Please enable JS

BHAKTI VICHAR CHAPTER NO. 21

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. प्रभु के लिए खर्च की हुई कोई भी चीज कभी भी व्यर्थ नहीं जाती चाहे वह हमारी सांसे हो, चाहे वह हमारा वक्त हो ।
002. संसार के भावों से हमें ऊपर उठना होगा तभी भक्ति के भाव का रंग हमारे भीतर लग पाएगा ।
003. हमारे चिंतन से संसार निकलता चला जाए तभी हम परमार्थ में सफल हो पाएंगे ।
004. हमारे सारे संकल्प प्रभु से जुड़ जाएं, प्रभु के अतिरिक्त कोई संकल्प जीवन में बचे ही नहीं ।
005. प्रभु गोपियों से सूने घर में माखन चुराने आते थे । ऐसे ही प्रभु सूना यानी संसार से रिक्त हृदय में ही आते हैं । जिस हृदय में संसार के रिश्तों की भीड़ होगी प्रभु कतई उस हृदय की तरफ देखेंगे भी नहीं ।
006. संसार में पूज्य और ज्ञानी होने से भी बड़ी बात है संसार में अनजान होकर प्रभु का सच्चा भक्त होना ।
007. एक संत श्रीमद् भागवतजी की कथा कहते थे और बीच में एक ही कीर्तन करते थे कि गोविंद मेरो है, गोपाल मेरो है । बहुत कथाएं कहीं पर अन्य कोई भी कीर्तन कभी नहीं कराया । एक बार उनसे किसी ने प्रश्न पूछा कि अन्य कथावाचक अलग-अलग कितने कीर्तन करते हैं पर आपने एक ही कीर्तन को क्यों पकड़ रखा है ? संत ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि मेरा यह कीर्तन पूरा हो तो ही तो मैं दूसरा कराऊं । अभी तो मैं कह रहा हूँ कि गोविंद मेरो है, गोपाल मेरो है । जब प्रभु कहेंगे कि तुम मेरे हो तो ही मेरा कीर्तन पूरा होगा । तब दूसरे कीर्तन के बारे में सोचेंगे । जब तक प्रभु उत्तर नहीं देंगे कि तुम मेरे हो जीवन भर यही कीर्तन गाता रहूंगा कि गोविंद मेरो है, गोपाल मेरो है ।
008. हमारा कंठ प्रभु का भजन गाता है और हमारा हृदय प्रभु का भजन गाता है, इन दोनों में कितना बड़ा फर्क है ।
009. गोपियां माखन की मटकी-पर-मटकी रखती हैं । प्रभु के श्रीहाथ ऊपर वाले मटकी तक नहीं पहुँचते तो प्रभु नीचे वाली मटकी निकाल लेते हैं और ऊपर वाली सब मटकिया गिरकर टूट जाती है । संकेत यह है कि प्रभु दीनता का भाव रखने वाले को अपनाते हैं । जिसने अपने नाम के आगे केवल उपाधि जोड़ने में अपना जीवन व्यतीत किया और संसार की नजरों में ऊँचा उठ गया और दीनता का भाव खो दिया उसे प्रभु नहीं अपनाते । उसका हश्र ऊपर रखी मटकी की तरह होता है जो अंत में गिरकर टूट जाती है ।
010. जीव में एक ही अभिमान प्रभु को मान्य है कि मैं प्रभु का ही सेवक हूँ और प्रभु ही एकमात्र मेरे स्वामी हैं । यह अभिमान शास्त्रोक्त भी है और प्रभु को मान्य भी है । इसके अलावा जीव में अन्य कोई भी अभिमान प्रभु को मान्य नहीं ।
011. मैं केवल प्रभु का सेवक हूँ और केवल प्रभु ही मेरे एकमात्र स्वामी हैं । यह अभिमान एक भक्त हृदय में रहे तो प्रभु को मान्य है । प्रभु को मान्य है इसलिए शास्त्रों में भी इसका प्रतिपादन है और इसको शास्त्रोक्त माना गया है ।
012. श्री रामचरितमानसजी में मुनि श्री सुतीक्ष्णजी ने प्रभु से मांगा कि मेरा एक अभिमान कभी न जाए, ऐसा वर दें । श्री लक्ष्मणजी ने प्रभु श्री रामजी से कहा कि यह निराले संत हैं क्योंकि सब लोग आपसे मांगते हैं कि मैं अभिमान रहित रहूँ जिससे आपको प्रिय हो जाऊ पर यह मुनि अलग ही मांग रहे हैं । प्रभु ने कहा कि उनकी पूरी बात तो सुन लें । मुनि ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा कि यह अभिमान मेरा कभी नहीं जाए कि मैं सेवक रघुपति का और रघुपति मेरे स्वामी हैं । मुनि ने कहा कि यह अभिमान प्रभु से मिलाने वाला है इसलिए मैं सदैव इसे रखना चाहता हूँ ।
013. संसार में मिली प्रतिष्ठा और सम्मान हमारे सहज गुण दीनता को खो देता है और हम प्रभु से दूर हो जाते हैं ।
014. भक्त प्रभु का प्रेम जगत में वितरण करता है ।
015. जब सच्ची भक्ति बढ़ेगी तो दीनता भी बढ़ेगी । यह भक्ति के मार्ग की पहचान है ।
016. भगवती भक्ति माता का वाहन दीनता है । जिसके जीवन में सच्ची भक्ति है उसमें दीनता जरूर होगी ।
017. एक संत कहते थे कि रोना हो तो श्रीगोपीगीत गाकर रो, हंसना हो तो प्रभु की माखन लीला सुनकर हंसो । अर्थ यह है कि रोना, हंसना और सभी विषय के केंद्र केवल प्रभु ही बना लेना चाहिए ।
018. प्रभु को जो करना होता है उसकी प्रेरणा अपने भक्त के मन में देते हैं । इसलिए भक्तों के भाव को जगत में बहुत सम्मान दिया जाता है ।
019. प्रभु अपने भक्तों पर अतुलनीय कृपा करते हैं पर कभी जताते नहीं कि मैंने यह किया है ।
020. एक संत ने भाव दिया है कि श्री मिथिलाजी के माली फुलवारी में प्रभु श्री रामजी से कहते हैं कि आप तो तोड़ेंगे दो-चार फूल पर बाकी सब फूल अपने आप गिरेंगे क्योंकि आपने उन्हें अपनी सेवा के लिए नहीं चुना इसलिए बाकी सभी फूल गिरकर अपना जीवन समाप्त कर लेंगे ।
021. सपने में भी प्रभु एक बार हमें अपना कह दें, इसके लिए भक्त का हृदय तरसता रहता है ।
022. भक्ति की साधना उस दिन के लिए की जाती है और भक्त जीवन भर उस दिन की प्रतीक्षा करता है जब प्रभु उसे कहें कि तुम मेरे हो ।
023. जीवन का एकमात्र लक्ष्य भगवत् प्राप्ति ही होना चाहिए ।
024. अपना जन्म और जीवन प्रभु के लिए न्यौछावर कर देना चाहिए जैसे वानरों ने प्रभु श्री रामजी के लिए किया था । प्रभु ने यह बात गुरु श्री वशिष्ठजी को कही कि यह सब वानर मेरे हैं क्योंकि इन्होंने अपना जन्म और जीवन मुझे और मेरे कार्य के लिए समर्पित कर दिया है ।
025. प्रभु जल्दी से किसी को पकड़ते नहीं हैं पर जिसको एक बार पकड़ लेते हैं फिर उसे छोड़ने की प्रभु की आदत नहीं है ।
026. हमें जीवन में आश और विश्वास केवल प्रभु का ही रखना चाहिए ।
027. प्रभु प्रेम के आगे झुक जाते हैं और प्रेम के बंधन को सहर्ष स्वीकार करते हैं ।
028. जिसको प्रभु अपना कह दें उसके भाग्य का क्या कहना । उससे बड़ा भाग्यवान पूरे ब्रह्मांड में और कोई नहीं होता ।
029. श्रीराम ही श्रीसिया हैं और श्रीसिया ही श्रीराम हैं, यह तो केवल भिन्न-भिन्न उनके नाम हैं ।
030. भगवत् साक्षात्कार युक्त रसिक भक्त अपने अनुभव में आई हुई प्रभु की श्रीलीला गाते हैं जो कभी-कभी शास्त्रों में लिखी हुई से भिन्न भी होती है ।
031. श्रीराधा-माधव का प्रेम ही श्री वृंदावनजी बनकर प्रकट हुआ है ।
032. श्री वृंदावनजी के भाव से प्रिया-प्रियतम को घर में विराज कर रखें और यह भाव करें कि घर ही श्री वृंदावनजी है ।
033. घर को अपना मानकर सफाई किया तो वह कर्म है पर घर को प्रभु का मानकर सफाई किया तो वह भक्ति है क्योंकि हम वह कार्य प्रभु के लिए कर रहे हैं ।
034. भक्ति में केवल भावना का राज्य है । भक्ति केवल भाव का ही खेल है ।
035. भोजन अपने लिए बनाया तो वह कर्म है और वही भोजन प्रभु के लिए बनाया और प्रभु को भोग लगाकर प्रसाद रूप में पाया तो वह कर्म भक्ति है ।
036. भक्ति के मार्ग से सरल कुछ भी नहीं है ।
037. भक्ति करने पर घर बैठे प्रभु मिल जाते हैं ।
038. भक्त के पास प्रभु के अलावा अपना कहने लायक कुछ भी नहीं रहता । वह सब कुछ प्रभु का मानता है और केवल प्रभु को ही अपना मानता है ।
039. भक्त अपना रोम-रोम प्रभु को समर्पित कर देता है ।
040. हमारा मन कहीं भी संसार में नहीं अटके, केवल प्रभु के श्रीयुगलचरणों में ही अटके ।
041. चौबीस घंटे का हर कार्य प्रभु को लक्ष्य करके करेंगे तो चौबीस घंटे भक्ति का फल मिलेगा । निद्रा में भी प्रभु के स्वप्न आएंगे तो निद्रा भी भक्ति बन जाएगी । भक्ति केवल एक-दो घंटे करने की नहीं बल्कि भक्ति चौबीस घंटे की क्रिया है ।
042. संत कहते हैं प्रभु से मिलने में जितना आनंद है उतना ही आनंद प्रभु के विरह में रोने में भी है ।
043. जो कथा सुनते, नाम जपते और कीर्तन करते आनंद आता है उस आनंद के रूप में भी तो प्रभु ही आते हैं ।
044. मन में स्थान रहेगा तो जगत घुसेगा । मन में प्रभु को रखें तो कोई प्रवेश नहीं कर पाएगा ।
045. भक्त प्रभु से कहते हैं कि आपने हमारा मन हर लिया इसलिए अब आपको मन छोड़कर जाने नहीं देंगे ।
046. तन का वास श्री वृंदावनजी में हो उससे भी बड़ी बात है कि अपने घर में रहते हुए अपने मन से वास श्री वृंदावनजी में करें । मन से श्री वृंदावनजी में रहें । मन को श्री वृंदावनजी बना लें ।
047. जिस तिथि को प्रभु से कुछ करने का संकल्प हो जाता है वही तिथि महान तिथि सदैव के लिए बन जाती है ।
048. गोपाष्टमी को गौ-माता का प्राकट्य हुआ है और प्रभु श्री कृष्णजी ने प्रथम बार गौचारण के लिए गोपाष्टमी को ही चुना, इसलिए गोपाष्टमी का दुगुना महत्व है ।
049. हमारे इष्ट श्रीगोपाल और श्रीगोपाल के इष्ट गौ-माता हैं । इसलिए ही गौ-माता इतनी महान और पूज्य हैं । गौ-माता के प्रति माँ का भाव रखने से श्रीगोपाल अति प्रसन्न होते हैं ।
050. प्रभु सबमें बसे हुए हैं और सबको अपने में बसाए हुए भी हैं ।
051. भक्त मोक्ष लेना नहीं चाहता । वह श्री साकेतजी, श्री गोलोकजी, श्री बैकुंठजी में प्रभु का परिकर बनाकर प्रभु की नित्य सेवा में सदैव रहना चाहता है ।
052. प्रभु जिनको प्राप्त होना चाहे वही प्रभु को प्राप्त कर सकता है ।
053. प्रभु जिनको बुलाने का संकल्प करते हैं उन्हीं गोपियों के कानों में प्रभु की बांसुरी का सुर पहुँचता है नहीं तो गोपों को भी सुर सुनाई देना चाहिए था, जब गोपियों ने सुना ।
054. आज भी प्रभु की बांसुरी बजती है पर सुनाई किसी भाग्यशाली भक्त को ही देती है ।
055. जिसको प्रभु अपने को दिखाना चाहते हैं वही प्रभु को देख सकता है ।
056. घट-घट में प्रभु रमे हुए हैं इसलिए प्रभु का एक नाम श्रीराम है । वे देव बनाकर घट-घट में बसे हुए हैं इसलिए उनका एक नाम श्रीवासुदेव है । घट-घट में प्रभु व्यापक रूप से हैं इसलिए उनका एक नाम श्रीविष्णु है ।
057. एक संत ने तो यहाँ तक कहा है कि भजन बिना मनुष्य कूकर−सूकर जैसा है ।
058. गोस्वामी श्री तुलसीदासजी भगवती सीता माता से प्रार्थना करते हैं कि कभी समय देखकर मेरी चर्चा प्रभु श्री रामजी के समक्ष चला दें । वे सीधे प्रभु श्री रामजी से नहीं कहते बल्कि भगवती सीता माता और प्रभु श्री हनुमानजी से कहते हैं कि उन्हें श्रीराम कृपा दिल दें ।
059. भगवती माता निस्वार्थ रूप से जीवों के लिए न्यायपति प्रभु के सामने वकालत करती हैं, ऐसा एक संत भाव देते हैं ।
060. एक युक्ति से माता के आश्रित जीव के अगर प्रभु अनुकूल नहीं होते तो माता दूसरी युक्ति फिर तीसरी युक्ति लगाती हैं पर प्रभु को अंत में अपने आश्रित जीव के अनुकूल कर देती हैं ।
061. भगवती माता जब अपने बच्चों का बचाव प्रभु के सामने करती है तो अंतिम युक्ति में माता प्रभु को ही दोष देती है कि दोष मेरे जीवरूपी पुत्रों का नहीं है, दोष आपकी माया का है जो उन्हें भ्रमित कर देती है ।
062. क्षमा करना और कृपा करना प्रभु और माता का शाश्वत स्वभाव है ।
063. प्रभु दंड नीति के प्रयोग की जगह क्षमा नीति और कृपा नीति का प्रयोग करते हैं ।
064. एक संत कहते हैं कि अगर हम प्रभु को करुणासिंधु कहते हैं तो माता को महाकरुणासिंधु कहना चाहिए ।
065. जो काम अपने आप न हो पाए उसमें सहयोग के लिए प्रभु से निवेदन करना चाहिए ।
066. प्रभु के सुयश को जो प्रभु श्री हनुमानजी को सुनाता है तो वे बहुत प्रसन्न होते हैं ।
067. प्रभु श्री महादेवजी एक बार ज्योतिष बनकर भगवती राधा माता के दर्शन को गए । सखियों ने उनसे कहा कि हमारी प्राणप्यारी राधा रानी की हस्तरेखा देखें । प्रभु श्री महादेवजी ने कहा कि मैं इनकी हस्तरेखा नहीं श्रीचरणों की रेखा देखूंगा । श्रीचरणों के दर्शन की इतनी अभिलाषा प्रभु श्री महादेवजी रखते हैं क्योंकि उनसे बड़ा कोई भजनानंदी या वैष्णव नहीं है ।
068. मधुमंगल प्रभु के सखा हैं । श्रीबृज लीला में उनकी सेवा है प्रभु को कुछ भी करके हंसना । संत कहते हैं की यह कितनी श्रेष्ठ सेवा है ।
069. सभी सखा वन भोजन से पहले प्रभु को चखाकर यानी प्रभु को जूठन पाते थे । उनका श्रेष्ठ भाव था प्रभु का जूठन प्रसाद रूप में पाने का ।
070. सखा जब दोने में खीर पाते थे तो प्रभु से कहते थे कि हर दोने को चखकर मुँह लगा दो और जूठा कर दो । प्रभु कहते क्यों तो सखा बोलते कि यह खीर मीठा प्रसाद बन जाएगा । प्रभु कहते खीर तो वैसे ही मीठी होती है और अधिक मीठा करना है तो मैया ने जो बूरा भेजा है वह मिला लो पर सखा कहते हैं कि तुम्हारे श्रीहोठों की मिठास ही हमें चाहिए ।
071. श्रीमद् भागवतजी महापुराण का सच्चा प्रसाद यही है प्रभु की कोई झांकी हमारे हृदय में बस जाए ।
072. प्रभु गौचारण श्रीलीला में पांच रंग के पुष्प से सजते थे । संत उन पुष्पों के रंगों का भाव देते हैं कि सफेद रंग के पुष्प शांत रस के भक्त हैं, नीले रंग के पुष्प दास रस के भक्त हैं, हरे रंग के पुष्प सखा रस के भक्त हैं, पीले रंग के पुष्प वात्सल्य रस के भक्त हैं और लाल रंग के पुष्प माधुर्य रस के भक्त हैं । प्रभु अपने पांचों प्रकार के भक्तों को मानो माला में पिरोकर पहनते हैं ।
073. रोज जो सखा सबसे पहले आगे भागकर भगवती यशोदा माता को सायंकाल में प्रभु के आगमन की वार्ता देता उसका मुँह मीठा भगवती यशोदा माता स्वयं करवाती ।
074. जो काम अपने से न हो पाए उसे प्रभु को निवेदन करना चाहिए तो अगर वह उचित होगा तो वह प्रभु करके छोड़ेंगे ।
075. भगवती माता जब चलती हैं तो उनकी पायल आवाज करती है तो सतंजन कहते हैं कि यह हमारे लिए श्री वेदजी की ध्वनि होती है ।
076. श्याम हैं श्यामा के और श्यामा हैं श्याम के पर हमारे तो प्राणधन दोऊ, ऐसा संत भाव देते हैं ।
077. प्रभु और माता की हर श्रीलीला का उद्देश्य जीव पर अनुग्रह करना ही होता है ।
078. भगवती राधा माता की इतनी महिमा इसलिए है कि उनका प्रेम तत्व प्रभु श्री कृष्णजी को भी मोहित कर देता है ।
079. संत कहते हैं कि श्रीकृष्ण कहने से प्रभु श्री कृष्णजी कितने प्रसन्न होंगे यह पता नहीं, पर एक श्रीराधा नाम कहने से वे अति प्रसन्न हो जाते हैं ।
080. संत कहते हैं कि “रा” नाम सुनते ही प्रभु श्री कृष्णजी के श्रीकान खड़े हो जाते हैं और “धा” नाम सुनते ही उनकी कृपा और करुणा जागृत हो जाती है और श्रीराधा नाम उच्चारण करने वाले पर वे अकारण कृपा कर देते हैं ।
081. संत कहते हैं कि भगवती राधा माता को किसी भी भक्त को “ना” कहना तो आता ही नहीं । वे “ना” कभी नहीं कहती क्योंकि वे इतनी अधिक दयालु और कृपालु हैं कि उनसे “ना” कहा ही नहीं जाता ।
082. प्रभु को शास्त्रों में प्रेम का सागर बताया गया है ।
083. रसिक जन असमंजस में पड़ जाते हैं कि चंदा और चकोर में से चंदा प्रभु को कहे या माता को । फिर वे दोनों को ही चंदा और दोनों को ही चकोर कहकर असमंजस से निकलते हैं ।
084. भक्त ही प्रभु प्रेम में नहीं रोते, प्रभु भी भक्त प्रेम में रोते हैं ।
085. प्रभु श्री कृष्णजी और भगवती राधा माता ने किशोर अवस्था में प्रथम बार एक दूसरे को देखा तो देखते ही रह गए और दोनों के श्रीनेत्रों से प्रेमाश्रु बहते रहे और वह प्रेम सरोवर बन गया ।
086. प्रभु जीवों को अपनी ओर खिंचते हैं । यह प्रभु का जीव पर असीम अनुग्रह होता है ।
087. भक्त श्री सूरदासजी के बाहर के नेत्र नहीं थे पर भीतर के नेत्र से प्रभु का और प्रभु की श्रीलीलाओं का वे नित्य दर्शन किया करते थे जो बीस हजार नेत्रवाले भी नहीं कर सकते ।
088. बिना भजन और सत्संग के मन को शांति नहीं मिल सकती ।
089. जैसे भैंस पानी से निकलना नहीं चाहती, मछली तो बिल्कुल भी नहीं निकलती, वैसे ही कथा के रसमय प्रसंग से भक्त बाहर निकलना ही नहीं चाहता ।
090. अपने भक्तों का यश सुनकर प्रभु और माता ऐसे प्रसन्न होते हैं जैसे अपने बच्चों का यश सुनकर सांसारिक माता-पिता प्रसन्न होते हैं ।
091. भक्त अपने कर्म से प्रभु को मुस्कान देने का प्रयत्न करता है क्योंकि भक्त की सच्ची संपत्ति प्रभु की मुस्कान यानी प्रभु की प्रसन्नता होती है ।
092. प्रभु को उपमा किसी की भी नहीं दे सकते, प्रभु की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती ।
093. प्रभु को अनन्य भक्त सबसे ज्यादा प्रिय होते हैं । भक्ति में अनन्यता होना भक्ति का गौरव माना जाता है ।
094. भगवती सीता माता ने पांच वर्ष की आयु में एक श्रीहाथ से धनुष उठाकर दूसरे श्रीहाथ से नीचे की सफाई कर दी । उस धनुष को रावण दस भुजाओं से और बाणासुर एक हजार भुजाओं से तिल भर भी हिला न पाए ।
095. प्रभु श्री कृष्णजी और भगवती राधा माता का मिलन दिन और रात में कई बार अष्ट सखियां करती है । हर बार अलग-अलग श्रीलीलास्थली में मिलन होता है । एक जिज्ञासा होगी कि प्रभु और माता को इतना चलना पड़ता होगा । संत समाधान देते हैं कि श्रीबृजभूमि चिन्मय है और कमल की पंखुड़ी की तरह खिली हुई होती है पर जब माता और प्रभु को दूसरे श्रीलीलास्थली जाना होता है तो कमल बंद हो जाता है, पंखुड़ी चिपक जाती है और एक कदम चलते ही प्रभु और माता दूसरी पंखुड़ी यानी दूसरी श्रीलीलास्थली पर पहुँच जाते हैं । पहुँचने के बाद फिर कमल की पंखुड़ी खिल जाती है श्रीलीलास्थली एक दूसरे से दूर हो जाती है । चिन्मय श्रीबृजभूमि इस तरह प्रभु और माता की सेवा करती है ।
096. एक संत एक बार सूर्योदय से पहले श्री यमुनाजी में स्नान करने गए । जहाँ स्नान करना था वहाँ कोई गांव का नाला आकर श्री यमुनाजी में गिर रहा था । उन्हें गंदगी देख लगा कि स्नान करूं या न करूं । दो-तीन मिनट तक उन्होंने अपने मन को समझाया कि श्री यमुनाजी चिन्मय हैं और स्नान किया । सफेद धोती लपेटकर स्नान किया था । घर आए तो धोती से केसर की सुगंध आ रही थी और सफेद धोती केसरिया हो गई थी । संत ने श्री यमुना माता का प्रत्यक्ष प्रभाव देखा और श्री यमुनाष्टक का पाठ किया और माता से माफी मांगी ।
097. श्री वृंदावनजी की सभी श्रीलीला वर्तमान में है । पहले श्रीलीला हुई है ऐसा नहीं है, वर्तमान में भी श्रीलीला हो रही है । ऐसा आज भी श्रीवृंदावन निवासी संत अनुभव करते हैं ।
098. प्रियाजी यह चाहतीं हैं कि मैं ऐसा क्या करूं जो प्रियतम प्रभु को सुख मिले और प्रियतम प्रभु यह चाहते हैं कि मैं ऐसा क्या करूं जिससे प्रियाजी को सुख मिले ।
099. श्रीगोपीजन और सखीजन यह चाहती है कि हम ऐसा क्या करें जिससे दोनों प्रिया और प्रियतम प्रभु को सुख मिले ।
100. आध्यात्म राज्य में सुख लेने की नहीं बल्कि सुख देने की भावना प्रधान होती है ।
101. भगवती गंगा माता नित्य नई हैं । अभी पांच मिनट पहले जिस गंगाजल में नहाए थे वह तो आगे बह गया । पांच मिनट बाद डुबकी लगाएंगे तो नया ही गंगाजल मिलेगा । वैसे ही श्रीमद् भागवतजी की कथागंगा भी नित्य नई है । जितनी बार भी कथा सुनेंगे नया भाव मिलेगा ।
102. प्रभु कथा सुनकर मन भर जाए कि बहुत सुन लिया तो इसका अर्थ यह है कि अभी कुछ भी भाव से नहीं सुना । जिसे सुनने पर सुनने की लालसा और बढ़ जाए वही असली सुनना है ।
103. प्रभु के श्रीकमलचरणों को अपने हृदय पटल पर स्थापित करके रखना चाहिए ।
104. बिना अनन्य भाव के त्रिलोकपति और प्राणपति प्रभु हमें कैसे स्वीकार करेंगे जब एक सांसारिक पति भी स्वीकार नहीं करता अगर उसकी पत्नी कहे कि 364 दिन और 23 घंटे में तुम्हारी हूँ पर 1 घंटे किसी और की हूँ ।
105. प्रभु का नाम लेकर ही जल पीना, नाम लेकर ही भोजन खाना और नाम ही लेकर सांस लेनी चाहिए ।
106. प्रभु से कभी भी संसार नहीं मांगना चाहिए । प्रभु से प्रभु की प्रेमाभक्ति ही मांगनी चाहिए ।
107. प्रभु ने श्री गिरिराजजी में प्रवेश किया यह वर्णन श्रीमद् भागवतजी महापुराण में है । पर किसी श्रीग्रंथ में यह वर्णन नहीं मिलेगा कि प्रभु श्री गिरिराजजी से वापस बाहर निकले । इसलिए ही श्री गिरिराजजी प्रभु के स्वरूप हैं ।
108. श्रीबृज में तीन नित्य श्रीलीला आज के समय की प्रतीक है । प्रभु इन तीनों में प्रकट रूप से विराजते हैं । श्री गिरिराजजी, भगवती यमुना माता और श्री रजरानी (यानी श्री बृजरज) ।
109. प्रभु ने श्री गिरिराजजी को सात दिन और सात रात धारण किया । सप्ताह में भी सात दिन और सात रात ही होती हैं । संत संकेत देते हैं कि प्रभु कहते हैं कि जीव तुम मेरी शरण में आ जाओ तो मैं एक दिन नहीं, दो रात नहीं, सप्ताह के सातों दिन और सातों रात तुम्हारी रक्षा करूंगा ।
110. प्रभु की दिव्यता अवर्णनीय है यानी वाणी से उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ।
111. महाराज श्री जनकजी प्रभु श्री रामजी को देखकर अपना ब्रह्म ज्ञान भूलकर श्रीराम रंग में रंग गए ।
112. श्री जनकपुर के दूत श्री अयोध्याजी में राज्यसभा में महाराज श्री दशरथजी के पूछने पर प्रभु श्री रामजी के बारे में कहते हैं कि उनके रोम-रोम में कोटि-कोटि श्री कामदेवजी का सौंदर्य छिपा हुआ है । प्रभु कितने सुंदर हैं कि प्रभु के एक रोम की सुंदरता को करोड़ों-करोड़ों श्री कामदेवजी से भी तुलना की जाए तो भी कम होगी ।
113. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी कहते हैं कि विश्व ही नहीं, ब्रह्मांड में व्याप्त सभी सद्गुण अपनी पराकाष्ठा में पहुँचकर एक जगह एकत्रित हो जाए तो वह प्रभु श्री रामजी होंगे ।
114. प्रभु श्री रामजी अनंत सद्गुणों के महासागर हैं ।
115. श्री जनकपुरवासी कहते हैं कि प्रभु श्री रामजी को पाकर उन्होंने जीवन भर के लिए अपने नेत्र होने का फल पा लिया । प्रभु की सुंदरता को निहारना ही नेत्रों का एकमात्र फल होता है ।
116. संत श्री रामकृष्ण परमहंसजी से किसी ने कहा कि आपको कुछ लोग पागल कहते हैं । वे बोले की ठीक ही तो कहते हैं और उन्होंने पागल का नया अर्थ कर दिया कि पागल आध्यात्मिक राज्य में उसे कहते हैं जो परम तत्व (पा) का पाकर गल (गल) गया यानी अपने अस्तित्व को परम तत्व प्रभु में मिलाकर गला लिया ।
117. प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता के विवाह का परमानंद श्री अवधवासियों और श्री मिथिलावासियों के हृदय में लबालब भरकर मानो अट ही नहीं रहा और बाहर छलक रहा है ।
118. भक्त को प्रभु की कृपा का एकमात्र भरोसा होता है और वे प्रभु की कृपा के सहारे ही अपना जीवन जीते हैं ।
119. जिसे अपनी योग्यता का भरोसा होगा वह हार सकता है पर जिसे प्रभु की कृपा का भरोसा होगा वह तो जीतेगा ही, यह सिद्धांत है ।
120. प्रभु के दरबार में जीतो तो भी लाभ, हारो तो भी लाभ ही है । रावण हारा तो प्रभु के श्रीहाथों प्राण अंत के कारण मोक्ष मिल गया । श्री विभीषणजी जीते को लंका का अचल राज्य मिल गया ।
121. प्रभु ने श्री गिरिराजजी के सात कोस के पर्वत को अपनी बाए श्रीहाथ के सबसे छोटी चिटकली अंगुली के नख के कौर यानी अग्रभाग पर उठाया और सात दिन और सात रात तक उठाए रखा ।
122. जीव को प्रभु से जोड़ने का काम भक्त करता है । प्रभु सबसे प्रसन्न इसी से होते हैं ।
123. रास का सीधा अर्थ है रस वितरण । प्रभु श्रीरास करके अपने भक्तों को अपने प्रेम रस का वितरण करते हैं । प्रभु के भक्त गोपियां हैं जो ऋषि, मुनि और सिद्धजन हैं ।
124. प्रभु जीव की तरह मायाधीन नहीं बल्कि मायातीत हैं और मायाधीश यानी मायापति हैं ।
125. श्रीरास में जीव के मन का मनमोहन से मिलन होता है ।
126. 300 करोड़ गोपियां श्रीमहारास में आई । पूरे ब्रह्मांड और चौदह भुवनों में जितने मधुर रस के भक्त थे सभी गोपी बनकर आए ।
127. गो यानी इंद्रियां । जिस भाग्यवान भक्त की सभी इंद्रियां प्रभु से जुड़ी हैं वही गोपी है, फिर चाहे वह स्त्री है, पुरुष है, बूढ़ा है, बच्चा है वह तो गोपी ही है ।
128. श्री वेदजी की श्रुतियों ने प्रभु से प्रार्थना की कि हमारा उपयोग मंत्र रूप में स्वाहा-स्वाहा कहकर यज्ञ में होता है, हमें प्रेम रस कब प्राप्त होगा । प्रभु ने उन्हें त्रेता में गोपी बनने का वरदान दिया और वे भी गोपी बनी । श्रीरामावतार के ऋषि, मुनि को भी प्रभु ने गोपी बनने का वरदान दिया । मत्स्यावतार के तमाम जलचर प्रभु का रूप देखकर मोहित हो गए । उन तमाम जलचर को प्रभु ने गोपी बनने का वरदान दिया ।
129. श्रीरास में त्रिभुवन के स्वामी प्रभु गोपियों का स्वागत करते हैं और उन्हें भाग्यवान नहीं बल्कि महाभाग्यवान कहकर संबोधित करते हैं ।
130. जिसकी सभी इंद्रियां प्रभु में लगी हो ऐसी गोपी को त्रिभुवन के स्वामी महाभाग्यवान कहते हैं । कोई साधारण व्यक्ति नहीं कह रहा और साधारण भाग्यवान भी नहीं कहा गया । प्रभु कह रहे हैं और महाभाग्यवान कह रहे हैं । सूत्र यह है कि प्रभु की दृष्टि में महाभाग्यवान वही है जिसने भक्ति से अपनी सभी इंद्रियां प्रभु को समर्पित कर दी हो ।
131. प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु का एक सर्वप्रिय रूप है यानी सबको प्रिय है । छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बड़े ज्ञानियों के लिए वे सर्वप्रिय मान्यता प्राप्त देव हैं ।
132. सनातन धर्म के सभी संप्रदायों में प्रभु श्री हनुमानजी की भक्ति को आदर प्राप्त है ।
133. परम निष्काम संत भी श्री हनुमान चालीसाजी का पाठ अपने अनुयायियों को करने का आग्रह करते हैं ।
134. श्री हनुमान चालीसाजी का अवलंबन लेकर हम भक्ति में व्यापक प्रगति कर सकते हैं ।
135. प्रभु श्री हनुमानजी की कृपा का प्रभाव अतुलनीय है ।
136. प्रभु श्री हनुमानजी का चिंतन मात्र ही जीव का परम कल्याण करता है । जीव की सारी बाधाएं दूर कर उसे जीवन में सफल बनाता है ।
137. प्रभु के चिंतन में जिनका चित्त सदा लीन हो वे ही सच्चे सद्गुरु कहलाते हैं । आज के कलियुग में ऐसे सद्गुरु बड़े बिरले होते हैं और बड़े भाग्य से ही प्राप्त होते हैं ।
138. प्रभु के दिव्य यश के प्रतिपादन का फल यह है कि वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों पुरुषार्थ हमारे जीवन में स्थापित कर देता है ।
139. प्रभु श्री रामजी का श्रीचरित्र प्रभु श्री हनुमानजी के बिना पूरा नहीं हो सकता और प्रभु श्री हनुमानजी का श्रीचरित्र प्रभु श्री रामजी के बिना पूरा नहीं हो सकता ।
140. प्रभु की भक्ति करना वह निश्चित उपाय है जिससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थ हमारी मुट्ठी में आ जाते हैं ।
141. प्रभु की भक्ति ही हमारे सारे विकारों का नाश कर सकती है ।
142. शारीरिक बल, मानसिक बल, बुद्धि का बल और आत्मबल सब प्रभु कृपा से ही मिलता है । प्रभु श्री हनुमानजी सभी प्रकार के इन बलों से युक्त हैं इसलिए उनसे बल की याचना करनी चाहिए ।
143. जितना-जितना हम प्रभु का स्मरण करेंगे हमारा बल, बुद्धि और धैर्य बढ़ता जाएगा । हमारी निरोगता भी बढ़ती जाएगी ।
144. प्रभु से जुड़ेंगे तो सद्बुद्धि मिलेगी नहीं तो बुद्धि तो शकुनि के पास भी थी पर वह कुबुद्धि थी जिसने विनाश करवाया ।
145. जीवन में क्लेशों को दूर करना है तो प्रभु से जुड़ना ही पड़ेगा ।
146. प्रभु श्री हनुमानजी स्तुति से जागृत होते हैं । इसलिए जितना मन से श्री हनुमान चालीसाजी की स्तुति घर में करेंगे, घर में विराजित प्रभु श्री हनुमानजी जागृत हो जाएंगे ।
147. प्रभु श्री हनुमानजी की मनोमय प्रतिमा अपने हृदय में धारण करके रखनी चाहिए ।
148. प्रभु श्री हनुमानजी ज्ञान और सद्गुणों के महासागर हैं । उनके जैसा ज्ञानवान भी कोई नहीं और उनके जैसा गुणवान भी कोई नहीं । वे ज्ञान और सद्गुणों के परिपूर्ण आदर्श हैं ।
149. जीवन रुपयों के सहारे जिएंगे यानी रुपया का सहारा जीवन में रखेंगे तो प्रभु के सहारे से हम वंचित रह जाएंगे । रुपया अपनी जगह रहे पर सहारा प्रभु का ही एकमात्र मन में होना चाहिए ।
150. ऋषि श्री वाल्मीकिजी के श्री रामायणजी में प्रभु श्री रामजी अपने श्रीमुख से एक श्लोक में प्रभु श्री हनुमानजी के गुण गिनाते हैं । वे कहते हैं कि शौर्य, दक्षता, सावधानता, धैर्य, बुद्धिमानी, लोगों को जोड़ने की कला, हर जगह अपना प्रभाव स्थापित करने की कला, पराक्रम और शक्ति - यह सारे सद्गुण पराकाष्ठा में प्रभु श्री हनुमानजी में निवास करते हैं । यह आकलन त्रिलोकी के स्वामी प्रभु श्री रामजी का है ।
151. प्रभु का न्याय देखें की बालि को मारकर श्री सुग्रीवजी को राजा बनाया पर युवराज श्री अंगदजी को बनाया । इसका सीधा अर्थ है कि श्री सुग्रीवजी के बाद उनका पुत्र नहीं बल्कि श्री अंगदजी यानी बालि का पुत्र राजा बनेगा ।
152. किसी भी प्रकार प्रभु श्री हनुमानजी के उपासक का मन धर्म से विचलित नहीं होता है ।
153. बिना किसी पद के भी सभी वानर प्रभु श्री हनुमानजी की आज्ञा का पालन करते हैं और करना चाहते हैं । इसका मुख्य कारण उनके सद्गुणों के कारण उनकी श्रेष्ठता है ।
154. पहली बार लंका जाने पर लंका दहन करके अपने पराक्रम का इतना प्रभाव प्रभु श्री हनुमानजी ने छोड़ा कि जब श्री अंगदजी दूत बनकर गए तो सभी राक्षस डर से दहशत में आ गए ।
155. प्रभु श्री हनुमानजी सर्वत्र अपना जो परिचय देते हैं वह श्री रामदास के रूप में ही देते हैं । श्री रामदास का संबोधन उन्हें अत्यंत ही प्रिय है ।
156. सच्चे भक्तों को जब प्रभु श्री हनुमानजी का स्मरण होता है तो अपने आप ही प्रभु श्री रामजी का भी स्मरण हो जाता है क्योंकि वे दो नहीं बल्कि एक ही हैं ।
157. भक्त श्री हनुमानजी इतने महान हैं तो उनके प्रभु श्री रामजी कितने महान होंगे इस तरह प्रभु श्री रामजी की मानस प्रतिमा हर श्रीहनुमान भक्त के हृदय में अंकित हो जाती है । यह सच्चा श्री राम दासत्व है ।
158. प्रभु श्री हनुमानजी अतुलित बल के धाम है यानी उनके बाल के आगे किसी का बल टिकता ही नहीं ।
159. धर्मवीर, दानवीर, दयावीर, विद्यावीर और रणवीर - यह पांच प्रकार की वीरता जिसमें हो उसे महावीर कहा जाता है । यह महावीर शब्द प्रभु श्री हनुमानजी के लिए सर्वत्र प्रयोग होता है ।
160. वज्र के समान प्रभु श्री हनुमानजी के श्रीअंग हैं । वज्र अमोघ होता है और शस्त्रों में सबसे उच्चकोटि का प्रधान शस्त्र है । वज्र से अधिक कठोर कुछ भी नहीं माना गया है । प्रभु श्री हनुमानजी के श्रीअंग वज्र तुल्य हैं इसलिए किसी भी शस्त्र का कोई परिणाम उन पर कभी भी होता ही नहीं है ।
161. कोई भी दीन बनकर याचना करता है तो प्रभु श्री हनुमानजी उसे संकट से उबार लेते हैं । इसलिए उनका एक नाम संकटमोचन है और वे जगत के संकटमोचन कहलाते हैं ।
162. प्रभु श्री हनुमानजी का दर्शन पराक्रम और अजय का साक्षात दर्शन है ।
163. प्रभु श्री हनुमानजी के भक्त का पराभव यानी हार – यह कभी हो ही नहीं सकता । उसकी सदैव विजय ही होती है ।
164. प्रभु श्री हनुमानजी की आराधना हमारी दुर्बुद्धि को नष्ट करती है । हमारे भीतर के विषय और वासना को समाप्त करती है ।
165. प्रभु की कृपा हमारी कुमति को सुमति में बदल देती है ।
166. संसार की दृष्टि में रूपवान, धनवान और प्रतिष्ठावान व्यक्ति भाग्यवान है पर प्रभु की दृष्टि में जिसके जीवन में भक्ति आ गई और जिसकी जीवन की दिशा संसार से हटकर प्रभु की तरफ हो गई वही सच्चा महाभाग्यवान है ।
167. जो जीवनरूपी कांच देकर प्रभु की भक्तिरूपी हीरा ले ले वही सच्चा बुद्धिमान होता है ।
168. जो जीवनरूपी फूल खिला है वह एक दिन जरूर मुरझाएगा पर जिसने मुरझाने से पहले वह जीवनरूपी फूल प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित कर दिया वही सच्चा भाग्यवान है ।
169. जीवन में काल आए उससे पहले जीवन में श्रीगोपाल को ले आए तभी उस जीवन की सार्थकता है ।
170. प्रभु की याद में जिसका जीवन बीते वही सच्चा बड़भागी है ।
171. प्रभु “से” चाहना बंद करना होगा और प्रभु “को” चाहना प्रारंभ करना होगा ।
172. गोपियां प्रभु से कहतीं हैं कि हम आपकी हैं और आपके लिए ही हमारा जीवन है ।
173. ग्रहचक्र की मार से जीवन में बचाना है तो ब्रह्मांड के मालिक प्रभु के नामचक्र को पकड़ लेना चाहिए ।
174. जीवन में जो भी प्रभु कृपा मिली है उसे कभी भी अपने पुरुषार्थ और योग्यता के कारण मिली है, ऐसा कदापि नहीं मानना चाहिए । कृपा तो प्रभु की कृपा से ही मिली है, यही मानना चाहिए ।
175. प्रभु को कृपा करने की आदत है, प्रभु जीव पर कृपा किए बिना रह ही नहीं सकते ।
176. श्रीरासपंचाध्यायी की फलश्रुति में प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि इसे सुनने से परा-भक्ति प्राप्त होती है और जीवन से काम की निवृत्ति होती है ।
177. प्रभु की हर क्रिया एक श्रीलीला हो जाती है ।
178. भगवती रुक्मिणी माता ने प्रभु का यश सुना था और प्रभु के यश को सुनने का प्रभाव था कि उनकी प्रीति प्रभु के श्रीकमलचरणों में हो गई । इसलिए प्रभु का यशगान निरंतर सुनना चाहिए ।
179. प्रभु के बारे में सुनने से प्रभु का जीवन में क्या महत्व है उसका ज्ञान होता है जिससे हमारी प्रभु से प्रीति हो जाती है ।
180. प्रभु जब अपने अवतार काल में विवाह की श्रीलीला करते हैं तो उस विवाह का आनंद पूरे त्रिभुवन में छा जाता है ।
181. प्रभु श्री हनुमानजी किसी के लिए भी भक्ति हेतु परिपूर्ण आदर्श हैं ।
182. प्रभु श्री हनुमानजी उनके संगी और साथी हैं जिनकी सद्बुद्धि जागृत है । दुर्बुद्धि का वे साथ नहीं देते ।
183. सद्बुद्धि वाला चाहे दुर्बल हो तो भी प्रभु श्री हनुमानजी उसका पूर्ण साथ देते हैं जैसा कि उन्होंने श्री सुग्रीवजी का दिया ।
184. प्रभु श्री हनुमानजी की अराधना हमारे भीतर सद्बुद्धि के जागरण के लिए अत्यंत जरूरी है ।
185. प्रभु श्री हनुमानजी भगवत् भक्ति के प्रचारक हैं । वे भक्ति की प्रेरणा और भक्ति का दान देते हैं ।
186. प्रभु श्री हनुमानजी के श्रीहाथ में जो गदा है वह वज्र के समान कठोर और अमोघ है यानी उसका प्रहार कभी भी, किसी भी परिस्थिति में विफल नहीं होता ।
187. प्रभु श्री हनुमानजी पराक्रम के प्रतीक गदा और आध्यात्म के प्रतीक प्रभु की ध्वजा अपने दोनों श्रीहाथों में रखते हैं । वे प्रभु का कार्य पराक्रम से भी करते हैं और प्रभु की भक्ति का प्रचार आध्यात्मिक रूप से भी करते हैं ।
188. प्रभु श्री हनुमानजी कुछ भी करने में असफल हुए हैं ऐसा आज तक कभी भी, कहीं भी अंकित नहीं हुआ है ।
189. प्रभु श्री हनुमानजी के सभी सद्गुणों का सार भक्ति है यानी उनकी भक्ति उनके सभी सद्गुणों का मानो शिखर है । उनके सभी सद्गुणों का समर्पण प्रभु श्री रामजी के लिए है । प्रभु श्री रामजी की सेवा में ही उनके सभी सद्गुण लगे हुए हैं ।
190. प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु श्री रामजी की सेवा के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं लगता, यहाँ तक कि विश्राम भी अच्छा नहीं लगता ।
191. वही व्यक्ति अपना महान प्रभाव इस संसार में छोड़ सकता है जो मग्न होकर प्रभु का कार्य करता है ।
192. विद्या का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिसकी पराकाष्ठा प्रभु श्री हनुमानजी में न हो ।
193. सुरसा माता के मुँह बड़ा करने पर अपने को दुगुना करना यह प्रभु श्री हनुमानजी का बल है फिर लघु रूप लेकर मुँह में प्रवेश कर वापस निकलना उनकी बुद्धि है । ऐसा चातुर्य प्रभु श्री हनुमानजी में है ।
194. प्रभु श्री कृष्णजी की युक्ति देखें कि जब दुर्योधन से अंतिम युद्ध होना था तो श्री युधिष्ठिरजी ने कह दिया कि हम पांचो पांडवों में से किसी एक को चुन लो । प्रभु श्री कृष्णजी वहाँ नहीं होते तो श्री युधिष्ठिरजी जीता हुआ युद्ध हार जाते अगर दुर्योधन श्री भीमजी को छोड़कर अन्य किसी को भी गदा युद्ध के लिए चुनता । प्रभु श्री कृष्णजी तुरंत दुर्योधन की तारीफ करते हुए बोले कि दुर्योधन किसी ऐरे-गेरे से युद्ध कर अपनी प्रतिष्ठा नहीं गँवाएगा । वह तो अपने टक्कर वाले से ही युद्ध करेगा । दुर्योधन तारीफ में उलझ गया और श्री भीमजी को ही युद्ध के लिए चुना । इस तरह प्रभु ने पांडवों को अपनी युक्ति से जीते हुए युद्ध में भी परास्त होने से बचाया । यह प्रभु श्री कृष्णजी का चातुर्य है जो श्री महाभारतजी में अनेकों स्थान पर देखने को मिलता है और यही चातुर्य प्रभु श्री हनुमानजी का श्री रामायणजी में अनेकों स्थान पर देखने को मिलता है ।
195. लंका जाते समय बहुत पर्वत प्रभु श्री हनुमानजी का अवरोध करने आए पर उन्होंने अपने श्रीकमलचरणों के प्रहार से उन सबको दबा दिया । पर श्री मैनाक पर्वत सहयोग करने आया तो उनका सम्मान करते हुए उन्हें स्पर्श करके, प्रणाम करके आगे बढ़े । यह पराक्रम और दीनता की मिसाल है ।
196. प्रभु श्री रामजी का कोई भी कार्य करने के लिए प्रभु श्री हनुमानजी सदा तत्पर और प्रस्तुत रहते हैं ।
197. प्रभु का काम हमें अवसर लगना चाहिए, बोझ नहीं लगना चाहिए । प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु का प्रत्येक कार्य प्रभु की सेवा का अवसर लगता है ।
198. प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु की कथा सुनने में बहुत रस आता है । उन्होंने प्रभु से विनती की कि जब तक धरती पर आपकी कथा होती रहेगी मैं प्रत्येक कथा सुनना चाहता हूँ ।
199. जो आनंद प्रभु की कथा में है वह अन्य कोई साधन में नहीं है । इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी खूब प्रभु नाम का जप करते हैं, खूब प्रभु का ध्यान करते हैं और प्रभु की कथा के तो सबसे बड़े रसिक वे हैं ही ।
200. इस कलियुग का सर्वोपरि साधन प्रभु की मंगलमयी कथा ही है ।
201. सच्चे भक्तों और संतों के लिए प्रभु की कथा ही सब कुछ होती है ।
202. जहाँ आप प्रभु श्री हनुमानजी को बुलाना चाहे वहाँ नित्य कथा करें तो वे बिना निमंत्रण ही आ जाएंगे ।
203. प्रभु श्री हनुमानजी के हृदय में प्रभु श्री सीतारामजी हैं इसलिए संसार कभी नहीं घुसा । हमारे हृदय में प्रभु नहीं हैं इसलिए संसार और परिवार हरदम घुसा ही रहता है ।
204. प्रभु श्री हनुमानजी जैसा ज्ञानी, वैराग्यशील और भक्त अन्य कोई भी नहीं है । इसलिए ही उनके हृदय में प्रभु श्री रामजी ज्ञानरूप में, भगवती सीता माता भक्तिरूप में और श्री लक्ष्मणजी वैराग्यरूप में बसते हैं ।
205. प्रभु श्री राम जी खुले आम यह बात कहते हैं कि उन्हें श्री हनुमानजी सर्वाधिक प्रिय हैं ।
206. प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि पूरे रघुकुल सहित वे सदा प्रभु श्री हनुमानजी के ऋणी रहेंगे ।
207. प्रभु श्री हनुमानजी की महानता का वर्णन कर पाना किसी कवि, देवता यहाँ तक की प्रभु के लिए भी संभव नहीं है । उनकी महानता शब्दातीत है यानी शब्दों से परे है ।
208. प्रभु श्री शिवजी सब कुछ देने का सामर्थ रखते हैं और उनके पास जो सबसे अमूल्य संपत्ति है जिस कारण वे देव नहीं बल्कि महादेव कहलाते हैं वह है भक्ति ।
209. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में पूरे जगत में सबसे बड़ा वैष्णव प्रभु श्री महादेवजी को ही बताया गया है ।
210. प्रभु से हमें सदैव भक्ति की ही भिक्षा मांगनी चाहिए ।
211. श्री वृंदावनजी के रसिक संत मानते हैं कि भगवती राधा माता ही प्रभु की आठ पटरानियों के रूप में और 16100 रानियां के रूप में प्रभु की सेवा कर रही हैं । सारी प्रिया रूप में स्वामिनी भगवती राधा रानी ही विराजमान हैं ।
212. प्रभु सहजता से किसी के हृदय में आते नहीं और भक्ति के कारण आ जाते हैं तो अन्य किसी को हृदय में रहने नहीं देते यानी अकेले ही रहते हैं ।
213. संतों ने प्रभु श्री कृष्णजी के 9 बार विवाह, आठ पटरानियों के साथ आठ बार में और एक बार में 16100 रानियां के साथ को नवधा भक्ति के रूप में देखा है । प्रथम भक्ति श्रवण भक्ति है और प्रभु का प्रथम विवाह प्रभु के सद्गुणों के श्रवण के कारण भगवती रुक्मिणी माता ने किया । नौवीं भक्ति आत्म-निवेदन भक्ति है और नौवें विवाह में 16100 रानियां, जिन्हें प्रभु ने बंदीगृह से मुक्त कराया था, उन्होंने अपने घर न जाकर अपना आत्म-निवेदन प्रभु को कर दिया था ।
214. केवल प्रभु के बारे में श्रवण करने से प्रभु मिल जाते हैं । अगर भगवती रुक्मिणी माता जैसा या राजा श्री परीक्षितजी जैसा श्रवण हो तो प्रभु निश्चित हमें श्रवण के फलस्वरूप मिलेंगे ।
215. प्रभु अपने भक्तों की कोई भी सात्विक रुचि अधूरी नहीं रहने देते ।
216. प्रभु की कथा अमृतरूपी है । स्वर्ग के अमृत से भी कथारूपी अमृत की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि यह कथारूपी अमृत सबसे श्रेष्ठ है ।
217. स्वर्ग भी मायाधीन है, मायातीत नहीं है । मायातीत तो केवल प्रभु के धाम ही हैं ।
218. कथामृत प्रभु और माता के श्रीकमलचरणों की प्राप्ति करवा देती है जबकि स्वर्ग का अमृत केवल शरीर को अमर करता है । इसलिए प्रभु श्री शुकदेवजी ने स्वर्ग के अमृत को कांच और प्रभु की कथामृत को हीरा कहा है ।
219. महिमा जाने बिना प्रीति नहीं होती । प्रभु की कथा प्रभु की महिमा हमें बताती है जिस कारण फिर प्रभु से प्रीति हो जाती है ।
220. मनुष्य शरीर बड़ा अमूल्य है । अभी व्यर्थ की चीजों में हमारे समय का बहुत बड़ा भाग व्यर्थ हो रहा है ।
221. प्रभु को नित्य साष्टांग दंडवत प्रणाम करना चाहिए । प्रभु को प्रणाम निवेदन करने का बहुत बड़ा फल होता है ।
222. प्रभु से मांगना चाहिए कि हमारे अपराधों को क्षमा करें और हमें अपनी सेवा में स्वीकार करें ।
223. एक संत दंडवत प्रणाम के विषय में कहते थे कि प्रभु को दंडवत प्रणाम करने से जीव का नर्क का दंड कम हो जाता है । लगातार प्रभु को दंडवत प्रणाम नित्य नियम से करने से नर्क का दंड खत्म ही हो जाता है, फिर हमें कभी नर्क नहीं जाना पड़ता ।
224. भगवती मीराबाई का कितना सुंदर भाव था कि ऐसे वर के लिए चूड़ी पहनूंगी जिसे कभी तोड़नी न पड़े, ऐसा वर का सिंदूर लगाऊंगी जिसे कभी मिटाना न पड़े । ऐसे तो एकमात्र प्रभु ही हैं ।
225. संसार की कामना के लिए रोना और प्रभु नाम लेकर प्रभु प्रेम में रोना, इन दोनों रोने में कितना बड़ा फर्क है । एक रोना दुःख-क्लेश देने वाला है, दूसरा भक्ति और परमानंद देने वाला है ।
226. इस कलियुग में प्रभु को पुकारे बिना काम चलने वाला नहीं है ।
227. जो जीव प्रेम से नित्य प्रभु और माता को पुकारते हैं प्रभु और माता बिना उसका कर्म देखे उसे अपनाते हैं । अगर प्रभु और माता कर्म देखें तो जीव के इतने पातक कर्म हैं कि उन्हें कोई न अपनाए पर प्रभु और माता इतने दयालु और कृपालु हैं कि बिना कर्म देखे जीव के पुकारने पर जीव को अपनाते हैं ।
228. भगवती राधा माता के लिए संत कहते हैं कि वे देना नहीं बल्कि बरसाना जानती हैं । वे करुणा की वर्षा करती हैं ।
229. प्रभु की एक कृपा दृष्टि ही जीव के अनंत जन्मों के अपराधों को क्षमा करने वाली होती है ।
230. प्रभु की एक कृपा दृष्टि परम सौभाग्य प्रदान करने वाली होती है ।
231. जैसे दूध को लगातार उबालने से पानी जल जाता है और जो दूध बचता है उसे खोया कहते हैं । इस खोया को गोल आकार दे दे तो खोया का लड्डू कहलाएगा । इस खोया को चपटा आकर दे दे तो यह पेड़ा कहलाएगा । इस खोया को चौकोर आकार दे दे तो वह खोया बर्फी कहलाएगा । तीनों तत्वतः एक खोया है पर आकर अलग-अलग है । इसी तरह प्रभु एक हैं, वे धनुष-बाण उठाते हैं तो प्रभु श्री रामजी कहलाते हैं, बांसुरी उठाते हैं तो प्रभु श्री कृष्णजी कहलाते हैं, चक्र उठाते हैं तो प्रभु श्री विष्णुजी कहलाते हैं और त्रिशूल-डमरू उठाते हैं तो प्रभु श्री महादेवजी कहलाते हैं ।
232. दिन में रोशनी और ताप देने वाले को भारत में प्रभु श्री सूर्यनारायणजी कहते हैं । इस्लाम देशों में उन्हें आफताब कहते हैं और अंग्रेज देशों में उन्हें सन कहते हैं । तत्वतः वे एक ही हैं पर अलग-अलग जगह अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग नाम से जाने और माने जाते हैं । वैसे ही प्रभु एक ही हैं पर वे अलग-अलग धर्मों और पंथों में अलग-अलग नाम से जाने और माने जाते हैं । जैसे कोई कहे कि हमारे श्री सूर्यनारायणजी में ज्यादा रोशनी है, वे बड़े हैं तो कोई कहे कि हमारे आफताब बड़े हैं और कोई कहे कि हमारे सन बड़े हैं तो यह हास्यप्रद लगेगा क्योंकि तीनों नाम में तत्व एक ही है, रोशनी और ताप एक ही है । वैसे ही धर्म और पंथ झगड़ा करें कि हमारे प्रभु बड़े हैं तो यह कितना हास्यप्रद होगा क्योंकि वे तत्व एक ही हैं, दो नहीं ।
233. प्रभु का श्रीचरित्र और श्रीलीलाएं अनंत हैं । हम उस चिड़िया की तरह हैं जो चाहती है कि प्यास के कारण सागर का पूरा जल पी जाए पर पी उतना ही पाती है जितनी थोड़ी-सी जगह उसके पेट में होती है । वैसे ही हम चाहकर भी पूरा प्रयास करने पर भी जीवन भर में प्रभु का थोड़ा-सा ही गुणगान उस चिड़िया की तरह कर पाते हैं क्योंकि हमारी क्षमता नगण्य है और प्रभु का श्रीचरित्र और श्रीलीलाओं का कोई अंत नहीं है ।
234. जैसे चातक पक्षी चाहता तो है कि वर्षा का पूरा जल उसके मुँह में समा जाए पर कुछ बूंदे ही उसकी चोंच पर पड़ती हैं जिससे वह आनंद मनाता है । वैसे ही भक्तजन के द्वारा थोड़ा-सा भी प्रभु का गुणगान होने पर भी वे आनंद मानते हैं । भक्तजन भी चातक पक्षी की तरह चाहते हैं कि हम भरपूर प्रभु का गुणगान कर पाए पर जीवन भर करने पर भी वह प्रभु के अनंत यश का थोड़ा-सा ही भाग होता है पर वह भी भक्तों को अति आनंद देता है ।
235. भक्ति भाव की बातें संसार वालों को समझ में नहीं आती, यह उनका दुर्भाग्य होता है ।
236. बिना भक्ति के मन को शांति कैसे भी नहीं मिल सकती ।
237. कोई कहे कि भजन की क्या जरूरत है तो संत उससे पूछते हैं कि भोजन की क्या जरूरत है ? वह कहता है कि भोजन बिना शरीर टिक नहीं सकता तो संत समझते हैं कि भजन बिना आत्मा टिक नहीं सकती, आत्मा का पोषण नहीं हो सकता जैसे शरीर का पोषण भोजन बिना नहीं हो सकता ।
238. जहाँ प्रभु श्री सूर्यदेवजी हैं वहाँ अंधकार नहीं हो सकता वैसे ही जहाँ प्रभु होते हैं वहाँ कोई बंधन नहीं होता यानी प्रभु जिसके जीवन में होंगे उस जीव के समस्त बंधन कट जाएंगे ।
239. 16100 कन्याएँ को संसार ने, यहाँ तक कि उनके माता-पिता, भाई-बहन ने स्वीकार करने से मना कर दिया पर प्रभु ने कहा कि जिनको कोई स्वीकार नहीं करता उनको भी मैं अपनाता हूँ और प्रभु ने उन्हें ससम्मान स्वीकार किया । यह फर्क है दुनिया में और प्रभु में ।
240. प्रभु के प्रथम दर्शन को मंगला कहते हैं क्योंकि वह मंगल के भवन और अमंगल को हरने वाले का दर्शन है । प्रभु का मंगला के दर्शन करने से हमारा दिनभर मंगल होता है ।
241. प्रभु उठते ही स्वर्ण पात्र में रखे घी में अपना श्रीमुख देखते थे । संत भाव देते हैं कि ऐसा करके प्रभु भी अपना मंगला करते हैं यानी अपने श्रीमुख के अलावा मंगल करने की प्रभु को भी कोई अन्य विधि पता नहीं है क्योंकि कोई अन्य विधि है ही नहीं ।
242. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ऐसे गुरु हैं जो जिसे भी मिलते हैं उन्हें प्रभु से मिलाकर ही छोड़ते हैं । वे भगवती पार्वती माता, भगवती सत्यभामा माता, ऋषि श्री वाल्मीकिजी, प्रभु श्री वेदव्यासजी, श्री प्रह्लादजी, श्री ध्रुवजी के गुरु रहे हैं । 16100 कन्याओं और जरासंध के यहाँ बंदी राजाओं के भी वे गुरु बने तभी उन्हें प्रभु मिले ।
243. हमारा असली परिचय यह है कि हम प्रभु के नित्य दास हैं । जीवन में बहुत परिचय बनाएं पर यह वाला परिचय सार्थक नहीं किया तो जीवन ही बेकार कर लिया ।
244. श्री केवटजी को भगवती गंगा माता से पार उतारने के बाद प्रभु ने बार-बार पूछा कि कुछ मांग लो, श्री लक्ष्मणजी ने और भगवती सीता माता ने बार-बार प्रभु का रुख देखकर कहा कि कुछ मांग लो पर श्री केवटजी ने कुछ नहीं मांगा । तब प्रभु ने अपना सबसे दुर्लभ दान प्रेमाभक्ति का दिया । मांग लेते तो मांगी हुई चीज मिल जाती पर नहीं मांगा तो प्रभु की प्रेमाभक्ति मिली । प्रभु इतने प्रसन्न हुए श्री केवटजी से कि लंका से लौटते हुए पुष्पक विमान उतारकर श्री केवटजी, उनकी पत्नी और बच्चों को साथ बिठाकर श्री अयोध्याजी ले गए । फिर पूरा जीवन श्री केवटजी श्री अयोध्याजी में ही प्रभु के पारिकर बनकर रहे और श्री सरयू माता में प्रभु को नौका विहार करने की सेवा जीवन भर करते रहे ।
245. श्रीमद् भागवतजी महापुराण का सच्चा प्रसाद प्रभु की प्रेमाभक्ति पाना है पर हम यह नहीं मांगते । हम श्रीमद् भागवतजी कथा के फलस्वरूप अपने संसार के मनोरथ मांगते हैं ।
246. जीवन की सबसे दुर्लभ वस्तु प्रभु की प्रेमाभक्ति है । कहीं हम जीवन भर इससे वंचित न रह जाए ।
247. प्रभु मंत्र के भूखे नहीं हैं, पदार्थ के भूखे नहीं हैं, वे केवल भाव के भूखे हैं ।
248. भाव से प्रभु को जो भी भजे उसका भवसागर से बेड़ा पार हो जाता है ।
249. जिनके भक्ति होती है प्रभु उनके हृदय में सदैव प्रकट रहते हैं ।
250. भक्ति में केवल भाव की ही प्रधानता होती है ।
251. किसी भी चीज का जीवन में अहंकार हो तो वह हमारे और प्रभु के बीच में पर्दा का काम करती है ।
252. सच्ची भक्ति करने वाला कोई हो तो प्रभु सब पर्दा अपने और भक्त के बीच से हटा देते हैं ।
253. प्रभु के कई भक्त प्रभु के लिए नियम पालन करने वाले होते हैं, वे मस्तिष्क प्रधान होते हैं । पर प्रभु के कुछ श्रेष्ठ भक्त प्रेमी होते हैं, वे हृदय प्रधान होते हैं ।
254. प्रभु के संकल्प मात्र से ही सब कुछ हो जाता है ।
255. उल्लू कहता है कि मैं दिन को नहीं मानता क्योंकि उसे दिन में दिखाई नहीं पड़ता, तो क्या उसके नहीं मानने से दिन नहीं होता । वैसे ही नास्तिक कहते हैं कि मैं प्रभु को नहीं मानता तो क्या उनके नहीं मानने से प्रभु नहीं हैं ।
256. हमें एक तीन मंजिल की बिल्डिंग के छत पर पानी चढ़ाने के लिए 10 हॉर्स पावर की मोटर, पाइप लाइन, टंकी और बिजली चाहिए । प्रभु का प्रभुत्व देखें कि करोड़ों मंजिल ऊपर बादलों द्वारा वर्षा करने के लिए पानी समुद्रदेवजी से चढ़ाने के लिए कोई मोटर, पाइप लाइन, टंकी या बिजली नहीं चाहिए ।
257. प्रभु ने ईख में मिठास, नीम में कड़वाहट, फूलों में रंग, बादलों को पानी से भरा है । प्रभु ने बिजली को चमक दी है, इमली को खटास, तितली को रंग, बिना कैंची के अलग-अलग पेड़ के पत्तों को न्यारी-न्यारी कतरन दी है । प्रभु ने भालू के तन में ऐसा चोला पहनाया है जो उम्र भर नहीं फटेगा न छोटा होगा, लघु बीज से विशाल वृक्ष को जन्म दिया और नारियल के भीतर कहाँ से प्रभु ने पानी भर दिया है ।
258. प्रभु ने मनुष्य शरीर में चमकती आँखें दी है, श्वास लेने के लिए नाक दिया, सुनने के लिए कान दिया, काम करने के लिए हाथ दिया, चलने के लिए पैर दिया - ऐसा जीता-जागता नमूना आज तक विज्ञान नहीं बन पाया और न कभी बना पाएगा ।
259. क्या विज्ञान मृत्यु, बुढ़ापा और बीमारी से दुनिया को कभी अलग रख सकता है कि ऐसा आविष्कार कर दे कि कोई मरे नहीं, बीमार नहीं पड़े, बुढ़ापा न आए - ऐसा सदियों-सदियों बाद भी कतई संभव नहीं है क्योंकि यह प्रभु का बनाया विधान है जिसको विज्ञान सदियों बाद भी पूरी उन्नति करके और पूरी ताकत लगाकर भी कुछ नहीं कर सकेगा ।
260. बच्चे के जन्म लेने से पहले माता के स्तनों में प्रभु ने दूध डाल दिया - यह प्रभु की उस नवजात शिशु पर कितनी बड़ी करुणा है ।
261. सबकी करनी का प्रभु यथायोग्य फल देते हैं, ऐसा बेमिसाल न्याय करने वाला संसार में कहाँ मिलेगा ।
262. शिशु जन्म से पहले, 10 मिनट पहले भी माता के स्तनों को दबाएंगे तो रक्त निकल जाएगा पर दूध नहीं आएगा पर बच्चों के जन्मते ही वह रक्त मानो दूध बनकर निकलता है यानी दूध निकलने लगता है । यह प्रभु का चमत्कार है ।
263. श्री सुदामाजी को गृहस्थ विरक्त कहा गया है यानी गृहस्थ में रहकर भी विरक्त रहना । वे गृहस्थ में रहकर भी सच्चे संन्यासी थे ।
264. संन्यासी केवल कपड़े रंगने से नहीं बना जाता । संन्यासी गृहस्थ में रहकर भी बना जा सकता है जैसे श्री सुदामाजी थे । प्रभु प्रेम हृदय में उदय हो जाए तो गृहस्थ में रहकर भी संन्यासी बना जा सकता है । संन्यास का सच्चा अर्थ है कि संसारी कामनाओं का निरोध और केवल प्रभु से सच्चा प्रेम ।
265. सबसे बड़ी विरक्ति संसार में रहकर भी संसार में आसक्त न होकर प्रभु के युगल श्रीकमलचरणों में आसक्त होना है ।
266. अपनी जिह्वा प्रभु यश गाने के लिए गिरवी रख देनी चाहिए यानी प्रभु के अलावा हमारी जिह्वा किसी अन्य संसारी का यश कभी भी नहीं गाए ।
267. क्या जीवन में केवल प्रभु से शिकायत ही होगी या कभी निष्काम प्रेम भी होगा ?
268. सच्चा वैष्णव प्रभु से कभी शिकायत नहीं करता, वह तो प्रभु को केवल धन्यवाद ही देता है ।
269. हम गलती-पर-गलती करते जा रहे हैं और प्रभु हमें माफी दिए जा रहे हैं ।
270. प्रभु कृपा-पर-कृपा किया जा रहे हैं पर उस कृपा को देखने के लिए हमें भक्ति की आँखें चाहिए ।
271. इतनी गरीबी के बाद भी भगवती सुशीलाजी अपने पति श्री सुदामाजी के भजन में विक्षेप नहीं बल्कि सहयोग ही करती थी । सच्ची धर्मपत्नी वही होती है जो कष्ट सहकर भी अपने पति को भजन मार्ग पर आगे बढ़ाती है ।
272. मन की बात केवल श्रीमनमोहन प्रभु से ही कहनी चाहिए ।
273. प्रभु के श्रीकमलचरणों में नत होने से जीव के कोई भी दुःख बाकी नहीं बचते ।
274. बहुत सारी माया के बीच में फंसकर हम मायापति प्रभु का भजन नहीं कर सकते ।
275. दुनियादारी कम करने से ही हमें भजन करने का अवकाश मिलेगा ।
276. भक्ति के भाव को कभी भी प्रभु से कुछ मांगकर भुनाना नहीं चाहिए ।
277. प्रभु के निकट जाए बिना जीवन में किसी भी अभाव की पूर्ति कभी भी नहीं होगी ।
278. हम एक छोटी-सी यात्रा पर जाते हैं तो कितनी तैयारी के साथ जाते हैं । यह शरीर छोड़ने के बाद बहुत बड़ी यात्रा में जाना पड़ेगा । क्या हमने उसकी तैयारी की है ?
279. जीवन के बाद के लिए हमने क्या प्रबंध किया है ?
280. भक्ति भाव की संपत्ति हमें जीवन में कमानी चाहिए । यही संसार में भी और मृत्यु बाद भी हमारे काम आने वाली सच्ची संपत्ति है ।
281. नीचे गिरे हुए पतितों को प्रभु ही संभालते हैं क्योंकि वे पतितपावन जो हैं ।
282. एक संत व्याख्या करते हैं कि एक दुकानदार काम करता है, रात होने पर दुकान बंद कर घर जाता है, दूसरे दिन दुकान खोलकर आगे का काम करता है । जहाँ तक पिछले दिन काम किया हुआ था वह दोबारा नहीं करता, इसी तरह प्रभु श्रीमद् भगवद् गीताजी में श्री अर्जुनजी से कहते हैं कि भक्ति करते-करते किसी का शरीर छूटा और भक्ति पूरी नहीं हो पाई तो उसको अगला मनुष्य जन्म ही मिलता है और वह पुराने किए साधन से युक्त होकर आगे का साधन ही करेगा । जितना रास्ता भक्ति मार्ग पर वह चल चुका है वह दोबारा नहीं चलना पड़ेगा, आगे का ही चलना पड़ेगा । यह प्रभु का आश्वासन है जो बताती है कि की हुई भक्ति कभी भी व्यर्थ नहीं जाती ।
283. किसी के हृदय में भक्ति का अंकुर देखें तो उसे प्रोत्साहन दें जिससे उसके जीवन में भक्ति का बीज अंकुरित हो पाए ।
284. प्रभु भक्त के प्रेम की डोरी को कभी नहीं तोड़ते । संत विनोद में कहते हैं कि सर्वसामर्थ्यवान होते हुए भी ऐसा करने में प्रभु समर्थ नहीं हैं ।
285. प्रभु सभी देवों के देव और सभी सम्राटों के सम्राट हैं ।
286. प्रभु को सब कुछ देना पड़ता है फिर प्रभु से सब कुछ मिलता है ।
287. हम पूछते हैं परिवार कितना है, जगत में व्यवहार कितना है, व्यापार कितना है पर यह किसी से नहीं पूछते कि प्रभु से प्रेम कितना है ।
288. संसार तो डूबने का मार्ग ही बताएगा, तरने का साधन तो शास्त्र और संत ही बताएंगे ।
289. गिरते हुए को एकमात्र प्रभु ही संभालते हैं ।
290. दीन का आदर तो केवल प्रभु के दरबार में ही होता है ।
291. प्रभु के सभी नाम समान प्रभाव वाले होते हैं ।
292. प्रभु कथा का लक्ष्य सुनने वालों को भक्ति करने की प्रेरणा देना होता है ।
293. श्रीमद् भागवतजी महापुराण का हर प्रसंग अपने आप में मीठा ही है जैसे मिठाई को कहीं से भी खाएं मुँह में मिठास ही आएगी, इसी तरह श्रीमद् भागवतजी महापुराण का कोई भी प्रसंग सुने मीठा ही लगेगा ।
294. अपने प्यारे भक्तों पर प्रभु की कृपा दृष्टि बराबर बनी रहती है ।
295. प्रभु का नाम लेना जीवन में कभी भी बिसारना नहीं चाहिए । सदैव प्रभु का नाम लेते रहना चाहिए ।
296. दुनिया मतलब की है । मतलब सिद्ध होने तक दुनिया हमें वैसे घेरे रखती है जैसे मुर्दे को गिद्ध ।
297. मतलब पूरा होने पर दुनिया ऐसा मुँह फेरती है मानो पहचान ही न हो ।
298. जब तक जगत प्यार देता रहता है तब तक श्रीजगदीश याद भी नहीं आते और जब जगत ठुकराता है तो श्रीजगदीश याद आते हैं । श्री विभीषणजी को रावण ने ठोकर मारी, श्री सुग्रीवजी को बालि ने ठोकर मारी, श्री ध्रुवजी को उनकी सौतेली माता ने ठोकर मारी, श्री नरसी मेहताजी को उनकी भाभी ने ठोकर मारी तब इन सभी को प्रभु याद आए और प्रभु ने अपनाया । सिद्धांत के तौर पर जगत ने ठुकराया तो प्रभु ने अपनाया । शर्त यह है कि जगत से ठुकराए जाने पर फिर जगत के दरवाजा नहीं खटखटाएं, फिर प्रभु का द्वारा ही खटखटाएं ।
299. जगत ने ठुकराया तो यह सुनहरा अवसर है श्री जगन्नाथजी के श्रीकमलचरणों में माथा टेक देने का ।
300. संत एक कड़वा सत्य कहते हैं कि स्त्री और पुरुष के जिस अंग से मूत्र निकलता है उसी अंग से पुत्र निकलता है । अगर पुत्र प्रभु का भजन करे तो वह पुत्र है नहीं तो वह मूत्र समान त्याज्य योग्य ही है ।
301. ऐसी माता किसी भाग्यशाली पुत्र को मिलती है जो जगत से बचाकर भक्ति के संस्कार देकर श्रीजगदीश की गोद में अपने पुत्र को बैठा देती है ।
302. प्रभु को पाने के बाद फिर कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता ।
303. प्रभु से विमुख रहने वाले के लिए जगत तो क्या, ब्रह्मांड में कोई भी ठिकाना नहीं बचता है ।
304. जिह्वा को स्वाद पहुँचने के लिए हम क्या-क्या नहीं खाते जिससे हमारे साधन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है ।
305. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि श्री ध्रुवजी को दर्शन देने प्रभु नहीं गए बल्कि अपने नन्हें भक्त का दर्शन करने प्रभु गए हैं ।
306. संत प्रभु को सुख सागर कहते हैं ।
307. कथा रसपान और सत्संग नित्य कर सकें ऐसा वर प्रभु से श्री ध्रुवजी ने मांगा । प्रभु ने यह तो दिया ही साथ ही प्रभु ने अपनी तरफ से 36 हजार वर्षों का राज्य और श्रीध्रुव लोक का दान भी दिया ।
308. प्रभु की कीर्ति गा-गाकर सबको सुनानी चाहिए और उन्हें तारना चाहिए । संत ऐसा ही करते हैं ।
309. भावना से जो प्रभु को पुकारते हैं प्रभु उनकी नैया पार लगा देते हैं ।
310. भक्ति बड़े-बूढ़े की करने की होती तो श्री ध्रुवजी और श्री प्रह्लादजी ने बालपन में भक्ति करके जगत को क्यों दिखाया ?
311. जिस दिन से प्रभु की लगन लग जाए समझ लें कि हमारा परम और सच्चा भाग्य जग गया है ।
312. जिस श्री ध्रुवजी का तिरस्कार हुआ था उनके चरण पड़ने को पूरा राज्य उमड़ पड़ा । कारण क्या था ? उसी कारण को पहचाने, उसी कारण को जाने और उसी कारण को जीवन में पकड़ लें । वह कारण था कि जिस पर प्रभु की कृपा होती है उसका जगवंदन होता है और सभी उसके अनुकूल होना चाहते हैं ।
313. भगवती गंगा माता का कितना माहात्म्य है कि प्रभु के पार्षद के आने पर और प्रभु के आदेश पर श्रीध्रुव लोक जाने से पहले श्री ध्रुवजी ने भगवती गंगा माता के अमृत जल में स्नान किया और कहा कि अब पृथ्वी छोड़कर जा रहा हूँ, भगवती गंगा माता फिर कहाँ मिलेंगी ।
314. जिस जगह स्वर्गाश्रम में श्री ध्रुवजी भगवती गंगा माता के पास बैठकर प्रभु का ध्यान कर रहे थे वहाँ जल बहने की कल-कल की आवाज से उनका ध्यान भंग हो रहा था । वे उठकर जाने लगे तो माता समझ गईं और प्रकट होकर बोलीं कि मैं तुम्हारा ध्यान भंग न हो इसलिए इस जगह आवाज नहीं करूंगी । 200 - 300 मीटर का वह तट आज भी है जिसके आगे और पीछे कल-कल की आवाज करते हुए गंगाजल बहता है पर उस 200 - 300 मीटर में जल आज भी आवाज नहीं करता और शांत रूप से ही बहता है ।
315. भजन करते रहने से प्रभु के धाम के पार्षद और प्रभु के धाम का विमान जरूर आता है जैसे श्री ध्रुवजी के लिए आया था ।
316. भक्त केवल भगवान के धाम ही जाता है - यह शाश्वत सिद्धांत है ।
317. भजन का प्रताप देखें कि काल को भी श्री ध्रुवजी का स्पर्श करने का साहस नहीं हुआ और श्री ध्रुवजी काल को लांघकर प्रभु के पार्षदों के साथ प्रभु के द्वारा भेजे विमान में बैठकर पृथ्वीलोक से चले गए जैसा कभी किसी के साथ भी नहीं हुआ था । अपने पैर का स्पर्श काल को कराकर उन्हें धन्य करके श्री ध्रुवजी गए ।
318. बिना शरीर छोड़ें भगवती मीराबाई, श्री ध्रुवजी, श्री कबीरदासजी, श्री चैतन्य महाप्रभुजी, श्री तुकारामजी प्रभु के धाम गए और काल ने प्रभु के ऐसे प्रिय भक्तों को अपना नियम तोड़कर प्रणाम किया ।
319. प्रभु की श्रीआँखें हमें सतत देख रही होती हैं ।
320. जो विचार अभी हमारी वाणी से अभिव्यक्त नहीं हुआ, हमारी क्रिया में परिवर्तित भी नहीं हुआ वे भी प्रभु जानते हैं । हमारे भीतर के हर भाव के प्रभु ज्ञाता हैं । इसलिए भक्त सदैव सतर्क रहता है कि उसकी भावना कभी नहीं बिगड़े ।
321. धर्म विरुद्ध और शास्त्र विरुद्ध कुछ भी नहीं करना चाहिए ।
322. हमारा हर संकल्प और कर्म प्रभु को प्रसन्न करने वाला होना चाहिए ।
323. श्री विभीषणजी की प्रभु के प्रति कितनी निष्ठा है, कितना समर्पण है इसकी परीक्षा तब हुई जब उन्होंने सर्वज्ञ प्रभु को रावण के नाभि में अमृत होने की बात बताई और रावण की नाभि में बाण मारने को कहा । अब तक श्री विभीषणजी ने यह बात प्रभु से छिपाई थी इसलिए उनकी शरणागति में पूर्णता नहीं थी । यह बात बताते ही उनकी शरणागति पूर्ण हो गई ।
324. हम प्रभु से तो पूर्ण निष्ठा चाहते हैं कि प्रभु पूरी-पूरी मदद करें, पूरा दिल से करें पर अपनी तरफ से प्रभु के प्रति पूर्ण निष्ठा नहीं रखते ।
325. जीव के विश्वास को जीतने के लिए प्रभु परीक्षा तक दे देते हैं । श्री सुग्रीवजी के विश्वास को जीतने के लिए कि किसी भी तरह उन्हें प्रभु का विश्वास हो जाए प्रभु ने बालि द्वारा मारे राक्षस के कंकाल और हड्डियों को फेंका, एक बाण से सात वृक्षों का भेदन किया ।
326. कलियुग का विषयी जीव किसी-न-किसी कामना को लेकर ही प्रभु की आराधना करता है ।
327. बिना किसी लाभ के संसार का विषयी जीव प्रभु को भजने को भी तैयार नहीं है । तभी शास्त्रों में कलियुग को देखते हुए सकाम उपासना को स्थान दिया गया है ।
328. जीव इतना चतुर है कि पहले प्रभु से फल चाहता है कि उसके बाद आपकी प्रसन्नता के लिए कर्म करूंगा । उदाहरण स्वरूप पहले पोता हो जाए तो फिर आपके लिए सवामणि करूंगा । करुणामय प्रभु ऐसे विषयी जीवों का भी अपने में विश्वास कायम रखने के लिए पहले उन्हें फल दे देते हैं यानी पहले पोता होता है फिर सवामणि होती है ।
329. प्रभु की भक्ति करने से जीव का किस प्रकार कल्याण और उद्धार होता है इसकी चर्चा श्रीमद् भागवतजी महापुराण में प्रधानता से हुई है ।
330. भक्ति सच्ची हो तो भक्त को भगवान से एकाकार कर देती है ।
331. प्रभु इतने करुणामय, दयालु और कृपालु हैं कि विषयी जीव का भी भरोसा और विश्वास जीतने के लिए कितना कुछ पहले करते हैं ।
332. गर्भावस्था में माता जो भी देखेगी, सुनेगी उसका सीधा प्रभाव गर्भ के बालक पर पड़ेगा । इसलिए प्रभु के विग्रह को देखना और प्रभु का यशगान सुनना चाहिए । प्रभु की कथा और सत्संग माता सुनेगी तो भक्त पुत्र या पुत्री को जन्म होगा जो कुल की पीढ़ियों को तार देगा ।
333. गर्भस्त बालक मूवी कैमरे की रील की तरह होता है । जो भी उसकी माँ देखती और सुनती है वह उसके हृदय पटल पर अंकित हो जाता है जैसे रील में दृश्य और आवाज अंकित हो जाते हैं ।
334. शास्त्रों ने मानव जन्म को बहुत दुर्लभ माना है ।
335. मानव जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ भगवत् प्राप्ति है ।
336. भक्त की रक्षा का विधान हमेशा प्रभु करते हैं ।
337. अपने भक्त के ऊपर हरदम प्रभु की नजर होती है । इसलिए भक्त का कोई भी बाल भी बाँका नहीं कर सकता ।
338. शास्त्रों में भक्ति रहित मानव को मृतक समान माना गया है ।
339. आज के विद्यालय में इंद्रियों के पोषण के लिए जरूरी अर्थ कमाने की पढ़ाई होती है । भगवत् प्राप्ति के विषय में कुछ भी नहीं सिखाया जाता जो मानव जीवन की सफलता की एकमात्र कुंजी है ।
340. प्रभु के शरणागत को किसी से डरने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
341. जीवन को प्रभु के संरक्षण में ही जीना चाहिए ।
342. कोई कोटि-कोटि उपाय क्यों न कर ले पर भक्त का बाल भी बाँका नहीं होता क्योंकि प्रभु का सुरक्षा कवच उसके चारों तरफ रहता है । श्री प्रह्लादजी इसके जीवंत उदाहरण हैं ।
343. जिन्होंने जीवन भर प्रभु का नाम लिया उनका नाम जगत में सदैव के लिए भक्त के रूप में अमर हो जाता है ।
344. जल, थल और नभ में सभी जगह हमारे रक्षक प्रभु ही हमारी रक्षा करते हैं ।
345. प्रभु नाम जपने वाले को कोई भी भय भयभीत नहीं कर सकता ।
346. प्रभु श्री जगदीशजी का दास जगत से कभी हार नहीं सकता ।
347. प्रभु का भक्त किसी के सामने हाथ पसारे, यह प्रभु कभी होने नहीं देते ।
348. भक्त के भगवान सबसे बड़े सहायक होते हैं ।
349. श्री प्रह्लादजी कहते हैं कि जो कुछ पाने की लालसा से प्रभु की भक्ति करता है वह भक्ति नहीं है बल्कि प्रभु से लेन-देन का धंधा कर रहा है, वह तो व्यापार है ।
350. निष्कामता देखें श्री प्रह्लादजी की कि प्रभु के आदेश देने पर भी कि वर मांगो, उन्होंने मांगा कि उन्हें यह वर दें कि कभी कुछ भी मांगने की जीवन में कामना ही न रहे ।
351. भक्त के हर अंग प्रभु की सेवा करने के लिए तरसते रहते हैं कि कोई प्रभु की सेवा मिल जाए ।
352. आशा और भरोसा केवल और केवल प्रभु का ही होना चाहिए तभी वह सच्ची और अनन्य भक्ति कहलाती है ।
353. लोग बेचैन रहते हैं कि नेता, अभिनेता और खिलाड़ी में उनका नाम आ जाए पर भक्ति में उनका नाम आ जाए, क्या कोई यह अभिलाषा रखता है ?
354. भक्तों में हमारी गिनती हो इसके लिए हर मनुष्य को बेचैन होना चाहिए और प्रयत्न करना चाहिए ।
355. भक्ति और भजन करना कभी भी, किसी भी परिस्थिति में छोड़ना नहीं चाहिए ।
356. राजा श्री अम्बरीषजी के पास एक बार देवर्षि प्रभु श्री नारदजी एक लाल बही लेकर आए । राजा श्री अम्बरीषजी ने पूछा कि इसमें क्या लिखा है ? देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने कहा कि इसमें वे भक्त का नाम है जो प्रभु की भक्ति करते हैं । राजा श्री अम्बरीषजी ने देखना चाहा तो देखा पर उन भक्तों में उन्हें अपना नाम नहीं मिला । फिर देवर्षि प्रभु श्री नारदजी कुछ दिन बाद एक हरी रंग की बही लेकर आए । राजा श्री अम्बरीषजी ने पूछा तो उन्होंने बताया कि इसमें उन भक्तों का नाम है जो प्रभु की भक्ति तो करते हैं पर जिनका भजन प्रभु भी करते हैं । राजा श्री अम्बरीषजी को आश्चर्य हुआ कि ऐसे भी भक्त होते हैं कि जिनका भजन भगवान स्वयं करते हैं तो देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने कहा कि प्रभु श्री हनुमानजी, श्री भरतलालजी, श्री भीष्म पितामह जैसे भक्त हैं जिनका ध्यान और भजन प्रभु भी करते हैं । उस बही में राजा श्री अम्बरीषजी ने देखा कि उनका नाम भी दर्ज था ।
357. प्रभु का प्यारा, दुलारा और कृपापात्र बनने का प्रयास जीवन में करना चाहिए ।
358. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के नाम का अर्थ है ना-रद यानी जिनकी बात प्रभु भी कभी रद्द नहीं करते यानी हमेशा उनकी बात मानते हैं, वे देवर्षि प्रभु श्री नारदजी हैं ।
359. जगह-जगह प्रभु ने अपने श्रीमुख से भक्ति की महिमा गाई है ।
360. भक्ति का अनादर करने वाले पतित हो जाते हैं, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
361. ऋषि श्री दुर्वासाजी ने प्रभु श्री नारायणजी की शरण लेते हुए कहा कि चक्रराज श्री सुदर्शनजी से मुझे बचाइए, मैं आपकी शरण में हूँ । प्रभु ने इतना मार्मिक उत्तर दिया कि मैं भक्तवत्सल, दीनबंधु, शरणागतवत्सल आदि सभी संबोधन से में सबसे प्रथम संबोधन भक्तवत्सल को प्रथम मानता हूँ । आपने मेरे भक्त का अपमान किया है इसलिए मैं शरण नहीं देता । मैं सबसे पहले भक्तवत्सल हूँ । मैं अपने भक्त के अधीन हूँ ।
362. जोगी, ज्ञानी, बैरागी, संन्यासी, त्यागी और तपस्वी ऋषि श्री दुर्वासाजी को प्रभु ने कहा कि आपके इतने सारे गुणों पर भी मेरे भक्त श्री अम्बरीषजी की भक्ति अकेली बहुत भारी पड़ती है ।
363. जीवन जीने के लिए प्राण, वायु, प्रकाश और पानी जो भी सबसे जरूरी है वह सब प्रभु ने हमें मुफ्त दिया है ।
364. प्रभु की कृपा से ही हमारी थाली में अन्न आता है । इसलिए भोजन से पहले प्रभु को प्रथम धन्यवाद देना चाहिए ।
365. प्रभु की कृपा बेमिसाल है । जीव का पतन होता है तो भी प्रभु कृपा करके पतितपावन बनाकर उसे संभालते हैं ।
366. प्रभु केवल हमसे हमारा पूरा भरोसा और विश्वास चाहते हैं ।
367. प्रभु के हमारे ऊपर जो अनंत उपकार हैं उस पर हमारी दृष्टि कभी तो जानी चाहिए ।
368. दुनिया की नजर में अरबपति हो पर प्रभु से प्रेम और प्रभु की भक्ति न हो तो आध्यात्मिक दृष्टि से वह जीव बहुत गरीब है ।
369. प्रभु की भक्ति और प्रेम का कथा रूप में वितरण करने वाला संसार का सबसे श्रेष्ठ दाता है । ऐसा श्रीगोपीजन ने श्री गोपीगीत में कहा है ।
370. कथा जीविका न हो, कथा जीवन हो - यह कितना बड़ा फर्क है ।
371. संसार के मोह के अंधकार में हम पड़े रहे और हमारे जीवन के मूल्यवान वर्ष व्यर्थ ही बीत गए ।
372. प्रभु की भक्ति करने के लिए ही हमें मानव तन मिला है ।
373. श्री द्वारिकाजी के नाथ अनाथों के भी नाथ हैं ।
374. प्रभु के श्रीकमलचरण हमारे हृदय में विराजमान रहे, ऐसा भक्त का निरंतर प्रयास होता है ।
375. श्री सुदामाजी अपनी निष्कामता और भक्ति को कभी भुनाना नहीं चाहते थे । वे अपनी निष्काम भक्ति को बरकरार रखना चाहते थे ।
376. हमारे अंदर दीनता होना प्रभु की कृपा का एक बहुत बड़ा हेतु होता है ।
377. प्रभु पदार्थ के भूखे नहीं हैं, वे केवल भाव के भूखे हैं ।
378. जल पर भी न्यौछावर होने के लिए प्रभु श्री महादेवजी सदैव तैयार रहते हैं ।
379. अगर प्रभु की “दया” चाहें तो दया शब्द का उल्टा “याद” यानी प्रभु को निरंतर याद करें ।
380. श्रीपुराण का अर्थ है जो पुरातन होते हुए भी नित्य नूतन हैं, उन्हें श्रीपुराण कहते हैं ।
381. प्रभु की कथा सुनने से करोड़ों प्रश्नों के जवाब स्वतः ही मिल जाते हैं ।
382. हमारी सभी समस्याओं का समाधान प्रभु की कथा के माध्यम से हो जाता है ।
383. प्रभु को नित्य नमन रूपी पुष्प समर्पित करना चाहिए ।
384. अपने मन को प्रभु के प्रति अनन्य भाव से सुंदर बनाकर वह सुंदर मन प्रभु को समर्पित करना चाहिए ।
385. प्रभु के वियोग में दुःखी होने जैसा आनंद दूसरा कोई नहीं है ।
386. प्रभु के लिए प्रेमाश्रु बहाने जैसा कोई परमानंद नहीं है ।
387. प्रभु घोषणा करते हैं कि मुझे खुश करना है तो अपना मन मुझे दे दो । यह प्रभु की जीव से एक ही मांग है ।
388. प्रभु की कृपा देखें कि हमारे अनंत जन्मों के संचित पापों को प्रभु चुरा लेते हैं ।
389. प्रभु के प्रति अपनत्व का भाव जागृत करना हमें सनातन धर्म सबसे प्रधानता से सिखाता है ।
390. भगवान मेरे हैं और मैं भगवान का हूँ - यह दृढ़ भाव जागृत करना ही भक्ति है । हम भगवान के “ही” हैं और केवल भगवान “ही” हमारे हैं - यहाँ तक भक्ति हमें पहुँचाती है ।
391. प्रभु जैसा सामर्थ्य, प्रभु जैसा सौंदर्य, प्रभु जैसा ज्ञान और प्रभु जैसी संपत्ति त्रिलोकी में कहीं नहीं है फिर भी हमारा दुर्भाग्य है कि हम प्रभु से रिश्ता नहीं जोड़ते ।
392. प्रभु को अपना बनाने का संत एक ही तरीका बताते हैं कि तुम अनन्य भाव से उनके हो जाओ ।
393. जो प्रभु के प्रति संपूर्ण समर्पित हो गया उसका कल्याण और मंगल करने के लिए प्रभु आतुर हो उठते हैं ।
394. संसार में ऐसा कोई प्राणी नहीं जो प्रभु का न हो पर हम प्रभु से अपनापन नहीं रखकर संसार से अपनापन रखने की गलती करते हैं ।
395. शरीर की खुराक तो कुत्ते और सुअर को भी मिला करती है पर आत्मा की भजन रूपी खुराक केवल मनुष्य ही ले सकता है ।
396. बंधु उसे कहते हैं जो दुःख और सुख में साथ देने वाला है । प्रभु से बड़ा बंधु कोई नहीं जो गर्भ के दुःख और नर्क के दुःख में भी साथ देते हैं और हमें बचाते हैं ।
397. प्रभु हमसे अपना रिश्ता कभी नहीं तोड़ते । हम ही प्रभु से नाता मानने को तैयार नहीं होते ।
398. सभी जीवों के स्वार्थ रहित सखा प्रभु हैं । संसार के सखा स्वार्थ वाले होते हैं और स्वार्थ पूरा होते ही दूर हो जाते हैं ।
399. भक्ति जब चरम पर पहुँचती है तो भक्त की दृष्टि ऐसी हो जाती है कि साधारण वर्षा की बूँदों में भी उसे प्रभु की कृपा झलकती है कि प्रभु की कृपा धरती पर बरस रही है ।
400. प्रभु शाश्वत हैं, उनका कभी भी किसी भी युग में अभाव नहीं होता ।
401. प्रभु का किया क्रोध भी कल्याणकारी और मंगलकारी ही होता है ।
402. संत कहते हैं कि प्रभु का क्रोध भी मोक्ष दिलाने वाला है । प्रभु ने क्रोध कर अधर्म कर रहे जितने असुरों को मारा सबको मोक्ष मिल गया ।
403. प्रभु श्री महादेवजी ने श्री कामदेवजी पर क्रोध किया और भस्म किया तो वरदान स्वरूप श्री कामदेवजी को प्रभु श्री कृष्णजी का पुत्र बनने का गौरव मिला और प्रभु की गोद में बैठने का सौभाग्य मिला । इस तरह प्रभु का प्रकोप भी कल्याणकारी हो गया ।
404. संत प्रभु का क्रोध भी प्रभु अनुग्रह का एक प्रकार ही मानते हैं ।
405. प्रभु की सामर्थ्य देखें कि संकल्प मात्र से सृष्टि उत्पन्न हो जाती है । प्रभु को कुछ करना नहीं पड़ता, कोई कर्म नहीं करना पड़ता, मात्र संकल्प करने से सब कुछ स्वतः ही हो जाता है ।
406. प्रार्थना हमारी मन की थकावट को दूर कर देती है ।
407. प्रार्थना प्रभु से जुड़ने का एक प्रधान साधन है जिससे हमारी सभी प्रकार की ऊर्जा फिर से सक्रिय हो जाती है ।
408. प्रभु सृजन करते हैं बिना मोह के, पालन करते हैं बिना अहंकार के और प्रलय करते हैं बिना क्रोध के ।
409. प्रभु के भृकुटी के हिलने मात्र से प्रलय हो जाती है ।
410. एक संत कहते हैं कि प्रभु के श्रीनेत्र खुले तो सृष्टि हो गई, श्रीनेत्र खुले रहे तब तक सृष्टि चली, श्रीनेत्र प्रभु ने बंद किए तो सृष्टि मिट गई । यह प्रभु का अद्वितीय सामर्थ्य है ।
411. भाव शून्य और शब्द युक्त प्रार्थना से भाव युक्त और शब्द शून्य प्रार्थना कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है ।
412. प्रभु से कुछ कहना नहीं पड़ता, बस समर्पण करें और सभी पाप और कष्ट प्रभु हर लेते हैं क्योंकि वे अंतर्यामी हैं ।
413. प्रभु को सच्चे हृदय से दंडवत प्रणाम करने से दुःख भी मिटते हैं और पाप भी नष्ट हो जाते हैं ।
414. प्रभु के श्रीकमलचरण सबके लिए उपलब्ध हैं । कालिया जैसे को भी प्रभु के श्रीकमलचरण मिले और उसके मस्तक पर प्रभु के श्रीकमलचरणों का श्रीचिह्न से वह श्री गरुड़जी से भी सदैव के लिए अभय हो गया ।
415. जो भी प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय चाहता है उसके लिए वे सदा उपलब्ध हैं ।
416. सबसे चिंतन करने योग्य प्रभु के श्रीकमलचरण ही हैं - ऐसा संत मत है और शास्त्र आज्ञा है ।
417. प्रभु के श्रीकमलचरण मुक्ति प्रदान करने वाले होते हैं ।
418. हमारी आरजू न रहे और प्रभु की मर्जी रहे तभी हमारा मंगल होगा ।
419. श्रीमद् भगवद् गीताजी योग शास्त्र है, श्री रामायणजी प्रयोग शास्त्र है और श्रीमद् भागवतजी महापुराण वियोग शास्त्र है - ऐसा संत मत है पर सभी में संत कहते हैं कि भक्ति का प्रतिपादन प्रमुखता से मिलेगा ।
420. प्रभु सच्चिदानंद हैं, कभी किसी अवतार में सत्वगुण को विशेष रूप से प्रकट करते हैं जैसे श्रीरामावतार में किया, चित्त गुण को श्री कपिल अवतार में प्रकट किया और आनंद तत्व को श्री कृष्णावतार में प्रधान रूप से प्रकट किया ।
421. भक्ति हमारी रुचि प्रभु की तरफ मोड़ देती है ।
422. देहधारियों में मानव देहधारी सबसे श्रेष्ठ हैं । मानव देहधारी में भक्ति करने वाला सबसे श्रेष्ठ है ।
423. प्रभु की कथा का एक-एक शब्द हमें प्रभु की श्रीलीलाओं का चिंतन कराता है ।
424. गृहस्थों के लिए श्रीमद् भागवतजी महापुराण भव रोग की औषधि है और विरक्तों के लिए यह रसायन है । औषधि से रोग ठीक होता है और रसायन से दोबारा रोग नहीं होता क्योंकि उससे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है ।
425. श्रीगोपीजन जैसे प्रभु प्रेमियों के लिए श्रीमद् भागवतजी महापुराण अमृत स्वरूप है ।
426. प्रभु श्री ब्रह्माजी ने मुक्ति के जितने भी साधन थे उनकी तुलना श्रीमद् भागवतजी महापुराण से की और श्रीमद् भागवतजी महापुराण सबसे सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुई । इनके श्रवण मात्र से मोक्ष मिलता है ।
427. प्रभु के श्रीकमलचरणों का ध्यान करने मात्र से दुःख चला जाता है, ऐसा संतों का अनुभव है ।
428. भक्ति करने वाले का हृदय भगवत् प्रेम से भरा हुआ ही होता है ।
429. संसार के नश्वर पदार्थों के प्रति हमारे मन में वैराग्य होना चाहिए ।
430. संत कहते हैं कि प्रभु की कथा जहाँ पर होती है वहाँ सारे तीर्थ आ जाते हैं । वह स्थान एक महातीर्थ बन जाता है ।
431. प्रभु को सुमन (फूल) अर्पित करने का एक अर्थ संत करते हैं कि प्रभु को सु-मन यानी अपना सुंदर मन निवेदन करें । पहले मन को सुंदर विचारों से युक्त करें, दुर्विचार हटाएं और फिर वह सुंदर मन रूपी सुमन प्रभु को समर्पित करें तो प्रभु अति प्रसन्न होते हैं ।
432. प्रभु की कथा कान से भी ज्यादा मन से सुननी चाहिए । मन प्रभु कथा में समर्पित करना चाहिए ।
433. प्रभु को नमन का एक अर्थ संत करते हैं कि न-मन यानी बिना मन के । संत कहते हैं कि अपना मन प्रभु को सौंप कर संसार के लिए बिना मन के हो जाएं । जैसे गोपियां नमन हो गई जब श्री उद्धवजी को उन्होंने कहा कि हमारा एक मन था जिसको हमने प्रभु के साथ भेज दिया । अब हमारे पास मन है ही नहीं यानी हम बिना मन के हैं ।
434. विश्व मंगल का सबसे उपयोगी साहित्य भारतवर्ष के पास ही है । यह संस्कृत में हमारे शास्त्र हैं ।
435. प्रभु के वियोग में रोने का भी एक अलग ही आनंद है जो भक्त अनुभव करता है ।
436. प्रभु को प्रसन्न करना है तो अपना मन प्रभु को दे देवें ।
437. जो जीव प्रभु को भजते हैं प्रभु उनके अनंत जन्मों में अर्जित पापों को चुरा लेते हैं ।
438. दुःख रूप संसार से आनंद की कामना करना मूर्खता है ।
439. संसार के समुद्र में समस्याओं की लहरें उठती ही रहती है । इसका समाधान केवल प्रभु की भक्ति है ।
440. प्रभु की भक्ति के भवसागर में डूबने से संसार के भवसागर में डूबने से बच जाएंगे ।
441. पहले वैराग्य से मन को संसार के विषयों में जाने से रोकना चाहिए फिर भक्ति द्वारा अभ्यास करके मन को प्रभु में लगाना चाहिए ।
442. आँखें जिन्हें देखने के लिए बनाई गई है वह परम निधि प्रभु का स्वरूप ही है ।
443. संसार भी हमारे नेत्रों और कानों के माध्यम से भीतर जाता है और प्रभु भी हमारे नेत्रों और कानों के माध्यम से भीतर जाते हैं । यह हमारे ऊपर है कि हम अपने नेत्र और कान का उपयोग किन्हें भीतर लेने के लिए करते हैं ।
444. प्रभु कथा से अधिक मन को प्रभु प्रेम में डूबाने वाला साधन कलियुग में अन्य कोई भी नहीं है ।
445. श्रवण, स्मरण और कीर्तन - यह कलियुग के तीन प्रधान साधन हैं ।
446. जिस समय भक्ति की इच्छा मन में जागृत हुई उसी समय से हमारा मंगल होना प्रारंभ हो जाता है ।
447. प्रभु को जाने बिना जितना भी हमने संसार को जाना है, शास्त्र दृष्टि से वह सब व्यर्थ है ।
448. जब तक बुद्धि के तरकश में तर्क का एक भी बाण बचा है तब तक पूर्ण श्रद्धा प्रभु के लिए जागृत होने वाली नहीं है ।
449. प्रभु सभी तर्कों से परे हैं । प्रभु को कभी भी तर्क से नहीं जान सकते । वे श्रद्धा और भक्ति से ही अनुभव में आते हैं ।
450. हम लौकिक चर्चा करते हैं और संत भगवत् चर्चा करते हैं - यह कितना बड़ा फर्क है ।
451. प्रभु की कथा सुनने से प्रभु के लिए श्रद्धा जागती है फिर प्रभु से प्रीति होती है, यही तो भक्ति का आरंभ है ।
452. मति यानी बुद्धि, रति यानी प्रेम और गति यानी हमारा गंतव्य प्रभु ही हो जाने चाहिए ।
453. सत्संग का समय दिन में काफी बड़ा होना चाहिए तभी वह प्रभावी होगा ।
454. श्रीहरि की भक्ति के बिना जीवन में परमानंद कभी नहीं मिल सकता ।
455. बहुत विषयी जीव भी अगर प्रभु की तरफ मुड़ जाए तो प्रभु का प्यारा बन जाता है ।
456. जो प्रेम की धारा हमारी संसार, रिश्ते, शरीर और धन की ओर है उस प्रेम की धारा को मोड़कर केवल प्रभु की तरफ कर देना ही भक्ति है ।
457. प्रेम करना सब जानते हैं पर हम गलत दिशा में प्रेम करते हैं । उस दिशा को शास्त्र, सत्संग और संत प्रभु की तरफ मोड़ देते हैं ।
458. दुनिया की यह रीत रही है कि जो उनके काम का होता है उसे ही प्रेम करते हैं । जैसे कमाऊ बेटे से माँ-बाप, पत्नी प्रेम करते हैं पर निकम्मे बेटे से कोई प्रेम नहीं करता । पर प्रभु के राज्य में बिना भेदभाव के प्रभु सबसे प्रेम करते हैं पर हमारा दुर्भाग्य है कि हम ही प्रभु से प्रेम नहीं करते ।
459. प्रभु के श्रीकमलचरणों में हुआ अनुराग हमारा कल्याण करवाने वाला होता है ।
460. अंश (जीव) का स्वभाव होता है अंशी (प्रभु) की तरफ जाए पर संसार इसमें बाधा देता है ।
461. जैसे बादलों का पानी नीचे गिरता है क्योंकि उनका अंशी श्री समुद्रदेवजी नीचे हैं, अग्नि की लपटें ऊपर उठती है क्योंकि उनका अंशी प्रभु श्रीसूर्यनारायणजी ऊपर हैं, पृथ्वी का पत्थर कितना भी ऊँ‍चा फेकें वह वापस नीचे पृथ्वी पर आता है क्योंकि उनका अंशी भगवती पृथ्वी माता नीचे हैं, इसी तरह जीव को अंत में अपने अंशी प्रभु की तरफ ही जाना पड़ेगा चाहे वह इस मानव जन्म में जाए या फिर 84 लाख योनियों में भटककर वापस मिले मानव जन्म में जाए ।
462. वे अनंत प्रभु, अनंत जन्मों से जीव को अपनी अनंत भुजाएं फैलाकर बुलाते हैं कि मेरी शरण में आ जाओ ।
463. जीवन में सुख चाहते हैं तो सुखसागर यानी सुख के सागर प्रभु की तरफ ही जाना पड़ेगा ।
464. हमारे सच्चे रूप में अपने तो केवल प्रभु ही हैं ।
465. शरणागति उनकी होनी चाहिए जो परम दयालु हैं और सर्वसामर्थ्यवान हैं और ऐसे तो केवल एक प्रभु ही हैं ।
466. प्रभु का अनुभव जीवन में होना, प्रभु का साक्षात्कार होना मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है ।
467. प्रभु अनुमान के विषय तो बहुतों के लिए बन जाते हैं कि संसार है तो इसे बनाने और चलने वाला भी कोई होगा । यह अनुमान तो प्रायः सभी कर लेते हैं पर धन्य वे होते हैं जो अनुमान के ऊपर उठकर प्रभु के अनुभव तक की यात्रा करते हैं ।
468. मंदिर में भीड़ प्रभु “से” चाहने वालों की होती है । प्रभु बाट जोहते हैं उनकी जो प्रभु “से” चाहने वाला न हो बल्कि प्रभु “को” चाहने वाला हो ।
469. प्रभु मुक्ति के देने वाले हैं पर हम उनसे संसार मांगकर मुक्ति की जगह बंधन मांग लेते हैं ।
470. जैसे कोई राजा किसी भिखारी से खुश हो जाए और कुछ मांगने को कहे और वह भिखारी शराब की एक बोतल मांग ले तो कितना मूर्ख माना जाएगा । वैसे ही हम ब्रह्मांड के महाराज प्रभु से लौकिक वास्तु मांगते हैं तो मूर्खता ही तो करते हैं ।
471. जिसकी कोई कामना नहीं रहती उसे ही जीवन में सच्ची शांति मिलती है ।
472. प्रभु शरण में आने वाले को ठुकराना नहीं जानते । वे कभी साक्षात्कार लेकर शरण नहीं देते । वे तो जो भी आता है बिना उसका लेखा-जोखा देखे शरण दे देते हैं ।
473. दीनता धारण करके अहंकार रूपी शत्रु से बचना चाहिए ।
474. भक्ति की पर किसी भी चीज का अहंकार कर लिया या भक्ति का भी अहंकार कर लिया तो वैसे ही हो गया जैसे छप्पन भोग बनाया और फिर उस पर मिट्टी का तेल डाल दिया ।
475. प्रभु जिसको अपना लेते हैं फिर कभी उसे त्यागते नहीं हैं ।
476. हमारे भाग्य को सही दिशा देने वाले केवल प्रभु ही हैं ।
477. हमें मानव शरीर अपने बिछड़े हुए प्रभु से प्रेम कर उन्हें प्राप्त करने के लिए ही मिला है । यह काम हम जीवन में कितना कर पाए हैं, यह कभी सोचना चाहिए ।
478. जैसे कोई जीव शौचालय में 20 घंटे बैठे वह मूर्ख कहलाएगा वैसे ही रोटी, कपड़ा और मकान के लिए जीवन के 60-70 वर्ष व्यर्थ कर दिए तो वह व्यक्ति आध्यात्मिक दृष्टि से महामूर्ख कहलाएगा ।
479. अगर जीवन की बुनियादी जरूरत की जुगाड़ हो गई है तो बाकी बची सभी श्वासों को प्रभु की भक्ति में लगानी चाहिए ।
480. अगर हमें दुःख और क्लेश सता रहे हैं तो सुखसागर प्रभु की तरफ ही चलना चाहिए ।
481. काल का डर है तो अकाल और महाकाल प्रभु की तरफ ही चलना चाहिए ।
482. संसार के पथभ्रष्टों को मोह निद्रा से जागने का काम भक्ति करती है ।
483. सच्चे संत दुनियादारी की चर्चा करना और सुनना जानते ही नहीं हैं । वे केवल भगवत् संबंधी चर्चा किया करते हैं ।
484. हम स्त्री, बच्चे, दुकान, मकान और गाड़ी सबको याद करते हैं पर इन्हें देने वाले प्रभु को क्या हम सदैव याद करते हैं ?
485. जिन्होंने इतनी भरपूर कृपा करके मनुष्य तन हमें दिया है उन प्रभु को ही हम संसार के चक्कर में भुला बैठे हैं ।
486. बिजली से रोशनी होती है पर उसका मासिक भुगतान करना पड़ता है नहीं तो बिजली कंपनी लाइन काट देती है । जगत को प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के माध्यम से सर्वत्र प्रकाश देने वाले प्रभु को हम भूल जाते हैं तो भी प्रभु लाइन नहीं काटते और जगत में अंधेरा नहीं करते ।
487. जिंदगी भर उपयोग करने के लिए मुफ्त में प्रकाश, ताप, पानी, हवा प्रभु हमें देते हैं और हम उन्हें ही भुला बैठे हैं । यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है और कृतघ्नता है ।
488. सच्चे संत हमारे मन को प्रभु की तरफ झुका देते हैं ।
489. मानव जीवन हमें प्रभु के गुण गाने के लिए ही मिला है ।
490. श्रीमद् भागवतजी महापुराण केवल सात दिन ही सुनने वाली कथा नहीं है । यह सदा-सदा सुनने वाली होनी चाहिए ।
491. मदिरा के व्यसन से हम होश खो देते हैं । कथा का व्यसन हुआ तो मानव जीवन का उद्देश्य समझने पर हम होश में आ जाएंगे ।
492. प्रभु का सुयश सुनना हमारी अनिवार्यता होनी चाहिए यानी उसके बिना हम रह ही न पाए ।
493. जिसको दिव्य जीवन जीना है उसे प्रभु की मंगलमय कथा सुननी ही चाहिए ।
494. एक बार प्रभु हमें उठा लें तो फिर दुनिया की कोई ताकत हमें कभी भी गिरा नहीं सकती ।
495. प्रभु के श्रीवचन हैं कि उनके भक्त का कभी पतन नहीं होता ।
496. प्रभु की कथा हमारा जीवन नीरस से सरस कर देती है ।
497. प्रभु की कथा हमें प्रभु की गोद में बैठा देती है ।
498. दुःख रूप संसार से आनंद की कामना करना नासमझी है ।
499. मृत्यु लोक में मृत्यु की भयंकर पीड़ा है और जीने की भी पीड़ा है क्योंकि जीवन भी समस्याओं से भरा हुआ है ।
500. संत कहते हैं कि संसार का दूसरा नाम ही समस्या है या यूं कहें कि समस्या का दूसरा नाम ही संसार है ।
501. जैसे किनारे पहुँचकर सागर की लहर समाप्त हो जाती है पर नई लहरें फिर उठती जाती है । वैसे ही संसार के सागर में भी समस्या की लहरें उठती ही रहती है, हम एक समस्या को समाप्त करते हैं तो पीछे से नई-नई समस्याएं उतनी ही उठती जाती हैं ।
502. प्रभु को सदैव अपने पक्ष में रखें तो जीवन में उत्सव, आनंद और मौज ही रहेगा ।
503. श्रीमद् भागवतजी महापुराण प्रभु से बिल्कुल भी भिन्न नहीं है क्योंकि वे साक्षात प्रभु का ही स्वरूप हैं ।
504. हमारे घर में और मन में प्रभु को रखेंगे तो कलियुग के दोष वहाँ प्रवेश नहीं कर पाएंगे ।
505. नेत्र और कान बहुत महत्वपूर्ण इंद्रियां होती हैं । मन कैसा बनेगा इसमें इन दोनों इंद्रियों का बोलबाला है क्योंकि हमारा मन वैसा ही बनता है जैसा हम देखते या सुनते हैं ।
506. अपने नेत्र और कान के माध्यम से प्रभु को अपने अंतःकरण में लाना चाहिए ।
507. भक्ति बिना परमानंद मिल ही नहीं सकता । परमानंद मिलने का अन्य कोई उपाय है ही नहीं ।
508. पुस्तक वही पढ़ें जिसे पढ़कर प्रभु से संयोग की अनुभूति हो और प्रभु से हम जुड़ सकें ।
509. संत श्री सूरदासजी के पद उनके हृदय से निकले हुए हैं इसलिए हमारे कान तक सीमित नहीं रहते बल्कि हमारे हृदय तक पहुँचते हैं ।
510. जो मानव की आकृति पाकर दानवता को अपनाते हैं वे नर्क जाते हैं ।
511. हमारे में अहंकार नहीं है, इस बात का भी अहंकार होना एक बहुत बड़ा अहंकार है ।
512. प्रभु के भृकुटी के इशारे से ब्रह्मांड पलट जाते हैं पर वे प्रभु जब अपने प्रेमी के संग होते हैं तो अपनी प्रभुता पूरी तरह से भुला देते हैं और प्रेम के रंग में रंग जाते हैं ।
513. जीवन से संबंधित सभी प्रश्नों का समाधान श्रीमद् भगवद् गीताजी में मिलता है ।
514. सर्वसामर्थ्यवान प्रभु ही सबके नियंता हैं ।
515. शरणागत भक्त प्रभु को अपने से बांध लेता है । जैसे एक छोटा नवजात बच्चा, जो अपनी माँ के शरणागत है, उससे माँ बंधी हुई होती है वैसे ही प्रभु भी अपने शरणागत भक्त से बंधे हुए होते हैं ।
516. प्रभु लगातार अपने भक्त के कुशल की चिंता करते रहते हैं ।
517. प्रभु के किसी भी रूप और अवतार में कभी भी भेद नहीं मानना चाहिए ।
518. प्रभु सबके नियंता हैं और सब कुछ प्रभु की इच्छा के अनुसार ही चलता है ।
519. अध्यात्म में बच्चों की रुचि बने ऐसा प्रयास हर माता-पिता और शिक्षक को करना चाहिए ।
520. संत कहते हैं कि प्रभु की करुणा का कोई आर पार नहीं है ।
521. प्रभु श्री यमराजजी अपने दूतों से कहते हैं कि जो प्रभु का भजन करते हैं, भक्ति करते हैं उन पर मेरी सत्ता और नर्क का प्रावधान नहीं चलता । ऐसा उन्होंने श्री अजामिलजी के प्रसंग में कहा ।
522. मन और इंद्रियां प्रभु में लगे, यह धर्म है और मन और इंद्रियां प्रभु को छोड़कर संसार में लग जाए, यही अधर्म है । कितनी सुंदर परिभाषा धर्म और अधर्म की यह है ।
523. भक्त के मन में काम यानी कामना होती है तो प्रभु दर्शन की ही होती है ।
524. देवर्षि प्रभु श्री नारद जी के दो प्रौढ़ यानी बूढ़े शिष्य प्रभु श्री वेदव्यासजी और ऋषि श्री वाल्मीकिजी हैं और उनके दो बालक शिष्य श्री ध्रुवजी और श्री प्रह्लादजी हैं । बच्चों से लेकर बूढ़ों तक जिनसे भी मिलते हैं उन्हें प्रभु से जोड़ने का काम देवर्षि प्रभु श्री नारदजी करते हैं ।
525. जो अमृत पिए वे देव कहलाए और जिन्होंने अमृत देवों को दिया और खुद विष पिए वे देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी कहलाए ।
526. सभी देवी-देवताओं की 1 दिन (श्री रामनवमी), 2 दिन (श्री जन्माष्टमी और नंद उत्सव), 9 दिन (श्री नवरात्रि), 10 दिन (प्रभु श्री गणेशजी का उत्सव) की पूजा वर्ष में होती है पर देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी की पूजा पूरा महीना भर (श्रावण मास) में होती है । वे करुणा के अवतार हैं जिसके कारण यह अधिकार उन्हें मिला है ।
527. प्रभु श्री महादेवजी मोहित भी हुए तो प्रभु के मोहिनी रूप में हुए । सच्चा वैष्णव मोहित भी होता है तो केवल प्रभु से होता है ।
528. मनुष्य जब तक जीवन से कामना नहीं त्यागता तब तक जीवन भर भटकता ही रहता है ।
529. प्रभु श्री वामन अवतार में तीन पग भूमि मांगते हैं यानी श्री बलिजी का तन, मन और धन तीनों मांगते हैं । यह तीनों देने पर श्री बलिजी का पूर्ण आत्म-निवेदन प्रभु को हुआ ।
530. प्रभु ने दो पग में श्री बलिजी “का” सब कुछ ले लिया और तीसरे पग में श्री बलिजी “को” ले लिया ।
531. हम प्रभु के काम के बन जाएं तो यह जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है ।
532. हमें प्रभु “से” कुछ मिला है और हमें प्रभु “स्वयं” मिले हैं - इन दोनों बातों में कितना बड़ा फर्क है ।
533. राजा श्री बलिजी ने अपने को प्रभु को समर्पित कर दिया, प्रभु ने उन्हें अपना मान लिया और स्वीकार किया । अब श्री बलिजी के रक्षक बनकर उन्हें संभालने की जिम्मेदारी प्रभु की हो गई । कितना सुंदर सूत्र है कि स्वयं का प्रभु को आत्म-निवेदन कर दें फिर सब जिम्मेदारी प्रभु की हो जाती है ।
534. प्रभु से कभी भी शिकायत नहीं करनी चाहिए । प्रभु जैसा रखें उस अवस्था में रहकर प्रसन्न रहना भी भक्ति का एक अंग है ।
535. संसार को मर्यादा का दर्शन करवाने वाले प्रभु श्री रामजी हैं ।
536. भोग भोगते रहने से कभी भी भोगों से तृप्ति नहीं होगी । भोग के त्याग में ही शांति है ।
537. प्रभु की कथा भवरोग को मिटाने वाली औषधि है जो कान से ग्रहण की जाती है ।
538. प्रभु श्री शुकदेवजी राजा श्री परीक्षितजी की कथा प्रीति को देखकर बहुत प्रसन्न हुए । हमारे में भी प्रभु की कथा के लिए प्रीति होनी चाहिए ।
539. जो कर्म प्रभु को याद कर किए जाते हैं उनमें सफलता जरूर प्राप्त होती है ।
540. जीवन से संबंधित सभी प्रश्नों का समाधान हम श्रीमद् भगवद् गीताजी से कर सकते हैं ।
541. विज्ञान बाहरी जीवन को सुविधा युक्त कर सकता है पर भीतर से समृद्ध हमें केवल भक्ति ही कर सकती है ।
542. हमारे द्वारा कही बातें शास्त्र सम्मत होनी चाहिए ।
543. नित्य किया जाने वाला सत्संग भक्ति रूपी अलौकिक संपत्ति को रखने के लिए तिजोरी है ।
544. प्रभु से मांगें कि ऐसी दृष्टि दें जिससे हमें अपने दोष दिखें और ऐसी शक्ति दें जिससे हम स्वयं को दोष मुक्त कर सकें ।
545. प्रभु जिनके जीवन में आते हैं उनके जीवन में परमानंद आ जाता है ।
546. जो अपने सभी इंद्रियों से भक्ति रस का पान करते हैं वही आज के युग के श्रीगोपी कहलाते हैं ।
547. भक्ति के जो विरोधी तत्व संसार में है उनसे सदा बचना चाहिए क्योंकि उनसे भक्ति करने में व्यवधान पड़ता है ।
548. संसार में भक्ति विरोधी तत्व से बचाना हम पर प्रभु कृपा का बहुत बड़ा सूचक है ।
549. श्री सुदामा चरित्र की सबसे बड़ी बात यह है कि दो लोक की संपत्ति पाकर भी श्री सुदामाजी विलासी प्रवृत्ति के नहीं बने और पहले जैसे अपने कुटिया में भजन करने वाले भजनानंदी बने रहे ।
550. प्रभु अपने भक्तों को ही अपना परिवार मानते हैं ।
551. तन से चाहे कितनी दूरी हो पर मन से बराबर प्रभु के समीप यानी प्रभु से जुड़े हुए रहें ।
552. जीव मायाधीन है और प्रभु मायाधीश हैं । भक्तजन मायातीत होते हैं ।
553. नित्य प्रभु में अपने मन को लगाए रखें और अनित्य संसार से जहाँ तक हो मन को हटाए रखें ।
554. श्वास लेने के लिए वायु, ऊपर से वर्षा का जल, नीचे जल के स्त्रोत, श्री चंद्रमाजी की चांदनी, प्रभु श्री सूर्यनारायणजी की रोशनी और ताप - सब प्रभु मुफ्त में कृपा करके सबको देते हैं ।
555. एक ऑक्सीजन सिलेंडर का मूल्य हमें चुकाना पड़ता है और वह कुछ घंटे ही चलता है । मुफ्त में प्रभु ने हमें ऑक्सीजन जन्म भर के लिए उपयोग करने के लिए दिया है । क्या हम उसका मूल्य कभी चुका सकते हैं या उसको चुकाने की कल्पना भी कर सकते हैं ?
556. प्रभु के पास वैभव की संपत्ति है जो हम सब चाहते हैं पर प्रभु के पास कृपा और प्रेम की संपत्ति भी है जो केवल अकिंचन भक्त ही चाहता है ।
557. भक्तों से प्रभु कितना प्रेम करते हैं इसके साक्षी के रूप में श्री भक्तमालजी श्रीग्रंथ भरा पड़ा है ।
558. माया सभी जीवों को नचाती है पर भक्त पर माया का प्रभाव नहीं होता क्योंकि भक्त प्रभु के संरक्षण में होते हैं ।
559. जीवन में लाभ सभी चाहते हैं । शास्त्र और संत कहते हैं कि जीवन का सबसे बड़ा लाभ प्रभु की भक्ति करना है ।
560. प्रभु की दया चाहते हैं तो संत कहते हैं दया शब्द को पलट दो तो वह याद बन जाता है यानी प्रभु को याद करते रहो तो प्रभु की निश्चित दया मिलेगी ।
561. माया रुपी नृत्यकी से बचना है तो नृत्यकी शब्द को पलट दें तो कीर्तन शब्द बनता है यानी प्रभु का कीर्तन करें तो माया प्रभाव नहीं डालेगी ।
562. जो धर्म या क्रिया हमें प्रभु से प्रेम नहीं करा सकी, वह मात्र श्रम के अलावा कुछ भी नहीं है ।
563. अगर परिस्थिति ने गरीब बनाया है तो गरीबनवाज प्रभु से जुड़ जाने का सुनहरा अवसर हमें मिला है ।
564. मानव शरीर हमें कितनी बार मिला है पर क्या आत्म-कल्याण करने का भाव कभी हमारे मन में जगा ? हम अपना मानव जीवन बिना आत्म-कल्याण किए व्यर्थ कर देते हैं ।
565. मानव शरीर मिला यह प्रभु की पहली कृपा, मानव शरीर पाकर आत्म-कल्याण का भाव जगा यह प्रभु की दूसरी कृपा, आत्म-कल्याण के लिए हम भक्ति करने लगे यह प्रभु की सबसे बड़ी तीसरी कृपा है ।
566. जैसे भोजन और पानी बिना शरीर अशांत हो जाता है वैसे ही भजन और सत्संग के बिना हमारी आत्मा अशांत रहती है, उसे शांति नहीं मिलती ।
567. सत्संग उसे कहते हैं जिससे सत् प्रभु का संग किया जाता है । व्यर्थ की बातें नहीं होती, केवल प्रभु की चर्चा ही होती है ।
568. जो संत अपने से जोड़े और प्रभु से न जोड़े वह संत नहीं है ।
569. बिना सत्संग के प्रभु से प्रीति नहीं होती और प्रभु से प्रीति हुए बिना भक्ति दृढ़ नहीं होती ।
570. जब तक हम प्रभु के स्वभाव और प्रभाव को सत्संग के माध्यम से नहीं जानते तब तक प्रभु से प्रेम नहीं होता । पर जब हम प्रभु के स्वभाव और प्रभाव को जान लेते हैं तो फिर प्रेम प्रभु से ही होता है, चाहकर भी संसार से प्रेम नहीं कर पाएंगे क्योंकि हम प्रभु की ओर पूर्ण रूप से आकर्षित हो चुके होंगे ।
571. अपने शरणागत हुए जीव के तीनों प्रकार के तापों को प्रभु क्षणभर में दूर कर देते हैं ।
572. संसार का सहारा लेने से कई लोगों का सहारा लेना पड़ता है और फिर भी काम नहीं बनता । परंतु एक प्रभु का सहारा लेने से फिर किसी का, कभी भी सहारा नहीं लेना पड़ता और काम बना बनाया मिलता है ।
573. प्रभु डंके की चोट पर कहते हैं कि मैं अपने भक्तों से कभी जीतता नहीं हूँ, सदैव हारता आया हूँ ।
574. भक्त के मान की प्रभु हरदम रक्षा करते हैं ।
575. प्रभु विश्राम के लिए भक्त का हृदय ही खोजते हैं ।
576. मांगने की आशा लेकर जो प्रभु का भजन करता है वह शास्त्र की दृष्टि से भक्त नहीं बल्कि व्यापारी है ।
577. श्री प्रह्लादजी को प्रभु ने वर मांगने को कहा । श्री प्रह्लादजी ने निष्काम बनकर कुछ नहीं मांगा तो प्रभु ने थोड़ा रुष्ट होते हुए कहा कि यह मेरी आज्ञा का उल्लंघन है । श्री प्रह्लादजी असमंजस में पड़ गए कि मांगता हूँ तो निष्कामता जाती है और नहीं मांगता हूँ तो प्रभु रुष्ट होते हैं । छोटे से श्री प्रह्लादजी ने क्या प्यारा मार्ग निकाला और मांगा कि प्रभु ऐसा वरदान दें कि कभी मांगने की कामना ही न हो । श्री प्रह्लादजी ने मांग भी लिया और निष्काम भी बने रहे तभी तो प्रभु बड़े गर्व और गौरव से कहते हैं कि मैं अपने भक्तों से हार जाता हूँ ।
578. शास्त्र कहते हैं कि धन अर्थ जरूर कहलाता है पर अनर्थ की जड़ होता है ।
579. भगवत् प्राप्ति की कामना वाले लोगों को कंचन, कामिनी और कीर्ति से एकदम बचकर रहना चाहिए ।
580. प्रभु से भक्ति पाने का अधिकारी वही है जिसे प्रभु से अन्य कुछ भी नहीं चाहिए ।
581. प्रभु कहते हैं कि अपने निष्काम भक्तों के सामने प्रभु की नहीं चलती, उन्हीं भक्तों की चलती है । यह कितना बड़ा गौरव है निष्काम भक्ति का ।
582. भक्तों को दुनिया मेले की तरह लगती है जहाँ से उन्हें अपने घर प्रभु के धाम लौटना है ।
583. संसार में जिसको अपना माना है अंत में वही रुलाएगा, यह संसार का नियम है ।
584. संसार में दूसरा कोई हमें कष्ट नहीं देता है । जिन्हें हमने अपना माना है वही सबसे ज्यादा अंत में हमें कष्ट देते हैं ।
585. संसार में पैसे को अपना माना तो वह अंत में रुलाएगा, रिश्तों को अपना माना तो वे भी अंत में रुलाएंगे । संत इसलिए उपाय बताते हैं कि संसार में हंसना है तो केवल प्रभु को ही अपना मानो ।
586. इस संसार में प्रभु ही एकमात्र हमारे अपने हैं इसलिए उन्हें ही केवल अपना मानना चाहिए ।
587. यह जीवन हमें प्रभु का गुणगान करने के लिए ही मिला है ।
588. जितना रस प्रभु के नाम और प्रभु की श्रीलीलाओं के गान में मिलेगा उतना रस अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा ।
589. भव से पार उतारना प्रभु की कृपा का काम है । जिस पर प्रभु की कृपा होती है उस जीव को प्रभु की कृपा भव से पार उतार देती है ।
590. मस्तक, दृष्टि, हृदय, मन, वाणी, पैर, हाथ, घुटने-जंघा - यह आठ अंग प्रभु को समर्पित होकर प्रणाम हो तो साष्टांग दंडवत प्रणाम कहलाता है ।
591. दंडवत प्रणाम का अर्थ है डंडे की तरह सीधा गिरकर प्रभु को प्रणाम करना ।
592. प्रभु सबको दर्शन देने जाते हैं पर श्री ध्रुवजी जैसे का दर्शन करने आते हैं कि नजदीक से वे अपने नन्हे और प्यारे भक्त को देख सकें ।
593. जीवों की दुर्दशा देखते हैं तो प्रभु और माता की करुणा जागृत होती है और वे अपने परिकर को संत बनाकर धरती पर भक्ति का प्रचार कर जीवों का उद्धार करने के लिए भेजते रहते हैं ।
594. सच्चे संतों को प्रभु और माता का श्री रामावतार में वनवास में वन-वन भटकना, भगवती सीता माता का अग्नि परीक्षा देना और फिर धोबी के कहने पर फिर वन भेजा जाना अच्छा नहीं लगता । संत कहते हैं कि कृतघ्न जीव पर करुणा नहीं करनी चाहिए और उनके लिए मनुष्य लीला करते हुए प्रभु और माता को इतना कष्ट नहीं सहना चाहिए । कृतघ्न जीवों को उनके कुकर्म भोगने के लिए छोड़ देना चाहिए पर प्रभु और माता इतनी करुणामय हैं कि उनका भी हित करने के लिए स्वयं कष्ट उठाते हैं ।
595. एक संत माला के साथ नंगी तलवार रखते थे । प्रभु और श्री अर्जुनजी गए तो पूछा कि तलवार क्यों ? संत क्रोधित हो उठे और कहा कि कुछ से उन्हें बदला लेना है जिन्होंने उनके प्रभु को कष्ट दिया है । श्री अर्जुनजी पहले हैं क्योंकि प्रभु, जिनकी सेवा में सभी देव खड़े रहते हैं, उनको सारथी बनाया और प्रभु को नीचे बैठाया और खुद रथ पर ऊपर बैठे । दूसरा, भगवती द्रौपदीजी हैं जिनकी अंतिम अवस्था में चीर-हरण की पुकार पर प्रभु को वस्त्र बनकर मासिक धर्म में हुई द्रौपदीजी से उनकी लाज बचाने के लिए लिपटना पड़ा । तीसरा, भगवती यशोदा माता हैं जिन्होंने दो-चार मटके फोड़ने पर क्रोध करके नन्हे प्रभु को ऊखल से बांध दिया । इतनी ऊँचाई पर जो संत पहुँच जाते हैं वे प्रभु को किसी के भी द्वारा अपने स्वार्थ के लिए कष्ट देने पर रुष्ट हो जाते हैं ।
596. प्रभु के लिए प्रेम में उमड़ती भावना का भक्तों के मन में कोई अंत नहीं होता । उनकी भावना इतनी प्रबल जो होती है ।
597. प्रभु के हर विधान में भक्त का कल्याण ही होता है ।
598. जैसे धूप आते ही अंधकार चला जाता है वैसे ही अभिमान आते ही भक्ति चली जाती है ।
599. शास्त्रों में निज धर्म प्रभु की भक्ति को ही बताया गया है ।
600. प्रभु का दर्शन अमोघ है यानी बिना दिए प्रभु नहीं जाते । जो कुछ नहीं लेता और निष्काम बना रहता है उसे प्रभु को वह अति दुर्लभ भक्ति का दान देना पड़ता है ।
601. पापी-से-पापी भी श्रीमद् भागवतजी महापुराण मन से सुन ले तो वह पाप छोड़कर भक्ति के पथ पर अग्रसर हो जाएगा । यह श्रीमद् भागवतजी महापुराण सुनने की महिमा है ।
602. घोर कलियुग में जो प्रभु की शरण आएगा, प्रभु का गुणगान सुनेगा और करेगा उसके सारे दोष और कष्ट दूर हो जाएंगे ।
603. भक्ति के पांच रस हैं – शांत, दास, सख्य, वात्सल्य और श्रृंगार । शांत रस में प्रभु और भक्त का रिश्ता होता है । दास रस में प्रभु स्वामी होते हैं और भक्त से दास का रिश्ता होता है । सख्य रस में प्रभु और भक्त सखा रूप में होते हैं । वात्सल्य रस में प्रभु बालक रूप में और भक्त बालरूप में उनकी सेवा करता है और श्रृंगार रस वह है जहाँ प्रेम रस का बाहुल्य होता है ।
604. लोक संबंधों में उलझने से प्राणी प्रभु की भक्ति के लिए समय नहीं निकल पाता और जो लोक संबंधों को भुलाकर ऊपर उठ जाते हैं वे ही प्रभु की भक्ति में स्वयं को प्रस्तुत कर पाते हैं ।
605. संत हृदय कवि प्रभु से प्रसन्नता की आशा रखते हैं और प्रभु की श्रीलीला प्रभु को ही पदों के माध्यम से सुनाते हैं ।
606. प्रभु नाम के आश्रित को भय नाम की कोई चीज नहीं सताती क्योंकि उसको प्रभु पर पूर्ण भरोसा होता है ।
607. एक संत ने एक बिच्छू को पानी में डूबते देखा । एक हाथ से उठाया तो बिच्छू ने डंक मारा, फिर दूसरे हाथ से उठाया तो बिच्छू ने फिर डंक मारा । फिर दोनों हाथ से उठाकर फिर डंक खाकर उसे किनारे पर छोड़ दिया । एक सज्जन यह देख रहे थे और उन्होंने पूछा कि डंक मारने के बाद भी आपने उसे बचाया । संत ने बड़ा प्यारा उत्तर दिया कि वह जीव अपने डंक मारने का स्वभाव नहीं छोड़ रहा तो मैं अपने मनुष्य होते हुए अपनी साधुता का स्वभाव कैसे छोड़ दूं ? जो स्वभाव प्रभु ने उसे दिया है वह कर रहा है और जो स्वभाव संत और मनुष्य बनाकर प्रभु ने मुझे दिया है वह मैं कर रहा हूँ ।
608. हम उतना अपराध अनंत जन्मों में नहीं कर सकते जितना एक क्षण में प्रभु क्षमा कर सकते हैं ।
609. प्रभु जो भी भक्तों के साथ करते हैं बहुत सोच-विचार कर और भक्त का परम हित जिसमें हो वही करते हैं ।
610. हमारा अपने लिए सोचना अगर एक गुना अच्छा है तो अगर हम प्रभु पर आश्रित हो जाते हैं तो प्रभु हमारे लिए कोटि गुना ज्यादा सोचते हैं ।
611. अंतःकरण में प्रभु भक्ति के कारण प्रकट हो जाते हैं तो संसार फीका लगने लग जाता है ।
612. अगर हम जो चाहते हैं वही प्रभु चाहते हैं तो वह हो जाएगा और अगर प्रभु कुछ और चाहते हैं तो वह होगा जो प्रभु चाहते हैं । इसलिए भक्त अपनी इच्छा प्रभु की चाह में मिला देता है ।
613. इस कलियुग में जो प्रभु कथा की शरण में आएगा उसके दुःख से उसकी निवृत्ति होगी ।
614. प्रभु की भक्ति संसार में उलझे हमारे मन को परम शांति देती है ।
615. जितना जीवन में सत्य से जुड़ेंगे उतना ही प्रभु के निकट हम पहुँच पाएंगे ।
616. जो सत्य को जीवन में अपना लेता है वह परेशान हो सकता है पर पराजित कभी नहीं हो सकता ।
617. जिन प्रभु के श्रीकमलचरणों में भगवती लक्ष्मी माता सदा रहतीं हैं उन प्रभु को हम धन से नहीं रिझा सकते । प्रभु को मात्र और मात्र भक्ति से ही हम रिझा सकते हैं ।
618. श्रीमद् भागवतजी महापुराण मन से सुन ली तो प्रभु के श्रीकमलचरणों की भक्ति हमें मिल जाएगी । यह श्रीग्रंथ परा-भक्ति देने वाला श्रीग्रंथ है ।
619. जीवन में किया हर कार्य व्यर्थ हो सकता है पर जीवन में किया भजन कभी भी व्यर्थ नहीं होता ।
620. प्रभु का किया भजन कभी निष्फल नहीं जाता । इस जन्म, अगले जन्म, सौ जन्मों बाद भी उसका फल अवश्य मिलकर ही रहेगा ।
621. हमने जीवन में सब कुछ किया, अगर कुछ करना छोड़ा है तो वह प्रभु का भजन ही है ।
622. जो चला जाएगा या यहीं रह जाएगा उसे हम खूब संभालते हैं और जो किया हुआ भजन साथ जाएगा उस तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता ।
623. संत कहते हैं कि झूठे जगत में जी ललचाकर हमने अपना असल वतन यानी प्रभु के धाम वापस जाने का अपना संकल्प छोड़ दिया ।
624. जीवन की सार्थकता तो केवल प्रभु के भजन में ही है ।
625. वही प्रभु का प्रियतम सेवक है जो प्रभु की आज्ञा का, निर्देश का और आदेश का पालन करता है ।
626. संत कहते हैं कि प्रभु को अपना मलिक घोषित करें और स्वयं को प्रभु का सेवक घोषित करें ।
627. प्रभु पर भरोसा करने से प्रभु सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर निभाते हैं ।
628. एक बार देवर्षि प्रभु श्री नारदजी महाराज श्री युधिष्ठिरजी के पास आए । उन्होंने पूछा यह महल, परिवार, सेना और संपत्ति किसकी है ? श्री युधिष्ठिरजी ने कहा कि प्रभु की । देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने पूछा कि सब कुछ प्रभु की है तो तुम्हारी क्या है ? श्री युधिष्ठिरजी ने कहा कि मेरे केवल प्रभु हैं । देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ऐसा उत्तर सुनकर अति प्रसन्न हुए । ऐसी भक्ति ही होनी चाहिए ।
629. प्रभु की कृपा भक्त को सदैव संभालती है ।
630. जीवन में जिसको अपना माना हुआ होगा वही पल-पल याद आएगा, इसलिए जीवन में केवल प्रभु को ही अपना मानना चाहिए ।
631. दुःख में प्रभु को याद कर लिया तो हंसते-हंसते दुःख भी पार हो जाएगा ।
632. सुख में प्रभु को निरंतर याद करते रहेंगे तो सुख टिका रहेगा और हमें छोड़कर नहीं जाएगा ।
633. प्रभु भक्ति के प्रेमरूपी बंधन को सहर्ष स्वीकार करते हैं ।
634. प्रभु मिलन की तड़प होगी तो प्रभु जरूर मिलेंगे । इस कलियुग में तो दौड़-दौड़ कर प्रभु अपने भक्तों से मिलते हैं ।
635. प्रभु का द्वार प्रेम देखकर ही हमारे लिए खुलता है ।
636. प्रभु अपने भक्तों की महिमा सदैव जग जाहिर किया करते हैं ।
637. प्रभु कहते हैं कि मुझे अपने भक्त से मिलने के लिए कोई बीच में बाधा नहीं बन सकता, कोई मुझे रोक नहीं सकता ।
638. बाकी सब कुछ प्रारब्ध पर निर्भर है पर प्रभु मिलन प्रारब्ध पर निर्भर नहीं है बल्कि हमारी भक्ति पर निर्भर है ।
639. प्रभु जिसको भी मिलते हैं उसकी भक्ति और प्रभु की कृपा के कारण ही मिलते हैं । प्रभु मिलन केवल इन दो बातों पर ही निर्भर होती है ।
640. हमें संतों से संसार की बातें नहीं पूछनी चाहिए बल्कि संसार से निकलने का साधन पूछना चाहिए ।
641. इस बात की महिमा नहीं है कि हम कितना जिए, महिमा इस बात की है कि जीवन जीते हुए हमने कितना प्रभु का भजन किया ।
642. एक फूल का छोटा-सा एक-दो दिन का जीवन होता है पर प्रभु के श्रीकमलचरणों में चढ़कर वह इतने छोटे से जीवन में भी धन्यता पा जाता है ।
643. साथ जाने वाली दौलत प्रभु का भजन और प्रभु का नाम जप ही है । हमें उसे कमाने में ही जीवन लगाना चाहिए ।
644. जब भी श्रीराम का नाम लिया जाएगा तो कितना भी अमंगल जीवन में आ रहा हो उसका नाश हो जाएगा और मंगल-ही-मंगल होने लगेगा क्योंकि प्रभु का नाम मंगल का भवन और अमंगल हारी है ।
645. भगवत् सुख जिन्हें प्राप्त हो गया वे पैसे, सोना, चांदी, हीरे और मोती में उलझते नहीं हैं ।
646. पैसा हमें गद्दा तकिया दे सकता है पर नींद नहीं दे सकता । पैसा हमें भोजन दे सकता है पर भूख नहीं दे सकता ।
647. श्वास और जिंदगी पैसे से नहीं खरीदी जा सकती ।
648. स्वास्थ्य और निरोगता पैसे से नहीं खरीदी जा सकती ।
649. आत्म सुख और शांति सत्संग से मिलती है, पैसे से नहीं मिल सकती ।
650. तरने के लिए दीनता चाहिए और डूबने के लिए अभिमान ।
651. एक बार एक संत नौका में जा रहे थे । नौका में दुष्टों का समूह भी था । उन्होंने नौका में संत का मजाक उड़ाना, कष्ट देना, उपहास करना शुरू किया । प्रभु से रहा नहीं गया । प्रभु ने आकाशवाणी में कहा कि मैं नौका को डुबोकर इन दुष्टों को मार रहा हूँ और संत से कहा कि आपको बचाने मैं स्वयं आ रहा हूँ । संत ने प्रभु से प्रार्थना की कि मारना ही है तो इन दुष्टों की दुर्बुद्धि को मार दें पर इन्हें न मारे । प्रभु संत के संतत्व पर रीझ गए ।
652. जैसे फसल का नियम होता है कि इस वर्ष की फसल अगले वर्ष काम में ली जाती है वैसे ही इस जन्म के पाप और पुण्य का फल आगे जन्मों में मिलता है और पिछले जन्मों के पाप और पुण्य का फल प्रारब्ध बनकर इस जन्म में भोगना पड़ता है । पर उग्र पाप हो गए या उग्र पुण्य हो गए तो उसका फल इस जन्म में ही मिलता है, ऐसा प्रावधान है ।
653. आखरी श्वास तक प्रभु की भक्ति कर सकें, ऐसी रोजाना प्रभु से अरदास करनी चाहिए ।
654. संसार अच्छा नहीं लगे तो यह समस्या नहीं बल्कि यह तो सौभाग्य है क्योंकि जब तक संसार अच्छा लगेगा प्रभु से प्रीति नहीं होगी ।
655. जिसको जीवन में प्रभु अच्छे लगने लग जाते हैं उसका ही जीवन सफल है और उसी का कल्याण और मंगल होता है ।
656. मन संसार से हटने लगा तो मानना चाहिए कि प्रभु कृपा हो गई और हमारी अध्यात्मिक साधना प्रारंभ हो गई ।
657. हम ज्ञानी तो बन गए, श्री वेदजी के मंत्र रट लिए पर प्रभु के प्रेमी नहीं बन पाए ।
658. पकड़ना चाहिए तो प्रभु की भक्ति को पकड़ना चाहिए और स्वीकार करना चाहिए तो प्रभु के प्रेम को स्वीकार करना चाहिए ।
659. संसार के संबंध स्वार्थ पर टिके होते हैं इसलिए सनातन संबंध प्रभु से ही बनना चाहिए जो प्रेम पर आधारित है ।
660. प्रभु तो लुटाना ही जानते हैं और देने में ही लगे रहते हैं ।
661. प्रभु श्री महादेवजी अपने रहने के लिए निवास तक नहीं रखते और अपनी याचकों को सब कुछ दे देते हैं ।
662. प्रभु श्री रामजी का नाम ही प्रभु श्री महादेवजी की दौलत है ।
663. जो भगवती गंगा माता का रोजाना ध्यान करते हैं उन्हें भवसागर में गोता नहीं लगाना पड़ता ।
664. जो मस्तक प्रभु के आगे नहीं झुकता वह संसार के चक्र में फंसकर कट जाता है ।
665. कलियुग में धर्म त्यागने में ही लोग अपना गौरव अनुभव करते हैं ।
666. कलियुग में जिनकी प्रभु के प्रति लगाव और रुचि हो तो यह निश्चित मानना चाहिए कि उनके ऊपर प्रभु की अतिशय कृपा है ।
667. जैसे कुआं में गलती से गिरी तांबे की बाल्टी को निकालने का पूरा प्रयत्न किया जाता है, उसे छोड़ा नहीं जाता वैसे ही भवकूप में गिरे जीव को निकालने के लिए प्रभु भी अपने पारिकर को भेज कर सत्संग, भक्ति और कथा के रूप में प्रयास करते हैं, उसे छोड़ते नहीं ।
668. भक्त का मंगल करते हैं तो प्रभु भक्तवत्सल कहलाते हैं और पतितों का भी उद्धार करते हैं तो पतितपावन कहलाते हैं ।
669. प्रेम करना है तो केवल श्रीभगवान से ही करना चाहिए ।
670. प्रभु कृपा मूर्ति है यानी कृपा करना उनका सहज स्वभाव है ।
671. दीन पर दया करने वाले और दीन को गले लगाने वाले केवल प्रभु ही हैं ।
672. दुर्योधन प्रभु श्री कृष्णजी का सगा संबंधी है क्योंकि उसकी पुत्री भगवती लक्ष्मणाजी का विवाह प्रभु के पुत्र श्री साम्बजी से हुआ था । फिर भी प्रभु ने अपने सगे संबंधी का साथ न देकर युद्ध में अपने भक्त पांडवों का साथ दिया । यह भक्ति की कितनी बड़ी महिमा है । दुर्योधन ने प्रभु से पूछा कि आप मेरे संबंधी हैं तो प्रभु ने उत्तर दिया कि मैं केवल भक्ति का एक नाता मानता हूँ । जो मेरे भक्त का विरोधी है वह मेरा भी विरोधी है ।
673. प्रभु की कथा सुनने के लिए जिसके पास समय न हो उससे अभागा जीव विश्व में कोई भी नहीं है ।
674. कोटि अश्वमेध यज्ञ का फल भी प्रभु की लव मात्र जितने समय की कथा के पुण्य की बराबरी नहीं कर सकता ।
675. संसार से आशा कष्ट देने वाली है इसलिए एक आश और एक विश्वास केवल प्रभु से रखनी चाहिए ।
676. जिन-जिन ने प्रभु की शरण ली उनके संकट तत्काल दूर हो गए ।
677. अनाथों के एकमात्र नाथ प्रभु ही हैं ।
678. हम अपने पल की बिगड़ी को कल्प में नहीं बना सकते और प्रभु हमारे कल्पों की बिगड़ी को पल में बना देते हैं ।
679. अपने पुरुषार्थ से अधिक सदैव प्रभु की कृपा पर भरोसा करना चाहिए ।
680. जिस पर प्रभु कृपा करते हैं तो श्री समुद्रदेवजी के बीच आया तूफान भी उस प्रभु के कृपापात्र को किनारे लाकर छोड़ जाता है ।
681. तूफान बड़े-बड़े जहाज को डुबो देते हैं पर एक साधारण नौका जिस पर प्रभु का भक्त बैठा हो उसे तूफान किनारे लाकर सुरक्षित पहुँच देता है । तूफान प्रभु के प्यारे का कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।
682. जिनका जगत में अपना कहने वाला कोई नहीं होता, उन अनाथों के भी सही मायने में नाथ प्रभु होते हैं ।
683. प्रभु किसी को ठुकराना जानते ही नहीं हैं ।
684. हर व्यक्ति को प्रभु के श्रीकमलचरणों को पकड़ने का अधिकार है ।
685. मन की बात मन में रहनी चाहिए और कहनी हो तो केवल श्रीमनमोहन प्रभु से ही कहनी चाहिए ।
686. जीवन में प्रभु से ही आश और विश्वास भी प्रभु का ही होना चाहिए ।
687. कोई भी श्वास प्रभु सुमिरन बिना खाली नहीं जानी चाहिए ।
688. जगत से दूरी बनाकर और प्रभु को अपना बनाकर रखना चाहिए पर हम इसका उल्टा करते हैं यानी जगत को अपना बनाकर और प्रभु से दूरी बनाकर रखते हैं ।
689. जगत हमें कुछ नहीं दे सकता, अगर दे सकते हैं तो केवल जगत के मालिक प्रभु श्री जगदीशजी ही दे सकते हैं ।
690. प्रभु से ही हमारी सहज प्रीति होनी चाहिए ।
691. हमारे दीन हृदय में दीनबंधु प्रभु का ही राज होना चाहिए ।
692. हम सब उत्तानपाद हैं यानी माता के गर्भ में हमारा मुँह नीचे था और पैर ऊपर था । उत्तानपाद की तरह हमारी भी दो पत्नियाँ हैं बुद्धि सुनीति है जो नीति बनाती है और मन सुरुचि है जो अपनी रुचि से चलती है । उत्तानपाद को सुनीति कम अच्छी लगती थी और सुरुचि बहुत प्रिय लगती थी । हमारी भी बिलकुल यही दशा है ।
693. संतों का मन प्रभु में एकाग्र होकर उनके वश में आ जाता है । संसारी का मन उनके वश में नहीं होता और उनकी दुर्गति करवाता है ।
694. मन को संतों ने मक्खी की उपमा दी है। मक्खी एक मिनट में प्रसाद में बैठ जाती है और दूसरे मिनट मल में जाकर बैठ जाती है । मन भी ऐसा ही है ।
695. मन को जीतने का एक ही उपाय है उस मन को प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित कर दें और प्रभु से विनती करें कि हमारी मनरूपी भेंट को स्वीकार करें ।
696. हम मन के नहीं है बल्कि मन हमारा है इसलिए मन हमारी बात माने ऐसा अभ्यास करना चाहिए ।
697. जो प्रभु के श्रीकमलचरणों में पहुँच जाता है फिर उसे कभी गिरना नहीं पड़ता ।
698. प्रभु की श्रीलीलाएं सुनाकर हमें अपने बच्चों के हृदय में प्रभु के लिए प्रेम भर देना चाहिए ।
699. आज भजन अंतरात्मा से नहीं बल्कि लोकरंजन के लिए गाया जाने लगा है जो कि गलत है । भजन प्रभु को रिझाने के लिए गाया जाना चाहिए, जगत को रिझाने के लिए नहीं ।
700. जैसे वृक्षों के लिए बसंत ऋतु का महत्व है वैसे ही सत्संग के लिए संतजनों का महत्व है ।
701. शरणागत होते ही भक्त की बिगड़ी सुधरती चली जाती है ।
702. भगवत् शरणागति के बिना कोई भी भवसागर के पार नहीं जा सकता ।
703. श्री ध्रुवजी ने सबसे पहला काम आँखें खोलने पर और प्रभु का दर्शन पाने पर यह किया कि डंडे की तरह लेटकर प्रभु को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया ।
704. ज्ञान मार्ग से साधक को प्रभु तक पहुँचना होता है पर भक्ति मार्ग में प्रभु साधक तक स्वयं आकर पहुँच जाते हैं । यह कितना बड़ा फर्क है और भक्ति मार्ग की कितनी बड़ी महिमा है ।
705. प्रभु को देखने का सबसे बड़ा फल यही है कि उनको लगातार देखा ही जाए क्योंकि प्रभु के दर्शन में ही परम आनंद है ।
706. जीवन का सबसे बड़ा लाभ प्रभु के दर्शन में ही है ।
707. संत प्रभु से प्रभु की भक्ति मांगते हैं और संसारी प्रभु से संसार मांगते हैं । यह कितना बड़ा फर्क है ।
708. सभी प्राणी प्रभु के ही हैं, ऐसा कोई नहीं जो प्रभु का न हो पर जिसमें प्रभु के लिए अपनापन का भाव जागृत हो गया वही धन्य होता है ।
709. संसार में सुख मिल सकता है पर आनंद प्रभु के श्रीकमलचरणों में आने पर ही मिलेगा । संसार का सुख वैसा है जैसे एक मछली को एक कुंड के जल में रख दें और आनंद वैसा है जैसे उस मछली को सागर में छोड़ दिया ।
710. जब हमारा शीश प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुक जाता है तो संसार, जो पहले ठोकर मारता था, वह उठाकर मस्तक पर बैठा लेता है । श्री ध्रुवजी इसके जीवंत उदाहरण हैं ।
711. हमारे कान दुनिया की बातें सुनने वाले नहीं बल्कि प्रभु का सुयश सुनने वाले होने चाहिए ।
712. सत्संग में बीता हमारा समय अनमोल हो जाता है ।
713. भोगों और व्यसनों में बीता जीवन किसी काम का नहीं है ।
714. संत जीवन के संतुलन में रहते हैं इसलिए ही संत कहलाते हैं ।
715. जिन्होंने हमें जीवन दिया है जीवन में उन प्रभु का भजन करना चाहिए ।
716. दुनिया से मोह करते रहे तो बार-बार दुनिया में आना पड़ेगा । दुनिया के चक्कर से छूटने का एक ही उपाय है कि केवल प्रभु से प्रेम करना ।
717. मानव शरीर को प्रभु की सेवा में लगाना ही इस मानव शरीर का सर्वश्रेष्ठ उपयोग है ।
718. अपने कल्याण की जिज्ञासा जीवन में उठानी चाहिए तो ही हमारा मन प्रभु की तरफ जाएगा ।
719. केवल भक्ति ही नर्क से बचने का एकमात्र उपाय है ।
720. प्रभु की भक्ति ही हमें पाप करने से बचाती है ।
721. चाहे जीवन में कितने भी अपराध और पाप किए हुए हो जिसके कारण संसार के हर दरवाजा बंद होने पर भी प्रभु की कृपा का द्वार सदा खुला ही रहता है ।
722. प्रभु का लिया नाम कब काम आ जाए यह हमें पता नहीं इसलिए प्रभु का नाम सदैव जीवन में लेना चाहिए ।
723. संसार में कोई क्रोध से अंधा, कोई काम से अंधा, कोई लोभ से अंधा, इसलिए प्रभु नामरूपी लाठी लेकर चलें तो भवकूप में गिरने से बच जाएंगे ।
724. जिसको प्रभु पकड़ लेते हैं तो प्रभु का स्वभाव है कि उसका कल्याण करे बिना प्रभु उसे कभी छोड़ते नहीं ।
725. प्रभु का एक नाम श्रीहरि है जिसका अर्थ है हरण करने वाले । प्रभु जीवों के पाप और संतों के चित्त का हरण करते हैं ।
726. कुसंग पाकर कुमति बलवती हो जाती है और सत्संग पाकर सुमति प्रबल हो जाती है ।
727. प्रभु जब कृपा करते हैं तो प्रतिकूल लोग और परिस्थिति भी अनुकूल बन जाती है ।
728. जीवन में प्रभु का इंतजार करना चाहिए, संसार का नहीं । हम पूरा जीवन भौतिक संसार की वस्तुओं का इंतजार करते हुए निकाल देते हैं, जो गलत है ।
729. हृदय में प्रभु मिलन का दृढ़ भाव जागृत हो जाना चाहिए ।
730. प्रभु को स्वयं देखा तो जा सकता है पर दूसरों को दिखाया नहीं जा सकता । दूसरों को स्वयं ही साधन करके देखने की पात्रता लानी होगी ।
731. प्रभु सबके लिए अनुभव के विषय हैं ।
732. भक्ति से प्रसन्न होकर ही प्रभु अपनी झलक दिखाते हैं ।
733. प्रभु भक्त के भाव में बैठे होते हैं और वहीं से निकलकर उस भक्त द्वारा पूजित विग्रह में आ जाते हैं ।
734. प्रभु सिर्फ और सिर्फ हमारे प्रेम के भूखे हैं ।
735. हमारी हर कामना को पूर्ण करने में प्रभु सर्वसमर्थ हैं ।
736. हमारे जीवन में जो भी होता है, वह प्रभु की कृपा से ही होता है ।
737. प्रभु से जब भी मांगें, अखंड भक्ति का वरदान ही मांगें ।
738. जीवन में आश्रय तो केवल प्रभु का ही लेना चाहिए ।
739. शरणागति की पहली शर्त यही है कि हमें प्रभु का पूरा विश्वास होना चाहिए कि विपत्ति में प्रभु हमें बचाएंगे ।
740. एक संत अपने एक शिष्य के साथ सागर में जहाज में यात्रा कर रहे थे । तभी तूफान आया और जहाज डगमगाने लगा । सभी यात्री डर गए और प्रभु से प्रार्थना करने लगे । संत शांति से बैठे रहे । उनके शिष्य ने आकर पूछा कि क्या आपको डर नहीं लग रहा ? संत ने एक चाकू अपनी झोली से निकाला और अपने शिष्य के गर्दन पर लगा दिया और पूछा कि क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा ? शिष्य ने कहा कि क्योंकि चाकू आपके हाथ है और आप पर मुझे विश्वास है इसलिए मुझे डर नहीं लग रहा । तब संत बोले कि इसी तरह मुझे तूफान का डर नहीं लग रहा क्योंकि तूफान मेरे प्रभु के श्रीहाथ में है और प्रभु पर मुझे पूर्ण विश्वास है ।
741. विश्वास में बड़ी ताकत होती है । मुसीबत जीवन में आए तो प्रभु पर पूर्ण विश्वास करके प्रभु का ही आश्रय लेना चाहिए ।
742. मुसीबत में दुनिया के आगे हाथ नहीं फैलाना चाहिए, प्रभु की शरण में ही जाना चाहिए ।
743. परमात्मा हर आत्मा में बैठे हुए हैं इसलिए बीमारी में भी प्रभु पर विश्वास रखने पर प्रभु डॉक्टर के रूप में इलाज करने आ जाएंगे ।
744. प्रभु को कोई बुलाने वाला हो तो प्रभु तो सदैव आने के लिए तैयार ही रहते हैं ।
745. प्रभु को आगे करके हर कार्य करना चाहिए । प्रभु को कभी भी पीछे नहीं छोड़ना चाहिए ।
746. संसार के पद के चक्कर में नहीं रहना चाहिए । अगर पद ही चाहिए तो प्रभु के श्रीकमलचरण पद ले लेना चाहिए जैसे प्रभु श्री हनुमानजी ने लिया ।
747. पग ही पकड़ने हो तो संसार के नहीं बल्कि प्रभु के पग यानी श्रीकमलचरण पकड़ना चाहिए ।
748. गुरु का काम प्रभु का मार्ग दिखाने का है । जो गुरु अपने चक्कर में उलझाकर रखें वह शास्त्र की दृष्टि से गुरु नहीं है ।
749. संत शब्द का अर्थ है जो अनंत प्रभु से मिलने की राह दिखा दे, वही संत है ।
750. जो प्रभु से प्रेम नहीं करे वह एक भक्त का नहीं हो सकता क्योंकि भक्त उससे संबंध नहीं रखना चाहता । पूरी श्रीमद् भागवतजी महापुराण में कहीं भी श्री प्रह्लादजी ने हिरण्‍यकशिपु को पिता कहकर संबोधित नहीं किया, उसे राजन कहा पर पिता नहीं कहा ।
751. हमारा सच्चा अपना वह होता है जो हमें प्रभु के श्रीकमलचरणों में लेकर जाता है ।
752. जीवन में प्रभु के नाम की दौलत कमाई तो वह अंत में साथ जाएगी और काम आएगी ।
753. प्रभु नाम लेने में पैसे खर्च नहीं होते फिर भी हम नाम नहीं लेते । यह नामरूपी दौलत अनमोल है जो बिना पैसे खर्च किए मिलती है ।
754. ऊपर जाकर प्रभु नाम की दौलत ही चलेगी जो कमानी धरती पर ही पड़ती है ।
755. प्रभु के सामने प्रभु प्रेम में अपने बहते आंसुओं को आने से कभी नहीं रोके क्योंकि यह अमूल्य तोहफा प्रभु किसी बिरले भक्त को ही देते हैं ।
756. भक्त सोता है तो भी प्रभु का नाम स्मरण करते हुए सोता है और जगता है तो भी प्रभु का नाम लेते हुए जगता है ।
757. विद्या वही सार्थक है जो प्रभु से हमारा परिचय करवाती है ।
758. प्रभु की कृपा के आगे कुछ भी असंभव नहीं है ।
759. एक संत ने कहा है कि प्रभु श्री कृष्णजी के श्रीलीला का संदेश है कि मुश्किल कैसी भी हो पर हार मत मानो । प्रभु अपनी श्रीलीला करते वक्त मुश्किलों से लड़ते रहे और हंसते रहे ।
760. प्रभु जब चाहे, जिसके जीवन में चाहे आ जाते हैं । उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है ।
761. प्रभु को हृदय में बैठाकर मनरूपी डोरी से झूला झूलाना चाहिए । संत ऐसा ही किया करते हैं ।
762. प्रभु का नित्य उत्सव भक्त जीवन में मनाते रहते हैं ।
763. जो किसी-न-किसी रूप में प्रभु से जुड़ गया उसका जीवन फिर उत्सव बन जाता है । इसलिए अपने जीवन को नित्य उत्सव बनाना है तो प्रभु से जुड़ जाना चाहिए ।
764. सुखी तो जीवन में सिर्फ वही है जो प्रभु के श्रीकमलचरणों में आ गया और नतमस्तक हो गया ।
765. संत कहते हैं कि संसार की हर वस्तु मिट्टी ही तो है और हम मिट्टी के पीछे ही तो जीवन भर भाग रहे हैं ।
766. संत कहते हैं कि जो संसार की वस्तु को इकट्ठा करता रहता है वह जीवन में अशांति में ही रहता है । शांति तो केवल प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही आने पर मिलती है ।
767. दुनिया के पीछे भागने का कोई लाभ नहीं, भागना ही है तो प्रभु के पीछे भागे तो ही हमें परमानंद मिलेगा और हमारा कल्याण होगा ।
768. दुनिया मतलब हो तो पकड़ लेती है, मतलब पूरा हो गया तो छोड़ देती है पर प्रभु कृपा करके जिसको एक बार पकड़ लेते हैं फिर उसका कल्याण करे बिना नहीं छोड़ते ।
769. प्रभु जैसे दयालु और करुणा बरसाने वाले कौन हो सकता है जो जहर देने आई पूतना को भी माँ की गति देकर मोक्ष दे दिया ।
770. ऐसी दया कोई नहीं कर सकता जैसी प्रभु करते हैं ।
771. प्रभु जैसा दयालु और कृपालु स्वभाव न कहीं देखा गया है और न ही किसी का सुना गया है । यह गोस्वामी श्री तुलसीदासजी डंके की चोट पर कहते हैं ।
772. प्रभु शरणागत के बड़े-से-बड़े अपराधों को भी अनदेखा कर देते हैं ।
773. श्री भरतलालजी को संत प्रभु श्री रामजी का प्रेमावतार मानते हैं यानी श्रीराम प्रेम प्रकट करने के लिए ही उनका अवतार हुआ है ।
774. कुछ संत श्री भरतलालजी को त्याग मूर्ति कहते हैं यानी उनके जितना त्याग की मिसाल अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगी ।
775. यह भारतवर्ष का सौभाग्य है कि यहाँ के गिद्ध भी परमार्थरूपी श्री जटायुजी जैसे हुए हैं जिन्होंने प्रभु काज किया और अपनी जाति को धन्य कर दिया ।
776. प्रभु श्री रामजी ने पिता तुल्य मानकर जो श्री जटायुजी को गति दी उससे उनका सौभाग्य जग जाहिर हो गया ।
777. अपना जीवन प्रभु को समर्पित कर देना चाहिए तभी हमारा मानव जीवन सफल माना जाएगा ।
778. श्री भक्तमालरूपी माला को प्रभु अपनी वैजयंती माला से भी ज्यादा प्रिय मानते हैं । यह भक्तमाल की माला प्रभु हृदय में धारण करते हैं पर यह माला भक्तों के भाव के कारण खिसककर प्रभु के श्रीकमलचरणों में चली जाती है क्योंकि सिद्धांत यह है कि प्रभु अपने भक्तों को अपने हृदय में स्थान देते हैं पर भक्त प्रभु के श्रीकमलचरणों में स्थान चाहते हैं ।
779. प्रभु अपने भक्तों को भक्ति के प्रचार करने का सौभाग्य देते हैं, जो कार्य प्रभु को सबसे प्रिय है ।
780. जो प्रभु के हो जाते हैं विपत्ति भी उनके लिए वरदान बन जाती है ।
781. यह मानव जीवन हमें जीवनधन प्रभु को पाने के लिए ही मिला है ।
782. मानव अवतार में भी प्रभु की प्रभुता छुपती नहीं है । सागर पर सेतु बनाना, श्री गोवर्धनजी को छोटी श्रीअंगुली के नख पर उठाना, कालिया नाग के 101 फनों पर नृत्य करना, क्या कोई प्रभु के अलावा करने की सोच भी सकता है ?
783. माखन चोरी श्रीलीला तो प्रभु की करुणा लीला है जिस कारण नौ लाख गौ-माताओं का दूध, दही, माखन स्वयं के घर होने पर भी प्रभु ने गोपियों के घर के माखन का भोग लगाया ।
784. प्रभु को कैसे सुख पहुँचा सकूं, यह भक्त हृदय हरदम सोचता और क्रियान्वित करता रहता है ।
785. सभी संसार के आश्रय को त्यागकर केवल एक प्रभु का ही आश्रय जीवन में रखना चाहिए ।
786. प्रभु का नाम हमारे अशुभ का नाश करता है ।
787. भक्ति से प्रभु का आश्रय पुष्ट होता है ।
788. नामी प्रभु अपने नाम जापक साधक से कभी अलग नहीं रहते ।
789. प्रभु का नाम हमारा पोषण और हमारी रक्षा करता है ।
790. त्याग के बाद त्याग की स्मृति का भी त्याग होना चाहिए तभी वह सच्चा त्याग माना जाएगा ।
791. प्रभु नाम जप की भावना करते ही हमारे भीतर के पाप कांपने लगते हैं । अभी नाम जप शुरू नहीं किया केवल प्रण किया कि नाम जप का नियम जीवन में लेंगे तभी भीतर के पाप कांपते हैं क्योंकि नाम जप से उन्हें नष्ट होना पड़ता है ।
792. प्रभु के नाम जप के कारण पाप हमें छोड़कर भाग जाते हैं ।
793. प्रभु नाम जापक का नाम नर्क से काट दिया जाता है क्योंकि उसे नर्क के दर्शन कभी नहीं होते ।
794. प्रभु नाम का आश्रय लेने वाला प्रभु के धाम ही जाता है ।
795. प्रभु के नाम जापक की उसके हर विकार पर जय होती है ।
796. माया का खेल बड़ा विचित्र है पर प्रभु के नाम जापक पर से माया अपना प्रभाव हटा लेती है ।
797. प्रभु का नाम जप प्रभु प्रेमियों के प्रेम का वर्धन करता है ।
798. प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय लेकर प्रभु का नाम जप करना चाहिए ।
799. जिसकी जिह्वा पर प्रभु नाम जप लगातार चलता रहता है उस जीव का मन प्रभु की तरफ आकर्षित होता है और प्रभु उसके अधीन हो जाते हैं ।
800. प्रभु के भक्त प्रभु की कृपा के कारण जगत पूज्य हो जाते हैं ।