| 001. |
संपत्ति में सुख है, इस भ्रम को त्यागने के लिए शास्त्र कहते हैं । शास्त्र कहते हैं कि जीवनभर पागल की तरह संपत्ति कमा कर और भक्ति नहीं करके अपने परमार्थ को न सुधार कर अपने जीवन को बर्बाद नहीं करना चाहिए । |
| 002. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त के पास संपत्ति नहीं होती क्योंकि मैं (प्रभु) ही उनकी संपत्ति होता हूँ । कितनी बड़ी बात यहाँ पर प्रभु कह रहे हैं । |
| 003. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त को संपत्ति चाहिए ही नहीं होती । संसार के भोग उसे लाचार नहीं बनाते, जिसका स्वयं पर नियंत्रण नहीं उसको वे लाचार बनाते हैं । प्रभु कहते हैं कि जिसने मुझ (प्रभु) पर भक्ति से नियंत्रण कर लिया उसे फिर कोई भी चीज लाचार नहीं बना सकती । |
| 004. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्तों को अधिक चीजों की आवश्यकता ही नहीं होती क्योंकि उनका मन भक्ति के कारण शांत होता है, चंचल नहीं होता । |
| 005. |
दुनिया में सेठों की भाग दौड़ में कोई हमसे फिर भी आगे रहने वाला है । जीवनभर हम हाँफते हुए भागते ही रहते हैं । एक संत का सेठों को उपदेश है कि इस भाग दौड़ को छोड़कर प्रभु की भक्ति करनी चाहिए । |
| 006. |
प्रभु कहते हैं कि जिनके मन में विषय नहीं आते और जिनकी इंद्रियों से विषय हट जाते हैं, वही सबसे सर्वश्रेष्ठ हैं और वही सबसे शांत है । |
| 007. |
प्रभु कहते हैं कि यह सब मैं उन भक्तों को बता रहा हूँ जिनको एक मुझे (प्रभु) को छोड़कर कुछ नहीं चाहिए । ऐसे भक्त जहाँ रहेंगे प्रकृति वहाँ आनंद बरसाएगी । |
| 008. |
प्रभु का ध्यान अच्छा हो जाए, सेवा अच्छी हो जाए, पूजा अच्छी हो जाए, जप अच्छा हो जाए, इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए - ऐसा भक्त का भाव होता है । |
| 009. |
भक्त का भाव होता है कि मेरा कोई परिवार नहीं, सिर्फ प्रभु ही मेरे परिवार के एकमात्र सदस्य हैं । |
| 010. |
चंद्रसरोवर पर बैठे श्री सूरदासजी को याद करें सिर्फ एक इकतारा लेकर प्रभु को रिझाते हैं और प्रभु उनका पद गान सुनने स्वयं आते हैं । |
| 011. |
क्या पहनना है, क्या खाना है, यह प्रश्न उन लोगों के लिए अहम होता है जिन्होंने जीवन में प्रभु की भक्ति का स्पर्श नहीं किया । |
| 012. |
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी को प्रभु श्री रामजी को छोड़कर और कुछ नहीं चाहिए था । भगवती मीराबाई को प्रभु श्री गिरधर गोपालजी को छोड़कर कुछ नहीं चाहिए था । ऐसे भक्तों की मृत्यु पर भी विजय हो जाती है । |
| 013. |
बाकी सब साधन अपनी जगह ठीक हैं पर भक्ति से जो मेरे साथ एकाकार हो गया वही सर्वोच्च है, ऐसा प्रभु कहते हैं । |
| 014. |
एक संत को उनके एक अनुयायी ने कहा कि आप इतनी सुंदर कथा कहते हैं, विदेश चले तो एक कथा के लिए इतने करोड़ों रुपए मिल जाएंगे । संत ने कहा कि मेरे श्री ठाकुरजी ने जो दिया है उसी में मुझे संतोष है । सिर्फ चार सामान मेरे लिए जीवन में पर्याप्त है । वे संत अंत समय इलाज के लिए अस्पताल नहीं गए । प्रभु के श्रीविग्रह के सामने, प्रभु के आश्रय में शरीर छोड़ा । ऐसे संत का मृत्यु भी कुछ नहीं बिगाड़ पाती । |
| 015. |
श्रीमद् भागवतजी महापुराण का एक-एक श्लोक अनमोल रत्न हैं । |
| 016. |
प्रभु श्री ब्रह्माजी का पद, स्वर्ग का राजा, योग की सभी सिद्धियों या स्वयं मुक्ति देवी भी आकर खड़ी हो जाती है तो भी प्रभु कहते हैं कि मेरा भक्त कहता है कि मुझे क्या करना, वापस चले जाएं । क्योंकि मेरे भक्त को तो सिर्फ मुझे (प्रभु) ही रिझाना है और सिर्फ मैं (प्रभु) ही चाहिए । |
| 017. |
भक्त मुक्ति नहीं मांगते, नित्य प्रभु का सानिध्य मांगते हैं । वे नित्य प्रभु की सेवा मांगते हैं और नित्य प्रभु का नाम जप और कीर्तन मांगते हैं । |
| 018. |
संत श्री तुकारामजी कहते हैं कि एक कृपा प्रभु कर दें कि कभी मुझे मुक्त नहीं करें । तो क्या करना, आप प्रभु बने रहें और मुझ तुकाराम को भक्ति करने दें, भक्ति का रसास्वादन लेने दें । |
| 019. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त को मुझ प्रभु को छोड़कर कुछ भी मिलता हो तो वे नहीं लेते, उसे तत्काल छोड़ देते हैं । |
| 020. |
प्रभु कहते हैं कि श्री ब्रह्माजी से भी मैं उतना प्रेम नहीं करता जितना अपने प्रेमी भक्तों से करता हूँ । |
| 021. |
प्रभु कहते हैं कि प्रभु श्री महादेवजी से देव रूप में उतना प्रेम मैं नहीं करता जितना प्रभु श्री महादेवजी के भक्तों से करता हूँ । |
| 022. |
प्रभु कहते हैं कि मैंने कभी भगवती लक्ष्मी माता से उतना प्रेम नहीं किया जितना प्रेम मैं अपने भक्तों से करता हूँ । |
| 023. |
प्रभु कहते हैं कि श्री शेषजी, जिनके आसन के ऊपर मैं शयन करता हूँ, उनसे भी मैं उतना प्रेम नहीं करता जितना प्रेम मैं अपने भक्तों से करता हूँ । |
| 024. |
प्रभु कहते हैं कि मैं शपथ लेकर कहता हूँ कि मैंने स्वयं से भी उतना प्रेम नहीं किया जितना प्रेम मैं अपने भक्तों से करता हूँ । इससे ऊँची और सारगर्भित कोई भी बात हो ही नहीं सकती जो प्रभु अपने भक्तों के लिए कह सकते हैं । |
| 025. |
प्रभु कहते हैं कि मैंने भगवती लक्ष्मी माता को अपने चरण दबाने में लगा दिया पर गोपियों को मैं अपने हृदय में स्थान देता हूँ । |
| 026. |
प्रभु कहते हैं कि इतना प्रेम भक्त को देखकर मेरे अंदर जागृत होता है कि मैं सोचता रहता हूँ कि मैं अपने भक्त की और क्या सेवा करूं । |
| 027. |
प्रभु यहाँ तक कहते हैं कि मैं अपने भक्तों का सानिध्य पाने के लिए तरसता हूँ । |
| 028. |
भक्त के लिए जितनी परवाह प्रभु करते हैं उतनी वे अपनी परवाह भी नहीं करते, ऐसा प्रभु कहते हैं । |
| 029. |
प्रभु कहते हैं कि भक्त मुझे इतने प्रिय हैं, भक्त मेरा भजन करते हैं तो मैं भी उनका भजन करता हूँ । |
| 030. |
प्रभु कहते हैं कि मैं भक्तों के पीछे-पीछे घूमता हूँ कि कभी मेरे भक्त पर संकट न आए । |
| 031. |
प्रभु कहते हैं कि संसार में मांगने वाले मेरे पीछे घूमते हैं और मैं अपने भक्तों के पीछे घूमता हूँ । |
| 032. |
प्रभु ने श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध में श्री उद्धवजी को भक्तों के लक्षण बताए हैं । |
| 033. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा भक्त बिना मुझसे अपेक्षा रख कर मेरी भक्ति करता है, मुझे प्रेम करता है । सूत्र यह है कि जो प्रभु से अपेक्षा रखता है उसे भक्त नहीं कहना चाहिए । |
| 034. |
प्रभु कहते हैं कि जब मैं अपने भक्त को धन, संपत्ति, मुक्ति देना चाहता हूँ तो वह कहता है कि प्रभु यह आप और किसी को दे दो बस मुझे आप अपना प्रेम देते रहो । |
| 035. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा भक्त मुझसे कुछ मांगता ही नहीं । प्रभु भक्त के लक्षण बताते हैं और कहते हैं कि मैं देना चाहता हूँ, मनुवार करता हूँ फिर भी मेरे भक्त मेरे से भक्ति के अलावा कुछ नहीं लेते । |
| 036. |
प्रभु कहते हैं कि संसार मेरे पीछे-पीछे चलता है पर मैं अपने भक्त के पीछे-पीछे चलता हूँ । |
| 037. |
प्रभु कहते हैं कि भक्त वह है जो शांत है और जिसका किसी के साथ भी बैर नहीं है । |
| 038. |
प्रभु भक्त की महिमा गाते-गाते थकते नहीं । संत श्री एकनाथजी कहते हैं कि देखो प्रभु मतवाले होकर प्रेम में क्या बोल रहे हैं । अपने भक्तों के लिए प्रभु कहते हैं कि उद्धव, सुनो मैं भक्त के पीछे क्यों चलता हूँ ? क्योंकि भक्तों के पैरों से उड़ी हुई रज से मैं पवित्र होना चाहता हूँ । प्रभु पवित्रता की पराकाष्ठा हैं फिर भी पवित्र होने की बात कहते हैं । |
| 039. |
प्रभु कहते हैं कि समस्त संसार के लिए वात्सल्य यानी प्रेम से भरपूर भक्त होते हैं । कोई भी जीव उनके पास आ जाए, सबसे प्रेम व्यवहार करते हैं क्योंकि सबके भीतर भक्त मेरा (प्रभु का) ही दर्शन करता है । |
| 040. |
देसी गौ-माता को हाथ चटाने से हमारे भाग्य की रेखा बदल जाती है । बहुत सारे रोग स्वतः ही ठीक हो जाते हैं । |
| 041. |
प्रभु से प्रेम करना चाहिए और प्रेम दीवानापन तक जाना चाहिए । वह प्रेम ही क्या जिसमें दीवानापन नहीं है । जैसे गौ-माता अपने नवजात बछड़े से दीवानापन का प्रेम करती है । |
| 042. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त के ऊपर काम, क्रोध, लोभ का आक्रमण नहीं होता । अगर होता भी है तो मैं उसकी रक्षा करता हूँ, उसे भ्रष्ट नहीं होने देता । |
| 043. |
प्रभु कहते हैं कि मैं भक्त की विपत्ति को, प्रारब्ध को नष्ट कर देता हूँ । भगवती मीराबाई पर प्रारब्धवश कष्ट आए पर वे प्रभु में रमी थी इसलिए उन्हें पता भी नहीं चला और दुःख आए और उन्हें नमस्कार करके चले गए । |
| 044. |
प्रभु कहते हैं कि कर्मकांड, यज्ञ, योग, जंगल में तप से जो नहीं होता वह सिर्फ एकमात्र भक्ति से संभव हो जाता है । एकमात्र उपाय है भक्ति । भक्ति से जीव के लिए इतनी ऊँचाई पाना संभव है कि वह मेरे प्रेम को पा जाता है । |
| 045. |
प्रभु कहते हैं कि मेरी भक्ति करने वाला कोई भी हो उसका कुल समेत उद्धार कर देता हूँ, उसके पूर्व जन्मों के सभी पापों को प्रभु कहते हैं कि मैं नष्ट कर देता हूँ । |
| 046. |
श्वपच और चांडाल जाति का भी भक्त अगर मेरी भक्ति करता है तो वह इतना पवित्र हो जाता है कि उसे स्पर्श करके तीर्थ पवित्र होते हैं । तीर्थ लालायित रहते हैं कि मेरे भक्त वहाँ पधारे । |
| 047. |
प्रभु कहते हैं कि वानर और रीछ जिन्होंने श्रीरामावतार में और ग्वाले जिन्होंने श्री कृष्णावतार में मेरा साथ दिया उनके लिए प्रेम की माला मैं बनाता हूँ और अपने हृदय में धारण करता हूँ । |
| 048. |
जिस भी जाति में, जो भी पाप कर्म लेकर जो जन्मा है, भक्ति करते-करते वह महान बन जाता है । |
| 049. |
प्रभु कहते हैं कि मुझसे प्रेम करते-करते कोई रोमांचित नहीं हुए, रोमावली खड़े नहीं हुए, नेत्र सजल नहीं हुए, गला अवरुद्ध नहीं हुआ, तो क्या खाक प्रेमाभक्ति की । सच्ची भक्ति में यह होना अनिवार्य है । |
| 050. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे बारे में बोलने में, सुनने में चित्त गदगद होना चाहिए । लोक लज्जा छुट जानी चाहिए । नेत्र प्रेम जल से तर हो जाने चाहिए । रोम खड़े हो जाने चाहिए । ऐसे मेरे महान आत्मा रूपी भक्त हैं । जिनके ऐसा होता है, ऐसे भक्त को देखने वाले, सेवा करने वाले भी पवित्र हो जाते हैं । जो भक्त प्रभु को अपने हृदय में विराजमान कर लेता है वह तीर्थ में जाता है तो तीर्थ भी पवित्रता से झूमते हैं । |
| 051. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त का दोष, प्रारब्ध, पाप को मैं इस तरह जला देता हूँ जैसे आग से स्वर्ण जलकर उसकी अशुद्धियां अलग हो जाती है । मेरे भक्त के दोष, प्रारब्ध, पाप जल जाते हैं और मेरा स्वर्ण युक्त भक्त उभर कर संसार के सामने आता है । |
| 052. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा प्रिय भक्त बस संसार में मेरी भक्ति फैलाता हुआ अपने जीवन को जीता है । |
| 053. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त को श्रीबैकुंठ आना छोटी बात है, वह जहाँ होता है वहीं मैं श्री बैकुंठजी का निर्माण कर देता हूँ । |
| 054. |
प्रभु श्री कृष्णावतार में जब-जब भगवती यशोदा माता से डरने की श्रीलीला करते हैं कि वे माता से डर रहे हैं तो प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि देखो, मेरे प्रभु डरे । क्योंकि वैसे भय और भगवान का कोई मेल नहीं, यह विरोधाभासी हैं यानी जिनको भय है वे भगवान नहीं, जो भगवान हैं उन्हें किसी का भय नहीं । श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि मेरे भय से पूरी सृष्टि का संचालन होता है, संसार चलता है । वे प्रभु प्रेम में भक्तों के साथ विचरण करते हुए मिलेंगे, रोष में युद्ध करते हुए मिलेंगे पर डर की श्रीलीला केवल भगवती यशोदा माता के सामने ही हुई । |
| 055. |
प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि प्रभु का डरना भी मधुर है क्योंकि प्रभु अखिलम मधुरम हैं । उनकी हर क्रिया, हर रूप मधुर है । |
| 056. |
एक संत ने व्याख्या करी कि प्रभु सत्य, प्रभु शिव, प्रभु सुंदर के साथ प्रभु मधुरम भी हैं । उन्होंने कहा कि प्रभु को सत्यम शिवम सुंदरम और मधुरम, ऐसा कहना चाहिए । |
| 057. |
पूरे विश्व में प्रभु श्री कृष्णजी की श्रीलीला से मधुर कुछ भी नहीं है । |
| 058. |
भगवती माता प्रभु की आत्मा शक्ति हैं यानी आत्मा हैं । |
| 059. |
भगवती यशोदा माता ने प्रभु के श्रीमुख में पूरा ब्रह्मांड, उसमें पृथ्वी, उसमें श्रीबृज, उसमें श्रीनंद भवन, उसमें यशोदा माता ने खुद को देखा । |
| 060. |
प्रभु पर आरोप था कि प्रभु ने मिट्टी खाई है । खाने का अर्थ है वह खाने वाला पदार्थ बाहर होना चाहिए पर प्रभु दिखाना चाहते हैं इस श्रीलीला के माध्यम से कि सब कुछ उनके भीतर ही है । ब्रह्मांड, पृथ्वी, श्रीबृज, श्रीनंद भवन, मिट्टी सब कुछ प्रभु के अंदर ही है । हमें यह देखना चाहिए कि प्रभु के अलावा कुछ भी नहीं है, प्रभु ही सर्वव्यापक हैं, विश्वव्यापी हैं, ब्रह्मांड को अपने भीतर समाए हुए हैं - यह दर्शन शास्त्र की व्याख्या है । प्रभु की हर बाल श्रीलीला दर्शन शास्त्र का सूत्र हमें देती है । संत तो इससे भी आगे की बात कहते हैं कि प्रभु सर्वव्यापक, विश्वव्यापी के साथ प्रभु विश्वातीत हैं यानी विश्व से अतीत कुछ भी अगर है तो वे भी प्रभु ही हैं । |
| 061. |
सभी चीज के केंद्रबिंदु प्रभु ही हैं । |
| 062. |
भगवती यशोदा माता को प्रभु के बाल रूप में झांकी का अर्थ हमने क्या लिया ? संत इसका अर्थ सबके लिए करते हैं कि हमें अपने घर पर बाल रूप में प्रभु का साक्षात बाल अवतार मानकर उनकी सेवा करनी चाहिए । |
| 063. |
जब प्रभु विग्रह की भाव से सेवा होती है तो वह विग्रह हंसता है, रोता है, बोलता है - ऐसा संत अपने अनुभव से कहते है । |
| 064. |
एक संत प्रभु का दर्शन करके आए । फिर संत को कहीं लंबी यात्रा पर जाना था । जैसे ही दर्शन करके आए तो उनके शिष्य ने आकर कहा कि प्रभु रो रहे हैं । संत ने जाकर देखा तो प्रभु के नेत्रों से टप-टप आंसू बह रहे थे । संत के विरह में प्रभु रो रहे थे । संत ने तत्काल अपनी लंबी यात्रा रद्द कर दी । |
| 065. |
हमारा भाव ही प्रभु विग्रह में भाव जागृत करता है । हमारा भाव पत्थर का है तो विग्रह भी हमें पाषाण के ही दिखेंगे । इसलिए प्रभु को लाड़ लड़ाना और सेवा का भाव लाना चाहिए तभी विग्रह सजीव हो उठते हैं । |
| 066. |
भक्ति में गान यानी पद और भजन गाना एवं कीर्तन का बहुत बड़ा महत्व है । |
| 067. |
ध्यान से गान ऊँचा साधन है क्योंकि ध्यान सबके बस की बात नहीं है । अगर अशुद्ध हृदय का व्यक्ति ध्यान करेगा तो चित्त अशुद्धि पर एकाग्र होगा पर पद और भजन गान सबके बस की बात है । कितना भी अशुद्ध व्यक्ति भी प्रभु के पद और भजन का गान कर सकता है । |
| 068. |
प्रभु के सामने गाने बैठें तो स्वर, साज का महत्व नहीं है । गान मन से, अपने प्राणों से, भाव से होना सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रभु इससे ही रीझते हैं । |
| 069. |
कलियुग में मंत्रों की माला से भी ऊँचा गान है क्योंकि गान में जो प्रभु के लिए जो भाव आता है, वह सर्वोत्तम होता है । |
| 070. |
भगवती मीराबाई ने प्रभु के लिए गाया, प्रभु के लिए नृत्य किया । सब नाचने गाने वाले भगवती मीराबाई नहीं बन सकते क्योंकि भाव के कारण ही वे भगवती मीराबाई बनी । |
| 071. |
भाव से गाए तो प्रभु सुनने आते हैं, यह सिद्धांत है । इसलिए सभी संत गाते थे । भक्त श्री सूरदासजी गाते थे तो प्रभु श्रवण के लिए आकर बैठ जाते थे । |
| 072. |
संत ने प्रभु के ध्यान को कलियुग में कम अंक दिया है और पद गाने को, कीर्तन को सबसे ज्यादा अंक दिए हैं । |
| 073. |
एक लाख गौ-माता का दूध गौ-माताओं को पिलाते-पिलाते एक पद्मगंधा गौ-माता तक आता था । उन पद्मगंधा गौ-माता का दूध प्रभु के लिए रोज उपयोग होता था । ऐसी सेवा प्रभु की श्रीबृज में भगवती यशोदा माता रोज करती थी । |
| 074. |
एक बार प्रभु के लिए माखन निकालने के लिए भगवती यशोदा माता ने दूध गर्म करने पर रखा । दूध उफनने लगा तो माता ने प्रभु को गोद से उतार कर दूध संभालने के लिए गई । प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि प्रभु चिढ़ गए - क्यों ? प्रभु आग्रही हैं कि मेरे से ज्यादा प्रेम केवल मुझसे ही करो । ऐसी व्याख्या प्रभु श्री शुकदेवजी ने श्रीमद् भागवतजी महापुराण में की है । |
| 075. |
प्रभु के लिए माखन बनाने हेतु दूध और प्रभु के बीच में प्रभु को ही सर्वोच्च स्थान देना चाहिए । प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि भगवती यशोदा माता ने इस श्रीलीला के बाद यह चीज जीवन में गांठ बांध ली । |
| 076. |
जैसे एक छोटा बच्चा देखता है कि उसकी माता ने अपनी गोद में किसी दूसरे बच्चे को बैठा दिया तो वह तुरंत उस बच्चे को गोद से हटाकर खुद बैठ जाता है वैसे ही प्रभु अपने स्थान पर किसी को नहीं बैठने देते । |
| 077. |
प्रभु को पीछे रखकर दूध यानी धन को बचाएंगे तो माखन यानी आनंद से हाथ धोना पड़ेगा । प्रभु ने जब देखा कि माता ने दूध को तवज्जो दी तो प्रभु ने माखन का पूरा पात्र ही तोड़ दिया । |
| 078. |
कभी भी साध्य यानी प्रभु किसी भी साधन से बड़े ही रहेंगे और सदैव रहेंगे । यह सिद्धांत है कि साध्य हमेशा और निरंतर साधन से बड़ा ही रहेगा । |
| 079. |
संसार की हर बात का मूल्यांकन संपत्ति यानी धन से नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे बहुत, बहुत और बहुत बड़ी है प्रभु की भक्ति । |
| 080. |
प्रभु की भक्ति नहीं करी और सिर्फ पैसा कमाया तो कुछ भी नहीं किया । क्योंकि धन का साधन आनंद के लिए किया गया और प्रभु भक्ति साध्य प्रभु के लिए होती है, जो आनंद के मूल हैं । |
| 081. |
भक्ति की प्राप्ति में ही तृप्ति है क्योंकि उससे ही परमानंद प्राप्त होता है । |
| 082. |
संसार के कोई भी पद को प्राप्त करके भी वह आनंद नहीं मिलेगा जो प्रभु के पद (श्री कमलचरण) को प्राप्त करके मिलेगा । |
| 083. |
सच्चे संतों के पास धन नहीं होता पर उनका मन सदैव परमानंद से भरा रहता है । |
| 084. |
किसी को क्या लगेगा, ऐसा भगवती मीराबाई ने कभी सोचा ही नहीं क्योंकि उनका मन बाहर कभी गया ही नहीं । मेरे श्रीगिरधर को क्या लगेगा, यही उनका सदैव भाव रहता था । |
| 085. |
धन कमाना गलत नहीं है पर कमाते-कमाते प्रभु को भूल जाना गलत है । भौतिकता और दुनियादारी गलत नहीं पर ऐसा करते-करते प्रभु को भूल जाना गलत है । |
| 086. |
प्रभु को पाएंगे उतना तृप्त होंगे । जितना तृप्ति होगी उतनी फिर अतृप्ति हो जागेगी । प्रभु प्रेम में तृप्ति और अतृप्ति साथ में चलती है । |
| 087. |
भक्ति साक्षात मोक्ष और परमानंद का प्रतीक है । |
| 088. |
कर्मकांड का श्री वेदजी में आग्रह तब तक है जब तक प्रभु प्रेम रस जागृत नहीं हो जाता । फिर प्रभु प्रेम में अगर हम संध्यावंदन करना भूल गए तो ऋषि और मुनि उस साधक के लिए संध्यावंदन का विधान कर देते हैं । |
| 089. |
फल डाली से चिपका हुआ रहता है पर एक अवस्था के बाद डाली फल को छोड़ देती है । वैसे ही प्रभु प्रेम जीवन में आया तो कर्मकांड, पूजा, पाठ सब हमें छोड़ देते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य पूरा हो गया । |
| 090. |
पूजा का उपयोग यह है कि प्रभु प्रेम में हमारा चित्त विलीन हो गया । फिर पूजा छुट भी गई तो कोई बात नहीं क्योंकि पूजा तो छुटनी ही थी क्योंकि पूजा ने अपना काम पूरा कर दिया हमारे हृदय में प्रभु प्रेम को जगाकर । |
| 091. |
संतों की व्याख्या है कि प्रभु जिसका चित्त चुराते हैं उसे परमानंद का अनुभव देते हैं । जैसे प्रभु अपने हाथ से माखन निकालकर अपने प्रेमी गोपों को खिलाते थे वैसे ही पर प्रभु अपना परमानंद अपने प्रेमी भक्तों को देते हैं । |
| 092. |
संत विनोद में कहते हैं कि भगवती यशोदा माता के लिए एक समस्या हो गई कि प्रभु की अटपटी माखन चोरी श्रीलीला देखकर कि वे क्या करें, रोवें, हंसें या गुस्सा करें । |
| 093. |
संत अनुभव करते हैं कि एकांत में बैठकर श्रीमद् भागवतजी महापुराण में प्रभु के बाललीला के अमूल्य श्लोकों का चिंतन करने में जो आनंद आता है उससे विलक्षण कुछ भी नहीं । एक-एक दर्शन शास्त्र के अनमोल रत्न यहाँ मिलते हैं । |
| 094. |
भाग-दौड़ करके उन वस्तुओं को पकड़ा जाता है जो दूर होती है । प्रभु तो पास ही हैं, उनके लिए भाग-दौड़ की जरूरत नहीं । वे तो हमारे भीतर ही विराजे हैं । भगवती यशोदा माता हाथ में लकड़ी लेकर प्रभु के पीछे भागी तो प्रभु पकड़ में नहीं आए । दर्शन शास्त्र कहता है कि यह अहंकार की लकड़ी थी इसलिए प्रभु पकड़ में नहीं आए । |
| 095. |
प्रभु यह सोचकर रोते हैं कि माता से दंड मिलेगा इसलिए प्रभु रोते हैं । प्रभु श्री शुकदेवजी अदभुत व्याख्या करते हैं कि पूरी दुनिया के आंसू पोछने वाले खुद रोने की श्रीलीला कर रहे हैं । प्रभु क्यों रोए क्योंकि माता ने रोते देखा तो सह नहीं पाई और पिघल गई । माता को पिघलाने हेतु प्रभु रोए । सूत्र यह है कि प्रभु को पिघलाने हेतु भक्त रोते हैं इसलिए उस ऋण को चुकाने के लिए प्रभु रोए । |
| 096. |
प्रभु कहते हैं कि मुझे आपका यानी भगवती यशोदा माता का डर नहीं लगता, डंडे का डर लगता है । डंडा अहंकार का प्रतीक है । सूत्र यह है कि प्रभु को जीव का अहंकार बहुत बुरा लगता है । |
| 097. |
जब भगवती यशोदा माता ने प्रभु को ऊखल से बांधा तो दो अंगुली रस्सी छोटी पड़ गई । प्रभु श्री शुकदेवजी व्याख्या करते हैं एक अंगुल जीव की भक्ति का प्रयास और दूसरा अंगुल प्रभु की कृपा । जैसे ही जीव ने भक्ति पूरी की तब प्रभु की कृपा हो गई और प्रभु बंधन में आ जाते हैं । हमारी भक्ति पूर्ण होती है तभी प्रभु कृपा हमारे जीवन में अवतरित होती है । |
| 098. |
प्रभु कृपा के बिना जीवन में कुछ भी होना संभव नहीं है । |
| 099. |
जिनके नाम के उच्चारण से सामान्य-से-सामान्य जीव भी बंधन मुक्त हो जाते हैं वे प्रभु यहाँ बंधन में बंध जाते हैं । प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं यह भाग्य सिर्फ भक्तों का है जो प्रभु को बांध सकता है । यह भाग्य प्रभु श्री ब्रह्माजी और भगवती लक्ष्मी माता को भी नहीं मिलता । |
| 100. |
प्रभु सिर्फ और सिर्फ भक्त के प्रेम बंधन को स्वीकार करते हैं । ब्रह्मांड में अन्य कोई शक्ति नहीं जो प्रभु को बांध सके । |
| 101. |
प्रभु को प्रेम बंधन में बांधने का सौभाग्य किसी ज्ञानी, योगी या कर्मकांडी को कभी नहीं मिलता । यह सौभाग्य सिर्फ और सिर्फ भक्त को ही मिलता है । |
| 102. |
प्रभु की अनुभूति ज्ञानी को भी और भक्त को भी होती है फिर भी एक बड़ा अंतर है । ज्ञानी को प्रभु ज्ञान की अनुभूति देते हैं, प्रभु को जानने की अनुभूति होती है । भक्त को प्रभु खिलाते हैं, पिलाते हैं, नचाते हैं, प्रेम में रुलाते हैं - यह सिर्फ भक्त का अधिकार होता है । |
| 103. |
ज्ञानी का प्रभु से मिलना एक ऑफिस में कर्मचारी का अपने मालिक से मिलने जैसा होता है जिसमें पूरी औपचारिकता निभानी पड़ती है । भक्त का प्रभु से मिलना ऐसा होता है कि भक्त जो प्रिय रूप प्रभु का चाहता है प्रभु उस रूप को लेकर मिलते हैं और कोई भी औपचारिकता नहीं होती है, हर समय प्रभु भक्त के लिए उपलब्ध रहते हैं । |
| 104. |
भक्त का विशेष अधिकार होता है कि वह प्रभु के सानिध्य में और प्रभु के साथ श्रीलीला में साथ-साथ रहता है । |
| 105. |
ज्ञानी गौण नहीं हैं पर भक्त प्रभु के लिए सबसे विशेष होते हैं । |
| 106. |
देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने दो गंधर्वों को श्राप दिया पर प्रभु श्री नारदजी एक भक्त भी हैं इसलिए उनका श्राप भी भगवत् कृपा का दर्शन कराने वाला होता है । दोनों गंधर्व वृक्ष तो बने पर श्रीनंद भवन के आंगन में और प्रभु के हाथों उनका उद्धार हुआ । इस तरह भक्त श्री नारदजी का श्राप भी वरदान बन गया । सिद्धांत यह है कि भक्त सबको प्रभु से जोड़ता है और सबको प्रभु कृपा दिलाने का पात्र बनाता है । |
| 107. |
गोकुलवासियों ने सुविधा को देखकर स्थानांतरण नहीं किया, प्रभु को देखकर स्थानांतरण किया । सूत्र यह है कि प्रभु के लिए अपना आध्यात्मिक साधन का स्थानांतरण करना चाहिए यानी हमें कर्मकांड, यज्ञ, तप से भक्ति की तरफ बढ़ना चाहिए । |
| 108. |
प्रभु श्री विश्वकर्माजी पधारे और श्री वृंदावनजी का निर्माण रातों-रात प्रभु के लिए हो गया । |
| 109. |
मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य प्रभु से प्रीति करना है यानी प्रभु से प्रेम करना है । |
| 110. |
जब प्रभु ने गौचारण का निर्णय लिया यानी बछड़ों को चराने हेतु वन जाने का निर्णय लिया तो सबसे ज्यादा व्याकुल गोपियां हो उठी । क्योंकि अब प्रभु के दर्शन सुबह और शाम ही हो पाएंगे । गौचारण जाने के समय और लौटने के समय । इतना प्रेम गोपियां प्रभु से करती थीं
कि वे प्रभु का दर्शन निरंतर चाहती थीं । यह गोपियां वे हैं जो प्रभु श्री ब्रह्माजी को पलक बनाने के लिए दोष देती थीं कि उन्हें झपकाते हैं तो प्रभु दर्शन में व्यवधान पड़ता है । |
| 111. |
जब प्रभु बछड़ों को लेकर वन गए तो गोपियां प्रभु का दर्शन करती और उस धूल का दर्शन करती रहती जो प्रभु के जाने के मार्ग में उठती थी । जब तक धूल उठती रहती गोपियां घर पर नहीं जाती । उन धूल का दर्शन करती रहती जो प्रभु के श्री कमलचरणों की ठोकर से उड़ी है । सूत्र यह है कि प्रभु ने जिस धूल को छू लिया भक्त के लिए वह भी अति पवित्र हो जाती है । |
| 112. |
श्रीमद् भागवतजी महापुराण का दशम स्कंध में प्रभु और गोपियों का जो संवाद है वह माधुर्य की परिसीमा है । |
| 113. |
प्रभु ने बालपन में खेल को भी आध्यात्मिक बना दिया । सभी संतों ने प्रभु के हर खेलने की श्रीलीला में अध्यात्म के सूत्र तलाश लिए । |
| 114. |
प्रभु वन भोज गोपों के साथ करते, किसी के हाथ से खाते, किसी को अपने हाथ से खिलाते । अपने भक्तों को अपने हाथों से खिलाकर आनंद देते । |
| 115. |
प्रभु ने हर गौ-माता के बछड़े बनकर और हर गोपी के लिए उनके पुत्र बनकर उन्हें आनंद पहुँचाने हेतु प्रभु श्री ब्रह्माजी द्वारा गोप और गौ-माता के बछड़ों के अपहरण की श्रीलीला करवाई । |
| 116. |
विश्व के निर्माता प्रभु श्री ब्रह्माजी को अपने द्वारा निर्मित गोप बालक और बछड़े नकली लगे और प्रभु के रूप में बछड़े और गोप बालक असली लगे । सूत्र यह है कि प्रभु श्री ब्रह्माजी को खुद की सृष्टि नकली लगी क्योंकि असली तो प्रभु ही हैं । |
| 117. |
प्रभु श्री ब्रह्माजी ने देखा कि गोप बालक के रूप में श्रीकृष्ण, उनकी पोशाक, माला, दुपट्टा और आभूषण के रूप में भी श्रीकृष्ण । प्रभु श्रीकृष्णजी के अलावा कुछ भी नहीं दिखा प्रभु श्री ब्रह्माजी को । |
| 118. |
प्रभु क्षमामूर्ति हैं क्योंकि अगर प्रभु क्षमा नहीं करें तो जीव के उद्धार के लिए जीव कहाँ जाएगा, अन्य कोई स्थान है ही नहीं । |
| 119. |
प्रभु श्री ब्रह्माजी ने माना कि आज सबसे ज्यादा भाग्यशाली बृजवासी हैं जिनके साथ प्रभु श्रीलीला कर रहे हैं । सूत्र यह है कि प्रभु जिनके पास होते हैं वे ही सबसे बड़े भाग्यशाली होते हैं । |
| 120. |
जिन ज्ञानियों और योगियों को जन्मों तक प्रभु का क्षण भर का दर्शन भी नहीं होता वे प्रभु प्रेम के कारण निरंतर गोपों के पास उनकी प्रेमाभक्ति के कारण रहते थे । |
| 121. |
निरंतर और नित्य प्रभु का भान होना यह सिर्फ भक्तों का अधिकार होता है । |
| 122. |
हर असुर को मारने की श्रीलीला का जो बारीक दर्शन श्रीमद् भागवतजी महापुराण में है वह अदभुत है । वहाँ सूत्र दर्शन है कि प्रभु उनको मारकर क्या उपदेश देना चाहते हैं । |
| 123. |
प्रभु के रूप का जहाँ-जहाँ भी वर्णन आया वहाँ एक-एक अक्षर की व्याख्या संतों ने करी है । उदाहरण स्वरूप जहाँ प्रभु की कोमलता का वर्णन आया वहाँ संतों ने व्याख्या करी कि कोटि-कोटि कमल से भी कोमल प्रभु की कोमलता है । |
| 124. |
कालिया नाग ने भी प्रभु की कोमलता देखकर उन्हें दंश करने का विचार ही उसने त्याग दिया । |
| 125. |
प्रभु एक समय दो-तीन कार्य करते हैं । कालिया नाग के एक सौ एक फन पर नृत्य करते हुए गोप-गोपियों को आनंदित करते हैं और उसी नृत्य की ठोकर से कालिया नाग के प्राणों को व्याकुल कर देते हैं । |
| 126. |
जब प्रभु के श्री कमलचरणों की ठोकर से कालिया नाग के प्राण व्याकुल हो गए तो नाग पत्नियाँ प्रभु के सामने आई और निवेदन किया कि रोष करना नाग जाति का स्वधर्म है और इसलिए प्रभु उसे माफ करें । नाग पत्नियों ने कालिया नाग पर कृपा और अनुग्रह करने की प्रभु से भीख मांगी । |
| 127. |
कालिया नाग का मूल स्थान श्री यमुनाजी नहीं था, उसका मूल स्थान फिजी द्वीप था । आज भी वहाँ कालिया नाग का मंदिर है । श्रीमद् भागवतजी महापुराण और श्री रामायणजी की एक-एक घटना पूर्ण सत्य हैं, ये कोई कथा या कहानी नहीं हैं । आज भी तथ्य मौजूद हैं जो इसके साक्षी हैं । |
| 128. |
प्रभु की वन में बजने वाली बांसुरी गांव की सब गोपियों को व्याकुल कर देती थी । |
| 129. |
गोपियों ने प्रभु की सुंदरता को याद करते हुए जो विरह गीत गाया वह अमर गीत श्रीमद् भागवतजी महापुराण का बन गया । |
| 130. |
प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि गोपियों के नेत्र धन्य हैं क्योंकि नेत्र का सबसे ज्यादा भाग्य यही है कि उससे प्रभु का दर्शन किया जाए । |
| 131. |
हमारी आँखें चौबीस घंटे समान नहीं होती । वे अलग-अलग संबंध देखकर अलग-अलग भाव देती है । जैसे एक स्त्री ने अपने पति को देखा तो भाव अलग, भाई को देखा तो भाव अलग, पुत्र को देखा तो भाव अलग वैसे ही प्रभु के श्रीनेत्र जब भी भक्तों को देखते हैं तो सबसे करुणामय भाव से देखते हैं । |
| 132. |
गोपियां अपने नेत्रों से ही प्रभु की पूजा कर लेती थी । टकटकी लगाकर प्रभु को देखते रहना ही उनकी पूजा थी, ऐसी संत व्याख्या करते हैं । |
| 133. |
प्रभु की बांसुरी का परिणाम गोपियों पर ही नहीं, पशु पक्षी और वृक्षों पर भी अदभुत रूप से होता था । प्रभु की बांसुरी का परिणाम था कि जड़ वस्तु भी चेतन होकर अदृश्य रूप से नाचने लगती थी । |
| 134. |
गोपियां अपने शरीर को कष्ट देती थीं, शीत ऋतु में ठंडे जल से स्नान करती थीं । भगवती जगदंबा माता की पूजा करती थीं, माता को प्रसन्न करने हेतु कि उनको पति रूप में प्रभु मिलें । |
| 135. |
चीर श्रीलीला में प्रभु कहते हैं कि वस्त्र ले जाओ, गोपियां चाहती हैं कि प्रभु वस्त्र छोड़कर अन्यत्र चले जाएं । प्रभु कहते हैं यह संकोच कैसा ? जिस जल में आप खड़ी हो वहाँ उस जल में क्या मैं (प्रभु) नहीं हूँ । प्रभु कहीं हैं, कहीं नहीं हैं, यह भावना ही गलत है । प्रभु सदैव हैं और सर्वत्र हैं यह भाव उत्तम साधक का होता है । उत्तम साधक याद रखता है कि जो मैं कर रहा हूँ, जहाँ भी कर रहा हूँ, वहाँ प्रभु मुझे देख रहे हैं । |
| 136. |
हम देवतागण का सम्मान कर पाएं या नहीं इस बात से भी ज्यादा सतर्क इस बात के लिए रहना चाहिए कि किसी देवतागण का अपमान नहीं हो जाए । जैसे बिना वस्त्र के नदी या तालाब में स्नान करने से जल देवता का अपमान होता है । |
| 137. |
शास्त्र अंतिम प्रमाण होते हैं । अपनी इच्छा से सही मानकर काम करना गलत है । शास्त्रों ने जो निश्चित किया है वही साधक को मानना चाहिए । किसी भी काम को करने से पहले शास्त्रों को पढ़कर शास्त्र आज्ञा माननी चाहिए । शास्त्रों का निर्णय क्या है, यह जानना चाहिए और उस अनुरूप ही कार्य करना चाहिए । |
| 138. |
प्रभु जीव को सदैव देख सकते हैं पर जीव प्रभु को नहीं देख सकता, जब तक प्रभु नहीं चाहते । |
| 139. |
श्री बैकुंठजी में प्रभु को सबको डांटने का अधिकार है पर इसका उल्टा श्री गोकुलजी में प्रभु को डांटने का सबको अधिकार है । तभी तो माता, गोपियां सब प्रेम में प्रभु को डांटती थीं । यह अधिकार केवल और केवल प्रेम के कारण । प्रभु प्रेम की इतनी विलक्षण महिमा है । |
| 140. |
स्त्री में प्रेम, तीव्रता, श्रद्धा और समर्पण ज्यादा होता हैं इसलिए स्त्री का मन भक्ति हेतु ज्यादा उपयोगी माना गया है । इसलिए संत लोग शरीर तो पुरुष का और मन से स्वयं को स्त्री मानते हैं और गोपी भाव रखकर संत प्रभु की आराधना करते हैं । |
| 141. |
जब प्रभु को वन में भूख लगी तो ग्वाल बालक पहली बार ब्राह्मणदेवों के पास आए तो ब्राह्मणदेवों ने उन्हें बिना जवाब दिए टरका दिया । ब्राह्मणदेवों के यज्ञ मंडप पर दोबारा ग्वाल बालक नहीं गए । सूत्र यह है कि प्रभु प्रेम से मिलते हैं, कर्मकांड से नहीं मिलते । ब्राह्मणदेवों ने कर्मकांड का तो ब्राह्मण पत्नियों ने प्रभु से प्रेम का सहारा लिया । ब्राह्मण पत्नियों ने अपना भाग्य सराहा कि प्रभु को भूख लगी और प्रभु ने हमें याद किया है । |
| 142. |
ब्राह्मणदेव श्री वेदजी पढ़ते रहे, श्री गायत्री मंत्र का जाप करते रहे फिर भी वह प्रेम भाव नहीं आया जो उनकी पत्नियों में आया । फिर जब ब्राह्मण पत्नियों को प्रभु ने अनुगृहीत किया तो ब्राह्मणदेवों ने अपनी विद्या को धिक्कारा, अपने कर्म पर ग्लानि आने लगी और ब्राह्मणदेवों ने अपनी पत्नियों के भाग्य को सराहा । |
| 143. |
पुण्य के तीन प्रकार शास्त्रों में बताए गए हैं । खुद किया हुआ पुण्य, दूसरे से करवाया हुआ पुण्य और दूसरे का किया हुआ पुण्य में उसकी सराहना करना, यह भी पुण्य है । |
| 144. |
ब्राह्मणदेवों की गलती क्या थी ? उन्होंने प्रभु को टरका दिया न “हाँ” कहा न “ना” कहा और ब्राह्मण पत्नियां एक बार में ही प्रभु का सत्कार करने चली गई । |
| 145. |
ज्ञान मार्ग प्रभु को पाने के लिए तलवार की धार पर दौड़ने जैसा कठिन है, ऐसा वेदांती कहते हैं । |
| 146. |
ज्ञान मार्ग में जो दिखे उसका खंडन करो कि वह प्रभु नहीं, सबका खंडन फिर जो बचा खंडन करने वाला वे प्रभु हैं । यह एक विपरीत मार्ग है । दूसरा मार्ग सबमें प्रभु को देखने वाला मार्ग है, हर चीज में प्रभु को देखना, यह सकारात्मक मार्ग है और यह भक्ति का मार्ग है । |
| 147. |
ब्राह्मणदेवों के पास कर्मकांड का मार्ग था, सिर्फ कर्म से प्रभु की प्राप्ति कभी संभव नहीं है । प्रभु यह श्रीलीला करके यह बताना चाहते थे कि वे केवल भक्ति और प्रेम से ही मिलते हैं । |
| 148. |
प्रभु श्री गोवर्धनजी की श्रीलीला के माध्यम से बताना चाहते थे कि श्री इंद्रदेव देवता मात्र हैं, जल देने वाला तो मैं प्रभु हूँ । दूसरा उद्देश्य कि मैं (प्रभु) हर रूप में हूँ, पर्वत श्री गिरिराजजी के रूप में भी मैं ही हूँ । |
| 149. |
जो प्रभु की भक्ति करके प्रभु का हो जाता है और जगत में पूज्य हो जाता है उसके लिए मन में अखंड श्रद्धा का भाव रखना भी एक प्रकार की पूजा है । |
| 150. |
गौ-माता की सच्ची पूजा माता के मस्तक पर रोली चंदन लगाना नहीं बल्कि गौ-माता के चारा, पानी, रहन-सहन की उचित व्यवस्था करना है । |
| 151. |
सभी को प्रभु का प्रसाद पाने का समान अधिकार है । प्रभु के प्रसाद से एक चांडाल तक के बच्चे को भी वंचित नहीं रखना चाहिए । |
| 152. |
भक्ति ने किसी भी जाति को हल्की नहीं माना और किसी भी जाति से किनारा नहीं किया । यही कारण है कि हर जाति में, हर प्रांत में प्रभु के भक्त ने जन्म लिया है । |
| 153. |
प्रभु ने भक्ति को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है । यह प्रभु तक पहुँचने का श्रेष्ठतम मार्ग है । प्रभु द्वारा श्री उद्धवजी को इस तथ्य का प्रतिपादन किया गया है । |
| 154. |
स्वर्ण की अशुद्धि को नष्ट करने हेतु तपाया जाता है । तपने से अशुद्धियां निकलती है और बचता है खरा सोना । वैसे ही भक्ति हमारे भीतर की अशुभ भावों को जलाती है और अपने आप जीव अधिकाधिक शुद्ध होता चला जाता है । |
| 155. |
जैसे स्वर्ण अशुद्धियां हटाने पर स्वयं प्रकाशित होता है और चमक उठता है वैसे ही अशुद्ध भाव का नाश होने पर भक्त भी चमकने लगता है और उसमें निखार आ जाता है । |
| 156. |
हमारे भीतर की अशुद्धियां को जलाने की प्रक्रिया ही भक्ति है । |
| 157. |
भक्ति के द्वारा अशुद्धियां का जितना सरलता और जितनी पूर्णता से नाश होता है अन्य कोई माध्यम से नहीं हो सकता, यह बात प्रभु कहते हैं । |
| 158. |
जैसे एक छोटा बच्चा अनाथ हो गया जब उसके सभी परिवार वाले किसी हादसे में मारे गए । गांववालों ने पाला और वह बच्चा बड़ा हुआ तो उसे अपने जीवन यापन की चिंता हुई । वह नौकरी खोजने दर-दर भटकता गया पर उसे पता नहीं कि उसके पिता ने करोड़ों का धन उसके लिए घर के गड्ढे में गाड़ कर रखा हुआ है । वह बच्चा जन्म से ही करोड़पति है पर उसे पता नहीं है । वैसे ही आनंद का अत्यंत बड़ा धन परमपिता प्रभु ने हमारे भीतर छिपा रखा है । हमारे भीतर आनंद का स्त्रोत भरा हुआ है । यह पता कैसे चलेगा, अविद्या का नाश होने पर और आध्यात्मिक विद्या की जागृति पर । तब हमें पता चलेगा कि हम आनंद धन से लबालब भरे हुए हैं । यह पता चलने का मार्ग ही भक्ति का मार्ग है । |
| 159. |
भक्ति से ही छिपा हुआ अध्यात्म धन यानी आनंद मिलता है । भक्ति के अलावा उस आध्यात्मिक आनंद को पाने का कोई विकल्प नहीं, प्रभु स्पष्ट कहते हैं । |
| 160. |
एक संत श्रीरासलीला के मंचन पर प्रभु की झांकी में प्रभु को लगातार तीन घंटे तक पंखा करते थे । किसी ने पूछा कि आप झांकी में बैठकर कलाकारों को पंखा करते हैं क्या ? क्योंकि आप तो स्वयं सिद्ध महात्मा हैं फिर साधारण कलाकारों हेतु ऐसा क्यों करते हैं । संत ने कहा कि आपको कलाकार दिखते होंगे मुझे तीन घंटे प्रभु दिखते हैं, इसलिए मैं मेरे प्रभु को पंखा करता हूँ । |
| 161. |
सूत्र के रूप में समझना चाहिए कि अगर प्रभु के लिए भाव पूर्ण है तो ही अपने को भाग्यवान मानना चाहिए । मूर्ति में प्रभु की बुद्धि होनी चाहिए, जड़ बुद्धि नहीं होनी चाहिए तब प्रभु हमें दिखेंगे और हमारा जीवन धन्य होगा । यह सिर्फ भक्ति से ही संभव है । |
| 162. |
जितनी हमारे भीतर की अशुद्धियां कम हुई, उतना प्रभु हेतु भाव का जागरण होगा । |
| 163. |
अशुद्धियां गई तो जो आध्यात्मिक बातें पहले पढ़ने पर भी समझ में नहीं आती थी वह स्पष्ट दिखने लगती है । जैसे आँखों में मोतियाबिंद के कारण साफ नहीं दिखता पर मोतियाबिंद का ऑपरेशन कर लिया तो साफ दिखने लग जाता है । वैसे ही भक्ति हमारी दृष्टि का शुद्धिकरण कर देती है, दृष्टि साफ होते ही हमें प्रभु, जो हमारे अंतरंग में हैं और सब जगह छिपे हुए हैं, वे हमें दिखने लगते हैं । |
| 164. |
श्री वेदजी और वेदांत में जो ज्ञान पकड़ में नहीं आता, वह ज्ञान भक्त सिर्फ भक्ति द्वारा पकड़ लेता है । उसे ज्ञान की अनुभूति भक्ति करा देती है । |
| 165. |
प्रभु सिर्फ अनुभव के विषय हैं । संत श्री रामकृष्ण परमहंसजी को उनके एक शिष्य ने पूछा कि आपने प्रभु को देखा है क्या ? उन्होंने कहा कि जैसे मैं स्पष्ट रूप से तुम्हें देख रहा हूँ वैसे स्पष्ट रूप से अभी भी प्रभु को देख रहा हूँ । |
| 166. |
एक बात जो बहुत सरल भी है और बहुत कठिन भी है पर यही एकमात्र सत्य है श्री उद्धवजी को प्रभु बताते हैं । एकदम आरंभ से प्रभु साक्षात्कार तक का मार्ग एक बात पर निर्भर करता है कि हम चिंतन किसका करते हैं, विषय का या श्रीवासुदेव का । |
| 167. |
मात्र मलिन विषय ही नहीं, दुनिया के हर प्रपंच का कार्य भी विषय ही कहलाता है । मन की प्रवृत्ति यानी आदत से मन जिस चीज का चिंतन करता है, वस्तु का चिंतन करता है, इच्छा करता है उस वस्तु के गुण को हमारे भीतर प्रवेश करवा देता है, यह सिद्धांत है । |
| 168. |
श्री योग वशिष्ठजी में इसलिए मन को जड़ और चेतन दोनों बताया है । मन जड़ का चिंतन करता है तो जड़ बन जाता है और चेतन प्रभु का चिंतन करता है तो चेतनमय बन जाता है । |
| 169. |
जितना जड़ का चिंतन मन करेगा उतना जड़त्व को मन स्वीकार करेगा । जितना चेतन प्रभु का चिंतन करेगा उतना जड़त्व खत्म होगा । |
| 170. |
जैसे दो ओढ़ने की चादर एक जैसी दिखती है पर एक में बहुत वजन होता है और एक हल्की होती है । वैसे ही मन विषयों का चिंतन करता है तो वह मन बहुत भारी हो जाता है और जैसे-जैसे मन प्रभु का चिंतन करता है वह हल्का होता चला जाता है । |
| 171. |
जो जीव पाप और बुराइयों का चिंतन करेगा वह जीवन में पाप और बुराइयों में फंसकर ही रहेगा । |
| 172. |
जितना हम मन के विषय को भूलने का प्रयास करते हैं उतना ही विषय अधिक मात्रा में मन में जमकर बैठ जाते हैं । यह नकारात्मक मार्ग है । सकारात्मक मार्ग यह है कि हमें अपने मन को प्रभु का चिंतन करने में लगाना चाहिए तो विषय अपने आप निकल कर भाग जाएंगे । |
| 173. |
सूत्र यह है कि किसी भी कारण से विषयों का चिंतन नहीं करना चाहिए और सिद्धांत के तौर पर किसी भी कारण से प्रभु का चिंतन नहीं छोड़ना चाहिए । |
| 174. |
चाहे वह सांसारिक व्यवहार हेतु चिंतन ही क्यों न करना पड़े पर संसार का चिंतन करना ही बुराई है, यह संतों की दृष्टि होती है । |
| 175. |
प्रभु कहते हैं कि मन के साथ संघर्ष यानी लड़ाई मत करो नहीं तो उसमें हार जाओगे । मन को बहुत शालीनता से वश में करना होता है । मन एक बच्चे जैसा है, डंडा लेकर उसके पीछे भागेंगे तो वह बच्चे की तरह विद्रोह कर देगा । उसे एक बढ़िया चीज दे दो तो वह पुरानी चीज भूल जाएगा । प्रभु को याद करने लगे तो संसार कब बाहर निकल जाएगा मन से, पता भी नहीं चलेगा । यह प्रभु द्वारा दिखाया हुआ मार्ग है । |
| 176. |
मन को खूब आसक्त रखो पर संसार में नहीं । आसक्ति का विषय बदल दो, प्रभु में आसक्ति, प्रभु के रूप में आसक्ति, प्रभु के नाम में आसक्ति । |
| 177. |
किसी भी प्रपंच में प्रभु को बैठा लेना और संसार को वहाँ से हटा देना, यह सिद्धांत है । संसार का कचरा अपने मन से अपने आप निकल जाएगा और मन प्रभु में विलीन हो जाएगा । जितना प्रभु का चिंतन होगा उतना मन प्रभु में विलीन होगा, यह सिद्धांत है । |
| 178. |
मन उसका चिंतन करेगा जहाँ उसे प्रेम होता है, स्वाद मिलता है, यह सिद्धांत है । इसलिए संत श्री एकनाथजी कहते हैं कि प्रभु से प्रेम करो, तभी प्रभु का प्रेममय चिंतन होगा । |
| 179. |
सारांश में प्रभु कहते हैं कि अन्य बातों का चिंतन कभी मत करो, प्रभु के केवल प्रेम का चिंतन करो । प्रभु कहते हैं कि मेरे से प्रेम करो, जितना प्रेम बढ़ेगा उतना ही मेरा चिंतन भी बढ़ेगा । |
| 180. |
जैसे सिनेमा में हमारा आकर्षण है तो वहाँ मन लगाने हेतु प्रयास नहीं करना पड़ता । तीन घंटे मन लग जाता है, हमें कोई काम वहाँ सताता नहीं । वैसे ही प्रभु भी आकर्षक लगने लग जाएंगे तो हमारा काम हो गया । जीवन में बस यही प्रयास करना है कि प्रभु हमें सबसे आकर्षक लगने लग जाए । |
| 181. |
श्री रामचरितमानसजी लिखने के बाद गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने यही याचना करी कि प्रभु आप मुझे प्रिय लगने लग जाएं, बस यही एक प्रार्थना करी । |
| 182. |
संसार मुझे नहीं भाए, मैं आपको यानी प्रभु को चाहूँ और पाऊँ, यह एक भक्त प्रभु से मांगता है । |
| 183. |
मैं आपको यानी प्रभु को पाऊँ, यह बाद की बात है । मैं आपको यानी प्रभु को चाहूँ, यह प्राथमिक बात है । |
| 184. |
प्रभु किनको चाहिए ? संसार में बहुत कम लोग होते हैं जिनको प्रभु चाहिए, नहीं तो सबको प्रभु से चाहिए । |
| 185. |
संसार भक्ति का साधन नहीं करता और फिर चाहता है कि प्रभु मिल जाएं । पेट का पानी भी नहीं हिले और प्रभु मिल जाएंगे, यह असंभव है । |
| 186. |
हम प्रभु को चाहते नहीं क्योंकि प्रभु हमें सबसे ज्यादा प्रिय नहीं लगते, यह सबसे बड़ी समस्या है । |
| 187. |
प्रभु प्रिय लगे तो प्रभु के लिए भक्त कष्ट भी खुशी-खुशी सह लेता है । |
| 188. |
पूरी श्री रामचरितमानस को लिखने के बाद गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने मांगा कि प्रभु आप मुझे प्रिय लगे । थोड़ा प्रिय लगे, कभी-कभी प्रिय लगे, यह नहीं मांगा । गोस्वामीजी ने मांगा कि जैसे एक कामी को स्त्री प्रिय लगती है और एक लोभी को धन प्रिय लगता है वैसे ही आप प्रभु मुझे प्रिय लगे । |
| 189. |
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी को पता था कि पत्नी प्रेम क्या होता है । वे पूर्व में पत्नी प्रेम में पूरी तरह आसक्त थे । पत्नी से मिलने की कितनी व्याकुलता उन्होंने सहन की थी इसलिए उससे भी ज्यादा परम व्याकुल अब वे प्रभु के लिए हो जाएं, ऐसा गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने प्रभु से मांगा । |
| 190. |
व्याकुलता से प्रभु को प्राप्त करने वाले संत श्री तुकारामजी और श्री रामकृष्ण परमहंसजी अभी हाल ही में हुए हैं । |
| 191. |
प्रभु प्रिय लगे, बहुत प्रिय लगे और ज्यादा प्रिय लगे - इसका उपाय प्रभु के सद्गुणों और श्रीलीलाओं का श्रवण करना है यानी प्रभु की कथा का नित्य श्रवण करना है । |
| 192. |
नित्य प्रभु का अनुसंधान होना चाहिए यानी चित्त की वृत्ति निरंतर प्रभु की तरफ ही बहनी चाहिए । |
| 193. |
श्री उद्धवजी पूछते हैं तो प्रभु कहते हैं कि जो कभी नष्ट नहीं होता, जो स्थाई तत्व है, वे प्रभु हैं । जो नष्ट होता है, नाशवान है, वह संसार है । प्रभु कहते हैं कि असत से निकलकर सत में अपने मन को लगाओ, बस यही आत्म-कल्याण का उपाय है । |
| 194. |
शास्त्रों में बताया गया है कि परस्त्री की संगति का तुरंत त्याग करना चाहिए । भारतीय परंपरा में खुद की पत्नी को तारिणी माना गया है क्योंकि वह पति को प्रभु से जोड़कर उसका उद्धार करवाती है इसलिए तारिणी माना गया है पर परस्त्री से बचने का शास्त्र कड़ा आदेश देते हैं । |
| 195. |
चित्त को अचंचल करके प्रभु में लगाना चाहिए और चंचल पदार्थ यानी संसार से उसे हटाना चाहिए । |
| 196. |
शास्त्र कहते हैं कि कंचन और कामिनी की आसक्ति का त्याग करना चाहिए । कंचन और कामिनी साधारण प्रिय लगे, अति प्रिय नहीं लगे । अति, अति और अति प्रिय तो केवल प्रभु ही लगे । |
| 197. |
संत श्री एकनाथजी एक गृहस्थ संत थे । वे एक श्रेष्ठ पति और उनकी पत्नी एक श्रेष्ठ आदर्श पत्नी थी, जो उन्हें प्रभु मार्ग में अग्रसर करती थी, खुद में आसक्त नहीं होने देती थी । संत श्री एकनाथजी भी इसलिए प्रभु की भक्ति में ही आसक्त हुए । |
| 198. |
लंपट मित्रों की संगति नहीं करनी चाहिए, जो हमें गलत आदतों में फंसा दे, ऐसा शास्त्र आदेश करते हैं । |
| 199. |
बुरे विषय का चिंतन नहीं करना चाहिए, बुरे विषय को वाणी का विषय भी नहीं बनाना चाहिए, बुरे विषय की निंदा में भी वाणी को नहीं लगाना चाहिए । निंदा की तो भी ध्यान बुरे विषय को सोचने में जाएगा । इसलिए बुरे विषय का किसी भी अवस्था में ध्यान ही नहीं करना चाहिए । |
| 200. |
जीवन भर कुछ भी पढ़ने की जरूरत नहीं क्योंकि जो यहाँ श्रीमद् भागवतजी महापुराण में मिलेगा प्रभु और श्री उद्धवजी के संवाद में वह कहीं नहीं मिलेगा । प्रभु की कृपा है कि प्रभु ने श्री उद्धवजी को निमित्त बनाकर उत्तर दिए और श्री उद्धवजी ने हम पर कृपा करके प्रभु से प्रश्न पूछे । प्रभु के अपने स्वधाम जाने से पूर्व श्री उद्धवजी ने जितना हो सके अपने मन की बात प्रभु से पूछी और संसार के उद्धार हेतु प्रभु ने पूर्ण ज्ञान का प्रतिपादन किया । |
| 201. |
प्रभु कहते हैं कि उनके ध्यान का अभ्यास नित्य करना चाहिए । प्रभु कहते हैं कि एकांत का चयन करना चाहिए और दीर्घकाल बैठकर जिस भी आसन में सुख मिले उसमें बैठना चाहिए । प्रभु ने उसे सहजासन का नाम दिया है और फिर प्रभु कहते हैं कि उनका ध्यान करना चाहिए । |
| 202. |
आजकल ध्यान भी प्रभु के अलावा अन्य चीजों पर करवाया जाता है । अलग-अलग चीजों पर ध्यान केंद्रित कराया जाता है, जो कि एकदम गलत है । ध्यान केवल और केवल प्रभु का ही होना चाहिए । |
| 203. |
संतों का दिया हुआ भक्ति का धन सबसे श्रेष्ठ धन है । |
| 204. |
संतों ने दूसरे प्राचीन काल के संतों की कभी भी भूल नहीं बताई । यह उनकी महानता का सूचक है और पुराने संतों की पूर्णता का सूचक है । |
| 205. |
प्रभु की माधुर्य का ध्यान करना चाहिए क्योंकि इस माधुर्य का ध्यान करते-करते हमें हृदय में सुख मिलने लगता है । |
| 206. |
प्रभु से प्रेम कैसा होना चाहिए ? संत श्री एकनाथजी कहते हैं कि बिना किसी शर्त का प्रेम होना चाहिए । |
| 207. |
जैसे एक स्त्री जिसने नीम, हकीम, वैद्य से इलाज करा लिया फिर भी पूरी जवानी बच्चा नहीं हुआ । उस स्त्री को साठ वर्ष की अवस्था में बच्चा हुआ तो उस स्त्री को उससे कितना प्रेम होगा । संसार में सबसे सुंदर उसे अपना बच्चा ही लगेगा । ऐसे ही और इससे भी बहुत ज्यादा प्रेम का भाव हमारा प्रभु के लिए होना चाहिए । |
| 208. |
प्रभु के सुकुमार रूप यानी कोमल रूप का ध्यान करना चाहिए । प्रभु श्री रामजी, प्रभु श्री कृष्णजी के कोमल रूप का ध्यान करना चाहिए । |
| 209. |
प्रभु के माधुर्य का ध्यान, प्रभु की कोमलता का ध्यान । ध्यान करने के लिए यह दो बिंदु संत श्री एकनाथजी ने दिए हैं । |
| 210. |
कालिया नाग और अपने शत्रुओं को भी प्रभु इतने कोमल लगते हैं कि वे भी प्रभु से युद्ध करने का विचार ही त्याग देते हैं । |
| 211. |
कमल के भीतर का भाग, जो सबसे कोमल भाग होता है, उससे भी कोटि-कोटि गुना ज्यादा कोमल प्रभु हैं । |
| 212. |
हमारा चित्त भी कोमल होना चाहिए । सूत्र यह है कि कोमल चीज ही कोमल तत्व का ध्यान कर सकती है । |
| 213. |
ध्यान के वक्त प्रभु की मूर्ति में जड़त्व दिखना ही नहीं चाहिए । प्रभु की मूर्ति सदैव चेतनमय ही दिखनी चाहिए । |
| 214. |
ध्यान हेतु एक और बिंदु संत देते हैं कि प्रभु के हास्य का यानी मधुर हास्य का ध्यान करना चाहिए । |
| 215. |
ध्यान हेतु सर्वोत्तम बिंदु संत देते हैं कि प्रभु के भीतर के परमानंद का ध्यान करना चाहिए । जैसे ही प्रभु के परमानंद पर ध्यान टिकेगा हमारे भीतर से आनंद का फव्वारा फूट पड़ेगा । संसार के सभी सुख इस आनंद की अनुभूति के सामने बहुत तुच्छ होते हैं । |
| 216. |
जैसे ही प्रभु के परमानंद का ध्यान हुआ हम ध्यान की सर्वोच्च अवस्था पर पहुँच गए । |
| 217. |
हम प्रभु के माधुर्य का ध्यान, फिर प्रभु के कोमलता का ध्यान, फिर प्रभु के हास्य का ध्यान, फिर प्रभु के परमानंद का ध्यान । ध्यान की पूर्णता इन्हीं ध्यान में है । आज प्रचलित अन्य चीजों पर ध्यान में यह पूर्णता है ही नहीं । |
| 218. |
जो प्रभु के परमानंद को आनंद से अनुभव कर लेता है संसार का दुःख उसे फिर कभी स्पर्श नहीं कर सकता । |
| 219. |
परमानंद की अनुभूति करने वाले जीव के जीवन में उठने वाली आनंद की लहर उसे सदैव के लिए प्रभु रूपी आनंद सिंधु की आनंद लहर ही बना देती है । |
| 220. |
दो भक्त मिलते हैं वैसे ही जैसे दो आनंद की लहर प्रभु रूपी सागर की आपस में मिलती हैं । |
| 221. |
प्रभु विश्व के सबसे बड़े वक्ता हैं । प्रभु श्री कृष्णजी ने अपना पहला भाषण मात्र सात वर्ष की अवस्था में दिया जब श्री इंद्रदेवजी की जगह उन्होंने श्री गिरिराजजी की पूजा हेतु पूरे गांव वालों के सामने भाषण दिया । प्रभाव यह हुआ कि सभी प्रभु से प्रभावित हुए और वर्षों से चली आ रही परंपरा को तोड़कर नई परंपरा प्रारंभ हुई । |
| 222. |
प्रभु श्री कृष्णजी को सजना बहुत अच्छा लगता है, कोई बस उन्हें सजाने वाला चाहिए । |
| 223. |
एक संत बड़ी सुंदर बात कहते हैं कि धर्म के लिए प्रभु श्री रामजी, प्रेम के लिए प्रभु श्री कृष्णजी, वैराग्य के लिए प्रभु श्री महादेवजी और वैभव के लिए प्रभु श्री नारायणजी की उपासना करनी चाहिए । |
| 224. |
संत तीर्थों का ध्यान भी करते थे यानी ध्यान तीर्थ का और उस तीर्थ से ध्यान के कारण बंध जाते थे । उदाहरण स्वरूप हम प्रभु श्री गिरिराजजी की परिक्रमा का मन में ध्यान करते हैं, शरीर से जाना नहीं हुआ तो भी ध्यान से पूरा पुण्य मिल जाता है मन से तीर्थ जाने का । |
| 225. |
श्रीबृज धाम के सभी तीर्थों का 500 वर्षों पूर्व पुनः प्रकाश हुआ । भगवती यमुना माता और प्रभु श्री गिरिराजजी महाराज परम अलौकिक और चिन्मय हैं । |
| 226. |
जिस क्षण प्रभु ने कहा कि “मैं गिरिराज हूँ” श्री गिरिराजजी प्रभु का रूप बन गए । अब वे पर्वत नहीं रहे । |
| 227. |
प्रभु ने श्री इंद्रदेवजी को मानो कहा कि जिनको मैं अपना लेता हूँ उनका नाश कोई भी नहीं कर सकता, वज्र भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता । |
| 228. |
श्री विभीषणजी के शरण में आने पर प्रभु बोले कि मेरी शरण में आया है, अब चाहे कुछ भी हो जाए इसकी रक्षा का दायित्व मेरा हो गया । |
| 229. |
सात दिनों तक प्रभु ने अपने छोटी (कनिष्ठा) अंगुली के नख पर श्री गिरिराजजी को उठाकर रखा । |
| 230. |
ऊपर से बरसने वाले जल को श्री सुदर्शन चक्रराजजी ने रोका, नीचे से आने वाले जल को श्री शेषनागजी ने रोका और जल की एक बूंद भी किसी भी बृजवासी को भिगो भी नहीं पाई । |
| 231. |
श्री इंद्रदेवजी ने मूसलाधार वर्षा करवाने के बाद भी एक घर गिरने की बात तो दूर, एक पत्ता जो पेड़ से गिरने हेतु लटक रहा था उसे भी श्री इंद्रदेवजी नहीं गिरा पाए । सात दिनों की कोप वृष्टि, आंधी, तूफान सबके बाद भी किसी का बाल भी बाँका नहीं कर पाए । |
| 232. |
धन्य वह जीव होता है जिसकी रक्षा का दायित्व प्रभु ले लेते हैं । |
| 233. |
श्री वेदजी का मंत्र है कि प्रभु मेरे ज्ञान की रक्षा करें क्योंकि मैं नहीं कर पाऊँगा, आपको ही करनी पड़ेगी । |
| 234. |
किसका ज्ञान सुरक्षित होता है ? जिस पर प्रभु की कृपा हो जाती है उसका ही ज्ञान सुरक्षित रहता है । |
| 235. |
जीवन में जो भी करना है उसे करते हुए कभी भी प्रभु को नहीं भूलना चाहिए । |
| 236. |
जब हम प्रभु को भूलते नहीं हैं तो हमारे सभी काम सुचारु रूप से होते चले जाते हैं । |
| 237. |
शिशुपाल ने प्रभु को नित्य निरंतर इतने अपशब्द कहे पर प्रभु ने कभी भी पलट कर एक भी अपशब्द शिशुपाल को नहीं कहा । |
| 238. |
सूत्र है कि हर व्यक्ति के जीवन में एक स्तर होता है । हमें अध्यात्म से जुड़कर अपने स्तर को बहुत ऊँचा बनाकर रखना चाहिए । |
| 239. |
सूत्र है कि व्यक्ति के जीवन स्तर की परीक्षा उसकी भाषा और व्यवहार से होती है । इसलिए कभी भी अपनी भाषा और व्यवहार को निंदनीय नहीं बनाना चाहिए । |
| 240. |
प्रभु कहीं भी देखते हैं तो मुस्कुराते हुए ही देखते हैं । प्रभु के मुस्कुराने में अति प्रेम छिपा हुआ होता है । |
| 241. |
प्रभु बोलते हैं तो उदारता से बोलते हैं । कभी भी हल्का शब्द प्रभु वाणी से बोला हुआ कहीं भी नहीं मिलेगा । |
| 242. |
सात दिन बाद श्री इंद्रदेवजी क्षमा मांगने आए तो भी प्रभु ने तुरंत कहा कि तुम्हारा कल्याण हो और प्रभु ने क्षमा कर दिया । यह प्रभु की कृपा और करुणा है । |
| 243. |
श्री गिरिराजजी श्रीलीला क्यों हुई ? इसलिए कि सभी देवतागण और ग्रह मर्यादा में रहें । |
| 244. |
प्रभु मनुष्य को भी मर्यादा में रहने हेतु संकेत करते रहते हैं । जो इस संकेत को समझ जाता है उसका ही कल्याण होता है । |
| 245. |
श्री कामधेनु गौ-माता इच्छा पूर्ति करने वाली माता है । |
| 246. |
श्री सुरभि गौ-माता ने प्रभु से कहा कि अब श्री इंद्रदेवजी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करेंगे पर दूसरे इंद्रदेवजी मर्यादा फिर तोड़ सकते हैं । तो प्रभु ने एक विधान बनाया कि चार तत्वों पर किसी का अधिकार नहीं चलेगा और उनके स्वामी सर्वदा और सिर्फ प्रभु ही होंगे । गौ-माता, साधु, ब्राह्मणदेव और देव मंदिर । इनका धरती पर कोई राजा भी मालिक नहीं हो सकता । देवता के राजा इंद्रदेवजी भी इनके मालिक नहीं हो सकते । इन चारों के मालिक सदैव प्रभु रहेंगे । |
| 247. |
एक-एक श्रीलीला के कारण प्रभु का एक-एक नाम पड़ा । श्रीगोविंद नाम प्रभु का पड़ा जब श्री कामधेनु गौ-माता ने अपने स्तनों के दूध से प्रभु का अभिषेक किया । |
| 248. |
प्रभु श्री कृष्णजी और प्रभु श्री रामजी ने कभी भी पुरानी बातों को पकड़ा नहीं, कभी भी किसी बात को अपने मर्यादा का विषय बनाया नहीं । |
| 249. |
प्रभु श्री शुकदेवजी ने “भगवान” शब्द की व्याख्या करी, उस व्याख्या में बैठने वाला ही “भगवान” कहलाता है । (1) जिनमें समस्त ऐश्वर्य हो और पृथ्वी, जल, आकाश, वायु सब जिनकी शक्ति से काम करती हो (2) जो धर्म की सदैव रक्षा करे (3) संपूर्ण यश जिनका जगत में फैला हुआ हो (4) जिनका सौंदर्य एक जैसा हो, कभी भी कम नहीं हो, कभी भी बुढ़ापा नहीं आए (5) जिनमें अखंड ज्ञान हो (6) जिनका वैराग्य अक्षुण्ण हो यानी कभी भी टूटने वाला नहीं हो । |
| 250. |
प्रभु श्री शुकदेवजी श्री रासपंचाध्यायी से पहले हमें चेतावनी स्वर में कहते हैं कि यह लीला मनुष्य की नहीं है, यह भगवान की श्रीलीला है । इसलिए इसे इसी संदर्भ में देखना चाहिए और इसमें कभी संदेह नहीं करना चाहिए । |
| 251. |
हमारा साधन कितना भी पक्का हो पर प्रभु इच्छा और प्रभु कृपा बिना प्रभु साक्षात्कार नहीं हो सकता । |
| 252. |
गोपियां पहले से रास चाह रही थी पर बात तब बनी जब प्रभु की चाहत हुई । सूत्र यह है कि जीव कुछ भी चाहता रहे पर प्रभु साक्षात्कार तभी होगा जब प्रभु चाहेंगे । |
| 253. |
हमारे भीतर के असुर मरने पर ही प्रभु के साथ श्रीरास हो सकता है । सभी असुर मारे गए उसके बाद ही श्रीबृज में श्रीरास हुआ । |
| 254. |
प्रभु की अवस्था दस वर्ष से भी कम थी जब श्रीरास हुआ । इसलिए श्रीरास का कोई गलत अर्थ करना भी बहुत बड़ा पातक है । |
| 255. |
प्रभु की बांसुरी सुनी तो अपने हाथों का काम उसी क्षण त्याग कर सभी गोपियां श्रीरास के लिए दौड़ पड़ी । एक गोपी पति को रोटी परोस रही थी, रोटी हाथ में लेकर चली । एक गोपी अपने बच्चों को दूध पिला रही थी तो बच्चे को बिसार कर दौड़ी । एक गोपी आँख में काजल डाल रही थी वह एक आँख में काजल और दूसरी आँख सूखी लेकर दौड़ी । संकेत यह है कि प्रभु की पुकार आते ही जीवात्मा को प्रभु मिलन के लिए दौड़ना पड़ता है । |
| 256. |
गोपियों को घर से बाहर निकलने पर किसी के पिता, किसी के भाई, किसी के बच्चे ने रोका पर सबकी उपेक्षा करते हुए वे प्रभु से मिलने दौड़ पड़ी । सूत्र यह है कि प्रभु ऐसा खींचते हैं कि संसार में कोई भी उस जीव को फिर प्रभु मिलन से नहीं रोक पाता । |
| 257. |
प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि गोपियां अपने पति, माता-पिता, सगे संबंधी की बात को ध्यान नहीं दे रही थी क्योंकि प्रभु, जो परमपति हैं, उन्होंने बुलाया था । |
| 258. |
एक गोपी को उसके पति ने कमरे में बंद कर दिया । ऐसी व्याकुलता उस गोपी को हुई जैसे जल से बाहर निकली मछली तड़पती है और उस गोपी ने वैसे ही तड़पते हुए अपने प्राण त्याग दिए । उस गोपी का शरीर छूट गया और उसकी आत्मा मिलन के लिए प्रभु के पास चली गई । |
| 259. |
सभी गोपियों की व्याकुलता को मिलाकर भी श्रीजी भगवती राधा माता की व्याकुलता का एक अंश भी नहीं बनती । श्रीजी भगवती राधा माता की कितनी व्याकुलता है इसका अनुमान लगाए, प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं । |
| 260. |
बिना किसी की परवाह किए गोपियां दौड़ी वैसे ही साधक को प्रभु की तरफ दौड़ना चाहिए बिना संसार की किसी चीज की परवाह किए । जैसे एक तीर बिना किसी की परवाह किए लक्ष्य को भेदने चला जाता है वैसे ही साधक को प्रभु मिलन के लक्ष्य की तरफ चलना चाहिए । |
| 261. |
भागवत साक्षात्कार हुए संत में सबसे बड़ी चीज प्रभु को पाने की व्याकुलता होती है । श्रीवेद, जप, कीर्तन, शास्त्र आदि सबने अलग-अलग कुछ साधन किया पर सभी में एक बात थी कि प्रभु को पाने की व्याकुलता । |
| 262. |
सूत्र यह है कि व्याकुलता नहीं हो तो जीवन में प्रभु प्राप्ति संभव ही नहीं है । |
| 263. |
व्याकुलता में भी तीव्रता होने पर ही वह तीव्रता हमें प्रभु प्राप्ति करवाती है । |
| 264. |
संसार के किसी भी देश में पागल को सजा नहीं होती, पागल नियम तोड़ते हैं तो भी उन्हें सजा नहीं होती । वैसे ही प्रभु प्रेम में जो कोटि जन्मों के पुण्य उदय होने के बाद पागलपन आता है तो उसकी प्रकृति भी नियम तोड़ने पर कोई सजा नहीं देती क्योंकि इसी प्रभु प्रेम के पागलपन को पाने के लिए साधक तरसते हैं । |
| 265. |
प्रभु प्रेम में गोपियों का जो पागलपन था वह श्रीवृंदावन धाम देख चुका था । इसलिए संत श्री वृंदावनजी की श्रीरज बनना चाहते हैं । |
| 266. |
जीव का परम सौभाग्य होता है प्रभु के लिए प्रेम का महाभाव यानी पागलपन का निर्माण हो जाना । यह सौभाग्य परम भाग्यवान को प्राप्त होता है, सामान्य पुण्यात्मा को भी प्राप्त नहीं होता । |
| 267. |
प्रभु ने श्रीगोपीजन का श्रीरास में स्वागत किया किन शब्दों के साथ - स्वागतम महाभागा कहकर यानी महाभाग्य वाले आपका स्वागत करता हूँ । |
| 268. |
वास्तव में कौन भाग्यवान ? भाग्यवान की व्याख्या क्या है ? सामान्य लोग बंगला, नौकर-चाकर, गाड़ी देखकर कह देते हैं कि सेठजी भाग्यवान है पर शास्त्र इनको भाग्यवान नहीं कहते । शास्त्र सिर्फ भक्त को भाग्यवान मानते हैं । शास्त्र ने भक्ति नहीं करने वाले को कर्मफूटा की संज्ञा दी है । |
| 269. |
श्री रामचरितमानसजी की चौपाई है कि पत्नी, सूत यानी बेटे-पोते और लक्ष्मी यानी धन पापी के पास भी होते हैं । यह भाग्यवान होने के लक्षण नहीं हैं । भाग्यवान होने के लक्षण प्रभु प्रेम और प्रभु की भक्ति है । |
| 270. |
संतों ने भाग्यवान उन्हें कहा है जो प्रभु मार्ग पर चल दिए हैं । |
| 271. |
भिक्षा मांग कर भी प्रभु साधना करने वाला भाग्यवान है पर सब कुछ संपन्नता होने पर भी साधन मार्ग पर नहीं चलने वाले को शास्त्रों ने कर्मफूटा कहा है, भाग्यवान उन्हें सिर्फ सांसारिक लोग ही मानते हैं । |
| 272. |
जो लोग यह कहते हैं कि हमने इतना धन कमाया हमें भाग्यवान क्यों नहीं कहते, संत उनसे एक उल्टा प्रश्न पूछते हैं कि आपका कमाया धन कहाँ तक आपके साथ जाएगा । भौतिक संपत्ति सिर्फ मृत्यु तक ही साथ रहेगी । जैसे पूर्व जन्म में संचित संपत्ति हम दूसरे जन्म में नहीं ले पाते पर प्रभु नामरूपी धन जिसने कमाया वह मृत्यु बाद भी साथ जाएगा । तो कौन-सा बड़ा धन हुआ ? भौतिक धन या आध्यात्मिक धन, संत यह प्रश्न पूछते हैं । |
| 273. |
एक संत ने कहा कि प्रभु नामरूपी धन अदभुत है क्योंकि भाई-भाई में इसका बंटवारा नहीं हो सकता, जिसका कमाया हुआ है उसके पास ही रहने वाला है, कोई चोर इसकी चोरी नहीं कर सकता, कोई डकैत इस पर डाका नहीं डाल सकता, सरकार इस पर कर नहीं लगा सकती, यहाँ तक कि प्रभु श्री यमराजजी भी मृत्यु पर इस धन को छीन नहीं सकते । |
| 274. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि वह भक्ति का परम धन मैं खुद अगले जन्म में उस साधक तक पहुँचाता हूँ चाहे वह किसी भी योनि में गया हो । |
| 275. |
अरबों की संपत्ति का एक धेला भी साथ नहीं जाएगा पर प्रभु नामरूपी धन कमाया हुआ प्रभु श्री यमराजजी भी छीन नहीं सकते । प्रभु श्री यमराजजी शरीर में से आत्मा का आकर्षण कर सकते हैं पर उस आत्मा द्वारा कमाए आध्यात्मिक धन तक उनकी भी पहुँच नहीं है । |
| 276. |
जो भक्ति का साधन हमने इस जीवन में कर लिया है प्रभु उसे अगले जन्म में हमें प्रदान करते हैं और उससे आगे का साधन करने हेतु कहते हैं । |
| 277. |
इस जन्म में जो साधन हम कर चुके हैं उसे अगले जन्म में दोबारा नहीं करना पड़ता, उससे आगे का साधन ही करना पड़ता है, यह सूत्र है । |
| 278. |
जैसे हमने एक करोड़ रुपए एक जन्म में कमाए और कोई हमें उसे अगले जन्म में दे दे कि अब इससे आगे की कमाई करो तो यह कितनी सुविधाजनक बात हो जाती है । भक्त के लिए प्रभु ऐसा ही करते हैं । |
| 279. |
इस जन्म में केवल भौतिक संपत्ति कमाकर इस जन्म तक उपयोग करने वाला कर्मफूटा है । भक्ति की संपत्ति को इकट्ठी करने वाला और उसे अगले जन्म में वापस प्राप्त करके, ऐसा करते-करते एक जन्म में प्रभु को प्राप्त करने वाला सबसे बड़ा भाग्यवान होता है । |
| 280. |
प्रभु भक्तों को कितना मान देते हैं यह एक दृष्टांत में देखें । श्रीक्षेत्र आनंदी में चौरासी सिद्धों ने समाधि ली । संत श्री ज्ञानेश्वरजी ने भी वहाँ समाधि ली । इसलिए वहाँ जो प्रभु महादेवजी का मंदिर है वे सिद्धेश्वर महादेवजी कहलाए । सिद्धों की समाधि स्थल है इसलिए प्रभु सिद्धेश्वर बन गए । |
| 281. |
भक्ति योग सर्वश्रेष्ठ है, यह प्रभु द्वारा प्रतिपादित तथ्य है जो कि प्रभु ने श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध में श्री उद्धवजी को कहा है । |
| 282. |
प्रभु से मतलब नहीं रखकर केवल प्रभु की सिद्धियों से मतलब रखना, एकदम गलत है । |
| 283. |
आज संसार ऐसा हो गया है कि प्रभु को कोई बिरला ही पाना चाहता है पर प्रभु से प्रभुता यानी धन-संपत्ति सब कोई पाना चाहते हैं । |
| 284. |
साधक को, जो भक्ति करता है, उसे सिद्धियों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए । अनेक प्रकार की सिद्धियाँ है जैसे शरीर के आकार को छोटा-बड़ा, हल्का-भारी करना, कामना को पूर्ण करना, प्रकृति से आज्ञा पालन करवाना, दूर की आवाज का सुनाई देना, दूर वाली चीज को देखना, दूसरे के शरीर में प्रवेश करना, किसी से अपनी आज्ञा का पालन करवाना, कहीं जाकर वायु मार्ग से आ जाना, अग्नि-जहर-जल पर कोई परिणाम नहीं होना, दूसरे के मन के विचार को जान जाना, किसी के जीवन की आगे-पीछे की बात जान लेना, इत्यादि-इत्यादि । भक्ति करने वाले साधक को इनके चक्कर में नहीं पड़कर प्रभु भक्ति के मार्ग पर ही अग्रसर होना चाहिए । |
| 285. |
ध्यान से अलग-अलग सिद्धियों को प्राप्त करने का हेतु छोड़ना चाहिए और अपना पूरा ध्यान भक्ति से प्रभु में लगाना चाहिए । |
| 286. |
भक्त को स्वतः ही सिद्धियाँ प्राप्त होती है पर भक्त उसका उपयोग नहीं करता क्योंकि सिद्धियों का उपयोग करना भक्ति मार्ग में अच्छा नहीं होता । |
| 287. |
सिद्धियाँ हमारी क्षमता में वृद्धि, लोकप्रियता में वृद्धि, लोकप्रियता चंचलता की वृद्धि करती है । मन चंचल हुआ तो हम प्रभु से दूर हो जाते हैं और सिद्धियाँ भी गलती होने पर चली जाती है । इसलिए हम दोनों तरफ से ही नुकसान में होते हैं यानी प्रभु भी छूट गए और सिद्धियाँ भी चली गई । |
| 288. |
एक दृष्टांत से संत समझाते हैं कि एक साधक पितृ श्राद्ध हेतु श्री गयाजी गए, रास्ते में डकैत मिले उन्होंने उसका धन लूट लिया । वैसे ही साधक अपना आध्यात्मिक धन सिद्धियों के कारण गंवा बैठता है और लुटा बैठता है । |
| 289. |
जो हमें चमत्कार लगता है वह सिद्धियाँ मात्र एक विज्ञान है । जैसे एक शहर के बच्चे के लिए रिमोट से रोबोट चलाना एक साधारण बात है पर एक गांव वाला बच्चा चकित हो जाता है कि बिना किसी को छुए यह कैसे चल सकता है । वह उसे चमत्कार मानने लगता है । |
| 290. |
जीवन में सिद्धियाँ प्राप्त करना भक्ति मार्ग में बाधक होती है, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 291. |
प्रभु कहते हैं कि सिद्धियों के कारण हम आध्यात्मिक धन खो देते हैं । सिद्धियों का उपयोग करने पर सिद्धियाँ साधक के साधन का नाश करती है । श्री पतंजलिजी कहते हैं कि सिद्धियों का उपयोग नहीं करना चाहिए पर अहंकार भी नहीं करना चाहिए कि मैंने सिद्धियों का उपयोग नहीं किया नहीं तो उसका पतन वैसे ही होगा जैसे सिद्धियों का उपयोग करने से होगा । |
| 292. |
प्रभु श्री महादेवजी कहते हैं कि सिद्धियों का प्रलोभन ऊपर उठे हुए साधक को नीचे गिरा देने के लिए है । |
| 293. |
श्रेष्ठ साधक वह है जो सिर्फ प्रभु का आलंबन लेता है, सिर्फ प्रभु के लिए भाव रखता है । सिद्धियों का उपयोग नहीं करता और इसका अहंकार भी नहीं करता कि मैंने सिद्धियों का उपयोग नहीं किया । |
| 294. |
सिद्धियों के उपयोग में क्या-क्या खतरा है, प्रभु बताते हैं । प्रभु कहते हैं कि जिसको मेरा विश्वास नहीं होता, वे सिद्धियों का उपयोग करते हैं । जिन्हें सिर्फ मेरा विश्वास है उनको सिद्धियों से कोई सरोकार नहीं होता क्योंकि मैं (प्रभु) उनकी सब जरूरत की पूर्ति स्वतः ही करता हूँ । फिर मेरे (प्रभु) से अधिक सिद्धियाँ उन्हें क्या दे सकती है । |
| 295. |
प्रभु कहते हैं कि सिद्धियाँ सबके पास होती है, पशु-पक्षी के पास भी होती है । पक्षी के पास उड़ने की सिद्धि होती है, हंस को सिद्धि होती है कि दूध और पानी को अलग-अलग कर दे । |
| 296. |
जप, तप, ध्यान, साधन, समाधि से सिद्धियाँ प्राप्त होती है । भक्ति करने वाले को प्रभु प्राप्त होते हैं और स्वतः ही सभी सिद्धियाँ उसके सामने नतमस्तक हो जाती है । इसलिए प्रभु कहते हैं कि भक्ति सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि भक्ति करें तो प्रभु और सिद्धियाँ दोनों प्राप्त होती है । भक्त प्रभु में रम जाता है और सिद्धियों की तरफ ध्यान भी नहीं देता क्योंकि भक्त को प्रभु के रूप में परम धन और परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है । |
| 297. |
आध्यात्मिक धन (प्रभु) को चमत्कार (सिद्धियों) से कभी नहीं जोड़ना चाहिए । शुद्ध भक्त के जीवन में प्रभु कृपा से स्वतः ही चमत्कार होते रहते हैं । |
| 298. |
सिद्धियों के बल पर कमाई करना, लोगों को आकर्षित करना, यह एकदम गलत है । यह साधक का नाश कर देता है, ऐसा प्रभु कहते हैं । |
| 299. |
एक साधक एक हजार चार सौ वर्ष तक जिए । मृत्यु को कोई जीत नहीं सकता पर उसे सिद्धियों के बल पर विलंब किया जा सकता है । |
| 300. |
जैसे जादू का खेल होता है वैसे ही प्रभु कहते हैं कि सिद्धियों का भी खेल होता है जो हमें चमत्कार के रूप में दिखता है । |
| 301. |
सर्वोत्तम सिद्धियाँ सिर्फ दो ही हैं । प्रभु कहते हैं कि दो बातों की ही सिद्धि मांगनी चाहिए और उसके लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए । पहला, अपने मन पर नियंत्रण हो जाए और दूसरा प्रभु के श्रीकमलचरणों में इतना प्रेम हो जाए कि संसार हमें खारा लगने लगे । इसके अलावा किसी सिद्धि की तरफ हमें ध्यान भी नहीं देना चाहिए । |
| 302. |
जीवन में दो बातें यानी मन पर नियंत्रण और प्रभु के श्रीकमलचरणों में प्रेम होना साधक के सिद्ध हो जाने के लिए पर्याप्त है । पहला, मन पर नियंत्रण को कहा गया क्योंकि मन पर नियंत्रण होगा तो मन विषयों से हटेगा और तभी दूसरी बात होगी कि प्रभु के श्रीकमलचरणों में प्रेम हो पाएगा । |
| 303. |
जितना-जितना प्रभु से संपर्क होगा उतनी-उतनी प्रभु कृपा हमसे जुड़ेगी और हम विलक्षण बनते जाएंगे, सिद्ध होते जाएंगे और अंत में प्रभु की एक विभूति बन जाएंगे । |
| 304. |
एक संत को किसी ने पूछा कि श्रीमद् भगवद् गीताजी में सबसे श्रेष्ठ अध्याय और सूत्र क्या है ? संत ने कहा कि विभूति योग और सूत्र के रूप में प्रभु विभूति के रूप में हमारे भीतर विराजमान है । |
| 305. |
अध्ययन करने से ही ज्ञान जागृत होता है यह सही है भी और नहीं भी है । सत्य यह है कि सरल, स्पष्ट और अकाट्य ज्ञान प्रभु कृपा से ही जागृत होता है । |
| 306. |
परमात्मा तत्व को जिन्होंने भीतर ढूंढने से इनकार कर दिया और प्रभु को बाहर ही ढूंढते रहे वे वैसा ही कर रहे हैं जैसे मृगजल से पानी का घड़ा भरने के लिए चल दिए । |
| 307. |
सबसे पहले प्रभु हमारे भीतर बैठे हैं इसका विश्वास करना पड़ेगा । प्रभु की पहली विभूति हमारे भीतर आत्म तत्व के रूप में है । |
| 308. |
अपना कल्याण करने हेतु अगणित बातों में जिसने एक बात पकड़ ली उसका सबसे ज्यादा कल्याण होगा । जिसने अंतर्मुखी होना सीख लिया क्योंकि जितनी हमारी वृत्ति बाहर गई उतना दुःख, जितनी हमारी वृत्ति अंतर्मुख हुई उतना जीव को आनंद । यह प्रभु द्वारा बताया सूत्र है । |
| 309. |
प्रभु कहते हैं कि साधक को प्रभु की सभी विभूतियों में श्रद्धा रखनी चाहिए पर परमात्मा तत्व का दर्शन प्राप्त साधक को विभूतियों में से कहीं ज्यादा श्रद्धा प्रभु में रखनी चाहिए । |
| 310. |
जीव प्रभु के साथ एकरूप हो जाए, यह प्रभु का अंतिम उपदेश है । इसके होने की योग्यता यानी भागवत् रूप होने की प्रक्रिया जो प्रभु बता रहे हैं वह है भक्ति । |
| 311. |
अपनी वाणी पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए । जिसने वाणी का नियंत्रण सीख लिया वह अंत में मन को भी नियंत्रित कर पाएगा । |
| 312. |
कुछ भी नहीं बोलना, ऐसा नहीं है । अनावश्यक नहीं बोलने और बोलने का विषय प्रभु को बना लेना । वाणी प्रभु को दे देना यानी प्रभु के लिए जप और भजन और सत्संग करना । |
| 313. |
शुरुआत इससे करनी चाहिए कि एक घंटा हमने अपनी वाणी प्रभु को दे दी । हमारे मन में संकल्प-विकल्प शब्दों के रूप में उठते हैं । अनेक शब्दों को छोड़कर एक प्रभु के नाम रूपी शब्द को पकड़ लें जैसे “श्रीराम” और वह हमारे लिए मंत्र बन गया । |
| 314. |
पन्द्रह मिनट प्रभु में मन लगाना बहुत मुश्किल है पर पन्द्रह मिनट नाम जप में प्रभु नाम रूपी शब्द का आधार लेकर वाणी को लगाना बहुत आसान है । |
| 315. |
मन से प्रभु का ध्यान, प्रभु के श्रीअंगों का ध्यान करना चाहिए । यह भक्ति का एक अभिन्न अंग है । |
| 316. |
प्राणों का नियंत्रण प्राणायाम से करना चाहिए, जिससे कि हमारे मन को स्थिर होने में सहायता मिले । |
| 317. |
बुद्धि का नियंत्रण विवेक से करना चाहिए । बुद्धि के प्रत्येक संकल्प को और विकल्प को प्रभु के लिए बदल देना चाहिए । |
| 318. |
शरणागति के माध्यम से अहंकार का त्याग करना चाहिए । तभी वह स्थिति आएगी जब हम स्वयं ही प्रभु को समर्पित हो जाएंगे । |
| 319. |
भारतीय संस्कृति सर्वोत्तम इसलिए है क्योंकि मानव जीवन को श्रेष्ठ आधार देने के लिए चार वर्ण, चार आश्रम, चार पुरुषार्थ, चार साधन मार्ग हैं । इतना विशाल आधार सोलह स्तंभों का किसी देश ने नहीं दिया होगा । |
| 320. |
हमारा मानव जीवन का लक्ष्य क्या है ? जन्म पर ही चार लक्ष्य हमें मिले – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । |
| 321. |
काम यानी कामना, अनेक कामना जागृत होती है और विसर्जित होती रहती है । भारतीय परंपरा में सात्विक कामना का तिरस्कार नहीं किया गया है बल्कि उसे भारतीय ऋषियों द्वारा पुरुषार्थ माना गया है । |
| 322. |
अर्थ कमाना सात्विक कामना पूर्ति हेतु को शास्त्रों में सही माना गया है पर वह कामना अनिवार्य रूप से सात्विक होनी चाहिए । |
| 323. |
धर्म को परिभाषित किया गया है कि समाज के नियम में रहकर व्यवहार करना, नियम का उल्लंघन नहीं करना, इसे धर्म कहा गया है । |
| 324. |
मोक्ष हमारी ऐसी कमाई है जो हमें यहाँ छोड़कर जाना नहीं पड़े और हम साथ लेकर जा सके । इसको ही ऋषियों ने मोक्ष कहा है । |
| 325. |
जीवन के लक्ष्य हेतु चार साधन मार्ग - योग, कर्म, ज्ञान और भक्ति । यह चार मार्ग आध्यात्मिक जीवन हेतु ऋषियों ने हमें दिखाए हैं । |
| 326. |
जैसे घर चलाने हेतु काम का विभाजन किया जाता है कि पुरुष कमाता है, स्त्री घर संभालती है वैसे ही ऋषियों ने समाज का विभाजन किया और संघर्ष रहित समाज रखने के लिए उसको चार वर्ण में और चार आश्रम में विभाजित किया । |
| 327. |
सनातन धर्म के सोलह स्तंभ (चार वर्ण, चार आश्रम, चार पुरुषार्थ, चार साधन) के हर जीव को जीवन में प्रभु भक्ति हेतु समय निकालना चाहिए, ऐसा प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं । |
| 328. |
शास्त्रों ने ब्राह्मणदेव को सबमें ज्येष्ठ माना है और सबमें श्रेष्ठ माना है पर उन्हें अपने आचरण से ऐसा साबित करना पड़ता है, ऐसा शास्त्र मत है । |
| 329. |
ब्राह्मणदेवों को इन गुणों का विकास श्रेष्ठता हेतु करना चाहिए, ऐसा शास्त्रों का आदेश है । उन्हें इंद्रियों पर नियंत्रण यानी संयम रखना चाहिए, पवित्र जीवन जीने वाला होना चाहिए, भक्ति करने वाला होना चाहिए, क्षमावान होना चाहिए, सरलता होनी चाहिए, सत्य निष्ठा होनी चाहिए और दया भाव होना चाहिए । |
| 330. |
क्षत्रियों में इन गुणों के बारे में शास्त्र आदेश करते हैं । तेजस्वी होना चाहिए, प्रतिकार की क्षमता होनी चाहिए, शौर्य और वीरता होनी चाहिए, बाधा सहने की क्षमता होनी चाहिए और उदार हृदय वाला होना चाहिए । |
| 331. |
वैश्य के बारे में इन गुणों का आदेश शास्त्र करते हैं । प्रभु में और परलोक में विश्वास होना चाहिए, दानी होना चाहिए, दिखावा करने वाला नहीं होना चाहिए, धन कमाने वाला होना चाहिए क्योंकि राष्ट्र के लिए कर रूपी संपत्ति कमाने की मुख्य जिम्मेदारी उसकी ही होती है और गौ सेवक होना चाहिए । |
| 332. |
भारत के ऋषियों ने पूरे समाज को चार वर्ण में बांटकर विभाजन नहीं किया बल्कि पूरे समाज को एक दूसरे से बांध कर रख दिया । |
| 333. |
प्रभु ने श्रीवेदों की रक्षा ब्राह्मणदेवों को सौंपी है । श्री वेदजी नहीं पढ़ने वाले ब्राह्मण का कल्याण नहीं है । प्रभु ने गौ-माता की रक्षा वैश्यों को सौंपी है । जो वैश्य होकर गौ रक्षा नहीं करता वह पतित हो जाता है । |
| 334. |
प्रभु श्री कृष्णजी ने श्री वासुदेवजी के यहाँ जन्म लिया जो कि क्षत्रिय थे और श्रीनंद बाबा के यहाँ बड़े हुए जो कि वैश्य थे । प्रभु ने इसलिए गौ सेवा का कार्य वैश्य धर्म अनुसार स्वीकार किया और उसे पूर्ण रूप से निभाया । |
| 335. |
संपत्ति बढ़ाना अच्छा है पर ऐसा होने पर धर्म का नियंत्रण रखना सबसे जरूरी है क्योंकि अधर्म की संपत्ति कभी नहीं कमानी चाहिए । |
| 336. |
गृहस्थ आश्रम भी एक आश्रम है जहाँ पवित्रता रखना अति आवश्यक । पवित्रता रखने वाले गृहस्थ पर ही प्रभु प्रसन्न होते हैं । |
| 337. |
गोपियों जैसा प्रभु प्रेम का पागलपन कोटि-कोटि जन्मों के पुण्य के बाद भी किसी-किसी बिरले भक्त को ही प्राप्त होता है । जिसे वह प्राप्त होता है वही सच्चा भाग्यवान होता है । |
| 338. |
शास्त्र कहते हैं कि संपत्ति सार्थक होती है जब उसका सदुपयोग धर्म कार्य में किया जाता है, संपत्ति निरर्थक होती है जब उसका उपयोग केवल भोग भोगने में किया जाता है और संपत्ति घातक होती है जब उससे हानिकारक और शास्त्र वर्जित काम किया जाता है । |
| 339. |
रोज कमाना, खाना, खर्च करना, निद्रा लेना, मैथुन करना - यह पशु तुल्य जीवन है । जिसने अपने जीवन का प्रभु भक्ति करके विकास किया, तभी उसका मानव जीवन सफल माना जाएगा । |
| 340. |
धन के सबसे पहले दो काम - परिवार का आरोग्य और परिवार की शिक्षा । आरोग्य और शिक्षा भी तब सार्थक जब वे जीवन में भक्ति का उदय कर देते हैं । आरोग्य शरीर यानी शरीर को ठीक रखना चाहिए भक्ति हेतु । आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करना चाहिए, भक्ति वाले प्रभु मार्ग पर चलने के लिए । |
| 341. |
जीवन बेकार उसका जिसने वाणी से प्रभु का नाम नहीं लिया, कानों से प्रभु कथा का श्रवण नहीं किया, आँखों से प्रभु विग्रह का दर्शन नहीं किया । धन्य वह जीवन, सर्वाधिक भाग्यवान वह जीवन जिसने अपना मन भगवान में लगाया, चाहे अन्य संपत्ति उसने कुछ भी नहीं कमाई । |
| 342. |
चाहे कोपीन पर जीवन निर्वाह किया जाए तो भी उसका ही जीवन सफल माना जाएगा जिसने कोपीन धारण कर अन्य कुछ भी अर्जित नहीं किया पर प्रभु की खूब भक्ति की । ऐसी व्याख्या श्रीमद् भागवतजी महापुराण प्रभु श्री शुकदेवजी करते हैं । |
| 343. |
जीवन जीने के लिए कमाना, कमाने के लिए दिनभर की भाग दौड़ । महर्षि श्री वशिष्ठजी श्री रामायणजी में कहते हैं वित्त का अर्जन करके भक्ति बिना जीवन नष्ट करने वालों से तो अच्छा उसका जीवन है जो भिक्षा पात्र लेकर, चाहे किसी की बस्ती में जाकर, मिलने वाली भिक्षा भी ग्रहण कर ले पर मानव का धर्म यानी भगवत् भक्ति किए बिना जीवन कदापि व्यतीत नहीं करे । |
| 344. |
धन्य वे हैं जिन्होंने अपने जीवन को प्रभु मार्ग पर आगे बढ़ाया । |
| 345. |
आज के समय न कोपीन धारण की जरूरत, न भिक्षा पात्र लेकर किसी की बस्ती में जाने की जरूरत । सूत्र यह है कि जो भी मिल जाए, जो भी प्रभु दे दें, उसमें संतोष कर भक्ति करनी और भक्ति पथ पर निरंतर अग्रसर होते चलना चाहिए । |
| 346. |
प्रभु ने प्रभु से प्रेम करने वाले, प्रभु के लिए दौड़ने वाले गोपियों को प्रभु ने महा भाग्यवान कहा है । हम भी दौड़ते हैं पर धन के लिए इसलिए प्रभु की नजरों में भाग्यवान नहीं । गोपियों को प्रभु ने महा भाग्यवान कहा है । प्रभु के लिए दौड़ने वाला महा भाग्यवान होता है, भाग्यवान नहीं बल्कि महा भाग्यवान । |
| 347. |
भोगों के लिए आजीवन चलने वाली भाग-दौड़ हमें कभी भी, कहीं भी परमार्थ में नहीं पहुँचाएगी । |
| 348. |
सार्थक वह दौड़ है जो हमें विश्राम तक ले जाए । प्रभु में ही विश्राम समाहित है । चौरासी लाख जन्मों का विश्राम प्रभु के श्री कमलचरणों में ही है । |
| 349. |
मृग मृगजल के पीछे दौड़ता है, मृगजल पानी है ही नहीं केवल जल का आभास है । संसार सिर्फ सुख का आभास है, संसार में सुख है ही नहीं । सुख और आनंद सिर्फ प्रभु के पास है । हम उस मृग की तरह मृगजल, जो आगे- आगे दिखता जाता है, उसके पीछे-पीछे दौड़ते हैं और एक दिन थककर मर जाते हैं । |
| 350. |
भोगों को भोगने वाले की गति यह है कि अंत में वह सदा अतृप्त ही रहता है । |
| 351. |
देखते-देखते आँखें चली गई पर दृश्य बचे रहे, खाते-खाते रोग ग्रस्त हो गए पर भोजन बचा रहा, यही जीवन का यथार्थ है । |
| 352. |
हमने भोगों को नहीं भोगा बल्कि भोग ने ही हमें भोगकर और हमें चूसकर नष्ट कर दिया । |
| 353. |
हम बूढ़े हो जाएंगे पर हमारी भोग भोगने की तृष्णा सदैव जवान ही बनी रहती है । |
| 354. |
जिसने जीवन में आध्यात्मिक ज्ञान यानी भक्ति की तरफ दौड़ नहीं लगाई उसके दौड़ने की दिशा ही जीवन में गलत थी । |
| 355. |
भक्ति की दौड़ का अंतिम परिणाम बहुत ही मीठा होता है । |
| 356. |
हमारा मन कहीं टिकता नहीं और संतों का मन कहीं जाता नहीं । संतों का मन कहाँ टिक गया - प्रभु के श्रीकमलचरणों में टिक गया । |
| 357. |
संसार में कोई नहीं है जो जीवन में विश्राम नहीं चाहता और चित्त का सच्चा विश्राम केवल प्रभु के श्री कमलचरणों में ही है । |
| 358. |
जिस दिन हमें कथा सुनने को मिलती है, हाथ में माला लेकर प्रभु का नाम लेने की इच्छा होती है, उस दिन समझना चाहिए कि हम सच्चे भाग्यवान हैं । |
| 359. |
जिस दिन इच्छा हो गई कि अब संसार से नाता तोड़कर सिर्फ प्रभु से नाता जोड़ लें उस दिन समझना चाहिए कि हम सच्चे और परम भाग्यवान हैं । |
| 360. |
गोपियों को महा भाग्यवान का संबोधन करके प्रभु पूछते हैं कि मैं (प्रभु) आपकी क्या सेवा करूं । |
| 361. |
प्रभु श्री कृष्णजी भक्तों के साथ बातचीत में थोड़ी छेड़छाड़ करते हैं । यह प्रभु श्री कृष्णजी का लीला माधुर्य है । प्रभु श्रीरास में आई श्रीगोपीजन से कहते हैं कि रात्रि के समय अकेली क्यों आई हो ? यहाँ रुकना नहीं चाहिए, वापस जाओ । प्रभु बोले अपना कर्तव्य अपने परिवार की सेवा करो । गोपियों को धक्का लगा पर प्रभु की आदत भक्तों के साथ मधुर छेड़छाड़ करने की है । |
| 362. |
गोपियां प्रभु से बोलती हैं कि कठोर शब्द तो आपने नहीं कहा पर निर्दयता से क्यों बोल रहे हैं ? प्रभु ने जब उन्हें श्रीरास से वापस जाने के लिए और अपने परिवार के पालन के लिए कहा । गोपियों ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि हम पति के पास क्यों जाए जब हमें परमपति मिल गया है । |
| 363. |
जीवन का केंद्र हमें प्रभु को ही सदैव मानना चाहिए । |
| 364. |
प्रभु हमारे प्रिय नहीं बल्कि हमारे प्रियतम होने चाहिए यानी प्रभु से प्रिय संसार में कोई भी हमारा नहीं होना चाहिए । |
| 365. |
गोपियों को एक ही सुख प्रभु स्मरण का सुख चाहिए था, उन्हें न परिवार का सुख, न अलंकार का सुख, न संसार का सुख चाहिए । |
| 366. |
श्रीरास लीला में प्रभु श्री शुकदेवजी के एक-एक शब्दों से जैसे अमृत टपकते हैं । |
| 367. |
गोपियों ने प्रभु से कहा कि संसार के पदार्थ कितने भी प्राप्त हो गए, आपने यानी प्रभु ने हमें बहुत अच्छे पति, सास-ससुर, बच्चे का साथ दिया और सभी संसाधन दिए तो भी वह आनंद कहाँ मिलेगा जो आपके श्रीकमलचरणों में मिलेगा । |
| 368. |
संत कहते हैं कि गोपियों की कक्षा में अपने को लाने की भूल भी कभी नहीं करनी चाहिए । गोपियां भी भक्त हैं पर हम भी खुद को भक्त मानते हैं । हम प्रभु से सदैव मांगते रहते हैं पर गोपियों ने कभी प्रभु से मांगा नहीं, कोई कामना नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, कोई याचना नहीं । |
| 369. |
मांगने वाला भक्त आरंभिक कक्षा का होता है और न मांगने वाला भक्त सबसे ऊँची कक्षा का होता है । |
| 370. |
प्रभु से न मांगने का अहंकार भी नहीं रखना चाहिए । सिर्फ प्रभु प्रेम के कारण, जो संसार में मिला है, उसमें तृप्त रहना चाहिए । |
| 371. |
भक्त सभी मिलने वाले सुख से अपना संबंध तोड़ देता है, सारी आधुनिक सुविधाओं को नकार कर एक भक्त श्री पंढरपुरजी 200 किलोमीटर पैदल चलकर जाता है या श्री केदारनाथजी की पैदल यात्रा करता है । |
| 372. |
भक्ति दीवानों का काम है । प्रभु के लिए दीवानापन आने पर ही भक्ति सार्थक होती है । |
| 373. |
भक्त मांगने के लिए नहीं, केवल प्रभु से मिलने हेतु तीर्थ में जाता है । क्या हम कभी किसी तीर्थ में केवल प्रभु से मिलने के लिए जाते हैं ? |
| 374. |
गोपियां प्रभु से कहती हैं कि प्रभु कुछ भी करना पर हमें छोड़ना मत । |
| 375. |
गोपियां प्रभु से कहती हैं कि प्रभु अपने प्रेम का एक बूंद ही बस हमें दे दें । |
| 376. |
गोपियां प्रभु से ऐसा प्रश्न पूछती हैं जिसका उत्तर प्रभु के पास भी नहीं है और प्रभु भी निरुत्तर हो जाते हैं । गोपियां पूछती हैं कि धर्म पालन क्यों करना चाहिए ? उसका उद्देश्य क्या है ? यानी पारिवारिक धर्म और सांसारिक धर्म के पालन का उद्देश्य क्या है ? गोपियां ही फिर उत्तर देती हैं कि इसका उद्देश्य प्रभु की प्रसन्नता है, यही इसका एकमात्र उद्देश्य है । |
| 377. |
गोपियां पूछती हैं कि जो पारिवारिक और सांसारिक धर्म का उद्देश्य भगवत् प्रसन्नता है, वे ही भगवान अभी हमारे सामने खड़े हैं । तो साध्य यानी प्रभु सामने खड़े होने पर साधन यानी धर्म की क्या आवश्यकता है । |
| 378. |
जब प्रभु मिल गए तो गोपियां पूछती हैं कि अब हमें सांसारिक और पारिवारिक धर्म निभाने की आवश्यकता क्या है ? यह गोपियों का प्रश्न है जिसका जवाब प्रभु के पास भी नहीं है क्योंकि सत्य यही है कि प्रभु मिलने के बाद किसी धर्म की कोई आवश्यकता नहीं होती । |
| 379. |
जिसके ऊपर प्रभु कृपा करते हैं बिना पढ़े उसके भीतर ज्ञान का उदय हो जाता है जैसे गोपियों में हुआ । |
| 380. |
गोपियों ने कोई धर्मशास्त्र नहीं पढ़ा पर इतना सच्चा ज्ञान उन्होंने प्रभु के सामने प्रकट किया कि जब साध्य यानी प्रभु मिल गए तो फिर साधन की आवश्यकता कहाँ रह गई । |
| 381. |
प्रभु ने जब श्रीरास से पहले गोपियों से कहा कि वापस चली जाओ, इतनी रात में क्यों आई हो तो गोपियां कहती हैं कि हमारे जो पैर हैं वे हमारी बात नहीं मानते यानी जाने हेतु वे उठते ही नहीं हैं । |
| 382. |
गोपियां कहती हैं कि प्रभु ने जादू कर दिया । वे प्रभु को सीधा जादूगर कहती हैं कि जादू से चुराई हुई वस्तु यानी गोपियों का चित्त प्रभु के पास है, वह वापस लौटा दो । |
| 383. |
गोपियां प्रभु से कहती हैं कि हमारा जो मन है उसे आपने चुरा लिया है । हम रोटी सेकते हुए तवे पर रोटी जलते हुए देखकर भी रोटी को उतारना भूल जाती हैं । भगवती यमुना माता में जल भरने जाती है तो नीला जल देखकर आपकी याद आने लगती है और वहाँ बैठकर हम रोने लगती हैं और जल लाना भूल जाती हैं । |
| 384. |
गोपियां प्रभु से कहती हैं कि कुछ ऐसी कृपा कर दो कि हम गोपियां आपको दिन में कुछ समय के लिए तो भूल जाएं । आपकी याद को कुछ समय के लिए भूल कर हम अपने संसार का काम तो कर लें । |
| 385. |
प्रभु हम आपको भूले नहीं, ऐसा ऋषि और संत प्रार्थना करते हैं पर गोपियां उल्टा प्रार्थना करती हैं कि प्रभु ऐसी कृपा करें कि कुछ समय के लिए हम आपको भूल जाएं । |
| 386. |
प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि गोपियां कितनी श्रेष्ठ हैं, ऋषि और संत से भी कि ऋषि और संत प्रभु को याद रखने का प्रयास करते हैं और प्रभु याद में नहीं आते । गोपियां प्रभु को भूलने का प्रयास करती हैं और प्रभु याद से जाते नहीं । यह कितना बड़ा फर्क है । |
| 387. |
गोपियां कहती हैं प्रभु से कि इतना तो बता दें कि एक बार आपके सम्मोहन में आने के बाद कोई आज तक छूटा है क्या ? फिर हम कैसे छूटने की आशा कर सकती हैं । |
| 388. |
पूरे बृजमंडल की बात ही नहीं, सारे त्रिलोकी में ऐसा कोई नहीं जो प्रभु के सम्मोहन से छूट गया हो । गोपियां कहती हैं प्रभु से कि हम स्त्री-पुरुष की नहीं, पशुओं की हालत भी देखें कि मोर, हिरण, गौ-माता सब अपने को भूलकर प्रभु सम्मोहन में बांसुरी सुनते हैं । |
| 389. |
प्रभु जब श्रीरास का प्रस्ताव रखते हैं तो गोपियां तुरंत उसके लिए तैयार हो जाती है और पहला श्रीरास शुरू होता है । |
| 390. |
श्रीरास में प्रभु अति सुंदर नृत्य करते हैं, गोपियां भी नृत्य करती है और श्रीरास की शुरुआत हो जाती है । |
| 391. |
गोपियों से एक गलती हो गई कि गोपियों को लगा कि हम इतनी श्रेष्ठ हैं कि प्रभु को हमारे साथ नृत्य करने का मन हो गया क्योंकि हम कुछ खास हैं । गोपियों को देखना चाहिए था कि प्रभु की कृपा और प्रभु की करुणा के कारण प्रभु ऐसा कर रहे हैं । |
| 392. |
गोपियों को लगा कि हम कुछ खास हैं जिस कारण प्रभु आतुर हुए हमारे साथ नृत्य करने के लिए । अहंकार का एक कण आया और परिणाम यह हुआ कि प्रभु अंतर्ध्यान हो गए । |
| 393. |
प्रभु को अत्यंत प्रिय गोपियां हैं और प्रभु कृपा मूर्ति हैं । प्रभु की कृपा करने की रीति है फिर भी प्रभु अहंकार नहीं सहते । |
| 394. |
जब प्रभु श्रीरास में मध्य से अंतर्ध्यान हो गए गोपियां अत्यंत व्याकुल हो गई, चीखने लगी और इधर-उधर दौड़ने लगी और कहा कि प्रभु को खोजना है । एक वन से दूसरे वन पूरी रात खोजती रहीं, बहुत पुकार की पर प्रभु नहीं मिले । |
| 395. |
जब प्रभु श्रीरास में मध्य से अंतर्ध्यान हो गए तो गोपियों को जब प्रभु नहीं मिले तब एक गोपी प्रभु बन गई और प्रभु की श्रीलीला का अनुसरण करने लगी । |
| 396. |
जब प्रभु श्रीरास में मध्य से अंतर्ध्यान हो गए तो गोपियां वृक्षों से पूछती, भगवती तुलसी माता से पूछती कि प्रभु आपको तो जाते वक्त स्पर्श करके गए होंगे, प्रभु कहाँ गए हैं, हमें बताओ । |
| 397. |
जब प्रभु श्रीरास में मध्य से अंतर्ध्यान हो गए तो गोपियां पूरी रात प्रभु को खोजती रही, नाम जप करके पुकारती रही और प्रभु की श्रीलीला करते हुए वन में चलती रही । |
| 398. |
गोपियों को प्रभु के श्रीकमलचरण के श्रीचिह्न दिखाई दिए । प्रभु के श्रीचिह्न की रज को लेकर उन्होंने मस्तक पर लगाया और श्रीचिह्न को प्रणाम करके उनका दर्शन किया । |
| 399. |
गोपियों ने फिर देखा कि प्रभु के दो श्री कमलचरण नहीं, चार श्री कमलचरणों के श्रीचिह्न हैं । गोपियों ने कहा कि हमारे बीच से प्रभु किसी को ले गए वही सच्ची आराधिका है यानी आराधना करने वाली, सच्ची सेवा करने वाली है और वे श्रीजी भगवती राधा माता हैं । |
| 400. |
संपूर्ण श्रीरास समाधि शास्त्र है यानी समाधि अवस्था में संत इसका अनुभव लेते हैं । |
| 401. |
प्रभु जिन जीव पर कृपा करते हैं तो उनकी क्षमताओं को बहुत बढ़ा देते हैं । |
| 402. |
प्रभु के कृपा पात्र थोड़े ही जीव होते हैं जिनके भीतर असाधारण क्षमता और प्रतिभा का जागरण होता है । अगर जीव को लगे कि यह मेरा पुण्य या पुरुषार्थ है तो यह गलत है क्योंकि यह सिर्फ प्रभु कृपा से ही संभव होता है । |
| 403. |
गोपियों के अहंकार की श्रीलीला का सूत्र यह है कि जब भी जीव का ध्यान प्रभु से हटकर खुद की ओर आया तो हम प्रभु से दूर हो गए क्योंकि हमारी भाव समाधि टूट गई और श्रीरास भंग हो गया । |
| 404. |
प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि कभी भी अपनी और ध्यान नहीं जाने देना चाहिए, ध्यान हमेशा प्रभु की तरफ ही रखना चाहिए । |
| 405. |
गोपियों ने प्रभु को कठोर वचन कहे जब प्रभु ने उन्हें श्रीरास से पहले वापस जाने के लिए कहा तो भी प्रभु ने उसे सह लिया पर एक बात प्रभु नहीं सहते जो कि अहंकार है । अहंकार हमारे में जागृत हुआ तो प्रभु तुरंत अंतर्ध्यान हो जाएंगे । |
| 406. |
अकेली श्रीजी भगवती राधा माता को लेकर प्रभु गए तो माता को भी लगने लगा कि मैं भी कुछ विशेष हूँ । इतनी सारी गोपियां प्रभु की सेवा करना चाहती हैं पर उन सब को छोड़कर प्रभु मेरे साथ आ गए । श्रीजी भगवती राधा माता भी श्रीलीला करके यह दिखाना चाहती हैं कि प्रभु किसी का भी अहम स्वीकार नहीं करते । श्रीजी भगवती राधा माता को कभी अहम हो ही नहीं सकता । फिर भी जगत मंगल के लिए सबको संदेश देने के लिए श्रीजी भगवती राधा माता अपना दृष्टांत देकर भी यह बताना चाहती है कि अहम कभी भी प्रभु को स्वीकार नहीं है । |
| 407. |
प्रभु के लिए श्रद्धा निर्माण करना और उससे भी बड़ा श्रद्धा को स्थाई बनाकर रखना सबसे जरूरी है । |
| 408. |
गोपियों में दो गुट बन गए । एक कहती कि प्रभु माता की सेवा करते हैं । दूसरी कहती कि माता प्रभु की सेवा करते हैं । आज भी श्रीबृज में दो गुट हैं । श्रीबरसाने वाले मानते हैं कि प्रभु माता की सेवा करते हैं और श्रीनंदगांव वाले मानते हैं कि माता प्रभु की सेवा करती हैं । संत विनोद में कहते हैं इस प्रश्न को प्रश्न ही बने रहने देना चाहिए । इसका उत्तर कभी तलाशना नहीं चाहिए । |
| 409. |
एक संत से पूछा तो वे विनोद में बोले कि मैं तो फुटबॉल की तरह हूँ । प्रभु लुढ़का देते हैं माता की तरफ और माता लुढ़का देती है प्रभु की तरफ और मैं निरंतर श्यामा-श्याम कहता रहता हूँ । यही भक्ति की मौज है, यह श्रेष्ठतम भक्ति के लक्षण हैं । |
| 410. |
संतों ने बृजवासियों को इतना बड़ा मान दिया है कि उन्होंने कहा है कि सबके गुरु संन्यासी और संन्यासी के भी गुरु बृजवासी । इतना मान बृजवासियों को प्रभु और माता के कारण मिला । |
| 411. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं और श्रेष्ठतम उपमा देते हैं कि कौन बड़ा - श्रीकृष्ण या श्रीजी राधा रानी । संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि पहले यह तो देख लो कि वे दो हैं या वे एक ही हैं । दो होने की श्रीलीला करते हैं पर जैसे लहर और सागर दो दिखते हैं पर कुछ क्षण में लहर सागर बन जाती है और सागर से मिलकर एकरूप हो जाती है, यही स्थिति प्रभु और माता की है । |
| 412. |
श्रीजी भगवती राधा माता ने जब अहम होने की श्रीलीला करी सबको बताने के लिए कि प्रभु को अहम स्वीकार नहीं है तो प्रभु अंतर्ध्यान हो गए । इतने में सब गोपियां प्रभु को खोजती हुई माता के पास पहुँच गई । फिर सभी गोपियों ने और श्रीजी भगवती राधा माता ने सबको दिखाने के लिए अपनी गलती का अनुभव किया । फिर श्रीरास का सबसे महत्वपूर्ण विरह पर्व में प्रभु के लिए विरह पीड़ा गाई गई । |
| 413. |
जहाँ संसार के सभी विरोधाभास विलीन हो जाते हैं वे प्रभु श्री कृष्णजी ही हैं । |
| 414. |
जो विरह पर्व में विलाप किया गया वह अदभुत है । संतों की समाधि लग जाती है । संसार में ऐसा विलाप कहीं नहीं मिलेगा । जो विरह पर्व में मिलेगा, श्रीमद् भागवतजी महापुराण का यह विरह गीत, वह संसार के सभी विरह गीत का शिरोमणि यानी मुकुटमणि है । |
| 415. |
आध्यात्मिक होने का मतलब यह नहीं है कि हम घर बार छोड़कर दूर चले जाएं । धर्म का मूल यानी अध्यात्म हमारे जीवन की बुनियाद में समा जाए । |
| 416. |
ऐसा नहीं कि मंदिर गए तो सात्विक हो गए और मंदिर से बाहर आए तो गलत बन गए । यह भारतीय परंपरा नहीं है । हर समय आध्यात्मिक रहना यह मूल भारतीय सिद्धांत है । |
| 417. |
सदैव आध्यात्मिक रहने से अंत समय भी आध्यात्मिक रहा जाएगा और मनुष्य अंत में इस कारण मोक्ष को प्राप्त कर लेगा । |
| 418. |
हमारे ऋषियों ने पूरे जीवन का ऐसा प्रबंधन किया है कि जीवन के अंत तक भी प्रभु तक पहुँचा जा सकता है । |
| 419. |
सब कुछ त्याग कर वन में जाकर बैठने का भारतीय सिद्धांत कभी नहीं रहा है । |
| 420. |
मोक्ष जीवन के अंत में नहीं, मोक्ष जीवन रहते ही मिल जाए, यह भारतीय परंपरा रही है । |
| 421. |
गृहस्थ आश्रम शौक, मौज-मस्ती के लिए नहीं है । सभी आश्रमों में गृहस्थ आश्रम को सबसे उत्तम माना गया है यदि उसमें परमार्थ किया जाए । |
| 422. |
गृहस्थ आश्रम उसका श्रेष्ठ जिसने अपने घर को आश्रम रूप में मानकर उसे पवित्र रखा है । |
| 423. |
देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण और समाज ऋण चुकाए बिना मोक्ष नहीं मिलता, यह भारतीय मान्यता है । |
| 424. |
कर्तव्य प्रथम यह भारतीय सिद्धांत रहा है पर सबसे बड़ा और परम कर्तव्य प्रभु की भक्ति है । |
| 425. |
प्रभु मार्ग पर यानी भक्ति करने वाले पर कोई भी देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण और समाज ऋण नहीं बचता । सभी ऋण से वह जीव स्वतः ही मुक्त हुआ माना जाता है । |
| 426. |
प्रभु गृहस्थ आश्रम हेतु कहते हैं कि काम यानी कामना मेरी विभूति है पर उसका पुरुषार्थ धर्म के अनुकूल होना चाहिए । |
| 427. |
कामना को धर्म से नियंत्रित रखना अति आवश्यक है । |
| 428. |
शास्त्रों की भावना होती है कि धन कमाना चाहिए पर उसे सत्कर्म में लगाना चाहिए । इससे समाज का ऋण चुकता है । अपने लिए कमाएं, अपने परिवार के लिए कमाएं और देश और समाज को भूल गए, यह बिलकुल गलत है । |
| 429. |
जो धर्म, देश और समाज के लिए कुछ भी नहीं करता, श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु उन्हें चोर कहते हैं । |
| 430. |
हमें अपनी संपत्ति को उतनी ही अपनी माननी चाहिए जितना कपड़ा हमें पहनने के लिए चाहिए और जितना हमारे पेट में डालने के लिए अन्न चाहिए । हमारा बस इतना ही है, यह भारतीय सिद्धांत रहा है । इससे ज्यादा जो कुछ भी प्रभु ने दिया है उसे देश और समाज के सेवा के लिए काम में लेना चाहिए । |
| 431. |
हमारे पास कोई दूसरा मकान है तो उसे शास्त्र कहते हैं कि अपना नहीं मानना चाहिए, वह संपत्ति देश की, समाज की है और अगर विपदा के समय संभालने हेतु किसी को उसकी जरूरत पड़े तो उसका उपयोग करना चाहिए, यह भारतीय सिद्धांत रहा है । |
| 432. |
धन की उपेक्षा, धन की आलोचना कहीं नहीं मिलेगी शास्त्रों में बल्कि प्रभु से धन की याचना की गई है । भारतीय शास्त्रों में यह अतिरिक्त धन सेवा हेतु, किसी सत्कर्म में लगाने हेतु उपयोग में लेने की बात कही गई है । |
| 433. |
जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के ताप से मेघ बनकर पानी ऊपर गया, अगर मेघ ने विचार किया कि पानी तो हमारे पास आ गया, अब यह हमारी संपत्ति हो गई, तो यह गलत है । मेघ का काम है जहाँ पानी नहीं वहाँ उसे बरसा दें तभी नया पानी प्रभु श्री सूर्यनारायणजी ऊपर भेजेंगे । |
| 434. |
ब्रह्मचारी और संन्यासी गृहस्थ से लेकर खाते हैं, यह भारतीय व्यवस्था शुरू से रही है । इसलिए गृहस्थ के ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है । |
| 435. |
ब्रह्मचारी बालक के लिए पढ़ना सबसे जरूरी है । पढ़ाई के समय कमाई हेतु उस पर भार नहीं आए, उसका भार गृहस्थ पर क्योंकि उसको स्वतंत्रता से पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने हेतु यह आधार शास्त्रों ने दिया है । |
| 436. |
भारतीय बच्चे बिना कमाई की चिंता करके पढ़ते हैं, जब तक पढ़ाई हो रही है तब तक बच्चे पर कमाने का दायित्व नहीं है । वह माँ-बाप की जिम्मेदारी होती है । इसलिए भारतीय छात्र आज भी विदेशी छात्रों से आगे हैं क्योंकि विदेशी बच्चों को अठारह वर्ष के बाद खुद ही कमाना पड़ता है । |
| 437. |
स्त्रीधन को उस स्त्री का पति भी हाथ नहीं लगा सकता है, यह भारतीय परंपरा रही है । |
| 438. |
जीविका का कार्य यानी कमाने का कार्य पुरुषों का, जीवन के अन्य कार्य महिलाओं को सौंपा गया है । खाना, कपड़ा, घर की अन्य व्यवस्था रखनी, बच्चे पालना यह सब काम महिलाओं की जिम्मे शास्त्रों ने दी है । |
| 439. |
यह भारतीय परंपरा नहीं रही है कि पत्नी को काम करने हेतु यानी कमाने के लिए भेजना । महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखकर शास्त्रों ने ऐसा प्रावधान बनाया है । |
| 440. |
अब हमारा ध्यान घर में ज्यादा-से-ज्यादा कमाने वाले सदस्यों के ऊपर हो गया है । इसलिए घर के ज्यादा-से-ज्यादा लोग कमाने वाले हो गए हैं । पहले घर की आमदनी कम रखी जाती थी जिससे एक आदमी की कमाई पर घर चल जाता था पर आज के परिवार में छह कमाने वाले, दूसरे परिवार में तीन कमाने वाले, ऐसी व्यवस्था हो गई है जिसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है कि परिवार टूट रहे हैं । |
| 441. |
पहले व्यापार को बदलना गलत माना गया था । अगर आपका व्यापार किराने की दुकान का है तो उसे आप बढ़ा सकते हैं, उससे धन कमा सकते हैं पर दूसरा व्यापार खोलना मान्य नहीं था । कपड़े का व्यापारी कपड़े के ही व्यापार को बढ़ा सकता है और उसे फैला सकता है । सूत्र यह था कि इससे समाज का संरक्षण होता था । हर व्यक्ति फले फूले, यह समाज का उद्देश्य होता था । |
| 442. |
यह भारतीय परंपरा रही है कि सबको सब काम करने के लिए आजादी नहीं थी । ऐसा नहीं करने का दुष्परिणाम आज यह हुआ कि कुछ लोगों ने सब कुछ को संग्रहीत कर लिया और बाद बाकी लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए । |
| 443. |
भारतीय ऋषियों ने पूरे विश्व, पूरे समाज के सुखी होने की कामना की है । |
| 444. |
घर के मालिक को घर के सदस्य और नौकर चाकर के भोजन के बाद भोजन का अधिकार है । उसके बाद उसकी पत्नी को भोजन करने का अधिकार है । कितनी सुंदर भारतीय व्यवस्था थी । |
| 445. |
घर के नौकर को सर्वप्रथम व्यक्ति माना गया है और घर का सदस्य माना गया है न कि नौकर माना गया है, यह भारतीय परंपरा रही है । |
| 446. |
भिक्षा मांगने वाले को घर का चूल्हा ठंडा हो जाए तब भिक्षा हेतु जाने का आग्रह शास्त्रों में किया गया है । इससे उसके लिए कुछ बनाने की जरूरत नहीं पड़ती, जो बन चुका है उसमें से ही उसको भिक्षा दिया जाता था । |
| 447. |
गृहस्थ आश्रम त्यागकर वानप्रस्थ आश्रम में कब जाएं ? उस समय जाएं जब पोते का जन्म हो जाए, यह भारतीय परंपरा रही है । |
| 448. |
कोई पति-पत्नी, भाई-भाई, माँ-बेटा नित्य साथ नहीं रहते । हमारा मृत्यु लोक में मिलन एक प्रवास के मिलन जैसा है । जैसे ट्रेन में दो-तीन यात्री मिले, बातचीत करते हैं, साथ खाते हैं और अपने-अपने गंतव्य पर एक दूसरे से विदा ले लेते हैं और उतर जाते हैं । वैसे ही संसार की गाड़ी में पति-पत्नी, भाई-भाई, माँ-बेटा का संबंध है, साथ रहे, साथ खाया-पिया और फिर मृत्यु के समय अलग हो गए, एक दूसरे से विदा ले लिया । मृत्यु शैय्या पर पत्नी पति को वैसे विदा करती है जैसे ट्रेन के एक स्टेशन पर एक यात्री दूसरे यात्री को विदा करता है । |
| 449. |
भारतीय परंपरा में पति-पत्नी का सात जन्मों का साथ इसलिए कहा गया है जिससे इतना प्रेम हो जाए पति-पत्नी में कि कम-से-कम इस जन्म में तो झगड़ा किए बिना वे जन्म बिता सकें । |
| 450. |
मार्ग में मिले राही जैसा मानकर हमारी परिवार, संबंधियों से आसक्ति कम करनी चाहिए और वह आसक्ति प्रभु के लिए जागृत करनी चाहिए । |
| 451. |
नैतिकता से अर्जित धन से किया यज्ञ और कर्मकांड श्रेष्ठ होता है । |
| 452. |
अनैतिक धन से किया सत्कर्म इतना लाभकारी नहीं होता । |
| 453. |
हमें हरदम सादे कपड़े धारण करने चाहिए, इससे जीवन सात्विक रहता है । |
| 454. |
जो सात्विक खाना मिल जाए उसी में हमें संतोष मानना चाहिए, गरिष्ठ खाने से सदैव बचना चाहिए । |
| 455. |
शरीर को स्वस्थ रहने के लिए शास्त्रों में बताया गया है कि जवानी में जमीन पर गद्दा या कंबल बिछाकर सोना चाहिए । |
| 456. |
स्वाभाविक रूप से गर्मी और सर्दी को सहन करना सीखना चाहिए । रोज का जीवन तपोमय होना चाहिए । |
| 457. |
ठंडी और गर्मी का विचार ज्यादा मन में नहीं करना चाहिए । सर्दी या गर्मी जो प्रकृति से मिल रही है उसमें संतोष करना सीखना चाहिए । |
| 458. |
उम्र आने पर वानप्रस्थी बन जाने की आवश्यकता है, इसका विशेष आग्रह हमारे शास्त्रों में किया गया है । |
| 459. |
वानप्रस्थी नहीं बन सके, बाहर जाने की जगह नहीं तो घर पर ही वानप्रस्थ की व्यवस्था करके रहना चाहिए । यह भारतीय परंपरा में छूट है । घर में कैसे रहे ? मेहमान की तरह निवास, भोजन की जो भी व्यवस्था मिले उसे स्वीकारें । वानप्रस्थी को घर में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए । |
| 460. |
जैसे मेहमान से अपेक्षा होती है कि वह घर के व्यवहार में हस्तक्षेप नहीं करें, मेहमान को व्यवस्था का लाभ लेना चाहिए पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए वैसे ही वानप्रस्थी को अपने बेटे-बहू के कर्तव्य के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए । |
| 461. |
वानप्रस्थ में जाने के बाद हमें सेठ या सेठानी का भाव मन से त्याग देना चाहिए । अभी हमारे मन में भाव होता है कि हमसे पूछे बिना और हमारी आज्ञा के बिना कोई काम नहीं होना चाहिए । यह भाव का त्याग होना चाहिए तभी सच्चे वानप्रस्थी हम बन पाएंगे । |
| 462. |
जब जीवन में कुछ गलत हो तो प्रभु के पास बैठना चाहिए और प्रभु से कहना चाहिए कि कृपा करके सब ठीक कर दें । प्रभु सब ठीक कर देंगे । |
| 463. |
जैसे मेहमान को घर के नफा-नुकसान का कोई प्रभाव नहीं होता है वैसे ही बेटे-पोतों के नफा-नुकसान का कोई परिणाम वानप्रस्थी पर नहीं होना चाहिए । |
| 464. |
सच्चे वानप्रस्थी को अपने परिवार में हुए नुकसान पर दुःख का नाटक करना चाहिए और नफा पर खुशी का नाटक करना चाहिए । सिद्धांत यह है कि वानप्रस्थी को दुनियादारी से कोई काम नहीं होना चाहिए, सिर्फ प्रभु से ही काम होना चाहिए । |
| 465. |
भगवत् कृपा होने पर ही हम अपने आश्रम धर्म का सही रूप में पालन कर सकेंगे । |
| 466. |
व्यक्ति को जीवन में कभी भी आग्रही नहीं होना चाहिए । बच्चा गलत करता है, पिता होने के नाते फर्ज है कि उसे समझाया जाए । बच्चा माने तो ठीक, नहीं माने तो ठीक । फिर गलती करे फिर अपनी राय दें नहीं माने तो प्रभु को अपना प्रयास अर्पण कर दें । |
| 467. |
आग्रही बनेंगे तो हम फंसेंगे, बिना आग्रह रखने वाला व्यक्ति ही सदैव सुखी रहता है । |
| 468. |
प्रभु को अपना केंद्र बनाकर सब व्यवहार करना चाहिए । |
| 469. |
सेवानिवृत्ति के बाद अपनी रुचि के अनुसार भगवदीय और सामाजिक सेवा का काम लेना चाहिए और अपना समय उसमें लगाना चाहिए । किसी भी सात्विक काम में अपने समय का दान करना चाहिए, यह सबसे बड़ा दान होता है । |
| 470. |
अपने लिए धन कमाए, अपने लिए पुण्य कमाए, अपने परिवार के लिए कीर्ति कमाई पर प्रभु सेवा के लिए कुछ भी नहीं किया, तो गलत है । हमें प्रभु सेवा के लिए धर्म और सनातन संस्कृति के लिए काम करना चाहिए जिसमें न आर्थिक लाभ, न सम्मान की इच्छा होनी चाहिए । केवल और केवल प्रभु सेवा के लिए धर्म और सनातन संस्कृति के लिए काम करना चाहिए । |
| 471. |
निस्वार्थ सेवा करके देखना चाहिए, भीतर से कितना आनंद की अनुभूति हमें होती है । |
| 472. |
बूढ़ा व्यक्ति घर पर रहता है तो बहू को नहीं भाता, दुकान पर जाकर बैठता है तो पुत्र को अच्छा नहीं लगता, तो उसे क्या करना चाहिए ? शास्त्र कहते हैं उसे अपना समय प्रभु को देना चाहिए । |
| 473. |
हम काम करते रह जाएंगे तो नई पीढ़ी तैयार कैसे होगी ? शर्त यह है कि नई पीढ़ी में अच्छे संस्कार के बीज बोने पड़ेंगे और फिर हमें उन पर कार्य का भार डालना पड़ेगा । |
| 474. |
ब्रह्मचर्य का उपयोग शिक्षा हेतु होना चाहिए, गृहस्थ का उपयोग सात्विक द्रव्य कमाने हेतु होना चाहिए, वानप्रस्थ का उपयोग समाज के लिए होना चाहिए और संन्यास का उपयोग केवल प्रभु के लिए होना चाहिए । |
| 475. |
संन्यास अवस्था में और कुछ भी नहीं, न धन, न परिवार, न समाज, कुछ भी नहीं होना चाहिए । सिर्फ और सिर्फ प्रभु ही होने चाहिए । |
| 476. |
जब हम प्रभु मार्ग पर वानप्रस्थ या संन्यास में चलते हैं पत्नी भावुक हो जाती है, बहू पोते को गोदी में दे देती है । ऐसा इसलिए होता है कि माया उस जीव को रोकने का प्रयास करती है क्योंकि प्रभु मार्ग में चलने वाला देवताओं से भी ऊँचा हो जाता है । |
| 477. |
जब हम प्रभु मार्ग पर पैर रख देते हैं और प्रभु मार्ग पर चलने लगते हैं तो प्रभु तत्व हमारे भीतर जागृत हो जाता है । |
| 478. |
भारतीय परंपरा बूढ़े-से-बूढ़े और नए-से-नए संन्यासी को प्रणाम करने की है क्योंकि उन्होंने प्रभु मार्ग को चुना है । उन्होंने सिर्फ और सिर्फ प्रभु को अपने जीवन में चुन लिया है इसलिए वे बहुत सम्मान योग्य हैं । |
| 479. |
मौन को शास्त्रों में एक बहुत आवश्यक गुण माना गया है । अनावश्यक बोलना बंद करना बहुत ही लाभदायक होता है । |
| 480. |
मननशील व्यक्ति को शास्त्रों में बड़ा महत्व दिया गया है । शास्त्रों के वचन और ऋषि वचनों का आंतरिक चिंतन हमारा होना चाहिए, ऐसा धर्म हमें आदेश करता है । |
| 481. |
सत्य बोलने का शास्त्रों में बहुत बड़ा महत्व बताया गया है । जो वाणी सत्य बोलती है वही आदर योग्य है, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 482. |
चित्त को एकाग्र करके प्रभु में लगाना चाहिए, इसका शास्त्र आदेश कहते हैं यानी मन को ऐसा बनाना चाहिए कि वह प्रभु में एकाग्र हो । |
| 483. |
शास्त्र के अनुसार जो जीवन नहीं जीता वह एक ढोंगी ही है क्योंकि वह मनमाना जीवन जीता है । |
| 484. |
प्रभु का चिंतन, यही भक्ति करने वाले साधक के जीवन का एकमात्र सत्य होता है । |
| 485. |
मुँह से निकलने वाला हर वाक्य सत्य से धुला हुआ होना चाहिए, इसका निरंतर हमें ध्यान रखना चाहिए । |
| 486. |
अपने जीवन की समीक्षा करते हुए हमें जीवन में चलना चाहिए । |
| 487. |
अपने जीवन में लिए हुए प्रभु के नियम और व्रत का पालन करना चाहिए । |
| 488. |
जब भी हम किसी मार्ग को चुनते हैं तो हमें यह देखना चाहिए कि यह प्रभु का मार्ग है क्या ? कहीं मैं प्रभु के मार्ग से भटक तो नहीं रहा हूँ । |
| 489. |
शास्त्र कहते हैं कि जीवन की व्यवस्था में ही केवल मन को नहीं लगाना चाहिए बल्कि मन को प्रभु में लगाना चाहिए । |
| 490. |
अगर हम दस दिन का उपवास रखते हैं और फिर पांचवें-छठे दिन हम चर्चा शुरू कर देते हैं कि जिस दिन उपवास खुलेगा उस दिन क्या बनेगा, क्या-क्या मैं खाऊँगा तो वह उपवास सफल नहीं है क्योंकि उपवास के समय हमारा चिंतन प्रभु का होना चाहिए । साधन का विचार नहीं करना चाहिए जिससे हम साध्य को ही भूल जाएं । |
| 491. |
वानप्रस्थी और संन्यासी का जीवन केवल और केवल प्रभु के लिए ही होना चाहिए । |
| 492. |
संन्यासी धर्म का जो पालन करता है, वह सर्वोच्च है क्योंकि सभी शास्त्र उसके सामने गौण हो जाते हैं । अगर वह प्रभु को नहीं भूलता है तो सभी शास्त्र उसे अपने बंधन से मुक्त कर देते हैं, अपने नियम से मुक्त कर देते हैं । सत्य यह है कि वह प्रभु को नहीं भूले क्योंकि शास्त्रों का काम ही है कि प्रभु को जीव नहीं भूले, ऐसी चर्या जीवन में बना देनी । |
| 493. |
एकांतवास एक बहुत महत्वपूर्ण नियम है । |
| 494. |
हिंसा भूलकर भी नहीं करनी चाहिए, इसका हर समय ध्यान रखना चाहिए । |
| 495. |
अंत में जिस स्थिति में पहुँचना है और सभी मनुष्य की यह अंतिम स्थिति होती है कि सभी प्राणियों में भगवत् दर्शन होना शुरू हो जाए । चराचर में प्रभु व्याप्त हैं इस स्थिति का जीवन में प्रतिपादन हो जाए । |
| 496. |
प्रभु कहते हैं कि प्रभु की अमृतमय कथा का श्रवण करना चाहिए, तब तक जब तक जीवन का अंत नहीं होता । |
| 497. |
प्रभु कहते हैं कि जीवन में प्रभु के मंगल नाम का कीर्तन करना चाहिए, इससे अमंगल का नाश होता है । |
| 498. |
प्रभु कहते हैं कि निष्ठा पूर्वक रोज थोड़ी-थोड़ी प्रभु की पूजा जरूर करनी चाहिए । दो फूल चढ़ाना भी पूजा है, प्रभु को साष्टांग दंडवत प्रणाम करना भी पूजा है । |
| 499. |
रोज कोई-न-कोई स्तोत्र का पाठ प्रभु को सुनाना चाहिए, इससे प्रभु को प्रसन्नता होती है । |
| 500. |
प्रभु की परिचर्या का आदर होना चाहिए । शुद्ध जल से स्नान, दूध, शुद्ध फल, पूजा के अंतर्गत सेवा में लेना चाहिए । मंदिर की परिचर्या का कोई भी कार्य जैसे झाड़ू लगाना, सफाई रखना हमें स्वयं करना चाहिए और करते हुए हमें अच्छा लगना चाहिए । नहीं तो जो कर रहा है उसको ऐसा करने की प्रेरणा देनी चाहिए और उसका आदर करना चाहिए । |
| 501. |
दिन में कई बार प्रभु को साष्टांग दंडवत प्रणाम जरूर करना चाहिए । अनंत कोटि के ब्रह्मांड के नायक प्रभु को प्रणाम कर रहा हूँ, यह भूमिका होनी चाहिए । एकदम जमीन पर लेट कर पूरी तरह से साष्टांग दंडवत प्रणाम करना चाहिए । |
| 502. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त की सेवा को मैं बहुत अच्छा पाता हूँ । जब भी कोई भक्त के बारे में प्रभु से बोलता है संत श्री एकनाथजी कहते हैं कि प्रभु मग्न होकर सुनने लगते हैं । |
| 503. |
प्रभु कहते हैं कि सबमें मुझे देखो और भगवत् दर्शन सबमें करना सीखना चाहिए । |
| 504. |
प्रभु कहते हैं कि हर काम करते वक्त एक विचार लाना कि यह मैं प्रभु के लिए कर रहा हूँ, चाहे वह घर में झाड़ू का काम क्यों न हो, सफाई मैं प्रभु के लिए कर रहा हूँ, यह भाव होना चाहिए । |
| 505. |
बच्चों में अच्छे संस्कार बोलकर बताने से नहीं आते । पवित्र संस्कार वाले व्यक्ति, चाहे वह परिवार के दादा-दादी हो या संत हो, को देखकर ही अच्छे संस्कार आते हैं । |
| 506. |
जीवन में अच्छा देखा जाता है तो अच्छाई ही हमारे भीतर से प्रकट होती है । |
| 507. |
जब कोई बच्चा देखेगा कि मेरे पिताजी से कोई इतना चिढ़ गया फिर भी मेरे पिताजी इतने शांत रहे, यह देखकर बच्चे के मन में पिता के लिए आदर बढ़ेगा और वैसे शांत रहने के संस्कार बच्चे में आएंगे । |
| 508. |
लोगों को सिखाना नहीं चाहिए, स्वयं करके दिखाना चाहिए । दुनिया में जिसको सीखना है वह अपने आप देखकर सीख लेगा । |
| 509. |
बच्चों को बुजुर्गों के अच्छे संस्कारों को देखना का सौभाग्य भी मिलना चाहिए, आज बुजुर्गों को कोई घर पर रखना ही नहीं चाहता । |
| 510. |
अपनी वाणी से प्रभु के गुणों का वर्णन करना चाहिए, प्रभु का गुणानुवाद करना वाणी का सबसे बड़ा धर्म है । |
| 511. |
प्रभु के लिए खर्च करना चाहिए । प्रभु कहते हैं कि मैं मृत्यु पर जीव से पूछूँगा कि उसने मेरे लिए कितना खर्च किया । इसलिए हमें वित्त और समय दोनों का खर्च प्रभु के लिए करना चाहिए । |
| 512. |
जो भी मेरे से हुआ है वह मैं प्रभु को चढ़ा रहा हूँ, प्रभु को समर्पित करने का नियम, अर्पण करने का नियम जीवन में लेना चाहिए । |
| 513. |
प्रभु कहते हैं कि जो मेरी भक्ति के मार्ग पर चलता है मैं (प्रभु) उसको भक्ति प्रदान करता हूँ । |
| 514. |
भक्ति सर्वश्रेष्ठ है और भक्ति अनिवार्य भी है, ऐसा प्रभु का स्पष्ट मत है । |
| 515. |
प्रभु कहते हैं कि भक्ति हो जाए तो सब बात ही खत्म हो गई क्योंकि भक्त मेरा हो गया और मैं (प्रभु) भक्त का हो गया । |
| 516. |
प्रभु की भक्ति में मन पर विजय करनी होती है । उपलब्ध होने पर भी अनावश्यक तत्व का त्याग करना पड़ता है । |
| 517. |
भक्ति के लक्षण होते हैं कि वह जीव अपना कर्म और कार्य प्रभु के लिए करता है । |
| 518. |
गोपियों द्वारा प्रभु की खोज वह खोज है जो साधक के जीवन में भी एक बार प्रभु दर्शन होने के बाद फिर तीव्रता से हर समय होती रहती है । |
| 519. |
मन से, वाणी से, शरीर से हर हलचल प्रभु के लिए होनी चाहिए, यह गोपी भाव है । |
| 520. |
श्रीबृज की साधारण कन्याएं कभी गोपियों को नहीं समझना चाहिए । गोपियों के दर्शन हेतु प्रभु श्री ब्रह्माजी को भी ध्यान लगाना पड़ता है । |
| 521. |
अंतरंग में श्रीकृष्ण भाव से भरा हुआ जो मन है, वह श्रीगोपी का मन है । |
| 522. |
श्री गोपीजन श्रीजी भगवती राधा माता के बीच में बैठकर प्रभु को पुकारती है । यह विरह गीत विश्व का सर्वोत्तम विरह गीत है । |
| 523. |
हर श्रेष्ठ संत ने अपने प्रभु हेतु विरह गीत और छंद लिखे हैं जब प्रभु उन्हें दर्शन देकर अंतर्ध्यान हो जाते हैं । उन सबमें श्री गोपीजन का विरह गीत सर्वश्रेष्ठ है । |
| 524. |
गोपियां प्रभु से विरह गीत में कहतीं हैं कि प्रभु एक बार आँखों के सामने आकर खड़े हो जाएं और एक बार देख तो लें कि आपके विरह में हमारी क्या दुर्दशा हो रही है । |
| 525. |
गोपियां कहतीं हैं कि प्रभु द्वारा जिनको अपनाया जाता है उनकी भूलों को यानी अहंकार आया यह भूल को भी क्षमा कर दिया जाता है । |
| 526. |
गोपियों की खोज की अंतिम वस्तु प्रभु हैं । सूत्र यह है कि हमारे भी जीवन की खोज चलती है पर अंत में हम क्या चाहते हैं, यह हमें देखना है । गोपियों का निर्णय कि उन्हें प्रभु के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए । |
| 527. |
संकटों से निकालने का प्रभु का स्वभाव है, संकट में धकेलना का नहीं है, गोपियां अपने विरह गीत में प्रभु से कहतीं हैं । |
| 528. |
गोपियां प्रभु से कहतीं हैं कि आप अंतर्यामी हैं इसलिए हमारे अंतर में जो विरह की पीड़ा हो रही है उसे आप भांप जाएं । |
| 529. |
गोपियां प्रभु से कहतीं हैं कि इतनी कठोरता तो आपने किसी भी अवतार में नहीं की । हमारी भूल के बाद हमें सजा देने के लिए आप अंतर्ध्यान हो गए और हमारे पुकारने पर भी आप वापस नहीं आ रहे । |
| 530. |
गोपियां प्रभु से कहतीं हैं कि क्यों हमारे चित्त को आपने चुराया, जब हमसे मिलना ही नहीं था । |
| 531. |
गोपियां प्रभु के साथ एक-एक प्रसंग को याद करतीं हैं और विरह में रुदन करतीं हैं । |
| 532. |
प्रभु के लिए अपने कुल, वंश, संबंधियों को बिसार कर गोपियां आई थीं, ऐसा गोपियां प्रभु को याद दिलाती हैं । |
| 533. |
गोपियां कहतीं हैं प्रभु को याद करते हुए कि कृपा करके वन में नहीं घूमिए, हमसे छुपते हुए वन में नहीं घूमिए क्योंकि आपके श्री कमलचरण इतने कोमल हैं कि उनको कठोर भूमि से पीड़ा होगी । |
| 534. |
प्रभु के वियोग में गोपियां डूब गई और उनको विरह में कुछ भी भान नहीं रहा । |
| 535. |
गोपियों की भावना अपने भीतर जागृत होना तो दूर, गोपियों की भावना को हम अपने मानव जन्म में जान भी पाए तो भी हमारा कल्याण हो जाएगा । |
| 536. |
किसी भी साधक को दोष के कारण प्रभु दर्शन देकर जब अंतर्ध्यान हो जाते हैं तो साधक अपने चित्त को कहीं भी टिका नहीं पाता । |
| 537. |
प्रभु को देखने पर फिर साधक की आँखें किसी पर टिकेगी नहीं, प्रभु की वाणी सुनने के बाद फिर कान कुछ सुनना पसंद नहीं करेगा । प्रभु जब अंतर्ध्यान हो जाते हैं तो साधक की आत्मा में अंधकारमय रात्रि हो जाती है क्योंकि संसार भी छूट जाता है और प्रभु भी बिछुड़ जाते हैं । |
| 538. |
प्रभु के दर्शन के बाद सारे संसार की भोग सामग्री उपलब्ध होने पर भी उसमें साधक का मन नहीं लगता । |
| 539. |
हमारा मन भोग पदार्थ में लगता है । भक्तों का मन प्रभु में लगता है, उन्हें भोग पदार्थ में कोई रस नहीं आता । यह कितना बड़ा फर्क है । |
| 540. |
संत कहते हैं कि श्रीगोपी भाव का अनुभव होना असंभव है, उसे समझना भी बहुत कठिन है । |
| 541. |
सच्चे भक्तों को संसार पागल ही मानते हैं क्योंकि वे प्रभु के प्रेम में परम दीवाने होते हैं । |
| 542. |
एक साधारण युवक-युवती का विवाह हुआ । पति कमाने परदेश गया । सावन का महीना था उस युवती को अपने पति की विरह के कारण याद आने लगी और वह रोने लगी । उस युवती की पाँच वर्ष की छोटी बहन पूछती है कि आप क्यों रो रही हो ? युवती कुछ नहीं बता सकती क्योंकि जब वह बहन बड़ी होगी तो खुद विरह का अनुभव करेगी, तभी वह समझ पाएगी । ऐसे ही भक्तों के विरह की अनुभूति शब्दों में साधारण लोग समझ नहीं सकते, समझ नहीं पाते । जब कोई भक्त बनता है तभी समझ पाता है कि प्रभु का विरह क्या होता है । |
| 543. |
संसार के हर संप्रदाय के भक्तों के नेत्र आंसुओं से भरे हुए रहे हैं क्योंकि वे प्रभु के लिए रोमांचित होकर रोते रहते हैं । |
| 544. |
इन विरह के आंसुओं के द्वारा गोपियों ने अपने अहंकार को धो डाला । अहंकार विरह के आंसुओं से ही धुलता है । |
| 545. |
प्रभु अंतर्ध्यान तब हुए जब गोपियों को स्वयं के गुण यानी अहंकार दिखा और प्रभु वापस तब आए जब गोपियों ने विरह में याद करते हुए प्रभु के सद्गुण देखे । |
| 546. |
जीवन का सूत्र यह है कि अपना गुण देखेंगे तो प्रभु चले जाएंगे और प्रभु के सद्गुण देखेंगे तो प्रभु मिल जाएंगे । |
| 547. |
अहंकार का होना समाधि का खुलना है और अहंकार का न होना समाधि का लगना है । |
| 548. |
प्रभु के ज्ञान के बाद भी प्रभु की भक्ति से ही प्रभु से एकाकार होना संभव है । |
| 549. |
संत कहते हैं कि लोगों को लगता है कि योग मार्ग, ज्ञान मार्ग कठिन है पर सबसे कठिन भक्ति मार्ग है क्योंकि यहाँ अहंकार का भी विसर्जन करना होता है । अन्य मार्गों में अहंकार के विलय की जरूरत नहीं होती । |
| 550. |
भक्ति में सबसे बड़ा बलिदान अहंकार का देना पड़ता है । अहंकार रहने पर भक्ति नहीं रहती । |
| 551. |
प्रभु श्री शुकदेवजी को भी गोपियों का रुदन, क्योंकि यह प्रभु प्राप्ति के लिए किया गया रुदन था, बहुत मीठा लगता है । |
| 552. |
उसी का रुदन शोभनीय है जो प्रभु के लिए रोए । जो पत्नी और पदार्थ के लिए रोए वह रुदन बहुत तुच्छ है । |
| 553. |
जन्म-जन्मांतर के साथी प्रभु को मैंने जीवन में पाने का कोई प्रयास नहीं किया, ऐसा मानकर रोने वाला कोई बिरला ही होता है । |
| 554. |
संत श्री रामकृष्ण परमहंसजी रोते थे हर सायं काल की आरती के घंटे पर कि माता मेरे जीवन का एक और दिन बीत गया और तुम अभी तक नहीं मिली । |
| 555. |
जब प्रभु के लिए रुदन अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है तो प्रभु का पुनः प्राकट्य होना अनिवार्य हो जाता है । |
| 556. |
श्रीगोपीजन के रुदन पर प्रभु का श्रीरास में वियोग के बाद पुनः प्राकट्य हुआ । |
| 557. |
श्रीगोपीजन जब प्रभु को वन-वन भटककर खोज रही थीं तो प्रभु नहीं मिले पर जब एक जगह बैठकर रुदन किया तो प्रभु उसी जगह पर पधारे । |
| 558. |
संत श्री तुकारामजी एक सूत्र कहते हैं कि प्रभु को संसार में खोजेंगे तो नहीं मिलेंगे, अपने भीतर भाव से प्रभु को खोजेंगे तभी प्रभु मिलेंगे । |
| 559. |
जो वस्तु अंदर है वह अंदर ही मिलेगी । प्रभु छुपते हैं हमारे अंदर तो प्रकट भी हमारे अंदर से ही होंगे । |
| 560. |
एक संत कहते हैं कि प्रभु कहीं श्रीरास से अंतर्ध्यान नहीं हुए । एक गोपी की चुनरी ओढ़ कर उन्हीं के बीच में थे और देख रहे थे कि मेरे वियोग में कौन कितना भाव से रुदन कर रहा है । फिर जब भाव दिखा तो चुनरी हटा दिए और प्रभु प्रकट हो गए । |
| 561. |
हमारे भीतर भी प्रभु चुनरी ओढ़ कर ढके और छिपे हुए हैं । भक्ति भाव से ही वे प्रकट होते हैं । |
| 562. |
गोपियों का भाव था जब प्रभु नहीं मिले कि प्रभु कब मिलेंगे और जब प्रभु मिल गए तो भाव बदल गया कि प्रभु वापस तो नहीं चले जाएंगे । |
| 563. |
गोपियों का कहना है कि प्रभु भक्ति में रोना-ही-रोना लिखा है पर फिर कहतीं हैं कि संसार के लिए हंसने में वह आनंद नहीं, जो प्रभु के लिए रोने में है । |
| 564. |
भक्तों की सिर्फ दो गति होती है, प्रभु से संयोग और वियोग । संयोग में वियोग तब होता है जब प्रभु से संयोग है और डर इस बात का होता है कि प्रभु कहीं चले तो नहीं जाएंगे । वियोग में संयोग तब होता है जब प्रभु से वियोग है और संयोग की फिर लालसा बनी रहती है कि प्रभु कब मिलेंगे । |
| 565. |
श्रीरास के लिए जो श्री वृंदावनजी का निर्माण प्रभु ने किया वहाँ की श्रीरज मानो रत्नों से भी कहीं अधिक मूल्यवान थी । |
| 566. |
पहले प्रभु एक थे और एक गोपी के साथ श्रीरास हुआ । प्रभु एक-एक करके सबके पास जाते थे । गोपियों को लगा कि हमारे प्रभु हमारे ही पास रहे तो प्रभु ने अनेक रूप धारण कर लिए और अब हर गोपी के साथ एक प्रभु हो गए । |
| 567. |
संत श्रीरास की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि नीलमणि और स्वर्णमणि की जोड़ी बन गई । सांवले प्रभु नीलमणि और गोरी गोपी स्वर्णमणि की जोड़ी । |
| 568. |
श्री चंद्रदेवजी भी छह माह के लिए आगे बढ़ना ही भूल गए और श्रीरास देखने लग गए । देवतागणों की पत्नियाँ विमान से श्रीरास देख रही थी और देवताओं को उन्हें पकड़कर रखना पड़ा नहीं तो वह भी श्रीरास में शामिल होने के लिए आतुर हो उठतीं । |
| 569. |
प्रभु के सद्गुणों की व्याख्या करते हुए वक्ता मौन हो जाते हैं क्योंकि प्रभु सद्गुणों से अतीत जो हैं । |
| 570. |
एक संत से किसी ने पूछा कि श्रीरास हुई थी क्या ? उन्होंने कहा कि हुई थी नहीं, हो रही है और फिर उन्होंने अपने शिष्यों को उसी समय श्रीरास के दर्शन करा दिए । शिष्यों ने देखा कि संत गोपी रूप में प्रभु के साथ श्रीरास में नृत्य कर रहे हैं । |
| 571. |
भक्तों के लिए श्रीरास आज भी चल रहा है और सदैव चलता ही रहेगा । |
| 572. |
दिव्य श्रीरास का चिंतन, मनन और वर्णन करने वाला अपने काम को जीत जाता है और भक्ति ही नहीं परा-भक्ति को प्राप्त करता है । |
| 573. |
श्रीरास प्रभु की काम विजय श्रीलीला है । |
| 574. |
श्रीरास एक अनोखी अंतर्यात्रा है । हमारे भीतर ही श्री वृंदावनजी है और श्रीरास हेतु हमें उसे तैयार करना है । |
| 575. |
अगर श्रीरास प्रभु की काम विजय श्रीलीला नहीं होती तो राजा श्री परीक्षितजी जिनके मृत्यु के तब तीन दिन शेष थे वे नहीं सुनते । प्रभु श्री शुकदेवजी नहीं सुनाते और इतने सारे ऋषिगण-मुनिजन भाव विभोर होकर नहीं बैठे रहते । आज भी संत श्रीरास का गुणगान करते हुए थकते नहीं हैं क्योंकि यह प्रभु की काम विजय श्रीलीला है । |
| 576. |
प्रभु और माता की क्षणिक कृपा हुए बिना यानी क्षण भर की कृपा हुए बिना श्रीरास के दर्शन यानी भाव दर्शन कर पाना असंभव है । |
| 577. |
प्रभु के लिए आकर्षण के बाद गोपियों को अपने घर के काम और परिवार का काम अब महत्वपूर्ण नहीं लगते । उन्हें अब जीवन में सबसे महत्वपूर्ण प्रभु ही लगते थे । |
| 578. |
श्रीरास के बाद गोपियां श्रीरास लीला को नित्य याद करने हेतु उसका गान करती रहतीं थीं । |
| 579. |
श्रीरास के बाद गोपियों को प्रभु के अलावा किसी का भी स्मरण अब नहीं रहता था । |
| 580. |
प्रभु के लीला अवतार में बहुत सारे कार्य बाकी थे इसीलिए श्रीरास का विश्राम हुआ । श्रीलीला में श्रीरास का विश्राम हुआ पर नित्य और अदृश्य रूप से श्रीरास लगातार चल रहा है । |
| 581. |
कंस के बुलावे पर श्री अक्रूरजी की एकदम इच्छा नहीं थी प्रभु को लाने की । दो कारण से वे राजी हो गए । पहला, उन्होंने सोचा कि मेरे पितरों का उद्धार हो जाएगा प्रभु के श्री कमलचरणों के दर्शन मात्र से, जिन्हें ऋषि और संत अपने हृदय में छुपाए रखते हैं । दूसरा, प्रभु को मैं सावधान कर दूँगा कंस की चाल से, उन्होंने सोचा कि मैं नहीं जाऊँगा तो कंस किसी अन्य को भेजेगा और मैं जाऊँगा तो मैं प्रभु को सावधान कर दूँगा, प्रभु के लिए चिंता उनके मन में थी । |
| 582. |
यदि व्यक्ति प्रभु का चिंतन करता है तो जीवन के संध्या काल के पहले भगवत् धाम दिखता है । श्री अक्रूरजी को जब कंस ने कहा तब वे प्रभु का चिंतन कर रहे थे और संध्या काल का समय था और उन्हें श्रीधाम वृंदावन के दूर से दर्शन हो गए । |
| 583. |
श्रीवृंदावन धाम की श्रीरज यानी धूलि कण कितने धन्य हैं जिनके ऊपर प्रभु चले हैं । |
| 584. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों के श्रीचिह्न देखकर श्री अक्रूरजी रथ से कूद पड़े और वे श्रीचिह्नों को दंडवत प्रणाम करने लगे । |
| 585. |
प्रभु के श्रीकमलचरण के श्रीचिह्न भाग्यवान भक्त के जीवन में ही प्रकट होते हैं । |
| 586. |
श्री अक्रूरजी के लिए प्रभु के श्रीकमलचरणों के श्रीचिह्न प्रकट हुए । प्रभु कृपा से ही प्रभु के श्रीचिह्न जीवन में भक्तों को बार-बार दर्शन देते हैं । |
| 587. |
सात्विकता ही धर्म का मूल है, धर्म का स्वरूप है । |
| 588. |
श्री वृंदावनजी की श्रीरज को श्री अक्रूरजी अपने मस्तक पर धारण करने लगे, अपने शरीर में रगड़ने लगे, श्रीरज में लोटने लगे ऐसा सोचकर कि यह मेरे प्रभु के श्रीकमलचरणों की पवित्र रज है । |
| 589. |
प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि मानव जन्म लेकर जो धन प्राप्त करना होता है वह श्री अक्रूरजी ने कर लिया । एक बल ऐसा जो प्रभु को प्राप्त करा कर ही रहता है । यह बल कौन-सा है ? यह प्रभु के लिए भक्ति भाव का बल है । |
| 590. |
प्रभु संपत्ति, बुद्धि, सुंदरता, लोकप्रियता से नहीं रीझते । यह सब बातें भक्त में हो तो ठीक पर भक्ति के मूल में भाव हो तो ही उस भक्त को प्रभु की प्राप्ति होती है । |
| 591. |
प्रभु के लिए नाचने में भाव आया तो उसे दबाना नहीं चाहिए कि लोगों को क्या लगेगा । ऐसा किया तो जन्म के अंत तक प्रभु नहीं मिलेंगे, भाव को प्रकट करने से, भाव को बढ़ाने से ही प्रभु मिलते हैं । |
| 592. |
प्रभु श्री शुकदेवजी ने श्री अक्रूरजी के लिए शब्द प्रयोग किया - महामति । क्यों ? क्योंकि कंस की योजना में सहभागिता का दिखावा किया पर अंतःकरण में प्रभु की सुरक्षा की परम चिंता थी । |
| 593. |
प्रभु कहते हैं कि गोपियों का प्रेम का बंधन बहुत कठोर है । प्रभु सोचते हैं कि कंस को मारने श्री मथुराजी मैं जाना तो चाहता हूँ पर गोपियों का क्या होगा । |
| 594. |
जब गोपियों ने सुना कि प्रभु श्री मथुराजी जाने वाले हैं तो वे सब अपना सारा काम छोड़कर श्रीनंद भवन की तरफ दौड़ी । सबको एक ही चिंता कि प्रभु के बिना जीवन में क्या बचेगा । |
| 595. |
रात्रि के समय श्रीनंद भवन को घेरकर गोपियां बैठ गई कि कहीं रात्रि में प्रभु उन्हें छोड़कर नहीं चले जाएं । |
| 596. |
किसी गोपी के मुँह में शब्द नहीं आए कि प्रभु मत जाओ पर मन में सभी के एक भाव था कि कैसे भी प्रभु रुक जाएं, सच्चा प्रेम यही होता है । |
| 597. |
जिनसे हम प्रेम करते हैं उन पर अपना निर्णय थोपना और उन्हें बाध्य नहीं करना चाहिए पर गोपियों का सच्चा प्रेम था कि निर्णय की स्वतंत्रता उन्होंने प्रभु को दे दी थी । सच्चा प्रेम वह होता है जिसमें प्रभु खुश हों, उसी में खुशी को मानना और स्वीकार करना चाहिए । प्रभु की प्रसन्नता में ही गोपियों ने अपनी प्रसन्नता देखी । |
| 598. |
गोपियों को प्रभु ने कहा कि चार दिन में लौट आऊँगा । गोपियां बोली वियोग के एक-एक दिन एक-एक युग जैसे हमें प्रभु प्रतीक्षा में लगेंगे । |
| 599. |
गोपियों ने कहा कि हमारे नेत्र अब से हमेशा श्री मथुराजी की दिशा में ही देखते रहेंगे और आपके लौटने की प्रतीक्षा करेंगे । |
| 600. |
गोपियां प्रभु के लिए लोक लज्जा छोड़ने वाली, कुल की मर्यादा छोड़ने वाली प्रभु की प्रेमी थीं । वर्तमान युग में भगवती मीराबाई ने भी ऐसा ही अनुसरण किया । |
| 601. |
राजा श्री परीक्षितजी ने प्रभु श्री शुकदेवजी से पूछा कि प्रभु के जाने पर गोपियों ने जीवन निर्वाह और जीवन धारण कैसे किया ? प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि जब भी प्रभु जाते हैं तो दो चीज देकर जाते हैं । पहला, प्रभु की श्रीलीला और दूसरा, प्रभु का मंगलमय नाम । भक्तों के अवलंबन के लिए यह दो आधार प्रभु देकर जाते हैं । |
| 602. |
प्रभु का रथ ओझल हो गया, रथ की धूल भी बैठ गई फिर भी गोपियां खड़ी देखती रही क्योंकि उनको आशा थी कि प्रभु लौट आएंगे । भक्त को आशा प्रभु प्रेम में पागल बना देती है । |
| 603. |
ईंट और दीवार का घर नहीं होता, घर वह होता है जहाँ प्रभु रहते हैं । गोपियों ने कहा कि हमें घर में इसलिए सफाई रखनी है कि प्रभु कब आ जाएं पता नहीं, हम सजतीं इसलिए हैं कि प्रभु हमको देखकर राजी हों, गौ-माता की सेवा इसलिए करतीं हैं कि बढ़िया दूध से प्रभु के लिए माखन बनाएं । |
| 604. |
सूत्र यह है कि हर चीज प्रभु के लिए और प्रभु को मद्देनजर रखकर करने का नियम जीवन में लेना चाहिए । |
| 605. |
गोपियां अपने भाग्य को कोसतीं कि हमारे प्राण क्यों नहीं निकले जब प्रभु चले गए । वे महाराज श्री दशरथजी के भाग्य को सराहती जो प्रभु श्री रामजी के वियोग में अपने प्राण त्याग कर एक बहुत उच्च आदर्श स्थापित करके गए । |
| 606. |
गोपियां एक दूसरे को आत्मघात करने से रोकतीं क्योंकि इससे प्रभु को दुःख पहुँचेगा । गोपियों का भाव था कि जी कर भी अपने किसी कर्म से प्रभु को कष्ट नहीं देंगे और मरकर भी प्रभु को कष्ट नहीं देंगे । वे कहतीं थीं कि वे जिएंगी, सहन करेंगी, सहकर जिएंगे पर प्रभु को कष्ट नहीं पहुँचाएंगे, यह उनका भाव था । |
| 607. |
चित्त की हर धड़कन प्रभु के लिए होनी चाहिए, यही भक्ति है । |
| 608. |
कभी-कभी की जाए, कभी नहीं की जाए, भक्ति ऐसी नहीं होती है । भक्ति होती है तो पूरी होती है नहीं तो नहीं होती है । |
| 609. |
भक्ति की आदर्श श्रीगोपीजन हैं । देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने अपने भक्ति सूत्र में भक्ति के आदर्श के रूप में गोपियों को चुना । इतने भक्त थे उनकी नजरों में पर उन्होंने गोपियों को चुना । |
| 610. |
हम यह प्रश्न पूछ लेते हैं कि मैंने तुम्हारे लिए इतना किया, तुमने मेरे लिए क्या किया, यह प्रेम नहीं बल्कि व्यवहार है । गोपियों ने प्रभु से प्रेम किया तो ऐसा प्रश्न कभी नहीं पूछा, कभी उनके मन में भी ऐसा प्रश्न नहीं आया । |
| 611. |
द्वारकावासियों को प्रभु ने समृद्धि प्रदान करी, मथुरावासियों को प्रभु ने सुरक्षा प्रदान करी पर गोकुलवासियों को क्या दिया ? ग्यारह वर्ष की अवस्था में प्रभु गए और एक सौ पच्चीस वर्ष की अवस्था में प्रभु श्रीलीला विश्राम देकर स्वधाम गए और कभी लौटकर श्री गोकुलजी नहीं आए । |
| 612. |
सच्ची भक्ति यह होती है कि कभी भी प्रभु को नहीं भूलें । हम होते तो सोचते प्रभु भूल गए हम भी प्रभु को भूल जाएं । प्रभु सदैव अपने हैं, यह गोपियों का भाव था इसलिए रंचमात्र भी प्रेम में कमी नहीं आई और क्षणभर के लिए भी प्रभु को नहीं भूलीं । यह सच्ची प्रेमाभक्ति है, जो इससे कम हो वह प्रेमाभक्ति नहीं हो सकती । |
| 613. |
प्रभु प्रेम कभी भी नहीं बुझने वाली प्यास का नाम है । |
| 614. |
पूरा श्रीबृज मंडल और पूरा भक्त मंडल इस न बुझने वाली प्रभु प्रेम की प्यास का अनुभव करता है । |
| 615. |
प्रभु के श्रीआगमन से श्री मथुराजी में चेतन की लहर दौड़ गई । प्रभु के दर्शन करने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी । |
| 616. |
एक कुबड़ी ने प्रभु का श्रृंगार किया, प्रभु को अति सुंदर सजाया और दर्पण दिखाया । प्रभु ने देखा कि उसने मुझे एक दिन के लिए सुंदर बनाया तो मैं (प्रभु) उसे जीवन भर के लिए सुंदर बना दूँगा । यह प्रभु की प्रभुता होती है कि थोड़ा-सा करने पर बहुत गुना बढ़ाकर देते हैं । |
| 617. |
सूत्र यह है कि प्रभु के लिए किया कार्य बीज का काम करता है जो वृक्ष रूप लेकर हजार गुना बनकर हमें वापस मिलता है । |
| 618. |
सूत्र यह है कि प्रभु ऋण का बोझ अपने ऊपर नहीं रखते । इतनी सी भी सेवा ऋण को अनंत गुना करके चुकाते चलते हैं । |
| 619. |
जिसकी जैसी भावना होती है प्रभु उसको उसी रूप में दिखाई देते हैं । मथुरावासियों में जो महिलाएं थी उन्हें प्रभु सौंदर्य मूर्ति दिखे, धार्मिक लोगों को धर्म मूर्ति दिखे और कंस को काल रूप में दिखे । |
| 620. |
प्रभु ग्यारह वर्ष श्री गोकुलजी और श्री वृंदावनजी में रहे, फिर प्रभु चौदह वर्ष श्री मथुराजी में रहे और फिर प्रभु एक सौ वर्ष श्री द्वारकाजी में रहे । इस तरह प्रभु ने सभी जगहों को धन्य किया और आज वे सब तीर्थ बन गए । |
| 621. |
प्रभु ने बहुत सारे युद्ध किए पर युद्ध के दौरान रात्रि में भी विश्राम के समय प्रभु हमेशा बृजवासियों को और गोपियों को याद करते थे । |
| 622. |
सूत्र यह है कि भक्त प्रभु को नहीं भूलते तो प्रभु भी भक्तों को कभी नहीं भूलते । |
| 623. |
ज्ञानियों के शिरोमणि श्री उद्धवजी में प्रेम भक्ति का भाव नहीं था । उनका जीवन बेकार न चला जाए इसलिए प्रेम भक्ति से युक्त करने के लिए उनको गोपियों से मिलने के लिए निमित्त बनाकर प्रभु ने भेजा । |
| 624. |
जिस श्रीबृज रज को देखकर श्री अक्रूरजी लोटने लगे, श्री उद्धवजी को वह साधारण प्रतीत हुआ । श्री उद्धवजी ज्ञानी थे पर भाव नहीं था । फिर श्री उद्धवजी को श्रीबृज की तरफ से आती हवा के झोंके में कुछ अलग लगा । प्रभु ने उन्हें अपने रथ में भेजा था इसलिए उन्हें देखकर बृजवासी दौड़ते हुए आए पर प्रभु नहीं आए यह देखकर बृजवासी आपस में प्रभु की बातें करने लगे । फिर श्री उद्धवजी ने वृद्ध को प्रभु को याद करते देखा, गोपियों को प्रभु की बाट जोहते देखा, गौ-माता को प्रभु के लिए व्याकुल देखा, दादी को बच्चों को प्रभु की कहानी सुनाते देखा, लड़के-लड़की को प्रभु के लिए गीत गाते देखा । उन्होंने श्रीनंद बाबा के यहाँ देखा कि श्रीनंद बाबा ने उनका स्वागत यह बोलकर किया कि लाला के सखा पधारे हैं । भगवती यशोदा माता श्री उद्धवजी से कहतीं हैं कि प्रभु कहीं भी रहे वे हमारे थे और हमारे रहेंगे । श्री उद्धवजी ने देखा कि श्रीबृज का बच्चा-बच्चा और कण-कण प्रभु को याद करता है । |
| 625. |
प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि प्रेम भावना का ऐसा सागर देखकर श्री उद्धवजी पूरी तरह से प्रेम में द्रवित हो उठे । |
| 626. |
श्री उद्धवजी के गले में एक माला थी जो प्रभु पहनते थे और प्रभु ने उन्हें उपहार स्वरूप दी थी । उस माला को देखकर गोपियां रोने लगी और प्रभु के श्रीचिह्न देखकर वे भाव विभोर हो उठीं । |
| 627. |
गोपियों से घिरे श्री उद्धवजी को गोपियां प्रभु को उलाहना देने के लिए कुछ सुनाना चाहती थी । एक भंवर आ गया और उसे निमित्त बनाकर गोपियों ने भंवर गीत गाया । यह श्रेष्ठ गीत श्रीमद् भागवतजी महापुराण का है । |
| 628. |
श्री उद्धवजी ने प्रेम की पाठशाला में गोपियों के माध्यम से प्रवेश लिया । गोपियों ने उन्हें एक-एक स्थान ले जाकर दिखाया, प्रभु की श्रीलीला बताई, प्रभु की श्रीलीला गाई, प्रभु की श्रीलीला का अभिनय किया । श्री उद्धवजी चार दिन के लिए आए थे और चार महीने तक रुक गए और एक-एक प्रभु की श्रीलीला स्थली का दर्शन करके उसके भाव का अनुभव किया । |
| 629. |
श्री उद्धवजी ने वापस लौटते वक्त रथ को श्रीधाम के बाहर रोका । श्रीधाम में आते वक्त वे भावुक नहीं हुए पर अब वे इतने भावुक हो उठे कि हाथ जोड़कर प्रणाम किया । क्यों ? क्योंकि प्रभु प्रेम का भाव जागृत हो गया था । |
| 630. |
ऋषि, संत और महात्मा जो प्रभु प्रेम का भाव पाने का प्रयास करते हैं वे गोपियां सहज ही भक्ति से पा चुकीं थीं । |
| 631. |
प्रभु श्री ब्रह्माजी को श्री उद्धवजी कहते हैं कि मुझे मुक्ति नहीं देवें, अगले जन्म में मुझे श्रीबृज की लता बना देवें जिससे गोपियों की श्रीचरण रज की धूल उड़कर मुझे पवित्र करती रहे । श्री उद्धवजी ने श्रीबृज रज को उठाकर अपने मस्तक पर लगाया । |
| 632. |
गोपियों को ज्ञान सिखाने आए थे श्री उद्धवजी और उनके प्रभु प्रेम में अपने ज्ञान की पोथी को जलाकर लौटे । ज्ञान सबसे बड़ा है यह कहते हुए आए थे और अपने ज्ञान के अहंकार को गला कर भक्ति के गीत गाते हुए श्री उद्धवजी लौटे । |
| 633. |
आपके श्रीगुणों का स्मरण करके मैंने अपना जीवन आपको अर्पण कर दिया और अब इसकी रक्षा का दायित्व आपका है । भगवती रुक्मिणी माता का प्रभु को लिखा पत्र का मूल भाव यह है । |
| 634. |
तीन राजाओं की सेना जरासंध, शिशुपाल और रुक्मी से घिरी भगवती रुक्मिणी माता को सेना के सागर के बीच से प्रभु ले गए । जैसे मोती चुगकर राजहंस उड़ जाता है और कौवे कांव-कांव करते रहते हैं, प्रभु श्री शुकदेवजी उपमा देते हैं वैसे ही प्रभु माता को लेकर चले गए । |
| 635. |
प्रभु प्रेम का प्राकट्य श्री उद्धवजी को माध्यम बनाकर जनकल्यानार्थ प्रभु करवाना चाहते थे । |
| 636. |
भक्ति के लक्षण में भोग का परित्याग, सुख का परित्याग करना पड़ता है । जैसे हम बेटी के विवाह के दस दिन पहले भोगों और सुख का परित्याग करके काम में जुट जाते हैं, जैसे एक बच्चा बीमार है तो माँ सब भोग और सुख का परित्याग करती है वैसे ही प्रभु कहते हैं कि जो मेरे लिए ऐसा करता है वह मुझे सर्वाधिक प्रिय होता है । प्रभु ऐसा श्री उद्धवजी को कहते हैं । प्रभु कहते हैं कि मैं यही प्रेमाभक्ति में देखता हूँ और जीवों में यही तलाशता हूँ । |
| 637. |
सूत्र यह है कि इतना प्रेम प्रभु से हो जाए, इतनी भक्ति हो जाए कि भोगों और सुखों का त्याग अपने आप ही जीवन में होने लगे । |
| 638. |
प्रभु कहते हैं कि जिसको मेरी प्रेमाभक्ति प्राप्त हो गई उसे अब कुछ भी पाना शेष नहीं बचता । प्रभु पूछते है कि अब उसे क्या प्राप्त करना बाकी है ? |
| 639. |
कुछ भक्तों को संकट आने पर ही प्रभु याद आते हैं जैसे श्री गजेंद्रजी । |
| 640. |
कुछ भक्तों को केवल अपनी कामना पूर्ति के लिए ही प्रभु याद आते हैं । |
| 641. |
कुछ भक्त प्रभु को ज्ञान से जानने हेतु प्रभु की भक्ति करते हैं । |
| 642. |
लौकिक संसार में फंसने पर या कामना पूर्ति के लिए या प्रभु को ज्ञान से जानने हेतु भक्ति करने वाला साधारण भक्त होता है । |
| 643. |
प्रभु कब प्राप्त होंगे, प्रभु साक्षात्कार कब होगा, प्रभु अपना प्रेम कब प्रदान करेंगे, प्रभु की प्राप्ति के लिए बेचैन - प्रभु ऐसे भक्तों को याद करते हैं । |
| 644. |
पहले कौन-कौन भक्त हुए, उन्होंने क्या-क्या भक्ति में किया, उससे उन्हें क्या-क्या प्राप्त हुआ, भक्ति में यह देखकर वैसा कर पाने हेतु कुछ भक्त भक्ति करते हैं । |
| 645. |
श्रेष्ठ भक्त तब बनता है जब वह कामना रहित और परम धन के रूप में प्रभु को ही देखता है । वह प्रभु रूपी प्रेम धन की ही कामना करता है । |
| 646. |
प्रभु प्राप्ति की सहज स्थिति का नाम ही भक्ति है । |
| 647. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त यानी निष्काम भक्त को किसी चीज की कामना या संकल्प ही नहीं करना पड़ता क्योंकि उसकी पूर्ति मैं स्वयं पहले ही कर देता हूँ । जो परा भक्ति को प्राप्त हो गया उसके लिए मैं दौड़ता हूँ, भक्त के लिए कुछ भी करना पड़े तो मैं करता हूँ । वैसे ही जैसे एक नवजात बच्चे हेतु माँ करती है, सब जिम्मेदारी लेती है और नवजात बच्चा बिना फिक्र के जीवन यापन करता है । |
| 648. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे निष्काम भक्त को जो प्राप्त होना है उसे मैं पहुँचाता हूँ, वह जिस मार्ग पर बढ़ता है मैं उस मार्ग को सुचारु बना देता हूँ । |
| 649. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा निष्काम भक्त जब भोजन के लिए बैठता है तो उस भोजन के कण-कण में उसकी तृप्ति हेतु मैं प्रवेश करता हूँ । |
| 650. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा निष्काम भक्त अगर औषधि लेता है तो मैं स्वास्थ्य बनकर उस औषधि में प्रवेश कर जाता हूँ । |
| 651. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे निष्काम भक्त को न संयम करना पड़ता है और न ही नियम पालन करना पड़ता है क्योंकि संयम और नियम हाथ जोड़कर उसके सामने खड़े रहते हैं । उससे कोई गलती नहीं होती क्योंकि वह मेरे शरणागत होता है । |
| 652. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा निष्काम भक्त जहाँ ध्यान करता है मैं उसके लिए वहाँ उपलब्ध रहता हूँ । |
| 653. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे निष्काम भक्त को निद्रा मैं देता हूँ जिसमें उसकी समाधि लग जाती है । |
| 654. |
प्रभु कहते हैं कि मैं अपने निष्काम भक्त में दृष्टि रूप में प्रवेश कर जाता हूँ और उसे लोकप्रियता दिलाता हूँ । वह जो बोलता है लोग उसे सुनना चाहते हैं । |
| 655. |
श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं कि मेरा निष्काम भक्त मुझसे अभिन्न नहीं रहता । प्रभु कहते हैं कि मेरे ऐसे निष्काम भक्त को तुम देखना चाहते हो । श्री उद्धवजी को प्रभु गोदी में उठा लेते हैं और कहते हैं कि देखो मेरा परा-भक्त । श्री उद्धवजी को गोदी में उठाकर प्रभु नाचने लगते हैं, उन्हें अपने आलिंगन में बांध लेते हैं, प्रभु और श्री उद्धवजी के नेत्रों में लगातार जल बहने लगता है । प्रभु ने आलिंगन में श्री उद्धवजी को ऐसा बांधा कि छोड़ना ही भूल गए और दोनों एक दूसरे में एकरूप हो गए । |
| 656. |
प्रभु ने फिर सोचा कि एकरूप हो गए तो मेरा नुकसान हो जाएगा फिर मैं प्रेम किससे करूँगा । प्रभु प्रेम करने के लिए भक्त को अलग रखना चाहते हैं । भक्त भी प्रभु से एकरूप नहीं होना चाहता, अलग रहना चाहता है जिससे प्रभु प्रेम का आनंद ले सके । |
| 657. |
संत कहते हैं कि रसगुल्ला खाना अच्छा लगता है या रसगुल्ला बनना अच्छा लगता है । उसे खाने में ही अच्छा लगता है । इसी तरह प्रभु से भिन्न रहने में और प्रभु से प्रेम करने में ही अच्छा लगता है । प्रभु से एकरूप होने में वह आनंद नहीं है । |
| 658. |
भक्त में और प्रभु में एकरूपता करने की, प्रभु में विलीन होने की क्षमता और सामर्थ्य आ जाती है पर वह विलीन नहीं होना चाहता । संत श्री तुकारामजी प्रभु को आगे आकर आलिंगन देने से मना कर देते हैं और कहते हैं आप आलिंगन देंगे और एकरूप कर देंगे । वे कहते हैं कि प्रभु मुझे भिन्न रखें जिससे मैं आपकी भक्ति कर सकूँ । |
| 659. |
संत कहते हैं कि हमें लहर जैसा बना दें जो सागर में उठे पर भिन्न रहे । फिर सागर में मिल जाए एकरूप हो जाए फिर लहर बनकर भिन्न हो जाए । कहने को तो वह दो होते हैं सागर और लहर पर होते एक ही हैं पर भिन्न भी होते हैं । वैसे ही लहर रूप में भक्त और सागर रूप में प्रभु होने चाहिए । |
| 660. |
प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध में मानो पूरा भक्ति का सार प्रभु ने श्री उद्धवजी को निमित्त बनाकर हमें दे दिया । |
| 661. |
वही सच्चा धर्म है जो अंत में भक्ति जागृत कर देता है, यह प्रभु की धर्म की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है । |
| 662. |
भक्ति ही अंत में प्राप्त हो इसके लिए जो आचार करना है, वही धर्म है, प्रभु ऐसी व्याख्या करते हैं । |
| 663. |
प्रभु की भक्ति प्राप्ति धर्म की अंतिम उपलब्धि होनी चाहिए । अन्य कुछ भी धर्म से प्राप्त नहीं किया तो भी चलेगा मगर प्रभु भक्ति प्राप्त कर ली तो धर्म पूर्ण हो गया, प्रभु ऐसी व्याख्या करते है । |
| 664. |
जीव के भीतर प्रभु का प्रेम निर्माण हो जाए और प्रभु सबमें दिखने लगे तो उस जीव का कल्याण हो जाता है । |
| 665. |
अंत में प्रभु प्राप्ति धर्म ने नहीं कराई तो वह धर्म नहीं है । |
| 666. |
ज्ञान की व्याख्या करते हुए प्रभु कहते हैं कि सभी में प्रभु अगर नहीं दिखते तो जो भी ज्ञान अर्जन किया, वह ज्ञान नहीं है । |
| 667. |
सच्चा ज्ञान समस्त जीवों में प्रभु तत्वों को देखता है, ऐसे ज्ञान वाले से कभी गलती नहीं हो सकती । |
| 668. |
ज्ञान की पोथी कितनी पढ़ी उससे ज्ञान आकलन करना सही नहीं । ज्ञान जीवन में कितना उतारा इससे ज्ञान का आकलन होता है । |
| 669. |
वैराग्य की व्याख्या प्रभु करते हैं कि किसी भी वस्तु में भोगने की बुद्धि का निर्माण अपने भीतर नहीं होने देना, यह सच्चा वैराग्य है । |
| 670. |
किसी चीज में आसक्ति का भाव नहीं होना वैराग्य है । जिसके जीवन में “चाहिए” शब्द ही नहीं आए, वह इंद्रासन और स्वर्ग देखकर भी और उर्वशी जैसी अप्सरा भी सामने आने पर जिसमें भोग की इच्छा नहीं हो, वह सच्चा वैरागी है । |
| 671. |
वैराग्य उसे नहीं कहते हैं जब हम पदार्थों को पदार्थ के रूप में देखते हैं और उसमें आसक्ति करने लगते हैं । |
| 672. |
ऐश्वर्य की व्याख्या प्रभु करते हैं कि समस्त सिद्धियां को स्वतः भक्ति द्वारा प्राप्त करना और उसमें नहीं फंसना, सच्चा ऐश्वर्य है । |
| 673. |
श्री उद्धवजी को प्रभु देखते हैं और प्रभु बोलने का क्रम जारी रखते हैं । इसलिए झटपट श्री उद्धवजी ने बहुत सारे प्रश्न प्रभु से पूछ लिए । यह मुक्ति और भक्ति के प्रश्न हैं । |
| 674. |
पूरी महाभारतजी में विदुर नीति और यक्ष प्रश्न पढ़ लिया तो जीवन सफल हो गया । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के समाधान के लिए यह सब प्रश्न और उत्तर हैं । |
| 675. |
संत कहते हैं कि बीस वर्ष की अवस्था तक श्रीराम कथा यानी श्री रामायणजी से नीति सीखना जैसा प्रभु श्री रामजी ने किया, यह आरंभिक बेला की शिक्षा है । |
| 676. |
संत कहते हैं कि तीस वर्ष की उम्र में श्रीकृष्ण कथा यानी श्री महाभारतजी से युक्ति सीखना जैसा प्रभु श्री कृष्णजी ने किया, यह संघर्ष बेला की शिक्षा है । |
| 677. |
संत कहते हैं कि पचास वर्ष की उम्र में श्री भागवतजी महापुराण से मुक्ति सीखना, यह श्रीहरि की कथा है । भक्ति के माध्यम से मुक्ति सीखना क्योंकि यह अंतिम बेला पर काम आएगी । |
| 678. |
पूरे महामंत्र का जप इस कलियुग में लोग कम कर पाएंगे इसलिए संतों ने करुणा करते हुए “जय जय राम कृष्ण हरि” के रूप में एक लघु मंत्र समाज को दे दिया । |
| 679. |
यक्ष प्रश्न के रूप में श्री महाभारतजी में सौ प्रश्न हैं और श्री उद्धवजी ने श्रीमद् भागवतजी महापुराण में पैंतीस प्रश्न पूछे हैं । दोनों जगह इसके उत्तर मिलेंगे और अलग-अलग उत्तर मिलेंगे । ऐसा क्यों ? जिनको धर्म, अर्थ और काम के रूप में उत्तर चाहिए उनको यक्ष प्रश्न में उत्तर मिलेंगे और जिनको भक्ति और मुक्ति के रूप में उत्तर चाहिए उन्हें श्रीमद् भागवतजी महापुराण के एकादश स्कंध में उत्तर मिलेंगे । |
| 680. |
श्री उद्धवजी ने प्रभु के सामने पैंतीस प्रश्नों की झड़ी लगा दी । एकादश स्कंध में श्री उद्धवजी ने पहला प्रश्न पूछा कि यम क्या है और दूसरा प्रश्न पूछा कि नियम क्या है ? प्रभु ने बारह यम और बारह नियम बताए । यम उनका नाम है जिन्हें पालन करना अनिवार्य है और नियम उनका नाम है जिनके पालन में थोड़ी शिथिलता प्रभु ने दी है । |
| 681. |
प्रभु अहिंसा पर बहुत जोर देते हैं । संत कहते हैं कि मन, वचन और कर्म तीनों से हमें अहिंसक बनना चाहिए । |
| 682. |
जीवन में सत्यता का पालन करना सबके लिए अनिवार्य होना चाहिए, ऐसा प्रभु कहते हैं । |
| 683. |
जीवन में भोगों से और कामनाओं से अपने मन को असंग रखना बहुत जरूरी है । |
| 684. |
प्रभु कहते हैं कि मनुष्य में लज्जा होनी चाहिए कि कुछ भी गलत चीज करने में उसे अपने ऊपर लज्जा आए । |
| 685. |
शास्त्र कहते हैं कि जीव को आस्तिक बने रहना चाहिए । उसे प्रभु, शास्त्रों और ऋषियों की वाणी में परम विश्वास होना चाहिए । |
| 686. |
शास्त्रों ने ब्रह्मचर्य पर बहुत जोर दिया है । ब्रह्मचर्य से हमें जो ऊर्जा मिलती है वह हमारी सात्विकता को बढ़ाती है । |
| 687. |
शास्त्रों में मौन को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया है । वाणी का मौन होने पर हमारा प्रभु के लिए चिंतन बढ़ता है । |
| 688. |
प्रभु कहते हैं कि मन को चंचल नहीं, स्थिर रखने की बहुत बड़ी जरूरत है और यह स्थिरता भक्ति से आती है । |
| 689. |
प्रभु क्षमा पर बहुत जोर देते हैं । प्रभु स्वयं क्षमाशील हैं और कहते हैं कि कुछ बातों को जीवन में सहकर क्षमा कर देना चाहिए और किसी की गलती पर उसे माफ कर देना चाहिए । |
| 690. |
प्रभु कहते हैं कि मेरी शरणागति लेने पर मैं सभी भय से जीव को मुक्त कर देता हूँ और जीव सदैव के लिए अभय हो जाता है । |
| 691. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें अपना खान-पान शुद्ध रखना चाहिए, इससे सात्विकता की वृद्धि होती है । |
| 692. |
शास्त्र कहते हैं कि मंत्र और प्रभु नाम जप जीवन में जरूर होना चाहिए, इससे बहुत जल्दी कलियुग में हमारा मंगल होता है । |
| 693. |
शास्त्र कहते हैं कि चित्त को प्रभु में एकाग्र करना चाहिए, प्रभु को कभी नहीं भूलना, यह कलियुग का तप है । |
| 694. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के, शास्त्रों के और ऋषियों के वचनों में सदैव श्रद्धा रखनी चाहिए और उनका पालन करना चाहिए । |
| 695. |
शास्त्र कहते हैं कि अतिथि सेवा जरूर करनी चाहिए और मन से करनी चाहिए । |
| 696. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की पूजा रोज करनी चाहिए, पूजन का क्रम नित्य होना चाहिए । |
| 697. |
शास्त्र कहते हैं कि जब भी समय मिले, तीर्थ में जाना चाहिए और तीर्थ का सेवन करना चाहिए और तीर्थों में पूर्ण श्रद्धा भाव रखना चाहिए । |
| 698. |
शास्त्र कहते हैं कि परोपकार का काम रोजाना करना चाहिए । सबमें प्रभु को देखकर निष्काम भाव से रोज कोई-न-कोई परोपकार का काम करना चाहिए । |
| 699. |
शास्त्र कहते हैं कि जीवन में संतोष रखना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । संतोष धन सबसे बड़ा धन होता है, ऐसा शास्त्र मत है । |
| 700. |
जैसे हम पहाड़ से चिल्लाते हैं तो वह शब्द वापस आता है । अच्छा शब्द बोलने से अच्छा शब्द वापस आएगा, बुरा शब्द बोलने से बुरा शब्द वापस आएगा । वैसे ही संसार का भला चाहेंगे और करेंगे तो हमारा भी भला होगा, संसार का बुरा चाहेंगे और बुरा करेंगे तो हमारा भी बुरा होगा । |
| 701. |
असंतोष का अभ्यास करने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता । संतोष का अभ्यास करने वाला कभी दुखी नहीं हो सकता, यह शाश्वत सिद्धांत है । |
| 702. |
मन को शांत रखने के लिए, विकार रहित और संयमित रखने के लिए एवं मन को नियंत्रित रखने के लिए प्रभु बहुत जोर देते हैं । |
| 703. |
इंद्रियों पर पूरी तरह संयम, इंद्रियों को नियंत्रण में रखने पर शास्त्र बहुत जोर देते हैं । |
| 704. |
मन में गलत विचार आ भी गया तो भी वह हमारी इंद्रियों से गलती नहीं करवाए, यह तभी संभव है जब जीवन में भक्ति होगी । |
| 705. |
आने वाले हर दुःख और प्रतिकूलता को सहज में सह लेने को शास्त्रों में तितिक्षा कहा गया है । |
| 706. |
इंद्रियों का संसार के विषयों से संबंध हमेशा रहेगा । जैसे आँखें हैं तो संसार का दृश्य दिखेगा और इसमें कुछ अनुभव सुख के होंगे, कुछ दुःख के होंगे । हमारे मन पर लगातार सुख और दुःख का अनुभव होगा । जो इसका प्रतिकार करेगा वह मूर्ख है । उत्तम पुरुष वह है जो प्रतिकूलता यानी दुःख को सह लेता है और सुख में फूलता नहीं है । |
| 707. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि सहन-सिद्धि जीवन में प्राप्त करनी चाहिए । आप गलत कितना कहेंगे, मैं उससे ज्यादा सुनने और सहने के लिए तैयार बैठा हूँ । ऐसे व्यक्ति को कोई भी दुःखी नहीं कर सकता । |
| 708. |
एक संत से उनके शिष्य ने पूछा कि आप जहाँ जा रहे हो वहाँ कोई आपको गाली देगा तो उन्होंने कहा कि मैं सोचूंगा कि उसने मारा तो नहीं । शिष्य बोला कि अगर वह मारेगा तो संत ने कहा कि मैं सोचूंगा कि मेरी जान तो बच गई । शिष्य बोला अगर जान से मार देगा तो संत ने कहा कि उस समय इससे अच्छा क्या होगा कि मेरा वृद्ध शरीर है और मेरे प्राण मुक्त होकर प्रभु से मिल जाएंगे । |
| 709. |
गलत व्यक्ति के सामने सत्य दस काल्पनिक अड़चन खड़ी कर देता है जिससे वह सत्य बोल ही नहीं पाता । |
| 710. |
सच्चा धैर्य यह है कि स्वादिष्ट पदार्थ देखकर भी जिह्वा पर नियंत्रण, रस इंद्रीय पर नियंत्रण । कामिनी को देखकर काम वासना पर नियंत्रण, काम इंद्रीय पर नियंत्रण । साधक शत्रु के बाणों को झेल लेता है पर रस इंद्रीय और काम इंद्रीय से हार जाता है । इन दोनों पर विजय नहीं होने पर आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है । |
| 711. |
जिसने अपने रस इंद्रीय और काम इंद्रीय पर नियंत्रण कर लिया, वही सच्चा धैर्यवान है । |
| 712. |
सबसे बड़ा दान क्या है ? इसके जवाब में शास्त्रों में कहा गया है कि मैं कभी भी, किसी को, किसी प्रकार का दंड नहीं दूं, अभय का दान दूं, यह सबसे बड़ा दान है । क्षमता होते हुए भी किसी को दंड नहीं देना यह सबसे बड़ा दान है । |
| 713. |
प्रभु श्री नारायणजी की तपस्या भंग करने के लिए श्री इंद्रदेवजी ने श्री कामदेवजी, वसंत ऋतु और अप्सराओं को भेजा । कोई कुछ नहीं कर पाया तब सब डरे कि अब प्रभु श्राप देंगे । प्रभु ने कहा कि आप हमारे मेहमान हैं तो मैं श्राप नहीं दूँगा । प्रभु ने सिर्फ क्षमा ही नहीं किया, एक भी बात नहीं सुनाई और सबसे बड़ी बात कि आक्रोश ही नहीं किया । |
| 714. |
प्रभु श्री रामजी पूरे श्रीवाल्मीकि रामायणजी में कहीं भी एक शब्द नहीं बोले भगवती कैकेयी माता के लिए । श्री दशरथजी बहुत बोले, श्री भरतलालजी ने बहुत कड़वे शब्द भगवती कैकेयी माता को बोले पर प्रभु ने उल्टे श्री शत्रुघ्नजी को शपथ दिलाई कि कोई भी चौदह वर्षों तक भगवती कैकेयी माता को वाणी से कष्ट नहीं पहुँचाएगा । |
| 715. |
हम पूरी तरह से भूल ही गए किसी के अपराध को, क्या ऐसा भी कभी हमारे जीवन में हुआ है । |
| 716. |
इस क्षमा दान और अभय दान से चित्त की शुद्धि जितनी होगी वैसी अन्य किसी से नहीं होगी, ऐसा प्रभु कहते हैं । |
| 717. |
सबसे कठिन तप कलियुग में कामना को जीतना है । सबसे बड़ी तपस्या वह है जिससे कामना पर विजय प्राप्त कर लिया जाए । प्रभु की भक्ति में सभी लौकिक कामनाओं को भूल जाना, सबसे बड़ा तप है । |
| 718. |
कितने शत्रु को मारा यह बाहरी शौर्य है । सच्चा शौर्य यह है कि अपने जीवन की बुरी आदतों को, स्वभाव को, जो परिवर्तित कर लेता है वह सच्चा शूरवीर है । सबसे बड़ा शौर्य यह है । |
| 719. |
हमें युद्ध करना होता है अपने मन से । शत्रु के साथ युद्ध में हम पूरी शक्ति लगा सकते हैं पर मन के साथ युद्ध में आधी शक्ति मन की तरफ हो जाती है । इसलिए इस मन को जीतना सबसे बड़ा शौर्य है । |
| 720. |
हमारा संकल्प होता है पर विकल्प मन देता है । मन मना करता रहता है और विकल्प देता रहता है और हमें आधी शक्ति से युद्ध करना पड़ता है । आधी शक्ति के बावजूद हम युद्ध जीत जाते हैं और बुरी आदतें और स्वभाव को हम बदल देते हैं, तो सबसे बड़ा शौर्य का प्रदर्शन हमने किया । |
| 721. |
मैं देह रूप नहीं हूँ, मैं परमात्मा तत्व हूँ, यह भान जीवन में होना चाहिए । |
| 722. |
महाभारतजी में यक्ष प्रश्न था कि सत्य क्या है ? उत्तर दिया गया कि जो सत्य किसी का अकल्याण करें वह सत्य नहीं है । जो सत्य होते हुए भी सबका कल्याण करें वही सत्य है । उदाहरण स्वरूप एक बूढ़े व्यक्ति ने एक अन्य बूढ़े व्यक्ति के पोते से कहा कि तुम्हें पता है मेरे और तुम्हारे दादाजी में कितनी गहरी मित्रता थी । हम साथ बैठकर शराब पीते थे । यह सत्य है कि दादाजी शराब पीते थे पर पोते के मन में अपने दादाजी शराबी थे यह भाव पैदा करना, इससे अकल्याण हुआ तो यह सत्य नहीं हुआ क्योंकि पोते की भावना को आघात पहुँचा दिया । |
| 723. |
पशु और पत्थर का स्वभाव नहीं बदलता पर प्रभु ने मनुष्य को स्वभाव बदलने का सामर्थ्य दिया है । मनुष्य के निर्णय में बड़ी-बड़ी बुरी आदतें और स्वभाव बदलने का सामर्थ्य है । |
| 724. |
जिसने अपने स्वभाव पर विजय कर लिया, वह सच्चा शौर्यवान और शूरवीर है । |
| 725. |
सत्य का सबसे सुंदर प्रतिपादन यहाँ मिलता है । प्रभु के दर्शन सबमें करने का दृष्टिकोण ही सत्य है । वाणी से बोलने वाले सत्य को यहाँ परिभाषित नहीं किया गया है, प्रभु ही एकमात्र सत्य हैं और उन सत्य प्रभु के बाद बाकी कुछ भी नहीं है, उन प्रभु का दर्शन सब जगह करना, यही सत्य है । |
| 726. |
जीवों का कल्याण करने की भावना रखनी चाहिए और उसके अनुरूप ही कार्य करना चाहिए । |
| 727. |
सत्य, जो जगत के हित में हो, वही सच्चा सत्य होता है । |
| 728. |
अपने द्वारा किए गए कर्म का संग नहीं होने देना चाहिए । पहला, अहंकार नहीं होने देना कि कर्म मैंने किया और दूसरा, उस कर्म के बदले कुछ फल नहीं चाहना, ऐसा शास्त्र आदेश देते हैं । |
| 729. |
कोई भी कर्म करने पर अहंकार आएगा कि मैंने किया, यह भाव नहीं आना चाहिए । कर्म करने पर मुझे क्या फल मिलेगा, यह भाव भी नहीं आना चाहिए । ऐसा होने पर ही वह शुद्ध कर्म होता है । |
| 730. |
कर्म किया और कर्म से असंग हो गए तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होती है । |
| 731. |
प्रभु की पूजा हेतु उत्तम-से-उत्तम पदार्थ इकट्ठा करना, पूजा का एक भी नियम नहीं तोड़ना फिर प्रभु से कहना कि यह कर्म आपको समर्पित । मुझे इसका कोई फल नहीं चाहिए, यह सबसे शुद्ध पूजा हुई । |
| 732. |
कर्म पूरी दक्षता से करना पर उससे कुछ फल नहीं चाहना, ऐसा जीवन में करने से यह बहुत बड़ी उपलब्धि होती है । |
| 733. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी उपमा देते हुए कहते हैं कि जैसे एक पिता अपनी बेटी का लाड़ प्यार करता है, पढ़ाता है और एक दिन कन्यादान कर देता है । पिता अपनी कन्या से कुछ नहीं लेता, यह भारतीय सिद्धांत है । संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि हर कर्म ऐसे करें और प्रभु को अर्पण करें कि मुझे इससे कुछ नहीं चाहिए । |
| 734. |
संत कहते हैं कि कर्म से कुछ फल नहीं चाहने से और कर्म प्रभु को अर्पण करने से यह होगा कि उसका फल तो मिलेगा पर अनंत गुना बढ़कर मिलेगा । |
| 735. |
मनुष्य का सच्चा धन यह है कि धर्म पालन कितना किया क्योंकि आज जो उसकी अवस्था है वह पूर्व जन्म के धर्म के बल पर है । इस जन्म में जिसने धर्म का पालन किया, धर्म का धन कमाया, धर्म कमाने में समय, बुद्धि और धन का उपयोग किया वह सबसे बड़ा धनी है क्योंकि यह धन उसके साथ मृत्यु के बाद भी जाएगा । |
| 736. |
कितनी भक्ति की, कितना भजन किया, कितना जप किया, कितना दान दिया, यह जीव का सबसे बड़ा कमाया धन होता है । |
| 737. |
हमारे धर्माचरण के पुण्य का कोई बंटवारा नहीं कर सकता । पत्नी, भाई, बच्चे उसे बांट नहीं सकते और चोर उसे चुरा नहीं सकता । |
| 738. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त ने धर्म किया, पुण्य कमाया तो जैसे उसने इस धन की रखवाली के लिए मुझे बैठा दिया । उसने किया हुआ धर्म मुझे (प्रभु को) अर्पित कर दिया अब मुझे (प्रभु को) उसकी रखवाली करनी पड़ती है और अगले जन्म में संभाल कर उस तक वापस पहुँचाना पड़ता है, उसका धन उसे प्रदान करना पड़ता है । |
| 739. |
श्री द्वारकाजी के लोगों को लगा कि हमारे प्रभु जैसे अलौकिक हैं वैसा कौन होगा इसलिए प्रभु के लिए इतनी अलौकिक योग्य पत्नी कहाँ मिलेगी । जब भगवती रुक्मिणी माता आईं तो उन्हें देखकर सबने कहा कि माता भी इतनी ही अलौकिक हैं जितने प्रभु हैं । |
| 740. |
संत मानते हैं कि प्रभु श्री महादेवजी, भगवती पार्वती माता, प्रभु श्री रामजी, भगवती जानकी माता, प्रभु श्री कृष्णजी, भगवती श्रीजी राधा माता - सबके साथ भक्ति के द्वारा एक संबंध स्थापित किया जा सकता है । |
| 741. |
भिन्न-भिन्न स्थानों पर एक ही भगवत् भाव रखकर हर जगह, जहाँ भी मिले, प्रभु के कोई विग्रह की पूजा बेहिचक करनी चाहिए । |
| 742. |
सभी श्रीपुराणों के सभी सूत्र एक श्रीमद् भागवतजी महापुराण में समाहित कर दिए गए । |
| 743. |
सभी श्रीवेदों का, श्रीपुराणों का ज्ञान होने पर भी श्रीमद् भागवतजी महापुराण को संत अपना मंगल सूत्र मानते हैं । |
| 744. |
विवाह पर पति मंगलसूत्र बांधते हैं । प्रभु श्री कृष्णजी का साक्षात विग्रह श्रीमद् भागवतजी महापुराण है । जो संत कांत भाव से प्रभु को पति के रूप में मानते हैं वे मंगलसूत्र के रूप में श्रीमद् भागवतजी महापुराण को मानते हैं । |
| 745. |
इतना ज्ञान सभी प्राचीन श्रीग्रंथों में होने पर भी श्रीमद् भागवतजी महापुराण को श्रेष्ठतम माना गया है । |
| 746. |
किसी के भी घर में प्रभु के इन पाँच रूपों में से एक की पूजा होनी ही चाहिए । इनमें से एक को प्रधान मानकर बाकी सभी के विग्रह रखना चाहिए - प्रभु श्री गणेशजी, प्रभु श्री नारायणजी, प्रभु श्री महादेवजी, प्रभु श्री सूर्यनारायणजी और भगवती देवी माता । |
| 747. |
लोक नेता का जीवन कलंक रहित होना चाहिए । प्रभु श्री कृष्णजी ने और प्रभु श्री रामजी ने अपनी श्रीलीला में ऐसा करके दिखाया । |
| 748. |
असत्य का जीवन केवल सत्य के प्रकट होने तक ही होता है । |
| 749. |
प्रभु श्री कृष्णजी ने श्री जाम्बवंतजी के साथ सत्ताईस दिनों तक मल युद्ध किया, फिर श्रीराम रूप में दर्शन देकर श्री जाम्बवंतजी को धन्य किया । |
| 750. |
देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के पास सभी समस्याओं का समाधान होता है । इसलिए देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के आते ही सभी खुश हो जाते हैं । |
| 751. |
प्रभु की प्राप्ति के लिए गोपियों और भगवती रुक्मिणी माता ने भगवती देवी माता का अनुष्ठान किया । प्रभु के जन्म के लिए भी श्री वासुदेवजी ने भगवती देवी माता का अनुष्ठान किया । जब प्रभु गुफा में सत्ताईस दिनों तक श्री जाम्बवंतजी से युद्ध कर रहे थे और श्रीद्वारका में जब यह बात पहुँची तो प्रभु की रक्षा के लिए देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के कहने पर श्री उग्रसेनजी, जो प्रभु के नानाजी थे, उन्होंने भगवती देवी माता का अनुष्ठान करवाया । सूत्र यह है कि प्रभु सबको यश देना चाहते हैं । अपने जन्म, अपने प्रेम मिलन, अपनी रक्षा हेतु भगवती देवी माता को यश दिलाया । |
| 752. |
प्रभु श्री कृष्णजी और प्रभु श्री रामजी ने अपनी श्रीलीला में कभी भी कटु शब्द और कड़वे शब्दों का प्रयोग नहीं किया, जब भी बोले तो मीठा ही बोले । |
| 753. |
मीठा बोलने में प्रभु से श्रेष्ठ कोई नहीं । प्रभु श्री कृष्णजी ने सत्राजित को मणि के वापस मिलने पर डांट पिलाई, दुर्योधन को राजदूत बनकर जाने पर डांट पिलाई, कठोर होकर बोले पर मीठा बोले एवं कटु शब्दों का प्रयोग नहीं किया । |
| 754. |
प्रभु बार-बार मार्गदर्शन देने इंद्रप्रस्थ जाते थे, पांडवों का मार्गदर्शन करने हेतु । इतना प्रेम प्रभु पांडवों से करते थे । |
| 755. |
प्रभु को सबसे ज्यादा प्रिय पांडवों में श्री अर्जुनजी थे । |
| 756. |
प्रभु श्री कृष्णजी की आठ पटरानी थीं । भगवती रुक्मिणी माता , भगवती जाम्बवन्ती माता, भगवती सत्यभामा माता, भगवती कालिन्दी माता, भगवती मित्रबिन्दा माता, भगवती सत्या माता, भगवती भद्रा माता और भगवती लक्ष्मणा माता । |
| 757. |
प्रभु श्री कृष्णजी ने 16100 कन्याओं को नरकासुर के यहाँ से बंदी मुक्त करवाया । सबने प्रभु को वरण किया नहीं तो उनके पास आत्मदाह के अलावा कोई रास्ता नहीं था क्योंकि उनको उनके परिवार और समाज ने ठुकरा दिया था । |
| 758. |
प्रभु कहते हैं कि क्षत्रियों के सब गुणों में सबसे पहला गुण होना चाहिए - शौर्य । |
| 759. |
16100 सभी क्षत्रिय कन्याएं थी । क्या उनके पिता, भाई, चाचा जो सब क्षत्रिय थे उन्होंने अपने शौर्य का परिचय देकर क्यों युद्ध नहीं करके अपनी बेटियों को छुड़वाया । कारण था कि सज्जन की सज्जन से एकता नहीं होती है और गलत व्यक्तियों के बीच में एकजुटता होती है । नरकासुर के साथ दंतवक्र, जरासंध, शिशुपाल ने मिलकर संगठन खड़ा कर दिया था । अंत में जो कोई नहीं कर पाया वह प्रभु को करना पड़ा । |
| 760. |
एक सज्जनता होती है कि मैंने किसी का बुरा नहीं किया । यह साधारण सज्जनता हुई । |
| 761. |
एक सज्जनता होती है कि मैंने किसी का बुरा तो नहीं किया और मैंने समाज और देश के लिए अच्छा किया । यह श्रेष्ठ सज्जनता हुई । |
| 762. |
अपनी रुचि के अनुसार एक क्षेत्र चुनकर समाज और देश का भला करना चाहिए । इसमें प्रभु से लोगों को भक्ति से जोड़ना सबसे ऊँचा स्थान रखता है । |
| 763. |
प्रभु श्री कृष्णजी सबसे बड़े उदाहरण हैं कि प्रभु को कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं था पर फिर भी समाज और देश के लिए स्वधाम गमन तक प्रभु प्रयासरत रहे । प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में श्री अर्जुनजी से यह बात कही । |
| 764. |
पहले राज कन्याओं को युद्ध की शिक्षा दी जाती थी । वे रथ के सारथी का काम जानती थी, प्राथमिक उपचार की जानकारी उन्हें होती थी । इस कारण श्री दशरथजी भगवती कैकेयी माता को अपने साथ युद्ध में ले गए और भगवती सत्यभामा माता को इसी कारण प्रभु श्री कृष्णजी नरकासुर के साथ युद्ध करने के समय साथ ले गए । |
| 765. |
ज्ञान के क्षेत्र में भी कन्याएं श्रेष्ठ होती थी । भगवती गार्गी माता ने ऋषि श्री याज्ञवल्क्यजी की अंतिम परीक्षा ली क्योंकि वे भी ज्ञान में श्रेष्ठ थी । |
| 766. |
मुक्ति दाता और रक्षा दाता प्रभु थे इसलिए 16100 कन्याओं ने प्रभु का वरण किया । प्रभु की पत्नी के रूप में सब जगत की माता बन गईं । प्रभु के विवाह होते ही सबके जीवन में प्रतिष्ठा आ गई, मुक्ति आ गई और आनंद आ गया । |
| 767. |
सूत्र यह है कि प्रभु के जीवन में आते ही सब श्रेष्ठ चीज जीवन में अपने आप ही आ जाती हैं । |
| 768. |
श्री रामावतार में प्रभु ने अहिल्याजी का उद्धार किया पर श्री कृष्णावतार में प्रभु ने 16100 कन्याओं पर अहिल्याजी जैसी विपदा आने से पूर्व उनका उद्धार किया । इन 16100 कन्याओं के भी पिता, भाई और समाज ने उनको स्वीकार नहीं किया था जैसे अहिल्याजी को उनके पति ने स्वीकार नहीं किया था । |
| 769. |
16108 पत्नियों के बाद भी प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं प्रभु का सामर्थ्य देखें और प्रभु का स्वभाव देखें कि इतने बड़े गृहस्थ आश्रम का वहन करने पर भी कभी तनाव ग्रसित नहीं हुए, हरदम तनाव रहित रहे । प्रभु सदैव हंसते रहे, विवाह के बाद भी प्रभु हंसते रहे । |
| 770. |
भारत में दोपहर में भोजन के बाद थोड़ा विश्राम का समय था । अब विदेशों में भी दोपहर में विश्राम देने की परिपाटी शुरू हो गई है । भारतीय ऋषियों के अनुसंधान को उन्होंने भी सही पाया है । |
| 771. |
भारत की परंपरा में जल्दी उठना, सुबह-सुबह काम निपटा लेना, दोपहर आहार के बाद थोड़ा विश्राम करना, इसको विश्व अब मानने लगा है । |
| 772. |
जीवन को सुखी बनाना चाहते हैं तो भारतीय ऋषियों के दिखाएं मार्ग पर चलना अनिवार्य हैं । |
| 773. |
गुण, रूप, शिक्षा, कुल की समानता देखकर पहले विवाह होते थे । आज ऐसा नहीं होता इसलिए दुर्गति हो रही है । |
| 774. |
प्रभु कितने विनोदी हैं इसका एक दृष्टान्त देखें । एक बार भगवती रुक्मिणी माता से प्रभु श्री कृष्णजी बोले कि विवाह समानता वालों में ही होता है । प्रभु बोले - मैं ग्वाला और तुम राजकन्या, माता गोरी और प्रभु सांवले, माता का कुंडलपुर के राजमहल में जन्म हुआ और प्रभु का कारागृह में जन्म हुआ, माता ने शिक्षा पाई और प्रभु ने गौ-चारण किया, माता का बाल्यकाल राजधानी में बीता और प्रभु का बाल्यकाल देहात में बीता । प्रभु बोले कि मैं तुम्हें बचाने प्रेम के कारण नहीं आया, उन दुष्टों के विनाश के लिए आया । भगवती रुक्मिणी माता को इतना बेहाल कर दिया और माता रोते-रोते गिर गई । प्रभु ने उठाया और माता को मनाने लगे । प्रभु विनोद में बोले कि मैंने बिना कारण तुम्हें नहीं रुलाया । प्रभु बोले कि मैंने तुम्हें सजी हुई देखा, हंसते हुए देखा पर रोते हुए कभी नहीं देखा था । इसलिए रुला कर भी अब देख लिया । इतना विनोद प्रभु गृहस्थी में करते थे । यह श्रीलीला प्रभु ने इसलिए करके दिखाई कि जीवन में हास्य का, जीवन में व्यंग्य का, जीवन में विनोद का क्या महत्व है, यह सबको बताने के लिए । |
| 775. |
प्रभु कहते हैं कि जीवन में खुश रहने के लिए शालीनता से हास्य, व्यंग्य और विनोद होते रहना चाहिए । |
| 776. |
प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी श्रीलीला काल में कितने प्रतिकूल समय को देखा । महाभारतजी के युद्ध में उनको पांडव प्रिय थे और उनकी सेना बहुत छोटी थी, सामने कौरवों की बहुत बड़ी सेना थी । शंखनाद के बाद प्रभु के सबसे प्रिय योद्धा श्री अर्जुनजी विषाद में चले गए, धनुष-बाण छोड़ दिया । प्रभु ने दायित्व ले रखा था पांडवों का इसलिए अंत में प्रतिकूलता के बाद भी पांडवों की ही विजय हुई । |
| 777. |
प्रभु ने पैंतालीस मिनट में श्रीमद् भगवद् गीताजी के माध्यम से श्री अर्जुनजी को विषाद मुक्त किया । प्रभु के स्थान पर कोई और होता तो उसे तनाव कितना होता । प्रभु हंसते रहे, मुस्कुराते रहे और प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल दिया । |
| 778. |
युद्ध से पहले श्री अर्जुनजी रो रहे थे और प्रभु मुस्कुरा रहे थे । पूरा श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश प्रभु ने हंसते हुए दिया । हम आज भी श्रीमद् भगवद् गीताजी पढ़ते हैं तो भी अशांत अवस्था में पढ़ते हैं, थके हुए और तनाव ग्रस्त अवस्था में पढ़ते हैं पर प्रभु ने मुस्कुराते हुए उसका विवेचन किया । |
| 779. |
हंसते मुस्कुराते रहकर हम अपने तनाव को घटा सकते हैं, यह शास्त्रों का सिद्धांत है । |
| 780. |
श्रीवेदांत का सूत्र है कि आनंद का स्त्रोत जीवन में होना चाहिए । श्रीमद् भगवद् गीताजी और श्रीज्ञानेश्वरी आत्मानंद के शास्त्र हैं । |
| 781. |
प्रभु श्री कृष्णजी का संपूर्ण गृहस्थ आश्रम ही आनंद का विस्तार था । |
| 782. |
जब परिवार वाले हमें विरोधी स्वर में बोलते हैं तो सुनने की आवश्यकता नहीं होने पर भी मैं सुनने का दिखावा कर रहा हूँ, इसकी आवश्यकता है । |
| 783. |
परिवार वाले कुछ बोले तो उन्हें बोलने देना चाहिए, बीच में टोकना नहीं चाहिए नहीं तो वे और ज्यादा बोलेंगे, यह सिद्धांत है । |
| 784. |
घर-परिवार को प्रसन्नता से भर देना चाहिए । जीते जी जीवन को आनंद तुल्य बनाने का सूत्र प्रभु अपने गृहस्थ आश्रम के माध्यम से हमें देते हैं । |
| 785. |
जीवन में पुरुषार्थ चाहिए तो महाभारतजी का यक्ष प्रश्न देखें और परमानंद चाहिए तो एकादश स्कंध में प्रभु का श्री उद्धवजी को दिया हुआ ज्ञान को देखें । |
| 786. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूँ । |
| 787. |
दक्षिणा के रूप में वित्त की दक्षिणा बहुत सामान्य है । प्रभु से जब दक्षिणा मिलेगी तो ज्ञान का उदय होगा और हम प्रभु की भक्ति को प्राप्त कर सकते हैं । |
| 788. |
भाग्यवान वे होते हैं जिनको प्रभु द्वारा ज्ञान की दक्षिणा मिलती है क्योंकि यह ज्ञान जन्म-जन्मांतर तक खंडित नहीं होता । |
| 789. |
शास्त्र बहुत जोर देते हैं कि प्राणायाम करके स्वस्थ रहना चाहिए और जीवन की अंतिम अवस्था तक निरोग रहने और बलवान रहने के लिए उपक्रम करना चाहिए । |
| 790. |
प्राण की स्थिर अवस्था है तो वह हमें स्वस्थ रख सकता है, नहीं तो नहीं रखेगा । |
| 791. |
बाहर का दिखने वाला स्वास्थ्य ठीक हो पर भीतर का स्वास्थ्य भी ठीक होना चाहिए । आलस्य और अज्ञान के कारण हम भीतर के स्वास्थ्य को खराब कर लेते हैं । |
| 792. |
हमारे मस्तिष्क की कोशिकाओं को कोई दवाई ठीक नहीं कर सकती, उसे प्राणायाम ही ठीक कर सकता है । प्राण शक्ति के नियंत्रण से ही यह संभव होगा । |
| 793. |
शास्त्रों में भगवान शब्द की व्याख्या करी गई है कि छह लक्षण जिसमें होवे वे भगवान हैं । पहला, परिपूर्ण ज्ञान । दूसरा, परिपूर्ण वैराग्य । तीसरा, पंचभूतों पर विजय । चौथा, परिपूर्ण धर्म का पालन । पांचवा, परिपूर्ण यश और परिपूर्ण ऐश्वर्य । छठवाँ, परिपूर्ण सौंदर्य । |
| 794. |
सर्वोत्तम लाभ क्या है ? इस यक्ष प्रश्न के उत्तर में धर्मराज श्री युधिष्ठिरजी ने कहा कि आरोग्य ही सर्वोत्तम लाभ है । |
| 795. |
श्रीमद् भागवतजी महापुराण में भक्ति को सबसे बड़ा मानव जीवन का लाभ बताया गया है । इससे बड़ा ब्रह्मांड में कोई लाभ नहीं है, ऐसा प्रभु ने श्री उद्धवजी को एकादश स्कंध में कहा है । |
| 796. |
आरोग्य कितना भी अच्छा हो तो भी आरोग्य का लाभ जीवन जीने तक है । जीवन के बाद उसका कोई लाभ नहीं है । अंतरंग में परमानंद की प्राप्ति आरोग्य नहीं करा सकता पर भक्ति का लाभ है कि जीवन में परमानंद की प्राप्ति कराता है और जीवन के बाद भी सिर्फ भक्ति से ही परमपद प्राप्त हो सकता है । |
| 797. |
आरोग्य का लाभ तो ले लिया पर भक्ति नहीं करता तो सब बेकार है, ऐसा प्रभु कहते हैं । |
| 798. |
आरोग्य प्राप्ति कर जीवन को प्रभु भक्ति में लगाना ही जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि है । |
| 799. |
शास्त्र कहते हैं कि जीव कीटक के समान ही है जो अपनी पूरी उम्र पाकर मर जाता है । अगर उसने भक्ति नहीं की तो जो भी जीवन में किया वह सब बेकार चला जाता है । |
| 800. |
शास्त्रों में दीर्घकाल के जीवन को सार्थक नहीं माना गया है, सार्थक जीवन सिर्फ भक्ति से ही है । संत श्री ज्ञानेश्वरजी, स्वामी श्री विवेकानंदजी दीर्घायु नहीं हुए पर भक्ति करके अपने जीवन को सार्थक करके इस धराधाम से विदा हुए । |