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BHAKTI VICHAR CHAPTER NO. 26

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. माया के प्रभाव से बाहर निकलना है तो ठंडा-गर्म सहने का अभ्यास करना होगा, मान-अपमान, भूख-प्यास को सहना ही तप है । यही तो आंतरिक तप कहलाता है ।
002. शास्त्रों में तितिक्षा पर बहुत जोर दिया गया है । तितिक्षा का अर्थ है कि बाहर के लोग जो कष्ट देते हैं उन्हें सहन करना क्योंकि प्रतिकार करेंगे तो सारे जीवन का समय उसमें ही चला जाएगा । छोटी-छोटी बातों का प्रतिकार करें ही नहीं । यह जिसके ध्यान में आया वही सच्चा साधक है ।
003. मौन का पालन करना चाहिए । जितनी अनावश्यक बातें टाल सकते हैं टालनी चाहिए । हम बिना कारण बहुत समय व्यर्थ बातों में लगाते हैं । जितना-जितना वाणी का संयम उतना-उतना चित्त शांत होगा और असत्य भाषण जीवन में कम हो जाएगा ।
004. जीवन को सरलता से भरकर रखना चाहिए । जीवन में जितना धोखाधड़ी, असत्य रहेगा उतना मन अशांत रहेगा । झूठ बोलने वाले को बहुत सावधान रहना पड़ता है कि मैंने किस-किस से क्या-क्या झूठ बोला है पर सत्य एक ही होता है इसलिए सत्य को याद रखने की जरूरत नहीं होती ।
005. जितनी सरलता उतनी मन की स्वच्छता, जितनी मन की स्वच्छता उतनी निश्चलता, जितनी निश्चलता उतनी साधना में सफलता मिलती चली जाएगी ।
006. जीवन को किसी महान कार्य में लगाना चाहिए जिससे जीवन असंयमी न बने ।
007. साधन करने के लिए ब्रह्मचर्य से ऊर्जा का संरक्षण करना जरूरी है ।
008. हाथ से तो दूर, मन और वाणी से भी किसी की हिंसा करने का विचार भी मन में नहीं लाना चाहिए । अहिंसा से हमारी वृत्ति शांत होती जाती है ।
009. शास्त्रों ने बताया है कि प्रभु सर्वत्र विराजमान हैं । यह भावना रखने का प्रयास करना चाहिए जिससे सभी के साथ व्यवहार उत्तम हो ।
010. घर की आसक्ति को कम करना चाहिए । घर की चिंता करना गलत है । सूत्र यह है कि हम घर में रहे पर घर हमारे मस्तिष्क में नहीं रहे । मन से अनिकेत बने ।
011. जो सामान्य कपड़े हमें मिल सकते हैं उसी में जीवन यापन करना चाहिए । महंगे-महंगे कपड़ों को नहीं खरीदना चाहिए । बिना प्रयास के जो वस्त्र आ गया, समय बर्बाद किए बिना और प्रयास किए बिना उसे ग्रहण करना चाहिए । प्रभु मेरी चिंता रखेंगे । मन में मेरे अलंकारों का विचार नहीं हो । प्रभु के लिए अपने आपको साधन युक्त करके रखना चाहिए और प्रभु का विचार ही जीवन में करना चाहिए ।
012. एकांत का सेवन करना चाहिए । जिसने-जिसने साधन मार्ग में उनत्ति की है उनके सूत्र उन्हें एकांत में ही प्राप्त हुए हैं ।
013. संतोष जीवन में धारण करके रखना चाहिए । जीवन में प्रभु कृपा से जो मिल गया उसमें संतोष रखना चाहिए ।
014. प्रभु की तरफ ले जाने वाले शास्त्रों में हमारी श्रद्धा होनी चाहिए । रोजाना 10-15 पन्ने शास्त्रों के पढ़ने की आदत डालनी चाहिए ।
015. साधक अगर साधन को नियमित करके नहीं रखेगा तो नीचे पतन की संभावना बनी रहती है ।
016. किसी भी अन्य शास्त्र और परंपरा की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए । यह हमारे साधन को कमजोर करता है ।
017. भगवत् प्राप्ति के लिए अपने चुने हुए शास्त्रों पर पूर्ण श्रद्धा रखनी चाहिए ।
018. हमारा मन, हमारी वाणी, हमारे शरीर की इंद्रियों को एक-एक नियम लगा देना चाहिए । वाणी का नियम कि सत्य बोलना है, मन का नियम कि चंचलता रहित होना है, शरीर को प्रभु सेवा का नियम लगा देना चाहिए ।
019. जितना भी साधन करें उसे प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पण करना चाहिए । मैंने मेरा घर, पत्नी, पुत्र, संपत्ति सब प्रभु के श्रीकमलचरणों में चढ़ा दी है । किसी वस्तु को अपना न मानकर उसके मूल स्वामी प्रभु हैं, यह मानना चाहिए । उसके संरक्षण करने की प्रभु ने मुझे सेवा दे रखी है । यह सब कुछ मेरा नहीं है - ऐसी भावना होनी चाहिए कि यह सब प्रभु का ही है ।
020. लोगों के लिए प्रेम और सेवा करने की भावना रखनी चाहिए । लोक सेवा का मौका मिले तो चूकना नहीं चाहिए क्योंकि यह प्रभु की ही सेवा है ।
021. अंतरंग में प्रभु की छवि की सेवा, बहिरंग में हाथों से प्रभु की विग्रह की सेवा । दीननारायण के रूप में गरीबों की सेवा करनी चाहिए ।
022. जो प्रभु की सच्ची भक्ति करने में तल्लीन हैं वे पृथ्वी के देवता हैं । उनका आदर, उनकी सेवा करना चाहे वह कोई जाति का हो, ब्राह्मण हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता । प्रभु का भक्त है इसलिए वह सर्वथा पूजनीय है ।
023. श्रीग्रंथों का रोजाना स्वाध्याय और चिंतन करना चाहिए ।
024. केवल कथा और प्रवचन सुनना नहीं बल्कि उसकी चर्चा करना । श्रवण करना आधी भक्ति है पर जो सुना उसका परिवार और मित्रों के साथ चर्चा करना । फिर सबके कल्याणार्थ उसे विश्व से साझा करना, यह पूरी भक्ति का साधन है ।
025. अपने मुँह से प्रभु का वर्णन होता है तो वह श्रेष्‍ठतम पुण्य होता है । अकेले हों तो प्रभु के सद्गुणों का चिंतन करना चाहिए । कुछ लोग मिले तो सत्संग के रूप में प्रभु का गुणानुवाद करना यानी एक दूसरे के साथ मिलकर भगवत् सद्गुणों की चर्चा करनी चाहिए, संत कहते हैं कि ऐसा करने से ग्यारह गुना ज्यादा तृप्ति का अनुभव होता है ।
026. प्रभु के यशगान करने से हमारे भीतर प्रभु के लिए प्रेम जागृत होता है और हमारा चित्त संतुष्ट होता है ।
027. मैं प्रभु का स्मरण कर रहा हूँ - यह एक बात है । मैं प्रभु का स्मरण दूसरों से करवा रहा हूँ - यह बहुत बड़ी बात है ।
028. प्रभु का यशगान जहाँ निरंतर होता है तो वहाँ से पाप के पर्वत भी हट जाते हैं ।
029. पहले भक्ति अनुशासन से आरंभ होती है, फिर भक्ति में रस आने लगता है, फिर पाप कटने लगते हैं और फिर मन शुद्ध होता है । फिर चित्त पिघलने लगता है, प्रभु में मन लगने लग जाता है और फिर प्रभु के लिए व्याकुलता बढ़ने लग जाती है । प्रभु के लिए आंसू निकलने लग जाते हैं, शरीर रोमांचित होने लग जाता है, गला अवरुद्ध होने लग जाता है । प्रभु के लिए व्याकुल होकर भक्त रोता-हंसता-बोलता है - यह भक्ति की परम अवस्था है । अब भक्ति ने परा-भक्ति का रूप ले लिया । अब उस भक्त के हाथ से पूजा हो तो ठीक न हो तो ठीक क्योंकि अब केवल परमात्मा ही उसका जीवन हो जाते हैं । अखंड प्रभु स्मरण और प्रेम यही परा-भक्ति है । पूजा की क्रिया का विशेष महत्व नहीं क्योंकि अब वह निरंतर आनंद में डूबा रहता है । अंतःकरण का एकमात्र विषय प्रभु होते हैं, प्रभु के साथ एकरूप हो गया । सूत्र यह है कि प्रभु के एकरूपता प्रभु की प्रेमाभक्ति के अलावा अन्य किसी भी साधन से नहीं हो सकती । वह सहजता से कब भवसागर से तर जाता है पता भी नहीं चलता । जैसे ही वह भक्ति में डूब गया माया नाम की जादूगरनी वहाँ से अंतर्ध्यान होकर भाग गई । समस्या ही अंतर्ध्यान हो गई । जैसे नदी पार करने हेतु हमें नौका की व्यवस्था करनी पड़ती है पर पता चलेगा मृगजल है तो नदी थी ही नहीं तो नौका की जरूरत ही नहीं वैसे ही माया अंतर्ध्यान हो जाती है और समस्त जगत में जो बचे हैं वे प्रभु ही होते हैं । उसे प्रभु ही दिखते हैं हर तरफ क्योंकि अब माया है ही नहीं । माया से तरने का एकमात्र उपाय भक्ति ही है ।
030. मनुष्य को सिर्फ जीना नहीं चाहिए, उसके जीवन की एक योजना, एक आदर्श होना चाहिए ।
031. जीवनभर श्री भीष्म पितामह की एक ही अभिलाषा थी कि अंतिम समय प्राण छोड़ते वक्त प्रभु उनके सामने रहें ।
032. अंतिम अवस्था में श्री भीष्म पितामह ने अपनी मति यानी बुद्धि को प्रभु को अर्पण कर दी थी ।
033. श्री भीष्म पितामह ने प्रभु से कहा कि आप मुझे अर्जुन से भी ज्यादा प्रेम करते हैं । भक्त की प्रभु कृपा देखने की महानता देखें कि श्री भीष्म पितामह कहते हैं प्रभु से कि आपको पता था कि अर्जुन का सामना भीष्म से होगा तो आपने उसका सारथी बनना स्वीकार किया जिससे आपका दर्शन मुझे होता रहे । अर्जुन की तरफ आपकी पीठ थी और आपका श्रीमुख तो मेरे तरफ ही था ।
034. दो प्रतिज्ञा विरोधाभासी थीं । दोनों आधी-आधी पूरी हो जाए, ऐसा नहीं हो सकता था । एक टूटनी थी । किसकी टूटनी थी इसका निर्णय प्रभु ने ले लिया था । भक्त को महान बनाने के लिए प्रभु ने स्वयं की प्रतिज्ञा तोड़ी ।
035. प्रभु चार धनुष यानी 28 फीट श्री अर्जुनजी को घसीटकर श्रीचक्र लिए अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने के लिए आगे वेग से बढ़े । इतना प्रबल वेग प्रभु का था कि उन्हें रोकने का प्रयास के लिए प्रभु श्री अर्जुनजी 28 फीट तक घसीटकर जाना पड़ा ।
036. प्रभु की एक ही आकांक्षा कि लोग बोले कि प्रभु की प्रतिज्ञा टूट गई तो टूट गई पर प्रभु की जीवन भर भक्ति करने वाले भक्त की प्रतिज्ञा न टूटे । अपनी प्रतिज्ञा को ताक पर रखकर प्रभु ने भक्त का गौरव बढ़ाया ।
037. अंतिम अवस्था में श्री भीष्म पितामह ने कहा कि मुझे कुछ नहीं चाहिए । हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे कृष्ण कहकर जिह्वा पर प्रभु नाम, नेत्रों के सामने प्रभु रूप, हृदय में प्रभु का वास और एक श्रेष्ठ भक्त भगवान में विलीन हो गया ।
038. प्रभु वियोग के बाद संपूर्ण जीवन में पहली बार श्री अर्जुनजी को भीलों ने परास्त किया जिससे श्री अर्जुनजी को पता चला कि उनका पराक्रम प्रभु के कारण ही था ।
039. श्री अर्जुनजी ने हस्तिनापुर पहुँचकर प्रभु के श्रीधाम गमन का भयंकर विलाप किया । श्री अर्जुनजी ने कहा कि एक क्षण भी मैं प्रभु के वियोग में जीना नहीं चाहता । पहला प्रभु की कृपा का प्रकरण याद किया जब प्रभु के श्रीनेत्रों की कृपा-दृष्टि के कारण मछली की आँख भेदी और भगवती द्रौपदीजी से पाणिग्रहण हुआ । फिर उसी भगवती द्रौपदीजी पर विपत्ति आई, सभी पराक्रमी पांच भाई सिर झुकाए बैठे थे और कुछ भी नहीं कर पाए तो प्रभु ने भगवती द्रौपदीजी की लाज बचाई । फिर ऋषि श्री दुर्वासाजी के श्राप से बचाया और उनके साथ आए ब्राह्मण द्वार से भूखे लौट जाते तो कलंक लग जाता । एक-दो-तीन नहीं बल्कि अनगिनत संकटों से प्रभु ने बाहर निकाला ।
040. महान लोग कभी अपनी महानता जताते नहीं, दिखाते नहीं क्योंकि वे सबमें प्रभु की कृपा ही मानते हैं यानी प्रभु कृपा से ही महान कार्य हो पाया ।
041. जिन भगवती द्रौपदीजी ने सबसे ज्यादा प्रभु कृपा पाई उन्होंने सबसे ज्यादा प्रभु वियोग का दुःख भी सहा ।
042. प्रभु की कृपा से राज्य मिला । प्रभु अंतर्ध्यान हो गए तो अब हम पांडवों का राज्य पर कोई अधिकार नहीं इसलिए संन्यास लेकर श्री हिमालयजी के लिए प्रस्थान कर गए ।
043. राज्य श्रीकृष्ण कृपा प्रसाद है, प्रभु को कभी नहीं भूलना, श्री परीक्षितजी के राजतिलक करते हुए यह बात श्री युधिष्ठिरजी ने कही ।
044. श्री परीक्षितजी जब यज्ञ करते थे तो आहुति के वक्त देवतागण प्रकट होकर आहुति ग्रहण करते थे । यह प्रभु की गर्भ में कृपा पाने के कारण सामर्थ्य था जो श्री युधिष्ठिरजी के द्वारा किए यज्ञ में भी नहीं होता था ।
045. दुःख को पचाना कठिन होता है पर सुख को पचाना उससे भी कठिन होता है क्योंकि अमर्यादा आ जाती है, काम, क्रोध, लोभ बढ़ जाते हैं, कपट, दुराचार, असत्य आ जाता है ।
046. सब बुराइयों का मिला-जुला एक नाम है - कलिकाल ।
047. पिता का बच्चों को संस्कार देना मुख्य काम होता है । धर्म आचरण, सदाचार सिखाना मुख्य काम है । संस्कार देने वाले ही पिता कहलाते हैं । किसी पिता ने अपने पुत्रों को सिर्फ पैसा कमाना सिखाया, वह शास्त्र दृष्टि से पिता नहीं है ।
048. कलिकाल के प्रभाव के कारण प्रजा में जब दुर्गुण बढ़ने लगे तो राजा श्री परीक्षितजी ने कलियुग के पराभव का विचार किया ।
049. महाभारतजी में आदर्श राजा को सबसे कम सोने का समय दिया गया है । कार्य करने हेतु ज्यादा समय देना इसका उद्देश्य था । आज के समय के हिसाब से राजा को रात्रि दो बजे ही उठकर कार्य की तैयारी में लग जाना चाहिए ।
050. श्री नंदीजी श्रीशिवालय से पहले होते हैं तो इसका अर्थ क्या है ? बैल और गौ-माता धर्म के प्रतीक माने गए हैं । संदेश यह है कि पहले धर्म का पालन करें फिर प्रभु श्री शिवजी के समक्ष उपस्थित होने का अधिकार मिलता है ।
051. धर्म चार पैरों पर यानी चार आधार पर खड़ा है । जहाँ भी यह चार तत्व सुरक्षित हैं वहीं धर्म सुरक्षित है । तप, शौच, दया और सत्य । जिसके जीवन में यह चार चीज प्रचुर मात्रा में है उनमें धर्म विद्यमान है । तप का अर्थ है अपने कर्तव्य करते हुए कष्ट भी सहना हो तो सहे और अपना कर्तव्य पूरा करना तप है, कर्तव्य पथ पर आने वाली कितनी भी कठिनाइयों को सहना तप है । शौच यानी अंतरंग और बाहर दोनों तरफ पवित्रता शौच कहलाती है । दया यानी किसी को दुःखी देखकर यह नहीं सोचना चाहिए कि वह अपने प्रारब्ध के कारण कष्ट पा रहा है, उस पर दया करना यह दया कहलाती है । सत्य यानी मन, वाणी और व्यवहार में सत्यता । भारतवर्ष ने सबसे ऊँ‍चा धर्म सत्य को माना है इसलिए प्राचीन भारत ने कभी सत्य से समझौता नहीं किया ।
052. कलिकाल में राजा श्री परीक्षितजी कलियुग को मारना चाहते थे पर वह शरणागत हो गया । क्षत्रियों का धर्म शरणागत की रक्षा करना होता है । अब वे मार नहीं सकते थे । राज्य से बाहर जाने को कहा तो कलियुग ने कहा कि पूरे भूमंडल पर आपका राज्य है मैं कहाँ जाऊँगा । कलियुग ने कहा कि मेरे रहने के लिए आप स्थान दे दें तो राजा श्री परीक्षितजी ने चार स्थान दिए, फिर एक स्थान और बढ़ाया तो कुल पांच स्थान में कलियुग का वास हो गया । (1) जुआ (2) मदिरापान (3) परस्त्री गमन (4) हिंसा और (5) स्वर्ण । हर दुराचार, हर दुःख का कारण इन पांच स्थानों में से कहीं-न-कहीं एक स्थान होगा । दुःख यहीं से निकलता है । जिसे अपना जीवन शुद्ध रखना हो उन्हें इन पांच बातों से दूर रहना चाहिए । इन पांच विकारों को अगर हमें दूर रखना है तो एक ही उपाय है और वह है भक्ति ।
053. कलिकाल को जो पहला स्थान दिया वह जुआ है । जुआ अच्छे-अच्छे की बुद्धि भ्रष्ट करता है । उदाहरण स्वरूप देखें तो धर्मराज श्री युधिष्ठिरजी जैसे धर्मयुक्त की भी भगवती द्रौपदीजी को जुए के दांव पर लगा देने जितनी बुद्धि भ्रष्ट हुई । आधुनिक तीन उदाहरण देखें । जहाँ भी बिना परिश्रम से प्राप्त हुई संपत्ति है वह जुआ ही कहलाता है । बिना पढ़ाई किए नकल करके पास होना जुआ है । बिना सेवा किए किसी पद पर बने रहना जुआ है ।
054. कलिकाल को जो दूसरा स्थान दिया वह मदिरापान है । देश के हर देहात में रात में एक लीटर दूध मिलेगा यह सवाल है पर मदिरा जरूर मिल जाएगी, यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है । उदाहरण स्वरूप प्रभु ने भी श्री कृष्णावतार में दिखाया कि मदिरापान ने प्रभु के कुल का नाश किया ।
055. कलिकाल को तीसरा स्थान दिया हुआ है परस्त्री गमन । आज मोबाइल और इंटरनेट इसका सबसे बड़ा माध्यम हो गया है । गलत चीज देखने से दोष दृष्टि बढ़ती ही जा रही है ।
056. कलिकाल को चौथा स्थान दिया गया है हिंसा । पशु हिंसा से पशु को मार कर खाएंगे तो पशु विचार ही हमारे भीतर आएंगे । हम फैशन हेतु बढ़िया-बढ़िया पर्स या बेल्ट पहनते हैं जिसको 40 मिनट खौलते हुए पानी में तड़पाकर जीव की हत्या करके खाल निकाली जाती है जिससे कि वह चमड़ा नर्म रहे । जीवित जानवरों की खाल निकाली जाती है । निकालते-निकालते वे जानवर के बच्चे तड़प-तड़प कर मर जाते हैं ।
057. कलिकाल को पांचवा स्थान दिया गया है स्वर्ण । स्वर्ण धातु का नाम नहीं यह तो संकेत है, उपलक्ष्ण है । शुद्ध तरीके से कमाया स्वर्ण का उपयोग धर्मयुक्त माना गया है पर अशुद्ध और अनैतिक तरीके से कमाया हुआ स्वर्ण या धन का निषेध धर्म ने किया है । यहाँ कलिकाल का वास है । अगर संपत्ति अशुद्ध है तो वह कलिकाल के कीटाणु को निर्माण करेगी । जैसे पानी की टंकी में हम यह ध्यान रखते हैं कि थोड़ा-सा भी गंदा पानी टंकी में नहीं जाए नहीं तो पूरा पानी को वह दूषित कर देता है वैसे ही थोड़ा-सा भी अनैतिक धन अगर शुद्ध धन में मिल जाता है तो वह पूरे शुद्ध धन को भी अशुद्ध कर देता है । जैसे थोड़ा-सा दूषित पानी ने पूरे पानी की टंकी के पानी को दूषित कर दिया ।
058. जो कलियुग सर्वत्र फैलना चाहता था उन्हें पांच स्थानों पर राजा श्री परीक्षित जी ने सीमित करके रख दिया । यह राजा श्री परीक्षितजी का हमारे ऊपर कितना बड़ा उपकार है ।
059. अपने शरीर को योग्य रखने हेतु युद्ध के लिए की गई तैयारी में सीमित मात्रा में मृगया (शिकार) करना धर्मयुक्त है । पर जब वह व्यसन बन जाता है, शौक बन जाता है और ज्यादा बार राजा करता है तो वह अनैतिक शौक बन जाने के कारण पशु हत्या अधिक मात्रा में होती है । कितना सुंदर धर्म का सिद्धांत है कि मृगया धर्मयुक्त है या मृगया अनैतिक है ।
060. क्या होती है समाधि ? पूर्ण अंतरंग होना यहाँ तक कि गले में साँप डालने पर भी समाधि नहीं खुली ऋषि श्री शमीकजी की ।
061. महात्मा और संतों को प्रणाम करते वक्त अपना नाम बता कर प्रणाम करना चाहिए । यह धर्म का सिद्धांत है और नाम बता कर किया प्रणाम को वैदिक परंपरा में प्रणाम माना गया है । सूत्र क्या है ? मेरा नाम याद करने जितना बोझ भी महात्मा और संतों पर नहीं पड़ना चाहिए । कितनी अदभुत भारतीय परंपरा रही है ।
062. उत्तर नहीं पाने पर अनैतिक स्वर्ण का मुकुट पहनने के कारण राजा श्री परीक्षितजी के भावना जग गई कि यह ढोंगी है और आजीवन ऋषियों को पूजनीय मानने वाले और मन में भी ऐसा कुटिल विचार नहीं आने देने वाले राजा श्री परीक्षितजी को कलिकाल के प्रभाव में ऐसा कृत्य करना पड़ा ।
063. कलिकाल हमें चपेट में लेता है पांच कारणों के कारण और फिर हमारा पतन करवा देता है ।
064. मोबाइल पर बुरा दृश्य देखना या नहीं देखना यह हमारे हाथ में है । मगर देख लिया तो उसको भूलना मुश्किल है । एक बुरी बात सुननी या नहीं सुननी है यह हमारे हाथ में है पर अगर बुरी बात मन में सुन ली तो उसे भूलना हमारे हाथ में नहीं है । यह मानव स्वभाव है कि अच्छी बातें जो याद रखनी चाहिए वह हम भूल जाते हैं और गलत बात जो भीतर बैठ गई है उसे भूलना बहुत कठिन होता है । सूत्र है कि इसलिए सावधान रहना चाहिए कि आरंभ से ही बुरा न देखें, न सुने और न सोचें ।
065. बुराई भीतर गई तो वह अपना परिणाम नहीं करेगी, ऐसा संभव ही नहीं है ।
066. हमारे भीतर बहुत हानिकारक कीटाणु छिपे हुए हैं पर जब हम दुर्बल होते हैं तो वे भीतर से आक्रमण करते हैं । तब तक वे अवसर की तलाश में शांत बैठे रहते हैं । इसी तरह समय आने पर हमारे भीतर के विकार हमें छोड़ेंगे नहीं इसलिए विकार को हमारे भीतर प्रवेश नहीं करने दें नहीं तो वह हमारी कमजोर बुद्धि पर क्षणभर में आक्रमण कर देंगे ।
067. तपस्वी को श्राप देना अपेक्षित नहीं क्योंकि श्राप दिया जाता है क्रोध से और क्रोध से साधन का नाश हो जाता है ।
068. साधन में नित्यता होनी चाहिए । रोजाना एक माला का नियम है पर एक दिन चूक गए, नियम खंडित हो गया तो माला के जाप का पुण्य गया ।
069. स्वर्ग की मेनका अप्सरा के कारण ऋषि श्री विश्वामित्रजी का पूरा तप काम के वश में चढ़ गया । दोबारा स्वर्ग की अप्सरा रंभा आई और काम का वेग तो ऋषि श्री विश्वामित्रजी ने रोक लिया पर क्रोध आ गया और अप्सरा रंभा को श्राप दे दिया । फिर क्रोध आते ही उनकी तपस्या नष्ट हो गई । आधुनिक उदाहरण स्वरूप हमने दो माला फेरी, पुण्य कमाया, फिर किसी से झगड़ा कर लिया तो हमारा पुण्य चला गया ।
070. मंत्र सिद्धि उसी को होती है जो अपमानों में भी शांत रहना सीख जाता है ।
071. हम अपने सब पुण्य अपने विकारों से नष्ट कर बैठते हैं और जीवन के अंत में किंचित मात्र भी पुण्य संचित नहीं रख पाते । पूरी पुण्य की कमाई को हम जला देते हैं और किंचित मात्रा में भी बचा नहीं पाते, उल्टे पाप जमा कर लेते हैं ।
072. शांत व्यक्ति का पुण्य नष्ट नहीं होता क्योंकि अपमान में, निंदा में, स्तुति में, भूख में, प्यास में भी वह शांत ही रहता है ।
073. अनीति के धन का मुकुट हटते ही राजा श्री परीक्षितजी को महसूस हुआ कि प्रभु श्री कृष्णजी के भक्त मेरे से ऐसा ऋषि अपराध कैसे हो गया ?
074. स्वयं को दंड देने की और स्वयं के लिए दंड मांगने की पद्धति भारत में थी । सज्जन लोग स्वयं के लिए गलत कर्म का दंड मांगते थे ।
075. हम अगर गुरु के दंड से बच गए, अगर राजा के दंड से बच भी गए और गलती हुई तो स्वयं जाकर शुद्धिकरण हेतु दंड ले लिया । इस तरह सज्जन लोग पृथ्वी पर ही दंड ले लेते थे तो नर्क में अगली दंड की प्रक्रिया बच जाती थी, नहीं तो प्रभु श्री यमराजजी के यमदंड से कोई भी नहीं बच सकता ।
076. कितना गहन चिंतन भारतीय संतों ने श्रीमद् भागवतजी महापुराण का किया है । श्री परीक्षितजी को 7 दिन का श्राप मिला था पर असल में वह 11 दिन थे क्योंकि राजा श्री परीक्षितजी ने अपने पुत्र जनमेजय को राज्य दिया, संतों से मिले और अपने आत्म-कल्याण का उपाय पूछा । कोई उपाय नहीं बता पाए तो अन्न-जल छोड़कर बैठ गए । तब प्रभु श्री शुकदेवजी आए और उन्होंने कहा कि अभी 7 दिन बाकी है चिंता मत करें, मैं श्रीमद् भागवतजी महापुराण का तुम्हें श्रवण करवाऊँगा ।
077. राजा श्री परीक्षित जी के पास 7 दिन की गारंटी थी पर हमारे पास तो वह भी नहीं है इसलिए आत्म-कल्याण हेतु हमें तुरंत ही सावधान हो जाना चाहिए ।
078. जीवन का उत्तम प्रबंधन वह करता है जो मृत्यु तक की योजना पहले से ही बना लेता है । वह यह सोच लेता है कि आत्म-कल्याण के कौन-कौन से कार्य हैं जो उसे मृत्यु से पहले करने चाहिए । यही सिखाने वाला श्रीग्रंथ है - श्रीमद् भागवतजी महापुराण ।
079. माया से तरने का अंतिम उपाय प्रभु की भक्ति से प्रभु से एकरूप हो जाना है ।
080. कैसी है माया ? संत श्री एकनाथजी उपमा देकर कहते हैं कि जैसे आकाश में नीलिमा दिखती है पर नीला कुछ भी नहीं होता वैसे ही जो वस्तु नहीं है, उसे मान लिया गया है, वह माया है ।
081. तीर्थ, तप, भजन सब साधन भक्ति है । इनको करके-करते लक्ष्य साध्य भक्ति होना चाहिए । आँखें खुले तो प्रभु, आँखें बंद हो तो प्रभु क्योंकि साध्य भक्ति में कोई क्रिया होती ही नहीं । साधन भक्ति में क्रिया होती है । साध्य भक्ति बोलने, सुनने और व्याख्या की चीज नहीं है । यह तो मात्र अनुभव लेने वाली भक्ति है । संत श्री ज्ञानेश्वरजी, गोस्वामी श्री तुलसीदासजी इसी साध्य भक्ति का प्रतिपादन करते हैं । पर वहाँ तक पहुँचने का मार्ग साधन भक्ति है । साधन भक्ति करते-करते ही साध्य भक्ति प्राप्त होती है ।
082. परमात्मा तत्व की व्याख्या क्या है ? प्रभु इसकी व्याख्या करते हैं और प्रभु की सर्वोत्तम व्याख्या श्रीमद् भागवतजी महापुराण में मिलेगी । वेदांत शास्त्र जिन्हें परमात्मा मानते हैं उनकी व्याख्या श्रीमद् भागवतजी महापुराण में मिलेगी ।
083. एक शक्ति जो पूरे ब्रह्मांड का निर्माण करती है, उसे धारण करती है और अंत में सृष्टि का विलय जिनमें होता है – वे प्रभु ही हैं ।
084. प्रभु की उत्पत्ति कहीं और कभी नहीं होती । प्रभु का कोई जन्म नहीं है । प्रभु सर्वदा से हैं और सर्वदा रहने वाले हैं ।
085. वेदांत में प्रभु वर्णन में कोई भी सांप्रदायिकता की बात ही नहीं है इसलिए वह सबको मान्य है ।
086. हर चीज किसी ने बनाई है, अपने आप कुछ भी नहीं बनती । इसलिए सृष्टि अपने आप नहीं बन सकती । एक सामान्य वस्तु जो अस्तित्व में है उसे किसी ने अस्तित्व में लाया है । इसी तरह सृष्टि को बनाने वाले, इसके पीछे कोई-न-कोई है । सिद्धांत यह है कि अगर कार्य है तो उसके पीछे कारण भी होगा ।
087. संत श्री रामकृष्णजी परमहंस गिरगिट को देखकर एक उदाहरण देते थे । तीन जन उलझे, एक ने गिरगिट को पीला, दूसरे ने लाल रंग का कहा और तीसरे ने कहा हरे रंग का है । गिरगिट का असली रंग कौन-सा है ? जिसने एक क्षण देखा वह एक रंग को ही देखेगा पर जो पूरा समय देखेगा उसे अलग-अलग रंग दिखेंगे । वैसे ही जो प्रभु को थोड़े समय के लिए देखेंगे उन्हें प्रभु एक रूप में दिखेंगे पर जो प्रभु को नित्य निरंतर देखने की आदत डालेंगे उन्हें प्रभु के विभिन्न रूप दिखेंगे ।
088. प्रभु भक्तों की प्रबल भावना के अनुसार विभिन्न रूप लेकर आते हैं ।
089. सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रभु के रूप और नाम की विभिन्नता का भान हमें करवाता है ।
090. जिसने जैसा नाम रखा बालक उस नाम से हुंकार भरता है वैसे ही प्रभु को अलग-अलग नाम से भक्त पुकारते हैं और प्रभु हुंकार भरते हैं ।
091. संसार है तो उसका मूल स्त्रोत कहीं होना चाहिए और वह मूल स्त्रोत परमात्मा ही हैं ।
092. प्रभु से संसार का निर्माण होता है पर प्रभु का निर्माण कहीं से नहीं होता - ऐसा वेदांत मत है ।
093. एक जागृत अवस्था, एक सुसुप्ति अवस्था, एक स्वप्न अवस्था, एक समाधि अवस्था इस प्रकार चार अवस्थाएं जीव की होती है ।
094. सपने को देखने वाला कौन ? सपना देखने वाला और दूसरे दिन सपना याद रखने वाला एक ही है । प्रगाढ़ निद्रा आई, बहुत सुख मिला, सुख अनुभव लेने वाला कौन ? जाग्रत, सुसुप्ति और स्वप्न का एक ही साक्षी है ।
095. जिसने सपना देखा उसे ही नींद आई थी और वही अभी जगकर उसे याद कर रहा है । साक्षी एक ही है । उसी साक्षी को अपने भीतर पहचानने का प्रयास करना चाहिए । इससे प्रभु जो हमेशा हमसे दूर लग रहे थे वे एकदम समीप लगने लगेंगे ।
096. समाधि में सिर्फ प्रभु ही होते हैं । जीवात्मा परमात्मा से एकरूप हो जाता है तो वह समाधि कहलाती है ।
097. संसार का एक नियम कि कोई भी क्रिया होगी तो क्रिया-शक्ति बिना नहीं होगी । हमारी इंद्रियां, प्राण, हृदय को चलाने वाली शक्ति प्रभु की है । अन्न पचाने की शक्ति प्रभु की है । इसलिए भक्त जरूरत से ज्यादा भोजन ग्रहण नहीं करते क्योंकि पचाने का भार प्रभु पर ज्यादा पड़ जाएगा । प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहा है कि भोजन मैं पचाता हूँ ।
098. प्रभु को बाहर श्रीहिमालय में नहीं खोजें, उन्हें अपने भीतर ही खोजें । हमारे भीतर के साक्षी - परमात्म तत्व यानी प्रभु ही हैं ।
099. विश्व में हृदय को छोड़कर कोई ऐसी मशीन नहीं जो नब्बे-सौ वर्षों तक बिना रुके निरंतर चलती रहे । यह शक्ति भी प्रभु की ही है ।
100. जैसे हम रिमोट से एयर कंडीशनर और टीवी बंद करते हैं, कोई तार नहीं दिखता पर ऊर्जा का प्रभाव हुआ तभी वह शुरू-बंद हुआ । वैसे ही प्रभु की ऊर्जा यानी बिना तार के रिमोट से प्रभु जीव और संसार को चलाते हैं ।
101. जिह्वा से बोलने वाली, आँखों को दिखाने वाली, प्राण का संचालन करने वाली, हृदय को चलाने वाली एक ही शक्ति है और वह प्रभु की शक्ति है ।
102. मैं सभी के हृदय में आत्म-शक्ति के रूप में विद्यमान हूँ - प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में श्री अर्जुनजी से यह कहा है ।
103. प्रभु का एक निवास हमारे भीतर प्रभु शक्ति के रूप में विद्यमान है ।
104. जैसे इंटरनेट कभी-कभी काम करना बंद कर देता है और मैसेज देता है कि सर्वर से संपर्क टूट गया है । वैसे ही प्रभु से संपर्क रहता है तो शरीर सुचारु चलता है, संपर्क टूट जाता है तो शरीर मृत हो जाता है ।
105. हमारे स्वयं के भीतर उतरने पर प्रभु जरूर मिलेंगे । प्रभु स्वयं का पता हमारे भीतर का बताते हैं । तीर्थ यात्रा से पुण्य मिलेंगे, अंतर-यात्रा से ही प्रभु मिलेंगे ।
106. प्रभु तक पहुँचने के लिए वाणी का प्रवेश नहीं, इंद्रियों का प्रवेश एकदम नहीं, बुद्धि वहाँ तक पहुँच नहीं सकती, मन की पहुँच नहीं है । इस तरह निर्मित वस्तु यानी जीवात्मा निर्माता यानी प्रभु को कैसे जान सकता है ? यह केवल भक्ति से ही संभव है जब प्रभु अपने आपको भक्त को जनवा देते हैं ।
107. प्रभु आत्ममूलम हैं यानी सबके मूल प्रभु ही हैं ।
108. प्रभु को वेदांत और शास्त्रों से भी नहीं जाना जा सकता – ऐसा संत श्री ज्ञानेश्वरजी ने श्री ज्ञानेश्वरीजी में कहा है ।
109. श्री वेदों ने, श्री उपनिषदों ने, शास्त्रों ने प्रभु का वर्णन तो किया पर कहाँ तक किया, थोड़ा-सा ही किया है । पूरी तरह वर्णन करने का दावा कभी श्री वेदजी के किसी भी श्लोक में नहीं मिलेगा ।
110. श्री विष्णु सहस्त्रनाम में प्रभु का हजार शब्दों में वर्णन है । प्रभु शब्दों से अतीत हैं पर जब भक्त शब्द से वर्णन करते हैं तो प्रभु हंसकर उसे मान्य कर देते हैं और उससे काम चला लेते हैं ।
111. जहाँ श्री वेदजी भी प्रभु का वर्णन करते-करते नेति-नेति कहकर मौन हो जाते हैं, वहाँ अन्य पुराणों और शास्त्रों की तो बात ही क्या है ।
112. हम व्रत खोलने से पहले जैसे पेड़ की डाली के ऊपर चंद्रमाजी के दर्शन करते हैं । पर पेड़ की डाली का चंद्रमाजी का कोई संबंध नहीं है । पर वह चंद्रमाजी को दिखाने हेतु दिशा दिखाने हेतु उपयोगी है । वैसे ही श्री वेदजी के शब्द प्रभु को दिखाने हेतु दिशा देते हैं । जैसे ही प्रभु के दर्शन करवा दिए, शास्त्रों के शब्द का उपयोग खत्म हो गया । उपयोग मात्र प्रभु का अनुसंधान कराने हेतु था ।
113. सर्वोत्तम ज्ञानी को आप प्रभु के बारे में पूछते हैं तो उनका एक ही उत्तर होता है - मौन ।
114. जैसे एक संसारी को अपनी पत्नी के साथ एकरूप होने में कोई संकोच नहीं होता वैसे ही ऋषियों और संतों को समाधि में प्रभु के साथ एकरूप होने में किसी तरह का संकोच नहीं होता ।
115. एक प्रभु संसार के लिए अनेक रूप लेकर प्रकट होते हैं ।
116. सभी सुखों की प्रभु से उत्पत्ति होती है यानी प्रभु ही सभी सुखों के आधार हैं ।
117. जब प्रभु संसार में आए तो एक नाम धारण कर लिया “जीवात्मा” और फिर एक से अनेक बनकर सभी में जीवात्मा के रूप में विद्यमान हो गए ।
118. प्रभु जीव देह में आए तो नाम मिल गया “जीवात्मा” ।
119. जीवात्मा का न जन्म होता है, न मरण । जीवात्मा केवल शरीर बदलता रहता है ।
120. शरीर मनुष्य का, गाय का पर प्राण-तत्व जीवात्मा सबमें एक जैसा ही होता है ।
121. शरीर की प्रभु-तत्व जीवात्मा को धारण करने की शक्ति खत्म हो गई । शरीर का नाश होने से जीवात्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । शरीर को कैंसर रोग हो गया तो प्रभु-तत्व जीवात्मा का कुछ नहीं बिगड़ा । ठीक वैसे ही जैसे एक बल्ब फ्यूज हो गया तो बिजली का कुछ नहीं बिगड़ा ।
122. परमात्मा का ज्ञान इतना साफ जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी को सभी नेत्र देख सकते हैं वैसे ही प्रभु का अनुभव सबको हो सकता है, सभी उसके पात्र हैं पर हमें पात्रता बनानी होगी । जैसे अंधे होने पर हम प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के दर्शन नहीं कर सकते, हमें पात्रता के रूप में आँखें चाहिए । जैसे एक देहाती ने शहर में चश्मे वाले की दुकान देखी जिसमें लिखा था “पढ़ने का चश्मा” । उस देहाती को पढ़ना नहीं आता था । बहुत सारे चश्मा बदल कर देखा पर वह पढ़ नहीं पाया क्योंकि पढ़ना आता ही नहीं था । सूत्र क्या है पढ़ने आने वाले के लिए व्यवधान हो तो चश्मा लगाने से वह पढ़ पाएगा पर जिसे पढ़ना ही नहीं आता चश्मा लगाने से भी वह कुछ नहीं पढ़ पाएगा ।
123. प्रभु को जानना है तो इंद्रियां, मन और बुद्धि के दोषों को पहले दूर करना चाहिए । इंद्रियां, मन और बुद्धि शुद्ध हो जाए तो ही प्रभु का पूर्ण अनुभव संभव है ।
124. भक्ति के जल से इंद्रियों को, मन को, बुद्धि को धोएंगे तो सारे मल नष्ट होकर प्रभु का साक्षात दर्शन संभव हो जाएगा । यह एकमात्र भक्ति से ही संभव है ।
125. चारों श्री वेदजी, श्री उपनिषद, श्री पुराणों में एक ही स्थान पर परमात्म-तत्व का इतना सुंदर विवेचन अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा जितना श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध में मिलेगा ।
126. हमारा जीवन शुद्ध नहीं है इसलिए प्रभु हमारे इतने समीप होकर भी हमें उपलब्ध नहीं होते । जीवन की शुद्धि होते ही प्रभु प्रकट हो जाते हैं । उन्हें कहीं श्री बैकुंठजी से आना नहीं पड़ता, वे हमारे भीतर से ही प्रकट हो जाते हैं ।
127. हमारे अस्तित्व के मूल आधार, हमारे प्राणों के मूल आधार, हमारे मन के मन प्रभु ही हैं ।
128. क्या घड़ा मिट्टी से अपना अस्तित्व अलग कर सकता है - नहीं । क्योंकि घड़ा का मूल मिट्टी है । वैसे ही जीव प्रभु से कभी दूर नहीं जा सकता चाहे वह नास्तिक ही क्यों न हो क्योंकि उसके मूल प्रभु ही हैं ।
129. एक बार एक संत ने अधर्म पर बहुत बड़ा भाषण दिया । मर्यादा से बाहर जाकर अधर्म की निंदा की, अधर्म को खरी-खरी सुनाई । रात को उनके सपनों में प्रभु आए और प्रभु की पीठ दुख रही थी । भगवती लक्ष्मी माता ने कारण पूछा तो प्रभु ने कहा कि एक संत ने आज मर्यादा की हद से बाहर जाकर अधर्म की निंदा करी । अधर्म प्रभु की पीठ है । सूत्र यह है कि जो भी अच्छा या बुरा है सब प्रभु के कोई-न-कोई श्रीअंग में है क्योंकि प्रभु के अलावा अन्य कुछ है ही नहीं ।
130. प्रभु के साक्षात रूप श्री वेदजी हैं ।
131. कभी कोई संत हमारे किसी प्रश्न के उत्तर के रूप में हमें उपदेश नहीं करते तो यह नहीं मानना चाहिए संत को उत्तर नहीं आता । यह मानना चाहिए हमारी पात्रता नहीं अभी उत्तर सुनने और समझने की । संत जब पात्रता नहीं पाते तो उत्तर नहीं देते ।
132. वैराग्यवान लोग के लिए वेदांत सबसे ऊँ‍चा श्रीग्रंथ है पर इससे सीधे पढ़ने का प्रयास करेंगे तो हमारी गाड़ी फिसल जाएगी और गिर जाएगी । इसलिए भक्ति के साथ ही इसे पढ़ने का प्रयास करना चाहिए ।
133. जैसे माँ जिसके दो पुत्र हैं वह जानती है कि एक पहलवान है और दूसरा बीमारी से उठा है तो दोनों के आहार समान नहीं होंगे । माँ बीमारी से उठने वाले पुत्र को हल्का भोजन देगी । वैसे ही ऋषियों ने संसारी लोगों को कलियुग में हल्का आध्यात्मिक आहार दिया है जिससे वे उसे पचा पाए ।
134. जीवन इतना शुद्ध करना चाहिए कि परमात्मा का ज्ञान हमारे भीतर उतर जाए ।
135. कर्म उसे कहते हैं जो हमारे निहित कर्म हो जो हमें करने ही चाहिए ।
136. अकर्म उसे कहते हैं जो निषेध कर्म हो जो हमें कभी नहीं करने चाहिए ।
137. विकर्म उसे कहते हैं जो मेरे निहित कर्म हैं पर वह मैं नहीं कर रहा हूँ । निषेध कर्म भी नहीं कर रहा हूँ और अपना निहित कर्म भी नहीं कर रहा हूँ ।
138. सवेरे जल्दी उठना और शुद्ध स्नान करने का यह नियम प्रभु प्राप्ति में बहुत सहयोगी है ।
139. घर में श्री ठाकुरबाड़ी की स्थापना जरूर होनी चाहिए । चित्त शुद्ध और शांत करने का सबसे सरल उपाय घर में श्री ठाकुरबाड़ी होना है और प्रभु की नित्य पूजा और सेवा होनी चाहिए । सूत्र यह है कि प्रभु के सगुण साकार रूप बिना एक पल भी नहीं रहना चाहिए यानी प्रभु के सगुण साकार रूप से निरंतर संबंध होना चाहिए ।
140. रोज श्री ठाकुरबाड़ी में सुबह स्नान करके और शुद्ध होकर बैठना चाहिए और सीधे बैठकर प्रभु का ध्यान करना चाहिए ।
141. रोज थोड़ा प्राणायाम जरूर करना चाहिए क्योंकि वह भीतर से भी हमें शुद्ध करता है । जैसे प्रभु के पूजा के बर्तन हम भीतर और बाहर से साफ करते हैं इसी तरह हमारे शरीर रूपी बर्तन को बाहर से स्नान और भीतर से प्राणायाम शुद्ध करता है ।
142. न्यास सहित अपने अंगों में प्रभु की शक्ति का जागरण करना चाहिए । प्रभु की शक्ति का आह्वान करना चाहिए जिससे जीवन में कभी रोग नहीं होगा ।
143. प्रभु की पवित्र प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए नहीं तो प्रतीक रखकर पूजा करनी चाहिए नहीं तो हृदय में प्रभु की मानस पूजा करनी चाहिए । कैसे भी पूजा करें वह पूजा प्रभु तक पहुँच ही जाती है ।
144. रोज नियम से पूजा करने की आदत डालनी चाहिए क्योंकि प्रभु से एक बार संबंध जोड़ने पर हमारा सब भार प्रभु ले लेंगे ।
145. पूजा की पूर्णता अंतःकरण में मानस पूजा से है, बाहर प्रतिमा की पूजा से भी बड़ी पूजा मानस पूजा मानी गई है ।
146. पहले पूजा की तैयारी पूरी कर लें फिर पूजा आसन पर बैठे । एक भी वस्तु के लिए आसन से उठना नहीं पड़े, इतनी तैयारी होनी चाहिए ।
147. एक मंत्र सिद्ध करना चाहिए, उसे पक्का बनाना चाहिए । पूरी पूजा के समय वही मंत्र का जप हो तो सभी मंत्रों का प्रभाव उसमें स्वतः ही आ जाएगा । पूजा में अलग-अलग मंत्रों के उपयोग की जरूरत नहीं है ।
148. प्रभु की स्तुति करनी चाहिए क्योंकि स्तुति प्रभु को बहुत प्रिय लगती है ।
149. प्रभु को अपने हृदय के पलंग पर सुलाने की आदत डालनी चाहिए । हमारे नव द्वार की पुरी में प्रभु को आराम करना सबसे प्रिय लगता है । इसलिए भक्त के हृदय मंदिर में प्रभु को निवास देना प्रभु सबसे प्रिय मानते हैं ।
150. प्रभु की पूजा के बाद विसर्जन के वक्त प्रभु से कहें कि आइए हृदय में वास करें । पूजा करने से पहले प्रभु को हृदय से मूर्ति में स्थापित करने हेतु आह्वान करना चाहिए । सूत्र यह है कि पूजा के बाद और पहले प्रभु हृदय में, पूजा के वक्त प्रभु हृदय से मूर्ति में । सूत्र यह है कि प्रभु को सिर्फ दो जगह रखना या तो पूजा करते वक्त मूर्ति में और या पूजा से पहले और पूजा के बाद अपने हृदय में ।
151. जीवन में ऐसा प्रबंधन करके रखना चाहिए कि सातवें दिन भी संसार छोड़कर जाना पड़े तो ठीक ।
152. ऐसे-वैसे जीवन जी लिया तो उसका क्या लाभ है ? जीवन में प्रभु प्राप्ति की योजना बनाकर ही जीवन जीना चाहिए ।
153. कभी भी मौत हमें बिना तैयारी की अवस्था में प्राप्त नहीं होनी चाहिए ।
154. गर्भ काल से प्रभु द्वारा संरक्षित भक्त श्री परीक्षितजी हैं ।
155. जब परलोक बिगड़ जाता है तब भी मनुष्य अपना जीवन नहीं संभालता और न ही मनुष्य इसके लिए सचेत होता है ।
156. श्री गरुड़पुराणजी जो जीव इस संसार से चला गया उसकी गति हेतु कम, पर जो पीछे से सुनते हैं उनकी गति हेतु और उनकी चेतना को जागृत करने हेतु ज्यादा है ।
157. असाधारण और पुण्यशील जीवन हमें बिताना चाहिए ।
158. राजर्षि – ऐसा संबोधन प्रभु श्री शुकदेवजी ने राजा श्री परीक्षितजी को किया जिसका अर्थ है कि राजा एवं ऋषि जैसे जीवन । राजा होते हुए ऋषि जैसा श्रेष्ठ जीवन ।
159. सर्वोत्तम पुरुष वह है जो जीवन के अंतकाल से पहले प्रभु और भगवती माता के शरण में चला जाता है ।
160. प्रभु के श्रीकमलचरणों को कभी नहीं भूलते हुए राज्य करना चाहिए - ऐसा उपदेश राजर्षि परीक्षितजी ने अपने पुत्र जनमेजय को दिया ।
161. जीव अकेला है । जीव का किसी जीव के साथ कोई स्थाई संबंध नहीं है । स्थाई संबंध सिर्फ प्रभु के साथ ही है ।
162. अंत में जीवन में एक ही संबंध रखना चाहिए - मैं प्रभु का और प्रभु मेरे । यह रोज पांच मिनट का अभ्यास जीवन भर करना चाहिए । मैं और मेरा सब कुछ छोड़कर पांच मिनट सब भूल जाइए, अपना सब कुछ घर, व्यापार, नाम सब भूल जाना चाहिए । सिर्फ मैं प्रभु का हूँ और प्रभु मेरे हैं । वस्तुतः मेरा कोई नाम नहीं, यह तो ऊपर से दिया हुआ है क्योंकि माँ के गर्भ में कोई नाम नहीं था । पांच मिनट सिर्फ प्रभु से अनन्य हो जाना चाहिए तो कितनी शांति भीतर से उमड़ती है । पर हम अपने सभी सांसारिक संबंध और तत्वों को स्थापित करने के कारण अशांति लेकर आए हैं ।
163. जन्म जन्मांतर के साथी और हमारे जीवन के रथ को दिशा देने वाले प्रभु ही हैं ।
164. प्रभु शपथ लेकर कहते हैं कि मैं जीव से बहुत प्रेम करता हूँ । यह प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में श्री अर्जुनजी से कहा है ।
165. जो जीवन के अंत में छूटने वाली है जैसे संबंध, पैसे इत्यादि उसको जो पहले मन से छोड़ देता है वही बुद्धिमान कहलाता है ।
166. प्रभु से आकर्षित होना एक बात और प्रभु से भक्ति और प्रेम का संबंध स्थापित करना और संसार से संबंध हटा लेना एक बात है । सबसे श्रेष्ठ बात हम प्रभु से भक्ति और प्रेम का संबंध स्थापित करके परिवार, धन से अपना संबंध उदासीन कर लें ।
167. सारे ऋषि मुनि प्रभु से जुड़े हुए हैं तो जैसे ही मैं प्रभु से जुड़ता हूँ सभी प्रभु भक्तों के साथ स्वतः ही जुड़ जाता हूँ । जैसे कि राजा श्री परीक्षितजी प्रभु से जुड़े, भगवती गंगा माता के तट पर सभी हिमालय की कंदरा में विचरण करने वाले ऋषि मुनि का हृदय का तार श्री परीक्षितजी से जुड़ गया और सब श्रीगंगा माता के तट पर चले आए राजा श्री परीक्षितजी के अंतिम समय के साक्षी बनने और उन्हें जीवन से विदा देने ।
168. संत जहाँ जाते हैं उस स्थान को पवित्रता देते हैं क्योंकि संत इतने पवित्र जो होते हैं ।
169. शास्त्र को जीवन में कैसे उतारा जाता है यह दिखाने हेतु राजा श्री परीक्षितजी के पास ऋषि और संत अपने शिष्य के झुंड-के-झुंड लेकर चले आए । सारे शास्त्र जिनके जीवन में साकार हो गए ऐसे महात्मा को देखना कितना अदभुत लाभ देता है, ऐसे महात्मा के भीतर शास्त्र खिल जाते हैं, जब ऐसे महात्मा को नेत्रों से देखा जाता है तो उसका संस्कार एकदम स्थाई होता है - यह सूत्र है ।
170. मरणशील जीव यानी जो मरने वाला हो उसे केवल प्रभु के बारे में ही अंत समय सुनना चाहिए ।
171. जीवन की सारी समस्या को सुलझाने की एक चाबी अपने पास हृदय में सदैव रखना चाहिए । भगवती द्रौपदीजी ने परीक्षितजी को एक बात बचपन में समझाई थी कि जीवन में जब भी विपदा घेरे और कोई समाधान नहीं दिखे तो तुरंत प्रभु शरण में चले जाना चाहिए । कितने प्रसंग भगवती द्रौपदीजी ने जीवन में गिनाए जब प्रभु साक्षात उनके सामने नहीं थे पर उन्होंने पुकारा तो प्रभु उद्धार करने पहुँच गए । श्रीमद् भगवद् गीताजी में जीव का कर्तव्य प्रभु को याद करना मात्र है और प्रभु का संकल्प है उसका उद्धार करने का - यह प्रभु के श्रीवचन हैं ।
172. प्रभु ही मेरी गति हैं और प्रभु ही मेरी मति हैं – ऐसा जीवन में होना चाहिए ।
173. एकमात्र प्रभु को अपने जीवन का अवलंबन बनाना चाहिए तो प्रभु दौड़कर उनके संकट को हर लेते हैं । कौन, कब, कैसे आकर आपको संकट से निकाल देगा और प्रभु उसे माध्यम बनाकर आपका संकट तत्काल हर लेंगे ।
174. संसार के हर जीव को दिया प्रभु का वचन है कि जो पहुँचाना है प्रभु अपने आप पहुँचा देंगे और प्रभु कृपा से जो उसके पास है उसकी रक्षा करेंगे । योगक्षेम का भार लेने का प्रभु का श्रीवचन श्रीमद् भगवद् गीताजी में है ।
175. राजा परीक्षितजी प्रभु का ध्यान कर रहे थे तो प्रभु श्री शुकदेवजी का रूप लेकर उनका उद्धार करने स्वयं प्रभु पधारे । श्री शिव महापुराण में लिखा है कि प्रभु श्री शिवजी ही प्रभु श्री शुकदेवजी का रूप लेकर उद्धार करने आए ।
176. राजा श्री परीक्षितजी ने प्रभु की असीम कृपा से प्रभु श्री शुकदेवजी का नेत्रों से दर्शन का भाग्य पाया और उनकी श्रीवाणी से श्रीमद् भागवतजी महापुराण को श्रवण करने का भाग्य पाया ।
177. प्रभु श्री शुकदेवजी संयोग से राजा श्री परीक्षितजी के अंतिम अवस्था में उद्धार करने नहीं आए । प्रभु ने उन्हें उद्धार करने हेतु स्वयं भेजा, भक्त के उद्धार की चिंता प्रभु को सदैव होती है ।
178. संसार में ही आसक्त रहकर जीवन मेरा व्यर्थ न जाए, प्रभु से यह कृपा मांगनी चाहिए ।
179. मृत्यु के मुँह में पहुँचने पर भी राजा श्री परीक्षितजी ने प्रभु श्री शुकदेवजी से इतना बढ़िया प्रश्न पूछा जिसमें पूरे संसार का कल्याण छुपा हुआ था ।
180. सबसे पहले स्वर्णिम मानव जीवन के महत्व को जानना चाहिए । पूरे ब्रह्मांड का सर्वश्रेष्ठ पदार्थ, सबसे अनमोल वस्तु मानव देह हमें प्राप्त हो गई पर उसका महत्व का भान हमें नहीं है ।
181. एक ग्वाल बालक को हीरा मिला उसने अपनी बकरी के गले में बांध दिया । एक जौहरी वहाँ से गुजरा उसने देखा तो उसने बकरी को खरीद लिया । वैसे ही मानव देह के मूल्य को हमने जाना नहीं और ग्वाल बालक की तरह हमने अपने परिवार के गले में बांध दिया, जैसे ग्वाल बालक ने हीरे को बकरी के गले में बांधा था । सिर्फ सांसारिक प्रपंच करने हेतु मानव जीवन हमें नहीं मिला है ।
182. मानव देह से ऐसा कार्य करना चाहिए कि दोबारा मानव देह प्राप्त करने की जरूरत ही नहीं पड़े यानी पुनर्जन्म नहीं लेना पड़े ।
183. प्रभु ने यह अनमोल निधि मानव तन की हमें दी है पर सदैव के लिए नहीं दी है । इसलिए इसका उपयोग कुशलता से करना चाहिए ।
184. एक व्यक्ति ने पांच लाख रुपए दिए और कहा कि अभी जरूरत नहीं 5 वर्ष बाद जरूरत पड़ेगी तो ले लूंगा । एक बुद्धिमान व्यक्ति ने 5 वर्ष के लिए उसको बैंक में जमा कर दिया, 5 वर्ष बाद मूल रकम लौटा दिया और ब्याज कमा लिया । दूसरे बुद्धिमान ने 5 लाख की पूंजी व्यापार में लगाई और 5 वर्ष में 5 लाख से ज्यादा दोगुना मुनाफा कर लिया । दोनों में ज्यादा बुद्धिमान कौन ? जिसने ज्यादा पूंजी कमाई । वैसे ही प्रभु ने पंचमहाभूत का बना हुआ यह पिंड यानी शरीर हमें दिया है, प्रभु वापस 80-100 वर्ष बाद इसे मांगेंगे और हमें लौटाना पड़ेगा । एक निश्चित अवधि हेतु ही हमें मिला है । अब जितना समय हमारे पास है उसमें परमार्थ की श्रेष्ठ कमाई यानी भक्ति हमें कर लेनी चाहिए । उत्तम पुरुष वह है जो इस शरीर का ऐसा उपयोग करता है जिससे उसे इस देह में दोबारा आने की जरूरत ही नहीं पड़ती । वह प्रभु के पास पहुँच जाता है । नश्वर शरीर का ऐसे उपयोग किया जाए कि शाश्वत अविनाशी प्रभु को पा लिया जाए । यही जीवन का परम अर्थ यानी परमार्थ है ।
185. अर्थ वह है जो मृत्यु के बाद हमारे साथ नहीं चलता पर परमार्थ वह है जो मृत्यु के बाद भी हमारे साथ चलता है ।
186. परमार्थ सिर्फ मानव योनि में ही संभव है । अर्थ यानी खाना, निद्रा, मैथुन हेतु अन्य योनियां हैं ।
187. जो आया है उसे जाना पड़ेगा, जाने वाले को सारी चाबियां, धन-संपत्ति यही छोड़कर जाना पड़ता है, मृत्यु कभी भी आ सकती है, इसलिए परमार्थ तत्काल प्रभाव से करना चाहिए - यह चार बातें सभी जानते हैं पर फिर भी परमार्थ नहीं होता - क्यों ? वे परमार्थ में आलसी और प्रमादी हो जाते हैं । माया की फेर में फंसकर वे उसे टालते रहते हैं । उत्तम पुरुष वह है जो अपने जीवन में परमार्थ के मूल्य को समझता है और यह समझता है कि परमार्थ के लिए सबसे उपयुक्त समय अभी ही है ।
188. 6 घंटा निद्रा में, जगाने पर भी लोटपोट करने में समय हम बिता देते हैं, पेट भरने हेतु व्यवसाय करना, बचा हुआ समय छोटी-छोटी बातों में जाता है, शरीर को संभालने हेतु, स्वास्थ्य और व्यायाम करने में, पत्नी परिवार को समय देने में, सांसारिक दुनियादारी निभाने में । प्रश्न यह है कि परमार्थ के लिए समय कहाँ बचेगा ? यह तो भ्रम त्याग देना चाहिए कि मेरे पास अभी परमार्थ के लिए पूरा जीवन बचा हुआ है ।
189. शरीर का त्याग करते समय प्रभु को याद रखें । मानव शरीर छूटने के समय को बहुत बड़ा महत्व दिया गया है । प्रभु के श्रीवचन हैं कि अंतिम क्षण जो मुझे याद करता है वह मेरे पास ही आता है । श्रीमद् भगवद् गीताजी में परमार्थ के जीवन भर की कमाई की कसौटी वाला अंतिम क्षण होता है । यह बहुत कठिन होता है पर प्रभु स्मरण की आदत पहले से बना ली जाए तो यह बड़ा सरल बन जाता है ।
190. पुराने समय की बात कि जैसे हम फोटो खिंचवाने के लिए गए । एक घंटा तैयार होकर जाते थे फोटो खिंचवाने के लिए पर अंत में क्लिक करते समय छींक आ गई तो फोटो बिगड़ गई । छींक फोटो की प्रिंट में आ जाएगी । वैसे ही जीवात्मा के अंतिम समय जो विचार आता है वही प्रिंट हो जाता है । कुत्ता की याद आई तो कुत्ता बनेगा, धन की याद आई तो साँप बनकर खजाने पर बैठेगा । अंतिम समय का विचार हमारे अगले जन्म को निर्धारित करता है । इसलिए अंतिम समय प्रभु का स्मरण हो तो कल्याण हो जाएगा पर इसका अभ्यास रोज करना पड़ेगा । रोज करेंगे तभी अंतिम क्षण ऐसा हो पाएगा । सभी कर्म, पूजा, माला, जप सभी भीतर-बाहर से प्रभु का बनकर प्रभु के विचार हृदय को जीवन में प्रधानता से रखने का अभ्यास है । व्यापार कर रहा हूँ तो भी प्रभु स्मरण । हर क्रिया में प्रभु स्मरण का अभ्यास जीवन में करते रहना चाहिए ।
191. यह सबसे उत्तम बात और कर्म होता है कि अंत समय प्रभु का स्मरण हो जाए । इसके साधन हेतु पूरा जीवन प्रभु स्मरण का अभ्यास करना पड़ता है । पर फिर भी अंत समय ऐसा होगा इसकी कोई गारंटी नहीं पर संभावना बहुत बड़ी बढ़ जाती है कि प्रभु का स्मरण अगर जीवन भर किया गया है तो अंतिम समय प्रभु कृपा करेंगे और वैसा जरूर होगा ।
192. मरण अवस्था पर पहुँचने पर श्रीमद् भागवतजी महापुराण का श्रवण करें । मरण अवस्था वाले व्यक्ति के लिए श्रीमद् भागवतजी महापुराण से बड़ा कोई योग नहीं, कोई तीर्थ नहीं, कोई ज्ञान नहीं ।
193. जो भी श्रीमद् भागवतजी महापुराण का श्रवण करता है वह अपने जीवन को सुधार लेता है ।
194. प्रभु की विशेषता क्या है ? जिनको संसार में कुछ नहीं चाहिए, जिन्हें कोई लुभा नहीं सकता, जिन्होंने जीवन में सब त्याग कर दिया पर एक बात उनके जीवन में कभी नहीं छूटती वह है प्रभु का स्मरण जो उनसे छूटता नहीं । हमें भक्ति करके कुछ प्राप्त करना होता है पर सच्चे भक्त को कुछ भी प्राप्त नहीं करना होता । मुक्ति तो ऐसे भक्त की जेब में रहती है । प्रभु की विशेषता है कि प्रभु ऐसे लोगों को ही मिलते हैं ।
195. सब कुछ छुट जाए पर प्रभु भक्ति कभी नहीं छूटे ।
196. एक संत कहते थे कि मैं तब तक ही जीवित रहूँ जब तक श्रीमद् भागवतजी महापुराण की कथा कह सकूँ, जब कहना बंद हो जाए तो मेरे जीवन का भी अंत हो जाए ।
197. साधन कितने समय तक किया जाए इसका महत्व कम पर साधन कितनी गंभीरता से किया जाए, कितनी तीव्रता से किया जाए इसका महत्व ज्यादा । उदाहरण स्वरूप राजा खटवांगजी को एक मुहूर्त यानी 24 मिनट मिले थे और तभी उन्होंने तीव्रता से साधन कर प्रभु को पा लिया । जब राजा खटवांगजी को स्वर्ग में पता चला कि मात्र 24 मिनट बचे हैं तो वे स्वर्ग से मृत्युलोक पहुँचे और सरयू मैया के पास पहुँचे । केवल 24 मिनट के तीव्र प्रभु ध्यान के बल पर शरीर त्याग कर प्रभु के श्री साकेत धाम पहुँच गए ।
198. अगर जीवन में कुछ समय शेष है तो क्या करना चाहिए ? घबराना नहीं चाहिए और पुण्य तीर्थ में जाकर निवास करें क्योंकि घर में व्यवधान होगा, ध्यान भटकेगा, घर में हर वस्तु के साथ हमारी भावना जुड़ी हुई होती है, स्मृतियां जुड़ी हुई होने के कारण प्रसंग याद आते हैं तो अंत समय प्रभु याद कैसे आएंगे ?
199. संसार में वही वस्तु हमारे मन में उपद्रव करती है जिससे हमारा सीधा संबंध जुड़ा हुआ होता है ।
200. जीवन में रोज-रोज प्रभु को याद करके परमार्थ का रास्ता खोलकर रखना चाहिए ।
201. तीर्थों में आकर अपनी सबसे बड़ी निधि अपना मंत्र और अपने प्रभु के नाम का जप कभी भूलना नहीं चाहिए और उसे तन्मयता से करना चाहिए ।
202. जैसे तलवार से शत्रु को युद्ध में काटते हैं वैसे ही साधक को अपने सांसारिक संबंध को मन की तलवार से काटना चाहिए क्योंकि परमार्थ के मार्ग पर चलने वाला भी एक योद्धा ही होता है ।
203. जीवन में संसार से विरक्त होने की आवश्यकता और इच्छा जरूर होनी चाहिए ।
204. संसार के लिए रोने वाले बहुत हैं पर प्रभु के लिए रोने वाला कोई बिरला ही होता है ।
205. तीर्थ में किसी के लिए नहीं जाना चाहिए । तीर्थ से मिलने के लिए जाना चाहिए और तीर्थ का आशीर्वाद लेने के लिए जाना चाहिए, यह भावना होनी चाहिए ।
206. पवित्र तीर्थ में पवित्र होकर पवित्रता से निवास करना चाहिए ।
207. तीर्थ में अकेला रहना ही श्रेयस्कर होता है ।
208. मंत्र, जप, ध्यान तीर्थों में बहुत फलदाई होता है ।
209. प्रभु का ध्यान करते वक्त अपने आसन पर स्थिर बैठने का अभ्यास करना चाहिए ।
210. प्रभु का ध्यान करते वक्त अपनी श्वास की गति जितनी गहरी और धीमी होगी साधन उतना अच्छा होगा और आयु भी बढ़ेगी । हम श्वास ऊपर की ऊपर लेते हैं, यह गलत आदत बना ली है । पेट तक सांस लेना चाहिए और छोटे बालक को देखकर श्वास लेना सीखना चाहिए कि उसका पेट फूलता है श्वास लेते वक्त ।
211. ध्यान में मन को जीत कर एकाग्र करना बहुत जरूरी है ।
212. ध्यान करते वक्त संपूर्ण विश्व में एकमात्र परमात्मा को देखना चाहिए । जो भी दिखे या याद आए उसमें परमात्मा को देखना चाहिए । ध्यान पर मन जहाँ भी जाए उस तत्व में प्रभु को देखना चाहिए । संतों ने तरीका निकाला मन इधर गया, खींचकर वापस प्रभु में लगा दिया फिर मन उधर गया, खींचकर वापस ले आए । फिर संतों ने नया निराला तरीका निकाला मन जहाँ भी जाए जाने दें, वापस मत खींचे । उसी वस्तु में प्रभु का स्मरण करें । एक चरवाहे को ध्यान करने हेतु कहा तो उसके ध्यान में सिर्फ उसकी भैंस आई । संत ने भैंस में भी प्रभु का ध्यान करने को कहा उसे वह सफलता से करने लगा । हमारा भी ध्यान पत्नी, पुत्र, बैंक बैलेंस, फैक्ट्री और हमारी संपत्ति में जाता है उसमें भी प्रभु को देखें और प्रभु का ध्यान करें । जिस किसी की याद आ जाए उसमें प्रभु का ध्यान और स्मरण करना चाहिए ।
213. प्रभु के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए और तीव्र साधन करना हो, सभी कर्म छोड़े और प्रभु के ध्यान का अभ्यास करना चाहिए । रोटी, कपड़े के लिए ज्यादा समय बर्बाद नहीं करना चाहिए । आत्मज्ञान प्राप्त करने हेतु ज्यादा-से-ज्यादा समय प्रभु का ध्यान जरूर करना चाहिए ।
214. जिन्होंने प्रभु को इस जन्म में पाया है यानी एक जन्म में पाया है उन्होंने तीव्रता से भक्ति करके ही पाया है । परमार्थ में कोई चालाकी करके किसी ने भी प्रभु को नहीं पाया है ।
215. विद्या वही पढ़े जिससे प्रभु की प्राप्ति हो जाए ।
216. भक्तों ने जीवन की बाजी लगाई है और प्रभु को पाकर ही रहे हैं ।
217. तीव्र भक्ति साधन से ही संतों और भक्तों ने प्रभु को पाया है ।
218. किसी भी हालात में मुझे एक प्रभु को छोड़कर मेरा समय और मन अन्यत्र लगाने नहीं देना है । मेरा जो भी जीवन है वह प्रभु साक्षात्कार के लिए ही है ।
219. तीव्र साधन से साधक प्रभु में एकाग्र जल्दी होते हैं ।
220. जितना वैराग्य अधिक, उतना प्रभु में एकाग्र होने का मौका अधिक ।
221. जो तीव्रता से ध्यान करता है वह प्रभु के पास सीधा जाता है । वे सत-मुक्ति यानी सीधी मुक्ति पाते हैं । दूसरा क्रम-मुक्ति है, जो मुक्त तो होते हैं पर सीधे प्रभु के पास नहीं जाते और उनका पुनर्जन्म भी नहीं होता । वे सतलोक में प्रभु श्री ब्रह्माजी के पास जाते हैं पर जब प्रभु श्री ब्रह्माजी का काल पूरा होता है तो वे मुक्त हो जाते हैं और सतलोक के सभी जीव भी उनके साथ प्रभु में मिल जाते हैं । एक कीर्तन-मुक्ति है, जो भक्त प्रभु नाम का कीर्तन करते हैं, भगवती मीराबाई, श्री चैतन्य महाप्रभुजी, संत श्री एकनाथजी प्रभु कीर्तन करते-करते मुक्त हो गए कलेवर समेत प्रभु में समा गए ।
222. किसी के लिए कुछ भी नहीं मांगना, प्रभु से भी स्वयं के लिए भी कुछ नहीं मांगना । अपने प्रियतम से कुछ भी मांगना कभी भक्ति के लक्षण नहीं हैं । कभी भी संत श्री एकनाथजी ने या भगवती मीराबाई ने प्रभु से प्रभु के अलावा कभी कुछ नहीं मांगा ।
223. घर के दुःख, गरीबी के कारण साधन ठीक से नहीं कर पाए तो स्वामी श्री विवेकानंदजी ने साधन ठीक हो इसके लिए प्रभु से विनती की और थोड़ा-सा सकामता का आश्रय लिया । प्रभु ने धन-धान्य दिया तो परिवार की चिंता पूरी हुई फिर उन्होंने अपना पूरा जीवन अपने साधन में लगा दिया ।
224. शास्त्रों में बताया गया है कि धन हेतु भगवती जगदंबा माता, पति-पत्नी के सामंजस्य हेतु भगवती पार्वती माता, ज्ञान हेतु प्रभु श्री महादेवजी, कोई कामना न हो या बहुत सारी कामना हो या सिर्फ मोक्ष की कामना हो तो इन तीनों अवस्था में प्रभु श्री नारायणजी की आराधना करनी चाहिए ।
225. भावना प्रधान भक्ति करने वाला ही धन्य होता है । जो प्रभु का ध्यान करता है, भक्ति करता है प्रभु के लिए अश्रुधारा जिसके निकलती है, वही धन्य होता है ।
226. सृष्टि तभी सक्रिय होती है जब प्रभु उसमें प्रवेश करते हैं ।
227. अनंत प्रभु का कोई अंत नहीं पा सकता । प्रभु श्री ब्रह्माजी कमल के नाल पकड़कर नीचे जाते हैं और कहीं भी उसका अंत नहीं मिलता ।
228. चित्त की एकाग्रता ही सबसे बड़ा तप है ।
229. चतुर्श्लोकी भागवतजी जो प्रभु ने श्री ब्रह्माजी को बताई वह श्रीमद् भागवतजी महापुराण का मूल है । जब यह सृष्टि नहीं थी तब प्रभु अकेले थे, सृष्टि के रूप में भी प्रभु हैं, जब सृष्टि नहीं रहेगी तो भी प्रभु रहेंगे । जो सृष्टि भिन्न दिखेगी वह प्रभु के योग माया के प्रभाव से दिखेगी । इतनी बात ध्यान रखेंगे तो मोह नहीं व्यापेगा, यह उपदेश प्रभु ने श्री ब्रह्माजी को दिया ।
230. कर्म और माया के चक्र से बाहर निकल कर प्रभु के श्रीकमलचरणों में हमें पहुँचने वाला बनना चाहिए ।
231. प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों धर्म के अंग हैं । गृहस्थी के लिए प्रवृत्ति धर्म है और संन्यासी के लिए निवृत्ति धर्म है । पर धीरे-धीरे सभी को निवृत्ति की तरफ चलने की आवश्यकता है ।
232. धर्म इहलोक के सुख को प्रदान करता है फिर परलोक की सद्गति को भी प्रदान करता है ।
233. इष्ट कामना को सिद्ध करने का अलौकिक उपाय है कर्मकांड यानी सकाम कर्म ।
234. आजीवन सकाम कर्म करते रहने से हम दलदल से कभी बाहर नहीं निकाल पाएंगे ।
235. कर्मों से बाहर निकालने के लिए भी कर्म बताए गए हैं और वह है भक्ति ।
236. आत्मशांति, चित्त को विश्राम हमें चाहिए इस हेतु हमें कर्म करने पड़ेंगे । जैसे एक व्यक्ति गाड़ी में स्वर्गाश्रम गया और श्रीराम-झूले के उस पार उसे जाना है तो अब उपाय क्या है ? पैर से चलकर कर्म करके अपने गंतव्य तक पहुँचे जिससे फिर विश्राम कर सके । इस प्रकार प्रभु के श्रीकमलचरणों तक पहुँच कर विश्राम करना है तो चित्त शुद्धि हेतु पहले कर्म करने पड़ेंगे ।
237. हमारा मन कर्मों में लगाने हेतु उसके मीठे-मीठे फल श्रीवेदों ने बताया है । जैसे माता कड़वी दवाई देने के लिए मिठाई का लालच बच्चे को देती है तभी वह कड़वी दवाई बच्चा लेता है । वैसे ही श्री वेदजी हमारी माता है और कर्म करने हेतु वेदमाता कर्मों का मीठा-मीठा फल हम बच्चों को लुभाने हेतु बताती हैं और प्रदान भी करती हैं ।
238. वेदमाता चाहती है कि जीव कर्म करते-करते प्रभु को प्राप्त कर ले ।
239. पार्थिव लिंग की पूजा से श्रेष्ठ पति मिलता है । यह बात वेदमाता ने कहीं तभी कन्या सुबह उठकर पूजा करती है । कन्या को लालच कि अच्छा पति मिले । वेदमाता चाहती हैं कि उसको पति तो अच्छा मिले पर उससे भी बड़ा फायदा सुबह उठकर प्रभु की सेवा कर्म करने से हो जाए । फिर कर्म में रस आने लगता है और हम प्रभु के समीप पहुँचते चले जाते हैं ।
240. धीरे-धीरे वेदमाता हमें निष्काम कर्म की ओर ले जाना चाहती है पर पहले सकाम कर्म के मार्ग पर ले जाती है । पहले कर्म फल प्राप्ति हेतु, फिर कर्म रस हेतु, प्रभु को प्रसन्न करने हेतु स्वतः ही होने लगते हैं ।
241. क्या मैं मेरी कामना प्रभु से न कहूँ तो प्रभु को पता नहीं है क्या ? प्रभु सर्वज्ञ हैं और प्रभु को सब पता है । इस बात का विश्वास हो गया तो फिर वह जीव प्रभु से मांगता नहीं । प्रभु की प्रसन्नता हेतु पूजा करता है कि प्रभु सदैव प्रसन्न रहे । प्रसन्न प्रभु उसकी जरूरत स्वतः ही पूरी करते हैं । यह सिद्धांत है जैसे माँ को मना करने के बाद भी माँ खाने के लिए वस्तु छुपाकर हमारे सामने रख देती है वैसे ही भक्त को प्रभु से मांगना नहीं पड़ता । वह प्रभु को प्रसन्न रखने हेतु कर्म करता है और प्रभु माँ की तरह उसकी व्यवस्था छिपकर करते रहते हैं ।
242. प्रभु के क्या अनेक रूप हैं और प्रभु क्या कर्म करते हैं ? प्रभु भक्तों के लिए अनेक रूप लेते हैं और प्रभु के संकल्प मात्र से प्रभु की योग माया ही सब कर्म करती है ।
243. प्रभु के होने वाले अवतार प्रभु की इच्छा और मर्जी से होते हैं । कोई कर्मबंधन के कारण नहीं होते ।
244. प्रभु के वचन हैं कि तुम्हें (जीव को) मैं (प्रभु) पाप मुक्त कर दूँगा ।
245. शास्त्रों के नियम जीव के लिए है, प्रभु के लिए कोई नियम नहीं होता । उदाहरण स्वरूप एकादशी में हम चावल नहीं खाते पर श्री जगन्नाथ पुरी में प्रभु को चावल का भोग एकादशी के दिन भी लगता है ।
246. शास्त्र सब अच्छे हैं, उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए पर प्रभु सर्वोपरि हैं । प्रभु पर कोई शास्त्र के नियम लागू नहीं होते । जैसे कारागृह में कैदी सजा काटने हेतु जाता है पर मंत्री निरीक्षण करने जाता है । दोनों के जाने में अंतर है । मंत्री स्वतंत्र है वह जब चाहे जा सकता है, आ सकता है पर कैदी अपनी इच्छा से नहीं निकल सकता ।
247. पूरे धर्मशास्त्र का उपदेश देकर प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहा कि धर्म शास्त्रों के ऊपर मैं (प्रभु) हूँ ।
248. हमने जो पाप किए हैं उन पापों के अभिलेख (रिकॉर्ड) प्रभु ने कहा कि मैं तुरंत नष्ट कर देता हूँ जैसे ही जीव मेरी शरणागति ग्रहण करता है ।
249. जो प्रभु की सभी श्रीलीलाओं, कर्मों को, रहस्यों को जानना चाहता है वह बाल बुद्धि वाला है । ऐसा कभी नहीं हो सकता । न किसी ने जाना है और न ही आगे जान पाएगा । संत और वेदमाता नेति-नेति कहकर शांत हो जाते हैं । हम संसार के रेत के कण को गिन सकते हैं पर प्रभु की सभी श्रीलीलाओं, कर्मों और रहस्यों को जानना बिल्कुल भी संभव नहीं है ।
250. प्रभु जब जीव में जीवात्मा के रूप में प्रवेश करते हैं तो इसको पहला अवतार पुरुषावतार कहते हैं । चेतन प्रभु के आने पर ही जीव सक्रिय होता है । ब्रह्मांड में प्रभु प्रवेश करते हैं तो ही ब्रह्मांड सक्रिय होता है ।
251. सृष्टि के लिए प्रभु तीन रूप लेते हैं - प्रभु श्री ब्रह्माजी, प्रभु श्री विष्णुजी और प्रभु श्री शिवजी के रूप में अवतरित होते हैं । सृष्टि रचना, सृष्टि पालन और सृष्टि विलय हेतु ।
252. जीव नर है और प्रभु नारायण हैं इसलिए प्रभु का एक अवतार श्री नर-नारायण अवतार भी कहलाता है ।
253. भक्ति भाव को सदैव बढ़ाना चाहिए । श्री शंकराचार्यजी ने सभी देवी-देवताओं पर श्लोक लिखे, जहाँ भी गए वहीं के प्रभु के रूप को देखकर श्लोक लिखे । किसी एक देवी-देवता के स्तोत्र नहीं अपितु समस्त देवी-देवताओं के स्तोत्र रचे ।
254. प्रभु श्री नारायणजी का विग्रह एक कुंड में था । कुछ पुजारी ने कुछ लोगों से बचाने के लिए वहाँ छुपा दिया था । प्रभु श्री बद्रीनाथजी का मंदिर खुला था । श्री शंकराचार्यजी को प्रेरणा हुई कि मैं (प्रभु) कुंड में हूँ । श्री शंकराचार्यजी ने कुंड में डुबकी लगाई और प्रभु विग्रह ऊपर लेकर आ गए ।
255. प्रभु शास्त्रों से ऊपर हैं । खंडित मूर्ति की स्थापना नहीं होती । प्रभु विग्रह थोड़ा-सा खंडित था तो उसे दो बार श्री शंकराचार्यजी ने कुंड में ही छोड़ दिया । फिर आकाशवाणी हुई इसी विग्रह को स्थापित करो तो तीसरी बार कुंड से ऊपर लेकर श्री शंकराचार्यजी आए । आज उसी विग्रह की श्री बद्रीनारायणजी के रूप में पूजा होती है ।
256. एक बार एक मंदिर में भगवती राधा माता के विग्रह में श्रीचरण थोड़ा टूट गया तो पुजारीजी ने दूसरी मूर्ति लानी पड़ेगी, ऐसा कहा । तो प्रभु ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि श्रीचरण ठीक करो, प्रभु ने कहा कि क्या तुम्हारे दामाद का पैर टूट जाए तो अपने बेटी के लिए नए दामाद लाकर दोगे । वही विग्रह को ठीक किया गया । सिद्धांत यह कि प्रभु शास्त्रों से सर्वोपरि हैं । शास्त्र के नियम प्रभु पर लागू नहीं होते । प्रभु की इच्छा ही सर्वोपरि होती है ।
257. पुण्यात्मा के नियमों को नष्ट कर दें तो उसका पुण्य प्रताप चला जाता है । नष्ट-भ्रष्ट कर देने की कोशिश माया करती है । पूर्व काल में श्री इंद्रदेवजी श्री कामदेवजी को भेजकर ऋषियों की तपस्या भंग करवाने का प्रयत्न करते थे ।
258. या तो उत्तेजित होकर ऋषि अप्सरा के जाल में आ जाते थे या अगर साधन में जोर होता था तो मुँह फेर लेते थे । प्रभु श्री शुकदेवजी के पास जब श्री इंद्रदेवजी ने रंभा को भेजा और रंभा ने काम की बड़ाई में श्लोक गाया तो प्रभु श्री शुकदेवजी ने उस श्लोक को प्रभु की स्तुति में बदल दिया । इतना सामर्थ्य उनमें था ।
259. जिसने जीवन में भोगों को स्वीकार किया उसका जीवन बेकार हो गया । अगर जीव ने प्रभु का साक्षात्कार नहीं किया तो उसका जीवन सचमुच बेकार ही चला गया ।
260. अप्सरा रंभा, ऋतु बसंत, गंधर्व और श्री कामदेवजी सभी परास्त हो गए, व्याकुल हो गए प्रभु श्री नर-नारायणजी के ध्यान को भंग नहीं कर पाए । जब परास्त हुए तो श्राप के डर से प्रभु के श्रीकमलचरण पकड़ लिए । प्रभु ने अपनी जंघा से अनेक अप्सराओं को प्रकट किया और श्री इंद्रदेवजी को भेंट के रूप में भेजा । प्रभु द्वारा प्रकट की गई अप्सराओं में उर्वशी श्रेष्ठ थी । उर्वशी को देखकर सभी स्वर्ग की अप्सराएं लज्जित हो गई । प्रभु के इस प्रभाव को देखकर अप्सराओं ने सोचा जिनको रिझाने हेतु आई थी उनकी श्रीजंघा में इतना सामर्थ्‍य है कि उर्वशी जैसी अनेक अप्सराएं प्रकट हो गई ।
261. अधिक अनुकूलता भी ज्यादा आपदा का कारण बनती है और प्रतिकूलता भी आपदा का कारण होती है । इन दोनों परिस्थिति में संरक्षण प्रभु ही करते हैं ।
262. श्री सनतकुमारजी ने प्रभु श्री ब्रह्माजी से प्रश्न पूछा तो वे उत्तर नहीं दे पाए । प्रभु का ध्यान किया तो प्रभु ने उन्हें वचन दिया कि जहाँ भी अटको तो मेरा स्मरण करना और मैं रक्षा हेतु आऊंगा । तो प्रभु ने श्री हंस अवतार लेकर श्री सनतकुमारजी को उपदेश दिया । यह श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध का बहुत बड़ा हिस्सा है - श्री हंसावतार उपदेश ।
263. प्रभु के अवतार का जो चिंतन और पठन करता है वह भवसागर से तर जाता है ।
264. प्रभु के सभी अवतारों के गुण कर्म, अवतारों के उपदेश भक्तों के लिए आलंबन होते हैं । क्योंकि कोई 24 घंटा जप और ध्यान नहीं कर सकता इसलिए प्रभु के सद्गुणों, कर्मों, श्रीलीलाओं का चिंतन करना चाहिए तो उसे चारों फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं ।
265. प्रभु की कथा आनंद देती है और उद्धार भी करती है । संत चरित्र हमें प्रभु की कथा सुनने की प्रेरणा प्रदान करते हैं । मुझे साधन करना चाहिए ऐसी प्रेरणा से कलियुग में भी प्रभु को प्राप्त किया जा सकता है । यह प्रेरणा संतों के जीवन को देखकर होती है और प्रभु में विश्वास और भी बढ़ जाता है क्योंकि संतों ने दिन-रात प्रभु मार्ग पर चलकर सफल होकर हमें दिखाया है ।
266. जीवन के रहस्य और उद्देश्य हम आयु बीत जाने के बाद भी नहीं समझ पाते ।
267. अपने ठाकुरबाड़ी में प्रभु का श्रीविग्रह नहीं बल्कि स्वयं प्रभु को साक्षात रूप में मानना चाहिए ।
268. एक प्रश्न श्रीमद् भागवतजी महापुराण में आता है कि जिसके जीवन में भक्ति की प्रेरणा हो जाती है वह तर जाते हैं पर जिनके जीवन में भक्ति की प्रेरणा नहीं होती है उनका क्या होता है ? इसके उत्तर में कहा गया है कि वे जिनके भक्ति की प्रेरणा नहीं होती वे अधोगति को प्राप्त होते हैं ।
269. प्रभु को नहीं मानने वाले, प्रभु की भक्ति नहीं करने वाले का कभी भी जग में मंगल नहीं हो सकता ।
270. अपने-अपने कर्म करते हुए प्रभु की भक्ति करें - यही धर्म का उपदेश है ।
271. अनेकों लोग भ्रम बना लेते हैं कि मैंने भक्ति नहीं की पर धन कमाया, सत्ता पाई तो मेरा क्या बिगड़ेगा । यह अभिमान अहंकार का कारण होता है जो हमें प्रभु से दूर कर देता है । कुछ समय बाद समय-चक्र उनका अभिमान और अहंकार नष्ट करने हेतु उनकी बुद्धि तमोगुणी बना देता है । हमारी दृष्टि में बड़ा कौन ? जो पैसे वाले हैं, जो बड़े पद पर हैं, जो उच्च कुल में जन्में हैं पर संतों के दृष्टिकोण में भागवत् धर्म के अनुसार ऐसे लोग ने अगर भक्ति नहीं है तो वे बड़े नहीं हैं । संपत्ति के साथ भक्ति, सत्ता के साथ भक्ति, वेदांत के ज्ञान के साथ भक्ति होनी चाहिए । भक्ति हो तो सब अच्छे, भक्ति नहीं है तो सब गौण । प्रभु भक्ति नहीं है तो हम बहुत नीचे स्तर पर हैं । जो भक्ति नहीं करते वे शास्त्रों के अनुसार पढ़े-लिखे मूर्ख कहलाते हैं ।
272. प्रभु की भक्ति करने वाला, प्रभु के अस्तित्व में पूर्ण विश्वास करने वाला, चाहे वह कोई जाति का हो वही सच्चे रूप में सबसे बड़ा है ।
273. धन्य है वे जो प्रभु के भक्ति मार्ग पर श्रद्धा से डटे रहते हैं, कभी उसका त्याग नहीं करते । एक समय आता है जब उनके विरोधी भी मानते हैं कि भक्ति मार्ग ही श्रेष्ठ था और श्रेष्ठ है ।
274. भक्ति के अलावा कोई और साधन से जीव तर नहीं सकता ।
275. किसी के साधन का तिरस्कार, किसी को तुच्छ और त्याज्य मानना बहुत बड़ी गलती है और हमारे साधन का भी पतन करती है ।
276. भक्ति करने वालों को सर्वदा श्रेष्ठ मानना चाहिए । वेदांती कभी मंत्र और वेद साधन के बल पर अकेले तर नहीं सकते जब तक वे भक्ति को साथ में नहीं जोड़ेंगे ।
277. जो भक्त और भक्ति का तिरस्कार करता है उसका घोर-घोर योनियों में पतन होता है ।
278. भक्ति प्रिय नहीं लगे तो जीवन में लंपटता बढ़ती जाएगी ।
279. संसार में सर्वोत्तम कर्म धन कमाना नहीं अपितु भक्ति करना है ।
280. श्री युधिष्ठिरजी का प्रश्न था कि हमने धर्माचरण किया तो हम दुःख भोग रहे हैं और जिन्होंने पापाचरण किया (कौरव) वे सुख भोग रहे हैं । तो इसका उत्तर महाभारतजी में दिया कि प्रभु की सजा देने की पद्धति है कि प्रभु पापी की पहले उन्नति कराते हैं, प्रगति करते हैं फिर काल एक धक्का ऐसा देता है कि उसका पूरा नाश हो जाता है और पापी घोर नर्क में प्रवेश करता है । अगला जीवन पशु इत्यादि योनि में मिलता है । परलोक में पीढ़ियों तक दुःख भोगता है ।
281. जीवन में प्रभु की उपेक्षा करके हम आत्मघात ही करते हैं ।
282. जैसे हमारे आसपास का वातावरण होता है उस अनुसार ही प्रभु की उपासना होने की संभावना होती है ।
283. एक प्रभु रूप में सभी देवी-देवताओं को देखना सीखना चाहिए ।
284. एक संत ने व्याख्या करी है कि प्रभु के किसी भी नाम की व्याख्या संभव ही नहीं है ।
285. कलियुग में बड़े यज्ञ, लंबी-चौड़ी पूजा करना आवश्यक नहीं क्योंकि ध्यान की पूर्णता नहीं । इसलिए केवल प्रभु नाम का जप और संकीर्तन करना ही पर्याप्त होता है ।
286. पूजा मर्यादा में होने पर अच्छी, दिखावे के लिए होने पर फलदायी नहीं होती ।
287. समय और स्थान में भिन्नता के कारण साधन भी बदलता जाता है ।
288. सतयुग ध्यान प्रधान युग था, बड़े-बड़े ध्यानी ध्यान करते थे । त्रेता युग यज्ञ प्रधान युग था, बड़े-बड़े यज्ञों का आयोजन होता था । द्वापर युग पूजा प्रधान युग था, बड़ी-बड़ी विधान से पूजा होती थी । कलियुग नाम जप और संकीर्तन का युग है । नाम जप और संकीर्तन सबसे बड़ा अवलंबन कलियुग का है ।
289. कलियुग में प्रभु और माता के किसी भी नाम का मुख्य रूप से नाम जप करना चाहिए ।
290. सतयुग में जो फल अखंड ध्यान से, त्रेता में जो बड़े-बड़े यज्ञ से, द्वापर युग में जो फल बड़ी पूजा से, वही फल कलियुग में प्रभु नाम जप और संकीर्तन से प्राप्त होता है ।
291. कलियुग में जन्में लोग सबसे महान । सतयुग, त्रेता और द्वापर में जन्में लोग फिर कलियुग में जन्म लेकर आना चाहते हैं क्योंकि प्रभु का साधन करना कलियुग में सबसे सरल हो गया है । प्रभु का नाम जप लेने से और प्रभु के नाम का संकीर्तन करने से ही वे तर जाते हैं ।
292. कलियुग में पाप कितना भी हो पर साधन इतना सरल कि पाप होकर भी वह पाप कट जाते हैं और जीव सरल साधन के कारण तर जाता है ।
293. जिसने प्रभु का जीवन में परम अवलंबन मान लिया, जीवन में पूर्ण शरणागति प्रभु के श्रीकमलचरणों की ले ली, प्रभु का बनकर जीवन जीता है, पक्का निश्चय कर लिया कि प्रभु को छोड़कर कुछ नहीं चाहिए, उसके देवता, ऋषि और पितृ ऋण सब स्वतः ही चुक जाते हैं ।
294. जिसको केवल प्रभु चाहिए, अन्य कुछ नहीं चाहिए, उसे कोई देवता, ऋषि और पितृ ऋण बांध नहीं सकते । देवता, ऋषि और पितृ अपना ऋण वापस ले लेते हैं । फिर उसने तर्पण किया तो ठीक, नहीं किया तो ठीक । पुत्र जन्मा तो ठीक, पुत्र नहीं हुआ तो ठीक । समाज की सेवा की तो ठीक, नहीं की तो ठीक क्योंकि वह भक्ति के कारण भूमि का देवता बन जाता है ।
295. भक्त के जीवन में अगर कोई गलती भी हो गई तो उस गलती का कोई प्रभाव उसके जीवन में नहीं हो, ऐसी कृपा प्रभु कर देते हैं ।
296. एकमात्र प्रभु का अवलंबन लेकर स्थिर हो जाना चाहिए । अपनी वाणी, कर्म सब प्रभु के लिए । उस व्यक्ति को श्री वैकुंठजी जाने की जरूरत नहीं क्योंकि वैकुंठाधिपति प्रभु स्वयं आ जाते हैं । प्रभु उसे अपना बच्चा मानकर संभालते हैं । प्रभु की भक्ति और शरणागति से बढ़कर कोई भी पुरुषार्थ इस भूमंडल में नहीं है । जो यह रहस्य को नहीं जान पाता है वही संसार चक्र में भटकता है और मुक्त नहीं होता ।
297. सबसे बड़ा भक्ति का प्रतिपादन श्रीमद् भागवतजी महापुराण की एकादश स्कंध में श्री योगेश्वरों द्वारा हुआ है । अन्य कहीं भी कुछ भी है तो वह इसका भाष्य मात्र ही मिलेगा ।
298. वही धन्य है जिसने जीवन में भक्ति का आधार लिया है ।
299. जिन सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए इतना भटकना पड़ता है उन्हें भक्ति से सरलता से प्राप्त किया जा सकता है पर भक्त ऐसा कभी नहीं करते ।
300. जिन प्रभु से द्वेष करके कंस का उद्धार हो गया, प्रभु को गलत शब्द बोलते हुए शिशुपाल का उद्धार हो गया, श्रीगोपीजन का उद्धार प्रभु प्रेम से हो गया, प्रभु के साथ किसी भी प्रकार का व्यवहार करने पर उद्धार निश्चित है - यह सिद्धांत है ।
301. प्रभु से ही अपना रिश्ता बनाना चाहिए । हम प्रभु से अपने उद्धार हेतु पिता, पुत्र, माता, दास, बंधु का संबंध बना सकते हैं पर प्रभु की आराधना ईश्वर-बुद्धि से ही करनी चाहिए । रिश्ता चाहे कोई भी रखें पर ईश्वर-बुद्धि ही रखनी चाहिए ।
302. भागवत् बुद्धि जीवन में जागृत करके रखनी चाहिए ।
303. श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध में कुल 31 अध्याय हैं । उसमें से पांच अध्याय जिनको भागवतजी का पंच-प्राण कहा गया है वह श्री योगेश्वरजी के द्वारा आत्म कल्याण के 9 प्रश्नों का उत्तर है ।
304. अंतकाल समीप आने पर करने वाला श्रेष्ठ साधन श्रीमद् भागवतजी महापुराण का श्रवण है ।
305. बिना श्रीमद् भागवतजी महापुराण सुने जीवन खत्म हो जाए वह जीव वैष्णव नहीं है ।
306. प्रभु इच्छा से और प्रभु कृपा से प्रभु श्री वेदव्यासजी ने प्रभु की श्रीलीलाओं और भक्तों के अनेक चरित्र का श्रीमद् भागवतजी महापुराण में समावेश किया है । यह उन्होंने समाधि अवस्था में अनुभव किया और उसका चित्रण किया । चतुर्श्लोकी भागवतजी इस तरह एक बड़े श्रीग्रंथ के रूप में स्थापित हो गया । मूल सिद्धांतों में कमी नहीं लाते हुए इसका विस्तार हुआ है ।
307. राजा श्री परीक्षितजी ने प्रश्न पूछे और उसका उत्तर प्रभु श्री शुकदेवजी ने दिया, फिर श्री सूतजी ने ऋषियों को जो उत्तर दिया उसको भी समाहित किया गया है । इस तरह श्रीमद् भागवतजी महापुराण श्रीग्रंथ का विस्तार होता गया और आज यह श्रीग्रंथ विस्तृत रूप से हमारे सामने है । जैसे अनेक नदियों के मिलने पर भगवती गंगा माता की मूल धारा इतनी बड़ी हो जाती है इस तरह अनेक ऋषियों के प्रश्न उत्तर के कारण श्रीमद् भागवतजी महापुराण की मूल धारा बढ़ती ही गई ।
308. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में मूल विषय एकमात्र प्रभु हैं और उनका विस्तार से वर्णन है । विशुद्ध रूप से प्रभु द्वारा चतुर्श्लोकी भागवतजी के उपदेश का विस्तार हुआ है ।
309. उत्तम पुरुष ने कैसे अपना धर्म पालन किया, प्रभु प्रताप और प्रभु कृपा से विजय का वर्णन, प्रभु कृपा और अनुग्रह की भक्त कथा का वर्णन श्रीमद् भागवतजी महापुराण में मिलेगा ।
310. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में प्रभु के अनेक अवतारों की कथा मिलेगी ।
311. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में जिन भक्तों और संतों के कारण प्रभु अवतार लिए उन संतों की कथा और भक्तों की कथा मिलेगी ।
312. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में प्रभु कैसे अपनी शक्तियों को समेट कर विलीन हो जाते हैं, यह कथा समझने को मिलेगी ।
313. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में कर्मों से हम कैसे मुक्त हो सकते हैं, ऐसी कथा मिलेगी ।
314. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में परब्रह्म का पूर्ण रूप से वर्णन हमें प्राप्त होता है ।
315. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में भिन्न-भिन्न विषयों को भिन्न-भिन्न स्कंधों में विभाजित किया गया है ।
316. प्रभु का हस्तिनापुर की राज्यसभा में शांतिदूत के रूप में श्रेष्ठतम भाषण हुआ । इसका बार-बार अध्ययन करना चाहिए । अपने पूरे सूत्र को एक भाषण में कैसे दिया जाता है इसका अनुभव लेना चाहिए ।
317. नेत्र नहीं है इसलिए नहीं बल्कि विवेक के चक्षु (आँखें) फूटी होने के कारण संत श्री ज्ञानेश्वरजी ने व्यंग्य में धृतराष्ट्र को अंधा कहा ।
318. पापी जीवात्मा हमेशा पाप करने के बाद कहता है कि श्रीहरि इच्छा से ऐसा हो गया ।
319. छात्रों को महाभारतजी की श्री विदुर नीति जरूर-जरूर पढ़नी चाहिए ।
320. निस्वार्थ आदमी सदैव स्पष्ट वक्ता होता है । जो निस्वार्थ नहीं है वे बोलने में समझौता करते हैं । उदाहरण स्वरूप श्री विदुरजी हमेशा स्पष्ट वक्ता थे ।
321. एक भी उदाहरण ऐसा नहीं कि पांडवों ने धृतराष्ट्र की आज्ञा का पालन नहीं किया हो, इतने आज्ञाकारी थे पांडव ।
322. अपने जीवन में बिंदु यानी रुकावट कहाँ-कहाँ आ सकता हैं यह हमें महाभारतजी सिखाती है ।
323. कौरव अपने अहंकार का दमन नहीं कर पाए और यह महाभारत युद्ध होने का मूल कारण रहा ।
324. धृतराष्ट्र चाहता था कि श्री विदुरजी उसके मन अनुरूप बात बोले पर श्री विदुरजी हमेशा सत्य निष्ठ थे और सत्य ही बोलते थे ।
325. जैसा व्यवहार रावण ने श्री विभीषणजी से किया वैसा ही व्यवहार धृतराष्ट्र ने श्री विदुरजी से किया । दोनों अपमानित होकर चले गए और उनके जाते ही रावण और धृतराष्ट्र का पतन हुआ ।
326. शुरू से संतानों को नियंत्रित रखने पर यहाँ तक नौबत नहीं आती, श्री विदुरजी ने धृतराष्ट्र को अंत में जाते हुए यही बात कही ।
327. शकुनी, दुर्योधन, दुशासन और कर्ण – इनको महाभारतकार ने चांडाल-चौकड़ी कहा है । हर समय और हर युग में ऐसी चांडाल-चौकड़ी संसार में रहती आई है ।
328. हमने बड़े होकर अनीति करने वालों को रोका नहीं तो हम भी पापी माने जाते हैं, दोषी माने जाते हैं ।
329. संत श्री गुलाबरावजी को एक बार उनके शिष्यों ने एक जगह जाने हेतु मना कर दिया क्योंकि वहाँ अपमान होने की संभावना थी । संत श्री गुलाबरावजी अपमान से बिना डरे वहाँ गए ।
330. जिसको प्रभु प्राप्ति अपने जीवन का लक्ष्य बनाना है वह अपनी निंदा को अपना अमृत तत्व मानता है । अपमान बेला पर शांत रहना श्रेष्ठ है । विवश होकर शांत रहना एक बात है पर प्रतिकार की शक्ति होने पर भी शांत रहना श्रेष्ठ है ।
331. प्रभु हमारे भीतर "चित्त की शांति" की भूमिका सबसे पहले देखना चाहते हैं । अपने यहाँ आने देने से पहले सच्ची भक्ति के कारण प्रभु चित्त की भूमिका शांत चाहते हैं कि चित्त एकदम शांत हो । किसी भी भक्त का जीवन देखें, प्रहार करके श्री विभीषणजी को निकाल देने पर श्री विभीषणजी चिढ़े नहीं । लात मारना मारने वाले रावण को महंगा पड़ा, श्री विभीषणजी को अपमान महंगा नहीं पड़ा । भक्त का अपमान करने वाले को महंगा पड़ता है, भक्त को अपमान कभी महंगा नहीं पड़ता - यह सिद्धांत है ।
332. पूरे महाभारतजी में दो ही पात्र ऐसे हैं जिनका कोई दोष नहीं मिलेगा बाकी सबके दोष आचरण मिलेंगे । यह दो पात्र हैं श्री विदुरजी और भगवती द्रौपदीजी ।
333. अपना कर्तव्य करें और बाकी सब श्रीभगवान पर छोड़ दें – श्री विदुरजी ने ऐसा ही किया । श्री विदुरजी की प्रभु में प्रगाढ़ भक्ति थी ।
334. ब्रह्मांड में समस्त तरफ प्रभु की शक्तियों का ही विस्तार और जागरण है ।
335. प्रभु श्री ब्रह्माजी सृष्टि का संकल्प करते हैं फिर ध्यान के माध्यम से वैसी सृष्टि प्रकट होती है ।
336. जिसका अस्तित्व सनातन था उसका निर्माण होता नहीं, जिसका अस्तित्व सनातन है उसका विनाश कभी होगा नहीं ।
337. शक्ति का निर्माण नहीं होता उसका तो केवल रूपांतरण होता है ।
338. प्रभु श्री ब्रह्माजी ने सभी सृष्टि का निर्माण किया । जलचर, थलचर, नभचर के निर्माण के बाद भी संतुष्ट नहीं हुए तो फिर मानव आकृति का निर्माण किया । श्री सनतकुमारजी ऋषि के रूप में चारों ऋषि कुमार प्रकट हुए जो प्रभु श्री ब्रह्माजी के मानस पुत्र हुए ।
339. श्री सनतकुमारजी ने कहा कि हम परिवार और प्रपंच में नहीं पड़ेंगे । हर जन्म हमने ऐसा ही किया, अब इस जन्म में हम प्रभु भक्ति मार्ग पर चलेंगे ।
340. फिर ऋषियों को प्रभु श्री ब्रह्माजी ने प्रकट किया । फिर दिव्य दंपति मनु-शतरूपा को एक साथ निर्मित किया । फिर उनके माध्यम से मैथुनी सृष्टि का काम शुरू हुआ ।
341. जहाँ जीवन विशुद्ध होता है वहाँ छोटा दोष भी बहुत बड़ा माना जाता है । हम छोटे दोषों को आज मानते नहीं क्योंकि हमारा जीवन विशुद्ध नहीं है ।
342. प्रभु वैकुंठाधिपति होकर भी इतनी नम्रता से बोले कि श्री सनतकुमारजी ऋषियों को ध्यान आ गया कि हमने नम्रता नहीं रखी और श्रीजय श्रीविजय को श्राप दे दिया ।
343. श्रीजय श्रीविजय ने प्रभु से कहा कि श्राप के कारण प्रभु से वियोग हो जाएगा तो प्रभु ने कहा कि मैं (प्रभु) भी तीन जन्म लेकर मृत्युलोक आऊँगा और इस तरह वियोग नहीं होगा ।
344. पापात्मा जन्म हेतु पापमय गर्भ चाहता है । पुण्यात्मा का जन्म पुण्यात्मक गर्भ में ही होता है ।
345. सांयकाल की बेला अति पवित्र होती है क्योंकि यह प्रभु श्री महादेवजी की मृत्युलोक में विहार की बेला होती है ।
346. सच्चे पश्चाताप से पाप का दाह कम हो जाता है ।
347. ऋषि सारे जीवन की पूरी तैयारी रखते हैं । प्रभु की आज्ञा थी इसलिए श्री कर्दमजी ऋषि ने गृहस्थ आश्रम को स्वीकार किया पर कहा कि एक पुत्र तक गृहस्थ आश्रम में रहूँगा फिर तपस्या मार्ग पर चलूँगा । पति को पत्नी के साथ बातचीत की फुर्सत नहीं, व्यवसाय के कारण नहीं, दुनियादारी के कारण नहीं बल्कि तपस्या के कारण । ब्रह्म मुहूर्त से रात्रि तक श्री कर्दमजी ऋषि की तपस्या चलती थी । विवाह से उनकी तपस्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा ।
348. इस शरीर को ब्रह्म प्राप्ति के लिए योग्य बनाना पड़ता है । उसे साधन से साधना पड़ता है । सर्वत्र विराजमान प्रभु तभी आत्म-साक्षात्कार देते हैं ।
349. पशुमय जीवन जी कर प्रभु प्राप्ति की आशा कभी नहीं रखनी चाहिए । कठोर नियमों को जीवन का अवलंबन बनाना चाहिए तभी प्रभु प्राप्ति संभव है ।
350. ब्रह्म ज्ञान और सिद्धियाँ तपस्या के बल पर ही प्राप्त होती हैं ।
351. शास्त्र के अनुसार भक्ति करने वाले साधक की पत्नी कैसी होनी चाहिए ? शास्त्र कहते हैं कि वह छाया समान होनी चाहिए । क्या छाया कभी हमें विघ्न करती है, नहीं करती सिर्फ हमारे पीछे-पीछे चलती रहती है । पर आज की ज्यादातर पत्नी माया में हमें उलझाती है ।
352. पहले पत्नी पति की सच्ची सेवा करती थी, वह भी प्रेम से । संत व्यंग्य में कहते हैं कि आज सेवा तो करती है मगर मन मार कर और बर्तन पटक कर ।
353. अपने पति का गौरव रखती थी पुरानी पत्नी । पहले भक्ति साधन करने वाले पति, सत्य बोलने वाले पति की पत्नी गौरवान्वित रहती थी । आज ऐसे पतियों को उनकी पत्नियाँ मूर्ख मानती है ।
354. प्रेम और सेवा से प्रभु को वश में कर सकते हैं, प्रेम और सेवा से प्रभु का वशीकरण संभव है ।
355. तपोबल से श्री कर्दमजी ऋषि ने ऐसा विमान बनाया जो चारों ऋतुओं के अनुकूल था, गर्म और ठंड की पूरी व्यवस्था थी । बिना चालक का विमान था । सरोवर, उद्यान, पशु-पक्षी विमान में ही थे । इच्छा से बड़ा या छोटा होने वाला था । रत्नों के प्रकाश से बिजली की रोशनी होती थी । तप में कितना बड़ा बल होता है और सिद्धियाँ क्या कर सकती है यह यहाँ देखने को मिलता है ।
356. ऋषि सिद्धबल से और तपोबल से दूसरे लोकों में चले जाते थे और जब उन्हें चंद्रलोक और अन्य लोकों से निमंत्रण मिलते थे । अभी विज्ञान जहाँ तक पहुँच नहीं पाया हमारे ऋषि वहाँ तक पहुँच जाते थे ।
357. श्री पुराणों की भाषा अलंकारिक होती है उनमें वैसा ही भाव लेना चाहिए । जैसे हम कहते हैं कि सौ बार कह दिया मतलब बहुत बार कह दिया, यह नहीं कि सौ बार गिनती करके कहा । ऐसे ही श्री पुराणों की हजार वर्ष मतलब बहुत, गिनती करने नहीं बैठना चाहिए कि हजार वर्ष की गिनती करनी है । सिर्फ भाषा के अलंकार का संकेत ग्रहण करना चाहिए ।
358. गृहस्थ करने के बाद भी गृहस्थ में मन रमा नहीं श्री कर्दमजी ऋषि का । प्रभु की सेवा में मन को लगाना ही उनका हेतु था इसलिए तपस्या के मार्ग पर तुरंत चल पड़े ।
359. विलास भोग के महल में रहकर भी भगवती देवहूति को वह शांति नहीं मिली जो श्री कर्दमजी ऋषि को अपनी कुटिया में थी । सूत्र यह है कि भगवत् प्राप्ति से ही शांति है, भोग विलास में शांति नहीं है ।
360. एक हजार सिद्धि कन्याएं सेवा हेतु, विमान भ्रमण हेतु, राजमहल ऋतुओं से युक्त, जेवर इतने कि गिनती भी नहीं, फिर भी भगवती देवहूति को शांति नहीं मिली । सूत्र यह है कि प्रभु भजन में ही शांति है ।
361. धन से प्रभु कभी प्राप्त नहीं हो सकते - यह वेदांती सत्य है । प्रभु प्राप्ति का एकमात्र उपाय भक्ति है । श्री मैत्रीजी ऋषि की पत्नी ने यह बात पूछी ऋषि श्री याज्ञवल्क्यजी से कि मेरे पति इतनी धन-संपदा छोड़ गए हैं मेरे लिए पर प्रभु प्राप्ति कैसे होगी तो ऋषि ने उपरोक्त बात कही ।
362. प्रभु की माया के प्रभाव के कारण हम आत्मज्ञान की याचना की जगह प्रभु से माया की याचना करते हैं । भगवती देवहूति अब रोई, धन के लिए नहीं, भगवान के लिए ।
363. प्रभु हमारे घर में आए इसके लिए हमारा जीवन पूर्णतया शुद्ध होना चाहिए नहीं तो प्रभु अंश का आगमन हमारे घर में नहीं हो सकता ।
364. प्रभु ध्यान से ही हमारा मन शुद्ध होता है ।
365. भक्ति का जितना सुंदर निरूपण श्रीमद् भागवतजी महापुराण की एकादश स्कंध में है, ऐसा कहीं भी नहीं मिलेगा ।
366. प्रभु श्री ब्रह्माजी, प्रभु श्री शिवजी, श्री इंद्रदेवजी, सभी देवतागण, ऋषि-महर्षि जाकर प्रभु के समक्ष हाथ जोड़कर कहते हैं कि प्रभु की श्रीलीलाओं का गान और कीर्तन ही हृदय शुद्ध करने का एकमात्र मार्ग है ।
367. प्रभु केवल लोगों का कल्याण हो, इस दृष्टि से सभी कार्य और श्रीलीलाएं करते हैं ।
368. उत्तम अध्ययन करने वाला, खूब यज्ञ करने वाला, खूब ध्यान करने वाला भी चित्त उतना शुद्ध नहीं कर सकता जितना प्रभु की श्रीलीला के गुणगान से होता है ।
369. एक सौ पच्चीस वर्षों की श्रीकृष्ण लीला सभी भक्तों, देवताओं, ऋषियों के लिए आदर्श बन गई गुणगान हेतु, लीलागान हेतु ।
370. श्रीकृष्ण लीला अनमोल धन है जिसका गान करते हुए हम अपने जीवन को सफल बना सकते हैं और धन्य कर सकते हैं ।
371. प्रार्थना करना भक्त के हाथ, प्रार्थना को कृपापूर्वक स्वीकार करना और अंतिम निर्णय देना प्रभु के हाथ होता है ।
372. संसार के पापियों का नाश प्रभु करते भी हैं और करवाते भी हैं ।
373. प्रभु के धर्म स्थापना के लिए प्रभु ने पांडवों को माध्यम बनाया । प्रभु कार्य से जो जुड़ जाता है वह भी महान बन जाता है । प्रभु कार्य करने के कारण पांडव भी महान बन गए ।
374. प्रभु उन्हें ही अपना मानते हैं जो प्रभु के बताए हुए मार्ग, जिसको धर्म कहते हैं, उस पर चलते हैं ।
375. ऋषि और संत किसी जाति, गांव, माता-पिता के यहाँ तो जन्म लेते हैं पर उनका रिश्ता सिर्फ प्रभु के साथ ही बन जाता है । फिर उनका जाति, गांव, माता-पिता से कोई सरोकार नहीं रहता । जैसे श्रीयमुना, श्रीनर्मदा, श्रीगोदावरी, श्रीकावेरी का जल अलग-अलग होता है पर जब वे श्री समुद्रदेवजी में मिल जाते हैं तो उनका अस्तित्व का विसर्जन हो जाता है । सागर के जल को घड़े में भरा तो अब वह सागर का जल ही कहलाता है, उसमें कोई श्रीयमुना, श्रीनर्मदा, श्रीगोदावरी, श्रीकावेरी का जल अलग से नहीं होता । वैसे ही ऋषि और संत अपने जाति, गांव परिवार का विसर्जन करते हैं प्रभु मिलन के लिए । अब ऋषियों और संतों को "वसुधैव कुटुम्बकम्" यानी पूरा संसार ही श्रीवासुदेव (प्रभु) का कुटुंब दिखता है ।
376. प्रभु सबके होते हैं, किसी एक संत, व्यक्ति, जाति, समाज के नहीं होते बल्कि सबके होते हैं ।
377. जो सीमित मात्रा में लोगों को अपनाते हैं यानी मेरी जाति, मेरा राज्य, मेरा देश वे संत नहीं होते । सच्चे संत प्रभु के विश्वरूप को मानने के कारण पूरे ब्रह्मांड और विश्व को एक जैसा मानते हैं और सबके होते हैं ।
378. कभी भी कोई रात्रि में बुरा सपना देखें तो श्री विष्णु सहस्त्रनामजी का जाप करें, नहीं आता हो तो श्रीराम नाम की माला फेरे । श्रीराम नाम सहस्त्रनाम तुल्य नाम है । इससे हमारा डर दूर चला जाएगा और अमंगल के संकेत और संकट मिट जाएंगे ।
379. प्रभु ने श्री द्वारकाजी के वृद्ध, महिला और बालकों को अमंगल से बचाने हेतु धार्मिक अनुष्ठान और दान करवाए ।
380. श्रीयक्ष प्रश्न है कि मरने वाले का साथी कौन ? उत्तर में कहा गया है कि उसके हाथ का दिया हुआ दान ही उसका साथी है । दान के अलावा सभी अंत में हमारा साथ छोड़ देंगे ।
381. दान से व्याधियों का नाश होता है । अनेक अनिष्टों को दान दूर करता है ।
382. दान न करते हुए सिर्फ धन का संचय करने वाला मलिनता से युक्त हो जाता है ।
383. संसार का सबसे बड़ा शूरवीर कौन ? तलवार लेकर लड़ने वाला नहीं बल्कि अपनी आदत यानी स्वभाव को बदलने वाला सबसे बड़ा शूरवीर है ।
384. प्रभु श्री महादेवजी के पास उद्धार करने के लिए और वरदान देने के लिए हमारी कोई पात्रता के होने की जरूरत नहीं है ।
385. श्री चंद्रदेवजी को क्षय रोग के श्राप से मुक्त कर दिया प्रभु श्री महादेवजी ने और श्री महादेवजी को नया नाम मिला श्रीसोमेश्वर ।
386. ब्राह्मण की बात छोड़ दें, पूर्व काल के वैश्य वर्ग भी इतने शुद्ध आचार वाले होते थे । पहले के वैश्य नियम पूर्वक सूर्योदय से पूर्व स्नान कर लेते थे, नहीं तो उस दिन वे भोजन ग्रहण नहीं करते थे । उनके जीवन में कभी भी ऐसा नहीं होता था कि सूर्योदय से पूर्व स्नान नहीं किया हो । वैश्य में सेठ सिर्फ पैसा कमाने वाले नहीं होते थे बल्कि संस्कार वाले सच्चे सेठ होते थे ।
387. एक सेठ चारों तरफ से बीमारी के कारण निराश हो गया क्योंकि डॉक्टर ने जीवन में तीन माह का समय शेष दिया था । तो एक संत ने उनसे कहा कि प्रभु कृपा से कुछ भी हो सकता है और उनसे खूब दान करवाया और वे स्वस्थ हो गए ।
388. सामूहिक पाप वह होता है जब हम गलत लोगों को गलत पद के लिए निर्वाचित कर देते हैं जिससे हमारा सामूहिक नुकसान होता है ।
389. प्रभु की खुशी के लिए मैं दान कर रहा हूँ - यह संकल्प लेकर विधि-विधान से दान करना सर्वश्रेष्ठ होता है ।
390. व्याख्यान (कथा) में प्रतिपादित धर्म जीवन में उतारना चाहिए और हमारे संस्कार में उसकी झलक दिखनी चाहिए ।
391. श्री उद्धवजी और प्रभु का प्रेम उत्तम प्रेम था । पूरे जीवन श्री उद्धवजी को प्रभु का संग मिला । श्री गोपीजन को कम संग मिला, श्री अर्जुनजी को भी कम संग मिला । सबसे अधिक प्रभु का संग श्री उद्धवजी को मिला ।
392. प्रभु का जीव पर अधिकार सबसे बड़ा होता है ।
393. श्री उद्धवजी प्रभु के वियोग में जी नहीं सकते थे इसलिए प्रभु से स्वयं को भी साथ ले जाने हेतु निवेदन किया जब प्रभु स्वधाम जाने की तैयारी कर रहे थे ।
394. जैसे किसी वन में एक अंधे बालक को कांटों के बीच माँ छोड़कर चली गई वैसी अवस्था श्री उद्धवजी ने कहा कि मेरी होगी अगर मैं अकेला रह गया । प्रभु मेरे जीवन के एकमात्र आलंबन हैं । श्री उद्धवजी प्रभु के श्रीकमलचरणों को अपनी छाती से चिपकाकर रुदन करने लगे ।
395. सारा जीवन प्रभु से वार्ता में और प्रभु के बारे में सुनने में बीता था श्री उद्धवजी का ।
396. प्रभु भगवती रुक्मिणी माता को अलग कमरे में सोने को कह देते और अपने मित्र श्री उद्धवजी के साथ अपने कक्ष में पूरी रात बातें करने में बिता देते । श्री उद्धवजी के अंतरंग सिर्फ प्रभु ही थे ।
397. भोजन के वक्त श्री उद्धवजी को प्रभु अपने पास बैठाते थे ।
398. तीर्थों का सेवन श्री उद्धवजी के साथ ही प्रभु करते थे ।
399. श्री उद्धवजी को प्रभु अपने साथ हर जगह ले जाने में आनंद मनाते थे ।
400. श्री उद्धवजी हमेशा वही वस्त्र, आभूषण, माला धारण करते थे जो सबसे पहले प्रभु धारण कर चुके होते थे । वे प्रभु के प्रसाद के रूप में उसे ग्रहण करते थे । उन्होंने जीवन में एक भी वस्तु को सीधे स्वीकार नहीं किया था । प्रभु को अर्पण करके ही हर वस्तु श्री उद्धवजी तक आती थी । ऐसा नियम श्री उद्धवजी ने जीवन में बना रखा था । इसके कारण माया का प्रभाव कभी श्री उद्धवजी पर नहीं हुआ, माया आती थी पर बिना श्री उद्धवजी को प्रभावित किए हुए वापस लौट जाती थी ।
401. त्यागी और संन्यासी महात्मा बड़े त्याग और संन्यास से प्रभु की दिव्य गति को प्राप्त करते हैं पर भक्त बड़ी सरलता से वह दिव्य गति को प्राप्त कर लेता है । उसके आधार होते हैं प्रभु का नाम जप, श्रीलीला चर्चा और कीर्तन ।
402. भक्त की पात्रता नहीं होने पर भी प्रभु उन पर असीम कृपा करते हैं ।
403. प्रभु अपनी करुणा के कारण भक्तों के साथ लीला-विलास करते हैं ।
404. प्रभु अपने भक्त के हित की एक भी बात कभी नहीं टालते । कभी भक्त के हित की बात को स्थगित नहीं करते और न ही कभी रद्द करते ।
405. श्री उद्धवजी को प्रभु अपने बराबर ही मानते थे, अपने से कम नहीं । श्रीउद्धव के रूप में मैं श्रीकृष्ण ही हूँ और श्रीकृष्ण रूप में मैं श्रीउद्धव ही हूँ - ऐसा प्रभु हमेशा कहते थे । प्रभु भक्त से एकरूप हो जाते हैं और ऐसा मानते हैं, यह प्रभु की कितनी बड़ी महानता है ।
406. प्रभु के सखा, श्रेष्ठतम ज्ञानी, देवताओं के गुरु श्री बृहस्पतिजी से जाकर ज्ञान प्राप्त किया था श्री उद्धवजी ने । प्रभु उनसे मंत्रणा करते थे, वे प्रभु के मंत्री थे, प्रभु उनसे सलाह लेते थे, परामर्श करते थे । प्रभु सिर्फ श्री उद्धवजी, देवर्षि प्रभु श्री नारदजी, श्री विदुरजी, श्री सतकीजी, पांडवों और भगवती द्रौपदीजी से परामर्श करते थे । सभी प्रभु के भक्त थे । श्री उद्धवजी प्रभु के अत्यंत प्रिय थे । प्रभु से प्रियत्व होना ही जीवन में सबसे बड़ा काम करता है - यह सूत्र है ।
407. श्री उद्धवजी त्यागी, तपस्वी, ज्ञानी और भगवत् भक्त थे । उन्होंने अंत में प्रभु पाने हेतु प्रभु की प्रेमाभक्ति को ही श्रेष्ठ माना ।
408. प्रभु के प्रिय हुए बिना प्रभु अपने रहस्यों को कभी नहीं खोलते ।
409. प्रभु का एकांत-प्रिय भक्त बनना चाहिए । जो जीवन में प्रभु के अलावा किसी को महत्व नहीं देता, किसी को जानने और मानने की बात ही खत्म । उसके लिए केवल प्रभु ही होते हैं, प्रभु से महत्वपूर्ण अन्य कुछ भी नहीं होता । भक्ति में भी सबसे बड़ी भक्ति एकांत-भक्ति है जिसमें प्रभु, प्रभु और सिर्फ प्रभु होते हैं ।
410. जो प्रभु से अनन्य हो गया, प्रगाढ़ प्रेम प्रभु के लिए हृदय में धारण कर लिया - वही सबसे बड़ा भक्त है ।
411. प्रभु के भूमंडल से अंतर्ध्यान होते ही यहाँ के मांगल्य नष्ट हो जाते हैं । सूत्र यह है कि जहाँ प्रभु है वहाँ मांगल्य, ऐश्वर्य, सदाचार और आनंद रहते हैं । श्रीवैकुंठ तुल्य वातावरण वहाँ रहता है । इसलिए प्रभु जीवन में रखें तो यह सब कुछ रहेगा ।
412. महापुरुषों पर प्रभु की कृपा होती है इसलिए उनके द्वारा संचालन श्रेष्ठ होता है । महापुरुष के बाद उनके आश्रम की गतिविधि दूषित हो जाती है क्योंकि अब प्रभु कृपा नहीं होती ।
413. एक मुझे (प्रभु) को छोड़कर किसी को याद मत करो, ऐसा प्रभु अपने भक्त से कहते हैं । परम आधार जिसने प्रभु को रखा उसके जीवन में दुःख का संचार भी कभी उसे व्यथित नहीं कर पाता ।
414. साधु-संतों को निरंतर प्रवास क्यों करना चाहिए क्योंकि कहीं भी आसक्ति निर्माण नहीं हो । माया के कारण मोह में नहीं फंसे ।
415. साधु-संतों को भिक्षा की रोटी खानी चाहिए और प्रभु का खूब भजन करना चाहिए, बस इतना-सा ही उनका काम होता है ।
416. पूरे वेदांत का सार प्रभु ने एक श्लोक में श्री उद्धवजी को बताया । प्रभु ने कहा जो दृश्य देखता है, कान से सुनता है, जिसकी-जिसकी अपने मन में कल्पना कर सकते हैं सब मिथ्या है, सब भ्रमित करने वाला है और उसका नाम माया है । कल्पनाओं का विलास हमें फंसाने हेतु हमारे सामने निर्माण किया गया है । पर यह उसके लिए है जो मुझे (प्रभु) को नहीं समझता, जो समझता है वह अपने को और परमात्मा को एकरूप में देखता है । मेरे (प्रभु) के अलावा कुछ नहीं । मेरे सामने आने वाले हर जीव के भीतर मेरे प्रभु हैं, जिससे मैं (भीतर के प्रभु) से ही व्यवहार कर रहा हूँ । मेरे भीतर प्रभु, व्यवहार करने वाले भी प्रभु, व्यवहार करवाने वाले भी प्रभु, व्यवहार भी होता है प्रभु के साथ । यहाँ देखने वाला और दिखने वाला दोनों एक हो गया ।
417. मेरे भक्त न अनुकूल देखकर खुश होते हैं और न प्रतिकूल देखकर डरते हैं । अशांति उनका स्पर्श तक नहीं करती - यह प्रभु का आश्वासन है ।
418. अपनी इच्छा का परित्याग करना और समस्त संसार को मेरे (प्रभु) से जोड़कर देखना ही भक्ति है ।
419. प्रभु श्री कपिलजी का अवतार केवल ज्ञान उपदेश हेतु हुआ था ।
420. प्रभु के विभिन्न अवतारों के विभिन्न हेतु होते हैं ।
421. अपने जीवन के लक्ष्य का भान हमें होना चाहिए । जीवन के समस्त व्यवहार करते समय हमें जीवन उद्देश्य का भान होना चाहिए ।
422. मनुष्य जन्म लेकर और प्राकृतिक जीवन जीने का महत्व नहीं है । प्रभु से आत्म-साक्षात्कार कर प्रभु में विलीन होना ही हमारा मानव जीवन का असली लक्ष्य होना चाहिए ।
423. समय पर कन्या का विवाह नहीं करने पर माता-पिता को दोष लगता है - ऐसा शास्त्र मत है ।
424. सारे कष्ट उन्हें होते हैं जिनको जीवन में कुछ नियम पालन करने होते हैं और शास्त्रोक्त जीवन जीना होता है । जिनको पशुतुल्य जीवन जीना है उनके लिए कोई नियम नहीं होते ।
425. कष्ट उन्हें सहना होता है जिन्होंने अपनी वाणी को सत्य रखने हेतु जीवन भर प्रयास किया है ।
426. प्रभु श्री कपिलजी ने श्री कर्दमजी ऋषि को मुक्त किया कि वे वन में जाएं तो प्रभु का अनादर नहीं होगा । घर पर रहते हैं और प्रभु सेवा करते तो अपनी वाणी को झूठा करने का दोष लगता क्योंकि उन्होंने संतान के बाद गृहस्थ का त्याग कर वन जाने का निर्णय लिया था । वन और घर दोनों जगह प्रभु पूजा सेवा ही करनी है पर अपने जीवन का व्यवहार सत्य रखने हेतु उन्होंने वन जाकर प्रभु का भजन करना स्वीकार किया । सामान्य कोई होता तो घर पर ही रुकता क्योंकि प्रभु ने छूट दे दी थी कि घर पर भी भजन कर सकते हैं ।
427. करीब 200 वर्षों पहले विदेश से भारत आने वाले एक विदेशी ने अपनी किताब में लिखा था कि भारतवर्ष में मुझे झूठ बोलने वाला एक भी आदमी नहीं मिला । यह हमारे देश के लिए कितनी बड़ी गौरव की बात थी ।
428. जो सत्य वचन का पालन करते हैं सिद्धियां उनका साथ स्वतः देती है । उनके द्वारा दिए हुए सभी आशीर्वाद और श्राप सदैव सफल होते हैं ।
429. तीव्र संन्यास का अर्थ है कि किसी के साथ बातचीत नहीं, अंतःकरण में प्रभु के चिंतन में संत डूब जाते हैं । बाहर की प्रकृति स्वतः ही ऐसे संतों का ध्यान रखती है, उन्हें कोई सेवक की जरूरत नहीं पड़ती ।
430. अध्यात्म क्या है ? जैसे भगवती गंगा माता का गंगासागर में लीन होना है वैसे ही हमारा परमात्मा में लीन होना ही अध्यात्म है । अध्यात्म युक्त जीव को प्रभु के अलावा कोई अन्य चीज का भान नहीं होता ।
431. मान-अपमान, सुविधा-असुविधा, हानि-लाभ में चित्त का संतुलन नहीं बिगड़े - यह संत स्वभाव होता है ।
432. बाहर देखेंगे तो सबको समान दृष्टि से देखेंगे, ऐसा संतों का स्वभाव होता है ।
433. निरंतर शांति से प्रभु का ध्यान करने वाले आत्मानंद का मन कैसा होता है ? एक ऐसे समुद्र की कल्पना करें जिसमें कोई लहर नहीं उठती हो । जिसके चित्त में कोई लहर नहीं उठती वही आत्मानंद है ।
434. जो शरीर के रहते प्रभु में लीन रहते हैं, देह जाने के बाद भी वे प्रभु के अलावा कहाँ जाने वाले हैं, वे निश्चित प्रभु के पास ही जाएंगे ।
435. प्रभु बाल-लीला इतनी मधुर करते हैं कि भगवती देवकी माता या भगवती देवहूति माता को कभी भान ही नहीं होता कि यही परब्रह्म हैं । प्रभु लीला करते हैं तो माया का पर्दा डाल देते हैं ।
436. बिना पूछे प्रभु कभी उपदेश नहीं करते । श्री अर्जुनजी ने पूछा, भगवती देवहूति माता ने पूछा तभी प्रभु ने उपदेश दिया । अध्यात्म शास्त्र का नियम है जब तक साधक जिज्ञासा नहीं करे, पूछे नहीं, आध्यात्मिक ज्ञान का उपदेश नहीं करना चाहिए ।
437. श्री अर्जुनजी से प्रभु का इतना प्रेम कि प्रभु ने उनका सारथी बनना स्वीकार किया ।
438. प्रभु ने श्री अर्जुनजी को दो-चार फटकार लगाई श्रीमद् भगवद् गीताजी के प्रथम अध्याय में । पहले अध्याय में श्री अर्जुनजी मोहग्रस्त हैं, तनावग्रस्त हैं और जिज्ञासु नहीं हैं । श्री अर्जुनजी प्रभु से पूछते नहीं हैं कि प्रभु उनका समाधान करें । दूसरे अध्याय के सातवें श्लोक में श्री अर्जुनजी ने प्रभु से जिज्ञासा की । इसे संत श्रीमद् भगवद् गीताजी की चाबी मानते हैं । श्रीमद् भगवद् गीताजी उनके ध्यान में आएगी जिनकी मन की अनुभूति इस श्लोक जैसी बन जाएगी । श्री अर्जुनजी इस श्लोक में प्रभु से कहते हैं कि मैं कुछ नहीं जानता, आप ही बताएं, मेरी बुद्धि कार्य नहीं कर रही, मैं आपकी शरण लेता हूँ । जिज्ञासु की शरणागति हो गई । फिर प्रभु धारा प्रवाह बोलना शुरू करते हैं और कोई कसर नहीं रखते । संपूर्ण जीवन का विज्ञान दे दिया । प्रभु केवल चालीस मिनट बोले और सभी-के-सभी प्रश्नों का समाधान कर दिया ।
439. प्रभु श्री कपिलजी का उपदेश परम-कल्याण हेतु पहले स्वयं को जाने, अध्यात्म को समझे । हमें मुक्त होना है और श्रीसाकेत, श्रीगोलोक, श्रीबैकुंठ जाना है - यह तय करना चाहिए । प्रभु ने अपना पहला पता दिया है हमारे हृदय में और हम प्रभु को बाहर दूसरी जगह तलाशते रहते हैं ।
440. संसार में घर नहीं चाहिए, पत्नी नहीं चाहिए, यह कहने वाले मिलेंगे । धन नहीं चाहिए, प्रसिद्धि नहीं चाहिए, यहाँ तक मोक्ष भी नहीं चाहिए यह कहने वाले मिलेंगे । पर सुख नहीं चाहिए यह कहने वाला कोई नहीं मिलेगा । पूजा और भजन भी हम सुख के लिए करते हैं, हर कार्य सुख के लिए करते हैं, यहाँ तक चोर चोरी भी सुख के लिए करता है । संत संन्यास लेते हैं सब त्याग कर, सुख के लिए । सूत्र क्या है कि सुख सबको चाहिए ।
441. मोक्ष से भी अलग और ज्यादा सुख भक्ति में है इसलिए भक्ति मिल जाए तो मोक्ष भी त्याज्य हो जाता है ।
442. सुख मिलता तो है पर कठिनाई यह है कि टिकता नहीं, खंडित हो जाता है ।
443. जीवन का यथार्थ कभी सुख, कभी दुःख । जीवन की आकांक्षा केवल सुख चाहिए, दुःख की मिलावट नहीं होनी चाहिए । हर एक की इच्छा अखंड सुख की रहती है ।
444. हमारी आकांक्षा होती है कि सुख असीम हो यानी सुख की कोई सीमा नहीं हो ।
445. प्रभु श्री कपिलजी की व्याख्या है सुख के लिए कि जीव की सुख के लिए परिभाषा यह है कि (1) सुख अखंड हो (2) सुख असीम हो और (3) सुख की चाबी हमारे हाथ में हो । सुख स्वाधीन हो, पराधीन नहीं हो । सुख अखंड हो, असीम हो और स्वाधीन हो - यह तीनों विशेषण सुख के साथ लगते ही वेदांती इसको आनंद की परिभाषा दे देते है । वह सुख जो अखंड, असीम और स्वाधीन हो, वह आनंद कहलाता है जो केवल और केवल प्रभु की भक्ति से ही संभव है ।
446. जिस आनंद की प्राप्ति के लिए जीवात्मा जन्मों-जन्मों से उसे खोजता और प्रयास करता आया है वह हमारे अंतःकरण में है । हम भीतर नहीं देखते हैं, हमारी दृष्टि सदैव बाहर का रूप और रंग को देखती है । आनंद का मूल स्त्रोत मेरे भीतर है - यह हम आभास ही नहीं कर पाते ।
447. आनंद रूपी वस्तु हमारे भीतर छिपी है । मन उसे खोजने के लिए बाहर जाता है जो गलत है ।
448. जड़ (प्रकृति) और चेतन (पुरुष) के संचालक प्रभु ही हैं ।
449. जैसे बोलने वाले ध्वनि-विस्तारक (माइक) में दिखने वाला लोहा का उपकरण होता है और दूसरा न दिखने वाला विद्युत का प्रभाव होता है । दोनों चाहिए तभी वह काम करेगा । वैसे ही हमारे साथ दिखने वाला देह होता है और नहीं दिखने वाला देही होता है ।
450. हमारा मन केवल बाहर देखता है । मन बाहर जहाँ तक जाता है, जो बाहर की कल्पना करता है, वह सब मिथ्या है ।
451. “मैं” शब्द का उच्चारण हम करते ही वह दिखने वाला शरीर के लिए करते हैं । जैसे यह फोटो मेरे शरीर की है । पर मृत्यु पर देह तो दिख रहा है पर देही निकल गया । देही निकल गया और चला गया तो देह किसी काम का नहीं रहता ।
452. दिखने वाला जड़ और न दिखने वाला चेतन दोनों प्रभु ही हैं ।
453. जो-जो दिखता है वह दृश्य प्रकृति है, जो-जो देखता है वह दृष्टा पुरुष है और दोनों ही प्रभु हैं ।
454. दृष्टा पुरुष आनंद स्वरूप है । आनंद को अंदर बाहर से लाने की जरूरत नहीं क्योंकि आनंद उसमें समाविष्ट है । आनंद उसका स्वरूप है जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी को प्रकाश के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं होती क्योंकि प्रकाश उनके भीतर ही है ।
455. आनंद के लिए वस्तुतः किसी बाहर की वस्तु पर हमें निर्भर होने की जरूरत नहीं है क्योंकि आनंद हमारा स्व-सिद्ध स्वरूप है ।
456. प्रभु जो हमारे भीतर हैं वे सत, चित और आनंद स्वरूप हैं और मैं (जीव) उनका अंश भी आनंद स्वरूप हूँ ।
457. आनंद हमारा स्वरूप होने पर भी उसका अनुभव इसलिए नहीं होता कि हम माया के अधीन हो गए हैं और उसके अनुरूप नाचने लग गए हैं, जैसे मदारी बंदर को नचाता है ।
458. वन में एक सिंह था । वन का राजा था । वह सिंह रोग से ग्रस्त और बूढ़ा हो गया । उसके पैर में कांटा लग गया । अब वह शिकार नहीं कर सकता । जीव भी आनंद पा सकता था पर भाव-रोग ने उसे ग्रस्त लिया और वह आनंद से वंचित रह गया ।
459. एक बड़ा सम्राट था । अपार धन और सेना का मालिक था पर एक शत्रु के चंगुल में फंस गया । हमारे चेतन को भी माया ने बंदी बना लिया और अपने चंगुल में फंसा लिया ।
460. एक राजहंस दलदल में फंस गया, फड़फड़ाता है पर उड़ नहीं सकता । दलदल में शक्ति काम नहीं करती । जितना हलचल करेंगे उतना दलदल में फंसते जाएंगे । आत्म-हंस जो सत, चित और आनंद स्वरूप है वह भी देह-मांस-हड्डी के दलदल में फंसा हुआ है । आत्मानंद की उड़ान नहीं भर सकता पर अगर वह माया से छूट जाए तो आनंद का अनुभव कर सकता है ।
461. प्रकृति से भिन्न मेरी चेतना है, यह पहचान हो जाए कि मैं जड़ (शरीर) से भिन्न हूँ तो बात बन जाती है ।
462. सबसे सर्वोच्च आत्मा का कार्य प्रभु की भक्ति करना है – यह सांख्य योग का भी सार है ।
463. ब्रह्म-सिद्ध बनना है कि मैं सत, चित और आनंद स्वरूप हूँ तो उसका सर्वोत्तम उपाय प्रभु की भक्ति ही है ।
464. किसी भी साधन की पूर्णता भक्ति बिना कतई संभव नहीं है । प्रभु श्री कपिलजी का उपदेश है कि भक्ति की अनिवार्यता सभी साधनों में होती है । यही उपदेश श्रीमद् भागवतजी महापुराण में, श्री ज्ञानेश्वरीजी में और श्री रामचरितमानसजी में है कि भक्ति सर्वोपरि है । सभी श्रीग्रंथों का एकमत सिद्धांत यही है ।
465. भक्ति की जागृति सत्संग से ही संभव होती है ।
466. निसंग होना यानी शरीर से अकेले रहने का अभ्यास करना, मन से अकेले रहने का अभ्यास करना - यह भक्ति में बहुत लाभदायक होती है ।
467. एकांत का सही अर्थ है शरीर और मन से अकेला होना ।
468. एकांत भी पचाना पड़ता है, ऐसा शास्त्र हमें उपदेश देते हैं ।
469. एकांत में रहने से उद्धार हो ऐसा नहीं, एकांत पतन भी करवा देता है । हम कितने संभले हुए हैं - यह मूल सिद्धांत है । हम संभले हुए हैं तो एकांत उद्धार करावाएगा अन्यथा एकांत हमें पतन युक्त भी कर देता है अगर हम संभले हुए नहीं हैं ।
470. एकांत के मौन में भी हम पर्ची लिखकर बात करते हैं, जो गलत है । एकांत में आलस्य करते हैं, बिस्तर में पड़े हैं, सो रहे हैं, जो गलत है ।
471. संत के पास खुद जाना चाहिए, संत के आने की प्रतीक्षा जीवन में नहीं करनी चाहिए ।
472. संत कैसा, वेष कैसा, संप्रदाय कौन-सा, कपड़े कैसे - संत की पहचान कैसे की जाए ? प्रभु श्री कपिलजी उपदेश देते हैं कि बाहर के रूप-रंग-चिह्न के कारण संत नहीं मानना चाहिए । संत का सच्चा परिचय उसके अंतःकरण के लक्षण से होता है ।
473. संत में तितिक्षा होती है यानी वे सहनशील होते हैं । मन से विपरीत बातें सहने वाले होते हैं । संसार की सभी बातें हमारे अनुकूल हो, यह कभी संभव नहीं है । जो संघर्ष करता है वह साधन नहीं कर सकता । साधन वह कर सकता है जो सहना सीख गया । प्रतिकार की शक्ति होने पर भी सहना सीख गया । यह तितिक्षा है । श्री शंकराचार्यजी की तितिक्षा की व्याख्या है कि आने वाली सभी दुःखों का प्रतिकार करने की क्षमता होते हुए भी प्रतिकार नहीं करके और उसके साथ ही मन को अशांत भी नहीं होने देना - यह तितिक्षा है । जिसने सहजता से सब कुछ सहना सीख लिया उन्हें संत श्री ज्ञानेश्वरजी सहनसिद्ध कहते हैं । कोई कुछ भी कहे, मैं शांति के साथ उसे पी जाऊँ - यह प्रार्थना प्रभु से संत श्री ज्ञानेश्वरजी करते हैं ।
474. करुणा संत का बहुत बड़ा गुण होता है । संत दुःख स्वयं तो सह लेते हैं पर दूसरों के दुःख को देखकर पिघल जाते हैं । संत स्वभाव के मूल में करुणा होती है । रावण के वध के बाद प्रभु श्री हनुमानजी भगवती सीता माता से मिलने गए, वहाँ राक्षसी थी जो पहले माता को डराती थी पर आज उन राक्षसी को प्रभु श्री हनुमानजी सबक सिखा सकते थे, दंड दे सकते थे । हम भी बहुतों को दंड देना चाहते हैं । भगवती सीता माता को वर्ष भर इतना कष्ट पूर्ण दिन और रात दिया था उन राक्षसी ने पर माता ने कहा कि जीवन में कभी बदला लेने की भावना नहीं रखनी चाहिए । सज्जनों और दुर्जनों में फर्क क्या ? माता ने उनकी विवशता बताई कि रावण का आदेश पालन करने हेतु वह कष्ट पहुँचाती थी, उनको समझा और करुणा रखी । मैं भी यह देख सकूँ कि यह गलती या कष्ट मुझे क्यों दिया जा रहा है, अपराधी के लिए करुणा रखना हमें तुरंत प्रभु के पास पहुँचाती है क्योंकि अपराधी को दंड देने का काम प्रभु का है । यह हमारे हृदय को स्वीकार करना चाहिए कि दंड देने का काम मेरा नहीं है ।
475. सबको प्रभु के गुणानुवाद की प्रसादी बांटना, यह संतों का कार्य होता है ।
476. सिर्फ स्वयं के छोड़कर हम दुनिया में सभी के अपराध को देखते हैं । हमें अपने अपराध को ही देखना चाहिए ।
477. संत वे हैं जो सबका भला चाहते हैं । हम भला चाहते हैं अपने परिवार का, अपने दामाद का पर हम सबका भला नहीं चाहते । दूसरा हम चाहते हैं कि मेरा सबसे ज्यादा भला हो पर संत शत्रु को और उनको कष्ट पहुँचाने वाले का भी पूरा भला चाहते हैं क्योंकि वे उन सब में प्रभु को देखते हैं । संत श्री ज्ञानेश्वरजी के जीवन में वे दिन भी थे जब भिक्षा मांगने जाने पर लोग द्वार बंद कर लेते थे और कहते थे कि सुबह मुँह देखने से उनका दिन बिगड़ गया । पर आज करुणा के कारण आनंदी में रोज लाखों लोग उनके दर्शन के लिए आते हैं । संसार का हाथ उन्हें मारने के लिए उठा पर उनका हाथ सदैव मारने वालों को आशीर्वाद देने के लिए ही उठा । यह कितना बड़ा फर्क है ।
478. संत श्री ज्ञानेश्वरजी प्रभु से प्रार्थना में मांगते वक्त सबसे पहले दुष्टों के लिए सद्बुद्धि मांगते थे । वे उनको निरंतर कष्ट देने वालों के लिए सबसे पहले प्रार्थना करते थे ।
479. यदि अपने आसपास कोई दिखे जिसने हमें कष्ट दिया तो मैं सहूं, सहनशील बनूँ, यह हमारी मानसिक तैयारी होनी चाहिए । मानसिक तैयारी हेतु हमें ऐसा करना चाहिए ।
480. हम व्यायाम करते हैं तो शरीर को कष्ट होता है फिर भी हम व्यायाम करते हैं क्योंकि यह कष्ट सकारात्मक है, लाभकारी है इससे हमारा शरीर ठीक रहेगा । ऐसे ही हमें मानसिक व्यायाम भी करते रहना चाहिए जो सत्संग से होता है ।
481. संत वे होते हैं जो शांत रहते हैं, कुछ भी हो जाए उनका मन अशांत होता ही नहीं । हम कोई भी निमित्त से अशांत हो जाते हैं ।
482. ऐसे संत हुए हैं जिनको किसी ने भी, कभी भी क्रोध करते हुए देखा ही नहीं । यह सच्चा संतत्व है ।
483. व्यक्ति को उसकी व्यवसाय की कुछ आदत चिपक जाती है । जैसे कोई व्यवसाय में आदत हो गाली-गलौज करने की तो वह आदत उससे चिपक जाएगी ।
484. संत किसी को शत्रु मान नहीं सकते और वे किसी से भी द्वेष रख नहीं सकते ।
485. संत के लक्षण हैं कि वे अनन्य होकर प्रभु की भक्ति करते हैं । भक्ति हम भी करते हैं पर भोगों की प्राप्ति हेतु पर संत अनन्य होकर प्रभु की भक्ति प्रभु की प्राप्ति हेतु करते हैं न कि कोई भोगों के लिए । हम आरती गाते हैं सुख-संपति घर आवे, कष्ट मिटे तन का पर संत ऐसा नहीं मांगते ।
486. धन प्राप्ति और लौकिक कामना की पूर्ति हेतु प्रभु की भक्ति करना गलत नहीं है पर सर्वोत्तम भक्ति प्रभु के लिए निष्काम भक्ति है । संत कभी प्रभु से स्वयं के लिए नहीं मांगते । कभी भी भगवती मीराबाई, गोस्वामी श्री तुलसीदासजी, भक्त श्री सूरदासजी ने पदों में या संत श्री ज्ञानेश्वरजी ने सुख की याचना अपने लिए कभी नहीं करी । प्रभु की भक्ति सिर्फ प्रभु के लिए, प्रभु की प्रसन्नता के लिए की । संत श्री तुकारामजी ने कभी अन्न मांगने, परिवार की संपन्नता के लिए कभी प्रभु को नहीं कहा सिर्फ भक्ति में प्रभु के प्रेम रस का दान मांगा ।
487. संत गुलाबरावजी अंतिम अवस्था में आनंदी नहीं गए क्योंकि उनके अनुयायी मानते थे कि संत गुलाबरावजी को प्रभु ठीक कर दें पर प्रभु से उन्हें कुछ मांगना ही नहीं था ।
488. मैं मेरे शरीर का भार भी प्रभु पर डालना नहीं चाहता । स्वयं तो नहीं मांगेंगे पर उनके अनुयायी भी प्रभु से उनका स्वास्थ्य नहीं मांगे इसलिए संत गुलाबरावजी आनंदी गए ही नहीं ।
489. प्रभु की भक्ति में बाधा बनने वाले हर कार्य का त्याग भक्त तुरंत कर देता है । अपने भक्ति के आड़े आने वाला सभी कर्म का त्याग कर देता है । यहाँ तक कि अपने परिवार का त्याग कर देता है, प्रभु के लिए । प्रभु ही सच्चे साथी होते हैं इसलिए संत प्रभु के लिए अपने प्राण की परवाह भी नहीं करते ।
490. श्री ठाकुरजी की सेवा भक्त को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़नी चाहिए ।
491. श्री विभीषणजी ने भाई को त्यागा, श्री प्रह्लादजी ने पिता को त्यागा, राजा श्री बलिजी ने गुरु को त्यागा, श्रीगोपियों ने परिवार को त्यागा । प्रभु की भक्ति में बाधा बनने वाले हर व्यक्ति, हर कार्य त्याज्य है ।
492. भक्त की व्यवस्था कौन करता है ? वे किसी पर निर्भर नहीं रहते, सिर्फ प्रभु के आश्रय को छोड़कर अन्य कोई आश्रय स्वीकार नहीं करते । किसी सेठ, किसी नेता का आश्रय नहीं । एक भरोसा, एक बल, एक आश, एक विश्वास प्रभु का ।
493. भक्त अन्य भक्तों से प्रभु की कथा कहते हैं और उनसे प्रभु की कथा सुनते हैं ।
494. भक्त प्रभु के कीर्तन में रम जाते हैं ।
495. जैसे भगवती गंगा माता श्रीगंगोत्री से गंगासागर तक एक ही जगह श्रीहरिद्वार में विशेष महत्व है वैसे ही श्रीमद् भागवतजी महापुराण में बहुत सारे तीर्थ रूपी विशेष अध्याय और सर्ग हैं जिनका विशेष महत्व है । उनका सेवन धीरे-धीरे करना चाहिए – ऐसा संतों का आदेश है ।
496. जहाँ तक कानों की श्रवण शक्ति, आँखों की दृष्टि, मन की दृष्टि जाती है वहाँ तक माया का मायाजाल ही है ।
497. श्री उद्धवजी ज्ञानियों के शिरोमणि हैं । वे प्रभु से कहते हैं कि प्रभु ज्ञान को सरल करके बताएं । ऐसा निवेदन जन कल्याण हेतु उन्होंने किया है ।
498. स्वधाम जाने की बेला पर श्री उद्धवजी प्रभु से ज्यादा-से-ज्यादा बुलवाना चाहते हैं । इसलिए वे पूछते गए और प्रभु श्रीवचन बोलते गए ।
499. श्री उद्धवजी और प्रभु का संवाद जगत मंगल के लिए दो प्रेमियों का संवाद है ।
500. संत श्री ज्ञानेश्वरजी एकमात्र संत हैं जिन्होंने प्रभु और श्री अर्जुनजी के बीच के प्रेम का वर्णन किया है । वे कहते हैं कि जब भी प्रभु खुलकर बोलते हैं प्रेम के कारण ही बोलते हैं ।
501. प्रभु श्री अर्जुनजी से कहते हैं कि - मैं शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ । हमें भी पूजा के वक्त यह श्लोक याद रखना चाहिए और श्री अर्जुनजी की जगह स्वयं को वहाँ रखना चाहिए और सोचना चाहिए कि प्रभु यह हमें बोल रहे हैं कि - मैं शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ ।
502. भक्त प्रभु के पास बार-बार क्यों आते हैं क्योंकि वे भी प्रभु से प्रेम करते हैं ।
503. स्वामी श्री शरणानंदजी प्रज्ञा-चक्षु थे । फिर भी वे रोज प्रभु श्री बिहारीजी के दर्शन हेतु श्री वृंदावनजी में जाते थे । एक दिन मूसलाधार वर्षा हुई और उनके अनुयायी ने कहा कि आज एक दिन दर्शन नहीं किया तो क्या हो जाएगा ? वैसे भी आपको दिखता तो नहीं है । स्वामीजी ने हंसकर एक मार्मिक उत्तर दिया कि मुझे तो नहीं दिखता यह बात सत्य है पर प्रभु को तो दिखता है और वे मेरी प्रतीक्षा करेंगे । यह भाव हमारे भीतर भी होना चाहिए कि रोज प्रातः और शाम की पूजा में प्रभु हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं ।
504. यदि प्रेम का संबंध नहीं होगा तो भक्त का हृदय खिलेगा नहीं और प्रभु के सभी रहस्य खुलेंगे नहीं ।
505. यदि प्रेम प्रगाढ़ है तो फिर प्रार्थना के शब्द गौण हो जाते हैं ।
506. श्री उद्धवजी ज्ञानी थे, बुद्धिमान थे पर प्रेम की बात नहीं समझते थे । श्रीगोपीजन की चर्चा हर समय प्रभु करते थे तो श्री उद्धवजी को अच्छा नहीं लगता था । इसलिए प्रेम-दीक्षा हेतु प्रभु ने श्री उद्धवजी को श्रीगोपीजन के पास भेजा ।
507. महापुरुषों का हर कार्य संसार हित के लिए होता है इसलिए ही वे महापुरुष कहलाते हैं । श्री उद्धवजी जनकल्याण हेतु प्रभु से ज्ञान कहलवाना चाहते थे इसलिए उन्होंने प्रभु से इतने सारे प्रश्न श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध में किए ।
508. हम प्रभु के दास हैं और हमारा जीवन प्रभु के श्रीकमलचरणों में समर्पित है - यह भाव प्रभु के लिए रखना चाहिए ।
509. संसार सागर से तारने हेतु प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय लेकर और जीवन को आनंदमय बनाने का उपाय श्री उद्धवजी को प्रभु बताते हैं और वह है भक्ति ।
510. कठिन विषय को भी प्रभु अपने भक्तों के सामने सरल बनाकर और सरल भाषा में बताते हैं ।
511. जिसे वास्तव में मनुष्य जीवन को सार्थक करना हो, उसे परमार्थ करना चाहिए । परमार्थ में हमारा कोई सहायक नहीं हो सकता, हमें परमार्थ का बोझ स्वयं ही उठाना पड़ेगा । परमार्थ में हमारा कोई सहयोग नहीं कर सकता, स्वयं ही इस मार्ग पर चलना होगा । व्यावहारिक बातों में सहयोग और सहायता करने हेतु मित्र, कुटुंबी काम आ सकते हैं पर परमार्थ में माता-पिता-पत्नी-पुत्र कोई काम नहीं आता, जो करना है स्वयं को ही करना पड़ता है ।
512. अपना अज्ञान हमें स्वयं दूर करना होता है । स्वयं को स्वयं का उद्धार करना पड़ता है । परमार्थ में कोई मित्र है तो वह मैं ही हूँ । परमार्थ में कोई शत्रु है तो वह मैं ही हूँ ।
513. अपने विवेक से हमने अपने भीतर जो बुराइयां देखी है उसे त्यागना है और जो अच्छाइयां देखी है उसे बढ़ानी है - ऐसा करने पर हमारा उद्धार स्वयं हम कर पाते हैं ।
514. उत्तम साधक के आत्मसाध करने हेतु चार अध्याय प्रभु श्री दत्तात्रेयजी और श्री यदुजी महाराज का संवाद जो श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध में है वह साधन का सार है ।
515. जो सांसारिक पद लेता है उसके पास साधन हेतु समय की कमी हो जाती है, समय नहीं बचता ।
516. महाराज श्री यदुजी ने एक युवा संन्यासी प्रभु श्री दत्तात्रेयजी को देखा जिनमें कोई भय नहीं था, कोई चिंता की झलक नहीं थी, आनंद विभोर की मूर्ति थे । महाराज श्री यदुजी ने उनसे इस आनंद का रहस्य जानना चाहा ।
517. संन्यासी की सबसे उत्तम अवस्था तब होती है जब कोई नियम नहीं रह जाते क्योंकि वे शास्त्रों के नियम के ऊपर उठ जाते हैं ।
518. सच्चे संन्यासी के चिह्न - कोई चिंता नहीं होती, आनंद में कोई कमी नहीं होती । जो उनके पास जाता है उसे आनंद से भर देते हैं ।
519. हम अपनी क्षमता का उपयोग धन कमाने हेतु करते हैं पर संन्यासी आनंद प्राप्ति हेतु करते हैं ।
520. हम रात-दिन अपनी आजीविका का विचार करते हैं और संत आनंद का विचार करते हैं ।
521. संन्यासी प्रभु भजन के अलावा कुछ भी नहीं करते क्योंकि उनकी कोई इच्छा ही नहीं होती ।
522. इतने प्रगाढ़ आनंद, इतनी प्रगाढ़ शांति देखकर महाराज श्री यदुजी दंग रह गए । हमारी बहुत सारी योजनाएं, बहुत सारी वासनाएं बची होती है और हम सब जल रहे होते हैं अशांति में, काम में, क्रोध में और लोभ में ।
523. क्रोधी अपने बैरी को देखता है तभी उसकी जलन शुरू हो जाती है ।
524. जैसे वन में आग लग गई और वन की आग बुझाना किसी के वश की बात नहीं है । सभी पशु-पक्षी चिल्लाते हुए भागते हैं । ऐसी स्थिति में एक गजराज श्रीगंगा माता में पहले से शांति से खड़ा हुआ है । वह वन की आग को देख रहा है पर क्योंकि वह दूर भगवती गंगा माता के तट पर है इसलिए बचा हुआ है और दूसरों को भागते हुए देखता है । हमारे संसार में भी काम, क्रोध, वासना की आग लगी है, सब दौड़-भाग रहे हैं पर प्रभु श्री दत्तात्रेयजी की शांति वैसी ही है जैसे उस गजराज की शांति है । ऐसा महाराज श्री यदुजी बोलते हैं उस शांति का रहस्य पूछते हैं ।
525. जैसे श्रीगंगा माता के दोनों तट पर वन है और वन में भयंकर आग लगी है और शीतल श्रीगंगा माता के जल में गजराज खड़ा है । दोनों तरफ आग फिर भी शीतलता और शांति के साथ वह गजराज खड़ा है । वैसे ही संसार की आग में रहते हुए प्रभु श्री दत्तात्रेयजी की प्रगाढ़ शांति है और परम आनंद है ।
526. आत्मानंद को कैसे प्राप्त किया जाए और उसे कैसे बरकरार रखा जाए ? संसार का ताप कैसे हमें स्पर्श नहीं करे ? इतना शांत कैसे रहें ? क्या हमें अपने आसपास कोई दिखता है जिसमें अशांति नहीं, सबमें विभिन्न विषयों को लेकर, खुद को लेकर, परिवार, जाति, देश को लेकर अशांति है ।
527. हमने इस सच्चे धन को भुला दिया जो कि आनंद और शांति है । यह आध्यात्मिक धन माना गया है जिसका मिलना सिर्फ मानव योनि में ही संभव है ।
528. श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं कि सभी योनियों में मुझे (प्रभु को) मनुष्य योनि प्रिय है क्योंकि इसमें ही जीव अपने आनंद को जागृत रख सकता है ।
529. मनुष्य में बुद्धि होती है तो पशु-पक्षी में भी बुद्धि होती है । कुत्ता हाथ में रोटी देखता है तो पास आता है और डंडा देखता है तो दूर भाग जाता है । बंदर को नृत्य सिखाया जाता है पर आत्म-बुद्धि यानी खुद को जानने की बुद्धि सिर्फ मनुष्य में होती है । यह कुत्ते और बंदर में नहीं होती ।
530. अगर मनुष्य योनि में हमने आत्म-बुद्धि जागृत नहीं की तो हमारा मनुष्य जीवन सार्थक नहीं है ।
531. संत को विषय भोग का स्पर्श नहीं होता । हम नेत्र से रूप, जिह्वा से स्वाद, त्वचा से कोमलता का स्पर्श चाहते हैं । संत स्पर्श विहित होते हैं, न उत्तम रूप देखने की चाह, न जिह्वा से स्वाद की चाह ।
532. हम एकादशी के अगले दिन बढ़िया जलपान करते हैं और एकादशी के फलाहार का पूरा बदला इस तरह निकाल लेते हैं ।
533. हम एयर कंडीशन में बढ़िया स्वाद लेते हुए भोजन करते है फिर भी आनंद नहीं । प्रभु श्री दत्तात्रेयजी हैं कि जीवन की कोई अनुकूलता नहीं फिर भी इतनी प्रगाढ़ शांति, इतना प्रगाढ़ आनंद, इतनी तृप्ति, इतनी प्रसन्नता कि महाराज श्री यदुजी पूछते हैं कि आप ऐसे कैसे रह सकते हैं ? इतना आनंद, इतना सुख कहाँ से आया - यह महाराज श्री यदुजी का प्रश्न है ।
534. जैसे बादल कृपा करके वर्षा करते हैं वैसे ही प्रभु श्री दत्तात्रेयजी अपनी मंगल वाणी से अमृत वचन की वर्षा करते हैं ।
535. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी कहते हैं कि मैंने अनेक गुरुओं का शिष्य बनकर अपनी बुद्धि और विवेक से शिक्षा ग्रहण की है ।
536. चौबीस गुरुओं की कथा है जिनसे प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने ज्ञान प्राप्त किया । यह सभी उनके शिक्षा गुरु हैं । पर किसी गुरु ने उन्हें कुछ नहीं पढ़ाया, सिर्फ उनके व्यवहार को देखकर शिक्षा ग्रहण की । पढ़ाने वाले को पता नहीं कि उनसे शिक्षा ग्रहण की पर पढ़ने वाला इतना चतुर है कि बिना पढ़ाए ही स्वतः ही पढ़ लिया । यह सद्बुद्धि के कारण ग्रहण की गई विद्या है ।
537. हमारी बुद्धि का जागरण जिज्ञासा के लिए होनी सबसे बड़ी बात होती है । हम भी अपनी जिज्ञासा से बहुतों से बहुत कुछ सीख सकते हैं ।
538. श्री योग वशिष्ठजी में कहा गया है कि सद्गुरु का मुख्य काम साधक की प्रज्ञा जागृत करना है । साधक की बुद्धि को जागृति सबसे जरूरी । यह बुद्धि का जागरण व्यावहारिक विद्या और अध्यात्म विद्या दोनों हेतु जरूरी है ।
539. बुद्धि से निरीक्षण करके जो-जो जहाँ भी ग्रहण करने योग्य है वह स्वतः ही अपने कल्याण हेतु ग्रहण करना चाहिए ।
540. कुछ बातें देखकर निश्चय करना चाहिए कि उसे ग्रहण करना है क्योंकि वह अनुसरण करने योग्य है । पर कुछ बातें देखकर निश्चय करना चाहिए कि उसका त्याग करना है क्योंकि वह अनुसरण योग्य नहीं है ।
541. अगर हम सीखने की दृष्टि से संसार की तरफ देखते हैं तो असंख्य चीजें देखकर हम सीख सकते हैं ।
542. अगर सीखने की वृत्ति जागृत हो गई तो हम पत्थर से भी सीख सकते हैं, झरने से काव्य सीख सकते हैं, फूलों से हंसना सीख सकते हैं, भँवरों से गाने का संदेश सीख सकते हैं ।
543. ऐसी विवेक की जागृति होनी चाहिए कि शांत होकर जो संसार को देखकर सीखता है वही श्रेष्ठ है ।
544. एक दृश्य को देखकर दो लोगों की दृष्टि अलग-अलग विचार करती है । प्रभु का सुंदर श्रृंगार देखकर हमारी दृष्टि होनी चाहिए कि हम भी अपने श्रीठाकुरबाड़ी के प्रभु को सजाएं । महापुरुष को देखकर उनके सद्गुण को ग्रहण करने की सोच होनी चाहिए जिससे वे महापुरुष इतने बड़े बन गए ।
545. सच्चा श्रृंगार गहनों का नहीं, सद्गुणों का होता है । सद्गुणों की साधना इसलिए करनी चाहिए ।
546. महापुरुषों के जीवन से सद्गुण के कण बटोरने चाहिए । यह भी एक आध्यात्मिक साधन है । वैसे ही अनेक तत्वों को देखकर उनसे सीख कर भी आध्यात्मिक साधन पथ पर आगे बढ़ सकते हैं ।
547. गुरु द्रोणाचार्यजी को भी आश्चर्य हुआ जब एकलव्य ने देखकर वह सीख लिया जो प्रत्यक्ष श्री अर्जुनजी भी नहीं सीख पाए ।
548. आध्यात्मिक ज्ञान हो और प्रभु प्राप्ति की चाह हो तो जीवन में हमें कोई रोक नहीं सकता, अगर हमारी इच्छा प्रमाणिक है ।
549. प्रभु से जोड़ने वाला ही सच्चा सद्गुरु होता है ।
550. जैसे पूंजी तो हमने कमाई पर ट्रेन में चोरों ने चोरी कर ली । ट्रेन में उसको कैसे संभालना चाहिए इसकी अक्ल नहीं थी । ऐसे ही सद्गुण कमाने पर भी व्यवहार में उसे कैसे जीवित रखना चाहिए, यह आना चाहिए । ऐसा नहीं तो व्यवहार जीवन में हम उसे गंवा देंगें ।
551. परमार्थ साधने हेतु, आत्मानंद की प्राप्ति हेतु प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने चौबीस तत्वों से शिक्षा ग्रहण की ।
552. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने पृथ्वी माता से सहने की शिक्षा ली । संसार में जो भी होता है पृथ्वी माता उसे सहती है । कोई शिकायत नहीं करती । पृथ्वी माता जैसा सहनशील हमें भी बनना चाहिए । पृथ्वी माता जैसा सहन करना नहीं सीखेंगे तो प्रतिकार करेंगे, प्रतिकार करने की क्षमता न होगी तो मन-ही-मन जलेंगे । सहनशीलता नहीं तो रोज की माथापच्ची, समय व्यर्थ जाएगा । इसलिए जीवन में बातों को सह जाना, पी जाना, याद भी नहीं रखना । यह साधक के लिए जरूरी है । हर एक के साथ विवाद करेंगे तो समय व्यर्थ होगा । जिसको परमानंद प्राप्त करना है, प्रभु प्राप्ति करनी है उसे विरोध नहीं करना चाहिए और सहना चाहिए ।
553. जगतगुरु का एक अर्थ संत करते हैं कि जगत को ही गुरु बना लेना चाहिए । जगत की हर चीज से सीखना चाहिए और जगत के हर तत्व से ज्ञान ग्रहण करना चाहिए ।
554. एक संत अपने सेवक और अनुयायी को बुलाते थे तो कहते थे - गुरुजी क्योंकि वे हर व्यक्ति से सीखने का प्रयास करते थे । जहाँ भी दृष्टि जाए वहाँ से जीवन को संवारने हेतु शिक्षा ग्रहण करें ।
555. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने पर्वत से एक स्थान पर स्थिर रहना सीखा । प्रभु के लिए साधन करना हो तो जीवन में स्थिरता जरूरी । एक साधन में जमे रहे, रोज साधन बदलने वाला हजार जन्म में भी प्रभु की प्राप्ति नहीं कर सकता । एक साधना, एक धारणा में स्थिर हो जाना चाहिए ।
556. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने वृक्षों से कष्ट सहकर छाया देने की शिक्षा ली । वृक्ष धूप में खड़े रहते हैं और उनके नीचे जो भी बैठ गया उसे वे छाया प्रदान करते हैं । साधक खुद सहकर जो उसके संपर्क में आए उसे छाया देने का प्रयास करे । समीप आने वाले व्यक्ति को देखकर वृक्ष कभी विचार नहीं करता कि उसने मुझे लगाया था इसलिए इसे अधिक छाया दूं और दूसरा रोज कुल्हाड़ी से मेरी डाल काटता है इसलिए इसे कम छाया दूं । व्यवहार उदारता के साथ और समानता के साथ होना चाहिए । साधक को सबके लिए समानता का भाव रखना चाहिए ।
557. एक बार महाराज श्री रणजीत सिंहजी को भ्रमण के वक्त किसी के द्वारा फेंके अनजाने में पत्थर लग गया । किसी वृद्ध औरत ने आम तोड़ने के लिए पेड़ को पत्थर मारा था और लगा महाराज को । दूसरे दिन वह वृद्ध औरत दरबार में हाजिर हुई । न्याय करते हुए जिस बगीचे में इसने पत्थर मारा था उसका आधा हिस्सा इसे दे दिया जाए - ऐसा महाराज श्री रणजीत सिंहजी ने कहा । सभी दंग रह गए इस न्याय से । महाराज बोले कि बुढ़िया ने पेड़ को पत्थर मारा तो पेड़ उसे दो आम देता, मैं तो महाराज हूँ मुझे लगा तो मैं क्या वृक्ष से भी गया गुजरा हूँ कि दो आम भी नहीं दूँगा । मैं तो महाराज हूँ इसलिए आधा बगीचा दे दिया जाए ।
558. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने वायु से गंध को ग्रहण कर फिर त्याग देना सीखा । वायु सुगंधी और दुर्गंधी ग्रहण करती है, फैलाती है पर कुछ समय बाद उस गंध का त्याग कर देती है । साधक को संसार विषय को ग्रहण करके संसार में व्यवहार करें फिर वह विषय तुरंत त्याग कर प्रभु के सामने आ जाए । दिमाग में बात रहेगी तो साधन नहीं कर पाएंगे । जिस समय जिन लोगों के साथ हूँ उस भाव को ग्रहण करूँ फिर उनके जाते ही त्याग कर अंतःकरण में कोई विषय नहीं रखूँ, सिर्फ प्रभु को रखूँ । किसी के घर जाकर मृत्यु के वक्त संवेदना रखें पर बाहर आकर अपने घर जाकर भूल जाए और तुरंत कोई संवेदना नहीं रखें सिर्फ प्रभु को याद रखें ।
559. व्यवहार में ढोंग नहीं होना चाहिए और बाद में उस भाव का सच्चा त्याग होना चाहिए और सच्चा भाव केवल प्रभु के लिए होना चाहिए ।
560. अपने से पहचान करवाने वाली, आत्माराम बनाने के लिए सबसे उत्तम और सरल साधन भक्ति है ।
561. केवल प्रभु का एक आश्रय अपने जीवन में स्वीकार करना चाहिए ।
562. संतों का पहला लक्षण होता है कि पहले कथा सुनने का वे आरंभ करते हैं क्योंकि कथा कहने वालों से भी बड़ा लाभ कथा श्रवण वाले को होता है । इसलिए बहुत सारे संत जो कथा कहने में इतने दक्ष हैं फिर भी वे कथा श्रवण हेतु बैठ जाते हैं ।
563. कथा कौन कह रहा है यह संतों के लिए गौण हो जाता है, मुख्य बात है कि वह प्रभु की कथा है ।
564. स्वयं कथा श्रवण करना - यह संत का बहुत बड़ा लक्षण होता है ।
565. बहुत सारे संत अपने अंतिम अवस्था में कथा सुनने बैठ जाते थे । जो भी मिलने आता उसे एक ही बात कहते हैं कि मुझे श्रीमद् भागवतजी, श्री रामचरितमानसजी सुनाओ ।
566. कथा श्रवण से प्रभु की प्रतीति भीतर बार-बार होती है । इसलिए संत कथा सुनने बैठ जाते थे ।
567. बाकी सभी संसार की कथा जीवन की व्यथा बढ़ाएगी । सिर्फ प्रभु कथा ही जीवन की व्यथा समाप्त करेगी और उसे मिटाएगी ।
568. संसारी लोग के लिए हम महीने के अंत में कितना कमा लेते हैं यही हमारी उपलब्धि संसार और परिवार के लिए तय होती है । पर संत कमाते नहीं फिर भी किसी का आश्रय कभी नहीं लेते । सिर्फ प्रभु पर विश्वास रखते हैं कि प्रभु मेरी चिंता करेंगे । मुझे (संत को) सिर्फ प्रभु की कथा कहनी है, सुननी है और प्रभु का नाम संकीर्तन करना है ।
569. संतों को वस्त्र, अन्न, औषधि की आवश्यकता होती है पर उनको विश्वास होता है कि इसकी चिंता मुझे क्यों करनी है ? यह प्रभु का काम है । संत श्री ज्ञानेश्वरजी एक अदभुत उपमा देते हैं - संतों का जीवन उस गर्भ के बच्चे की तरह जो पूरी तरह अपनी माँ पर निर्भर है । प्रभु माँ बनकर हमारी पूरी चिंता करते हैं और हमारा भार उठाते हैं ।
570. संत अपने देह की चिंता नहीं करते । देह की चिंता करना प्रभु का काम । संतों का काम सिर्फ प्रभु का चिंतन करना ।
571. जीवन के और आधार होने पर भी संत उन आधार का त्याग कर सिर्फ प्रभु विश्वास के मार्ग पर चल देते हैं ।
572. भगवान की भक्ति में भी कष्ट सहने पड़ते हैं क्योंकि संसार में कष्टों से कोई नहीं बच सकता । सामान्य कमाई करने में भी कष्ट उठाना पड़ता है ।
573. क्या हम प्रभु के भक्त बनना चाहते हैं । संतों ने कभी प्रभु से सुख की उम्मीद नहीं की । क्या मिलेगा भक्ति करके यह उनके मन में आया ही नहीं । नहीं तो वह व्यापार हो जाता । वे प्रभु के शुल्क दास बनना नहीं चाहते हैं क्योंकि शुल्क दास बनाने के लिए प्रभु तैयार बैठे हैं । पर संत अशुल्क दास बनना चाहते हैं जिसमें प्रभु को योगक्षेम का भार उठाना पड़ता है । प्रभु चाहते हैं कि हम शुल्क दास बने और प्रभु हमारा पारिश्रमिक दे दे क्योंकि अशुल्क दास की भक्ति से प्रभु बंध जाते हैं ।
574. श्रीराम नाम अपने मुँह में आ गया तो यह बहुत कुछ मिल गया । श्रीराम नाम से क्या मिलेगा - यह सोचना ही गलत है ।
575. क्या भगवती मीराबाई ने कभी सोचा था कि महल छोड़कर भक्ति करने से क्या मिलेगा ? पर उन्हें जो मिला वह संसार के लिए एक आदर्श बन गया ।
576. जैसे माँ अपने नवजात शिशु के चिंतन में डूबी रहती है वैसे ही संत प्रभु के चिंतन में डूबे रहते हैं । चित्त प्रभु में डूब गया तो बाहर के कष्ट भी कष्ट नहीं लगते । लोगों को लगता है कि वे कष्ट में है पर वे मौज में रहते हैं क्योंकि प्रभु चिंतन उन्हें मौज देता है ।
577. कौन संत – जिनके जीवन में कोई अन्य का संग नहीं है वे ही सच्चे संत हैं । श्री रामकृष्ण परमहंसजी ने जीवन भर भगवती काली माता के अलावा किसी बात का कभी चिंतन ही नहीं किया ।
578. संतों का संग प्रभु से होता है । वे मानते हैं कि जो उसके संपर्क में आया उन्हें प्रभु ने भेजा और जो जीवन से गया वह प्रभु इच्छा से गया । उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ।
579. उत्तम महापुरुष और संत के पास हमें जाना पड़ता है । वे चलकर हमारे जीवन में नहीं आते ।
580. संतों की दृष्टि और वाणी एवं उनके पास का वायुमंडल भी हमारे पर प्रभाव डालता है ।
581. संतों के मुँह से कथा सुनने से उनके शब्द सीधा प्रभाव हमारे भीतर करते हैं ।
582. जो बुढ़ापा कम करे और यौवन लौटाए उसे रसायन कहते हैं । संत की कथा रसायन है क्योंकि यह हमारे साधन को यौवन कर देती है ।
583. प्रभु के लिए सच्ची श्रद्धा का उदय तभी होता है जब हम संतों के मुँह से प्रभु की कथा सुनते हैं ।
584. प्रभु की आराधना करना ही जीवन का सच्चा सुख है ।
585. प्रभु के अस्तित्व में विश्वास, प्रभु की कृपा में विश्वास, प्रभु को इसी जीवन में प्राप्त करूँगा, यह तीनों विश्वास जीवन में होना चाहिए ।
586. शास्त्रों का सौ प्रतिशत विश्वास संतों को होता है । हमारे शास्त्रों और ऋषियों ने जो कहा है वह परिपूर्ण सत्य है, यह विश्वास जीवन में दृढ़ रखना चाहिए ।
587. प्रभु मार्ग ही सत्य है और सही है – ऐसी दृढ़ता और श्रद्धा जीवन में होनी चाहिए ।
588. प्रभु का मार्ग कितना रस भरा है, भक्ति में कितना रस है, इसका आस्वादन उस मार्ग पर आने पर ही होता है ।
589. प्रभु स्वरूप में श्रद्धा, फिर प्रभु से रति यानी प्रेम, फिर भक्ति - यह क्रम होता है ।
590. यदि वास्तव में प्रभु प्रेम जागृत हो गया तो बहुत-सा संसार हमसे स्वतः ही छूट जाता है । यह कसौटी है प्रभु भक्ति की क्योंकि भक्ति और संसार के भोग साथ-साथ नहीं चलते ।
591. प्रभु भक्ति हमें देहातीत कर देती है । देह की अनुभूति गौण हो जाती है, देह की आवश्यकता भी गौण हो जाती है ।
592. भक्ति तभी सार्थक व परिपूर्ण होती है जिसमें भक्ति माता के दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य युवावस्था में हमारे जीवन में नृत्य करते हैं । ज्ञान (प्रभु का) और वैराग्य (प्रभु के अलावा कुछ नहीं चाहिए) ।
593. भीतर से प्रभु प्रेम जागृत करने से बाहर की तरफ मन जाएगा ही नहीं क्योंकि मन को फिर कुछ चाहिए ही नहीं ।
594. प्रभु प्रेम भीतर से जागृत हो गया तो हमें बाहरी नियम की जरूरत नहीं होती । वह प्रेमी भक्त जो करे वही नियम हो जाते हैं ।
595. पदार्थ का स्वीकार करना एक बात जो संत भी करते हैं पर वे पदार्थ में मन को नहीं फंसाते ।
596. संत के लक्षण होते हैं कि इहलोक में भोगों की जरूरत नहीं और परलोक में भी स्वर्ग सुख हेतु कर्मकांड नहीं करते क्योंकि उन्हें स्वर्ग सुख भी तुच्छ लगते हैं ।
597. संतों का संपूर्ण चित्त प्रभु के वशीभूत हो जाता है । प्रभु आराधना के अलावा उनके जीवन में कुछ दिखता नहीं ।
598. भक्तों के एक-एक बंधन कटते जाते हैं जब प्रभु से मिलन की बेला आती है । पर भक्त प्रभु से एकाकार नहीं होना चाहते । प्रभु पहले परीक्षा हेतु सिद्धियों के द्वार, मुक्ति के द्वार खोल देते हैं । भक्त कहता है कि मुझे कुछ नहीं चाहिए । भक्त की एकमात्र इच्छा कि हम प्रभु के सेवक बने रहे, निरंतर प्रभु सेवा हमसे होती रहे । इसलिए भक्त प्रभु से एकाकार होकर प्रभुमय नहीं बनना चाहते । वे प्रभु सेवा करना चाहते हैं और उनकी सेवा में भाव की प्रधानता होती है ।
599. प्रभु की सेवा में तल्लीन होने वाला भक्त प्रभु को जीत लेता है ।
600. प्रभु के भक्त जब आपस में मिलते हैं तो अति प्रसन्न होते हैं । एक प्रभु की विशेषता का वर्णन करता है, दूसरा प्रभु का यश-कीर्ति-श्रीलीला का वर्णन करता है । रोमांचित होकर भक्त एक दूसरे के सामने प्रभु का गुणगान करते ही रहते हैं ।
601. भक्त प्रभु विग्रह को लगातार टकटकी लगाकर दर्शन करते हैं और उनके नेत्र आंसुओं से तर हो जाते हैं ।
602. भक्त प्रभु के विभिन्न-विभिन्न विग्रह के दर्शन करता है पर उन सब रूपों में एक अपने श्री ठाकुरजी के ही दर्शन करता है । उत्तम भक्त हर तीर्थ, हर मंदिर में माथा टेकता है । वह प्रभु का कोई रूप नहीं छोड़ता क्योंकि हर जगह उसे एक ही प्रभु दिखते हैं और वह प्रभु के अतीव सुंदर रूप को देखता ही रहता है ।
603. भक्त सिर्फ आपस में प्रभु के विषय की मीठी-मीठी बातें करते रहते हैं ।
604. प्रभु की श्रीलीला गान, रूप दर्शन, भगवत् चर्चा करते-करते भक्त की इंद्रियां पहले प्रभु में लगती हैं । फिर प्रभु इंद्रियों के बाद उसके मन को खींचते हैं । फिर प्रभु उसके प्राणों को अपनी तरफ खींचते हैं । अब वह स्थिति आती है जब सभी इंद्रियां, मन और प्राण सब प्रभु में रम जाते हैं ।
605. अंत में भक्त को प्रभु अपने भीतर लीन कर लेते हैं ।
606. वे प्रभु, जिनके नियंत्रण में पूरा ब्रह्मांड है, भक्ति के माध्यम से भक्त के वश में हो जाते हैं ।
607. सारे विश्व का निर्माण, संचालन करने वाले प्रभु भी अपने भक्तों के भक्त बन जाते हैं ।
608. सारे संसार में एकमात्र प्राप्तव्य वस्तु प्रभु की तीव्र भक्ति है ।
609. श्रीमद् भागवतजी महापुराण का अनुपम शब्द है - तीव्र भक्ति । यह “तीव्र” शब्द अन्य किसी भक्ति शास्त्र में नहीं मिलेगा । मंद और मध्यम भक्ति का कहीं-कहीं प्रतिपादन मिलेगा पर भक्ति में तीव्रता का प्रतिपादन श्रीमद् भागवतजी महापुराण में ही मिलेगा ।
610. अंतरंग में प्रेमाभक्ति का ऐसा उबाल आना चाहिए कि संसार पीछे छूट जाए ।
611. कभी-कभी भक्ति की तीव्रता क्षणिक भी होती है पर सच्चे भक्त निरंतर तीव्र भक्ति ही करते रहते हैं । मनुष्य जीवन में आकर बस इतना प्राप्त करना है कि जीवन में निरंतर तीव्र प्रभु भक्ति हो सके । यह प्रभु श्री कपिलजी का अंतिम मत है ।
612. यही याद रखना चाहिए बाकी सब भूल जाना चाहिए कि हमें निरंतर तीव्रता से भक्ति करनी है । यह सब सार का सार है । भक्तों के नेत्र कभी भी प्रभु भक्ति में सूखे नहीं रहे, हमेशा भीगे हुए रहे क्योंकि वे निरंतर अपनी भक्ति में स्थिरता और तीव्रता दोनों रखते थे ।
613. स्थिरता और तीव्रता आने पर भक्ति में भक्त ज्यादा समय नहीं जीता । वह प्रभु से एकरूप होने वाला होता है क्योंकि प्रकृति अब उसे बांध नहीं सकती और वह प्रकृति के ऊपर उठ जाता है । वह शरीर त्याग कर प्रभु से एकरूप हो जाने की तैयारी कर लेता है ।
614. प्रभु श्री कपिलजी का सांख्य दर्शन के मूल में भक्ति है । यहाँ भक्ति का निरूपण नहीं बल्कि भक्ति की अनिवार्यता बताई गई है ।
615. ब्रह्मांड निर्माण होने के समय, चेतन प्रभु के प्रवेश से पहले, वह जड़ कहा गया है । प्रभु तत्व के प्रवेश से ही ब्रह्मांड सक्रिय होता है ।
616. सुख-दुःख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । हम सभी सुख चाहते हैं पर दुःख साथ में आता है । जैसे सिक्के का एक हिस्सा हम जेब में नहीं डाल सकते, दोनों हिस्से साथ में आएंगे । सूत्र यह है कि जब तक सुख की आकांक्षा है, दुःख से हमें मुक्ति नहीं मिलेगी क्योंकि सुख की चाहत होगी तो दुःख भी आएगा ।
617. जब हम सुखी होते हैं तो सोचते हैं कि दुःख का दर्शन नहीं हो पर सुख के साथ दुःख चिपका हुआ ही होता है ।
618. जैसे एक पानी का घड़ा जिसमें श्री चंद्रदेवजी का प्रतिबिंब दिखता है उसे तोड़ने पर प्रतिबिंब नष्ट हो सकता है पर मूल श्री चंद्रदेवजी पर कोई असर नहीं पड़ता । वैसे ही सुख-दुःख का हमारे भीतर के चेतन तत्व पर कोई असर नहीं पड़ता ।
619. जैसे राजा युद्ध में पराधीन हो गया, जैसे सिंह रोगी हो गया, जैसे हंस दलदल में फंस गया वैसे ही आत्मानंद जीव संसार में फंस गया ।
620. उत्तम मार्ग यही है कि प्रभु से प्रेम करके प्रभु भक्ति में डूब जाए - ऐसा प्रभु श्री कपिलजी कहते हैं ।
621. न मंद, न मध्यम पर तीव्र भक्ति का ही जगह-जगह प्रतिपादन प्रभु श्री शुकदेवजी ने श्रीमद् भागवतजी महापुराण में किया है ।
622. तीव्र भक्ति के कारण संसार से हमारा पिंड छूटता है । संसार से हम दूर नहीं हो सकते क्योंकि यह दलदल है और जितना दूर करने की हम कोशिश करते हैं उतना हम फंसते हैं । तीव्र भक्ति के कारण संसार स्वयं हमसे दूर हो जाता है । भक्ति के बल पर तीव्र प्रेम प्रभु से, ज्ञान से प्रभु को जानना और वैराग्य से सब सांसारिक विषयों को भूल जाना चाहिए ।
623. जब माया देखती है कि मुझे अनदेखा किया जा रहा है तो माया स्वयं हमारे जीवन से बोरिया बिस्तर उठाकर चली जाती है क्योंकि अब माया तीव्र भक्ति करने वाले का कुछ नहीं बिगाड़ सकती ।
624. जब तक संसार में, प्रकृति में हमने रस लिया तब तक हम उसमें फंसे हुए हैं । जब रस लेना बंद कर दिया तो हम उससे निकल जाते हैं ।
625. आत्म-साक्षात्कार युक्त भक्त का माया और संसार कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि अब वे उन्हें फंसाने वाले नहीं होते ।
626. जैसे गहरी निद्रा से हम जागते हैं तो फिर निद्रा के विषय यानी स्वप्न का विषय हमें प्रभावित नहीं करते वैसे ही संसार, प्रकृति और माया भक्त को प्रभावित नहीं करते ।
627. मन को कैसे साधा जाए, कैसे मन को प्रभु में लगाया जाए - इसके लिए प्रभु श्री कपिलजी ध्यान योग की बात करते हैं ।
628. संत श्री एकनाथजी कहते हैं कि प्रभु श्री कपिलजी का यह व्याख्यान रत्न की पेटी है । वे अब रत्न उछालने वाले हैं, जिसे जितना मिल जाए उसे अनमोल रत्न को पकड़ लेना चाहिए ।
629. दो शब्द आज खूब प्रचलित हैं - योग और ध्यान । पर यह आज का योग और ध्यान मूल से बहुत दूर हैं । इसमें मूल का थोड़ा ही तत्व है पर यह मूल से बहुत दूर हैं ।
630. सच्चे ध्यान में बाहर का सारा वातावरण हम पर प्रभाव नहीं कर सकता और सच्चा ध्यान हमारे आनंद की जागृति करता है ।
631. आध्यात्मिक शास्त्र शांति पर समाप्त नहीं होते । दुःख की निवृत्ति तो होनी ही चाहिए पर आनंद की अनुभूति भी होनी चाहिए । सिर्फ शांति नहीं, परमानंद की अनुभूति, प्रभु की अनुभूति तक वे हमें ले जाते हैं ।
632. श्री वेदजी में कहा गया है कि प्रभु कैसे हैं ? वे चतुर्भुज हैं, बांसुरी धारण करते हैं, धनुष धारण करते हैं, सब अलग-अलग समय करते हैं पर हर समय जो मूल प्रभु धारण करते हैं वह आनंद तत्व है ।
633. आनंद हमें ध्यान में नहीं मिलेगा, कभी नहीं मिलेगा । यह सिर्फ भगवती मीराबाई, गौरांग महाप्रभु जैसी भक्ति में ही संभव है ।
634. ध्यान में केवल शांति पर आनंद सिर्फ भक्ति से ही मिल सकता है यानी प्रभु के सगुण साकार रूप का अवलंबन लेना ही पड़ेगा ।
635. कुछ भी साधन कर लें पर अखंड आनंद की अनुभूति तो प्रभु की भक्ति से ही संभव है ।
636. ज्ञानियों के शिरोमणि श्री मधुसूदन सरस्वतीजी ने लिखा है कि प्रभु की भक्ति से बढ़कर किसी अन्य आनंद तत्व का मुझे पता नहीं है ।
637. प्रभु की भक्ति भक्त के पिछले जन्मों के गलत प्रारब्ध को भी नष्ट कर देती है ।
638. प्रभु की भक्ति करनी है तो आवश्यक कर्तव्यों का पहले व्यवस्थित कर लें, नहीं तो आवश्यक कार्य हमारे मन में उलझन पैदा करेंगे । अनावश्यक कर्तव्य से दूर रहें और आवश्यक कर्तव्य को पूरा करें तभी मन रिक्त होगा और प्रभु की भक्ति में लगेगा ।
639. आवश्यक कौन-सा कार्य है इसका विवेक हमें रखना चाहिए । हमें अनावश्यक कार्य के लिए "ना" बोलने की आदत डालनी चाहिए । जो हमारा कर्तव्य कार्य नहीं है उसकी जिम्मेदारी हमें नहीं लेनी चाहिए । अपने काम की जिम्मेदारी की सीमा निश्चित करनी चाहिए तो प्रभु के लिए रिक्त समय निकाल पाएंगे और भक्ति कर पाएंगे ।
640. संत कहते हैं जो हमारा कर्तव्य नहीं है उसकी अवहेलना करके हमें प्रभु की भक्ति करनी चाहिए जो हमारा मुख्य कर्तव्य है ।
641. भक्ति करने के लिए आज समय नहीं । चौबीस घंटे पहले भी थे और आज भी हैं पर हमारी वासना इतनी बढ़ गई, इतने संसार के झंझट हमसे चिपक गए, कमाई की तीव्रता इतनी बढ़ गई कि अब प्रभु के लिए भी समय नहीं है । बारह महीने में रोज दिन-रात और चाहिए और चाहिए । इस असंतुलन के कारण हम प्रभु की भक्ति हेतु कभी समय नहीं निकल पाते । कभी मन से पूछना चाहिए इतना मिलने पर भी वह अतृप्त क्यों है ? पचास वर्षों से दौड़ रहे हैं, बीस वर्ष से दौड़ना शुरू किया और आज सत्तर के हो गए और दौड़ ही रहे हैं । कहाँ तक दौड़ेंगे ? कितना दौड़ेंगे ? कोई अपनी आवश्यकता के कारण दौड़ता है तो उसमें आपत्ति नहीं पर आज हम अपनी आवश्यकता पूर्ण होने के बाद भी दौड़ते हैं । दूसरा आगे नहीं निकल जाए इसलिए आज हम दौड़ते रहते हैं । दूसरे का सुख हमारे दुःख का कारण बनता है ।
642. शास्त्र कहते हैं कि बच्चे छोटे होते हैं तो पत्नी अपनी होती है पर बच्चे बड़े हो जाते हैं तो पत्नी उनके साथ हो जाती है ।
643. अपनी आवश्यकता हेतु कार्य करना चाहिए पर दिखावा और प्रतिस्पर्धा हेतु कार्य करना गलत है ।
644. कितना भी दौड़ेंगे फिर भी कमाई में अपने से आगे बहुत सारे लोग खड़े मिलेंगे । हम क्यों अपना जीवन इस बेकार की दौड़ में बलि चढ़ाते हैं । यह आसुरी प्रवृत्ति के लक्षण हैं ।
645. व्यावसाय करना, कमाना चाहिए पर अपने साधन हेतु जितना समय निर्धारित किया है यानी प्रभु के लिए तीन घंटा निकालना है तो इसमें किसी भी कारण से कटौती नहीं करनी चाहिए । प्रभु के समय के बाद बचे हुए समय में जो भी प्राप्त हो जाए उसमें संतोष करना चाहिए ।
646. संतोष धन आएगा तो सभी धन धूलि समान हमें लगेगा ।
647. सद्गुरु का वरण करते ही साधन की दिशा तय होती है ।
648. भक्ति ही शास्त्रों के रहस्य को खोलता है । व्याकरण और शब्दकोश के बल पर श्रीग्रंथ नहीं खुलते ।
649. शास्त्रों के रहस्य को एकमात्र भक्ति से ही खोला जा सकता है । यह सिद्धांत है ।
650. हम दो घंटे भक्ति करते हैं और चार घंटे मोबाइल देखते हैं तो हमारा साधन चला गया । चित्त को गंदा बनाने वाले विषयों को दूर रखना अनिवार्य है नहीं तो गंदगी चित्त से चिपक जाएगी । उत्तेजना वाले दृश्य हम देखना बंद नहीं करेंगे तो हमारा साधन सफल नहीं होगा । यह तो ऐसा ही हुआ कि रोज थाली में एक ओर प्रसाद और दूसरी तरफ गटर का पानी हमने ले लिया । थोड़ी-सी अशुद्धि हमारे जीवन को बिगाड़ देती है । जिसमें मदिरा मिल गई उस पात्र को शुद्ध जल भी पवित्र नहीं कर सकता ।
651. मन का रूपांतरण करके मन प्रभु में लीन करना हो तो इंद्रियों को उत्तेजित करने वाले दृश्य से दूर रहना पड़ेगा ।
652. संसार के रस को भीतर से सुखाना चाहिए । शादी में जाना है तो वहाँ जाकर मौज-मस्ती करना गलत, सिर्फ औपचारिकता करनी ठीक है ।
653. संसार के बंधन में बंधने की अपेक्षा उस बंधन से बाहर निकलना चाहिए । हमें फंसना है या छूटना है, यह पहले तय करना चाहिए ।
654. आहार पवित्र हो और योग्य मात्रा में हो तो सबसे सही है । ज्यादा उपवास भी अनावश्यक है और ज्यादा भोजन भी गलत है । खाने पीने का पूरा विचार करना चाहिए । हम थाली में जो आ जाता है वह खा लेते हैं और भूल जाते हैं, जो गलत है । विचार करके पवित्र और योग्य मात्रा में आहार लेना चाहिए ।
655. आहार को निर्धारित मात्रा में लेना चाहिए । बहुत अल्प आहार स्मृति का नाश करती है । ज्यादा आहार इंद्रियों में आलस्य लाती है ।
656. अन्न को भी ब्रह्म माना गया है, यह शास्त्रयुक्त मत है ।
657. आयुर्वेद का सिद्धांत है कि जितनी भूख है उससे आधा भोजन लेना चाहिए । आधा पेट भोजन से भरना चाहिए, चौथाई पेट जल से भरना चाहिए और चौथाई पेट वायु संचार हेतु खाली रखना आवश्यक है ।
658. आहार का सही-सही नियंत्रण करने वाला रोग से मुक्त रहता है और भक्ति के लिए उपयुक्त बना रहता है ।
659. मनुष्य शरीर आदतों के अधीन होता है । हमें देखना चाहिए कि गलत आदतों को हमें दूर करना है और अच्छी आदतों को हमें अपने जीवन में शामिल करना है ।
660. आज हम वातानुकूलित माहौल में ध्यान करने बैठते हैं । ऐसी आदत हमने लगा ली है, जो गलत है ।
661. जिस आदत में हमें सहूलियत ज्यादा है उससे छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए । नई बुरी आदतें नहीं लगानी चाहिए । पुरानी बुरी आदतें जो छोड़ सकते हैं उसे छोड़ देना चाहिए । जो नहीं छोड़ पाए उसे रखें पर साधन कभी नहीं छोड़ना चाहिए । ऐसा नहीं करूँगा या तो साधन छूट जाएगा, ऐसी आदत कभी नहीं त्यागनी चाहिए क्योंकि साधन सर्वोपरि होता है ।
662. सत यानी प्रभु तत्व के दर्शन करवाकर सत तत्व से मिलाने वाला सद्गुरु होता है ।
663. एक अच्छा पौधा उगा जो सुगंधी देने वाला है पर उसका पोषण करना आवश्यक है नहीं तो जानवर खा जाएंगे । वैसे ही हमारे साधन मार्ग में प्रभु प्राप्ति तक हमें सचेत रहना पड़ता है कि कोई हमारे साधन को खत्म नहीं कर दे ।
664. हम ही हैं आनंद स्वरूप और वह स्वरूप पाने हेतु जीवन में बाधाएं भी बहुत हैं पर उन्हें पार करना जरूरी है ।
665. आज घर में किसी भी बात की कमी नहीं फिर भी शांति एकदम नहीं है ।
666. घर में सब कुछ ठंडा है, ठंडा माहौल है, ठंडा खाने हेतु है पर फिर भी दिमाग गर्म रहता है ।
667. अपने घर की, अपने आसपास की शांति हेतु सबसे पहले हमें अपने व्यवहार बदलने की जरूरत है ।
668. दूसरे की गलती देखकर हम सीखें - यह जरूरी । खुद गलती करें फिर सीखे - यह गलत है ।
669. दुनिया में बहुत कुछ ग्राही यानी ग्रहण करने योग्य है और बहुत कुछ त्याज्य यानी त्यागने योग्य है ।
670. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने आकाश से सीखा कि जब आकाश में रंग फेंका हरा, काला, नीला पर वह हवा में उड़ गया और रंग आकाश में टिका नहीं । आकाश रंगों से निर्लेप है, अछूता है । वैसे ही हर घटना हमारे पर परिणाम नहीं करे, हम भी निर्लेप और अछूते रहे । हमारी जागृत हुई भावना हम पर परिणाम नहीं करे । किसी बादल, रंगों का स्थाई प्रभाव आकाश पर कभी नहीं होता । कुछ टिकता नहीं आकाश में, वैसे ही हमारे भीतर भी कुछ नहीं टिके । अगर टिकेगा तो वह सड़ेगा और हमारे जीवन को विकृत बनाएगा ।
671. हम हमारे भीतर जमा करके रखते हैं । अपने अंतःकरण को समस्त लिप्तता से रहित रखना चाहिए ।
672. हम बुढ़ापे के कारण बूढ़े नहीं होते, मन को निर्लेप नहीं रख पाने के कारण अपनी क्षमता का ह्रास करते हैं और इस कारण हम बुढ़ापे की दलदल में पहले ही आ जाते हैं ।
673. ध्यान हेतु एकांत में अभ्यास करना चाहिए ।
674. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी कहते हैं कि निर्लेप रहने की अवस्था जीवन भर प्राप्त करनी चाहिए । ऐसा संकेत वे देते हैं कि कोई चीज कभी भी हम पर कोई परिणाम नहीं कर सके । उन्होंने जल तत्वों से सीखा कि स्वभाव से जल स्वच्छ होता है । हमें भी अपने अंतःकरण को स्वच्छ रखना चाहिए । जल में हम बाहरी तत्व डालते हैं, अशुद्धि डालते हैं तो वह अशुद्ध हो जाता है । जल जोड़ने वाला है । जैसे आटे के कण को जल जोड़ देता है । उत्तम साधक का जीवन सबको प्रभु से जोड़ने वाला होना चाहिए, सबको लगे कि हम साधक से जुड़े हैं । साधक का सबसे प्रेम होना चाहिए । प्रेम से साधक सबको प्रभु से जोड़ता है जो उसके समीप आते हैं । संसार में कुछ लोग जोड़ने वाले साधु स्वभाव के होते हैं । सूत्र यह है कि साधक प्रेम से जोड़ने वाला होना चाहिए । एक दूसरे की प्रकृति से भिन्न लोग भी साधक से जुड़ जाते हैं क्योंकि लोगों को उनसे जुड़ना अच्छा लगता है ।
675. मनुष्य वह जो अपने गलत व्यवहार को बदलने की क्षमता रखता है ।
676. जल में मधुरता भी होती है और जब हमें खाते वक्त तीखी मिर्ची लगती है तो पानी का घूंट लेते हैं तो जल हमारी जलन भी शांत करता है । वैसे ही संत के सामने लोग जलते हुए आएं पर शांत होकर जाएं । संत से बात करके लोगों का मन शांत हो जाए, हल्का हो जाए । लोग तनाव युक्त आते हैं और तनाव मुक्त होकर जाते हैं । यह संत के जीवन का माधुर्य है ।
677. सब लोगों को कुछ देना पड़े इसकी आवश्यकता नहीं पर संसार के हर व्यक्ति की एक मांग है - प्रेम । प्रेम पाना सबको अच्छा लगता है ।
678. उत्तम संत तीर्थ रूप होते हैं । एक तीर्थ जहाँ हम जाते हैं उनको स्थाई तीर्थ कहते हैं । एक तीर्थ जो चलते-फिरते होते हैं जो संत के रूप में होते हैं । तीर्थ का सच्चा अर्थ है जो पवित्र करने वाला हो और हमारे दोषों का नाश करने वाला हो ।
679. हम केवल डुबकी लगाकर भगवती गंगा माता से पवित्र नहीं होते, हम सिर्फ भगवती गंगा माता का दर्शन भाव से करने पर उससे ज्यादा पवित्र हो जाते हैं । उन आँखों से बड़ा किसी का फल ही क्या है जो भगवती गंगा माता का पवित्र दर्शन करती हैं ।
680. आँखों से प्रभु विग्रह को चखना चाहिए जैसे जिह्वा से हम मधुर पदार्थ चखते हैं ।
681. कानों से भगवती गंगा माता की लहर की धुन को सुनना चाहिए क्योंकि वे श्री वेदजी की ध्वनि के बराबर हैं ।
682. एक समय के सबसे अच्छे संन्यासी श्री मधुसूदन सरस्वतीजी और सबसे अच्छे गृहस्थ श्री वाचस्पति मिश्राजी एक ही समय में काशी में हुए थे । श्री मिश्राजी संसारी प्रपंच में नहीं पड़े, सिर्फ प्रभु के बारे में वेदांत लिखते रहे । वे वेदांत चिंतन में इतने डूबे रहते थे कि बुढ़ापे में पत्नी का नाम तक भूल गए । विद्यावानों के शिरोमणि रहे । उनकी पत्नी भानुमति की एक इच्छा थी कि भगवती गंगा माता के दर्शन पैदल चलकर करना चाहिए । श्री मिश्राजी ने भगवती गंगा माता के प्रवाह को दूर से देखा और नेत्र बहने लगे और कहा कि माँ कौन कहता है कि आपके स्नान से मुक्ति है, आपके दर्शन मात्र से मुक्ति है और यह अमर वाक्य लिख दिया । भगवती गंगा माता के दर्शन पाकर वहीं उनकी मुक्ति हो गई और वे गतप्राण हो गए और मोक्ष को प्राप्त हो गए ।
683. संत भी ऐसा होना चाहिए जिनका दूसरों को किया स्पर्श उसका उद्धार कर दे, पवित्रता से भर दे । ऐसे संत हुए हैं जिनका सानिध्य हमें पवित्रता देता है । उनके नाम से हमारे भाव पवित्र हो जाते हैं ।
684. व्यासपीठ पर बैठकर प्रभु के अलावा, प्रभु के संतों और भक्तों का नाम भी लेना चाहिए जो प्रभु के लिए जिए हैं । अन्य किसी संसारी का नाम नहीं लेना चाहिए ।
685. संत श्री एकनाथजी कहते हैं कि प्रभु नाम की महिमा सबसे बड़ी है पर भक्त का नाम प्रभु भी प्रेम से लेते हैं इसलिए उसको महिमा प्रभु प्रदान करते हैं ।
686. एक संत जिन्होंने प्रभु श्री पंढरीनाथजी की सेवा मंदिर में पुजारी के रूप में की और श्रीमद् भागवतजी महापुराण का वाचन किया और जीवन में कुछ भी नहीं किया । एक दिन सुबह उन्हें मंदिर खोलते समय संकीर्तन सुनाई दिया । उन्होंने देखा तो कोई नहीं दिखा पर जितना प्रभु विग्रह के पास गए उतना संकीर्तन बढ़ता गया । तब उन्होंने जाना कि प्रभु अपने भक्तों के नाम लेकर (ज्ञानेश्वर-तुकाराम) का उच्चारण कर संकीर्तन कर रहे हैं ।
687. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने श्री अग्निदेवजी के निरीक्षण से तेज सीखा । उत्तम साधक को भी अपनी साधना का तेज बरकरार रखना चाहिए, उसे कभी क्षीण नहीं होने देना चाहिए । संत का मूल्यांकन उसके तेज से होता है । आज सबका मूल्यांकन संपत्ति से होता है, जो गलत है । सेठों का मूल्यांकन संपत्ति से होता है पर जिन संत के पास कुछ भी नहीं बस एक प्रभु का एक अकिंचनप्रिय नाम है, वे प्रभु को सबसे प्रिय होते हैं । हाल के समय में स्वामी श्री रामसुखदासजी इसके पर्याय हैं । आज के संतों के पास बहुत कुछ होता है पर सच्ची साधुता की कसौटी क्या है ? तेज, तप, वैराग्य और भक्ति होनी चाहिए । ऐसे संत हुए जो जीवन भर गाड़ी में नहीं बैठे, गद्दे पर नहीं सोए । साधु अपने वैराग्य से, साधना से, तप की अग्नि को निरंतर बनाए रखता है । अग्नि की एक विशेषता कि वह लोगों के काम आती है जब तक उसे मर्यादा में रखा जाए । वैसे ही संत सबके काम आते है जब लोग मर्यादा में रखें और उनके साथ खिलवाड़ नहीं करें । अगर अग्नि कुछ नहीं जलाती है तो अग्नि का तेज कम हो जाता है, तेज बढ़ने पर लोहा भी जल जाता है । वैसे ही संतों को दूसरों के अवगुणों को जलाना चाहिए और उन्हें सुधारना चाहिए ।
688. देने वाले के दोष से भिक्षा का दोष होता है । स्वाद का दोष, किसने बनाया, किसने किसको बनाते हुए देखा, उसके बाद उस पदार्थ का प्रभु को भोग लगा, किस तरह किसने स्पर्श किया । वह जिससे बना है वह धन शुद्ध है क्या ? साधु को इतना तप करना चाहिए कि भिक्षा के दोष के साथ भी भिक्षा लिया तो भी प्रभु नाम के बल पर वह उसे स्वाहा कर लेता है । साधु अगर भिक्षा के दोष का विचार करेगा तो भूखा ही रह जाएगा । इसलिए दोष का विचार किए बिना जो मिले भिक्षा में ले ले और अपने तप से उसे स्वाहा करने का समर्थ रखें ।
689. धार्मिक अनुष्ठान से दोषों का क्षय होता है ।
690. प्रभु आराधना से जीवन को इतना अग्निमय बना लें कि हमारे पास आते ही सारे दोष जल जाएं ।
691. एक संत के नियम बड़े कड़े थे, किसी तीर्थ में लोगों ने उनके चरण स्पर्श की इच्छा की पर वे नहीं चाहते थे कि कोई उनके चरण स्पर्श करें । तो उन्होंने कहा चने ले आओ और उनके पैर पर चढ़ाओ । वे चने पैर पर चढ़ाते ही स्वतः भुन गए । लोगों ने फिर उनके चरणस्पर्श का विचार ही त्याग दिया ।
692. संतों का जीवन हमारे जीवन को प्रभावित किए बिना नहीं रहता ।
693. एक अग्निकुंड में अग्नि चारों तरफ से एक जैसी नहीं होती । कहीं स्पष्ट अग्नि, कहीं ज्वाला, कहीं शांत अग्नि पर सभी आहुति को स्वाहा करती है । वैसे ही उत्तम साधु की सेवा हमारे पापों को स्वाहा करती है । तप वाला साधु होना चाहिए, भंडारे वाला साधु नहीं होना चाहिए ।
694. गृहस्थ होकर वर्षभर में यज्ञ नहीं किया तो दोष लगता है । यज्ञ और हवन दोषों का नाश करता है ।
695. साधु वह है जिसने कम-से-कम 1200 ओंकार का जाप रोजाना किया हो । नहीं तो नित्य वह जो ग्रहण करेगा उसका पाप उसे ही लगेगा ।
696. साधु के जठराग्नि में इतना तेज होना चाहिए कि वह भिक्षा देने वाले गृहस्थ के पापों को भी नष्ट कर दे ।
697. अग्नि का कोई आकार नहीं । गोलाकार में आग लगे तो गोलाकार दिखेगा । लंबी वस्तु में आग लगे तो अग्नि लंबी लगेगी । प्रभु को भी जिस आकार में भक्त स्थिर कर देता है प्रभु वैसे ही दिखने लग जाते हैं ।
698. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने श्री चंद्रदेवजी से सीखा कि कला-कला में बढ़ते हैं, पूर्णमासी तक पूर्ण गोल हो जाते हैं, फिर घटते जाते हैं, क्षीण-क्षीण होते जाते हैं और अमावस्या तक गायब हो जाते हैं । जैसे श्री चंद्रदेवजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, छाया के कारण पृथ्वी से ऐसा प्रतीत होता है कि श्री चंद्रदेवजी बढ़ और घट रहे हैं वैसे ही हमारे शरीर के बढ़ने और कम होने से हमारे जीवात्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।
699. जैसे एक दीप जलता है तो प्रतिक्षण वह वायु के कारण बदलता है पर ज्योति एक ही लगती है । ज्योति नित्य बदलती है पर हमें लगती है कि वह एक ही है वैसे ही संसार नित्य बदलता है पर हमें एक जैसा प्रतीत होता है ।
700. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने प्रभु श्री सूर्यनारायणजी से तेज सीखा । तेज से सागर के जल को सुखाया, भाप बनकर ऊपर लिया, मेघ बनाकर बरसा दिया । प्रभु श्री सूर्यनारायणजी ने ऐसा किया, पानी लिया, फिर बरसा दिया, पानी का स्पर्श प्रभु श्री सूर्यनारायणजी को भी नहीं हुआ । वैसे ही मैं द्रष्टा बनकर जो सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से कार्य मेरे द्वारा हो रहे हैं उसे मैं देखता रहूँ, उसमें फंसू नहीं । जब-जब हमारे भीतर जैसी वृत्ति का उदय हुआ उस अनुरूप कार्य किया पर हम किसी भी गुण में फंसे नहीं । किसी भी गुण को मेरी इंद्रियां ग्रहण करती है पर उसमें फंसती नहीं है । मैं उनसे भिन्न हूँ, मैं सिर्फ उसका साक्षी और दृष्टा मात्र हूँ । सारे दोष मेरी इंद्रियां, मन और बुद्धि में आए फिर भी मेरे अंतःकरण से उसका कोई लेना-देना नहीं है । जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी जल से अलिप्त रहते हैं वैसे ही हमें गुण-दोषों से अलिप्त रहना चाहिए ।
701. जैसे रस्सी साँप के रूप में दिखी तो डर लगता है पर प्रकाश किया तो रस्सी का पता चल जाता है । अब तो वह पड़ी भी रहे तो भी डर चला गया । वैसे ही हमारे अंतरात्मा का डर हमारे गुण-दोष के कारण होता है ।
702. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने कबूतर से सीखा जिसको परमात्मा प्राप्ति का लक्ष्य बनाना है उसको सबसे प्रेम करने की आदत डालनी चाहिए पर अति प्रेम किसी से कभी भी नहीं करना चाहिए ।
703. संसार से अति प्रेम किसी से भी करना बहुत गलत है क्योंकि सबसे सर्वाधिक प्रेम हमारा प्रभु के साथ ही होना चाहिए । एक संत एक उदाहरण देकर समझाते थे कि एक व्यक्ति एक रमणीय स्थान पर गया । स्थान अच्छा लगा इसलिए कुछ दिन वहाँ निवास किया । वहाँ एक पेड़ पर एक कबूतर का जोड़ा बैठा था । कबूतर ने वही घोसला बना लिया था । पेड़ पर घोसले में शय्या बनाई और फिर कबूतरी गर्भवती हुई । अंडे दिए तो फिर कबूतर कबूतरी की सेवा करता है जैसे शराबी नशा में नाचता है वैसे ही वह अति प्रेम में नाचने लग गया ।
704. जिसे ध्यान के माध्यम से प्रभु का चिंतन करना है उसे ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ेगा ।
705. जीवन का मुख्य लक्ष्य प्रभु की प्राप्ति ही होनी चाहिए ।
706. शक्ति का नियंत्रण करके उसे ऊर्जा रूप में हमारे साधन में लगाना चाहिए ।
707. संतों और भक्तों का जीवन ऐसा है जिनका नाम लेने से ही श्रद्धा से हमारे मस्तक झुक जाते हैं, मन प्रभु भक्ति से भर जाता है और पवित्र हो जाता है ।
708. हिंदी के सभी अध्यात्म के शब्द अंग्रेजी में उपलब्ध नहीं क्योंकि अंग्रेजी ने उन अध्यात्म के विषयों की कल्पना ही नहीं करी, वहाँ तक के शब्द ही नहीं बनाए जहाँ तक संस्कृत और हिंदी की पहुँच है ।
709. जिसके जीवन में पहले से ही व्यापक ध्येय यानी लक्ष्य हो गया उसके लिए अपनी इंद्रियों को ब्रह्मचर्य से युक्त कर संयम में रखकर शक्तियों को प्रभु में केंद्रित करना होता है ।
710. ब्रह्मचर्य की व्याख्या ब्रह्मचर्य आश्रम के लिए अलग है और गृहस्थ के लिए ब्रह्मचर्य के नियम अलग है ।
711. शौचाचार्य यानी शुद्ध रहने का अभ्यास जीवन में करना चाहिए ।
712. प्रभु प्राप्ति के लिए देहातीत होना पड़ता है यानी देह का मोह छोड़ना होता है ।
713. साधन के रूप में देह की रक्षा करना ठीक है । बस इतना ही ठीक है पर इससे आगे अगर देह हेतु मोह बढ़ेगा तो प्रभु से उतना हमारा ध्यान हटेगा ।
714. स्वाध्याय यानी रोज कुछ-न-कुछ अच्छा पढ़ना चाहिए । एक सद्ग्रंथ अगर नित्य वाचन के लिए नहीं होगा तो प्रभु हेतु हृदय में भाव टिकेंगे नहीं ।
715. स्वाध्याय का दूसरा अर्थ है कि अपने इष्ट के मंत्र का जाप करना । जितना जप उतनी इष्ट से नजदीकी हमारी बढ़ती जाएगी । मंत्र और नाम जप की महिमा अपार है ।
716. मंत्र जाप करने वाला ध्यान भी अच्छा करेगा ।
717. रोजाना प्रभु का पूजन जरूर करना चाहिए । सगुण साकार श्रीविग्रह की पूजा करना अनिवार्य होना चाहिए ।
718. पूजा सामान्य बात नहीं है क्योंकि वह हमें प्रभु के समीप पहुँचाती है ।
719. खाली अन्य विषय का ध्यान किया तो प्रभु के सगुण साकार रूप से हमारा मन हट जाएगा । कल्याण प्रभु के सगुण साकार रूप का ध्यान करने में ही है ।
720. स्वामी श्री विवेकानंदजी पहले मूर्ति पूजा नहीं मानते थे पर उन्हें ऐसे गुरु मिले संत श्री रामकृष्ण परमहंसजी के रूप में जिन्होंने अपना पूरा परमार्थ भगवती काली माता के मूर्ति पूजा के बल पर किया । इसलिए स्वामी श्री विवेकानंदजी भी बाद में इसे पूर्ण रूप से मानने लग गए ।
721. प्रभु तक पहुँचने हेतु सबसे श्रेष्ठ आलंबन सगुण साकार रूप की पूजा ही है ।
722. एकउपचार पूजा में कुछ नहीं किया पर प्रभु के श्रीविग्रह को आठों याम प्रणाम किया तो यह एकउपचार पूजा कहलाती है।
723. जीवन में मौन जरूरी क्योंकि हमारी शक्ति का बहुत ह्रास बोलने से होता है । इस शक्ति को साधन हेतु बचाना जरूरी है इसलिए मौन की बहुत जरूरत है ।
724. मेरे मुँह से एक भी अनावश्यक शब्द बाहर कभी नहीं जाए, यही सही मौन है । एक दिन का मौन लिया तो उस दिन कुछ जरूरी बोलना हो तो हम तड़पेंगे । चाह कर भी मौन के कारण बात नहीं करते हैं तो हम उग्र हो जाते हैं और हमारी शांति का नाश होता है । इसलिए नित्य मौन यानी दो शब्दों की जरूरत है तो दो शब्द ही बोलना, यह श्रेष्ठ है । यह श्रेष्ठ मौन की व्याख्या है । सदैव उतना बोलना जितना अल्प जरूरत हो । उतनी बात ही करनी जितनी करना अनिवार्य हो ।
725. आसन जय करना चाहिए । तन पहले स्थिर करना चाहिए एक आसन में दो-तीन घंटे बैठ सके और फिर मन को स्थिर करना चाहिए । जैसे ही बैठने में स्थिरता आएगी वैसे ही प्राणों में स्थिरता भी आएगी, यह सिद्धांत है ।
726. प्राण जय यानी प्राणायाम के अभ्यास को करना चाहिए । प्राणायाम की महिमा अपार है । प्राणायाम की अपेक्षा कभी भी नहीं करनी चाहिए । मन और प्राण का गहरा संबंध है । मन स्थिर होगा तो प्राण भी स्थिर होंगे ।
727. पूजा के प्रतीक को पकड़ने से उसकी जिज्ञासा बढ़ेगी और शास्त्रों में उसकी खोज आरंभ होगी । जैसे प्राणायाम का उच्चारण कर पूजा में नाक पकड़ने की परंपरा है, नाक पकड़ना पूजा के दौरान प्राणायाम करने का प्रतीक है । ऐसी जिज्ञासा होनी चाहिए कि नाक ही क्यों और उसकी खोज के लिए शास्त्रों को पढ़ना चाहिए ।
728. जो विधि अनुसार 30 मिनट की पूजा करता है उसे पूजा से बहुत बड़ा लाभ मिलता है ।
729. मन और प्राण की जोड़ी है । दोनों एक तरह ही चलते हैं । मन अस्थिर है तो प्राण भी अस्थिर और मन स्थिर है तो प्राण भी स्थिर है । इसलिए साधन मार्ग पर दोनों को स्थिर करने का प्रयास करना चाहिए ।
730. प्राण के माध्यम से मन स्थिर करना, यह हठयोगी है । मन के माध्यम से प्राण स्थिर करना, यह राजयोग है ।
731. पन्द्रह से बीस बार अनुलोम-विलोम करना, बस यही काफी है रोजाना पूजा से पहले प्राणायाम हेतु ।
732. पहाड़ी पर चढ़ना हो तो धीमे-धीमे चढ़ना होता है तब वह थकता नहीं और ऊपर तक पहाड़ पर चढ़ जाता है । जो तेजी से पहले चढ़ता है वह बीच में थक जाता है । इसी तरह साधन धीरे-धीरे करने वाला सफल होता है, यह सिद्धांत है ।
733. साधन के लिए आवश्यक और योग्य समय जीवन में देना ही होता है, इसके अलावा कोई उपाय और विकल्प नहीं ।
734. योग शास्त्र का अंतिम लक्ष्य प्रभु प्राप्ति है पर वहाँ तक पहुँचाते-पहुँचाते योग शास्त्र जीवन को रमणीय बना देता है ।
735. स्वामी श्री विवेकानंदजी ने एक बार विदेश में देखा कि कुछ लोग अंडे पानी में फेंक रहे हैं और पिस्तौल से उन अंडों को गोली मार रहे हैं पर एक भी अंडा नहीं फूटा । स्वामीजी हंस दिए । उन लोगों ने कहा कि आप करो । स्वामीजी ने जीवन ने पहली बार पिस्तौल ली और 1-2-3 अंडे फोड़ दिए । उन लोगों ने रहस्य पूछा तो स्वामीजी बोले भारत में मन जय और प्राण जय सिखाया जाता है जिससे चित्त एकाग्र होता है । चित्त एकाग्र हो तो सब विषय ठीक से होते हैं, यह सूत्र है ।
736. प्रत्याहार विषयों से करना है, हृदय तक करना है और मन से करना है । दृश्य से मन को पीछे मोड़कर, अपने मन को विषय से निकाल कर, हृदय को प्रभु तक पहुँचाना है । यह अभ्यास करना चाहिए । एक-एक इंद्रियों का प्रत्याहार बढ़े । गंध है, दृश्य है, शब्द है पर उसे अपने अंदर नहीं लेना, यही प्रत्याहार । जैसे हमें दिल्ली से हरिद्वार जाना है तो जैसे ही दिल्ली से निकले दिल्ली को भूल जाते हैं । विषय जिनको हम भूलना चाहते हैं उनका ध्यान त्याग देना चाहिए ।
737. हम वहाँ जा पहुँचते हैं जहाँ हमारा मन एकाग्र होता है । यह भागवत सिद्धांत है । इसलिए ध्यान करना तो प्रभु के साक्षात सगुण विग्रह का ही करना चाहिए तो ही प्रभु तक हम पहुँच पाएंगे । आज के युग में पता नहीं कहाँ-कहाँ ध्यान करवाते हैं जिसका परमार्थ में कोई लाभ नहीं । मात्र हमारी चंचलता कम हो सकती है । हमारी एकाग्रता बढ़ सकती है, इससे ज्यादा ऐसे ध्यान से कुछ हासिल होने वाला नहीं है ।
738. अगर चंचलता से भरे मन को स्थिर करना है तो ध्यान के माध्यम से धीरे-धीरे करना पड़ेगा । जैसे गाड़ी जो रफ्तार में चल रही है उसे धीमी करके ही रोकना पड़ता है, एक बार में ब्रेक लगाया तो दुर्घटना होने का डर होता है ।
739. घर में वहाँ ध्यान करना चाहिए जब जहाँ कोई आवाज नहीं, धुआँ नहीं, कीटक नहीं होने की संभावना है ।
740. प्रभु ने जो दिया है उसका सदुपयोग करना चाहिए, जो नहीं दिया है उसकी शिकायत कभी नहीं करनी चाहिए ।
741. ध्यान हेतु सिद्ध होकर बैठना चाहिए यानी मेरुदंड सीधा रहना चाहिए ।
742. प्राणायाम से आरोग्य अच्छा होता है, नाड़ी शुद्धि अच्छी होती है । प्राचीन ऋषि प्राणायाम के बल पर दीर्घायु होते थे ।
743. हम श्वास लेना ही नहीं जानते, गहरी लंबी श्वास नहीं लेते, पेट तक श्वास भरते नहीं । हम हल्की-हल्की श्वासें लेते हैं जो बहुत बीमारियों की जड़ होती है ।
744. कुछ समय के लिए मन को एक स्थान पर बांधकर रखना, इसे धारणा कहते हैं । सबसे श्रेष्ठ प्रभु विग्रह में मन को बांधकर रखना चाहिए । मन प्रभु विग्रह में लगा रहे । प्रभु विग्रह के ऊपर-नीचे कहीं भी मन घूमे पर बाहर नहीं निकले ।
745. प्रभु के सद्गुणों की धारणा करनी चाहिए । यह हमारे भीतर के दोषों का नाश कर हमारे सद्गुणों को बढ़ाता है ।
746. प्रभु का ध्यान अपने हृदय पटल पर करना चाहिए । प्रभु का जो रूप प्रिय हो उसका ध्यान करना चाहिए । श्रीमद् भागवतजी महापुराण संकीर्ण श्रीग्रंथ नहीं क्योंकि वहाँ प्रभु के सभी रूपों का ध्यान करने की पूर्णता छूट दी गई है ।
747. प्रभु का एक रूप नहीं, अनेक रूप हैं । संतों ने एक-एक रूप में विश्वास रखा और अनेक रूपों को सहर्ष स्वीकार किया ।
748. भाव रूप का अर्थ है भक्ति के भाव के अनुसार प्रभु उस रूप को धारण करते हैं उस भक्त का कल्याण करने के लिए ।
749. सिर्फ भारतवर्ष के सनातन धर्म में पूरी छूट है प्रभु रूप की । अन्य कहीं नहीं है । इसलिए प्रभु के इतने रूप सिर्फ भारतवर्ष में हैं, अन्य कहीं नहीं हैं ।
750. सनातन धर्म और भारतवर्ष कहता है सबका उद्धार हो, अन्य धर्म कहते हैं कि हमारे अनुयायी का ही उद्धार हो ।
751. भारतवर्ष का सनातन धर्म सभी देश, धर्म और पंथ का आदर करना सिखाता है ।
752. श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवद् गीताजी, श्री रामचरितमानसजी की तुलना विश्व के किसी श्रीग्रंथ से संभव नहीं है ।
753. भारतवर्ष के ऋषि और संत संसार में श्रेष्ठ हैं, यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए ।
754. जिस व्यक्ति को अपनी परंपरा के गौरव का भान नहीं, वह गिरा हुआ व्यक्ति है ।
755. स्वामी श्री विवेकानंदजी ने अपने ऊपर आघात हुआ तो मौन रहे पर अपने देश और संस्कृति पर आघात करने वालों के देश में जाकर उन्हें सम्मोहित कर दिया ।
756. भारतवर्ष के धर्म की ऊँचाइयों को कोई भी नहीं छू सकता ।
757. श्रीमद् भागवतजी महापुराण विशालता का धनी श्रीग्रंथ है । कोई भी प्रभु रूप को चुनें और इस चर्चा में मत पड़े कि प्रभु कैसे हैं । हम भक्ति के द्वारा प्रभु को जैसा चाहते हैं प्रभु वैसे ही रूप हमारे समक्ष धारण करके उपस्थित हो जाते हैं ।
758. ध्यान हेतु यह ध्यान करना चाहिए कि प्रभु सर्वाधिक सुंदर हैं । जीव प्रभु के जिस रूप का ध्यान करना चाहता है वह उसे सबसे प्रिय लगे, उससे सुंदर कुछ भी नहीं लगे, कल्पना भी हमारी नहीं जाए उससे आगे । तभी उस रूप में मन लगेगा । सिद्धांत यह है कि प्रभु के सौंदर्य की तरफ जीव का मन स्वतः ही खिंचा जाता है और आकर्षित होता है ।
759. ध्यान करते वक्त यह ध्यान करना चाहिए कि मेरे प्रभु सर्वाधिक शक्तिमान है, सबसे ज्यादा प्रभावशाली हैं और उनसे शक्तिशाली ब्रहमांड में कोई भी नहीं है ।
760. प्रभु का ध्यान करते वक्त जड़ मूर्ति का ध्यान नहीं करना चाहिए । चाहे ध्यान करें, चाहे पूजा करें, चाहे दर्शन करें हमें चेतन तत्व का ध्यान करना चाहिए । हमें मूर्ति का जड़ नहीं दिखना चाहिए, प्रभु साक्षात उसमें दिखने चाहिए । सूत्र यह है कि जड़ का ध्यान करेंगे तो जड़ता आएगी और चेतन का ध्यान करेंगे तो चेतनता आएगी । हमारा मन जिनका चिंतन करेगा उनमें रम जाएगा, यह सिद्धांत है । इसलिए चेतन का दर्शन, चिंतन और ध्यान करना चाहिए ।
761. चेतन का ध्यान करने से चेतन से ही जवाब मिलता है, यह श्री योग वशिष्ठजी का सिद्धांत है ।
762. संतों को कभी प्रभु प्रतिमा नहीं दिखी । भगवती मीराबाई को हमेशा चेतन प्रभु दिखे, उनके श्री गिरधर गोपाल साक्षात दिखे । इसलिए किसी पद में नहीं लिखा कि मूर्ति है ।
763. प्रभु प्रतिमा के आंसू निकलते हैं, प्रतिमा बोलती है, प्रतिमा चलती है - यह संतों ने अनुभव किया है ।
764. संत रामकृष्ण परमहंसजी को किसी ने कहा कि यह माता की प्रतिमा है तो संत ने उन्हें प्रेम से थप्पड़ लगाई और कहा कि यह माता की प्रतिमा नहीं साक्षात यह मेरी माँ है ।
765. एक संत की अनुयायी ने देखा कि प्रभु चलकर आए और संत ने अपने हाथों से प्रभु के श्रीकमलचरणों के कोमलता का अनुभव श्रीकमलचरण पकड़ने पर कर लिया ।
766. हमें प्रभु को सर्वाधिक सुंदर, सर्वाधिक प्रभावशाली और सर्वाधिक शक्तिशाली मानना चाहिए क्योंकि यही सत्य है । हम प्रभु को चेतन मानेंगे तो ही हमारा हृदय पिघलेगा, पिघली हुई वस्तु ही किसी में मिल सकती है । ठोस वस्तु पास आ सकती है पर मिल नहीं सकती ।
767. प्रभु हमें सौंदर्य की पराकाष्ठा लगे तभी हमारा मन वहाँ से हटेगा नहीं ।
768. प्रभु के अनेक श्री लीलाओं का ध्यान के माध्यम से दर्शन करना चाहिए ।
769. हम देखें मन से कि प्रभु खड़े हैं, प्रभु चल रहे हैं, कभी बैठे हैं, कभी शयन कर रहे हैं । जैसे हम दिनभर अलग-अलग स्थिति में रहते हैं वैसे ही प्रभु की अलग-अलग स्थिति का दर्शन हमें करते रहना चाहिए । हमारे में चेतन है इसलिए हमारी दिनभर भिन्न-भिन्न स्थित होती है, प्रभु भी चेतन हैं इसलिए उनका भाव भी दिनभर अलग-अलग स्थिति में हमें आता रहे । सदैव ही प्रभु का चेतन रूप देखना, न कि प्रभु की जड़ मूर्ति ।
770. प्रभु चोरी भी करते हैं तो ऐसी जो दिखती नहीं । भक्तों के हृदय की, चित्त की चोरी कर लेते हैं, केवल दृष्टि मात्र से । इसलिए संत विनोद में कहते हैं कि भूले चुके भी प्रभु से नयन नहीं मिलना चाहिए ।
771. मेरे ठाकुरजी सर्वाधिक सुंदर, सर्वाधिक प्रभावशाली और सर्वाधिक चेतनमय हैं – ऐसा भान जीवन भर होना चाहिए ।
772. चित्त को शुद्ध रखना हो तो ध्यान शुद्ध करना चाहिए । सकाम होकर पूजा करें, यज्ञ करें पर सकाम होकर ध्यान कभी नहीं करना चाहिए - ऐसा प्रभु श्री कपिलजी कहते हैं ।
773. अपने हृदय कमल में प्रभु के एक-एक श्रीअंग का ध्यान करना आरंभ करना चाहिए । प्रभु के श्रीकमलचरण कितने कोमल, जल्दीबाजी ध्यान में बिलकुल नहीं करना चाहिए । बहुत समय बिताना चाहिए ध्यान में, ऐसा नहीं सोचें कि जल्दी-जल्दी प्रभु के श्रीमुख तक पहुँचना है । कितने ही संत ध्यान में दस घंटे बैठे रहते हैं और श्रीकमलचरणों से ऊपर उठ ही नहीं पाते । तभी तो एक पद लिखा गया है कि "दृढ़ विश्वास इन श्रीकमलचरणों का" ।
774. प्रभु के श्रीकमलचरण कितने कोमल होंगे इसकी कल्पना करें । भगवती जानकी माता के श्रीहाथ कितने कोमल हैं पर माता को सदैव डर लगता रहता है कि मेरे श्रीहाथों की कठोरता कहीं प्रभु के श्रीकमलचरणों को कष्ट तो नहीं देगी ।
775. प्रभु के श्री कमलचरणों में ध्वजा, पताका और कितने ही श्रीचिह्न अंकित हैं । प्रभु के श्रीनख कितने सुंदर हैं । प्रभु के इन्हीं श्रीकमलचरणों से निकली भगवती गंगा माता इतनी पवित्र कि उन्हें धारण करने वाले प्रभु श्री महादेवजी, जो इतने पवित्र हैं, वे मानते हैं कि इस कारण वे और अधिक पवित्र हो गए । उन प्रभु के श्रीकमलचरणों का ध्यान मेरे हृदय को कितनी पवित्रता प्रदान कर रहा है । कितना पवित्र हो गया मेरा हृदय, ऐसा ध्यान करना चाहिए ।
776. अपने अपवित्र शरीर को नहीं देखना चाहिए, उसमें विराजमान पवित्रतम प्रभु को देखना चाहिए जिसके कारण शरीर भी पवित्र हो गया है । जैसे हम मंदिर की सीढ़ी को प्रणाम करते हैं क्योंकि वह प्रभु के समीप हमें ले जाने का साधन है वैसे ही प्रभु तक ले जाने की सीढ़ी यह शरीर है ।
777. हमारा शरीर एक चलता फिरता मंदिर है क्योंकि निरंतर हमारे हृदय में परमात्मा झूला झूल रहे हैं ।
778. जितने जीव के शरीर हैं वे सभी प्रभु के मंदिर हैं । समर्थ श्री रामदास स्वामीजी की व्याख्या है कि हर जीव का शरीर एक प्रभु मंदिर है ।
779. हमारे जन्मों के पाप क्षय करने के लिए प्रभु की शक्ति का विश्वास रखना चाहिए । पाप के पहाड़ भी प्रभु नष्ट कर देते हैं । प्रभु हमारे भीतर हैं तो पाप बच ही नहीं सकते ।
780. एक संत को पंडितजी ने पापोहम पापमुक्त के मंत्र से पूजा कराई । संत बोले मेरे हृदय में प्रभु हैं इसलिए मेरे इस जन्म के पाप तो क्या, लाखों जन्मों के पाप नष्ट हो चुके हैं । इसलिए यह मंत्र नहीं पढ़े ।
781. जितनी जिसकी श्रद्धा उतना फल उसे मिलेगा । जो भगवती गंगा माता में इस श्रद्धा से डुबकी लगाएगा कि माता मेरे जन्मों के पाप काटेगी तो माता उसके जन्मों के पाप काटती हैं ।
782. प्रभु की कृपा का विश्वास रखना चाहिए । अगर प्रभु के होते ऐसा लग रहा है कि पाप बचेंगे तो हमने पाप को प्रभु से बड़ा मान लिया है ।
783. भगवती लक्ष्मी माता को दौड़-दौड़ कर वहाँ आने की आदत है जहाँ प्रभु के श्रीकमलचरण पड़ते हैं । अगर प्रभु के श्रीकमलचरणों को हृदय में रख लिया जाए तो भगवती लक्ष्मी माता को स्वतः ही खोजते-खोजते आना ही पड़ेगा ।
784. एक-एक प्रभु के श्रीअंग का ध्यान करते वक्त उन श्रीअंगों में डूबते रहना चाहिए । भाव से डूबे बिना हमारी गति नहीं है ।
785. प्रभु के श्रीअंगों के साथ-साथ उनके अलंकार-पीतांबर-शस्त्रों का ध्यान भी करना चाहिए ।
786. श्री सुदर्शनजी चक्रराज क्यों घूम रहे हैं ? संसार की रक्षा हेतु, नहीं-नहीं यह सिर्फ मेरी रक्षा हेतु घूम रहे हैं, ऐसा भाव करना चाहिए ।
787. प्रभु के शंख का शंखनाद मेरे शत्रु को दूर भगा देगा । प्रभु की गदा मेरे शत्रुओं का नाश करने के लिए है ।
788. अगर भावना यह कर ली है कि प्रभु गदा मेरे लिए लेकर खड़े हैं तो उस जीव का संसार में कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा ।
789. प्रभु के श्रीहाथों में कमल फूल का हेतु क्या है ? हम प्रभु की पूजा करते हैं फूलों से तो प्रभु भी कमल लेकर तैयार रहते हैं भक्त की अर्चना हेतु यानी अंतिम समय में मोक्ष से पहले प्रभु स्वयं भक्त के मस्तक वह कमल का फूल चढ़ाएंगे । संत श्री ज्ञानेश्वरजी की अदभुत और अनुपम व्याख्या श्री ज्ञानेश्वरीजी में ।
790. जैसे गर्भवती माता को खट्टा खाने-पीने की तीव्र इच्छा होती है वैसे ही प्रभु कहते हैं मेरी भी तीव्र इच्छा मेरे भक्त के दर्शन हेतु होती है ।
791. प्रभु कहते हैं कि मेरी आँखें नहीं थी । मैंने उसे प्रकट किया केवल अपने भक्तों के दर्शन हेतु ।
792. प्रभु कहते हैं कि मेरे चार हाथ क्यों ? अपने भक्त को चारों हाथों से आलिंगन करने हेतु क्योंकि भक्त भी दो हाथ से आलिंगन करेगा तो मैं (प्रभु) उसका चार हाथ से आलिंगन करूँगा ।
793. बारह वर्षों तक प्रभु ने संत श्री एकनाथजी की सेवा की । प्रभु से प्रेम करने वाले भक्तों की महिमा इतनी बड़ी है ।
794. भक्ति से जीवन तो बदल ही जाएगा क्योंकि पूरे संसार को बदलने का सामर्थ्य भक्ति में है ।
795. किसी भी धर्म में नहीं मिलेगा कि भगवान भक्त की भक्ति करते हैं । सनातन धर्म है जिसमें भक्ति पारस्परिक है । भक्त भगवान की भक्ति करते हैं और भगवान भक्त की भक्ति करते हैं ।
796. जैसे माँ की दृष्टि में बालक उसका अपना होता है वैसे ही ध्यान और भक्ति के वक्त प्रभु मेरे हैं, यह भाव लाना चाहिए कि प्रभु सिर्फ मेरे “ही” हैं ।
797. मैं केवल प्रभु का ही हूँ, केवल प्रभु ही मेरे हैं । श्री मधुसूदन सरस्वतीजी ने भक्ति की ऐसी व्याख्या करी है ।
798. प्रभु के मुखारविंद पर अनुकंपा के भाव को याद रखना चाहिए । प्रभु की अनुकंपा यानी दया, करुणा और हितैषी की भावना जो प्रभु के हृदय में रहती है । कितनी अनुकंपा ? जितना कंप हमारे भीतर होगा, उतनी प्रभु की अनुकंपा मिलेगी । जितना कंप हमारे हृदय में प्रभु हेतु होगा उतनी अनुकंपा हमारे लिए प्रभु की ओर से होगी । इसलिए दो व्यक्ति को एक बराबर अनुकंपा नहीं मिलती क्योंकि दोनों का कंप अलग-अलग होता है । हमारा कंप प्रभु के लिए श्रद्धा, प्रेम, भक्ति और विश्वास से जागृत होता है । हमारे हृदय में प्रभु के लिए कंप नहीं तो प्रभु विग्रह हमारे लिए मूर्ति मात्र है ।
799. प्रभु के श्रीनेत्रों का ध्यान करना चाहिए । उन श्रीनेत्रों से बहने वाले कृपा का ध्यान, प्रभु के श्रीनेत्रों में स्वयं के लिए कृपा के भाव का अनुभव करना चाहिए ।
800. भक्ति मार्ग पर थोड़ा कष्ट है पर यह प्रभु की कृपा है जो उन कष्टों को हर लेती है ।