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BHAKTI VICHAR CHAPTER NO. 30

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. एक संत ने एक भाव दिया है कि डोरी है प्रभु का नाम और पतंग हैं प्रभु । नाम की डोर हमारे हाथ में होगी तो प्रभु दूर नहीं हैं । नाम की डोरी तानते-तानते प्रभु की प्राप्ति संभव है जैसे पतंग की डोरी तानने पर पतंग हमारे हाथ में आ जाती है ।
002. प्रभु का नाम हमारे जीवन में उन्नति की बाधा को दूर कर देता है ।
003. कोई भी विघ्न नाम जप के सामने टिक नहीं सकता ।
004. प्रभु की प्रसन्नता ही हमारा कर्तव्य और धर्म होना चाहिए ।
005. प्रभु के श्रीकमलचरणों में नित्य प्रतिदिन हमारा अनुराग बढ़ते ही रहना चाहिए ।
006. सबसे बड़ा भक्ति का सूत्र है कि हम एकमात्र प्रभु के हैं और एकमात्र प्रभु ही हमारे हैं ।
007. माया प्रभु का विस्मरण कराती है और भक्ति प्रभु का स्मरण कराती है । यह कितना बड़ा फर्क है ।
008. संसार के भोग भोगना और प्रभु को प्राप्त करना एक साथ कभी भी संभव नहीं हो सकता ।
009. भक्त को प्रभु का सामर्थ्य का ही भरोसा जीवन में होता है ।
010. सत्संग की धारा में बहता-बहता जीव प्रभु के सन्मुख आ जाता है ।
011. प्रभु का नाम वह परम धन है जो कभी भी नष्ट नहीं होता ।
012. प्रभु का नाम कभी हमें संसार के दुःख में फंसने नहीं देता ।
013. संसार के सुख में भक्त दोष दर्शन करता है तभी उसकी भोग लालसा नहीं बढ़ती ।
014. अपनी बुद्धि में प्रभु की भक्ति का महत्व को जीवन में सदा के लिए बढ़ा लेना चाहिए ।
015. प्रभु की भक्ति का दान प्रभु से हमें मांगना चाहिए ।
016. प्रभु के यहाँ हमारी हाजिरी लगने पर अनंत जन्मों की हमारी बिगड़ी तत्काल ही बन जाती है ।
017. प्रभु और माता जीव पर कृपा करने के लिए अति उत्सुक होते हैं । वे कृपा करने के लिए निमित्त खोजते रहते हैं । वे कृपा करने के लिए अवसर तलाशते रहते हैं ।
018. माता बहुत क्षमाशील हैं । यह माता का सहज स्वभाव ही है ।
019. किसी-न-किसी बहाने प्रभु और माता जीव का उद्धार करना चाहते हैं ।
020. श्री अर्जुनजी को प्रभु कहते हैं कि तुम अपना मन मुझमें लगाओ और तुम्हारे सभी कार्य करने की जिम्मेदारी मैं (प्रभु) उठाता हूँ ।
021. जीवन में अनुकूलता प्रभु कृपा से ही प्राप्त होती है ।
022. प्रभु कृपा प्राप्त करने के लिए आवश्यक होता है हमारा भजन और भक्ति युक्त साधन ।
023. भक्ति के बल पर जब प्रभु अनुकूल हो जाते हैं तो हमारे जीवन के सभी असंभव भी संभव हो जाते हैं ।
024. एक बात हृदय से स्वीकार कर लें कि मैं केवल और केवल प्रभु का ही हूँ और किसी का नहीं हूँ ।
025. हम अध्यात्म के प्रायः सभी सिद्धांतों को जानते हैं पर मानते नहीं तभी हमारा कल्याण नहीं होता । सुनकर और पढ़कर हमने जान तो लिया पर मन से माना नहीं ।
026. प्रभु की कृपा की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए बल्कि जीवन में कृपा की प्रतीक्षा करनी चाहिए ।
027. जगत के ममत्व को दूर करना पड़ेगा और वह ममत्व प्रभु के लिए होना पड़ेगा तभी हमारा कल्याण होगा ।
028. अपना साथ और कौन देगा, शरीर तक साथ छोड़ देगा । इसलिए शरीर और शरीर संबंधियों से मोह नहीं रखना चाहिए ।
029. माता की कृपा के बिना प्रभु की शरणागति नहीं हो सकती । माता की ही करुणामय वार्ता सुनकर प्रभु जीव को शरण में लेते हैं ।
030. भगवान जहाँ भी विराजते हैं भक्ति के कारण ही विराजते हैं ।
031. संत कहते हैं कि प्रभु और माता की अनियंत्रित दया और कृपा होती है यानी कृपा पर कोई नियंत्रण नहीं है और दया पर कोई नियंत्रण नहीं है । इसलिए ही वे असीम कृपा और असीम दया करने वाले हैं ।
032. हमारा हाथ माला को लेकर भज रहा है पर हमारा मन प्रभु का नाम नहीं भज रहा । गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्रीविनय पत्रिका में कहते हैं कि “श्री रामचंद्र कृपालु भज मन” । वे मन को प्रभु को भजने का आग्रह करते हैं जो परम सत्य है और सच्चा लाभ देने वाला है ।
033. हमारा मन हीरा फेंककर कांच उठा रहा है यानी प्रभु को छोड़कर संसार के भोगों में लिप्त हो रहा है ।
034. खाते समय, निद्रा के समय और उपयोगी बोलने के अलावा हर समय मानसिक नाम जप होते रहना चाहिए ।
035. प्रभु का नाम भवसागर पार करने के लिए कलियुग का सबसे उपयुक्त साधन है ।
036. नौका नाम है और हमारे सद्गुण उस नौका पर चित्रकारी समान है । चित्रकारी नौका पर अच्छी लगती है परंतु चित्रकारी से भवसागर पार नहीं कर सकते यानी सद्गुणों से भवसागर पार नहीं किया जा सकता । भवसागर पार करने के लिए प्रभु नाम रूपी नौका ही चाहिए ।
037. हम धन, पुत्र, पौत्र, घर और व्यापार का भरोसा करते हैं कि वे जरूरत पर काम आएंगे पर प्रभु नाम का भरोसा नहीं करते, जो नितांत आवश्यक है । भरोसा करने लायक तो केवल और केवल प्रभु का नाम ही है ।
038. प्रेम होता है हितैषी से, प्रभु को सबसे बड़ा हितैषी मानना चाहिए तो सच्चा प्रेम केवल प्रभु से हो जाएगा ।
039. सबसे बड़ा करने योग्य कार्य प्रभु का नाम जप है । गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु नाम जप सबसे बड़ा कार्य है और प्रभु नाम को बिसारना सबसे बड़ी भूल है ।
040. अगर प्रभु का नाम जप नहीं तो जीवन में तीनों तापों से जलना ही पड़ेगा ।
041. मानसिक जप, मानसिक प्रभु का चिंतन, मानसिक प्रभु की सेवा का बहुत बड़ा महत्व है ।
042. जीव की गति वह होती है जहाँ उसकी मति होती है । इसलिए अपनी मति को सदैव प्रभु से जोड़कर रखनी चाहिए ।
043. जैसे नदी के पास रहकर कोई प्यासा मर जाए या कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर कोई दरिद्र रह जाए वैसे ही मानव जन्म पाकर जो भगवत् प्राप्ति नहीं करता उसके जीवन में किया उसका पूरा श्रम ही व्यर्थ चला जाता है ।
044. शांति की इच्छा नहीं करें बल्कि अपनी इच्छा को शांत करें ।
045. प्रभु नाम को बिसार कर कोई भी किया हुआ पुण्य हमारा परम मंगल नहीं करेगा ।
046. सत्संग के लिए कभी हीन भावना नहीं रखनी चाहिए ।
047. जैसे मछली जल का त्याग करते ही मर जाएगी वैसे ही कलियुगी जीव अगर प्रभु नाम का त्याग कर देंगे तो उनकी अधोगति होगी ।
048. हमें अनन्य संबंध प्रभु से ही मानना पड़ेगा और यह भाव जीवन में प्रगाढ़ करना पड़ेगा ।
049. प्रभु ही हमारे कल्याणकर्ता और भयहर्ता हैं ।
050. असहाय जीव का सच्चा मित्र केवल प्रभु का नाम ही होता है ।
051. प्रभु का नाम अभागे जीव के लिए उसका अनुकूल भाग्य बन जाता है ।
052. जिसने प्रभु के नाम का आश्रय नहीं लिया वह कलियुग में भक्ति मार्ग पर सफल नहीं हो पाएगा ।
053. हमारे असली माता-पिता प्रभु का नाम ही है । ऐसा गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने श्रीविनय पत्रिका में कहा है ।
054. परिवार, धन, प्रतिष्ठा घर की छत के समान है जो खंभे पर टिकी होती है । गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि वह खंभा प्रभु का नाम है । अगर जीवन में नाम जप नहीं है तो हमारा जीवन बिना खंभे की छत की तरह है जिसका गिरना एकदम तय है ।
055. प्रभु श्री हनुमानजी जब लंका गए तो बहुत बाधाएं आई पर भगवती जानकी मातारूपी भक्ति से मिलने के बाद उसी मार्ग से वापस आने पर एक भी बाधा नहीं आई । सूत्र यह है कि जब तक भक्ति परिपक्व नहीं होती तब तक ही जीवन में बाधा आएगी ।
056. गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि अंतिम समय नाम लेने पर यमदूत हट जाते हैं और प्रभु के पार्षद आ जाते हैं ।
057. पतितपावन प्रभु के नाम जैसा लाभ जगत में अन्य कहीं भी नहीं है ।
058. प्रभु के बिना जीवन में अभाव-ही-अभाव बना रहेगा ।
059. एक मनसुख जीव होता है जो अपने मन से चलता है । एक प्रभु के सम्मुख जीव होता है जो प्रभु की इच्छा से चलता है । यह कितना बड़ा फर्क है ।
060. भक्ति में अतुलित सामर्थ्य है कि जीव को इतना सजा-संवार देती है कि प्रभु आकर्षित हुए बिना नहीं रह पाते ।
061. जितने भी हमारे में सद्गुण हैं उसका उद्देश्य प्रभु की प्रसन्नता ही होनी चाहिए ।
062. मन एक है या तो जगत में लगाया जाए या जगतपति प्रभु को अर्पित किया जाए । मन को प्रभु को अर्पित करना ही सबसे श्रेष्ठ होता है ।
063. भक्ति जिसके जीवन में आती है अंत में उसे प्रभु से मिलाकर ही छोड़ती है ।
064. प्रभु सदैव अपने भक्तों का मान रखते हैं ।
065. भजन छोड़ने पर आज तक किसी का मंगल नहीं हुआ है ।
066. प्रभु के नाम में प्रभु रहते हैं । यह मान लें तो जैसे प्रभु दर्शन के लिए हम लालायित रहते हैं वैसे नाम लेने के लिए भी लालायित रहेंगे ।
067. प्रभु अपनी सारी शक्तियों को लेकर अपने नाम में बैठे हैं ।
068. छोटी बातों के लिए भी संसार के नियम होते हैं पर प्रभु नाम जप में प्रभु ने कोई नियम नहीं लगाया है । यह प्रभु की कितनी बड़ी कृपा और करुणा है ।
069. पश्चाताप के अश्रु प्रभु बहुत जल्दी स्वीकार करते हैं ।
070. हमारी आशा और विश्वास जगत से नहीं बल्कि श्रीजगदीश से ही होनी चाहिए ।
071. अंत में केवल प्रभु को छोड़कर सब हमें छोड़ देंगे । इसलिए पहले ही हमें जगत को छोड़कर प्रभु को पकड़ लेना चाहिए ।
072. शरीर और संसार मेरा नहीं है, केवल प्रभु ही मेरे हैं ।
073. बिना किसी हेतु के प्रभु से प्रेम होना चाहिए ।
074. शास्त्रों के अनुसार सबसे बड़ा निषेध कर्म प्रभु की विस्मृति ही है ।
075. मानव जीवन का पूरा समय हमें प्रभु प्राप्ति के लिए ही मिला है पर हम प्रभु के समय को संसार के कामों में व्यय कर देते हैं ।
076. प्रभु के अलावा जीवन में किसी से भी अपनापन का भाव नहीं रखना चाहिए ।
077. प्रभु के अनुग्रह का ही जीवन में सदैव भरोसा रखना चाहिए ।
078. प्रभु का श्री नरसिंहावतार भक्त के वचन को पूर्ण करने के लिए कि प्रभु खंभे में भी हैं और भक्त की रक्षा के लिए हुआ ।
079. प्रभु को सुख प्रदान करने की लालसा ही हमारे हृदय में सदैव होनी चाहिए ।
080. मनरूपी दर्पण मैला होने के कारण उसमें मनमोहन प्रभु की छवि हमें दिखाई नहीं पड़ती ।
081. क्षण भर की शांति भी तब तक नहीं मिलेगी जब तक जीवन में भगवत् भक्ति नहीं होगी । बिना भक्ति के पूर्ण शांति की बात तो छोड़ ही दें ।
082. प्रभु का नाम पाप और पाप करने की वृत्ति का ही नाश कर देता है ।
083. जीवन में सहारा लेना ही है तो अपने अंशी प्रभु का ही लेना चाहिए ।
084. भगवत् प्राप्ति प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण से ही संभव होती है ।
085. शरणागति से बड़ा न कोई धर्म है और न ही कोई सिद्धांत है ।
086. श्रद्धापूर्वक और पूर्ण विश्वास से प्रभु की कथा का श्रवण करना चाहिए ।
087. श्री रामचरितमानसजी में सबसे बड़ी स्तुति गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने “नाम भगवान” की करी है । गोस्वामीजी ने कलियुग के मद्देनजर अंत में कह दिया कि नाम की बड़ाई नाम वाले प्रभु भी नहीं कर सकते ।
088. नवधा भक्ति में तीन भक्ति प्रधान हैं - श्रवण भक्ति, कीर्तन भक्ति और स्मरण भक्ति ।
089. प्रभु का सहारा ही जीवन का सबसे सुरक्षित सहारा होता है ।
090. प्रभु की भक्ति से ही जीवन में पूर्णता आती है ।
091. प्रभु के उत्सव को अति उत्साह के साथ मनाना चाहिए ।
092. आपत्ति काल में मिले हुए समय का सदुपयोग करके प्रभु और माता की आराधना करनी चाहिए ।
093. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी सबके लिए उपयोगी बनते हैं इसलिए ही वे सबके प्रिय और पूज्य हैं ।
094. भगवत् सेवा के कार्य करने की प्रेरणा प्रभु कृपा बिना नहीं होती है ।
095. भक्त प्रभु से मांगते हैं कि उनकी स्मृति में प्रभु के अलावा और कोई न आए ।
096. बुरे से बुरे लोग के भीतर भी प्रभु की ज्योत होती है इसलिए उनसे नहीं बल्कि उनकी बुराई से नफरत करनी चाहिए ।
097. अपने मन को प्रभु से जोड़कर रखने का सदैव प्रयास करना चाहिए ।
098. पुण्य कमाना मानो कांच है और प्रभु प्रेम कमाना स्वर्ण जैसा है । कांच और स्वर्ण में क्या तुलना ?
099. प्रभु को शिकायत सुनना पसंद नहीं है । प्रभु के हो जाएं फिर कभी भी, किसी भी तरह की शिकायत करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी ।
100. जीवन में कभी तो भजन करने का पूर्ण अवकाश ले लेना चाहिए ।
101. कभी भी जीवन में किसी वस्तु या किसी व्यक्ति का आश्रय नहीं लेना चाहिए । जीवन में आश्रय केवल और केवल प्रभु का ही लेना चाहिए ।
102. प्रभु यह देखते हैं कि हमारी प्रार्थना हृदय से होती है या केवल मुँह से निकलती है ।
103. दुनिया वाले रंग बदलते हैं । प्रभु हमारा वक्त बदलते हैं यानी बुरे वक्त से निकालकर अच्छे वक्त में पहुँचा देते हैं ।
104. जीवन में कभी भी भजन का क्रम टूटना नहीं चाहिए ।
105. प्रभु का आश्रय तब पुष्ट होता है जब अन्य सभी आश्रयों का जीवन से त्याग हो जाता है ।
106. प्रभु में हमारी निष्ठा परिपक्व होनी चाहिए ।
107. प्रभु और माता महाप्रेम रस का दान अपने भक्तों को करते हैं ।
108. जो प्रभु सबको मंदिर में अचल लगते हैं वे भक्त को सचल लगते हैं । यह कितना बड़ा अंतर है ।
109. प्रभु की कृपा ही हमें प्रभु तक पहुँचाएगी, अन्य कोई उपाय नहीं है ।
110. मानव जन्म पाकर भजन नहीं करने का भी पाप लगता है और वे जीव नर्क जाते हैं ।
111. जीवन में अपनी बुराई को त्याग करके भजन करना ही श्रेष्ठ है ।
112. भक्तों में भगवत् चर्चा करने की प्रबल रुचि होती है ।
113. अपने भक्तों का प्रकाश और कीर्ति उनके विरोधी द्वारा विरोध करवाकर प्रभु प्रकट करवाते हैं ।
114. प्रभु की कृपा और शरणागति का आश्रय ही जीवन में लेना चाहिए ।
115. सबसे बड़े अनाथ वे हैं जिनके न श्रीरघुनाथ हैं, न श्रीगोपीनाथ हैं, न श्रीजगन्नाथ हैं, न श्रीबद्रीनाथ हैं और न श्रीकेदारनाथ हैं ।
116. हमें प्रभु में ही पूर्ण रूप से आसक्ति होनी चाहिए ।
117. हमें यह देखना चाहिए कि हमें प्रभु कितने प्रिय लगते हैं ।
118. हम अपने प्रभु को पराया समझते हैं और पराए देह और देह संबंधियों को अपना मान बैठे हैं । यह कितनी बड़ी विडंबना है ।
119. देह और देह संबंधी जो बार-बार मृत्यु पर साथ छोड़े वे अपने हैं या जो प्रभु सदैव हमारे साथ रहते हैं वे प्रभु अपने हैं, यह हमें जीवन में विचार करना चाहिए ।
120. पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर ही भक्ति करनी चाहिए ।
121. प्रभु इतने दयालु हैं कि जिस राक्षस को मारते हैं उसे भी तार देते हैं ।
122. जो प्रभु को अर्पण हो जाता है वह अक्षय हो जाता है ।
123. हर समय गर्व रखें कि हम प्रभु के श्रीकमलचरणों के अशुल्क दास हैं ।
124. प्रभु को स्मृति में रखना चाहिए, चाहे वह कथा से हो, चाहे वह कीर्तन से हो, चाहे वह नाम जप से हो । मूल बात यह है कि प्रभु को सदैव अपनी स्मृति में रखना चाहिए ।
125. प्रभु में निष्ठा रखने से वह निष्ठा ही चमत्कार दिखा देगी ।
126. जो मानव जीवन भगवत् प्राप्ति के लिए मिला है उसे हम संसार के भोगों को भोगने में खो रहे हैं । यह कितना बड़ा हमारा दुर्भाग्य है ।
127. जैसे मक्खी शहद पर बैठने से उसके पंख चिपक जाते हैं वैसे ही हम जीव भोगों से चिपक गए हैं । शहद से चिपकने के कारण मक्खी का अंत हो जाता है वैसे ही भोगों से चिपकने के कारण जीव का भी अंत हो जाता है और वह अंत बहुत दुःखमय होता है ।
128. नर्क में यातना शरीर में चेतना से सारे कष्ट भोगने पड़ते हैं । क्योंकि वहाँ कोई कष्ट से मर नहीं सकता, कोई कष्ट से मूर्छा नहीं आ सकती, सभी कष्ट चेतना अवस्था में ही भोगने पड़ते हैं । कितना दुःखमय होता होगा, जरा कल्पना करके देखें ।
129. प्रतिकूलता आने पर संत यह भावना करते हैं कि प्रभु ने उनके मन की नहीं बल्कि अपने मन की कर दी । इसलिए संत प्रतिकूलता में भी प्रभु की जय बोलते हैं ।
130. सर्वसामर्थ्यवान प्रभु के शरण में हो गए और फिर चिंता भी करें - यह दोनों बातें बड़ी विरोधी हैं । क्योंकि शरण हो गए तो चिंता कैसी ? और चिंता है तो शरणागति कैसी ?
131. हम कहाँ जा रहे हैं जहाँ वासना मोड़ दे वहीं जा रहे हैं । यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि हम प्रभु की प्राप्ति के मार्ग पर नहीं जा रहे ।
132. जो शास्त्र, ऋषि, संत और भक्त के मार्ग पर नहीं चलता उसका विनाश तय है ।
133. हमें प्रभु पर संदेह और संशय नहीं बल्कि परम श्रद्धा और आस्था होनी चाहिए ।
134. साधक को निरंतर भगवत् मार्ग में चलने का निश्चय करके ही चलना चाहिए ।
135. मैं प्रभु के शरणागत हूँ, मेरा अमंगल किसी भी सूरत में प्रभु होने नहीं देंगे । यह दृढ़, अटूट और परम विश्वास जीवन में होना चाहिए ।
136. बालक भक्त श्री प्रह्लादजी भी असुर बालकों के साथ खेलते थे पर कुछ समय में ही चले आते थे । फिर अकेले एकांत में बैठकर प्रभु की भक्ति में तल्लीन हो जाते थे । सूत्र यह है कि भक्त को भक्ति के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं लगता । ज्यादा समय संसार और संसार के खेल भक्त को बांध नहीं सकते ।
137. श्री प्रह्लादजी एकांत में अपने अंतःकरण में प्रभु मिलन का आनंद लेते थे ।
138. एकांत में जाकर प्रभु की भक्ति करने से जीव का कल्याण होता है, यह श्री प्रह्लादजी का सूत्र है ।
139. जब हिरण्‍यकशिपु ने श्री प्रह्लादजी से पूछा कि सबसे बढ़िया जो लगता है एक या दो वाक्य में बताओ । उत्तर में श्री प्रह्लादजी ने कहा कि प्रभु की कथा का श्रवण, एकांत में प्रभु के सद्गुणों का स्मरण, प्रभु के नाम का कीर्तन और खुद को प्रभु के श्रीकमलचरणों की सेवा में अर्पण कर देना उन्हें अच्छा लगता है और ऐसा ही सबको करना चाहिए ।
140. सत्य मरता नहीं इसलिए श्री प्रह्लादजी को मारने के सभी प्रयास नाकाम हुए । श्री प्रह्लादजी सत्य कह रहे थे कि प्रभु भक्ति सबसे सर्वोपरि है । इसलिए सत्य का पतन नहीं होता और सत्य बोलने वाले का भी पतन नहीं होता ।
141. खाना और खेलना छोड़कर कोई बालक प्रभु की तरफ चलता है तो मानना चाहिए कि वह विलक्षण है क्योंकि खाना और खेलना बालक का स्वभाव होता है ।
142. हिरण्याकशिपु ने जब पूछा कि किसके बल पर इतनी हिमाकत कर रहे हो तो श्री प्रह्लादजी ने जवाब दिया कि प्रभु के बल पर ।
143. प्रभु को शांत करने के लिए प्रभु श्री ब्रह्माजी, प्रभु श्री महादेवजी, भगवती लक्ष्मी माता आए पर कोई शांत नहीं कर पाए । सूत्र यह है कि भक्ति की महिमा बताने के लिए प्रभु श्री ब्रह्माजी, प्रभु श्री महादेवजी और भगवती लक्ष्मी माता पीछे हट गए कि एक भक्त ही प्रभु को भक्ति से शांत कर सकता है ।
144. आयु में श्री प्रह्लादजी सबसे छोटे पर भक्ति में श्री प्रह्लादजी सबसे बड़े हैं ।
145. दूध नापने का एक पैमाना होता है, रास्ता नापने का एक पैमाना होता है पर भक्ति को नापने का मापदंड क्या है, नापने का पैमाना क्या है - प्रभु पर परम विश्वास ।
146. श्री प्रह्लादजी को परम विश्वास था कि प्रभु को मैं शांत कर लूंगा क्योंकि प्रभु मेरे इष्ट है और मेरे से कभी रुष्ट नहीं हो सकते ।
147. जो प्रभु का भरोसा रखता है कि प्रभु के होते मेरा कोई बुरा नहीं कर सकता, कोई ताकत उसका बुरा नहीं कर सकती ।
148. भक्त को जन्म देने वाले पिता की सद्गति निश्चित होती है । इक्कीस पीढ़ियों की सद्गति एक भक्त करवा देता है । यह भक्ति का प्रभाव है । प्रभु ने श्री प्रह्लादजी को कहा कि मुझे हिरण्‍यकशिपु को सद्गति देने की आवश्यकता नहीं क्योंकि श्री प्रह्लादजी के कारण उसकी सद्गति पहले ही सुनिश्चित हो गई है ।
149. विष ग्रहण करने की शक्ति सिर्फ देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी में ही है । इसके लिए न कोई देवतागण सक्षम हैं, न कोई दैत्य सक्षम है ।
150. मरने के बाद भी राजा श्री बलि तपस्या, यज्ञ और कर्मकांड के बल पर और संजीवनी विद्या से पुनर्जीवित हो जाते थे । राजा श्री बलि इतने बलशाली थे । देवतागण श्री मोहिनी अवतार में अमृत पान के बाद भी मौज-मस्ती में मग्न हुए इसलिए उनका पतन हुआ और असुर से युद्ध हार गए । सूत्र यह है कि कोई भी हो वह सत्कर्म से ऊँ‍चा उठ सकता है और मौज-मस्ती करने पर उसका पतन होता है ।
151. राजा श्री बलि ने अपना सर्वस्व प्रभु को अर्पण कर दिया तो प्रभु ने भी स्वयं का अर्पण कर किया और निरंतर उनको दर्शन देने हेतु उनके द्वारपाल बन गए । यह आत्म-निवेदन भक्ति का प्रभाव है । हम स्वयं का आत्म-निवेदन प्रभु को कर देते हैं तो प्रभु भी स्वयं का अर्पण हमें कर देते हैं ।
152. भक्त प्रभु का सेवक होता है और प्रभु स्वामी होते हैं पर भक्ति के कारण प्रभु भक्त की सेवा करते हैं । भक्ति से प्रभावित होकर और प्रसन्न होकर खुद प्रभु सेवक बन जाते हैं और भक्त को अपना स्वामी बना देते हैं । संत श्री तुकारामजी के यहाँ प्रभु 12 वर्षों तक सेवक बनकर रहे और उनका सब काम करते थे । यहाँ तक पूजा की सेवा के लिए चंदन घिसते थे, वह चंदन किसको अर्पण करने के लिए, संत श्री तुकारामजी के हाथों खुद को अर्पण होने के लिए ।
153. प्रभु ने दर्शन देकर एक ब्राह्मण को बताया, जिसने प्रभु की आराधना करी कि उसका कुष्ठ रोग मिट जाए, तो प्रभु ने कहा कि मैं मंदिर में नहीं हूँ, अभी मैं श्री तुकारामजी के सेवक के रूप में हूँ । वहाँ आकर मेरे दर्शन करो तो वह ब्राह्मण संत श्री तुकारामजी के यहाँ पहुँचा और सेवक के रूप में प्रभु को देखा तब श्री तुकारामजी को एवं उस ब्राह्मण को प्रभु के द्वारकाधीश रूप में दर्शन हुए और प्रभु अंतर्ध्यान हुए । यह घटना 12 वर्ष की सेवा के बाद घटी । 12 वर्ष बाद यह रहस्य संत श्री तुकारामजी को ब्राह्मण के माध्यम से पता चला । ब्राह्मण का कुष्ठ रोग तुरंत नष्ट हो गया । सूत्र यह है कि जिसने अपना सर्वस्व प्रभु को चढ़ा दिया, अपना आत्म-निवेदन प्रभु को कर दिया उसी के साथ ऐसा हो सकता है । आत्म-निवेदन भक्ति की इतनी बड़ी महिमा है ।
154. प्रभु की सबसे बड़ी कृपा कौन सी है ? धन, धान्य, पद, स्वास्थ्य यह प्रभु की कृपा के छोटे-छोटे फल हैं पर प्रभु की सबसे बड़ी दो कृपा है कि पहला, सत्संग मिले और दूसरा, संसार से वैराग्य हो जाए । जिस दिन यह दोनों हो जाए यह पक्का समझना चाहिए उस दिन प्रभु की सबसे बड़ी कृपा जीवन में हो गई ।
155. संसार में बाकी सब चीज सुलभ है पर प्रभु की तरफ मन लगे यह सबसे दुर्लभ है ।
156. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी महाराज को शास्त्रों में गुरुमूर्ति के रूप में माना गया है ।
157. गुरु तत्व प्रभु का ही तत्व है । वह किसी व्यक्ति का रूप लेकर सद्गुरु के रूप में हमारे जीवन में आता है ।
158. संसार का संग त्याग करना एक बात, घर छोड़कर तीर्थ में चला जाना दूसरी बात है । पर संसार संग से मुक्त होना सबसे बड़ी बात है । संसार में रहकर भी संसार की आसक्ति मन से छोड़ देना सबसे बड़ी बात है ।
159. श्री शंकराचार्यजी ने कहा कि संन्यास कब लेना ? जिस दिन प्रभु के लिए मन बन जाए उस दिन संन्यास ले लेना, कोई मुहूर्त देखने की जरूरत नहीं है ।
160. संन्यास छोड़ने का नाम है । संसार की आसक्ति को छोड़ दी वह उत्तम संन्यास है । संन्यास ग्रहण किया यानी फिर संन्यास आश्रम का बोझा ले लिया, यह संन्यास नहीं है ।
161. जीवन में एक नियम बना लेना चाहिए - छोड़ने का नियम । जो भी चीज पास दिखे सब छोड़े, बस एक चीज जीवन में रह जाए बाकी सब कुछ छूट जाए यानी प्रभु ही जीवन में रह जाए ।
162. घर छोड़कर मठ, आश्रम तैयार कर लिया यह छोड़ना नहीं हुआ क्योंकि संसार के झमेले से मठ और आश्रम के झमेले ज्यादा होते हैं ।
163. संसार का त्याग बाहर से होता है । संसार मुक्त अंतःकरण होना भीतर से होता है, जो श्रेष्ठ है ।
164. संसार मुक्त हो गए इसकी कसौटी क्या ? पकड़ना छूट जाए, छूटने की और छोड़ने की आदत लग जाए तो मानना कि संसार मुक्त हो गए ।
165. एक संत को कमंडल खरीदना था, लोटा था पर कमंडल खरीदने की इच्छा हुई - यह छोड़ना हुआ या पकड़ना हुआ, यह पकड़ना हुआ उन संत के लिए । सूत्र यह है कि जो आ गया जीवन में उसे ग्रहण करना, अपने लिए रसोई में कुछ नहीं बनवाना, जो थाली में आ जाए उसे प्रभु की प्रसादी के रूप में सहर्ष ग्रहण करना ।
166. भिक्षा का अन्न अपने चयन का नहीं होता है । भिक्षा भोग नहीं है इसलिए उसे भोग दृष्टि से नहीं देखना चाहिए ।
167. संसार मुक्त का एक उदाहरण देखें । प्रभु श्री शुकदेवजी के सामने रंभा अप्सरा नाची, खूब नाची पर हार कर चली गई । प्रभु श्री शुकदेवजी पर कोई प्रभाव नहीं हुआ ।
168. हमारा मन किन-किन पदार्थों में फंसता है, अटकता है यानी यह नहीं मिले तो असंतुष्ट होता है यह साधक को देखना चाहिए और उस आदत को त्यागना चाहिए ।
169. हम जहाँ भी हैं, उस जगह जैसी स्थिति है, उससे हमारा मन प्रतिकूल प्रभावित नहीं हो । जो थाली में आ जाए वह ठीक, शरीर ढ़कने को जो मिल जाए वह ठीक, यही सच्चा संन्यास है ।
170. एक सास को उसकी बहू ने दो दिन प्रणाम नहीं किया । सास ने बड़ा गुस्सा करा कि क्यों नहीं किया । सूत्र यह है कि छूटने वाली घटना के साथ हमारा मन कभी भी चिपकना नहीं चाहिए । यह श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु का उपदेश है ।
171. जिस व्यक्ति की चाहत छूट गई वह व्यक्ति घर त्याग करके कहीं नहीं जाए तो भी वह घर में रहकर ही मुक्त होता है ।
172. पदार्थ के हमारे मन से चिपकने की कला को आसक्ति कहते हैं ।
173. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में एक प्रश्न आता है कि किसका मन जलता है ? आसक्त मनुष्य का मन जलता है जैसे तेल से दीप जलता है ।
174. कलियुग में वन में जाना संन्यास नहीं है, घर में रहकर विरक्त हो जाना ही सच्चा संन्यास है ।
175. हम नारियल से सीख सकते हैं कि एक नारियल जिसके भीतर जल है और एक नारियल जिसका जल सूख गया है और गोला बन गया है । अगर गोले को अखंड रूप में निकालना है कि गोला टूटे नहीं तो उपाय क्या है ? जब तक पानी रहेगा वह चिपका हुआ रहेगा, अखंड नहीं निकलेगा । पानी सूखा तो वह गोला अखंड रूप से निकलेगा । हमें भी अपनी आसक्ति के पानी को सुखाना पड़ेगा तभी हमारा गोला अखंड रूप से प्रभु के लिए निकलेगा । जब घर में रहकर भी भिक्षा के रूप में भोजन ग्रहण करना आ जाए यानी जो मिल गया वह ठीक, कोई दखल नहीं, घर में रहना अतिथि बनकर, कोई झंझट नहीं । पर हम बेटे से छूटते हैं तो पोते में फंसते हैं, पोते से निकलते हैं तो जँवाई में फंस जाते हैं । हमारा गोला प्रभु को चढ़ाने योग्य जब अखंड निकलेगा तभी हमारा कल्याण होगा ।
176. अपने अंतःकरण में हमें भक्ति भाव में डूब जाना चाहिए । बाहर संसार में क्या चल रहा है उसमें रस नहीं लेना चाहिए ।
177. समस्त संसार में प्रभु तत्व के विहार को ही देखना चाहिए, यह अवस्था प्राप्त करना जीवन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए ।
178. पौधे के रक्षण हेतु उसमें बाड़ लगाई जाती है कि कही बकरी नहीं खा जाए वैसे ही साधक को स्वयं के संरक्षण करने के लिए सत्संग की बाड़ लगानी चाहिए कि कहीं माया उसे भ्रमित नहीं कर दे ।
179. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में चौबीस गुरुओं की जो कथा है वह साधक हेतु है कि साधक परमानंद कैसे प्राप्त कर सकता है । उस रहस्य को प्रभु ने श्री उद्धवजी के सामने खोला ।
180. प्रभु हमारे भीतर हैं पर प्रभु का अनुभव भीतर होता नहीं यह श्री उद्धवजी का प्रभु से प्रश्न था । इसके जवाब में प्रभु ने कहा कि यह भक्ति से ही संभव है ।
181. प्रभु कहते हैं कि यदि हम मनुष्य जीवन में प्रभु दर्शन करने की योजना बना लें तो प्रभु साक्षात्कार संभव हो जाता है । साधक का जीवन प्रबंधन का सूत्र यहाँ पर प्रभु ने दिया है ।
182. अपने जन्म के वर्ण यानी जाति के कर्तव्य का विचार करना चाहिए, अपने आश्रम का विचार करना चाहिए पर इन सबसे ऊपर हमें कहाँ जाना है यानी प्रभु साक्षात्कार करके प्रभु के धाम जाना है, यह लक्ष्य जीवन में बनाना चाहिए ।
183. जो गृहस्थ है उसको अपने कुल परंपरा के अनुसार अपने निर्धारित कर्म करने चाहिए । उसे वर्ण धर्म, आश्रम धर्म और कुल धर्म तीनों का पालन करना चाहिए पर उससे भी यानी सबसे ऊपर जो परम धर्म है प्रभु की भक्ति वह जरूर करनी चाहिए ।
184. प्रभु व्याख्या करते हैं कि कर्म के चार प्रकार हैं । एक नित्य कर्म होते हैं जो रोज करने चाहिए । एक विशिष्ट कर्म होते हैं जो विशेष अवसर पर करने चाहिए । एक कामना कर्म होते हैं जो कामना पूर्ति हेतु करने चाहिए । एक प्रायश्चित कर्म होते हैं जो पाप और गलतियों को धोने हेतु करने चाहिए ।
185. प्रभु कहते हैं कि निषेध कर्म जो नहीं करने वाले कर्म होते हैं उन्हें कभी नहीं करने चाहिए । क्योंकि नित्य कर्म नहीं हुआ उसका दोष कम है पर निषेध कर्म हो गया उसका दोष ज्यादा लगता है ।
186. श्रीमद् भागवतजी महापुराण के श्रवण का एक हेतु निर्धारित करना चाहिए और वह हेतु की पूर्ति यह श्रीग्रंथ कर देता है ।
187. धन के उपयोग का क्षेत्र अलग है और धन के उपद्रव का क्षेत्र अलग है । सूत्र यह है कि धन ने उपयोग क्षेत्र की मर्यादा लांघी तो वह उपद्रव क्षेत्र में चला जाता है ।
188. प्रभु को ऐसी पूजा प्रिय जिसमें लौकिक संकल्प नहीं लिया जाए, कोई लौकिक इच्छा नहीं हो । बार-बार सकामता से पूजा करें पर एक बार बीच में निष्काम पूजा करें तो प्रभु इससे ही प्रसन्न हो जाते हैं ।
189. निषेध कर्म तो बिलकुल भी नहीं करना चाहिए । कामना कर्म कम-से-कम करना चाहिए क्योंकि अंत में कामना कर्म का त्याग ही हमारा जीवन का लक्ष्य होना चाहिए ।
190. नित्य कर्म और विशिष्ट कर्म करने चाहिए और करके प्रभु को अर्पण करना चाहिए । एक संत हुए जिन्होंने सो कर उठने के बाद नींद प्रभु को अर्पण करते, सो कर उठने के बाद उबासी प्रभु को अर्पण करते, खाते समय खाना प्रभु को अर्पण करते । हर कार्य दिनभर का प्रभु को अर्पण करने की परिपाटी जीवन में बनानी चाहिए ।
191. जब भी समय मिले प्रभु से कहना चाहिए कि यह सब आपका है, मैं तो आपके लिए ही कर्म कर रहा हूँ । इसलिए सब कुछ आपको अर्पण करता हूँ ।
192. प्रभु हमारे घर और व्यापार के स्वामी हैं । घर और व्यापार प्रभु का है और हम प्रभु के नौकर हैं, ऐसा संकल्प करके कर्म करने से कर्म हमसे चिपकेगा नहीं क्योंकि हम स्वामी बनकर नहीं कर रहे । ऐसा संकल्प जीवन में लेना चाहिए । भोजन घर में हमारे लिए नहीं बल्कि प्रभु के लिए बनता है और प्रभु ने ग्रहण किया तो बाद में उसका प्रसाद हमने पा लिया । जब प्रभु को जीवन में सर्वोच्च मान लिया, सब कर्म और सब कुछ प्रभु के लिए होने लगे तो अर्पण का झंझट ही खत्म हो जाता है । संत श्री एकनाथजी की एक अदभुत ओवी है कि मूल वृत्ति कर लें कि सब प्रभु का, मेरा कुछ भी नहीं, हर कर्म करते समय यही संकल्प हो कि हर कर्म प्रभु के लिए हो रहा है । यह श्री भरतलालजी ने करके दिखाया है जब राज्य को प्रभु का माना और प्रभु के श्रीकमलचरणों की पादुका को राज सिंहासन पर पधराकर और सेवक बनकर राज्य को चलाया ।
193. संसार के सारे लोग शब्द, स्पर्श, रूप, गंध के विषयों में पड़े हैं । हमारा सभी व्यवहार और कर्म इन विषयों को प्राप्त करने हेतु ही हो रहा है ।
194. यह गलत है कि हम विषयों में पड़े हैं इसलिए सुख की जगह हमें दुःख मिलता है । कहावत है कि खोदा पहाड़ और निकली चुहिया । संत श्री तुकारामजी ने मराठी में कहा खोदा पहाड़ निकला राई का दाना । राई दाना बराबर सुख और पहाड़ जितना दुःख । उन्होंने सुख को चूहे की जगह राई दाना की संज्ञा दी है । संत श्री तुकारामजी ने बताया कि यह संसार का यथार्थ है, संसार का सत्य है ।
195. हमारी कितनी इच्छाएं विफल होती है । प्रभु उपाय बताते हैं कि अपनी इच्छा और वासना को अपने विवेक से कम कर देना चाहिए ।
196. स्वाभाविक रूप से जो चाहिए उसे समझें और उसे प्राप्त करने हेतु प्रयास भी करना चाहिए पर जो आवश्यक नहीं है, उत्तेजना के कारण देखी-दिखाई होने के कारण, महत्वकांक्षा के कारण उसका त्याग करना चाहिए । यह प्रभु के श्रीवचन है कि जरूरी और आवश्यकता की पूर्ति करनी चाहिए और अनावश्यक और अनुपयोगी का त्याग करना चाहिए एवं उसकी पूर्ति का प्रयास नहीं करना चाहिए ।
197. बार-बार देखने पर वह अनुपयोगी वस्तु भी हमारे मन में घुसती है । दृश्य का संग करने से हम मारे जाते हैं । उदाहरण स्वरूप कहीं हम विज्ञापन में बार-बार गहने देखते हैं तो उस गहने को खरीदने की इच्छा जन्म लेती है ।
198. जीवन में चाह रहित रहना चाहिए और प्रभु से प्रेम करना चाहिए ।
199. जो जीवन में चाहता रहेगा वह जीवन भर रोता रहेगा । जो चाहिए वह मिल भी गया पर पड़ोसी को ज्यादा मिला इसलिए दुःखी रहेगा । दुःख का कारण है कि हम अपनी तुलना दूसरे से करते हैं ।
200. जो चाहा वह मिल गया फिर वह चला गया, यह भी दुःख का एक बहुत बड़ा कारण होता है ।
201. मनुष्य भक्ति करने पर सत्य में दुःखी नहीं हो सकता पर उसने अपनी नासमझी से भक्ति नहीं करने पर स्वयं को संसार में दुःखी बनाकर रखा हुआ है ।
202. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु ने मृत्युलोक को दुखालय का नाम दिया है । प्रभु का यह दिया हुआ नाम कि जहाँ दुःख मिलता है वह मृत्युलोक है । मृत्युलोक में दुःख मिलेगा ही नहीं, यह संभव ही नहीं है पर भक्ति करने पर दुःख को सहने की शक्ति मिल जाती है और हम आसानी से दुःख से उबर जाते हैं ।
203. आसक्ति से प्रेम में नहीं मिल पाने के कारण और परिवार के विरोध के कारण सांसारिक प्रेमी और प्रेमिका आत्महत्या तक कर लेते हैं । जरा सोचें कि ऐसी सुंदर प्रेम की आसक्ति प्रभु के लिए हो जाए तो जीव का कल्याण ही हो जाएगा ।
204. हर कर्म करते समय यह विवेक रखना चाहिए कि यह कर्म मुझे बांधने वाला तो नहीं है, मुझे मुक्त करने वाला होना चाहिए । हर कर्म इस कला से करना चाहिए कि वह हमें बांध नहीं सके और इसका सबसे सीधा और सरल उपाय है उसको प्रभु को अर्पण करना ।
205. ब्रह्म जिज्ञासा निर्माण हो जाना, यह श्रेष्ठतम अवस्था है । सब पूजा, पाठ, यज्ञ, कर्मकांड का उद्देश्य यही है कि ब्रह्म जिज्ञासा का जीवन में निर्माण हो जाए ।
206. यम और नियम का जीवन में पालन करना चाहिए, उनसे समझौता नहीं करना चाहिए । यह प्रभु के श्रीवचन हैं ।
207. नियम को त्यागना नहीं चाहिए पर उसका बोझ भी बना कर पालन नहीं करना चाहिए । सूत्र यह है कि नियम को कभी बोझ नहीं बनने देना चाहिए ।
208. सद्गुणों के रत्नों की माला से प्रभु प्रसन्न होते हैं । यह चमकने वाले बाजारी रत्न से प्रभु प्रसन्न नहीं होते । जीवन में एक-एक सद्गुण का विकास करके यह रत्नों की माला बनाई जाती है जिसको प्रभु सहर्ष स्वीकार करते हैं ।
209. जीवन में अमानी रहना चाहिए यानी खुद को बड़ा मानना, यह एकदम गलत है । प्रभु के सामने और संसार के सामने हम छोटे-से-छोटे हैं, यह भाव रखना चाहिए ।
210. किसी से झगड़ा और द्वेष नहीं करना चाहिए । जीवन में आपस में लड़ने से अपनी अच्छाई और दूसरों की बुराई देखने का दोष लगता है । सबके लिए समानता और सामंजस्य का भाव होना चाहिए । प्रभु को वही प्रिय होता है जिसका किसी के साथ कलह नहीं होता ।
211. अपने ज्ञान के कारण सर्वदा सावधान और दक्ष रहना चाहिए । मन को लूटने वाले भावों और तत्वों से सावधान रखना चाहिए ।
212. जीवन में ममत्व का त्याग करना चाहिए । यह मेरा है - इस बात का त्याग होना चाहिए । आसक्ति का त्याग कि यह मेरा है, यह भाव का त्याग । किसी भी प्रकार से मैं और मेरापन का भाव जीवन में नहीं आए ।
213. संपूर्ण प्रेम और आस्था का केंद्र प्रभु हो जाएं, यह भाव कभी जीवन में कम नहीं होना चाहिए ।
214. जीवन में जल्दबाजी कभी नहीं करना चाहिए । प्रभु कहते हैं कि जल्दबाजी में लिया हुआ निर्णय हरदम सही नहीं होता इसलिए विवेक से सोच समझकर निर्णय लेना चाहिए ।
215. प्रभु के लिए जिज्ञासा सदैव बनी रहनी चाहिए ।
216. असत्य का व्यवहार जीवन में कभी भी नहीं करना चाहिए ।
217. प्रभु के प्रेम और करुणा को पाने की हमारे जीवन में सहज मांग होनी चाहिए ।
218. एक संत के पास एक साधक प्रभु को पाने का उपदेश पाने के लिए गए । संत ने कहा कि श्री गिरिराजजी की परिक्रमा करना और श्रीराधे-कृष्ण का जाप करना । साधक ने वह किया एक दिन परिक्रमा के दौरान प्रभु ने दर्शन दिए । प्रभु को पाने का उपदेश मांगने गए थे और स्वयं अपनी नाम जप की निष्ठा से प्रभु को पा लिया ।
219. पत्थर के टुकड़े को प्रभु रत्न नहीं मानते, यह सब प्रभु के लिए धूल समान हैं । जीव के सद्गुणों को ही प्रभु रत्न मानते हैं ।
220. श्रीमद् भागवतजी महापुराण का एक-एक श्लोक जीवन का पूरा-का-पूरा प्रबंधन बताने वाला है । केवल विवेक जागृत करने से मनुष्य जीवन सार्थक हो जाता है, ऐसे अनेक उपदेश इस महापुराण में मिलते हैं ।
221. श्री गजेंद्र मोक्ष की कथा हमें सिखाती है कि जब मगरमच्छ ने श्री गजेंद्रजी को पकड़ा तो जीवन में पहली बार उन्होंने अपना पूरा बल लगाया, जीवन में पहली बार सहायता हेतु हाथी-हथिनी आए पर सब प्रयास व्यर्थ हुए । वे खुद इतने बलवान थे कि एक हजार हाथियों का बल उनमें था इसलिए कभी किसी से सहायता की जीवन में जरूरत ही नहीं पड़ी । जीवन में पहली बार पराधीन हो गए । आज के उदाहरण में समझें कि दस फैक्ट्री का मालिक अस्पताल में पड़ा पराधीन हो जाता है, हजारों व्यक्तियों का पेट भरने वाला आज खुद अपने घर से भोजन आने का अस्पताल में इंतजार करता है ।
222. श्री गजेंद्र मोक्ष की कथा में हाथी और हथिनी ने सोचा कि अब यह गजेंद्र बचने वाला नहीं है, एक-एक करके गजेंद्र को वह सब छोड़ गई और संख्या कम होने लगी । सब दूर हो गए, अब उसके पास कोई नहीं था । जीवन में इस कठोर स्थिति का सामना श्री गजेंद्रजी को पहली बार करना पड़ा । सूत्र यह है कि डूबने वाले का साथी प्रभु को छोड़कर कोई नहीं होता ।
223. उत्सव के समय खुशियां मनाने हेतु खूब लोग हमें मिल जाएंगे पर विपदा में कोई नहीं आता । श्री गजेंद्रजी के मन में पहली बार प्रश्न उठा कि अब मेरा कौन ? यह सिर्फ श्री गजेंद्रजी का प्रश्न नहीं है यह हम सब का प्रश्न है क्योंकि जीवन के सुख सरोवर में एक मृत्यु नाम का मगरमच्छ है । वह इतना बलवान है कि जब आक्रमण करता है तो बलवान-से-बलवान भी हतबल हो जाता है ।
224. हमारा सारा धनबल, कुटुंबबल और सावधानी धरी की धरी रह जाती है । जीवन के अंतिम क्षण सबको यह पता चलता है कि अब साथी कोई नहीं । माता अमाता, पिता अपिता, पत्नी अपत्नी हो जाती है । फिर वह सोचता है कि अब मेरा कौन ? जिन सबको अपना माना था उन्होंने साथ छोड़ दिया । अब मुझे अकेला ही जाना पड़ेगा । हम जीवन में साथी तलाशते हैं, क्लब जाते हैं, घूमने जाते हैं, यहाँ तक कि तीर्थ और कथा में भी जाने के लिए हम साथी तलाशते हैं पर अंतिम यात्रा में कोई साथी मिलने वाला नहीं है ।
225. श्री गजेंद्र मोक्ष की कथा में जब सरोवर में श्री गजेंद्रजी एकांत में रह गए, सब हाथी-हथिनी चले गए तो उनके भीतर से अंतरात्मा की आवाज आई । पूर्व जन्मों का सत्संग की बात सुनी हुई याद आई कि जिसका कोई नहीं होता, जो अनाथ होता है, उसके नाथ प्रभु होते हैं ।
226. बच्चों को सुलाते समय ऐसा माना जाता है कि उनके दिमाग में किसी बात को प्रवेश कराने का सबसे उपयुक्त समय होता है । इसलिए बच्चों को सुलाते समय जो उन्हें प्रभु के बारे में कथाएं सुनाई जाती है वह उनके भीतर उतर जाती है । आधी कथा सुनने तक बच्चा सो जाता है पर उस समय तक सुनी कथा गहरे रूप से उसके भीतर प्रवेश कर जाती है । इसलिए पहले दादा-दादी बच्चों को प्रभु की कथा सुनाते-सुनाते सुलाते थे । ऐसी भारतीय परंपरा थी ।
227. श्रेष्ठ ज्ञान एकांत में ही प्रकट होता है । श्री गजेंद्रजी को एकांत में ध्यान आया और उनके भीतर से आवाज आई कि प्रभु मेरे हैं क्योंकि प्रभु हमें कभी भी, किसी भी परिस्थिति में त्यागते नहीं हैं । श्रीमद् भगवद् गीताजी की अमर पंक्ति है, प्रभु के श्रीवचन हैं कि मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ ।
228. श्री गजेंद्र मोक्ष कथा में श्री गजेंद्रजी ने सोचा जो मेरे लौकिक साथी थे उनसे मैंने आशा रखी जो आशा टूट गई । जो मेरे सनातन साथी प्रभु हैं उन्हें मैं पुकारना भूल गया । फिर श्री गजेंद्रजी की अंतरात्मा ने प्रभु को पुकारा । उन्होंने पूर्व जन्म में सत्संग में सुना था कि प्रभु का पूजन करना चाहिए । कुछ भी नहीं था उनके पास । सूंड गई तो पास में एक कमल खिला हुआ था उसे तोड़कर उन्होंने भाव से प्रभु को अर्पण किया ।
229. जीव प्रभु की शरण में जाकर ही अभय को प्राप्त कर सकता है ।
230. प्रभु करुणा के सागर हैं । पापियों पर भी प्रभु करुणा करते हैं, यह प्रभु का स्वभाव है ।
231. ज्ञानियों को तरने के लिए ज्ञान का आधार होता है, पुण्यात्मा को तरने के लिए पुण्यों का आधार होता है पर पापी को तरने के लिए प्रभु की करुणा का ही आधार होता है ।
232. एक बहुत बड़ा पापी भगवती गंगा माता के पास आया और बोला कि दुनिया तब देखेगी कि मुझ जैसे घोर पापी को भी आप तार देंगी । माता ने तार दिया क्योंकि माता पाप नहीं देखती, पुकार को देखती हैं ।
233. देवतागण आसमान में खड़े होकर देख रहे थे कि श्री गजेंद्रजी ने किसी को नहीं पुकारा । प्रभु को पुकारा । देवतागण तैयार थे कि पुकारेंगे तो हम भी जाएंगे पर श्री गजेंद्रजी को एक भरोसा सिर्फ प्रभु का था । उन्होंने प्रभु की शरणागति ले ली कि अब बचूँगा तो प्रभु के बचाए ही बचूँगा । अन्य कोई प्रयास बचने के लिए नहीं करूंगा । एक भरोसा सिर्फ प्रभु का उनके दिमाग में रह गया ।
234. अगर श्री गजेंद्रजी डूब जाते तो प्रभु की कीर्ति भी डूब जाती क्योंकि प्रभु का आश्रय उन्होंने ले लिया था । फिर उनका विनाश होना संभव नहीं था क्योंकि अभी तक कभी भी नहीं हुआ, किसी भी युग में नहीं हुआ । इसलिए संत कहते हैं कि प्रभु को आना ही था । जो कभी नहीं हुआ, वह कभी होगा भी नहीं कि प्रभु का आश्रय लिया और कोई डूब गया ।
235. श्री गजेंद्र मोक्ष की कथा श्रीमद् भागवतजी महापुराण की अमृत कथा है ।
236. अत्यंत विकल होकर श्री गजेंद्रजी प्रभु को पुकार रहे थे । देवतागण खड़े थे मदद हेतु पर श्री गजेंद्रजी का ध्यान उधर नहीं था । उनके नेत्र प्रभु की प्रतीक्षा में थे । अंतिम समय प्रभु पधारे पर पहले अपने श्री सुदर्शन चक्रराज को भेज दिया और श्री चक्रराज ने मगरमच्छ का अंत किया और डूबते हुए श्री गजेंद्रजी की रक्षा हुई ।
237. प्रभु के श्रीकमलचरणों में श्री गजेंद्रजी लुढ़क गए । एक दिव्य पुरुष के रूप में वे प्रकट हुए । प्रभु ने सिर्फ संकट से ही उन्हें मुक्त नहीं किया बल्कि पशु योनि से भी और ऋषि के श्राप से भी मुक्त कर दिया ।
238. श्री गजेंद्रजी आर्त भक्त हैं । संकट में फंसने पर प्रभु को याद करने वाले भक्त हैं । संकट में फंसने पर प्रभु की शरणागति लेने वाले भक्त हैं । प्रभु ऐसे भक्तों का भी स्वागत करते हैं ।
239. श्री गजेंद्र मोक्ष की कथा श्रीमद् भागवतजी महापुराण का एक अदभुत अलंकार है । संकट में आज भी और आगे भी श्री गजेंद्र मोक्ष का दीन बनकर पाठ करने वाले और प्रभु की शरणागति लेकर पाठ करने वाले तर जाते हैं ।
240. भारतीय परंपरा के मूल तत्व में केवल परमात्मा का ही विचार किया गया है ।
241. विदेश के लोग अपने को धनी के कुटुंब से जोड़ने में गौरव मानते हैं और भारतवर्ष के लोग प्रभु से जुड़ने में गौरव मानते हैं । यह भारतीय परंपरा रही है ।
242. भारत का मूल स्वर अध्यात्म है । यहाँ की वायु भी आध्यात्मिक है ।
243. बड़े राजा भी तृप्ति का अनुभव तभी करते थे जब उनके हाथों से प्रभु की अर्चना होती थी और मुँह से प्रभु का कीर्तन होता था ।
244. भारतवर्ष ने कभी काम यानी कामना और अर्थ यानी धन कमाने को प्राथमिकता नहीं दी । भारतवर्ष ने हमेशा प्रभु भक्ति को ही सर्वोच्च स्थान दिया है ।
245. हम अपनी भावना के कारण प्रभु को एक रूप में ही देखने लगते हैं । जो जिस रूप में श्रद्धा रखता है उसे उस रूप को देखने का अधिकार भारतीय अध्यात्म ने दिया है ।
246. क्या प्रभु का एक ही रूप है - नहीं । प्रभु सभी रूपों में हैं - यह सही है । हम कौन होते हैं प्रभु पर पाबंदी लगाने वाले कि आप इसी रूप में स्थित रहें । अपनी बुद्धि की सीमा के कारण प्रभु को कभी सीमित नहीं करना चाहिए ।
247. प्रभु को एक रूप में बांधना गलत है । यह भारतीय परंपरा नहीं है । प्रभु सर्वत्र हैं, सर्वदा से हैं और सर्वदा सभी रूपों में रहने वाले हैं ।
248. मेरे प्रिय प्रभु के रूप की आराधना की जैसे मेरे मन को स्वतंत्रता है वैसे ही अन्य को अन्य रूप की आराधना की भी स्वतंत्रता है ।
249. प्रभु के पूजा पद्धति की भी स्वतंत्रता है कि जो जैसे चाहे, जिस पद्धति से चाहे प्रभु की पूजा कर सकता है । जो उदारता और स्वतंत्रता सनातन धर्म में है वह विश्व में कहीं नहीं मिलेगी ।
250. प्रभु ने मत्स्य रूप में प्रलय काल के दौरान घूमते हुए नौका में जो प्रवचन राजा एवं सप्त ऋषिगण को दिया वह श्रीमत्स्य पुराण बन गया ।
251. रात्रि में नींद के समय हमारे बोलने की, खाने की, सुनने की शक्ति खत्म नहीं होती पर लीन हो जाती है, उठते ही भीतर से प्रकट हो जाती है । वैसे ही प्रलय में सब कुछ प्रभु में लीन हो जाता है और फिर नए युग का प्राकट्य प्रभु से होता है ।
252. जो है वह कभी नष्ट नहीं होता और जो नहीं है उसका कभी निर्माण नहीं होता । यह अदभुत सिद्धांत श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु ने प्रतिपादित किया जिसको आज विज्ञान भी मानने लगा है ।
253. ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, उनका रूपांतरण ही होता है । यह भारतीय सिद्धांत रहा है जिसको आज विश्व भी मानता है ।
254. तप क्या है, योग क्या है ? शक्ति का पुनर्जागरण यानी हमारे भीतर लीन शक्तियों को पुनर्जागृत करना ही तप और योग है ।
255. जो अपने भीतर की ऊर्जा को बचाकर और उसका संरक्षण करके रख सकते हैं, वे ही महान कार्य करने वाले जीवन में बड़े बनते हैं ।
256. श्री वेदजी अध्यात्म तत्व को पाने हेतु हमारा संविधान यानी नियमावली है । क्या करना है, क्या नहीं करना है, इसके सूत्र बताए गए हैं । जैसे एक देश का संविधान होता है जिसके बिना देश नहीं चल सकता वैसे ही हमारे अध्यात्म जीवन का श्री वेदजी संविधान हैं जिनके बिना हम नहीं चल सकते ।
257. पूरे ब्रह्मांड में हमारी धरती मात्र एक कण जितनी है । इतनी विशाल सृष्टि को किसी की शक्ति चला रही है और वह शक्ति प्रभु की है ।
258. पूर्व जन्म में किए कर्म का दंड संसार की न्यायपालिका नहीं दे सकती पर प्रभु की न्यायपालिका जन्मों-जन्मों के कर्म का दंड और पुण्य प्रदान करती है ।
259. जिसने जीवन में जितना धर्म का पालन किया है उसे उतना सुख मिलेगा, यह सिद्धांत है ।
260. धर्म पालन करने से पहले धर्म को सही रूप में जानना सबसे जरूरी है ।
261. हमें श्री वेदजी में बताए सिद्धांत के अनुरूप अपने कर्म करने चाहिए जिससे हमारे कर्म सही दिशा में हो ।
262. किसी भी अध्यात्म विषय का अंतिम प्रमाण श्री वेदजी ही हैं । सृष्टि का नियम से संचालन के लिए श्री वेदजी ही हैं ।
263. वैदिक धर्म में जो कुछ भी कहा गया है उससे बेहतर और उससे नया सिद्धांत विश्व में कहीं भी नहीं मिलेगा । इसलिए श्री वेदजी श्रेष्ठ हैं और इनको मानने वाला सनातन धर्म श्रेष्ठ हैं ।
264. श्री वेदजी के सिद्धांत जानकर जो जीवन जीता है उसका जीवन में कभी पराभव नहीं होगा यानी वह कभी हारेगा नहीं ।
265. श्रीपुराणों में, श्रीमद् भागवतजी महापुराण में, श्रीमद् भगवद् गीताजी में, श्री रामचरितमानसजी में वैदिक ज्ञान ही है, वैदिक सिद्धांत ही है और वैदिक सूत्र ही हैं ।
266. सप्त ऋषिगण, श्री इंद्रदेवजी, देवतागण - यह कोई व्यक्ति का नाम नहीं है । अधिकारी जीव को प्रभु यहाँ नियुक्त करते हैं, फिर उनका कार्यकाल पूरा होने पर वे चले जाते हैं और नई नियुक्ति फिर से प्रभु करते रहते हैं ।
267. प्रभु देवतागणों के पद का निर्माण कर उन्हें एक-एक काम यानी कर्म सौंपते हैं ।
268. अगर किसी विद्वान बच्चों के किसी विषय में अंक कम रह जाते हैं तो शिक्षक उसे अपनी तरफ से वह अनुग्रह अंक देकर उत्तीर्ण कर देता है । वैसे ही महात्माओं, संतों और भक्तों को अगर उनके प्रयास में कुछ कमी रह जाती है तो प्रभु अपनी तरफ से अनुग्रह करके उत्तीर्ण कर देते हैं । महात्मा, संत और भक्त का उद्धार प्रभु अपनी कृपा और दया का अनुग्रह करके कर देते हैं ।
269. हमारे ऋषि भी यज्ञ द्वारा प्रयोग करते थे, जैसे विज्ञान में प्रयोग होता है वैसे ही प्रयोग करते थे । क्या क्रिया की जाए कर्मकांड में और उसके प्रयोग से क्या फल मिलता है यह हमारे ऋषियों ने आविष्कार किया । ऐसा करते-करते नियम बने जो यज्ञ नियम कहलाए । हमारे ऋषियों की कितनी बड़ी देन है - आज की यज्ञ पद्धति । ऐसी सुंदर पद्धति है कि उसके नियम अगर पालन किए जाएं तो निश्चित सफलता मिलती है । यज्ञ द्रव्य और मंत्र में कोई गलती नहीं हो तो निश्चित फल प्राप्ति होती ही है । यज्ञ और कर्मकांड पूर्ण अनुशासन से करने से उचित फल मिलकर ही रहेगा ।
270. एक राजा ने एक ऋषि से यज्ञ करवाया पुत्र प्राप्ति हेतु । रानी ने कह दिया पुत्री का संकल्प करें और पुत्री हो गई । राजा पीछे पड़ गए ऋषि के और कहा कि निमंत्रण मैंने आपको दिया था, यज्ञ मैंने करवाया था, दक्षिण मैंने दी थी तो फिर आपने रानी के कहने पर पुत्री का संकल्प क्यों यज्ञ में कर दिया । राजा ने कहा कि अब इस पुत्री को पुत्र बनाने का दायित्व आपका है । यज्ञ और कर्मकांड में ऐसा कोई विधान नहीं कि किया हुआ कर्म को वापस किया जा सके । तो ऋषि ने सोचा कि यह काम तो केवल एक ही देव कर सकते हैं और वे हैं देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी । उन्होंने प्रभु श्री महादेवजी की आराधना करी और प्रभु ने उस पुत्री को पुत्र बना दिया ।
271. श्री अश्विनीकुमारों ने जो रसायन ऋषि श्री च्यवनजी को वृद्ध से जवान करने के लिए उपयोग किया उस रसायन को आयुर्वेद में च्यवनप्राश के नाम से जाना जाता है । यह भारतवर्ष का गौरव है कि यहाँ के आयुर्वेद के जन्मदाता देवतागण हैं ।
272. संत श्री ज्ञानेश्वरजी आरंभ में अपनी टीका में कहते हैं कि कितने कल्पों तक सत्यता से भक्ति करने के कारण उन्हें श्रीमद् भगवद् गीताजी का भाष्य करने का अधिकार मिला ।
273. श्री महाभारतजी में एक यक्ष प्रश्न है कि जीवन में कुछ नहीं करके एक नियम का पालन ऐसा करें जो हमें स्वर्ग पहुँचा दे । धर्मराज श्री युधिष्ठिरजी ने उत्तर दिया एक नियम का पालन करना है और अन्य कोई नियम पालन नहीं करना और स्वर्ग जाना है तो वह नियम है - सत्यता । सत्य से बड़ा कोई सिद्धांत नहीं है ।
274. शास्त्रों को विवेक से पढ़ा होगा तो जीवन में हर अंधकार में प्रकाश मिलेगा और हम जीवन में निश्चित सफल होंगे ।
275. आज तीर्थों का वाणिज्यीकरण हो गया है, आज तीर्थ प्रभु दर्शन की भावपूर्ण यात्रा नहीं रहकर मनोरंजन का केंद्र बन गया है, मौज मस्ती का केंद्र बन गया है जो कि बिलकुल गलत है ।
276. भगवती गंगा माता के तट पर हमने इतने गलत कार्य करना और देखना आरंभ कर दिए कि प्रकृति विकराल और उग्र रूप लेकर उसका फल हमें देती है ।
277. श्री नाभागजी गरीब थे क्योंकि उनके भाइयों ने जब बंटवारा किया तो उनके हिस्से में बूढ़े पिता को दे दिया । वे यज्ञ में बचा हुआ द्रव्य लेकर किसी तरह अपना गुजारा करते थे । किसी का एक यज्ञ पूरा हुआ तो प्रभु श्री महादेवजी परीक्षा लेने आए क्योंकि यज्ञ का बचा हुआ द्रव्य का अधिकार श्री रूद्रजी का होता है । प्रभु श्री महादेवजी ने पूछा कि क्या तुम्हें यह पता है ? गरीब नाभाग शास्त्रों के ज्ञाता थे, शास्त्र जानते थे तो वे तुरंत मान गए । प्रभु श्री महादेवजी ने अपना रूप प्रकट किया और दर्शन दिया और बचा हुआ द्रव्य नाभाग को दे दिया । वह बचा हुआ द्रव्य नाभाग के जीवन काल में इतना बढ़ा कि उनके पुत्र श्री अम्बरीषजी पूरे विश्व के चक्रवर्ती राजा बन गए । प्रभु श्री महादेवजी की एक कृपा दृष्टि का यह फल था ।
278. राजा श्री अम्बरीषजी राजा होने पर भी अपने महल की श्री ठाकुरबाड़ी में स्वयं झाड़ू-पोछा लगाते थे । अपने हाथ से पूजा, अपने हाथ से प्रभु की सभी सेवा करते थे । राजा श्री अम्बरीषजी की सेवा करने अनेक सेवक थे पर प्रभु की सेवा वे स्वयं अपने हाथों से ही करते थे, कोई सेवक से नहीं करवाते थे ।
279. राजा श्री अम्बरीषजी रोज प्रभु की कथा सुनते थे । उनका सूत्र था कि रोज कथा नहीं सुनने से बुद्धि शुद्ध नहीं रहती ।
280. अपनी हर इंद्रियों को प्रभु सेवा में लगाने से भक्ति का आरंभ हो जाता है, यह सिद्धांत है ।
281. राजा श्री अम्बरीषजी ने प्रभु के लिए एक बड़ा व्रत वर्ष भर हेतु किया । उसकी रक्षा हेतु यानी अपने प्रिय भक्त की रक्षा हेतु प्रभु ने अपना श्री सुदर्शन चक्रराज को पहले ही भेज दिया ।
282. शास्त्र के अनुसार हर मेहमान अतिथि नहीं होता । जिसको हमने बुलाया नहीं, जिसकी आने की तिथि का हमें पता नहीं, वही अतिथि होता है और उसका सत्कार करने की हमारी जिम्मेदारी होती है, ऐसा शास्त्र मत है ।
283. ब्राह्मण को निमंत्रण देकर उनसे पहले भोजन कर लेना गलत है । ऐसा करने से उस ब्राह्मणदेव को अपना झूठा खिलाने का पाप लगता है ।
284. प्रमाणिक वक्ता हमें श्रीग्रंथ का सार निकाल कर देते हैं । यह जीवन की धन्यता होती है कि कितने श्रीग्रंथों का सार सरल भाषा में प्राप्त हो जाता है । संस्कृत भाषा में लेख है कि बहुत सुनने वाले को सबसे बड़ा माना गया है । श्रवण हमको सबसे महान बना देता है । विदेश में पढ़ने को ज्यादा महत्व दिया जाता है, जो गलत है । हम खुद पढ़कर भी वह सार नहीं निकाल सकते जो एक सुलझे हुए महात्मा निकाल लाते हैं । हमें पढ़ने से बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं मिलेगा जो सुनने से मिल जाएगा, यह भारतीय सिद्धांत है ।
285. एकादशी के दिन पूर्ण एकादशी का पुण्य लेना हो तो सिर्फ पानी पीना और एक बार फलहार ले लेना चाहिए, यह शास्त्र में प्रावधान है । जिस एकादशी को इसकी भी छूट नहीं है उसे निर्जला एकादशी कहते हैं ।
286. अत्यंत श्रेष्ठ बात जीवन में उतरे इसलिए उन श्रेष्ठ बातों को पहले जानना जरूरी है ।
287. उत्तम पुरुष हर शास्त्र के हर सिद्धांत को शुद्ध रूप से जानता है, फिर उसको लागू कैसे करना इसकी व्यवस्था जीवन में करता है ।
288. जब श्री दुर्वासाजी ऋषि ने कृत्या राक्षसी को निर्मित किया तो राजा श्री अम्बरीषजी ने क्या किया । शूरवीर होते तो प्रतिकार करते, कायर होते तो पलायन करते पर राजा श्री अम्बरीषजी प्रभु के भक्त थे, प्रभु का हाथ जोड़कर स्मरण किया । भक्त की लाज प्रभु के हाथ में ही होती है । प्रभु के श्री सुदर्शन चक्रराज ने कृत्या राक्षसी को मारा और श्री दुर्वासाजी ऋषि के पीछे लग गए ।
289. श्री दुर्वासाजी ऋषि को विश्वास था कि प्रभु श्री नारायणजी मुझे श्री सुदर्शन चक्रराज से बचा लेंगे पर प्रभु ने स्पष्ट मना कर दिया । प्रभु अपना अपराध क्षमा कर देते हैं पर अपने भक्तों पर हुआ अपराध प्रभु कतई सहन नहीं करते, यह सिद्धांत यहाँ प्रतिपादित होता है ।
290. प्रभु ने स्पष्ट कह दिया मैं कुछ नहीं करूँगा । श्री दुर्वासाजी ऋषि ने कहा कि संसार आपके अधीन है तो प्रभु ने कहा कि पर मैं अपने भक्त के अधीन हूँ । भक्ति की कितनी बड़ी महिमा प्रभु ने यहाँ प्रकट करी ।
291. प्रभु कहते हैं कि मैं अपने श्रीमुख से भी भक्ति की महिमा नहीं बता सकता । भक्ति की महिमा इतनी बड़ी है ।
292. मैं, मेरा परिवार, मेरी संपत्ति, मेरा इहलोक-परलोक को दांव पर लगाकर मेरे भक्त मेरी भक्ति करते हैं । श्री दुर्वासाजी ऋषि को प्रभु भक्ति की ऐसी महिमा बताते हैं ।
293. भक्त कहता है कि श्रीठाकुर सेवा ही उसका धर्म है, कोई जगत में उसे भला कहे या बुरा कहे श्रीठाकुर सेवा ही उसका परम धर्म है और दुनियादारी से उसका कोई काम नहीं है ।
294. प्रभु के श्रीवाक्य हैं कि मेरे भक्त ऐसे होते हैं जो मुझे छोड़कर कुछ भी नहीं जानते, न जानने का प्रयास करते हैं । मैं (प्रभु) भी ऐसे भक्तों को ही जानता हूँ, अन्य को जानने का मेरा कोई प्रयोजन नहीं है ।
295. प्रभु अपने भक्त के लिए सबकी उपेक्षा कर देते हैं, इतना प्रेम प्रभु अपने भक्तों से करते हैं ।
296. प्रभु कहते हैं मैं भक्तों को वरदान देने जाता हूँ पर आज तक एक भी मेरे सच्चे भक्त ने कुछ नहीं मांगा, मैं (प्रभु) देना चाहता हूँ पर वे लेना ही नहीं चाहते । भक्त कहता है कि अगर देना ही है तो आपकी भक्ति दे दें, धन-दौलत और किसी को दे दीजिए ।
297. धन-दौलत और किसी को देने की बात भक्त कहता है । भक्त कहता है कि प्रभु अपने स्वयं को मुझे दे दें और प्रेम और दया मुझ पर रखें । अपना चाकर जानकर और मानकर मुझे अपने सेवा में नियुक्त कर दें, यही भक्त मांगता है ।
298. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में इतना सुंदर भक्तों का वर्णन प्रभु द्वारा कहीं नहीं मिलेगा । प्रभु भक्तों की महिमा बताते-बताते गदगद हो जाते हैं ।
299. प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्तों का हृदय मुझसे बंधा हुआ रहता है, उनका संसार में कोई अपना नहीं होता । ऐसे भक्तों के बंधन में प्रभु आ जाते हैं और वे भक्त प्रभु को अपने वश में कर लेते हैं । प्रभु वश में कैसे होते हैं, इसका प्रभु यहाँ उल्लेख करते हैं कि भक्त के संपूर्ण समर्पण से यह संभव होता है ।
300. श्रीमद् भागवतजी महापुराण के माहात्म्य में लिखा है कि समय में बंधकर श्रीमद् भागवतजी महापुराण का श्रवण नहीं करना चाहिए । सात दिन में श्रवण कर ली, पढ़ ली, ऐसा नहीं करना चाहिए । एक-एक श्लोक का इतनी-इतनी गहराई से अध्ययन करना चाहिए, उनके अनेकों भाष्य पढ़ने चाहिए ।
301. प्रभु कहते हैं कि मेरे हृदय को चीरकर देखो तो वहाँ मेरे भक्त ही मिलेंगे । क्योंकि भक्त के हृदय में भगवान तो भगवान के हृदय में भक्त मिलते हैं ।
302. इस भक्ति के आगे तप भी क्या करेगा, समाधि भी क्या करेगी और योग भी क्या करेगा, ऐसा संत कहते हैं ।
303. सच्चे संत वे हैं जिनके हृदय के आसन पर प्रभु का वास होता है ।
304. श्री दुर्वासाजी ऋषि से प्रभु कहते हैं कि तुम मेरा अपमान कर देते तो मैं इसी क्षण क्षमा कर देता पर तुमने मेरे भक्त का अपमान किया है इसलिए मैं कुछ भी नहीं कर सकता ।
305. प्रभु ने श्री दुर्वासाजी ऋषि को कहा कि मेरे भक्त श्रीअम्बरीष के पास जाकर देखो, मेरे भक्त कैसे होते हैं । वहाँ जाकर क्षमा मांगना फिर देखना मेरा भक्त कैसे पलभर में क्षमा कर देता है और तुम्हारा कल्याण करता है ।
306. जीवन में सदैव सद्गुणों का विकास करते चलना चाहिए । हमारे जीवन का यह क्रम निरंतर चलते रहना चाहिए ।
307. परमार्थ में क्या करना है यह प्रभु ने एक श्लोक में व्याख्या करते हुए बताया है । सर्वोत्तम साधन का पूर्ण आधार क्या है ? साधन का मुख्य आधार हमारी बुद्धि होती है । जब तक बुद्धि में विवेक नहीं जगेगा तब तक सात्विक विचार ही नहीं जगेगा ।
308. ज्ञान के महत्व को गौण कभी नहीं मानना चाहिए । प्रभु को जानने हेतु ज्ञान यानी बुद्धि का सहयोग लेना चाहिए ।
309. शास्त्रों के अर्थ लगाने की युक्तियां, उसकी संगति, विरोधाभास भाव की भी संगति लगाने की कला हमारे ऋषियों और संतों के पास ही होती थी ।
310. प्रभु कहते हैं तीव्र और सात्विक बुद्धि से मेरे बारे में जाना जा सकता है । विशुद्ध बुद्धि से नहीं बल्कि अति विशुद्ध बुद्धि से ही प्रभु को जाना जा सकता है ।
311. संकीर्तन के साथ-साथ प्रभु ज्ञान की चर्चा भी जीवन में चलती रहनी चाहिए ।
312. ज्ञान की चर्चा हमारे अज्ञान को नष्ट करके जाती है ।
313. बुद्धि की मलिनता निकल जाए तो सिर्फ सात्विक यानी सतोगुणी बुद्धि रह जाएगी ।
314. तमोगुण को दूर करने के लिए रजोगुण को जागृत करना पड़ता है । फिर रजोगुण को सतोगुण में बदलना पड़ता है तभी आत्म सुख मिलता है ।
315. श्रीमद् भगवद् गीताजी में बताए देवी संपदा के विकास से सतोगुण जीवन में बढ़ता है ।
316. मैं शरीर हूँ - यह देह बुद्धि में स्थित हमारा मन होता है जो सबसे नीचे स्तर पर होता है । शास्त्रों में इसे पशु बुद्धि कहा गया है ।
317. बुद्धि सात्विक होती चली जाएगी तो हमें यह भान होगा कि मैं शरीर नहीं हूँ, मैं आत्म तत्व हूँ ।
318. साधारण मनुष्य देह के लिए ही जीता है पर महात्मा शरीर को साधन मात्र मानकर इसका उपयोग करते हैं । प्रभु को पाने के लिए शरीर महात्मा का सर्वाधिक उपयोगी उपकरण होता है ।
319. संत भी अपने शरीर को संभालते हैं पर सिर्फ साधन करके भगवत् प्राप्ति के लक्ष्य के लिए ।
320. शरीर जड़ है और आत्मा चेतन है, ऐसा शास्त्रों का मत है ।
321. जिसे स्वयं का ज्ञान नहीं होता और अन्य का भी ज्ञान नहीं, वह जड़ है और जिसे स्वयं का भी ज्ञान है और अन्य का भी ज्ञान है, वह चेतन है ।
322. मैं चेतन हूँ, जड़ शरीर नहीं हूँ - यह भान होना चाहिए । जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी को हम कहेंगे कि आप जगत को प्रकाश से भरकर अंधकार दूर कर देते हैं तो वे कहेंगे कि अंधकार क्या है ? प्रभु श्री सूर्यनारायणजी को अंधकार का पता ही नहीं वैसे ही हमें भान होना चाहिए कि हम चेतन हैं, जड़ नहीं हैं । जड़ का भान ही नष्ट हो जाए जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी को अंधकार का भान ही नष्ट हो गया ।
323. ऐसी चेतन अवस्था आने पर हम चेतन प्रभु को पा जाते हैं । हमें हर तरफ चेतन-ही-चेतन दिखता है और हम हर तरफ आनंद का ही अनुभव करते हैं ।
324. जिसने चेतन तत्व को पहचान लिया उसका जीवन शरीर के रहते और शरीर के बाद भी आनंदमय रहता है क्योंकि आनंद उसका स्वभाव बन जाता है ।
325. श्री उद्धवजी ज्ञान में उलझ गए और कहा कि मेरे ध्यान में भगवत् प्राप्ति की बात ही नहीं आ रही, तब प्रभु ने श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध का उन्हें उपदेश दिया और समझाया ।
326. प्रभु कहते हैं कि जीव को बंधन नहीं क्योंकि बंधन होता तो वह कभी नष्ट नहीं होता इसलिए हमारा बंधन काल्पनिक है । वैसे ही मुक्ति भी काल्पनिक है । मुक्ति शब्द तभी तक ही है जब तक बंधन को हम मानते हैं । जीव तो सदैव से ही मुक्त है । वह बंधन में है ही नहीं इसलिए जीव को मुक्ति की आवश्यकता नहीं ।
327. एक नाटक में एक व्यक्ति को अंधे व्यक्ति की भूमिका निभानी होती है । अंधा न होने पर भी उसे अंधा जैसा अभिनय उस नाटक मंच पर करना पड़ता है पर जैसे ही वह मंच के पीछे जाता है उसकी आँखों से दिखाई देने लग जाता है । प्रश्न यह है कि क्या वह अंधा है - नहीं । उसने सिर्फ अंधेपन का भाव रखा था इसी तरह हम बंधन के भ्रम में जीते हैं ।
328. साधन करना अनिवार्य है । जैसे एक बच्चा बार-बार घर के बाहर जाता है तो माँ ने कह दिया कि बाहर डाकू है तो बच्चा सहम जाता है और बाहर नहीं जाता । अब अगले दिन बच्चों को किसी काम से माँ बाहर भेजना चाहती है तो बच्चा डाकू के डर से मना कर देता है । माँ कहती है कि ताली बजाकर मैं डाकू को भगा देती हूँ । बच्चा सोचता है कि डाकू भाग गया और अब वह जाने को तैयार हो जाता है क्योंकि डर चला गया । न डाकू था, डाकू का भय निर्माण किया गया था, फिर डाकू का भय हटाया गया । वैसे ही हम मुक्त हैं, बंधन का भ्रम निर्माण हुआ, फिर साधन से भ्रम हटाया गया जिससे हम बंधनमुक्त हो गए ।
329. जैसे एक चश्मा को हमने सिर पर चढ़ा लिया फिर उसे खोज रहे हैं तो क्या चश्मा खोया है - नहीं । किसी ने बताया कि चश्मा तो सिर पर है तो उसी समय चश्मा मिल गया । इसी प्रकार हम बंधन के भ्रम में हैं पर हम तत्काल बंधन मुक्त हो सकते हैं, अगर हम जागृत हो जाते हैं ।
330. पहले शरीर का विसर्जन चेतना में, फिर चेतना का विसर्जन प्रभु में, यह अंतिम लक्ष्य होता है ।
331. जीवात्मा भोग दृष्टि से शरीर को देखता है । भोग के कारण क्षणिक सुख और बहुत सारा दुःख वह जीवन में पाता है ।
332. जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी का प्रतिबिंब जल में, प्रतिबिंब का कुछ भी हो गया पर बिंब पर कोई फर्क नहीं पड़ता वैसे ही हर क्रिया प्रतिबिंब जिससे चेतन तत्व यानी बिंब पर कोई फर्क नहीं पड़ता ।
333. प्रभु ज्ञान तक आने के सारे मार्ग उत्तम होने पर भी सबसे सरल मार्ग भक्ति का ही है ।
334. चाहे सारे शास्त्र का अध्ययन कर लें, श्री वेदजी कंठस्थ कर लें, सब सद्गुण जीवन में ले आए फिर भी प्रभु की भक्ति नहीं की तो उसकी जीवन में पूर्णता कभी नहीं आ सकती । भक्ति के अभाव में उसके कष्ट कभी नहीं कटेंगे और उसे आनंद कभी नहीं मिलेगा ।
335. प्रभु के रूप का ध्यान, प्रभु के सद्गुण एवं श्रीलीला रूपी कथा का श्रवण, प्रभु नाम का संकीर्तन - भक्ति के यह तीन मुख्य आधार हैं जो प्रभु ने श्री उद्धवजी को बताए ।
336. परमात्मा तत्व का ज्ञान जिसको हो गया वह शरीर में रहकर भी सब क्रिया करता हुआ भी उसमें फंसता नहीं है ।
337. सारा संसार कल्पनामय है इसलिए इस कल्पना को अपने अंतरात्मा से निकालने हेतु सर्वोत्तम मार्ग है भक्ति करके परमात्मा तत्व का जीवन में आश्रय लेना ।
338. मन को कल्पना करने का अभ्यास, उसे प्रभु की कल्पना करने दें । मन को शब्द चाहिए, उसे प्रभु के भजन सुनने में लगा दें । मन को रूप चाहिए, उसे प्रभु के रूप का आस्वादन करने दें ।
339. सपने में एक राजा ने देखा कि वह भिखारी बन गया । राजा सपने में दुःख कर रहा था, रो रहा था । वैसे ही हम चेतन होते हुए भी अपने को शरीर मानते हुए अज्ञान की निद्रा में हम सुख-दुःख को देखते हैं । ज्ञानी वह व्यक्ति होता है जिसका सपना टूट जाता है और वह जग जाता है ।
340. जैसे दो राजकुमार भिखारी बनने का एक ही सपना देख रहे थे । पहला राजकुमार सपना देख रहा था, दूसरा जग गया तो जो दुःख पहले राजकुमार को हो रहा था निद्रा में, वह दूसरे का अपने आप ही नष्ट हो गया । क्योंकि वह दुःख तो मूल में था ही नहीं । वैसे ही हम संसार को सत्य मानकर इसमें सुख-दुःख को पकड़कर रोते हैं पर एक संत भी संसार को देखता है पर उसे पता होता है कि यह सत्य नहीं है, सपना है, इसलिए संसार उसे सुख-दुःख नहीं देता ।
341. एक बालक रात्रि में सपने में सांप से डर गया । सपने में उसके माता-पिता लाठी से सांप को नहीं मार सकते । इसका सटीक उपाय क्या है ? बच्चे को सपने से जगा दिया जाए तो उसका डर खत्म हो जाएगा । हम भी जीवन में जग जाएंगे तो संसार के सपने का सब डर खत्म हो जाएगा ।
342. प्रभु भक्ति योग की व्याख्या के प्रारंभ में कहते हैं कि हमें जो भी करना है प्रभु की प्रसन्नता हेतु ही करना है, यह जीवन का नियम बना लेना चाहिए ।
343. प्रभु कथा श्रवण से मन को विशुद्ध करना चाहिए । कथा में तीन घंटे बैठे हैं तो संसार की चिंता से, दुर्विचार से दूर और सकारात्मक विचार हमारे चित्त को शुद्ध करता है । तीन घंटे के लिए हम अशुद्धि से दूर हो जाते हैं ।
344. कथा के कथा प्रसंग का एकांत में स्मरण करना चाहिए । प्रभु की श्रीलीला का मन में अभिनय करना, मन में झांकी बनानी चाहिए । अपने प्रभु की श्रीलीला का मन में अभिनय करने से हृदय शुद्ध होता है । सूत्र यह है कि अभिनय हमें प्रभु का ध्यान हेतु स्वतः ही बाध्य कर देता है । हम प्रभु को ठीक से देखेंगे श्रीलीला में तभी तो मन में अभिनय कर पाएंगे । इसलिए प्रभु कथा में झांकी का प्रावधान कथा के बीच-बीच में किया जाता है ।
345. एक जगह प्रभु के जीवन पर आधारित नाटक किया गया । प्रभु किसे बनाया जाए इसका चयन हुआ । संयोग से वह बच्चा जो योग्य था वह माँसाहार करता था । उसे कहा गया कि माँसाहार त्यागना पड़ेगा । वह बच्चा प्रभु के अभिनय करने हेतु इतना पक्का था कि एक महीने तक माँसाहार छोड़ दिया । प्रभु की माला जपने लगा, प्रभु की फोटो देखने लगा कि मुझे इस तरह का ही स्वरूप बनाना है । प्रभु की कथा पढ़ने लगा, नाटक हुआ तब तक वह प्रभु से इतना प्रेम करने लगा कि इतना सुंदर अभिनय उसने किया कि लोग उसको प्रणाम करने उमड़ पड़े । उसकी और उसके परिवार की जीवनचर्या ही बदल गई ।
346. अपने सांसारिक प्रपंच को त्यागने की जरूरत नहीं पर इतना बीच-बीच में भाव लाना चाहिए कि यह सांसारिक प्रपंच का नाटक कर रहा हूँ पर असल में प्रभु को प्राप्त करना ही मेरे जीवन का लक्ष्य है ।
347. श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं कि जो मुझे प्राप्त करने के लिए इतनी भक्ति करेगा उसके हृदय में मैं (प्रभु) बस जाऊँगा और उसे कभी छोडूंगा नहीं ।
348. जीवन की सभी अशुद्धि का नाश प्रभु की भक्ति कर देती है ।
349. सुख अपने आप दौड़कर उनके पास आता है जो प्रभु की शरण में चले जाते हैं ।
350. प्रभु कहते हैं कि मुझे क्षीरसागर में, श्री बैकुंठजी में भी वह सुख नहीं मिलता जो मेरे भक्त जब मेरा कीर्तन और भजन करते हैं तब मिलता है ।
351. प्रभु से श्री उद्धवजी कहते हैं कि यह भक्ति का मार्ग तो बहुत अच्छा बताया । ज्ञान कितनों को भव पार करेगा यह पता नहीं पर भक्ति से सभी भव पार हो जाएंगे ।
352. प्रभु से श्री उद्धवजी भक्ति की और जिज्ञासा और व्याख्या हेतु निवेदन करते हैं और प्रभु श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध में अपना पूरा मन खोलकर भक्ति का प्रतिपादन करते हैं ।
353. भक्ति करने वाले जीव को जीवन में से सकामता कम कर देनी चाहिए ।
354. जीवन में किसी के साथ भी हमारा निष्ठुरता का व्यवहार नहीं होना चाहिए ।
355. मेरा भजन सिर्फ मेरे प्रभु को प्रसन्न करने के लिए है, भजन भोग की चाहत के लिए नहीं होना चाहिए । अगर भोग की चाहत से प्रभु का भजन किया तो वह भोग तो मिल जाएगा पर चित्त शुद्ध नहीं होगा क्योंकि चित्त शुद्धि तो निष्काम भक्ति से ही संभव है ।
356. सूत्र यह है कि चित्त शुद्ध निष्काम भक्ति से ही होगा और तभी हम प्रभु तक पहुँच पाएंगे ।
357. उत्तम भक्त नियमित रूप से प्रभु के श्रीविग्रह का दर्शन करता है क्योंकि प्रभु के श्रीविग्रह काल्पनिक नहीं हैं । जैसे-जैसे संतों और भक्तों को प्रभु के स्वरूप के दर्शन हुए हैं वैसे-वैसे ही श्रीविग्रह बनते गए हैं । इसलिए मंदिर जाकर श्रीविग्रह के दर्शन करने से प्रभु का अनुग्रह हमें मिलता है ।
358. संत और भक्त जीवन में जहाँ भी मिले उन्हें तत्काल प्रणाम करना चाहिए । इससे प्रभु को प्रसन्नता होती है ।
359. नेत्रों से प्रभु के श्रीविग्रह का दर्शन करना चाहिए, हाथों से प्रभु के श्रीविग्रह के श्रीकमलचरणों का स्पर्श कर प्रणाम करना चाहिए, पूजन सामग्री से प्रभु की अर्चना करनी चाहिए ।
360. पूजा नहीं कर सकें तो परिचर्या करनी चाहिए । प्रभु के लिए मंदिर में झाड़ू लगाना, प्रभु के लिए माला बनाना, प्रभु के लिए रसोई बनाना - यह परिचर्या के विषय हैं । एक व्यक्ति पूरी पूजा कर ले और दस लोग उसमें परिचर्या के रूप में सहयोग करें तो दसों को वही फल प्राप्त होता है जो पूजा करने वाले को होता है ।
361. प्रभु की स्तुति करनी चाहिए । स्तुति प्रभु को अत्यंत प्रिय है । शास्त्रों के स्तोत्र की स्तुति करनी चाहिए, नहीं कर सके तो जो भी अपनी लोक भाषा यानी बोलचाल की भाषा में प्रभु की वंदना है वह करनी चाहिए । प्रभु के रूप और भाव हमारे भीतर स्थिर हो जाए, स्तुति इसके लिए जरूरी है । स्तुति में हम प्रभु के रूप, सद्गुणों का गान करते हैं वह प्रभु के रूप और सद्गुण हमारे हृदय में स्थिर हो जाते हैं । वह प्रभु के सद्गुण हमारे पर कृपा करने लगते हैं ।
362. प्रभु के सद्गुणों का गान करना यानी कीर्तन करना चाहिए । प्रभु के जितने भी सद्गुणों का हम गान करते हैं उन सद्गुणों की शक्ति गुणगान के कारण हमारे लिए काम करने लगती है । जैसे हमने कहा कि प्रभु कृपानिधान हैं तो प्रभु की कृपा हमरे लिए काम करने लगेगी ।
363. सायंकाल में स्तोत्र गान सामूहिक रूप से परिवार में होने से परिवार के सभी जनों का अमंगल नष्ट हो जाता है, ऐसा भक्तों का अनुभव रहा है ।
364. जितना-जितना प्रभु नाम का संकीर्तन करेंगे उतने-उतने हमारे भीतर की अशुद्धियां और पाप जलते जाएंगे ।
365. हमारे जन्मों-जन्मों के अशुद्ध मल को नष्ट करने के लिए श्रेष्ठ उपाय है - प्रभु का नाम जप और प्रभु के नाम का संकीर्तन ।
366. प्रभु का ध्यान करने का और प्रभु का स्मरण दिन में बार-बार करने का अभ्यास करना चाहिए ।
367. जो भी घर में आया वह प्रभु के सामने रखा जाए तब उसे प्रभु प्रसाद के रूप में स्वीकारना चाहिए । यह वैष्णव घरों की सदा से परंपरा रही है ।
368. एक संत थे जिनको चाय का बहुत शौक था । हर बार प्रभु को चाय का भोग लगाते । प्रभु को चाय का भोग, यह शास्त्रों में नियम नहीं है, नियम माखन मिश्री के भोग का है पर संत का नियम था कि जो भी ग्रहण करना वह श्री ठाकुरजी को अर्पण करके ही करना । इसलिए वे कहते कि प्रभु चाय का भोग स्वीकार करें । सूत्र यह है कि जो भी जीवन में आया, जीवन में एक नियम बना लेना चाहिए कि वह श्री ठाकुरजी के सामने जाना चाहिए । जीवन में यह अभ्यास बना लेना चाहिए, ऐसा श्री उद्धवजी को प्रभु श्रीमद् भागवतजी महापुराण में कहते हैं ।
369. रोज एक बार दिन में प्रभु को साष्टांग दंडवत प्रणाम करना चाहिए और कहना चाहिए कि प्रभु मैं आपका दास हूँ, मेरी सेवा और समर्पण स्वीकार करें ।
370. अपना आत्म-निवेदन प्रभु से करना चाहिए, यह भक्ति का सबसे बड़ा नियम है । अपना ही भोग प्रभु को चढ़ा देना चाहिए पर हम जीवन में प्रभु से संसार के भोग मांगते रहते हैं, जो कि गलत है । स्वयं को प्रभु को अर्पण कर देना चाहिए, ऐसा श्री उद्धवजी को प्रभु कहते हैं ।
371. प्रभु कहते हैं कि मेरी कथा घर पर कहनी चाहिए, मेरे विभिन्न अवतारों की कथा कहनी चाहिए । किसी श्रीव्यास को बुलाने की जरूरत नहीं, खुद कहना घर के सदस्यों को खासकर बच्चे, पोते-पोती को ।
372. प्रभु के उत्सव घर में मनाने चाहिए । श्रीजन्माष्टमी, श्रीरामनवमी, श्रीशिवरात्रि, श्रीनवरात्रि और अन्य सभी उत्सव । उस समय घर में सजावट, पूजा, भजन होना चाहिए । जहाँ नित्य प्रभु के उत्सव होते हैं वहाँ प्रभु चले आते हैं । सूत्र यह कि प्रभु को जितना लाड़ लड़ाएंगे उतनी प्रभु की जागृति हमारे भीतर होगी ।
373. जीवन में प्रभु के लिए तीर्थों की यात्रा करनी चाहिए ।
374. प्रभु को नैवेद्य, फूल, फल, अन्य पकवानों आदि का भोग लगाना चाहिए ।
375. एक संत कहते थे कि जितने प्रभु के उत्सव मनाते हैं उतनी प्रभु के प्रताप से हमारी ऊर्जा सकारात्मक हो जाती है और प्रभु का श्रीविग्रह, जिसका उत्सव मनाया जा रहा है, वह भी उतना चेतनमय होता चला जाता है ।
376. जीवन में किसी भी प्रभु के नाम या मंत्र की दीक्षा लेनी चाहिए उसका जाप नित्य नियम से करना चाहिए ।
377. जीवन में प्रभु के लिए कुछ नियम धारण करना चाहिए । कम-से-कम एकादशी का व्रत तो जरूर करना चाहिए । संत कहते हैं कि जीवन में बहुत सारे नियमों के जंजाल में बंधना गलत है पर बिना नियम के होना भी बहुत गलत है । कोई भी नियम जीवन में जरूर लेना चाहिए क्योंकि प्रभु के लिए कुछ नियम नहीं होगा तो हमारी बुद्धि तमोगुणी बन जाएगी और प्रभु के लिए प्रेम भाव जागृत नहीं होगा ।
378. जो भी दिन भर में जीवनयापन के लिए करें उसे प्रभु की पूजा के रूप में करें और प्रभु को हाथ जोड़कर उसका निवेदन कर देना चाहिए ।
379. जीवन में कोई भी प्रभु की प्रतिमा की स्थापना करें और उसकी सेवा खुद नहीं कर सके तो उसमें सहयोग जरूर देना चाहिए । सेवा घर का कोई सदस्य करे मगर उसमें हमारा पूर्ण सहयोग होना चाहिए ।
380. प्रभु के सार्वजनिक मंदिर में उद्यान यानी बगीचा लगाना और प्याऊ जरूर बनानी चाहिए ।
381. प्रभु कहते हैं कि जो सार्वजनिक मंदिर बनाने में सहयोग देता है, उसमें बगीचा और प्याऊ लगाता है और मेरी मंदिर की सफाई की विशेष व्यवस्था रखता है उसे मंदिर में सहयोग देने का बहुत पुण्य मिलता है । बहुत सारे सनातन धर्म के पंथ हैं जो मंदिर में सफाई का बहुत विशेष ध्यान रखते हैं ।
382. जो छोटे-से-छोटा बन जाता है यानी तिनके से भी छोटा बन जाता है वही प्रभु को प्राप्त कर सकता है । जितने छोटे बन सकेंगे उतने प्रभु के करीब जल्दी पहुँचेंगे । श्री उद्धवजी को प्रभु कहते हैं कि इतना ही सिद्धांत ध्यान में रखना चाहिए ।
383. प्रभु कहते हैं कि मंदिर को साफ नहीं कर सकते तो उसे गंदा और मैला तो कभी भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करना पातक होता है ।
384. संसार का सबसे छोटा प्राणी मैं हूँ, प्रभु कहते हैं कि यह भाव अपने हृदय में लाना चाहिए ।
385. प्रभु कहते हैं कि जीवन में किसी का भी कभी विरोध नहीं करना चाहिए ।
386. मैं किसी से मान नहीं चाहूँगा और सबका सम्मान करूँगा, यह सिद्धांत जीवन में बनाना चाहिए श्री उद्धवजी को प्रभु कहते हैं ।
387. हमारे शरीर को प्रभु सेवा के हर साधन करने की आदत होनी चाहिए ।
388. प्रभु कहते हैं कोई मेरे मंदिर की सफाई करें, कोई लिपाई करें, कोई सुगंध छिड़के, कोई रंगोली बनाएं, कुछ-न-कुछ मेरे लिए जरूर करना चाहिए । अपने को प्रभु का सेवक मानकर ऐसा करना चाहिए ।
389. प्रभु की सेवा का दिखावा कभी नहीं करना चाहिए । जो किया वह किसी से कहा गया या दिखाया गया तो वह बेकार हो गया । जितना छुपाया जाता है उतना ही वह बढ़ जाता है, यह सूत्र है ।
390. प्रभु के लिए जो-जो निर्धारित किया गया है उसमें से रत्ती भर का भी उपयोग अपने लिए नहीं करना चाहिए । उदहारण स्वरूप मंदिर के दीपक के घी का दान कर दिया और उस दीपक की लौ में घर का हिसाब कर लिया तो दोष लग जाएगा । सूत्र यह है कि जो वस्तु श्री ठाकुरजी की सेवा में अर्पण हो गई उसका उपयोग स्वयं के लिए करना पाप कर्म है ।
391. एक संत समाधि के अट्ठारह वर्षों बाद एक व्यक्ति से मिले जिनका सबसे ज्यादा विकास पूरे गांव में हुआ था जबकि वे शुरू में मजदूर थे । एक नियम उन्होंने लिया कि प्रभु श्री महादेवजी के मंदिर में जाकर दीपक जलाकर ही भोजन करना । इतनी सेवा बिना समझौते के उन्होंने संत के कहने पर करी और इस नियम को जिंदगी में कभी नहीं छोड़ा । यह नियम उनको तारने वाला बना गया । प्रभु श्री महादेवजी ने एक छोटे से नियम से उन्हें इतना बड़ा बना दिया ।
392. प्रभु को वही अर्पण करना चाहिए जो अपने स्वयं को सबसे प्रिय हो, वह नहीं जो घर में फालतू हो । जो जीवन में प्रामाणिकता से प्रभु को चढ़ाया जाएगा, उतने ही प्रामाणिकता से वह प्रभु हम तक वापस पहुँचाएंगे । प्रभु को एक बात अच्छी नहीं लगती कि हम प्रभु सेवा में कंजूसी करते हैं । जिसके पास कुछ नहीं है प्रभु को उससे कुछ नहीं चाहिए पर जिसके पास है उसको प्रभु की सेवा पूरे मन से और श्रेष्ठतम तरीके से करनी चाहिए ।
393. जो मुझे सबसे अच्छा लगता है वह मेरे प्रभु के लिए होना चाहिए ।
394. प्रभु श्री सूर्यनारायणजी को अर्घ्य देना चाहिए । सब रूपों में एक ही प्रभु को देखना चाहिए ।
395. श्री अग्निदेवजी का हवन करके पूजन करना चाहिए । गौ-माता का नित्य पूजन करना चाहिए ।
396. प्रभु कहते हैं कि जो भी भक्त हो और मेरा नाम ले रहा हो, वह जाति से, रूप से, वर्ण से चाहे कोई भी हो, पापी-से-पापी क्यों न हो, महापापी भी हो पर अगर वह हाथ में गंगाजल लेकर ओम नमः शिवाय कहता हुआ चलता है तो वह पूजनीय है । सूत्र यह है कि प्रभु कहते हैं कि भक्तों के अंदर भी मेरी पूजा करना सीखना चाहिए ।
397. आकाश, वायु, जल और भूमि में मुझे मानकर पूजा करनी चाहिए, ऐसा प्रभु उपदेश देते हैं ।
398. अपने भीतर यानी हृदय में भगवान का मुख्य स्थान है और वहाँ भगवान की पूजा करनी चाहिए ।
399. जैसे अपने भीतर मुझे देखना चाहिए वैसे ही सबके भीतर भी मुझे देखना चाहिए और पूजा करनी चाहिए, ऐसा प्रभु कहते हैं ।
400. प्रभु कहते हैं कि मेरी सेवा प्रधानता से करनी चाहिए ।
401. श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं कि निरंतर जीव को मेरी याद बनी रहनी चाहिए, यह जीवन जीने का सबसे बड़ा सूत्र है ।
402. प्रभु कहते हैं कि प्रभु के ऊपर योग, वेदांत, कर्मकांड, तप, यज्ञ वह प्रभाव नहीं करता यानी उनसे प्रभु इतने प्रभावित नहीं होते जितना कि इन सबका शिरोमणि साधन भक्ति से प्रभावित होते हैं । प्रभु ऐसा कहते हैं सब छूट जाए तो चलेगा पर भक्ति कभी नहीं छूटनी चाहिए ।
403. प्रभु कहते हैं कि हमेशा सत्संग करना चाहिए । कुछ दिन सत्संग छोड़कर देखें तो मन में मलिनता आ जाती है । जैसे कपड़े को नहीं धोया जाए तो दो दिन में मलिनता आ जाती है वैसे ही मन को मलिनता आ जाती है अगर उसको सत्संग के जल से नित्य नहीं धोया जाए ।
404. प्रभु कहते हैं कि मनुष्य की बात ही क्या पशु, राक्षस, गंधर्व, पक्षी सभी सत्संग से तर गए । प्रभु नाम गिनते हैं श्री प्रह्लादजी का, श्री विभीषणजी का, श्री काकभुशुण्डिजी का, श्री गजेंद्रजी का और भगवती शबरीजी का ।
405. श्रीगोपीजन को प्रभु याद करते हैं और कहते हैं कि उन्हें भूखा रखा उनके पतियों ने फिर भी अपनी भूख की भी परवाह नहीं करते हुए, मेरे भूख की चिंता करते हुए मुझे खिलाने के लिए खाद्य सामग्री लेकर मेरे पास आती थीं । उनके पास एक ही धन था और वह था भक्ति भाव का धन ।
406. श्रीगोपीजन को प्रभु याद करते हैं और वह दृश्य याद करते हैं जब श्री अक्रूरजी के साथ प्रभु मथुरा जा रहे थे और श्रीगोपीजन रथ के सामने लेट गईं कि हमारे ऊपर से प्रभु को चलकर जाना पड़ेगा ।
407. अपने प्राणप्रिय गोपियों के बारे में प्रभु कहते हैं कि कोई शास्त्र उन्होंने नहीं पढ़ा पर उनका हृदय इतना भक्ति भाव से भरा हुआ था जिस कारण प्रभु उन्हें कभी नहीं भुला सके और न कभी भुला सकेंगे ।
408. प्रभु अपने प्राणप्रिय गोपियों के बारे में कहते हैं कि उन्होंने इतना समय मेरे साथ बिताया, फिर भी उनको अतृप्ति रहती थी । मैं (प्रभु) जाने के लिए कहता तो वे मना कर देती थी और कहती थी कि अभी तो आए हो, यह गोपीजन का भाव सदैव होता था ।
409. प्रभु कहते हैं कि श्रीगोपीजन को एक रोग लग गया था और वह था मेरी भक्ति का रोग । दिन-रात वे मेरा नाम लेती थीं और मेरे रूप को अपने हृदय में देखती थीं ।
410. प्रभु कहते हैं कि सभी गोपीजन मेरे में विलीन हो जाएंगी । श्रीगोपी मेरा ही रूप बन जाएंगी ।
411. अलग-अलग नदी जैसे सागर में मिलती है तो वे सब सागर रूप हो जाती है वैसे ही सभी श्रीगोपी श्रीकृष्ण रूप हो जाएंगी ।
412. प्रभु कहते हैं कि उन गोपियों को पता नहीं था कि मैं परब्रह्म हूँ फिर भी वे इतना विश्वास और प्रेम मेरे से करती थीं । परब्रह्म जानती तो कोई स्वार्थ आ जाता पर उनका कोई स्वार्थ नहीं था इसलिए वे सब मेरे में ही विलीन होंगी ।
413. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में प्रभु कहते हैं श्री उद्धवजी को कि जो ज्ञान पढ़ा है, जो भी मेरे से सुना है, वह सब भूल जाओ । सब शास्त्रों का विसर्जन कर दो । क्या करना है, मैं बतलाता हूँ, एकमात्र मेरी शरण में आ जाओ और अन्य सबको भूल जाओ । मैं विश्वास से कहता हूँ कि मैं तुम्हें सभी भय से सदा-सदा के लिए मुक्त कर दूँगा, तुम्हारे जीवन के सभी विकारों को समाप्त कर दूँगा ।
414. श्री दुर्वासा ऋषि तपस्या मूर्ति थे, श्रेष्ठ सिद्धियां उन्हें प्राप्त थी और दूसरी तरफ प्रभु के जो भक्त अम्बरीषजी थे वे केवल प्रभु के भक्त थे । प्रभु ने यह श्रीलीला इसलिए करके दिखलाई कि प्रभु की दृष्टि में भक्ति कितनी श्रेष्ठ होती है ।
415. शास्त्रों में बताया गया है कि श्री ब्राह्मणदेव के भीतर की दो आँखें होती हैं । एक विद्या की और दूसरी तप की । दोनों होना जरूरी है नहीं तो एक आँख की कमी रह जाएगी । प्रभु फिर भी दिखाना चाहते हैं कि भीतर की दोनों आँखें होने पर भी अगर किसी भी श्री ब्राह्मणदेव में अहंकार आ जाता है तो उसका पतन होता है जैसे श्री दुर्वासा ऋषि का हुआ ।
416. श्री दुर्वासा ऋषि ने सोचा कि अम्बरीषजी मुझे बहुत बुरा भला कहकर क्षमा करेंगे । किंतु भक्त का लक्षण देखे कि श्री दुर्वासा ऋषि जैसे ही अम्बरीषजी के पैर पर गिरना चाहते थे अम्बरीषजी ने गिरने नहीं दिया और उन्हें उठाया । अम्बरीषजी के हाथ जुड़े थे और वे विनम्रता की मूर्ति बन गए । जब श्री सुदर्शन चक्रराज आए तो अम्बरीषजी ने श्री दुर्वासा ऋषि को पीछे कर लिया और खुद आगे हो गए । श्री सुदर्शन चक्रराज को प्रणाम किया और उन्हें शांत होने का निवेदन किया । श्री सुदर्शन चक्रराज शांत नहीं हुए क्योंकि भक्त का अपराध प्रभु के अस्त्र भी सहन नहीं करते, प्रभु तो सहन करते ही नहीं है । फिर अम्बरीषजी ने कहा कि अगर मैंने बाल्यकाल से निष्ठा से प्रभु की पूजा और सेवा की है तो मेरे सब पुण्यों की शपथ देता हूँ कि आप शांत हो जाएं । अपने पुण्यों को दांव पर लगाकर प्रभु के भक्त ने श्री सुदर्शन चक्रराज को शांत किया और श्री सुदर्शन चक्रराज अंतर्ध्यान हो गए ।
417. श्री अम्बरीषजी का नियम था और उन्होंने अब तक भोजन ग्रहण नहीं किया था जबकि श्री सुदर्शन चक्रराज से बचने के लिए श्री दुर्वासा ऋषि एक वर्ष से दौड़ रहे थे । श्री अम्बरीषजी ने एक वर्ष तक अन्न का त्याग कर रखा । ऐसी भक्त की महानता देखकर श्री दुर्वासा ऋषि एकदम स्तंभित रह गए ।
418. श्री अम्बरीषजी जब श्री दुर्वासा ऋषि को प्रणाम करने झुके तो श्री दुर्वासा ऋषि ने उठाकर उन्हें गले से लगा लिया और कहा कि मुझे आज एक सच्चे भक्त के दर्शन हुए हैं । प्रभु कृपा से एक सच्चे भक्त के दर्शन का पुण्य मुझे आज मिला है । आज तक मेरा दर्शन करके लोग कृतार्थ होते थे पर आज भक्त का दर्शन करके मैं कृतार्थ हो गया । भक्त के घर का अन्न ग्रहण करने से मेरी पूरी जीवन की तपस्या ही मानो सफल हो गई ।
419. श्री दुर्वासा ऋषि ने श्री अम्बरीषजी को आशीर्वाद दिया कि जब तक भगवती गंगा माता मृत्युलोक में है तब तक भक्त तुमसे यानी श्री अम्बरीषजी से प्रेरणा लेते रहेंगे । प्रभु ने विश्व को दिखाया कि भक्त का जीवन कैसा होना चाहिए । संसार भक्तों के चरण में झुक जाता है, यह प्रभु ने दिखाया । तपस्या की मूर्ति श्री दुर्वासा ऋषि को भी भक्त के चरणों में झुकना पड़ा ।
420. महाराज श्री अम्बरीषजी अपना राज्य कभी नहीं मानते थे, प्रभु का राज्य मानते थे और नित्य अपने हाथों से प्रभु की सेवा स्वयं करते थे । विनम्रता, क्षमा की मूर्ति थे, क्रोध उनको छूता तक नहीं था, सद्गुणों के खान थे । सूत्र यह है कि सद्गुणों की माला भक्ति ही देती है । प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में उन सभी सद्गुणों को गिनाया जो भक्ति के कारण जीव में आ जाते हैं ।
421. प्रभु को प्रेमपूर्वक बीच में रखकर सद्गुणों की माला बनानी चाहिए और उसे पहननी चाहिए, यही भक्ति है ।
422. प्रभु से निष्ठा, प्रभु से प्रेम - यह भक्ति की मूल पूंजी है ।
423. भक्ति एक लगातार होने वाली क्रिया है जिससे सद्गुण हमारे जीवन में आते हैं और दुर्गुण जाते रहते हैं । ऐसा तभी होता है जब भक्ति सही दिशा में हो रही है ।
424. इतने वर्षों से भक्ति कर रहे हैं तो क्या हमारे अवगुण कम हो रहे हैं और सद्गुण बढ़ रहे हैं । यह आकलन हमको हर वर्ष करना चाहिए ।
425. प्रभु मार्ग पर अग्रसर हर साधक को एक आकलन हर जन्मदिन पर करना चाहिए कि सद्गुणों की वृद्धि और अवगुणों का त्याग कितना हुआ । यह आकलन अत्यंत जरूरी होता है ।
426. प्रभु श्री रामजी के सद्गुणों का अनुसरण ही जीवन में करने का लक्ष्य बना लें तो अन्य किसी भी शास्त्रों में सद्गुण को देखने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी ।
427. प्रभु श्री रामजी साक्षात सद्गुणों की मूर्ति हैं । उनका कभी भाइयों से झगड़ा नहीं हुआ, सदैव माता-पिता की आज्ञा का पालन किया, कभी धर्म विरुद्ध आचरण नहीं किया, कभी ऊँ‍‍ची आवाज में बोले नहीं । धर्म युक्त आचरण करके जीवनभर एक आदर्श प्रभु श्री रामजी ने प्रस्तुत किया ।
428. संतों ने भी हमें सद्गुणों की सूची दे दी । श्री नरसी मेहताजी के पद “वैष्णव जन तो तेने कहिए” में सच्चे वैष्णव के सदगुण दिए गए हैं । हमने वैष्णव को संप्रदाय बना लिया है, वैष्णव संप्रदाय नहीं है, जिसमें सद्गुण है वही सच्चा वैष्णव है और प्रभु को अतिशय प्रिय है ।
429. प्रभु श्री वेदव्यासजी, प्रभु श्री शुकदेवजी, संत श्री ज्ञानेश्वरजी, गोस्वामी श्री तुलसीदासजी सब एकमत है कि प्रभु भक्ति और सद्गुणों का विकास कोई भी हो, किसी भी संप्रदाय का हो, जो भी ऐसा करता है उसका उद्धार तय है ।
430. सद्गुणों का विकास यानी हमारी जीवन शैली सात्विक बनी रहे, यही धर्म हमें सिखाता है ।
431. सात्विकता सनातन धर्म का मूल है, सद्गुणों का विकास सनातन धर्म का मूल है ।
432. संसार में ऐसा कोई भी नहीं हुआ जिसको मधुर कंठ प्रिय नहीं, कोमल शब्द प्रिय नहीं और विनम्रता प्रिय नहीं । इसलिए यह सद्गुण जीव में होना बहुत जरूरी है ।
433. संत श्री रामदास स्वामीजी को जब प्रभु दर्शन हुए तो उन्होंने मांगा कि मेरी हर क्रिया इतनी विनम्र हो, मेरी वाणी इतनी कोमल हो जो प्रभु को अति प्रिय लगे, यही एक भक्त के लक्षण होते हैं ।
434. एक संत ने प्रभु से मांगा कि मुझमें विवेक नहीं कि मैं क्या मांगू इसलिए जो आपको उचित लगे वह दे दें । इतनी सुंदर मांग कि प्रभु को स्वयं को ही देना पड़ता है ।
435. सागर पुत्रों ने क्रोध किया तो वे भस्म हुए, श्री अंशुमानजी गए और विनम्र रहे तो प्रभु श्री कपिलजी ने अश्व लौटा दिया और भगवती गंगा माता के आह्वान की प्रेरणा दी । सूत्र यह है कि क्रोध से सागर पुत्रों ने गंवाया और विनम्रता से श्री अंशुमानजी ने पाया ।
436. तीन पीढ़ियों की भक्ति से प्रकट हुई भगवती गंगा माता । भगवती गंगा माता इतनी विलक्षण हैं, इतनी दिव्य हैं जिनकी तुलना विश्व में किसी से नहीं की जा सकती ।
437. भगवती गंगा माता ने दो समस्या बतलाई । पहला, उनका वेग इतना तेज कि पृथ्वी को चीरते हुए पाताल लोक में समा जाएगी । कौन इतना सामर्थ्यशाली कि उनके वेग को रोक पाए । श्री भागीरथजी ने कहा सिर्फ प्रभु श्री महादेवजी, फिर उन्होंने कहा कि प्रभु की जटाओं में ही इतना सामर्थ्य है कि वे वेग को रोक पाएगी । दूसरा, लोग अपने पाप क्षय के लिए स्नान करेंगे तो मैं उन पापों के पहाड़ से प्रदूषित हो जाऊँगी । उत्तर में श्री भागीरथजी ने कहा कि जब प्रभु के भक्त आकर आप में स्नान करेंगे तो जो पाप आपके तह में इकट्ठे हुए हैं वे नष्ट हो जाएंगे और आपकी पवित्रता भक्त बनाए रखेंगे । प्रभु ने यहाँ भक्त की महिमा दिखाई है ।
438. हम जो खाते हैं, जैसा सोचते हैं, उसका प्रभाव हमारे भीतर हमारे अंतःकरण में होता है ।
439. भारतवर्ष के शास्त्रों में वर्णित जीवन में शुद्धि की विचारधारा बचनी चाहिए । शुद्धि की विचारधारा भारतीय परंपरा का बहुत बड़ा धन है ।
440. जो भोग लगाया उस पर प्रभु की दृष्टि मात्र गई तो वह प्रसाद बन जाता है, पवित्रतम हो जाता है । भोग लगाई मिठाई प्रभु की दृष्टि में आने पर अमृततुल्य बन जाती है क्योंकि प्रभु की कृपा का अंश उसमें उतर जाता है और वह साधारण मिठाई प्रसाद बन जाती है ।
441. जहाँ प्रभु श्री रामजी ने वनवास की एक रात बिताई वह तीर्थ बन गया । जहाँ भगवती सीता माता ने वनवास काल में एक बार रसोई बनाई वह तीर्थ बन गया, आज भी सीता रसोई के नाम से कितने जगह और स्थान हैं जहाँ की पूजा होती है ।
442. भक्त के प्रभाव से तीर्थ के तीर्थत्व की वृद्धि होती है ।
443. हर तीर्थ में कुछ पत्थर और कुछ पानी होते हैं पर भाव यह है कि हर पत्थर प्रभु हैं और पानी अमृत है ।
444. भगवती गंगा माता के स्पर्श मात्र से सागर पुत्र अस्थियों से दिव्य रूप में प्रकट हो गए और श्री बैकुंठजी से विमान आए । उतने विमान आए जितने सागर पुत्र थे जिसमें बैठकर सागर पुत्र श्री बैकुंठजी चले गए । भगवती गंगा माता के स्पर्श मात्र का प्रभाव कि श्री बैकुंठजी से विमान आ गया ।
445. पितरों के श्राद्ध करना अनिवार्य होना चाहिए । कहीं अन्न दान कर दिया वह श्राद्ध नहीं माना जाता । श्री वेदजी में स्पष्ट आज्ञा है कि माता-पिता और पितरों का श्राद्ध अनिवार्य है, इसमें कोई समझौता नहीं होना चाहिए ।
446. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में प्रभु श्री रामजी की कथा वनवास से शुरू होती है । ऐसा क्यों ? ऐसा इसलिए कि ऐसी मान्यता है कि प्रभु का श्री रामावतार वनवास के दौरान भक्तों, ऋषियों और संतों के उद्धार हेतु हुआ ।
447. रावण को मारने के लिए प्रभु को आने की जरूरत नहीं थी । उस समय बालि, सहस्त्रार्जुन और प्रभु श्री परशुरामजी, जो कि प्रभु के अंश अवतार थे । यह वे थे जो रावण को हरा चुके थे और मार भी सकते थे । रावण को वरदान था कि दो जाति को छोड़कर यानी नर और वानर रावण को मार सकते हैं । बालि वानर था, प्रभु श्री परशुराम जी और सहस्त्रार्जुन नर थे जो रावण को मार सकते थे और श्रीब्रह्म वरदान का भी पालन हो जाता । प्रभु ने फिर भी अवतार लिया अपने भक्तों को प्रेम का रसास्वादन करवाने के लिए और अवतार काल में रावण को भी मारकर तार दिया ।
448. दुष्टों को मारने के लिए नहीं बल्कि लोगों को मर्यादा धर्म सिखाने हेतु प्रभु का अवतार हुआ । यह प्रभु श्री हनुमानजी की श्रीरामावतार की व्याख्या है ।
449. अन्य विद्या को पढ़ने की आवश्यकता नहीं, कोई अन्य विद्या से कुछ अन्य नहीं मिल सकता जो मर्यादा धर्म का पाठ प्रभु ने स्वयं आकर पढ़ाया है उससे मिलता है । प्रभु मर्यादा की साक्षात मूर्ति है, वे ही पढ़ा सकते हैं मर्यादा का पाठ । मर्यादा सबके लिए ऐसी जरूरी, एक-दो जाति की जरूरत नहीं, एक-दो वर्ण को जरूरत नहीं, एक-दो आश्रम को जरूरत नहीं बल्कि सभी प्राणी मात्र को उस मर्यादा धर्म की जरूरत है, इसलिए प्रभु पधारे ।
450. विज्ञान और आज की शिक्षा प्रणाली हमें मर्यादा धर्म नहीं सिखा सकते । हमारे सनातन धर्म के शास्त्र ही ऐसा कर सकते हैं ।
451. बालि बलवान मगर काम युक्त था जिसने सुग्रीवजी की पत्नी को अपने पास रख लिया । सहस्त्रार्जुन बलवान पर लोभी था जो श्री कामधेनुजी को चुराने चला गया । प्रभु श्री परशुरामजी बलवान पर क्रोधी थे जिन्होंने क्रोध करके इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दिया । पर प्रभु श्री रामजी के जीवन में महा बलवान होते हुए भी इनमें से तीनों विकार एवं अन्य कोई भी विकार एकदम नहीं दिखते ।
452. प्रभु श्री रामजी सभी अवगुणों और सभी दोषों से अतीत हैं ।
453. आज प्रबंधन, पारिवारिक रिश्ते, नेतृत्व के विषय में विश्व में सबसे ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित होती हैं पर कोई भी नवीन तत्व कहीं भी नहीं मिलेगा । जो हमारे शास्त्रों में खासकर श्री योग वशिष्ठ, श्री रामायणजी, श्री महाभारतजी में मिलेगा उससे अलग कहीं भी, कुछ भी नहीं मिल सकता क्योंकि सभी सिद्धांतों का प्रतिपादन हमारे ऋषियों ने और संतों ने पहले ही कर दिया है ।
454. श्रीराम कथा और श्री महाभारतजी हमने जीवन में नहीं सुनी और न ही बच्चों को पढ़ाई इसलिए हमारे घर में सब सुविधा होने के बाद भी रिश्ते इतने खराब हैं, इसका एकमात्र कारण यही है ।
455. श्री रामचरितमानस में सभी आध्यात्मिक सद्गुणों का विस्तार से वर्णन है ।
456. जिसने प्रभु श्री रामजी को जान लिया उसने धर्म को पूरी तरह से जान लिया ।
457. प्रभु श्री रामजी सबके अनुकरणीय हैं और जगत को मर्यादा की शिक्षा देने ही अवतार लेकर पधारे थे ।
458. प्रभु श्री रामजी की कोई भी लीला अंश का अनुकरण आँखें बंद करके कर सकते हैं ।
459. जो प्रभु श्री रामजी ने किया वही धर्म बन गया और धर्म कहलाया ।
460. जो प्रभु श्री रामजी ने करके दिखाया उससे ज्यादा करना तो दूर, कल्पना करना भी असंभव है ।
461. संत मानते हैं कि धर्म को दिशा देने हेतु ही प्रभु श्री रामजी का अवतार हुआ ।
462. ऋषियों के अनुसार काम, क्रोध और लोभ में लोभ सबसे बड़ा है क्योंकि काम और क्रोध शरीर सीमा से बंधा हुआ है पर लोभ मानसिक होता है इसलिए उसकी कोई सीमा नहीं । हम लोभ में करोड़पति, अरबपति, खरबपति, नरबपति और उससे भी आगे के सपने देखने लग जाते हैं ।
463. प्रभु ने लोभ को क्या उत्तर दिया, जिस दिन राज्याभिषेक होना था उस दिन वल्कल वस्त्र धारण करके राज्य को छोड़कर चले गए । श्री लक्ष्मणजी ने विद्रोह किया और कहा पिताजी कैकेयी माता के वश में हैं इसलिए उन पिताजी की आज्ञा पालन करने की आवश्यकता नहीं । पिताजी पर प्रजा और सेना महाभियोग चलाने की तैयारी करेगी, दशरथजी को कारावास होगा, ऐसी वार्ता पूरे अयोध्या में है । पूरी अयोध्या दशरथजी को अपराधी मान रही है । प्रभु श्री रामजी ने क्या किया, लक्ष्मणजी को डांटा फिर समझाया और प्रजा और सेना के सामने पिता को निर्दोष साबित करने के लिए स्वयं वनवास स्वीकार किया । जिस पिता को पूरी अयोध्या अपराधी मान बैठी थी उनको कलंक न लगे इसलिए प्रभु चुपचाप अपनी इच्छा से वन में चले गए ।
464. राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही राजा होता है, इस नियम को अपनी पिता की आज्ञा पालन करने के लिए प्रभु ने भंग किया ।
465. ऋषि मंडली, मंत्री मंडली, राज्य मंडली ने अनुमोदित निर्णय किया कि प्रभु को राज्य मिले पर प्रभु ने अपनी पिता की आज्ञा को सर्वोपरि माना ।
466. सब कुछ प्रभु की तरफ झुका हुआ था पर फिर भी प्रभु वन को चले गए ।
467. राजा श्री दशरथजी ने कैकेयी माता के कहने पर जो प्रभु को वनवास दिया उसका अनुमोदन मंत्रिमंडल और राज्य संसद कभी नहीं करती । प्रभु को यह बात पता थी इसलिए प्रभु ऐसा हो, इससे पहले ही चुपचाप चले गए ।
468. कैकेयी माता की बात मानने के कारण दशरथजी के ऊपर मंत्रिमंडल और राज्य संसद में कलंक नहीं लगे इसलिए प्रभु ने पहले ही वनवास का निर्णय स्वेच्छा से ले लिया ।
469. प्रभु ने कैसे बचाया अपने पिता को ? स्वतः ही राज्य का त्याग करके चले गए । संसद अब दशरथजी को दोष नहीं दे सकता क्योंकि प्रभु खुद छोड़कर गए हैं, बाध्य होकर नहीं गए । प्रभु चले गए तो दशरथजी का कैकेयी माता को दिया वचन भी कलंकित नहीं हुआ । दोनों तरफ के कलंक से अपने पिता को प्रभु ने बचाया, नहीं तो दशरथजी पर एक तरफ का कलंक लगना तय था ।
470. राज्य के लिए अधिकार की लड़ाई प्रभु श्री रामजी ने कभी नहीं लड़ी ।
471. अयोध्याजी की अपार संपत्ति, जिसे देखकर श्री इंद्रदेवजी को भी लोभ आ जाए, उसे तिनके की तरह त्याग कर त्यागमूर्ति बनकर प्रभु वन को चल दिए ।
472. क्या होती है वास्तव में लोकप्रियता - यह विश्व में कहीं भी देखने को नहीं मिलेगी । प्रभु श्री रामजी जब वन के लिए चले तो उनकी लोकप्रियता का जो वर्णन ऋषि श्री वाल्मीकिजी ने किया है, वह अदभुत है । ऐसी लोकप्रियता विश्व में कहीं भी देखने को नहीं मिलेगी । एक भी घर का चूल्हा नहीं जला, गाय माताओं और घोड़ों ने भोजन को छुआ तक नहीं । उस दिन जिस घर में बच्चा जन्मा उस घर में कोई भी उत्सव नहीं मनाया गया ।
473. जहाँ श्रीराम नहीं वहाँ अयोध्या नहीं, जहाँ श्रीराम हैं वही अयोध्या है - यही अयोध्यावासी की एकमात्र पुकार बन गई थी ।
474. विद्रोह के कगार पर खड़ी पूरी अयोध्या को प्रभु ने समझाया । जिनके ऊपर आपत्ति आई उन प्रभु श्री रामजी ने दूसरे को यानी अपने पिता दशरथजी को आपत्ति से बचाया ।
475. आज नहीं, कल नहीं, इस जीवन में नहीं, किसी भी जीवन में कभी राजा नहीं बनूँगा । अयोध्याजी का राज्य सिंहासन सदैव प्रभु का है, यह भक्त श्री भरतलालजी के घोषणा के अमर वाक्य थे ।
476. पूरी अयोध्याजी पहले श्री भरतलालजी को भी प्रभु के वनवास के लिए दोषी मानती थी पर उनके श्रीराम प्रेम को देखकर और उनके त्याग को देखकर सभी-के-सभी दंग रह गए ।
477. प्रभु श्री रामजी वन में जाएं इसकी मांग कम-से-कम दो लोगों (कैकेयी माता और मंथरा) की थी पर श्री भरतलालजी राजा नहीं बने इसकी मांग किसी की भी नहीं थी क्योंकि प्रभु सबको समझाकर गए थे कि कोई श्रीभरत का विरोध नहीं करें ।
478. संसार ने राजा बनने की लड़ाई तो बहुत बार देखी है और आगे भी देखेगी पर इतिहास में एक बार ही हुआ और संसार ने देखा कि लड़ाई हुई, वाक् युद्ध हुआ कि मैं राजा नहीं, तुम राजा । राजा नहीं बनने की लड़ाई प्रभु श्री रामजी और श्री भरतलालजी लड़े ।
479. चाहे हिमालय की सारी बर्फ पिघल जाए, चाहे सागर मर्यादा छोड़ दे पर प्रभु श्री रामजी बोले कि मैं पिताजी को कलंकित नहीं कर सकता और उनके वचन का मैं पालन करके ही रहूंगा ।
480. तर्क से जो काम नहीं हो सकता था वह एक भक्त के आंसुओं से हुआ । श्री भरतलालजी ने आंसू प्रभु को अर्पण कर दिए, युक्ति नहीं चली प्रभु के सामने तो भक्ति चली । प्रभु ने कहा कि तुम मेरे सेवक बनकर चौदह वर्षों तक राज्य का कार्यभार संभालो । प्रभु श्री रामजी राजा नहीं बने, पिता का वचन पूरा किया और श्री भरतलालजी का समाधान भी किया ।
481. प्रसाद रूप में श्री भरतलालजी को प्रभु ने अपनी श्री कमलचरणों की पादुका दी जिनको भक्त श्री भरतलालजी ने अपने मस्तक पर रखा और चले । चौदह वर्षों तक श्री भरतलालजी प्रभु प्रेम में प्राण नहीं त्यागे उसका आधार श्रीपादुका हुई और श्री अयोध्याजी के राज्य का आधार भी वही श्रीपादुका हुई ।
482. श्री भरतलालजी ने प्रभु से स्पष्ट कह दिया कि चौदह वर्षों के लिए आधार श्रीपादुका के रूप में आपने दे दी पर चौदह वर्षों के बाद आपके लौटने में एक दिन का भी विलंब हुआ तो मैं अग्नि प्रवेश कर लूँगा ।
483. श्री शत्रुघ्नलालजी को प्रभु ने चित्रकूटजी में पूछा कि सीता और मैं तुम्हारे क्या लगते हैं ? श्री शत्रुघ्नलालजी ने उत्तर दिया माता-पिता । प्रभु ने कहा कि माता-पिता के रूप में हमारी सौगंध लेकर एक वचन दो कि चौदह वर्षों तक तुम या अयोध्याजी के किसी भी निवासी की एक भी ऐसी बात भगवती कैकेयी माता तक नहीं पहुँचे जिससे की उनको कष्ट हो । ऐसा कोई व्यवहार तुम या कोई भी नहीं करें इसकी सौगंध प्रभु ने श्री शत्रुघ्नलालजी को दिलाई ।
484. जिस कैकेयी माता के कारण इतनी बड़ी विपदा प्रभु सह रहे थे उनके लिए इतना निश्छल हृदय प्रभु का था । क्या कहीं भी और कभी भी ऐसी मिसाल मिल सकती है – असंभव ।
485. क्षण-क्षण प्रभु की श्रीपादुका से आज्ञा मांगकर प्रभु का राज्य का जो भार था वह श्री भरतलालजी संभालने लगे ।
486. प्रभु ने योजनापूर्वक तरीके से रावण से युद्ध किया, आवेश में आकर नहीं किया । योजनापूर्वक वन में घूमें और सबका संरक्षण किया, सबको संगठित किया फिर रावण से युद्ध किया ।
487. तेरह वर्षों तक प्रभु श्री रामजी ने संगठन किया और अंतिम वर्ष में प्रभु ने युद्ध किया ।
488. प्रभु श्री रामजी ने भारतवर्ष के एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा की और उसे जोड़ा और अभय किया ।
489. भक्तों के यहाँ जाकर, ऋषियों और मुनियों के यहाँ जाकर उन्हें दर्शन दिए, बुलाकर नहीं दिए, खुद जाकर दर्शन दिए और उनका गौरव बढ़ाया । सब ऋषियों और मुनियों के आश्रम में जाकर उनको सुख दिया ।
490. शूर्पणखा के नाक-कान क्यों कटवाए, मारा क्यों नहीं प्रभु ने । क्योंकि प्रभु चाहते थे कि रावण पहले कुछ गलत करे । प्रभु आक्रमणकारी नहीं बनना चाहते थे । बचाव के लिए बाध्य होकर आक्रमण करना चाहते थे ।
491. राजनीति के सबसे बड़े ज्ञाता प्रभु थे । शत्रु से वह करवाया जो प्रभु चाहते थे । शत्रु से गलत व्यवहार करवाया और फिर प्रभु ने उसे प्राणदंड दिया ।
492. प्रभु ने भगवती सीता माता के लिए रावण से प्रत्यक्ष युद्ध किया पर युद्ध का अप्रत्यक्ष कारण था कि रावण धर्म के लिए चुनौती था, सती नारियों के लिए चुनौती था, ऋषियों के लिए चुनौती था और गौ-माता के लिए चुनौती था । प्रभु ने उसे नष्ट करने की योजना भगवती सीता माता के स्वयंवर से पूर्व ऋषियों की हड्डियों का पहाड़ देखकर ही बना ली थी ।
493. श्रीराम राज्य के समय राज्य की संपदा तो इतना बढ़ाना और राज्य के खर्च को इतना कम करना, यह प्रभु ने सबसे बड़ा कार्य किया । श्रीराम राज्य से अच्छी राज्य प्रबंधन की मिसाल कहीं भी नहीं मिलेगी ।
494. प्रभु के सद्गुणों को अपने जीवन में लाना, यह प्रभु श्री रामजी की सबसे सच्ची पूजा है ।
495. जो प्रभु श्री रामजी ने अपने अवतार काल में सद्गुणों का प्राकट्य किया उसका अनुकरण करें तो हम नर से श्रीनारायण प्रिय बन सकते हैं ।
496. कितने राजा विश्व ने देखे, आए और गए पर विश्व के पटल पर एक ही राजा और एक ही रानी विराजमान हैं - राजा श्री रामजी और रानी भगवती सीताजी ।
497. श्रीराम राज्य सद्गुणों का, चरित्र का और सदाचार का राज्य था ।
498. श्रीकृष्ण कथा विश्व की सबसे आकर्षक कथा है । घर बार का त्याग कर विरक्त होकर निकलने वाले भी श्रीकृष्ण कथा का त्याग नहीं कर सकते । यह कहकर राजा श्री परीक्षितजी ने विस्तार से श्रीकृष्ण कथा सुनने का निवेदन प्रभु श्री शुकदेवजी से किया ।
499. प्रभु श्री शुकदेवजी ने राजा श्री परीक्षितजी की परीक्षा ली कि तीन-चार दिन से आप भूखे हैं, कुछ खा लें । राजा श्री परीक्षितजी ने यह नहीं कहा कि मैं भूख सह लूंगा, कहा कि दिव्य अमृत का पान कर रहा हूँ, भूख है ही नहीं । प्रभु श्री शुकदेवजी ने साधु-साधु कहा और कथा जारी रखी ।
500. क्या कथा हुई होगी, जरा सोचें । प्रभु श्री शुकदेवजी का उत्साह, राजा श्री परीक्षितजी का उत्साह और दोनों को बांधने वाला श्रीकृष्ण प्रेम ।
501. देवतागण, श्रुतियाँ, ऋषियों, योगियों को जब पता चला कि प्रभु श्री कृष्णजी की बाल लीला श्री गोकुलजी में होगी तो जो-जो पात्र थे प्रभु की बाल लीला में शामिल होने के लिए उनका जन्म श्री गोकुलजी के आसपास होने लगा । देवतागण, श्रुतियाँ, ऋषियों, योगियों में भगदड़ मच गई प्रभु की बाल लीला में शामिल होने के लिए ।
502. प्रभु के आते ही भूमंडल का पूरा वातावरण ही बदल जाता है, सभी दिशाएं तेजोमय हो जाती हैं ।
503. प्रभु के आने की घड़ी होती है तो पूरा भूमंडल हिलोरें लेने लगता है, सुगंधित वायु बहने लगती है, नदियाँ तरंगें लेकर प्रभु के स्वागत में गीत गाने लगती है, यज्ञ कुंडों में अग्नि स्वतः ही प्रज्वलित हो जाती है ।
504. जब प्रभु प्रकट हुए तो श्री वासुदेवजी के पास कुछ भी नहीं था क्योंकि वे कंस के बंधन में थे फिर भी प्रभु के मंगल जन्म पर दस हजार गौ-माताओं के दान का संकल्प उन्होंने लिया । सूत्र यह है कि प्रभु के लिए मंगल संकल्प लेना चाहिए चाहे उस समय हम उसकी पूर्ति नहीं कर पाएं ।
505. प्रभु पधारे, यह सुनते ही श्री नंदबाबा को लगा मानो किसी ने उनके कानों में अमृत की बूंदें टपका दी ।
506. सकल चराचर जगत में माया का ही विस्तार है और इस माया के बीच में एक ही सार है और वह है प्रभु की भक्ति ।
507. भारत ज्ञान की आभा का देश रहा है । “भा” का अर्थ है ज्ञान की आभा और “रत” का अर्थ है युक्त होना यानी भारत का अर्थ है ज्ञान की आभा से युक्त ।
508. प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के उदय से पूर्व उठकर उनके स्वागत के लिए आराधना करनी चाहिए ।
509. श्री एकनाथी भागवतजी में प्रभु को जगद्‌गुरुम् रूप में देखा गया है क्योंकि प्रभु ने श्रीगुरु रूप में श्री उद्धवजी को बड़ा सुंदर और मार्मिक उपदेश दिया है ।
510. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं कि सब झंझटों को छोड़ो और मेरी शरण में आ जाओ । दिव्य शरणागति की बात प्रभु कहते हैं ।
511. हमारे शरीर के हर अंग में प्रभु का चेतन तत्व कार्य कर रहा है । इसका प्रतिपादन प्रभु ने श्री उद्धवजी से किया ।
512. संसार एक वृक्ष है । वृक्ष की डाली पर पंछी बैठे हैं । वृक्ष पर भोग हेतु फूल फल लगे हैं । प्रभु कहते हैं कि कुछ पंछी फूल फल का भोग विलास के लिए इस्तेमाल करते हैं । प्रभु उन लोगों के लिए शब्द का प्रयोग करते हैं “पशु” जिनका ध्यान सिर्फ भोग विलास की तरफ ही रहता है ।
513. संत श्री रामकृष्णजी परमहंस कहते थे कि जीवन की ऊँचाइयाँ पाकर भी अगर ध्यान कंचन, कामिनी और कीर्ति की तरफ है तो वह पशु ही है ।
514. अध्यात्म से युक्त जनों को प्रभु हंस की संज्ञा देते हैं जो मोती चुन लेते हैं । दूध और पानी का मिश्रण सामने हो तो वे पानी छोड़ देते हैं और दूध को ग्रहण कर लेते हैं । दूध और पानी क्या है ? दूध चेतन तत्व का दर्शन अपने भीतर करना है और पानी भोग विलास है ।
515. गृहस्थ आश्रम के बाद वानप्रस्थ आश्रम भी एक आश्रम है जिसे हम प्रायः भूल जाते हैं । हमारा गृहस्थ आश्रम ही इतना बढ़ता चला जाता है । भोगों से वृत्ति को निकालकर वह प्रभु की तरफ लगे और हम मोती चुगने वाले और दूध ग्रहण करने वाले हंस बने, यही सच्चा वानप्रस्थ है ।
516. यदि संसार की माया को अपने भीतर से निकालना है तो प्रभु की तरफ चलना ही पड़ेगा । प्रभु कहते हैं कि इसका ज्ञान हो गया तो पूरे श्री वेदजी का रहस्य जान लिया ।
517. हमारा जीवन सभी साधनों से युक्त होना चाहिए फिर पूर्ण आत्म शांति का प्रयास जीवन में होना चाहिए, यही जीवन जीने का मार्ग होना चाहिए ।
518. श्री वेदजी का रहस्य वेदांत में कहा गया है जो श्री वेदजी का सार है कि माया अशाश्वत है । अशाश्वत माया से शाश्वत प्रभु की तरफ चलना चाहिए, यही श्री वेदजी का निर्देश है ।
519. मुझे इस नश्वर संसार से निकालकर उस स्थाई तत्व प्रभु की तरफ ले चलें, प्रभु मुझे अज्ञान से निकालकर ज्ञान के आलोक में ले चलें, मैं मृत्यु लोक में हूँ मुझे अमृत तत्व प्रभु की प्राप्ति करा दें, श्री वेदजी के शुरू में साधक की यही प्रार्थना प्रभु से होती है ।
520. रटन एक बात, पढ़ना एक बात और बोध होना सबसे बड़ी बात होती है ।
521. सद्गुरु की व्याख्या यह है कि जो शब्द और ज्ञान में प्रवीण हों और प्रभु के ज्ञान को हमारे भीतर उतार दे और करुणा वाले स्वभाव के हों, वे ही सच्चे सद्गुरु हैं ।
522. प्रभु श्री कृष्णजी के अवतार के दो श्रेष्ठतम उपदेश – श्री अर्जुनजी को दिया श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश और श्री उद्धवजी को दिया श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध का उपदेश ।
523. अपनी परंपरा का पालन करने वाला ही श्रेष्ठ जन होता है ।
524. कितना भी वेदांत पढ़ने से, कितना भी योग शास्त्र पढ़ने से जब तक प्रभु की भक्ति नहीं होगी तब तक ज्ञान कृपा नहीं करेगा यानी वह ज्ञान अपने को समेट कर रखेगा, अपने को खोलेगा नहीं ।
525. शास्त्रों का चिंतन भी प्रभु तक पहुँचने का एक बहुत बड़ा साधन है ।
526. मैं शरीर नहीं हूँ, मैं परब्रह्म तत्व हूँ - यह भी पूर्ण ज्ञान नहीं है क्योंकि यहाँ “मैं” बचा हुआ है । “मैं” का विसर्जन होने पर ही सच्चा ज्ञान होता है ।
527. प्रभु से प्रेम करते-करते भक्त प्रभु से एकत्व की अनुभूति करने लगता है । यह प्रेमाभक्ति से ही संभव है । प्रभु से एकत्व की अनुभूति हुई तो “मैं” लीन हो जाता है, विसर्जित हो जाता है ।
528. यदि रात्रि को नींद नहीं आई और दूसरे दिन किसी ने पूछा तो हम कहेंगे कि नींद नहीं आई, बहुत प्रयास किया । सूत्र यह है प्रयास के बाद भी नींद नहीं आती, अप्रयास से ही नींद आती है । नींद का ज्यादा समय ज्यादा प्रयास करने पर कभी नींद नहीं आती । इसी तरह साधन का ज्यादा प्रयास करने पर प्रभु नहीं मिलते, साधन में पूर्ण समर्पण होने पर ही प्रभु मिलते हैं ।
529. अंत में हमारा साधन भी हमें विसर्जन करना पड़ता है क्योंकि साधन अधिक करेंगे तो उस अंतिम अवस्था से फिसलना पड़ेगा । जैसे तवे पर रोटी सेक रहे हैं, सेकते रहे, सेकते रहे और तवे से रोटी को उतारी नहीं तो रोटी जल जाएगी ।
530. एक समय तक साधन करना चाहिए, फिर कुछ नहीं करना चाहिए सिर्फ प्रभु की प्रेमाभक्ति करनी चाहिए । शांत हो जाना चाहिए, सब साधन छोड़कर और केवल प्रभु से प्रेम करना चाहिए ।
531. अध्यात्म में ज्यादा पढ़ने से हम उलझते जाते हैं, छूटना है तो बहुत कम पढ़ना चाहिए ।
532. हम प्रभु तत्व हैं, यह साधन करते-करते बोध हो गया तो साधन छूट जाना चाहिए क्योंकि फिर उस साधक का स्तर बदल गया ।
533. श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध के अंत में प्रभु कहते हैं श्री उद्धवजी से कि मैंने ज्ञान का गुह्यतम रहस्य तुम्हें बता दिया है ।
534. श्री उद्धवजी ने पूछा कि सरल बात बताएं और सरल बनाकर बताएं तो प्रभु ने और सरल बात बताई कि सब कुछ भूलकर मेरी भक्ति करो ।
535. राक्षस कुल में उत्पन्न होने पर भी हमें तीन भाई में तीन गुण देखने को मिलते हैं । सतोगुण जो ज्ञान, प्रकाश और शांति का है वह श्री विभीषणजी में पाया जाता है । रजोगुण जो क्रियाशीलता का है वह रावण में पाया जाता है और तमोगुण जो आलस्य और निद्रा का है वह कुंभकरण में पाया जाता है ।
536. संसार में रजोगुण के बिना व्यावहारिक सफलता नहीं मिलती पर रजोगुण को अंत में सतोगुण की तरफ ले जाना पड़ता है तभी हम जीवन में सफल होते हैं ।
537. हम आज तमोगुणी हो गए हैं, इस कारण आलस्य और भोग विलास में डूब गए हैं । तमोगुणी भावना के कारण हम बहुत कुछ गलत सहन करने लग जाते हैं ।
538. धर्मयुक्त आचरण करके बदले में कुछ न चाहने वाला सबसे बड़ा धार्मिक होता है । कुछ न करने वाला धार्मिक नहीं होता ।
539. प्रभु श्री कृष्णजी कभी चुप नहीं बैठे, इतना सक्रिय जीवन किसी का भी देखने को नहीं मिलेगा पर किसी से कुछ भी नहीं चाहा, यह सच्चा धार्मिक जीवन है ।
540. आराम करने वाला तमोगुणी होता है, मरते दम तक सात्विक काम करने वाला ही श्रेष्ठ जीवन होता है ।
541. रावण का रजोगुण ध्यान में रखकर उसे क्रियान्वित करके श्री विभीषणजी बनना चाहिए । रजोगुण के व्यवहार को लेकर सतोगुणी बनना श्रेष्ठ है ।
542. सतोगुण की वृद्धि से रजोगुण और तमोगुण घटेगा, यह सिद्धांत है ।
543. सक्रिय होकर अक्रिय होना, यह श्री वेदजी का सार है ।
544. पूरे व्यक्तित्व को कैसे सतोगुणी बनाना पड़ेगा । साधक को सबसे ज्यादा ध्यान इस बात पर देना चाहिए कि रोज की उसकी शैली और दिनचर्या सतोगुणी बने तभी प्रभु का ज्ञान उसमें अवतरित होगा ।
545. सात्विक अध्ययन श्री वेदजी और शास्त्रों के अध्ययन को माना गया है ।
546. एक नियम जीवन में लेना चाहिए कि एक भी दिन ऐसा नहीं जाए जिस दिन मैंने श्रीमद् भगवद् गीताजी का एक अध्याय भी नहीं पढ़ा ।
547. साधन करके प्रभु प्राप्ति करनी है तो सभी मंत्र और पाठ के अध्ययन की जरूरत नहीं । मंत्र और पाठ से हमारी आकांक्षा पूरी होती है पर प्रभु प्राप्ति नहीं होती ।
548. श्रीमद् भगवद् गीताजी, श्रीमद् भागवतजी महापुराण और श्री रामचरितमानसजी में से जो प्रिय लगे उसका पाठ रोजाना करना चाहिए ।
549. शक्ति के जागरण हेतु श्री रामचरितमानसजी के श्री सुंदरकांडजी को पढ़ना चाहिए । प्रभु श्री हनुमानजी शक्ति के जागरण के मुख्य स्त्रोत हैं ।
550. श्री रामचरितमानसजी के श्रीअयोध्या कांड संत पढ़ते हैं श्री भरतलालजी की तरह दिव्य भक्ति पाने के लिए ।
551. श्री रामचरितमानसजी के श्रीउत्तरकांड पढ़ना चाहिए कलियुग में जीवन के संघर्ष से बचने के लिए । कलियुग का अति सुंदर चित्रण श्रीउत्तरकांड में किया गया है ।
552. श्री रामचरितमानस को पढ़ने से प्रभु श्री रामजी के पीछे दौड़ना नहीं पड़ेगा, प्रभु श्री रामजी हमारे समक्ष आकर हमें दर्शन देंगे ।
553. प्रभु श्री रामजी भंवर बन जाते हैं उस साधक के पीछे जो श्री रामचरितमानसजी का नित्य पाठ करता है । ऐसी अदभुत व्याख्या श्री मधुसूदन सरस्वतीजी ने श्री रामचरितमानसजी की करी है ।
554. सात्विक अध्ययन करना बहुत जरूरी है । हम जो शास्त्र पढ़ते हैं वह सात्विक अध्ययन होता है । जो गलत साहित्य पढ़ते हैं यानी गंदी चीज पढ़ते हैं वह तमोगुणी अध्ययन होता है ।
555. सतोगुणी साहित्य प्रभु की तरफ ले जाने वाला और जीवन को शांत करने वाला होता है । रजोगुणी साहित्य चित्त को चंचल बनकर क्रिया करवाने वाला साहित्य होता है । तमोगुणी साहित्य आलसी बनाने वाला और प्रमाद करवाने वाला साहित्य होता है ।
556. हम शास्त्रों का और कर्मकांड का उपयोग अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए करते हैं, अध्यात्म की ऊँचाइयों पर जाने के लिए नहीं करते - यह गलत बात है ।
557. आज मंदिरों में अध्यात्म की उन्नति के लिए भीड़ नहीं है, प्रभु से स्वार्थ पूर्ति के लिए व्यापार करने वालों की ज्यादा भीड़ है । यह अध्यात्म नहीं, व्यापार है जो कि गलत है ।
558. सकल कलियुग के पापों को धोने वाला प्रचलित भाषा का श्रीग्रंथ श्री रामचरितमानसजी है । इनमें जो सिद्ध चौपाइयाँ हैं वे चुने हुए दोहे हैं जो जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी हैं ।
559. प्रभु के आदेश से योग माया ने जन्म लेकर बाल प्रभु की रक्षा हेतु श्रीलीला की और प्रभु को श्री गोकुलजी पहुँचा दिया और माता स्वयं श्री मथुराजी के कारागृह में आ गई ।
560. देवतागण कोई भी हो पर उनके पीछे शक्ति के रूप में हमेशा माता की शक्ति रहती है । प्रभु का नाम लें तो माता का नाम पहले लिया जाता है जैसे श्री गौरीशंकर, श्री लक्ष्मीनारायण, श्री सीताराम, श्री राधेश्याम - यह भारतीय परंपरा रही है ।
561. भारतवर्ष का देश मातृ शक्ति को पूजने वाला देश रहा है ।
562. जब भगवती जगदंबा माता ने कंस को सावधान किया कि प्रभु का जन्म हो चुका है तो कंस श्री वासुदेवजी के पैरों में गिर पड़ा और कहा कि अब मैं पापाचरण नहीं करूँगा । दिनभर तो उसका प्रण ठीक रहा पर रात को टूट गया क्योंकि उसके असुर मित्र आए और उसका दिमाग फिर खराब हो गया । इसलिए आसुरी प्रवृत्ति के लोगों से हमें बचना चाहिए क्योंकि उनकी मनोवृत्ति असुर जैसी होती है कि खाओ, पियो और मौज करो । वे सत्कर्म खुद भी नहीं करते और दूसरों को भी सत्कर्म करने से रोकते हैं ।
563. कंस ने संकल्प लिया था कि मैं अच्छा बनना चाहता हूँ पर उसके आसुरी मित्रों ने उसको पाप की तरफ धकेल दिया । सूत्र यह है कि गलत मित्र हमारा जीवन बिगाड़ देते हैं क्योंकि वे हमें बुराइयों की तरफ ले जाते हैं ।
564. रावण की लंका को शास्त्रों में देहनगर कहा गया है जहाँ शरीर की चिंता, शरीर को क्या दिखाना, क्या खिलाना, क्या पिलाना, सभी राक्षस ऐसा ही करते थे । उनका नैतिकता के साथ कोई सरोकार नहीं था ।
565. जीवन में पापी-से-पापी आदमी भी कभी-न-कभी संभलना चाहता है क्योंकि हमारे भीतर के प्रभु अंश हमें भीतर से प्रेरणा देते हैं संभलने हेतु, बुराइयों को छोड़ने हेतु, अच्छाइयों को अपनाने हेतु ।
566. शास्त्रों ने माना है कि अगर कोई बुराई छोड़ दे तो बुरा-से-बुरा आदमी भी अच्छा बन सकता है । बुराई को छोड़ा जा सकता है क्योंकि बुराई स्थायी नहीं होती और पलटी जा सकती है ।
567. शास्त्र कहते हैं कि कोई जीवन में सकारात्मक सोच लाता है तो हंस-हंसकर जीता है और कोई नकारात्मक सोच लाता है तो रो-रोकर जीता है ।
568. शास्त्र कहते हैं कि जो गिरकर फिर संभल जाए उसे सच्चा इंसान कहते हैं ।
569. पूर्व में गलती किए हुए लोग भी अपनी जीवन शैली को बदलकर महान बन जाते हैं । सबसे बड़ा उदाहरण ऋषि श्री वाल्मीकिजी का है जो पूर्व में डाकू थे और फिर महान ब्रह्म ऋषि बन गए ।
570. श्रीमद् भगवद् गीताजी के नवम अध्याय में प्रभु का आश्वासन है जो प्रभु उन पश्चाताप युक्त लोगों को देते हैं कि तुम बदलो तो मैं तुम्हारे साथ हूँ । प्रभु बदलने का अवसर भी सबको देते हैं । प्रभु ने कंस को भी योग माया के द्वारा अवसर प्रदान किया पर कंस नहीं बदला । श्री वाल्मीकिजी को देवर्षि प्रभु श्री नारदजी द्वारा प्रवचन के कारण अवसर मिला और वे बदल गए ।
571. कंस की जगी हुई सद्बुद्धि को उसको उसके गलत मित्रों ने फिर दबा दिया ।
572. किसी को बर्बाद करने के लिए उसे बंदूक से मारना नहीं बस मित्र बनकर गंदी आदतें लगा दें तो वह बर्बाद हो जाएगा । शत्रु इतना नाश नहीं करता जितना बुरी लत लगाकर मित्र नाश कर देते हैं ।
573. कंस में सद्बुद्धि को कायम रखने का विवेक नहीं था क्योंकि उसने जीवन में कभी सत्संग नहीं किया । बिना सत्संग के विवेक कभी नहीं हो सकता ।
574. सत्संग में सच्चा अर्थ है शास्त्रों के वचन का संग करना, ऐसा संत मानते हैं ।
575. श्रीराधे-श्रीराधे कहने का एक अर्थ संत कहते हैं कि प्रभु से हमारी विनती होती है श्रीजी श्रीराधा माता का नाम लेकर कि प्रभु हमें अपने तक पहुँचने की राह दें और बीच की बाधा हटा दें ।
576. प्रभु के आने पर श्रीनंद भवन को इतना सजाया गया कि श्रीइंद्रलोक को भी मात दे दिया । सभी गोकुलवसियों ने अपने घरों को सजाया, अपने गोधन को सजाया, स्वयं सजे प्रभु के स्वागत के लिए और फिर प्रभु के लिए उत्सव मनाने श्रीनंद भवन पहुँचे ।
577. प्रभु श्री शुकदेवजी ने वर्णन किया है कि श्रीनंद भवन में उत्सव के लिए गोपियों को आने में सबसे विलंब हुआ क्योंकि वे प्रभु के लिए इतनी बारीकी से तैयार हुई और सजी । श्रीगोपीजन कभी नहीं सजी थीं, सिर्फ पहली बार जीवन में प्रभु के लिए वस्त्र और अलंकारों के साथ सज रही थीं ।
578. शास्त्र कहते हैं खुद को सजाने का सबसे बड़ा अलंकार प्रभु प्रेम है । श्रीगोपीजन ने जीवन भर अपने को प्रभु प्रेम से सजाया, ऐसा अदभुत वर्णन प्रभु श्री शुकदेवजी करते हैं ।
579. बाल प्रभु का पहला दर्शन पाकर गोपियों ने जैसे अपना सब कुछ लुटा दिया । सबको एक भाव आया कि प्रभु सिर्फ भगवती यशोदा मैया के नहीं हैं, मेरे भी हैं, मेरे भी हैं और मेरे भी हैं ।
580. श्रीगोपीजन ने प्रेम के कारण प्रभु को आशीर्वाद दिया । सूत्र यह है कि श्री बैकुंठजी के प्रभु को हम आशीर्वाद नहीं दे सकते पर प्रेम से प्रगटे प्रभु को भक्त आशीर्वाद देते हैं, देने की हिमाकत करते हैं । यह सब प्रभु प्रेम के कारण संभव होता है ।
581. भगवत साक्षात्कार के बाद पूरा जीवन ही बदल जाता है । श्रीगोपीजन ने बाल रूप में प्रभु का पहला दर्शन पाया और श्रीगोपीजन का पूरा जीवन सदैव के लिए ही बदल गया ।
582. प्रभु साक्षात्कार होने को संत हमारा पुनर्जन्म हुआ मानते हैं यानी इसी जन्म में ही पुनर्जन्म हो गया ।
583. श्रीनंद बाबा ने खुशी की पराकाष्ठा के कारण ब्राह्मणों को इतना दान दिया कि ब्राह्मणों के लिए समस्या खड़ी हो गई कि इतना दान कहाँ रखेंगे क्योंकि उनके घर छोटे पड़ गए ।
584. प्रभु को जिन्होंने भी देखा उनके मन में तुरंत सात्विक वृत्ति के भाव अपने आप आ गए ।
585. श्रीनंद बाबा प्रभु के उत्सव में जो भी हाथ में आया सब लुटाने और उछालने लगे श्रीनंद भवन के आंगन में ।
586. प्रभु का भव्य, पवित्र और सुंदर दर्शन था । भव्यता, पवित्रता और सुंदरता का अदभुत संगम प्रभु के दर्शन में सबने अनुभव किया ।
587. मनुष्य जीवन जितना सात्विक होता जाएगा उतना हम प्रभु के समीप पहुँचते चले जाएंगे । सतोगुण की वृद्धि सबसे जरूरी नहीं तो हम प्रभु से दूर होते चले जाएंगे ।
588. संसार के सभी धर्मों का एकमत सिद्धांत है कि सतोगुण की वृद्धि जिस भी क्रिया से होती है वही धर्म कहलाता है ।
589. भक्ति हमारे ऊपर कितना परिणाम करती है यह देखने हेतु हमें देखना चाहिए कि मैं कितना सात्विक बन रहा हूँ ।
590. जीवन की चर्या को सात्विक करना ही धर्म का लक्ष्य होता है ।
591. जीवन में कल्याण के लिए सात्विक वृत्ति होनी सबसे जरूरी है ।
592. जितना-जितना श्रीमद् भगवद् गीताजी का अध्ययन करेंगे उतनी-उतनी जीवन में सात्विकता आती चली जाएगी ।
593. जो जल हम पीते हैं वह जल कितना शुद्ध है इसका विचार पहले के समय में किया जाता था कि वह पानी कहाँ से आता है, कौन भरता है, किस अवस्था में किसे पानी निकालने का अधिकार होता है । पहले के समय बाहर जाकर आए हैं तो जल की मटकी छू नहीं सकते थे और अन्य घर के जन ही पानी देते थे ।
594. प्रभु का चरणामृत लेने का रोज नियम ही हमारे जीवन को बदल देता है । रोज श्रीगंगा जल का सेवन हमारे जीवन को बदल देता है ।
595. एक संत रोज श्रीगंगा जल बाल्टी में डालकर फिर स्नान के लिए ऊपर से जल भरते थे । सिद्धांत यह है कि माता को याद करके रोज जल से स्नान करेंगे और माता को याद करके शुद्ध जल पाएंगे उतना ही जीवन सात्विक होता चला जाएगा ।
596. संगति का बहुत बड़ा असर सात्विकता पर पड़ता है । हमारा संग या संगति कितनी सात्विक है । आध्यात्मिक चिंतन करने वाला और शास्त्रों के अध्ययनशील व्यक्ति के साथ रहने से सात्विकता और शांति आती है, जीवन शुद्ध बनता है, पापाचरण से हम दूर रहते हैं ।
597. गलत लोगों के साथ रहने से और गलत चीज खाने वाले के साथ रहने से गंदी चीज जिससे हम घृणा करते थे वह घृणा दूर हो जाती है । फिर उस गंदी चीज का उपयोग करने का हमारा भी मन करता है और वह हमारे व्यवहार में उतर जाती है ।
598. तीर्थों में जाकर हमारी संगति सात्विक होनी चाहिए, हमारा भाव सात्विक होना चाहिए क्योंकि तीर्थों में हमें सात्विक बातें ही सुनने को मिलती है । हमें कोई ऐसा संग नहीं करना चाहिए जो हमें सात्विकता से दूर ले जाए क्योंकि तीर्थों में सात्विकता ही प्रमुख साधन है ।
599. घंटाभर हम मंदिर में बैठकर सात्विक विचार और तरंग लेकर आते हैं और घंटाभर किसी होटल या क्लब में जाकर तमोगुण विचार और तरंग ले आते हैं । व्यवहार के लिए जाना पड़े तो ठीक पर ज्यादा समय अपने को किसी सात्विक जगह पर ही रखने का प्रयास करना चाहिए ।
600. सात्विक जगह वह होती है जहाँ जाकर शांति मिलती है और लौटने का मन ही नहीं करता ।
601. छत्रपति श्री शिवाजी महाराज रोजाना अपने हाथों से प्रभु श्री महादेवजी की पूजा करते थे । एक बार ज्योतिर्लिंग श्री मल्लिकार्जुनजी के तीर्थ में प्रभु श्री महादेवजी की पूजा में वे इतने रम गए कि लगभग समाधि में चले गए । यह जगह यानी तीर्थ की संगति का प्रभाव होता है कि जितना-जितना हम सात्विक स्थान का उपयोग करेंगे सतोगुण बढ़ता चला जाएगा और रजोगुण और तमोगुण कम होते चले जाएंगे ।
602. संसार में प्रभु की आराधना से ऊपर कुछ भी नहीं है ।
603. सुबह मंदिर में जाकर दर्शन करके आने की भारतीय परंपरा इसलिए है क्योंकि इससे जीवन में सात्विकता आती है ।
604. मन की विशेषता है कि सात्विक वस्तुओं को जीवन में लाकर हम अपने मन को बदल सकते हैं ।
605. भगवती गंगा माता के तट पर बैठने से हमें सात्विक विचार आते हैं, हमारी मनोवृत्ति सात्विक होती है ।
606. चौबीस घंटे में हर घंटे में साठ मिनट एक जैसे नहीं होते क्योंकि हम उनका उपयोग सात्विक, रजोगुण और तमोगुण व्यवहार में करते हैं । हमें चाहिए कि ज्यादा-से-ज्यादा हमें हर घंटे को सात्विक बनाना चाहिए ।
607. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना सबसे सात्विक समय होता है । सुबह चार बजे का समय साधन हेतु होना चाहिए क्योंकि दिनभर में ऐसा सात्विक समय कभी नहीं मिलेगा । हर धर्म में सुबह के समय का महत्व बताया गया है । ध्यान सुबह चार बजे या दिन में ग्यारह बजे उसी कमरे, उसी जगह पर करे तो भी प्रकृति बदल जाती है । रात को दस बजे सो कर सुबह चार बजे उठे, यह सात्विकता हुई और रात को एक बजे सोकर सुबह दस बजे उठे, यह तामसी जीवन हुआ ।
608. सुबह चार बजे जो प्रकृति की तरंग हम पकड़ सकते हैं, वह दिन में ग्यारह बजे नहीं मिलेगी । प्रभु की सभी पूजा नौ बजे से पहले हो जानी चाहिए, शास्त्र इसके आग्रही होते हैं ।
609. सुबह की पूजा का जो फल है वह दोपहर में की गई पूजा का नहीं है ।
610. भगवती गंगा माता में प्रातःकाल और सायंकाल में स्नान की सबसे ज्यादा महिमा है ।
611. सुबह की अनुकूलता के समय में प्रभु को याद करना जीवन में बहुत बड़ा लाभ देता है ।
612. ज्यादा समय सात्विक स्थान, सात्विक प्रसंग में ही व्यतीत किया जाना चाहिए ।
613. एकादशी का व्रत का लाभ एकादशी के दिन ही मिलेगा क्योंकि उस दिन पुण्य निर्माण हुआ और व्रत का लाभ भी हुआ ।
614. रात को बारह बजे पूजा निषेध है पर शिवरात्रि में रात्रि बारह बजे की पूजा का ही सबसे बड़ा लाभ है ।
615. रोजी रोटी कमाने हेतु कार्य करना यह राजस कर्म है, किसी से झगड़ा किया तो वह तामस कर्म हो गया पर ऐसा कर्म जिससे मुझे आध्यात्मिक लाभ हो वह सात्विक कर्म होता है । पुराने जमाने में सत्कर्म नित्य किए जाते थे, किसी की सहायता करना सत्कर्म, किसी को आर्थिक लाभ पहुँचाना सत्कर्म ।
616. एक जन्म माता-पिता देते हैं फिर दीक्षा पर गुरु द्वारा पुनर्जन्म होता है । प्रभु कहते हैं कि दीक्षा ऐसी लेनी चाहिए जिससे सात्विकता हमारे जीवन में आए और हमारा नया जन्म सात्विक हो जाए ।
617. ध्यान भी सात्विक, राजस और तामस होता है । प्रभु के किसी भी श्रीविग्रह का मंगलमय ध्यान, यह सात्विक ध्यान है ।
618. मंत्र भी सात्विक, राजस और तामस होते हैं । हम सात्विक मंत्र का जाप करके श्रेष्ठतम अवस्था में पहुँच जाते हैं । श्री गायत्री माता का मंत्र सात्विक मंत्र है । हम सात्विक मंत्र छोड़कर तामस मंत्र जपते हैं तो वैसा ही है जैसे देसी गौ-माता का दूध छोड़कर भैंस का दूध पी रहे हैं ।
619. श्री एकनाथजी महाराज ने श्रीराम नाम के दिव्य मंत्र की बहुत सुंदर व्याख्या करी है कि इस नाम मंत्र से दिव्य और कुछ भी नहीं है ।
620. नाम संस्कार में पुत्र या पुत्री का नाम रखना एक संस्कार है । प्रभु के नाम पर नाम रखा जाना श्रेष्ठतम है । प्रभु के नाम पर रखा हुआ नाम चिन्मय होता है ।
621. विवाह संस्कार सात्विक तरीके से होना चाहिए । भारतीय रीति रिवाज के साथ होना चाहिए । तामसी विचारधारा विवाह संस्कार में कदापि नहीं आना चाहिए ।
622. मृत्यु संस्कार में शव को ले गए और श्मशान में जला दिया ऐसा नहीं होकर पूरे धर्म से संस्कार युक्त तरीके से किया गया कर्म सात्विक कर्म होता है ।
623. प्रभु कहते हैं कि जहाँ सात्विक चर्या का आलंबन लिया जाएगा वह प्रभु की प्राप्ति हेतु अगाध श्रद्धा का निर्माण करेगा ।
624. प्रभु कहते हैं कि हम सात्विक आलंबन, राजस आलंबन और तामस आलंबन ले सकते हैं । यह हमारे ऊपर है पर प्रभु कहते हैं कि सभी जगह सात्विक आलंबन लेना ही श्रेष्ठ होता है ।
625. शास्त्रों के श्रेष्ठ आकलन की बुद्धि सात्विक आलंबन लेने से ही प्राप्त होती है ।
626. श्री उद्धवजी कहते हैं प्रभु से कि सात्विक, राजस और तामस का विभाजन का कोई सरल मार्ग बताएं । प्रभु कहते हैं कि हमारे ऋषियों, संतों और भक्तों ने जिन-जिन बातों को श्रेष्ठ माना है उसे सात्विक मानना चाहिए और वे जिनकी निंदा करते हैं, जिसे करने के लिए मना करते हैं उन्हें तामस मानना चाहिए ।
627. हम अच्छाई सामने आने पर भी उसे अपनाते नहीं और हम लोग बुराई को जानकर भी त्यागते नहीं, यह कितनी बड़ी विडंबना है ।
628. मन को स्वच्छ रखने के लिए सत्संग की बहुत बड़ी जरूरत जीवन में होती है ।
629. किसी भी भक्त या संत के द्वारा आचरण की हुई भक्ति की चर्या का जीवन में अनुकरण करना चाहिए ।
630. श्री रामचरितमानसजी में प्रभु श्री रामजी ने क्या किया, उसका अनुसरण आँखें बंद करके करना चाहिए ।
631. भक्तों और संतों ने जिस स्थिति में जो भक्ति का आचरण किया हमें भी उस परिस्थिति में वैसे ही भक्ति के आचरण का चुनाव करना चाहिए ।
632. सतोगुण बढ़ने से देह और चेतन का मिलन होता है और देह बुद्धि खत्म हो जाती है ।
633. प्रभु का स्पष्ट निर्देश है कि सतोगुण प्रभु मिलन में बाधक नहीं है । इसलिए रजोगुण और तमोगुण को कम करने पर वह सतोगुण की वृद्धि करता है ।
634. शरीर तीनों गुणों से युक्त है पर प्रभु तीनों गुणों से अतीत हैं ।
635. प्रभु कहते हैं कि वनअग्नि जैसे रगड़ से लगती है, हवा चलती है और पूरा वन जलने लगता है । अग्नि को बाहर से किसी ने नहीं लगाई । अग्नि का निर्माण लकड़ी से लकड़ी की रगड़ से हुई । फिर अग्नि कहाँ गई, पूरा वन जलने पर अग्नि का विसर्जन हो गया । ऐसे ही वैराग्य और ज्ञान की अग्नि का निर्माण करना, अज्ञान को जलाकर फिर उनको विसर्जित कर देना । फिर जीवन में केवल भक्ति ही बचे ।
636. प्रभु श्री ब्रह्माजी के पास श्री सनतकुमारजी आए और प्रश्न पूछा कि मन में विषय आते हैं या विषयों में मन जाता है । यह कितना सुंदर आत्म-कल्याण का प्रश्न है जो महापुरुष जगत कल्याण के लिए प्रभु से पूछते थे ।
637. संत श्री एकनाथजी ने उदाहरण दिया कि नए युवक-युवती का विवाह हुआ । पत्नी पीहर गई और युवक पत्नी को याद करने लगा । पत्नी उसके मन में आकर बसी या युवक का मन वहाँ चला गया । कोई कहेगा कि दोनों एक ही बात है और तथ्य भी यही है । मन बाहर जाता भी है और मन में आकर बाहर की चीज बसती भी है ।
638. श्री उद्धवजी का प्रश्न है कि चित्त से विषय को निकालना या चित्त को विषय से पीछे खींचना । प्रभु कहते है इस खटपट में मत पड़ो और केवल चित्त को मेरे में लगाकर मेरी भक्ति करो ।
639. प्रभु श्री ब्रह्माजी ने प्रभु श्री नारायणजी को याद किया और प्रभु श्री हंसावतार लेकर प्रकट हुए । श्रीहंस रूप में प्रभु आए इसका दो अर्थ है । हंस का संस्कृत में अर्थ संन्यासी यानी प्रभु साधु वेष में आए, दूसरा अर्थ हंस दूध और पानी में से पानी को अलग कर देता है और दूध को ग्रहण कर लेता है । प्रभु ज्ञान देने के लिए आए और थोथ को हटाने के लिए आए ।
640. श्री सनतकुमारजी प्रभु से प्रश्न पूछते हैं तो प्रभु उत्तर देते हैं कि पंचभूत से शरीर बना है पर शरीर पंचभूत से अतीत आत्म तत्व भी है ।
641. खटपट करने वाले जीव की बुद्धि जड़ हो जाती है, वह सूक्ष्म चीज ग्रहण नहीं कर पाती ।
642. बहुत सारे पदार्थ में मन चलाकर अपनी एकाग्रता को हम नष्ट कर देते हैं ।
643. प्रभु के लिए काम करने वाले प्रभु श्री ब्रह्माजी को अड़चन आने पर प्रभु स्वयं आकर उसे दूर करते हैं । यह सिद्धांत है प्रभु के लिए काम करेंगे और कहीं भी फसेंगे तो उसका निदान प्रभु करेंगे ।
644. मेरा मन जहाँ तक के विषयों को सोचता है, वाणी जहाँ तक के विषयों को बोल सकती है, नेत्र जहाँ तक के विषयों को देख सकते हैं, कान जहाँ तक के विषयों को सुन सकते हैं - वह केवल एक तत्व है यानी परब्रह्म तत्व ही है ।
645. प्रभु कहते हैं कि सभी परमात्मा तत्व एक मेरा ही आविष्कार है ।
646. प्रभु कहते हैं कि चित्त में विषय आते हैं या चित्त विषयों में जाता है, इस खटपट में नहीं उलझना चाहिए । चित्त को प्रभु में एकाग्र करके प्रभु की भक्ति करनी चाहिए ।
647. संसार को जितना भूलने का प्रयास करेंगे उतना भूल नहीं सकेंगे । सिद्धांत यह है कि जिसको हम भूलना चाहेंगे हमें उसी की सबसे ज्यादा याद आती है ।
648. प्रभु कहते है कि मन में घुसे हुए बंदर को डंडे से बाहर नहीं निकाला जा सकता । ऐसे ही मन में घुसे हुए संसार को हम डंडे से नहीं निकाल सकते । उसके लिए भक्ति करना ही अनिवार्य है ।
649. प्रभु कहते हैं कि मन से विषयों को बाहर निकालना या मन को विषयों से पीछे खींचना - दोनों ही प्रयास मिथ्या है । प्रभु कहते हैं कि एक बात जान लें कि जैसे विषयों का जाल मिथ्या है वैसे ही मन जो उसमें फंसता है वह भी मिथ्या है । इसलिए इस खटपट में नहीं उलझना चाहिए और मन को प्रभु में लगाकर प्रभु की भक्ति करनी चाहिए ।
650. सभी में एक ही चेतन तत्व प्रभु ही विराजमान हैं ।
651. संसार के विषयों को जीतने के लिए प्रभु सूत्र देते हैं कि विषयों को सदैव साक्षी होकर देखना चाहिए, उनमें लिप्त नहीं होना चाहिए ।
652. एक प्रभु की शक्ति है जो साक्षी भाव से सब कुछ देखती है । वह साक्षी भाव वाला जो तत्व हमारे भीतर भी है वह प्रभु रूप है ।
653. विषयों से झगड़ा करने पर वे बाहर नहीं निकल पाएंगे । काम, क्रोध, मद और लोभ को मन बाहर नहीं निकाल पाएगा, न ही मन को संसार से पीछे खींचा जा सकता है तो क्या करना चाहिए । प्रभु कहते हैं कि मेरी गोद में आ जाओ, साक्षी अवस्था में आ जाओ तो फिर न विषय हमें छलेंगे, न चित्त विषयों तक जाएगा । अगर चला भी गया तो तुम साक्षी अवस्था में हो इसलिए वह तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा ।
654. साक्षी बन जाओ । कैसे ? जैसे एक मंच पर दीपक लगा है और सुबह वहाँ एक सभा हुई, दीपक जल रहा था । दोपहर को संत का प्रवचन हुआ, दीपक जल रहा था और रात्रि को नाच-गान हुआ तो भी दीपक जल रहा था । दीपक ने तीनों को देखा पर दीपक पर क्या परिणाम हुआ । कुछ भी नहीं हुआ क्योंकि वह तो साक्षी रूप में था ।
655. प्रभु कहते हैं कि मेरे साथ एकरूप हो जाओ तो संसार अछूता हो जाएगा । प्रभु से एकरूप होते ही हमारे में साक्षी भाव आ जाएगा । अभी हम साक्षी नहीं हैं इसलिए हमारा मन कोई भी विषय को देखकर उस पर टिप्पणी करता है । आभूषण देखता है तो मन कहता है कि “अच्छा है” और फंस जाता है । गंदी चीज देखता है तो मन कहता है “बुरा है” और फिर भी फंस जाता है । इसलिए अगर हम साक्षी भाव से देखेंगे तो हमारा मन कोई टिप्पणी नहीं करेगा और हम फंसेंगे नहीं ।
656. अच्छा लगने का विचार आया तो दूसरा विचार तत्काल आएगा कि “चाहिए” और हम फंसते चले जाएंगे ।
657. साक्षी की साधना हेतु क्या करना चाहिए । अंतर्यात्रा करनी चाहिए । आँखों के पीछे जो देखने वाले प्रभु बैठे हैं उन्हें देखना चाहिए ।
658. उपनिषद में क्या कहा गया है ? प्रभु कहाँ हैं ? प्रभु तत्व आँखों से कभी दिखाई नहीं देता परंतु आँखों को देखने की शक्ति जो देता है वह प्रभु तत्व है । मन कभी प्रभु तत्व की कल्पना नहीं कर सकता पर मन को कल्पना करने की शक्ति प्रभु तत्व देता है । कान से जिन्हें सुना नहीं जा सकता वह प्रभु तत्व है पर कान को सुनने की शक्ति प्रभु तत्व देती है ।
659. अंतर्यात्रा का पहला सूत्र है कि हल्के होकर वह यात्रा करनी पड़ती है । हम अध्यात्म में बहुत सारा बोझ लेकर यानी मन का बोझ लेकर, संकल्प का बोझ लेकर, धन-धान्य-पुत्र-पौत्र का बोझ लेकर प्रभु तक नहीं पहुँच सकते । अगर प्रभु के दर्शन करने हैं तो हमको कचरा छोड़ना पड़ेगा अन्यथा इस कचरे की पूर्ति हेतु प्रभु साधन भेज देंगे पर प्रभु खुद नहीं मिलेंगे ।
660. अंतर्यात्रा में काम, क्रोध, मद और लोभ का भी बोझ हम लेकर नहीं जा सकते ।
661. प्रभु कहते हैं कि बाहर देखना बंद करो । बाहर माया का तमाशा है जो जितना देखेगा उतना फंसेगा । प्रभु कहते हैं कि सबको फंसाने हेतु माया का तमाशा प्रभु की माया ने ही खड़ा किया है । इसलिए प्रभु कहते हैं कि भीतर देखो और अंतर्यात्रा करो ।
662. जैसे रात्रि के समय अंधेरा है और एक अगरबत्ती को वेग से गोल घुमाया जाता है तो वह चूड़ी जैसी दिखती है । वैसे ही माया के कारण हमें संसार के दृश्य दिखते हैं पर प्रभु कहते हैं कि यह सब खेल है, तमाशा है ।
663. तृष्णा कम करना और वासना के बोझ को छोड़कर अंतर्यात्रा करनी पड़ती है ।
664. साक्षी भाव आने से संसार पिघल जाता है और कोई बंधन नहीं रहता ।
665. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में प्रभु द्वारा गाया श्रीहंस गीत बड़ा ही सार रूप वाला उपदेश है ।
666. प्रभु एक संकल्प मात्र से अनंत कोटि ब्रह्मांड़ो का निर्माण और उसे विलीन करते हैं ।
667. प्रभु के आने के बाद श्री गोकुलजी में नित्य आनंद, आनंद और आनंद ही बरसने वाले हैं । प्रभु श्री शुकदेवजी की यह व्याख्या है कि प्रभु जहाँ जाते हैं आनंद साथ जाता है ।
668. प्रभु साक्षात्कार के बाद संत का जीवन ही उत्सव हो जाता है । हमारा सांसारिक उत्सव दो-तीन घंटे मात्र का होता है पर जिन्होंने प्रभु का अनुभव कर लिया वे जीवनभर हर पल उत्सव का ही आनंद लेते हैं ।
669. कौन संपूर्ण जीवन को आनंद से जी सकता है ? श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि जो मेरा बन गया, जिसने मुझ प्रभु से प्रेम किया, वही जीवन को पूर्णतया आनंदित तरीके से जी सकता है ।
670. प्रभु कहते हैं जो मेरे बन गए हैं वे ही जीवन का सच्चे रूप में आनंद लेते हैं ।
671. हमारा उत्सव तो कभी-कभी होता है पर प्रभु भक्त का उत्सव नित्य चलता है । भक्त प्रतिपल और प्रतिपल आनंद को सरोकार करता रहता है । यह सिर्फ भक्ति से ही संभव है ।
672. परमानंद भरा कण-कण में प्रभु हमें रमन कराते हैं ।
673. प्रभु के भक्त के लिए जीवन उत्सव हो जाता है, यह बड़ी बात क्या है क्योंकि उसका मरण भी उत्सव हो जाता है । भक्ति का इतना बड़ा सामर्थ्य जो है ।
674. प्रभु श्री गोकुलजी में श्रीलीला करेंगे इसलिए श्री गोकुलजी के कण-कण का वातावरण सुंदर, सुयश और सुगंधित हो गया । जहाँ नजर जाती वहीं समृद्धि के दर्शन होने लगे ।
675. श्रीनंद बाबा सदैव प्रभु श्री नारायणजी की प्रार्थना करते थे कि कोई भी आपत्ति आए तो मेरे लाल प्रभु पर न आए । सिर्फ ऐसी एक प्रार्थना वे प्रभु से रोज करते थे ।
676. जब पूतना की कथा कहने का समय आया तो प्रभु श्री शुकदेवजी रुष्ट हो गए और रोष में बोले कि मेरे कोमल प्रभु को जहर पान कराने पूतना आई है । रुष्ट इसलिए हुए कि इतने कोमल प्रभु को इतना कड़वा पदार्थ देने आई है ।
677. जब प्रभु ने पूतना के प्राणों का आकर्षण करना शुरू किया तो पूतना ने प्रभु से कहा कि छोड़ो-छोड़ो तो प्रभु ने मन-ही-मन में कहा कि तुम्हें चौरासी के बंधन से ही मैं सदैव के लिए छुड़ा देता हूँ ।
678. जब पूतना को प्रभु ने मार दिया तो भगवती यशोदा माता ने प्रभु को आगे से, पीछे से, ऊपर से, नीचे से, दाएं से, बाएं से यानी सब तरफ से देखा कि कहीं प्रभु को चोट तो नहीं लगी । इतना प्रेम वे प्रभु से करती थी ।
679. सभी गोपियों ने गोमूत्र से प्रभु को स्नान करवाया, इतना प्रेम प्रभु से था कि प्रभु का अमंगल हरने के लिए फिर गोबर का टीका लगाना प्रारंभ हुआ । प्रभु का बार-बार लेप होता गया । सूत्र यह है कि गोमूत्र और गोबर मंगल के प्रतीक हैं इसलिए उनका स्पर्श मात्र कराया जाता है पर यहाँ तो गोमूत्र और गोबर का अभिषेक प्रभु का चलता रहा । इतना प्रभु से प्रेम था कि प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि इन गोपियों के इस अदभुत प्रेम को देखो, गोबर और गोमूत्र को मत देखो ।
680. देसी गौ-माता के गोमूत्र और गोबर में जहर उतारने वाला तत्व होता है इसी उद्देश्य से प्रभु को गोपियों ने गोबर और गोमूत्र से स्नान करवाया । विश्व में कोई अन्य गोधन में यह सामर्थ्य नहीं होता । भारत के देसी गौ-माता में जो गुण हैं वह कहीं भी, किसी भी अन्य गौ-माता में नहीं मिलेगा । इसलिए भारतीय गोवंश की रक्षा करना बहुत जरूरी है ।
681. देसी गौ-माता का घी बहुत सारे रोगों को नष्ट कर देता है । यह सामर्थ्य सिर्फ देसी गौ-माता में होती है ।
682. गोबर और गोमूत्र से सुबह तीन बजे नित्य श्री काशी विश्वनाथजी में प्रभु श्री महादेवजी के लिंग में लेप होता है । क्यों ? क्योंकि दिन भर भक्तों के हाथ के स्पर्श की अशुद्धि को दूर करने के लिए गोबर और गोमूत्र का लेप होता है । गोबर और गोमूत्र का इतना बड़ा महत्व है कि उसके बाद फिर प्रभु श्री महादेवजी के लिंग का पंचामृत से अभिषेक होता है ।
683. प्रभु के लिए वैसी प्रेमासक्ति होनी चाहिए जैसी गोपियों में थी ।
684. सुख में प्रभु से एकरूपता, दुःख में प्रभु से एकरूपता, ऐसा हमारा जीवन होना चाहिए ।
685. हम सब प्रभु के हैं, यह भाव का नाम ही श्रीगोकुल है क्योंकि श्री गोकुलजी में सर्वदा से यह भाव रहा है ।
686. जितना हम प्रभु से दूर होते जाएंगे उतना दुःखी होते जाएंगे, यह सिद्धांत है ।
687. मैं प्रभु का हूँ, अपने आप का अर्पण प्रभु को कर देना चाहिए ।
688. पूतना की चिता से सुगंधी निकली तो राजा श्री परीक्षितजी ने पूछा कि ऐसा क्यों तो प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि प्रभु पापनाशक होते हैं । प्रभु ने किसी का स्पर्श किया तो उसके पाप कहाँ बचेंगे । प्रभु का स्पर्श सब पापों को नष्ट कर देता है । पूतना राक्षसी थी, जीवन पापिनी का था, मांस खाने वाली थी फिर भी प्रभु के स्पर्श के कारण उसकी चिता से सुगंधी निकली क्योंकि उसके पाप नष्ट हो गए थे ।
689. पूतना की दुर्गति नहीं, सद्गति हो गई । जो गति बाद में भगवती यशोदा माता को प्रभु ने दी वह पहले ही पूतना को दे दी । भगवती यशोदा माता तो प्रभु को पालने वाली माँ थी और पूतना पापिनी थी । प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि प्रभु का एक कमजोर पक्ष है, एक बात में प्रभु असमर्थ हैं । प्रभु वैसे किसी भी चीज में असमर्थ नहीं पर एक बात में असमर्थ है कि कोई जीव किसी भी निमित्त से प्रभु के समीप चला जाता है तो उसका उद्धार रोकने में प्रभु असमर्थ हैं । किस निमित्त से गया, यह बात महत्वहीन है क्योंकि प्रभु के पास गया तो उसका उद्धार तय है ।
690. कंस ने डर से आठवां-आठवां कहकर प्रभु का नाम भी नहीं लिया और प्रभु को याद किया । बस याद किया और वह तर गया । प्रभु ने कंस का उद्धार कर दिया क्योंकि अंतिम समय प्रभु के श्रीकमलचरण कंस की छाती पर थे, कंस की दृष्टि प्रभु पर टिकी थी और इस तरह कंस तर गया और मुक्त हो गया ।
691. शिशुपाल जीवन भर प्रभु से द्वेष करता रहा । उसकी नित्य स्तुति प्रभु की गाली के रूप में ही थी । एक भी दिन ऐसा नहीं गया जिस दिन उसने प्रभु को याद करके प्रभु को गाली नहीं दी हो । वह याद करता था तो भी प्रभु को द्वेष से करता था उसके हृदय में द्वेष भरा था फिर भी वह तर गया जब श्री सुदर्शन चक्रराजजी से उसका सिर का छेदन हुआ ।
692. भक्ति का एक अदभुत सिद्धांत है कि कोई भी, किसी भी निमित्त से प्रभु को याद करे तो उसका उद्धार रोकना प्रभु के लिए भी संभव नहीं है । प्रभु से कोई भी व्यवहार करो तो उस जीव का कल्याण ही होगा ।
693. जैसे एक चंदन की लकड़ी को रगड़ने से सुगंधी, घिसने से सुगंधी, चंदन के वृक्ष को काटने से सुगंधी, जलाने से सुगंधी यानी सुगंधी के अलावा चंदन के पास कुछ है ही नहीं । वैसे ही प्रेम से, क्रोध से, द्वेष से कुछ भी प्रभु से किया गया तो कल्याण ही होगा क्योंकि अकल्याण नाम का द्रव्य प्रभु के पास है ही नहीं ।
694. जो वस्तु नहीं हो उसकी भावना करना यानी सुपारी में प्रभु श्री गणपतिजी की पूजा की भावना करना तो प्रभु की पूजा सुपारी मानकर की तो फल पूरा मिलेगा क्योंकि हमने उसको प्रभु का मान लिया और प्रभु मानकर पूजा किया इसलिए पूरा फल मिलेगा ।
695. जीव का सबसे बड़ा पुरुषार्थ कि किसी भी भावना से मन प्रभु में लगना चाहिए । प्रभु श्री शुकदेवजी एक खुली चुनौती देते हैं कि प्रेम से, क्रोध से, द्वेष से, विरोध से यानी किसी भी निमित्त से मन प्रभु में लगाओ तो कल्याण तय है । किसी भी उपाय से प्रभु को याद कर लिया, प्रभु का सानिध्य प्राप्त कर लिया तो उद्धार तय है ।
696. हम आज सोचेंगे कि भगवती यशोदा माता जैसा होकर ज्यादा क्या मिला तो फिर पूतना जैसा बनने में परहेज क्यों ? क्योंकि दोनों की गति एक जैसी, दोनों को मुक्ति मिली पर भगवती यशोदा माता को जो प्रभु से प्रेम मिला क्या वह संपूर्ण इतिहास में किसी को मिला है ? जो भक्ति के एवज में प्रेम का रसास्वादन प्रभु ने मैया को कराया वह विश्व में किसी को नहीं कराया होगा । भगवती कुंतीजी कहती हैं कि मैं वह दृश्य सोचकर रोमांचित हो जाती हूँ जब भगवती यशोदा माता डंडा लेकर दौड़ती है और प्रभु डरने की श्रीलीला करते हैं । जिनसे पूरा ब्रह्मांड डरता है वे प्रभु डरने की श्रीलीला अपनी मैया के सामने करते हैं ।
697. प्रभु मुक्ति देने में बहुत उदार हैं पर भक्ति देने में बहुत कंजूस हैं । प्रभु श्री शुकदेवजी ऐसा कहते हैं क्योंकि प्रभु मुक्ति देकर खुद भी मुक्त हो जाते हैं और जीव भी मुक्त हो जाता है पर भक्ति देकर प्रभु प्रेम में बंध जाते हैं ।
698. मुक्ति से बहुत ऊँ‍चा स्थान भक्ति का है ।
699. भक्त ही सिर्फ प्रभु की श्रीलीला में रमते हैं । क्या श्री शुकदेवजी, यशोदा माता, श्री नारदजी कभी प्रभु से मुक्ति चाहते हैं ? कभी नहीं क्योंकि वे प्रभु से भक्ति ही चाहते हैं ।
700. भक्ति करके क्या मिलेगा, यह प्रश्न जिसके जीवन में आया वह जीव कर्मफूटा ही है ।
701. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी कहते हैं कि जिसको भक्ति मिल गई उसे सब कुछ पहले ही मिल गया ।
702. जो प्रभु के रूप, सद्गुण और श्रीलीला में रम जाते हैं वे ही जीवन का सच्चा आनंद ले पाते हैं । वे आनंद स्वरूप बन जाते हैं ।
703. भक्ति प्रभु तक पहुँचने का साधन नहीं बल्कि परम साधन है, ऐसा संत मानते हैं ।
704. साधन करके प्राप्त क्या करना है – प्रभु का प्रेम । पूरी श्री रामचरितमानसजी को लिखकर गोस्वामी श्री तुलसीदासजी मांगते हैं कि प्रभु मेरे प्रिय हो जाएं जैसे कामी को स्त्री प्रिय होती है और लोभी को धन प्रिय होता है । बस अंत में सभी भक्त यही मांगते है कि उन्हें प्रभु प्रिय हो जाएं ।
705. जीव को चाहिए कि वह सिर्फ प्रभु की भक्ति करें और अन्य साधन के झंझटों में नहीं पड़े ।
706. जीवन की वृत्ति और जीवन के विषय सब प्रभु बन जाने चाहिए । भक्ति की यह श्रेष्ठतम अवस्था होती है ।
707. किसी भी कारण से प्रभु को याद करें, जीव को बस कैसे भी हो प्रभु को सदैव याद करना चाहिए । जीवन में इतना ही पुरुषार्थ करना पर्याप्त है ।
708. जीवन में ढोंग भी करना हो तो प्रभु भक्ति का ही ढोंग करना चाहिए, ऐसा संत कहते हैं । भक्ति का ढोंग करते-करते भक्त बन जाएंगे, इतना बड़ा भक्ति का सामर्थ्य है ।
709. एक डाकू को पकड़ने के लिए एक पुलिसकर्मी साधु का वेष बनाकर प्रभु श्री हनुमानजी के मंदिर में छह महीने तक रहे । फिर क्या था उन्होंने कभी वह साधु का चोला नहीं उतारा । पुलिस की नौकरी छोड़ दी और भक्त बन गए ।
710. एक वेश्या ने अपने बच्चे को श्रीशिव नाम रटाया तो नाम रटाते-रटाते वह स्वयं तर गई और प्रभु श्री महादेवजी के साक्षात दर्शन उसे हुए ।
711. ऐसे ज्ञानियों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए जो प्रभु के सगुण साकार रूप से ही हमें दूर करना चाहते हैं ।
712. सर्वोत्तम ज्ञानी और साधक होगा वह भक्त भी होगा यानी जो भक्त हुआ है वही ज्ञानी और साधक अपने आप में है, ऐसी संतों की व्याख्या है । यह सिद्धांत है, इसलिए ज्ञान और साधना के पीछे नहीं चलें, भक्ति के पीछे चलें तो ज्ञान और साधना जीवन में स्वतः ही आ जाएंगे ।
713. जब तक जीवन है कुछ-न-कुछ उपभोग जीवन में रहेगा । इसलिए प्रभु से जोड़कर उपभोग करें । उदहारण स्वरूप अमरस खाना है तो प्रभु के लिए बनाएं, भोग लगाएं और फिर प्रसाद रूप में स्वीकार करें ।
714. जीवन में भोगों का महत्व कम और प्रभु का महत्व सबसे ज्यादा होना चाहिए ।
715. भगवती यशोदा माता ने गोरस के मटके को सकट के ऊपर रखा और बाल प्रभु को नीचे सुला दिया । प्रभु रूठ गए और सकट को पटक दिया जिससे गोरस के मटके टूट गए । सूत्र यह है कि भक्त के मन में अपने से ऊपर किसी को देखकर प्रभु को अच्छा नहीं लगता ।
716. प्रभु की तरफ जीवन में ध्यान नहीं देंगे तो प्रभु जीवन से चले जाएंगे ।
717. हाथ हिलते हैं, पैर चलते हैं, नींद आती है, सांस आती है, भूख लगती है क्योंकि प्रभु हमारे भीतर से सब चलाते हैं ।
718. अपने भीतर के प्रभु को कभी नहीं भूलना चाहिए ।
719. अन्वयार्थ नाम बच्चों का रखना चाहिए यानी वैसा नाम जैसा संस्कार हम बच्चे में देखना चाहते हैं । जैसे प्रभु श्री बलरामजी बल के धाम होंगे इसलिए नाम पड़ा श्रीबलराम ।
720. प्रभु श्री कृष्णजी के नाम का अर्थ है कि सारे संसार में जितना आनंद है वह सारा का सारा आनंद जिस आनंद सिंधु की एक बिंदु मात्र है वे प्रभु श्री कृष्णजी हैं ।
721. प्रभु श्री कृष्णजी आनंद की सत्ता के परम शिखर हैं ।
722. प्रभु श्री कृष्णजी के नाम की व्याख्या श्री गर्गाचार्यजी ने करी कि प्रभु श्री कृष्णजी का नाम परमानंद, परमानंद और सिर्फ परमानंद देने वाला होगा ।
723. संत आनंद और परम विनोद में कहते हैं कि प्रभु श्री कृष्णजी का नाम टेढ़ा है, कोई अक्षर सीधा नहीं है श्रीकृष्ण नाम में । प्रभु श्री कृष्णजी खड़े होते हैं तो तीन जगह से टेढ़े खड़े होते हैं । प्रभु श्री कृष्णजी बोलते हैं तो भी टेढ़े बोलते हैं जिसका उदाहरण है कि पैंतालीस मिनट के श्रीमद् भगवद् गीताजी के संवाद ने पांच हजार वर्षों से विश्व के सभी टीकाकार को उलझाए रखा है । अगर सरल सीधे चाहिए तो प्रभु श्री रामजी का नाम सीधा, प्रभु श्री रामजी सीधे खड़े होते हैं और प्रभु श्री रामजी बोलते भी स्पष्ट हैं । संत आनंद और परम विनोद में कहते हैं कि सीधापन प्रभु श्री रामजी का, टेढ़ापन प्रभु श्री कृष्णजी का दोनों ही परम लुभावना और परम मंगलकारी है ।
724. प्रभु श्री रामजी जैसा आदर्श कहीं नहीं मिलेगा और प्रभु श्री कृष्णजी जैसा माधुर्य कहीं नहीं मिलेगा ।
725. प्रभु श्री श्रीकृष्ण आकर्षण करने में श्रेष्ठ हैं । जो भी प्रभु श्री श्रीकृष्ण के संपर्क में आया वह उनके परमानंद तत्व पर और माधुर्य पर मुग्ध होकर फंस गया ।
726. हमारे अंतःकरण में जो भी भावना उठे वह प्रभु के लिए ही उठनी चाहिए ।
727. संसार की सारी कलाएं, विद्याएं अपना आयाम प्रभु से ही पाती है ।
728. गोपियों ने प्रभु को सरल नाम दिया – श्री कन्हैया । वे श्रीकृष्ण नहीं बोल पातीं थीं इसलिए श्री कान्हा, श्री कन्हैया नाम दिया ।
729. प्रभु जब गुड़ालिया चलने लगे तो गौशाला जाते और बीच में कीचड़ मिल जाता तो कीचड़ से खुद को लेप लेते । प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि कीचड़ सबसे अपवित्र होता है पर प्रभु के लेप के बाद ब्रह्मांड का सबसे पवित्र वस्तु बन जाता ।
730. भाग्य के उदय की परिसीमा यानी पराकाष्ठा के दर्शन करें कि प्रभु के माता-पिता बने श्री नंदजी और भगवती यशोदा पर देवतागण फूलों की वृष्टि करते थे ।
731. देवता, ऋषि और संत पंछी के रूप लेकर प्रभु की जूठन प्रसादी प्राप्त करने के लिए आकाश में उड़ते रहते थे और आपस में छीना झपटी करते रहते थे प्रभु की प्रसाद को पाने हेतु ।
732. श्री गोकुलजी के पेड़, पेड़ नहीं वे श्रेष्ठ योगी थे जो इस आशा में खड़े रहते कि प्रभु आएंगे और हम छाया देकर धन्य होंगे ।
733. गोपियां अपने घर पर रहती ही नहीं थी । वे बार-बार कुछ निमित्त बनाकर प्रभु से मिलने श्रीनंद भवन जाती रहतीं थीं ।
734. सारे ब्रह्मांड को नचाने वाले प्रभु गोपियों के सामने प्रेम में नाचते थे ।
735. मोर नाचते हैं तो प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि यह मोर नहीं प्रभु श्री महादेवजी अपनी भूत-प्रेत की टोली के साथ पधारे हैं प्रभु के साथ नृत्य करने हेतु । प्रभु श्री महादेवजी नीलकंठ हैं और मोर बने इसलिए मोर का एक नाम भी नीलकंठ पड़ गया ।
736. हर गोपी प्रभु को अपने घर ले जाती, सजाती, खिलाती, लाड़ लड़ाती । इतना प्रेम वे प्रभु से करतीं थीं ।
737. गोपीजन जहाँ भी एक दूसरे से मिलती उनके चर्चा के विषय प्रभु श्री कृष्णजी होते । बस उनकी चर्चा का एक ही विषय रहता - प्रभु ।
738. गोपियां कहीं भी मिले, कभी भी मिले पर चर्चा सिर्फ प्रभु की ही करतीं थीं । वे सुबह, शाम और रात्रि में प्रभु की चर्चा में ही मग्न रहतीं थीं ।
739. प्रभु माखन के साथ गोपियों के प्रेम भाव को चुराते थे, माखन तो मात्र माध्यम था ।
740. गोपियां प्रभु की शिकायत भगवती यशोदा माता से करती कि माखन चोरी करते हुए प्रभु को हम पकड़ नहीं पाती । प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं ये गोपियां नहीं बल्कि संत, ऋषि और भक्त हैं जो माता से जैसे कह रहे हैं कि कितने जन्मों को जप, साधन में लगाकर भी हम प्रभु को फिर भी अभी तक नहीं पकड़ पाए हैं ।
741. प्रभु क्षण मात्र के लिए हमारे हृदय पटल पर प्रकट हो यह साधारण बात है पर प्रभु स्थिर रूप से वहाँ विराजे यह सबसे श्रेष्ठ बात है ।
742. प्रभु ने माखन के अलावा कुछ भी नहीं चुराया । माखन की क्या कमी थी प्रभु के पास क्योंकि श्रीनंद बाबा के पास नौ लाख गोधन था । इतना माखन था जिसका अनुमान भी हम नहीं कर सकते पर गोपियों को आनंद देने के लिए प्रभु माखन चोरी की श्रीलीला करते थे ।
743. गोपियां भी असली शिकायत नहीं करती सिर्फ शिकायत का दिखावा करती । जीवनभर माखन निकालने हेतु बिलोना करना उनका आज सार्थक हो गया ऐसा गोपियां मानती जिन गोपियों के यहाँ प्रभु माखन चोरी हेतु जाते । वे अपने भाग्य जग गए ऐसा मानती और सबको अपना भाग्य गिनाती । जिनके यहाँ उस दिन प्रभु नहीं पहुँचते वे दुःखी हो जाती ।
744. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि प्रभु माखन चोर नहीं, चितचोर हैं । गोपियों का माखन नहीं बल्कि उनका चित्त चुराते थे, यह प्रभु श्री शुकदेवजी की माखन चोरी की व्याख्या है ।
745. प्रभु अनंत कोटि ब्रह्मांड के नायक हैं और अगर चुराएंगे तो शुद्ध चित्त ही चुराएंगे । प्रभु को भक्तों का निर्मल मन को ही चुराने की आदत है ।
746. मन कैसा होना चाहिए प्रभु के चुराने हेतु - माखन जैसा कोमल एवं निर्मल और विकारों से रहित । भगवती मीराबाई, श्री चैतन्य महाप्रभु का मन ऐसा था, जो प्रभु ने चुरा लिया ।
747. संतों को एक प्रभु को छोड़कर कोई भी दूसरा पदार्थ संसार में दिखता ही नहीं है ।
748. मन को कोमल और निर्मल बना लें तो वह प्रभु के द्वारा चुरा लिया जाएगा । इसका नाम भक्ति समाधि है । प्रभु चित्त चुरा लेते हैं तो भक्त समाधि में चला जाता है, समाधि हो जाती है, लगाई नहीं जाती । प्रभु चित्त को खींच लेते हैं तो समाधि लग जाती है, साधक लगाता है तो समाधि कभी नहीं लगती ।
749. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में प्रभु द्वारा गाया श्रीहंस गीत अगर किसी को मुक्त होना है तो उसके लिए सबसे बड़ा उपदेश है ।
750. चित्त को विषयों से निकाला जाए या विषयों को पीछे खींचा जाए । मन विषयों में आता है या विषय मन में भी आते हैं । इसी बात का श्रीहंस गीत में उत्तर दिया गया है और उसका निवारण का उपाय भी बताया गया है ।
751. बुद्धि का स्तर सबमें अलग-अलग होता है । कुछ लोगों की बुद्धि सूक्ष्म विषय पर ध्यान कर लेती है पर कुछ लोगों की बुद्धि में बार-बार प्रयास के बाद भी सूक्ष्म विषय उतर ही नहीं पाते । यह बुद्धि का अलग-अलग स्तर होता है, इसको बढ़ाने के लिए सत्संग ही एकमात्र उपाय है ।
752. प्रभु कहते हैं कि चित्त और विषय दोनों से प्रभु अतीत हैं । जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के ताप से सागर का जल भाप बनकर मेघ बन गए, फिर बरसे, फिर वह जल वापस सागर में आ गया पर इसका प्रभु श्री सूर्यनारायणजी पर कोई असर नहीं पड़ा क्योंकि वे इससे अतीत हैं ।
753. वही जीव वास्तव में मुक्त होता है जो चित्त और विषयों से अतीत हो जाता है, ऐसा प्रभु कहते हैं ।
754. प्रभु श्री सूर्यनारायणजी की तरह हमें भी सिर्फ जीवन में दृष्टा बनकर देखना है कि मेघ बन गए ताप से और मेघ से वर्षा हुई । हमें चित्त और विषयों में उलझना नहीं है ।
755. हमारा साधन माया के चक्कर से प्रभावित है इसलिए हमारे साधन सफल नहीं होते ।
756. शब्द और दृश्य से बाहर निकलने पर ही सच्ची मुक्ति है । पहले गलत लोगों के शब्द सुनते थे फिर संत के शब्द सुनने लगे । पहले गलत दृश्य देखते थे फिर सात्विक दृश्य देखने लगे । फिर जिस दिन हमें ध्यान आ जाएगा कि हम शब्द और दृश्य से अतीत हैं उस दिन ही हम जीवन-मुक्त हैं ।
757. सतोगुणी व्यक्ति ही मुक्ति पा सकता है । रजोगुणी और तमोगुण ऐसा नहीं कर सकते । पहले रजोगुण और तमोगुण को सतोगुण में परिवर्तित करना होगा तभी मुक्ति के मार्ग पर हम चल पाएंगे ।
758. संसार का एक नाम संतों ने छलिया दिया है क्योंकि संसार हमें छल लेता है ।
759. हमें संसार भीतर और बाहर दोनों तरफ से छलता है । बाहर से हमने कुछ खाया और भीतर से उसकी याद बनी रहती है ।
760. संसार में चलते-चलते संसार की इतनी आदत लग गई है कि अब उसके बिना चलता ही नहीं, यह हमारा कितना बड़ा दुर्भाग्य है ।
761. प्रभु कहते हैं कि भक्ति करके सारे संसार को अपने भीतर से धकेल कर हमें बाहर निकालना चाहिए ।
762. संसार को हम अपने भीतर से बाहर निकालें इसके लिए उपाय क्या है ? प्रभु कहते हैं कि थोड़ी-थोड़ी देर में मेरा ध्यान करो और मेरी भक्ति करते हुए इसका नित्य अभ्यास करो ।
763. मैं विषयों से अतीत हूँ और अपने मन के विकारों से भी अतीत हूँ । जैसा हम अपने कपड़ों से भिन्न है वैसे ही हमारे अंदर आने वाले विषयों और विकारों से भी हम भिन्न हैं ।
764. भगवती माता को कुमकुम, प्रभु श्री महादेवजी को बेलपत्र, प्रभु श्री नारायणजी को श्री तुलसीदल चढ़ाते हैं । वैसे ही अपने मन की हर वृत्ति प्रभु को चढ़ानी चाहिए । एक-एक विचार को प्रभु को चढ़ाना चाहिए । ऐसा श्री उद्धवजी को प्रभु कहते हैं ।
765. एक प्रभु श्री महादेवजी का आत्मलिंग हमारे भीतर भी है जिसकी पूजा हमने कभी नहीं करी । बाहर के लिंग की पूजा हम करते हैं पर भीतर के आत्मलिंग की मानसिक पूजा भी हमें करनी चाहिए ।
766. जैसे हम बाहर के प्रभु श्री महादेवजी को दृष्टि खोलकर देखते हैं प्रभु कहते हैं कि अब दृष्टि बदलो और अंतर्दृष्टि करो और अपने भीतर के प्रभु श्री महादेवजी प्रभु को देखो ।
767. बाहर की पूजा सकाम थी यानी कामना युक्त थी पर भीतर की पूजा निष्काम होनी चाहिए यानी कोई कामना नहीं होनी चाहिए ।
768. मन प्रभु को अर्पित होना चाहिए और यह हम भीतर की पूजा यानी मानसिक पूजा करेंगे तभी संभव होगा ।
769. मेरे मन की धारा अंतरात्मा के लिंग प्रभु श्री महादेवजी पर चढ़ती रहे, यह आत्मा का अभिषेक होता है यानी आत्माभिषेक ।
770. प्रभु का आत्माभिषेक करना भक्ति की श्रेष्ठतम अवस्था होती है ।
771. आत्माभिषेक करते-करते जीव परमात्मा में लीन हो जाता है ।
772. बाहर के पदार्थ से संबंध नहीं, अपने शरीर से संबंध नहीं, अपने मन की वृत्ति से संबंध नहीं, सबसे अतीत हो गया तभी शांति और परमानंद हमें मिलेगा और तभी मुक्ति संभव होगी ।
773. हमारे बाहर देखने का आकर्षण ही खत्म हो जाता है क्योंकि हम अपने भीतर देखना सीख जाते हैं ।
774. अपने भीतर के आत्मलिंग के लिए संपूर्ण समर्पण होना चाहिए । ऐसा होने पर विषय और संसार उस साधक को दिखते हैं, वह संसार और विषयों से व्यवहार भी करता है पर उस पर कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि संसार के विषय अब उसे बांध नहीं सकते ।
775. जैसे सपने में देखे साँप और आग से जागृत अवस्था का मनुष्य डरता नहीं, उसका कोई परिणाम उस पर नहीं होता वैसे ही संसार भी जीवन-मुक्त जीव पर कोई परिणाम नहीं करता ।
776. अब संसार के विषय जीवन-मुक्त जीव पर पाप और पुण्य का लेप नहीं करते ।
777. हमारी बुद्धि विषय को देखती है, विषय से व्यवहार करती है पर हमारी आत्मा उससे अतीत है । जैसे बादल जल बरसाते हैं पर बादल जल में भीगते नहीं वैसे ही साधक की आत्मा विषयों से अलिप्त रहती है ।
778. प्रभु को श्री उद्धवजी कहते हैं कि रोज-रोज आप मुझे नए-नए साधन बताते हैं, सब कठिन हैं । ऐसा एक साधन, जो सरल हो और कल्याण कर दे, वह बताएं । श्री उद्धवजी कहते है कि प्रभु आपकी दृष्टि में श्रेष्ठतम साधन क्या है, वह मुझे बताएं । श्री उद्धवजी कहते हैं कि मुझे साधन चुनने का विकल्प ही मत दें क्योंकि मैं भ्रमित हूँ । श्री उद्धवजी कहते हैं कि प्रभु आप ही मेरे हित के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन बता दें । प्रभु तब भक्ति का सर्वहितार्थ साधन बताते हैं ।
779. प्रभु यही प्रश्न चाहते थे कि कोई उनसे पूछे कि सर्वोत्तम साधन बता दें । कौन-सा साधन ऐसा है जो हमारा प्रभु से प्रेम करा दे – प्रभु कहते हैं कि ऐसा साधन तो केवल भक्ति ही है ।
780. जैसे छोटे बच्चे को एक माँ अपने हाथ से भोजन कराती है वैसे ही प्रभु के समक्ष छोटे बनने में जो मौज है वह बड़े बनने में नहीं है । यह संत श्री ज्ञानेश्वरजी की अदभुत व्याख्या है छोटे बनने की ।
781. प्रभु कहते हैं कि मैंने श्रीवेदों को बनाया । इनमें अनेक प्रकार के साधन बताए गए हैं क्योंकि संसार में जीव अनेक प्रकार के हैं । जैसे माँ को सभी बच्चों के लिए उनकी पसंद का आहार बनाना पड़ता है वैसे ही श्रीवेद माता सभी साधक बच्चों के लिए विभिन्न साधन बताती है ।
782. जैसे एक माँ का एक बेटा जो ऑफिस जाता है उसका भोजन उसके ऑफिस जाने से पहले सुबह माँ बना देती है । दूसरा बेटा जो व्यायामशाला जाता है उसका आहार पौष्टिक बनाती है। तीसरा बेटा जो अभी बीमारी से उठा है उसका आहार हल्का बनाती है । सबके लिए एक आहार नहीं हो सकता । अगर हल्का आहार व्यायामशाला जाने वाले को दे दे तो परेशानी है और अगर पौष्टिक आहार बीमार बच्चे को दे दिया तो परेशानी है । ऐसे ही श्रीवेद माता सात्विक, राजस और तामस मंत्र भी प्रदान करती है और सात्विक, राजस और तामस उपासना भी बताती है । जिसको जो चाहिए वह उसे ग्रहण कर सकता है ।
783. जैसे हम दवाई की दुकान पर जाते हैं और कोई भी दवाई नहीं ले सकते, हमें अपने रोग के हिसाब से डॉक्टर की लिखी दवाई का चयन करना पड़ता है । कुछ भी ले लिया और सब कुछ ले लिया तो हमारा अमंगल हो जाएगा, ऐसे ही हमें अपने काम का साधन चुनना पड़ता है ।
784. मेरे लिए उपयोगी क्या है, यह मुझे पता होना चाहिए या मेरा एक हितैषी होना चाहिए जो मुझे सही साधन का चयन करवा दे । प्रभु से श्री उद्धवजी कहते हैं कि आपसे बड़ा मेरा हितैषी कौन हो सकता है ?
785. कोई कहता है कि धर्म करो, कोई कहता है यज्ञ करो, कोई कहता है कथा सुनो, कोई कहता है शास्त्र अध्ययन करो, कोई कहता है योग करो, कोई कहता है ध्यान करो, कोई कहता है कर्मकांड करो, प्रभु कहते हैं कि सब छोड़ो, मेरी बात सुनो और सब साधनों को भूलकर मेरी भक्ति करो ।
786. हमें जो रस विषय भोगों में दिखता है वह वहाँ है ही नहीं, उसका भ्रम मात्र है, यह शास्त्र मत है ।
787. श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं कि सब साधन कुछ मात्रा में कुछ लोगों के लिए उपयोगी है पर एक भक्ति का साधन है जो सब समय, सबके लिए उपयोगी है । कितना भी योग, पूजा करो मेरे तक नहीं पहुँच पाओगे इसलिए यह सब करते-करते यानी जो भी संभव हो करते हुए वह करो जिससे मुझ तक पहुँच पाओगे । मेरी भक्ति करो, सिर्फ भक्ति करो, मोक्ष के सभी साधन में भक्ति सर्वोपरि साधन है । मुझ (प्रभु) तक पहुँचने का एकमात्र साधन है - भक्ति ।
788. भक्ति के पुत्र ज्ञान और वैराग्य हैं । माता आएगी तो बेटे अपने आप चले आएंगे, ऐसा प्रभु कहते हैं ।
789. प्रभु कहते हैं श्री उद्धवजी को कि सर्वोच्च साधन केवल मेरी भक्ति ही है । किसी को भी और कभी भी मेरी भक्ति के बिना रहना ही नहीं चाहिए । प्रभु डंके की चोट पर कहते हैं कि जीवन में जो भी कर लो शांति हेतु, कभी शांति नहीं मिलेगी । अखंड शांति तो केवल प्रभु की भक्ति करने पर ही मिलेगी ।
790. भक्ति का कोई भी विकल्प ही नहीं है, ऐसा प्रभु स्पष्ट श्री उद्धवजी को कहते हैं ।
791. प्रभु की भक्ति बिना अखंड आनंद कहीं भी नहीं मिल सकता, ऐसा श्री उद्धवजी को प्रभु कहते हैं ।
792. अखंड आनंद से हृदय सदैव भरा रहे, यह अनुभूति भक्ति बिना कतई संभव नहीं है ।
793. धन्य होता है वह जीव जो भक्ति के मर्म को जान लेता है ।
794. प्रभु के सानिध्य का सुख प्रदान करने वाला एकमात्र साधन है - भक्ति ।
795. प्रभु कहते हैं प्रभु श्री महादेवजी श्मशान में जाकर एकांत में क्या करते हैं ? वे वहाँ भक्ति करते हैं । भक्ति हेतु एकांत की चाह प्रभु श्री महादेवजी को श्मशान में निवास करवाती है । श्री उद्धवजी को प्रभु बताते हैं कि भक्ति का सूत्र यह है कि भक्ति एकांत में करो, एकांत अनिवार्य है ।
796. प्रभु कहते हैं कि मेरी भक्ति का सच्चा सुख तो प्रभु श्री महादेवजी ही जानते हैं ।
797. प्रभु श्री महादेवजी एकांत में श्मशान में बैठते हैं और भक्ति करते हैं क्योंकि कोई श्मशान के डर से उनसे मिलने नहीं आता । अगर आता है तो डाकिनी, भूत, प्रेत उसे भगा देते हैं ।
798. विश्व का भोग का सुख भक्ति के आनंद के आगे तुच्छ, तुच्छ और तुच्छ है । ऐसा श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं इसलिए सभी संत निष्काम भक्त होते हैं । प्रभु के यहाँ सबसे बड़ा महत्व निष्काम और निस्वार्थ भक्ति करने वाले का है । सिर्फ प्रेम के लिए भक्ति करनी और ऐसी भक्ति में रमे रहना चाहिए ।
799. गोपियों की प्रेमलक्षणा भक्ति है । यह भक्ति की शुद्धतम अवस्था होती है । सकाम भक्ति मिलावटी भक्ति होती है, किसी कामना की कोई मिलावट भक्ति में नहीं होनी चाहिए ।
800. प्रभु कहते हैं कि मैं शपथ लेकर कहता हूँ मेरी निष्काम और निस्वार्थ भक्ति करने वाले के दुःख और कष्टों को मैं हर लेता हूँ ।