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BHAKTI VICHAR CHAPTER - SHREERAM.

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. प्रेम के कारण श्रीरामावतार के मर्यादा अवतार में भी प्रभु ने अपने नियम तोड़ दिए । प्रभु का नियम था कि प्रभु अपने स्वयं के और श्री लक्ष्मणजी के हाथों से वनवास में कंद मूल ग्रहण करते थे पर यह नियम तोड़कर प्रभु ने प्रेम के कारण भगवती शबरीजी के बेर खाए ।
002. मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री रामजी का किसी से भी अहंकार से किया व्यवहार पूरी श्री रामचरितमानसजी में कहीं भी देखने को नहीं मिलेगा ।
003. प्रभु के श्रीकमलचरण इतने कोमल हैं कि श्रीरामावतार में प्रभु के श्रीकमलचरणों को दबाते हुए भगवती सीता माता सोचती थीं कि मेरे श्रीहाथों से प्रभु के श्रीकमलचरणों को वेदना तो नहीं होगी । माता के श्रीहाथ कितने कोमल हैं इसकी कल्पना करें पर फिर भी माता सोचती थीं कि प्रभु को वेदना होगी । इसलिए जरा सोचिए कि प्रभु के श्रीकमलचरण कितने कोमल हैं ।
004. प्रभु श्री रामजी की कथा सुनकर प्रभु श्री रामजी की भक्ति जरूर करनी चाहिए और साथ ही प्रभु श्री रामजी के सद्गुणों का अनुसरण भी अपने जीवन में करना चाहिए ।
005. पाप नाश करने के लिए प्रभु श्री रामजी का नाम सर्वोपरि है ।
006. प्रभु इतने कोमल और इतने अदभुत सुंदर हैं कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता । श्री रामायणजी में राक्षस खर प्रभु श्री रामजी की कोमलता और सुंदरता को देखकर आक्रमण करना भूल गए और प्रभु के रूप लावण्य पर मुग्‍ध हो गए ।
007. प्रभु कहते हैं कि एक बार मेरा भक्त मन से बस यह कह दे कि प्रभु जैसा भी हूँ, मैं आपका हूँ । बस इतना कहने भर से और मन में ऐसी धारणा बनने से उसकी रक्षा और उसको निर्भय करने की जिम्मेदारी प्रभु की हो जाती है । श्री रामचरितमानसजी में इसी व्रत को पालन करते हुए प्रभु ने श्री विभीषणजी की रक्षा की और उन्हें निर्भय किया ।
008. एक भक्त काफी दिन बाहर प्रवास करके आया फिर दूसरे दिन उसे किसी कार्यवश वापस जाना था । उसके जीवन में प्रभु श्री रामजी की सेवा थी तो बहुत लोगों ने प्रभु श्री रामजी की मूर्ति को रोते हुए देखा । दर्जनों लोगों ने ऐसा देखा कि प्रभु श्री रामजी की मूर्ति रो रही है । प्रसंग यह बताता है कि प्रभु अपने भक्त को जाने नहीं देना चाहते और उसका वियोग नहीं सह पाते ।
009. प्रभु श्री रामजी ने अपने अवतार काल में वैदिक मर्यादा यानी धर्म का सर्वत्र पालन किया । किसी भी धर्मशास्त्र के सिद्धांत को प्रभु ने कभी भंग नहीं किया । श्रीरामावतार में प्रभु ने सदैव धर्म का पालन किया और कोई भी धर्म अपराध अपने सामने नहीं होने दिया ।
010. श्री रामावतार में प्रभु जहाँ भी गए, जो कुछ भी किया सभी में सफल हुए । जिस काम को भी प्रभु ने हाथ में लिया उसमें सफलता ही हासिल की ।
011. प्रभु श्री रामजी का नाम इतना अदभुत है और उसमें इतना रस भरा हुआ है कि वह रस अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलेगा ।
012. मर्यादा का रस चखना हो तो प्रभु श्री रामजी की कथा सुनें ।
013. मैं अपने भक्तों का ऋण नहीं चुका सकता, यह बात प्रभु ने श्रीरामावतार में प्रभु श्री हनुमानजी को कही ।
014. अंत में प्रभु श्री रामजी का ही नाम लेना पड़ेगा ।
015. मर्यादा का पाठ पढ़ाना और लोक शिक्षा देना प्रभु श्री रामजी के अवतार का प्रधान हेतु था । प्रभु के अवतार का दूसरा हेतु अपने प्रेमियों से मिलना था जिनको एक प्रभु को छोड़कर और कुछ भी नहीं चाहिए था । प्रभु श्री रामजी इतने ऋषियों से, संतों से, भक्तों से जैसे भगवती शबरीजी, श्री केवटजी, श्री विभीषणजी इत्यादि से अपने अवतार काल में मिले ।
016. प्रभु श्री रामजी को मर्यादा प्रिय हैं इसलिए वे मर्यादा प्रधान हैं ।
017. मानव जीवन के सारे आयाम प्रभु श्री रामजी की श्रीलीलाओं में देखने को मिलेंगे ।
018. प्रभु के सभी अवतारों में प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ही पूर्णावतार हैं ।
019. प्रभु श्री रामजी के हर व्यवहार में कुशल नेतृत्व दिखाई देता है ।
020. शांति जीवन का सबसे बड़ा बल है । जिसने किसी भी अवस्था में शांत रहना सीख लिया वह अंत में जीतेगा । प्रभु शांतमूर्ति हैं । मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री रामजी ने धनुषयज्ञ में कितनी शांति से धनुष उठाया जबकि अन्य सभी राजा अपनी भुजाओं को ठोकते हुए और अपना बल दिखाते हुए आए और पराजित होकर वापस गए । प्रभु श्री रामजी परम शांति से आए और उन्होंने धनुष को उठा लिया ।
021. प्रभु श्री रामजी ने कितने सिंहासन पलटे पर एक भी सिंहासन को ग्रहण नहीं किया ।
022. प्रभु श्री रामजी के अवतार की श्रीलीला का अनुसरण करना चाहिए और उससे शिक्षा लेनी चाहिए ।
023. प्रभु श्री रामजी का श्रीचरित्र श्रीरामावतार में अतुलनीय है ।
024. प्रभु श्री रामजी लोक नेता हैं । दो बातें उनके जीवन में हैं, उनका जीवन ही क्रांति से भरा हुआ है और उनका जीवन अत्यंत पारदर्शी है ।
025. प्रभु के अवतार का एक हेतु धर्म स्थापना होता है । प्रभु श्री रामजी ने इसके लिए निमित्त वानरों को बनाया ।
026. प्रभु के सभी विग्रह हमें मुस्कुराते हुए मिलेंगे । प्रभु श्री रामजी के विग्रह हमें सर्वत्र मुस्कुराते हुए मिलते हैं जो इस बात को बताते हैं कि जीवन में सदैव प्रसन्न रहना चाहिए ।
027. आत्मकल्याण हेतु श्रेष्ठ आश्रम संन्यास आश्रम है । पर सबका उपकारक आश्रम गृहस्थ आश्रम है । इसलिए प्रभु श्री रामजी ने अपनी श्रीलीला में गृहस्थ आश्रम के धर्म को निभा कर दिखाया है ।
028. प्रभु मौन रहकर भगवती गायत्री माता के मंत्र का जप करते थे । प्रभु श्री रामजी भगवती गायत्री माता के मंत्र का जप करते थे । मौन रहने का मतलब है कि मन में जप करना, उच्चारण और वाणी से जप नहीं करना ।
029. प्रभु श्री रामजी ने अपने अवतार काल में सारी परंपराओं का निर्वाह किया और समाज को दिखाया । ऐसा उन्होंने इसलिए किया कि सामान्य मनुष्य भी उनका अनुसरण कर सकें ।
030. भारतवर्ष की सभी जाति, संस्कृति में प्रभु श्री रामजी के लिए एक ही भक्ति भाव मिलेगा । यह भारतवर्ष का अद्वितीय गौरव है ।
031. प्रभु श्री रामजी को जाने बिना असत्य संसार भी हमें सत्य ही नजर आता रहेगा । प्रभु श्री रामजी को जानने पर ही असत्य संसार हमें असत्य लगेगा ।
032. जीवन से काम को दूर करने के लिए श्री रामजी की शरण में ही जाना पड़ेगा ।
033. प्रभु श्री रामजी का एकवचन व्रत था यानी उनका सत्यव्रत था क्योंकि सत्य वचन एक ही होता है ।
034. प्रभु श्री रामजी अपने मर्यादा अवतार में किसी भी स्त्री का स्पर्श नहीं करते थे इसलिए उन्होंने भगवती अहिल्याजी को अपने श्रीकमलचरणों से स्पर्श नहीं किया । प्रभु मात्र अपने श्रीकमलचरणों को शिला के ऊपर ले गए, श्रीकमलचरणों की रज शिला पर गिरी और भगवती अहिल्याजी का उद्धार हो गया । प्रभु के श्रीकमलचरणों की रज का इतना बड़ा सामर्थ्य है ।
035. राजा श्री जनकजी निर्गुण ब्रह्म को मानते थे । उन्हें रूप और नाम में आसक्ति नहीं थी पर जैसे ही उन्होंने प्रभु श्री रामजी को देखा और प्रभु का नाम "श्रीराम" सुना तो सुनते ही और प्रभु के रूप को देखते ही वे उसमें उलझ गए । निर्गुण से पल भर में सगुण बन गए ।
036. राजा श्री जनकजी ने प्रभु श्री रामजी से अपना रिश्ता बनाने का निश्चय किया । वे प्रभु को पुत्र नहीं बना सकते थे क्योंकि श्री दशरथजी के प्रभु पुत्र थे, शिष्य नहीं बना सकते थे क्योंकि ऋषि श्री वशिष्ठजी के प्रभु शिष्य थे । प्रभु किसी के जमाई नहीं थे इसलिए उन्होंने प्रभु को जमाई बनाकर प्रभु से रिश्ता बना लिया ।
037. प्रभु जहाँ भी निवास करते हैं उस भूमि का गौरव बढ़ जाता है । प्रभु श्री रामजी जब निवास करने श्री चित्रकूटजी पहुँचे उसी समय से श्री चित्रकूटजी की भूमि पावन और पूजनीय हो गई ।
038. पंचवटी को शाप था कि वसंत ऋतु वहाँ नहीं पहुँचती थी पर जैसे ही प्रभु श्री रामजी पंचवटी पहुँचे वसंत ऋतु प्रभु के स्वागत के लिए उपस्थित हो गई । सूत्र है कि प्रभु के आते ही सभी अनुकूलता स्वतः ही आ जाती है ।
039. प्रभु के श्री रामावतार में वात्सल्य स्थान खाली नहीं था क्योंकि श्री दशरथजी और भगवती कौशल्या माँ ने उसे ले लिया था, माधुर्य स्थान खाली नहीं था क्योंकि भगवती सीता माता ने उसे ले लिया था, बंधु स्थान खाली नहीं था क्योंकि श्री लक्ष्मणजी और श्री भरतजी ने उसे ले लिया था, सखा स्थान खाली नहीं था क्योंकि श्री सुग्रीवजी ने उसे ले लिया था सिर्फ एक दास का स्थान बचा था तो वह प्रभु श्री हनुमानजी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया क्योंकि उन्हें वही चाहिए था ।
040. जब प्रभु को अपने भक्त दिखते हैं तो उन्हें भूख भी लग जाती है । श्री रामावतार में प्रभु को भगवती शबरीजी के यहाँ जाने पर भूख लगी ।
041. लंका दहन करके आने के बाद प्रभु श्री रामजी अपने भक्त प्रभु श्री हनुमानजी को बार-बार अपने गले लगाना चाहते थे पर प्रभु श्री हनुमानजी बार-बार प्रभु के श्रीकमलचरणों में गिरते रहे । प्रभु के श्रीकमलचरणों में मिलन भक्त और भगवान का सही मिलन होता है ।
042. सनातन धर्म में युगल सरकार की पूजा का विधान है । इसलिए श्री सीतारामजी की पूजा होती है ।
043. सारे जगत को मानव चरित्र की मर्यादा का दिव्य रूप दिखाने के लिए प्रभु का श्री रामावतार हुआ ।
044. स्वर्ग से भी बढ़कर अपनी जन्मभूमि होती है, प्रभु श्री रामजी ने यह उपदेश श्री लक्ष्मणजी को दिया ।
045. जहाँ प्रभु श्री रामजी बसते हैं वहीं शांति है । जहाँ काम बसता है वहाँ व्याकुलता है ।
046. गोस्वामी श्री तुलसीदासजी सूत्र देते हैं कि प्रभु श्री रामजी को पाने के लिए प्रभु श्री शिवजी ने वैराग्य धारण किया, प्रभु का नाम जप किया और कानों से प्रभु की कथा सुनी और अपने श्रीमुख से प्रभु की कथा सुनाना प्रारंभ किया ।
047. प्रभु का काज ही हमारे जीवन का एकमात्र हेतु होना चाहिए । प्रभु श्री हनुमानजी का जन्म ही प्रभु श्री रामजी के काज करने के लिए हुआ था ।
048. प्रभु श्री हनुमानजी ने लंका में रावण को जब अपना परिचय दिया तो यह कहा कि मैं प्रभु श्री रामजी का दास हूँ । उन्होंने यह नहीं कहा कि मैं केसरीनंदन हूँ या अंजनीकुमार हूँ । जीव का सच्चा परिचय यही होना चाहिए कि वह प्रभु का दास है ।
049. जब समुद्रदेवजी पर पुल बन गया तो प्रभु श्री रामजी के दर्शन के लिए मगरमच्छ और जलचर ऊपर आए और वानरों द्वारा बनाए गए पुल के दोनों तरफ दो और पुल स्वतः ही बन गए । सूत्र यह है कि जीव जब अपनी भक्ति के साधन से पहला पुल बनाता है तो प्रभु अपनी कृपा से दूसरा पुल बना देते हैं ।
050. ऋषि श्री विश्वामित्रजी को राजा श्री दशरथजी धन, भूमि, गोधन, श्री अयोध्याजी का पूरा राजकोष और अपने प्राण तक देने को तैयार हो गए पर प्रभु श्री रामजी को देने से मना कर दिया । वे इतना प्रेम प्रभु श्री रामजी से करते थे ।
051. राजा श्री दशरथजी कहते हैं कि मुझे श्रीराम चाहिए, राजकोष आप ले जाएं । ऋषि श्री विश्वामित्रजी कहते हैं कि मुझे राजकोष नहीं, मुझे भी श्रीराम ही चाहिए । दोनों को श्रीराम चाहिए । श्री अयोध्याजी का राजकोष किसी को नहीं चाहिए । जरा देखें प्रभु श्री रामजी का दोनों के जीवन में कितना बड़ा महत्व है ।
052. श्री रामचरितमानसजी में श्री केवटजी के प्रसंग में श्री केवटजी प्रभु से कहते हैं कि मैं जब तक आपके श्रीकमलचरणों को पखार नहीं लूं, मैं नाव से आपको पार नहीं कराऊँगा । आप चाहें तो भगवती गंगा माता को तैरकर पार कर लें । प्रभु ने कहा कि मुझे तैरना नहीं आता इसलिए तैरकर पार नहीं कर सकता इसलिए नाव से ही जाना पड़ेगा । तब संतों ने इस अदभुत प्रसंग की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रभु को तैरना नहीं आता, प्रभु को तो तारना ही आता है ।
053. श्रीराम नाम रूपी नेक कमाई जीवन में करते ही रहना चाहिए ।
054. प्रभु श्री रामजी इतने आज्ञाकारी पुत्र थे कि श्री दशरथजी से एक बार भी पूछा तक नहीं कि किस अपराध से या किस कारण से उन्हें युवराज पद देते-देते वनवास दे दिया गया ।
055. भारतवर्ष के पास श्रीराम रूपी नाम धन है ।
056. श्री रामचरितमानसजी की चौपाइयां लाख बार सुनने के बाद भी सुनने की व्याकुलता बनी रहनी चाहिए ।
057. प्रभु श्री विष्णुजी के अवतार प्रभु श्री रामजी । प्रभु श्री विष्णुजी के एक श्रीहाथ में शंख है, शंख के अवतार श्री भरतलालजी हैं । प्रभु के एक श्रीहाथ में श्री सुदर्शनजी हैं, श्री सुदर्शनजी के अवतार श्री शत्रुघ्नजी हैं और प्रभु श्री शेषजी पर लेटे हुए हैं, श्री शेषजी के अवतार श्री लक्ष्मणजी हैं ।
058. रात को सोते समय राम-राम जपते-जपते सोएं । सुबह उठते वक्त राम-राम कहते-कहते उठें । इस तरह रात की पूरी निद्रा ही राममय हो जाएगी ।
059. जीवन में सभी भोगों को त्यागकर सभी रसों को त्यागकर केवल श्रीराम रस ही पीना चाहिए ।
060. प्रभु श्री महादेवजी श्री काशीजी में जीव के कान में श्रीराम नाम कहकर उस जीव को मुक्ति दे देते हैं । श्रीराम नाम की इतनी महिमा है कि प्रभु श्री महादेवजी द्वारा श्री काशीजी में जीव के कान में श्रीराम नाम कहने पर उस जीव को सभी पापों से क्षणभर में मुक्ति मिल जाती है ।
061. श्री रामचरितमानसजी में ऋषि श्री शरभंगजी की आत्मा प्रभु के धाम गई, प्रभु में लीन नहीं हुई । प्रभु में लीन होने से भी ज्यादा सुख प्रभु से प्रेम करने में है । इसलिए सच्चे भक्त प्रभु से प्रेम मांगते हैं और भाव देह मांगते हैं । वे प्रभु में लीन होना नहीं चाहते । वे दो बनकर रहना चाहते हैं जिससे प्रभु से प्रेमाभक्ति कर सकें, लीन होकर एक नहीं होना चाहते ।
062. राजा श्री जनकजी ज्ञानी थे और निराकार प्रभु को मानते थे पर वे प्रभु श्री रामजी के सगुण साकार रूप को देखकर प्रेममग्न हो गए और मंत्रमुग्ध हो गए । उनका ज्ञान छूट गया, निराकार उपासना छूट गई और सगुण साकार में वे मग्न हो गए । यह दृष्टांत बताता है कि निराकार से ज्यादा सुख सगुण साकार में है ।
063. हमें सीताजी के श्रीराम से प्रेम करना चाहिए । माता ऐसा करने से पिता की भक्ति दिला देती है ।
064. श्रीलीला करते हुए भगवती सीता माता ने श्री लक्ष्मणजी को कटु वचन कहकर प्रभु के पास मारीच के प्रसंग में भेजा । भगवती सती माता ने प्रभु श्री महादेवजी की बात नहीं मानकर प्रभु श्री रामजी की परीक्षा ली । भगवती माताएं श्रीलीला करके यह बताना चाहती हैं कि कभी भी प्रभु के लिए मन में तनिक भी अविश्‍वास और अश्रद्धा का भाव नहीं होना चाहिए नहीं तो वह हमसे बहुत बड़ी गलती करवा देगा ।
065. प्रभु श्री रामजी की भक्ति के खजाने की चाबी प्रभु श्री महादेवजी और प्रभु श्री हनुमानजी के पास है ।
066. प्रभु श्री महादेवजी से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें प्रभु श्री रामजी की भक्ति दें । ऐसा वरदान मांगना प्रभु श्री महादेवजी को अति प्रसन्न कर देता है ।
067. संतों का मानना है कि प्रभु श्री हनुमानजी किसी भी भक्त का संदेश प्रभु श्री रामजी को ऐसे समय सुनाते हैं कि कृपानिधान प्रभु उस भक्‍त पर कृपा करने पर बाध्य हो जाते हैं ।
068. कुछ भी करो पर कहो और मानो यही कि मेरे श्रीराम की कृपा से सब कुछ हो रहा है । सब कुछ करते हैं राघव पर मेरा नाम हो रहा है ।
069. मनुष्य प्रभु द्वारा स्थापित आदर्श की पालना करें इसलिए प्रभु ने श्रीरामावतार में ब्रह्म के रूप में नहीं अपितु मनुष्य के रूप में स्वयं को स्थापित किया ।
070. प्रभु श्री रामजी ने अपने मर्यादा अवतार में सबको आदर्शपूर्ण जीवन जीकर दिखाया । उन्होंने दिखाया कि एक पुत्र कैसा हो, एक शिष्य कैसा हो, एक पति कैसा हो, एक मित्र कैसा हो, एक भाई कैसा हो और एक शत्रु भी कैसा हो । यह सब प्रभु ने जीवंत करके दिखाया ।
071. श्रीराम कथा सुनने और पढ़ने के लिए मन की पवित्रता अनिवार्य है ।
072. मन को प्रभु श्री रामजी में लगा लेने से संसार के दुःख-सुख हमें अनुभव नहीं होंगे क्योंकि प्रभु में मन लगा होने के कारण फिर जीव सदा आनंदित ही रहेगा ।
073. प्रभु इतने कृपालु हैं कि श्री रामावतार में प्रभु के जन्मोत्सव के समय एक महीने का एक दिन हुआ और प्रभु श्री सूर्यनारायणजी ने प्रभु का एक महीने तक दर्शन किया ।
074. प्रभु श्री रामजी के नाम की व्याख्या यह है कि वे सबका मंगल-ही-मंगल करते रहते हैं ।
075. विपरीत परिस्थिति में प्रसन्न रहना प्रभु श्री रामजी से सीखना चाहिए ।
076. जिस पर प्रभु श्री महादेवजी की कृपा नहीं होती वह प्रभु श्री रामजी के तत्व को नहीं पा सकता । प्रभु श्री महादेवजी की सेवा का फल है कि प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों में हमारी भक्ति दृढ़ हो जाती है ।
077. प्रभु श्री रामजी सदैव मानव चरित्र करते हुए प्रसन्न रहते मिलेंगे । समस्या बहुत देखी पर मुस्कुराते हुए रहे ।
078. जिनको श्रीराम नाम के रत्न का मूल्यांकन जीवन में समझ में आ जाता है वे उसे कमाने में ही अपना जीवन लगा देते हैं ।
079. श्री रामावतार अनुकरण का विषय है ।
080. एक बार जो प्रभु की शरण में आ जाए तो प्रभु उसे तत्काल अभयदान दे देते हैं । यह प्रभु की श्री रामावतार में प्रतिज्ञा है ।
081. प्रभु श्री रामजी की कथा श्री चंद्रदेवजी के समान है और चकोररूपी संत और भक्त उसका पान करते हैं ।
082. प्रभु श्री रामजी की कथा के सर्वप्रथम रचयिता प्रभु श्री महादेवजी हैं ।
083. ऋषि श्री अगस्त्यजी ने प्रभु कथा सुनाकर प्रभु श्री महादेवजी से प्रभु श्री रामजी की भक्ति मांगी । ऋषि श्री अगस्त्यजीजी का कितना श्रेष्ठ आचरण था कि कथा दक्षिणा के रूप में भक्ति मांग ली क्योंकि प्रभु श्री रामजी की भक्ति देने में प्रभु श्री महादेवजी सबसे अग्रणी हैं ।
084. बालरूप में प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी का स्वरूप एक जैसा है । फर्क सिर्फ एक है कि प्रभु श्री रामजी गंभीर हैं और प्रभु श्री कृष्णजी चंचल हैं ।
085. मर्यादा देखना हो तो प्रभु श्री रामजी के अवतार में देखें ।
086. प्रभु श्री रामजी नीति और प्रीति दोनों में परिपूर्ण हैं ।
087. श्री लक्ष्मणजी को अगर कोई कहता कि वे श्रीदशरथ पुत्र हैं तो वे इतने प्रसन्न नहीं होते पर जब कोई कहता कि वे श्री रामजी के छोटे भ्राता हैं तो इस परिचय से वे अति प्रसन्न हो जाते । सूत्र यह है कि हमें भी यह सुनकर प्रसन्न होना चाहिए कि हम प्रभु के हैं । इसके अतिरिक्त दूसरे कोई परिचय से हमें प्रसन्न नहीं होना चाहिए ।
088. जैसे पेड़ को काटकर पेड़ के पत्ते को रखना संभव नहीं या जल से निकालकर मछली को रखना संभव नहीं वैसे ही प्रभु श्री रामजी के बिना श्री भरतजी का अस्तित्व नहीं । यह बात श्री भरतलालजी ने स्वयं भगवती कैकेयी माता को कही ।
089. श्री भरतलालजी कण-कण में प्रभु श्री रामजी के दर्शन किया करते थे ।
090. एक श्रीग्रंथ करोड़ों का कल्याण कर देता है । श्री रामचरितमानसजी ने आज तक कितनों को तारा है इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते ।
091. जो जीव प्रभु श्री हनुमानजी की शरण ग्रहण कर लेते हैं उन्हें प्रभु श्री रामजी के पास पहुँचने में कोई परेशानी नहीं होती ।
092. जिनको प्रभु श्री हनुमानजी ने आश्रय दे दिया, उन्हें प्रभु श्री रामजी एक दिन जरूर आश्रय देंगे ।
093. श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवद् गीताजी, श्री रामचरितमानसजी पूरी मानवता के लिए है । ये सिर्फ हिंदू धर्म ग्रंथ नहीं है क्योंकि कहीं भी इनमें लिखा हुआ नहीं है कि यह केवल हिंदुओं के लिए है । इसलिए ये पूरे विश्व के कल्याण के लिए है ।
094. अधर्म के रास्ते पर जाने पर रावण को उसके सगे भाई विभीषण ने छोड़ दिया और धर्म के रास्ते पर होने पर प्रभु श्री रामजी के साथ भालू और वानर भी आ गए ।
095. प्रभु के सभी नामों में श्रीराम नाम श्रेष्ठ हों, ऐसा वरदान देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने प्रभु से मांगा और प्रभु ने तथास्तु कहा । इसलिए प्रभु के सभी नामों में श्रीराम नाम श्रेष्‍ठतम है, ऐसा संतों का मत है ।
096. प्रभु श्री रामजी एकवचनी हैं यानी जो कह दिया उसका पालन करते हैं ।
097. कालों के काल और महाकाल प्रभु श्री महादेवजी भी श्रीराम नाम जपते रहते हैं । श्रीराम नाम इतना दिव्य है ।
098. श्रीराम कथा अमूल्य है । इसका मोल कोई भी और कभी भी चुका नहीं सकता ।
099. भगवती सीता माता ने अशोक वाटिका में प्रभु श्री हनुमानजी को कई आशीर्वाद दिए पर प्रभु श्री हनुमानजी प्रसन्न नहीं हुए । फिर भगवती सीता माता ने कहा कि प्रभु श्री रामजी उनसे प्रीति करेंगे तब प्रभु श्री हनुमानजी प्रेम मग्न हो गए और अति प्रसन्न हुए ।
100. जब प्रभु श्री महादेवजी प्रभु श्री कृष्णजी एवं प्रभु श्री रामजी के बालपन में दर्शन करने गए थे तो वे प्रभु को रिझाने के लिए सज संवर के गए । सूत्र यह है कि अगर सजना संवरना भी हो तो वह भी प्रभु के लिए होना चाहिए ।
101. एक संत का भाव है कि जैसे प्रभु श्री रामजी स्वयंवर में भाग लेने के लिए श्री जनकपुरजी की तरफ चले तो श्री जनकपुरजी चलकर निकट आ गए । प्रभु को पहुँचने के लिए चलना न पड़े और प्रभु को कष्ट न हो इसलिए श्री जनकपुरजी नगर चेतनमय हो उठे और चलकर प्रभु की राह के निकट आ गए ।
102. प्रभु श्री रामजी अपनी जन्मभूमि श्री अयोध्याजी को श्री चित्रकूटजी में भी याद करके रोने लग जाते थे । अपनी जन्मभूमि से हमें भी इतना प्रेम होना चाहिए ।
103. प्रभु श्री रामजी के वनवास जाने के बाद अवधवासियों की आँखों में वर्षा ऋतु ने मानो प्रवेश कर लिया ।
104. जब प्रभु श्री रामजी का वनवास हुआ और महाराज श्री दशरथजी का निधन हुआ तो ऋषि श्री वशिष्ठजी ने दूतों को श्री भरतलालजी को ननिहाल से बुलाने के लिए कैकई देश भेजा । ऋषि श्री वशिष्ठजी ने दूतों से कहा कि श्री भरतलालजी को कुछ भी बताएं नहीं क्योंकि श्री भरतलालजी प्रभु से इतना प्रेम करते हैं कि श्रीराम विरह की आंधी में भरतरूपी दीप कहीं बुझ न जाए ।
105. प्रभु श्री हनुमानजी अपना परिचय कभी नहीं देते । जब परिचय देने का समय आता है तो वे प्रभु श्री रामजी का यश गाना शुरू कर देते हैं । यही सच्चे भक्त की निशानी है ।
106. भक्तों के हृदय में प्रभु श्री हनुमानजी का वास है और प्रभु श्री हनुमानजी के हृदय में प्रभु श्री रामजी का वास है ।
107. जब तक काम वासना जीवन में रहेगी तब तक श्रीराम उपासना जीवन में नहीं हो सकती ।
108. नाम की महिमा इतनी है कि भावपूर्वक श्रीराम कहते ही प्रभु श्री रामजी हमारे अंतःकरण में प्रकट हो जाते हैं । नाम से संतों ने ऐसा करके दिखलाया है ।
109. नौका चलाने वाले केवट की इतनी महिमा हो गई कि आज भी बुंदेलखंड के लोग केवट के हाथों का पानी पीते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि श्री रामावतार में केवट ने प्रभु के श्रीकमलचरणों को पखारकर अपने हाथ को अति पवित्र कर लिया था ।
110. श्रीराम रस का आस्वादन जीवन में करना चाहिए ।
111. श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवद् गीताजी और श्री रामचरितमानसजी जैसा धन और कुछ भी नहीं हो सकता । ऐसा धन भारतवर्ष के अलावा कहीं नहीं मिलेगा ।
112. जहाँ प्रभु श्री रामजी की कथा हो वहाँ प्रभु श्री हनुमानजी नहीं हो ऐसा हो ही नहीं सकता । प्रभु श्री हनुमानजी सदा वहाँ आकर कथा श्रवण करते हैं ।
113. प्रभु श्री हनुमानजी की कृपा से श्रीराम प्रेम का रोग हमें लग जाता है ।
114. श्रीराम दिल में बैठ गए तो काम वहाँ आएगा ही नहीं । पर जहाँ काम बैठा है वहाँ से काम को हटाए बिना प्रभु श्री रामजी भी नहीं आएंगे ।
115. सनातन धर्म में तीन मुख्यतम श्रीग्रंथ हैं । श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवद् गीताजी और श्रीमद् वाल्मीकि रामायणजी । रामायणजी को भी श्रीमद् से सुशोभित किया गया है । श्री वाल्मीकिजी की रामायणजी का पूरा संबोधन श्रीमद् वाल्मीकि रामायणजी है ।
116. संसार के कण-कण में जो रमण करते हैं वे ही श्रीराम हैं । संसार जिनके रोम-रोम में समाया वे ही श्रीराम हैं ।
117. प्रभु श्री रामजी जब विद्या अध्ययन करने के लिए गुरुकुल आए तो समस्त विद्या प्रभु की सेवा करने के लिए उपस्थित हो गई ।
118. जब प्रभु श्री रामजी श्री जनकपुरजी का भ्रमण करने गए तो सखियां प्रभु का अपने घर के छत के झरोखे से दर्शन करने लगीं । प्रभु मर्यादा अवतार में थे इसलिए नीचे देखकर चल रहे थे । तो सखियों ने प्रभु के ऊपर पुष्पों की वर्षा की और प्रभु ने ऊपर देखा कि फूल कहाँ से गिर रहे हैं और ऐसा करते ही सखियों ने प्रभु का दर्शन कर लिया ।
119. श्री अयोध्याजी में एक भी ऐसा जीव ऐसा नहीं था जो कि श्रीराम का प्रेमी न हो । इसलिए भगवती सरस्वती माता ने उनकी बुद्धि को नहीं फेरा । सूत्र यह है कि प्रभु प्रेमी की बुद्धि को कभी भी कोई भी नहीं बिगाड़ता क्योंकि उसकी बुद्धि का संरक्षण प्रभु स्वयं करते हैं ।
120. महाराज श्री दशरथजी बोलते हैं कि शरीर मेरा है पर उसमें जो प्राण हैं वह श्रीराम हैं ।
121. दुनिया को आज कष्ट है कि उनके पुत्र उनकी आज्ञा में नहीं चलते पर महाराज श्री दशरथजी को कष्ट था कि उनके पुत्र प्रभु श्री रामजी उनकी इतनी आज्ञा को क्यों मानते हैं । महाराज श्री दशरथजी प्रभु श्री महादेवजी को मनाते हैं कि प्रभु श्री रामजी उनकी आज्ञा नहीं मानें और आज्ञा का उल्लंघन करके वनवास में नहीं जाए । महाराज श्री दशरथजी को पता है कि प्रभु को मालूम चलते ही कि यह पिता की आज्ञा है वे स्वतः ही बिना प्रतिकार किए और बिना कारण पूछे वनवास के लिए चले जाएंगे ।
122. प्रभु श्री रामजी का आचरण और उनका व्यवहार सब कुछ पूजनीय है ।
123. प्रभु श्री रामजी और श्री भरतलालजी के मिलन को देखकर पत्थर भी पिघल गए और आज भी श्री चित्रकूटजी में प्रभु और श्री भरतलालजी के श्रीचरण चिह्न पत्थर पर अंकित हैं ।
124. ऋषि श्री वशिष्ठजी ने प्रभु और श्री भरतलालजी के बीच निर्णय करने से मना कर दिया क्योंकि ऋषि श्री वशिष्ठजी ने कहा कि वे श्री भरतलालजी के श्रीराम प्रेम के वश में हैं । उन्होंने कहा कि वे श्री भरतलालजी का ही साथ देंगे इसलिए उचित निष्पक्ष निर्णय नहीं दे पाएंगे । श्री भरतलालजी का श्रीराम प्रेम इतना प्रबल था कि उस प्रेम ने एक ऋषि को भी अपने वश में कर लिया ।
125. संतों का काम श्रीराम विमुख को श्रीराम के सम्मुख कर देना है ।
126. श्रीराम कथा का श्रवण प्रभु श्री हनुमानजी ने भगवती सीता माता को अशोक वाटिका में कराया । उस युग में भी प्रभु कथा सभी दु:खों और क्लेशों को हर लेती थी और आज कलियुग में भी प्रभु कथा हमारे सभी दुःखों और कष्टों का नाश करती है ।
127. रावण की नाभि में बाण लगते ही उसने श्रीराम नाम पुकारा और प्रभु ने उसे उसी समय परम गति प्रदान कर दी । प्रभु इतने करुणामय हैं ।
128. प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी में कोई भेद नहीं । दोनों पूर्ण परमात्मा हैं । श्री जामवंतजी जब युद्ध में हार गए तो प्रभु से परिचय पूछा तो प्रभु श्री कृष्णजी ने प्रभु श्री रामजी के रूप में उन्हें दर्शन दिया । इससे प्रतिपादित होता है कि दोनों प्रभु एक ही हैं ।
129. एक सेठ को एक बहेलिया ने वैष्णव घर में पला हुआ एक तोता बेचा । तोता हरदम राम-राम, गोविंद-गोविंद कहता था । सेठ को उसने बिना जाने ही राम-राम, गोविंद-गोविंद कहने की आदत डाल दी । मृत्यु बेला पर जब सेठ को यमदूत दिखे तो तोता उसी समय बोला राम-राम, सेठ ने भी कहा राम-राम और प्रभु के पार्षद तुरंत आ गए । तोता और सेठ दोनों प्रभु के धाम चले गए ।
130. भक्ति मार्ग में दासानुदास होने का भी बड़ा भारी लाभ है । जैसे हम प्रभु श्री हनुमानजी के दास जो कि प्रभु श्री रामजी के दास हैं ।
131. ऋषि श्री विश्वामित्रजी को महाराज श्री दशरथजी अपने प्राण देने को तैयार हो गए पर प्रभु श्री रामजी को देने को तैयार नहीं हुए । प्रभु का इतना लाड़ महाराज श्री दशरथजी करते थे ।
132. जब श्री जनकपुरजी के बगीचे में प्रभु श्री रामजी फूल चुनने गए तो कई महात्मा फूल का रूप लेकर वहाँ उपस्थित हो गए कि प्रभु की नजर एक बार उन पर पड़ जाए ।
133. प्रभु श्री रामजी के विवाह में सभी शकुन नाचने लगे । शकुन अपने भाग्य की सराहना करने लगे और अति उत्साह से प्रभु के विवाह में शुभ संकेत देने लगे ।
134. भगवती कौशल्या माता प्रभु श्री रामजी से कहती हैं कि प्रभु श्री ब्रह्माजी से कह दें कि जितने दिन प्रभु दर्शन और प्रभु भजन बिना बीते उन्हें उनकी उम्र की गिनती में शामिल नहीं किया जाए । कितना सुंदर संदेश है कि जो दिन हमारा प्रभु दर्शन और प्रभु भजन बिना बीतता है वह दिन हमारा एकदम व्यर्थ जाता है ।
135. प्रभु श्री रामजी ने अपने स्वभाव से अयोध्यावासियों को, अपने रूप से मिथिलावासियों को और अपने बल से लंकावासियों को आकर्षित कर लिया ।
136. प्रभु श्री महादेवजी विवाह करके आए तो भी श्री कैलाशजी में कभी संसार चर्चा नहीं हुई, श्रीराम चर्चा ही हुई । गृहस्थ जीवन जीने का इसलिए सबसे बड़े आदर्श प्रभु श्री महादेवजी हैं ।
137. प्रभु श्री रामावतार में बालि और रावण को बाण मारते हैं तो उन्हें भी अपना निज लोक दे देते हैं । इतने कृपालु प्रभु हैं ।
138. संत कहते हैं श्री कृष्णजी बिना आनंद नहीं और श्री रामजी बिना आराम नहीं ।
139. प्रभु के नाम का सामर्थ्य इतना बड़ा है कि गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीराम नाम की महिमा प्रभु श्री रामजी भी नहीं गा सकते ।
140. प्रभु श्री हनुमानजी को सागर लांघते वक्त कितनी बाधा आई पर उन्होंने प्रभु श्री रामजी का नाम लेकर सभी बाधाओं को आसानी से पार कर लिया । यह प्रसंग हमें शिक्षा देने के लिए है कि प्रभु के नाम के बल पर हम भी सभी विपत्तियों को पार कर सकते हैं ।
141. जब श्री लक्ष्मणजी को युद्ध में शक्ति लगी तो घाव श्री लक्ष्मणजी को हुआ पर उसका दर्द प्रभु श्री रामजी ने झेला । प्रभु इतने दयालु और कृपालु हैं कि भक्तों का दुःख और दर्द खुद झेलते हैं ।
142. प्रभु श्री हनुमानजी की चर्चा प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों में लाकर बैठा देने वाली चर्चा है । प्रभु श्री हनुमानजी दास भक्ति के आदर्श हैं ।
143. संसार सागर में कूदें तो प्रभु का नाम लेकर कूदें तो हमें कोई डूबो नहीं पाएगा और हम संसार सागर से पार हो जाएंगे । जैसे प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी का नाम लेकर सागर में छलांग लगाई और विघ्नों के बावजूद सागर को सफलता से पार किया ।
144. आज के युवाओं को जरूरत है कि अपना आदर्श प्रभु श्री रामजी को बनाए ।
145. प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी को जब वे लंका दहन करके और माता का पता लगाकर वापस आए तो गले से लगाकर अपने समीप बैठने का आसन दिया । पर प्रभु श्री हनुमानजी बैठे तो सही पर प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों में । उनकी दृष्टि भी प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही केंद्रित थी । संकेत यह है कि सदैव प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही हमें रहना चाहिए और अपनी दृष्टि को भी प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही केंद्रित करके रखनी चाहिए ।
146. सारी लंका का घी और तेल प्रभु श्री हनुमानजी की श्रीपूंछ को जलाने में लग गया पर श्रीपूंछ का एक भी बाल तक नहीं जला क्योंकि प्रभु श्री रामजी की कृपा और अनुग्रह उन पर थी ।
147. भक्त के रोम-रोम में प्रभु का ही अस्तित्व होता है । जब श्री लक्ष्मणजी को शक्ति लगी और वे संजीवनी के प्रयोग से प्रभु कृपा से मूर्छित अवस्था से जागे तो प्रभु श्री हनुमानजी ने उनसे पूछा कि आपको शक्ति के कारण पीड़ा सहनी पड़ी होगी । श्री लक्ष्मणजी ने कहा कि अगर पीड़ा हुई होगी तो वह प्रभु श्री रामजी को हुई होगी क्योंकि उनके रोम-रोम में प्रभु श्री रामजी ही विराजमान हैं ।
148. प्रभु तक पहुँचने का मार्ग प्रभु ही जानते हैं और प्रभु ही जीव को बताते हैं । प्रभु ने ही श्री रामचरितमानसजी में भगवती शबरीजी के समक्ष नवधा भक्ति का प्रतिपादन किया है ।
149. गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्री रामचरितमानसजी में कहते हैं कि वे प्रभु नाम की बड़ाई कहाँ तक करें क्योंकि प्रभु श्री रामजी भी अपने श्रीराम नाम की बड़ाई नहीं गा सकते । प्रभु नाम की इतनी बड़ी महिमा है ।
150. प्रभु श्री रामजी ने जिस सागर को सेतु बनाकर पार किया, प्रभु श्री हनुमानजी उसी सागर को श्रीराम नाम लेकर लांघ गए ।
151. प्रभु पर किया भरोसा कभी भी हमें हारने नहीं देता । श्री अंगदजी ने लंका की भरी सभा में अपना पांव जमा दिया और कहा कि कोई उसे हिला दे तो श्रीराम सेना यहीं से हार मानकर लौट जाएगी । श्री अंगदजी को पता था कि वे तो हार सकते हैं पर उनका प्रभु पर जो भरोसा है वह कभी नहीं हार सकता ।
152. प्रभु ने भगवती शबरीजी के जूठे बेर खाने के बाद श्रीराम राज्य में जहाँ-जहाँ भी भोजन किया, यहाँ तक कि भगवती सीता माता के श्रीहाथ का बनाया हुआ भी राजमहल में भोजन किया तो प्रभु कहने से कभी नहीं चूके कि यह सब अच्छा है पर मेरे शबरी के बेर जैसी मिठास नहीं है । प्रभु भक्तों के भाव को इस प्रकार ग्रहण करते हैं और भक्त के ऋणी बन जाते हैं ।
153. प्रभु श्री रामजी श्री रामचरितमानसजी में कहते हैं कि जिन पर प्रभु श्री महादेवजी कृपा करते हैं उन्हें ही भक्ति प्राप्त होती है ।
154. प्रभु श्री रामजी का अवतरण ही संसार में मर्यादा की प्रतिष्ठा करने के लिए हुआ है ।
155. प्रेम का शील है कि वह मर्यादा के पात्र में ही टिकता है । इसलिए ही श्रीमद् भागवतजी महापुराण में श्रीकृष्ण प्रेम से पहले मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री रामजी आते हैं । सूत्र यह है कि जीवन में पहले मर्यादा आती है फिर प्रभु के लिए प्रेम आता है ।
156. करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या का पाप भी जिसे लगा हो उसे भी प्रभु शरण में आने पर स्वीकार करते हैं, यह प्रभु ने श्री रामचरितमानसजी में कहा है । इससे बड़ा पाप और क्या हो सकता है और इससे बड़ा आश्वासन प्रभु का और क्या हो सकता है ?
157. श्री विभीषणजी ने बहुत प्रतिकूल परिस्थिति में रहकर प्रभु का भजन किया । असुर कुल यानी तामस तन प्राप्त हुआ जहाँ तमोगुण का प्रभाव था और चारों तरफ असुरों के बीच रहकर लंबे काल तक उन्होंने प्रभु का भजन किया । इससे प्रसन्न होकर प्रभु ने गुरुरूप में प्रभु श्री हनुमानजी को भेजा और फिर स्वयं प्रभु श्रीराम रूप में उन्हें स्वीकार किया ।
158. देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी भी श्री रामचरितमानसजी में प्रभु श्री रामजी से भक्ति और सत्संग निरंतर मिलती रहे यही कामना करते हैं ।
159. प्रभु श्री रामजी प्रभु श्री हनुमानजी के वश में हैं इसलिए तो उनके हृदय में सदैव बसते हैं ।
160. जब वे लंका जा रहे थे तो प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु की मुद्रिका अपने श्रीमुख में रखी तो किसी ने पूछा कि क्या मुद्रिका मुख में रखने की चीज है । प्रभु श्री हनुमानजी ने बहुत मार्मिक उत्तर दिया कि मुद्रिका में जो श्रीराम नाम अंकित है वह तो सदैव मुख में ही रखने योग्य है इसलिए उन्होंने श्रीराम नाम अंकित मुद्रिका को अपने श्रीमुख में ही स्थान दिया है ।
161. प्रभु श्री हनुमानजी कहते हैं कि मैं तो रिक्त हूँ, जो मेरे में बल है वह मेरे प्रभु का है । जैसे एक मकान में सामान रखा हुआ है तो वह सामान उस मकान का नहीं होता बल्कि उस मकान के मालिक का होता है, इसी प्रकार प्रभु श्री हनुमानजी स्वयं को मकान मानते हैं और उस मकान में रखा बल उस मकान के मालिक प्रभु श्री रामजी का मानते हैं ।
162. प्रभु श्री हनुमानजी सबको खुला निमंत्रण देते हैं कि जीव प्रभु श्री रामजी की शरण में आ जाएं तो उनका मंगल-ही-मंगल होता चला जाएगा ।
163. जो हमारी ममता धन में, संपत्ति में, पद में, प्रतिष्ठा में, परिवार में बिखरी हुई है उसे समेटकर प्रभु के श्रीकमलचरणों में केंद्रित कर देना चाहिए । प्रभु ने श्री रामचरितमानसजी में यही कहा है ।
164. संत तो यहाँ तक कहते हैं कि प्रभु श्री रामजी भी अपने नाम “राम” की बड़ाई नहीं गा सकते । प्रभु का नाम ब्रह्मांड में अतुल्य है ।
165. हमारे मन में दो भाव "राम" और काम एक साथ नहीं रह सकते । मन में एक ही भाव रहेगा या तो श्रीरामजी रहेंगे या फिर काम यानी संसार की कामनाएं और वासनाएं रहेंगी ।
166. यह प्रभु की असीम कृपा है कि प्रभु ने जीव को एक ही मन दिया है । अगर दो दे देते तो जीव इतना चालाक है कि एक में "राम" और एक में काम रखता । ऐसे में उस जीव को कभी भी भगवत् प्राप्ति नहीं होती ।
167. सच्चा धनवान वही है जिसके पास श्रीराम नाम रूपी परमधन है ।
168. प्रभु के श्रीकमलचरणों को हृदय में रखने का भाव जीवन में जागृत करने से हमारा मन निर्मल होता है और निर्मल मन होने से प्रभु मिलते हैं । प्रभु ने श्री रामचरितमानसजी में कहा है कि निर्मल मन वाला ही मुझे पाता है ।
169. प्रभु श्री हनुमानजी ने भगवती सीता माता को अंगूठी देने पर भी अपना परिचय श्रीराम दूत कह कर दिया, यही जीव का सही परिचय है कि वह प्रभु का दास है । यही परिचय देने पर भगवती सीता माता उन पर प्रसन्न हुई ।
170. जब प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी से पूछा कि आप सभी अयोध्यावासियों को अपने धाम ले जा रहे हैं और मुझे पृथ्वी पर रुकने का आदेश दे रहे हैं तो मेरे पास आधार क्या रहेगा तो प्रभु ने उन्हें प्रभु कथा का आधार दिया । इस तरह प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी को ब्रह्मांड के अंत तक पृथ्वी पर रहने को कहा और कथा सुनने का आधार दिया ।
171. श्री रामचरितमानसजी में प्रभु सौगंध खाकर विशेष रूप से बार-बार कहते हैं कि मुझे मेरे सेवक और भक्तों के समान अन्य कोई भी प्रिय नहीं है ।
172. जब लंका दहन और भगवती सीता माता का पता करके आने के बाद प्रभु श्री हनुमानजी कुछ भी लेने को तैयार नहीं हुए तो प्रभु श्री रामजी ने सोचा अब क्या दिया जाए, क्योंकि देना तो प्रभु का स्वभाव है और दिए बिना प्रभु रह ही नहीं सकते । तो फिर प्रभु ने अपनी सबसे दुर्लभ भक्ति का आशीर्वाद दिया । इस दृष्टान्त से प्रभु श्री हनुमानजी हमें सिखाते हैं अगर वे पूरा ब्रहमांड भी मांगते तो उनकी जो भी मांग होती प्रभु तुरंत उसे अपने संकल्प मात्र से तत्काल पूरा कर देते पर वे निष्काम बने रहे तो प्रभु को अंत में अपनी सबसे दुर्लभ भक्ति देनी पड़ी ।
173. श्री रामचरितमानसजी की चौपाई मंत्र स्वरूप है क्योंकि वह प्रभु श्री महादेवजी के हृदय से प्रकट हुई है । इसलिए श्री रामचरितमानसजी की एक-एक चौपाई मंत्र है ।
174. जीवन में जब कभी शुभ कार्य करने का अवसर आए तो सोचना यह चाहिए कि प्रभु यह कार्य मुझसे करवाना चाहते हैं । प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी का लंका से लौटने के पश्चात दुलार कर बड़ाई की तो प्रभु श्री हनुमानजी बोले कि प्रभु बहलाइए मत, चारों दिशाओं में वानर गए थे पर आपने मुद्रिकारूपी अंगूठी निशानी के तौर पर मुझे ही क्यों दी क्योंकि आप मेरे से ही यह कार्य करवाना चाहते थे ।
175. गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि उन्होंने श्रीराम नाम के मणि दीप को अपनी जिह्वा की देहली पर रखा है । इससे भीतर भी प्रकाश होता है और बाहर भी प्रकाश होता है ।
176. सौ करोड़ श्लोकों की श्री रामायणजी के महाकाव्य की रचना प्रभु श्री महादेवजी ने की । देवता, मनुष्य और असुर प्रभु के पास प्रसादी लेने के लिए आए तो प्रभु श्री महादेवजी ने पूरे सौ करोड़ श्लोकों में से एक श्लोक रखकर बाकी तीनों में बांट दिए । जो श्लोक रखा उसमें 32 अक्षर थे । फिर देवताओं, मनुष्यों और असुरों ने निवेदन किया कि यह भी हमें प्रसादी रूप में दें तो प्रभु ने उस अंतिम श्लोक के 10-10-10 अक्षर तीनों में बांट दिए । जो दो शब्द पूरे श्री रामायणजी के सौ करोड़ श्लोकों में से बचे वह “रा” और “म” (राम) थे जिन्हें प्रभु श्री महादेवजी ने सदैव के लिए अपने पास अपने हृदय में रख लिया ।
177. प्रभु श्री हनुमानजी ने अपना कोई घर नहीं रखा और प्रभु श्री रामजी का हृदय ही उनका घर बन गया ।
178. प्रभु श्री रामजी को अपने यश से भी ज्यादा प्रभु श्री हनुमानजी के यश को सुनने में आनंद आता है ।
179. गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्री रामचरितमानसजी में कहते हैं कि वही निपुण है, वही चतुर है, वही सयाना है, वही बुद्धिमान है, वही शास्त्रों का ज्ञाता है, वही गुणी है, वही वीर है और वही योग्य है जो प्रभु का भजन करता है ।
180. संसार के विषय रस से श्रेष्ठ है ब्रह्मानंद का रस, पर उससे भी श्रेष्ठ और सबसे सर्वश्रेष्ठ है भक्ति का रस । राजा श्री जनकजी प्रभु श्री रामजी को देखकर ब्रह्मानंद के रस को भी भूल गए ।
181. प्रभु श्री रामजी का यशगान सुनकर प्रभु श्री हनुमानजी राजी होते हैं और प्रभु श्री हनुमानजी का यशगान सुनकर प्रभु श्री रामजी राजी होते हैं ।
182. श्री हनुमान चालीसाजी गाने से हमें प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता की प्रसन्नता प्राप्त होती है - इसी उद्देश्य से श्री हनुमान चालीसाजी का पाठ करना चाहिए ।
183. प्रभु श्री रामजी को राजी करने का सबसे उत्तम उपाय यही है कि उनके समक्ष प्रभु श्री हनुमानजी का यशगान किया जाए ।
184. जिनकी सिफारिश प्रभु श्री हनुमानजी कर देते हैं उन्हें आँख मूंदकर प्रभु श्री रामजी अपना लेते हैं । श्री सुग्रीवजी और श्री विभीषणजी इसके उदाहरण हैं ।
185. प्रभु श्री हनुमानजी हाथ जोड़कर निरंतर प्रभु श्री रामजी की आज्ञा पालन करने के लिए तत्पर रहते हैं । यही सेवक का धर्म होता है ।
186. प्रभु श्री हनुमानजी का श्रीराम नाम रटन हमेशा चलता ही रहता है ।
187. आराम चाहिए तो आ-राम यानी, आओ राम को जीवन में लाएं और उनकी शरण में जाएं और श्रीराम-श्रीराम जपें ।
188. प्रभु श्री हनुमानजी श्री सुग्रीवजी के साथ हैं तो उन पर श्रीराम कृपा होनी ही थी । सिद्धांत यह है कि जिसके साथ प्रभु श्री हनुमानजी होते हैं श्रीराम कृपा उस जीव पर होकर ही रहती है ।
189. प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी और श्री लक्ष्मणजी को श्री सुग्रीवजी के पास ले जाने के लिए अपने कंधों पर बैठाया और हाथों की हथेली पर नहीं बैठाया । ऐसा क्यों किया ? संत कहते हैं कि हाथों की हथेली पर बैठाने से प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु श्री रामजी को पकड़ना होता पर कंधे पर बैठाने से प्रभु श्री रामजी ने श्री हनुमानजी को पकड़ा । जीव प्रभु को पकड़ कर भी संसार के जंजाल में उलझा रहेगा और इस उलझन में प्रभु को छोड़ सकता है इसलिए उचित यह है कि प्रभु जीव को पकड़ ले क्योंकि प्रभु फिर उसे कभी भी नहीं छोड़ेंगे ।
190. श्रीराम कृपा के मूल में श्रीहनुमंत कृपा होती है । प्रभु श्री हनुमानजी की कृपा से ही प्रभु श्री रामजी की कृपा जीव को मिलती है ।
191. प्रभु श्री हनुमानजी जिस पर कृपा करने को कहते हैं प्रभु श्री रामजी सोचते भी नहीं कि वह कृपा करने के लायक है भी या नहीं और प्रभु श्री हनुमानजी के कहने भर से तत्काल उस पर कृपा कर देते हैं ।
192. प्रभु श्री हनुमानजी सदैव मानते हैं कि उनका अपना कोई बल नहीं है, जो भी है वह प्रभु श्री रामजी का बल है ।
193. नाम जप से ही प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी को अपने प्रेम के वश में कर लिया है ।
194. प्रभु श्री हनुमानजी हमारी वाणी से प्रभु श्री रामजी का नाम सुनकर सबसे अधिक प्रसन्न होते हैं ।
195. हम प्रभु श्री हनुमानजी का भजन करके प्रभु श्री रामजी को पा सकते हैं ।
196. प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी को सबसे बड़ी बात कह दी कि मैं सबके ऋण से उऋण हो जाऊँगा पर तुम्हारे ऋण से कभी भी उऋण नहीं हो सकता ।
197. प्रभु श्री हनुमानजी काम तो सब करते हैं पर करते-करते भी उनकी दृष्टि प्रभु श्री रामजी पर ही रहती है ।
198. जिस जीव को प्रभु श्री हनुमानजी मिलते हैं उन्हें ही प्रभु श्री रामजी भी स्वतः ही मिल जाते हैं ।
199. जहाँ प्रभु श्री हनुमानजी हैं वहीं प्रभु श्री सियारामजी भी हैं ।
200. श्रीरामराज्य के बाद सभी की विदाई हुई पर प्रभु श्री हनुमानजी ने विदा नहीं ली और प्रभु के पास ही रुक गए । प्रभु ने कहा कि मेरा राज्याभिषेक हो गया है अब राज्यसभा में रहना पड़ेगा तो प्रभु श्री हनुमानजी भी कोई राज्यसभा का पद ले लें । प्रभु श्री हनुमानजी बोले कि मुझे देना ही है तो एक नहीं दो पद दें और वे दो पद हैं आपके श्रीकमलचरणरूपी दोनों पद ।
201. प्रभु श्री रामजी जब श्री अयोध्याजी छोड़कर वन गए तो श्री अयोध्याजी में दुर्भाग्य की होड़ लग गई और जब प्रभु वापस आए और उनका राज्याभिषेक हुआ तो श्री अयोध्याजी में सौभाग्य की होड़ लग गई । सूत्र यह है कि प्रभु जिसके जीवन में नहीं है वहाँ दुर्भाग्य है और प्रभु जिसके जीवन में हैं वहीं सौभाग्य है ।
202. बिना प्रभु श्री हनुमानजी की आज्ञा के श्रीराम दरबार में किसी को प्रवेश प्राप्त नहीं होता ।
203. कोई ऐसा क्षण नहीं जब प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु श्री रामजी की सेवा न करते हो । वे निरंतर प्रभु सेवा में ही रहते हैं ।
204. प्रभु श्री हनुमानजी निरंतर प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों को अपनी गोद में लेकर रखते हैं ।
205. प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु श्री रामजी की कोई भी सेवा कभी छोड़ते ही नहीं क्योंकि सभी सेवा उन्हें ही करनी आती है ।
206. श्रीराम नाम में ही प्रभु श्री हनुमानजी विराजते हैं ।
207. प्रभु श्री हनुमानजी का भोजन ही श्रीराम नाम है ।
208. श्रीराम नाम से ही प्रभु श्री हनुमानजी तृप्त होते हैं ।
209. जब भगवती अंजना माता से मिलने प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता गए तो उन्होंने अपने पुत्र प्रभु श्री हनुमानजी को ही उन्हें प्रदान कर दिया । उन्होंने कहा कि मैंने जीवनभर तप कर यही चाहा कि मुझे श्रीरामभक्त पुत्र हो और जब ऐसा पुत्र मिला तो अब मैं उनको आपकी नित्य सेवा में प्रदान करती हूँ ।
210. प्रभु श्री रामजी का नाम जपने वाले की सदा प्रभु श्री हनुमानजी रक्षा करते हैं ।
211. प्रभु श्री रामजी का बाण भी श्रीराम नाम जापक का कुछ नहीं बिगाड़ सकता । श्रीरामबाण अमोघ है फिर भी श्रीराम नाम जापक का बाल भी बाँका नहीं कर सकता । प्रभु ने अपने भक्तों का अमंगल करने की शक्ति अपने शस्त्रों को भी नहीं दी है ।
212. जब श्री काशीजी में प्रभु श्री हनुमानजी गोस्वामी श्री तुलसीदासजी की श्रीरामकथा सुनने आते थे तो एक बार गोस्वामीजी ने उनके श्रीकमलचरण पकड़ लिए । प्रभु श्री हनुमानजी ने पूछा क्या चाहिए तो गोस्वामी श्री तुलसीदासजी बोले कि मुझे श्री सीतारामजी के दर्शन करवा दें । प्रभु श्री हनुमानजी से मांगने योग्य इससे बड़ा कुछ नहीं हो सकता ।
213. प्रभु श्री हनुमानजी की कृपा से श्री सुग्रीवजी, श्री विभीषणजी, गोस्वामी श्री तुलसीदासजी और समर्थ श्री रामदास स्वामीजी जैसे अगणित जनों को प्रभु श्री रामजी के दर्शन हुए तो हमें भी हो सकते हैं ।
214. गर्भावस्था में यदि स्त्री मन लगाकर श्रीमद् भागवतजी और श्री रामायणजी सुनती है तो उसके यहाँ भक्त संतान का जन्म होता है ।
215. प्रभु श्री हनुमानजी की हर क्रिया ही प्रभु श्री रामजी का भजन है ।
216. जब रावण ने प्रभु श्री हनुमानजी की श्रीपूंछ में आग लगाने को कहा तो प्रभु श्री हनुमानजी ने मन-ही-मन प्रभु श्री रामजी का स्मरण किया कि लंका में आग लगाने की प्रेरणा भी आपने ही दी और उसके लिए घी, तेल का इंतजाम भी रावण से ही करवा दिया । फिर सब तरफ से वायु चलवा दी कि आग धधक उठे और इन सब का श्रेय अपने भक्त को दिला दिया ।
217. प्रभु श्री हनुमानजी श्रीरामदास होने का गौरव तो सदैव महसूस करते हैं पर इसका अभिमान अपने भीतर नहीं आने देते । यही उनकी महानता है ।
218. प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु श्री रामजी के कितने बड़े सेवक हैं जो प्रभु उनसे कहते हैं कि वे उनकी सेवा द्वारा चढ़ाए ऋण से कभी और कुछ भी करके उऋण नहीं हो सकते ।
219. प्रभु श्री हनुमानजी ने पूर्ण निष्ठा के साथ प्रभु श्री सीतारामजी की सेवा की और बदले में कुछ भी नहीं चाहा । यही उनकी महानता है ।
220. जब प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी से कहा कि उनके कारण श्री सुग्रीवजी को किष्किंधा का पद, श्री विभीषणजी को लंका के राजा का पद और स्वयं प्रभु श्री रामजी को श्री अयोध्याजी के राजा का पद मिला पर प्रभु श्री हनुमानजी को कौन-सा पद मिला ? प्रभु श्री हनुमानजी ने बड़ा सुंदर उत्तर दिया कि आप सबको मेरे कारण एक-एक पद मिला तो मुझे भी प्रभु श्री रामजी के दोनों श्रीकमलचरण पद मिले इसलिए वे दुगुने हर्षित हैं ।
221. गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्री सुंदरकांडजी के आरंभ में प्रभु श्री रामजी से मांगते हैं कि भगवती सीता माता प्रभु श्री हनुमानजी को लंका में भक्ति का दान करें इससे पहले आप मुझे भक्ति का दान कर दें तो आपका यश माता से भी ज्यादा बढ़ जाएगा । प्रभु श्री रामजी ने पूछा कैसे ? तो गोस्वामीजी बोले कि माता तो सबसे सुपात्र भक्त प्रभु श्री हनुमानजी को भक्ति का दान करेगी पर आप तो सबसे कुपात्र गोस्वामीजी को उससे पहले ही भक्ति दान कर चुके होंगे । सब कहेंगे कि योग्य को देखकर तो सब देते हैं पर प्रभु श्री रामजी की उदारता देखें कि गोस्वामीजी जैसे अयोग्य को भी भक्ति का दान दे दिया ।
222. प्रभु श्री हनुमानजी से श्रीराम भक्ति और प्रभु श्री रामजी के अतिरिक्त हम कुछ भी मांगेंगे तो वे दे देंगे पर देने पर भी उन्हें अच्छा नहीं लगेगा ।
223. प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु श्री रामजी से श्रीराम भक्ति के सिवा कुछ भी नहीं चाहिए ।
224. प्रभु श्री हनुमानजी ने अपने बल, बुद्धि और सारे सद्गुणों को श्रीराम काज हेतु अर्पित किया । आज संसार में बल, बुद्धि और गुण रखने वाले तो मिल जाएंगे पर उनमें कितने हैं जो उसका उपयोग प्रभु कार्य के लिए करना चाहते हैं ।
225. प्रभु श्री रामजी तक पहुँचने के लिए प्रभु श्री हनुमानजी की कृपा आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है ।
226. प्रभु श्री रामजी जब प्रभु श्री हनुमानजी के गुण किसी से स्तुति में सुनते हैं तो वे प्रसन्न नहीं, अति प्रसन्न होते हैं ।
227. प्रभु श्री हनुमानजी श्री रामायणजी के सबसे बड़े वक्ता और सबसे बड़े श्रोता हैं ।
228. प्रभु श्री हनुमानजी से कोई उनका परिचय पूछे तो वे श्रीरामदास के रूप में ही सदैव अपना परिचय देते हैं ।
229. प्रभु श्री हनुमानजी श्रीराम सेवा और श्रीराम काज के लिए सदा तैयार और आतुर रहते हैं ।
230. प्रभु का नाम ही हमारी जिह्वा का सच्चा आभूषण है । इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी ने श्रीराम नाम अंकित मुद्रिका को अपने श्रीमुख में जिह्वा पर रख लिया ।
231. श्री जटायुजी ने अपने पंख श्रीराम कार्य में कटवाए और उनका पंख कटवाना सफल हो गया जब प्रभु ने उन्हें अपने धाम भेज दिया और उनकी सद्गति हो गई ।
232. प्रभु श्री रामजी प्रभु श्री हनुमानजी का बखान अपने श्रीमुख से करते हुए कहते हैं कि उन्होंने बहुत बड़ा उपकार प्रभु पर किया है । प्रभु इसका बदला कैसे भी करके नहीं चुका सकते और प्रभु उनसे कैसे भी उऋण नहीं हो सकते । प्रभु बोले कि पूरे जगत में ऐसा कोई देव, मुनि, मनुष्य या अन्य कोई शरीरधारी नहीं है जो प्रभु श्री हनुमानजी जैसा उनका उपकारी हो । प्रभु बोले कि वे क्या प्रति उपकार करें और कैसे प्रभु श्री हनुमानजी की सेवा का उपकार चुकाए, यह उनकी समझ में नहीं आ रहा । संत विनोद में कहते हैं कि प्रभु श्री रामजी प्रभु श्री हनुमानजी से इतना प्रेम करते हैं कि सदा के लिए उनके ऋणी बने रहना चाहते हैं ।
233. एक संत का भाव है कि जब प्रभु श्री रामजी ने अपने श्रीमुख से प्रभु श्री हनुमानजी की प्रशंसा की तो प्रभु श्री हनुमानजी को पता था कि प्रशंसा से अभिमान आएगा और अभिमान गिराएगा । तो प्रभु श्री हनुमानजी ने सोचा कि गिरना ही है तो पहले ही प्रभु के श्रीकमलचरणों में गिर जाना चाहिए और रक्षा करें, रक्षा करें ऐसा कहकर वे प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों में गिर पड़े ।
234. प्रभु श्री रामजी से जब कोई जीव भक्ति मांगता है तो प्रभु श्री हनुमानजी बहुत राजी होते हैं और उसके पीठ पर हाथ रखकर कहते हैं कि प्रभु से यही मांगना चाहिए और उसकी सिफारिश प्रभु श्री रामजी से कर देते हैं ।
235. जो प्रभु श्री हनुमानजी की बात मानते हैं उन्हें प्रभु श्री रामजी अपना लेते हैं । श्री सुग्रीवजी ने बात मानी तो बालि को मारकर उन्हें अपनाया । श्री विभीषणजी ने बात मानी तो रावण को मारकर उन्हें अपनाया ।
236. प्रभु श्री हनुमानजी से जो कुछ भी मांगे वह मिलता है पर अगर उनसे हम प्रभु श्री रामजी की प्रीति मांगते हैं तो वे अत्यधिक प्रसन्न होते हैं ।
237. प्रभु श्री रामजी बालि से मैत्री करते तो बालि रावण को आदेश दे देता और रावण को बात माननी पड़ती । पर प्रभु श्री रामजी राजनीति से नहीं रामनीति से चलते हैं जो निर्बल का साथ देती है और अन्याय से सताए का साथ देती है जैसे उन्होंने श्री सुग्रीवजी का साथ दिया ।
238. श्री सुग्रीवजी में अनेक कमियां होते हुए भी प्रभु श्री रामजी ने उन्हें अपनाया क्योंकि प्रभु श्री हनुमानजी उनके पक्ष में थे, यही एकमात्र कारण था ।
239. प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु श्री रामजी को लेकर श्री सुग्रीवजी के पास गए । वे श्री सुग्रीवजी को लेकर प्रभु के पास आ सकते थे पर प्रभु श्री हनुमानजी जानते थे कि श्री सुग्रीवजी अगर नाता जोड़ेंगे तो तोड़ भी सकते हैं पर अगर प्रभु नाता जोड़ेंगे तो कभी तोड़ेंगे नहीं ।
240. प्रभु श्री हनुमानजी जैसा बड़भागी कोई नहीं और प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों का परम अनुरागी भी उनके जैसा कोई नहीं है । यह बात स्वयं प्रभु श्री महादेवजी ने भगवती पार्वती माता को कही है ।
241. प्रभु श्री हनुमानजी के प्रभु प्रेम और प्रभु सेवा का बखान बार-बार प्रभु श्री रामजी अपने श्रीमुख से करते हैं ।
242. प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि उनके पास वह धन नहीं है जिसे देकर वे प्रभु श्री हनुमानजी के ऋण से उऋण हो सकें ।
243. जहाँ प्रभु के भक्त प्रभु श्री रामजी के सद्गुणों का गायन करते हैं वहाँ प्रभु श्री हनुमानजी सदैव उपस्थित रहते हैं ।
244. हम अगर संसार के जंजालों से निकलकर प्रभु तक नहीं पहुँच सकते तो हमें प्रभु श्री हनुमानजी का आश्रय लेना चाहिए जिससे वे प्रभु श्री रामजी को हमारे तक ले आएंगे जैसे वे प्रभु को श्री सुग्रीवजी के पास ले गए थे ।
245. प्रभु श्री हनुमानजी के प्रेम और सेवा की सराहना प्रभु श्री रामजी बार-बार अपने श्रीमुख से करते ही रहते हैं ।
246. संसारी को सांसारिक कामकाज से फुर्सत नहीं होती है और भक्तों को श्रीराम काज से फुर्सत नहीं होती है ।
247. प्रभु श्री हनुमानजी को महाप्रभु भी कहते हैं । सारा संसार जिनके वश में हो वे प्रभु श्री रामजी और ऐसे प्रभु जिनके वश में हो वे महाप्रभु श्री हनुमानजी ।
248. प्रभु श्री रामजी प्रभु श्री हनुमानजी को अपने से भी अधिक प्रेम और मान देते हैं ।
249. प्रभु श्री हनुमानजी से बड़ा बड़भागी कोई नहीं है और न ही उनके समान कोई प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों का अनुरागी है ।
250. सारा संसार प्रभु श्री रामजी के गुणों का गान करता है और प्रभु श्री रामजी प्रभु श्री हनुमानजी के गुणों का बखान अपने श्रीमुख से करते कभी थकते नहीं ।
251. जब प्रभु श्री हनुमानजी से किसी ने पूछा कि आप प्रभु की मुद्रिका लेकर गए थे तो प्रभु श्री हनुमानजी ने जवाब दिया कि प्रभु की मुद्रिका में अंकित श्रीराम नाम ही उन्हें लेकर गया था ।
252. जब प्रभु श्री हनुमानजी के लंका दहन के बाद प्रभु श्री रामजी ने उनसे उऋण नहीं होने की बात कही तो वे प्रभु के श्रीकमलचरणों में गिर पड़े । संत भाव देते हैं कि प्रशंसा हो तो अभिमान आता ही है और अभिमान आने पर जीवन में गिरना ही होता है । इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी ने दिखाया कि संसार में गिरने से बचना है तो प्रभु के श्रीकमलचरणों में गिर जाना चाहिए ।
253. सारे श्रीराम भक्त प्रभु श्री हनुमानजी के ऋणी हैं क्योंकि उनकी अनुकंपा से ही प्रभु श्री रामजी से उनका मिलन संभव होता है ।
254. संत मानते हैं कि पूरा जगत ही प्रभु श्री हनुमानजी का ऋणी है क्योंकि जब प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता ही उनके ऋणी हैं तो फिर ऋणी होने से बचा कौन ? क्योंकि सिद्धांत है कि जिनके जगतपति और जगतमाता ऋणी होते हैं उनका जगत स्वतः ही ऋणी होता है ।
255. श्रीराम भक्त यही चाहता है कि श्री सीतारामजी के श्रीकमलचरणों में प्रभु श्री हनुमानजी रहें और प्रभु श्री हनुमानजी के श्रीकमलचरणों में श्रीराम भक्त रहे ।
256. प्रभु श्री महादेवजी की करुणा देखें कि जब श्री चंद्रदेवजी उनकी शरण में उनके श्रीकमलचरणों में स्थान पाने के लिए आए तो प्रभु श्री महादेवजी ने उन्हें अपने श्रीकमलचरणों में नहीं बल्कि अपने मस्तक पर स्थान दिया । प्रभु श्री महादेवजी ने कहा क्योंकि श्री चंद्रदेवजी का नाम प्रभु श्री रामजी से जुड़ा हुआ है यानी प्रभु श्री रामजी श्री रामचंद्रजी कहलाते हैं और प्रभु श्री कृष्णजी श्री चंद्रवंश में पधारे हैं इसलिए श्री चंद्रदेवजी को सम्मान देकर उन्हें मस्तक पर स्थान दिया ।
257. प्रभु श्री महादेवजी से बड़ा श्रीराम नाम और श्रीकृष्ण नाम का प्रभाव जानने वाला कोई नहीं है ।
258. एक संत एक सत्य घटना बताते थे कि एक हवेली में एक सेठ-सेठानी रहते थे जिनका नाम राम और सीता था और वे सच्चे वैष्णव थे । उनकी सेवा भी प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता की थी । एक रात उनके वृद्ध पिता को प्यास लगी । पास में रखा पानी खत्म हो चुका था तो उन्होंने अपनी बहू को आवाज लगाई । घर में बहू सीता गहरी नींद सोई हुई थी तो वह नहीं उठ पाई पर भगवती सीता माता एक आवाज में तुरंत पहुँच गई और माता ने स्वयं आकर उन्हें जल पिलाया और कृतकृत्य कर दिया ।
259. प्रेम भाव के कारण भगवती शबरीजी की कुटिया पर जाकर प्रभु श्री रामजी को भूख लगती है ।
260. श्री रामचरितमानसजी के श्री सुंदरकांडजी की व्याख्या करते हुए एक संत ने कहा है कि जग में सुंदर वही है जिसके मुँह में श्रीराम नाम हो और हाथ में श्रीराम का काम हो । प्रभु श्री हनुमानजी इसलिए सुंदर हैं क्योंकि वे श्रीराम नाम लेकर श्रीराम कार्य के लिए इस कांड में जाते हैं । इसलिए इस कांड का नाम श्री सुंदरकांड पड़ा ।
261. गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि पूरा जगत प्रभु श्री रामजी के वश में है पर उन प्रभु श्री रामजी को प्रभु श्री हनुमानजी ने अपनी भक्ति से अपने वश में कर रखा है ।
262. प्रभु श्री हनुमानजी से प्रभु श्री सीतारामजी के दर्शन के अलावा कुछ नहीं मांगना चाहिए । सबसे बड़ी श्रीहनुमान कृपा यही है ।
263. श्री लक्ष्मणजी के नाम की एक संत ने बहुत सुंदर व्याख्या की है कि जिनका मन सदैव लक्ष्य पर लगा रहता है वे श्री लक्ष्मण हैं । श्री लक्ष्मणजी के परम लक्ष्य प्रभु श्री रामजी हैं ।
264. लंका युद्ध में प्रभु श्री हनुमानजी, श्री अंगदजी, श्री जाम्बवंतजी जिन राक्षसों को मारते उन्हें प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों में फेंक देते । समीप खड़े श्री विभीषणजी उनका नाम प्रभु को बताते और प्रभु उन्हें मोक्ष देकर अपने धाम भेज देते ।
265. जो सबमें रमे हुए हैं इस कारण प्रभु का एक नाम “राम” पड़ा है ।
266. श्रीराम काज के लिए हमारे जीवन में भरपूर समय होना चाहिए यानी प्रभु के लिए जीवन में भरपूर समय निकलना चाहिए ।
267. श्री विभीषणजी जब प्रभु की शरण में आए तो उन्होंने प्रभु से पूछा कि आपने तो निशाचरों का संहार करके भूमि की रक्षा करने का प्रण लिया है और मैं भी तो उसी निशाचर कुल से हूँ । प्रभु श्री रामजी बोले कि तुम्हें लंका में मेरे प्रिय भक्त श्री हनुमानजी ने अपना लिया और भ्राता कहकर संबोधित किया जिसके कारण तुम निशाचर कुल से निकल कर वैष्णव कुल के हो गए इसलिए मैं भूमि को तो निशाचरहीन करूंगा पर तुम्हें अभय करके शरण में लूँगा ।
268. प्रभु से भिन्न हमारा कोई परिचय नहीं होना चाहिए । हम श्री रामजी के दास, सखा, भ्राता ऐसा परिचय हमारा होना चाहिए ।
269. जब प्रभु श्री हनुमानजी ने भगवती सीता माता से लंका में कहा कि अभी पीठ पर बैठाकर मैं आपको प्रभु के पास पहुँचा दूंगा तो माता ने पूछा कि क्या ऐसा करने के लिए प्रभु श्री रामजी ने कहा है । प्रभु श्री हनुमानजी ने कहा कि “नहीं” तो माता ने कहा कि जो प्रभु इच्छा होगी वे वही करेंगी । हमें भी प्रभु इच्छा को जीवन में सबसे ज्यादा महत्व देना और मानना चाहिए ।
270. प्रभु श्री रामजी ने देवतागणों से और भगवती सीता माता से अपने लाड़ले प्रभु श्री हनुमानजी को वरदान दिलवाया और स्वयं सभी वरदानों का शिरोमणि वरदान “भक्ति का वरदान” दिया ।
271. श्री भरतलालजी ने प्रभु श्री रामजी का पराकाष्ठा का प्रेम पाया था ।
272. प्रभु श्री सीतारामजी का अतिशय दुलार प्रभु श्री हनुमानजी को मिला ।
273. आज के भाई संपत्ति में हिस्सा बांटते हैं पर श्री रामचरितमानसजी में श्री अयोध्याजी के भाई श्री लक्ष्मणजी, श्री भरतलालजी अपने भाई प्रभु श्री रामजी की विपत्ति की श्रीलीला में विपत्ति बांटते हैं ।
274. जब धोबी की वार्ता पर प्रभु ने श्रीराम राज्य में भगवती सीता माता को ऋषि श्री वाल्मीकिजी के आश्रम भेजा तो वहाँ की साध्वी ने कहा कि पहले 14 वर्ष का वनवास, फिर 11 महीने लंका में, फिर अग्नि परीक्षा और अब फिर वन का वास । उन्होंने कहा कि सीता माता श्री गंगाजी में डूबकर आत्मदाह क्यों नहीं कर लेती क्योंकि उन्हें जीवनभर क्या सुख मिला ? मेरी माता ने उत्तर दिया कि प्रभु का आदेश नहीं है आत्मदाह के लिए श्री गंगाजी में डूबने का । अगर ऐसा करती हूँ तो यह पतिव्रत धर्म के अनुरूप नहीं होगा । मेरे पति द्वारा मुझे वन में रहने का आदेश है । पतिव्रत धर्म के अनुसार मैं वही करूँगी जो मेरे पतिदेव ने कहा है । ऐसा अलौकिक पतिव्रत धर्म भगवती सीता माता ने सबको निभाकर दिखाया ।
275. भगवती सीता माता ने प्रभु श्री रामजी के सुयश को उजागर करने का कार्य किया नहीं तो वे एक बार कोप-दृष्टि से लंका में रावण को देख लेती तो रावण जलकर उसी समय भस्म हो जाता है पर माता रावण को मारने का यश प्रभु को दिलाना चाहती थीं ।
276. प्रभु श्री रामजी के श्रीचरित्र के सौंदर्य की मिसाल पूरे ब्रह्मांड में अन्य कहीं भी नहीं मिलेगी ।
277. अपने अवतार काल में संकट की श्रीलीला करते हुए प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि वे संकट में थे तो प्रभु श्री हनुमानजी ने संकटमोचन बनकर कार्य किया जिसका ऋण प्रभु श्री रामजी पर चढ़ गया । प्रभु श्री रामजी कितने दयालु है कि वे सदैव के लिए ऋणी बने रहना चाहते हैं । ऐसा इसलिए कि ऋण उतारने के लिए प्रभु श्री हनुमानजी को संकट में पड़ना पड़ेगा तब प्रभु श्री रामजी संकटमोचन बनकर ऋण उतार सकेंगे । पर प्रभु श्री रामजी कभी नहीं चाहते कि उनका प्रिय श्रीहनुमान कभी भी, कैसे भी संकट में पड़े । इसलिए प्रभु श्री रामजी सदैव प्रभु श्री हनुमानजी के ऋणी बनकर रहना ही पसंद करते हैं ।
278. इतने भाव से प्रभु श्री रामजी को उनके अतिशय प्रिय प्रभु श्री हनुमानजी का सुंदरकांड सुनाए कि प्रभु श्री रामजी के श्रीनेत्रों में अपने प्रिय भक्त का श्रीचरित्र सुनकर आंसू आ जाए ।
279. प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु श्री रामजी का गुणगान सुनाएं तो वे मग्न होकर सुनेंगे ।
280. एक बार चित्रकूटजी में प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता एक वृक्ष के नीचे बैठे थे जिस पर एक लता फूलों से लदी थी । प्रभु श्री रामजी ने इशारे से कहा कि लक्ष्मण यह वृक्ष कितना सौभाग्यशाली है कि इसको इतनी सुंदर लता मिली । भगवती सीता माता इशारा समझ गई और बोली कि लक्ष्मण यह लता कितनी भाग्यशाली है कि इससे इतना विशाल वृक्ष फैलने के लिए मिला । प्रभु श्री रामजी लता के रूप में भगवती सीता माता की बड़ाई कर रहे थे और माता वृक्ष के रूप में प्रभु श्री रामजी की बड़ाई कर रही थी । श्री लक्ष्मणजी असमंजस में पड़ गए कि अगर वृक्ष की बड़ाई करता हूँ तो माता प्रसन्न होगी और सुंदर लता की बड़ाई करता हूँ तो प्रभु प्रसन्न होंगे । श्री लक्ष्मणजी बोले कि प्रभु और माता लता को पाकर वृक्ष और वृक्ष को पाकर लता कितनी धन्य हो रही है कि यह वे दोनों जाने पर मैं लक्ष्मण सबसे ज्यादा धन्य हूँ जो वृक्ष और लता दोनों की छाया में बैठा हुआ हूँ ।
281. प्रभु श्री रामजी श्री भरतलालजी से कहते हैं कि मेरे लिए चौदह वर्ष तो श्री अयोध्याजी को संभाल लो तो श्री भरतलालजी कहते हैं कि स्वामी और राजा बनकर नहीं बल्कि आपका दास और सेवक बनकर मालिक की संपत्ति मुनीम की तरह मैं संभालूंगा ।
282. प्रभु श्री रामजी इतने कृपालु हैं कि स्वधाम जाने से पहले अपने राज्य के पूरे समाज को, यहाँ तक कि सभी पशु-पक्षी और वनस्पति यानी पेड़-घास सबको अपने धाम ले गए ।
283. भगवती पार्वती माता प्रभु श्री महादेवजी से कहतीं हैं कि श्रीराम कथा के संदर्भ में जो प्रश्न मैंने पूछे हैं और जो प्रश्न मैंने नहीं पूछे हैं क्योंकि मेरी बुद्धि में नहीं आए हैं उन सबका उत्तर कथा रूप में दें । माता की ऐसी जिज्ञासा सुनकर प्रभु श्री महादेवजी बहुत प्रसन्न हुए ।
284. प्रभु श्री रामजी की कृपा से जीवन में मर्यादा आती है ।
285. प्रभु श्री महादेवजी अपने हृदय में क्षण-क्षण प्रभु श्री रामजी को और प्रभु श्री रामजी अपने हृदय में क्षण-क्षण प्रभु श्री महादेवजी को संभाल कर रखते हैं ।
286. वही रामनवमी सार्थक है जिसमें हमारे हृदय पटल पर प्रभु श्री रामजी प्रकट होंगे ।
287. प्रभु श्री रामजी ने नवमी तिथि जो रिक्ता थी उसे अपने प्राकट्य दिवस के लिए अपनाया । संत कहते हैं कि रिक्ता को भरने वाले जगत में एकमात्र प्रभु ही हैं । भरे हुए को भरने के लिए दुनिया में होड़ लग जाती है पर रिक्ता की तरफ कोई नहीं देखता । रिक्ता को केवल प्रभु ही अपनाते हैं ।
288. भगवती पार्वती माता ने प्रभु श्री रामजी के अवतार का कारण, बाल लीला, विवाह, वन लीला सबके बारे में प्रभु श्री महादेवजी से पूछा और फिर कहा कि जो मेरे पूछने में बाकी रह गया यानी जो मैं पूछ नहीं पाई उसे भी बताएं यानी कुछ भी शेष छुपा कर नहीं रखें । ऐसी जिज्ञासा प्रभु के विषय में हमें भी होनी चाहिए ।
289. प्रभु श्री महादेवजी परम ईश्वर हैं पर ईश्वरत्व उन्हें श्रीरामावतार में प्यारा नहीं लगा । वे सेवक बनकर प्रभु श्री हनुमानजी के रूप में प्रभु की सेवा करने के लिए अपनी प्रभुता भुलाकर उतर गए ।
290. प्रभु श्री रामजी के पास बाल्यकाल में प्रभु श्री हनुमानजी वानर रूप में रहे । फिर जब ऋषि श्री विश्वामित्रजी के साथ प्रभु गए तो प्रभु ने कहा कि अब ऋषिमुख पर्वत पर मिलना होगा । प्रभु श्री रामजी ने कहा कि इतने वर्षों बाद मुझे पहचान तो लोगे । प्रभु श्री हनुमानजी ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि आपकी कृपा बनी रहेगी तो पहचान लूंगा और अगर आप माया का पर्दा डाल देंगे तो नहीं पहचान पाऊंगा । इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी से कहा कि सदा अपनी कृपा उन पर बनाए रखें ।
291. श्रीरामावतार में श्रीमिथिला की फुलवारी में माता की सखी प्रभु श्री रामजी से कहती है कि आप कैसे पुष्प तोड़ेंगे, कहीं फूल की कोमल कली आपको चुभ न जाए । उन्होंने यह नहीं कहा कि फूल के डंठल या कांटे चुभ न जाए, उन्होंने कहा कि फूल की पंखुड़ी चुभ न जाए यानी प्रभु की कोमलता इतनी है कि फूल की पंखुड़ी जो सबसे कोमल होती है वह भी प्रभु को वेदना दे सकती है ।
292. श्री रामचरितमानसजी में मुनि श्री सुतीक्ष्णजी ने प्रभु से मांगा कि मेरा एक अभिमान कभी न जाए, ऐसा वर दें । श्री लक्ष्मणजी ने प्रभु श्री रामजी से कहा कि यह निराले संत हैं क्योंकि सब लोग आपसे मांगते हैं कि मैं अभिमान रहित रहूँ जिससे आपको प्रिय हो जाऊँ पर यह मुनि अलग ही मांग रहे हैं । प्रभु ने कहा कि उनकी पूरी बात तो सुन लें । मुनि ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा कि यह अभिमान मेरा कभी नहीं जाए कि मैं सेवक रघुपति का और रघुपति मेरे स्वामी हैं । मुनि ने कहा कि यह अभिमान प्रभु से मिलाने वाला है इसलिए मैं सदैव इसे रखना चाहता हूँ ।
293. एक संत ने भाव दिया है कि श्री मिथिलाजी के माली फुलवारी में प्रभु श्री रामजी से कहते हैं कि आप तो तोड़ेंगे दो-चार फूल पर बाकी सब फूल अपने आप गिरेंगे क्योंकि आपने उन्हें अपनी सेवा के लिए नहीं चुना इसलिए बाकी सभी फूल गिरकर अपना जीवन समाप्त कर लेंगे ।
294. अपना जन्म और जीवन प्रभु के लिए न्यौछावर कर देना चाहिए जैसे वानरों ने प्रभु श्री रामजी के लिए किया था । प्रभु ने यह बात गुरु श्री वशिष्ठजी को कही कि यह सब वानर मेरे हैं क्योंकि इन्होंने अपना जन्म और जीवन मुझे और मेरे कार्य के लिए समर्पित कर दिया है ।
295. श्रीराम ही श्रीसिया हैं और श्रीसिया ही श्रीराम हैं, यह तो केवल भिन्न-भिन्न उनके नाम हैं ।
296. घट-घट में प्रभु रमे हुए हैं इसलिए प्रभु का एक नाम श्रीराम है ।
297. गोस्वामी श्री तुलसीदासजी भगवती सीता माता से प्रार्थना करते हैं कि कभी समय देखकर मेरी चर्चा प्रभु श्री रामजी के समक्ष चला दें । वे सीधे प्रभु श्री रामजी से नहीं कहते बल्कि भगवती सीता माता और प्रभु श्री हनुमानजी से कहते हैं कि उन्हें श्रीराम कृपा दिल दें ।
298. महाराज श्री जनकजी प्रभु श्री रामजी को देखकर अपना ब्रह्म ज्ञान भूलकर श्रीराम रंग में रंग गए ।
299. श्री जनकपुर के दूत श्री अयोध्याजी में राज्यसभा में महाराज श्री दशरथजी के पूछने पर प्रभु श्री रामजी के बारे में कहते हैं कि उनके रोम-रोम में कोटि-कोटि श्री कामदेवजी का सौंदर्य छिपा हुआ है । प्रभु कितने सुंदर हैं कि प्रभु के एक रोम की सुंदरता को करोड़ों-करोड़ों श्री कामदेवजी से भी तुलना की जाए तो भी कम होगी ।
300. प्रभु श्री रामजी अनंत सद्गुणों के महासागर हैं ।
301. श्री जनकपुरवासी कहते हैं कि प्रभु श्री रामजी को पाकर उन्होंने जीवन भर के लिए अपने नेत्र होने का फल पा लिया । प्रभु की सुंदरता को निहारना ही नेत्रों का एकमात्र फल होता है ।
302. प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता के विवाह का परमानंद श्री अवधवासियों और श्री मिथिलावासियों के हृदय में लबालब भरकर मानो अट ही नहीं रहा और बाहर छलक रहा है ।
303. प्रभु श्री रामजी का श्रीचरित्र प्रभु श्री हनुमानजी के बिना पूरा नहीं हो सकता और प्रभु श्री हनुमानजी का श्रीचरित्र प्रभु श्री रामजी के बिना पूरा नहीं हो सकता ।
304. प्रभु श्री हनुमानजी सर्वत्र अपना जो परिचय देते हैं वह श्री रामदास के रूप में ही देते हैं । श्री रामदास का संबोधन उन्हें अत्यंत ही प्रिय है ।
305. सच्चे भक्तों को जब प्रभु श्री हनुमानजी का स्मरण होता है तो अपने आप ही प्रभु श्री रामजी का भी स्मरण हो जाता है क्योंकि वे दो नहीं बल्कि एक ही हैं ।
306. भक्त श्री हनुमानजी इतने महान हैं तो उनके प्रभु श्री रामजी कितने महान होंगे इस तरह प्रभु श्री रामजी की मानस प्रतिमा हर श्रीहनुमान भक्त के हृदय में अंकित हो जाती है । यह सच्चा श्री राम दासत्व है ।
307. प्रभु श्री हनुमानजी के सभी सद्गुणों का सार भक्ति है यानी उनकी भक्ति उनके सभी सद्गुणों का मानो शिखर है । उनके सभी सद्गुणों का समर्पण प्रभु श्री रामजी के लिए है । प्रभु श्री रामजी की सेवा में ही उनके सभी सद्गुण लगे हुए हैं ।
308. प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु श्री रामजी की सेवा के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं लगता, यहाँ तक कि विश्राम भी अच्छा नहीं लगता ।
309. प्रभु श्री रामजी का कोई भी कार्य करने के लिए प्रभु श्री हनुमानजी सदा तत्पर और प्रस्तुत रहते हैं ।
310. प्रभु श्री हनुमानजी के हृदय में प्रभु श्री सीतारामजी हैं इसलिए संसार कभी नहीं घुसा । हमारे हृदय में प्रभु नहीं हैं इसलिए संसार और परिवार हरदम घुसा ही रहता है ।
311. प्रभु श्री हनुमानजी जैसा ज्ञानी, वैराग्यशील और भक्त अन्य कोई भी नहीं है । इसलिए ही उनके हृदय में प्रभु श्री रामजी ज्ञानरूप में, भगवती सीता माता भक्तिरूप में और श्री लक्ष्मणजी वैराग्यरूप में बसते हैं ।
312. प्रभु श्री राम जी खुले आम यह बात कहते हैं कि उन्हें श्री हनुमानजी सर्वाधिक प्रिय हैं ।
313. प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि पूरे रघुकुल सहित वे सदा प्रभु श्री हनुमानजी के ऋणी रहेंगे ।
314. संसार को मर्यादा का दर्शन करवाने वाले प्रभु श्री रामजी हैं ।
315. सच्चे संतों को प्रभु और माता का श्री रामावतार में वनवास में वन-वन भटकना, भगवती सीता माता का अग्नि परीक्षा देना और फिर धोबी के कहने पर फिर वन भेजा जाना अच्छा नहीं लगता । संत कहते हैं कि कृतघ्न जीव पर करुणा नहीं करनी चाहिए और उनके लिए मनुष्य लीला करते हुए प्रभु और माता को इतना कष्ट नहीं सहना चाहिए । कृतघ्न जीवों को उनके कुकर्म भोगने के लिए छोड़ देना चाहिए पर प्रभु और माता इतनी करुणामय हैं कि उनका भी हित करने के लिए स्वयं कष्ट उठाते हैं ।
316. जब भी श्रीराम का नाम लिया जाएगा तो कितना भी अमंगल जीवन में आ रहा हो उसका नाश हो जाएगा और मंगल-ही-मंगल होने लगेगा क्योंकि प्रभु का नाम मंगल का भवन और अमंगल हारी है ।
317. प्रभु श्री रामजी ने पिता तुल्य मानकर जो श्री जटायुजी को गति दी उससे उनका सौभाग्य जग जाहिर हो गया ।
318. जितनी भी शिक्षा प्रभु श्री रामजी के श्रीचरित्र से हम प्राप्त कर सकते हैं, उतनी करने से हमारा जीवन पूर्ण मंगलमय हो जाएगा ।
319. श्रीमद् भगवद् गीताजी के समस्त उपदेशों के साकार मूर्ति प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी हैं ।
320. प्रभु श्री रामजी में स्थिरप्रज्ञ के पूर्ण लक्षण ऋषि श्री वशिष्ठजी ने श्री भरतलालजी को बताए । उन्होंने कहा कि जब मैंने राज्याभिषेक की वार्ता दी और जब वनवास की वार्ता मिली तो दोनों अवस्था में प्रभु श्री रामजी के मनोभाव में रंच मात्र भी फर्क नहीं आया । राज्याभिषेक की वार्ता सुनकर न प्रभु प्रसन्न हुए और न ही वनवास के लिए प्रस्थान करते वक्त खिन्न हुए ।
321. प्रभु श्री रामजी में न राज्य की आसक्ति, न वनगमन का भय, न वनवास दिए जाने पर क्रोध था । प्रभु ने स्थिरप्रज्ञ को आदर्श रूप में चरितार्थ करके दिखाया ।
322. प्रभु श्री रामजी अपने मानव लीला के उदाहरण द्वारा हमें शिक्षा देते हैं ।
323. प्रभु कहते हैं कि इंद्रियां बलवान हैं, इंद्रियों से मन बलवान है, मन से बुद्धि बलवान है पर बुद्धि से भी काम, जो सबसे बड़ा शत्रु है, वह बलवान है । पर प्रभु सबसे बलवान हैं इसलिए अगर श्रीराम को पकड़कर रखेंगे तो काम हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा ।
324. भगवान हमारे भीतर हैं और हमने उनसे पहचान नहीं करी । श्रीराम से पहचान कर लें तो प्रभु कामनारूपी रावण का हमारे भीतर नाश कर श्रीराम राज्य की स्थापना कर देंगे ।
325. पढ़े-लिखे पर शास्त्र-संस्कार विहीन लोगों को ऐसा लगता है कि प्रभु श्री रामजी या प्रभु श्री कृष्णजी महापुरुष हैं । यह गलत है क्योंकि प्रभु महापुरुष नहीं, प्रभु भगवान हैं, प्रभु ईश्वर हैं ।
326. संतों की व्याख्या है कि प्रभु के अवतार का एक हेतु अपने आचरण से लोक शिक्षा देना होता है । मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री रामजी ने ऐसा करके दिखाया और मर्यादापूर्ण जीवन की शिक्षा दी ।
327. जीवन मूल्यों की शिक्षा देने प्रभु श्री रामजी अवतार लेकर आए । प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी के समक्ष यह बात कही थी ।
328. गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने श्री रामचरितमानसजी में प्रभु से प्रभु के प्रति आसक्ति मांगी है । कितनी आसक्ति, जितनी कामी को स्त्री से और लोभी को धन से होती है ।
329. श्रीराम नाम को सहस्त्रनाम तुल्य माना गया है । कभी इसमें तनिक भी संदेह रखकर यह नहीं सोचना चाहिए कि यह बढ़ा चढ़ाकर की गई श्रीराम नाम की प्रशंसा है क्योंकि यह परम सत्य है ।
330. प्रभु श्री रामजी आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श स्वामी, आदर्श भाई, आदर्श राजा, आदर्श मित्र और आदर्श शत्रु बने यानी सब कुछ में वे आदर्श हैं । आदर्श पुत्र श्री दशरथजी और भगवती कौशल्या माता के लिए, आदर्श पति भगवती सीता माता के लिए, आदर्श स्वामी प्रभु श्री हनुमानजी के लिए, आदर्श भाई श्री भरतलालजी, श्री लक्ष्मणलालजी और श्री शत्रुघ्नलालजी के लिए, आदर्श राजा श्री अयोध्यावासियों के लिए, आदर्श मित्र श्री सुग्रीवजी और श्री विभीषणजी के लिए, आदर्श शत्रु रावण के लिए ।
331. प्रभु श्री रामजी ने सबसे प्रेम किया और सबके लिए अपने कर्तव्य का निर्वाह किया ।
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