| 001. |
पुराने जमाने में जैसे एक पन्द्रह वर्ष की बहू को ससुराल में कष्ट मिलता है तो वह मन-ही-मन रोती है कि अपने पिता से मिलने पीहर में जाऊँगी तो बताऊँगी । वैसे ही भक्त संसार के ताप और कष्ट को झेलता है और अपने पीहर यानी तीर्थ में जाकर प्रभु को बोलता है । |
| 002. |
प्रभु के दर्शन मात्र से सारे पापों का नाश और कष्टों का नाश होता है । |
| 003. |
प्रभु की भक्त को देखकर मुस्कुराहट इतनी मधुर है कि उससे आगे की कल्पना करना भी संभव नहीं है । प्रभु का हास्य देखकर भक्त अपना दुःख-दर्द, जो प्रभु से बांटने गया था, वह भूल जाता है । साधना की सारी थकान उतर जाती है । |
| 004. |
ध्यान समय देखकर नहीं होता । ध्यान में डूबना होता है । कितने बजे ध्यान में बैठेंगे यह तो तय कर सकते हैं पर कब तक ध्यान से छूटेंगे यह हमारे हाथ में नहीं होता है । ऐसा संत मानते हैं कि प्रभु तक ध्यान में जाना हमारे हाथ में है पर वापस आना हमारे हाथ में नहीं है क्योंकि प्रभु जब छोड़ेंगे तभी लौट पाएंगे । |
| 005. |
समय और काल से अतीत होने का नाम ही ध्यान है । इसलिए हरदम समय का चिंतन करेंगे तो ध्यान नहीं होगा । इसलिए घड़ी लेकर कभी ध्यान हेतु नहीं बैठना चाहिए नहीं तो ध्यान घड़ी की तरफ जाएगा, प्रभु का ध्यान नहीं होगा । |
| 006. |
ध्यान में उतर कर चुप हो जाना चाहिए । आरंभ में ध्यान के लिए प्रयत्न करना चाहिए, फिर चुप हो जाना चाहिए, देखते रहना अपने आपको कि क्या होता है । कोई प्रयास नहीं स्वतः होने देना चाहिए । |
| 007. |
कभी ध्यान में हम रोमांचित होते हैं, कभी हंसते हैं, कभी रोते हैं क्योंकि हमारा चित्त पिघलता जाता है । चित्त चिपका हुआ है शरीर से । जितना पिघलेगा उतना शरीर से छूटेगा । एक समय ऐसा होगा जब वह पूरा पिघल कर परमात्मा में रम जाता है । चित्त को शरीर से छुड़ाकर परमात्मा में लीन करना, यही ध्यान की साधना है । |
| 008. |
प्रभु में जिसका मन विलीन है उसे भूख, प्यास और समय का कोई भान नहीं रहता । |
| 009. |
ध्यान में भक्ति के मिलने पर चित्त का परमात्मा से मिलन बहुत जल्दी होता है । |
| 010. |
भक्ति में श्रवण भक्ति, कीर्तन भक्ति और स्मरण भक्ति का बहुत ऊँचा स्थान है । |
| 011. |
सर्वोत्तम भक्ति में चित्त पिघल कर प्रभु में बहुत वेग से रम जाता है जैसे भगवती गंगा माता बड़ी वेग से गंगा सागर की ओर चलती है । |
| 012. |
प्रभु के सद्गुणों का स्मरण, प्रभु के नाम का स्मरण भक्ति को बहुत प्रगाढ़ करता है । |
| 013. |
एक ही प्रभु सबके अंतःकरण में विराजते हैं । सबके भीतर मेरे प्रभु विराजे हैं इसलिए सबको प्रणाम करना चाहिए । |
| 014. |
जो परमात्मा मुझमें हैं, वे ही मेरे सामने वाले में हैं - यह सच्ची भक्ति है, ऐसी प्रभु श्री कपिलजी की व्याख्या है । इसलिए ही पुराने लोग राम-राम कहते थे यानी जो "राम" मेरे अंदर है वही "राम" तुम्हारे अंदर भी है इसलिए राम-राम कहते थे । राम-राम कहते ही जीवन में वेदांत का सार आ जाता था । |
| 015. |
जो प्रभु की सगुण साकार भक्ति करते हैं वे बिना रुके, बिना दुर्गम मार्ग से चले सीधे प्रभु के पास पहुँचते हैं । ऐसा प्रभु श्री कपिलजी कहते हैं । |
| 016. |
आध्यात्मिक होने का अर्थ भावना रहित होना कदापि नहीं है । |
| 017. |
पेड़ जब छोटा हो तो एक बकरी भी उसे नष्ट कर सकती है पर जब वह वृक्ष बन जाता है तो उसे डर नहीं होता । वैसे ही साधक को आरंभ में बहुत सावधान रहने की जरूरत है । |
| 018. |
अध्यात्म ज्ञान हेतु प्रभु श्री दत्तात्रेयजी चौबीस गुरुओं की कथा कहकर हमारे विवेक की जागृति करते हैं । चौबीस तत्वों से उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान सीखा था । |
| 019. |
प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने कबूतर और कबूतरी से सीखा कि वह अपने बच्चों का लालन पालन कितना प्रेम से करते हैं और व्यस्त हो जाते हैं । पत्नी-बच्चों के पीछे नाचना हम संसार के सुख के रूप में देखते हैं । बाल-लीला को देखकर कबूतर और कबूतरी अपना भान तक भूल गए । कुछ दिन बीते । एक दिन कबूतर और कबूतरी दाना चुगने बाहर गए थे । एक बहेलिया आया और जाल बिछाया और बच्चे जाल में फंस गए । थोड़ी देर में कबूतरी आ गई उसने देखा बच्चे जाल में फंसे हैं तो बच्चे के स्नेह के कारण वह व्याकुल होकर रोने लगी और चिल्लाने लगी । बच्चों को बचाने हेतु कबूतरी भी जाल में कूद गई और वह भी फंस गई । फिर कबूतर आया तो उसने देखा कि मेरे बच्चे-पत्नी सब फंस गए, उसने अपना गृहस्थ आश्रम समाप्त होते देखा । वह अपने बच्चों और पत्नी के गुणों को याद करता और विलाप करता रहा । अपनी पत्नी और बच्चों के बिना वह नहीं रह सकता था यह सोचकर वह भी जाल में कूद गया । बहेलिये ने सबको पकड़ा और चलता बना । प्रभु श्री दत्तात्रेयजी कहते हैं कि क्या कबूतर का व्यवहार सही था ? उसे अतिप्रेम था, प्रेम होना ठीक है पर अतिप्रेम होना बहुत गलत है । कबूतर को पता होना चाहिए था कि मैं कूद भी गया तो भी सबको बचा नहीं सकता, वे भी मर रहे हैं और मैं भी मर जाऊँगा । उसे अतिप्रेम में अपने जीवन को गँवाना नहीं चाहिए था । |
| 020. |
एक घर में श्री महाभारतजी की कथा हुई । कथावाचक ने सबसे पूछा - क्या ग्रहण किया तो बेटों ने कहा कि संपत्ति हेतु भाई को मारने में कोई आपत्ति नहीं है । कथावाचक ने अपना माथा पीट लिया । सूत्र यह है कि प्रसंग अपने स्थान पर रहेंगे पर हमें विवेक होना चाहिए और संस्कार होना चाहिए कि क्या ग्रहण करना है । |
| 021. |
श्री महाभारतजी की विदुर-नीति, जो केवल आठ अध्याय में है, उससे हमारा विवेक जागृत हो जाता है । |
| 022. |
हर प्रसंग में हमारा विवेक जागृत होगा तो ही उसका सार ग्रहण करके हम उसका सदुपयोग कर पाएंगे । |
| 023. |
संसार में घटने वाली हर घटना का सार ग्रहण करना चाहिए और त्याज्य को त्यागने का विवेक होना चाहिए । |
| 024. |
एक व्यक्ति के मरने पर लगातार रोते रहना, सब कामकाज छोड़कर महीनेभर तक रोना - ऐसा शास्त्रों में वर्जित माना गया है । |
| 025. |
विवेक होना चाहिए कि मेरी हर क्रिया किसी के लिए उपयोगी होनी चाहिए । बचाने के लिए कुछ भी संभावना हो तो खतरा मोल लेकर किसी को बचाना शौर्य है, जो सही है । पर बचाने की कोई संभावना नहीं फिर भी मैं बचा तो नहीं सकता पर मैं भी जी कर क्या करूँगा, इसलिए अति प्रेम में फंसकर गलत करना, यह धर्मयुक्त नहीं है । |
| 026. |
प्रभु द्वारा हमें प्रदान मानव जीवन का यह दुरुपयोग है कि जाने वाले के लिए हम अपना जीवन ग्लानि और शोक से भरकर कर्तव्य पथ से विमुख हो जाए । जाने वाले के दुःख का कारण सिर्फ रोना-ही-रोना, यह गलत है । |
| 027. |
सारे दुःख को भीतर समेटकर भी प्रभु को जीवन में भूलने का समर्थन कदापि नहीं किया जा सकता । पत्नी पति की मौत के बाद बावली हो जाती है और पूजा-पाठ तक भूल जाती है, जो गलत है । |
| 028. |
पूरा मंत्रिमंडल और श्री लक्ष्मणजी विद्रोह हेतु तैयार थे पर धन्य हैं प्रभु श्री रामजी की पितृभक्ति कि पिता के वचन, जो पिता ने प्रभु से नहीं बोले थे और भगवती कैकेयी माता ने कहा था कि वन जाओ, का पालन करने हेतु तत्काल तैयार हो गए । प्रभु को राजा श्री दशरथजी ने कहा कि एक रात रुक जाओ कल प्रातः चले जाना पर प्रभु ने कहा कि कैकेयी माता का वचन है सूर्यास्त से पहले जाने का । तो प्रभु चल पड़े और पिता को कलंक न लगे इसलिए चल पड़े । जब प्रभु जाने लगे तो श्री दशरथजी ने रथ रोकने हेतु श्री सुमंतजी को कहा तो प्रभु ने कर्तव्य पथ पर रथ नहीं रोकने दिया । हम होते तो तुरंत रोक देते और पिताजी ऐसे रो रहे हैं, माँ विलाप कर रही है इस बहाने से वन जाना त्याग देते । प्रभु ने श्री सुमंतजी से कहा कि रथ जल्दी आगे बढ़ाए नहीं तो पिताजी जाने नहीं देंगे और पिता के माथे पर कलंक लग जाएगा । प्रभु ने अपने पिता की कीर्ति कलंकित न हो, यह देखा और कर्तव्य पथ से विमुख नहीं हुए । प्रभु का प्रेम यहाँ प्रेम है, अति प्रेम नहीं है । |
| 029. |
भावनाओं का जीवन में स्थान होता है, उनका आदर करना चाहिए पर कभी भी भावना कर्तव्य के आगे नहीं आनी चाहिए नहीं तो वह अति प्रेम बन जाती है । भावना जो कर्तव्य के पीछे चले वह प्रेम कहलाती है । |
| 030. |
एक बहुत बड़े विद्वान अपने बेटे को पहाड़ से गिरता देखकर इतनी जोर से चिल्लाए और अपनी भावना को रोक नहीं पाए और वही हृदय गति रुक जाने पर उनका देहांत हो गया । यह अति प्रेम के कारण भावना को नहीं रोक पाने का फल था । |
| 031. |
संसार से प्रेम की भावना रखनी चाहिए पर कभी भावना को कर्तव्य रेखा पार कर अति प्रेम नहीं बनने देना चाहिए । |
| 032. |
हमारी बुद्धि की जागृति हेतु प्रभु श्री दत्तात्रेयजी के चौबीस गुरुओं की कथा श्रीमद् भागवतजी महापुराण में है । |
| 033. |
मनुष्य को चाहिए कि प्रेम और अति प्रेम की लक्ष्मण रेखा को जाने और कर्तव्य पथ से विमुख कभी नहीं हो, यह विवेक जीवन में रखें । |
| 034. |
जीव कहता है कि मैं रात्रि में सोया और मैंने सोचा कि जीवन बहुत मजेदार है पर जब मैं सुबह उठा तो पाया कि जीवन में कर्तव्यों के पहाड़ मेरे सामने खड़े हैं । |
| 035. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी के जीवन देखते वक्त यह ध्यान आएगा कि कर्तव्य पहले और भावनाएं पीछे । |
| 036. |
जीव का परम सौभाग्य कि मनुष्य जीवन की प्राप्ति कर सभी प्राणियों में सबसे ऊँचा उठकर फिर किसी सांसारिक के मोह और अति प्रेम में फंस कर गिर गया । यह तो उठकर गिरना हुआ, जो गलत है । |
| 037. |
मृत्यु किसी एक दिन की घटना नहीं है, वह रोजाना घटने वाली एक प्रक्रिया है । |
| 038. |
जगत से अति प्रेम में मानव जीवन के उद्देश्य की उपेक्षा कभी नहीं करनी चाहिए । |
| 039. |
कोई भी, कितना भी प्रिय व्यक्ति हमारे बीच से मृत्यु होने पर जाता है तो दुःख में और शोक में जाकर मेरे जीवन में अब क्या बचा, ऐसा सोचना आत्मघात करने के बराबर हुआ । |
| 040. |
जो गया उसके लिए अपने मानव जीवन की उपेक्षा कभी नहीं करनी चाहिए क्योंकि मानव जीवन हमें प्रभु प्राप्ति के लिए ही मिला है । |
| 041. |
श्री गरुड़पुराणजी में कहा गया है कि जाने वाले के पीछे जितना रोया जाता है उतना उसकी आत्मा को कष्ट पहुँचता है । |
| 042. |
मेरा मनुष्य जीवन प्रभु प्राप्ति के लिए है और इस जीवन में प्रभु से आत्म-साक्षात्कार का हेतु ही एकमात्र मेरा जीवन लक्ष्य है । |
| 043. |
यह मूल सिद्धांत है कि प्रभु प्राप्ति इसी मानव जीवन में करनी है, जो हमें मानना चाहिए और अपना पूरा प्रयास इसी दिशा में करना चाहिए । |
| 044. |
घर में किसी की मृत्यु हुई तो भी उन बारह दिनों में शोक के कारण प्रभु को कभी भी क्षणभर के लिए भी नहीं भूलना चाहिए । |
| 045. |
प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने अजगर से सीखा कि अजगर कभी विशेष प्रयास नहीं करता, जहाँ जो मिल जाता है उससे ही संतुष्ट हो जाता है । बढ़िया आहार मिल गया तो ठीक, थोड़ा आहार मिल गया तो ठीक, आहार नहीं मिला तो भी ठीक । इसका सूत्र यह है कि व्यक्तिगत जरूरत को कम रखना चाहिए तभी हम साधना के लिए समय निकाल पाएंगे । |
| 046. |
प्रभु का भजन करने वाले का जीवन निर्वाह प्रभु ही करवाते हैं । |
| 047. |
प्रभु की आराधना जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए । |
| 048. |
स्वामी श्री विवेकानंदजी संत श्री रामकृष्ण परमहंसजी की समाधि के बाद कैसे रहे यह देखना चाहिए । बारह शिष्य श्री रामकृष्ण परमहंसजी के । बारह गुरुबंधु एक भूत बंगले में रहे । बारह शिष्यों में कुल दो वस्त्र थे, बाकी सभी के पास कोपीन मात्र थे । भिक्षा हेतु या बाजार जाते तो दो व्यक्ति ही जा सकते थे । सभी बारह स्नातक (ग्रेजुएट) थे, चाहे जितना कमा सकते थे पर कितने दिन बीतने पर भी पके हुए चावल और नमक के अलावा कुछ नहीं पाया । प्रभु के दिए समय और अक्ल को संसार में नष्ट नहीं करूँगा, यह उनका मुख्य उद्देश्य था । धन्य हैं स्वामी श्री विवेकानंदजी और उनके ग्यारह गुरुबंधु जिन्होंने भिक्षा मांगी पर समय और अक्ल संसार में नहीं लगाया । प्रभु आराधना में और शास्त्रों के चिंतन में लगाया । कितना बड़ा लक्ष्य जीवन का रखा । |
| 049. |
जिसने भी जीवन में प्रभु का लक्ष्य रखा है उसे एक मान्यता रखनी चाहिए कि जो कुछ भी मुझे प्राप्त हो जाएगा उसे प्रभु प्रसाद मानकर मैं संतुष्ट रहूँगा । |
| 050. |
उत्तम साधक को कम-से-कम उपकरण में अपनी देह को चलाने का अभ्यास अपनी इच्छा से करना चाहिए, मन मारकर नहीं करना चाहिए । |
| 051. |
स्वाद में चखने को कितने ही दिन मीठा नहीं मिलता तो भी सच्चा साधक उस भोजन से संतुष्ट रहता है । |
| 052. |
मेरी देह की जितनी आवश्यकता देह चलाने हेतु है उतना ही ग्रहण करूं, यह सच्चे साधक का नियम होता है । |
| 053. |
हमें जीवन में महान ऋषियों, अच्छे-अच्छे संतों और प्रभु भक्तों के नाम तक नहीं पता, यह हमारा कितना बड़ा दुर्भाग्य है । |
| 054. |
एक संत एक दूसरे संत से हवाई अड्डे पर मिले । वे धर्म प्रचार के लिए विदेश जा रहे थे । उन्हें छोड़ने के लिए बहुत सारे उद्योगपति जो उनकी उत्तम-से-उत्तम व्यवस्था करने हेतु तत्पर थे पर वे संत विमान की सबसे साधारण सीट पर बैठकर गए । |
| 055. |
जो मिला उसमें काम चला लेना, व्यवस्था के पीछे पड़कर अपने मानव जीवन के मुख्य उद्देश्य को ओझल करना गलत है । |
| 056. |
स्वामी श्री विवेकानंदजी को जीवन में बहुतों ने सुनाया कि मुफ्त की रोटी खाते हो, ग्रेजुएट हो काम क्यों नहीं करते । पर उन्होंने जो अध्यात्म से पाया वह कोई नहीं पा सकता । एक बात उन्होंने तय कर ली कि जीवन भौतिक संपत्ति प्राप्ति हेतु नहीं लगाना, सिर्फ प्रभु को भक्ति करके प्राप्त करना जीवन का हेतु और लक्ष्य । यही कारण था कि उन्होंने भारतीय अध्यात्म का डंका पूरे विश्व में बजा दिया । |
| 057. |
बड़े वैज्ञानिक के कितने प्रयोग निष्फल होते हैं, कितनी असुविधाओं को सहते हैं फिर सफल होते हैं । ऐसे ही आध्यात्मिक जीवन में भी असफलता के बाद ही सफलता मिलती है । |
| 058. |
एक व्रत कि जो मिल गया उससे संतुष्ट रहना, वस्त्र और निवास के लिए जो मिल गया वह ठीक, शरीर की रक्षा हेतु जो मिल गया वह ठीक । ऐसा सहज में स्वीकार नहीं करने वाला जीवन में महान कार्य नहीं कर सकता है । |
| 059. |
कितने दिन जीना है, सारे जीवन का धन लगाकर बंगला बनाया, सारा जीवन उस संपत्ति को कमाने में लगा दिया । संसारी ऐसा करते हैं तो ठीक पर प्रभु मार्ग पर चलने वाले के लिए यह त्याज्य है । |
| 060. |
प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने श्री सागरदेवजी से सीखा कि सागर जैसा होना चाहिए । सागर में निरंतर लहरें उठती है जो हमें भी प्रसन्नता देती है लहर के नृत्य को देखकर । पर भीतर की गहराई का पानी एकदम स्थिर होता है, हिलता भी नहीं । वैसे ही साधक सबसे मिले तो लहर की तरह सबको प्रसन्नता देनी चाहिए पर एकांत में बैठे तो एकदम स्थिर और गंभीर होना चाहिए । लोकांतर में प्रसन्नता और एकांत में गंभीरता साधक का ऐसा संतुलित जीवन होना चाहिए । |
| 061. |
सागर से रत्न उसको ही मिलते हैं जो डुबकी लगाकर नीचे तह तक जाते हैं । साधक भी जितना नीचे उतरेगा साधन के तह में उतना ही उसे आत्मरत्न मिलेगा । |
| 062. |
सागर कभी रत्न नहीं उछालते । हमें भी अपने साधन को नहीं उछालना चाहिए । मैं यह करता हूँ, वह करता हूँ, यह संसार को नहीं बताना चाहिए । साधन गुप्त रखना चाहिए । |
| 063. |
एक बार राजा श्री ययातिजी को अपने पुण्यों के कारण श्री इंद्रदेवजी के पास आसन पर बैठने का स्वर्ग में मौका मिला । श्री इंद्रदेवजी को अच्छा नहीं लगा । श्री इंद्रदेवजी ने उकसाने हेतु पूछा कि यहाँ तक पहुँचने हेतु आपने क्या किया । राजा श्री ययातिजी ने अपने पुण्य कर्म गिनाना शुरू किए, अंतिम पुण्य गिनाया तो श्री इंद्रदेवजी ने धक्का दिया कि अब सब पुण्य खत्म हो गए और मृत्यु लोग वापस भेज दिया । |
| 064. |
सूत्र यह है कि अपने मुँह से पुण्यों को गिनाने से वह पुण्य को तत्काल खत्म कर देता है । |
| 065. |
साधक को अपने साधन का रहस्य और अपने साधन के बारे में किसी को भी नहीं बताना चाहिए । |
| 066. |
इतनी नदियां मिलती है तब भी सागर में कभी बाढ़ नहीं आती, सदैव अपनी मर्यादा में रहता है । वैसे ही भीषण गर्मी पड़ने पर सागर कभी सूखता नहीं । वैसे ही साधक को अनुकूलता में उछलना नहीं चाहिए और प्रतिकूलता में निराश नहीं होना चाहिए । |
| 067. |
साधक सृष्टि की चिंता नहीं करता, जिसकी सृष्टि है वे प्रभु चिंता करेंगे । साधक केवल प्रभु का चिंतन करते हैं । |
| 068. |
संसारी के पीछे तनाव, चिंता होती है पर साधक के पीछे कुछ नहीं होता, कुछ भी पीछे है तो वह साधक नहीं है । क्योंकि सभी तनाव और चिंता की गठरी साधक प्रभु के श्रीकमलचरणों में रख देता है कि प्रभु संभालेंगे, इन्हें संभालना मेरा काम नहीं, यह प्रभु का कार्य है । |
| 069. |
प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने पतिंगा से सीखा कि जैसे दीपक को देखकर पतिंगा लपकते हैं क्योंकि दीपक की लौ उन्हें अच्छी लगती है । लौ से आँखें फूट जाती है और पंख जल जाते हैं और वे मर जाते हैं । सूत्र यह है कि साधक अगर सौंदर्य के आभास से उस सौंदर्य के उपभोग हेतु दौड़ता है तो उसका नाश होता है । उसकी आँखें जलती है, जो ज्ञान का प्रतीक है । उसके पंख जलेंगे, जो पुरुषार्थ का प्रतीक है । सूत्र यह है कि साधक को सभी से सावधान रहना चाहिए, बढ़िया चीजों से सावधान, उनके उपयोग की दृष्टि से सांसारिक पदार्थ को देखकर जितना आकृष्ट हुआ उतना उसके ज्ञान और पुरुषार्थ का नाश होगा । संसार दीपक जैसा है और हमारा मन पतिंगा जैसा है, मन को रूप बुद्धि और उपभोग बुद्धि से दूर रखना चाहिए । |
| 070. |
प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने भ्रमर से सीखा कि भिन्न-भिन्न फूलों पर जाकर मधु का सेवन करता है पर विशेष बात पुष्पों की रचना को बिगाड़ता नहीं । इसी तरह उत्तम साधक को गृहस्थ को बिना दुःख पहुँचाए, अपना भार डाले बिना उनसे भिक्षा रूप में अपनी जरूरत की पूर्ति कर लेनी चाहिए । भ्रमर चारों तरफ बगिया में घूम मधुकर वृत्ति से मधु को लेता है वैसे ही साधक को घूम-घूम कर मधुकर वृत्ति से भिक्षा लेनी चाहिए । पर किसी को भिक्षा के कारण कष्ट नहीं पहुँचे यानी सबके भोजन होने के बाद भिक्षा हेतु जाए - यह शास्त्र मत है । |
| 071. |
जैसे भ्रमर सारे छोटे-बड़े पुष्पों के सार को ग्रहण कर लेता है वैसे ही साधक को बड़े और छोटे ग्रंथों के सार को ग्रहण करना चाहिए । ग्रंथों को ग्रहण करना हमारी क्षमता के बाहर क्योंकि ग्रंथ इतने सारे हैं । सूत्र यह है कि सिर्फ उनका सार ग्रहण करना । ग्रंथ पढ़कर छोड़ दे जैसे भ्रमर मधु ग्रहण करने के बाद फूल को छोड़ देता है । |
| 072. |
शास्त्र भी बोझ, बोझ ढोने की जरूरत नहीं इसलिए जो सार को ग्रहण कर थोथ को उड़ा दे वही सच्चा साधक है । |
| 073. |
प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने मक्खी से ग्रहण किया कि एक कमरे की रसोई में आने वाली साधारण मक्खी को जो मिल गया उसे लिया, कोई अपने पास जमा करने की थैली नहीं रखती । दूसरे प्रकार की मक्खी वह जो इकट्ठा करती है, करती जाती है और खाती नहीं उसे मधुमक्खी कहते हैं । तो व्यक्ति आकर उसे जला देता है और शहद निकाल लेता है । इकट्ठा किया शहद चखा तक नहीं और मर गई । साधक को ऐसा संग्रह नहीं करना चाहिए जो उसकी जान पर आ बने, उसके अनुयायी ही उसे लालच में मार देंगे । उसे मधुमक्खी की तरह इकट्ठा करने वाला और न चखने वाला नहीं बनना बल्कि घरेलू मक्खी की तरह जीना चाहिए कि जो जैसा मिल गया पेट भरने के लिए उसे पेट में डाल दिया और संग्रह नहीं किया । सूत्र यह है कि साधक को भी मात्र अपना पेट भरना चाहिए, इकट्ठा नहीं करना चाहिए । |
| 074. |
ऋषि श्री अत्रिजी की साधना से प्रसन्न होकर श्रीत्रिदेव आ गए । प्रभु श्री ब्रह्माजी, प्रभु श्री विष्णुजी और प्रभु श्री महादेवजी क्योंकि ऋषि ने संकल्प किया था कि सारे संसार का संचालन करने वाले परमात्मा आ जाएं । इसलिए तीनों आ गए क्योंकि संचालन तीनों मिलकर ही करते हैं और श्रीत्रिदेव की भी इच्छा हुई कि हम ऋषि श्री अत्रिजी के पास चले, ऐसा साधन उन्होंने किया था । |
| 075. |
देवर्षि प्रभु श्री नारदजी भगवती लक्ष्मी माता, भगवती पार्वती माता और भगवती सावित्री माता के पास गए और भगवती अनुसुइयाजी की प्रशंसा की । भगवती अनुसुइयाजी ऋषि श्री अत्रिजी की पतिव्रता स्त्री थी । तीनों माताओं ने प्रभु से कहा कि भगवती अनुसुइयाजी के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लें । तीनों प्रभु भिक्षा लेने पहुँचे, शर्त रखी कि निर्वस्त्र होकर भिक्षा दो तो ग्रहण करेंगे । भगवती अनुसुइयाजी ने भीतर कुटिया में जाकर पतिव्रत धर्म के तेज के कारण ध्यान किया और देखा कि तीनों प्रभु हैं तो उन्होंने संकल्प मात्र से तीनों प्रभु को एक माह का बालक बना दिया और उन्हें दूध पान कराया । छह महीने बाद तीनों माताएं आई और भिक्षा के रूप में प्रभु को मांगा तो भगवती अनुसुइयाजी ने जल छिड़काव किया और तीनों प्रभु प्रकट हो गए । तीनों प्रभु वापस अपने स्वधाम लौटे पर तीनों ने एक-एक अंश वहाँ छोड़ दिया और तीनों अंश से प्रभु श्री दत्तात्रेयजी बने । सूत्र यह है कि मैं अपने धर्म का पालन करूं तो विश्व के परमात्मा का बल मेरे धर्म में आ जाता है । |
| 076. |
भक्ति का त्याग कभी नहीं करना चाहिए, धर्म का पालन करना चाहिए । किसी भी स्थिति में चाहे कितना भी कलियुग आ जाए तब भी - यह बताने हेतु अभी भी संत जन्मते हैं और अपने व्यवहार और प्रचार से ऐसा करते हैं । |
| 077. |
प्रभु श्री दत्तात्रेयजी स्मरण-गामी हैं यानी स्मरण करने पर प्रकट होने वाले देव हैं । आज भी प्रभु श्री दत्तात्रेयजी बहुत से संतों को साधन मार्ग में सफल करने हेतु स्वयं प्रकट होकर उपदेश देते हैं । |
| 078. |
साधन मार्ग पर दत्त उपासना करना जरूरी क्योंकि साधन के विघ्न को प्रभु श्री दत्तात्रेयजी हर लेते हैं । साधन मार्ग की गलतियों से प्रभु प्रभु श्री दत्तात्रेयजी हमारी रक्षा करते हैं । प्रभु श्री दत्तात्रेयजी को रोज एक फूल चढ़ाना चाहिए और एक बार उनकी जय बोलनी चाहिए । अनेक संतों पर प्रभु श्री दत्तात्रेयजी की असीम अनुकंपा रही है । ऐसा मत मानना कि एक ही प्रभु की पूजा करूँगा, पूजा एक की ही करना, उनमें ही सभी प्रभु के रूप समाहित हैं इसलिए एक पुष्प का जयकारा सबका होना चाहिए । इसी से प्रभु के सभी रूपों से हमारा संपर्क बना रहता है । |
| 079. |
एक बार श्री डोंगरेजी महाराज से मिलने स्वामी अखंडानंदजी पहुँचे । एक व्यक्ति आया जो स्वामी अखंडानंदजी को जानता था । स्वामी अखंडानंदजी ने श्री डोंगरेजी महाराज से उसका परिचय कराया कि यह मेरा मित्र है । बाद में स्वामी अखंडानंदजी के किसी काम से जाने पर श्री डोंगरेजी महाराज ने उस व्यक्ति को कहा कि आप कभी भूलकर भी स्वामी अखंडानंदजी को अपना मित्र मत मान लेना । आपको आपकी मर्यादा में ही रहना चाहिए । |
| 080. |
श्री दक्षजी प्रभु श्री महादेवजी के ससुर बनने के बाद अपने को बड़ा मानने लगे । वे सोचने लगे कि मैं पिता तुल्य हो गया प्रभु श्री महादेवजी का । उन्हें यह समझना चाहिए था कि दामाद होने पर भी प्रभु श्री महादेवजी ही सबके पिता तुल्य हैं और रहेंगे । |
| 081. |
श्री दक्षजी के निंदा के शब्द को जो कि उन्होंने प्रभु श्री महादेवजी के लिए कहे उसे भी संतों ने निंदा स्तुति मानी । प्रभु की निंदा भी कोई करता है तो संत उसमें स्तुति का भाव ही देखते हैं । |
| 082. |
जिसका आगे चलकर सर्वनाश और सत्यानाश होना है उसे प्रभु प्रेरणा देकर अपने लिए ऐसा गलत बुलवाते हैं । श्री दक्षजी एवं शिशुपाल ने ऐसा ही किया और दोनों का विनाश हुआ । |
| 083. |
जीवन में जो भी इच्छा हो प्रभु श्री महादेवजी से मांगना और उसकी पूर्ति होगी । प्रभु श्री कृष्णजी से कुछ नहीं मांगना सिर्फ उनसे प्रेम करना । प्रभु श्री महादेवजी देने वाले देव हैं प्रभु श्री कृष्णजी प्रेम करने वाले देव हैं । |
| 084. |
एक प्रभु महादेव का नाम ही जीवन में सब कुछ कर देता है । |
| 085. |
एक संत के पास एक व्यक्ति आया और कहा कि मैंने इतना पाप किया है, पाप कैसे मेरे भीतर से निकलेंगे । संत ने कहा कि श्रीशिव-श्रीशिव कहो । सिर्फ, सिर्फ और सिर्फ श्रीशिव नाम को रटो । संत ने कहा कि एक भी पाप नहीं बचेंगे । अगर तीन घंटा रोजाना कुछ महीनों के लिए सिर्फ श्रीशिव का जाप किया जाए तो कोई पाप बच ही नहीं सकता । |
| 086. |
अपने मुँह से प्रभु निंदा के शब्द कभी भी किसी भी परिस्थिति में निकलने नहीं देने चाहिए । यह प्रभु द्रोह कहलाता है जो परम विनाशकारी होता है । |
| 087. |
प्रभु की कृपा होने के लिए एक सेकेंड का समय ही काफी होता है । |
| 088. |
किया हुआ भजन कभी भी और किसी भी परिस्थिति में नष्ट नहीं होता । |
| 089. |
प्रभु अपने भक्तों को कभी भी कमजोर नहीं पड़ने देते । |
| 090. |
प्रभु के आश्रय में बहुत बड़ा बल होता है । |
| 091. |
हर क्षण की हमारी व्यवस्था प्रभु करते हैं, प्रभु इतने कृपालु हैं । |
| 092. |
जो लोक धर्म में ही फंसे हुए हैं वे परम धर्म यानी भक्ति से वंचित हैं । |
| 093. |
भक्ति सीधा भगवत् प्राप्ति करवाने वाला साधन है । |
| 094. |
प्रभु का भरोसा रखने पर सबसे बड़ा बल जीवन में हमें मिलता है । |
| 095. |
प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण होने पर प्रभु पर दृढ़ विश्वास हो जाता है । |
| 096. |
अगर मनुष्य जन्म पाने के बाद भी हम जन्म-मरण के चक्कर में फंसे रहे तो यह हमारी विफलता है । मनुष्य जन्म वही सार्थक है जो आगे के जन्म-मरण से छुड़ाकर हमें प्रभु के श्रीकमलचरणों में पहुँचा दे । |
| 097. |
संसार में सुखी वही है जिसने केवल प्रभु का आश्रय ले लिया है । |
| 098. |
प्रभु और प्रभु के नाम के अलावा हमें दुःखों से कोई भी नहीं बचा सकता । |
| 099. |
भक्ति से कामनाओं का विसर्जन हो जाता है और हम कामना रहित हो जाते हैं । |
| 100. |
प्रभु प्रेम रस का वितरण जीवों में करते हैं । |
| 101. |
श्रीगोपीजन ने बाहर से कुछ नहीं त्यागा पर भीतर से प्रभु के लिए सब कुछ त्याग दिया । मन से किया त्याग ही सच्चा त्याग होता है । |
| 102. |
संत भी साधन मार्ग पर शांत हो जाते हैं तो प्रभु श्री महादेवजी तो शांतमूर्ति हैं और उन्होंने शांति से श्री दक्षजी के द्वारा किए अपमान को सहा । पूरा अपमान होने तक बैठे रहे फिर उठकर श्री कैलाशजी चले गए और इतना शांत रहे कि भगवती सती माता को भी कुछ नहीं बताया । |
| 103. |
अहंकार के कारण श्री दक्षजी ने श्रीशिव-श्रीशक्ति से नाता तोड़ लिया । संसार में किसी का भी भला नहीं हो सकता जो जगत के माता-पिता श्रीशिव और श्रीशक्ति से रिश्ता तोड़ लेता है । |
| 104. |
हम सबको बदल नहीं सकते पर सबके साथ सामंजस्य बैठाने का प्रयास तो कर सकते हैं । जैसे सर्कस में सभी जानवरों से सामंजस्य बैठाया जाता है । पहले भालू, फिर बंदर, फिर घोड़ा, फिर हाथी, फिर शेर से । सर्कस के संचालक को पता है कि सबसे कैसा व्यवहार करना है । |
| 105. |
प्रेम सबसे समान करना पर व्यवहार सबसे समान नहीं करना चाहिए । प्रभु श्री कृष्णजी ने महाभारतजी में ऐसा करके दिखाया । |
| 106. |
श्री शंकराचार्यजी की कर्मकांड की सबसे प्रिय उपासना श्रीयंत्र की थी । सारे देवता, सारे परमात्मा शक्ति एक जगह आराधना के लिए आ जाते हैं । सभी मठों में अलग-अलग प्रभु विग्रह स्थापित किए पर श्रीयंत्र सब जगह स्थापित किया । |
| 107. |
भौतिक उन्नति के लिए कर्मकांड अनिवार्य है और आंतरिक शांति के लिए भक्ति अनिवार्य है । |
| 108. |
भक्ति से आंतरिक शांति के पूर्व देवताओं का अनुग्रह हमें कर्मकांड से प्राप्त करना चाहिए । |
| 109. |
श्री रमण महर्षिजी से किसी ने पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं श्रीयंत्र की स्थापना अपने आश्रम में करूँगा और फिर यह पूरा आश्रम श्रीयंत्र ही चलाएगा । इतना सामर्थ्य श्रीयंत्र में होता है । |
| 110. |
कर्मकांड में ज्यादा नहीं फंसना चाहिए और भक्ति में ही अपने जीवन को अर्पण करना चाहिए तभी प्रभु की प्राप्ति संभव है । |
| 111. |
कर्मकांड से भौतिक उन्नति करनी चाहिए, वेदांत के माध्यम से प्रभु का ज्ञान पाना चाहिए और भक्ति से प्रभु में विलीन हो जाना चाहिए । |
| 112. |
जब प्रभु हृदय में बस जाते हैं तो फिर कोई अन्य वहाँ बस नहीं सकता । प्रभु किसी को हृदय में रहने नहीं देते, वे अकेले ही रहते हैं । |
| 113. |
रोना उसी का धन्य होता है जो प्रभु प्रेम में रोता है । |
| 114. |
जब तक अंतःकरण में संसार का महत्व रहेगा प्रभु का महत्व हमारी समझ में नहीं आ सकता । |
| 115. |
प्रभु की कृपा हमारे सभी शोकों का निवारण करने वाली होती है । |
| 116. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों की श्रीअंगुली के नख का भी ध्यान करने से हमारा अमंगल नष्ट हो जाता है । |
| 117. |
प्रभु की कृपा का प्रकाश जीवन में हो जाए तो हमारा कल्याण सुनिश्चित हो जाता है । |
| 118. |
प्रभु की भक्ति से अधिक एक वैष्णव के लिए प्राप्त करने योग्य कुछ भी नहीं है । |
| 119. |
जीवों पर अनुग्रह करने के लिए प्रभु श्रीलीलाएं करते हैं । श्रीलीलाएं सुनकर, गाकर जीव का कल्याण होता है । |
| 120. |
एक ही कामना जीवन में बचनी चाहिए कि हमें प्रभु के श्रीकमलचरणों में स्थान मिल जाए । |
| 121. |
चंचल मन भक्ति करने से शांत हो जाता है । अन्य किसी साधन से ऐसा होना संभव नहीं है । |
| 122. |
संसार के भोगों की आकांक्षा रखने वाला भगवत् प्राप्ति नहीं कर पाता । |
| 123. |
जिसने भगवत् आश्रय को स्वीकार कर लिया उसका अमंगल कभी भी नहीं हो सकता । |
| 124. |
भगवत् नाम जापक के सामने कोई तंत्र-मंत्र-यंत्र काम नहीं करते । |
| 125. |
प्रभु की श्रीलीलाओं का प्रयोजन जीवों पर अनुग्रह करना होता है जिससे जीव प्रभु में तन्मय हो सके । |
| 126. |
संत कहते हैं कि जिनको केवल एक परमात्मा ही चाहिए और कोई सकामता की इच्छा नहीं हो, कोई ज्ञान की इच्छा नहीं हो, उन्हें कर्मकांड की जरूरत नहीं और वेदांत की जरूरत नहीं । उन्हें सिर्फ भक्ति ही करनी चाहिए जैसे संत श्री तुकारामजी और भगवती मीराबाई ने सीधी भक्ति ही की थी । |
| 127. |
गृहस्थ को कभी अपने कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि कर्म त्याग से मलिनता आती है । |
| 128. |
सज्जन जितना बड़ा होता जाता है उतना नम्र होता जाता है और असज्जन जितना बड़ा होता जाता है उतना अकड़ता जाता है । |
| 129. |
जितनी नम्रता उतनी उन्नति होगी - यह सिद्धांत है । राजा श्री युधिष्ठिरजी इतने नम्र थे तो उनकी इतनी उन्नति हुई और दुर्योधन इतना अकड़वान था तो उसकी इतनी दुर्गति हुई । |
| 130. |
प्रभु ने हमें बड़ा बनाया है, प्रभु ने जितनी अनुकूलता दी है, उतना हृदय को विशाल करें । लोगों को व्यवहार से जीते, अपने बड़प्पन को न दिखाएं । |
| 131. |
जो शातिर लोग होते हैं उन्हें बात कैसे मनवानी है, वह पता होता है । वे शब्दों को बदलकर, संवेदना बदलकर अपनी बात मनवा लेते हैं । ऐसे लोगों से हरदम सावधान रहना चाहिए । |
| 132. |
सही शब्द, सही जगह और सही तरीके से प्रयोग संत श्री ज्ञानेश्वरजी ही करना जानते हैं । ऐसा करने के कारण ही श्री ज्ञानेश्वरजी अपूर्व हैं, उनकी कोई तुलना नहीं की जा सकती । |
| 133. |
यज्ञ के लिए निमंत्रण की आवश्यकता नहीं, स्वयं पहुँचना अपेक्षित होता है । |
| 134. |
जहाँ प्रेम है वहाँ निमंत्रण की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए पर जहाँ प्रेम नहीं है वहाँ निमंत्रण आने पर ही जाना चाहिए । पर जहाँ उपेक्षा होगी वहाँ जाना ही नहीं चाहिए । |
| 135. |
अपने वैर को कभी भी घसीटना नहीं चाहिए और उसे मिटाने की कोशिश ही सदैव करनी चाहिए । |
| 136. |
प्रभु का रंग चढ़ने के बाद संसार का रंग कभी भी नहीं चढ़ सकता । |
| 137. |
प्रभु से प्रभु का प्रेम ही मांगना चाहिए । |
| 138. |
कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रभु ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं । |
| 139. |
हमारा मन और शरीर प्रभु सेवा के लिए ही हमें मिला है । |
| 140. |
प्रभु के अलावा अन्य किसी की सत्ता ब्रह्मांड में नहीं है । |
| 141. |
प्रभु के लिए प्रेम से रोना नहीं सीखा, तड़पना नहीं सीखा तो संसार में अन्य सब सीखना व्यर्थ ही है । |
| 142. |
भक्त के पास प्रभु की प्रतीक्षा के अलावा अन्य कुछ नहीं होता । |
| 143. |
प्रभु का एक नाम प्रेमाधीन है यानी भक्ति और प्रेम के कारण अपने भक्तों के अधीन प्रभु रहते हैं । |
| 144. |
अपनी आंसुओं की भेंट केवल प्रभु के लिए ही रखनी चाहिए । |
| 145. |
प्रभु को संतों द्वारा दया का समुद्र कहा गया है । |
| 146. |
परमार्थ हमारा वास्तविक धन है । सांसारिक धन तो चक्रवर्ती सम्राट को भी संसार में ही छोड़कर जाना पड़ता है । |
| 147. |
एक-एक श्वास प्रभु की सेवा और सुमिरन में ही बितानी चाहिए । |
| 148. |
अपने शरीर के मालिक भी खुद नहीं बनना चाहिए, प्रभु को ही बनाकर रखना चाहिए । |
| 149. |
नाम जप को कोई भी विपरीत कर्म नष्ट नहीं कर सकता क्योंकि नाम जप अविनाशी है । |
| 150. |
प्रभु का नाम जप हमारा मंगल करके ही रहता है । |
| 151. |
अपमान मृत्यु से भी भयंकर होता है, ऐसा शास्त्र मत है । |
| 152. |
भगवती सती माता को शोक, रोष और ग्लानि हुई जब प्रभु महादेवजी ने उन्हें समझाया कि बिना बुलाए पिता के घर पर नहीं जाना चाहिए । ऐसे तीन भावों का चित्रण प्रभु श्री शुकदेवजी ने किया है । |
| 153. |
परिवार से कितना प्रेम किया जाए इसके आदर्श प्रभु श्री महादेवजी हैं । प्रभु श्री महादेवजी जानते हैं कैसे परिवार के सभी लोगों से प्रेम करना क्योंकि परिवार को झगड़े से नहीं जीत सकते, प्रेम से ही जीतना पड़ता है । |
| 154. |
अपने पति प्रभु श्री महादेवजी के अपमान के कारण अपनी देह, जो श्री दक्षजी की देन थी, को माता ने त्याग दिया । जिस पिता ने गलत शब्द का प्रयोग किया प्रभु श्री महादेवजी के लिए उनके द्वारा दी हुई देह माता धारण नहीं करना चाहतीं थीं । ऐसी महानता की भावना भगवती सती माता में थी । |
| 155. |
यजमान श्री दक्षजी के मस्तक की आहुति से कुयज्ञ की पूर्णाहुति हुई । कुयज्ञ इसलिए कि वहाँ प्रभु श्री महादेवजी का स्मरण नहीं किया गया था । |
| 156. |
श्रीमद् भागवतजी महापुराण में चतुर्भुज प्रभु श्री नारायणजी और अष्टभुज प्रभु श्री नारायणजी दोनों का वर्णन है । |
| 157. |
प्रभु श्री नारायणजी ने भगवती सती माता के शरीर को बाण से विच्छेद किया जब प्रभु श्री महादेवजी माता के शरीर को पीठ पर धारण करके घूम रहे थे । जहाँ-जहाँ माता का श्रीविग्रह गिरा वहाँ-वहाँ श्री शक्तिपीठ बन गए । |
| 158. |
देवी-देवता के मंदिर सिद्ध पुरुषों द्वारा स्थापित किए या प्राचीन मंदिर होते हैं उनसे छेड़छाड़ कभी नहीं करनी चाहिए । माता के एक मंदिर को हटाने का एक जगह प्रयास किया गया तो इतनी बड़ी प्राकृतिक आपदा आई कि सभी ने माना कि यह देवी-देवता का कोप है । |
| 159. |
जिस यज्ञ में प्रभु श्री ब्रह्माजी और प्रभु श्री नारायणजी को निमंत्रण था पर वे नहीं गए क्योंकि प्रभु श्री महादेवजी को निमंत्रण नहीं था । सूत्र यह है कि प्रभु को एक साथ ही सभी रूपों में बुलाओगे तो प्रभु आएंगे पर एक रूप की उपेक्षा करेंगे तो प्रभु अन्य रूपों में भी नहीं आएंगे । |
| 160. |
प्रभु श्री ब्रह्माजी रुष्ट हो गए तो प्रभु श्री नारायणजी की आराधना कर प्रभु श्री ब्रह्माजी को मनाया जा सकता है । प्रभु श्री नारायणजी रुष्ट हो गए तो प्रभु श्री महादेवजी की आराधना कर प्रभु श्री नारायणजी को मनाया जा सकता है । पर प्रभु श्री महादेवजी रुष्ट हो गए तो फिर उसका कोई उपाय नहीं, इसलिए प्रभु श्री महादेवजी की उपेक्षा हो ही नहीं सकती । |
| 161. |
प्रभु जैसा तो ब्रह्मांड में केवल प्रभु ही हैं । |
| 162. |
जो भी संसार में जमा किया मृत्यु एक क्षण में सब कुछ चौपट कर देती है । इसलिए जमा करना है तो प्रभु का नाम धन जमा करना चाहिए जिसका मृत्यु भी कुछ नहीं बिगाड़ सकती । |
| 163. |
लोक-परलोक में हमारी जय कराने वाला केवल प्रभु का नाम ही है । |
| 164. |
भय भी प्रभु नाम जापक का कुछ नहीं बिगाड़ सकता । |
| 165. |
कलिकाल भी प्रभु के नाम जापक से डरता है । |
| 166. |
यह मानव जीवन केवल प्रभु प्राप्ति के लिए ही मिला है । |
| 167. |
सभी समस्याओं का समाधान प्रभु के नाम जप और प्रभु के चिंतन से ही संभव है । |
| 168. |
इसी जन्म में नाम जप से हमारा समाधान हो सकता है । |
| 169. |
प्रभु के आश्रित होकर, प्रभु की शरण में रहकर प्रभु का स्मरण करना - इससे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है । |
| 170. |
हम सुख और शांति पाने के लिए संसार में भाग रहे हैं पर सुख से भी बड़ा परमानंद और शांति से भी बड़ी परम शांति तो केवल प्रभु के सानिध्य में ही है । |
| 171. |
संसार से विमुख होकर प्रभु के सन्मुख होना चाहिए । |
| 172. |
जो हम बहुत बोलते, देखते और सुनते हैं वही हमारी आसक्ति बन जाती है । इसलिए प्रभु को देखें और प्रभु के बारे में बोले और सुनें । |
| 173. |
परमानंद और शांति का ठिकाना प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही है, दूसरा कहीं भी नहीं है । |
| 174. |
हमारी सारी चेष्टा प्रभु को पाने के लिए ही होनी चाहिए । |
| 175. |
पूरे समय प्रभु का स्मरण करते रहना चाहिए । कर्तव्य पालन के कार्य करते वक्त भी प्रभु का स्मरण होना चाहिए । |
| 176. |
प्रभु श्री महादेवजी आदिगुरुदेव हैं । जैसे ज्ञान के लिए भगवती सरस्वती माता की आराधना आवश्यक है वैसे ही विवेक की जागृति के लिए प्रभु श्री महादेवजी की आराधना अनिवार्य है । |
| 177. |
श्री दक्षजी के यज्ञ में भाग लेने गए देवताओं पर प्रभु श्री महादेवजी रुष्ट नहीं हुए । देवता अपने बच्चे हैं यह मानकर उनकी गलती का विचार प्रभु श्री महादेवजी ने नहीं किया और उन्हें माफ कर दिया क्योंकि प्रभु श्री महादेवजी क्षमामूर्ति हैं । |
| 178. |
प्रभु श्री महादेवजी ने कृपा दृष्टि यानी श्रीशिव दृष्टि की तो सभी देवताओं की आकृति पहले जैसी हो गई । श्री वीरभद्रजी द्वारा सबके अंग भंग जो हो चुके थे पर वे सब ठीक हो गए । श्रीशिव दृष्टि का बहुत बड़ा सामर्थ्य है । केवल श्रीशिव दृष्टि मात्र ही सभी काम कर देती है, प्रभु को कुछ करने की जरूरत या संकल्प की भी जरूरत नहीं पड़ती मात्र श्रीशिव दृष्टि की जो कृपा है वही पर्याप्त है । |
| 179. |
प्रभु श्री महादेवजी आशुतोष हैं । उन्हें क्रोध आता भी है तो तुरंत चला जाता है । सूत्र यह है कि क्रोध आकर चला जाए, रोष भी चला जाए, वही श्रेष्ठ है । प्रभु श्री महादेवजी का क्रोध भी ऐसा ही है । |
| 180. |
हम श्रीशिवलिंग पर पंचामृत, श्रीगंगा जल, बिल्व पत्र और पता नहीं क्या-क्या चढ़ाते हैं, पर श्रीशिवलिंग पर फिर कुछ भी नहीं रुकता । जो आया वह चला जाता है । इसलिए हमेशा हमें अपने से भी कुछ चिपका हुआ नहीं रखना चाहिए क्योंकि चिपका हुआ पदार्थ सड़ता है और दुर्गंध देता है । इसलिए अपने मन को श्रीशिवलिंग की तरह बनाना चाहिए कि जिस पर किसी का भी कोई लेप स्थिर नहीं हो । |
| 181. |
दुनिया का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि माया के बीच रहते हुए प्रभु में अनुराग जग जाए । |
| 182. |
हमें दुनिया से नहीं बल्कि दुनिया बनाने वाले प्रभु से सरोकार होना चाहिए । |
| 183. |
भौतिकता में स्थाई सुख किसी को आज तक नहीं मिला । जब जीव भौतिकता से थक जाता है तो वह शांति और आनंद पाने के लिए अध्यात्म की तरफ ही मुड़ता है । |
| 184. |
जीवन में सुखी होने के लिए प्रभु का आश्रय लेना ही पड़ेगा क्योंकि अन्य कोई विकल्प ही नहीं है । |
| 185. |
प्रभु ने कहा है कि मेरे भक्त का कभी भी नाश नहीं हो सकता क्योंकि उसकी रक्षा प्रभु स्वतः करते हैं । |
| 186. |
प्रभु का आश्रय लेने से मंगल-ही-मंगल होगा । प्रभु आश्रित का अमंगल हो ही नहीं सकता । |
| 187. |
हर स्थिति में प्रभु की कृपा को एक भक्त देखता भी है और अनुभव भी करता है । |
| 188. |
जीवन में भजन की भूख बढ़ाना प्रभु की सबसे बड़ी कृपा है । |
| 189. |
भगवत् विमुख होकर संसार के मार्ग पर चलना सबसे बड़ा पाप है । |
| 190. |
प्रभु की प्राप्ति का लक्ष्य रखकर जीवन में आगे बढ़ना सबसे बड़ा पुण्य है । |
| 191. |
जिसका लक्ष्य भोग और संग्रह करना है और भोग भोगना है वे अंत में दुर्गति को ही प्राप्त होते हैं । |
| 192. |
जीवन में भजन करने का अवसर बड़े भाग्य से जीव को मिलता है । |
| 193. |
प्रभु को ही अपना एकमात्र जीवनधन मानना चाहिए । |
| 194. |
जब तक संसार में अन्य कोई भरोसा है हम दुःखी ही रहेंगे । सुखी होना है तो केवल और केवल प्रभु का ही भरोसा जीवन में होना चाहिए । |
| 195. |
प्रभु की रुचि का पोषण करें, अपनी रुचि का पोषण नहीं करना चाहिए । |
| 196. |
भक्ति करने वाले जीव के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं होता । |
| 197. |
एक जीवन प्रभु को देकर देखें फिर क्या चमत्कार होता है इसका अंदाजा भी आप नहीं लगा पाएंगे । |
| 198. |
प्रभु पूरी सृष्टि का भार लेकर रखे हैं तो हमारा भार उठाने में उन्हें कहाँ परहेज है । |
| 199. |
परमानंद की बाढ़ आ जाएगी जब भक्ति परिपक्व होगी । |
| 200. |
प्रभु तब बहुत प्रसन्न होते हैं जब वे देखते हैं कि दुःखों के बावजूद एक इंसान उन पर पूर्ण विश्वास रख रहा है । तब यकीन मानिए प्रभु उस विश्वास की कीमत समय आने पर जरूर देते हैं । |
| 201. |
बकरे का मुँह लगने पर श्री दक्षजी के पाप का क्षय हुआ और वे प्रभु श्री शिवजी के सामने झुके । पाप क्षय होते ही हम प्रभु के सामने झुक जाते हैं । हमारे पाप ही हमें प्रभु के सामने झुकने नहीं देते । |
| 202. |
समस्त पापों के क्षय का एक उत्तम उपाय है - प्रभु श्री शिवजी की भक्ति और पूजा । |
| 203. |
जो श्रीत्रिदेव को अलग-अलग मानते हैं उन्हें कभी साधन मार्ग में शांति नहीं मिलती है । सूत्र यह है कि प्रभु के सभी रूपों को एक मानना चाहिए । प्रभु के अनेक स्वरूपों में कभी तुलना नहीं करनी चाहिए । |
| 204. |
यह दोष है कि यह प्रभु रूप बड़ा है और यह प्रभु रूप छोटा है । प्रभु के किसी भी रूप को छोटा बड़ा मानना, यह पूर्ण मूर्खता है । उदाहरण स्वरूप प्रभु श्री शिवजी प्रभु श्री रामजी के भक्त हैं और प्रभु श्री रामजी प्रभु श्री शिवजी के भक्त हैं । |
| 205. |
श्री काशीजी में प्राण त्याग पर मोक्ष क्यों ? क्योंकि ऐसी मान्यता है कि प्रभु श्री शिवजी गुप्त रूप से गुप्त रूप बनाकर उस जीव के कान में अंतिम समय श्रीराम नाम का उच्चारण करते हैं । |
| 206. |
प्रभु का प्रेम किसी बड़े भाग्यवान को ही नसीब होता है । इसलिए अगर प्रभु का प्रेम नसीब हुआ है तो अपने आपको अति भाग्यवान मानना चाहिए । |
| 207. |
हमें रहना जगत में है पर जगत हमारे भीतर कदापि नहीं रहना चाहिए । जगत हमारे भीतर नहीं रहे, इस बात से सदैव सावधान रहना चाहिए । |
| 208. |
प्रभु पर विश्वास सदा हमारे भीतर नई उमंग भर देता है । |
| 209. |
जब प्रभु श्री जगन्नाथजी साथ हो तो भला कोई अनाथ कैसे हो सकता है । |
| 210. |
प्रभु सिर्फ हमसे अपनापन चाहते हैं । इसके अलावा प्रभु की हमसे कोई मांग नहीं है । |
| 211. |
प्रभु ने कहा कि मैं प्रेम भाव का भूखा हूँ पर प्रभु ने कहीं नहीं कहा कि मैं छप्पन भोग का भूखा हूँ । |
| 212. |
प्रभु को अपना प्रेम देने की भावना सदैव हमारे भीतर होनी चाहिए । |
| 213. |
प्रभु का मन भक्त के प्रेम के कारण पिघल जाता है । |
| 214. |
जो आज तक प्रभु की शरण में आए हैं वे सभी अपने समस्त दुःखों से उबर गए । |
| 215. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों में सबके लिए स्थान है । |
| 216. |
किसी भी पाप में सामर्थ्य नहीं है कि वह हमें प्रभु से दूर कर सके । |
| 217. |
उम्मीद संसार से नहीं, सदा प्रभु से ही रखनी चाहिए क्योंकि संसार के पास देने का भाव नहीं है और प्रभु के पास कोई अभाव नहीं है । |
| 218. |
प्रभु कभी भी हमारा साथ नहीं छोड़ते, विपत्ति में तो बिलकुल भी नहीं छोड़ते । |
| 219. |
परमार्थ के मार्ग पर उत्साह से चलना चाहिए तभी हम उसमें सफल होंगे । |
| 220. |
प्रभु के सिवाय हमारी वृत्ति कहीं अन्य नहीं जाने पाए तभी हमारा कल्याण संभव है । |
| 221. |
इस जन्म में भगवत् प्राप्ति करना चाहता हूँ, यह विचार बहुत बड़ी प्रभु कृपा से जीवन में आता है । |
| 222. |
हमारा हर कार्य प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही होना चाहिए । |
| 223. |
ऐसा कार्य जीवन में कभी न करें जिसके बाद प्रभु से आँखें न मिला पाए । |
| 224. |
हमारे जीवन का हर निर्णय प्रभु के हाथ में है इसलिए प्रभु की भक्ति करें और कभी भविष्य से नहीं डरें । |
| 225. |
प्रभु के सभी नाम समान प्रभाव वाले हैं । प्रभु के अनंत नामों में कभी भी कोई भेद नहीं करना चाहिए । |
| 226. |
प्रभु पर किया भरोसा और प्रभु का आशीर्वाद असंभव काम को भी संभव बना देता है । |
| 227. |
जब दुःख में दुःख का अनुभव नहीं हो तो समझ लेना चाहिए कि प्रभु हमारे बहुत करीब हैं । |
| 228. |
कोई संसारी प्रभु की तरफ डर से देखता है पर भक्त प्रभु की तरफ सदैव भरोसे से ही देखता है । |
| 229. |
संत कहते हैं कि श्रीजी भगवती राधा माता देना नहीं जानती अपितु वे तो बरसाना जानती हैं । |
| 230. |
विश्वास और प्रेम भाव जीवन में प्रभु के लिए दृढ़ हो जाए तो हमारा कल्याण सुनिश्चित हो जाता है । |
| 231. |
प्रभु सबसे ज्यादा हमारे भीतर प्रेम भाव को देखकर प्रसन्न होते हैं । |
| 232. |
अंत में पाप का परिणाम दुःख, अशांति और क्लेश ही होता है । |
| 233. |
प्रभु के लिए कहा जाता है कि वे पात्र को देते हैं पर माता तो बिना पात्र वाले को भी दे देती है । |
| 234. |
प्रभु में मन लग जाए, बुद्धि लग जाए तो हमारा कल्याण सुनिश्चित हो जाएगा । |
| 235. |
प्रभु का अखंड चिंतन जीवन में होना सर्वोत्तम साधन है । |
| 236. |
भगवत् स्मरण बहुत बड़ा बल हमें जीवन में देता है । |
| 237. |
प्रत्येक कर्म, प्रत्येक क्षण प्रभु को समर्पण करके ही करना चाहिए । |
| 238. |
प्रभु के सामने प्रेम भाव में रोने वाला हमेशा जीवन में सफल होता है और जीत में रहता है । |
| 239. |
प्रभु की कृपा होती है तो वे हमारे भीतर उत्तम ज्ञान प्रकाशित कर देते हैं । |
| 240. |
प्रभु का एक-एक नाम जप हमारे मन को निर्मल करता जाता है । |
| 241. |
नाम जप करने वाले के जीवन में अभ्यास से एक समय ऐसा आएगा कि हर समय मन में नाम चलने लगेगा । |
| 242. |
नाम भगवान बाहर पहरा देते हैं और बुरी चीजों को भीतर आने नहीं देते एवं भीतर से बुरी चीजों को बाहर फेंक देते हैं । |
| 243. |
प्रभु का नाम हमारे अनर्थ की निवृत्ति करता ही रहता है । |
| 244. |
माया कहाँ समय देती है प्रभु का नाम जपने का । अगर नाम जप जीवन में हो रहा है तो यह प्रभु की कृपा के फलस्वरूप ही हो रहा है, ऐसा मानना चाहिए । |
| 245. |
हमें पूर्ण रूप से प्रभु पर ही आश्रित रहना चाहिए, किसी अन्य का कोई सहारा जीवन में लेना ही नहीं चाहिए । |
| 246. |
जीवन में प्रभु कृपा की बाट जोहने से प्रभु कृपा जीवन में फलित होती है । |
| 247. |
नाम जप ही हमारा मंगल करेगा, प्रभु से मिलाएगा और विपत्ति सहने का सामर्थ्य भी देगा । |
| 248. |
जहाँ श्रीजी श्रीराधा नाम है वहाँ बाधा टिक ही नहीं सकती । |
| 249. |
अगर प्रभु नाम जप हम जीवन में करते रहेंगे तो आनंद हमारे चरणों में आकर गिरेगा । |
| 250. |
संसार को देने के लिए प्रभु के श्रीमुख से श्रीमद् भगवद् गीताजी भारतवर्ष में ही प्रकट हुई है । यह भारतवर्ष का परम गौरव है । |
| 251. |
भारतवर्ष में सदैव संतों ने धर्म का चिंतन विश्व कल्याण के लिए किया है । |
| 252. |
धर्म के सारे सिद्धांत साकार हो जाएं तो जो नाम प्रकट होता है वह श्रीराम ही होगा । |
| 253. |
भारतवर्ष ने अपने प्रभु को कभी भुलाया नहीं, इस धरती पर हरदम भक्ति की ज्योति जलाने के लिए भक्त जन्में हैं । |
| 254. |
श्रीमद् भागवतजी महापुराण और श्री रामचरितमानसजी के भक्त पात्रों के भीतर भक्ति लहराती है । |
| 255. |
प्रभु श्री हनुमानजी का चिंतन प्रभु श्री रामजी को रिझाने का सर्वोत्तम उपाय है । |
| 256. |
सारा विश्व प्रभु श्री रामजी का स्मरण करता है और वे प्रभु श्री रामजी एकांत में प्रभु श्री हनुमानजी का स्मरण करते हैं । |
| 257. |
प्रभु एकांत में अपने भक्तों का ही चिंतन करते हैं । |
| 258. |
प्रभु का नाम अखिल ब्रह्मांड को विश्राम देने वाला है । |
| 259. |
विश्व के संपूर्ण सुख को इकट्ठा करने पर वह प्रभुरूपी आनंद सिंधु का एक बिंदु मात्र भी नहीं होगा । |
| 260. |
प्रभु का हर विधान हमारे लिए मंगल स्वरूप ही होता है । |
| 261. |
संसार के विषय सुख के लिए जीवन में कभी आदर भाव नहीं होना चाहिए । |
| 262. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त का कभी भी नाश नहीं होता क्योंकि प्रभु सदैव उनकी रक्षा करते हैं । |
| 263. |
वर्षा के जल में इतनी बूंदे नहीं बरसती जितनी भाव और प्रेम से एक प्रभु का नाम लेने पर प्रभु की कृपा बरसती है । |
| 264. |
प्रेम और नियम दोनों के संतुलन को साधना बहुत कठिन कार्य है जो केवल श्री भरतलालजी के चरित्र में देखने को मिलता है । शरीर नियम से बंधा हुआ और हृदय प्रभु प्रेम में भरा हुआ । |
| 265. |
श्री भरतलालजी का चरित्र परम उपकारी है और भक्तों के लिए परम अनुकरणीय है । |
| 266. |
श्री भरतलालजी का जीवन भक्तों के लिए अति प्रेरक है । |
| 267. |
कामनाओं की पूर्ति के लिए सर्वाधिक देने वाले प्रभु श्री महादेवजी हैं । |
| 268. |
प्रभु ही हमारी हर सात्विक मनोकामना पूर्ण करने में सर्वथा समर्थ है । |
| 269. |
विश्व पटल पर प्रभु श्री रामजी से श्रेष्ठ राजा और श्रीराम राज्य से श्रेष्ठ राज्य न कभी हुआ है और न आगे कभी होगा । |
| 270. |
पूरी श्रद्धा से सद्ग्रंथों का श्रवण और पठन करना चाहिए । |
| 271. |
जिस व्यक्ति का विश्वास अपने प्रभु पर हर परिस्थिति में बना रहता है, प्रभु भी उस व्यक्ति के विश्वास को किसी भी परिस्थिति में टूटने नहीं देते । |
| 272. |
अधर्म आचरण कभी भी किसी को सुखी नहीं कर सकता । |
| 273. |
प्रभु साथ हैं तो कुछ भी दुर्लभ नहीं और प्रभु विमुख हैं तो कुछ भी हाथ में नहीं लगेगा । |
| 274. |
मनुष्य योनि को छोड़कर एक भी ऐसी योनि चौरासी लाख योनियों में नहीं है जो भगवत् प्राप्ति करवा सके । इसलिए मनुष्य योनि बेहद अनमोल है । |
| 275. |
प्रभु की भक्ति हमारे हृदय का गुप्त विषय होना चाहिए । संसार को इसका पता नहीं चलने देना चाहिए । |
| 276. |
प्रभु श्री रामजी संपूर्ण आदर्शों के भी आदर्श हैं । |
| 277. |
संपूर्ण सद्गुणों की पराकाष्ठा के शिखर पर एक ही नाम मिलेगा – श्रीराम, श्रीराम और श्रीराम । |
| 278. |
धर्म की साक्षात साकार मूर्ति प्रभु श्री रामजी हैं । |
| 279. |
जीवन में केवल और केवल प्रभु का ही यश गाना चाहिए । |
| 280. |
प्रभु की कृपा से ही हम अपने विकारों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं । |
| 281. |
प्रभु कृपा करते-करते कभी भी थकते नहीं, प्रभु जीव पर सतत कृपा करते ही रहते हैं । यह प्रभु का स्वभाव है । |
| 282. |
सबसे बड़ा कलियुग का बल प्रभु का नामरूपी बल है । |
| 283. |
प्रभु के भरोसे ही जीवन को जीना चाहिए । |
| 284. |
मन को छूट दे दी जाए तो वह विषय भोग में ही जाना पसंद करता है । |
| 285. |
प्रभु श्री रामजी के नाम की व्याख्या एक संत ने की है कि जो सब में रमे हैं वे ही श्रीराम हैं । |
| 286. |
संसार में सहारा नहीं खोजना चाहिए, केवल प्रभु का सहारा ही जीवन में लेना चाहिए । |
| 287. |
प्रभु जैसा सर्वसामर्थ्यवान और दयालु जगत में दूसरा कोई भी नहीं है । |
| 288. |
प्रभु के स्वभाव की सबसे सुंदर बात यह है कि प्रभु हमारे अवगुण नहीं देखते, नहीं तो आज तक किसी पर भी प्रभु की कृपा ही नहीं होती । |
| 289. |
प्रभु को प्रेमाधीन कहा गया है यानी प्रभु अपने भक्त के प्रेम के आधीन रहते हैं । |
| 290. |
हमारी कपट भरी प्रार्थना होती है इसलिए प्रभु तक नहीं पहुँच पाती, कपट रहित प्रार्थना कभी भी प्रभु द्वारा अनसुनी नहीं की जाती । |
| 291. |
भक्ति से आध्यात्मिक ज्ञान जागृत हो जाता है । |
| 292. |
वे बहुत भाग्यवान होते हैं जिनके मुँह से सदैव प्रभु का नाम निकलता ही रहता है । |
| 293. |
प्रभु से एकाकी प्रेम करना चाहिए यानी केवल एक प्रभु से ही प्रेम होना चाहिए । |
| 294. |
जीवन की धन्यता इसी में है कि इस जीवन को प्रभु सेवा में लगा दिया जाए । |
| 295. |
संतों ने श्वास और नाम को एकरूप कर लिया यानी प्रत्येक श्वास में वे प्रभु का नाम जपते हैं । |
| 296. |
जो श्वास बिना प्रभु नाम के ली गई वह व्यर्थ गई । |
| 297. |
प्रभु के सभी नाम हमें तारने में परम समर्थ हैं । |
| 298. |
नाम जप हमें मन से बलवान बनाता है । |
| 299. |
एक अबोध बालक को दूध पीने की चिंता नहीं होती क्योंकि वह चिंता उसकी माँ को होती है । ऐसे ही शरणागत होने पर प्रभु को ही हमारी सभी चिंताएं होती है । |
| 300. |
भजन मार्ग गुप्त मार्ग होना चाहिए । भजन मार्ग को जितना गुप्त रखेंगे उतनी उसमें सफलता मिलेगी । |
| 301. |
एक क्षण के लिए भी जीवन में प्रभु का विस्मरण नहीं होने देना चाहिए । |
| 302. |
भक्त प्रभु से एकाकी प्रेम करते हैं । एकाकी का अर्थ है केवल एक प्रभु से ही प्रेम करना । |
| 303. |
आंसुओं से प्रभु का अभिषेक करके, मन से प्रभु का चिंतन करना चाहिए । |
| 304. |
भगवत् प्राप्ति की भावना जीवन में बनाकर रखनी चाहिए । |
| 305. |
श्रीजी श्रीराधा नाम के आगे जीवन की कोई बाधा टिक ही नहीं सकती । |
| 306. |
हमारी रुचि लोक रंजन में नहीं बल्कि अपने परलोक को सुधारने में होनी चाहिए । |
| 307. |
लंबे समय तक प्रभु नाम को विश्वास और श्रद्धा से लेने पर वह चमत्कार करता है । |
| 308. |
जग का सब कुछ छूटेगा, साथ जाएगा तो केवल प्रभु का लिया हुआ नाम ही साथ जाएगा । |
| 309. |
हमारे जीवन का लक्ष्य केवल भगवत् प्राप्ति ही होना चाहिए । |
| 310. |
जीवन में किया हुआ कोई भी अपराध हमें प्रभु के पास पहुँचने से रोक नहीं सकता । |
| 311. |
प्रभु का बल ही हमें संसार में भ्रष्ट होने से बचा सकता है । |
| 312. |
जीवन में सदैव भगवत् आश्रित बनकर ही रहना चाहिए । |
| 313. |
भरोसा जीवन में केवल और केवल प्रभु का ही होना चाहिए । |
| 314. |
जीवन में केवल प्रभु को ही अपना मानने से भगवत् प्राप्ति एक-न-एक दिन जरूर हो जाती है । |
| 315. |
प्रभु गिरे हुए जीव को भी उठाते हैं और अपनी गोद में स्थान देते हैं । |
| 316. |
नाम जप में हमारी बिगड़ी बनाने का असीम सामर्थ्य होता है । |
| 317. |
केवल प्रभु के भरोसे ही अपना जीवन जीना चाहिए । |
| 318. |
प्रभु अगर हमारा हाथ न पकड़े तो हम भवसागर में से कतई पार नहीं हो सकते । |
| 319. |
प्रभु का एक स्वरूप विश्वास है इसलिए प्रभु में पूर्ण विश्वास और श्रद्धा रखनी चाहिए । विश्वास पक्का कर लें तो प्रभु एक-न-एक दिन जरूर मिलेंगे । |
| 320. |
प्रभु के नाम में तारण शक्ति होती है यानी हमें तारने की शक्ति होती है । यह सभी संतों और भक्तों का अनुभव है । |
| 321. |
शरीर तो सबका जाना ही है पर वह प्रभु कार्य में लगकर गया या नहीं इससे उसका मूल्यांकन होता है । |
| 322. |
जीवन में महान लक्ष्य रखना सबसे जरूरी है और यह महान लक्ष्य प्रभु की प्राप्ति का लक्ष्य होता है । |
| 323. |
जीवन को एक सफर बनाना चाहिए श्री हरिनाम लेते हुए श्री हरिधाम जाने तक का । |
| 324. |
प्रभु के अधीन जिन्होंने अपना जीवन कर लिया उन्हें संभालने का कार्य स्वतः ही प्रभु का हो जाता है । |
| 325. |
भगवत् प्रेम सर्वोपरि होता है इसलिए इसे जीवन में सर्वोपरि स्थान देना चाहिए । |
| 326. |
श्री भरतलालजी की सबसे बड़ी कमाई प्रभु श्री रामजी का उन पर परिपूर्ण विश्वास होना है । प्रभु का विश्वास जीतना ही उनकी सबसे बड़ी धरोहर और जीवन की कमाई थी । |
| 327. |
किसी के अमंगल की कामना कभी भी नहीं करनी चाहिए चाहे वह हमारा कितना भी बड़ा विरोधी क्यों न हो क्योंकि ऐसा करने पर प्रभु को अच्छा नहीं लगता । |
| 328. |
अगर हमारे संभाले कुछ नहीं संभलता तो उसे संभालने का निवेदन प्रभु को कर दें । प्रभु ने जगत को संभाल रखा है तो हमारा कार्य भी संभाल लेंगे । |
| 329. |
दूसरे को दुःखी करके हम जीवन में कभी भी सुखी नहीं हो सकते क्योंकि प्रभु ने ऐसा ही विधान बनाया है । |
| 330. |
अध्यात्म से ही हम अपने जीवन में सुधार कर सकते हैं । |
| 331. |
एक संत कहते हैं कि प्रभु की शरण में आने पर प्रभु बिना हमारा लेखा-जोखा देखे हमें उत्तीर्ण कर देते हैं । |
| 332. |
भगवत् आश्रित होते ही प्रभु हमें पूरी तरह से संभाल लेते हैं और हमारा मंगल होना आरंभ हो जाता है । |
| 333. |
हम निर्बल हैं इसलिए जीवन में किसी बलवान का सहारा लेना पड़ता है । जगत में सबसे बलवान प्रभु ही हैं । |
| 334. |
प्रभु का नाम जपना नहीं छोड़ने पर प्रभु हमारी सभी बिगड़ी बना देते हैं । |
| 335. |
प्रभु का नाम लेने वाला जीवन में और जीवन के बाद भी पक्का जीत जाता है । |
| 336. |
प्रभु साक्षात्कार करना ही जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए । |
| 337. |
जब तक प्रभु का आश्रय नहीं लेते हमारे लिए शुभ भी अशुभ है और अशुभ तो अशुभ है ही । |
| 338. |
प्रभु की शरण में होने पर कोई भी अपशकुन हमारा अमंगल नहीं कर सकता । |
| 339. |
प्रभु के शरणागत भक्त का कोई अमंगल नहीं कर सकता क्योंकि प्रभु का रक्षा कवच सदा उसके साथ रहता है । |
| 340. |
हम डरते इसलिए है क्योंकि हमने प्रभु के महाबल का सहारा जीवन में अभी तक नहीं लिया है । |
| 341. |
प्रभु का रक्षा कवच सदैव भक्तों के साथ रहता है, ऐसा प्रभु ने स्वयं कहा है और ऐसा संतों और भक्तों ने अनुभव किया है । |
| 342. |
प्रभु का आश्रय लेने पर चिंता, भय और शोक कभी भी जीवन में नहीं रहेंगे । |
| 343. |
प्रभु का नाम जपना चाहिए और प्रभु के आश्रित होकर रहना चाहिए । |
| 344. |
प्रभु का नाम प्रभु की तरह अत्यंत बलशाली है । |
| 345. |
प्रभु का नाम जप हमारे जन्मों-जन्मों की बिगड़ी बना देता है । |
| 346. |
प्रभु ही अपने शरणागत के दुःखों का निवारण करते हैं । |
| 347. |
प्रभु का निरंतर स्मरण करने से संसार में कभी भी किसी से दुःख निवृत्ति की याचना नहीं करनी पड़ेगी । |
| 348. |
मनुष्य जीवन में जो राक्षसी भाव प्रवेश कर रहा है उसका अध्यात्म के बिना किसी भी तरह सुधार होना संभव नहीं है । |
| 349. |
किसी भी कर्म का कर्ता कभी नहीं बनना चाहिए, उस कर्म को प्रभु को अर्पण कर देना ही श्रेष्ठ होता है । |
| 350. |
कर्ता भाव खत्म करना है तो उस कर्म को प्रभु के श्रीकमलचरणों में तुरंत अर्पित कर देना चाहिए तभी हम उसके कर्मबंधन से बच पाएंगे । |
| 351. |
जो प्रभु की भक्ति करते हैं प्रभु कभी नहीं देखते कि पहले वह पापी था या पुण्यात्मा था । जैसे अग्नि विष्ठा और चंदन दोनों को जला देती है और भेदभाव नहीं करती वैसे ही प्रभु पापी या पुण्यात्मा दोनों में भेदभाव नहीं करते जो उनकी शरण में चला आता है । |
| 352. |
कभी भी शास्त्र विरुद्ध आचरण जीवन में नहीं करना चाहिए । |
| 353. |
हमें प्रभु के यंत्र बनकर ही रहना चाहिए यानी जैसे प्रभु चलाएं वैसे चलना चाहिए । |
| 354. |
प्रभु के द्वारा ही अपने जीवन को संचालित कराना चाहिए, इसी में हमारी जीत है । |
| 355. |
जिस रथ की बागडोर प्रभु के हाथ में सौंप दी जाती है वह रथ क्या कभी गलत जगह और गलत दिशा में जा सकता है ? |
| 356. |
हमारी बुद्धि की चतुराई प्रभु के आगे कभी भी काम नहीं करती । |
| 357. |
प्रभु करुणा के समुद्र हैं और सब पर करुणा बरसाते ही रहते हैं । |
| 358. |
जितनी आधुनिकता बढ़ रही है उतना ही हमारा दुर्भाग्य भी बढ़ता जा रहा है क्योंकि भोग विलास में उलझकर हम प्रभु से दूर होते जा रहे हैं । |
| 359. |
प्रभु के नाम जप में प्रीति होने में ही हमारा कल्याण निहित है । |
| 360. |
प्रभु की कृपा हमें सदैव जीवन में निर्भय कर देती है । |
| 361. |
प्रभु के सिवाय जगत में अपना कोई भी नहीं है, यह सच्ची मान्यता जीवन में रखनी चाहिए । |
| 362. |
हमारी प्रबल श्रद्धा केवल और केवल प्रभु में ही होनी चाहिए । |
| 363. |
पूर्ण समर्पण और निष्ठा से प्रभु की भक्ति करनी चाहिए । |
| 364. |
जब तक अपना कोई बल शेष रहेगा प्रभु नहीं आएंगे । जब सब बल हार जाएंगे और प्रभु को पुकारेंगे तो प्रभु तत्काल आएंगे । |
| 365. |
हमारी गलती यह होती है कि विपत्ति में हम हाथ-पैर मार कर बचना चाहते हैं । फिर हमें हारने पर प्रभु की याद आती है । शुरू में ही अगर प्रभु को याद कर लिया जाए तो हमारी दुर्गति कभी नहीं होगी । |
| 366. |
हमारा जीवन प्रभु के लिए है यह मानते ही जीवन सार्थक हो जाएगा । |
| 367. |
हमारे जीवन में दिव्यता प्रभु के नाम जप से आती है । |
| 368. |
भगवत् आश्रय लेने में जो भी बाधा पहुँचाता है उसका जीवन से तत्काल त्याग कर देना चाहिए । |
| 369. |
प्रभु के लिए प्रेम भाव जागृत हो गया तो ही हमें जीवन का सच्चा लाभ मिलेगा । |
| 370. |
हर क्रिया प्रभु को अर्पित करके करनी चाहिए तभी हम उसके कर्मबंधन से बच पाएंगे । |
| 371. |
भगवत् बल को प्रदान करने वाला प्रभु का नाम होता है । इसलिए सतत प्रभु का नाम जपते रहना चाहिए । |
| 372. |
प्रभु ही हमारा मंगल विधान करते हैं । प्रभु के अलावा हमारा मंगल करने वाला जगत में और कोई भी नहीं है । |
| 373. |
प्रभु जो भी हमारे लिए करते हैं सदैव सर्वश्रेष्ठ ही करते हैं । यह अलग बात है कि हम उस समय उसे समझ नहीं पाते । |
| 374. |
आचरण पवित्र रखकर प्रभु का नाम जप करें तो हमारा कल्याण सुनिश्चित हो जाएगा । |
| 375. |
जीवन में हमारा उद्देश्य भगवत् प्राप्ति का ही होना चाहिए । इसके अलावा कोई उद्देश्य रखने पर हमें जीवन में कोई विशेष लाभ मिलने वाला नहीं है । |
| 376. |
वास्तविक सुख तो सुख के सिंधु प्रभु के सानिध्य में ही मिल सकता है । |
| 377. |
धर्म के विपरीत काम करने से दुःख, अशांति, चिंता, रोग, भय और क्लेश जीवन में सदैव रहेगा । |
| 378. |
धर्म से चलने पर शांति, सुख और अभय जीवन में जरूर मिलेगा । |
| 379. |
जिनके पास प्रभु हैं उनके पक्ष की ही सदैव जय होती है । |
| 380. |
दुःख में भी प्रभु की कृपा देखें और प्रभु का सानिध्य मिल जाए तो वह दुःख भी हमारा मंगल करके ही जाएगा । |
| 381. |
जो कहीं नहीं हो सकता, कभी नहीं हो सकता, किसी से नहीं हो सकता वह केवल प्रभु ही कर सकते हैं । |
| 382. |
जो भक्ति जन्मों-जन्मों में नहीं की वह एक जन्म में कर लें तो सदैव के लिए हमारा उद्धार हो जाएगा । |
| 383. |
हमारे केवल प्रभु ही हैं इसलिए जो भी कार्य करें प्रभु के लिए, प्रभु की प्रसन्नता के लिए करें । |
| 384. |
भगवत् प्राप्ति हमारा भगवत् चिंतन ही करवा सकता है । |
| 385. |
आठों पहर चिंतन करें कि हम केवल प्रभु पर आश्रित हैं, हमारा पोषण प्रभु करते हैं और हमें केवल प्रभु के लिए ही अपना जीवन समर्पित करना चाहिए । |
| 386. |
हमारा जीवन केवल प्रभु के लिए ही होना चाहिए । |
| 387. |
प्रभु श्री रामजी को उनके नियम से और धर्म के पालन से कोई नहीं डिगा सकता । |
| 388. |
श्रीराम राज्य सर्वोच्च है । उसकी परिकल्पना करना भी संभव नहीं है । श्रीराम राज्य जैसा राज्य न आदिकाल में कभी हुआ, न आगे कभी भी होने की कतई संभावना है । |
| 389. |
श्रीराम राज्य की स्थापना प्रभु श्री रामजी ने की पर इसका शिलान्यास एक महान संत और भक्त श्री भरतलालजी ने स्थापना के चौदह वर्ष पूर्व ही कर दिया था । |
| 390. |
श्री भरतलालजी के लिए प्रभु श्री रामजी ही उनके पिता, गुरु और राजा सदैव से थे और सदैव रहे । यही उनकी जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी । |
| 391. |
प्रभु प्रेम से लबालब भरे आचरण को देखकर गुरु श्री वशिष्ठजी श्री भरतलालजी से कहते हैं कि कुछ लोग होते हैं जो अपना आचरण धर्म के अनुसार चलाते हैं पर श्री भरतलालजी जैसा बिरला कोई होता है जिनके आचरण को देखकर धर्मशास्त्र लिखे जाते हैं । |
| 392. |
जिस पर प्रभु अनुकूल हो गए तो उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु उससे मित्रवत व्यवहार करता है । |
| 393. |
भगवत् रस का परमानंद केवल मानव जीवन में ही प्राप्त हो सकता है । |
| 394. |
नवधा भक्ति का अंतिम लक्ष्य प्रभु को अपना आत्म-निवेदन है । प्रभु को अपना आत्म-निवेदन अंतिम उपलब्धि है । |
| 395. |
प्रभु अपने प्रिय भक्तों के अपराध नहीं गिनते क्योंकि वे वात्सल्य सिंधु हैं । |
| 396. |
प्रभु अपने भक्तों को परमानंद की प्राप्ति करवाना चाहते हैं । |
| 397. |
प्रभु से मिलने पर ही जीवन में परमानंद मिलेगा । |
| 398. |
मांगें तो प्रभु से प्रभु का प्रेम, प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय मांगें । ऐसा मांगने से हम निहाल हो जाएंगे । |
| 399. |
प्रभु का यश गाने की प्रधानता जीवन में रखनी चाहिए । |
| 400. |
प्रभु का यश प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही गाना चाहिए । |
| 401. |
परमानंद केवल प्रभु के यशगान से ही मिलता है । |
| 402. |
प्रभु से अलग जीवन में कोई अन्य इच्छा हो गई तो संत उसे कपट मानते हैं । |
| 403. |
प्रभु का यश गाने वाले को त्रिभुवन में कोई भी परास्त नहीं कर सकता । |
| 404. |
एकमात्र सुख प्रभु के सानिध्य में ही मिलता है । |
| 405. |
जीवन ऐसा व्यतीत करें कि प्रभु के पास जाएं तो हिसाब देने लायक रहें । |
| 406. |
बुद्धि पवित्र करने के लिए प्रभु का नाम जप बहुत बड़ा साधन है । |
| 407. |
प्रभु के नाम जप से ही कलियुग में प्रभु हमारे अनुभव में आएंगे । |
| 408. |
जैसा हमारा प्रभु के लिए भाव है प्रभु हमें वैसे ही लगते हैं । |
| 409. |
भक्तों के जीवन चरित्र का अनुसरण करने का प्रयास करना चाहिए । |
| 410. |
धन्य वे लोग होते हैं जिन्हें पक्का विश्वास होता है कि जो भाव वे प्रभु को अर्पण करते हैं, प्रभु उसे सहर्ष ग्रहण और स्वीकार करते हैं । |
| 411. |
जितना हमारा भाव जागृत होगा हमारे श्री ठाकुरजी के प्रभु विग्रह में उतनी देव-कला जागृत हो जाएगी । |
| 412. |
संसार में रहते भी संसार से अलिप्त रहना जैसे कमल जल के बीच में रहकर जल से अलिप्त रहता है । |
| 413. |
श्री भरतलालजी का जीवन को देखने का सर्वोच्च दृष्टिकोण था कि श्री अयोध्याजी, मैं और मेरा शरीर सब प्रभु श्री रामजी की संपत्ति है । न्यासी के रूप में वे केवल उनका संचालन कर रहे हैं । |
| 414. |
कभी भी जीवन में विष जैसी कठिनाई आ जाए तो देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी का स्मरण करना चाहिए । जो उनकी शरण में चला जाएगा उस विष जैसी कठिनाई से प्रभु श्री महादेवजी उसे बाहर निकाल देंगे । |
| 415. |
पतित-से-पतित जीव भी भक्ति से पावन हो जाता है । |
| 416. |
अपने पाप का पश्चाताप होना जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि होती है । |
| 417. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों की सेवा से बढ़कर सौभाग्य अन्य किसी प्रयोजन में हो ही नहीं सकता । |
| 418. |
प्रभु को खोजने की जरूरत नहीं, भजने की जरूरत है । |
| 419. |
प्रभु नाम जपने से वह सब संभव हो जाता है जो हम सोच भी नहीं सकते । |
| 420. |
प्रभु का आश्रय लेकर नाम जप करना मानव जीवन का सच्चा लाभ है । |
| 421. |
अहंकार की सत्ता जीवन से समाप्त होने पर ही प्रभु मिलते हैं । |
| 422. |
प्रभु की कृपा जब जीवन में साकार हो जाती है तो फिर परमानंद-ही-परमानंद का अनुभव हमें होता है । |
| 423. |
मन, क्रम और वचन से हमें जीवन में प्रभु का आश्रय ले लेना चाहिए । |
| 424. |
जीवन में भक्ति के पथ पर ही चलना चाहिए तभी जीवन सफल माना जाएगा । |
| 425. |
भक्ति की शक्ति, भक्ति की महिमा, भक्ति का वैभव, भक्ति का प्रभाव, भक्ति का प्रसाद और भक्ति का प्रताप सभी अद्वितीय होते हैं । |
| 426. |
प्रभु की तरफ देखते ही हाथ जुड़े रहे, हृदय प्रेम से भरा रहे और मस्तक झुका रहे । |
| 427. |
प्रभु ही एकमात्र हमारे रक्षक है, यह जीवन में दृढ़ विश्वास रखना चाहिए । |
| 428. |
मन जिस दिन प्रभु के श्रीकमलचरणों में लग जाएगा उस दिन हमारा नया जन्म हुआ, ऐसा मानना चाहिए । |
| 429. |
जब साधक का सच्चा प्रयास होगा और वह अपने साधन में हारने लगेगा तो प्रभु उसी समय उसे संभाल लेंगे । |
| 430. |
प्रभु नाम में पाप नाशक शक्ति है और आनंद प्रदान करने की शक्ति है । |
| 431. |
प्रभु के सभी नाम समान फल देने वाले और समान सामर्थ्य वाले हैं । |
| 432. |
प्रभु जब कृपा करते हैं तो हमारे समस्त पापों का दहन करके ही रुकते हैं । |
| 433. |
देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी ऐसे हैं जो अपात्र और कुपात्र पर भी कृपा करने से नहीं चूकते । |
| 434. |
प्रभु का चिंतन करने से प्रभु के सद्गुणों का अंश हमारे भीतर उतर आता है । |
| 435. |
प्रभु की कृपा से हमारे सभी संचित पाप भस्म हो जाते हैं । |
| 436. |
प्रभु को जीवन में रखेंगे तो हर समय मंगल-ही-मंगल होगा । |
| 437. |
सच्ची माने तो जगत में केवल प्रभु ही अपने हैं । |
| 438. |
लोक लोकान्तर में जीव भटकता आया है, विश्राम तो केवल प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही मिलेगा । |
| 439. |
भगवत् धर्म का पालन करने वाला ही महात्मा कहलाता है । |
| 440. |
जीवन के किसी भी महाभय की परिस्थिति से रक्षा केवल और केवल प्रभु ही कर सकते हैं । |
| 441. |
कैसी भी परिस्थिति हो अगर हमने प्रभु का सानिध्य स्वीकार किया है तो हम हर परिस्थिति में प्रसन्न रह सकते हैं । |
| 442. |
प्रभु के संकल्प मात्र से ही हमारा मंगल हो जाता है । |
| 443. |
प्रभु का सहारा नहीं तो जीवन की विपरीत परिस्थिति हम कभी सह नहीं सकेंगे । |
| 444. |
प्रभु की आशा और प्रभु का भरोसा जीवन में नहीं है तो हमारे अमंगल से कोई हमें नहीं बचा सकता । |
| 445. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों से जब तक संबंध नहीं होगा हमें सपने में भी विश्राम नहीं मिल सकता । |
| 446. |
संसार के प्रवाह में बहते हुए हमें सहारा एकमात्र प्रभु ही दे सकते हैं । |
| 447. |
हर क्षण प्रभु में विश्वास प्रबल होता चला जाना चाहिए । |
| 448. |
किसी भी क्षेत्र में हमें अपार सामर्थ्यशाली केवल प्रभु ही बनाते हैं । |
| 449. |
प्रभु का आश्रय लिए बिना हमारा उद्धार संभव ही नहीं है । |
| 450. |
आदिकाल से अब तक ब्रह्मांड में आज तक ऐसा कोई नहीं हुआ जिसने कहा हो कि उसने प्रभु का आश्रय लिया हो और उसके जीवन में अमंगल हो गया । |
| 451. |
एक बार श्री काशीजी के घाट पर नाव से जा रहे संत श्री रामकृष्णजी परमहंस ने देखा कि एक व्यक्ति को मरणावस्था में प्रभु श्री शिवजी उसके कान में श्रीराम नाम का जप कर रहे हैं । |
| 452. |
काशी नगरी श्री शिवजी की नगरी है फिर भी प्रभु श्री शिवजी श्रीराम नाम का उच्चारण करके ही जीव को वहाँ मुक्ति देते हैं । प्रभु श्री शिवजी की इतनी भक्ति प्रभु श्री रामजी के लिए है । |
| 453. |
भारतवर्ष में ऐसे घर हैं जहाँ पिता श्री शिवजी की उपासना करता है, बड़ा बेटा श्री गणपतिजी की उपासना करता है, छोटा बेटा श्री हनुमानजी की उपासना करता है और बहू भगवती दुर्गा माता की पूजा करती है । यह भारतवर्ष का गौरव है । |
| 454. |
संसार के किसी धर्म में यह संभव नहीं कि इतनी देवी-देवताओं की उपासना हो सके । सनातन धर्म ही इतना विशाल है कि प्रभु को हर रूप में स्वीकार करता है । |
| 455. |
श्री वेदों का मर्म कुछ विदेशी भक्तों ने जाना और उन्होंने इसे सबसे बड़ा धन माना । वे हिंदू समाज को कहते हैं कि इस परम धन को संभालो, श्री वेदजी की रक्षा हेतु गंभीर हो और जागो । |
| 456. |
हम श्री नाग देवता की, भगवती गंगा माता की, भगवती तुलसी माता की पूजा करते हैं और प्रभु को नाग के रूप में, नदी के रूप में और वनस्पति के रूप में देखते हैं । यह भारतीय मान्यता सनातन धर्म की कितनी बड़ी ऊँचाई है, कितनी सुंदरता है कि प्रभु को हर रूप में, हर वेश में, भिन्न-भिन्न प्रकार से मान्य किया गया है । |
| 457. |
इतना ऊँचा सिद्धांत तो केवल भारत ही देता है कि प्रभु को हर रूप में मान्य करता है । यह विशालता केवल भारतवर्ष में ही है । |
| 458. |
स्वामी श्री विवेकानंदजी को जब उनके विदेशी अनुयायी पूछते थे कि हम आपके लिए क्या करें तो स्वामीजी एक ही बात कहते थे कि मेरे भारत से प्रेम करो । |
| 459. |
परमार्थ की शक्ति का दिव्य स्तंभ भारतवर्ष है । यह देश सिर्फ एक मिट्टी का टुकड़ा या एक देश नहीं है बल्कि परमार्थ का विश्व का सबसे बड़ा और मुख्य स्तंभ है । |
| 460. |
कन्याकुमारी में एक मंदिर है जहाँ भगवती माता पार्वती के एक श्रीकमलचरण का विग्रह है । यह बताने के लिए कि माता ने एक श्रीकमलचरण पर खड़े होकर प्रभु श्री शिवजी की प्राप्ति हेतु यहाँ तप किया था । |
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यह सिद्धांत है कि श्रीशिव-श्रीशक्ति का कभी वियोग नहीं होता, वियोग की श्रीलीला होती है । भगवती सती माता के रूप में वियोग की श्रीलीला हुई तो भगवती पार्वती माता के रूप में फिर संयोग की श्रीलीला भी करनी पड़ी । |
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भिन्न-भिन्न तत्वों से अपनी बुद्धि से सत्य ग्रहण किया और उन तत्वों को पता ही नहीं चला कि हमसे कोई सीख ले रहा है । पर सीखने वाले प्रभु श्री दत्तात्रेयजी इतने जिज्ञासु कि सीख ले ली । अपनी बुद्धि को ऐसा जागृत करें कि जहाँ जाएं वहाँ से सीख कर आए । हमारा प्रामाणिक प्रयास होना चाहिए जीवन में कोई भी हमें ज्ञान अर्जन से रोक नहीं सके । |
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शास्त्र कहते हैं कि बहुत पढ़ने पर भी योग्य निर्णय की क्षमता तब तक नहीं आएगी जब तक हमने किसी बुजुर्ग से उनका तजुर्बा नहीं सीखा । |
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जिसने जीवन में अधर्म को आधार बनाया उसे धर्म की दुहाई देकर बचने का कोई अधिकार नहीं है । श्रीकर्ण ने जब रथ के पहिए फंसने पर धर्म की दुहाई दी तो प्रभु ने श्री अर्जुनजी से कहा कि इसे मारो क्योंकि अधर्मी को धर्म की दुहाई देने का कोई भी हक नहीं है । |
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समस्त जगत के पदार्थों को देखकर मैं उनसे क्या-क्या सीख सकता हूँ, यह हमारा दृष्टिकोण होना चाहिए । |
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हम सिखाने वाले शिक्षक के पास बैठकर भी उतना नहीं सीख पाते जितना प्रभु दत्तात्रेयजी ने हर चीज को देखकर स्वतः ही सीख लिया । |
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यदि साधक को साधना करनी है तो कंचन, कामिनी और कीर्ति के स्पर्श से बचना पड़ेगा । |
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प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने एक जंगली हाथी से सीखा कि स्पर्श द्वारा उसे फंसते हुए देखा और फिर बोझा ढ़ोते हुए देखा । एक महावत के अंकुश पर एक गजराज को नियंत्रित होते हुए देखा । ऐसा बलवान हाथी जो राजा था, नौकर कैसे बन गया ? एक गर्जन से पूरे वन को हिला देने की क्षमता वाला हाथी था । वन में एक गड्ढा बना उसे पत्ते से ढक दिया गया । एक हथिनी, जो पहले से ही शिक्षित थी, उसे वन में घूमने के लिए छोड़ दिया । हाथी ने उस हथिनी के स्पर्श के मोह में पीछा किया । हथिनी उसे गड्ढे के पास लाई और खुद बचकर निकल गई और हाथी उस गड्ढे में गिर गया । हाथी को फिर भूखा रखा गया, फिर दुर्बल हुआ, निर्बल हुआ, बलहीन हुआ, उत्साहहीन हुआ और अंत में वह अंकुश के वश में आकर हरदम के लिए गुलाम बन गया । |
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इतना बड़ा गजराज फंस गया हथिनी के आसक्त होकर । उसके स्पर्श हेतु दौड़ा और क्षणिक स्पर्श के सुख के कारण अपना पूरा जीवन परतंत्र बना लिया । प्रभु श्री दत्तात्रेयजी कहते हैं कि ऐसे ही मनुष्य भी स्वतंत्र था पर कामिनी के मोह के कारण पूरा जीवन परिवार का बोझ ढ़ोने में बिता दिया । इसलिए जिसे आध्यात्मिक उन्नति करनी है उसे संन्यास को स्वीकार करना चाहिए जिससे कामिनी से बचा जा सके । संत श्री एकनाथजी महाराज कहते हैं कि लकड़ी से बनी हुई स्त्री का भी आकर्षण होता है और वह हमारी चंचलता को बढ़ा देती है । |
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कामिनी के आकर्षण के कारण देवताओं का भी पतन हो जाता है । श्री अहिल्याजी के कारण देवराज श्री इंद्रजी का पतन हुआ । दो असुर भाई थे जो इतना प्रेम करते थे कि एक शरीर और दो प्राण थे । उन्होंने तप किया और अमर होने के लिए वरदान मांगा । प्रभु श्री ब्रह्मा जी से कहा कि अन्य के मारे हम नहीं मरें पर अगर हम एक दूसरे को मारेंगे तो हम मर सकते हैं । उनमें इतना अपार प्रेम था इसलिए उन्होंने सोचा कि हम कभी भी एक दूसरे को मार ही नहीं सकते और हम हमेशा के लिए अमर हो जाएंगे । प्रभु श्री नारायणजी ने श्री ब्रह्माजी से कहा कि अमर के अलावा आप कुछ भी दे दो क्योंकि अन्य सबकी युक्ति प्रभु के पास है । प्रभु ने सुंदर स्त्री का निर्माण किया और उसे देखकर दोनों असुर भाई आपस में झगड़ लिए, वे इतने मोहित हो गए कि आपस का प्रेम भुला दिया और गदा युद्ध करने लगे स्त्री को प्राप्त करने के लिए और दोनों मर गए । स्त्री के मोह के कारण दोनों मारे गए । |
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प्राणी का प्राण अन्नगत होता है, अन्न के अधीन होता है, अन्न नहीं मिले तो प्राणहीन हो जाता है, बुद्धि कमजोर हो जाती है और हम उदासीन हो जाते हैं । |
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किसी को नष्ट करने के लिए सदैव अस्त्र की जरूरत नहीं पड़ती । उस व्यक्ति की दुर्बलता क्या है उस पर प्रहार करना चाहिए, ऐसा श्री महाभारतजी में उपदेश देते हुए प्रभु कहते हैं । |
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प्रभु के बारे में श्रवण, प्रभु नाम का कीर्तन और प्रभु का चिंतन-मनन भक्ति के सबसे उपयोगी साधन हैं । |
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मूलतः प्रभु के बारे में रोजाना श्रवण करना आरंभ करने से परम लाभ होता है, ऐसा सभी संतों का अनुभव है । |
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जो संसार की बातें करते हैं वे प्रभु को कैसे प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि उनके जीवन में प्रभु चर्चा है ही नहीं । |
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भगवत् चर्चा करने का निमित्त खोजना चाहिए, कोई भी भगवत् प्रेमी मिले उसके साथ भगवत् चर्चा करनी चाहिए । |
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गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु श्री रामजी पत्नी वियोग में विलाप के भी आदर्श हैं । प्रभु की यह श्रीलीला देखकर फिर गोस्वामीजी कहते हैं कि भक्तों को अपने अंतःकरण को पुष्ट करने हेतु अपने जीवन में वैराग्य धारण करना चाहिए । |
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प्रभु श्री दत्तात्रेयजी कहते हैं कि रूपासक्ति के कारण पतिंगा जलकर मर जाता है और स्पर्श आसक्ति के कारण हाथी फंस जाता है । |
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प्रभु श्री दत्तात्रेयजी कहते हैं कि मधुमक्खी शहद का छत्ता बनाती है, मधु को इकट्ठा करके उसे छत्ते में भरती है, संग्रह करती है । पर न तो खुद खाती है, न किसी को खाने देती है । छत्ते के पास भिनभिनाती रहती है उसकी रक्षा हेतु । शहद इकट्ठा करने वाला आता है, आग जलाता है, मधुमक्खी उसमें जल जाती है और शहद इकट्ठा करने वाला शहद लेकर चला जाता है । |
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न कमाने वाले गृहस्थ की प्रशंसा हमारे शास्त्रों में कहीं भी नहीं है । |
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जिसको सांसारिक प्रपंच करना है उस गृहस्थ को धन कमाना ही पड़ेगा, अन्य कोई विकल्प नहीं है । |
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धन व्यय करते समय बहुत संयम भी होना चाहिए, शास्त्र ऐसी शिक्षा देते हैं । |
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गृहस्थ है पर धन कमाने की कोई योजना नहीं, कितना व्यय करना है, कितना बचाना है इसकी योजना नहीं तो सब बेकार है । |
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संतों की वाणी को अपने विवेक से ग्रहण करना चाहिए कि किस काल में, किस लिए, किस संदर्भ में कहा गया है यह सोचकर विवेक से ग्रहण करना चाहिए । संत वाक्य को गलत तरह से अपनी सुविधा अनुसार पकड़ लिया, तो यह गलत हो जाता है । |
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धर्म, अर्थ और काम की सबसे सुंदर व्याख्या श्री महाभारतजी में मिलेगी । |
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धन का हेतु क्या है, उपयोग क्या है, धन स्वयं में परिपूर्ण नहीं है पर उसे सत्कर्म में लगाने से वह परिपूर्ण हो जाता है । |
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धन का मूल्य कई जगह शून्य भी होता है । उदाहरण स्वरूप कोई सागर में फंस गया और रोटी नहीं है और लाखों रुपए हैं तो क्या लाख रुपए हम खा सकते हैं, नहीं । धन यहाँ पर कोई काम नहीं आया । |
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धन का उपयोग अपने शरीर और परिवार के लिए के लिए भोग में उपयोग आने के लिए है और दूसरा उपयोग दान में काम आने के लिए है । पर कंजूस आदमी मधुमक्खी की तरह धन इकट्ठा करता है, भोग और दान नहीं करता और मधुमक्खी की तरह ही मर जाता है । खाली इकट्ठा करने में ही जीवन गया और उपयोग भी नहीं किया । |
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मनुष्य के जीवन में भोग और प्रमाद का भी स्थान होना चाहिए, ऐसा श्री महाभारतजी में उल्लेख है । |
| 490. |
ज्यादा संपत्ति होना हमारे स्वयं के लिए बहुत खतरा होता है । धन की रक्षा के लिए बहुत उपाय करने पड़ते हैं । |
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प्रभु श्री दत्तात्रेयजी कहते हैं कि धन कमाना भी चाहिए उसका उपभोग भी करना चाहिए यानी धन का मौज भी लेना आना चाहिए और दान भी करना चाहिए । कमाई, भोग और दान तीनों का संयुक्त उपक्रम होना चाहिए । |
| 492. |
साधक को इंद्रियों को उत्तेजित करने वाले गीत-संगीत से बचना चाहिए क्योंकि यह वेग से हमारा पतन करवा देता है और गलत भावना जागृत कर देता है । जैसे कीर्तन हमारा उत्थान करता है, सात्विक भावना जाग्रत करता है वैसे ही भद्दे गाने तामस भावना को जागृत करते हैं और हमारा पतन करवाते हैं । |
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चौबीस गुरुओं का ज्ञान साधक हेतु खतरे की घंटी है कि उसे कहाँ-कहाँ और किस-किस परिस्थिति में किस-किससे बचना है । |
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दो भाषा संसार के सभी प्राणी समझते हैं - एक प्रेम की भाषा और एक संगीत की भाषा । |
| 495. |
हमारे उत्थान हेतु संकीर्तन में संगीत का उपयोग इसलिए होता है क्योंकि संगीत की भाषा सब समझते हैं । |
| 496. |
इंटरनेट के जरिए मोबाइल पर देखा गलत दृश्य तत्काल हमारा आध्यात्मिक पतन करवा देता है । |
| 497. |
श्रवण के बाद उसका मनन करना परम आवश्यक है । श्रवण करके मनन करने वाला जहाँ पहुँच जाता है वहाँ केवल जीवनभर श्रवण करने वाला नहीं पहुँच पाता । |
| 498. |
भक्ति करना और भक्ति तीव्रता यानी वेग से करना इन दोनों में दिन-रात जैसा अंतर है । |
| 499. |
प्रभु श्री महादेवजी की उपासना की सुलभता अदभुत है । प्रभु श्री महादेवजी मात्र जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं । |
| 500. |
प्रभु की भक्ति में तल्लीन होना सबसे जरूरी है । |
| 501. |
स्वामी श्री विवेकानंदजी एक बहुत अच्छे गायक थे । बहुत सारे वाद्य बजाना जानते थे पर उन्होंने अपने संगीत का अपनी आध्यात्मिक उन्नति हेतु ही उपयोग किया । |
| 502. |
स्वामी श्री विवेकानंदजी बहुत सुंदर भजन गाते थे इसी कारण उनके गुरु संत श्री रामकृष्णजी परमहंस से उनकी मुलाकात हुई । संत श्री रामकृष्णजी परमहंस भजन सुनने के लिए हरदम इच्छुक रहते थे । |
| 503. |
भजन वह काम कर देता है जो ज्ञान भी नहीं कर पाता । |
| 504. |
संत गुलाबरावजी कहते थे कि प्रभु के लिए ध्यान से भी प्रभु के लिए गान का स्थान बहुत ऊँचा है । |
| 505. |
मृग को पकड़ना बहुत कठिन है क्योंकि वह इतना चंचल और उसका वेग भी बहुत होता है । उसे गोली से मारना आसान है पर जिंदा पकड़ना बहुत कठिन है । पर मृग को पकड़ने हेतु उसकी संगीत सुनने की कमजोरी से उसका वेग रुक जाता है और पैर थम जाते हैं । संगीत के लालच में मृग फंस जाता है । |
| 506. |
प्रभु श्री रामजी के जन्म के पूर्व ऋषि श्री वशिष्ठजी ने राजा श्री दशरथजी से कहा कि एक ऋषि को बुलाकर पुत्रकामेष्टि यज्ञ करना चाहिए । मंत्र उच्चारण एक साधारण व्यक्ति करें तो उसका परिणाम थोड़ा होता है पर एक सिद्ध महात्मा के कंठ से, जिसने खूब नाम जप किया हुआ है, उसका प्रभाव बहुत अधिक होता है । |
| 507. |
शास्त्र कहते हैं कि पर-स्त्री को देखने से आँखें जल जाना बेहतर है और पर-धन के अन्न खाने से जिह्वा जल जानी बेहतर है । |
| 508. |
प्रभु श्री हनुमानजी का एक मंदिर है जिसकी स्थापना विचित्र रूप से हुई । एक राजा के राज्य में कई वर्षों से वर्षा नहीं हुई । राजा ने राज्य के ब्राह्मणों को जप करने में लगाया और शर्त रखी कि जब तक वर्षा नहीं होगी निरंतर जप करते रहे । सभी ब्राह्मण तीन वर्षों तक जप करते-करते हार-थक गए और दुःखी हो गए । स्वामी समर्थ रामदासजी वहाँ से गुजरे, उन्हें ब्राह्मणों ने अपनी वेदना बताई । स्वामी समर्थ रामदासजी ने जप शुरू किया और कुछ घंटे में बादल घिर आए और वर्षा हुई । वहाँ के एक पत्थर ने प्रभु श्री हनुमानजी का रूप ले लिया और प्रभु विग्रह बन गया । |
| 509. |
प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने नदी के तट पर एक दृश्य देखा कि मछली पकड़ने के लिए मछुआरे आए । एक लकड़ी में लगी हुई रस्सी थी जिसमें कांटा लगा हुआ था और उसमें खाने का पदार्थ लगाकर उन्होंने नदी में फेंक दिया । मछली स्वाद के लालच में उस पदार्थ को खाने आई और कांटे में फंसकर मर गई । बाद में मछुआरे ने कांटा दूसरी मछली के लिए डाला । दूसरी मछली देख रही थी कि पिछली मछली फंसकर मर गई फिर भी वह सावधान नहीं हुई और स्वाद के लालच में वे भी मरती गई । |
| 510. |
जिह्वा पर कोई नियंत्रण नहीं यही कारण होता है मछली के मरने का । प्रभु दर्शन हेतु साधन करना है तो प्रभु श्री दत्तात्रेयजी कहते हैं कि मनुष्य को अपनी जिह्वा पर नियंत्रण करना चाहिए । जिह्वा की स्वाद इच्छा ही हमारा पतन करवाती है । अन्य सभी इंद्रियों को जीतने वाला भी अपनी जिह्वा को जीत नहीं पाता और जितेंद्रिय नहीं बन पाता । जितेंद्रिय वही है जो अंत में अपनी जिह्वा स्वाद को जीत लेता है । |
| 511. |
मनुष्य जिह्वा के अधीन होने के कारण इंद्रियों के स्वाद के कारण गलत पोषण पाकर क्षीण हो जाता है और तिल-तिल कर मरता है । मनुष्य जितना अन्न पदार्थ रोज खाता है उसका आधा भी खाए तो उसका स्वास्थ्य ठीक रहेगा । हम जो आधा अन्न खाते हैं उससे हमारा गुजारा होता है पर जो आधा अन्न ज्यादा खाते हैं उसके बाद दवाइयों से हमारा गुजारा होता है । कितनी ही बीमारियां ज्यादा भोजन करने के कारण पैदा होती है । |
| 512. |
क्या, कैसे और कितना खाना चाहिए यह सीख लिया तो हमें जीवन में वैद्य की जरूरत नहीं पड़ेगी । |
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हम बीमार होते हैं तो डॉक्टर को फीस देते हैं । पुराने जमाने में घरेलू वैद्यजी को बिना बीमारी के इलाज के दीपावली और होली पर खर्चा दिया जाता था । अपनी सलाह से आरोग्य रखने के लिए उन्हें पारिश्रमिक मिलता था । |
| 514. |
हम स्वस्थ रहें इसके लिए वैद्यजी घर आकर परामर्श देते थे । इस कारण हमें पूरे वर्ष में स्वास्थ्य के लिए ऋतु अनुसार परामर्श मिलता था । ऐसी परंपरा भारत में रही है । |
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हम अन्न को खाते हैं, आधा अन्न तो ठीक है पर ज्यादा अन्न खाते हैं तो अन्न हमें खा जाता है । पाचन हेतु हमारे प्राण शक्ति का व्यय करवाता है । |
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प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने मिथिला में पिंगला नाम की एक वेश्या को देखा जो रात्रि में दरवाजे पर खड़े होकर ग्राहक की प्रतीक्षा करती है । उसे ग्राहक नहीं मिलने पर मध्य रात्रि में उसे कल्याणकारी विचार आता है और वैराग्य निर्माण होता है और वह सोचती है और एक गीत गाती है । प्रभु श्री दत्तात्रेयजी कहते हैं कि जीवन में आशा के कारण ही लोग दुःखी होते हैं । मनुष्य को जीवन में अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए । किसी से भी अपेक्षा रखने से वह हमें लाचार बनाती है । केवल आशा और अपेक्षा के कारण बिना कारण हम संसार से अच्छा व्यवहार करते हैं और संसार को अच्छा समय देना पड़ता है । किसी से अपेक्षा नहीं रखें तो हम जीवन में दुःखी नहीं रहेंगे । |
| 517. |
बेटे-बहू का बूढ़े माँ-बाप की सेवा करना उनका कर्तव्य है पर बेटे-बहू से सेवा लेना माँ-बाप का अधिकार नहीं है, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 518. |
शास्त्र कहते हैं कि बुढ़ापे में लोगों को अपने घर में अतिथि के रूप में रहना चाहिए । कोई आकांक्षा नहीं अतिथि की तरह और कोई व्यवधान नहीं अतिथि की तरह । |
| 519. |
हम अपने बच्चों के पालक होते हैं पर उनके मालिक नहीं होते । |
| 520. |
हमने आशा रखी इसलिए ही अंत में दुःखी होना पड़ता है । |
| 521. |
हमने नहीं चाहा और बेटे-बहू ने सेवा की तो अच्छा लगेगा पर हमने चाहा और बेटे-बहू ने सेवा नहीं की तो हम दुःखी होंगे क्योंकि हमने आशा रखी । |
| 522. |
दुःख आता ही आशा और अपेक्षा के कारण है । अगर आशा और अपेक्षा नहीं तो सुख-ही-सुख जीवन में है । |
| 523. |
दुःख के दो कारण होते हैं । पहला, हमारा अहंकार और दूसरा, हमारी आकांक्षा यानी आशा । |
| 524. |
लोगों से जितनी अपेक्षा रखेंगे उतना दुःखी होंगे और जितनी अपेक्षा नहीं रखेंगे उतना सुखी होंगे । |
| 525. |
बहू-बेटे सेवा करने हेतु तरसते हैं, सेवा करना चाहते हैं और माँ-बाप सेवा लेना नहीं चाहते - यही जीवन की सच्ची मौज है । |
| 526. |
न कोई सामाजिक काम शेष रहे, न कोई भी व्यावहारिक काम शेष रहे, जीवन में शेष रहे तो केवल परमात्मा - ऐसी प्रार्थना प्रभु से रोज करनी चाहिए । |
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परमार्थ रहित जीवन आसुरी जीवन होता है । |
| 528. |
पवित्र बुद्धि मन को अपने शासन में ले लेती है । |
| 529. |
जब तक प्रभु का आश्रय नहीं, भजन नहीं, सत्संग नहीं, शास्त्र स्वाध्याय नहीं, तब तक बुद्धि भ्रष्ट होने की पूरी संभावना होती है । |
| 530. |
जैसे पानी को कहीं भी छोड़े वह नीचे की तरफ ही जाएगा, वैसे ही हमारा मन और बुद्धि भी विषयों की तरफ ही जाती है । |
| 531. |
हमारा अगला जन्म ही न हो, यह अंतिम जन्म हो, इस मानव जीवन में हमारा इस दिशा में प्रयास होना चाहिए । |
| 532. |
अनंत माताओं से भी ज्यादा दुलार प्रभु एक क्षण में हमें देते हैं । |
| 533. |
प्राण छूटने के समय प्रभु नाम का उच्चारण हमारी मुक्ति का कारण बन जाता है । |
| 534. |
हमारा मन विषयों के बीच रहते हुए भी विषयों से प्रभावित नहीं हो, ऐसा केवल भक्ति से ही संभव है । |
| 535. |
संसार का विस्मरण हो जाए, यही सच्ची भक्ति है । केवल प्रभु का ही स्मरण रहे । |
| 536. |
बुद्धि को भजन में लगा दें तो ही उसे सच्चा विश्राम मिलेगा । |
| 537. |
संसारी को भोजन की भूख लगती है पर संतों को नाम जप की भूख लगती है, इन दोनों भूख में कितना बड़ा अंतर है । |
| 538. |
संतों ने पाया है कि प्रभु ने आज तक किसी का भरोसा कभी भी नहीं तोड़ा है । |
| 539. |
अगर प्रभु पर भरोसा है तो प्रभु किसी भी रूप में आकर हमें विपत्ति से निकाल लेंगे पर प्रभु उस भरोसे को कभी टूटने नहीं देंगे । |
| 540. |
धन में प्रधान बुद्धि होते ही धन का मद हमारे सिर पर चढ़ जाता है । |
| 541. |
जीवन में प्रधानता केवल प्रभु की ही होनी चाहिए । |
| 542. |
प्रभु बड़े कृपालु हैं जो भी करते हैं हमारा मंगल विधान ही करते हैं । गलती हमेशा हमसे ही होती है और प्रभु तो हमेशा उसका सुधार ही करते हैं । |
| 543. |
जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी चाहकर भी अंधकार नहीं कर सकते, वे तो प्रकाश ही करेंगे वैसे ही प्रभु कभी किसी का चाहकर भी अमंगल नहीं कर सकते, वे तो सदैव सबका मंगल-ही-मंगल करेंगे । |
| 544. |
जिसके जीवन में प्रभु का आश्रय हो गया उसका मंगल जीवन में होकर ही रहेगा । |
| 545. |
हमें मनुष्य शरीर मिला है यह प्रभु की असीम कृपा माननी चाहिए । |
| 546. |
हर चीज का अस्तित्व केवल प्रभु से ही है । |
| 547. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम करना सब विघ्नों का नाश करने का श्रेष्ठ उपाय है । |
| 548. |
प्रभु के नाम जप से मन निर्मल होता है और सात्विक विचार मन में आते हैं । |
| 549. |
संत वही है जो निरंतर भगवत् भाव रखते हुए भजन करता है फिर उसकी वेशभूषा कुछ भी हो सकती है, वह संत ही है । |
| 550. |
नाम जप से प्रभु का सच्चा परिचय हमें मिलता है । |
| 551. |
प्रभु को बुद्धि से नहीं बल्कि अनुभव से जाना जा सकता है । |
| 552. |
प्रभु का नाम जप हमें लाभ दिए बिना रह ही नहीं सकता । |
| 553. |
निष्कामता से ही भगवत् प्राप्ति होती है । |
| 554. |
जैसे-जैसे भक्ति करेंगे और प्रभु आश्रित होंगे हम निष्काम होते चले जाएंगे । |
| 555. |
जीते हुए मन से बड़ा मित्र कोई नहीं और हारे हुए मन से बड़ा शत्रु कोई नहीं । |
| 556. |
जिसने काम को जीवन से मिटा दिया वही श्रीराम को पा सकता है । काम के रहते श्रीराम कभी नहीं मिलते । |
| 557. |
मन और इंद्रियां हमें गुलाम बना कर रखते हैं पर भक्ति करने पर मन और इंद्रियां हमारे अधीन हो जाते हैं । |
| 558. |
मन हमारे द्वारा ही संसार का रस पिलाने पर हमसे ही पुष्ट हो रहा है । मन की गलत बात नहीं मानने से वह हमारे अधीन होता है । |
| 559. |
बुद्धि सभी में होती है पर विवेक सत्संग से ही मिलता है । |
| 560. |
प्रभु ही हमें संसाररूपी युद्ध में जिता सकते हैं । |
| 561. |
विषय का चिंतन, विषय के सेवन से भी ज्यादा घातक है क्योंकि विषयों के चिंतन से मन दूषित होता है । |
| 562. |
प्रभु की शरणागति के बिना जीव माया के जाल से नहीं बच सकता । प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में ऐसा कहा है । |
| 563. |
प्रभु जीव पर कृपा करने के लिए निमित्त खोजते रहते हैं । |
| 564. |
भगवत् भक्ति में कल्याण-ही-कल्याण छिपा हुआ है । |
| 565. |
प्रभु अर्पित जीवन ही हमें जीना चाहिए । |
| 566. |
प्रभु ऐसे सखा हैं जो कभी भी हमारा साथ नहीं छोड़ते । |
| 567. |
हमें बच्चों को आध्यात्मिक बल से युक्त करना चाहिए । |
| 568. |
संसार में रहकर ऐसे कर्म करें कि परलोक में भी हमारा मंगल हो । |
| 569. |
मन तब तक अशांत रहेगा जब तक प्रभु से नहीं जुड़ेगा । मन में आनंद तभी आएगा जब हम अपने मन को प्रभु से जोड़ेंगे । |
| 570. |
प्रभु का आश्रय नहीं हो तो निराशा-ही-निराशा जीवन में मिलेगी । |
| 571. |
हमारे धर्म के मार्ग पर चलने का हिसाब प्रभु ऐसे देते हैं कि हम निहाल हो जाते हैं । |
| 572. |
प्रभु हमारे लिए क्या नहीं कर सकते, सब कुछ कर सकते हैं । |
| 573. |
जिनको हमने जीवनभर अपना समझा वे कोई भी अंत में हमारे काम आने वाले नहीं हैं । |
| 574. |
प्रभु का नाम जप अविनाशी है, कभी नष्ट होने वाला नहीं है । पुण्य नष्ट होने वाले हैं । |
| 575. |
प्रभु की कथा भक्ति के बीज को अंकुरित करने का श्रेष्ठतम साधन है । |
| 576. |
भगवत् कृपा जीवन में सब कुछ करने में सक्षम होती है । |
| 577. |
हमारी प्रभु की शरणागति पुष्ट हो जाए तो हमारा मृत्यु लोक में आना-जाना बंद हो जाएगा । |
| 578. |
शास्त्रों में कामना को ही मल माना गया है इसलिए हमें जीवन में कामना रहित होना चाहिए । |
| 579. |
प्रभु का दास बन प्रभु की सेवा कर हमें प्रभु के समक्ष भक्ति के द्वारा पहुँच जाना चाहिए । |
| 580. |
प्रभु को अपना मन, तन और प्राण समर्पित कर देना चाहिए । |
| 581. |
प्रभु की भक्ति हमें जीवन में पूर्ण रूप से निश्चिंत कर देती है । |
| 582. |
भगवत् भक्ति मार्ग का परम लक्ष्य प्रभु प्राप्ति ही है । |
| 583. |
प्रभु हमारी रक्षा भी करते हैं और साथ ही हमारा दुलार भी करते हैं । |
| 584. |
हमारा मन प्रभु की दासता में लगा रहना चाहिए । |
| 585. |
प्रभु की दासता में जीवन व्यतीत करने से बड़ा कोई सुख नहीं है । |
| 586. |
प्रभु का दासत्व जीवन में मिलना बड़ी दुर्लभ बात है । |
| 587. |
जब जगत से कोई आशा नहीं बचती तो फिर प्रभु का एकमात्र मार्ग जीवन में खुल जाता है । |
| 588. |
जब हम संसार में हाथ-पैर चलाना बंद कर देते हैं और शून्य बन जाते हैं तो प्रभु हमें तत्काल अपना लेते हैं । |
| 589. |
प्रभु के विस्मरण की गुंजाइश भी जीवन में नहीं रह जानी चाहिए तो यह प्रभु की सबसे बड़ी कृपा होती है । प्रभु का स्मरण लगातार होता रहे, यही प्रभु से चाहना चाहिए और मांगना चाहिए । |
| 590. |
केवल, केवल और केवल प्रभु के श्रीकमलचरणों का एकमात्र भरोसा जीवन में होना चाहिए । |
| 591. |
प्रभु का दासत्व पुष्ट हो जाना जीव का सबसे बड़ा सौभाग्य होता है । |
| 592. |
जब ऐसा लगने लगे कि अपने हाथ कुछ नहीं रहा तब ऐसा समझना चाहिए कि अब हजार हाथ वाले प्रभु ने हमें अपने श्रीहाथों में ले लिया है । |
| 593. |
बहुत ताकत है प्रभु के नाम जप में, नाम जप जो चाहे वह करने में सक्षम है । |
| 594. |
घोर दुराचारी को भी भगवत् प्राप्ति हो सकती है क्योंकि प्रभु इतने करुणामय हैं । |
| 595. |
प्रभु के दासों के पीछे प्रभु की अनंत शक्तियां उनकी सुरक्षा हेतु सदैव रहती है । |
| 596. |
केवल अध्यात्म ही सबका मंगल कर सकता है । |
| 597. |
मन और बुद्धि को प्रभु में स्थिर कर देना चाहिए । |
| 598. |
जब तक दीनता रहेगी माया प्रभाव नहीं करती है पर जब दीनता हटकर अहंकार आ जाता है तो माया जोरदार पटकनी मारती है । |
| 599. |
प्रभु से प्रचुर माया पाकर जब जीव प्रभु से दूर हो जाता है तो प्रभु उस जीव के जीवन से अंतर्ध्यान हो जाते हैं । |
| 600. |
शास्त्रों में प्रभु को जगत मंगल स्वरूप माना गया है । |
| 601. |
प्रभु को प्राप्त करने के लिए सबका समान अधिकार होता है । |
| 602. |
प्रभु के नाम में प्रभु की तरह अपार सामर्थ्य है । |
| 603. |
असंभव को भी संभव करना प्रभु का एक छोटा-सा खेल ही है । इस तथ्य पर जीवन में विश्वास होना चाहिए । |
| 604. |
जैसे पर्वत को चूर करने का सामर्थ्य केवल वज्र में है वैसे ही पाप को चूर करने की ताकत केवल प्रभु नाम में है । |
| 605. |
कलियुग में सभी साधनों का सार प्रभु का नाम जप है । |
| 606. |
बिना प्रभु नाम जप के उच्च स्थिति जीवन में कभी नहीं आ सकती । |
| 607. |
हर मनुष्य को इस नियम का पालन करना चाहिए कि प्रथम पूजा प्रभु श्री गणेशजी की हो क्योंकि सभी देवतागणों को उनकी पूजा तभी स्वीकार होगी जब प्रथम पूज्य प्रभु श्री गणेशजी की पूजा हो जाए अन्यथा कोई भी देव अपनी पूजा स्वीकार नहीं करते । |
| 608. |
श्री काशीजी की कितनी महिमा है कि शास्त्र कहते हैं कि श्री काशीजी में श्रीशिवलिंग है यह कहना गलत है क्योंकि श्री काशीजी स्वयं ही श्रीशिवलिंग स्वरूप है । |
| 609. |
प्रभु की इच्छा यह होती है कि जीव भक्ति करे ताकि उसका उद्धार और कल्याण संभव हो सके । |
| 610. |
प्रभु के निकट भाव देह जाती है जिसका निर्माण भक्ति से होता है । मनुष्य देह यहीं संसार में पंचभूतों में मिल जाती है । |
| 611. |
प्रभु की माया बहुत प्रबल है जो प्रभु का भी विस्मरण करवा देती है । |
| 612. |
सबसे पहले जीवन में पूर्ण श्रद्धा से प्रभु नाम का जप करना चाहिए । |
| 613. |
नाम जप के अभाव में ही कलियुग में हमारी दुर्गति होती रहती है । |
| 614. |
जीवन में एकाग्र होने के लिए एकमात्र लक्ष्य प्रभु ही होने चाहिए । |
| 615. |
प्रभु की कृपा की अनुभूति, प्रभु प्रेम और परमानंद हम भक्ति से पा सकते हैं । |
| 616. |
भक्त पर प्रभु की कृपा निरंतर बढ़ती ही रहती है । |
| 617. |
संसार के मूल में प्रभु की कृपा ही काम करती है । |
| 618. |
जितना अपनापन शरीर और संसार के संबंधों में है उसका अंश मात्र भी प्रभु से हो जाए तो जीवन में हमारा कल्याण सुनिश्चित हो जाता है । |
| 619. |
प्रभु की प्राप्ति हमारे द्वारा किए साधन से नहीं, केवल प्रभु की कृपा से ही होती है । |
| 620. |
हमारी कोई सत्ता ही नहीं है, यह भ्रम मात्र है क्योंकि संसार में सत्ता तो केवल और केवल प्रभु की ही है । |
| 621. |
सुई के छेद में जहाँ धागा जाना भी कठिन होता है वहाँ से प्रभु अनंत कोटि ब्रह्मांड को पार कर सकते हैं यानी जो संभव नहीं है उस असंभव को भी प्रभु संभव कर सकते हैं । |
| 622. |
भक्ति करने वाले के हाथ में परम पद रखा हुआ होता है, उसके लिए अलग से प्रयत्न करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती । |
| 623. |
प्रभु की कृपा जीवनभर प्रभु से मांगनी चाहिए । |
| 624. |
सत्कर्म को भगवत् अर्पित करने पर परम लाभ मिलता है । वैसे सत्कर्म हमें साधारण लाभ दे सकता है पर भगवत् अर्पित करने पर ही वह परम लाभ देता है । |
| 625. |
शरीर और संबंधों को अपना मानना अज्ञान है और केवल प्रभु को ही अपना मानना सच्चा ज्ञान है । |
| 626. |
भक्ति करने वाले से अधर्म नहीं होता क्योंकि जीवन के लक्ष्य में प्रभु होते हैं । वह जीव प्रभु की प्रेरणा से प्रभु को अर्पण करके ही कर्म करता है इसलिए उससे अधर्म नहीं होता । |
| 627. |
ऐसे महापुरुष कलियुग में भी हुए हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल में इतना नाम जप किया कि उनके रोम-रोम से प्रभु नाम निकलता था । |
| 628. |
अपने दास को प्रभु जगत में बहुत महान बना देते हैं । |
| 629. |
अंदर से प्रभु के शरणागत होते ही सभी बात बन जाती है । |
| 630. |
परमार्थ के साधन में भी अहंकार आ जाता है कि मैं दस वर्ष से फलाहारी हूँ । यह अहंकार नहीं आना चाहिए नहीं तो वह हमारे साधन का ह्रास कर देगा । |
| 631. |
अहंकार जीवन से तभी मिटेगा जब हम प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय ले लेंगे । |
| 632. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों की शरणागति लेने से भीतर के शत्रु यानी काम, क्रोध, मद, लोभ और अहंकार और बाहर के शत्रुओं से पूरी सुरक्षा मिल जाती है । |
| 633. |
नाम जापक का बाल भी बाँका न अंदर के शत्रु कर सकते हैं और न बाहर के शत्रु कर सकते हैं । यह पक्का सिद्धांत है क्योंकि प्रभु का नाम सदैव हमारी रक्षा करता है । |
| 634. |
भारतवर्ष सदैव से भगवत् धर्म से युक्त देश रहा है । |
| 635. |
पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति को पाकर मन शांति से युक्त नहीं होता बल्कि भय से युक्त होता है । शांति के लिए तो प्रभु की भक्ति ही करनी पड़ेगी । |
| 636. |
काल भी उस जीव को डरा नहीं सकता जिस पर प्रभु की अनुकंपा होती है । |
| 637. |
संसार में आकर मनुष्य जन्म को प्राप्त कर भक्ति करके हम प्रभु के धाम जाने की योग्यता प्राप्त कर सकते हैं । |
| 638. |
भगवत् नाम हमारी रक्षा करता है और सदैव करता रहेगा । |
| 639. |
अपनी प्रभु की शरणागति को जीवन में पुष्ट करते चलना चाहिए । |
| 640. |
शरीर की सुंदरता को जग प्रसिद्धि के लिए सुंदर और स्वस्थ रखें तो वह बंधनकारक होता है और उसी शरीर को प्रभु सेवा का यंत्र मानकर स्वस्थ और सुंदर रखें तो वह भक्ति हो जाती है । यह कितना सूक्ष्म फर्क है । |
| 641. |
मुक्त वही होता है जो प्रभु को प्राप्त कर लेता है । |
| 642. |
प्रभु नाम ही हमें प्रभु तक पहुँचा सकता है । |
| 643. |
उत्तम भक्त वही है जो अपनी गलती स्वीकार कर उसे जीवन में दोहराता नहीं क्योंकि जो परम न्यायाधीश प्रभु हैं, वे सर्वज्ञ हैं । |
| 644. |
हमारा संकल्प उदित होने से पहले ही प्रभु उसे जान लेते हैं । |
| 645. |
प्रभु के न्याय करने में कोई गलती या चूक कभी नहीं होती क्योंकि प्रभु सर्वज्ञ हैं, अंतर्यामी हैं और सर्वसामर्थ्यवान हैं । |
| 646. |
किया हुआ नाम जप कभी भी व्यर्थ नहीं जाता । |
| 647. |
अगर इस जन्म में भक्ति करके भगवत् प्राप्ति नहीं होती तो अनंत जन्म फिर से भटकना पड़ेगा और अनेक योनियों में फिर से जाना पड़ेगा । |
| 648. |
मनुष्य शरीर पाकर ऐसा भजन करें कि दोबारा कोई शरीर ही नहीं मिले और प्रभु के धाम में वास मिले । |
| 649. |
हमारी चित्त वृत्ति प्रभु के श्रीकमलचरणों में लग जाए तो ही हमारा कल्याण होगा । |
| 650. |
जहाँ प्रभु के धाम हमें जाना है वहाँ की पहचान और परिचय नाम जप से बन जाती है । |
| 651. |
हमारी बुद्धि सीमित है पर प्रभु जब हमारी बुद्धि को प्रेरणा देंगे तो वह बुद्धि चमक जाएगी । |
| 652. |
हम सबके हर कर्म के साक्षी प्रभु ही हैं । |
| 653. |
जीवन में हर समय प्रभु को साथ लेकर चलना चाहिए तभी हमें सफलता मिलेगी । |
| 654. |
जगत के सबसे बड़े न्यायाधीश प्रभु के न्याय से कोई भी, कभी भी और कैसे भी नहीं बच सकता । |
| 655. |
नाम जप से ही यह जीवन भी मंगलमय रहेगा और शरीर छूटने के बाद भी मंगल-ही-मंगल होगा । |
| 656. |
इस जन्म में सबसे जरूरी कार्य प्रभु को अपने प्रेम से रिझा लेना है । |
| 657. |
भक्त के सबसे बड़े बल सदैव प्रभु ही होते हैं । |
| 658. |
अथाह सामर्थ्य प्रभु की एक कृपा दृष्टि में है, ऐसा सभी संतों का अनुभव रहा है । |
| 659. |
प्रभु के नाम ने अनंतों को पवन किया है, कर रहा है और आगे भी करता रहेगा । |
| 660. |
प्रभु उपमा रहित हैं, किसी से प्रभु की उपमा नहीं दी जा सकती क्योंकि प्रभु के समान तो केवल प्रभु ही हैं । |
| 661. |
प्रभु की कृपा अनंत, असीम और अपार हैं । |
| 662. |
जैसे कोटि जुगनुओं से प्रभु श्री सूर्यनारायणजी की उपमा दें तो यह लघुता होगी और प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के लिए अवहेलना समान होगी । इसी तरह कोटि उपमाओं से भी प्रभु की मिसाल दें तो वह प्रभु की अवहेलना ही होगी । इसलिए श्री वेदजी भी नेति-नेति कहकर शांत हो जाते हैं । |
| 663. |
प्रभु के लिए हमेशा प्रेम का भाव उठाकर रखें, कभी भी प्रभु के लिए प्रेम भाव गिरे नहीं, प्रेम भाव में कमी न आए । |
| 664. |
भाव से शून्य पुकार कभी प्रभु तक नहीं पहुँचती । भावयुक्त पुकार प्रभु को हमारे उद्धार के लिए विवश कर देती है । |
| 665. |
ममता कहीं भी संसार में नहीं हो, केवल प्रभु के श्रीयुगलचरणों में ही हो । |
| 666. |
दुःख की निवृत्ति भगवत् प्राप्ति पर ही होती है । |
| 667. |
भगवत् प्राप्ति करने के लिए सबको समान अधिकार होता है । |
| 668. |
अभी हमारी बुद्धि हमारे सुख का निश्चय करने में लगी है । उसे प्रभु के सुख के निश्चय करने में लगाना ही भक्ति है । |
| 669. |
जितना हमारा मन मलिन होगा उतना हमें इंद्रियों के भोगों में सुख प्रतीत होगा । |
| 670. |
जब मन सत्संग से स्वच्छ हो जाएगा तो उसे ब्रह्मलोक के भोग भी विष के समान दिखेंगे । |
| 671. |
संसार में ममता और राग भगवत् प्राप्ति में बहुत बड़ा विघ्न है । |
| 672. |
प्रभु के लिए उत्कृष्ट भाव जीवन में आना भक्ति का ही फल होता है । |
| 673. |
इंद्रियों के चंगुल में फंसा जीव कभी भी सुख नहीं पा सकता, कभी उसे तृप्ति नहीं मिल सकती । |
| 674. |
भोगों को त्यागने से ही शांति मिलती है पर हमारी मति हमें कहती है कि भोगों को भोगने से शांति मिलती है, जो एकदम गलत है । |
| 675. |
भगवत् प्राप्ति के लिए इंद्रियों को वश में रखना चाहिए, यह अत्यंत जरूरी है । |
| 676. |
एक संत बताते थे कि प्रभु श्री ब्रह्माजी ने चारों युगों को बुलाया और कहा कि मैंने नर्क बनाया है वहाँ लोगों को भेजने की व्यवस्था रखना । सतयुग ने कहा कि कोई करोड़ों में एक ही जाएगा । त्रेता ने कहा कि मुझसे भी ज्यादा उम्मीद न रखें । द्वापर ने कहा मैं कोशिश करूँगा पर शायद मैं भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाऊँगा । तब कलियुग ने आगे बढ़कर कहा कि पितामह चिंता नहीं करें, जैसे बड़े भैया सतयुग ने कहा है कि कोई करोड़ों में एक ही जाएगा वैसे ही मैं वादा करता हूँ कि मेरे युग में कोई करोड़ों में एक ही परम पद या स्वर्ग जाएगा बाकि सभी नर्क में ही जाएंगे । नर्क भरा हुआ ही रहेगा, यह जिम्मा कलियुग ने लिया है । |
| 677. |
प्रभु के दास, भोगों के दास कभी नहीं हो सकते । |
| 678. |
हमारा रोम-रोम प्रभु के दासत्व से युक्त हो जाना चाहिए । |
| 679. |
प्रभु प्रेम के अधीन रहते हैं इसलिए प्रभु का एक नाम प्रेमाधीन है । |
| 680. |
सहज में प्रभु से प्रेम करें यानी बिना किसी निमित्त, कारण या स्वार्थ के प्रभु से प्रेम करें । |
| 681. |
अभी भक्ति शुरू कर दें तो जितनी आयु बची है उसमें निश्चित ही भगवत् प्राप्ति हो जाएगी । |
| 682. |
कोई कण या क्षण ऐसा नहीं है जहाँ प्रभु न हो । |
| 683. |
आश्रय धन का, बाहुबल का, बुद्धि का नहीं होकर केवल प्रभु का ही आश्रय जीवन में होना चाहिए । |
| 684. |
प्रभु के अलावा कोई भी जीवन में हमारा सदैव के लिए साथ नहीं दे सकता । |
| 685. |
प्रभु का आश्रय होते ही सब बात बन जाएगी पर वह आश्रय अंतिम चरण के श्री गजेंद्रजी जैसा या भगवती द्रौपदीजी जैसा आश्रय होना पड़ेगा । |
| 686. |
प्रभु का आश्रय लेने पर प्रभु तत्काल हमारी पूरी-की-पूरी जिम्मेदारी ले लेते हैं । |
| 687. |
जीव का महत्व प्रभु के कारण ही जगत में बढ़ता है । |
| 688. |
प्रभु को संतों ने करुणामूर्ति कहा है यानी करुणा के साक्षात स्वरूप प्रभु ही हैं । |
| 689. |
प्रभु "से" चाहना साधारण बात है, प्रभु "को" चाहना असाधारण और श्रेष्ठतम बात है । |
| 690. |
कामना रहित कर देना प्रभु का स्वभाव है । या तो विपरीत कामना को प्रभु क्षीण कर देते हैं या सात्विक कामना हो तो प्रभु उसे पूर्ण कर देते हैं । |
| 691. |
जीवन में हर वस्तु प्रभु को अर्पित करके ही ग्रहण करना चाहिए । |
| 692. |
जैसे-जैसे और कलियुग बढ़ेगा वह हमें भक्ति नहीं करने देगा । इसलिए कलियुग के इस पहले चरण में ही भक्ति करके अपना मंगल कर लेना चाहिए । |
| 693. |
कलियुग में अपवित्रता की धूम मचेगी, आगे आने वाला समय बड़ा भयावह होगा । |
| 694. |
संत कहते हैं कि सत्संग नहीं, भक्ति नहीं तो वह देह मृत देह के समान ही है । |
| 695. |
भक्ति करने के लिए ही शास्त्रों, ऋषियों और संतों ने उपदेश और आदेश दिया है क्योंकि यह जीव का परम कर्तव्य है । |
| 696. |
निर्मल मन होते ही उस मन में प्रभु प्रकाशित हो जाते हैं । |
| 697. |
संसार में हमारे बहुत सारे धर्म हैं पर परम धर्म तो केवल भगवत् प्राप्ति ही है । |
| 698. |
कोई सांसारिक लोक धर्म अगर हमें परम धर्म की प्राप्ति में बाधा पहुँचाता है तो उसे सांसारिक धर्म का तत्काल त्याग कर देना चाहिए । प्रभु श्रीमद् भगवद् गीताजी में यही कहते हैं कि सभी धर्मों का परित्याग करके एक मेरी शरण में आ जाओ । |
| 699. |
अपने प्रिय प्रभु के यश का गान सदैव ही जीवन में करते रहना चाहिए । |
| 700. |
अपने परम मंगल के लिए प्रभु के यश का गान करना चाहिए । |
| 701. |
सदगुरुदेव भगवत् मार्ग पुष्ट करने के लिए होते हैं । अगर वे भगवत् मार्ग से हमें विमुख करते हैं तो उनका त्याग कर देना चाहिए । |
| 702. |
शरणागत के शरीर और मन की रक्षा प्रभु सदा करते हैं । |
| 703. |
शरणागत कभी न समझे कि वह अकेला है, असमर्थ है क्योंकि प्रभु सदैव उसके साथ ही होते हैं । |
| 704. |
प्रभु भक्त से ऐसा कर्म करवाते हैं जिससे जगत का मंगल ही होता है । |
| 705. |
आज के समय में अपने मन को पवित्र रखना कठिन है पर अपवित्र करना बहुत सुलभ होता है । |
| 706. |
वाणी से हुए पाप शरीर से हुए पाप से भी बहुत ज्यादा होते हैं । |
| 707. |
हमारे जीवन का पोषण करने वाले केवल प्रभु ही होते हैं । |
| 708. |
हमारी स्मृति के केंद्र में प्रभु ही होने चाहिए । |
| 709. |
संसार की कामना हृदय में हो तो उसे मिटाना है, बढ़ाना नहीं है । शास्त्र ऐसा ही आदेश करते हैं । |
| 710. |
सुखी वही होता है जो प्रभु शरण में रहता है क्योंकि उसे कोई बाधा परास्त नहीं कर सकती । |
| 711. |
सर्व पाप नष्ट करने की क्षमता भगवत् चर्चा करने और सुनने में होती है । |
| 712. |
सबसे बड़ी हानि मनुष्य देह पाकर भक्ति नहीं करना है । |
| 713. |
प्रभु का प्रेम पाना ही प्रभु का सबसे बड़ा वैभव पाना है, ऐसा संत मानते हैं । |
| 714. |
प्रभु का निज जन बनकर ही जीवन में रहना चाहिए । |
| 715. |
प्रभु हमें प्रेम करें और प्रभु को प्रसन्न करने वाले सद्गुण हममें प्रभु कृपा से प्रकट हो जाए, ऐसा आशीर्वाद प्रभु से और संतों से मांगना चाहिए । |
| 716. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों में नित्य हमारा प्रेम बढ़ता ही रहना चाहिए । |
| 717. |
प्रभु के भरोसे ही जीवन में रहना श्रेष्ठ है । |
| 718. |
जहाँ धन की और भोगों की प्रधानता होगी वहाँ राक्षसी बुद्धि इस कलियुग में स्वतः ही आ जाएगी । |
| 719. |
प्रभु जब द्रवित होते हैं तो अहेतु की कृपा करते हुए हमें सत्संग और भक्ति के मार्ग पर आने की प्रेरणा देते हैं । |
| 720. |
त्रिभुवन की राजलक्ष्मी भी हमें प्रभु भक्ति के परमानंद के आगे फीकी लगने लगती है । |
| 721. |
भक्तों की पवित्र कीर्ति का विस्तार प्रभु करते हैं । ऐसा करके प्रभु को बहुत सुख मिलता है । |
| 722. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों की सेवा से बड़ा कोई परमानंद और यश नहीं हो सकता । |
| 723. |
भक्तों को प्रभु और माता के यशगान में स्वयं के जीवन को डुबो देना चाहिए । |
| 724. |
कौन-सा ऐसा परम लाभ है जो प्रभु की कृपा से नहीं मिल सकता ? |
| 725. |
इस जन्म को प्रभु की प्राप्ति के लिए समर्पित करना चाहिए । जितनी भी सांसे बची है उन्हें प्रभु प्राप्ति में ही लगाना चाहिए । |
| 726. |
प्रभु कृपा कर दें तो क्या नहीं हो सकता । |
| 727. |
भक्ति का हमें निर्मल करने का और प्रभु प्रेम प्रदान करने का स्वभाव है । |
| 728. |
प्रभु के नाम जप में बहुत बड़ा सामर्थ्य होता है । |
| 729. |
एक बार भक्ति में लग जाएं फिर देखें जीवन में कैसा चमत्कार होता है । |
| 730. |
एक पारस मणि अशुद्ध, अपवित्र और जंग लगे हुए लोहे को प्रभु का स्वर्ण आभूषण बनने योग्य बना सकती है तो भक्ति एक पतित, दुराचारी, विकार युक्त को पवित्र कर प्रभु तक पहुँचा सकती है । |
| 731. |
क्या है परमानंद, क्या है प्रभु प्रेम रस - उसका आनंद लेने का संकल्प करें और भक्ति करके उसको पूर्ण करें । |
| 732. |
भक्ति में कोई चूक होती है तो प्रभु उस भक्त को संभालते हैं । |
| 733. |
माया भी प्रभु के भक्त से डरती है कि यह प्रभु का दास है इसलिए हमसे इसका कोई अपराध न बन जाए । |
| 734. |
एक धोबी अपने गधे पर कपड़े लादकर नदी पर पहुँचा । कपड़ा धोने जाने लगा तो याद आया कि गधे को बांधने की रस्सी लाना भूल गया । उसने सिर्फ दिखावे के लिए गधे को रोजाना की तरह बांधा । गधा वहीं खड़ा रहा जैसा बंधा हुआ है । जाने के समय भी वह गधा हिला नहीं । तब धोबी को याद आया कि उसे दिखावे के लिए रस्सी खोलनी पड़ेगी । उसने ऐसा किया तो गधा चल पड़ा । हम भी संसार की खूँटी से ऐसे ही दिखावे की तरह बंधे हुए हैं । हम सत्यता में बंधे नहीं हैं पर हमें भान है कि हम संसार में बंधे हुए हैं, ठीक उस गधे की तरह । माया ने हमें धोबी की तरह दिखावे में इस संसार से बांध रखा है । |
| 735. |
सच्चे भक्त मोक्ष की जगह भक्ति स्वीकार करते हैं । |
| 736. |
भक्ति करने से जन्म-मृत्यु का चक्र अनायास ही खत्म हो जाता है । |
| 737. |
भक्ति मणि है इसलिए चाहे माया की कितनी भी हवा चले वह दीपक नहीं है जो बुझ जाएगी । वह स्वयंप्रकाश मणि है जो कितनी भी माया की हवा से बुझने वाली नहीं है । |
| 738. |
वर्तमान को भजन करके सुधार लें तो भूतकाल और भविष्यकाल दोनों स्वतः ही सुधर जाएंगे । |
| 739. |
जीवन का सच्चा लाभ भगवत् प्राप्ति में ही है । |
| 740. |
प्रभु मंगलभवन और अमंगलहारी हैं । संत कहते हैं कि प्रभु की भक्ति करने पर प्रभु पूर्व के अमंगल नष्ट कर देते हैं और आगे मंगल-ही-मंगल कर देते हैं । |
| 741. |
प्रभु का शासन सबसे ऊपर और सबके ऊपर है । |
| 742. |
सुख स्वरूप प्रभु को भूलकर हम अपने मन, बुद्धि और इंद्रियों से संसार में सुख खोजते हैं जो वहाँ है ही नहीं । संसार के विषयों में कभी भी सुख नहीं है । |
| 743. |
प्रभु का नाम भी प्रभु स्वरूप ही है । प्रभु का हर सामर्थ्य प्रभु के नाम में भी है । |
| 744. |
जहाँ कामनाएं हैं वहाँ शांति रह ही नहीं सकती । |
| 745. |
भगवत् विस्मरण होते ही संसार के विषय पतन की तरफ हमें घसीट लेते हैं । |
| 746. |
भक्त के चित्त की वृत्ति हर समय प्रभु की तरफ ही जाती है । |
| 747. |
प्रभु प्रतिपल हमें संभाल रहे हैं, हमारी रक्षा कर रहे हैं । |
| 748. |
जो सुख भक्ति में है वह किसी अन्य साधन के फल में नहीं है, यहाँ तक कि मोक्ष का भी सुख भक्ति के आगे फीका लगता है । |
| 749. |
प्रभु में हमारी अदभुत निष्ठा होनी चाहिए । |
| 750. |
प्रभु के श्रीकमलचरण जिनके ध्यान में आने लगते हैं, वे जीव भवसागर से पार हो जाते हैं । |
| 751. |
अपने प्राणों से भी करोड़ों गुना ज्यादा प्रेम हमें प्रभु से करना चाहिए । |
| 752. |
जिस हृदय में जितनी दीनता होगी प्रभु प्रेम उतना ज्यादा प्रकाशित होगा, यह सिद्धांत है । |
| 753. |
भगवत् प्रेम नित्य प्रतिदिन जीवन में बढ़ते ही रहना चाहिए । |
| 754. |
जीवन में भक्ति से बढ़कर कोई वरदान नहीं, भक्ति से बढ़कर कोई लाभ नहीं । |
| 755. |
ज्ञान, तपस्या या अन्य साधनों से प्रभु किसी के अधीन हुए हो इसका एक भी प्रमाण नहीं मिलेगा पर भक्ति से प्रभु भक्त के अधीन हो जाते हैं, यह प्रभु स्वयं कहते हैं । |
| 756. |
भक्ति परम आनंद प्रदान करने वाला साधन है । |
| 757. |
ज्ञान, वैराग्य सब भक्ति से सुदृढ़ हो जाते हैं, उनके लिए अलग से प्रयास करने की आवश्यकता नहीं पड़ती । |
| 758. |
जीवन की शुरुआत में ही हमारा समाधान हो जाना चाहिए कि जीवन का परम लाभ भक्ति में ही है । |
| 759. |
प्रभु की माया इतनी प्रबल है कि ज्ञानी और तपस्वी के चित्त का हरण कर लेती है । माया अगर डरती है तो भक्ति से क्योंकि भक्त पर प्रभु की कृपा होती है इसलिए माया अपना प्रभाव भक्त पर नहीं डालती । |
| 760. |
एक भी हमारी वृत्ति भगवत् विमुख हुई तो वह हमें गिरा सकती है, इसलिए निरंतर भक्ति करते रहने को कहा गया है । |
| 761. |
किसी भी भक्त में उसका बल नहीं बल्कि प्रभु का बल काम करने लगता है जो हर परिस्थिति में उसकी सबसे रक्षा करता है । |
| 762. |
भक्ति में प्रभु का भरोसा और बल होता है जबकि अन्य साधनों में उस साधन का बल होता है जो गौण साबित होता है । |
| 763. |
जिस हृदय में भक्ति होती है माया उस हृदय का आकर्षण नहीं करती । |
| 764. |
प्रभु की भक्ति प्रभु को बहुत प्यारी लगती है । भक्ति को भक्त के भीतर देखकर प्रभु सबसे ज्यादा आनंदित होते हैं । |
| 765. |
जिसके हृदय में प्रभु भक्ति होती है प्रभु उस जीव पर विशेष अनुकूल रहते हैं । |
| 766. |
प्रभु की माया भक्ति माता की दासी है और प्रभु विमुख को ही दंड देती है पर भक्त की तरफ माया देखती भी नहीं है । |
| 767. |
प्रभु का नाम जप जीव को महात्मा बना देता है । नाम जप का इतना बड़ा सामर्थ्य कलियुग में है । |
| 768. |
कलियुग में भक्ति का सबसे बड़ा साधन नाम जप ही है । |
| 769. |
संत कहते हैं कि धन में सुख, शांति नहीं है बल्कि भजन में ही सच्चा सुख और शांति है । |
| 770. |
जब भक्ति में प्रभु भक्त से प्रसन्न होते हैं तो लोक परलोक के सब सुख भक्त का वरण कर लेते हैं । |
| 771. |
संसार के भोग भोगकर कभी शांति और तृप्ति नहीं मिल सकती, यह शास्त्रों का एकमत सिद्धांत है । |
| 772. |
भगवत् विमुख चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो वह अशांत ही रहेगा और भगवत् सम्मुख चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो वह परम शांति में ही मिलेगा । |
| 773. |
प्रभु का नाम जप हमारा जगत में भी मंगल करता है और जगत छूटने पर भी परम मंगल ही करता है । |
| 774. |
भक्ति का परिणाम कभी भी उल्टा नहीं हो सकता । |
| 775. |
भक्ति जब एक बार होती है तो जीवन में बढ़ती ही चली जाती है । |
| 776. |
प्रभु किसी की भी बिगड़ी हुई बुद्धि को सुधार सकते हैं । |
| 777. |
भक्ति का मार्ग विश्वास का मार्ग है, विश्वास रखकर भक्ति करने पर पूर्ण फल मिलता है । |
| 778. |
मानव जीवन ऐसे जिएं कि प्रभु के घर जाने पर आदर मिले तभी मानव जीवन की पूर्णता है । |
| 779. |
भक्ति का उत्साह और उमंग जीवन में कभी कम नहीं होने देना चाहिए । |
| 780. |
भक्ति करने वाला त्रिभुवन में परम धन्य हो जाता है । |
| 781. |
किसी भी इंद्रिय को धर्म विरुद्ध विषयों का सेवन नहीं करने देना चाहिए । |
| 782. |
संसारी विषय और भोगों के लिए रोते हैं पर भक्त प्रभु के लिए प्रेम में रोते हैं, यह कितना बड़ा फर्क है । |
| 783. |
केवल प्रभु से ही अपनापन होना चाहिए । |
| 784. |
भक्तों का हृदय प्रभु प्रेम में रम जाता है । |
| 785. |
भक्ति में प्रभु पर श्रद्धा और विश्वास पूरा होना चाहिए । |
| 786. |
प्रभु से मिलन की बात केवल सोचने से ही हृदय पवित्र होने लग जाता है । |
| 787. |
संसार हमारे शरीर, धन, प्रतिष्ठा, वैभव को प्यार करता है । प्रभु केवल हमसे ही प्रेम करते हैं । |
| 788. |
संसार को देखकर हमारी दुर्गति हो गई है । अब तो केवल प्रभु की तरफ ही देखना चाहिए । |
| 789. |
माया हमें पीसती रहती है जब तक हम प्रभु की शरण में नहीं चले जाते । |
| 790. |
सभी वृत्ति प्रभुमय हो गई तो वह जीव धन्यों में भी परम धन्य हो जाता है । |
| 791. |
ऐसा कब होगा जब हमारे अश्रु केवल और केवल प्रभु के लिए ही निकलेंगे । |
| 792. |
जो सत्संग में सुना उसका मनन करना चाहिए । |
| 793. |
अगर मनुष्य जन्म प्राप्त करके प्रभु का भजन नहीं किया तो सब कुछ व्यर्थ गया । |
| 794. |
प्रभु के पास देने के लिए सबसे कीमती चीज भक्ति ही है । |
| 795. |
सत्संग प्रभु ने ही दिया होता है । यह प्रभु की सबसे बड़ी कृपा होती है । |
| 796. |
जैसे पारस मणि को फेंक दें और चमकते कांच को उठा लें वैसे ही मनुष्य देह से संसार भोगना कांच उठाना है और भक्ति करना पारस मणि लेना है । |
| 797. |
असंतोष सबसे बड़ा संसार का दुःख है । |
| 798. |
प्रभु की जगह धन को ही सर्वस्व मान लेना सबसे बड़ी मूर्खता है । |
| 799. |
दीन हृदय के भक्तों को प्रभु सबसे पहले गले लगाते हैं । |
| 800. |
भाग्य से ज्यादा कर्मों पर और कर्मों से भी बहुत ज्यादा प्रभु पर भरोसा होना चाहिए । |