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BHAKTI VICHAR CHAPTER NO. 22

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. प्रभु का नाम जापक तीर्थों को भी पवित्र करने वाला बन जाता है ।
002. प्रभु का नाम संचित पापों को नष्ट करता ही है और उसके साथ ही पाप करने की प्रवृत्ति का भी नाश कर देता है ।
003. प्रभु श्री यमराजजी अपने यमदूतों से कहते हैं कि जिसने प्रभु नाम का आश्रय ले लिया उसे कभी नर्क नहीं लाना क्योंकि ऐसा करने पर प्रभु का अपराध बन जाएगा ।
004. माया को परास्त करने के लिए मायापति प्रभु का आश्रय ही लेना पड़ेगा ।
005. धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और प्रभु प्रेम सभी नाम जप से सुलभ हो जाते हैं ।
006. सुख की रक्षा और दुःख की निवृत्ति के लिए प्रभु का नाम जप सर्वश्रेष्ठ है ।
007. प्रभु की कृपा का लाभ जगत का सबसे बड़ा लाभ है ।
008. जो प्रभु की भक्ति नहीं करता वह धरती पर भार स्वरूप है, ऐसा शास्त्र मत है ।
009. विपत्ति में केवल प्रभु को ही पुकारना चाहिए, संसार को कतई नहीं पुकारना चाहिए । यही अनन्यता प्रभु हमसे चाहते हैं ।
010. प्रभु की सेवा में ही हमारा कल्याण निहित है ।
011. अपनी समस्या को केवल प्रभु को निवेदन करें क्योंकि संसार के लोग तो अपनी ही समस्याओं से परेशान रहते हैं ।
012. मन की बात कभी कहनी हो तो केवल मनमोहन प्रभु से ही कहनी चाहिए ।
013. सदा जीवन में प्रभु का गुणगान करते रहना चाहिए ।
014. प्रभु की शपथ है कि कोई भयभीत, दीन, दुःखी उनकी शरण में आता है तो प्रभु कृपा ही करते हैं, कभी उसे ठुकराते नहीं ।
015. प्रभु को अपना स्वामी बनाकर तो देखें ऐसा स्वामी, ऐसा कुशल करने वाला और ऐसा हित करने वाला स्वामी जगत में दूसरा नहीं मिलेगा ।
016. प्रभु के पास माया भी है और भक्ति भी है । अब यह हमारे ऊपर है कि हम प्रभु से क्या लेकर आते हैं ।
017. जो जीवन में खूब भागना चाहता है, फंसना चाहता है, नाचना चाहता है वह माया लेता है पर जो प्रभु को अपनाना चाहता है वह प्रभु की भक्ति लेता है ।
018. हमें वह वाणी प्रभु से मांगनी चाहिए जिससे प्रभु का गुणगान हो सके । हमें वह कान प्रभु से मांगना चाहिए जिससे प्रभु का गुणानुवाद हम सुन सके । हमें वह हाथ प्रभु से मांगना चाहिए जो प्रभु की सेवा कर सके । हमें वह मस्तक प्रभु से मांगना चाहिए जो सदैव प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुका रहे ।
019. अपने जीवन के सभी कर्मफल प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पण कर देना चाहिए ।
020. प्रभु को छोड़कर किसी की भी याद जीवन में नहीं रखनी चाहिए । याद केवल और केवल प्रभु को ही जीवन में निरंतर करते रहना चाहिए ।
021. ब्रह्मांड में स्तुति करने योग्य केवल और केवल प्रभु ही हैं क्योंकि इंसान तो बुराइयों का पुतला है ।
022. प्रभु कृपा से भरे हुए हैं इसलिए जो उनके श्रीकमलचरणों में आ जाता है वह प्रभु की कृपा को पा जाता है ।
023. जो भय से की गई हो वह पूजा नहीं है, पूजा सदैव प्रभु प्रेम के कारण करनी चाहिए ।
024. प्रभु का आश्रय लेने पर बहुत बड़ा बल जीवन में हमें मिलता है ।
025. जो समय प्रभु की सेवा, प्रभु की चर्चा और प्रभु के चिंतन में लगाया जाता है वह जीवन का सबसे बेशकीमती समय होता है ।
026. कोई ऐसी जगह नहीं जहाँ प्रभु के कान न सुनते हो, प्रभु की आँखें न देखती हो और प्रभु की उपस्थिति न हो ।
027. प्रभु श्री कन्हैयाजी को सुबह देखने के बाद ही श्रीबृज की गायें घास खाती थीं । इतना प्रेम वे प्रभु से करती थीं ।
028. भक्तों को साथ जोड़कर प्रभु का नाम लिया जाए तो वह प्रभु को अति प्रिय लगता है जैसे श्री सूरदासजी के श्रीश्याम, भगवती मीरा बाईजी के श्रीगिरधर-गोपाल ।
029. भक्तों के पास भक्ति का बहुत बड़ा बल होता है ।
030. भक्तों के जगत में हमारा नाम होने का अर्थ है कि प्रभु के बही-खाते में हमारा नाम दर्ज हो गया ।
031. हर कार्य प्रभु को आगे रखते हुए और प्रभु को अर्पण करते हुए करना चाहिए, ऐसा करने पर हमसे कोई गलत कार्य नहीं होगा ।
032. प्रभु को जिसमें सुख मिले, भक्त सदा वही करता है ।
033. मनरूपी भंवर को प्रभु के चिंतन में ही लगाकर रखना चाहिए ।
034. एक राजा ने अपने तीन पुत्रों को 100 स्वर्ण मुद्रिकाएं दी और कहा कि अपने-अपने महल को भर दो । एक ने शराब पी, दूसरे ने शहर के कचरे से महल को भर दिया और तीसरे ने दीपक जलाकर पूरा महल प्रकाश से भर दिया । राजा तीसरे बेटे से प्रसन्न होकर उसे युवराज नियुक्त किया । अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो राजा प्रभु हैं और संतानें हम सब हैं । महल हमारा शरीर है । पहले राजकुमार की तरह कुछ लोग खाओ-पियो और मौज करो की जिंदगी में अपना जीवन व्यर्थ कर देते हैं । दूसरे राजकुमार की तरह कुछ संसार की व्यर्थ गंदगी से अपना जीवन भर देते हैं । पर तीसरे राजकुमार की तरह लायक व्यक्ति भक्ति के दीपक से अपना जीवन को जगमगा कर उसे सफल कर लेता है ।
035. जीवन में जब विकट परिस्थिति आए, कोई रास्ता न दिखे तो प्रभु की शरण में तत्काल चले जाना चाहिए ।
036. प्रभु की शरण सबके लिए है यानी हर प्राणी मात्र के लिए है ।
037. प्रभु की शरण में आने की दो ही शर्तें हैं, प्रभु पर पूर्ण भरोसा और प्रभु का पूर्ण विश्वास ।
038. शरण लेनी हो तो जीवन में केवल प्रभु की शरण लेनी चाहिए, किसी ऊँचे पद या प्रभाव के संसारी व्यक्ति की नहीं ।
039. प्रभु सबके हृदय में बैठे हैं और सबके हृदय के स्वामी हैं ।
040. कोई एक बार कह दे कि प्रभु मैं आपका हूँ तो प्रभु तत्काल उस जीव को अपना लेते हैं - यह प्रभु का संकल्प है ।
041. प्रभु हमारे जीवन से भय समाप्त कर देते हैं । प्रभु शरण में आते ही प्रभु हमें अभय कर देते हैं ।
042. शरण में आए हुए को प्रभु कभी नहीं ठुकराते, उसे तत्काल अपना लेते हैं ।
043. शरण में आने वाले के दोष प्रभु कभी नहीं देखते और उसे अपना लेते हैं ।
044. प्रभु पर अगर हमारा पक्का विश्वास हो तो प्रभु हमारी रक्षा करने के लिए बिलकुल तैयार हैं ।
045. प्रभु को साथ रखेंगे तो जीवन का मार्ग सुविधा युक्त हो जाएगा ।
046. प्रभु की भक्ति करने वाले पर प्रभु की माया प्रभाव नहीं डालती ।
047. हम प्रभु के लिए जैसी भावना करें प्रभु वैसा ही अनुभव हमें देंगे ।
048. जो प्रभु के सभी रूपों को एक समझता है वह मुक्त हो गया और जो प्रभु को अनेक समझता है वह जीवन भर भ्रमित होता रहता है ।
049. प्रभु श्री महादेवजी की कृपा से ही जीव प्रभु की भक्ति कर सकता है । इसलिए जो जीव भक्ति कर पा रहा है उसे प्रभु श्री महादेवजी का ऋण अपने ऊपर मानना चाहिए ।
050. जो प्रभु की शरण में आता है प्रभु उसे संसार के द्वंदों से मुक्त कर देते हैं ।
051. प्रभु की तरह दयालु और परोपकारी जगत में अन्य कोई भी नहीं है ।
052. प्रत्येक मनुष्य को अधिकार है जीवन में प्रभु की भक्ति प्राप्त करने का ।
053. जहाँ श्रीजी राधा हैं वहाँ कोई बाधा हमें परास्त नहीं कर सकती ।
054. जीवन में प्रभु की कृपा का पूर्ण भरोसा रखना चाहिए ।
055. प्रभु की कृपा से ही प्रभु की प्राप्ति संभव है ।
056. प्रभु की कठपुतली बनकर रहना सबसे श्रेष्ठ है ।
057. प्रभु शरणागत के कष्ट का हरण करने वाले हैं ।
058. जो अपनी हर इंद्रियों से भक्ति का प्रेम रस पिए, वही श्रीगोपी है ।
059. एक स्वस्थ व्यक्ति प्रभु कृपा से 21600 श्वासें रोजाना लेता है । भक्त वह होता है जो हर श्वास में प्रभु को याद कर लेता है ।
060. हम वक्त को इधर-उधर लगाते हैं पर संत कहते हैं कि हर वक्त प्रभु सुमिरन का ही होना चाहिए ।
061. चिता जले उससे पहले चेतना को प्रभु में मिला लेना चाहिए, अस्थि उठे उससे पहले आस्था प्रभु में जगा लेनी चाहिए ।
062. प्रभु की जीवन में प्रतीक्षा करने पर एक दिन प्रभु जरूर मिलकर रहेंगे । बस शर्त एकमात्र यही है कि अति विकल और आतुर प्रतीक्षा होनी चाहिए ।
063. प्रभु हरण करना जानते हैं इसलिए उनका एक नाम श्रीहरि है । प्रभु चित्त का हरण करते हैं ।
064. भक्त का आकर्षण प्रभु में हो यह प्रभु की उस भक्त पर बहुत बड़ी कृपा होती है ।
065. अपने भजन को हमेशा संभालना चाहिए, विपरीत अवस्था में भी भजन बना रहे, यह देखना चाहिए ।
066. संसार के भोग तो सभी भोगते हैं । अगर उसमें ही कल्याण होता तो सबका कल्याण हो चुका होता, सबका उद्धार हो चुका होता ।
067. भोगकर शांति नहीं मिल सकती, त्याग में ही शांति है ।
068. मन वश में नहीं हो तो वह हमारी सबसे ज्यादा दुर्गति करता है ।
069. भक्त का संग करने से भक्ति का रंग हम पर भी चढ़ता है ।
070. जीव को परम पवित्र करने का साधन प्रभु का नाम जप है ।
071. अपना मनुष्य जीवन व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए, इसमें प्रभु की प्राप्ति करनी ही चाहिए ।
072. अगर हमारा प्रभु में विश्वास हिल जाए तो प्रभु कभी नहीं मिलेंगे ।
073. प्रभु गंभीर हैं और शांत हैं इसलिए जब हमारा चिंतन प्रभु का होता है तो हमारी चंचल इंद्रियां भी गंभीर और शांत हो जाती हैं ।
074. भोग को कितना भी भोग ले उसमें शांति नहीं है । शांति तो एकमात्र प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही है ।
075. अपनी इंद्रियों को फिसलने से बचाना है तो उन्हें प्रभु में लगाए । इंद्रियां रूप देखना चाहती है तो उन्हें प्रभु का अति सुंदर रूप दिखाएं । इंद्रियां ऐश्वर्य देखना चाहती है तो उन्हें प्रभु का महान ऐश्वर्य दिखाएं ।
076. हमारा आचरण बिगड़ने से हम प्रभु से दूर हो जाते हैं ।
077. मन से की गई प्रभु की प्रार्थना द्वारा बहुत बड़े-बड़े काम बन जाते हैं ।
078. हम प्रभु की शरण में हैं तो कोई तंत्र, मंत्र, भूत और प्रेत हमें बाधा नहीं दे सकते ।
079. हमारा उद्देश्य अगर भगवत् प्राप्ति है तो हमें कोई भी नहीं रोक सकता क्योंकि प्रभु की कृपा हमें इस मार्ग में मिलती है ।
080. संत कहते हैं कि अल्प पुण्य वालों का प्रभु भक्ति में विश्वास नहीं होता । जो सच्चे भाग्यशाली होते हैं केवल उन्हें ही भगवत् भक्ति में विश्वास होता है । अगर भक्ति में विश्वास है तो निश्चित माने कि बहुत बड़ी और विशेष प्रभु कृपा हमारे ऊपर है ।
081. जब प्रभु किसी पर प्रसन्न होते हैं तो उसे अपनी अखंड स्मृति प्रदान करते हैं ।
082. जगत की विस्मृति और भगवत् स्मृति - यह प्रभु कृपा का परम फल होता है ।
083. अखंड सुख तो प्रभु की कृपा से ही प्राप्त हो सकता है । प्रभु कृपा प्रभु की शरण में जाने पर ही मिलती है ।
084. प्रभु के लिए दास भाव जागृत हो जाए कि हम प्रभु के नित्य अशुल्क दास हैं तो हमारा उसी समय कल्याण और मंगल हो जाएगा ।
085. प्रभु का जीवन में लिया भगवत् नाम ही अंत में हमारे साथ जाने वाला है ।
086. प्रभु नाम स्मरण करने की वृत्ति जीवन में बढ़ती रहनी चाहिए ।
087. जैसे संसारी के शरीर में रक्त दौड़ता है वैसे ही सिद्ध संतों के शरीर में प्रभु नाम दौड़ता है ।
088. शास्त्रों के बताए मार्ग पर चलने से ही मंगल होगा ।
089. प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय लेने से बुरे-से-बुरे प्रारब्ध भी बदल जाते हैं ।
090. भगवत् मार्ग पर चलने से कभी भी अमंगल होने की संभावना ही नहीं होती ।
091. माया के बल से संसार नाचता है पर उस माया को प्रभु नचाते हैं ।
092. प्रभु के मार्ग में चलने वाला सदैव सनाथ रहता है ।
093. प्रभु के विधान में कहीं भी, कभी भी, कोई कमी नहीं होती ।
094. प्रभु का स्मरण हो और अगर हृदय द्रवित नहीं हुआ तो वह हृदय नहीं पत्थर है ।
095. प्रभु से कहें कि ऐसी आँखें न दें जिससे प्रभु के लिए आंसू न टपके ।
096. अगर प्रभु पर भरोसा रखेंगे तो अंतिम फल मंगल ही होगा ।
097. सही आश्रय तो प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय ही है ।
098. प्रभु डूबते हुए जीव को उबारने वाले हैं ।
099. शरीर की खुराक भोजन से मिलती है वैसे ही आत्मा की खुराक सत्संग से मिलती है ।
100. प्रभु ही जगत में केवल अपने हैं ।
101. अपना सर्वस्व प्रभु को सौंप देना चाहिए ।
102. पूरे प्रेम भाव से प्रभु को भजने से भवसागर से बेड़ा पार हो जाता है ।
103. भाव बिना प्रभु तक हमारी प्रार्थना नहीं पहुँचती है ।
104. प्रभु अपने धाम में बैठे एक संकल्प से रावण को मार सकते हैं पर भगवती शबरीजी के फल खाने के लिए प्रभु को पृथ्वी पर अवतार लेकर आना पड़ता है ।
105. प्रभु अपने भक्तों का पूरा ध्यान रखते हैं ।
106. जिन्होंने अपना जीवन प्रभु को समर्पित कर रखा है, वे ही सही मायने में प्रशंसा के पात्र हैं ।
107. प्रभु की कथा निरंतर सुनते रहने से प्रभु से दूरी खत्म हो जाती है ।
108. जीवन में वही करें जिससे प्रभु को सुख मिले ।
109. प्रभु के रुख के विपरीत कभी भी नहीं चलना चाहिए ।
110. एक भक्त वे होते हैं जिनको प्रभु प्यारे होते हैं । एक भक्त वे होते हैं जो प्रभु को प्यारे होते हैं ।
111. प्रभु तो सभी भक्तों के प्यारे होते हैं पर कुछ लाड़ले भक्त प्रभु को भी प्यारे होते हैं ।
112. कभी अपने को असहाय नहीं मानना चाहिए । सहायता के लिए प्रभु सदैव उपलब्ध रहते हैं ।
113. अन्य जगह भक्त भगवान से संबंध बनाता है पर श्री सुदामाजी के प्रसंग में भगवान ने भक्त से संबंध बनाया ।
114. संसार का दूसरा नाम है समस्या और प्रभु का दूसरा नाम है समाधान । हर उलझन, हर तकलीफ में प्रभु का स्मरण करें तो उस उलझन और तकलीफ का समाधान निकल आएगा ।
115. प्रभु से की गई प्रार्थना में इतनी ताकत होती है कि वह नामुमकिन को मुमकिन बना देती है ।
116. जीवन में ऐसा कोई काम नहीं करें जिससे भक्ति की हानि हो ।
117. हम प्रभु के हैं, यही हमारा असली परिचय होना चाहिए ।
118. हमें प्रभु के संबंध से दुनिया में पुकारा जाए, जैसे कि यह प्रभु का भक्त है, तो ही हमारा मानव जीवन सफल है ।
119. इच्छा को शांत करने से ही सच्ची शांति मिलेगी ।
120. अपने मन की बात केवल मनमोहन प्रभु से ही कहनी चाहिए ।
121. प्रभु के सम्मुख जाने पर जीव का कोई दुःख बाकी नहीं बचता ।
122. हमारा भजन प्रभु की खुशी के लिए ही होना चाहिए ।
123. जीवन में प्रभु से एक संबंध जोड़ लेना चाहिए जैसा कि प्रभु के भक्तों ने जोड़ा है ।
124. प्रभु के सारे नाम एक बराबर हैं, उनमें कभी भी कोई फर्क नहीं करना चाहिए ।
125. प्रभु से प्रेम हो जाए तो प्रभु में मन लगने लग जाएगा ।
126. प्रभु के लिए प्रेम भाव रूपी संपत्ति अर्जित करनी चाहिए ।
127. तन से कोई हमें भजन करने से रोक सकता है पर मन से भजन करने पर कोई पाबंदी नहीं लगा सकता क्योंकि हम मन से क्या कर रहे हैं यह किसी को पता नहीं चल सकता ।
128. हमारा तन और धन को मांगने वाले दुनिया में होते हैं पर मन किसी को नहीं चाहिए । इसलिए मन प्रभु को अर्पित कर देना चाहिए क्योंकि प्रभु को केवल हमारा मन ही चाहिए ।
129. जीवन की शाम आए उससे पहले जीवन में श्रीश्याम आ जाए तो ही हमारा मानव जीवन सफल है ।
130. प्रभु श्रीलीला करके अपने भक्तों के हृदय में प्रवेश करते हैं ।
131. प्रभु की तरफ देखने से जीवन में बहुत बड़ा बल मिलता है ।
132. प्रभु प्राप्ति के रास्ते में एक जीवन लग जाए तो यह हमारा कितना बड़ा भाग्य है क्योंकि हमने कितने पूर्व जन्म संसार ही करके व्यर्थ गंवा दिए ।
133. प्रभु अपने भक्त को पार करने को खेवैया बनकर स्वयं आते हैं ।
134. संसार की बातें, संसार की उठापटक हमें प्रभावित नहीं करें तभी हम भक्ति के लिए तैयार हैं, ऐसा मानना चाहिए ।
135. प्रभु प्रेम की परीक्षा लेते भी हैं और देते भी हैं । संत कहते हैं कि द्वार पर खड़े श्री सुदामाजी के समय प्रभु प्रेम की परीक्षा देते हैं और दीन का मान बढ़ाते हैं ।
136. श्री सुदामाजी को प्रभु ने जब बहुत देर तक आलिंगन दिया तो फिर दोनों ने एक दूसरे का सुख विचार कर आलिंगन को ढीला किया । श्री सुदामाजी ने सोचा कि मेरे शरीर की हड्डियां प्रभु के कोमल शरीर को पीड़ा दे रही होगी और प्रभु ने सोचा कि आलिंगन में कसकर पकड़ने से श्री सुदामाजी की हड्डियां को पीड़ा पहुँचेगी क्योंकि उनके शरीर पर हड्डियों का ढांचा मात्र था ।
137. प्रभु ने जब श्री सुदामाजी के मस्तिष्क पर तिलक किया तो संत कहते हैं कि प्रभु ने विधि की रेखा को पलट दिया । विधि ने श्रीक्षय (धन का सदैव नाश हो) लिखा था पर प्रभु ने उसे पलट कर क्षयश्री (धन का कभी नाश न हो) कर दिया । प्रभु श्री ब्रह्माजी ने पूछा तो प्रभु ने कहा कि मेरे द्वार पर आने से पहले विधि के विधान बाधा दे सकती थी पर प्रभु से मिलने पर जीव के ऊपर विधि का लेख निष्क्रिय हो जाता है ।
138. प्रभु ने श्री सुदामाजी को भगवती रुक्मिणी माता के महल के पलंग पर बैठाया और माता ने पूछा कि प्रभु श्री ब्रह्माजी और श्री इंद्रदेवजी को भी अंतःपुर में प्रवेश नहीं है पर यह कौन हैं जो मेरे अंतःपुर के महल और पलंग पर आ गए हैं । संत कहते हैं कि प्रभु ने कहा कि मैं जगत के लिए भगवान हूँ तो ऐसा समझो कि श्री सुदामाजी मेरे भगवान हैं ।
139. प्रभु ने श्रीलीला करते हुए अपनी 16108 रानियों (माताओं) को कहा कि श्री सुदामाजी को प्रणाम कर आशीर्वाद लें । सभी रानियां प्रणाम करने लगीं और श्री सुदामाजी हाथ उठाकर लंबा आशीर्वाद देने लगे । फिर रानियां आती गईं और थककर श्री सुदामाजी का हाथ उठाना बंद हो गया, फिर आशीर्वाद के शब्द भी मंद पड़ गए । श्री सुदामाजी घबराए तो प्रभु ने कहा कि अभी तो इतनी रानियां बाकी हैं । प्रभु ने कहा कि एक उपाय है बचने का कि अगर रानियों की जगह उनके पति प्रणाम कर ले तो सभी रानियों को आशीर्वाद के फल की प्राप्ति हो जाएगी और प्रभु ने श्री सुदामाजी को दंडवत प्रणाम किया । देवतागण इस भक्तवत्सल प्रभु की झांकी देखकर आकाश से लगातार फूल बरसाते रहे ।
140. प्रभु को मत बताइए कि कितनी मुश्किलें हैं आपके पास, मुश्किलों को बताइए कि प्रभु हैं आपके पास और आपके साथ ।
141. अगर आप चाहते हैं कि आपकी बात प्रभु तक जल्दी पहुँचे तो शिकायत के बजाय शुक्रिया करने वालों की लाइन में लगना चाहिए । शिकायत की लाइन में भीड़ बहुत है और वक्त लग जाएगा पर शुक्रिया करने वालों की लाइन छोटी होती है इसलिए बहुत जल्दी बारी आ जाएगी ।
142. संतों ने श्रीहरि चरण को दुःख हरण का नाम दिया है ।
143. जो मायापति की शरण में चले जाते हैं उन पर माया प्रभाव नहीं करती ।
144. संत कहते हैं कि हमें माधव का भक्त बनना चाहिए माधव की माया का भक्त नहीं बनना चाहिए ।
145. प्रभु कहते हैं कि मैं किसी भी सच्चे भक्त की भक्ति का मोल नहीं चुका सकता । भक्ति की इतनी महिमा प्रभु बतलाते हैं ।
146. जिस कार्य के लिए हमें मानव तन मिला है वह कार्य यानी भगवत् प्राप्ति करने से हम चूक जाते हैं ।
147. आज भजन करने के साधन तो खूब बढ़ रहे हैं पर सच्ची साधना कम होती जा रही है ।
148. रूप में कोई सुंदर हो पर मुँह पर प्रभु का नाम न हो और हाथों में प्रभु की सेवा न हो तो शास्त्र उसे कतई सुंदर नहीं मानते ।
149. प्रभु जब पूछें कौन ? तो हमारे तरफ से उत्तर यही मिलना चाहिए कि आपका दास ।
150. भजन का एक अर्थ भगवत् मिलन की तैयारी है ।
151. कभी भी यह आशा नहीं छोड़ें कि इस मानव जन्म में हमें प्रभु प्राप्ति नहीं होगी ।
152. प्रभु सबके भीतर चेतना के रूप में विराजमान हैं ।
153. सबके चित्त का आकर्षण करने वाले प्रभु श्री कृष्णजी हैं और प्रभु श्री कृष्णजी के चित्त का आकर्षण करने वाली भगवती राधा माता हैं ।
154. संसार में देह के संबंधों को हम अपना मानने लग गए और जो सदा-सदा से अपने हैं उन प्रभु को हमने भुला दिया है ।
155. जगत के मालिक प्रभु का जब सिर पर हाथ होता है तो फिर कोई भी चिंता की बात जीवन में नहीं रहती ।
156. आज हमने संसार में बहुत कुछ प्राप्त कर लिया है पर भजन मार्ग में बहुत पिछड़े हुए हैं । यह हमारी सबसे बड़ी विफलता है और हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य है ।
157. प्रभु जिसके अनुकूल हो जाते हैं सारे नक्षत्र और ग्रह भी उस जीव के अनुकूल हो जाते हैं ।
158. अपने को अकेला मानना अनर्थ का कारण होता है इसलिए सदैव प्रभु को अपने संग में माने ।
159. प्रभु की कृपा मिलनी कठिन नहीं है पर संत कहते हैं कि उस प्रभु कृपा को बचा पाना और पचा पाना कठिन होता है ।
160. अपने आपको मालिक कदापि नहीं मानना चाहिए । संत कहते हैं कि अपने आपको प्रभु का मुनीम या माली मानना चाहिए यानी प्रभु के कार्य का मुनीम और प्रभु के बाग का माली ।
161. हमारा लक्ष्य प्रभु को सुख देना और प्रभु की सेवा करनी होना चाहिए ।
162. लोग धन की हानि, स्वास्थ्य की हानि, प्रतिष्ठा की हानि को सबसे बड़ी हानि मानते हैं पर शास्त्र और संत कहते हैं कि भजन की हानि सबसे बड़ी हानि होती है ।
163. जो व्यक्ति प्रभु पर भरोसा रखता है उसको संसार की कोई भी परिस्थिति विचलित नहीं कर सकती ।
164. भगवती तुलसी माता को शास्त्रों में श्री हरिप्रिया कहा गया है ।
165. प्रभु को प्रणाम करने से जीव के पापों का नाश होता है ।
166. संसार में चाहने से कुछ नहीं मिलता, करने से मिलता है पर भक्ति साम्राज्य में केवल हृदय से सच्चे रूप से चाहने से प्रभु मिल जाते हैं ।
167. भक्तों को प्रेरणा देने वाले प्रभु ही होते हैं ।
168. प्रभु की भुजा हमें आश्रय देने वाली होती है ।
169. प्रभु ने सात दिवस ही श्री गिरिराजजी को धारण क्यों किया ? पांच या आठ दिवस क्यों नहीं किया ? संत भाव देते हैं कि प्रभु ने सात दिवस धारण करके बताया कि वे हफ्ते के सातों दिन हमारी रक्षा करने के लिए उपलब्ध हैं ।
170. जो श्रीहरि की सेवा करे वही सच्चा हरिदास है ।
171. प्रभु का अवतरण भक्तों को सुख देने के लिए ही होता है ।
172. अगर प्रभु का यशगान सुनने और करने का मन नहीं करता तो निश्चित माने कि संचित पाप हमारे ऊपर अभी भारी पड़ रहे हैं । उन्हें प्रभु का यशगान सुनाकर ही मिटाया जा सकता है ।
173. जितना भजन का धन जीवन में कमाया है वहीं अंत में मृत्यु के बाद हमारे साथ जाएगा ।
174. मृत्यु के बाद प्रभु के श्रीकमलचरणों में स्थान पाने का ही हमें जीवन में लक्ष्य रखना चाहिए ।
175. प्रभु ही हमारे सर्वस्व हैं, प्रभु के अलावा हमारा जगत में कोई भी अपना नहीं है - यह मान्यता हृदय में धारण करके एवं दृढ़ करके रखनी चाहिए ।
176. संसार की दृष्टि में भाग्यवान की परिभाषा कुछ और होती है पर प्रभु की दृष्टि में भाग्यवान वह है जिसकी दृष्टि संसार से हटकर प्रभु की तरफ हो गई है ।
177. धन का संचय करने वाला नहीं बल्कि प्रभु प्रेम का संचय करने वाला सच्चा भाग्यवान होता है ।
178. प्रभु हर जीव से पूछते हैं कि मुझसे चाहते हो या मुझे चाहते हो ? जो प्रभु से चाहते हैं उन्हें धन, संपत्ति यहाँ तक कि मुक्ति देकर भी प्रभु अपना पिंड छुड़ा लेते हैं । पर जो प्रभु को चाहते हैं उन्हें प्रभु को स्वयं प्रदान करना पड़ता है । प्रभु को उनके प्रेम बंधन को स्वीकार करना पड़ता है ।
179. संत कहते हैं कि प्रभु और माता की प्राप्ति के अतिरिक्त जीवन में कोई कामना नहीं रखनी चाहिए ।
180. मानव देह हमें अपने उद्धार करने के लिए ही मिली है ।
181. भजन जीवन में हो रहा है तो सब कुशल है, भजन नहीं हो रहा है तो कुछ भी कुशल और मंगल नहीं है ।
182. प्रभु जैसा दयालु और कृपालु पूरे ब्रह्मांड में अन्य कोई भी नहीं है ।
183. अपने भक्तों की सेवा करने से प्रभु कभी नहीं चूकते ।
184. प्रभु को कृपा करने की आदत है । प्रभु का अकारण कृपा करने का स्वभाव है । प्रभु कृपा करे बिना रह ही नहीं सकते ।
185. जीव को कभी भी अपने सौभाग्य का मद नहीं होना चाहिए ।
186. भक्त अनुकूलता को प्रभु की कृपा मानते हैं और प्रतिकूलता को भी प्रभु की बड़ी कृपा मानते हैं ।
187. अनन्यता और दीनता भक्ति के लिए परम आवश्यक हैं । संत कहते हैं कि भक्तिरूपी नदी जो सागररूपी प्रभु के पास जा रही है उसके दो तट यानी किनारे हैं । एक अनन्यता का और एक दीनता का । अगर एक भी किनारा टूट गया तो नदी का जल अन्यत्र जाकर विनाश करेगा और सागर में मिलने से वह नदी वंचित रह जाएगी ।
188. चित्त में अभिमान रहता है तो उसमें भगवान नहीं रहते ।
189. प्रभु जहाँ रहेंगे अकेले ही रहेंगे इसलिए अपने हृदय को पूर्ण रिक्त करने पर प्रभु उसमें आकर विराजते हैं ।
190. जीवन में एकमात्र भरोसा प्रभु कृपा का ही होना चाहिए ।
191. प्रभु का एक नाम अच्युत है । संतजन कहते हैं कि जो अपने प्रण से कभी भी चूकते नहीं वे अच्युत प्रभु हैं ।
192. प्रभु हमारे जितने निकट हैं उतना निकट अन्य कोई भी संसार में नहीं हो सकता ।
193. प्रबलता से प्रभु के नाम को पकड़ कर रखना चाहिए ।
194. हम अध्यात्म से दूर होकर विकास की तरफ जा रहे हैं या विनाश की तरफ जा रहे हैं, यह कभी सोचना चाहिए ।
195. सभी विद्या तभी धन्य होती हैं जब वह प्रभु के साथ जुड़ती हैं और प्रभु के काम में लगती हैं ।
196. प्रभु का नाम भी प्रभु की तरह बहुत दयालु है ।
197. मन न लगता हो तब भी प्रभु का नाम जप करना चाहिए । नाम भगवान की कृपा एक दिन जरूर होगी और मन लगने लगेगा ।
198. दूसरों की बुराई देखने से कोई लाभ नहीं होगा । स्वयं की बुराई देखने पर हम उसे सुधार कर लाभान्वित हो पाएंगे ।
199. प्रभु के श्रीकमलचरण वैष्णवों की सबसे बड़ी संपत्ति होती है ।
200. प्रभु की शरण लेकर उनके श्रीकमलचरणों के सहारे ही अपना जीवन जीना चाहिए ।
201. जो सागर में डूब रहा होता है उसका बचाने के लिए हाथ ऊपर उठा हुआ होता है । वैसे ही भवसागर में डूबे साधक प्रभु की जय बोलते समय हाथ ऊपर उठाकर रखते हैं कि वे डूब रहे हैं, प्रभु उन्हें बचाएं ।
202. जब तक हमारा मन “मोहन” से नहीं मिलेगा तब तक हमें जीवन में मनमोहन प्रभु कैसे मिलेंगे ?
203. लोग कहते हैं कि पैसा संभाल कर रखें क्योंकि बुरे वक्त में काम आएगा पर संत कहते हैं कि प्रभु से रिश्ता बनाकर रखें तो बुरा वक्त ही नहीं आएगा ।
204. प्रभु जहाँ विराजते हैं वहाँ की शोभा श्री बैकुंठजी से भी बड़ी हो जाती है ।
205. प्रभु के अलावा अपना कहलाने वाला पूरे जगत में हमारा अन्य कोई भी नहीं होना चाहिए । यह भक्त का दृष्टिकोण होता है ।
206. भक्ति के रस को चखने के बाद मन संसार के विषय रस की तरफ आकृष्ट नहीं होगा क्योंकि जिसने मिश्री खा ली वह कड़वा नीम क्यों खाएगा ?
207. प्रभु जिनको अपनाते हैं उनका पूरा दायित्व और चिंता प्रभु वहन करते हैं ।
208. भक्त और किसी से जीवन में आशा नहीं रखता क्योंकि उसको पूर्ण आश्रय प्रभु का जो होता है ।
209. उस भक्त को स्वर्ग-नर्क से कोई लेना-देना नहीं होता जो एकमात्र प्रभु पर आश्रित होता है ।
210. जीवन में आश्रय केवल प्रभु का और प्रभु के नाम का ही होना चाहिए ।
211. प्रभु के श्रीकमलचरण संसार सागर में डूबते जीवों के लिए एकमात्र सहारा होते हैं ।
212. जीव अनाथ तभी तक है जब तक उसका प्रभु श्री जगन्नाथजी से परिचय नहीं होता । प्रभु से परिचय होते ही जीव सदैव के लिए सनाथ हो जाता है ।
213. चकोर पक्षी मरना पसंद कर लेता है पर श्री चंद्रदेवजी को छोड़कर कुछ निहारता नहीं । इसी प्रकार हमें भी प्रभु के लिए अनन्यता होनी चाहिए जैसे चकोर पक्षी में श्री चंद्रदेवजी के लिए होती है ।
214. प्रभु की एक कृपा दृष्टि शरणागत के अनंत कोटि जन्मों के पापों का हरण करने वाली होती है ।
215. प्रभु भक्तों के सात्विक संकल्पों को कभी भी नहीं तोड़ते ।
216. भक्ति में प्रभु का ही एकमात्र सहारा मिलेगा । संसार से भक्ति मार्ग में कभी सहारा नहीं मिलता ।
217. घर में तो सबके श्री ठाकुरजी होते हैं पर हमें अपने हृदय में श्री ठाकुरजी को विराजमान करना होगा, तभी बात बनेगी ।
218. वर्तमान अगर भगवत् चिंतन में चल रहा है तो भविष्य हमारा गुलाम बनकर रहेगा ।
219. भक्ति करने पर प्रभु की कृपा से बहुत बड़ी सामर्थ्य हमारे भीतर आ जाती है ।
220. भविष्य उनको भयभीत करता है जो प्रभु से विमुख होते हैं ।
221. श्रीहरि का अर्थ है जो अपने शरण में आए हुए के दुःखों को, पापों को, क्लेशों को, चिंताओं को, भयों को, भटकन को, विषाद को हरण कर लेते हैं ।
222. संत कहते हैं कि कोई प्रभु की तरफ एक कदम बढ़ाता है तो प्रभु सौ कदम उससे मिलने के लिए दौड़ते हैं ।
223. कथारूपी माता और कीर्तनरूपी पिता की अंगुली पकड़ कर रखने से हम संसार के मेले में नहीं खोएंगे ।
224. प्रभु की कथा सुनने मात्र से वह हमारा मंगल करने वाली होती है ।
225. प्रभु की कथा जीव के संपूर्ण अमंगलों का नाश करती है ।
226. पूरे विश्व में दानी, महान और धन्य वे होते हैं जो भक्ति का प्रचार करके जीव को प्रभु से जोड़ते हैं ।
227. प्रभु की कथा प्रभु प्रेम के अंकुर को हमारे भीतर अंकुरित करती है ।
228. हमारी हर श्वास प्रभु की अमानत है ।
229. प्रभु का स्मरण ही जीव का सब तरफ से मंगल करने वाला होता है ।
230. प्रभु का यश गाते-गाते जीवन की संध्या हो जाए, ऐसा भाव संत रखते हैं ।
231. श्रवण, कीर्तन और स्मरण भक्ति के प्राण स्वरूप हैं ।
232. इतना प्रबल प्रभु स्मरण हो कि हम प्रभु के लिए भावनाओं में खो जाएं ।
233. प्रभु की मानसी सेवा सर्वोपरि सेवा है ।
234. हर प्रेममयी चेष्टा केवल प्रभु के लिए ही होनी चाहिए ।
235. जन्म-जन्म का भटका चित्त प्रभु में अटक जाए, यही भक्ति है ।
236. वही चीज का श्रवण करें जिससे हमारी भक्ति पुष्ट होती हो ।
237. जगत से जगतपति तक की यात्रा का नाम ही भक्ति है ।
238. भक्ति हमें भगवत् अर्पित कर देती है ।
239. संसार के सभी जीव बिछुड़ने वाले हैं, एकमात्र प्रभु ही हैं जो जीव से कभी नहीं बिछुड़ेंगे ।
240. जीवन प्रभु से जुड़ जाए तभी जीवन में विश्राम मिलेगा ।
241. एक प्रभु के अलावा अपना जगत में कोई नहीं है, ऐसा संतों ने प्रत्यक्ष अनुभव किया है ।
242. प्रभु के सभी नाम परम मंगलकारी हैं ।
243. शास्त्रों के सभी उपदेश हमारे मंगल के लिए होते हैं ।
244. प्रभु को अर्पण करके भोजन पाने से वह भोजन हमारी बुद्धि को शुद्ध करता है ।
245. कोई सेकेंड ऐसा नहीं होता जब हम प्रभु की दृष्टि में न हो ।
246. प्रभु के प्रेम गंगा में स्नान करने के बाद जो तृप्ति मिलती है उसका वर्णन संभव नहीं है ।
247. सैकड़ो पुण्यों का फल होता है श्री गंगा माता का स्नान क्योंकि वे प्रभु के श्रीकमलचरणों से निकली हैं ।
248. अगर चार सौ कोस दूर से भी कोई श्री गंगा माता को याद करे तो भी उस जीव के पाप क्षय हो जाते हैं ।
249. प्रभु कहते हैं कि भक्ति करने वाले से पवित्र त्रिभुवन में अन्य कोई भी नहीं है ।
250. प्रभु की कृपा बड़ी-से-बड़ी समस्या का भी विध्वंस कर देती है ।
251. प्रभु नाम जप किया हुआ कभी नष्ट नहीं होता, वह प्रभु के पास जमा हो जाता है ।
252. बिना मन के जहर पीने से मर जाएंगे, बिना मन के आग को छूने से जल जाएंगे, ऐसे ही बिना मन के भी प्रभु का नाम जप करने से वह हमारा कल्याण ही करेगा ।
253. प्रभु नाम जप के प्रभाव से हमारे अशुभ भस्म हो जाते हैं ।
254. कोई भी व्यक्ति, कोई भी घटना, कोई भी परिस्थिति हमें तब तक तकलीफ दे सकती है जब तक प्रभु भक्ति हम नहीं करते । भक्त को कोई व्यक्ति, घटना, परिस्थिति बाधा नहीं पहुँचा सकती क्योंकि उसकी रक्षा प्रभु करते हैं ।
255. जीवन में आकर्षण केवल और केवल प्रभु का ही होना चाहिए ।
256. कोई परिस्थिति हमें विपरीत प्रभावित कर रही है तो इसका मतलब है कि प्रभु पर हमारा भरोसा कम है ।
257. प्रभु शरणागत का बल होते हैं जिस कारण वह शरणागत जीव प्रभु कृपा से हर विपरीत परिस्थिति से मुस्कुरा कर बाहर निकल जाता है ।
258. प्रभु प्रेम का रंग चढ़ने पर संसार का कोई रंग हमें प्रभावित नहीं कर सकता ।
259. उपदेश में महानतम और आकृति में लघुत्तम श्रीग्रंथ है श्रीमद् भगवद् गीताजी ।
260. इतने छोटे आकार का संसार का सबसे प्रसिद्ध श्रीग्रंथ है श्रीमद् भगवद् गीताजी ।
261. संपूर्ण आध्यात्मिक श्रीग्रंथों का कोहिनूर रत्न श्रीमद् भगवद् गीताजी है क्योंकि यह प्रभु की वाणी रूपी श्रीग्रंथ है ।
262. मृत्यु पर जगत को छोड़कर जाने का आनंद हमें महसूस होना चाहिए कि हम प्रभु के धाम जा रहे हैं । इसे ही जीवन रहते मोक्ष कहा गया है ।
263. जो बातें श्री महाभारतजी में बड़े विस्तार के साथ समझाई गई है वही बातें श्रीमद् भगवद् गीताजी में सिद्धांत रूप में सार रूप में प्रतिपादन की गई है ।
264. श्री वेदजी का सार श्री महाभारतजी है और श्री महाभारतजी का सार श्रीमद् भगवद् गीताजी है ।
265. प्रभु के श्रीमुख से प्रकट होने के कारण श्रीमद् भगवद् गीताजी का महत्व श्री वेदजी से भी अधिक है ।
266. भगवती गंगा माता के नाम का उच्चारण मात्र ही हमारे पापों का नाश कर देता है ।
267. प्रभु के श्री मुखारविंद से निकली श्री गंगारूपी श्रीग्रंथ है श्रीमद् भगवद् गीताजी ।
268. जीव प्रभु का अंश होने के कारण आनंद स्वरूप है । यह भय, शोक, मोह बाहर की मलिनता है । यह हमारा स्थाई हिस्सा नहीं है । हमारा स्थाई स्वरूप आनंदमय है ।
269. वही भाग्यवान हैं जो किसी भी प्रकार से श्रीमद् भगवद् गीताजी से जुड़े हुए हैं ।
270. प्रभु इतने करुणानिधान हैं कि सारे शास्त्रों का सार के रूप में 700 श्लोकों का लघु शास्त्र श्रीमद् भगवद् गीताजी हमें दे दी ।
271. प्रभु की वाणी होने के कारण श्रीमद् भगवद् गीताजी मंत्र रूप है ।
272. जिसको श्रीमद् भगवद् गीताजी सुनाई जा रही है वह समझे या न समझे उसका परम उद्धार श्रीमद् भगवद् गीताजी करने वाली है । इसलिए ही प्रथा है कि मरण अवस्था में मनुष्य को श्रीमद् भगवद् गीताजी सुनाई जाती है ।
273. श्रीमद् भगवद् गीताजी का वाचन, पारायण, पठन यहाँ तक कि इस श्रीग्रंथ को प्रणाम करने वाला भी दिव्य गति को प्राप्त होता है ।
274. श्रीमद् भगवद् गीताजी के ईश्वर बहुत उदार हैं । वे पठन या प्रणाम करने वाले दोनों को समान फल प्रदान करते हैं ।
275. श्रीमद् भगवद् गीताजी हमें भीतर से परिवर्तित कर देती हैं ।
276. श्रीमद् भगवद् गीताजी सभी श्रीग्रंथों का सार रूप है ।
277. संपूर्ण वैदिक साहित्य के रहस्य रूप में श्रीमद् भगवद् गीताजी को प्रभु ने प्रकट किया है ।
278. विदेशों में जहाँ-जहाँ श्रीमद् भगवद् गीताजी पहुँची उन लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया कि हम यह क्या दिव्यतम श्रीग्रंथ पढ़ रहे हैं ।
279. श्रीमद् भगवद् गीताजी से बढ़कर और कोई भी अध्ययन नहीं हो सकता और न ही कोई ज्ञान हो सकता है ।
280. प्रभु श्री कृष्णजी का एक नाम गोपाल है यानी गौ-माता का पालन करने वाले । उन्होंने दूधरूपी ज्ञान का भी दोहन किया और उस मंथन को श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में श्री कुरुक्षेत्रजी में प्रकट किया ।
281. श्रीमद् भगवद् गीताजी ने अपने दिव्य उपदेश से सारे संसार का सदा के लिए कल्याण कर दिया ।
282. श्री अर्जुनजी को श्रीमद् भगवद् गीताजी सुनने को मिली यह प्रभु श्री कृष्णजी की कृपा थी । हमें श्रीमद् भगवद् गीताजी पढ़ने को मिलती है यह प्रभु श्री कृष्णजी की कृपा के साथ-साथ प्रभु श्री वेदव्यासजी की कृपा भी है, जिन्होंने संकलन किया और आने वाले समय और पीढ़ियों के लिए इस अनमोल ज्ञान को लुप्त नहीं होने दिया ।
283. श्रीमद् भगवद् गीताजी हमारी साक्षात माता हैं । सनातन धर्म की हमारी पूरी परंपरा में श्रीमद् भगवद् गीताजी को माँ के रूप में देखा गया है ।
284. प्रभु और माता के पास हमेशा छोटे बनकर जाना चाहिए क्योंकि बड़े बच्चों से माता-पिता का उतना प्रेम बंधन नहीं होता जितने छोटे बच्चे से होता है ।
285. बड़े के लिए माता-पिता के पास नियम होते हैं पर छोटे के लिए केवल लाड़-ही-लाड़ होता है । इसलिए प्रभु और माता के समक्ष हरदम छोटे बनकर ही जाना श्रेयस्कर होता है ।
286. जो प्रभु के सामने छोटा बनने में लाभ है वह बड़े बनने में कदापि नहीं है ।
287. कितना भी किसी का पतन हुआ हो प्रभु उसे दुत्कारते नहीं, उसे संभालते हैं और माफ करते हैं ।
288. प्रभु में वात्सल्य की प्रधानता है क्योंकि प्रभु सबके परमपिता हैं ।
289. माँ की तरह श्रीमद् भगवद् गीताजी से प्रेम करना चाहिए तो हमारा कल्याण-ही-कल्याण होगा ।
290. श्रीमद् भगवद् गीताजी का अशुद्ध पाठ भी हो तो प्रभु व्याकरण नहीं देखते, पाठ करने वाले का अंतःकरण देखते हैं ।
291. श्रीमद् भगवद् गीताजी जीव का उद्धार-ही-उद्धार करती है । इससे कम कुछ नहीं करती, न कर सकती है ।
292. प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखना चाहिए ।
293. जिसने जीवन में एक भी दिन श्रीमद् भगवद् गीताजी पढ़े बिना नहीं बिताया, उसके अंतकाल में प्रभु दौड़कर आए बिना नहीं रहेंगे । इसलिए एक अध्याय, नहीं तो एक श्लोक, नहीं तो आधा श्लोक रोजाना श्रीमद् भगवद् गीताजी का जरूर पढ़ना चाहिए ।
294. श्रीमद् भगवद् गीताजी को प्रभु ने अपना हृदय बताया है ।
295. प्रभु सबसे ज्यादा प्रेम उससे करते हैं जो रोजाना श्रीमद् भगवद् गीताजी पढ़ता है, रोजाना श्रीमद् भगवद् गीताजी पढ़ाता है और जो श्रीमद् भगवद् गीताजी को जीवन में उतारने का प्रयास करता है ।
296. श्रीमद् भगवद् गीताजी को पूर्ण रूप से आज तक कोई नहीं जान पाया है, केवल प्रभु श्री कृष्णजी ही श्रीमद् भगवद् गीताजी के संपूर्ण रहस्यों को जानते हैं ।
297. अपनी जितनी शक्ति और क्षमता है उसे पूरी लगा देनी चाहिए श्रीमद् भगवद् गीताजी के अदभुत ज्ञान को जानने के लिए ।
298. श्रीमद् भगवद् गीताजी पढ़ने के बाद अन्य कोई श्रीग्रंथ हमने पढ़ा नहीं तो भी हमारा कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है क्योंकि पूर्ण ज्ञान हमें श्रीमद् भगवद् गीताजी से प्राप्त हो जाता है ।
299. रोज थोड़ी-सी भी श्रीमद् भगवद् गीताजी पढ़ने का हमें अपना दैनिक स्वभाव बना लेना चाहिए क्योंकि यह आदत पड़ जाए तो हमारा मंगल और कल्याण पक्का है ।
300. श्रीमद् भगवद् गीताजी का श्रीग्रंथ घर में रखने मात्र से हमारा उद्धार हो जाता है ।
301. श्रीमद् भगवद् गीताजी का पठन ही नहीं, दर्शन मात्र भी हमारा निश्चित कल्याण करता है ।
302. नि:स्वार्थ भाव से अपनी जन्मभूमि की सेवा करनी चाहिए ।
303. प्रभु द्वारा दिया गया मानव जीवन के लिए सर्वोच्च उपहार श्रीमद् भगवद् गीताजी ही है क्योंकि यह प्रभु का दिव्य प्रसाद है ।
304. हमें भी प्रभु ने शरीररूपी रथ दिया है । इंद्रियां इसके घोड़े हैं । सारथी इसकी बुद्धि है और सारथीरूपी बुद्धि जिस लगाम से इंद्रियांरूपी घोड़ों को नियंत्रित करती है वह लगाम हमारा मन है । यानी मनरूपी लगाम से बुद्धिरूपी सारथी इंद्रियांरूपी घोड़ों को शरीररूपी रथ में चलाती है ।
305. श्रीमद् भगवद् गीताजी का श्रवण बुद्धिरूपी सारथी को ठीक करने के लिए है । बुद्धि को शुद्ध करने का अन्य कोई उपाय नहीं है ।
306. बुद्धि भ्रष्ट होते ही जीव का पतन होता है । इसलिए बुद्धि को दुरुस्त करने के लिए श्रीमद् भगवद् गीताजी है ।
307. जीवन के लिए शास्त्र प्रकाशक (प्रकाश देने वाले) होते हैं ।
308. हमारा जीवन शुद्ध, सादगीपूर्ण और ज्ञानमय होना चाहिए ।
309. क्षमा करना भक्तों का अलंकार होता है ।
310. प्रभु को सदैव अपने पक्ष में ही रखना चाहिए ।
311. प्रभु श्री हनुमानजी का किसी के पक्ष में भी विराजना उस व्यक्ति की निश्चित विजय का सूचक होता है क्योंकि प्रभु श्री हनुमानजी विजय के देव हैं ।
312. श्री अर्जुनजी का भाग्य देखें कि रथ पर प्रभु श्री नारायणजी (प्रभु श्री कृष्णजी) के रूप में विराजते हैं और प्रभु श्री महादेवजी (प्रभु श्री हनुमानजी) के रूप में ध्वज पर विराजते हैं ।
313. प्रभु में परिपूर्ण श्रद्धा और निष्ठा होनी चाहिए ।
314. चाहे हमारे बुरे कर्म को संसार में किसी ने नहीं देखा पर देखने वाले प्रभु सर्वत्र होने के कारण प्रभु सब कुछ देखते हैं और उनसे कुछ भी छुपा हुआ नहीं है ।
315. प्रभु का न्याय सर्वत्र देखने को मिलता है अगर उसे देखने वाली आँखें हमारे पास हो तो ।
316. हमारा हर कर्म प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही होना चाहिए ।
317. संत और भक्त छिपकर भी कोई गलती नहीं करते क्योंकि उन्हें पता होता है कि प्रभु देख रहे हैं ।
318. हमसे भूलकर भी कोई भूल न हो, यह केवल भक्ति से ही संभव है ।
319. हमारी नैतिकता कभी भी शिथिल नहीं पड़नी चाहिए ।
320. अपने द्वारा होने वाली बुराई, गलती और पाप से हमें सदैव डरना चाहिए तभी हम उनसे बच पाएंगे ।
321. संतों का संग करने से मन प्रभुमय होगा और संसारी का संग करने से मन संसारमय होगा ।
322. प्रभु की प्राप्ति प्रभु के कृपा के बल पर ही संभव होती है ।
323. मानव जीवन कैसे व्यतीत किया जाना चाहिए यह पढ़ाने वाला श्रीग्रंथ श्रीमद् भगवद् गीताजी है ।
324. जीव को भक्ति से ही आनंद उपलब्ध हो सकता है ।
325. भक्ति हमें आनंद उपलब्ध कराती है जहाँ है वहीं से, जिस भी स्थिति में है उसी में और जब से हम भक्ति करने लगते हैं तभी से ।
326. चाहे कुछ भी हो जाए पर प्रभु के ऊपर विश्वास कभी नहीं खोना चाहिए । प्रभु पर विश्वास रहेगा तो परीक्षा अवश्य होगी पर हम उसमें प्रभु कृपा से सफल हो जाएंगे ।
327. प्रभु के विषय में हरदम सकारात्मक ही रहना चाहिए । सभी श्रीग्रंथ हमें यही उपदेश देते हैं । श्रीमद् भगवद् गीताजी भी हमें यही सिखाती हैं ।
328. प्रभु के सच्चे भक्त प्रभु कृपा से गुणों की खान होते हैं ।
329. जितनी भी शिक्षा प्रभु श्री रामजी के श्रीचरित्र से हम प्राप्त कर सकते हैं, उतनी करने से हमारा जीवन पूर्ण मंगलमय हो जाएगा ।
330. प्रभु के समक्ष अबोध बालक की तरह बनकर जाएं कि मैं कुछ नहीं जानता । यह श्री अर्जुनजी की श्रीमद् भगवद् गीताजी के दूसरे अध्याय की भूमिका है जिसके बाद प्रभु ने उनका भरपूर मार्गदर्शन किया ।
331. बिना मांगे भूखे को रोटी खिला देना पर आत्मज्ञान का नियम है कि बिना मांगे किसी को भी न देवें ।
332. प्रभु की भूमिका है श्रीमद् भगवद् गीताजी में कि पहले मुझसे पूछो । श्री अर्जुनजी को प्रभु ने आत्मज्ञान तब दिया जब उन्होंने पूछा क्योंकि यही आत्मज्ञान की मर्यादा है ।
333. लौकिक चीजें जैसे भोजन, पानी, दवाई बिना मांगे देनी चाहिए पर अलौकिक आत्मज्ञान की मर्यादा है कि बिना मांगे कभी नहीं देना चाहिए ।
334. जिज्ञासा के बिना कभी भी ज्ञान उपदेश नहीं होता ।
335. सद्गुरु के सामने अगर हमें अपना पात्र ज्ञान से भरना है तो वह पात्र खाली होना चाहिए, सीधा होना चाहिए और हम ज्ञान अर्जन करने के लिए जिज्ञासु होने चाहिए ।
336. मेरा निश्चित कल्याण किस चीज में होगा यह बताएं ? स्वयं कुछ नहीं जानने की इस भूमिका में श्री अर्जुनजी आए और फिर प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश दिया ।
337. प्रभु की शरणागति लेना प्रभु के प्रति हमारा पूर्ण समर्पण को दर्शाता है ।
338. प्रभु और सद्गुरु के प्रति भक्ति भाव होने पर ही श्रीग्रंथों का ज्ञान हमारे भीतर उतरता है अन्यथा कितनी बार भी पढ़े लेवें पूर्ण लाभान्वित नहीं होंगे ।
339. आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए भक्ति ही एकमात्र चाबी है ।
340. अगर हम अपना कल्याण चाहते हैं तो प्रभु की शरणागति अनिवार्य है ।
341. श्रीमद् भगवद् गीताजी का मुख्य भाव भक्ति का भाव ही है ।
342. जीवन में शांति केवल भक्ति से ही मिल सकती है ।
343. प्रभु को दीनता प्रिय है और अहंकार एकदम अप्रिय है ।
344. जिसने छोटा बनना सीख लिया वही प्रभु के द्वार में प्रवेश कर सकता है ।
345. महान-से-महान ज्ञानी और भक्त भी प्रभु के सामने दीन बने रहते हैं ।
346. प्रभु के मंदिर के दरवाजे बड़े लोगों के लिए बिना समय भी खुल जाते हैं पर प्रभु के हृदय का दरवाजा छोटे बनने वाले और दीनता रखने वालों के लिए ही खुलते हैं ।
347. भक्ति करते हुए भक्त भगवती माता से कहते हैं कि मैं तो पक्का कुपुत्र हूँ पर आप तो किसी भी अवस्था में विमाता नहीं हो सकती, ऐसी दीनता भक्त रखते हैं ।
348. संतों के सभी स्तोत्रों और पदों में आप दीनता के दर्शन पाएंगे ।
349. दीनता के बिना अहंकार और अकड़ नहीं जा सकती और जब तक अहंकार और अकड़ है प्रभु के द्वार में प्रवेश नहीं मिल सकता । इसलिए दीनता अति आवश्यक है ।
350. शास्त्रों में सभी तरह के पापियों के कल्याण का मार्ग मिलता है पर अहंकारी का उद्धार हुआ ऐसा एक भी उदाहरण किसी भी शास्त्र में नहीं मिलेगा । कामी तर गए, क्रोधी तर गए, लोभी तर गए, महापापी भी तर गए पर अहंकारी कभी भी नहीं तरा ।
351. भगवत् कृपा जीवन में लानी हो तो अहंकार को बाहर निकालना अति आवश्यक है । दीनता जीवन में लाने से ही अहंकार का नाश होता है ।
352. शरणागति भी हो तो अनन्य हो यानी अनन्य शरणागति ।
353. हमारी दीनता देखकर प्रभु का अंतःकरण गदगद हो जाता है, प्रभु का अंतःकरण करुणा से भर जाता है ।
354. मैं कुछ भी नहीं जानता, प्रभु आप ही बताएं - यह श्री अर्जुनजी की श्रीमद् भगवद् गीताजी के दूसरे अध्याय में भूमिका है जिसके बाद प्रभु ने अपना दिव्यतम उपदेश दिया ।
355. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु की शरणागति स्वीकार करना श्री अर्जुनजी की सबसे बड़ी उपलब्धि है ।
356. आनंद परब्रह्म का स्वरूप है ।
357. उत्तम भक्त कभी भी चिंता नहीं करता क्योंकि उसको प्रभु पर पूर्ण भरोसा जो होता है ।
358. प्रभु श्रीमद् भगवद् गीताजी के उपदेश का आरंभ करते हैं चिंतामुक्त जीवन की बात से और उपदेश का समापन करते हैं चिंतामुक्त जीवन की बात से । प्रभु मध्य-मध्य में भी कहते हैं कि चिंतामुक्त रहो ।
359. श्रीमद् भगवद् गीताजी चिंतामुक्त जीवन जीने का शास्त्र है । हमारे भीतर का आनंद कभी खंडित नहीं होना चाहिए और कभी लुप्त भी नहीं होना चाहिए - यह सार है श्रीमद् भगवद् गीताजी का ।
360. शिक्षा देने वाले सर्वोत्तम सद्गुरु एवं आदिगुरु प्रभु ही हैं ।
361. ध्यान करने की विधि श्रीमद् भागवतजी महापुराण में प्रभु श्री कपिलजी ने अपनी माता को उपदेश करते वक्त और प्रभु श्री कृष्णजी ने श्री उद्धवजी को उपदेश करते वक्त यही बताई कि ध्यान प्रभु के श्रीकमलचरणों से प्रत्येक श्रीअंगों से होता हुआ प्रभु के मुखारविंद के हास्य (मुस्कान) तक पहुँचे और उस हास्य (मुस्कान) पर रुक जाए ।
362. प्रभु की मुस्कान उनके आनंद स्वरूप होने का परिचय देती है ।
363. प्रभु दुःखी जीवात्मा को प्रसन्नता प्रदान करने के लिए श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश करते हैं ।
364. अगर हमारे में प्रभु का विश्वास है और प्रभु की भक्ति है तो प्रभु श्याममेघ बनाकर श्रीमद् भगवद् गीताजी के आनंद ज्ञान की वर्षा करके हमारे चेहरे पर वापस मुस्कान ला देंगे और हमें शोकमुक्त कर देंगे । गत हजारों वर्षों से असंख्य लोगों ने इसका अनुभव किया है ।
365. जब शोक और मोह से घिर जाएं तो श्रीमद् भगवद् गीताजी को पढ़ें । यह हर युग में हुए हर महापुरुष के अनुभव के आधार पर आदेश है ।
366. श्रीमद् भगवद् गीताजी संतों का जीवनधन रहा है ।
367. संत मानते हैं कि प्रभु का महाधन प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में भर रखा है ।
368. भक्ति परमानंद प्राप्ति कराने वाला साधन है ।
369. हम शोकग्रस्त, मोहग्रस्त और भयग्रस्त होते हैं पर प्रभु की भक्ति इन सभी को नष्ट कर देती है ।
370. परमात्मा का प्रतिबिंब जीवात्मा में है जिसके कारण उसका जीवन चल रहा है ।
371. मानव की योनि एकमात्र योनि है जिसमें हम आत्म-विचार कर सकते हैं, इसलिए यह सभी योनियों में सर्वश्रेष्ठ है ।
372. क्या कभी हमने स्वयं का परिचय प्राप्त करने का प्रयास किया है ? हमारा सच्चा परिचय यह है कि हम प्रभु के अंश हैं ।
373. भक्त का पहला लक्षण होता है कि वह सहना सीख जाता है ।
374. प्रतिकार करने की क्षमता होने पर भी प्रतिकार नहीं करना और उस प्रतिकूलता से दुःखी भी नहीं होना और अशांत भी नहीं होना - यही सहने का सही अर्थ है ।
375. श्रीमद् भगवद् गीताजी के उपदेश के बाद में कोई संशय बच ही नहीं सकता ।
376. श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश हृदय से सुनने वाला कभी भी फिर दुःखी नहीं होगा और सदैव आनंद में स्थित रहेगा ।
377. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु सदा-सदा के लिए श्री अर्जुनजी की सारी समस्याओं का समाधान कर देते हैं ।
378. श्री अर्जुनजी के प्रश्नों की गहराई उतनी नहीं है पर प्रिय होने के कारण प्रभु बहुत गहराई में जाकर अपने प्रिय श्री अर्जुनजी के प्रश्नों का उत्तर श्रीमद् भगवद् गीताजी में देते हैं ।
379. भगवत् कृपा और सद्गुरु कृपा नहीं हो तो कोई भी श्रीग्रंथ अपने रहस्यों को हमारे समक्ष प्रकट नहीं करते ।
380. प्रभु से अपार प्रेम करें जिससे प्रभु भी आपसे प्रेम करने के लिए बाध्य हो जाए ।
381. जीवन में झंझट आएगा पर श्रीमद् भगवद् गीताजी का अध्ययन करने वालों को झंझट प्रभावित नहीं कर पाएगा ।
382. प्रभु ऊपर-ऊपर से श्री अर्जुनजी का उपचार करना नहीं चाहते और पूर्ण उपचार चाहते हैं जिससे जीवन में कभी भी फिर उन्हें इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़े । इसलिए श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश बहुत गहरा है ।
383. प्रभु हर जीव मात्र से प्रेम करते हैं ।
384. अगर आप श्रीमद् भगवद् गीताजी से प्रेम करते हैं तो निश्चित माने कि प्रभु आपसे बहुत प्रेम कर रहे हैं और आप प्रभु प्रेम से वंचित नहीं हैं ।
385. आप श्रीमद् भगवद् गीताजी को मत छोड़ें तो फिर प्रभु किसी भी स्थिति में आपको नहीं छोड़ेंगे - यह पक्का सिद्धांत है ।
386. श्रीमद् भगवद् गीताजी को पढ़ने और पढ़ाने वाले से प्रभु अत्यंत प्रेम करते हैं, यह प्रभु ने स्वयं अठारहवें अध्याय में घोषणा की है ।
387. श्रीमद् भगवद् गीताजी की महत्ता यह है कि यह प्रभु का प्रेम हमें उपलब्ध करवा देती है ।
388. प्रभु की श्रीलीला का अंतःकरण में अवलोकन करते समय भक्त तल्लीन हो जाते हैं । इसका सबसे बड़ा उदाहरण जब प्रभु श्री महादेवजी श्री मानसजी के उस चरण में तल्लीन हो गए जब प्रभु श्री रामजी और लंका से लौटने के बाद प्रभु श्री हनुमानजी का मिलन हुआ और प्रभु ने कहा कि मैं उऋण नहीं हो सकता । उस समय प्रभु श्री महादेवजी कथा में इतने तल्लीन हो गए कि भगवती पार्वती माता को कथा सुनाते-सुनाते मग्न हो गए और तल्लीनता के कारण कथा रुक गई ।
389. भगवत् अनुभूति बहुत-बहुत रसीली होती है ।
390. कथा की अनुभूति में श्रोता को अपने मन को डुबो देना चाहिए ।
391. जिस श्रवण से हम प्रभु को जान पाए वही श्रवण करना चाहिए ।
392. प्रभु के बारे में किया श्रवण हमें प्रभु के नजदीक पहुँचा देता है ।
393. हमारा मन अगर कामना पूर्ति में लग जाता है तो फिर वह प्रभु में कैसे लग पाएगा ?
394. प्रभु में ही हमारा मन एकाग्र होना चाहिए ।
395. हमें अपनी हर वृत्ति को प्रभु में केंद्रित करनी चाहिए ।
396. हमारे पाप-पुण्य का हिसाब प्रभु के पास है और एकदम पक्का है ।
397. भक्ति हमारे मन को प्रसन्न रखती है और मानस रोग जैसे काम, क्रोध, लोभ, अवसाद, दुःख, निराशा, चिंता और तनाव से हमें बचाती है ।
398. संसार की प्रतिकूलता भक्त को स्पर्श तो करती है पर वेदना नहीं देती । भक्त अपनी प्रसन्नता में ही जीता है ।
399. हर कर्म प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही करना चाहिए ।
400. भगवत् विश्वासी व्यक्ति हर अनुकूलता और प्रतिकूलता को श्रीहरि इच्छा मानता है ।
401. श्रीहरि इच्छा का मतलब ही यह है कि मेरी इच्छा का मेरे लिए कोई महत्व नहीं है, मेरे लिए महत्व भगवान की इच्छा का है जो मुझे सर्वथा मान्य है ।
402. जीवन में प्रभु पर पूर्ण विश्वास रखना सबसे जरूरी है ।
403. संसार में आपके मन जैसा मूल्यवान कुछ भी नहीं है इसलिए अपने इस मूल्यवान मन को प्रभु में लगाना चाहिए ।
404. हमें प्रभु में अपने मन को तन्मय करना चाहिए ।
405. बुद्धि अस्थिर होने का मुख्य कारण वासना, कामना और तृष्णा है । बुद्धि को स्थिर करना चाहते हैं तो वासना, कामना और तृष्णा का त्याग अनिवार्य है ।
406. अपनी हर कामना को प्रभु की तरफ मोड़ देना चाहिए और प्रभु उसके केंद्र बन जाने चाहिए ।
407. श्रीमद् भगवद् गीताजी के समस्त उपदेशों के साकार मूर्ति प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी हैं ।
408. मानव जीवन के उत्थान का सर्वश्रेष्ठ और अति संक्षिप्त शास्त्र श्रीमद् भगवद् गीताजी है ।
409. प्रभु श्री रामजी में स्थिरप्रज्ञ के पूर्ण लक्षण ऋषि श्री वशिष्ठजी ने श्री भरतलालजी को बताए । उन्होंने कहा कि जब मैंने राज्याभिषेक की वार्ता दी और जब वनवास की वार्ता मिली तो दोनों अवस्था में प्रभु श्री रामजी के मनोभाव में रंच मात्र भी फर्क नहीं आया । राज्याभिषेक की वार्ता सुनकर न प्रभु प्रसन्न हुए और न ही वनवास के लिए प्रस्थान करते वक्त खिन्न हुए ।
410. प्रभु श्री रामजी में न राज्य की आसक्ति, न वनगमन का भय, न वनवास दिए जाने पर क्रोध था । प्रभु ने स्थिरप्रज्ञ को आदर्श रूप में चरितार्थ करके दिखाया ।
411. वृत्तियों का जीवन में न उठाना ही योग है । ऐसे लोगों प्रभु से एकरूप होने के लिए सक्षम हो जाते हैं ।
412. हमारा मन तेल की तरह इतना चिकना है कि संसार की कितनी चीजें उसमें चिपकी रहती हैं ।
413. हमारा मन संसार में कहाँ-कहाँ चिपकता है हमें देखना चाहिए और उसे वहाँ से बचाना चाहिए ।
414. अपने मन को संसार में कहीं भी चिपकने नहीं देना चाहिए ।
415. आने वाली अनुकूलता और आने वाली प्रतिकूलता स्थिरप्रज्ञ को प्रभावित नहीं करती ।
416. जैसे कछुए के चार पैर, एक मुख और एक पूंछ होती है और जैसे ही उसे संकट लगता है वह सबको अपनी कठोर पीठ में समेट लेता है । ऐसे ही जब इंद्रियों के विषय सामने आए और संकट लगे कि यह विषय मुझे चंचल कर सकते हैं तो उन विषयों से अपनी इंद्रियों को पीछे खींच लेना चाहिए ।
417. इंद्रियों को खुलेआम छूट देकर हम अपनी बुद्धि और मन को स्थिर नहीं रख सकते ।
418. विषयों में उत्तेजना होती है जो हमें चंचल कर देती है ।
419. जो संयम कर पाएगा वही भगवत् सानिध्य के लिए पात्र होगा ।
420. शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध यह पांच विषयों पर संयम साधक के लिए बहुत जरूरी है ।
421. जैसे हम एकादशी में निराहार रहते हैं वैसे ही इन विषयों से (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध) निराहार रहना चाहिए । इनके आहार से अपने मन को वंचित रखना चाहिए ।
422. इंद्रियों के आहार इंद्रियों को न देना यही सच्चा निराहार रहना है । आँखों का आहार दृश्य है, कान का आहार शब्द है, त्वचा का आहार स्पर्श है, नाक का आहार सुगंधी है और जिह्वा का आहार रस है । हमें आँख को गलत दृश्य, कान को गलत शब्द, त्वचा को गलत स्पर्श, नाक को गलत गंध, जिह्वा को गलत रस नहीं देना चाहिए ।
423. इंद्रियों को आहार देना बंद करेंगे तो धीरे-धीरे मनोजय (मन की जय) को प्राप्त होंगे ।
424. इंद्रियों को आहार दिए बिना हम ज्यादा मौज में रहते हैं - ऐसा संतों का अनुभव रहा है ।
425. एक संत एकादशी को कुछ बोलते नहीं थे, मौन रहते थे पर किसी से मिलते भी नहीं थे ताकि कुछ सुनना भी नहीं पड़े । एकादशी के दिन बोलना भी नहीं और सुनना भी नहीं ।
426. मन ने हमें ऐसे दलदल में फंसा दिया है कि मन कहता है कि इन इंद्रियों को आहार तो देना ही पड़ेगा । मन के इस संकल्प के आगे हम हार मान जाते हैं ।
427. इंद्रियों को निराहार रखने की प्रक्रिया मन को असीम शांति देने वाली प्रक्रिया है ।
428. मन के भीतर के शांति के सागर में इंद्रियों के गंदे नाले आकर मिलते हैं । इसलिए जैसे ही हम इनको बंद कर देते हैं हमें परम शांति भीतर से ही मिलती है ।
429. जानी हुई भूल का जीवन में त्याग कर देना चाहिए । वह भूल जीवन में दोबारा कभी नहीं होनी चाहिए ।
430. आँख ने जो भूल की है, कान ने जो भूल की है, जिह्वा ने जो भूल की है उसे जीवन में पुनः नहीं दोहराना चाहिए ।
431. विषयों को त्यागने से भी भोगे हुए विषयों का रस जो भीतर निर्माण हो रखा है और जमा है वह हमसे चिपका रहता है । इस रस से भी मनोहर रस भक्ति का रस हमें अपने मन को देना पड़ेगा तभी विषयों का चिपका रस फीका पड़ेगा ।
432. भक्ति का रस ऐसा है जो विषयों के रस के बीज को ही समाप्त कर देता है ।
433. अंतःकरण में प्रभु की प्रेम भरी भक्ति की आवश्यकता है तभी हम विषय और वासना से मुक्त हो सकते हैं ।
434. प्रभु की भक्ति में मन लग गया तो फिर मन के बाहर जाने की संभावना ही नहीं बचती है ।
435. हमें अपने मन और बुद्धि को भक्ति का परम श्रेष्ठ विकल्प ही देना चाहिए ।
436. जो योग का, संयम का अभ्यास तो करते हैं पर प्रभु की भक्ति नहीं करते उनके लिए विषय दब तो जाते हैं पर फिर कभी-न-कभी मुँह उठाकर उठ जाते हैं । इसलिए तपस्वी के पतन की घटना तो मिलेगी पर प्रभु के एक भी भक्त के पतन की घटना कहीं भी नहीं मिलेगी ।
437. जब भीतर भक्ति का रस चित्त को प्राप्त हो जाता है तो फिर वह कभी बाहर नहीं जाता ।
438. इंद्रियों को विषयों से रोकने का प्रयास बिना प्रभु की भक्ति के सफल नहीं हो सकता, इसे समझना बहुत जरूरी है ।
439. भक्ति से रहित ज्ञान, योग और कर्मकांड कभी भी सफल नहीं होता ।
440. श्रीमद् भगवद् गीताजी का मुख्य स्वर भक्ति ही है ।
441. श्रीमद् भगवद् गीताजी की शिक्षा एक वाक्य में कहनी हो तो वह भक्तिमय योग है ।
442. श्रीमद् भगवद् गीताजी में ज्ञान, कर्म और योग सब हैं पर प्रभु अपने उपदेश के द्वारा भक्ति को सर्वोपरि बताते हैं । भक्ति से प्रभु कहीं भी समझौता नहीं करते ।
443. जीव का भक्ति रहित प्रयास कभी भी सफल हो नहीं सकता ।
444. भक्ति को टालकर किसी के द्वारा कितना भी वेदांत का अध्ययन, योग का अभ्यास, ज्ञान का अर्जन, कर्मकांड की क्रिया की जाए तो भी वह अपूर्ण ही रहेगी । यह तथ्य श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रतिपादित है ।
445. एक सिद्धांत पूर्णरूप से ध्यान में रखने योग्य है कि पूर्ण शांति केवल और केवल भक्ति से ही संभव है ।
446. भक्ति का आग्रह श्रीमद् भगवद् गीताजी, श्रीमद् भागवतजी महापुराण एवं श्री रामचरितमानसजी सभी में एक रूप से मिलेगा ।
447. प्रभु की भक्ति का सहारा लिए बिना किसी भी साधन में कभी भी हम सफल नहीं हो सकते ।
448. प्रभु की भक्ति का आधार लेने पर साधन मार्ग की सभी अड़चने स्वतः ही दूर होती चली जाती है ।
449. इंद्रियां हमें व्याकुल कर देती हैं, हमें हैरान कर देती हैं । प्रबल इंद्रियों को जीतना केवल भक्ति से ही संभव है क्योंकि फिर प्रभु आपके साथ हो जाते हैं । इंद्रियों पर विजय के लिए प्रयास करते वक्त भक्ति के द्वारा प्रभु को कभी भी भूलना नहीं चाहिए तभी सफलता मिलेगी ।
450. प्रभु को ही अपना सर्वस्व मानना भक्ति है ।
451. प्रभु का चिंतन करने के लिए जीवन में एकांत में बैठने का अभ्यास करना चाहिए ।
452. जो जितना भगवद् पारायण होता जाएगा उसकी इंद्रियों की चंचलता उतनी कम होती जाएगी । उसका मन भी उतना ही अंतर्मुख होता चला जाएगा ।
453. मन को बाहर के विषयों का रस आता है इसलिए वह इंद्रियों को बाहर के विषयों के रस को लेने के लिए बल प्रदान करता है । पर जब मन को भीतर भक्ति का रस प्राप्त हो जाएगा तो इंद्रियां बाहर के रस को त्यागकर अपने आप भीतर के भक्ति रस को ग्रहण करेंगी ।
454. विषयों का ध्यान करने से ही हमारे पतन की शुरुआत हो जाती है ।
455. अपनी बुद्धि प्रभु के सन्मुख रखनी चाहिए, प्रभु से विमुख कभी नहीं होनी देनी चाहिए । ऐसा नहीं करने पर बुद्धि का नाश हो जाता है ।
456. सांसारिक विषयों के स्थान पर पारमार्थिक विषयों को रखने पर ही हमारी सद्गति होगी ।
457. किसी भी प्रकार से एक बार प्रभु को अपने जीवन में आने दें, प्रभु अपने आप अपनी प्राप्ति की लालसा हमारे मन में निर्माण कर देंगे ।
458. प्रभु का चिंतन करते-करते हम जीवन में उत्थान के मार्ग पर चल सकते हैं ।
459. कोई भी सांसारिक विषय, जो भोग लिया है, उसे पुनः कभी याद नहीं किया जाना चाहिए नहीं तो फिर उसे भोगने की प्रवृत्ति जागृत हो जाएगी ।
460. मन के स्तर पर विषयों से किए जाने वाला संग ही है जो हमें गिराता है ।
461. जीवन में पतन से बचना हो तो पहले विषयों के मानस चिंतन से बचना होगा ।
462. हमारे मन को शिक्षा देनी पड़ेगी कि संसार में कहीं भी चिपकना नहीं है । यह तभी संभव है जब हम प्रभु की भक्ति करने लगेंगे ।
463. प्रभु के सामने नित्य ज्यादा-से-ज्यादा बार और ज्यादा-से-ज्यादा समय बैठने का अभ्यास करना चाहिए ।
464. हम प्रभु के समक्ष जितना ज्यादा रहते हैं हमारा चित्त प्रभु की भावना में उतना ज्यादा डूबता है ।
465. प्रभु में मन लगता नहीं यह शिकायत नहीं करनी चाहिए । प्रभु को ज्यादा समय देने पर मन अपने आप प्रभु में लगने लग जाएगा ।
466. पुनः पुनः प्रभु के लिए भावना हमारे चित्त में उठनी चाहिए ।
467. सामने होते हैं विषय, उनके पीछे दौड़ती हैं इंद्रियां, इंद्रियों के पीछे होता है मन और मन के पीछे होती है हमारी बुद्धि ।
468. बुद्धि और मन को स्थिर करने के लिए अपनी इंद्रियों को विषयों की ओर जाने से रोकना पड़ेगा, ऐसा किए बिना काम नहीं चलेगा ।
469. जिन बातों में एक संसारी को खूब रस आता है, एक भक्त प्रयास करके भी उसमें रस नहीं ले सकता क्योंकि उसे उसमें रस आता ही नहीं है ।
470. भक्त की दुनिया ही अलग होती है । संसारी की दुनिया भी अलग होती है ।
471. भक्त के भीतर भोग बुद्धि का नाश हो जाता है ।
472. भोग बुद्धि का विसर्जन होने पर ही हमें शांति मिल सकती है ।
473. भक्त के ध्यान को एक प्रभु को छोड़कर कहीं जाने की संभावना ही नहीं होती ।
474. प्रभु हर जीव से अत्यंत प्रेम करते हैं पर जीव का दुर्भाग्य है कि वह प्रभु से प्रेम नहीं करता और संसार से प्रेम करता है ।
475. जैसी हमारी प्रवृत्ति है उसी प्रकार का मार्ग चुनने से ही हमारा कल्याण होगा । सभी लोग एक मार्ग से नहीं जा सकते । कुछ लोग क्रिया प्रधान हैं, उनके लिए कर्म योग का मार्ग है । कुछ विचार प्रधान लोग हैं, उनके लिए ज्ञान योग का मार्ग है । पर कुछ भावुक हृदय के भाव प्रधान लोग हैं, उनके लिए भक्ति योग का मार्ग है ।
476. जिसने मानव देह धारण किया है उसके लिए कर्म करेंगे ही नहीं, यह बात संभव नहीं है । इसलिए कर्म प्रभु के लिए करें तो वह भक्ति बन जाएगी ।
477. इंद्रियों की जगह मन को रोकें क्योंकि इंद्रियों से गलती मन ही करवाता है ।
478. इंद्रियां तो मात्र झरोखे हैं, इन झरोखे से मन ही बाहर देखता है ।
479. मीठे गाने सुनने हो, सुंदर दृश्य देखना हो तो मन उचक कर क्रमशः कान और आँख में आ जाता है ।
480. प्रभु इंद्रियों को दंड देने का निषेध करते हैं क्योंकि दोषी तो मन होता है । मन का नियंत्रण करना सबसे जरूरी है ।
481. संसार हमें भक्ति के लिए कभी नहीं छोड़ेगा । वह तो अंत तक हमें निचोड़ता ही रहेगा, हमें खुद ही छूटना पड़ेगा ।
482. प्रभु की भक्ति की उपलब्धि जीवन में हो गई तो फिर सारे कर्म भी छूट जाएं तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारी विजय हो गई ।
483. भगवद् प्रेम की प्राप्ति के बाद कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं बचता ।
484. प्रभु श्रीमद् भगवद् गीताजी के दसवें अध्याय के विभूति योग में सारे यज्ञों में अपनी विभूति को जप यज्ञ (नाम जप) को बताते हैं ।
485. अपनी इंद्रियों की तृप्ति करते-करते जिया गया जीवन व्यर्थ जीवन होता है ।
486. सारी सृष्टि में एकमात्र प्रभु का ही निवास है ।
487. प्रभु जानते हैं कि कौन सत्कर्म श्रद्धा से कर रहा है और कौन दिखावे के लिए कर रहा है ।
488. प्रभु नाम का कीर्तन को भी प्रभु का यज्ञ माना गया है ।
489. प्रभु के लिए बड़ा नियम नहीं ले पाए तो छोटा ही नियम लें पर नियम जरूर लेना चाहिए । नियम का अर्थ है जो रोजाना हम प्रभु के लिए करें ।
490. कलियुग में प्रभु नाम का संकीर्तन सबसे बड़ा साधन है ।
491. जो प्रभु की भक्ति में तृप्त और लीन हो गया उसके लिए कर्मबंधन गल जाते हैं ।
492. प्रभु के लिए किया जाने वाला नित्य कर्म भी प्रभु की आराधना और हमारी साधना होती है ।
493. जितना-जितना श्रीमद् भगवद् गीताजी का चिंतन करेंगे उतनी-उतनी दिव्यता हमारे जीवन में आती चली जाएगी । ऐसे बहुत सारे उदाहरण हमें मिलेंगे कि जिन्होंने इस श्रीग्रंथ का चिंतन किया और उनके जीवन में दिव्यता आई ।
494. प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी अपने मानव लीला के उदाहरण द्वारा हमें शिक्षा देते हैं ।
495. तीर्थ के दर्शन करके आने के बाद उन तीर्थ का दर्शन सदैव अपने घर के देवालय में करना चाहिए ।
496. इंद्रियों का नियमन और संयम, यह साधना का आरंभ बिंदु है । प्रभु इसके बहुत आग्रही हैं ।
497. प्रभु कहते हैं कि इंद्रियां बलवान हैं, इंद्रियों से मन बलवान है, मन से बुद्धि बलवान है पर बुद्धि से भी काम, जो सबसे बड़ा शत्रु है, वह बलवान है । पर प्रभु सबसे बलवान हैं इसलिए अगर श्रीराम को पकड़कर रखेंगे तो काम हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा ।
498. भगवान हमारे भीतर हैं और हमने उनसे पहचान नहीं करी । श्रीराम से पहचान कर लें तो प्रभु कामनारूपी रावण का हमारे भीतर नाश कर श्रीराम राज्य की स्थापना कर देंगे ।
499. श्री वेदजी के अतिरिक्त कोई नया सिद्धांत किसी के पास नहीं, किसी धर्म, संप्रदाय, मत या महापुरुष के पास नहीं । श्री वेदजी की यह महत्ता है ।
500. सारे प्राणी मात्रों पर अगर किसी का नियंत्रण है तो वह एकमात्र प्रभु का ही है ।
501. प्रभु का सब कुछ अलौकिक-ही-अलौकिक है ।
502. जब-जब धर्म पर संकट आता है, धर्म की हानि होती है, अधर्म धर्म पर हावी हो जाता है उस समय प्रभु स्वयं को प्रकट करते हैं । फिर प्रभु दुष्टों का विनाश, साधुओं का रक्षण और धर्म की पुनर्स्थापना करते हैं ।
503. धर्म का मूल आधार सात्विक सदाचार में है ।
504. प्रभु पूरी सृष्टि का ब्रह्मांडीय प्रबंधन करते हैं ।
505. सर्वसामर्थ्यवान प्रभु के आगमन से ही सब ठीक-ठाक हो जाता है ।
506. धर्म की हानि हो सकती है पर धर्म कभी नष्ट नहीं होता - यह सिद्धांत है ।
507. जब अधर्म बलवान हो जाता है और धर्म कमजोर पड़ जाता है तब प्रभु आते हैं ।
508. संत कहते हैं कि प्रभु के आने का एक छुपा हुआ मकसद होता है । वह छुपा हुआ मकसद अपने भक्तों को लाड़ लड़ाना और उनको अपना सानिध्य देना होता है ।
509. श्रीमद् भगवद् गीताजी प्रभु के श्रीमुख से निकले हुए मंत्ररूप शब्द हैं ।
510. प्रभु अपने परम आत्मीय भक्तों के समक्ष अपना परम रहस्य खोल देते हैं ।
511. प्रभु सृष्टि के निर्माता और संचालक के साथ-साथ सृष्टि के मालिक भी हैं ।
512. श्रीमद् भगवद् गीताजी, श्रीमद् भागवतजी महापुराण और श्री रामचरितमानसजी से ज्यादा उद्धार करने वाले कोई श्रीग्रंथ नहीं हो सकते ।
513. पढ़े-लिखे पर शास्त्र-संस्कार विहीन लोगों को ऐसा लगता है कि प्रभु श्री रामजी या प्रभु श्री कृष्णजी महापुरुष हैं । यह गलत है क्योंकि प्रभु महापुरुष नहीं, प्रभु भगवान हैं, प्रभु ईश्वर हैं ।
514. प्रभु के प्रकृति वश में होती है पर हम प्रकृति के आधीन होते हैं ।
515. परमात्मा और परमात्मा शक्ति नहीं हो, ऐसा कोई स्थान सृष्टि में नहीं है ।
516. प्रभु से रहित कुछ भी नहीं है । एक ऐसा कण नहीं जहाँ प्रभु नहीं हों और एक ऐसा क्षण नहीं जहाँ प्रभु नहीं हों ।
517. ध्यान करना है तो प्रभु के श्रीअंगों के अतिरिक्त और किसी का भी ध्यान नहीं करना चाहिए । प्रभु के सगुण साकार रूप का ध्यान सभी श्रीग्रंथों ने और सभी वैष्णव आचार्यों ने बताया है ।
518. अंतःकरण प्रभु को अर्पण करने से श्रीग्रंथों का हृदय हमारे लिए खुल जाता है । श्रीग्रंथ हमारे लिए प्रकट हो जाते हैं ।
519. निर्गुण निराकार की जगह प्रभु का सगुण साकार रूप भक्तों को बहुत अधिक मीठा लगता है ।
520. पूर्णता कहीं नहीं है अगर कहीं भी पूर्णता मिलेगी तो वह प्रभु की भक्ति में ही मिलेगी ।
521. भक्ति से ऊँ‍चा कहीं भी कुछ मिलने वाला नहीं है ।
522. एक प्रभु के स्वरूप में सब कुछ स्थित है ।
523. प्रभु के सभी स्वरूप एक ही हैं, किसी भी स्वरूप में कोई भिन्नता नहीं है । हमारी जिस स्वरूप में श्रद्धा है उसी को पूर्ण मानकर उसमें पूर्ण श्रद्धा बनाए रखनी चाहिए ।
524. प्रभु भावना के अनुरूप अलग-अलग भक्तों के लिए अलग-अलग रूपों में प्रकट होते हैं । प्रभु के रूपों के लिए हम रोक लगाने वाले कौन होते हैं क्योंकि यह प्रभु की इच्छा और भक्त की भावना का विषय है ।
525. प्रभु के सभी सगुण स्वरूप में जिस दिन हमारी पूर्ण आस्था जागृत हो जाए और उनमें कोई भेद हमें प्रतीत नहीं हो तो ही हमें मानना चाहिए कि प्रभु ने अपनी पूर्ण कृपा हम पर कर दी है ।
526. जिन लोगों को प्रभु के सगुण साकार रूप में पूर्ण श्रद्धा हो गई उनके लिए आगे साधन का मार्ग बहुत थोड़ा बचता है । जिनके अंदर सगुण साकार रूप में श्रद्धा जागृत नहीं हुई उन्हें अभी प्रभु प्राप्ति में बहुत जन्म लगने वाले हैं ।
527. भगवती मीराबाई को अपने श्री गिरधर गोपाल में पूर्ण श्रद्धा थी और इसलिए एक ही जन्म में वे तर गईं ।
528. भाग्यवान हम तब होंगे जब हमें अपने ठाकुरबाड़ी की धातु की मूर्ति में चेतन प्रभु के दर्शन होने लगेंगे ।
529. किसी भी भक्त को अपने प्रभु की धातु की मूर्ति नहीं बल्कि चेतन तत्व दिखा, परब्रह्म तत्व ही दिखा ।
530. प्रभु के आगमन का एक छिपा हुआ कारण अपने प्रेमी भक्तों से मिलने का होता है ।
531. धर्म की पुनर्स्थापना का कार्य प्रभु किसी को भेजकर भी करवा सकते हैं पर कुछ प्रेमी भक्त ऐसे होते हैं जिनको प्रभु के अतिरिक्त किसी से तृप्ति नहीं मिल सकती । उनकी तृप्ति के लिए प्रभु को स्वयं आना पड़ता है । उन प्रेमी भक्तों का समाधान करने के लिए, उन्हें प्रेम का रस का रसास्वादन कराने के लिए प्रभु का आगमन होता है और अवतार के रूप में प्रभु आते हैं ।
532. परमहंस महात्मा प्रभु के लिए संसार के सारे संबंधों का त्याग कर देते हैं ।
533. प्रभु के एकांतिक भक्त बने यानी एक प्रभु के अलावा हमें कुछ सूझे ही नहीं ।
534. भगवती शबरीजी ने दो श्रेष्ठ काम किए । अपने गुरुजी से यह नहीं पूछा कि प्रभु कब आएंगे और किस दिशा से आएंगे । इसलिए बाल अवस्था से बुढ़ापे तक रोजाना और सभी दिशा से उन्होंने प्रभु का इंतजार किया । इस इंतजार का इतना मीठा फल था कि प्रभु को मार्ग बदलकर प्रेमवश आना ही पड़ा ।
535. जिनके जीवन में प्रभु का अनुसंधान आरंभ हो जाता है, जिनको प्रभु की धुन लग जाती है प्रभु को उसके जीवन में आना ही पड़ता है ।
536. जिनको प्रभु की धुन लग जाती है उनको फिर प्रभु का ध्यान करने की आवश्यकता नहीं होती । किसी श्रीगोपीजन ने प्रभु का कभी भी ध्यान नहीं किया । हमें संसार की धुन लगी हुई है इसलिए प्रभु का ध्यान करने की आवश्यकता है ।
537. सर्वोच्च योग है परमात्मा से अखंड प्रेम ।
538. भक्ति से बढ़िया और भक्ति से ऊँ‍चा कुछ भी नहीं है ।
539. साधन प्रभु के लिए दीर्घकाल और बिना खंडित हुए करना चाहिए तभी वह प्रभु प्राप्ति करवाता है ।
540. प्रभु के नाम का एक शब्द भी हमें तार देता है ।
541. जिनका अपने साधन में पूरा ध्यान है उनके सद्गुरु सदैव उनके साथ ही होते हैं, उनको सद्गुरु से मिलने जाने की आवश्यकता नहीं होती ।
542. भगवती शबरीजी का शरीर बूढ़ा हो गया पर विश्वास बूढ़ा नहीं हुआ और दृढ़ रहा कि प्रभु आएंगे ।
543. अपने भक्तों को भक्ति और प्रेम के रस का आस्वादन करने के लिए प्रभु आते हैं, संतों की यह व्याख्या है ।
544. संतों की व्याख्या है कि प्रभु के अवतार का एक हेतु अपने आचरण से लोक शिक्षा देना होता है । मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री रामजी ने ऐसा करके दिखाया और मर्यादापूर्ण जीवन की शिक्षा दी ।
545. भक्तों के प्राण प्रभु पर निर्भर करते हैं क्योंकि उनका जीना ही प्रभु के लिए होता है और उनके जीवनधन ही प्रभु होते हैं ।
546. भक्त प्रभु का सानिध्य और प्रभु सेवा का अवसर तलाशते रहते हैं ।
547. भक्त को परिवार, अपनी देह, यहाँ तक कि समाज की भी परवाह नहीं होती क्योंकि उनके केंद्रबिंदु एकमात्र प्रभु ही होते हैं ।
548. हमारे सारे भाव एक प्रभु में एकत्रित हो जाने चाहिए यानी हमारे सब कुछ प्रभु हो जाने चाहिए ।
549. प्रभु अपने भक्त को प्रभु से वियोग की व्याकुलता के संकट से मुक्त करने के लिए पधारते हैं ।
550. संसारी के लिए दीपावली का दिन वर्ष में एक दिन आता है पर उत्तम भक्तों की तो रोज ही दीपावली होती है क्योंकि प्रभु उनके भीतर विवेक का दीपक जला देते हैं ।
551. जीवन मूल्यों की शिक्षा देने प्रभु श्री रामजी अवतार लेकर आए । प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी के समक्ष यह बात कही थी ।
552. संसारी का मन संसार से चिपकता है । प्रभु का मन केवल उनकी भक्ति करने वाले और उनसे प्रेम करने वाले भक्त से चिपकता है ।
553. भारतीय अध्यात्म में वासनाओं के त्याग की बात से भी ज्यादा बल वासनाओं की शुद्धिकरण करके उनको सद्वासना बनाने पर दिया गया है ।
554. एक वासना सैर सपाटे के लिए विदेश जाने की लौकिक होती है । दूसरी वासना भगवती गंगा माता में स्नान की अलौकिक होती है । पहली वासना बंधनकारी है, दूसरी वासना बंधन को शिथिल करने वाली है । भगवती गंगा माता में स्नान वाली दूसरी वासना हमारा उद्धार करने वाली भी है ।
555. सद्वासनाओं में अपनी असतवासनाओं का विलय करना चाहिए यानी कहीं जाने का मन करे तो सैर सपाटे के लिए नहीं जाकर तीर्थ में जाने का मन बनाना चाहिए ।
556. प्रभु स्वेच्छा से पृथ्वीलोक पर आते हैं । वे आने या न आने में स्वतंत्र होते हैं । जीव को पूर्व जन्म की वासनाओं के कारण बाध्य होकर आना ही पड़ता है, वह स्वतंत्र नहीं है ।
557. प्रभु का आना-जाना प्रभु के अधीन है । जीव का आना-जाना प्रारब्ध के अधीन होता है ।
558. जैसे बीज डालने पर वे उगेंगे ही वैसे ही कर्म करने पर कर्मफल उगेगा ही । पर जैसे बीज को भूनकर डाला जाए तो फिर कितनी भी अच्छी मिट्टी हो, कितना भी अच्छा वातावरण हो, कितना भी अच्छी वर्षा हो तो भी वे नहीं उगेंगे वैसे ही भक्त अपना कर्म प्रभु को अर्पण करके भक्ति के द्वारा अपने कर्म को भून देते हैं ।
559. प्रभु को जानने का प्रयास ज्ञानरूपी तप है ।
560. श्रीग्रंथों से प्रभु को जाना जाता है इसलिए उनके पारायण को ज्ञान-यज्ञ कहते हैं ।
561. आज सत्संग, सत्संग नहीं रहा । सत उसमें से निकल गया है वह नृत्य संग हो गया है, वह ताल संग हो गया है, वह स्वर संग हो गया है ।
562. संतों और भक्तों के जीवन में से आसक्ति निकल जाती है, भय निकल जाता है । भगवती मीराबाई का जीवन देखें न पीहर की, न ससुराल की आसक्ति । न सर्प का, न सिंह का और न विष का भय ।
563. प्रभु में विश्वास और अनुसंधान के कारण भक्तों के जीवन में कोई भय ही नहीं रहता ।
564. जिसको प्रभु में मन लगाना है उनके लिए संसार जहर है । पर हम संसारी तो संसार के दलदल में ही पड़े रहते हैं ।
565. हमें प्रभु के चिंतन से फुर्सत ही नहीं होनी चाहिए ।
566. भक्त प्रभु के साथ तन्मय हो जाते हैं । यही भक्ति का स्वरूप है ।
567. उत्तम भक्ति में बाहर का जलसा नहीं होता, लंबी-चौड़ी पूजा नहीं होती, केवल प्रभु में तन्मयता होती है ।
568. भक्त प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय ले लेते हैं और प्रभु से कह देते हैं कि इस देह को जो खिलाना है खिलाए, जो वस्त्र पहनाना है पहनाएं, मैं तो आपके श्रीकमलचरणों में आकर पड़ा हूँ ।
569. भक्ति सिद्धांत से ज्यादा अनुभव की बात है । सिद्धांत के रूप में भक्ति को मानते हुए उसका अनुभव लेना चाहिए ।
570. जो जिस भाव से प्रभु तक पहुँचता है प्रभु उसी भाव से उसे ग्रहण करते हैं । यह प्रभु की शैली है ।
571. प्रभु के पास पहुँचने के अनेक मार्ग हैं पर भक्ति और शरणागति के मार्ग को प्रभु ने सर्वश्रेष्ठ बताया है ।
572. प्रभु तक पहुँचाने के छह भाव प्रधान हैं । सनकादि ऋषियों का शांत भाव है । प्रभु श्री हनुमानजी का दास भाव है । प्रभु या माता का बेटा या बेटी बन जाना ललन भाव है (श्री रामकृष्ण परमहंस का यह भाव भगवती काली माता के लिए था कि मैं आपका पुत्र हूँ) । वात्सल्य भाव जहाँ प्रभु लाला बन जाते हैं और हम प्रभु के माता-पिता की भूमिका में आ जाते हैं । सखा भाव जहाँ हम प्रभु के सखा या मित्र बनते हैं (जैसे श्री सुदामाजी, श्री अर्जुनजी, श्री उद्धवजी प्रभु के सखा बने) । माधुर्य भाव जहाँ हम प्रभु की प्रिया बन जाती है (श्रीगोपियों का भाव, भगवती मीराबाई का भाव और संत श्री गुलाबरावजी का भाव यही था) ।
573. तीन प्रकार की भक्ति होती है । पहला, जो जीव प्रभु से करता है । दूसरा, जो शिष्य अपने सद्गुरु से करता है और तीसरा जो प्रभु अपने भक्त से करते हैं ।
574. जो भक्ति और शरणागति में जिस भाव या भूमिका से प्रभु के पास आता है, प्रभु कहते हैं कि मैं भी वही भूमिका उसके लिए ले लेता हूँ ।
575. प्रभु कहते हैं कि मैं भी अपने प्रिय भक्त की भक्ति करता हूँ ।
576. प्रभु ही भक्त को परमानंद पहुँचाते हैं ।
577. प्रभु कहते हैं कि जो जैसे भी मेरे पास आ जाए मैं वैसे ही उसको स्वीकार करता हूँ ।
578. जैसे एक बिजली पंखे के माध्यम से हवा देती है, लाइट के माध्यम से हमें रोशनी देती है, गीजर के माध्यम से गर्म पानी देती है पर बिजली एक ही है । वैसे ही एक प्रभु अलग-अलग भाव से आए भक्तों को अपने प्रेम का रसास्वादन करवाते हैं ।
579. जीव मेरा अंश है ऐसा प्रभु नहीं कहते हैं, प्रभु कहते हैं कि जीव “केवल” मेरा ही अंश है । यहाँ “केवल” शब्द बहुत महत्वपूर्ण है ।
580. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के अनुसार अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए प्रभु निमित्त ही ढूँढ़ते रहते हैं ।
581. प्रभु कल्पवृक्ष के जैसे हैं यानी जो भी जो सोचकर प्रभु के पास जाता है उसे वही प्राप्त हो जाता है ।
582. जिस घर में प्रभु की आराधना निरंतर चलेगी वहाँ पर मंगल-ही-मंगल होता रहेगा ।
583. श्री वेदजी हमारी माता है । हमारी हर जरूरत की पूर्ति जैसे सांसारिक माता करती है वैसे ही श्रीवेद माता हमारी सभी जरूरत की पूर्ति का मार्ग और फल बताती है ।
584. देवताओं की आराधना हर घर में होती रहनी चाहिए । यह भारतीय मान्यता और पुरातन भारतीय संस्कृति है ।
585. मांग्लय की वृद्धि के लिए देवताओं की आराधना की जानी चाहिए ।
586. प्रभु की आराधना में हमारी पूरी श्रद्धा होनी चाहिए ।
587. हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि प्रभु सर्वसामर्थ्यवान हैं । प्रभु पर ऐसी श्रद्धा और विश्वास प्रभु को हमारे लिए सब कुछ करने के लिए बाध्य कर देती है ।
588. कर्म करते समय फल की इच्छा न हो और कर्तापन का भाव न हो तो वह कर्म हमें बांधेगा नहीं ।
589. धन से की जाने वाली प्रभु की सेवा, और तन से की जाने वाली प्रभु की सेवा, इन दोनों से भी बड़ी होती है मन से की जाने वाली प्रभु की सेवा । जैसे मन से प्रभु श्री गिरिराजजी की परिक्रमा करना । इसमें सभी शास्त्र, पंथ और संत एकमत हैं ।
590. उत्तम भक्त प्रभु की मानस पूजा करते हैं । उत्तम भक्त अपने हृदय कमल पर प्रभु को विराजमान करके प्रभु की मानस पूजा करते हैं ।
591. मानस पूजा में अगर हम लीन होना सीख जाते हैं तो प्रभु सबसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं ।
592. क्रिया की पूजा से भी ज्यादा मानस पूजा महत्वपूर्ण है और प्रभु को प्रिय है, ऐसा उच्चकोटि के संत मानते हैं ।
593. मन के स्तर पर पूजा करने का फल बहुत विलक्षण है ।
594. जीवन में जो कामना रहित हो जाता है, वही सच्चा साधक है ।
595. जैसे ही हम संसार को देखते हैं तो संसार हमें अच्छा लगता है और हमारे मन में कामना होती है कि संसार चाहिए ।
596. संसार को देखते समय संसार बढ़िया है यह विचार साधक अपने मन में आने ही नहीं देता ।
597. अपने अंतःकरण में प्रभु के अलावा किसी का भी प्रवेश वर्जित करके रखना चाहिए ।
598. प्रभु इच्छा में हमें अपना काम चलाना चाहिए यानी जो प्रभु ने हमें दिया है उसमें ही संतोष रखना चाहिए ।
599. हम वहीं होते हैं जहाँ हमारा मन होता है । इसलिए मन को प्रभु में लगाकर ही रखना चाहिए ।
600. हमें सब कुछ प्रभु के लिए ही करना चाहिए ।
601. सारे संसार को, ब्रह्मांड को प्रभु अपना आधार देकर रखते हैं ।
602. हम संसार के कार्य तो तन्मयता से करते हैं पर प्रभु कार्य तन्मयता से नहीं करते ।
603. प्रभु उस भाव को स्वीकार करते हैं जिस भाव में हम प्रभु के लिए डूब जाते हैं ।
604. अपनी सभी इंद्रियों का संयम करना भी यज्ञ है ।
605. प्रभु के लिए जितने विषयों की हमें आवश्यकता है हमें उतना ही ग्रहण करना चाहिए ।
606. उत्तम संयम के बिना उत्तम साधन नहीं हो सकता ।
607. प्रभु के लिए शांति के साथ सब कुछ सहना, इसे प्रभु तपोयज्ञ कहते हैं ।
608. प्रभु के नाम का जाप करने से प्रभु का सानिध्य हमें प्राप्त होता है ।
609. मनुष्य जीवन प्रभु की अनुभूति प्राप्त करने के लिए ही हमें मिला है ।
610. प्रभु के लिए जीवन में नियम बनाने चाहिए और उन्हें जीवन में बढ़ाते चलना चाहिए ।
611. सभी यज्ञ में प्रभु ज्ञानयज्ञ को सर्वोपरि बताते हैं ।
612. भक्ति की कोई सीमा नहीं होती, भक्ति हम कितनी भी ज्यादा कर सकते हैं ।
613. न कर्म, न योग, न ज्ञान प्रभु को सर्वाधिक प्रिय केवल भक्ति ही है ।
614. प्रभु की शरणागति को जीवन में अवश्य स्वीकार करना चाहिए ।
615. प्रभु के प्रति अनुकूल व्यवहार करने के लिए सदैव सिद्ध रहना चाहिए, इसे शास्त्रों ने प्रभु सेवा माना है ।
616. भक्ति की नौका में बैठने से जीव ने कितने भी पाप किए हों वह पाप के सागर से पार हो जाएगा । भक्ति का इतना बड़ा सामर्थ्‍य है ।
617. भक्ति जैसा पवित्र करने वाला साधन अन्य कुछ भी नहीं है ।
618. भक्ति मार्ग में चलते रहने पर हमें भीतर से ही प्रभु की अनुभूति होती है ।
619. एक-एक इंद्रियों के संयम के बिना हम भक्ति मार्ग में सफल नहीं हो सकते ।
620. हमें प्रभु के अलावा कुछ नहीं चाहिए, यह विचार जीवन में एक-न-एक दिन तो आना ही चाहिए ।
621. शास्त्रों के वचन में परम श्रद्धा होनी अति आवश्यक है ।
622. प्रभु के लिए अंतःकरण में श्रद्धा होने से ही हमें प्रभु की प्राप्ति हो पाएगी ।
623. प्रभु के नाम जप से पाप नष्ट नहीं होंगे, ऐसा कभी हो ही नहीं सकता ।
624. प्रभु हम पर कृपा करेंगे इस तथ्य पर कभी भी जीवन में आशंका नहीं होने देना चाहिए ।
625. भाग्यवान वे होते हैं जो यह पक्का मान लेते हैं कि उनके जीवन काल के बाद वे प्रभु के धाम और प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही पहुँचेंगे ।
626. श्रद्धा के बल पर ही प्रभु के दिव्य लोक में प्रवेश किया जा सकता है ।
627. श्रद्धा हो तो एक छोटे से मंत्र से जीव का उद्धार हो जाता है और श्रद्धा नहीं हो तो पूरे जीवन श्री वेदजी के पूरे मंत्रों को भी याद करने के बाद भी उद्धार होने वाला नहीं है ।
628. प्रभु पर विश्वास रखकर जीवन में आगे बढ़ते चलना चाहिए ।
629. कर्म तो करें पर कर्ता भाव न रखें और कर्मफल की इच्छा नहीं रखें तो वह कर्म नहीं कर्मयोग कहलाएगा ।
630. प्रभु को छोड़कर किसी से आशा या अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए ।
631. मैं और मेरा – इन दोनों को छोड़ना ही संन्यास है । इसी संन्यास की बात प्रभु कहते हैं । प्रभु चार आश्रमों में से एक संन्यास आश्रम की बात नहीं कहते, प्रभु मैं और मेरा छोड़ने की बात कहते हैं जो सच्चा संन्यास है ।
632. मैं और मेरा है तो संसार है और मैं और मेरा का विसर्जन होने पर संन्यास हो गया ।
633. जीवन के दुःख हमें प्रभु के साथ जोड़ देते हैं ।
634. कर्मकांड हम संसार मांगने के लिए करते हैं जबकि निष्काम होकर कर्मकांड प्रभु की प्रसन्नता के लिए करना श्रेष्ठ होता है, जो हम नहीं करते ।
635. प्रभु से कुछ मत चाहें, प्रभु से केवल प्रभु को ही चाहें ।
636. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु योगयुक्त होने पर बहुत जोर देते हैं ।
637. कोई भी कर्म भक्तियोग तब बनता है जब (1) कर्तापन हटता है कि मैं नहीं कर रहा (2) उसके एवज में कोई फल नहीं चाहना (3) केवल और केवल प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही करना और (4) प्रभु को अर्पण करके करना । यह चार शर्तें पूरी होने पर वह कर्म भक्तियोग बनेगा ।
638. स्वयं को जाँचते रहना चाहिए कि संसार की हमारी आसक्ति कितनी कम हुई ।
639. हमारे मन में संसार की भोग बुद्धि कम होती रहनी चाहिए तभी हम परमार्थ में सफल हो पाएंगे ।
640. हमें मनन और आकलन करना चाहिए कि हम परमार्थ के मार्ग में कहाँ तक पहुँचे ?
641. मननशील साधन यानी मनन करते हुए किया हुआ साधन में प्रगति बहुत जल्दी होती है क्योंकि हम अपनी भूलों को सुधार करके चलते हैं । मनन के कारण हमें अपनी भूल पता चलती है ।
642. श्रवण के साथ मनन जुड़ जाना चाहिए तब उसका वेग बहुत बढ़ जाता है । ऐसे किए साधन का वेग बहुत बढ़ जाता है जिस कारण साधन सफल होता है ।
643. कभी भी साधन बोझिल यानी बोझ वाला नहीं लगना चाहिए । हमेशा साधन करते वक्त आनंद की अनुभूति होनी चाहिए ।
644. साधन के साथ मनन चलता है तो वह निश्चित आनंद देगा ।
645. श्रीमद् भगवद् गीताजी प्रभु की शरणागति के द्वारा ब्रह्म-विलय की बात हमें समझाती है । यही जीवन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए ।
646. सच्चे भक्त को कभी अशांति होती ही नहीं क्योंकि वह पूरी तरह प्रभु पर निर्भर होता है यानी प्रभु कृपा पर निर्भर होता है ।
647. योगी का अंतःकरण कमल के पत्तों के समान होना चाहिए । जैसे रात-दिन जल में रहकर भी पत्ते किंचित भीगते नहीं वैसे ही संसार में रहकर भी अलिप्त रहने वाला योगी होता है ।
648. योगी का अंतःकरण कमल के पत्ते के सामान होता है जो रात-दिन जल में रहकर भी तनिक भीगता नहीं पर जो योगी नहीं हैं उनका अंतःकरण स्पंज (पानीसोख) के समान होता है एक पल के लिए भी जल में डूबते ही पूरा जल सोख लेता है । योगी संसार में रहकर संसार से अलिप्त रह पाता है पर जो योगी नहीं है वह संसार को अपने भीतर समा लेता है । यह कितना बड़ा फर्क है ।
649. इंद्रियों और मन पर नियंत्रण प्राप्त करने पर ही हमें शांति मिल पाएगी ।
650. हर कर्म प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित करके चलना चाहिए तब वह कर्म कर्मयोग नहीं बल्कि सत्कर्मयोग बन जाता है । सत्कर्मयोग प्रभु को बहुत प्रिय होता है ।
651. योग को, ज्ञान को और कर्म को एक स्थान पर पहुँचकर विराम देना पड़ता है पर भक्ति निरंतर चलती ही रहती है ।
652. भक्ति करते-करते दैवी संपदा यानी सद्गुण जीवन में आते ही रहते हैं ।
653. जीवन को भक्तिमय बनाने में ही जीवन की सार्थकता है और सभी समस्याओं का समाधान है ।
654. संसार के प्रपंच को हमने अपना माना जबकि वास्तव में उसके साथ हमारा कोई संबंध नहीं था । हम जीवात्मा हैं और हमारा संबंध केवल परमात्मा के साथ है ।
655. संसार में लिप्त होते ही सारे झमेले हमारे गले में पड़ जाते हैं ।
656. आकाश के समान निर्लिप्त और प्रकाश के समान केवल साक्षी होना चाहिए । जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के ताप से सागरदेवजी का जल मेघ के रूप में आकाश में जाता है और फिर वर्षा होती है । आकाश निर्लिप्त रहता है, जल आया, जल गया वह भीगा नहीं । जैसे प्रकाश में एक सभागार में बैठक होती है, शोकसभा होती है, संगीत का कार्यक्रम होता है, प्रकाश सबका साक्षी होता है पर किसी का संग नहीं करता ।
657. सांसारिक उलझने हम स्वयं निर्माण करते हैं ।
658. प्रभु न जीव का पाप ग्रहण करते हैं, न पुण्य ग्रहण करते हैं, न बुराइयां ग्रहण करते हैं, न अच्छाइयां ग्रहण करते हैं । प्रभु केवल और केवल जीव का प्रेम और भक्ति ग्रहण करते हैं ।
659. प्रभु पर अगर कोई आरोप लगाता है तो वह निश्चित ही अविवेकी जीव है क्योंकि प्रभु केवल दृष्टा की भूमिका निभाते हैं और हमें कर्म के लिए स्वतंत्र छोड़ते हैं ।
660. प्रभु के चिंतन में भक्त निरंतर मग्न रहते हैं ।
661. जिसका प्रभु उद्धार कर देते हैं उसको फिर जन्म लेकर दुःखमय संसार में नहीं आना पड़ता ।
662. मैं और मेरा - यह है तो संसार है, यह नहीं है तो संन्यास है ।
663. शोक, मोह और भय सभी मानव समस्याओं का मूल है और इससे प्रभु की शरणागति ग्रहण करके ही हम बच सकते हैं ।
664. श्रीमद् भगवद् गीताजी का मुख्य स्वर भक्ति और शरणागति का ही है ।
665. अपनी भक्ति की समीक्षा करते चलना चाहिए कि हमारी भक्ति में कितनी प्रगति हो रही है ।
666. परम तत्व प्रभु में अपना मन स्थिर होना चाहिए ।
667. संसार कभी भी हमारी आध्यात्मिक उन्नति के लिए बाधक नहीं होना चाहिए ।
668. जो सुख अंतर्मुखी होने पर मिलेगा वह बाहर मिल ही नहीं सकता । आंतरिक सुख अक्षय होता है यानी सदैव रहने वाला होता है, वह कभी खंडित नहीं होता ।
669. आंतरिक सुख उसे मिलता है जो प्रभु से जुड़ जाता है । आंतरिक सुख के लिए प्रभु से जुड़ाव सबसे जरूरी है ।
670. जो प्रभु के साथ जुड़ जाता है वह किसी के द्वारा भी परेशान और अशांत नहीं किया जा सकता ।
671. जिसका सुख न संपत्ति पर, न कीर्ति पर, न अपने परिवार पर निर्भर करता है बल्कि केवल प्रभु पर निर्भर करता है उसे ही अक्षय सुख की प्राप्ति होती है ।
672. श्रीमद् भगवद् गीताजी अंतःकरण में प्रभु से एकरूप होने की बात सिखाती है ।
673. एक बार प्रभु से एकाकार होने पर वह प्रसन्नता प्राप्त होगी जो कभी घट नहीं सकती और कभी हट नहीं सकती ।
674. सच्चे मन से सुनी प्रभु कथा भीतर से हमारा शुद्धिकरण कर देती है ।
675. इतने आत्म शुद्धि के सूत्र जो श्रीमद् भगवद् गीताजी में हैं वे इतनी सरल भाषा में, इतने थोड़े शब्दों में, एक साथ संकलित अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलेंगे । यही श्रीमद् भगवद् गीताजी की विशेषता है ।
676. संसार में ऐसा कोई सुख नहीं जिसके पीछे दुःख चिपका हुआ न आए ।
677. संसार के हर सुख का अंत है । कोई ऐसा सुख नहीं जो अनंत काल तक टिकेगा या मिलेगा ।
678. मन के वेगों में बहना नहीं चाहिए, उन्हें पूरी तरह रोकना चाहिए । यह श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं ।
679. काम और क्रोध के वेग को प्रभु ने शत्रु कहा है, इन्हें रोकना और सहना चाहिए नहीं तो ये हमारा नाश कर देंगे ।
680. अगर बाहर के सुखों में आसक्त होने से स्वयं को रोकना चाहते हैं तो अंदर के सुख को अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए । प्रभु यह युक्ति बताते हैं ।
681. प्रभु कहते हैं कि जीव को अपना पाप और दोष को क्षीण करने के लिए सतत प्रयास करना आवश्यक है । पहले पाप और दोष क्षीण होंगे फिर वे समाप्त होंगे ।
682. स्वयं पर नियंत्रण रखने पर प्रभु बहुत बल देते हैं ।
683. सबके हित के लिए लोक-उपकार काम में जीव को लगाने पर प्रभु बहुत जोर देते हैं ।
684. जीव को पूरे मानव जाति के कल्याण के लिए कार्य करने पर प्रभु जोर देते हैं ।
685. जो बात हमें प्रभु से विमुख करे उसका उसी समय सर्वथा त्याग होना चाहिए ।
686. अल्पतम शब्दों में परिपूर्ण वर्णन करने वाला श्रीग्रंथ है श्रीमद् भगवद् गीताजी ।
687. चित्त को बाहर से भीतर की ओर मोड़ने का प्रयास ही योग है ।
688. जिसे प्रभु की अनुभूति के मार्ग पर आगे बढ़ना है तो अनिवार्य है कि कुछ समय सारे संसार से हटकर रहना उसे दैनिक जीवन में सीखना होगा ।
689. रात-दिन संसार में रमता रहेगा और प्रभु की अनुभूति का अधिकारी भी बनेगा, यह दोनों बात एक साथ नहीं हो सकती ।
690. प्रभु के श्रीकमलचरणों में अपने मन को एकाग्र करना चाहिए ।
691. इंद्रियां, मन और बुद्धि को नियंत्रित रखना चाहिए । इंद्रियों से अनावश्यक हलचल नहीं, मन से अनावश्यक चिंतन नहीं, बुद्धि से अनावश्यक विचार नहीं । ऐसा होने पर हम इंद्रियां, मन और बुद्धि को प्रभु में लगा पाएंगे ।
692. मन के परदे पर संसार का चित्र दिखना बंद हो जाए तो ही हमारा साधन सफल हुआ है, यह मानना चाहिए ।
693. हमारे द्वारा किए जाने वाली हर प्रक्रिया प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही होनी चाहिए ।
694. प्रभु सबके नियंत्रक हैं । ऐसा कोई नहीं जो प्रभु के नियंत्रण से बाहर हो ।
695. संस्कृत भाषा का गौरव अन्य किसी भी भाषा को कभी भी मिलने वाला नहीं है । संस्कृत भाषा सभी भारतीय भाषाओं की जननी के स्थान पर है ।
696. प्रभु जीवात्माओं से कहते हैं कि तुम मुझे प्रेम करो या न करो मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ । यह प्रभु सभी जीवात्माओं से कहते हैं ।
697. हम चाहे प्रभु से प्रेम करें या न करें प्रभु हमसे प्रेम करते हैं और हमारा सर्वदा हित करते हैं । यह प्रभु की कितनी बड़ी करुणा है ।
698. चाहे संसार में सब लोग हमारा साथ छोड़ दें पर विश्वास रखना चाहिए कि प्रभु सर्वदा हमारे साथ ही रहेंगे ।
699. श्री गजेंद्रजी के साथ जितने भी थे, सब एक-एक करके चले गए पर उन्हें अंत तक विश्वास था कि चाहें सब छोड़ जाएं पर प्रभु साथ नहीं छोड़ेंगे और प्रभु ने आधे नाम की पुकार पर उनका उद्धार किया ।
700. कभी जीवन में मत कहें कि मेरा कोई नहीं है । सबके प्रभु होते हैं । कभी जीवन में उदास नहीं रहना चाहिए यह सोच कर कि मेरा कोई नहीं है ।
701. मनुष्य हारता है, दुःखी होता है और उदास हो जाता है । प्रभु कहते हैं कि हर परिस्थिति से बचाने के लिए मैं बैठा हूँ । प्रभु के इस अमर वाक्य का अगर विश्वास जीवन में हो गया तो शांति अपने आप जीवन में आ जाती है ।
702. अनंत कोटि ब्रह्मांड के नायक प्रभु जब हमारा हित करने के लिए बैठे हैं तो हमें किसका डर है ।
703. प्रभु कितनी ही बार यह कह चुके हैं कि मैं तुमसे यानी जीव से प्रेम करता हूँ । कभी हमें भी तो मन से कहना और उसी अनुसार प्रभु से सच्चा प्रेम करना चाहिए ।
704. श्रीमद् भगवद् गीताजी के समान संसार के जंजाल में फंसे जीव के लिए पथ-प्रदर्शन करने वाला अन्य कोई भी श्रीग्रंथ नहीं है ।
705. क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए इसका सबसे उत्तम मार्गदर्शन श्रीमद् भगवद् गीताजी में ही मिलता है ।
706. प्रभु ही हमारे सनातन साथी और सदा हित करने वाले हैं ।
707. अपने मन के संकल्प और विकल्प का त्याग जीवन में होना आवश्यक है । संकल्प और विकल्प ही हमारे मन में कामना का निर्माण करते हैं ।
708. संसार बढ़िया है, यह टिप्पणी मन में उठने ही नहीं देनी चाहिए । यह टिप्पणी ही हमें फंसाने वाली है ।
709. प्रभु के स्वरूप का और प्रभु के दिव्य तेज का ध्यान करना चाहिए ।
710. हमें प्रभु नाम लेने की धुन लग जानी चाहिए ।
711. प्रभु का अवकाश श्रीगोपीजन के जीवन में था ही नहीं क्योंकि हर पल प्रभु का स्मरण ही उनके जीवन में चलता था ।
712. श्रीगोपीजन को प्रयास करना पड़ता था प्रभु को भूलने का जो उनसे होता नहीं था । हमें प्रयास करना पड़ता है प्रभु को याद रखने का । यह कितना बड़ा फर्क है ।
713. संसार से अपनी प्रवृत्ति को बटोर कर प्रभु में लगाने का प्रयास करना चाहिए ।
714. पूजा तल्लीन होकर ही करनी चाहिए तभी उसका फल मिलता है और हम प्रभु के समीप पहुँचते हैं ।
715. चित्त को बाहर के विषयों से हटाकर प्रभु में केंद्रित करने की आवश्यकता है ।
716. हर साधन उपयोगी है पर उसकी सीमा है । केवल भक्ति ही है जो सर्वोत्तम उपयोगी है और उसकी कोई सीमा भी नहीं है । हम कितने भी आगे भक्ति पथ पर बढ़ते चले जा सकते हैं ।
717. सभी साधन का अंत में त्याग होता है पर भक्ति चलती ही रहती है ।
718. हमारा लक्ष्य प्रभु की प्राप्ति और प्रभु के दर्शन होने चाहिए ।
719. संसार का अनुभव मन को रोजाना होने पर भी हमें देखना चाहिए कि हमारा मन उस संसार से चिपकता तो नहीं है ।
720. जब भीतर से संसार छूट जाता है तभी हमारा कल्याण संभव होता है । संसार में रहते हुए भी हमारा संसार छूट जाए, यह सबसे ऊँ‍‍ची स्थित होती है ।
721. हम संसार में करने की, संसार को जानने की और संसार से पाने की इच्छा रखते हैं, जो गलत है । यह तीनों समाप्त होने पर ही हमारा कल्याण संभव है ।
722. हमारे मन में संसार के लिए नहीं बल्कि प्रभु के लिए संकल्प उठने चाहिए ।
723. आध्यात्मिक मार्ग पर हम अपनी उन्नति या अधोगति के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं । प्रभु यह बात साफ कहते हैं ।
724. स्वयं का कल्याण, स्वयं का उद्धार स्वयं के प्रयास से ही हमें करना पड़ता है । अन्य किसी के द्वारा हमारा कल्याण और उद्धार संभव नहीं जब तक हमारा प्रयास नहीं होगा ।
725. साधन के क्षेत्र में हमारे मित्र भी हम ही होते हैं और हमारे शत्रु भी हम ही होते हैं ।
726. प्रभु की प्राप्ति के लिए हमें योग्य बनना पड़ता है ।
727. अगर हमने आध्यात्मिक उन्नति की है तो इसमें हमारा विवेक, हमारा वैराग्य और हमारा साधन कारण होता है । अगर हमने आध्यात्मिक उन्नति नहीं की है तो उसमें हमारा अविवेक, हमारा अवैराग्य, हमारी चंचलता और हमारा आलस्य कारण होता है ।
728. हम बहाने बनाने में माहिर होते हैं पर अध्यात्म मार्ग पर विफलता पर हम कोई बहाना नहीं दे सकते ।
729. हमारे भीतर भक्ति की तीव्र लालसा है कि नहीं, यह देखने योग्य बात है ।
730. जब तक जीवन है तब तक प्रभु की कथा का श्रवण करते रहना चाहिए ।
731. अध्यात्म से दूर जाकर हमारे पतन का कारण हम ही बनते हैं और अध्यात्म से जुड़कर हमारे उत्थान का काम भी हमें ही करना होता है ।
732. आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रभु कसौटी बताते हैं कि हमारी इंद्रियों पर हमारा कितना नियंत्रण है । जितने अनुपात में हमारा नियंत्रण है उतने हम अपने हितकर्ता हैं ।
733. जीवन में जितना संयम का अभ्यास अधिक होगा उतना हमने अपना कल्याण किया, यह प्रभु हमें समझाना चाहते हैं । जितनी हमने संयम की उपेक्षा की, उतनी मात्रा में हमने अपना घात किया यानी अहित किया ।
734. संसार हमें नहीं पकड़ता है, हम ही संसार को पकड़ कर रखते हैं और कहते हैं कि संसार हमें भजन के लिए छोड़ता नहीं ।
735. संसार के विषय हमें एक बार पकड़ते हैं फिर जीवन भर के लिए हम उन्हें पकड़ लेते हैं । हम उन्हें छोड़ सकते थे पर हम छोड़ते नहीं जैसे तोता नली को पकड़ लेता है और उल्टा भी हो जाता है तो भी छोड़ता नहीं और बहेलिए की पकड़ में आ जाता है ।
736. परमानंद स्वरूप प्रभु हमसे दूर नहीं हैं, हमारे सबसे समीप हैं ।
737. प्रभु बेहद समीप हैं पर संत कहते हैं कि काम, क्रोध, मद और लोभ की पहाड़ी बीच में आ गई है इसलिए प्रभु के समीप होने पर भी दर्शन नहीं होते ।
738. श्रीमद् भगवद् गीताजी में दैवी संपत्ति के रूप में प्रभु ने जो सद्गुणों की सूची दी है उस ओर हमारा ध्यान जाना चाहिए ।
739. प्रभु से मिलन का लक्ष्य निरंतर हमारे जीवन में होना चाहिए ।
740. चाहे पापी-से-पापी, दुराचारी-से-दुराचारी कोई है पर उसमें भी प्रभु का निवास है, यह कभी नहीं भूलना चाहिए ।
741. पूरी सृष्टि में एक ही चेतन प्रभु को देखना चाहिए । पूरी सृष्टि एक प्रभु की श्रीलीला विलास है ।
742. किसी का विरोध करना हो, सजा करनी हो, कठोर निर्णय किसी के लिए लेना हो तो भी उसके भीतर स्थित प्रभु की चेतना को हमें कभी भूलना नहीं चाहिए ।
743. सबके भीतर प्रभु की ज्योति है ।
744. भक्ति का साधन पूर्णतया अकेले का साधन है । यह सामूहिक साधन नहीं है । एकांत के बिना इसमें उन्नति और प्रगति नहीं होती है ।
745. हम संसार को अपने भीतर लाते हैं, सांसारिक बातों में व्यस्त रहते हैं और उसी में जीवनभर उलझते चले जाते हैं ।
746. जीवनभर हम लोगों में रहे, लोगों से व्यवहार किया, लोगों को जानने का प्रयास किया पर कभी प्रभु को जानने का प्रयास किया ही नहीं । हमारा दुर्भाग्य देखें कि ऐसा कोई प्रयास किया जाना चाहिए, यह हमने सोचा भी नहीं ।
747. भक्ति सतत होती रहनी चाहिए । कभी हो, कभी नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिए ।
748. भक्ति करना हमारा स्वभाव बन जाना चाहिए ।
749. भक्ति एकाकी साधन है । एकाकी का अर्थ है दूसरा कोई भी संग नहीं । भक्ति का साधन भक्त और भगवान के बीच का एकाकी साधन है । भक्त और भगवान के बीच में अन्य कोई नहीं होता ।
750. भक्ति में अपना मन प्रभु में लगाना होता है और यह प्रयास सतत करते रहना होता है ।
751. जब तक बाहर की सारी-की-सारी सृष्टि से वैराग्य नहीं होता तब तक भक्ति कभी सिद्ध नहीं हो सकती ।
752. जितना संग्रह अधिक होगा, उतना भक्ति में व्यवधान अधिक होगा ।
753. शास्त्रों में कहा गया है कि जब सारे तीर्थ लुप्त हो जाएंगे तो वे आकर भगवती गंगा माता में निवास करेंगे । भगवती गंगा माता का इतना बड़ा माहात्म्य है ।
754. एक संवेदनशील मन ही भक्ति कर पाता है ।
755. संतों ने श्री हिमालयजी में तीर्थ नहीं माना, पूरे श्री हिमालयजी को ही तीर्थ माना है । आज भी कितने योगी, ऋषि अदृश्य रूप से वहाँ निवास करते हैं ।
756. संसार हमें करना पड़ता है यह अलग बात है पर हम संसार करने के लिए जन्मे नहीं हैं । हम प्रभु प्राप्ति करने के लिए ही जन्मे हैं ।
757. स्वर्ग के देवतागण भी अन्यत्र पृथ्वी भूमि पर जन्म लेने के इच्छुक नहीं होते, वे केवल भारतवर्ष की भूमि पर जन्म चाहते हैं । भारतवर्ष का इतना बड़ा गौरव है ।
758. प्रभु के साथ भक्ति द्वारा हमारी तरंगें जुड़ जाती है ।
759. प्रभु से हमारा कितना प्रेम है, प्रभु इस बात को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं ।
760. संसार को हमारे भीतर लाने का सबसे बड़ा काम हमारी आँखें और हमारे कान करते हैं । इन दोनों को अगर हम प्रभु दर्शन और प्रभु गुणानुवाद के श्रवण में लगा लेते हैं तो हमारा मंगल-ही-मंगल होता है ।
761. संसार के जिन पदार्थों का अनुभव हम करते हैं उसको पाने की लालसा हमारे भीतर निर्माण हो जाती है ।
762. प्रभु जीव को आत्मा शुद्धि करने की प्रेरणा देते हैं जिससे वह अपने भीतर स्थित प्रभु का अनुभव कर पाए ।
763. उत्तम भक्ति वही कर सकता है जो ब्रह्मचर्य का पालन करता है ।
764. कुछ भी हो जाए, भक्त के मन को अशांत होने की संभावना ही नहीं होती क्योंकि उसे प्रभु पर पूर्ण विश्वास होता है ।
765. संसार की उपेक्षा करने जितना वैराग्य भक्त हृदय में आ ही जाता है ।
766. इधर-उधर मन नहीं लगना चाहिए, मन भगवान में लगाना चाहिए - ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
767. मन को एकाग्र होने का अभ्यास है । आज वह विषयों में एकाग्र होता है । उसे प्रभु में एकाग्र करना ही भक्ति है ।
768. भक्ति जैसे अत्यंत पवित्र अमृत से मनुष्य जीवन पाकर वंचित रहने वाला व्यक्ति धिक्कार योग्य है ।
769. प्रभु का निरंतर स्मरण करने का जीवन में नियम लेना चाहिए और उसे कभी तोड़ना नहीं चाहिए ।
770. श्रीग्रंथों में साक्षात ईश्वर बुद्धि रखनी चाहिए ।
771. मन को केवल एकाग्र करना योग नहीं है । मन को प्रभु में एकाग्र करना ही योग कहलाता है ।
772. विषयों से मन एकाग्र रोज ही होता है । उस मन को विषयों और संसार से हटाकर प्रभु में एकाग्र करना ही योग है और हमारा प्रयास इसी दिशा में होना चाहिए ।
773. मंत्र के भाव में डूबकर मंत्र उच्चारण से उसका अनंत गुना फल हो जाता है । बिना भाव के मंत्र उच्चारण का केवल साधारण फल होता है ।
774. हम अखंड जलधारा से प्रभु श्री शिवजी का अभिषेक करते हैं पर उतने समय के लिए अगर हमारे विचारों की धारा भी प्रभु श्री शिवजी में केंद्रित रहे तो हमारी पूजा तुरंत सिद्ध हो जाती है ।
775. भाव में लीन होकर ही पूजा करनी चाहिए । जैसे-तैसे जल्दबाजी में पूजा करने का फल सीमित होता है ।
776. प्रभु के लिए जो भी कर रहे हैं उसमें पूरी तरह चित्त को एकाग्र करके करें ।
777. शास्त्र प्रभु के अलावा कहीं भी मन लगाने का निषेध करते हैं ।
778. प्रभु विराट हैं और सभी रूप उनके ही हैं । इसलिए जो रूप हमें प्रिय हो उसकी भक्ति उन विराट प्रभु तक स्वतः ही पहुँच जाती है ।
779. हमें प्रभु कैसे चाहिए, प्रभु वैसे बनने को तैयार हैं । जो रूप हमें प्रिय है उस रूप में आकर प्रभु हम पर कृपा कर देते हैं । यह सनातन धर्म की विशेषता है ।
780. श्री वेदजी की अमर वाणी है कि परमात्मा एक ही हैं ।
781. प्रभु के किसी भी रूप का कभी भी खंडन करना महापाप है ।
782. यह सिद्धांत है कि प्रभु के जिस रूप में हम आसक्त हैं प्रभु हम पर कृपा करने के लिए वही रूप धारण करके पधारते हैं ।
783. प्रभु के सब रूपों से, प्रभु के सब नामों से पहुँचने का गंतव्य एक ही है ।
784. अपने भीतर की भक्ति भावना का उपयोग संत और भक्त केवल प्रभु प्राप्ति के लिए ही करते हैं ।
785. हमारा अंतःकरण प्रभु के चिंतन से हटना ही नहीं चाहे, तो ही हमारी भक्ति सफल है, ऐसा मानना चाहिए ।
786. अपने भक्त पर अहेतु की कृपा करने के लिए प्रभु सदैव आतुर रहते हैं ।
787. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी श्री ध्रुवजी को कहते हैं कि प्रभु में अनुग्रह करने की आतुरता सदैव रहती है क्योंकि वे जीव मात्र से प्रेम करते हैं ।
788. ध्यान और पूजा उसकी सफल होती है जिसको प्रभु विग्रह की जगह साक्षात प्रभु दिखते हैं । जिसको प्रभु का चित्र नहीं दिखता उसमें प्रभु दिखते हैं ।
789. अपने प्रभु से अधिक, अपने साधन से अधिक हमें कोई बात महत्वपूर्ण नहीं लगनी चाहिए ।
790. फल की ओर ध्यान जाते ही हमारे द्वारा किए जा रहे साधन का मूल्य कम हो जाता है ।
791. प्रभु से सदैव भक्त यही मांगते हैं कि उनकी भक्ति में निष्ठा कभी कम नहीं होवे ।
792. एक भी दिन जो साधन हमने प्रभु के लिए अपनाया है, वह खंडित नहीं होना चाहिए ।
793. प्रभु के लिए किया जाने वाला साधन पूर्ण श्रद्धा के साथ होना चाहिए ।
794. यह सिद्धांत है कि जिसमें हम अपना चित्त लगाते हैं उनके पास जो होता है वह हमें मिलता है । प्रभु के पास शांति और परमानंद है इसलिए प्रभु में चित्त लगाने वाले को शांति और परमानंद मिलता है ।
795. अत्यंत प्रेम से, भाव से, भक्ति से प्रभु की आराधना करें क्योंकि पूर्ण शांति प्रभु के पास ही है । शांति संसार में है ही नहीं ।
796. प्रभु कहते हैं कि मेरे में ही चित्त लगाओ और मेरा ही चिंतन करो ।
797. जीवन की सारी बातें पारमार्थिक होनी चाहिए ।
798. प्रभु का रूप, प्रभु का नाम, प्रभु के सद्गुण, प्रभु की श्रीलीला, प्रभु के धाम का चिंतन करना चाहिए । इससे रोजाना चिंतन के लिए नया-नया विषय मिलता रहेगा ।
799. घर बैठे-बैठे मन से तीर्थों में भक्त चले जाते हैं ।
800. मन को प्रभु के रूप, नाम, सद्गुण, श्रीलीला और धाम में रोजाना कहीं-न-कहीं बांधना जरूरी है जिससे वह संसार की तरफ नहीं भागे ।