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BHAKTI VICHAR CHAPTER NO. 32

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. सर्वोत्तम विद्या क्या है ? जीवात्मा और परमात्मा को एकाकार करने का ज्ञान देने वाली विद्या और शास्त्र सर्वोत्तम है । इसे आत्म-विद्या कहते हैं यानी स्वयं को जानने की विद्या ।
002. लज्जा क्या है ? बुरे काम करते समय ग्लानि का भाव आना लज्जा है । यह दैवी संपदा है । श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहा गया है कि जीवन में कुछ बातें करने से हमें शर्म आनी चाहिए । कलियुग में सबसे ज्यादा नाश लज्जा का हुआ है क्योंकि अब गलत काम करते हुए हमें लज्जा ही नहीं आती ।
003. अब युवतियां गलत वस्त्र धारण करके लज्जा नहीं रखती जबकि श्री अर्जुनजी को प्रभु प्रेम उनके दैवी गुण के कारण करते थे । श्री अर्जुनजी में लज्जा रूपी दैवी गुण था कि स्वर्ग में उर्वशी अप्सरा को अल्प वस्त्र में देखकर उन्हें देखा तक नहीं और आँखें नीचे कर ली और माँ कहकर उनको संबोधन किया ।
004. शास्त्र कहते हैं कि पाप हमारे शरीर, मन और दृष्टि तीनों से होता है ।
005. कुछ लोग की आँखों में शर्म होती है और कुछ लोगों का व्यवहार ही बेशर्मी का होता हैं ।
006. मंदिर में पूरे ढ़के हुए सही वस्त्र पहन कर जाना चाहिए क्योंकि वहाँ हमारा प्रभु से मिलन होता है ।
007. शास्त्र कहते हैं कि लज्जा से ही जीवन सुंदर बना रहता है । जितनी जल्दी गलत चीज करने में लज्जा समाप्त होगी उतनी जल्दी जीवन का सौंदर्य भी समाप्त हो जाएगा ।
008. लज्जा रखने पर जीवन में रस बना रहता है । पहले स्त्री-पुरुष में लज्जा ज्यादा थी इसलिए उनके आचरण परम पवित्र होते थे और दांपत्य जीवन भी सुखमय होता था ।
009. शास्त्रों ने लज्जा को जीवन का आभूषण बताया है ।
010. प्रभु के लिए हमें साधन तो करना चाहिए पर उसके बदले में प्रभु से कुछ भी नहीं चाहना चाहिए ।
011. प्रभु के लिए किया साधन का दिखावा दुनिया के सामने कदापि नहीं करना चाहिए ।
012. साधन करते वक्त साधक को शांत जीवन ही व्यतीत करना चाहिए ।
013. साधक को प्रभु के लिए साधन करते वक्त सबमें परमात्मा के दर्शन करने चाहिए और किसी से वैर नहीं रखना चाहिए ।
014. साधक को सबके साथ आत्मीय व्यवहार रखना चाहिए क्योंकि उसके प्रभु सबमें वास करते हैं ।
015. श्री उद्धवजी ने प्रश्न पूछा कि सुख क्या है तो प्रभु ने इतनी सुंदर सुख की व्याख्या करी कि वह अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगी । प्रभु कहते हैं कि अनुकूल वृत्ति सुख है और प्रतिकूल वृत्ति दुःख है । अखंड सुख चाहिए तो इन दोनों वृत्तियों से ऊपर उठ जाना चाहिए तो जीवन में वह जीव आनंद से मालामाल हो जाएगा ।
016. हमें सुख जो मिलता है वह विषयों का है । आँखों ने अच्छा देखा, जिह्वा से अच्छा चखा पर इस सुख के साथ दुःख चिपका हुआ है क्योंकि सुख के सिक्के का दूसरा पहलू दुःख है । सुख का सिक्का जेब में डाला तो दुःख अपने आप स्वतः ही साथ आएगा ।
017. विषयों के सुख को पकड़ने का प्रयास किया तो दुःख आएगा । विषयों से अतीत जो सुख है, जो भक्ति द्वारा प्रभु का परमानंद है, उसे पकड़ने पर दुःख कभी नहीं आएगा क्योंकि उस सिक्के के दोनों हिस्से में परमानंद-ही-परमानंद है, दुःख है ही नहीं ।
018. विषयों का सुख हमें मिला पर उसका उपयोग हमने नहीं किया, उपभोग की बुद्धि नहीं रखी तो विषयों का सुख हमें फंसा नहीं पाएगा और उसकी चाहत हमारे मन में नहीं रहेगी ।
019. श्री उद्धवजी ने प्रश्न किया कि सबसे बड़ा दुःख क्या है तो प्रभु कहते हैं कि कामना के पीछे पड़े रहना ही सबसे बड़ा दुःख है ।
020. प्रभु कहते हैं कि श्रेष्ठ वह जीव है जो कामनाओं से अतीत हो जाता है । कामना की जीवन में जितनी अपेक्षा ज्यादा उतना दुःख ज्यादा और कामना से जितनी अपेक्षा कम उतना दुःख कम ।
021. श्री उद्धवजी ने प्रश्न पूछा कि समझदार पुरुष कौन है ? प्रभु ने जवाब दिया कि किसी काम में उलझा हुआ व्यक्ति और किसी काम में सुलझा हुआ व्यक्ति में से जिसके पास विवेक है वह ही समझदार है । शास्त्रों को रटने वाला समझदार नहीं पर उसमें जो पढ़ा हुआ है उसका उपयोग जटिलता को सुलझाने में करने वाला समझदार है ।
022. श्री उद्धवजी ने प्रश्न पूछा कि मूर्ख कौन है तो प्रभु ने जवाब दिया कि जो शरीर को “मैं” मानकर बैठा है वह सबसे बड़ा मूर्ख है ।
023. श्री उद्धवजी ने प्रश्न पूछा कि प्रभु तक पहुँचने का श्रेष्ठ मार्ग कौन-सा है ? प्रभु कहते हैं कि भक्ति का मार्ग श्रेष्ठ है जो हमें प्रभु तक पहुँचा देता है ।
024. श्री उद्धवजी ने प्रश्न पूछा कि दरिद्र कौन है ? प्रभु कहते हैं जो असंतुष्ट है वह सबसे बड़ा दरिद्र है ।
025. श्री उद्धवजी ने प्रश्न पूछा कि लाचार कौन है ? प्रभु कहते हैं कि जिसका अपनी इंद्रियों पर कोई नियंत्रण और संयम नहीं वह सबसे लाचार है ।
026. श्री उद्धवजी ने प्रश्न पूछा कि सच्चा भाग्यवान कौन है ? प्रभु कहते हैं कि कंचन, कामिनी और कीर्ति पर जिसने विजय प्राप्त कर ली वह सबसे ज्यादा भाग्यवान है । यह तीनों जिसको आधीन नहीं कर पाए वह सबसे बड़ा भाग्यवान है ।
027. श्री उद्धवजी ने प्रश्न पूछा कि सबसे बड़ा दोष क्या है तो प्रभु ने कहा कि दूसरों के दोषों को देखना यह सबसे बड़ा दोष है ।
028. शास्त्र कहते हैं कि अपनी बुराइयों का समर्थन करना बिलकुल गलत है क्योंकि जब तक हम अपनी बुराई को बुराई मानेंगे ही नहीं तब तक वह कभी छूटेगी नहीं ।
029. सबसे बड़ा दुर्गुण क्या है, इसके जवाब में प्रभु ने कहा कि अपनी बुराई को नहीं मानना सबसे बड़ा दुर्गुण है ।
030. अपने कल्याण के लिए तीन मार्ग उपलब्ध है ज्ञान का, कर्म का और भक्ति का पर इसमें श्रेष्ठ मार्ग भक्ति का ही है ।
031. वैराग्यवान के लिए ज्ञान मार्ग है, अनेक कामनाओं वालों के लिए कर्म मार्ग है और परमानंद और मुक्ति वालों के लिए भक्ति मार्ग है ।
032. वह आत्मघाती मनुष्य है जो मानव देह पाकर उसका मोल नहीं जान पाया और मानव जीवन को व्यर्थ कर दिया जो कि एक नैया थी भवसागर पार करने के लिए ।
033. जीवन का मोल क्या है यह केवल सत्संग से ही पता चलता है ।
034. सत्संग हमें मानव जीवन कितना दुर्लभ है इसका भान करवाता है ।
035. मानव जीवन में प्रभु को प्राप्त नहीं किया और सब कुछ प्राप्त कर लिया तो भी वह जीवन पूरी तरह से विफल गया ।
036. श्री उद्धवजी ने पूछा कि नर्क क्या है तो प्रभु ने कहा कि इस जन्म में तमोगुण में डूबा हुआ जीव मानो नर्क में ही रह रहा है ।
037. श्री उद्धवजी ने पूछा कि स्वर्ग क्या है तो प्रभु ने कहा इस जन्म में सतोगुण की प्राप्ति कर लेना स्वर्ग प्राप्त करने जैसा है ।
038. सभी चीजों का केंद्र मनुष्य का मन होता है, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
039. एक उज्जैन के आस-पास का निवासी था । वह व्यापार करता था और ब्याज में पैसे का लेन−देन करता था । उसे विचार आया कि पैसे को कैसे बढ़ाया जाए तो उसने पैसा कमाने के लिए खूब उद्यम किया पर कंजूस इतना था कि घरवालों की जरूरत पूर्ति भी नहीं करता था, सबको रूखी सूखी खिलाकर रखता था । कोई अतिथि सेवा, साधु सेवा, पूजा, गौ-सेवा, अनुष्ठान, सत्कर्म नहीं करता था तो देवतागण उससे रुष्ट हो गए क्योंकि हमारी कमाई में देवताओं का सहयोग होता है । देवतागण के अनुकूल होते ही धन खूब आता है और देवतागण प्रतिकूल हो जाते हैं तो वेग के साथ धन समाप्त हो जाता है । उसके घर में आग लगी तो सबों ने उसके घर का धन लूट लिया, यहाँ तक कि उसके बच्चों ने भी धन लूट लिया । फिर उसके पास कुछ नहीं बचा । सब लोग उसके विरुद्ध हो गए, वह अकेला हो गया और उसे पागल ठहरा दिया गया और घर से निकाल दिया गया । यह सब क्यों हुआ क्योंकि उसका मन धन में अटका था । एक दिन एकांत में बैठे-बैठे उस पर प्रभु की कृपा हुई और उसका मनोभाव ही बदल गया । उसने एक गीत गाया जिसको भिक्षु गीत कहते हैं जो श्रीमद् भागवतजी महापुराण का एक अमर गीत है । वह गीत के माध्यम से कहता है कि मैं दुःखी क्यों हूँ ? पत्नी, बेटे, धन - यह मेरा दुःख का कारण नहीं है, मेरा मन ही मेरे दुःख का सच्चा कारण है ।
040. अगर हम जीवन में दुःखी हैं तो इसका एकमात्र कारण हमारा मन होता है । सूत्र यह है कि अन्य कोई कारण नहीं, न प्रारब्ध, न काल, न ग्रह, न पूर्व कर्म हमें दुःखी कर सकते हैं, केवल हमारा मन ही हमें दुःखी करता है ।
041. मन को नियंत्रण करने वाला जीव प्रतिकूलता में भी सुखी रहेगा और ऐसा नहीं कर पाने वाला अनुकूलता में भी दुःखी रहेगा ।
042. मन को हर परिस्थिति में सुख का अनुभव करना सदैव सीखना चाहिए, ऐसा प्रभु उपदेश करते हैं ।
043. देवतागण, काल, ग्रह, पूर्व कर्म का अधिकार हमारे शरीर पर है पर हमारे मन पर किसी का अधिकार नहीं । हमारे मन पर सिर्फ और मात्र हमारा अधिकार है, ऐसा शास्त्र मत है ।
044. श्रीमद् भागवतजी महापुराण का भिक्षु गीत मन की चिकित्सा करने वाला सर्वश्रेष्ठ गीत है । ऐसा गीत विश्व में कहीं भी अन्यत्र नहीं मिलेगा ।
045. सारी विकट परिस्थिति संतों के जीवन में आने पर भी वे अशांत नहीं हुए क्योंकि उन्होंने अपने मन को वश में करके रखा था ।
046. हमारे जितने दुःख उससे भी अनंत गुना ज्यादा दुःख कितने ही संतों के जीवन में आए पर उन्होंने एकदम आनंदमय जीवन जी कर दिखाया क्योंकि उन्होंने अपने मन को ठीक रखा था ।
047. संत श्री तुकारामजी की पत्नी को घर में अन्न नहीं होने के कारण प्राण त्यागने पड़े । अन्न नहीं दे सकने वाले पति श्री तुकारामजी को मन में कितना दुःख हुआ होगा फिर भी उनका मन आनंदमय था । साहूकार के पैसे नहीं चुकाने के कारण एक संत के घर में बर्तन नीलाम हुए, उनके सामने सब कुछ हुआ फिर भी वे आनंद से भर कर रहे । ऐसा प्रभु से जुड़ा हुआ मन संतों का होता है जिस पर संसार की कोई भी गतिविधि कोई असर नहीं डाल सकती । इसके विपरीत हम तो छोटी-छोटी बातों पर रोने का गाना गाने लगते हैं ।
048. सत्संग कभी बेकार नहीं जाता । जीवन में कहाँ, क्या सुना और पढ़ा हुआ, कब काम आएगा - यह पता नहीं चलता ।
049. प्रभु श्री कृष्णजी को गृहस्थ के प्रपंच की कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि वे स्वयं आनंद स्वरूप हैं । यह सारा गृहस्थ का प्रपंच उन्होंने कैसे गृहस्थ को आनंदमय बनाकर रखा जाए इस लोक शिक्षा हेतु किया ।
050. अहंकार की भाषा एक साधारण व्यक्ति को भी नहीं सुहाती तो फिर प्रभु को कैसे सुहाएगी ।
051. पूर्व समय में सिद्धियों के कारण वैज्ञानिक प्रगति इतनी थी कि चित्रलेखा ने बहुत सारे चित्र श्री अनिरुद्धजी के मनोभाव को जान कर उस राजकुमारी के बना दिए जो श्री अनिरुद्धजी के सपने में आई थी ।
052. पूर्व समय में सिद्धियों के कारण वैज्ञानिक प्रगति इतनी थी कि राजकुमारी ऊषा के पास चित्रलेखा ने एक रात में श्री अनिरुद्धजी को पलंग समेत उठाकर आकाश मार्ग से श्री द्वारकाजी से असम पहुँचा दिया । सिद्धियों से कितना कुछ संभव था ।
053. जैसे सिद्धांत के कारण भीष्म पितामह जानते हुए भी कि कौरव गलत थे उनके साथ बंधे हुए थे और उसके बचाव में युद्ध में आए वैसे ही बाणासुर की आराधना से प्रभु श्री महादेवजी बंधे हुए थे । एक तरफ प्रभु श्री महादेवजी बाणासुर के साथ दूसरी तरफ प्रभु श्री कृष्णजी । प्रभु श्री महादेवजी चाहते थे कि प्रभु श्री कृष्णजी की विजय हो तो उन्होंने प्रभु को प्रेरणा दी कि मुझे आप मोहित करने के लिए मोह बाण चलाएं । मैं मूर्छा में आ जाऊँ तब आप बाणासुर पर विजय प्राप्त कर लें क्योंकि प्रभु श्री महादेवजी के रहते और उनके संरक्षण में बाणासुर पर कोई विजय प्राप्त नहीं कर सकता था ।
054. सूत्र यह है कि गलत चीज में प्रभु अपने आराधक का साथ नहीं देते, प्रभु हमेशा सत्य का ही साथ देते हैं ।
055. अपने मानव अवतार में प्रभु सब जानते हैं और न जानने का नाटक भी श्रेष्ठ रूप में करते हैं ।
056. एक गिरगिट श्री द्वारकाजी के उद्यान में आया । प्रभु ने उसे छुआ तो वह उस गिरगिट योनि से मुक्त हो गया । एक दिव्य आत्मा निकली और प्रभु के सामने आकर प्रणाम किया । वह पूर्व जन्म का राजा नृग था जो बहुत बड़ा दानी था और प्रभु के श्रीहाथों उसका उद्धार हुआ ।
057. सूत्र यह है कि प्रभु के छूने मात्र से अधम जीव मुक्त हो जाते हैं ।
058. राजा नृग ने बहुत सारा गोदान किया मगर एक गलत गोदान के कारण गलती से वे गिरगिट बने । सभी दूध देने वाली गौ-माता के सींग में स्वर्ण, पैरों में चांदी, रेशम वस्त्र से ढ़की हुई करोड़ गौ-माताओं का उन्होंने दान किया । गलती यह हो गई कि हजार गौ-माताओं का दान एक ब्राह्मण को किया, उसमें से एक गौ-माता किसी दूसरे ब्राह्मण की थी जिसका दान भी राजा नृग ने ही किया था । वह घास चरते-चरते भटक गई और वापस राजा की गौशाला में आ गई । जब वह ब्राह्मण गौ-माता को लेकर जा रहा था तो जिस ब्राह्मण की वह एक गौ-माता थी उसने देख लिया । दोनों राजा के पास पहुँचे । राजा ने देखा कि मेरे सेवक की गलती हुई है । राजा ने एक गौ-माता के बदले दस, फिर सौ, फिर हजार, फिर एक लाख गौ-माताओं का उसे दान देने का वादा किया पर दोनों ब्राह्मण उस गौ-माता को छोड़ने को तैयार नहीं हुए । सिद्धांत यह है कि दान उस वस्तु का हो सकता है जो अपनी हो । राजा ने गलती से एक गौ-माता, जो उनकी नहीं थी, उसका दान किया । इस गलती के कारण उन्हें गिरगिट बनना पड़ा ।
059. सेवक की गलती मालिक के माथे ही होती है, यह सिद्धांत है जो राजा नृग की कथा से प्रभु बताना चाहते हैं ।
060. जहर पीने से जहर पीने वाला मरता है पर धर्म का धन यानि ब्राह्मण का धन, किसी विधवा का धन, किसी प्याऊ का धन, किसी मंदिर का धन, किसी गौशाला के धन का उपयोग अगर जानकर किया जाता है या अनजान में भी किया जाता है तो वह ऐसा करने वाले कुल की पीढ़ियों का विनाश कर देता है ।
061. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु ने कहा कि यज्ञ, ज्ञान और तप करते रहना चाहिए पर भक्ति कभी त्यागना नहीं चाहिए ।
062. अनीति से कमाए अशुद्ध धन से कभी दान नहीं करना चाहिए क्योंकि वह देने वाले और लेने वाले दोनों का मंगल नहीं करता ।
063. अनीति से कमाए अशुद्ध धन के दान करने से खामियाजा देने वाले और लेने वाले दोनों को भुगतना पड़ता है ।
064. शुद्ध धन से दान करने से जैसे एक कमरे में खिड़की से नई हवा भीतर आती है वैसे ही शुद्ध धन कमाई के माध्यम से वापस हमारे पास आ जाता है ।
065. बिना भावना के भगवती गंगा माता में स्नान करने से भी पुण्य मिलता है पर जो पूरे भाव से, श्रद्धा से, माता को दंडवत करके और आज्ञा लेकर स्नान करते हैं उन्हें श्रेष्ठ पुण्य मिलता है ।
066. प्रभु धन की शुद्धता की महिमा बताते हैं । धनवान होना अपराध नहीं है पर अशुद्ध रूप से कमाया हुआ धन के कारण उस जीव को भयंकर परिणाम भुगतना पड़ता है ।
067. किसी से सौ रुपया लिया और लौटाया नहीं और प्रभु प्राप्ति हेतु साधन कर रहे हैं तो वह जब तक चुकाया नहीं जाएगा तब तक साधन सफल नहीं होगा ।
068. उत्तम साधन करने वाला अपने द्रव्य की शुद्धता का विशेष ध्यान रखता है । जो अन्न उसके पेट में जा रहा है वह शुद्ध धन का होना अनिवार्य है अगर उसे प्रभु प्राप्ति करनी है ।
069. एक बहुत-बहुत पवित्र जीवन जीने वाले संत की समाधि की अवस्था में छह आने चुकाने की आवाज उनके भीतर से आई । उनको एक पंसारी को छह आना देना शेष था । पंसारी ने मांगा नहीं क्योंकि वे महात्मा थे और उस पंसारी ने अपनी बही में हिसाब बराबर कर दिया । प्रभु के यहाँ उनका हिसाब बंद नहीं हो तो समाधि से पहले आवाज आई । उन्होंने जाकर खोज कर पंसारी को छह आने दिए तब जाकर उनकी समाधि लगी ।
070. अशुद्ध धन का अन्न खाकर प्रभु का साक्षात्कार नहीं हो सकता ।
071. हवा, मिट्टी, पानी से हमारा जीवन शुद्ध नहीं होता । हमारा धन शुद्ध हो तो ही जीवन शुद्ध होता है क्योंकि शुद्ध धन से ही हमारे घर के पूरे वातावरण में शुद्धता आती है ।
072. किसी ने हमारा अपमान किया, उसका वापस अपमान कभी नहीं करना चाहिए, शास्त्र ऐसा कहते हैं ।
073. प्रभु ने श्री अर्जुनजी के सामने श्रीमद् भगवद् गीताजी में और अपने पुत्रों-पौत्रों के सामने स्वयं का उदाहरण दिया क्योंकि प्रभु का जीवन श्रेष्ठतम था । क्या हम अपना उदाहरण अपने पुत्र- पौत्र को हर चीज में दे सकते हैं ?
074. प्रभु ने हरदम अपने पुत्र और पौत्रों के साथ आध्यात्मिक विषय में बातचीत की । क्या हमने कभी अपने बच्चों से पूछा, उनसे चर्चा करी कि परोपकार क्या होता है ? हम उनसे अन्य चर्चा करते हैं पर अध्यात्म की चर्चा करना भूल जाते हैं क्योंकि हमारी खुद की रुचि ही आध्यात्मिक नहीं होती ।
075. अध्यात्म का ज्ञान अगर हमने बच्चों को नहीं दिया तो कौन देगा क्योंकि वर्तमान की शिक्षा प्रणाली यह नहीं देती ।
076. संपन्न रहना है, निरोग रहना है तो शुद्ध धन का दान पात्र व्यक्ति को करना चाहिए ।
077. कभी-कभी अच्छा कर्म जैसे हवन करते हुए एक गलती से हाथ जल जाता है, इसलिए जीवन में गलती करने से सदैव बचना चाहिए ।
078. उत्तर स्वयं देना एक बात है पर सही उत्तर की दिशा में बच्चों को पहुँचा देना उससे भी बड़ी बात है । प्रभु श्री कृष्णजी सही उत्तर की दिशा में अपने पुत्र और पौत्रों को मोड़ते थे, सिर्फ स्वयं उत्तर देकर अपने कर्तव्य से इतिश्री नहीं कर लेते थे ।
079. हर व्यक्ति को उसकी रुचि के हिसाब से काम पर लगाना चाहिए । लोगों को हम बदल नहीं सकते तो यह देखना चाहिए कि उनकी उपयोगिता कहाँ है और उन्हें वहाँ लगा देना चाहिए । प्रभु श्री कृष्णजी ऐसा ही करते थे ।
080. एक कृत्या राक्षसी को प्रभु के श्री सुदर्शन चक्रराजजी ने जलाया और उस स्थान को जला दिया जहाँ कृत्या का निर्माण अनुष्ठान से हुआ था । सूत्र यह है कि आतंकी के साथ उनके जड़ स्थान को भी नष्ट कर देना चाहिए, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
081. किसके पास कैसे जाया जाए यह कला प्रभु श्री कृष्णजी से सीखनी चाहिए । किसके पास दूत बनकर, किसके पास मित्र बनकर, किसके पास सेना लेकर युद्ध हेतु जाना चाहिए - प्रभु जानते थे ।
082. पांडवों का जन्म जंगल में हुआ इसलिए ऋषियों और मुनियों को देखकर श्रेष्ठ संस्कार उनमें आए । कौरवों का जन्म एक अंधे पिता के यहाँ हुआ और माता ने भी आँख होते हुए भी आँखों पर पट्टी बांध रखी थी । सूत्र यह है माँ-बाप आँखों पर पट्टी बांध लेंगे तो घर में दुर्योधन और दुशासन ही जन्म लेंगे ।
083. मनुष्य की भाषा शैली से उसकी सभ्यता का पता चलता है, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
084. अपनी भाषा को मृदु बनाकर रखना चाहिए चाहे जीवन में अन्य कुछ भी नहीं कर पाए । सिंहासन, धन, राज्य सब कुछ गंवाने पर भी भगवती कुंती माता सहन कर गई पर भगवती द्रौपदीजी का अपमान नहीं सह पाई, कौरवों की भाषा के कारण । जिस गंदी भाषा का प्रयोग राज्यसभा में भगवती द्रौपदीजी हेतु कौरवों ने किया उस करण ही महाभारत युद्ध हुआ ।
085. देव कोप को कभी भी काल्पनिक बात नहीं माननी चाहिए । देव कोप जीवन में न हो इसके लिए हमेशा सावधान रहना चाहिए ।
086. किसी का अकल्याण कभी भी नहीं करना चाहिए, करना तो दूर, ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए ।
087. सबका आकलन करके सबसे व्यवहार करना चाहिए क्योंकि सबसे एक समान व्यवहार नहीं हो सकता ।
088. प्रभु की 16108 रानियों का गृहस्थ देखने हेतु एक बार देवर्षि प्रभु श्री नारदजी आए । जिन-जिन 16108 महलों में वे गए हर जगह प्रभु को अलग-अलग कार्य करते हुए आनंद में देखा । देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के चरण प्रभु के हर महल में प्रभु ने धोए, माला पहनाई और भोजन कराया । सौ महल पूरे हुए इतने में देवर्षि प्रभु श्री नारदजी को चरण धुलते-धुलते छींक आने लगी और माला पहनते-पहनते थक गए और खाते-खाते पेट फूल गया । देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने प्रभु श्री कृष्णजी के श्रीकमलचरण पकड़ लिए । भगवद् माया का पार नहीं, यह कहकर देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने विदा लिया ।
089. प्रभु ब्रह्म मुहूर्त में सबसे जल्दी 3:30 बजे उठते थे । यह आदत जीवन में आ जाए तो कल्याण हो जाता है । फिर प्रभु ध्यान में बैठते थे । फिर प्रभु स्नान, संध्या वंदन, पूजा और तर्पण करते थे । फिर प्रभु अपने माता-पिता को प्रणाम करते थे । फिर प्रभु पूजा के वस्त्र बदलते थे । फिर प्रभु का श्रृंगार होता और प्रभु स्वर्ण कटोरे में गौ-माता के घी में मुख देखकर दान किया करते थे । फिर पान का बीड़ा माता प्रभु को देती थी । फिर प्रभु अपने गृह के सभी सेवकों से प्रेम से मिलते । फिर प्रभु का रथ लेकर उनके सारथी दरुखजी आते थे । माताएं प्रभु को राज्यसभा हेतु विदा करती थी । फिर राज्यसभा में प्रभु विराजते थे । ऐसी प्रभु की मंगल बेला की दिनचर्या प्रभु श्री शुकदेवजी श्रीमद् भागवतजी महापुराण में बताते हैं ।
090. प्रभु के समय कैसे-कैसे दुष्ट राजा हुए । एक दुष्ट राजा ने 84 राजाओं को हराकर बंदी बना लिया और उन्हें अपने राजधानी ले आया । अब 16 राजाओं को पकड़ने का संकल्प किया । फिर यज्ञ करके बलि में जानवर की जगह सौ राजाओं की बलि की योजना बनाई । 84 राजाओं ने प्रभु को संदेश भेजा और प्रभु ने आकर युद्ध करके उन्हें मुक्त कराया ।
091. भारतीय परंपरा थी कि पान का बीड़ा पत्नी द्वारा बनाया हुआ होता था । तिलक विप्र यानी ब्राह्मण द्वारा किया हुआ होता था । खाना बनाती पत्नी थी पर परोसने का और खिलाने का काम माता का होता था । कितनी अदभुत भारतीय व्यवस्था और परंपरा थी ।
092. प्रभु पूरे ब्रह्मांड के अलंकार हैं फिर भी सेवक प्रभु को अलंकारों से सजाते हैं ।
093. यह भारतवर्ष का देश स्वर्ण भूमि थी । पूजा का, दान का धातु सदैव स्वर्ण का होता था । भारतीय परिवार इतने समृद्ध होते थे क्योंकि घर में इतना स्वर्ण होता था कि भारतीय ऋषियों द्वारा व्यवस्था की गई थी हर चीज में स्वर्ण का उपयोग होता था ।
094. संपत्ति बढ़ने पर यज्ञ, अनुष्ठान और दान करने की व्यवस्था थी । कंजूसी से संपत्ति का संग्रह करके रखने से संपत्ति का किसी भी निमित्त से नाश होता है, यह भारतीय सिद्धांत था ।
095. एक द्युत में जाने के लिए पांडवों ने प्रभु से नहीं पूछा और विपत्ति में फंस गए । इस एक अपवाद के अलावा पांडवों ने जीवन में कभी भी प्रभु को किसी भी चीज में अनदेखा और अनसुना नहीं किया । यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी ।
096. अकेले निर्णय लेने की क्षमता होने पर भी अकेले निर्णय नहीं लेना चाहिए । परामर्श करके ही निर्णय लेना चाहिए । किन से बात करना है यह भी देखना चाहिए । अकेले नहीं तो बड़ी भीड़ के साथ भी बात नहीं करनी चाहिए । कम-से-कम तीन व्यक्ति और अधिक-से-अधिक पांच व्यक्ति जो संबंधित विषय के जानकार हों उनसे मिलकर निर्णय लेना चाहिए, यह भारतीय शास्त्रों का प्रबंधन था ।
097. प्रभु ने भी हमेशा अपने मंत्रिमंडल और श्री उद्धवजी को निर्णय में अपने साथ रखा था ।
098. हर कार्य को एक आदर्श स्वरूप प्रभु ने अपनी श्रीलीला काल में प्रस्तुत किया था ।
099. जीवन में अच्छा काम करना चाहिए तो गालियां सुनने का भी अभ्यास रखना चाहिए । प्रभु ने अपने जीवन में ऐसा करके दिखाया और जरासंध एवं शिशुपाल ने प्रभु को गालियां तक दी ।
100. श्री भीमसेनजी 27 दिन में जरासंध को हरा नहीं पाए तो फिर प्रभु की शरण में गए तो फिर प्रभु ने 28वें दिन तिनके को चीरकर, अलग करके, अलग दिशा में फेंका और संकेत दिया कि जरासंध को फाड़कर अलग दिशा में फेंका जाए तो जरासंध मर जाएगा ।
101. अपने बल पर कुछ भी करेंगे तो हम उसमें सफल नहीं होंगे पर प्रभु को सामने रखकर और प्रभु की आज्ञा से जो भी काम किया जाएगा उसमें सफलता जरूर मिलती है ।
102. जरासंध को मारने के बाद प्रभु ने राज्य स्वयं नहीं रखा, जरासंध के बेटे सहदेव को दिया । सहदेव प्रभु का भक्त बना । दुश्मन के बेटे को भी प्रभु ने मित्र बना लिया ।
103. बालि को प्रभु ने मारा और श्री अंगदजी प्रभु के भक्त बन गए । रावण सबसे ज्यादा श्री अंगदजी को फूट डालकर तोड़ना चाहता था उनके पिता को मारने वाले की दुहाई देकर और धन का लालच देकर । प्रभु ने स्वयं श्री अंगदजी को दूत बनाकर लंका भेजा कि रावण चाहे जो करके देख ले, मेरा भक्त मुझसे अलग नहीं हो सकता । मेरे भक्त पर कोई अन्य लालच या दुहाई काम नहीं करती, यह प्रभु सबको बताना चाहते थे ।
104. प्रभु ने 84 राजाओं को मुक्त कराया । सभी राजा प्रभु को बहुत कुछ देना चाहते थे पर प्रभु ने कुछ भी नहीं लिया । सबने कहा कि प्रभु हम आपको वचन देते हैं कि हमसे कोई सेवा लेवें तो प्रभु ने उनकी सेवा अपने भक्त पांडवों हेतु कुरुक्षेत्र के युद्ध में ली ।
105. सूत्र यह है कि प्रभु ने अपने लिए कुछ भी नहीं लिया, कभी भी, किसी से भी और सबकी भलाई करते गए ।
106. पापियों को सजा नहीं देने का अर्थ है सज्जनों को कष्ट देना क्योंकि पापी सज्जनों को कष्ट पहुँचाते हैं, यह शास्त्र मत है ।
107. अगर हमारे दायित्व में आता है कि किसी पापी को दंड देना और हम नहीं देते तो उसका पाप हमें लगता है ।
108. अपने भीतर प्रभु भक्ति का भाव इतना प्रबल होना चाहिए कि जो भी हमारे संपर्क में आए उसमें वह भक्ति भाव जागृत हो जाए ।
109. छत्रपति श्री शिवाजी की राष्ट्रभक्ति इतनी जोर की थी कि जो भी उनके संपर्क में आया उनके भीतर राष्ट्रभक्ति के बीज उन्होंने अंकुरित कर दिए । छत्रपति श्री शिवाजी ने चोरों को भी राष्ट्रभक्त बना दिया ।
110. कोषाध्यक्ष बनकर राजसूय यज्ञ में पांडवों की अपार संपत्ति देखी पर दुर्योधन का मन बदला शकुनि ने जिसने उसको भड़काया फिर द्युत का खेल खेलना तय किया ।
111. सूत्र यह है कि कुसंगति से हमेशा जीवन में बचना चाहिए ।
112. कर्ण से दो गलती हुई । पहली, श्री अर्जुनजी से जीवनभर द्वेष का भाव रखा, कभी भी श्री अर्जुनजी ने कर्ण से ईर्ष्या नहीं की । दूसरी, शकुनि, दुर्योधन, दुशासन की चौकड़ी में सहभागी हुए जिसे टीकाकार दुष्टों की चौकड़ी कहते हैं ।
113. यह संसार भांति-भांति के विचारधारा के लोगों से भरा पड़ा है, उनके बीच में हमें अपनी आध्यात्मिक विचारधारा को बचाए रखना है ।
114. व्यासपीठ पर बैठा हुआ छोटा बालक भी वंदनीय है । उसके पिता भी सामने बैठे हो तो बेटा व्यासपीठ से उठकर प्रणाम नहीं करेगा । पिता प्रणाम करेंगे व्यासपीठ में बैठे अपने बेटे को । व्यासपीठ का इतना सम्मान है ।
115. एकांतवासी और सजग व्यक्ति की प्रज्ञा खिल जाती है ।
116. धन का ज्यादा संग्रह सुख की जगह दुःख लाता है क्योंकि ज्यादा धन के साथ खटपट बहुत जुड़ी हुई होती है ।
117. धन कमाया और कंजूसी भी की तो इस जन्म में भी ताप देता है और परलोक में भी नर्क देगा क्योंकि कमाए धन को कंजूस बनकर हमने कोई सत्कर्म में नहीं लगाया ।
118. अनीति का धन तो कभी भी घर में नहीं लाना चाहिए क्योंकि उसमें कलियुग का वास होता है ।
119. धन कमाने में प्रयास, धन सुरक्षित रखने की चिंता, धन बढ़ाने में तन-मन लग जाता है, मन में सदैव धन का विचार रहना, धन हमें विकार देता है, हिंसा, कर चोरी, झूठ बोलना, दिखावा, क्रोध बढ़ता है, दोगलापन बढ़ता हैं, कामनाएं बढ़ती हैं, अहंकार बढ़ता है, सबके लिए अविश्वास का भाव निर्माण होता है, पहले अविश्वास होता है फिर वह वैर बन जाता है, बिना कारण स्पर्धा करने की आदत बन जाती है, व्यसन के रूप में बुराइयां जीवन में आ जाती है । श्रीमद् भागवतजी महापुराण के भिक्षु गीत में यह पन्द्रह दोष धन के बताए गए हैं जिसे संतों ने अनर्थ माना है और कहा है कि अर्थ (धन) में अनर्थ के रूप में इन तत्वों को देखना चाहिए और इनसे बचना चाहिए ।
120. आजीविका हेतु धन कमाना बुरा नहीं है पर अनीति से अत्यधिक धन संग्रह करने वाले के साथ अनर्थ रूपी पन्द्रह दोष आ जाते हैं, ऐसा शास्त्र मत है ।
121. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में भिक्षु गीत गाते हुए भिक्षु के मन में विचार आया धन को खान-पान, मौज-मस्ती में मैंने नहीं लगाया, सिर्फ संग्रह किया । अब वह चला गया पर अगर नहीं जाता तो भी मैं सत्कर्म में उपयोग नहीं करता अपनी कंजूसी के कारण । मेरे मन में तब भावना होती कि धन है पर उपयोग नहीं । आज भावना है कि धन नहीं है तो उपयोग की स्थिति में भी मैं नहीं हूँ । इससे भिक्षु ने सबसे बड़ा सूत्र निकाला कि मन ही सुख-दुःख का कारण है । बाहर की स्थिति के कारण जो परिवर्तन आता है उसके बाद भी अगर मैंने निश्चय कर लिया कि मैं दुःखी नहीं होऊंगा तो किसी की ताकत नहीं कि मुझे दुःखी कर दे ।
122. क्या हमने जीवन में प्रसन्न होने का साधन सीखा है ? क्या हमने ऐसा साधन सीखा है कि हम सदैव प्रसन्न रहें, कैसी भी स्थिति में हम क्यों न हों ।
123. शास्त्र कहते हैं कि हमारे भीतर आत्मजयी होने की भावना होनी चाहिए ।
124. मन को नियंत्रित करना जिसने सीख लिया वही श्रेष्ठ है क्योंकि प्रतिकूल स्थिति में भी वह दुःख की जगह सुख खोज लेगा ।
125. एक कुली जब बोझ उठाता है तो वह चाहता है कि कम बोझ उठाऊँ, उसके मन की भूमिका ऐसी कि ज्यादा बोझ उठाने मिलने पर वह दुःखी होता है । वही एक पहलवान ज्यादा-से-ज्यादा बोझ उठाने की इच्छा रखता है मेडल जीतने के लिए, उसके मन की भूमिका होती है कि ज्यादा-से-ज्यादा बहुत उठाने को मिले तो मैं सुखी होऊँ । मन की भूमिका दोनों जगह अलग-अलग जिस कारण एक अवस्था में ज्यादा बोझ पर दुःख और एक तरफ ज्यादा बोझ उठाने पर सुख ।
126. सूत्र यह है कि हमारी मन की भूमिका ही हमें सुख और दुःख देती है । समझदार वह व्यक्ति है जो अपनी मन की भूमिका को सदैव सुख खोजने में लगाता है ।
127. भक्ति भावना के कारण हमारी संकल्प शक्ति इतनी बढ़ जाती है कि हम प्रभु की प्रसन्नता के लिए सावन सोमवार का व्रत करते हैं और हमारा मन व्रत पालन करने पर आनंदित होता है । दूसरे दिन जिस दिन व्रत नहीं है उस दिन खाने को नहीं मिले तो मन दुःखी हो जाता है । पहले दिन कुछ नहीं खाकर भी सिर्फ संकल्प शक्ति के कारण मन प्रसन्न रहा था । संकल्प शक्ति में इतना बल होता है ।
128. संतों ने मन की भावना को बहुत बड़ा माना है । उदाहरण के तौर पर समझे कि एक व्यक्ति को साँप ने दंश किया पर किसी ने कहा कि साँप जहरीला नहीं था तो वह व्यक्ति काम पर लग जाएगा । दो घंटे काम किया फिर किसी ने कह दिया कि वह साँप बहुत जहरीला था तो वह बेसुध हो जाएगा और तबीयत बिगड़ने का अनुभव उसे होने लगेगा ।
129. हम ठीक हैं पर दिन भर में दस लोगों ने कह दिया कि आप कमजोर और बीमार लग रहे हैं तो शाम तक हमारा मन खुद को कमजोर और बीमार मानने लगेगा । हमारा मन ऐसा करवा देता है ।
130. मन का सही दृष्टिकोण होने पर हमारे जीवन में वह बहुत प्रसन्नता लाता है ।
131. सूत्र यह है कि संतों ने अपने मन का दृष्टिकोण को इतना सकारात्मक बनाकर रखा और मन को प्रभु से जोड़कर रखा, जिससे वह सात्विक बना रहता है ।
132. जिस दिन कुछ नहीं मिले उस दिन मानना कि प्रभु ने निर्जला एकादशी का मौका दे दिया । ऐसा मानते ही जो भावना नकारात्मक थी वह तुरंत सकारात्मक हो जाती है ।
133. प्रभु का एक मंदिर बन रहा था । वहाँ पत्थर तोड़ने वाले तीन व्यक्ति काम कर रहे थे । एक संत ने पूछा पहले व्यक्ति से तो वह चिढ़ कर बोला कि देखते नहीं मैं पत्थर तोड़ रहा हूँ । दूसरे व्यक्ति से पूछा तो उसने कहा कि पापी पेट के कारण पत्थर तोड़ रहा हूँ । दोनों का दृष्टिकोण साधारण था । तीसरे से पूछा तो उसने बहुत प्रसन्नता से कहा कि प्रभु का मंदिर बन रहा है और प्रभु ने मुझे अपनी सेवा अर्पित करने का शुभ अवसर देने की कृपा करी है, वही सेवा मैं दे रहा हूँ । तीनों काम एक ही कर रहे थे पर दृष्टिकोण तीनों का अलग-अलग था ।
134. हमारे सारे शास्त्र दृष्टिकोण बदलने हेतु, मन बदलने हेतु हैं कि हमारा मन प्रभुमय हो जाए ।
135. मन को नियंत्रित करके हम सभी प्रतिकूलता को चीरते हुए प्रभु तक पहुँच सकते हैं ।
136. संत श्री एकनाथजी और संत श्री तुकारामजी के जीवन में बहुत प्रतिकूलता आई फिर भी वे दोनों संत प्रतिकूलता को चीरते हुए प्रभु तक पहुँच गए ।
137. सारा आनंद अपने दृष्टिकोण में होता है, पदार्थों में नहीं होता, यह सूत्र है ।
138. सत्संग करने वाला कभी विषाद में नहीं जाता, प्रतिकूल परिस्थिति होने पर भी नहीं जाता क्योंकि प्रभु पर उसका विश्वास सत्संग से बन चुका होता है ।
139. सिद्धांत प्रतिपादित करने में और सरल भाषा की दृष्टि से श्रीमद् भागवतजी महापुराण का कोई विकल्प नहीं है ।
140. प्रभु एक पंक्ति में मन को कैसे नियंत्रित किया जाए इसका सार देते हैं । विषयों को ग्रहण करती है इंद्रियां, इंद्रियां अधीन रहती है मन के । प्रभु कहते हैं कि इस मन को बुद्धि यानी विवेक के अधीन कर लें ।
141. आज संघर्ष यही है कि विवेक कहता है कि जल्दी उठो पर मन कहता है कि इतनी अच्छी नींद आ रही है सोने दो ।
142. प्रभुमय बुद्धि होनी चाहिए, ऐसी बुद्धि हो तो मन नियंत्रित होता है और मन से इंद्रियां नियंत्रित होती है ।
143. प्रभुमय बुद्धि मन को नियंत्रित करती है, मन फिर इंद्रियों को नियंत्रित करता है, यह सबसे ऊँ‍चा प्रबंधन है मन का जो श्री उद्धवजी को प्रभु बताते हैं ।
144. संसार में कोई नहीं जिसके भीतर सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण नहीं हो । सबके भीतर यह तीनों गुण हैं पर प्रधानता एक गुण की होती है ।
145. जैसे हम अपने स्वयं का ब्लड प्रेशर और शुगर नापते हैं वैसे ही हमें अपने स्वयं का निरीक्षण करना चाहिए, अपने मन को नापना चाहिए कि वह उस समय सतोगुणी है, रजोगुणी है या तमोगुणी है । यह हमें बीच-बीच में स्वयं जांच करते रहना चाहिए ।
146. सतोगुण को मापने का एक मापदंड यह है कि मन प्रसन्न है क्या ? किसी भी परिस्थिति में मन प्रसन्न रहना सतोगुणी मन होता है ।
147. सतोगुण को मापने का एक मापदंड यह है कि इंद्रियों में शांति है क्या ? व्याकुलता तो नहीं है ।
148. सतोगुण को मापने का एक मापदंड यह है कि मन में कोई भय तो नहीं है, मन अभय है क्या प्रभु के शरणागत होने पर ।
149. सतोगुण को मापने का एक मापदंड यह है कि मन में किसी की असक्ति तो नहीं है, मन किसी के लिए व्याकुल तो नहीं है, मन सिर्फ प्रभु में आसक्त हो ।
150. सतोगुण को मापने का एक मापदंड यह है कि मन सबसे असंग है क्या ? किसी भी स्थान, व्यक्ति, वस्तु से मन चिपका हुआ तो नहीं है । मन चिपका हुआ हो तो सिर्फ प्रभु से ।
151. सतोगुण को मापने का एक मापदंड यह है कि मन जिस चीज की जरूरत नहीं उस तरफ ध्यान ही नहीं देता और इधर-उधर नहीं जाता ।
152. सतोगुण को मापने का एक मापदंड यह है और सतोगुण की कसौटी यह है कि मन का पूरा झुकाव प्रभु की तरफ हो, संसार की तरफ एकदम भी नहीं हो ।
153. सतोगुण मापने का एक मापदंड यह है कि सत्संग सुनने की इच्छा हो, सुनकर समझने की इच्छा हो, जो समझ गया उसको जीवन में धारण करने की इच्छा होती है क्या ?
154. हमें यह बीच-बीच में जांचते रहना चाहिए कि हमारे मन में सतोगुण का उदय तो है ना, अन्य कोई गुण का उदय तो नहीं है ।
155. रजोगुण में मन में किसी भी प्रकार की शांति नहीं होती, व्याकुलता बनी रहती है ।
156. रजोगुण का जब प्रभाव होता है तो रोग द्वारा तन की पीड़ा होती है डर द्वारा मन की पीड़ा होती है ।
157. रजोगुण में मन भ्रांति युक्त होता है, किसी भी चीज पर मन एकाग्र नहीं होता ।
158. रजोगुण में चित्त में चंचलता बनी रहती है ।
159. तमोगुण में किसी भी काम में पूरी तरह से मन नहीं लगता, मन हरदम अन्यत्र भटकता ही रहता है ।
160. तमोगुण में किसी सत्संग की बात सुनना अच्छा नहीं लगता और उसे जीव ग्रहण नहीं कर पाता और भूल जाता है ।
161. तमोगुण में क्रोध, लोभ, ग्लानि, झूठ, हिंसा, कलह, शोक और मोह का जीवन में बोलबाला रहता है ।
162. ऐसे समझना चाहिए कि तमोगुण वाला व्यक्ति बैठा है पर उसकी बुद्धि सो रही होती है, वह कुछ भी ग्रहण नहीं कर पाता ।
163. पहले छात्रों में भी एकपाठी छात्र होते थे यानी एक बार सुना और सतोगुण के कारण ग्रहण कर लिया । कुछ त्रिपाठी होते थे यानी तीन बार सुना तब ग्रहण किया, ऐसे छात्र रजोगुणी छात्र होते थे ।
164. भारतीय परंपरा रही है कि शास्त्र मार्ग हमें अकेले ही सही दिशा में ले जाता है । इतना वैज्ञानिक सिद्धांत विश्व में कहीं भी नहीं मिलेगा ।
165. तमोगुण पशुमय जीवन जीने का नाम है क्योंकि बुद्धि पशु जैसी सोई हुई होती है ।
166. मंदिर में, वन में, आश्रम में निवास करना सात्विक निवास माना गया है ।
167. अपने घर पर निवास करना राजस निवास माना गया है ।
168. होटल में जो जुआखाने और मदिरालय युक्त स्थान हैं उनमें निवास करना तामस निवास माना गया है ।
169. तमोगुणी व्यक्ति को मोह बहुत अच्छा लगता है, आलस्य बहुत अच्छा लगता है, किसी भी चीज को समझने की चेष्टा नहीं होती और चिंता ज्यादा होती है ।
170. भक्ति सर्वोच्च है, भक्ति से बड़ा कोई सिद्धांत नहीं है, नहीं है और नहीं है । ऐसा शास्त्र बहुत जोर देकर कहते हैं ।
171. ज्ञान भक्ति को बढ़ाता है क्योंकि प्रभु के बारे में ज्ञान प्रभु के बारे में हमारे सोचने के नजरिया को ही बदल देता है । फिर भी ज्ञान मार्ग को सदैव पकड़कर नहीं रखना चाहिए और भक्ति मार्ग को कभी छोड़ना नहीं चाहिए, यह सूत्र है ।
172. विषय से भोगों से जो सुख मिलता है, वह राजस सुख है ।
173. श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं कि सर्वोच्च सुख अंतरंग में परमात्मा तत्व की जागृति का सुख होता है । उसे प्रभु सुख नहीं बल्कि परमानंद कहते हैं । यह सात्विक है और यह सबसे बड़ा प्रभु का प्रसाद है ।
174. मनुष्य को चाहिए कि संसार की उपेक्षा करके प्रभु का भजन करें, श्री उद्धवजी से प्रभु यह कहते हैं ।
175. भक्ति न करते हुए जो किसी भी अन्य मार्ग पर चलता है तो उसे जीवन में विपत्ति भुगतनी ही पड़ती है ।
176. मानव देह की प्राप्ति बहुत बड़ी परमात्मा की कृपा है । इसलिए सर्वदा प्रभु की भक्ति, प्रभु का भजन करना चाहिए, कभी भी इसका त्याग नहीं करना चाहिए । इससे विकारों का दमन होगा और रजोगुण और तमोगुण दब जाएंगे । वे नष्ट नहीं होते पर नष्टप्राय हो जाते हैं और उनका उपद्रव शांत हो जाता है । जैसे साँप के जहर के दांत निकाल दिए जाएं फिर उसे खोल भी दिया जाए तो वह कोई हानि नहीं पहुँचाएगा । वैसे ही रजोगुण और तमोगुण को भक्ति से कम करना चाहिए और सतोगुण की स्थिति में रहना चाहिए और प्रभु की भक्ति करते रहना चाहिए, यह श्रेष्ठ अवस्था है ।
177. अपने में ज्ञान और सात्विकता होने पर भी जीव कैसे माया में फंसता है इसका एक दृष्टांत श्रीमद् भागवतजी महापुराण में मिलता है । श्री उद्धवजी को प्रभु एक राजा की कथा सुनाते हैं । वह प्रतापी राजा था, एक प्रसंग ऐसा उनके जीवन में आया जो अप्सरा उर्वशी के कारण उन्हें पतनोन्मुख होना पड़ा । राजा बार-बार देवताओं के संपर्क में रहता था और उन्हें मदद भी करता था । वह स्वर्ग आता-जाता रहता था । प्रभु श्री ब्रह्माजी ने उर्वशी को श्राप देकर कुछ समय के लिए मृत्युलोक भेजा । राजा को अच्छा लगा, उन्होंने उर्वशी से विवाह का प्रस्ताव किया, उर्वशी ने कुछ शर्त रखी, राजा उसके प्रेम में आसक्त था इसलिए सब शर्त मान ली । एक बार शर्त भंग हुई तो उर्वशी चली गई । राजा खूब रोए पर उर्वशी को रोक नहीं पाए । राजा को बाद में पछतावा हुआ कि एक उर्वशी के कारण मैंने कितना समय बर्बाद किया, उन्होंने एक गीत गाया जो श्रीमद् भागवतजी महापुराण का एक विलक्षण गीत है । राजा ने गीत में कहा कि बड़े-बड़े राजा मुझे प्रणाम करते थे, देवराज श्री इंद्रजी मेरी सहायता के लिए मेरे पास आते थे पर एक उर्वशी के बंधन में मैं आ गया और उर्वशी के हाथों का खिलौना बन गया । उसने जैसे नचाया मैं नाचता रहा । मेरी सारी महानता, पुरुषार्थ और ज्ञान उर्वशी ने बेकार कर दिया । एक चक्रवर्ती सम्राट होकर मेरा ऐसा दुर्भाग्य हुआ ।
178. सूत्र यह है कि कितनी भी योग्यता प्राप्त कर ली, विद्या पढ़कर ज्ञानी बन जाएं, तप से तपस्वी बन जाएं पर कामिनी के चक्कर में फंसकर जीवन बर्बाद हो जाता है । सभी योग्यता बर्बाद हो जाती है, इतना अपमान, इतनी लाचारी सिर्फ कामिनी के कारण उत्तम साधक को भी झेलनी पड़ सकती है । इसलिए साधक को चाहिए कि कामिनी से हरदम बचे ।
179. स्त्री और पुरुष का आकर्षण बड़ा विलक्षण होता है और बड़ा विकार युक्त होता है । साधक को लंपट बना देता है और आसक्त कर देता है, यहाँ तक कि उसे परस्त्री गमन के मार्ग पर भी डाल देता है ।
180. शास्त्रों में धर्मपत्नी का जिक्र आया है कि अगर धर्मपत्नी सात्विक है और प्रभु मार्ग पर है तो वह अपने पति के साथ अपने कुल का उद्धार कर देती है । ऐसे कितने प्रसंग भारतीय इतिहास में हैं । इसके विपरीत जो पत्नी सात्विक नहीं है तो वह अपने परिवार का उद्धार नहीं कर पाएगी, इसलिए साधक को जीवन में उनसे बचना चाहिए ।
181. विषयों का प्रभाव कब होता है जब हमारी आँखों ने बुरा देखा, जिह्वा ने बुरा बोला और मन ने बुरा सोचा । इसलिए बुरा सोचना, बुरा देखना और बुरा बोलना, यह विकार की जड़ हैं ।
182. सूत्र यह है कि आँखों के पीछे से कुछ भी बुरा हुआ, जो हमने देखा नहीं तो वह हम पर प्रभाव नहीं करेगा ।
183. जो स्थान या वस्तु हमने देखी नहीं उसके लिए आकर्षण निर्माण नहीं होगा पर जो हमारी आँखें लगातार देखेगी तो आकर्षण निर्माण हुए बिना रहेगा नहीं ।
184. आम को याद करके उतना मन नहीं होगा जितना आम को देखने पर और सुगंधी नाक में जाने पर खाने के लिए मन बनेगा ।
185. उत्तम साधक और भक्त को कुसंगति, कुदृश्य और कुविचार से बचना चाहिए ।
186. ऊँ‍‍ची अवस्था प्राप्त साधक, बढ़िया संप्रदाय और जाति के साधक को कुसंगति, कुदृश्य और कुविचार ने नष्ट कर दिया ।
187. गलत स्थान में रहेंगे और फिर विषय की तरफ आकर्षण बढ़ेगा नहीं, प्रभु कहते हैं कि ऐसा होना संभव नहीं है ।
188. प्रभु कहते हैं कि कुसंग को कभी नहीं अपनाना चाहिए और सत्संग को कभी नहीं छोड़ना चाहिए ।
189. सत्संग जीव को भीतर से साफ करता जाता है ।
190. प्रभु कहते हैं कि भक्ति का जागरण जीवन में हो गया, प्रभु के सच्चे भक्त बन गए तो कुसंगति, कुदृश्य और कुविचार फिर कभी परेशान नहीं करेंगे ।
191. प्रभु ने भक्ति हेतु कहा है कि प्रभु को हर स्थान पर देखकर पूजा करना, विग्रह में, प्रभु श्री सूर्यनारायणजी में, हर चीज में प्रभु को देखकर मानसिक पूजा करना ।
192. प्रभु का विग्रह हम कैसे भी बना सकते हैं । मूर्ति के रूप में, पत्थर के रूप में, लकड़ी के रूप में, लोहे के रूप में, दीवार में लेपन के रूप में, चित्र के रूप में, बालू मिट्टी की मूर्ति बनाकर, रत्न की प्रतिमा, मनोमय प्रतिमा यानी अपने मन में प्रभु की प्रतिमा बनाने की भावना करना ।
193. मनोमय प्रतिमा संत अपने मन में भावना से बना लेते हैं । प्रभु के दिव्य रूप को पूर्ण श्रद्धा से मन में धारण करते हैं जैसे श्री ध्रुवजी ने किया था । इसे मनोमय मूर्ति कहते हैं, जो श्रेष्ठ होती है ।
194. प्रभु को अपना मानेंगे तभी घर की ठाकुरबाड़ी में श्रेष्‍ठतम सेवा हो पाएगी ।
195. एक गौशाला के संचालक ने नियम बनाया कि जिस दिन तक गौ-माता के भोजन की व्यवस्था रहेगी तब तक कि उनके घर का चूल्हा जलेगा । उनके इस नियम से गौ-माता की भोजन की व्यवस्था हरदम बनाए रखने का उपक्रम बन गया नहीं तो उनके घर का चूल्हा भी नहीं जलेगा ।
196. हमें भी नियम बनाना चाहिए कि जिस दिन श्री ठाकुरजी की पूजा और सेवा घर नहीं होगी उस दिन अन्न ग्रहण नहीं करेंगे ।
197. हम अपने मंदिरों से प्रेम नहीं करते हैं इसलिए ही हमने उन्हें व्यावसायिक बना दिया है ।
198. कितने लोग हैं जो गौ-माता की गौ-भूमि को भी अन्य उपयोग में लेने लगे हैं ।
199. प्रभु कहते हैं कि जहाँ मेरा मंदिर नहीं वहाँ मेरा मंदिर बनाकर अखंड काल तक नित्य रूप से पूजा चलती रहे, इसकी व्यवस्था करनी चाहिए । संत भी कहते हैं कि जहाँ आसपास बहुत मंदिर है वहाँ नए मंदिर नहीं बनाने चाहिए पर जिस ग्राम या जिस शहर की कॉलोनी में मंदिर नहीं है वहाँ जरूर बनाने चाहिए ।
200. जिसने मंदिर, गौशाला और धार्मिक स्थलों के धन का हरण किया उसे 10000 वर्षों तक नाली के कीड़े बनकर बिताना पड़ता है और विष्ठा खानी पड़ती है, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
201. भारतवर्ष में पूर्व काल में वैज्ञानिक प्रगति कितनी थी इसका अंदाज शास्त्रों में लिखी इस बात से लगा सकते हैं कि ऐसा विमान था जो हवा में उड़ सकता था, पृथ्वी पर चल सकता था, जल के ऊपर चल सकता था और जल के भीतर पनडुब्बी की तरह चल सकता था ।
202. शौर्य की आराधना भी हमारे जीवन का एक अंग बन जाना चाहिए, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
203. प्रभु श्री कृष्णजी ने पूतना से आरंभ करके कितने दुष्टों का नाश किया और अनेकों-अनेक दुष्ट योद्धाओं को समाप्त किया ।
204. जब राजा श्री परीक्षितजी ने प्रभु श्री शुकदेवजी से कहा कि अब श्री सुदामाजी का चरित्र सुनाने की कृपा करें क्योंकि अब मेरे जीवन का बहुत कम समय बचा है तो प्रभु श्री शुकदेवजी इन भक्तश्री का चरित्र सुनाने से पूर्व भावुक हो गए । उन्होंने प्रभु के श्री कमलचरणों का स्मरण किया कि इन श्रेष्ठ भक्त का चरित्र आपकी कृपा से मैं गा सकूं ।
205. प्रभु जहाँ भी जाते हैं लोकप्रिय हो जाते हैं । प्रभु श्री कृष्णजी के नाम का अर्थ ही है कि जो सबको आकर्षित कर लेता है ।
206. वैसे प्रभु सबको आकर्षित करते हैं पर सात्विकता की प्रतिमूर्ति एक ब्राह्मण बालक श्री सुदामाजी ने प्रभु को भी आकर्षित कर लिया । प्रभु उनके साथ भोजन करना, खेलना, आश्रम का सब काम साथ करना पसंद करते थे ।
207. श्री सुदामाजी अपने को धन्य मानते थे कि जिन प्रभु श्री कृष्णजी को सब चाहते हैं वे प्रभु मुझे चाहते हैं ।
208. प्रभु ने चौंसठ दिनों की विद्या ग्रहण की श्रीलीला करी । समस्त विद्याओं को हर तरह से प्राप्त कर लिया । प्रभु ज्ञान स्वरूप हैं । यह प्रभु की अध्ययन श्रीलीला सबको सिखाने हेतु है कि जीवन में अध्ययन करना चाहिए ।
209. प्रभु श्री कृष्णजी का जीवन भी अलौकिक और उनकी हर श्रीलीला अलौकिक है ।
210. प्रभु जब भी अपने मित्र (श्री उद्धवजी, श्री अर्जुनजी, श्री सुदामाजी) से बात करते थे तो इतने आत्मीय होकर बात करते थे कि मित्र का हाथ अपने श्रीहाथों में पकड़ कर बात करते थे ।
211. जब श्री सुदामाजी को प्रभु ने गुरु आश्रम से विदा होते हुए पूछा कि अगला मिलन कब होगा तो श्री सुदामाजी ने कहा कि यह तो प्रभु आपके हाथ है कि दोबारा मिलन का अवसर आप जीव को कब देते हैं ।
212. श्री सुदामा जी ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि प्रभु आप स्वाधीन परमात्मा हैं और मैं (सुदामा) पराधीन जीवात्मा हूँ । मिलन होना स्वाधीन परमात्मा के श्रीहाथों में होता है, पराधीन जीवात्मा के हाथ में नहीं ।
213. श्री सुदामाजी बोले कि मेरे जैसा सुदामा की तरह आपको तो जीवन में बहुत मिल जाएंगे पर मेरे को आप जैसा प्रभु कहाँ मिलेगा ।
214. गुरु आश्रम से विदा के समय श्री सुदामाजी के नेत्र जल से प्रभु के श्री कमलचरणों का अभिषेक हुआ तो आलिंगन करते हुए प्रभु के श्रीनेत्रों के अमृत से श्री सुदामाजी की पीठ का अभिषेक हो गया ।
215. श्री सुदामाजी बहुत ज्ञान लेकर, बहुत बड़े ज्ञानी बनकर लौटे पर अध्यात्म का ज्ञान सिखाता है - भक्ति । इसलिए उन्होंने अपना पूरा जीवन प्रभु भक्ति में लगा दिया ।
216. श्री सुदामाजी के घर में बहुत गरीबी थी । प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं इतनी गरीबी कि घर भी कहाँ था, छप्पर टूटा हुआ घर, टूटे हुए बर्तन, पूरे जीवन श्री सुदामाजी भगवती सुशीलाजी को कुछ लाकर नहीं दे पाए । जो गाँव के लोग कभी-कभी श्री सुदामाजी के श्री ठाकुरजी के आगे कुछ चढ़ा जाते उसी को प्रभु का प्रसाद मानकर वे अपना जीवन यापन करते ।
217. गरीबी के कारण एक समय भोजन का नियम तो शुरू से ही था पर कभी-कभी दो-तीन दिन का भी व्रत श्री सुदामजी को स्वतः ही हो जाता था जब कोई चढ़ावा उनके श्री ठाकुरजी के आगे नहीं आता था ।
218. सदैव फटा हुआ वस्त्र और भूख के कारण दुर्बल पेट और पीठ चिपकी हुई श्री सुदामाजी की रहती थी पर उसमें भी वे अनांदित होकर प्रभु की भक्ति ही किया करते थे ।
219. श्री सुदामाजी की कथा सुनाते-सुनाते प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि मैं तुम्हें (राजा श्री परीक्षितजी) को श्री सुदामाजी की गरीबी की कथा नहीं सुना रहा अपितु ऐसे श्री सुदामाजी की कथा सुना रहा हूँ जो कभी मन में दुःखी नहीं हुए, हरदम शांत भाव से रहे और प्रसन्न आत्मा बनकर रहे । क्यों ? क्योंकि भक्ति का इतना बड़ा सामर्थ्य है यह प्रभु श्री शुकदेवजी बताना और दिखाना चाहते हैं ।
220. भक्ति में प्रभु को प्रिय बातों में सबसे पहली बात है जो अवस्था हो उसमें शांत रहना भक्त को सीख लेना चाहिए ।
221. श्री सुदामाजी ठंडी रात को छाती से अपने घुटनों को लगाकर, चिपकाकर श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण का जाप करते हुए बिता देते थे क्योंकि गर्म कपड़े ओढ़ने के लिए उनके पास नहीं थे ।
222. श्री सुदामाजी हमेशा मेरा कान्हा, मेरा कान्हा कहकर प्रभु की बातें सदैव बताते रहते थे । प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि श्री कान्हाजी के स्वर्ण की श्रीद्वारका की प्रभु की बातें बताते थे पर खुद कभी भी जीवन में स्वर्ण का दर्शन तक नहीं किया । फिर भी ईर्ष्या एकदम नहीं कि प्रभु के पास स्वर्ण की नगरी है और उनके भक्त सुदामा के पास स्वर्ण का दर्शन तक नहीं है ।
223. सूत्र यह है कि प्रभु की भक्ति करें, प्रभु से प्रेम करें पर उसमें कोई मांग प्रभु से नहीं होनी चाहिए ।
224. भगवती सुशीलाजी से श्री सुदामाजी कहते कि प्रभु मेरी गरीबी जानते हैं क्योंकि वे अंतर्यामी है और एक कीटक की भी बात प्रभु जानते हैं ।
225. भगवती सुशीलाजी से श्री सुदामाजी कहते कि प्रभु पूर्ण सामर्थ्यवान हैं, कुछ भी कर सकते हैं, क्षण भर में गरीबी हटा सकते हैं ।
226. भगवती सुशीलाजी से श्री सुदामाजी कहते कि स्वयं प्रभु ने मुझे गरीब रखा है तो मुझे गरीबी ही प्रिय है क्योंकि यह प्रभु की इच्छा से ही है । सर्वसामर्थ्यवान और अंतर्यामी होने पर भी प्रभु ने ऐसा रखा है तो यह प्रभु की रजा है जिसमें मैं राजी हूँ ।
227. सूत्र यह है कि प्रभु की रजा में राजी रहना भक्ति का कितना बड़ा सामर्थ्‍य है ।
228. जब भगवती सुशीलाजी ने पन्द्रह दिनों में तीन बार श्री सुदामाजी से श्री द्वारकाजी जाने के लिए कहा तो तीनों बार उन्होंने मना कर दिया कि मैं मांगने कभी नहीं जाऊँगा । फिर एक दिन माला फेरते हुए उन्हें लगा कि भगवती सुशीलाजी ने कभी भी एक बार मना करने के बाद दोबारा वह बात जीवन में नहीं कही । इस बार तीन बार बोली तो यह प्रभु प्रेरणा देकर ही करवा रहे हैं क्योंकि प्रभु भक्त से मिलना चाहते हैं ।
229. श्री सुदामाजी ने मन में पक्का निश्चय किया कि मांगने नहीं जाऊँगा क्योंकि प्रभु का दर्शन ही परम लाभ है । यह लाभ लेने जाऊँगा, ऐसा विचार श्री सुदामाजी के मन में आया ।
230. प्रभु को उपहार की आवश्यकता नहीं, भक्त की भक्ति ही प्रभु का सबसे प्रिय उपहार होता है ।
231. फिर श्री सुदामाजी ने सोचा कि प्रभु के पास कुछ लेकर नहीं गए तो रिवाज पूर्ति नहीं होगी क्योंकि बड़ों के पास खाली हाथ जाने का रिवाज नहीं है, कुछ लेकर जाने का रिवाज है ।
232. प्रभु को कुछ देने की व्यवस्था भी प्रभु ही करेंगे, यह भाव श्री सुदामाजी और भगवती सुशीलाजी के मन में आया, यह कितना श्रेष्ठ भाव है ।
233. सूत्र यह है कि प्रभु को जो हम धन की सेवा, तन की सेवा अर्पित करते हैं उसकी व्यवस्था भी प्रभु ही करते हैं यानी हमें उसे अर्पण करने लायक बनाते हैं ।
234. साधन के मार्ग पर परीक्षा का दिन सबसे कड़ा होता है । जिस दिन सबसे ज्यादा जरूरत थी प्रभु को उपहार भेजने के लिए किसी चढ़ावे की उस दिन बार-बार द्वार पर खड़ी होकर इंतजार करने के बाद भी कोई भी नहीं आया ।
235. भगवती सुशीलाजी जीवन में पहली बार प्रभु के लिए मांगने निकली । जीवन में व्रत था कि कभी किसी से जाकर नहीं मांगूंगी पर प्रभु के लिए उन्होंने अपना यह व्रत को तोड़ा । जिनके घर मांगने गई उनकी संपन्नता यानी उनके वस्त्र, अलंकर, अन्न का भंडार देखकर दंग रह गई । जीवन में भगवती सुशीलाजी ने इतनी संपत्ति कभी देखी ही नहीं थी ।
236. भगवती सुशीलाजी ने ब्राह्मणों को कहा कि श्रीद्वारकापति मेरे देवर हैं । यह पूर्णतया सत्य था पर सत्य भी गरीब के मुँह से निकलने पर झूठ हो जाता है, यह संसार की रीति है ।
237. सत्य कैसे सत्य होता है क्योंकि यह बात पूर्णतया सत्य था कि श्रीद्वारकापति प्रभु भगवती सुशीलाजी के देवर थे और इसको प्रभु ने पूरे ब्रह्मांड को दिखाया ।
238. जिसको आवश्यकता नहीं उसे देने वाले खूब मिल जाते हैं पर जिन्हें सच्ची आवश्यकता है उनकी विपदा को समझकर देने वाला कोई बिरला ही होता है ।
239. भगवती सुशीलाजी को पहली बार विचार आया कि प्रभु ने कितना गरीब बना दिया कि प्रभु की सेवा हेतु उपहार भेजने हेतु भी क्षमता नहीं है ।
240. तीन मुट्ठी चिउड़ा इकट्ठा हुआ चार घरों में जाने के बाद और मांगने पर । यह भेंट भाभी भगवती सुशीलाजी के प्रेम से भरी थी, इसलिए प्रभु ने बड़े चाव से और सहर्ष स्वीकार किया ।
241. भगवती सुशीलाजी ने श्री सुदामाजी से कहा कि प्रभु से कहना कि उनके दर्शन की मुझे भी बहुत इच्छा है । प्रभु ने वापसी में श्री सुदामाजी से पहले पहुँचकर सुदामापुरी देने के समय भगवती सुशीलाजी के पास स्वयं आए और उन्हें दर्शन दिया ।
242. पूरे मार्ग में श्री सुदामाजी प्रभु का चिंतन करते हुए चले, प्रभु के श्रीनाम को गुनगुनाते हुए चले ।
243. सिर्फ चिउड़े की पोटली ही नहीं थी, प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि बहुत सारे प्रश्नों की पोटली भी साथ थी । श्री सुदामाजी के प्रश्न थे कि क्या प्रभु पहचानेंगे, क्या प्रभु को याद होगा, क्या एक स्वर्णनगरी का राजा एक भिखारी से मिलेगा ।
244. श्री द्वारकाजी में भी लोगों ने श्री सुदामाजी का खूब मजाक किया और खूब घुमाया । घूम-घूमकर श्री सुदामाजी थक गए और एक पेड़ के नीचे बैठ गए । प्रभु वेष बदलकर आए और उन्हें अपने राजमहल के द्वार तक खुद पहुँचाया ।
245. सूत्र यह है कि प्रभु ही अपने द्वार तक हमें पहुँचाते हैं, अन्य कोई हमारा साधन हमें नहीं पहुँचा सकता ।
246. प्रभु के राजमहल को देखने पर श्री सुदामाजी अति प्रसन्न और राजी हुए, अपनी कुटिया की याद उन्हें नहीं आई । दोनों जगह की तुलना करने का उनके मन में विचार नहीं आया ।
247. हमारी स्वर्णनगरी का कोई आदमी इतना गरीब नहीं हो सकता । गरीबी इससे ज्यादा नहीं हो सकती । श्री सुदामाजी को देखकर द्वारपाल ने प्रभु से आकर ऐसा कहा ।
248. इतना दुर्बल कि सारी हड्डी-पसली गिनी जा सकती है, श्री सुदामाजी को देखकर द्वारपाल ने प्रभु से आकर ऐसा कहा ।
249. हर मेहमान के स्वागत हेतु माता को बुलाकर प्रभु उन्हें साथ लेकर जाते थे । आज श्री सुदामाजी का स्वागत करने के लिए माता पास में थी, माता को प्रभु भूल गए और प्रेम मुदित होकर अपने प्रिय भक्त और मित्र का स्वागत करने दौड़े ।
250. राजमहल के तीन द्वार के अंदर ब्रह्मांड के लक्ष्मीपति स्वामी एक तरफ और विश्व के सबसे दरिद्र श्री सुदामाजी दूसरी तरफ थे, ऐसा प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं ।
251. श्री सुदामाजी के एक भी प्रश्न का उत्तर वाणी से प्रभु ने नहीं दिया पर व्यवहार से सभी का ऐसा उत्तर दिया कि ब्रह्मांड में ऐसा उत्तर कभी किसी ने न देखा, न सुना होगा ।
252. प्रभु को देखते ही श्री सुदामाजी के सब दुःख मिट गए, सारी थकान उतर गई ।
253. सूत्र यह है कि प्रभु के दर्शन मात्र से जीव के सभी दुःख मिट जाते हैं ।
254. दोनों सखा प्रभु और श्री सुदामाजी बोल नहीं रहे पर बोलने का काम दोनों के चारों नेत्र कर रहे थे ।
255. श्री सुदामाजी की कथा परमात्मा से जीवात्मा की मिलन की कथा है, ऐसा प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं ।
256. प्रभु कहते हैं मेरा गृहस्‍थ आश्रम आज धन्य हो गया, मेरी द्वारकापुरी आज धन्य हो गई, मेरा जीवन आज धन्य हो गया जो श्री सुदामाजी आज यहाँ पधारे । इतना मान प्रभु ने श्री सुदामाजी को दिया ।
257. भगवती रुक्मिणी माता सोचती हैं कि इस महात्मा श्री सुदामाजी ने पता नहीं क्या पुण्य किए होंगे कि प्रभु को प्रेम में ऐसा मतवाला बना दिया ।
258. श्री सुदामाजी को प्रभु लेकर आए और सीधे भगवती रुक्मिणी माता के पलंग पर बैठा दिया जहाँ पर किसी की भी पहुँच ब्रह्मांड में कभी भी नहीं थी ।
259. प्रभु कहते हैं कि श्रीकृष्ण का शीश जहाँ झुकना चाहिए वह चरण श्री सुदामाजी के हैं । ऐसा कहकर श्री सुदामाजी के चरणों में प्रभु बैठ गए ।
260. यह सब श्री सुदामाजी के भक्ति और त्याग की प्रभु द्वारा पूजा करने की कथा है, ऐसा प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं ।
261. प्रभु अपने श्रीनेत्र से श्री सुदामाजी के चरणों का अभिषेक कर रहे थे, अपने पीतांबर से उन्हें पोछ रहे थे, श्री सुदामाजी के पैरों के एक-एक कंकड़, एक-एक कांटे को प्रभु अपने श्रीहाथों से निकाल रहे थे ।
262. जिन प्रभु श्री कृष्णजी के वैभव का सबने उपयोग किया उन प्रभु के वैभव की तरफ दृष्टि तक नहीं की, इतने बड़े निष्काम भक्त श्री सुदामाजी थे ।
263. प्रभु ने मानो अभिषेक करने का एक नया ही रास्ता निकाल लिया, स्वर्ण कलश के जल को छुआ तक नहीं और अपने श्रीनेत्रों के श्रीजल से ही श्री सुदामाजी के चरणों का अभिषेक कर दिया ।
264. प्रभु ने श्री सुदामाजी की चरण पूजा की फिर उनका हाथ अपने श्रीहाथों में लेकर पुरानी बातें करने बैठ गए, पुरानी यादों में खो गए ।
265. प्रभु ने चिउड़े की पोटली को स्वयं खींचा । प्रभु भक्त की भक्ति को स्वयं ही खींच लेते हैं, ऐसी व्याख्या करते हुए प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं ।
266. जब प्रभु चिउड़े की पोटली खींच रहे थे तो माता ने इशारा करके कहना चाहा कि ऐसा व्यवहार करते हैं किसी अतिथि के साथ पर प्रभु ने माता की तरफ देखा तक नहीं । भक्त और भगवान के बीच कोई नहीं आ सकता, प्रभु श्री शुकदेवजी व्याख्या करते हुए कहते हैं ।
267. जितनी बड़ाई भगवती सीता माता के सामने हमेशा प्रभु श्री रामजी भगवती शबरीजी के बेर की करते थे, उतनी ही बड़ाई भगवती रुक्मिणी माता के सामने सदैव श्री सुदामाजी के चिउड़े की प्रभु श्री कृष्णजी करते थे ।
268. भगवती रुक्मिणी माता ने देखा कि प्रभु एकदम विभोर हो गए भक्त के प्रेम में, यह अनोखा दृश्य उन्होंने जीवन में पहली बार देखा । ध्यान लगाया माता ने तो देखा कि यह दो मुट्ठी चिउड़े बड़े भारी पड़े क्योंकि दो लोक चले गए । माता ने प्रभु का श्रीहाथ पकड़ लिया जब प्रभु तीसरी मुट्ठी चिउड़े को खाने वाले थे । प्रभु माता से रुष्ट हो गए ।
269. प्रभु कहते हैं मेरे और सुदामाजी में बड़े सुदामाजी हैं और मैं (प्रभु) उन्हें कुछ देने लायक ही नहीं हूँ ।
270. प्रभु कहते हैं कि मेरे द्वारकाजी में भी लोगों ने मेरे मित्र को भटकाया क्योंकि उनके दुर्बल तन, फटे हुए वस्त्र को देखा, किसी ने उनकी भक्ति को, उनके ज्ञान को, उनके वैराग्य को, उनके गुणों को, उनके व्रतों को नहीं देखा । मेरे मित्र की दरिद्रता ने उसके गुणों को ढक दिया इसलिए आज मैं उसकी दरिद्रता को मिटा कर रहूँगा ।
271. प्रभु कहते हैं कि धन्य है मेरा मित्र जिसने गरीबी में भी गौरव मनाया क्योंकि यह श्रीकृष्ण की भेजी हुई थी, ऐसा वह मानता था । क्योंकि प्रभु अंतर्यामी हैं और सर्वसामर्थ्यवान होते हुए भी उन्होंने गरीब रखा इसलिए गरीबी प्रभु की भेजी हुई थी, ऐसा श्री सुदामाजी मानते थे ।
272. प्रभु कहते हैं कि मेरे माथे का कलंक है मेरा मित्र होकर भी इतनी दरिद्रता को सहना पड़ा । प्रभु कहते हैं कि आज उस कलंक को मैं धोकर रहूँगा । श्रीहरि मित्र दुःखी हो यह कलंक मुझसे सहा नहीं जाता, ऐसा प्रभु कहते हैं ।
273. भगवती रुक्मिणी माता ने सफाई दी रुष्ट प्रभु को कि विवाह के समय आपका वचन था कि कुछ भी माता से मिलकर, बाँटकर उपयोग और उपभोग करेंगे । सबसे दुर्लभ वस्तु आज आपने खाई इसलिए आपके प्रसाद पाने के लिए आपका श्रीहाथ पकड़ा कि मेरे हक का प्रसाद मुझे मिले ।
274. श्री सुदामाजी के चरणों की सेवा में प्रभु रहे, भगवती रुक्मिणी माता पंखा डुला रही है । श्री सुदामाजी ने नींद आने का नाटक किया जिससे प्रभु और माता अपने कक्ष में लौट जाएं ।
275. सूत्र यह है कि भगवान भक्त की सेवा करना चाहते हैं पर भक्त भगवान से सेवा करवाना ही नहीं चाहता अपितु उनकी सेवा करना चाहता है ।
276. श्री सुदामाजी को पूरी रात नींद नहीं आई क्योंकि इतने मुलायम गद्दे पर कभी सोने तो दूर, उन्होंने ऐसी कल्पना भी नहीं की थी कि कोई सोने का गद्दा इतना मुलायम हो सकता है ।
277. श्री द्वारकाजी पधारने के बाद श्री सुदामाजी के साथ प्रभु पूरे समय रहे । सभी राज दरबार वाले और परिवार वाले चकित थे क्योंकि प्रभु ने इतना समय कभी भी, किसी को भी आज तक नहीं दिया ।
278. श्री सुदामाजी से मिलकर प्रभु को इतना उल्लास, इतना आनंद था जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता । किसी ने भी, कभी भी प्रभु को इतना उल्लास और आनंद में नहीं देखा था ।
279. इतना सब कुछ प्रभु ने किया फिर अंतिम परीक्षा ली और लौटते वक्त श्री सुदामाजी को कुछ भी नहीं दिया, भारी वस्त्र और अलंकार भी उतरा लिए पर श्री सुदामाजी के मन में कोई विपरीत परिणाम नहीं हुआ । यह उनकी अंतिम परीक्षा थी जिसमें एक निष्काम भक्त पूरी तरह से उत्तीर्ण हो गया ।
280. श्री सुदामाजी साधारण भक्त नहीं थे, वे एक मंझे हुए निष्काम भक्त थे । उनके जीवन में दुःख आया तो कोई बात नहीं, सुख आया और वापस गया तो कोई परिणाम नहीं हुआ ।
281. प्रभु नंगे श्रीकमलचरणों से श्री सुदामाजी को राजमहल से छोड़ने निकले । श्री द्वारकाजी के मुख्य बाजार से होकर चले, एक गरीब के गले में हाथ डालकर प्रभु पैदल चले । पूरी श्री द्वारकाजी दंग रह गई, सब प्रभु को देखकर चकित हो गए, जिन लोगों को लगा था कि श्री सुदामाजी भिखारी हैं, बावरे हैं उनको अपने श्रीमुँह से कुछ नहीं बोल कर प्रभु ने अपने व्यवहार से संदेश देकर साबित किया कि मेरा भक्त मेरे लिए सर्वोपरि होता है ।
282. पूरे रास्ते हाथ पकड़े एक दूसरे को देखते हुए श्री सुदामाजी और प्रभु चले, किसी अन्य को रास्ते में प्रभु ने देखा भी नहीं ।
283. प्रभु ने अंत में विदाई देते वक्त श्री सुदामाजी को कहा कि भैया, मुझको कभी भूल मत जाना ।
284. श्री सुदामाजी ने भी एक वचन प्रभु से लिया कि जीवनभर जब तक शरीर में क्षमता रहेगी मैं (सुदामा) आपको याद करता रहूँगा पर अंत समय किसी शारीरिक विकार के कारण भी विस्मृति आ गई और मैं भूल जाऊँ तो प्रभु भूलने मत देना । यह वचन प्रभु से श्री सुदामाजी ने लिया । यह किसी भी जीव का प्रभु से लेने वाला जीवन का कितना श्रेष्ठ वचन है ।
285. जुड़े हुए श्रीहाथों से प्रभु ने श्री सुदामाजी को श्री द्वारकाजी की सीमा से विदा किया ।
286. श्री सुदामाजी जब दूर गए तो एकदम डर गए कि प्रभु आँखों से ओझल हो गए पर सदैव की तरह हृदय में प्रभु प्रकट हो गए ।
287. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि लौटते वक्त श्री सुदामाजी आह्लादित और आनंदित होते हुए लौटे । प्रभु ने कुछ भी नहीं दिया फिर भी प्रभु ने उन्हें जो प्रेम दिया उससे अभिभूत थे ।
288. सूत्र यह है कि प्रभु प्रेम का मतलब क्या था यह सुदामाजी जानते थे और प्रभु ऐश्वर्य से उनका कोई सरोकार नहीं था । जगत के लोगों को प्रभु के ऐश्वर्य से सरोकार होता है प्रभु के प्रेम से नहीं पर यहाँ एकदम उल्टा था जो एक सच्चे भक्त की स्थिति होती है ।
289. सारे देवतागण जिन प्रभु के श्रीकमलचरणों की पूजा में तत्पर रहते हैं और अवसर तलाशते रहते हैं वे प्रभु अपने भक्त श्री सुदामाजी की चरण सेवा में बैठे ।
290. श्री सुदामाजी को धन संभालने का अभ्यास नहीं था, उन्होंने सोचा इसलिए प्रभु ने कुछ नहीं दिया कि इस जंजाल में सुदामा को नहीं डालना है । दूसरा कि रास्ते में डाकू लूट लेंगे इसलिए कुछ नहीं दिया, प्रभु कृपा का दर्शन इसमें भी श्री सुदामाजी ने किया ।
291. प्रभु ने कुछ दिया इसमें प्रभु की कृपा के दर्शन तो हम भी करते हैं और प्रभु ने कुछ नहीं दिया तो भी प्रभु की कृपा का दर्शन करने वाले भक्तों के आदर्श श्री सुदामाजी हैं ।
292. सूत्र यह है कि सच्चा भक्त वह है जो अनुकूलता और प्रतिकूलता दोनों में प्रभु की कृपा के दर्शन करना खोज लेता है ।
293. भक्ति के साम्राज्य में प्रभु के लिए हरदम सकारात्मक सोच होती है, नकारात्मक सोच होती ही नहीं है ।
294. एक नास्तिक ने कहा कि प्रभु ने गुलाब के फूल में कांटे लगा दिए तो एक भक्त ने कहा कि प्रभु ने कांटो के पौधे में इतना सुंदर गुलाब का फूल लगा दिया । इसी दृष्टिकोण का नाम ही भक्ति है ।
295. चाहे जो हो जाए उसमें मैं प्रभु की कृपा को खोज लूंगा, यही सच्ची भक्ति है ।
296. भगवान की अनुकंपा जीवन के हर प्रसंग में जो खोज लेता है तो प्रभु की कृपा में उसकी हिस्सेदारी स्वतः ही बन जाती है, ऐसा प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं ।
297. श्री सुदामाजी के साथ ऐसा हुआ कि उन्होंने प्रभु के द्वारा कुछ न देने पर भी प्रभु की अनुकंपा देखी और प्रभु का ऐश्वर्य का हिस्सा श्री सुदामापुरी के रूप में उनके जीवन में आ गया ।
298. श्री सुदामाजी ने अपने गांव, अपनी पत्नी तक को नहीं पहचाना, प्रभु ने इतना जोरदार ऐश्वर्य दिया ।
299. भगवती सुशीलाजी जब घर में अकेली थी, घर अंधेरे से डूबा था, तेल भी नहीं था दीया जलाने के लिए तो प्रभु आए और रत्नों की ज्योत ने पूरे झोपड़ी को जगमगा दिया ।
300. प्रभु ने भगवती सुशीलाजी से कहा कि मेरी सामर्थ्य नहीं कि मैं अपने भक्त श्रीसुदामा को कुछ दे सकूँ । भक्त बड़ा होता है और मैं भगवान उसके सामने छोटा होता हूँ । इसलिए एक देवर के रूप में अपनी भाभी को मैं देने आया हूँ ।
301. प्रत्यक्ष हाथों से श्री सुदामाजी को कुछ भी नहीं दिया पर देने में प्रभु ने कोई भी कसर नहीं छोड़ी । पूरे ब्रह्मांड ने देखा कि ऐसा दातार ब्रह्मांड में कोई भी नहीं है ।
302. प्रभु ने श्री सुदामाजी के वचन को निभाया । श्री सुदामाजी का प्रण था कि मैं नहीं मांगूंगा तो प्रभु स्वयं आकर भगवती सुशीलाजी को निमित्त बनाकर देकर चले गए ।
303. श्री सुदामाजी ने एक बात प्रभु से मांगी कि यह संपत्ति भक्ति में व्यवधान नहीं बने, मैं सदैव आपका दास बना रहूँ, मुँह में मेरे आपका नाम रहे, हाथों में आपकी सेवा रहे, यह वरदान अगर देना है तो ही मैं यह संपत्ति स्वीकार करता हूँ वरना प्रभु इसे वापस ले जाएं । कितना श्रेष्ठ वचन प्रभु से श्री सुदामाजी ने लिया ।
304. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि भक्त और भगवान की स्पर्धा में भक्त की जीत हुई । श्री सुदामाजी का प्रण था कि मैं सकामता से भक्ति नहीं करूँगा । प्रभु ने सोचा कि बचपन में नहीं मांगा तो विवाह के बाद मांगेगा, बच्चों को भूखा देखकर मांगेगा, फिर बुढ़ापे में मांगेगा, श्री द्वारकाजी का ऐश्वर्य देखकर मांगेगा, कुछ भी नहीं दूँगा तब मांगेगा, लौटते वक्त मांगेगा पर श्री सुदामाजी ने कुछ नहीं मांगा और ऐसे एक निष्काम भक्त की जीत हुई ।
305. भक्ति में कुछ भी कामना करके अपनी भक्ति को कलंक नहीं लगाना चाहिए । कुछ भी नहीं चाहिए प्रभु से, ऐसा प्रभु से निवेदन करना चाहिए । प्रभु आपका कोई उपहार नहीं चाहिए, मुझे सिर्फ प्रभु आप ही चाहिए, भक्ति में यह भाव होना चाहिए ।
306. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि भक्त की जीत हुई और भगवान हार गए जैसे वे हरदम भक्तों के सामने हारते आए हैं और गौरव मानते हुए हारते आए हैं ।
307. भक्त श्री सुदामाजी ने भगवती सुशीलाजी से कहा कि धन सत्कर्म में उपयोग करो पर मुझे मेरी ठाकुरबाड़ी से बाहर मत निकालना, मेरे तो सिर्फ श्री ठाकुरजी ही हैं ।
308. श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं कि परमात्मा तत्व तक पहुँचने के सारे योग मैंने तुम्हें बताए । कोई भी प्रक्रिया से प्रभु तक पहुँचने का लक्ष्य जीवन में हर मानव को बनाना चाहिए ।
309. अपने स्वयं को आनंदमय जानना चाहिए क्योंकि हम आनंद के मूल प्रभु के अंश हैं ।
310. भिन्न-भिन्न प्रक्रिया का एक ही लक्ष्य है कि मैं आनंद स्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर सकूँ । अखंड आनंद का मूल स्त्रोत मुझे वापस मिले यानी परमात्मा प्राप्ति जीवन में हो जाए ।
311. भक्ति करने पर हम जहाँ भी रहे, जिस भी स्थिति में रहे, निरंतर आनंद में रहेंगे । जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी कभी प्रकाश से रहित नहीं होते, बादल आने पर भी प्रभु श्री सूर्यनारायणजी प्रकाश से रहित नहीं होते वैसे ही भक्ति होने पर प्रतिकूल स्थिति के बादल हमारे जीवन में आने पर भी हमारे आनंद का प्रकाश अखंड रहेगा ।
312. श्री सुदामाजी निरंतर आनंद में रहे चाहे कोई भी स्थिति थी । भगवती मीराबाई के ऊपर इतने कष्ट आए, लोगों ने क्या-क्या कहा पर इतने कष्ट आने पर भी भगवती मीराबाई को कोई फर्क नहीं पड़ा । श्री नरसी मेहताजी के एकमात्र पुत्र की साँप के काटने पर मृत्यु हो गई पर उसी शाम उन्होंने नित्य की तरह प्रभु का कीर्तन किया । संत श्री तुकारामजी की पत्नी का देहांत अन्न नहीं होने के कारण हुआ पर उन्होंने मौज में कहा कि प्रभु की इस प्रतिकूल कृपा को मैं सहर्ष और आनंद से स्वीकार करता हूँ ।
313. आनंद जो हमारे भीतर है उसे शास्त्रों में स्वानंद कहा गया है ।
314. प्रभु का ध्यान हमारे भीतर होना चाहिए क्योंकि वे हमारे भीतर ही निवास करते हैं ।
315. सनातन धर्म में प्रभु से जुड़कर दुःख निवृत्ति के साथ परमानंद प्राप्ति के लक्ष्य को मान्य किया गया है ।
316. बाहर का पूरा विश्व मायामय और परिवर्तनशील है । परिवर्तन होने वाला विश्व का आधार लेकर हम अखंड आनंद की प्राप्ति जीवन में कभी भी, कैसे भी नहीं कर सकते ।
317. संसार का आधार लेकर सुख पाने की कोशिश की तो थोड़ा-सा सुख और बहुत सारा दुःख मिलेगा । संसार में दुःख मिश्रित थोड़ा-सा ही सुख है पर परमानंद तो है ही नहीं । परमानंद तो केवल प्रभु के पास ही है ।
318. सारी योग की प्रक्रिया में भक्ति ही सर्वोच्च है, प्रभु ने फिर श्री उद्धवजी को यह बात स्मरण कराई ।
319. अखंड आनंद की प्राप्ति के मार्ग में सकामता नहीं होनी चाहिए नहीं तो वह योग नहीं कुयोग बन जाता है और अखंड आनंद और परमात्मा प्राप्ति नहीं हो पाती । उल्टा वह जीव पथभ्रष्ट हो जाता है, उसमें काम क्रोध, लोभ आदि विकार का निर्माण होता है, वह सांसारिक प्रपंच में फंस जाता है, शारीरिक रोग आधि और मानसिक रोग व्याधि से ग्रस्त हो जाता है ।
320. भक्ति का सही साधन करने वाला मन से रोग रहित रहता है, ज्यादा बीमार नहीं पड़ता क्योंकि उसकी चर्या ही भक्ति के साधन के कारण सात्विक रहती है ।
321. मन को ठीक स्थान प्रभु में केंद्रित करना आ जाए तो स्वतः ही जीवन से सभी बाधाएं दूर हो जाती है ।
322. ऋषिजन ठंड में स्वयं के भीतर की अग्नि का ध्यान कर ताप प्राप्त करते थे । ऋषिजन गर्मी में जल की शीतलता का अपने भीतर ध्यान कर ठंड का अनुभव करते थे । इतनी पहुँच भारतीय ऋषियों की हुआ करती थी ।
323. सूत्र यह है कि मन की स्थिति बदलने पर परिस्थिति हमारे लिए बदल जाती है ।
324. बाहर की स्थिति में ताप है तो ऋषिजन उल्टी धारणा ठंड की करते थे । योग का मूल तत्व है कि मन की धारणा से ही सब कुछ होता है । इसलिए किसी से बैर हो तो उसका उल्टा उससे प्रेम की धारणा करनी चाहिए, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
325. कफ, पित्त और वायु का प्रकोप होने से रोग होता है, यह आयुर्वेद का सिद्धांत है पर सारे रोग का मूल हमारे भीतर हमारे मन की स्थिति है, ऐसा हमारे ऋषियों ने कहा है ।
326. पूर्व के पातक और मन के विकारों के कारण रोग होता है । रोग शांत करने के लिए पूर्व पातक का नाश प्रभु की भक्ति से और मन के विकार का नाश प्रभु की शरणागति से होने पर रोग हमें पीड़ा नहीं देते ।
327. ध्यान का साधन कलियुग में इतना कठिन है कि चाहकर भी हम ध्यान हेतु एकांत में बैठ नहीं सकते, बैठ भी गए तो ध्यान लगता नहीं ।
328. हर योग आसन के साथ मन कहाँ पर केंद्रित किया जाए, यह विज्ञान है । यह नहीं किया गया तो आसन पूरा लाभ नहीं देता ।
329. कोई भी एक साधन को 100 प्रतिशत करके भी काम नहीं चलेगा, भक्ति जोड़नी ही पड़ेगी तब जाकर वह साधन हमें सच्चा लाभ देगा ।
330. कुछ फायदा योग से, कुछ व्रत से, कुछ मौन से, कुछ फायदा मंत्र से पर 100 प्रतिशत फायदा भक्ति के अलावा कोई एक साधन से प्राप्त नहीं होता ।
331. अगर उच्चारण सही हो तो मंत्र उच्चारण से उसका नीयत फल प्राप्त होता ही है ।
332. कुछ रोग औषधि से दूर होंगे इसलिए साधक को कभी भी औषधि से परहेज नहीं करना चाहिए, ऐसा प्रभु का स्पष्ट मत है ।
333. बड़े-बड़े योगी, जो किसी को स्पर्श कर दे तो वह ठीक हो जाए, वे स्वयं औषधि का इस्तेमाल करते थे । प्रभु पर कितना बोझ डालना अपने प्राणों का और कितना बोझ नहीं डालना, यह हमें पता होना चाहिए । सारा बोझ प्रभु पर नहीं डालना चाहिए कि मैं कर्म करूं ही नहीं, औषधि लूं ही नहीं और प्रभु ठीक कर देंगे, इस भरोसे बैठा रहूँ, यह ठीक नहीं है । अंत में करने वाले तो प्रभु ही हैं पर मुझे अपना कर्म तो करना ही होगा ।
334. अनावश्यक ली हुई औषधि हमारी क्षमता को नष्ट करती है पर आवश्यकता पर औषधि जरूर लेनी चाहिए ।
335. श्री विष्णु सहस्त्रनामजी का सामर्थ्य है कि सब कुछ सिद्ध करवा देती है पर किसी ने कहा कि यह बहुत बड़ा है तो प्रभु श्री महादेवजी ने एक अदभुत कार्य कर दिया । उन्होंने घोषणा कर दी और प्रभु के सहस्त्रनाम तुल्य दो अक्षर को नाम दे दिया है “राम” । “राम” जपने से सब कुछ सिद्ध हो जाएगा । श्रीराम नाम की ऐसी महिमा और व्याख्या और इसका प्रतिपादन प्रभु श्री महादेवजी ने किया । सहस्त्रनाम तुल्य नाम “राम” यह प्रभु श्री महादेवजी की मनुष्य को एक अदभुत देन है ।
336. श्रीराम नाम की गर्जना से यमपास से मुक्ति, दुःख और विघ्न दौड़ते हैं, भागते हैं साधक के जीवन से । संतों ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि “राम” नाम सहस्त्रतुल्य नाम है तब है, जब एक हजार बार इसे लिया जाए ।
337. प्रभु का नाम संकीर्तन से अदभुत लाभ है क्योंकि कीर्तन जुड़ गया तो नाम का बल कई गुना बढ़ जाता है ।
338. जो वस्तु निशुल्क है, सरल है और बिना मूल्य के सबको मिलती हैं कलियुग में संसार उस पर भरोसा नहीं कर पाता । प्रभु नाम जप के साथ भी यही बात है ।
339. संतों ने एक निशुल्क औषधि बताई जिसको रामबाण औषधि कहते हैं । बीस मिनट “हरे रामा हरे कृष्णा” महामंत्र का कीर्तन करना तो कुछ अशुभ जीवन में बच ही नहीं सकता । कोई बाधा उस घर में आ ही नहीं सकती, कोई जादू टोना काम कर ही नहीं सकता । यह भगवदीय शक्ति के जागरण करने का एक श्रेष्ठ उपाय है ।
340. नाम संकीर्तन से महाराष्ट्र और बंगाल, जहाँ सबसे ज्यादा यह होता है, अनेकों उदाहरण हैं कि नाम संकीर्तन से बड़े-बड़े चमत्कार हुए हैं ।
341. भगवत् नाम पर विश्वास हो गया उस दिन हम सच्चे भाग्यवान बन गए । प्रभु में आस्था अडिग हो गई उस दिन हम सच्चे भाग्यवान बन गए । जीवन में पैसा बढ़ गया उस दिन अपने को भाग्यवान नहीं मानना चाहिए ।
342. निर्विवाद पुण्य के रूप में शास्त्रों में अन्न दान को कहा गया है । भूखे को अन्न देना सबसे बड़ा हवन है, महाहवन है क्योंकि सभी के भीतर जठराग्नि के रूप में प्रभु का ही हवन कुंड है ।
343. संतों ने चार अनमोल सूत्र दिए - लेने को हरि नाम, देने को अन्न दान, तरने के लिए विनम्रता और डूबने के लिए अभिमान ।
344. जिसकी अकड़ यानी अभिमान जितना उसका डूबना तय है । जब डूबने का समय आता है तो हमारा अभिमान जागृत हो जाता है । जिसको कभी डूबना नहीं है उसके हाथ हरदम विनम्रता से जुड़े हुए रहते हैं । भक्तों के हाथ आपको प्रभु दर्शन करते हुए जुड़े हुए ही सदैव मिलेंगे ।
345. जिसकी वाणी से प्रभु का नाम निकलता रहता है, वही सच्ची और धन्य वाणी होती है ।
346. महाभारत युद्ध टालने के दस प्रयास हुए, दस जगह युद्ध टाला जा सकता था पर दुर्योधन की अकड़ और अभिमान के कारण महाभारत का युद्ध टला नहीं ।
347. कोई भी जाति को, किसी भी निमित्त से हमारे द्वारा दिया हुआ अन्न हमारा कल्याण ही करेगा ।
348. किसी भी निमित्त से निकला प्रभु का नाम हमारा कल्याण ही करेगा ।
349. किसी भी निमित्त से किया गया अभिमान हमें जीवन में गिराएगा ही ।
350. किसी भी कारण से की हुई विनम्रता हमें जीवन में महान बनाएंगी ।
351. भक्तों के दर्शन से ही अनेकों बाधाओं का नाश होता है । भक्ति का इतना बड़ा सामर्थ्‍य है ।
352. योग मार्ग से हम अपनी आयु बढ़ा सकते हैं और दीर्घायु हो सकते हैं पर शास्त्रों में उस आयु का श्रेष्‍ठतम उपयोग भक्ति द्वारा भगवत् प्राप्ति करने में कहा गया है ।
353. प्रभु में श्रद्धा और भक्ति का त्याग जीवन में कभी भी नहीं करना चाहिए ।
354. भक्ति जीवन में चलती रहे तो कब क्या करना है, यह ज्ञान सही समय पर प्रभु किसी निमित्त से उपलब्ध करवाते हैं । प्रभु हमारा मार्ग निर्देशन करते हैं और हमें पथभ्रष्ट नहीं होने देते ।
355. सबको जीतना आसान है पर मृत्यु को नहीं जीता जा सकता । प्रभु कहते हैं कि भक्ति से मृत्यु को भी जीता जा सकता है, मृत्यु तो होगी पर उसका डर नहीं रहेगा और वह उत्सव बन जाएगी ।
356. जीवन में जो भी करें बस एक भावना से करें कि प्रभु मैं आपके लिए कर रहा हूँ ।
357. कार्य से पहले और कार्य के अंत में प्रभु को याद करना चाहिए । कार्य के आरंभ में कहना चाहिए यह कर्म प्रभु आपके लिए कर रहा हूँ । कार्य की समाप्ति पर कहना चाहिए कि प्रभु यह आपको अर्पण कर दिया ।
358. हमें सुबह जागने पर शुरुआत करनी चाहिए और कहना चाहिए कि प्रभु आज जो भी करूँगा आपके लिए करूँगा । रात को सोने से पहले प्रभु से कहना चाहिए पूरा दिन जो भी कर्म किया उसे आपको अर्पित कर दिया ।
359. हम कर्म किसके लिए कर रहे हैं इससे उसका मूल्यांकन बढ़ जाता है । एक कर्म अपने लिए करें तो मूल्यांकन उसका छोटा होता है, वही कर्म परिवार के लिए करें तो मूल्यांकन थोड़ा बड़ा हो जाता है । वही कर्म गांव के लिए किया तो मूल्यांकन और बढ़ जाता है, वही कर्म पूरे समाज के लिए किया तो मूल्यांकन और बढ़ जाता है और वही कर्म देश के लिए किया तो उसका मूल्यांकन बहुत बढ़ जाता है । वही कर्म प्रभु के लिए किया तो उसका मूल्यांकन अनंत गुना बढ़ जाता है ।
360. स्वयं के लिए किया कर्म का मूल्य सबसे छोटा होता है और वही प्रभु के लिए उस कर्म को करने पर वह सबसे मूल्यवान बन जाता है ।
361. भोजन भी करें तो कहना चाहिए कि प्रभु आपको भूख लगी है इसलिए आप इसका भोग आरोगें ।
362. औषधि लेते वक्त भी कहना चाहिए प्रभु आपको कष्ट हो रहा है इसलिए औषधि से आप निरोग हो जाएं ।
363. सूत्र यह है कि जीवन में प्रभु का अनुसंधान नियमित बना रहना चाहिए ।
364. शुरू में पन्द्रह-बीस बार दिनभर में प्रभु को याद करना चाहिए । प्रभु से पूछना चाहिए कि आप ठीक है ना, आपके लिए मैं कर्म कर रहा हूँ । अंत में सदैव हर समय प्रभु को याद करने का अभ्यास बनाना है । शुरुआत में पन्द्रह-बीस बार दिन में याद करने से वह बढ़ते-बढ़ते फिर पूरे दिन प्रभु याद रहने लगेंगे ।
365. जहाँ भक्त रहते हैं उस जगह जाना चाहिए, उसका संग करना चाहिए, ऐसा प्रभु कहते हैं ।
366. सूत्र यह है कि जो प्रभु की बातें करें, प्रभु का गुणगान करें, उनका संग करना चाहिए ।
367. तीर्थ जल और पत्थर की मूर्ति से नहीं बनते । तीर्थ बनते हैं भक्तों की भक्ति से । किसी ने वहाँ भक्ति की तभी से वह स्थान तीर्थ बन गया ।
368. एक यक्ष प्रश्न के जवाब में कहा गया है कि मन के मल का त्याग ही सच्चा स्नान है ।
369. प्रभु का नाम लेते रहना चाहिए । प्रभु नाम ही भवरोग की औषधि है । यह औषधि अपना काम करके ही रहेगी ।
370. प्रभु के विग्रह अपने घर में स्थापित करके उन्हें सजाना चाहिए, उत्सव मनाना चाहिए, प्रभु का नाम जप करना चाहिए, प्रभु की जय-जयकार करनी चाहिए, कीर्तन करना चाहिए, प्रभु को प्रसन्न करने के लिए प्रभु के सामने नृत्य करना चाहिए ।
371. जैसे संकीर्तन एक परिपूर्ण योग है वैसे नृत्य भी एक परिपूर्ण योग है । बस वह नृत्य प्रभु से जुड़ जाए । जिसको प्रभु के लिए नृत्य करने में शर्म आती है वह अभी कच्चा है ।
372. लोगों के सामने लोगों की वाहवाही के लिए नाचना एक बात है और सिर्फ प्रभु के सामने इस भावना से नाचना कि प्रभु इससे प्रसन्न होंगे, यह बहुत बड़ी बात है ।
373. श्रीधाम पंढरपुर में महाराष्ट्र की परंपरा ने बहुत सारे नृत्य की विधियां विकसित कर दी है । प्रभु को रिझाने के लिए अलग-अलग तरीके से नृत्य-कीर्तन होता है ।
374. हमारी सारी विद्याएं, सारी परंपराएं भगवत् समर्पित होने के लिए है । गीत, नृत्य, कथा, भजन सब कुछ प्रभु के लिए करना चाहिए क्योंकि सभी विद्याएं और परंपराएं प्रभु को समर्पित होने के लिए ही है ।
375. प्रभु का उत्सव जरूर मनाना चाहिए । संत श्री एकनाथजी कहते हैं कि खुद के पास सामर्थ्य हो तो अकेले मनाना, सामर्थ्य नहीं है तो सार्वजनिक मिल कर उत्सव मनाना पर प्रभु का उत्सव जरूर मनाना चाहिए ।
376. प्रभु के उत्सव मनाने से प्रभु प्रेम जीवन में जागृत होता है ।
377. सभी में मेरे प्रभु का दर्शन अनिवार्य रूप से करना चाहिए, इसलिए सबका सम्मान करना, किसी का भी निरादर नहीं करना चाहिए ।
378. प्रभु से श्री उद्धवजी कहते हैं कि आपने श्री वेदजी में कहा है कि अपवित्र जीव में मेरा वास नहीं और यहाँ पर आप कहते हैं कि सबमें मेरा दर्शन करो तो मैं क्या करूं, उलझन में हूँ । प्रभु कहते हैं कि जब इतना मन शुद्ध हो जाए भक्ति से तो श्रीवेद आज्ञा से ऊपर उठकर सबमें मुझे (प्रभु को) देखो और एक पशु में भी मेरा दर्शन करो ।
379. सूत्र यह है कि संत कहते हैं कि श्रीवेद आज्ञा महान है पर प्रभु उनसे भी महान हैं तो प्रभु की आज्ञा श्रीवेद आज्ञा से ऊपर है जिस कारण प्रभु का आदेश ही मान्य है ।
380. सूत्र यह है कि श्रीवेद महान हैं पर भक्ति उससे भी महान है इसलिए भक्ति के सिद्धांत सर्वोपरि हैं ।
381. सभी में प्रभु को देखने का अभ्यास करने से चार दोष हमारे भीतर से निकल जाते हैं । स्पर्धा का दोष, तिरस्कार का दोष, अनादर का दोष और जलन का दोष ।
382. जब हम सबमें प्रभु को देखते हैं तो हम किसी से स्पर्धा नहीं करते क्योंकि सबको हम अपने समान ही मानते हैं ।
383. जब हम सबमें प्रभु को देखते हैं तो हम किसी का तिरस्कार नहीं करते, किसी को छोटा नहीं मानते, सबको अपने जैसा ही मानते हैं ।
384. जब हम प्रभु को सबमें देखते हैं तो हम किसी का अनादर नहीं करते, हम बड़ों का भी अनादर नहीं करते और छोटों का भी अनादर नहीं करते ।
385. जब हम सबमें प्रभु को देखते हैं तो किसी के लिए हमारे मन में जलन नहीं होती जैसे अपना बच्चा अगर प्रगति करता है तो हमारे मन में कोई जलन नहीं होती ।
386. सबसे बड़ी बात है कि जब हम सबमें प्रभु को देखते हैं तो हमारे मूल अहंकार का नाश होता है, अहंकार गलता है और हम प्रभु साक्षात्कार के लिए तैयार हो जाते हैं ।
387. सूत्र यह है कि मैं शरीर नहीं परमात्मा तत्व हूँ और सभी तरफ वही परमात्मा तत्व मुझे दिखाई देता है ।
388. प्रभु कहते हैं कि जो भी दिखे उसमें मुझे देखकर प्रणाम करना, उसका शरीर मत देखना कि पशु का है या मनुष्य का है । मनुष्य है तो उसकी जाति मत देखना, बस प्रणाम करना ।
389. सूत्र यह है कि शरीर हमें नहीं देखना चाहिए उसके भीतर परमात्मा तत्व ही देखना चाहिए । भक्त को शरीर नहीं उसके भीतर प्रभु ही दिखते हैं ।
390. संत श्री एकनाथजी कहते हैं कि अपने गांव के जानवरों को प्रणाम नहीं कर सकते है क्योंकि लज्जा आती है कि कोई देख लेगा । अगर ऐसा है तो दूसरे गांव में जाकर वहाँ के जानवरों को भी प्रणाम करना चाहिए क्योंकि वहाँ हमें कोई नहीं जानता । मन जब इतना झुकेगा और झुकने का अभ्यास हो जाएगा तो हमारा मन इतना पिघल जाएगा कि प्रभु हमें गले लगा लेंगे ।
391. महात्मा और भक्त के आचरण साधक के लिए साधन के सूत्र होते हैं ।
392. प्रणाम हेतु गधा, घोड़ा, बैल को नहीं देखना चाहिए । जो भी सामने दिखे उसको प्रणाम करने की आदत बनानी चाहिए । यह सूत्र है क्योंकि नहीं तो हम गधे, घोड़े, बैल को ही खोजते रहेंगे उनके भीतर प्रभु को नहीं देख पाएंगे । सूत्र यह है कि जो दिखे उसमें प्रभु को देखकर प्रणाम करना चाहिए ।
393. सबकी सेवा हमारा धर्म है, यह भारतीय सिद्धांत रहा है और यह उच्चतम सिद्धांत है ।
394. जिसे सर्वत्र परमात्मा का बोध होने लग गया वह महात्मा भक्त बहुत दुर्लभ है ऐसा प्रभु श्री कृष्णजी श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहते हैं ।
395. शरीर का अंत मुट्ठी भर राख में ही है । उससे पहले इस नश्वर शरीर से शाश्वत प्रभु की प्राप्ति कर लेना सबसे सच्ची बुद्धिमानी है । जो ऐसा कर पाता है उसका मानव शरीर धन्य माना जाता है ।
396. प्रभु कहते हैं कि जो श्रीवेदों में, पुराणों में कहा गया है उसका सार निकालकर मैंने बता दिया । सबका सार है भक्ति जो देवताओं के लिए भी बहुत दुर्लभ और दुर्गम है ।
397. प्रभु कहते हैं श्री उद्धवजी से कि मेरे भक्तों की तरह तुम भी भक्ति का उपदेश जीवन में सबके हित के लिए करते रहना ।
398. अमृत रूपी भक्ति को पाने के बाद कुछ पाने जैसा शेष नहीं रह जाता । भक्ति को प्राप्त करने के बाद अन्य कुछ प्राप्त करने जैसा नहीं रह जाता ।
399. भक्ति का दान पाकर श्री उद्धवजी ने अपने दोनों हाथ से प्रभु के श्रीकमलचरण पकड़ लिए और अपना मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में रख दिया ।
400. श्री उद्धवजी बोलते हैं प्रभु से कि प्रभु इतना बड़ा चमत्कार आपने कर दिया कि अपनी वाणी का श्रवण कर मेरे अज्ञान को पूरी तरह नष्ट कर दिया और भक्ति का दीपक मेरे भीतर जला दिया ।
401. प्रभु से श्री उद्धवजी कहते हैं कि आप अब अपने स्वधाम जाएंगे तो मैं आपके विरह में कहाँ जाऊँ । तब प्रभु ने कहा कि मैं एकरूप से श्रीमद् भागवतजी महापुराण में प्रवेश कर जाऊँगा, यह आधार सदैव के लिए और सबके लिए रहेगा ।
402. प्रभु ने पूछा श्री उद्धवजी से कि जो मांगोगे मिल जाएगा – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से क्या चाहिए ।
403. श्री उद्धवजी से प्रभु ने कहा कि मांगो तो श्री उद्धवजी बोले कि कितनों ने आपसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष लेकर अपने को आपसे दूर कर लिया । मैं आपसे दूर नहीं होना चाहता क्योंकि यह चार चीज लेकर जीव आपसे दूर हो जाता है इसलिए मुझे तो सिर्फ आपकी भक्ति ही चाहिए ।
404. श्रीमद् भागवतजी महापुराण का एक अमर श्लोक श्री उद्धवजी के मुख से निकला कि यह चार चीज धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष लेकर प्रभु से सब दूर हो गए । प्रभु से श्री उद्धवजी निवदेन करते हैं कि आप मुझे दूर मत करें, आप मेरे साथ खेल मत करिए, मुझे सिर्फ अपनी भक्ति देकर कृतार्थ कर दें ।
405. प्रभु से श्री उद्धवजी कहते हैं कि आप मेरे सद्गुरु बन जाएं, अपने श्रीकमलचरणों से कभी दूर नहीं करें और अपनी भक्ति मुझे दें ।
406. श्री उद्धवजी कहते हैं कि मुक्ति से भी लाख गुना भक्ति ऊँ‍‍ची है ।
407. प्रभु ने लाड़ में श्री उद्धवजी के गालों को स्पर्श किया और उन्हें अपनी प्रेमाभक्ति प्रदान की ।
408. यदुवंश में श्री उद्धवजी भी थे पर प्रभु अपने भक्त का कभी नाश नहीं होने देते तो प्रभु ने श्री उद्धवजी को बद्रिकाश्रम भेज दिया क्योंकि प्रभु को पता था कि यदुवंश का नाश होने वाला है । अपने परिवार को नष्ट होते प्रभु देख सकते हैं पर अपने भक्त को नष्ट होते प्रभु नहीं देख सकते । भक्त के लिए प्रभु ने श्राप को भी टाल दिया ।
409. प्रभु के कहने पर भी श्री उद्धवजी वहीं रुके रहे तो प्रभु ने पूछा क्यों क्या चाहते हो ? श्री उद्धवजी बोले कि जब आपके दर्शन हेतु आँखें तरसेगी तो किसे देखूँगा, प्रणाम करने का मन होगा तो किसे प्रणाम करूँगा ।
410. प्रभु को भी श्री उद्धवजी को दूर भेजना बहुत कष्ट दे रहा था । इससे सिद्धांत का प्रतिपादन होता है कि प्रभु भी अपने भक्त को अपने समीप ही रखना चाहते हैं ।
411. प्रभु ने अपनी श्रीचरण पादुका श्री उद्धवजी को प्रदान की और उन्होंने मस्तक पर धारण कर प्रभु की परिक्रमा करके चले । एक महान ज्ञानी थे जो भक्त बन गए थे । श्री रामावतार में यह सौभाग्य श्री भरतलालजी ने पाया और श्री कृष्णावतार में यह सौभाग्य श्री उद्धवजी ने पाया ।
412. प्रभु का गृहस्थ आश्रम सबके लिए एक आदर्श स्थापित करने वाला था ।
413. अपने माता-पिता की इच्छा मात्र को प्रभु आज्ञा मानते थे, इतने आदर्श पुत्र प्रभु थे ।
414. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि जिनके एक-एक श्रीकमलचरण की श्रीरज में कोटि-कोटि तीर्थ निवास करते हैं वे प्रभु पूरी विधि से तीर्थ सेवन करने श्री कुरुक्षेत्रजी गए । यह लोकाचार हेतु प्रभु ने किया ।
415. सारे वर्ण, सारे आश्रम, सारी जाति, सारे प्रदेश सब तीर्थ में एकाकार हो जाते हैं ।
416. श्री कुरुक्षेत्रजी तीर्थ में प्रभु सभी प्रदेश के लोगों के बीच बृजवासियों को खोज रहे थे क्योंकि प्रभु गोपियों का दर्शन करना चाहते थे ।
417. भगवती यशोदा माता ने देवकीनंदन कहकर प्रभु का अभिनंदन किया तो प्रभु को हृदय में चोट लगी और प्रभु ने कहा कि मैं यशोदानंदन पहले हूँ फिर देवकीनंदन हूँ ।
418. सूत्र यह है कि प्रभु को “मेरे प्रभु” कहकर हम नहीं पुकारेंगे तो प्रभु को हृदय में चोट लगेगी ।
419. गोपों ने प्रभु को द्वारकाधीश कहकर पुकारा तो प्रभु ने कहा कि नहीं मैं तो आपका कन्हैया हूँ ।
420. सूत्र यह है कि प्रभु को हम जिस नाम से रिझाते हैं प्रभु उस नाम से सदैव के लिए हमारे बन जाते हैं ।
421. प्रभु ने कहा कि राजा के कर्तव्य निभाते-निभाते और इतने विवाह से गृहस्थ आश्रम में फंसने के कारण मैं कभी बृजवासियों से मिलने नहीं आ पाया पर जब भी मुझे एकांत मिला तो सदैव गोपियों का ही स्मरण मैंने किया ।
422. सूत्र यह है कि भक्त से मिलने अगर प्रभु नहीं आते तो भी भक्तों को प्रभु कभी भूलते ही नहीं हैं ।
423. सूत्र यह है कि प्रभु भक्त को कभी नहीं भूलते चाहे दर्शन देने में विलंब भी करें तब भी भक्त को सदैव प्रभु अपने अंतःकरण में याद रखते हैं ।
424. प्रभु श्री शुकदेवजी ने गोपियों की व्याख्या करते हुए कहा कि पलकों को झपकने में जितना समय लगता है उतने क्षण भी अदर्शन को गोपियां नहीं सह सकती । इसलिए वे प्रभु श्री ब्रह्माजी को दोष देती कि विघ्न देने हेतु पलकों को क्यों बनाया ।
425. गोपियों की भक्ति की तीव्रता श्रीमद् भागवतजी महापुराण का अमर श्रृंगार है ।
426. गोपियों को प्रभु ने इतना दीर्घ वियोग दिया फिर भी किसी को कोई शिकायत नहीं थी । सच्चा भक्त वही होता है जिसको प्रभु से कभी भी कोई शिकायत नहीं होती ।
427. गोपियां नेत्रों से प्रभु को देखकर उन्हें अपने हृदय में खींच लेती थीं ।
428. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि गोपियों की विशेषता देखें कि प्रभु से पूछा कि आपने बहुत सारे विवाह किए हैं, हमें माताओं के दर्शन करने हैं । उन्होंने कोई शिकायत नहीं की प्रभु से क्योंकि वे सभी प्रभु को हर हाल में खुश और प्रसन्न देखना चाहतीं थीं ।
429. अपनी समस्त दुर्बलताओं को त्यागकर अपना कर्तव्य करने के लिए सिद्ध हो जाना चाहिए ।
430. अपने मन को संतुलित तथा बुद्धि को स्थिर रखना चाहिए ।
431. कर्तव्य पालन करना सांसारिक धर्म है ।
432. प्रभु की भक्ति करना परम धर्म है ।
433. किसी भी परिस्थिति में कर्तव्य का त्याग नहीं करना चाहिए ।
434. कर्तव्य कर्म करने में सदैव सावधानी रखनी चाहिए ।
435. कर्तव्य के परिणाम में जो मिल जाए उसे प्रसन्नता से स्वीकार करना चाहिए और ऐसा स्वभाव बनाना चाहिए कि उसके कारण हम प्रसन्न रह सकें ।
436. सज्जनों की रक्षा तथा दुष्टों का विनाश प्रभु अवश्य करते हैं ।
437. मन से सदाचारी बनने का प्रयास ही सच्ची साधना है ।
438. साधुता का आडंबर करना दंभ है ।
439. छोटे-छोटे नियमों तथा व्रतों का प्रामाणिकता से पालन करते-करते हम महान बन सकते हैं ।
440. अपना उद्धार अपने द्वारा ही हो सकता है ।
441. हम ही अपने सर्वश्रेष्ठ मित्र और असंयमी होने पर अपने सबसे बड़े शत्रु और विनाशकर्ता हो सकते हैं ।
442. मानसिक संतुलन को “योग” कहते हैं और सामाजिक संतुलन को “धर्म” कहते हैं ।
443. हम नश्वर शरीर नहीं अमर आत्मतत्व हैं ।
444. सुख और दुःख आते-जाते ही रहते हैं, उनसे अतीत होकर साक्षी भाव से उन्हें देखना चाहिए ।
445. किसी भी अवस्था में धीरज न त्यागते हुए तेजस्वी और धर्मवीर बनना चाहिए ।
446. प्रभु की भक्ति में सकामता नहीं होनी चाहिए ।
447. निष्काम भक्त को प्रभु सब कुछ तो क्या स्वयं को भी प्रदान कर देते हैं ।
448. हर प्राणी में परमात्मा का दर्शन करते हुए सभी के प्रति अपना प्रेमपूर्ण और सेवामय व्यवहार रखना चाहिए ।
449. सर्वदा जीवन में प्रभु की शरणागति का भाव बना रहे, यही सबसे महान तत्व है ।
450. प्रभु की शरणागति होना इहलोक और परलोक दोनों का सर्वोत्तम लाभ है ।
451. श्रीमद् भगवद् गीताजी को पढ़ना और पढ़ाना चाहिए और जीवन में इसे अपनाने का प्रयास करना चाहिए ।
452. श्रीमद् भगवद् गीताजी का पठन प्रभु का सर्वाधिक प्रिय होने के लिए सबसे सर्वोत्तम उपाय है ।
453. महाभारतजी में कहा गया है कि मरण अवस्था में जितना दान दिया जाए उतना श्रेष्ठ है ।
454. आपत्ति आने वाली हो तो रोते नहीं बैठना चाहिए, यह उत्तम पुरुष के लक्षण नहीं हैं । उस समय विवेक से जो उपयुक्त हो वह करना चाहिए, यह उत्तम पुरुष के लक्षण हैं ।
455. हर काल की लीला में प्रभु का अनुमोदन होता है यानी प्रभु द्वारा वह अनुमोदित होती है ।
456. देह का कोई प्रभाव आत्मतत्व पर नहीं होता ।
457. जिस व्याध के बाण ने प्रभु को स्पर्श किया और धन्य हुआ क्योंकि प्रभु ने उसे अपनी श्रीलीला को विश्राम देने के लिए चुना । उस व्याध ने गलती से बाण चलाया मृग जानकर और प्रभु से क्षमा मांगी । प्रभु ने दिव्य विमान मंगवाया और उस व्याध को परमगति दी । प्रभु पर बाण चलाने वाले को भी प्रभु परमगति देते हैं, प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि देखो प्रभु कितने करुणामय हैं ।
458. प्रभु के स्वधाम गमन का दर्शन करने प्रभु श्री महादेवजी, प्रभु श्री ब्रह्माजी और सब देवतागण पुष्पांजलि और स्त्रोत पाठ करते हुए अभिनंदन करने के लिए आए ।
459. प्रभु ने कृपा दृष्टि से सबको देखा और अपने श्रीनेत्र बंद कर लिए और स्वधाम के लिए प्रस्थान किया ।
460. देवतागण उत्सुक थे प्रभु की अंतर्ध्यान श्रीलीला देखने हेतु । प्रभु अंतर्ध्यान हुए पर कोई विमान नहीं आया । प्रभु कहीं नहीं गए । प्रभु श्रीमद् भागवतजी महापुराण में विद्यमान हो गए । इसलिए प्रभु का साक्षात विग्रह श्रीमद् भागवतजी महापुराण है ।
461. प्रभु जब चाहे, जहाँ से चाहे प्रकट हो सकते हैं ।
462. कलियुग में अर्थ और काम की प्रधानता रहेगी, कुटुंब पालने के लिए लोग लगे रहेंगे, व्याधियों और रोगों से ग्रस्त रहेंगे, आयु घटती जाएगी, पातक सभी प्रकार के होंगे, अनाचार खूब बढ़ेगा, भूमि के लिए लोग निरंतर संघर्ष करते रहेंगे ।
463. हम भूमि का मालिक बनने और भूमि में हिस्सेदारी लेने के लिए कितना प्रयत्न करते हैं और फिर अंत में सब कुछ छोड़कर जाना पड़ता है क्योंकि भूमि के असली और सनातन मालिक तो प्रभु ही हैं ।
464. कलियुग में लोग अंधे होकर व्यवहार करेंगे यानी बिना सोचे समझे व्यवहार करेंगे ।
465. मनुष्य में सतोगुण यानी मन, बुद्धि और इंद्रियों पर नियंत्रण एवं साधना और आध्यात्मिक विद्या की प्राप्ति में रुचि कलियुग में नहीं होगी ।
466. धर्म, काम और अर्थ में रुचि हो तो यह हमारे रजोगुण के लक्षण हैं ।
467. लोभ, असंतोष बढ़ेगा, सम्मान पाने की इच्छा बढ़ेगी, ऐसा कलियुग में होगा ।
468. कपट की इच्छा, झूठ बोलना सही लगेगा, खूब आलस्य आएगा, यह तमोगुण के लक्षण है जो कलियुग में प्रकट होंगे ।
469. कलियुग में एक गुण है जिस कारण देवतागण भी कलियुग में जन्म लेकर मृत्युलोक में भारतवर्ष में जन्म पाने हेतु लालायित रहते हैं और वह गुण है भक्ति के अंतर्गत नाम जप और नाम कीर्तन करके प्रभु प्राप्ति करने का ।
470. सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में लंबी पूजा करने पर जो फल मिलता था वह मात्र प्रभु नाम कीर्तन से सहजता से कलियुग में मिल जाता है । इसलिए कलिकाल को संतों ने बहुत आदर दिया है क्योंकि तरने हेतु साधन बहुत ही सरल है ।
471. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि अन्य कुछ नहीं करें सिर्फ प्रभु नाम रूपी कीर्तन करें तो प्रभु तक सहजता से कलियुग में पहुँचा जा सकता है ।
472. सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलि एक निरंतर चलने वाला चक्र है ।
473. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि निरंतर बदलने वाले कालचक्र पर कभी ध्यान नहीं देना चाहिए । कभी न बदलने वाले कालचक्र के मालिक प्रभु की तरफ सदैव ध्यान रखना चाहिए ।
474. तक्षक सर्प के आने का वक्त हो गया था । प्रभु श्री शुकदेवजी पूछते हैं श्री परीक्षितजी से कि कैसा लग रहा है ? समाधि अवस्था में पहुँचे राजा श्री परीक्षितजी कृतज्ञता से बोलते हैं कि आपने दिव्य तत्व प्रभु का ज्ञान करवा दिया, शरीर मरेगा, मैं तो उस दिव्य तत्व का ही तत्व हूँ, मेरा कुछ बिगड़ने वाला नहीं है ।
475. कथा मात्र सुनने का विषय नहीं, अनुभूति और अनुभव का विषय है ।
476. जीवन में वाणी के सभी व्यापार छोड़कर एक प्रभु को ही वाणी का विषय बनाना चाहिए ।
477. प्रभु श्री शुकदेवजी का राजा श्री परीक्षितजी ने पूजन किया और प्रभु श्री शुकदेवजी ने मंगल आशीर्वाद दिया और विदा हुए ।
478. तक्षक सर्प आया, दंश किया, शरीर विष से जलने लगा और राजा श्री परीक्षितजी की आत्मा निकलकर प्रभु में विलीन हो गई ।
479. जैसे मंदिर में दीपदान के बर्तन में दीपक घी नहीं होने पर कैसे विलीन हो जाता है, बाहर से किसी को पता भी नहीं चलता कि दीपक कब बुझ गया वैसे ही राजा श्री परीक्षितजी भी प्रभु में कब विलीन हो गए किसी को कुछ पता भी नहीं चला ।
480. श्रीमद् भागवतजी महापुराण के टीकाकार ने मृत्यु को मोक्ष-उत्सव यानी मोक्ष होने का उत्सव का नाम दिया है ।
481. तपस्वी अगर संयमी होता है तो उसका अभिनंदन देवतागण भी करते हैं ।
482. वैराग्यशीलता साधक का आभूषण होता है ।
483. भक्त अगर संयमी होता है तो संयम होने पर भक्ति बहुत बल पाती है ।
484. माया के चक्कर की जिज्ञासा करना भी चक्कर ही है ।
485. कुछ क्षण में प्रभु ने लाखों वर्ष के दर्शन और लाखों ब्रह्मांड के दर्शन ऋषि श्री मार्कंडेयजी को कराया । ऋषि श्री मार्कंडेयजी समझ गए कि यही प्रभु की माया है ।
486. भारतीय शास्त्रों ने दृश्य का नहीं, दृष्टा प्रभु का विचार किया है ।
487. जो हमारे भीतर से देख रहा है उन प्रभु को देखना चाहिए, यह भारतीय शास्त्रों का मूल सूत्र है ।
488. ऋषि श्री मार्कंडेयजी अल्प आयु के थे पर प्रभु श्री महादेवजी ने उनको दीर्घायु नहीं, चिरंजीवी ही बना दिया । जब प्रभु श्री यमराजजी पहुँचे तो ऋषि ने श्रीशिवलिंग को “हर हर महादेव” कहकर पकड़ लिया । प्रभु श्री यमराजजी ने ऋषि का विवरण बताया और उनकी मृत्यु बेला की बात बताई पर प्रभु श्री महादेवजी के सामने यमलोक के कोई नियम और लेखा नहीं चलते । प्रभु श्री महादेवजी ने यमलोक के नियम को ठोकर मारकर ऋषि को चिरंजीवी कर दिया ।
489. प्रभु के श्रीकमलचरणों का स्मरण ही हमारा जीवन हो जाए क्योंकि इससे ही अमंगल का ह्रास होता है और मंगल का उदय होता है ।
490. श्रीमद् भागवतजी महापुराण का श्रवण करके भक्ति का दीपक घर में जलाना चाहिए ।
491. भक्ति के दीपक को संसार की वायु से बुझने नहीं देना चाहिए, संत ऐसा उपदेश देते हैं ।
492. शास्त्र और संत कहते हैं कि यह भावना दृढ़ कर लेनी चाहिए कि हम सिर्फ भगवान के ही हैं ।
493. हम जहाँ भी रहते हैं प्रभु के दरबार में ही रहते हैं, यह धारणा जीवन में मान्य कर लेनी चाहिए ।
494. हम जो भी शुभ काम करते हैं, प्रभु का ही काम करते हैं ।
495. शुद्ध सात्विक जो भी हमें मिलता है वह प्रभु के प्रसाद के रूप में हम ग्रहण करते हैं ।
496. प्रत्येक मनुष्य को प्रभु की तरफ चलना ही पड़ेगा, चाहे आज चले या अनेक जन्मों बाद चले । तो फिर देरी क्यों करें ?
497. जिसकी दृष्टि संसार में रहती है वह कहता है भगवान कहाँ हैं और जिसकी दृष्टि भगवान में रहती है वह कहता है भगवान कहाँ नहीं हैं ।
498. मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिए, मुझे अपने लिए कुछ भी नहीं करना है - यह तीन बातें शीघ्र ही हमारा उद्धार करने वाली बन जाती है ।
499. भोग भोगने और संग्रह करना इन दोनों की इच्छा से ही सब अनर्थ पैदा होते हैं ।
500. भगवान के हृदय में भक्त का जितना आदर है उतना आदर संसार में करने वाला दूसरा कोई भी नहीं है ।
501. मैं केवल भगवान का “ही” हूँ और केवल भगवान “ही” मेरे हैं, यह सबसे बड़ा जीवन का सार है और शाश्वत सिद्धांत है ।
502. भागदौड़ का जीवन जीने वाले प्रभु श्री कृष्णजी जब गोपियों से मिले तो मानो समय ठहर गया । प्रभु ने छह महीने श्री कुरुक्षेत्रजी में बृजवासियों के साथ व्यतीत किए ।
503. प्रभु सुबह श्री कुरुक्षेत्रजी तीर्थ में यज्ञ करते, सांयकाल को कथा सुनने के लिए प्रभु श्रोता बनकर बैठ जाते ।
504. श्री कुरुक्षेत्रजी के युद्ध में जब श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश किया तो प्रभु श्री कृष्णजी सर्वोत्तम वक्ता थे । वे ही प्रभु वापस श्री कुरुक्षेत्रजी में प्रभु कथा सुनने सर्वोत्तम श्रोता बनकर बैठे ।
505. प्रभु से संयोग के बाद फिर वियोग का समय आया तो सभी गोपियां बहुत व्याकुल हो उठी ।
506. प्रभु ने गोपियों को अध्यात्म का उपदेश दिया । निरंतर प्रभु का स्मरण गोपियों ने सदैव किया था इसलिए अध्यात्म का उपदेश प्रभु ने स्वयं उन्हें दिया ।
507. संयोग में जब प्रभु मिलते हैं तो जितना आकर्षण होता है, प्रेम होता है उससे ज्यादा आकर्षक प्रभु वियोग में होता है । यह सूत्र है जो गोपियों को प्रभु देते हैं ।
508. संत प्रभु से संयोग और वियोग दोनों चाहते हैं । कुछ संत प्रभु से वियोग ही मांगते हैं क्योंकि वियोग में ज्यादा प्रभु की याद आती है, ज्यादा प्रभु का स्मरण होता है ।
509. संत कहते हैं कि अध्यात्म सुख देने के लिए प्रभु ने गोपियों को वियोग दिया । वियोग का अध्यात्म सुख बड़ा अद्वितीय होता है ।
510. प्रभु ने गोपियों को संपत्ति, स्वर्ग, मुक्ति, काम, अर्थ, धर्म सब कुछ निवेदन किया पर गोपियों ने हाथ जोड़कर कहा कि इसमें से कुछ भी नहीं चाहिए ।
511. प्रभु ने पूछा कि क्या चाहिए तो गोपियां बोली चाहे कर्म अनुसार स्वर्ग, नर्क जाएं, किसी भी योनि में रहे, प्रभु आप इसमें हस्तक्षेप नहीं करें । एक निवेदन है कि जहाँ भी जाए, जो भी भुगते, जिन भी लोक, योनि, स्थिति में रहे, हमारा जीवन का संपूर्ण प्रेम सिर्फ आपके लिए हो ।
512. गोपियां प्रभु से कहतीं हैं कि हमारी प्रेमाभक्ति का प्रवाह निरंतर आपके श्री कमलचरणों की तरफ बहे, हमारी वाणी में सिर्फ आपका नाम हो, हमारे शरीर से कोई-न-कोई आपकी सेवा होती रहे, बस यह तीन चीजें प्रभु आप दे दें ।
513. निरंतर हृदय में प्रभु का स्मरण, वाणी से प्रभु का नाम और शरीर से प्रभु की सेवा यह तीन श्रेष्ठ भक्त के सूत्र हैं ।
514. भक्ति के तीन स्थर होते हैं । साधारण भक्ति यानी प्रभु से प्रेम स्वार्थ के लिए करना, जैसे कुब्जा ने किया । मध्यम भक्ति यानी प्रेम के बदले प्रेम की चाहत होना, जो प्रभु की पत्नियों (माताओं) ने किया । पर श्रेष्ठतम प्रेमाभक्ति गोपियों की थी जहाँ प्रभु की प्रसन्नता ही उनका एकमात्र हेतु था इसलिए सबसे ऊँ‍‍ची गोपियों की प्रेमाभक्ति ।
515. कुब्जा ने प्रभु को अपने घर बुलाया, प्रभु गए तो भोगों की याचना की और प्रभु से प्रेम किया अपने सुख के लिए । हम भी प्रभु से कहते हैं कि धन-धान्य, संपत्ति सब कुछ साथ लेकर आएं तो जरूर आएं, यह साधारण भक्ति है ।
516. अपने सुख का साधन प्रभु को बनाना, यह साधारण भक्ति है ।
517. प्रभु की पत्नियाँ (माताओं) ने प्रभु से प्रेम भी किया और प्रभु से प्रेम भी चाहतीं थीं । प्रभु को सुख भी देती थीं और प्रभु से सुख चाहती भी थीं, यह मध्यम भक्ति है ।
518. गोपियों ने प्रभु से प्रेम स्वयं के सुख के लिए नहीं किया । गोपियों ने प्रभु को दिया ही दिया बदले में कुछ भी नहीं चाहा । गोपियां सिर्फ चाहतीं थीं कि प्रभु प्रसन्न रहे । यह श्रेष्ठतम भक्ति का स्तर है ।
519. जो संत ऐसी निष्काम भक्ति कर पाते हैं वे ही सच्चे संत हैं ।
520. प्रभु श्री हनुमानजी ने क्या किया, कुछ भी नहीं चाहा । जो प्रभु प्रिय होने का आशीर्वाद दिया वह भगवती जानकी माता ने दिया । प्रभु ने कुछ नहीं दिया पर एक मंगल श्लोक में प्रभु ने अपनी भावना व्यक्त कर दी कि मैं हनुमान को अपने स्वयं को देता हूँ क्योंकि मेरे पास हनुमान को देने लायक स्वयं के अलावा कुछ भी नहीं है । इतने प्रेम और भक्ति के आगे प्रभु को पिघलना ही नहीं, झुकना भी पड़ता है ।
521. भगवती यशोदा माता कहती हैं ग्यारह वर्ष के बाद जो प्रभु गए तो शरीर के पिंजरे टूट गए और प्राणरूपी पक्षी ने उड़ने से मना कर दिया क्योंकि उन्हें आशा थी कि प्रभु वापस आएंगे । आज श्री कुरुक्षेत्रजी में यह मिलन हुआ और प्राणरूपी पक्षी अब उड़ने को आतुर हैं । अंतिम इच्छा है कि जब प्राण निकले तो प्रभु दौड़कर आएं, कन्हैया के वेष में ।
522. भगवती यशोदा माता चाहती हैं कि प्रभु बंसी बजाते मुझे देखते रहे और वे उन्हें देखती रहे, इस तरह यशोदा प्रभु में विलीन हो जाए ।
523. सूत्र यह है कि भगवती यशोदा माता को पता है कि अंतिम समय प्रभु का स्मरण हुआ तो प्रभु में विलीन हो जाएंगी । उन्होंने यह जिम्मेदारी भी प्रभु को दे दी क्योंकि नियति कहीं कोई अन्य विचार अंतिम समय नहीं ला दे ।
524. सूत्र यह है कि हमें भी अपनी अंतिम अवस्था में प्रभु स्मरण की जिम्मेदारी प्रभु को ही देनी चाहिए ।
525. भगवती यशोदा माता के निवेदन पर श्रीमद् भगवद् गीताजी के प्रखर वक्ता प्रभु मौन हो गए । अब क्या ज्ञान दें क्योंकि श्रेष्ठतम ज्ञान प्रभु कृपा से माता में आ गया था इसलिए प्रभु मौन हो गए ।
526. गोपियों की श्रेष्ठता यह है कि प्रभु को इतना भूलने की कोशिश करती हैं पर प्रभु को हृदय से बाहर एक क्षण के लिए भी निकालना उनके लिए संभव नहीं होता ।
527. सर्वोत्तम भक्ति का स्तर यह होता है कि प्रभु सदैव याद रहे । उन्हें भूलने का प्रयास करने का मतलब क्या है कि वे सदैव याद हैं, निरंतर याद हैं । यह सर्वोत्तम भक्ति है ।
528. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी को सभी भक्तों का स्तर पता है । कोई भक्त उनसे छिपा हुआ नहीं है । उन्होंने गोपियों को प्रेमाभक्ति का आदर्श माना । यह स्थान गोपियों को दिया क्योंकि गोपियों में असाधारण प्रेमाभक्ति थी ।
529. प्रभु का पक्का, पूर्ण और सनातन सानिध्य का नाम ही भक्ति है ।
530. हम किसके हैं ? हम प्रभु के ही हैं । बृजवासियों की यही भावना थी कि हम प्रभु के ही हैं ।
531. हम जो भी करते हैं, परिस्थिति जो करवाती है, जहाँ ले जाती है, जैसे रखती है - एक दृढ़ निष्ठा होनी चाहिए कि मैं प्रभु का हूँ और सिर्फ प्रभु ही मेरे हैं ।
532. हमें किसी दूसरे के होकर नहीं रहना चाहिए । हमारे मालिक सिर्फ प्रभु होने चाहिए ।
533. हमने जीवन में जो कुछ भी सीखा है प्रभु का होकर ही सीखा है, संत ऐसा मानते हैं ।
534. सारा अध्यात्म ज्ञान होने पर भी मानवीय बने रहना यह प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने करके दिखाया । संत इसका ही अनुसरण करते हैं ।
535. बुढ़ापा समाप्त करने का सामर्थ्य साधना के बल पर ऋषि के पास होता था । श्री योग वशिष्ठ में इसका रहस्य बताया गया है कि कैसे जीवन जीने से दीर्घायु होना संभव होता है, यह दर्शाया गया है । श्री काकभुशुण्डिजी इसके आदर्श है । जब उनसे पूछा कि आपकी उम्र क्या है तो उन्होंने कहा कि सौ बार प्रभु श्री ब्रह्माजी को आते-जाते हुए वे देख चुके हैं, इतनी दीर्घायु को वे प्राप्त हुए ।
536. प्रभु की कृपा से भगवती यशोदा माता के बुढ़ापे में भी प्रभु को देखते ही दूध आ जाता था क्योंकि प्रेमवश प्रभु को स्तनपान कराने की उनकी इच्छा होती थी ।
537. भगवती यशोदा माता को अपने छह मृत बच्चों से मिलने की इच्छा थी । इच्छा पूर्ति हेतु प्रभु ने मात्र एक दिन की अवस्था में उनको लाकर वापस दिया क्योंकि जब कंस ने उन्हें मारा था तो वे एक दिन के थे । प्रभु ने ऐसा इसलिए किया कि भगवती यशोदा माता की कामना और इच्छा समाप्त हो जाए । अंतकाल में कोई कामना नहीं बचे, सिर्फ प्रभु का स्मरण ही बचे, तभी प्रभु प्राप्ति संभव है ।
538. प्रभु की कृपा से संतों को इतना सामर्थ्य प्रभु दे देते हैं कि वे एक बूढ़े-बुढ़िया को पुत्र होने का वरदान देते हैं, सब चकित हो जाते हैं पर वह असंभव भी प्रभु की कृपा से संभव हो जाता है ।
539. सनातन धर्म में प्रभु के सामने पश्चाताप और अपनी गलती मानने को बहुत बड़ा पुरुषार्थ माना गया है ।
540. हमारे भीतर कोई भी वासना बची हुई नहीं रहनी चाहिए, तभी अंत में प्रभु प्राप्ति संभव होती है ।
541. हमें अपनी इच्छा, अपनी गलतियों को प्रभु के समीप मुँह से बोलकर बताना चाहिए । इससे प्रभु को प्रसन्नता होती है ।
542. अवांछित लोगों को कैसे टालना चाहिए, यह प्रभु श्री कृष्णजी से सीखना चाहिए ।
543. श्री वेदजी शब्दमय हैं । शब्दमय श्री वेदजी कैसे शब्दों से अतीत प्रभु का वर्णन कर सकते हैं । इसलिए श्री वेदजी "नेति-नेति" कहकर शांत हो जाते हैं । श्री वेदजी प्रभु का संकेत मात्र करते हैं, ऐसा संत मानते हैं ।
544. सूत्र यह है कि श्री वेदजी जितना प्रभु का बखान करते हैं वह तो मात्र संकेत है क्योंकि प्रभु का पूर्ण वर्णन करने की क्षमता किसी में भी नहीं है ।
545. ऋषि श्री भृगुजी प्रभु श्री ब्रह्माजी के सामने जाकर बैठ गए तो प्रभु श्री ब्रह्माजी रुष्ट हो गए । फिर भी प्रभु श्री महादेवजी के पास गए और प्रभु आलिंगन देने के लिए आगे बढ़े तो ऋषि श्री भृगुजी ने आलिंगन से मना कर दिया तो प्रभु श्री महादेवजी रुष्ट हो गए । जब वे प्रभु श्री नारायणजी के पास पहुँचे और उनके वक्षस्थल पर पग से प्रहार किया प्रभु ने कहा कि मेरा हृदय इतना कठोर और आपके पग इतने कोमल, कहीं चोट तो नहीं लगी । ऋषि श्री भृगुजी ने प्रभु श्री नारायणजी को करुणामय बताया । यह प्रभु की श्रीलीला मात्र है । प्रभु वैसे तीनों रूपों (प्रभु श्री ब्रह्माजी, प्रभु श्री नारायणजी और प्रभु श्री महादेवजी) में करुणामय ही हैं ।
546. जिस समय भी प्रभु की आराधना करनी है प्रभु के सगुण साकार रूप की ही करनी चाहिए ।
547. संयोग और वियोग दोनों में प्रभु से प्रेम बढ़ता है, प्रभु ने गोपियों को ऐसा कहा ।
548. संयोग के बाद वियोग देने से फिर ज्यादा प्रेम उभरता है । वियोग के बाद संयोग में भी ज्यादा प्रेम उभरकर आता है ।
549. श्रीमद् भगवद् गीताजी में संत श्री ज्ञानेश्वरजी के भाष्य को श्रवण करना श्रेष्ठ होता है ।
550. श्रीमद् भागवतजी महापुराण का एकादश स्कंध में संत श्री एकनाथजी के भाष्य का सहारा लेना श्रेष्ठ होता है ।
551. श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं कि मैं अपने भक्तों के पीछे-पीछे नित्य चलता हूँ क्योंकि उन भक्तों की चरणों की धूल मेरे ऊपर गिरे और मैं पवित्र हो जाऊँ । यह भक्तों की महिमा का प्रभु द्वारा बखान करने की पराकाष्ठा है ।
552. प्रभु के हृदय को खोलकर देखेंगे तो वहाँ भक्त मिलेंगे और भक्त के हृदय को खोलकर देखेंगे तो वहाँ प्रभु मिलेंगे ।
553. प्रभु कहते हैं कि मेरा भक्त मेरे अलावा किसी को नहीं जानता और न जानने का प्रयास करता है ।
554. प्रभु कहते हैं कि मैं भी अपने भक्त के अलावा किसी दूसरे का स्मरण भी नहीं करता हूँ । भक्त के अलावा प्रभु किसी को जानना ही नहीं चाहते ।
555. भक्तों को भी प्रभु के अलावा किसी भी अन्य चीज में रुचि ही नहीं होती ।
556. प्रभु की भक्ति की महिमा बताते हुए संत व्याख्या करते हैं कि एक असंभव बात जैसे सुई के नोक से ऊँट पार हो सकता है पर एक खरबपति कभी प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि उसका अहंकार गलता नहीं है और बिना अहंकार गले प्रभु की प्राप्ति संभव नहीं है । प्रभु केवल भक्ति के अंतर्गत दीनता और पूर्ण समर्पण से ही मिलते हैं ।
557. भक्त के मन में लबालब प्रभु प्रेम भरा हुआ ही रहता है ।
558. संत श्री रामकृष्ण परमहंसजी ने कहा कि दाल-रोटी कमाने की विद्या मुझे पढ़नी ही नहीं है, मुझे तो सिर्फ प्रभु कैसे प्राप्त हो यही जीवन में जानना है ।
559. भक्त सदैव शांत होते हैं, प्रभु उन्हें शांताराम कहते हैं ।
560. भक्त के जीवन में प्रतिकूल बहुत घटता है फिर भी वे प्रभु के भरोसे शांत ही रहते हैं ।
561. संत श्री एकनाथजी को अशांत करने के लिए वहाँ के गांव के लोगों ने इनाम रखा पर पूरे जीवन वह इनाम किसी को नहीं मिल पाया क्योंकि संत श्री एकनाथजी को कोई, कभी भी अशांत ही नहीं कर पाया ।
562. भक्तों का प्रेम सब जीवों से होता है क्योंकि वे सबके अंदर में अपने प्रभु का दर्शन करते हैं ।
563. संत कहते हैं कि प्रभु को पूरा भान होता है कि भक्तों का दायित्व प्रभु के ऊपर सदैव रहता है ।
564. भक्त को प्रभु अंश के रूप में पूरा विश्व देखता है ।
565. भक्त जो भी करते हैं वह सामने वाले व्यक्ति को देखकर नहीं करते बल्कि उनमें स्थित परमात्मा को देखकर करते हैं ।
566. भक्तों के अंतःकरण में निरंतर आनंद लहराता ही रहता है क्योंकि वे प्रभु से जुड़े हुए होते हैं ।
567. भक्तों के अंतःकरण में जो आनंद होता है उसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते ।
568. प्रभु ही भक्तों के अंतःकरण में आनंद की ऊर्जा पहुँचाते हैं । आनंद देने वाले प्रभु ही हैं ।
569. भक्तों का आनंद अखंड होता है ।
570. भगवती मीराबाई ने जो राजमहल छोड़ दिया वह उनके लिए कंकड़ समान था और जो प्रभु को पाया वे परम रत्न थे ।
571. भक्ति के कारण संसार के विषयों का आक्रमण जीव के भीतर ठंडा पड़ जाता है ।
572. हमें भक्ति की भावना का अत्यंत विकास अपने जीवन में करना चाहिए ।
573. भक्ति जितनी श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है, भक्ति का स्थान सबसे ऊपर है । भक्ति से जो प्राप्त होता है वह अन्य साधनों से प्राप्त नहीं होता ।
574. प्रभु किसी को मिलते हैं तो केवल भक्ति, भक्ति और भक्ति से ही मिलते हैं । अन्य कोई साधन से प्रभु प्राप्त नहीं होते । एकमात्र भक्ति से ही प्रभु प्राप्त होते हैं, ऐसा प्रभु ने श्री उद्धवजी को कहा ।
575. प्रभु ने “एकमात्र” शब्द लगाया और तीन बार "भक्ति" शब्द का प्रयोग किया और कहा कि मैं एकमात्र भक्ति, भक्ति और भक्ति से ही प्राप्त होता हूँ ।
576. भक्ति के साथ कुछ भी नहीं हो तो भी वह पूर्ण है क्योंकि उसे अन्य साधनों की आवश्यकता नहीं है ।
577. भक्ति प्रभु में निष्ठा निर्माण करके हमारे भीतर प्रभु के लिए प्रेम भाव निरंतर बढ़ाती रहती है ।
578. भक्ति से हमारे विचार के परमाणु बदल जाते हैं । भक्ति हमें भीतर से और पूरी तरह से प्रभावित करती है ।
579. भक्ति के कारण भक्त का जीवन परम पवित्र हो जाता है ।
580. कोई भी जाति में जन्में व्यक्ति को भी भक्ति परम पवित्र बना देती है ।
581. कोई श्रेष्ठ जाति में जन्मा और बारह गुणों से युक्त होने पर भी अगर भक्ति रहित है तो वह एकदम तुच्छ है ।
582. प्रभु की भक्ति में इतना रस आना चाहिए कि हमारा मन अन्यत्र कहीं जाए ही नहीं ।
583. प्रभु की भक्ति नहीं करने वाले श्रेष्ठ जाति के जीव से भी भक्ति करने वाला कोई भी जाति का जीव श्रेष्ठ है, यह श्रीमद् भागवतजी महापुराण का सिद्धांत है ।
584. किसी भी साधन और किसी भी सद्गुण की पूर्णता भक्ति बिना नहीं है । पूर्णता तो सिर्फ भक्ति से ही प्राप्त होती है ।
585. कितना भी सत्य बोले, नैतिकता से रहे, अहिंसा का पालन करें पर प्रभु की भक्ति नहीं की तो सब अपूर्ण और बेकार है ।
586. भक्ति ही जीवन को शुद्ध करती है । एकमात्र भक्ति में ही इसका सामर्थ्य है ।
587. भक्ति हमारे चित्त को प्रभु के प्रेम के लिए पिघला देती है ।
588. प्रभु के श्रीगुणों का विचार आया, प्रभु की श्रीलीला का विचार आते ही हमारा चित्त प्रेम में पिघलना चाहिए ।
589. प्रभु अपने नियम को दूर रखकर भी भक्त का उद्धार करते हैं । भगवती शबरीजी के लिए प्रभु ने अपने नियम तोड़े और उनका उद्धार किया ।
590. प्रभु भी भक्त की प्रतीक्षा करते हैं । श्री ध्रुवजी ने जब ध्यान में आँखें नहीं खोली तो प्रभु प्रतीक्षा करते हुए खड़े रहे । श्रीपंढरपुर में भी प्रभु एक ईंट पर खड़े होकर अपने भक्त की प्रतीक्षा करते हैं ।
591. जब चित्त पिघलता है तो प्रेम की धारा बहती है और इसी प्रेम धारा, जो प्रभु के लिए बहती है, उसका नाम भक्ति है ।
592. प्रभु प्रेम में शरीर रोमांचित होता है तो यह भक्ति का लक्षण है ।
593. जब तक प्रभु के लिए प्रेम में आंसू नहीं छलके तब तक यह मानना चाहिए कि हमारा हृदय अभी कठोर है ।
594. बेटे-बेटी के लिए रोना बड़ी बात नहीं है, प्रभु के लिए प्रेम में रोना सबसे श्रेष्ठ बात है । जिसके जीवन में ऐसा होता है उसकी भक्ति साकार हो गई, ऐसा मानना चाहिए ।
595. भक्त प्रभु मिलन की अनुभूति हृदय में पाता है ।
596. भक्त सबको तारता-तारता स्वयं भी स्वतः ही तर जाता है ।
597. प्रभु के वियोग का विरह और प्रभु के संयोग का आह्लाद दोनों भक्तों के जीवन में होता है ।
598. हम भक्ति द्वारा जब शुद्ध हो जाते हैं तो प्रभु तत्काल हमें अपना लेते हैं ।
599. भक्ति द्वारा जीव प्रभु को अत्यंत प्रिय हो जाता है ।
600. भक्ति द्वारा प्रभु और जीव दोनों एक दूसरे से बंध जाते हैं ।
601. प्रभु श्री कृष्णजी कहते हैं कि देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के सभी श्रीगुणों का वर्णन करना प्रभु के लिए भी संभव नहीं है ।
602. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे परम चरित्रवान हैं, अपने बड़प्पन को सदैव छुपाते हैं और कभी भगवद् कार्य के लिए उदासीन नहीं रहते ।
603. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे क्रोध रहित रहते हैं, चंचलता और चपलता उनमें नहीं है और वे सारे भगवद् कार्य जल्दी-से-जल्दी पूरे करते हैं ।
604. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे कभी किसी से डरते नहीं है, कोई कार्य करने में संकोच नहीं करते और उत्साह और हिम्मत से सभी भगवद् कार्य करते हैं ।
605. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि एक बार जो संकल्प कर लिया उससे पीछे नहीं हटते, कभी लोभ के कारण कुछ हेर-फेर नहीं करते और अध्यात्म के सभी पहलू को जानकर काम करते हैं ।
606. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि अपनी इंद्रियों पर उनका पूरा संयम है, बहुत ही सरल स्वभाव के हैं और सदैव सत्य बोलते हैं ।
607. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि सभी साधन करने में पूर्ण सक्षम हैं, बहुत सूक्ष्म बुद्धि के हैं और भगवद् कार्य के लिए खूब परिश्रम करते हैं ।
608. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे परम तेजस्वी हैं, अत्यंत विद्यावान है और अत्यंत विनम्र स्वभाव के हैं ।
609. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि जन्म से भी वे बहुत बड़े हैं क्योंकि प्रभु श्री ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं, अत्यंत शीलवान हैं और सदैव पवित्र भोजन करने वाले हैं ।
610. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे बहुत मीठा बोलते हैं, किसी से भी ईर्ष्या नहीं करते और कोई भी उनके सामने आए उसका भला कैसे हो वह कार्य सदैव जीवन में करते हैं ।
611. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि पाप बुद्धि उनमें है ही नहीं, किसी का अनिष्ट कभी नहीं चाहते, सबका कल्याण ही करते हैं और चाहते हैं और सभी शास्त्रों का सार निकालकर बोलते हैं ।
612. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि उन्हें कितनी ही कथाएं याद है, कितनी बातें वे सबकी सहते हैं और किसी का अपमान कभी भी नहीं करते हैं ।
613. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे सबके साथ समानता का व्यवहार करते हैं, कभी पक्षपात नहीं करते और अनुकूल सत्य बोलते हैं यानी जिस सत्य में सबका कल्याण हो वही बोलते हैं ।
614. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि किस समय क्या बोलना चाहिए यह ध्यान रखते हैं, बहुत उत्तम वक्ता हैं और जो बोलते हैं उसे रोचक बनाकर बोलते हैं ।
615. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे अत्यंत बड़े विद्वान और ज्ञानी हैं, कभी किसी को धोखा नहीं देते और किसी के साथ कभी झगड़ा नहीं करते ।
616. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि उनकी कोई गलती प्रभु तक को भी कभी नहीं मिलती, परमात्मा की भक्ति कूट-कूट कर भरी हुई है और उनके व्यवहार में कोई दोष नहीं है ।
617. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि उन्होंने कभी किसी के साथ कठोरता का व्यवहार नहीं किया, हमेशा कोमल व्यवहार ही करते हैं, कोई चीज में आसक्ति नहीं, कहीं कभी किसी चीज में फंसे नहीं और हर व्यक्ति को लगता है कि देवर्षि प्रभु श्री नारदजी को मैं कितना प्रिय हूँ ।
618. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे किसी के बारे में कोई पूर्वाग्रह नहीं रखते, कब बोलना, कितना बोलना, कैसे बोलना, क्या नहीं बोलना सब जानते हैं और जिस सत्य को बोलने से काम बिगड़ता है वह नहीं बोलते ।
619. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे विषय भोगों में लिप्त नहीं होते, कभी स्वयं की प्रशंसा नहीं करते और कभी किसी से वैर नहीं करते ।
620. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे बड़ा मीठा-मीठा बोलते हैं, कभी किसी की गलती दूसरों के सामने उजागर नहीं करते और लोक संपर्क की अदभुत विद्या जानते हैं ।
621. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि कभी भी एक क्षण कहीं व्यर्थ नहीं गंवाते, स्वयं के ऊपर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं और भगवद् कार्य के लिए बेहद परिश्रमी हैं ।
622. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे भगवान के लिए बहुत समय निकालते हैं, निरंतर सावधान रहते हैं और जीवन में कोई गलती नहीं करते या गलत कार्य नहीं करते ।
623. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे दूसरे के राज कभी किसी अन्य को नहीं बताते, यश और हानि में बुद्धि स्थिर रखते हैं और ऐसा कोई गुण नहीं जो उनमें नहीं हो ।
624. प्रभु श्री कृष्णजी देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के गुण बताते हैं कि वे कभी असफल नहीं होते और किसको क्या प्रिय है उसका पूरा ज्ञान सदैव रखते हैं ।
625. प्रभु श्री कृष्णजी कहते हैं कि देवर्षि प्रभु श्री नारदजी सभी ऋषियों के ऋषि, ज्ञानियों के ज्ञानी और पूज्यों के पूज्य हैं ।
626. भक्तों की जीवन गाथा सुनने से हमारे जीवन में प्रेरणा आती है कि भक्ति कैसे की जाए और भक्ति से कैसे प्रभु को पाया जाता है ।
627. प्रभु श्री वेदव्यासजी सभी गुरुओं के आदिगुरु हैं । इसलिए ही गुरु पूर्णिमा का पहला नाम व्यास पूर्णिमा है ।
628. अपने सदगुरुदेव की पूजा से पहले प्रभु श्री वेदव्यासजी की पूजा अनिवार्य है क्योंकि प्रभु ही व्यास रूप में आते हैं ।
629. प्रभु के चौबीस अवतारों में एक अवतार श्रीव्यास अवतार है जिन्होंने आकर श्री वेदजी का विभाजन किया और श्री पुराणों की रचना की ।
630. जितनी भौतिकता बढ़ेगी उतनी हमारे भीतर की शक्ति का ह्रास होगा ।
631. प्रभु श्री वेदव्यासजी ने श्री वेदों को चार खंड में विभाजित किया, फिर श्री उपनिषदजी की रचना की जिसमें वेदांत के रहस्य को प्रकाशित किया ।
632. सारे वेदांत का सार श्री ब्रह्मसूत्र में है । श्री ब्रह्मसूत्र की कुल संख्या पाँच सौ पचपन है ।
633. श्री वेदजी का ज्ञान अल्प बुद्धि वाले कलियुग के लोगों के लिए सरल भाषा में कथा रूप में यानी कहानियों के रूप में वर्णित करने के लिए प्रभु श्री वेदव्यासजी ने सत्रह पुराणों की सबसे पहले रचना करी ।
634. प्रभु श्री वेदव्यासजी ने फिर महाभारतजी की रचना की जिसे पंचम वेद कहा गया है ।
635. श्री महाभारतजी के बाद प्रभु श्री वेदव्यासजी को फिर भी शांति नहीं मिली तब देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के कहने पर उन्होंने श्रीमद् भागवतजी महापुराण के रूप में अठारहवां पुराण की रचना करी जिसमें भक्ति का प्रतिपादन मुख्य रूप से किया गया है । भक्ति का प्रतिपादन करने पर ही उन्हें परम शांति मिली ।
636. प्रभु श्री वेदव्यासजी ने जो भी लिखा वही भारतीय संस्कृति बन गई ।
637. प्रभु श्री वेदव्यासजी को प्रभु श्री ब्रह्माजी, प्रभु श्री नारायणजी और प्रभु श्री महादेवजी की उपमा दी जाती है जो किसी अन्य को कभी नहीं मिली ।
638. प्रभु श्री वेदव्यासजी को एकमुखी प्रभु श्री ब्रह्माजी की उपमा दी गई है (वैसे प्रभु श्री ब्रह्माजी के चार श्रीमुख हैं) ।
639. प्रभु श्री वेदव्यास जी को दो भुजा वाले प्रभु श्री नारायणजी की उपमा दी गई है (वैसे प्रभु श्री नारायणजी की चार श्रीभुजाएं हैं) ।
640. प्रभु श्री वेदव्यासजी को दो नेत्रों वाले प्रभु श्री महादेवजी की उपमा दी गई है (वैसे प्रभु श्री महादेवजी के तीन श्रीनेत्र हैं) ।
641. प्रभु का कार्य करने पर उस कार्य में अनुकूलता देने का काम प्रभु करते हैं ।
642. प्रभु श्री वेदव्यासजी की लेखनी का हमारे ऊपर बहुत बड़ा उपकार है ।
643. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी पूरे ब्रह्मांड में सबसे पूज्य और सबसे लोकप्रिय हैं । सामान्यतः जो प्रिय होता है वह पूज्य नहीं होता और जो पूज्य होता है वह प्रिय नहीं होता पर देवर्षि प्रभु श्री नारदजी दोनों हैं - परम पूज्य और परम प्रिय ।
644. प्रभु श्री कृष्णजी का मत है कि सर्वोच्च व्यक्तित्व जो पूज्य और लोकप्रिय पूरे ब्रह्मांड में हैं वे देवर्षि प्रभु श्री नारदजी हैं । यह प्रभु श्री कृष्णजी का मत है इसलिए यह मत सर्वमान्य है ।
645. संसार में श्री भीष्म पितामह की कीर्ति बनी रहे कि वे कितने ज्ञानी हैं इसलिए अपने भक्त को महानता प्रदान करने के लिए प्रभु श्री कृष्णजी ने श्री भीष्म पितामह के मुँह से शांतिपर्व कहलवाया जो श्री महाभारतजी का एक अदभुत अलंकार है ।
646. इस संसार में सबसे बड़ा बल भगवत् कृपा का बल होता है । हमारा पुरुषार्थ तुच्छ होता है क्योंकि जो होता है वह प्रभु कृपा से ही होता है ।
647. एक संत थे जो अपनी झोपड़ी में एक कागज लगाकर रखते थे जिसमें लिखा था “आपका समय बहुत अनमोल है” जिससे लोगों को लगे कि उनका समय अनमोल है और वे उनसे व्यर्थ की चर्चा नहीं करें ।
648. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने भी दासी पुत्र के रूप में प्रभु की कथा सुनी और उनमें कथा के कारण ही भक्ति भाव जागृत हुआ । प्रभु कथा का इतना बड़ा प्रभाव होता है ।
649. हमें कथा में तल्लीन होकर हमें प्रभु की कथा सुननी चाहिए ।
650. प्रभु कथा हमारे दुर्गुणों को नष्ट कर देती है ।
651. प्रभु कथा में हमें बहुत ही रस आना चाहिए तभी कथा सुनना सार्थक होता है ।
652. प्रभु का प्रसाद पाने से भाग्य का उदय होता है । इसलिए जीवन में प्रसाद का कभी अपमान नहीं करना चाहिए ।
653. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने जब दासी पुत्र के रूप में प्रभु की कथा सुनी तो वह प्रभु श्री कृष्णजी से मिलने के लिए आतुर हो गए । प्रभु की याद में रोने लगे और प्रभु से मिलन की तीव्र इच्छा उनमें जग गई ।
654. हमारे भीतर अंतःकरण में भक्ति के बीज अंकुरित होने चाहिए ।
655. भक्ति के बीज अंकुरित होने पर प्रभु के बारे में निरंतर सुनने और बोलने का मन करता है ।
656. हमें हर जीव में प्रभु के दर्शन होने चाहिए ।
657. प्रभु की श्रीलीला को मन में सदैव जागृत करके रखना चाहिए ।
658. प्रभु को भी भक्तों की उतनी ही याद आती है जितनी भक्तों को प्रभु की आती है ।
659. भक्त के मन में प्रभु मिलन के लिए संकल्प उठते रहने चाहिए ।
660. भक्तों का मन कभी भी प्रभु के सानिध्य से तृप्त नहीं होता ।
661. भक्ति को जीवन में सबसे बड़ा और परम धन मानना चाहिए ।
662. श्रीराम-श्रीराम नाम जपने वाले के पीछे प्रभु श्री रामजी को चलना पड़ता है । प्रभु नाम के अधीन स्वयं को मानते हैं ।
663. हमें व्यर्थ की दुनियादारी के चक्कर में नहीं पड़े रहना चाहिए ।
664. मायापति प्रभु को पकड़ने पर माया हमें छोड़ देती है ।
665. जब हम प्रभु की तरफ भक्ति से बढ़ते हैं तो माया हमें पत्नी, पुत्र, माता, पिता को माध्यम बनाकर रोकती है ।
666. जीव का सिर्फ प्रभु से ही सदैव से सनातन संबंध रहा है ।
667. संसार के प्रपंच में लिप्त नहीं होना चाहिए ।
668. जीवन में प्रभु मिलन की प्यास हमें लगनी चाहिए ।
669. संसार के प्रपंच में लिप्त होने वाले को प्रभु का मिलना असंभव है ।
670. सत्संग का अर्थ प्रभु से एकरूप होना है । सत्संग प्रभु से एकरूप होने का साधन है ।
671. हम अकेले नहीं है क्योंकि प्रभु हमारे हैं और हम प्रभु के हैं ।
672. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी का दासी पुत्र के रूप में अवतार में जब उनकी माता को साँप ने काटा तो उसमें भी उन्होंने प्रभु का अनुग्रह ही देखा ।
673. विज्ञान ने हमारी असुरक्षा बढ़ा दी इसलिए वैज्ञानिक युग में सत्संग अत्यंत जरूरी है ।
674. प्रभु की श्रीलीलाओं को सुनने के बाद उनका चिंतन करना अत्यंत आवश्यक, जरूरी और उपयोगी होता है ।
675. हमारी सारी दिनचर्या में हमें प्रभु की श्रीलीला की स्मृति बनी रहनी चाहिए ।
676. जिन्हें प्रभु प्राप्ति करनी है उन्हें अंतर्यात्रा करनी चाहिए । तीर्थों की यात्रा करने से भी ज्यादा अंतर्यात्रा करने से प्रभु की प्राप्ति होती है ।
677. मौन सबसे बड़ा पाठ और एकांत सबसे बड़ा साधन है ।
678. ऐसे महात्मा अभी कलियुग में भी हुए हैं जो चालीस वर्षों तक अपने कमरे से भी बाहर नहीं निकले । उन्होंने प्रभु की भक्ति में रमकर इतना एकांत सेवन किया ।
679. साधक के लिए सबसे महत्वपूर्ण यात्रा अंतर्यात्रा है । यह तब तक नहीं होती जब तक बाहर की यात्रा बंद नहीं करते ।
680. भगवती शबरीजी को विश्वास था कि प्रभु श्री रामजी वहाँ आएंगे तो प्रभु श्री रामजी को आना पड़ा । मुख्य बात विश्वास की है । अगर विश्वास है, श्रद्धा है तो प्रभु को भी उसे पूर्ण करने के लिए वह बाध्य कर देती है ।
681. सबसे पहले गुरु यानी आदिगुरु प्रभु ही हैं । सबकी गुरु परंपरा प्रभु से ही आरंभ होती है ।
682. प्रभु साक्षात्कार के बाद जीव को सर्वत्र परमानंद-ही-परमानंद, केवल परमानंद-ही-परमानंद का अनुभव होता जाता है ।
683. जिनके जीवन में दोष शेष रह जाता है उन्हें प्रभु साक्षात्कार या दर्शन नहीं होता ।
684. प्रभु साक्षात्कार के लिए जीवन विशुद्ध होना चाहिए । जिसके जीवन में थोड़ा-सा भी दोष बच जाता है उसे प्रभु दर्शन नहीं होते ।
685. साधक को प्रभु साक्षात्कार के लिए अपने सभी दोषों को समाप्त करके अपने जीवन को विशुद्ध करना होता है ।
686. प्रभु वर्तमान में भी भक्तों के साथ रहते हैं । प्रभु आज भी हैं क्योंकि प्रभु के लिए भूत, वर्तमान और भविष्य नहीं होते । प्रभु साक्षात और सदैव अपने भक्तों के साथ होते हैं ।
687. आज भी संत प्रभु की श्रीलीला में संग करते हैं । श्री वृंदावनजी में ऐसे कई संत विगत चालीस वर्षों में हुए हैं जिन्होंने प्रभु के साथ श्रीलीला की है । प्रभु ने उन्हें अपनी नित्य श्रीलीला में शामिल किया है ।
688. प्रभु श्री वेदव्यासजी को श्रीमद् भागवतजी महापुराण के लेखन हेतु मार्गदर्शन करने के कारण प्रभु श्री वेदव्यासजी ने देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के श्रीचरणों की पूजा की । देवर्षि प्रभु श्री नारदजी का व्यक्तित्व इतना महान है ।
689. संसार में प्रभु श्री वेदव्यासजी के जितना ज्ञान कोई भी, कभी भी नहीं दे सकेगा ।
690. चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विवेचन प्रभु श्री वेदव्यासजी अपने श्रीग्रंथों में कर चुके थे । इसके बाद उन्होंने भक्ति का विवेचन श्रीमद् भागवतजी महापुराण में किया, तब जाकर उन्हें शांति प्राप्त हुई ।
691. चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के माथे पर यानी सिर पर भक्ति का स्थान है ।
692. जनमानस का कल्याण केवल प्रभु भक्ति से ही संभव है ।
693. मनुष्य अंतःकरण से जब भी बदलता है तो सिर्फ भक्ति के कारण ही बदलता है ।
694. हमें पता होता है कि क्या सही है पर हम वैसा नहीं कर पाते । हम वैसा तभी कर पाते हैं जब हमारे भीतर भक्ति जागृत होती है ।
695. ज्ञान हमारे मन को नहीं बदल सकता, सिर्फ भक्ति ही मन को बदल सकती है ।
696. जीव को सबसे ज्यादा प्रभावित भक्ति ही करती है ।
697. प्रभु के प्रेम का जीवन में विश्वास रखना चाहिए और प्रभु से भरपूर प्रेम जीवन में करना चाहिए ।
698. हमारे जीवन में जो भी आध्यात्मिक उन्नति होती है वह भक्ति के कारण ही हो पाती है ।
699. भक्ति के साथ सद्गुण जीवन में अपने आप आते हैं, उन्हें अलग से बुलाना नहीं पड़ता ।
700. भक्ति का स्थान सभी साधनों में सर्वोपरि और सर्वश्रेष्ठ है ।
701. केवल भक्ति से ही प्रभु से मिलन संभव है ।
702. श्रीमद् भागवतजी महापुराण की रचना का मूल हेतु यह है कि उसके श्रवण के बाद जीवन में हमारी प्रभु के लिए भक्ति बहुत बढ़ जाए ।
703. प्रभु श्री वेदव्यासजी को श्रीमद् भागवतजी महापुराण एवं ऋषि श्री वाल्मीकिजी को श्री रामायणजी की रचना की प्रेरणा देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने ही दी थी ।
704. सभी प्रश्नों के उत्तर देवर्षि प्रभु श्री नारदजी को मालुम होते हैं और उनके पास होते हैं ।
705. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी दर्शन देकर भगवत् कार्य की प्रेरणा आज कलियुग में भी बहुत से भक्तों को देते हैं ।
706. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी आज भी हमारा मार्गदर्शन करते हैं जब हम भगवत् मार्ग यानी भक्ति मार्ग पर चलते हैं ।
707. आज भी संसार सिद्धों और महात्माओं से रिक्त नहीं है । हर युग में सिद्ध और महात्मा रहे हैं और आगे भी रहेंगे ।
708. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी इतने महान है कि उनका वर्णन किया जाना किसी जनसाधारण द्वारा संभव ही नहीं है ।
709. कोई शास्त्र ऐसा नहीं जो देवर्षि प्रभु श्री नारदजी जानते नहीं हो ।
710. अगर हमें कोई कार्य करते हुए सुख नहीं मिले तो वह काम ज्यादा समय तक नहीं कर पाएंगे । इसलिए वही भगवत् कार्य चुनना चाहिए जिसमें सुख मिले । जो भगवत् कार्य कर रहे हैं उसमें सुख की तलाश करनी चाहिए ।
711. हर भगवत् कार्य के लिए जीवन में समय तय करना चाहिए ।
712. दिनभर में कौन-सा भगवत् कार्य कब करना चाहिए जिससे उसका सबसे ज्यादा आनंद मिले, यह जानना जरूरी है ।
713. भगवत् कार्यों के लिए अपने समय का विभाजन करना चाहिए ।
714. स्वयं पर अपना नियंत्रण होना चाहिए । पहले खुद पर हमें हुकूमत करना आना चाहिए ।
715. जीवन वास्तव में क्या है और किस लिए हमें मिला है, यह हमें समझना चाहिए ।
716. प्रभु की आराधना करने से और प्रभु के प्रसन्न होने पर सभी देवतागण स्वतः ही प्रसन्न हो उठते हैं । यह सिद्धांत है कि प्रभु के प्रसन्न होते ही सभी देवतागण स्वतः ही प्रसन्न होंगे ।
717. विश्व के लिए भक्ति का प्रचार और सबको भक्ति की प्रेरणा देना, यह देवर्षि प्रभु श्री नारदजी का सबसे प्रिय कार्य है ।
718. जिसने हम पर उपकार किया, उसकी गाली सुनने और सहन करने पर उस उपकार का ऋण हम पर से चुक जाता है ।
719. जब श्री दक्ष प्रजापति ने देवर्षि प्रभु श्री नारदजी को श्राप देना चाहा तो देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने मन में श्रीनारायण-श्रीनारायण का जाप किया और श्राप बढ़िया मिला । कोई श्राप दे रहा हो उस समय प्रभु को याद करना चाहिए तब उस श्राप से भी हमारा मंगल ही होगा ।
720. गर्भ में देवर्षि प्रभु श्री नारदजी का प्रवचन सुनने पर श्री प्रह्लादजी जन्म से ही भक्त बन गए ।
721. गोपियों को सदैव केवल प्रभु के सुख की ही चाह रहती थी ।
722. प्रभु श्री वेदव्यासजी और देवर्षि प्रभु श्री नारदजी को प्रणाम किए बिना भक्ति सफल नहीं होती क्योंकि भक्ति का साहित्य प्रभु श्री वेदव्यासजी की देन है और भक्ति का प्रचार देवर्षि प्रभु श्री नारदजी द्वारा किया जाता है ।
723. हमें आत्मा-शांति का प्रयास करना चाहिए जो भक्ति से ही संभव है ।
724. धर्म की हानि हो सकती है पर धर्म का पूर्ण नाश कभी नहीं होता । इसलिए धर्म की हानि होने पर धर्म की रक्षा और पुनर्स्थापना करने के लिए प्रभु पधारते हैं ।
725. धर्म की सदैव जय होती आई है और आगे भी होती रहेगी ।
726. निष्काम होकर अपने इष्टदेव की भक्ति करना और मांगना ही हो तो अन्य देवों से मांगना । यह प्राचीन विधान रहा है ।
727. प्रभु श्री महादेवजी सबको सब कुछ देने वाले हैं । प्रभु श्री कृष्णजी को जब भगवती जाम्बवन्ती माता से पुत्र नहीं हुआ तो उन्होंने प्रभु श्री महादेवजी की उपासना की और प्रभु श्री महादेवजी ने प्रसन्न होकर प्रारब्ध में नहीं होने पर भी वैसा कर दिया ।
728. प्रभु श्री महादेवजी के द्वार पर आया हुआ खाली हाथ कभी जाता ही नहीं है ।
729. जीवन में अपने व्रत और नियम से टस-से-मस भी नहीं होना चाहिए ।
730. देवताओं के लिए आराधना का भाव आने पर देवतागण हम पर कृपा करते हैं ।
731. भक्ति का मार्ग इतना बड़ा है कि उस पर चलने वाले को माता, पिता, पत्नी, पुत्र बाधा करते हैं, रोकते हैं । ऐसा माया करवाती है ।
732. इस जीवन में अच्छे बुरे कर्मों का फल लेकर और उसे भोगने के लिए जीवात्मा मृत्यु के बाद आगे की यात्रा करता है ।
733. श्री आदि शंकराचार्यजी जिन भी देव के सामने गए उन्होंने उन देव की स्तुति लिखी । सभी देवों की स्तुति उन्होंने लिखी । प्रभु के विभिन्न रूपों को स्वीकार किया और सभी की स्तुति लिखी ।
734. जीवन में प्रभु के विभिन्न रूपों में आस्था और प्रेम होना चाहिए ।
735. प्रभु का कार्य करने पर प्रभु का और साथ में महापुरुषों का भी आशीर्वाद हमें प्राप्त होता है ।
736. भक्तों की सभी चिंता भगवान वहन करते हैं ।
737. ब्रह्म उस शक्ति का नाम है जो अपरिवर्तनीय है, जिसका कोई परिवर्तन नहीं होता । संसार और जीव परिवर्तनशील हैं ।
738. पूरा ब्रह्मांड एक ब्रह्म का विलास मात्र है ।
739. जो है ही नहीं उसका नाम ही माया है ।
740. महापुरुषों के जीवन बड़ी कठिनाई से गुजरते हैं । उनके जीवन में कठिनाई आती है, उन्हें संघर्ष करना पड़ता है तभी वे महापुरुष बनते हैं ।
741. श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं कि सब कुछ छोड़ो, मेरी शरणागति ग्रहण करो । शरणागति से बढ़कर कुछ भी नहीं है । यह बात श्रीमद् भागवतजी महापुराण में एवं श्रीमद् भगवद् गीताजी में दोनों जगह प्रभु ने कही है । श्री वाल्मीकिजी के श्री रामायणजी में भी शरणागति का ही उपदेश है ।
742. प्रभु भक्तों को हर परिस्थिति में संभालते हैं ।
743. प्रभु हमेशा क्षमाशील बने रहते हैं ।
744. अंतःकरण में हम प्रभु अंश होने के कारण सदैव शुद्ध हैं । बाहर से हम अशुद्ध हो जाते हैं पर भक्ति से यह अशुद्धि खत्म हो जाती है ।
745. भारतीय संस्कृति में तप और त्याग का बहुत बड़ा महत्व है ।
746. भगवान की भक्ति जीवन का सर्वोच्च साधन है ।
747. भक्ति के अधिकारी सभी हैं । दीन, हीन, मलिन-से-मलिन व्यक्ति भी प्रभु की शरणागति के कारण भक्ति का अधिकारी है ।
748. भक्ति के सिद्धांत का प्रचार करने वाला प्रभु को सबसे प्रिय होता है ।
749. संत सभी प्रभु के रूपों का समन्वय करके, सबके प्रति भक्ति भाव रखते हैं । वे प्रभु के सभी रूपों में आस्था रखते हैं ।
750. भक्त अपने संपर्क में आने वाले लोगों को प्रभु से जोड़कर उनके उद्धार के लिए कार्य करते हैं ।
751. एक संत को उनके गुरुजी ने एक मंत्र दिया और कहा कि इसे जपने वाले का पाप कटता है और वह श्री बैकुंठजी जाने के लिए सिद्ध हो जाता है पर यह बहुत गोपनीय मंत्र है । गोपनीय मंत्र को जनसाधारण में अगर बताओगे तो नर्क जाना पड़ेगा । उन संत ने उस मंत्र का जनसाधारण के समक्ष खूब प्रचार कर दिया । संत को उनके गुरुजी ने बुलाया और कहा कि यह गोपनीय मंत्र तुमने सबको बताने का अपराध किया है अब तुम्हें नर्क जाना पड़ेगा । संत ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि सबका उद्धार हो जाए तो मैं नर्क जाने को भी तैयार हूँ ।
752. श्री प्रह्लादजी ने प्रभु की भक्ति लोगों के बीच जागृत करने का प्रभु श्री नृसिंहजी से वरदान मांगा जब प्रभु ने उन्हें बार-बार वर मांगने के लिए कहा ।
753. सबसे बड़ा पुरुषार्थ प्रभु की भक्ति के अंतर्गत प्रभु की शरणागति है ।
754. प्रभु का अर्चा अवतार यानी घर की ठाकुरबाड़ी के प्रभु विग्रह में प्रभु का नित्य निवास मानकर प्रभु की सेवा करनी चाहिए ।
755. प्रभु के अनेक अवतारों की कथा का श्रवण करना चाहिए और प्रभु के उत्सव मनाने चाहिए ।
756. प्रभु के रूप के साथ के जो देवी-देवता हों उनके पूरे परिवार की पूजा जैसे श्रीराम दरबार, श्री शिव परिवार की पूजा करनी चाहिए ।
757. अपना मन प्रभु के सूक्ष्म रूप में लगाना चाहिए ।
758. अंत में अपने भीतर विराजे प्रभु का ध्यान और प्रभु से साक्षात्कार के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ।
759. अंतर्यामी के रूप में प्रभु की आराधना करनी चाहिए । प्रभु विग्रह से हटकर ऊँ‍‍ची अवस्था आने पर साधक को अंतर्यामी रूप में प्रभु की आराधना करनी चाहिए । यह साधना की एक बहुत ऊँ‍‍ची अवस्था है ।
760. मुक्त जीव प्रभु की श्रीलीला में शामिल हो जाते हैं, उसमें लीन हो जाते हैं ।
761. रोज मंदिर में जाकर प्रभु का दर्शन करना चाहिए । मंदिर में कुछ सेवा जरूर करनी चाहिए ।
762. प्रभु की सेवा के लिए मंदिर में इत्र, वस्त्र, पुष्प अर्पण करना चाहिए ।
763. रोज कोई न कोई स्तोत्र पाठ करना चाहिए और मंत्र और नाम जप करना चाहिए ।
764. रोज स्वाध्याय करना चाहिए, शास्त्रों को पढ़ना चाहिए ।
765. रोज प्रभु का ध्यान करना चाहिए ।
766. शरणागति का सूत्र है कि प्रभु को जो प्रिय है उसी का संकल्प करें यानी जो प्रभु को अच्छा लगे वही करना चाहिए ।
767. प्रभु को जो अच्छा नहीं लगे, जिससे प्रभु को दुःख होगा वह कभी नहीं करना चाहिए जैसे असत्य बोलना, हिंसा करना ।
768. जैसे एक माता को गर्भ है तो उसका ध्यान गर्भ के हित में होता है । जो गर्भ के अनुकूल है वही और वैसा ही उसे करना चाहिए । वैसे ही प्रभु को जो प्रिय लगे वही हमें जीवन में करना चाहिए ।
769. जिसने प्रभु के श्रीकमलचरणों में सब कुछ रख दिया उसे विश्वास होना चाहिए कि हर अवस्था में प्रभु उसकी रक्षा करे बिना नहीं रहेंगे । श्री अर्जुनजी को पूरा विश्वास था प्रभु की शरणागति लेने के बाद और प्रभु ने उस विश्वास को किस कदर निभाया यह पूरे विश्व ने देखा ।
770. महाभारत युद्ध में जयद्रथ के वध का श्री अर्जुनजी ने प्रतिज्ञा करी कि कल सूर्यास्त से पूर्व में जयद्रथ का वध नहीं किया तो अग्नि प्रवेश करूँगा । पांडवों का एक प्रण था कि एक भी पांडव मर जाएगा तो सब अपना देह त्याग करेंगे । अब कौरवों को सिर्फ एक काम करना था कि जयद्रथ को सूर्यास्त तक बचाना था ताकि पांचो पांडव खुद ही खत्म हो जाए । प्रभु योजना बना रहे थे श्री अर्जुनजी को बचाने हेतु और श्री अर्जुनजी गहरी निद्रा में सो रहे थे । फिर जब प्रभु उन्हें जगाने गए तो श्री अर्जुनजी ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि मुझे जागने की क्या आवश्यकता क्योंकि आप मेरी चिंता कर रहे हैं ना । शरणागति का यह बहुत बड़ा उदाहरण है ।
771. शरणागति का एक उदाहरण श्री रामायणजी में आता है कि प्रभु ने रावण की शक्ति खुद झेली और श्री विभीषणजी को अपने पीछे करके बचाया ।
772. अपनी रक्षा के लिए हमारी आश और पूरी निष्ठा प्रभु पर होनी चाहिए ।
773. भरोसा सिर्फ एक प्रभु का ही जीवन में होना चाहिए ।
774. हमारे अंतःकरण में प्रभु का विश्वास सबसे पहले होना चाहिए ।
775. निरंतर यह भावना रखनी चाहिए कि मैं प्रभु के श्रीकमलचरणों में बैठा हूँ । प्रभु की दृष्टि उस पर तुरंत जाती है जो प्रभु के श्रीकमलचरणों में बैठा होता है ।
776. अपना पूरा सामर्थ्य भूलकर प्रभु की शरणागति ग्रहण करनी चाहिए । मैं कुछ भी नहीं, कुछ नहीं जानता, कुछ सामर्थ्य नहीं, प्रभु आप ही संभाले तो प्रभु तुरंत संभालने आते हैं । यह दीनता का भाव शरणागति के लिए सबसे जरूरी है । जो दीन बनकर प्रभु के पास जाता है वह प्रभु से सब कुछ प्राप्त कर लेता है ।
777. मैं मलिन, दीन, पापी, असहाय और अनाथ हूँ, ऐसा कहते ही प्रभु दौड़कर आकर स्वीकार करते हैं जब हम प्रभु की शरणागति इस भाव से लेते हैं ।
778. पापियों का शिरोमणि भी है तो भी प्रभु की शरण में जाने पर प्रभु तत्काल उसे स्वीकार करते हैं ।
779. प्रभु की शरणागति का सूत्र भगवती माता ने आचार्यों के समक्ष प्रकट किया ।
780. प्रभु की सेवा करने वाले की रुचि का विचार करके प्रभु निर्णय लेते हैं कि उसके लिए क्या करना चाहिए ।
781. भक्त दीनता से इतने लघु बन जाते हैं तो प्रभु की नजरों में वे बहुत बड़े बन जाते हैं । प्रभु उनकी सब बातें मानते हैं, मानने लगते हैं ।
782. भक्तिमय जीवन होना चाहिए और भक्ति का प्रचार जीवन में करना चाहिए ।
783. सर्वोपरि साधन के रूप में भक्ति माता की ही प्रतिष्ठा है ।
784. सभी साधन अपनी-अपनी जगह सही है पर सर्वोच्च साधन के रूप में भक्ति की ही प्रतिष्ठा सभी शास्त्रों ने और सभी आचार्यों ने सर्वमत से स्वीकार की है ।
785. सभी संतों के उपदेश में भक्ति की ही प्रधानता मिलेगी ।
786. सभी संतों और आचार्यों का कार्य जनमानस को प्रभु के श्रीकमलचरणों की तरफ ले जाना होता है । यह उत्तम कार्य ही उनका एकमात्र कार्य होता है ।
787. भक्ति के बिना जीव की कोई गति नहीं है, इसलिए भक्ति करना अनिवार्य है ।
788. संत किसी भी सिद्धांत के लिए कभी नहीं कहते कि यह मेरा मत है । वे कहते हैं कि यह शास्त्र मत है ।
789. जब भी व्यवस्था बिगड़ती है तो प्रभु धर्म को पुनः स्थापित करते हैं ।
790. सनातन धर्म की स्थापना की कोई तिथि नहीं है । यह सनातन है और भविष्य में भी सनातन ही रहेगा ।
791. सारा संसार प्रभु के आधीन है ।
792. भगवत् बोध पहले प्राप्त होता है फिर भगवत् दर्शन प्राप्त होते हैं ।
793. प्रभु और माता दोनों मिलकर एक ही हैं पर श्रीलीला करने के लिए दो बन जाते हैं ।
794. प्रभु के माधुर्य, ऐश्वर्य, तेज, कृपा, दया और करुणा का वर्णन भक्त सदा करते रहते हैं ।
795. श्रीजी भगवती राधा माता माधुर्य स्वरूपा हैं और भगवती रुक्मिणी माता ऐश्वर्य स्वरूपा हैं ।
796. भक्ति प्राप्त हो जाए तो मुक्ति भी उसके आगे तुच्छ हो जाती है ।
797. हमें भक्ति का आलंबन लेकर शरणागति से प्रभु से जुड़ना चाहिए ।
798. प्रभु कृपा से ही प्रभु की शरणागति प्राप्त होती है और उसकी योग्यता प्राप्त होती है ।
799. प्रभु मैं केवल आपका हूँ - ऐसा कहकर प्रभु की शरणागति लेनी चाहिए ।
800. भगवती माता केवल नाम मात्र के लिए प्रभु से भिन्न हैं पर वैसे वे प्रभु से अभिन्न हैं यानी एक ही हैं ।