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BHAKTI VICHAR CHAPTER NO. 35

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. जब प्रभु की पूजा होती है तो प्रभु के अंग स्वरूप सभी देवताओं की स्वतः ही पूजा हो जाती है ।
002. कठोर परिश्रम करें और इंद्रियों की तृप्ति का सुख लें - इस सांसारिक विचारधारा का प्रभु ने तिरस्कार किया है ।
003. मानव शरीर विशेष रूप से आत्म-साक्षात्कार के लिए ही मिला है और भक्ति से ही यह संभव हो सकता है ।
004. कामना रखने वाला मनुष्य सदा दुःखी ही रहता है ।
005. परमात्मा का चिंतन तभी हो सकता है जब संसार के दूसरे चिंतन का हम त्याग करने की क्षमता रखें ।
006. सर्वव्यापी प्रभु हमसे दूर है ही नहीं और हो भी नहीं सकते । प्रभु हमारे सबसे ज्यादा समीप हैं ।
007. परमात्मा को प्राप्त करने के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य का महत्व जीवन में नहीं रखना चाहिए ।
008. शास्त्रों के अनुसार वास्तव में परमात्मा प्राप्ति के अतिरिक्त मनुष्य जीवन का अन्य कोई प्रयोजन है ही नहीं ।
009. शरीर, इंद्रियां, मन, बुद्धि, धन, कुटुंब, जमीन आदि पदार्थ संसार के हैं, अपने नहीं हैं । अपने तो केवल प्रभु ही हैं ।
010. करोड़पति के मरने पर कौड़ी भी साथ नहीं जाती । केवल जीवन में किया भगवत् नाम का जप ही साथ जाएगा और एक भी भगवत् नाम साथ जाने से पीछे नहीं रहेगा ।
011. कोई भी गुरु, संत और भक्त प्राचीन प्रामाणिक श्रीग्रंथों के नियमों के विपरीत कोई नियम नहीं बनाते ।
012. मनुष्य योनि अपना कल्याण करने वाली योनि है ।
013. प्रभु ऋषिकेश कहलाते हैं अर्थात वे ही हमारे शरीर की इंद्रियों के असली स्वामी हैं ।
014. प्रभु के साथ ही हमारा एकमात्र शाश्वत और सनातन संबंध है ।
015. अपने जीवन के सारे कार्य प्रभु की सेवा में नियोजित करने चाहिए ।
016. भक्त मानता है कि उसकी भौतिक दशा प्रभु के नियंत्रण में है । इसलिए वह अपनी भौतिक दशा से कभी विचलित नहीं होता ।
017. सब कुछ प्रभु का है यानी संसार पूरा-का-पूरा प्रभु का है और केवल प्रभु अपने हैं । हम प्रभु की जगह वस्तु को अपना मान लेते हैं इसलिए बंधन में पड़ जाते हैं ।
018. जो भक्त को चाहिए उसकी व्यवस्था प्रभु स्वतः ही बिना मांगे करते रहते हैं ।
019. प्रभु की वस्तु को प्रभु की ही मानना वास्तविक अर्पण है । जो मनुष्य वस्तु को अपनी मानते हुए प्रभु को अर्पण करता है, वह गलत है । परंतु जो मनुष्य वस्तु को अपनी न मानकर प्रभु की मानते हुए प्रभु को अर्पण करता है, वही सच्चा अर्पण है ।
020. प्रभु की इच्छा के लिए मनुष्य को अपने सर्वस्व की बलि दे देनी चाहिए ।
021. कोषाध्यक्ष अपने स्वामी के लिए लाखों रुपए गिन सकता है किंतु उसमें से एक पैसा भी उसका नहीं होता । वैसे ही संसार में किसी भी मनुष्य का कुछ भी नहीं है, सारी वस्तुएं प्रभु की हैं । इसलिए किसी भी वस्तु पर अपना स्वामित्व का दावा नहीं करना चाहिए ।
022. संसार की वस्तुओं का सदुपयोग करने का अधिकार हमें है पर उसे अपना मानने का अधिकार नहीं है । इन वस्तुओं को अपना मान लेना प्रभु की उदारता का दुरुपयोग करना है ।
023. सिद्धांत वह होता है जो प्रभु की और शास्त्रों की आज्ञा अनुसार हो । प्रभु और शास्त्रों की आज्ञा के विपरीत सिद्धांत कदापि मान्य नहीं होता ।
024. अपने कर्म भगवत् अर्पण कर दें, ऐसा मान लें कि कर्म मैंने अपने लिए नहीं अपितु प्रभु के लिए किए हैं । जिससे कर्म होते हैं वह शरीर, इंद्रियां, मन और बुद्धि आदि भी प्रभु के ही हैं और मैं भी प्रभु का ही हूँ ।
025. कहीं भी हम कोई विपरीत चीज से बच गए तो उसमें अपना बल न मानकर प्रभु की कृपा माननी चाहिए कि प्रभु की कृपा से हम बच गए नहीं तो फंस जाते ।
026. इंद्रियों का कौतुक पूर्वक कभी लाड़ नहीं करना चाहिए । क्या कभी सर्प से खेला जा सकता है ? वैसे ही इंद्रियों से कौतुक पूर्वक कभी नहीं खेलना चाहिए ।
027. सांसारिक विषयों का संग नहीं करना चाहिए क्योंकि वे परमार्थ में घातक होते हैं ।
028. श्रीमद् भगवद् गीताजी साक्षात प्रभु की वाणी है इसलिए उनमें शंका की संभावना ही नहीं है ।
029. प्रभु प्राप्ति चाहने वाले साधक को धन, मान, बड़ाई, आदर, आराम आदि पाने की इच्छा नहीं होती ।
030. हमारा ध्येय केवल प्रभु को प्राप्त करना ही होना चाहिए, धन और मान आदि प्राप्त करना नहीं होना चाहिए ।
031. प्रभु प्राप्ति का उद्देश्य होने पर हमारे सभी कर्म प्रभु के लिए ही होते हैं ।
032. सांसारिक कामनाओं का त्याग करने से ही प्रभु प्राप्ति होती है । सांसारिक कामना के रहते प्रभु हमेशा हमें अप्राप्त ही रहते हैं ।
033. सांसारिक भोग और संग्रह की कामना कभी पूरी नहीं होती । जितने भी भोग पदार्थ मिलते हैं उतनी ही उनकी भूख बढ़ती रहती है ।
034. विषय भोग कितना भी किया जाए, तृप्ति नहीं होगी । जिस प्रकार निरंतर ईंधन डालने से अग्नि कभी नहीं बुझती ।
035. मनुष्य प्रभु प्राप्ति किए बिना अपने शरीर को अगर सांसारिक भोगों और संग्रह में खो देता है तो फिर उसे मनुष्य शरीर दोबारा चौरासी लाख योनियों के बाद मिलता है ।
036. जीव प्रभु का अभिन्न अंश है इसलिए उसका जीवन प्रभु की सेवा के लिए ही होना चाहिए ।
037. प्रबल भक्ति जागृत हुए बिना जीव की परमार्थ मार्ग में प्रगति नहीं होती ।
038. हमारा आकर्षण सदैव प्रभु की तरफ ही होना चाहिए ।
039. सांसारिक इच्छाओं को मिटाने के लिए पारमार्थिक और आध्यात्मिक इच्छा तीव्र करना बहुत उपयोगी और जरूरी है ।
040. जिस समय मनुष्य अपने मन में रहने वाली समस्त सांसारिक कामनाओं का परित्याग कर देता है उसी समय वह प्रभु के सानिध्य में शांति का अनुभव करने लगता है ।
041. सांसारिक कामना करेंगे तो अंत में दुःख पाना ही पड़ेगा ।
042. सांसारिक पदार्थों की कामना वाला मनुष्य दुःख से कभी बच ही नहीं सकता, यह सिद्धांत है ।
043. प्रभु के साथ सीधा संबंध स्थापित करना चाहिए जो भक्ति से संभव होता है ।
044. यदि मन प्रभु की सेवा में निरंतर लगा रहे तो इंद्रियों की अन्यत्र जाने की संभावना ही नहीं बचती । मन अगर प्रभु की दिव्य सेवा में लगा रहे तो उसे तुच्छ सांसारिक विषयों का आकर्षण समाप्त हो जाता है ।
045. अपने आपको प्रभु का शाश्वत सेवक जानकर प्रभु की सेवा में सदैव प्रवृत्त रहना चाहिए ।
046. प्रभु के साथ जीव का स्वतः सिद्ध संबंध होता है ।
047. जीव को प्रभु का होने के लिए कुछ करना नहीं होता क्योंकि वह तो प्रभु का ही है । जब वह प्रभु के साथ अपना संबंध मान लेता है तो वह प्रभु के साथ नित्य संबंध का अनुभव करने लगता है ।
048. प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी की विद्या को समझाने के लिए प्रभु श्री सूर्यनारायणजी को पहला शिष्य चुना । सबसे पहले प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश प्रभु श्री सूर्यनारायणजी को दिया, फिर प्रभु श्री सूर्यनारायणजी ने अपने पुत्र मनु और मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को दिया ।
049. एक मोटे अनुमान से श्रीमद् भगवद् गीताजी 12,04,00,000 वर्षों पूर्व सबसे पहले कही गई और मानव समाज में यह 20 लाख वर्षों तक विद्यमान रही । बहुत समय बीत जाने के बाद पश्चात यह योग अप्रकट हो गया । फिर प्रभु ने श्री कृष्णावतार लेकर इस योग को श्री कुरुक्षेत्रजी में पुनः प्रकट किया । प्रभु ने लगभग 5000 वर्ष पूर्व इसे श्री अर्जुनजी के समक्ष पुनः प्रकट किया ।
050. श्रीमद् भगवद् गीताजी सभी वैष्णवों का एक अमूल्य परमधन है ।
051. श्री अर्जुनजी के लिए प्रभु कैसे कृपालु बने कि उन्हें श्रीमद् भगवद् गीताजी का दिव्यतम उपदेश देते ही चले गए ।
052. राजा, समाज और परिवार के लोगों को श्रीमद् भगवद् गीताजी की दिव्य विद्या का ज्ञान अवश्य होना चाहिए तभी समाज सुखी रहेगा ।
053. श्री अर्जुनजी जब प्रभु के पूर्ण शरणागत हुए तभी प्रभु का दिव्य उपदेश आरंभ हुआ ।
054. प्रभु से वैभव को चाहने से वैभव तो जीवन में आ जाता है पर प्रभु जीवन में नहीं आते । इसलिए सच्चे भक्त वैभव की प्राप्ति के लिए प्रभु का भजन नहीं करते । वे वैभव नहीं चाहते अपितु प्रभु को ही चाहते हैं ।
055. वैभव को चाहने वाले वैभव के दास होते हैं और प्रभु को चाहने वाले प्रभु के भक्त यानी प्रभु के दास होते हैं ।
056. श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि तू मेरी शरण में आ जा, मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू चिंता मत कर । प्रभु द्वारा अपने शरणागत को दिए यह कितने बड़े आश्वासन हैं ।
057. हमें भक्ति के संस्कार अपने भीतर जागृत करने चाहिए ।
058. श्रीजी भगवती राधा माता, भगवती रुक्मिणी माता, भगवती सीता माता भक्तिरूपा हैं और प्रभु की भक्ति प्रदान करतीं हैं ।
059. भक्ति इतनी विलक्षण है कि निराकार प्रभु को साकार रूप में प्रकट कर देती है और प्रभु को भी खींच लाती है । यह भक्ति भी प्रभु ही कृपा करके जीव को देते हैं ।
060. भक्ति में प्रभु विरह भी भेजते हैं और मिलन भी भेजते हैं । विरह आने पर भक्त प्रभु के बिना व्याकुल हो जाता है, प्रभु कहाँ हैं, क्या करूं, कैसे प्रभु को पाऊँ । इस प्रकार भक्त व्याकुल हो जाता है और यह व्याकुलता प्रभु को साकार रूप में प्रकट कर प्रभु का मिलन करवा देती है ।
061. प्रभु के लिए तीव्र व्याकुलता से बहुत जल्दी प्रभु मिलन का कार्य हो जाता है ।
062. प्रभु को स्वयं कुछ नहीं करना पड़ता, प्रभु की दिव्य शक्तियां ही प्रभु के संकल्प मात्र से सब काम कर देती है ।
063. प्रभु श्री कृष्णजी और श्रीजी भगवती राधा माता एवं प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता एक ही हैं, श्रीलीला के लिए बस दो रूप में बने हुए हैं ।
064. प्रभु की शक्तियां अनंत है और अपार है ।
065. अपनी ऐश्वर्य शक्ति से प्रभु दिव्य और महान कार्य करते हैं जिनको दूसरा कोई कर ही नहीं सकता ।
066. प्रभु की ऐश्वर्य शक्ति के कारण प्रभु की विलक्षणता और अलौकिकता दिखती है जो प्रभु के सिवाय किसी में देखने या सुनने में भी नहीं आती ।
067. प्रभु अपनी माधुर्य शक्ति के कारण बड़े मधुर और प्रिय लगते हैं ।
068. प्रभु अपने भक्तों के भाव के अनुसार उनको आनंद देने के लिए अपनी ऐश्वर्य शक्ति को छिपाकर माधुर्य शक्ति प्रकट कर देते हैं । गोपियों के समक्ष प्रभु ने अपनी माधुर्य शक्ति प्रकट की । अगर प्रभु अपनी ऐश्वर्य शक्ति प्रकट कर देते तो गोपियां प्रभु से वह प्रेम नहीं कर पाती जो उन्होंने किया ।
069. प्रभु की एक सौंदर्य शक्ति भी है जिससे हर एक प्राणी प्रभु की तरफ आकृष्ट हो जाता है । प्रभु के सौंदर्य के सामने सृष्टि का अन्य कुछ भी नहीं टिक सकता ।
070. प्रभु को सजाने संवारने की आवश्यकता नहीं, गहने-कपड़ों की आवश्यकता नहीं क्योंकि प्रभु का सौंदर्य स्वयं सिद्ध है । पर भक्त अपने आनंद के लिए ऐसा करता है और प्रभु को सजाते संवारते हैं ।
071. प्रभु के रूप को देखकर भक्त को कभी तृप्ति नहीं होती क्योंकि प्रभु नित्य नवीन लगते रहते हैं ।
072. प्रभु के दिव्य सौंदर्य में प्रेमी (गोपियां), विरक्त (प्रभु श्री शुकदेवजी), ज्ञानी (श्री उद्धवजी), यहाँ तक कि असुर (खर दूषण) तक सबका मन आकृष्ट हो जाता है ।
073. जो प्रभु से विमुख रहते हैं उनके सामने प्रभु अपनी योग माया के प्रभाव से छिपे रहते हैं ।
074. अवतार का एक अर्थ है - नीचे उतरना । प्रभु अपार, असीम और अनंत होकर भी अपने प्रिय भक्तों के लिए छोटे बनकर नीचे उतर कर आते हैं ।
075. सर्वोच्च धर्म प्रभु की शरण ग्रहण करना ही है ।
076. प्रतिकूलता में जितना बड़ा आध्यात्मिक लाभ हमें मिलता है उतना किसी भी दूसरे अवसर में नहीं मिलता । इसलिए ही प्रभु भक्तों के जीवन में प्रतिकूलता भेजते हैं ।
077. प्रभु उदारता के भंडार हैं यानी परम उदार हैं ।
078. प्रभु की श्रीलीलाओं को सुनने, पढ़ने और याद करने से हमारा अंतःकरण निर्मल और पवित्र हो जाता है ।
079. प्रभु जीव मात्र का कल्याण करने के उद्देश्य से अवतार लेते हैं और अलौकिक श्रीलीलाएं करते हैं ।
080. प्रभु की श्रीलीलाओं को गाने, सुनने, पढ़ने और उनका चिंतन करने से प्रभु के साथ हमारा संबंध जुड़ जाता है ।
081. प्रभु से संबंध जुड़ने से संसार से संबंध अपने आप छूट जाता है क्योंकि संसार के साथ हमारा माना हुआ संबंध है जबकि प्रभु के साथ हमारा सत्य और सनातन संबंध है ।
082. प्रभु की छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी प्रत्येक क्रिया श्रीलीला होती है जो कि दिव्य और विलक्षण होती है ।
083. जगत में आनंद उत्पन्न करने के लिए प्रभु अवतार लेते हैं और अपने अवतार काल में आनंद-ही-आनंद बांटते हैं ।
084. अपना कोई प्रयोजन न रहने पर भी प्रभु केवल हमारे कल्याण के लिए अवतार लेते हैं ।
085. प्रभु का आकर्षण होने पर मनुष्य प्रभु में जल्दी तन्मय हो जाता है ।
086. भक्त हर समय प्रभु में ही तल्लीन रहना चाहते हैं ।
087. संसार का आकर्षण भगवत् प्राप्ति का निरोध कर देता है ।
088. प्रभु में रमे हुए भक्त का आकर्षण प्रभु में ही होता है और उन्हें जीवन में प्रिय-से-प्रिय प्रभु ही लगते हैं ।
089. जो वस्तु हमें चाहिए और हमारे हित की है प्रभु ने पहले ही बिना मांगे दे रखी है और ज्यादा दे रखी है, कम नहीं । हमारी जरूरत जितना प्रभु समझते हैं उतना हम भी नहीं समझ सकते ।
090. प्रभु की उदारता अपार है उसका कोई आर पार नहीं ।
091. प्रभु को ही जीवन में सबसे सर्वोपरि मानना चाहिए ।
092. प्रभु के साथ ही केवल हमारा नित्य संबंध होना चाहिए ।
093. जीव पर प्रभु की बड़ी भारी कृपा है कि प्रभु जीव से अपना संबंध जोड़ते हैं क्योंकि कहाँ जीव और कहाँ प्रभु, जिन दोनों में कोई तुलना ही संभव नहीं है ।
094. जीवात्मा प्रभु का नित्य दास है इसलिए उसे जीवन में प्रभु का ही कार्य करना चाहिए ।
095. अगर कर्म प्रभु के लिए किए जाएंगे तो उसके संपादन का दिव्य आनंद हमें प्राप्त होगा ।
096. कर्म के बंधन से मुक्ति तभी संभव है जब हर जीव हर कार्य प्रभु की प्रसन्नता के लिए करे और प्रभु को समर्पित करके करे ।
097. आलस्य से मनुष्य पाप प्रवृत्ति को प्राप्त होता है ।
098. प्रभु की सेवा के बदले धन, मान, बड़ाई, पद, अधिकार आदि कुछ भी लेना नहीं चाहिए । इसे स्वीकार करना तो अनाधिकार की चेष्टा है ।
099. कर्म बंधन से छूटने का उपाय है - फलेच्छा का त्याग और कर्म सबके हित के लिए करना ।
100. इंद्रियां अपने विषयों क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध में बिल्कुल प्रवृत्त न हो और संयम बनाकर रखे तभी हमारा कल्याण संभव है ।
101. मानव जीवन पशुओं की भांति इंद्रियों की तृप्ति के लिए नहीं बना है और न ही इसके लिए हमें मिला है ।
102. श्रीमद् भगवद् गीताजी के विश्राम पर प्रभु ने कहा कि जो इस शास्त्र का अध्ययन करेगा उसके द्वारा मैं (प्रभु) ज्ञान यज्ञ से पूजित होऊँगा । तात्पर्य यह है कि श्रीमद् भगवद् गीताजी का स्वाध्याय ज्ञान यज्ञ है ।
103. हमें प्रभु की निष्काम और निश्छल भक्ति में ही प्रवृत्त होना चाहिए ।
104. अविनाशी प्रभु का अनुभव करने के लिए कर्म करने चाहिए । हमें लोक और परलोक के विनाशी भागों की प्राप्ति के लिए कर्म नहीं करने चाहिए ।
105. सकाम भाव से किए बड़े-से-बड़े कर्म से भी प्रभु की प्राप्ति नहीं होती ।
106. भगवत् अर्पणरूपी यज्ञ उसे कहा गया है जहाँ संपूर्ण क्रियाओं और पदार्थों को केवल प्रभु का मानना और प्रभु का मानकर प्रभु के लिए कर्म करना और प्रभु को कर्म अर्पण करना ।
107. जब कोई जीव प्रभु की तीव्र भक्ति में लग जाता है तो वह माया के प्रभाव से तुरंत मुक्त हो जाता है । तीव्र भक्ति करने वाले के लिए माया निष्क्रिय हो जाती है ।
108. प्रभु का यह कथन बहुत बड़ा आश्वासन देने वाला है कि अगर कोई जीव सभी पापियों से भी अधिक पापी है और प्रभु की शरण में आ जाता है तो प्रभु क्षणभर में उसे पाप मुक्त कर देते हैं । जरूरत है कि वह जीव पाप त्याग का संकल्प करे और प्रभु की शरणागति ग्रहण करे ।
109. महान दुराचारी मनुष्य भी निश्चय कर ले कि अब मैं प्रभु की भक्ति करूँगा तो उसका बहुत जल्दी कल्याण हो जाता है ।
110. जैसे कहीं सौ वर्षों से अंधेरा है तो फिर वहाँ एक दीपक जला दिया तो प्रकाश को उस अंधेरे को दूर करने में सौ वर्ष नहीं लगते अपितु तत्काल दीपक जलते ही अंधेरा मिट जाता है । वैसे ही प्रभु के शरणागत होते ही तत्काल हमारे संचित पापों के पहाड़ का क्षय हो जाता है यानी वे नष्ट हो जाते हैं ।
111. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु से प्राप्त पूर्ण ज्ञान मुक्ति का पथ है ।
112. जो लोग प्रभु और प्रभु के वचनों में श्रद्धा नहीं रखते उनका संसार और परलोक दोनों बिगड़ जाता है ।
113. जीवन में जीव को एकमात्र प्रभु को प्राप्त करने की इच्छा ही रखनी चाहिए ।
114. भक्त की पुकार प्रभु तक तत्काल पहुँच जाती है और इसमें कोई देरी नहीं होती ।
115. भक्ति पथ सबसे सुगम और सरल पथ है ।
116. प्रत्येक वस्तु प्रभु की ही है, अतः उसका उपयोग प्रभु के लिए ही किया जाना चाहिए ।
117. भक्त जो भी कुछ करता है प्रभु के लिए ही करता है ।
118. प्रभु की भक्ति का एक अर्थ यह है मन से प्रभु की सभी प्रकार की सेवा करना ।
119. प्रभु भक्ति के दृढ़ उद्देश्य से अंतःकरण में जितनी जल्दी और जितनी अच्छी शुद्धि होती है उतनी जल्दी और उतनी अच्छी शुद्धि किसी दूसरे अनुष्ठान से नहीं होती ।
120. प्रभु ने भोगों और संग्रह के साधन को अपनी प्राप्ति में बाधक बताया है ।
121. हम प्रभु के शाश्वत दास हैं इसलिए प्रभु सेवा के अतिरिक्त हमें कोई दूसरा काम नहीं होना चाहिए ।
122. हम प्रभु के हैं और हमारा मन, बुद्धि और शरीर भी प्रभु की ही संपत्ति है ।
123. जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय, श्रवण और मनन से प्रभु के लिए भक्ति हमारे हृदय में जागृत होती है ।
124. जो अपने कर्मों को और कर्मफल को प्रभु को अर्पण कर देता है वह कर्मबंधन में नहीं फंसता और उससे मुक्त हो जाता है ।
125. जब एक प्रभु तत्व के सिवा दूसरा कुछ है ही नहीं तो फिर कौन द्वेष करे और किससे द्वेष करे ।
126. संसार के विषयों का सुख उतना ही सुखद है जितना एक सर्प द्वारा एक चूहे पर अपने फन के द्वारा छाया करना सुखदाई होता है । सर्प कभी भी चूहे को निगल सकता है, ऐसे ही विषय कभी भी साधक की साधना को बाधित कर सकते हैं ।
127. जैसे मेंढक कीचड़ को नहीं छोड़ सकता है, वैसे ही विषयी पुरुष विषय भोग को नहीं छोड़ते ।
128. प्रभु प्राप्ति करने का अवसर मनुष्य शरीर में ही है, दूसरे शरीर में नहीं है । इसलिए इस मनुष्य शरीर के छूटने से पहले ही यह प्रभु प्राप्ति का कार्य जरूर कर लेना चाहिए ।
129. प्रभु प्राप्ति करना ही हमारे जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए ।
130. जब मनुष्य भक्ति करता है तो ही वह दिव्य स्थिति को प्राप्त होता है ।
131. संसार के सभी पदार्थों को अपना न मानकर केवल प्रभु को ही अपना मानते हुए उन्हीं की सेवा में अपना तन, मन और धन को लगा दें तो परम शांति प्राप्त होगी ।
132. अपने लिए कुछ भी चाहना, किसी भी वस्तु को अपना मानना और प्रभु को अपना न मानना - यह तीनों बातें प्रभु प्राप्ति में मुख्य बाधक होती हैं ।
133. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि केवल मेरे को ही अपना मानें, अन्य किसी वस्तु और व्यक्ति आदि को अपना न मानें ।
134. भक्त कभी भोगों को भोगकर आत्म तृप्ति की इच्छा नहीं रखता, वह सदैव प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही कार्य करता है ।
135. भक्ति करने वाला साधक केवल प्रभु के लिए ही कर्म करता है ।
136. प्रभु ने मनुष्य जन्म के रूप में हमें अवसर दिया है कि हम अपना उद्धार कर लें ।
137. हमें मनुष्य जन्म के अमूल्य और मुक्ति दायक समय को संसार के निरर्थक संकल्पों में बर्बाद नहीं करना चाहिए ।
138. जब कोई भक्त प्रभु की दिव्य प्रेमाभक्ति में पूरी तरह लग जाता है तो वह इंद्रिय तृप्ति और सकाम कर्म के लिए प्रवृत्त नहीं होता ।
139. मैं केवल भगवान का हूँ और केवल भगवान ही मेरे हैं - यह सभी शास्त्रों की सार बात है ।
140. जब भक्ति के द्वारा मन पर विजय प्राप्त हो जाती है तो हमारा मन प्रभु आज्ञा का पालन करने लगता है ।
141. अपने मन को निरंतर प्रभु में लगाए रखना चाहिए और यह भक्ति से ही संभव है ।
142. एकांत में बैठकर मन को निरंतर प्रभु में लगाने का अभ्यास करना चाहिए ।
143. मन प्रभु का चिंतन नहीं करता है तो वह मन फिर संसार में लिप्त हो जाता है । इसलिए अपने मन को प्रभु के चिंतन में लगाए रखना चाहिए ।
144. प्रभु अपने सखा श्री अर्जुनजी से इतना प्रेम करते हैं कि उनके प्रश्न पूछने से पूर्व ही मानो प्रेम में अधीन होकर उत्तर देने में प्रवृत्त हो जाते हैं ।
145. हमारे जीवन में प्रभु प्राप्ति का ही दृढ़ उद्देश्य होना चाहिए ।
146. संसार से संबंध के कारण ही हर्ष, शोक, राग, द्वेष आदि द्वंद्व होते हैं और इन्हीं के कारण हमारी शांति भंग होती है ।
147. चित्त को संसार से हटाकर प्रभु की श्रीलीला, गुण, प्रभाव और महिमा के चिंतन में लगाने से ही शांति मिलती है ।
148. हमारा लक्ष्य प्रभु के चिंतन का होना चाहिए, संसार के चिंतन का नहीं ।
149. प्रभु के सिवाय हमारे अंतःकरण में कोई सांसारिक वासना, आसक्ति, कामना और ममता आदि नहीं रहनी चाहिए ।
150. भक्ति की विशेषता है कि प्रभु के पारायण रहने से हमारे भीतर प्रभु का बल रहता है जिससे हमारे विकार शीघ्र दूर होते हैं और अभिमान भी नहीं होता ।
151. मानव जीवन का सच्चा उद्देश्य प्रभु को जानना और प्रभु को पाना है ।
152. प्रभु के सिवाय भक्त किसी से भी संबंध नहीं रखना चाहता । उसका एकमात्र संबंध पूर्णतया प्रभु से ही होता है ।
153. मन को संसार से हटाकर प्रभु में लगाए रखना चाहिए ।
154. हम संसार में सांसारिक धन-वैभव आदि कमाने के लिए नहीं आए हैं अपितु प्रभु प्राप्ति करने के लिए आए हैं । हमें यह सोचना चाहिए और दिनचर्या से जितना समय निकाल सके उतना समय निकालकर अधिक-से-अधिक प्रभु की भक्ति करनी चाहिए ।
155. सोते समय भी यह ध्यान रखें कि मैंने दिन में बैठकर भजन किया, अब लेटकर भजन करना है, तब नींद भी भजन बन जाती है ।
156. एक मिनट का समय भी प्रभु सानिध्य के बिना नहीं बिताना चाहिए ।
157. अपनी इच्छाओं को प्रभु की इच्छा पूरी करने में लगाना चाहिए ।
158. भक्ति में वह आनंद है जिसे प्राप्त करने के बाद उसकी अपेक्षा कोई अन्य सांसारिक सुख श्रेष्ठ नहीं लगता ।
159. प्रभु का चिंतन करते-करते मन प्रभु को प्राप्त कर लेता है ।
160. संसार की तरफ चलने से सुख नहीं पाया जा सकता, केवल दुःख-ही-दुःख पाया जाता है ।
161. एक प्रभु के सिवाय ब्रह्मांड में दूसरी कोई सत्ता किसी की है ही नहीं ।
162. हमारा संबंध केवल प्रभु के साथ ही होना चाहिए ।
163. हमारी भक्ति घंटे दो घंटे के लिए नहीं अपितु आठों पहर के लिए होनी चाहिए ।
164. प्रभु का चिंतन करते-करते मन प्रभु में तल्लीन हो जाता है और संसार का चिंतन स्वतः ही छूट जाता है ।
165. जो जिस प्रकार प्रभु की शरण लेते हैं प्रभु उसी प्रकार उनको आश्रय भी देते हैं ।
166. प्रभु के बिना किसी भी चीज का अस्तित्व ही नहीं है ।
167. सारा संसार प्रभु का रूप है, प्रभुमय है - ऐसा भक्तों और संतों ने अनुभव किया है ।
168. भक्त की दृष्टि में प्रभु के सिवाय कुछ भी नहीं रहता ।
169. ऐसी भावना रखनी चाहिए कि मैं प्रभु का सेवक हूँ और केवल प्रभु की सेवा करना ही मेरा एकमात्र काम है ।
170. मैं भगवान का हूँ, केवल भगवान को अर्पित होना ही मेरा काम है ।
171. भक्त प्रभु के ही आश्रय में रहता है इसलिए प्रभु अपने भक्त की विशेष रक्षा करते हैं ।
172. भगवत् साक्षात्कार के लिए भक्ति ही विशेष रूप से उपयुक्त है और उपयोगी है ।
173. यदि कोई आध्यात्मिक मार्ग चुनता है तो उसे सभी प्रकार के भौतिक सुखों से विरक्त होना पड़ता है ।
174. जिसकी रक्षा प्रभु करते हैं उसकी दुर्गति कभी नहीं हो सकती ।
175. प्रभु कहते हैं कि जो मनुष्य मेरी तरफ चलता है वह मुझे बहुत प्यारा लगता है और बहुत जल्दी मुझे प्राप्त कर लेता है ।
176. वास्तव में हम प्रभु के अंश हैं, संसार के अंश नहीं हैं । इसलिए हमारा वास्तविक संबंध प्रभु के साथ ही है ।
177. प्रभु के हृदय में भक्ति करने वालों के लिए बहुत बड़ा स्थान आरक्षित होता है ।
178. जो प्रभु की शरण में चला जाता है उसकी न कोई क्षति होती है और न कभी उसका पतन होता है ।
179. हमारे जीवन में प्रभु प्राप्ति के लिए सदैव चिंतन होते रहना चाहिए ।
180. प्रभु की तरफ चलने की उत्कंठा, लगन, उत्साह, तत्परता दिन प्रतिदिन बढ़ती ही रहनी चाहिए ।
181. जीव को केवल मनुष्य जन्म में ही अपने उद्धार का अवसर मिलता है । अतः इस अवसर का सदुपयोग करना चाहिए ।
182. चौरासी लाख योनियों बाद मनुष्य रूपी अंतिम जन्म प्रभु ने जीव को केवल अपने कल्याण करने के लिए ही दिया है ।
183. जीव को मनुष्य जन्म में तत्परता से अपने उद्धार के लिए यत्न करना चाहिए ।
184. अनेक जन्मों के पुण्य कर्म के फल से जीव मनुष्य जन्म में संसार के व्यवधानों से मुक्त हो प्रभु की दिव्य प्रेमाभक्ति में लग पाता है ।
185. जो संसार से विमुख होकर प्रभु के सम्मुख हो गया वही वास्तव में सच्चा भक्त है ।
186. जो जीव प्रभु की भक्ति करता है वह सभी प्रकार के जीव की अपेक्षा श्रेष्ठ है और प्रभु को बहुत प्रिय होता है ।
187. हमारा खिंचाव केवल प्रभु की तरफ ही होना चाहिए ।
188. प्रभु भक्त की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि जिनको केवल मेरी ही आशा है, मेरा ही भरोसा है, मेरा ही सहारा है, मेरा ही विश्वास है और जो सर्वदा मेरे पर ही आश्रित रहता है वही मेरा सच्चा भक्त है ।
189. संसार के धन, संपत्ति, वैभव, विद्या, बुद्धि, योग्यता, कुटुंब का आश्रय नाशवान है, केवल प्रभु का आश्रय ही शाश्वत और सनातन है ।
190. मन भी प्रभु में आसक्त हो जाए और जीवन में आश्रय भी प्रभु का हो जाए तो हमारा कल्याण हो जाता है ।
191. आश्रय लिया जाता है सर्वसामर्थ्यवान का और एकमात्र सर्वसामर्थ्यवान तो केवल प्रभु ही हैं । इसलिए जीवन में आश्रय केवल और केवल प्रभु का ही लेना चाहिए ।
192. सच्ची शरणागति तब होती है जब प्रभु में ही आसक्ति हो, प्रभु का ही आश्रय हो, प्रभु में ही मन लगे और प्रभु में ही बुद्धि लगे ।
193. प्रभु से बड़ा कोई प्रमाण नहीं है । अतः श्रीमद् भगवद् गीताजी में श्री अर्जुनजी को निमित्त बना प्रभु के श्रीवचन सुनने का सौभाग्य हमें भी प्राप्त होता है ।
194. प्रभु के विषय में सुनना और साक्षात प्रभु के श्रीवचनों के द्वारा सुनना, इससे बड़ा पुण्य कर्म कुछ भी नहीं है ।
195. ज्यों-ज्यों हम प्रभु के विषय में अधिकाधिक सुनते हैं त्यों-त्यों हमारी भगवत् भक्ति जागृत और स्थिर होती चली जाती है ।
196. प्रभु के बारे में वर्णन करने का जितना ऋषियों, संतों और भक्तों का अनुभव होता है वह बुद्धि में नहीं आता, बुद्धि में जितना आता है उतना मन में नहीं आता, मन में जितना आता है उतना वर्णन में नहीं आता । इसलिए प्रभु के बारे में जो भी लिखा या कहा गया है वह बहुत अल्प है, ऐसा मानना चाहिए ।
197. प्रभु का जो प्रभाव है, ऐश्वर्य है उसका अंत है ही नहीं । जब उसका अंत ही नहीं है तो उसे जानना मनुष्य की बुद्धि के बाहर की बात है ।
198. प्रभु की प्राप्ति कठिन या दुर्लभ नहीं है पर ऐसा इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि सच्ची लगन से तत्परता पूर्वक ऐसा प्रयत्न करने वाले बहुत कम जीव होते हैं ।
199. प्रभु स्वभाव से ही दयालु और कृपालु हैं पर अपने भक्तों के साथ बहुत अधिक दयालु और कृपालु बनकर व्यवहार करते हैं ।
200. कामरूप दोष के कारण स्त्री का आकर्षण होता है, लोभरूप दोष के कारण धन का आकर्षण होता है, मोहरूप दोष के कारण कुटुंब और परिवार का आकर्षण होता है । इन सबसे ऊपर उठकर भक्ति के द्वारा प्रभु में आकर्षण कर लेना चाहिए ।
201. प्रभु को उत्साह पूर्वक प्राप्त करने का जो प्रयत्न है वही वास्तव में सच्चा पुरुषार्थ है ।
202. प्रभु के सिवा जगत में कहीं कुछ भी नहीं है ।
203. हमारा केवल प्रभु के साथ ही नित्य संबंध है । इस बात को जितनी जल्दी हम स्वीकार करेंगे उतनी जल्दी ही हम शांति को प्राप्त करेंगे ।
204. हमें प्रभु से विमुख होकर संसार से संबंध कभी नहीं जोड़ना चाहिए ।
205. भक्त को आतंरिक आनंद-ही-आनंद प्राप्त होता है और संसारी मनुष्य को दुःख-ही-दुःख मिलता है । यह फर्क है प्रभु के सानिध्य और संसार के सानिध्य में ।
206. सांसारिक माँ तो एक जन्म में ही पालन करने वाली होती है प्रभु तो जन्म-जन्म से सदा पालन करने वाले हमारी माता है ।
207. प्रभु की कृपालुता इतनी विलक्षण है कि वह जीव का शीघ्र ही कल्याण कर देती है ।
208. भक्त केवल भगवत् संबंधी कर्म में ही रुचि रखता है ।
209. जिनको प्रभु में रुचि हो गई वे ही सच्चे भाग्यशाली होते हैं और मनुष्य कहलाने योग्य होते हैं ।
210. प्रभु के साथ अपनापन होने का अर्थ है कि हृदय में यह भाव दृढ़ता से जागृत हो जाना कि मैं केवल प्रभु का ही हूँ और केवल प्रभु ही मेरे हैं ।
211. भक्त केवल भगवान को चाहते हैं और भगवान केवल अपने भक्त को चाहते हैं ।
212. प्रभु ही हमें लगाने वाली भूख में अन्नरूप बनकर और हमें लगाने वाली प्यास में जलरूप बनकर हमारे पास आते हैं ।
213. प्रभु में अपने भक्त के लिए अत्यधिक कृपालुता और दयालुता होती है ।
214. भक्त मानता है कि मेरे तो केवल प्रभु ही हैं, प्रभु के सिवाय मेरा कोई भी है ही नहीं ।
215. जो जीव प्रभु की भक्ति के साथ भौतिक भोग की कामना करता है वह परस्पर विरोधी इच्छाओं वाला होता है क्योंकि भक्ति के मार्ग पर भौतिक इच्छाएं बाधक होती है । अतः प्रभु अपने शुद्ध भक्त को भौतिक लाभ प्रदान नहीं करते ।
216. प्रभु की भक्ति करने से प्रभु से नित्य संबंध बन जाता है । एकमात्र प्रभु के साथ संबंध ही सदा रहने वाला संबंध है ।
217. जो प्रभु के श्रीकमलचरणों की रंचमात्र भी कृपा प्राप्त कर लेता है वह प्रभु की महानता को जान लेता है ।
218. भक्ति के द्वारा ही प्रभु को समझा जा सकता है और पाया जा सकता है ।
219. अगर जीव प्रभु की शरण में चला जाए तो प्रभु उसके अज्ञान को दूर कर देते हैं और अपनी माया को भी उससे दूर कर देते हैं ।
220. प्रभु की भक्ति करना ही जीव का सर्वोच्च धर्म है ।
221. मनुष्य जन्म जैसा अमूल्य अवसर पाकर भी जो अपना उद्धार नहीं करता वह मानो अपना आत्मघात ही कर लेता है ।
222. श्री सूर्यनारायणजी के समान हैं प्रभु और प्रभु की माया बादल के समान है जो कि श्री सूर्यनारायणजी को ढक देती है । जीव माया के बादलों के पार प्रभु को देख नहीं पाता । भक्ति ही इन माया के बादलों को हवा बनकर हटाती है और प्रभु के दर्शन करवाती है ।
223. प्रभु से विमुख होने के कारण ही जीव को संसार में बार-बार जन्म लेना पड़ता है ।
224. जीव को प्रभु की तरफ अपनी वृत्ति को लगानी चाहिए और संसार की तरफ से अपनी वृत्ति को हटानी चाहिए ।
225. प्रभु से सच्चा प्रेम होगा तो संसार से स्वतः ही वैराग्य हो जाएगा ।
226. मनुष्य जीवन का उद्देश्य भोग भोगना नहीं अपितु प्रभु की प्राप्ति करना है ।
227. जीवन में प्रभु की प्राप्ति ही हमारा एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए ।
228. जो प्रभु की भक्ति में लग जाता है उसके पुराने पापों का स्वतः ही अंत हो जाता है ।
229. प्रभु के सम्मुख होना सबसे बड़ा पुण्य है और प्रभु से विमुख होना सबसे बड़ा पाप है ।
230. प्रभु के प्रति एकनिष्ठा का भाव हमारे हृदय में जागृत करके रखना चाहिए ।
231. जीव कहीं भी रहे, वह कभी भी प्रभु की दृष्टि से ओझल नहीं हो सकता ।
232. यह सिद्धांत है कि किसी भी तरह से प्रभु में हमारा चित्त आकर्षित हो जाए तो हमारा उद्धार हो जाता है ।
233. हमें हर समय यह स्मरण रखना चाहिए कि हम संसारी नहीं है, साधक हैं और भगवत् प्राप्ति करना ही हमारा लक्ष्य है ।
234. प्रभु से विमुख होना सबसे बड़ा पाप भी है और विपत्ति को निमंत्रण भी है । प्रभु के सम्मुख होना सबसे बड़ा पुण्य भी है और लाभ भी है । ऐसा सभी शास्त्रों का एकमत है ।
235. हमें यह अभिमान नहीं करना चाहिए कि मैंने ऐसा कर लिया, जिस कारण ऐसा हो गया । हमें यह सोचना चाहिए कि प्रभु के आश्रय और कृपा से ही ऐसा संभव हुआ, इसमें मेरा कोई योगदान नहीं है ।
236. वैसे तो प्रभु की माया से तरना बहुत दुष्कर है पर जो प्रभु की शरण में चले जाते हैं वे माया से तर जाते हैं ।
237. श्री अर्जुनजी के लिए केवल प्रभु से प्रश्न पूछने भर की देर थी कि प्रभु अपने भक्त को सविस्तार उत्तर देने के लिए उत्सुक थे जैसे एक गौ-माता अपने बछड़े को दूध पिलाने के लिए उत्सुक रहती है ।
238. भक्ति के द्वारा इंद्रियों को प्रिय लगने वाले विषयों को जीवन से बाहर निकाल फेंकना चाहिए ।
239. प्रभु न्याय भी करते हैं और भरपूर दया भी साथ-साथ करते हैं । प्रभु के अलावा ऐसा कोई नहीं कर सकता क्योंकि जो सांसारिक न्याय करता है वह दया नहीं करता और जो दया करता है उससे ठीक-ठीक न्याय नहीं होता । प्रभु ही एकमात्र हैं जो न्याय के साथ दया भी करते हैं क्योंकि अगर प्रभु ऐसा नहीं करते तो सभी जीव आज नर्क में होते ।
240. एक प्रभु के सिवाय जीवन में हमारा दूसरा कोई लक्ष्य नहीं होना चाहिए ।
241. किसी भी सांसारिक विषय का भोग बुद्धि से सेवन नहीं करना चाहिए ।
242. हमारा उद्देश्य केवल परमात्मा प्राप्ति ही हो । परमात्मा प्राप्ति के अलावा जीवन में और कोई ध्येय होना ही नहीं चाहिए ।
243. भक्तों की निष्काम और प्रेमल भक्ति का प्रभु अपने ऊपर ऋण मानते हैं ।
244. प्रभु भक्ति को ही सर्वोपरि मानते हैं ।
245. एक तो प्रभु की ओर जाने वाला सरल मार्ग है और दूसरा प्रभु को छोड़कर संसार की ओर जाने वाला टेढ़ा मार्ग है ।
246. हमारा लक्ष्य प्रभु प्राप्ति के लिए अटल होना चाहिए ।
247. भक्ति करने वाले के लिए भगवत् धाम का मार्ग स्वतः ही सुगम, सुनिश्चित और सीधा हो जाता है ।
248. हमें सांसारिक पदार्थों से सर्वथा विमुख होकर केवल प्रभु के पारायण होना चाहिए ।
249. अनन्य भाव से प्रभु की भक्ति करने वाले का योगक्षेम प्रभु स्वयं वहन करते हैं ।
250. प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त का कभी विनाश अथवा पतन नहीं होता ।
251. प्रभु की तरफ दृष्टि न रखकर संसार की तरफ दृष्टि रखने से जीव प्रभु को प्राप्त न होकर बार-बार जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है ।
252. जीवन में प्रभु के साथ ही हमारा सबसे घनिष्ठ संबंध होना चाहिए ।
253. ज्यों-ज्यों भक्त प्रभु के बारे में अधिकाधिक पढ़ता और सुनता है त्यों-त्यों वह आत्म प्रकाशित होता जाता है ।
254. भक्त अपने जीवन काल में प्रभु की सेवा में निरंतर लगा रहता है ।
255. जो लोग प्रभु की भक्ति में रत रहते हैं उनके सारे पाप कर्म प्रभु कृपा से नष्ट हो जाते हैं ।
256. प्रभु कहते हैं कि मैं तो मेरे भक्तों में केवल उनकी भक्ति और प्रेम को ही देखता हूँ ।
257. शास्त्र कहते है कि मनुष्य शरीर केवल प्रभु प्राप्ति के लिए ही हमें मिला है पर हम अन्य प्रयोजन में इसका इस्तेमाल करते रहते हैं ।
258. संसार से हमारा संयोग और प्रभु से हमारा वियोग कभी भी नहीं होना चाहिए ।
259. जब तक निष्काम भक्ति से प्रभु की प्राप्ति नहीं होगी, तब तक सकाम भाव पूर्वक जितने भी कर्म करेंगे तो उसका फल भोगकर अंत में दुःख और अशांति के सिवाय कुछ नहीं मिलेगा ।
260. जो कर्म प्रभु के लिए, प्रभु की प्रसन्नता के लिए और प्रभु को अर्पण करके किए जाते हैं वे ही श्रेष्ठ होते हैं ।
261. हम संसार की सभी भाषाएं सीख लें, सभी लिपियां सीख लें, तरह-तरह की कलाएं सीख लें, तरह-तरह की विद्याएं और विज्ञान का ज्ञान प्राप्त कर लें, पर जब तक उन सबका उपयोग प्रभु सेवा के लिए नहीं किया जाता तब तक वे सब निष्फल हैं ।
262. जो मनुष्य अपने स्वार्थ सिद्ध करने में, अपनी कामना पूर्ति करने में, अपने प्राणों का पोषण करने में लगे रहते हैं और प्रभु से विमुख होते हैं वे आसुरी स्वभाव वाले होते हैं ।
263. प्रभु का अंश होने के कारण जीव का प्रभु के साथ ही अखंड संबंध है । जब तक जीव प्रभु के साथ अपने इस संबंध को नहीं पहचानता तब तक वह प्रभु से विमुख ही रहता है ।
264. प्रभु का नाम भक्तों के मुख में अखंड आनंद से नाचता रहता है ।
265. भक्त एकमात्र प्रभु की वार्ता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सुनना चाहते ।
266. भक्ति में एक प्रभु का ही विश्वास मुख्य होता है । प्रभु का ही एकमात्र आश्रय होता है ।
267. प्रभु अपने भक्तों का हित देखकर वही कार्य करते हैं जिसमें भक्त का हित होता है ।
268. केवल जीवन धारण करना ही कोई जीवन नहीं है । अपना जीवन प्रभु के नाम करना और प्रभु के लिए जीवन जीना ही यथार्थ जीवन है ।
269. जिन्होंने प्रेम और भक्ति से अपना संपूर्ण आश्रय प्रभु को बना लिया उनके योगक्षेम को प्रभु को चलाना ही पड़ता है ।
270. भक्त में प्रभु को खिलाने का भाव जब आता है तो प्रभु को भूख लग जाती है । प्रभु पदार्थ के भूखे नहीं है बल्कि भक्त के भाव के भूखे हैं ।
271. प्रभु ने जो किया वही ठीक है क्योंकि उसमें ही हमारा कल्याण है । प्रभु ने जो नहीं किया वही ठीक है क्योंकि उसमें भी हमारा कल्याण ही है । यह एक सच्चे भक्त की दृढ़ भावना होती है ।
272. जब प्रभु भक्त के मन में अपने लिए अपनापन का भाव देखते हैं तो प्रभु को अति प्रसन्नता होती है ।
273. प्रभु को जीव से केवल प्रेम और भक्ति ही चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं ।
274. जो व्यक्ति अपने को प्रभु भक्ति में रत रखने के अतिरिक्त अन्य कोई सांसारिक रुचि नहीं रखता, वही वास्तविक भक्त है ।
275. हमें नेत्रों से प्रभु का रूप देखना चाहिए, कानों से प्रभु का गुणगान सुनना चाहिए और मन से प्रभु का ध्यान करना चाहिए ।
276. प्रभु कहते हैं कि फल तो छोड़ दें, प्रेम से अर्पण एक पत्ता भी प्रभु को प्रिय लगता है चाहे वह कैसा भी हो, ताजा हो, बासी हो या सूखा हो ।
277. अगर हम अपने सभी कर्म प्रभु को अर्पण कर देते हैं तो कर्मों के कारण मिलने वाले जन्म-मरण के चक्र समाप्त हो जाते हैं और आगे जन्मों में मिलने वाले दुःख भी नष्ट हो जाते हैं ।
278. जीवन में वह दिन आना चाहिए जब हमारा मन यह कहे कि अब मैं केवल प्रभु का ही हूँ और अब मेरा काम केवल प्रभु की भक्ति करना ही है ।
279. प्रभु की प्राप्ति करवाने के लिए एकमात्र भक्ति ही समर्थ है ।
280. श्रीमद् भगवद् गीताजी में अनेक जगह ऐसा लगता है कि प्रभु को अपने प्यारे भक्त श्री अर्जुनजी को अपने हृदय की बात कहते-कहते तृप्ति नहीं होती । प्रभु को पता है कि उनके हृदय की गोपनीय बात एक भक्त के सिवाय संसार में कोई और सुनने वाला नहीं है । इसलिए प्रभु बिना पूछे ही अपने भक्त श्री अर्जुनजी को कृपापूर्वक कहना प्रारंभ कर देते हैं ।
281. प्रभु कहते हैं अपने भक्तों से संसार के सब झंझटों को छोड़कर एक मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम चिंता मत करो ।
282. ज्यों-ज्यों प्रभु के विषय में कोई भक्त सुनता है त्यों-त्यों वह भक्ति में रमता जाता है । इसलिए प्रभु के विषय में सदा श्रवण करते रहना चाहिए जिससे हमारी भक्ति बढ़ती चली जाए ।
283. प्रभु के भक्त के रूप में संसार में जाना जाए, यही वास्तविक यश है ।
284. दृढ़ भक्ति का तात्पर्य यह है कि प्रभु के सिवाय कहीं भी किंचित मात्र भी महत्व बुद्धि न हो ।
285. प्रभु के सिवाय दूसरे किसी का आकर्षण हमारे जीवन में नहीं होना चाहिए ।
286. भक्त सदैव और सर्वदा प्रभु के ही आश्रित होता है । भक्त मानता है कि मैं जैसा भी हूँ, प्रभु का ही हूँ और केवल प्रभु ही मेरे अपने हैं ।
287. कर्मयोग और ज्ञानयोग लौकिक साधन हैं पर भक्ति अलौकिक साधन है । अलौकिक में तो लौकिक आ ही जाता है पर लौकिक में अलौकिक नहीं आता । ज्ञानी तो भक्ति से रहित हो सकता है पर भक्ति ज्ञान से रहित नहीं होता । उदाहरण स्वरूप देखें तो श्रीगोपीजन ने ज्ञान का कभी भी संग नहीं किया पर फिर भी उनकी भक्ति के कारण उनमें विलक्षण ज्ञान था ।
288. जो स्वयं भी शुद्ध हो और अपने संपर्क में आने वाले दूसरों को भी शुद्ध करे, वही परम पवित्र कहलाता है । प्रभु ही केवल परम पवित्र हैं और उनके नाम, रूप आदि सभी परम पवित्र हैं ।
289. भक्ति मार्ग में प्रभु पर विश्वास रखना ही मुख्य बात है । प्रभु में विश्वास प्रकट होना भक्ति मार्ग में सबसे अनिवार्य है ।
290. देवता, मनुष्य, दानव आदि कोई भी अपनी शक्ति से, सामर्थ्य से, योग्यता से, बुद्धि से प्रभु को नहीं जान सकते । प्रभु जिसे चाहते हैं कि वह प्रभु को जाने वही प्रभु कृपा से प्रभु को कुछ-कुछ जान पाता है ।
291. जीव के कल्याण के लिए भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ साधन है ।
292. जो अनन्य भक्त जीवन में निरंतर प्रभु का ही चिंतन करते रहते हैं उनके योगक्षेम को प्रभु वहन करते हैं ।
293. प्रभु के स्वरूप को देखते-देखते तथा प्रभु के सद्गुणों का वर्णन सुनते-सुनते भक्तों के मन में कभी तृप्ति नहीं होती ।
294. प्रभु की कृपालुता और दयालुता अनंत हैं, असीम हैं और अपार हैं ।
295. प्रभु द्वारा श्रीमद् भगवद् गीताजी में बताई विभूतियों की और ध्यान जाते ही स्वतः प्रभु का चिंतन होना चाहिए ।
296. प्रभु की विभिन्न विभूतियों में एक-एक विभूति का नाम मात्र भी गिनाया जाए तो भी हजारों जन्म व्यतीत होने पर भी किंचित विभूतियों का वर्णन कर पाना भी संभव नहीं है ।
297. मैं आपका चिंतन कहाँ-कहाँ करूं, श्री अर्जुनजी के इस प्रश्न के उत्तर में प्रभु ने अपनी विभूति के रूप में अपने चिंतन की बात बताई है ।
298. आज भी कोई नयी आध्यात्मिक रचना करता है तो उसे प्रभु श्री वेदव्यासजी का ही प्रसाद माना जाता है ।
299. सभी प्रभु की विभूतियों में सभी विशेषताएं प्रभु की ही है और प्रभु से ही आयी है ।
300. प्रभु की हर विभूति का स्मरण होते ही हमारी दृष्टि प्रभु की तरफ जानी चाहिए ।
301. प्रभु श्रीमद् भगवद् गीताजी के दसवें अध्याय के बीसवें श्लोक से उनतालीसवें श्लोक तक अपनी बहुत सारी विभूतियों का वर्णन करते हैं ।
302. यह श्रीमद् भगवद् गीताजी का दसवां अध्याय भक्ति का प्रकरण है क्योंकि इस प्रकरण में श्री अर्जुनजी का प्रश्न था कि मैं प्रभु का कहाँ-कहाँ चिंतन करूं । इसलिए इसके उत्तर में बहुत ही संक्षिप्त में प्रभु ने अपनी विभूतियां बताई और उनतालीसवें श्लोक में समस्त विभूतियों का सार बताते हुए कहा कि सबका बीज अर्थात कारण प्रभु ही हैं । इसका मूल तत्व यह है कि हमारी इंद्रियां, मन और बुद्धि जहाँ-जहाँ भी जाए उन सबमें प्रभु के स्वरूप का ही दर्शन करें । क्योंकि प्रभु ने कहा है कि मेरे सिवाय कुछ नहीं अर्थात सब कुछ प्रभु ही हैं । इस अध्याय का सार यही है कि किसी भी वस्तु, घटना, परिस्थिति में प्रभु का ही चिंतन होना चाहिए । प्रभु का विभूति बताने का तात्पर्य जीव के उद्धार के लिए अपना चिंतन करवाने का है क्योंकि सब रूपों में एक प्रभु ही हैं ।
303. प्रभु की दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है क्योंकि प्रभु अनंत हैं इसलिए उनकी विभूतियां, सद्गुण, श्रीलीला आदि भी अनंत हैं । प्रभु की विभूतियों के विस्तार का भी अंत नहीं है ।
304. हम संसार में परमाणुओं की संख्या फिर भी असंभव लगने पर भी गिन सकते हैं पर करोड़ों ब्रह्मांड को रचने वाले प्रभु की विभूतियों को कभी भी, कैसे भी नहीं गिना जा सकता ।
305. प्रभु की विभूतियां अनंत, असीम और अगाध हैं ।
306. प्रभु का अपनी विभूतियां बताना वास्तव में बहुत ही संक्षेप में और नाम मात्र का है क्योंकि प्रभु की विभूतियों का अंत है ही नहीं ।
307. सभी विभूतियों का तात्पर्य यही है कि एक प्रभु के सिवाय कुछ भी नहीं है । सभी रूपों में एक प्रभु ही हैं ।
308. प्रभु की विभूतियों को और प्रभु के ऐश्वर्य को जानकर हमें प्रभु के शरणागत होकर भक्ति से प्रभु को नमन करना चाहिए ।
309. संसार में जहाँ भी हमें कोई विशेषता दिखती है उसको प्रभु की ही विशेषता मानते हुए उसमें प्रभु के रूप का दर्शन करना चाहिए । तात्पर्य यह है कि उस वस्तु या व्यक्ति जिसमें हमें विशेषता दिखाई दी है उसके प्रति हमारा आकर्षण न होकर वह आकर्षण प्रभु में होना चाहिए, यही इस दसवें अध्याय का ध्येय है ।
310. संसार में किसी भी सजीव या निर्जीव वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, गुण, भाव, क्रिया में कुछ भी ऐश्वर्य दिखे, शोभा दिखे, सौंदर्य दिखे, बलवत्ता दिखे, कुछ भी विशेषता, विलक्षणता और योग्यता दिखे उन सबको प्रभु से जोड़कर ही देखना चाहिए ।
311. हमें जहाँ-जहाँ विशेषता दिखे वहाँ-वहाँ प्रभु का ही चिंतन होना चाहिए । अगर हमें वहाँ प्रभु को छोड़कर कुछ भी दिखता है तो वह हमारे पतन का कारण बनता है क्योंकि प्रभु के लिए हमारे अनन्य भाव के व्रत का भंग हो जाता है ।
312. सभी के आधार प्रभु हैं इसलिए एक प्रभु की झलक ही हमें सर्वत्र दिखनी चाहिए ।
313. सब तरफ दिखने वाली विशेषताओं को हमें प्रभु की ही माननी चाहिए । जहाँ-जहाँ जिस किसी में जहाँ कहीं भी विशेषता दिखे वह हमें प्रभु की ही दिखनी चाहिए । इस तथ्य को समझाने के लिए प्रभु ने अनेक तरह से अपनी विभूतियां बहुत ही संक्षिप्त रूप में बताई है ।
314. प्रभु की विभूतियों के समझने का फल यह होता है कि प्रभु में हमारी दृढ़ भक्ति जागृत होती है ।
315. संसार में विशेषताएं और विलक्षणता वास्तव में प्रभु से ही आती हैं । अंश में वही चीज आती है जो अंशी में हो । इसलिए हमें जो विशेषता, सुंदरता, सामर्थ्य और विलक्षणता संसार में दिखती है वह सब प्रभु की है और संसार में ऐसा देखने पर हमें प्रभु के ही दर्शन सर्वत्र होने चाहिए ।
316. सभी विभूतियों में प्रभु ही हैं । प्रभु के इस कथन का तात्पर्य अपनी तरफ दृष्टि करवाने में है क्योंकि सब कुछ प्रभु ही तो हैं ।
317. जहाँ कहीं जो कुछ भी विशेषता दिखती है वह सब प्रभु की ही है, ऐसा मानने से प्रभु के साथ योग यानी संबंध का अनुभव हो जाता है । इसलिए ही दसवें अध्याय को विभूतियोग कहा गया है । प्रभु सवर्त्र व्याप्त हैं यही इस अध्याय का संदेश है ।
318. प्रभु इतने विलक्षण और महान हैं फिर भी अपने भक्त श्री अर्जुनजी से कितना स्नेह, कितनी आत्मीयता रखते हैं और जैसा श्री अर्जुनजी कहते हैं वैसा ही करते हैं जो-जो श्री अर्जुनजी पूछते हैं उसका उत्तर देते हैं ।
319. प्रभु संपूर्ण शक्तियों, कलाओं, विद्याओं आदि के विलक्षण भंडार हैं ।
320. मनुष्य की बड़ी भूल होती है कि मिली हुई चीज को अपनी मान लेता है और जहाँ से मिली है उसे देने वाले प्रभु की तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं जाती । मनुष्य मिली हुई वस्तु को जैसे बुद्धि, आरोग्य, संपत्ति, कीर्ति को देखता है पर देने वाले प्रभु को नहीं देख पाता ।
321. मनुष्य संसार में कार्य को देखता है पर जिसकी शक्ति से कार्य हुआ है उन प्रभु को नहीं देख पाता ।
322. प्रभु की संपूर्ण क्रिया में उनकी कृपा-ही-कृपा भरी रहती है पर मनुष्य उसे पहचान नहीं पाता ।
323. प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में जो वचन कहें हैं वह केवल जीव पर कृपा करने के लिए ही कहें हैं । केवल प्रभु की कृपा के अलावा अन्य कोई प्रभु का हेतु नहीं है ।
324. प्रभु का विश्वरूप सुनने पर एक साथ चार भाव मन में आते हैं – आश्चर्य, प्रेम, भय और आदर ।
325. विश्वरूप दिखाकर श्री अर्जुनजी को प्रभु बताते हैं कि सब कुछ करने वाले प्रभु ही हैं । श्री अर्जुनजी को प्रभु के श्रीहाथों का यंत्र बनकर काम करना है क्योंकि जो होना है वह प्रभु की योजना के अनुसार ही होना निश्चित है ।
326. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु स्पष्ट कहते हैं कि जीव को केवल प्रभु की भक्ति करने की ही आवश्यकता है ।
327. श्रीमद् भगवद् गीताजी का एकादश अध्याय विश्वरूप का यानी अदभुत रस का अध्याय है । प्रभु ने अपना व्यापक विश्वरूप का दर्शन श्री अर्जुनजी को करवा कर उनके मन में अत्यंत आश्चर्य के कारण अदभुत रस उत्पन्न कर दिया ।
328. प्रभु की उदारता परम स्वतंत्र है यानी याचक की इच्छा पर निर्भर नहीं है । याचक प्रभु की उदारता चाहेगा तभी प्रभु उदार होंगे, ऐसा नहीं है । प्रभु तो स्वभाव से ही परम उदार हैं ।
329. प्रभु की इच्छा पर छोड़ने से साधक को जितना लाभ होता है उतनी अपनी इच्छा प्रभु के सामने रखने पर नहीं होता ।
330. प्रभु के विराट विश्वरूप को आँखों से नहीं देखा जा सकता, कानों से नहीं सुना जा सकता, मन से उसका चिंतन नहीं किया जा सकता और बुद्धि से उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ।
331. श्री अर्जुनजी का पूछना तो मात्र निमित्त बना, सत्य यह है कि प्रभु ने अपनी तरफ से कृपा करके लोक कल्याणार्थ श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश दिया ।
332. प्रभु अत्यधिक कृपालु और दयालु हैं ।
333. प्रभु में अपार पराक्रम, सामर्थ्य, बल और तेज है । प्रभु अनंत हैं और असीम शक्तिशाली हैं ।
334. प्रभु का विराट विश्वरूप अदभुत, विलक्षण, अलौकिक और आश्चर्यजनक था ।
335. प्रभु का विराट विश्वरूप असीम है जिसको देखने के लिए श्री अर्जुनजी को प्रभु द्वारा प्रदान दिव्य दृष्टि भी श्री अर्जुनजी को बहुत सीमित प्रतीत हुई । ऐसा इसलिए कि श्री अर्जुनजी की दिव्य दृष्टि भी जहाँ तक जाती थी उन्हें वहाँ से भी आगे प्रभु का विराट विश्वरूप दिखता था ।
336. प्रभु की एक-एक रोमावली में अनंत कोटि ब्रह्मांड विराजमान हैं ।
337. प्रभु की महिमा को सर्वथा कोई जान ही नहीं सकता क्योंकि प्रभु की महिमा अनंत है ।
338. हम जितनी कृपा प्रभु की अपने ऊपर मानते हैं उससे कई गुना अधिक कृपा प्रभु हम पर करते हैं । प्रभु की जीव पर कृपा अपार और असीम होती है और उसको मानने का सामर्थ्य जीव के पास सीमित है ।
339. जीव को चाहिए कि प्रभु की कृपा को सीमा में न बांधे और न ही कृपा की गणना करे ।
340. हमारी भक्ति ठीक चल रही है इसलिए प्रभु का हमारे ऊपर राजी होना भी एक योग होता है ।
341. सुख से स्वतः ही अरुचि हो जाए इसलिए सुख का साधक को सावधानी पूर्वक असंग करना चाहिए तभी हम वास्तविक प्रभु तत्व का अनुभव कर पाएंगे ।
342. वही मनुष्य श्रेष्ठ है जिसे प्रभु को देखने की, प्रभु को जानने की वास्तविक इच्छा होती है ।
343. प्रभु नित्य हैं इसलिए प्रभु की कृपा भी नित्य होती रहती है ।
344. प्रभु के दर्शन की नित्य लालसा रखना अनन्य भक्ति है ।
345. जीवन में नित्य निरंतर प्रभु की प्राप्ति की ही लालसा रहे और दूसरी कोई लालसा न हो ।
346. प्रभु का दर्शन प्रभु की कृपा से ही हो सकता है, जीव की किसी योग्यता या पुरुषार्थ से नहीं हो सकता ।
347. अनन्य भक्ति का अर्थ है केवल प्रभु का ही आसरा, सहारा, आशा और विश्वास । ऐसे अनन्य भक्तों के लिए प्रभु सदैव ही सुलभ रहते हैं ।
348. प्रभु की कृपा सदैव भक्त पर उमड़ती ही रहती है ।
349. साधक की एक बहुत बड़ी भूल यह होती है कि वह पारमार्थिक क्रिया करते समय तो अपना संबंध प्रभु से मानता है पर व्यावहारिक क्रिया करते समय अपना संबंध संसार से मान लेता है । जबकि उसे व्यावहारिक क्रिया करते समय भी अपना संबंध केवल प्रभु से ही मानना चाहिए ।
350. हमारे जीवन का एकमात्र उद्देश्य प्रभु प्राप्ति को हमें जीवन में ठीक-ठीक पहचान लेना चाहिए ।
351. भक्ति मार्ग पर चले साधक का रक्षण करने के लिए प्रभु सदैव तैयार रहते हैं ।
352. प्रभु के लिए प्रेम से भर जाना, इसी का नाम भक्ति है ।
353. प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त मुझे मेरे प्राणों की अपेक्षा भी अधिक प्रिय लगते हैं ।
354. प्रभु की शरण में जाने की क्रिया को ही भक्ति कहते हैं ।
355. जब भक्त प्रभु के बिना नहीं रह सकता तो प्रभु भी उस भक्त के बिना नहीं रह सकते । जब प्रभु अपने भक्त का वियोग नहीं सह पाते तो प्रभु उस भक्त को मिल जाते हैं ।
356. भक्त मानता है कि प्रभु का उसके लिए विधान सदैव मंगलमय ही होता है ।
357. संसार के साथ कभी संयोग था नहीं, है नहीं, रहेगा नहीं और रह सकता भी नहीं ।
358. भक्त की प्रभु में अत्यधिक प्रियता रहती है और रहनी भी चाहिए तभी भक्ति सफल मानी जाएगी ।
359. वास्तव में जीव का प्रभु के प्रति स्वाभाविक प्रेम है । पर जब तक वह संसार से अपनी भूल के कारण अपनापन का संबंध रखता है तब तक उसमें प्रभु के लिए प्रेम प्रकट नहीं होता ।
360. हमारी संपूर्ण क्रिया प्रभु की प्रियता के लिए ही होनी चाहिए ।
361. भक्त पर प्रसन्न होकर प्रभु उसे अपना प्रेम प्रदान करते हैं । भक्त उस प्रेम को वापस प्रभु से और ज्यादा प्रीति करने में लगा देता है । प्रभु उसकी इस क्रिया से आनंदित होते हैं और पुनः उसे और ज्यादा प्रेम प्रदान करते हैं । भक्त पुनः उसे प्रभु से और भी अधिक प्रीति करने में लगा देता है । इस प्रकार भक्त और प्रभु के बीच प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम का आदान-प्रदान होता रहता है ।
362. जीव में प्रभु प्राप्ति की तीव्र उत्कंठा और व्याकुलता होनी चाहिए ।
363. प्रभु ने भक्ति मार्ग में अभय होने का भाव बताया है । जैसे एक बालक अपनी माँ को देखकर अभय हो जाता है वैसे ही श्री प्रह्लादजी की तरह भक्ति मार्ग का साधक प्रभु को सब जगह देखता है और इसलिए आरंभ से ही अभय हो जाता है ।
364. अपने मन का संबंध केवल प्रभु से ही हो, दूसरे किसी के साथ किंचित मात्र भी अपने मन का संबंध न हो, यह प्रभु की अव्यभिचारिणी भक्ति होती है ।
365. भक्ति का अर्थ है प्रभु से परम प्रेम करना ।
366. प्राणी पृथ्वी पर हो, समुद्र में हो, आकाश में हो, स्वर्ग में हो अथवा त्रिलोकी में कहीं भी हो, हर छोटे-से-छोटे एवं बड़े-से-बड़े प्राणी का पालन पोषण प्रभु ही करते हैं ।
367. प्रभु हमारे जितने नजदीक हैं उतना दूसरा कोई भी नहीं है ।
368. प्रभु से विमुख होने पर अंधकार स्वरूप संसार सर्वत्र दिखाई देने लग जाता है और तरह-तरह के भय सताने लग जाते हैं ।
369. मनुष्य जन्म प्राप्त होने पर केवल प्रभु प्राप्ति का ही उद्देश्य रहे, भोग और संग्रह का उद्देश्य बिलकुल न रहे, इसी दृष्टिकोण को भक्तियोग कहते हैं ।
370. प्रभु की भक्ति करना अतीव सरल साधन है ।
371. प्रभु का अंश होने के कारण जीव का एकमात्र वास्तविक संबंध केवल प्रभु के साथ ही है ।
372. लंबे रास्ते का तो अंत आ सकता है पर गोल रास्ते का अंत कैसे आएगा ? हम मनुष्य कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल घूमते हुए जन्म के बाद मरण और मरण के बाद फिर जन्म पाते है, यह गोल रास्ता ही तो है ।
373. मनुष्य के अतिरिक्त दूसरी सभी योनियां भोग योनियां ही हैं । मनुष्य योनि में किए हुए पाप और पुण्य का फल भोगने के लिए ही मनुष्य को दूसरी योनियों में जाना पड़ता है । मुक्त होने का अधिकार और अवसर केवल और केवल मनुष्य शरीर में ही है ।
374. यह नियम है कि जहाँ से बंधन होता है वहीं से छुटकारा भी होता है । मनुष्य योनि से ही जीव बंधता है अतः मनुष्य योनि से ही वह मुक्त हो सकता है ।
375. संग्रह और भोगों के परिणाम पर दृष्टि रखने की योग्यता भी मनुष्य को ही होती है । जो मनुष्य होकर भी संग्रह और भोगों के घातक परिणामों पर दृष्टि नहीं रखता और भोग और संग्रह में लगा रहता है, शास्त्र कहते हैं कि उसे पशु कहना भी मानो पशु योनि की निंदा करने जैसा ही है ।
376. कितना दुर्भाग्य है मनुष्य का कि मनुष्य भक्ति नहीं करके केवल सांसारिक भोगों के कारण पशु योनि की तरफ जा रहा है और पशु अपने कर्मफल भोगकर मनुष्य योनि की तरफ आ रहे हैं ।
377. सांसारिक स्त्री, पुत्र, मान, बड़ाई, धन, संपत्ति, आयु, निरोगता आदि कितने ही प्राप्त हो जाएं, यहाँ तक संसार के समस्त भोग भी एक मनुष्य को मिल जाएं तो भी उससे उस मनुष्य की तृप्ति नहीं हो सकती । तृप्ति का एकमात्र उपाय है - भगवत् भक्ति ।
378. पाप से कमाया धन तो शरीर के साथ यहीं छूट जाएगा किंतु उस धन के लिए कितने झूठ, कपट, बेईमानी, चोरी आदि पाप तो मृत्यु के बाद भी जीव से चिपके रहेंगे और परलोक में भी जीव की दुर्गति ही करेंगे ।
379. शरीर छोड़ते समय धन तिजोरी में पड़ा रह जाता है, स्त्री दरवाजे तक साथ देती है, पुत्र श्मशान तक साथ देता है, शरीर चिता तक साथ देता है पर जीव के द्वारा की हुई प्रभु की भक्ति जीव के साथ-साथ जाती है और उस जीव का परलोक में भी उद्धार करवाती है ।
380. मैं केवल प्रभु का ही हूँ और केवल प्रभु ही एकमात्र मेरे हैं, इस वास्तविकता पर दृढ़ता के साथ जीवन में डटे रहना चाहिए ।
381. संसार से संबंध बना रहने से प्रभु से अपने संबंध में ढिलाई आती है और जप, कीर्तन, स्वाध्याय आदि सब कुछ करने पर भी कोई विशेष लाभ नहीं होता । इसलिए प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में स्पष्ट कहा है कि साधक को पहले मन से संसार से संबंध विच्छेद करने को जीवन में मुख्यता देनी चाहिए ।
382. जीव प्रभु का अंश है । संसार से संबंध मान लेने के कारण वह अपने अंशी (प्रभु) के साथ अपना नित्य संबंध को भूल गया है ।
383. प्रभु अपनी कृपा से ही मिलते हैं । उन्हें किसी भी साधन से प्राप्त नहीं किया जा सकता । साधन केवल हमें प्रभु की कृपा दिलाने में सहायक बनता है ।
384. जो साधक जग जाता है उसका फिर संसार के साथ कभी मन से संबंध होता नहीं और प्रभु से उसका मन से संबंध कभी छूटता नहीं ।
385. वास्तव में अपने मन से संसार से संबंध विच्छेद होने पर ही प्रभु की अनुभूति जीवन में हो सकती है ।
386. प्रभु के सिवाय अन्य कोई भी आश्रय जीवन में टिकने वाला नहीं है ।
387. प्रभु के अलावा अन्य का आश्रय वास्तव में आश्रय है ही नहीं । अन्य का आश्रय लेना तो वैसा ही है जैसे समुद्र में डूबते हुए व्यक्ति के लिए मगरमच्छ का आश्रय लेना है ।
388. मनुष्य को विनाशी संसार का आश्रय न लेकर अविनाशी प्रभु का ही आश्रय लेना चाहिए ।
389. यह भाव जीवन में दृढ़ होना चाहिए कि मैं केवल भगवान का हूँ और केवल भगवान के लिए ही हूँ ।
390. एक कुत्ते के वमन को खाने में जितनी घृणा होती है उतनी ही घृणा भक्ति करने वाले साधक को संसार के विषयों को भोगने में होनी चाहिए ।
391. हमारा अपनापन केवल और केवल प्रभु से ही होना चाहिए ।
392. प्रभु में आकर्षण होना “प्रेम” है और संसार में आकर्षण होना “आसक्ति” कहलाती है ।
393. प्रभु के पारायण होने के कारण भक्त की सांसारिक भोगों में आसक्ति नहीं रहती ।
394. दो बातें सदैव ध्यान रखनी चाहिए । पहला, मैं केवल प्रभु का ही हूँ और केवल प्रभु ही मेरे हैं और दूसरा, मैं संसार का नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है । परंतु हम इसका उल्टा करते हैं ।
395. भक्त का अनुभव होता है कि शरीर, इंद्रियां, मन और बुद्धि सभी प्रभु के ही हैं । प्रभु के सिवाय उसका अपना कुछ भी नहीं है ।
396. जीवन में कामनाओं के रहते प्रभु कभी भी नहीं मिल सकते ।
397. कामनाओं से निवृत्ति होनी चाहिए और उनकी पूर्ति की चेष्टा नहीं करनी चाहिए ।
398. हम प्रभु के अंश हैं इसलिए प्रभु का जो धाम है वही हमारा असली घर है । हमें मनुष्य जीवन में ऐसा प्रयास करना चाहिए कि हमें हमारे घर यानी प्रभु के धाम की प्राप्ति हो जाए, जहाँ से फिर हमें संसार में लौटकर नहीं आना पड़े । जब तक हम हमारे घर यानी प्रभु के धाम नहीं पहुँचेंगे तब तक मुसाफिर की तरह अनेक योनियों में घूमते ही रहेंगे । विभिन्न योनियों में घूमते रहना और भटकना तभी बंद होगा जब हम अपने असली घर यानी प्रभु के धाम पहुँच जाएंगे ।
399. केवल भक्ति मार्ग के द्वारा ही प्रभु के धाम की प्राप्ति बताई गई है । यह भक्ति की विशेषता है कि हम केवल और केवल भक्ति से ही प्रभु के धाम पहुँच सकते हैं ।
400. जीव के पतन को देखकर प्रभु भी दुःखी होते हैं क्योंकि जीव को प्रभु के पास आने का पूरा अधिकार था पर वह प्रभु को प्राप्त किए बिना अपने पाप कर्मों के कारण नर्क चला गया ।
401. प्रभु सदैव जीव को अपनी ओर खींचते ही रहते हैं, यह प्रभु की कितनी बड़ी अहेतु की कृपा और उदारता है ।
402. धन, संपत्ति, सांसारिक पदार्थ जीवन में कितने भी क्यों न हम प्राप्त कर लें पर अंत में या तो वे नहीं रहेंगे अथवा हम नहीं रहेंगे ।
403. जीव जितना संसार के नाशवान पदार्थों को महत्व देता है उतना ही वह पतन की तरफ जाता है और जितना वह अविनाशी प्रभु को जीवन में महत्व देता है उतना ही वह ऊँ‍चा उठता जाता है ।
404. जीव जिनका अंश है उन सर्वोपरि प्रभु को प्राप्त करने में ही उसके जीवन का सबसे बड़ा लाभ छिपा हुआ है ।
405. प्रभु अपने भक्तों को कितना बड़ा मान देते हैं कि प्रभु कहते हैं कि मैं तो मेरे भक्तों का दास हूँ और भक्त मेरे मुकुटमणि हैं । प्रभु आगे कहते हैं कि मैं स्वतंत्र नहीं हूँ और अपने भक्तों के पराधीन हूँ । प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्तजन मुझे अनन्य रूप से प्यारे हैं । प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्तों का मेरे हृदय पर पूर्ण अधिकार होता है । क्या कोई सांसारिक व्यक्ति या पदार्थ हमें इतनी बड़ाई दे सकता है ?
406. प्रभु जैसी परिस्थिति में हमें रखें, वैसे रखें पर हम कभी भी, किसी भी परिस्थिति में प्रभु को नहीं भूलें ।
407. तीन बातें जीवन में सदा याद रखनी चाहिए और माननी चाहिए । पहला, सिर्फ प्रभु ही मेरे हैं दूसरा, मैं केवल प्रभु का ही हूँ और तीसरा, जो कुछ भी संसार में है सब कुछ प्रभु का ही है ।
408. जैसे ब्राह्मणदेव को गौ-माता दान देने पर हम चारा-पानी तो उन गौ-माता को दे सकते हैं पर उन गौ-माता का दूध पीने का हमें अधिकार नहीं है । वैसे ही प्रभु से मिले मनुष्य शरीर का सत्कर्म में सदुपयोग तो हम कर सकते हैं पर उससे भोग भोगने का अधिकार हमें नहीं है ।
409. जैसे स्वप्न में जल पीने से प्यास नहीं मिटती वैसे ही जीवन में भोग भोगते रहने से कभी शांति नहीं मिलती ।
410. संसार से संबंध जोड़कर मनुष्य चाहता तो सुख है पर पाता दुःख-ही-दुःख है ।
411. संपूर्ण ब्रह्मांड की संपूर्ण शक्तियों के मूल प्रभु ही हैं ।
412. रुपयों को जीवन में महत्व देने वाला व्यक्ति प्रभु के महत्व को समझ ही नहीं सकता ।
413. प्रभु उन्हें कहते हैं जो सब समय हों, सबमें हों, सबके हों, सर्वसामर्थ्य हों, परम दयालु हों और अद्वितीय हों ।
414. प्रभु का जीवन में जितना-जितना विश्वास होता जाता है और प्रभु पर जितने-जितने आश्रित होते चले जाते हैं उतना-उतना हम जीवन में अभय होते चले जाते हैं ।
415. गोदान, भूमिदान, स्वर्णदान, अन्नदान, जलदान, वस्त्रदान में अभयदान श्रेष्ठ है । श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवद् गीताजी और श्री रामचरितमानसजी आदि श्रीग्रंथों के द्वारा प्रभु की भक्ति जगाकर जीव का कल्याण करना और उस जीव को संसार और मृत्यु के भय से मुक्त करना सर्वश्रेष्ठ अभयदान है ।
416. संसार से विमुख हो जाना ही असली त्याग है ।
417. बाहर के त्याग की अपेक्षा भीतर की कामना का त्याग श्रेष्ठ है क्योंकि कामना का सर्वथा त्याग होने पर तत्काल शांति की प्राप्ति होती है ।
418. अनुकूलता आने पर हमारे पुराने पुण्य का नाश होता है परंतु प्रतिकूलता आने पर हमारे पुराने पापों का नाश होता है । इस तथ्य को समझने से जीवन में प्रतिकूलता में भी स्वतः ही शांति बनी रहती है ।
419. भक्त लोग प्रतिकूल परिस्थिति को भेजना प्रभु की “कृपा” मानते हैं और अनुकूल परिस्थिति को भेजना प्रभु की “दया” मानते हैं ।
420. भक्ति करने वाले स्त्री और पुरुष साधक को मनुष्य तो क्या यहाँ तक जंतुओं की भी काम विषयक चेष्टा कभी नहीं देखनी चाहिए । यदि जीवन में दिख जाए तो ऐसा विचार करना चाहिए कि यह तो बिलकुल चौरासी लाख योनियों में जाने का रास्ता है ।
421. शास्त्र और लोक मर्यादा के विरुद्ध कर्म करने में लज्जा आनी चाहिए । लज्जा जीवन में होने पर साधक बुरे कर्मों से बच जाता है और उसका आचरण ठीक बना रहता है ।
422. हमें दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि हम अकेले नहीं है, चाहे हम गहन जंगल में ही क्यों न हों । हमारे साथ हमारे प्रभु हैं जो सब तरह से हमारी रक्षा करेंगे ।
423. प्रभु से इतना प्रेम हो जाना चाहिए कि प्रभु हमें अपने प्राणों से भी प्यारे लगने लगे । भक्तों को प्रभु उनके प्राणों से भी कोटि गुना अधिक प्यारे लगते हैं । इसलिए भक्त प्रभु को प्राणनाथ, प्राणेश्वर, प्राणप्रिय कह कर पुकारते हैं ।
424. भक्ति के अंतर्गत मुक्ति के सभी साधन आ जाते हैं ।
425. देवतागण भी निरंतर यही कहते हैं कि जिन्होंने भारतवर्ष में जन्म लिया वे जन हम देवतागणों की अपेक्षा भी अधिक बड़भागी हैं क्योंकि भारतवर्ष प्रभु की भक्तियोग वाली पुण्य भूमि है । श्रीहरि जब प्रसन्न होते हैं तभी परम सौभाग्य से भारतवर्ष की भूमि में जन्म मिलता है ।
426. प्रभु ने अत्यंत कृपा करके जीव को मनुष्य शरीर दिया है जिससे वह अपना उद्धार करने का मौका न चूके ।
427. अगर भोजन का ग्रास प्रभु का नाम लेकर ही मुख में डाला जाए तो भोजन भी भजन बन जाता है । भोजन करते समय ग्रास-ग्रास में प्रभु नाम का जाप करते रहना चाहिए । इससे अन्न के दोष तो दूर होते ही हैं और वह भोजन प्रभु को अर्पण हो जाता है जिससे वह प्रभु का प्रसाद बन जाता है ।
428. सर्वोत्तम भोजन तो प्रभु को समर्पित भोजन यानी प्रभु का उच्छिष्ट (प्रसाद) ही है ।
429. प्रभु के प्रभाव, सामर्थ्य, दयालुता, सर्वव्यापकता पर सदैव जीवन में अटल विश्वास होना चाहिए ।
430. जिसके भीतर एक प्रभु का ही आसरा है, एक प्रभु का ही भरोसा है, एक प्रभु का ही चिंतन है और एक प्रभु की तरफ चलने का ही निश्चय है उसका कल्याण जगत में कोई नहीं रोक सकता ।
431. सभी जीवों का निश्चित कल्याण हो जाए, इस उद्देश्य को लेकर श्रीमद् भगवद् गीताजी का प्रभु उपदेश करते हैं ।
432. जीवन की सभी क्रियाएं प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही करनी चाहिए ।
433. जीवन के सारे कर्म प्रभु के परमधाम वापस जाने के उद्देश्य से किए जाने चाहिए । यही जीवन की परम उपलब्धि भी है ।
434. भक्ति ही जीवन का एकमात्र परम लक्ष्य होना चाहिए ।
435. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में कहा गया है कि जिस कार्य से भगवत् भक्ति को बढ़ाने में लाभ मिले उसे जीवन में सहर्ष स्वीकार करना चाहिए ।
436. श्रीमद् भगवद् गीताजी के शरणागति के श्लोक का महत्व देखें । श्री महाभारतजी के सवा लाख श्लोक का सार श्रीमद् भगवद् गीताजी के सात सौ श्लोकों में आ गया । पुनः उन सात सौ श्लोकों का सार श्रीमद् भगवद् गीताजी के शरणागति के श्लोक में आ गया ।
437. श्रीमद् भगवद् गीताजी रूपी मंदिर का अठारहवाँ अध्याय कलश रूप है । मंदिर में कलश चढ़ा देने के बाद मंदिर का निर्माण पूर्ण माना जाता है ।
438. संसार के संबंध का सर्वथा के लिए विच्छेद हो जाना सात्विक त्याग कहलाता है ।
439. भीतर का त्याग ही असली त्याग है । भीतर का त्याग बाहर के त्याग से बहुत बड़ा है ।
440. सत्संग, प्रभु कथा, भक्त चरित्र सुनने से किसी का वैराग्य हो जाए और वह प्रभु को पाने के लिए आवश्यक कर्तव्य कर्म को भी छोड़ देता है और केवल भगवान के भजन में लग जाता है तो उसका त्याग सात्विक है । प्रभु को प्राप्त करना ही मनुष्य जीवन का एकमात्र ध्येय है । अतः उस ध्येय की सिद्धि के लिए कर्तव्य कर्म का त्याग करना वास्तव में कर्तव्य कर्म का त्याग नहीं प्रत्युत असली कर्तव्य को करना है ।
441. भक्ति में प्रभु के साथ संबंध जोड़ना ही मुख्य बात है । इसलिए भक्त को जप, ध्यान, कीर्तन आदि साधन कर्तव्य समझकर नहीं अपितु प्रभु यानी अपने प्रियतम का काम समझ कर उनकी प्रसन्नता के लिए करना चाहिए । इन साधनों से उसके मन में प्रभु के लिए प्रेम का उदय होना चाहिए ।
442. भक्त को प्रभु का प्रत्येक साधन यानी नाम जप, रूप आसक्ति, गुणानुवाद, श्रीलीला चिंतन आदि प्रिय लगनी चाहिए ।
443. स्त्री, पुत्र, परिवार, भोजन और धन-संपत्ति में तो संतोष करना चाहिए पर स्वाध्याय, पूजा-पाठ, नाम जप, कीर्तन, सत्संग में कभी भी संतोष नहीं करना चाहिए पर हम ठीक इसका उल्टा करते हैं ।
444. जो मनुष्य प्रभु की आज्ञा के अनुसार, प्रभु की प्रसन्नता के लिए और प्रभु को सर्वथा समर्पित करके कार्य करता है उस भक्त के प्रभु भी भक्त बन जाते हैं ।
445. संसार में कोई भी नौकर को अपना मालिक नहीं बनाता परंतु प्रभु अपने शरणागत भक्त को अपना मालिक बना लेते हैं । ऐसी उदारता केवल और केवल प्रभु में ही है ।
446. हमें अपने कर्म से प्राप्त होने वाले फल को प्रभु को समर्पित कर देना चाहिए ।
447. जब कोई भगवत् संबंधी साधन जैसे जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदि करता है तब उसका वह कर्म भक्तियोग बन जाता है ।
448. जिनका उद्देश्य केवल प्रभु हैं, संसार के भोग और संग्रह आदि नहीं, उनके लिए सत्संग, स्वाध्याय, जप, ध्यान, कथा, कीर्तन आदि भगवत् संबंधी कार्य ही जीवन में मुख्य हो जाते हैं ।
449. प्रभु का अंश होने के कारण सभी जीव प्रभु प्राप्ति के लिए पूर्ण रूप से अधिकारी हैं ।
450. प्रभु का सच्चा भक्त चाहे किसी भी कुल का क्यों न हो वह भक्तिहीन विद्वान से श्रेष्ठ है ।
451. शास्त्र कहते हैं कि श्रीहरि भक्ति करने में लीन रहने वाला एक चांडाल भी श्रीहरि भक्ति से रहित उच्च कुल में उत्पन्न होने वाले जीव से श्रेष्ठ है । भक्ति का इतना महत्व जीवन में है ।
452. किसी भी जाति अथवा समुदाय आदि का कोई भी जीव क्यों न हो सभी प्रभु की भक्ति के अधिकारी हैं क्योंकि सभी प्रभु के अपने जन हैं ।
453. प्रभु ने श्री अर्जुनजी से कहा कि कोई भी मनुष्य अगर श्रीमद् भगवद् गीताजी के संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं (प्रभु) ज्ञानयज्ञ से पूजित हो जाऊँगा । इससे यह सिद्ध होता है कि श्रीमद् भगवद् गीताजी का पाठ करना, अध्ययन करना - इस क्रिया को प्रभु अपना पूजन मान लेते हैं ।
454. मनुष्य जन्म को मुक्ति का द्वार कहा गया है ।
455. अपना उद्धार करने के योग्य केवल मनुष्य शरीर ही है । यही उद्धार के लिए एकमात्र और सबसे योग्य शरीर है ।
456. तभी तक कर्म करना चाहिए जब तक भोगों से वैराग्य न हो जाए अथवा जब तक प्रभु की श्रीलीला, कथा के श्रवण और कीर्तन आदि में श्रद्धा न हो जाए । जब भक्ति के संस्कार जीवन में जागृत हो जाएं तो फिर भक्ति मार्ग में ही चलना चाहिए ।
457. एकांत में साधन अधिक होगा, मन प्रभु में अच्छी तरह से लगेगा । इसलिए एकांत सेवन करना चाहिए ।
458. प्रभु के लिए प्रतिक्षण वर्धमान यानी बढ़ाने वाली एक विलक्षण, आकर्षक, खिंचाव और अनुराग हो जाए तो उसे परा भक्ति कहते हैं ।
459. जिसके भीतर भक्ति के संस्कार होते हैं उस पर हुई भगवत् कृपा उससे मुक्ति से संतुष्ट नहीं होने देती प्रत्युत मुक्ति के रस को भी फीका कर देने वाली प्रभु प्रेम का रस प्रदान करती है ।
460. भक्ति योग में प्रभु से अभिन्नता होने का प्रतिक्षण वर्धमान परमानंद यानी अनंत आनंद मिलता रहता है ।
461. निजी इंद्रिय तृप्ति के लिए किया गया कोई भी कर्म बंधन का कारण बनता है ।
462. प्रेमाभक्ति के चार प्रधान भाव हैं – दास, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य ।
463. प्रभु की कृपा में जो शक्ति है वह शक्ति किसी भी साधन में नहीं है ।
464. भक्त का काम केवल प्रभु का आश्रय लेना है और प्रभु का चिंतन करना है । फिर उसके सब काम प्रभु करते हैं । प्रभु उस पर विशेष कृपा करते हैं उसके जीवन से विघ्न, बाधाओं को दूर करते हैं और अंत में उसको अपनी प्राप्ति करवा देते हैं ।
465. अपने आपको प्रभु के श्रीहाथों की कठपुतली बनाकर रखना चाहिए ।
466. जब हम प्रभु की शरणागति ग्रहण करते हैं तब हमारे पास अपना कहने को कुछ भी नहीं बचता क्योंकि हमारे तो सिर्फ प्रभु ही हो जाते हैं ।
467. हमें दूसरे का सहारा तलाशने के बजाय केवल प्रभु की शरणागति लेनी चाहिए ।
468. प्रभु की शरण के अलावा कहीं भी हमारा किंचित मात्र भी हित होने वाला नहीं है ।
469. अन्य सभी योनियों में भी कामना पूर्ति करने का अवसर मिलता है पर कामना का त्याग करके प्रभु की प्राप्ति करने का अवसर केवल मनुष्य योनि में ही मिलता है ।
470. मनुष्य जन्म में प्रभु प्राप्ति करना और प्रभु का अत्यंत प्यारा बनना ही मनुष्य जन्म की परिपूर्ण सफलता है ।
471. प्रभु का श्रद्धापूर्वक स्मरण सदा जीवन में करते ही रहना चाहिए ।
472. हमें प्रभु का नित्य दास बनकर ही जीवन व्यतीत करना चाहिए ।
473. हमारे कानों में जब श्रीग्रंथ के शब्द प्रवेश करते हैं तो पाप तत्काल हमारे भीतर से निकल भागते हैं ।
474. श्रीमद् भगवद् गीताजी प्रभु की साक्षात वाणी है और इसलिए एक-एक शब्द शिक्षाप्रद हैं ।
475. प्रभु के सभी सद्गुण नित्य रहते हैं और जीव पर असीम कृपा करते रहते हैं ।
476. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु के श्रीवचन सुनकर श्री अर्जुनजी कृतकृत्य हो गए और विगत पाँच हजार से भी ज्यादा वर्षों से जो भी इसका श्रवण कर रहा है, अध्ययन कर रहा है, प्रचार कर रहा है, विवेचन कर रहा है, पाठ कर रहा है वे सब-के-सब कृतकृत्य होते आए हैं और आगे भी होते रहेंगे ।
477. निष्काम भजन, निरंतर भजन और गुप्त भजन - यह तीनों होना चाहिए तो जीवन में बहुत बड़ा लाभ मिलता है ।
478. भजन की उपयोगिता इस बात में है कि उससे प्रभु की प्रसन्नता हो ।
479. भक्त को सदैव अनुभव करना चाहिए कि प्रभु उसके साथ हैं ।
480. प्रभु सदैव हमारी रक्षा कर रहे हैं, यह भाव दृढ़ता से हमें अपने हृदय में धारण करके रखना चाहिए ।
481. जो वृत्ति, वस्तु प्रभु प्राप्ति के प्रतिकूल है उसका जीवन से तत्काल त्याग कर देना चाहिए ।
482. कुंदन, कंठा में हमें मूल्य सोने का ही मिलता है क्योंकि महत्व सोने का है । वैसे ही जीव के भीतर महत्व प्रभु रूपी आत्मा का ही है ।
483. जब तक भजन नहीं तब तक जीवन में परमानंद नहीं मिल सकता ।
484. प्रभु के अलावा संसार में सत्य अन्य कुछ भी नहीं है ।
485. एकमात्र प्रभु ही सभी रूपों में ब्रह्मांड में विराजमान हैं ।
486. अगर हमारी गलती प्रभु माफ नहीं करें तो हमारे द्वारा प्रभु प्राप्ति कतई संभव ही नहीं हो सकती ।
487. एकांत जिनका पवित्र होता है वे ही प्रभु की प्राप्ति कर सकते हैं ।
488. भक्त का पूरा बल भगवान का बल होता है ।
489. चारों तरफ से प्रभु की कृपा हमें घेरे हुए हैं, यह भावना सदैव अपने हृदय में रखनी चाहिए ।
490. जीवन में सबसे बड़ा अपराध प्रभु को भूल जाना ही है ।
491. सदा, सर्वदा और सर्वत्र प्रभु उपस्थित रहते हैं ।
492. पाप रूपी पहाड़ को नष्ट करने के लिए भगवत् नाम वज्र के समान है ।
493. हमारे ऊपर प्रभु की अपार कृपा है, इसका केवल चिंतन करने से ही हमारा कल्याण हो जाएगा ।
494. जैसे तिनके का कोई बल नहीं होता, हवा उसे उड़ाकर कहीं भी ले जाती है । वैसे ही प्रभु की कृपा हमें उड़ाकर प्रभु के श्रीकमलचरणों में ले जाएगी । शर्त यह है कि जैसे तिनके में कोई बल नहीं वैसे ही हमें भी अपना बल भूलना होगा ।
495. बिना भगवत् कृपा के प्रभु नाम जप में रुचि नहीं होती ।
496. प्रभु के नाम जप में अनंत सामर्थ्य है ।
497. प्रभु का एक-एक नाम हमें प्रभु तक पहुँचा देता है ।
498. जैसे मलिनता युक्त बच्चे की माँ को बच्चा ही दिखता है पर संसार को मलिनता दिखती है । वैसे ही प्रभु को शरणागत हुआ भक्त दिखता है, काम, क्रोध, मद, लोभ रूपी मलिनता जो उस जीव में है, वह नहीं दिखते ।
499. प्रभु को भुला देना, प्रभु को आवरण में छुपा देना, यह माया का कार्य होता है ।
500. भजन करके भगवत् प्राप्ति करना बहुत जरूरी है, नहीं तो जीवन में दुर्गति-ही-दुर्गति होगी ।
501. हमारे प्रेम को वस्तु, व्यक्ति और स्थान का स्पर्श नहीं होना चाहिए । सच्चा प्रेम केवल प्रभु के लिए ही होना चाहिए ।
502. प्रभु के नाम में प्रभु स्वयं विराजमान रहते हैं ।
503. अगर नाम जप में रुचि है तो अपने को बहुत भाग्यवान मानना चाहिए ।
504. समस्त शास्त्रों का सार यह है कि संसार का चिंतन छूटकर प्रभु का ही चिंतन हो ।
505. प्रभु के आश्रय का सही अर्थ यह है कि प्रभु में दृढ़ विश्वास होना ।
506. केवल प्रभु की चर्चा सुननी चाहिए तो बहुत जल्दी भक्ति हमारे जीवन में प्रकाशित हो जाएगी ।
507. संसार के सभी रिश्ते स्वार्थ पर ही आधारित होते हैं । स्वार्थ पूर्ति नहीं होने पर संसार का हर रिश्ता हमें त्याग देता है ।
508. प्रभु की कृपा भक्तों को सदैव घेरे रहती है ।
509. प्रभु के लिए ही भक्त अपने शरीर की सभी चेष्टाएं करता है ।
510. प्रभु की सेवा से बहुत बड़ा लाभ जीवन में हमें मिलता है ।
511. मृत्यु के समय एक पैसा, एक इंच भूमि, एक इंच कपड़ा, एक व्यक्ति भी हमारे साथ जाने वाला नहीं है । केवल हमारी की हुई भक्ति और भक्ति के अंतर्गत किया हुआ नाम जप ही साथ जाएगा ।
512. शास्त्रों में बताए सभी ऋणों से मुक्त होने के लिए प्रभु की शरणागति सबसे उत्तम उपाय हैं ।
513. प्रभु की प्राप्ति में प्रभु की कृपा ही काम करती है, हमारा किया हुआ साधन मात्र प्रभु की कृपा दिलाने का काम करता है ।
514. बहुत वर्षों की सांसे हमने भोगों में व्यर्थ कर दी, संग्रह में व्यर्थ कर दी । हमें सोचना चाहिए कि हमारे जीवन में बची हुई सांसे हम प्रभु को अर्पण करें ।
515. हमारा अपने ऊपर ही बहुत बड़ा उपकार हो जाएगा अगर हम प्रभु का नाम जप करने लगेंगे ।
516. कलियुग के लिए नाम जप की साधना बहुत ही सरल साधना है ।
517. जिन आँखों से प्रभु के लिए अश्रु निकलते हैं, प्रभु उसके हृदय में आसन लगाकर बैठ जाते हैं ।
518. प्रभु प्रेम में निकले अश्रु जल से प्रभु सबसे जल्दी प्रसन्न होते हैं ।
519. प्रभु का नाम लेते ही वह नाम प्रभु के हृदय में अंकित हो जाता है ।
520. प्रभु की शरणागति लेकर अगर जीवन का बोझ प्रभु के हवाले कर देंगे तो हम बहुत हल्के हो जाएंगे ।
521. प्रभु की कृपा की एक किरण ही हमारा उद्धार करने के लिए पर्याप्त है ।
522. मनुष्य शरीर मोक्ष प्राप्ति के लिए खुला हुआ द्वार है, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है ।
523. हमारा मन प्रभु के चिंतन के अलावा कुछ अन्य चिंतन के लिए राजी ही नहीं होना चाहिए, ऐसी स्थिति जीवन में कभी तो आनी चाहिए ।
524. हमें जीवन में प्रयत्न सुख के लिए नहीं बल्कि भगवत् प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए ।
525. संसार में सुख नहीं है, सुखाभाष है यानी सुख का आभास मात्र है ।
526. स्नेह, द्वेष, भय से जिसमें हमने मन लगाया वही हमें अब अगले जन्म में बनना पड़ेगा । इसलिए मन तो केवल प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही लगाना चाहिए ।
527. बुद्धिमान पुरुष वह है जो सांसारिक भोग भोगने में अपने जीवन को नहीं लगाता ।
528. मन को संसार से खींचकर उसे प्रभु की भक्ति में लगाना चाहिए ।
529. जहाँ कोई नहीं बचा सकता, वहाँ केवल प्रभु ही बचा सकते हैं ।
530. किसी भी सांसारिक भोग में सुख नहीं है, सिर्फ आभास है कि हमें सुख मिल रहा है । सुख से भी बहुत ऊँ‍चा आनंद और परमानंद तो केवल प्रभु की भक्ति में ही है ।
531. जो पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति, स्थान प्रभु को समर्पित हो जाता है वह धन्य हो जाता है ।
532. जिसमें प्रभु की चर्चा न हो ऐसी कोई भी वाणी का श्रवण नहीं करना चाहिए ।
533. भक्ति की प्राप्ति सत्संग से होती है और सत्संग प्रभु कृपा से ही मिलता है ।
534. भक्त को तो केवल प्रभु का ही एकमात्र सहारा होता है ।
535. जो प्रभु की भक्ति में लगा रहता है वही परम संत है, ऐसा श्री उद्धवजी से प्रभु कहते हैं ।
536. भक्त को अपने गुण का कदापि अभिमान नहीं होता क्योंकि उसमें पूर्ण दीनता होती है ।
537. तिरस्कार और पुरस्कार में एक भक्त सम रहता है ।
538. प्रभु के सानिध्य में जाने के लिए सत्संग से रोज उत्साह भी मिलता है और मार्गदर्शन भी मिलता है ।
539. सांसारिक विषयों में सुख खोजना मानो जीवन को बर्बाद कर देना है ।
540. एक माँ जितनी ममता अपने बच्चे पर रखती है उससे कोटि-कोटि गुना ज्यादा ममता प्रभु अपने भक्त पर रखते हैं ।
541. जिनके हृदय में अभिमान के कांटे भरे पड़े हैं वहाँ भक्ति महारानी कभी नहीं आती । भक्ति में अभिमान बहुत बड़ा बाधक तत्व है ।
542. प्रभु का निस्वार्थ और सच्चा प्रेमी भक्त मिलना आज कलियुग में बड़ा ही दुर्लभ है ।
543. प्रभु अपने चिंतन का सामर्थ्य हमें देते हैं, यह प्रभु की हमारे ऊपर सबसे बड़ी कृपा होती है ।
544. जीवनभर प्रभु का नाम जप किया तो अंतिम समय प्रभु का नाम हमें नहीं छोड़ता और स्वतः हमारे स्मरण में आकर हमारा उद्धार करवा देता है ।
545. भजन के लिए कभी प्रमाद स्थिति जीवन में नहीं होने देनी चाहिए क्योंकि प्रमाद स्थिति भजन नहीं होने देती ।
546. ढेर सारा प्रभु नाम रूपी धन इकट्ठा कर लेना चाहिए । वे हमारे पाप नष्ट करके हमें प्रभु के धाम में प्रवेश दिला देते हैं ।
547. कलियुग में बहुत दोष हैं पर प्रभु का नाम जप और कीर्तन इस युग में सबसे बड़े लाभ देने वाले साधन हैं ।
548. करोड़ों शास्त्रों के अध्ययन का सार भक्ति ही है ।
549. भजन के लिए जीवन में तड़प होनी चाहिए ।
550. भोग के चिंतन में सुख है, जो कि एक भ्रम है पर असल में भोग भोगने में सुख नहीं है बल्कि पतन ही है ।
551. शास्त्रों में मनुष्य शरीर दुर्लभ इसलिए कहा गया है क्योंकि इसी मनुष्य देह से ही भक्ति एकमात्र संभव है ।
552. प्रभु का यश कोटि-कोटि ब्रह्मांडों में व्याप्त है ।
553. कामना से युक्त जीव को प्रभु को प्राप्त करना बहुत कठिन होता है ।
554. प्रभु की कृपा से अगणित विपत्तियों और विघ्नों से भी प्रभु का भक्त कभी परास्त नहीं होता ।
555. कलियुग का प्रभाव सभी पर है, केवल प्रभु के सच्चे भक्तों पर ही इसका प्रभाव नहीं होता है और वे ही इससे बचे रह पाते हैं ।
556. शास्त्र कहते हैं कि कलियुग ने मनुष्य को पशु से भी नीचे गिरा दिया है ।
557. कलियुग का विष भक्त पर नहीं चढ़ पाता, यह प्रभु की भक्त पर असीम कृपा होती है ।
558. कलियुग पापों का घोर जंगल है और प्रभु का नाम अग्नि समान है जो पापों के घोर जंगल को जला देता है ।
559. अखिल ब्रह्मांडों के स्वामी प्रभु कभी भी अपने भक्त को अकेला नहीं छोड़ते ।
560. भक्त का अदृश्य रूप में प्रभु सदैव हाथ पकड़कर चलते हैं ।
561. प्रभु के अमृतमय नाम का जाप करना चाहिए ।
562. प्रभु की दृष्टि में प्रभु प्राप्ति के लिए भक्ति का साधन सबसे श्रेष्ठ है ।
563. प्रभु को समर्पित हो जाना यानी प्रभु की शरणागति लेना सबसे श्रेष्ठ होता है ।
564. सब प्रकार से बेपरवाह होकर प्रभु के श्रीकमलचरणों की शरण में चले जाना चाहिए ।
565. अपने को प्रभु को सौंप देना चाहिए, यह पूर्ण रूप से शरणागति लेने पर ही संभव होता है ।
566. प्रभु के शरणागत हो गए तो हमारी संपूर्ण साधना सिद्ध हो गई ।
567. एक शरणागत भक्त प्रभु के सिवाय प्रभु से कुछ भी नहीं चाहता ।
568. प्रभु कहते हैं कि जितना वे अपने भक्त से प्रेम करते हैं उतना वे स्वयं से भी नहीं करते ।
569. किसी से अपेक्षा नहीं रखने वाला और केवल प्रभु से अपेक्षा रखने वाला सच्चा शरणागत भक्त होता है ।
570. जैसे अग्नि काठ को भस्म कर देती है वैसे ही भक्ति उस भक्त के समस्त पापों को भस्म कर देती है ।
571. प्रभु को प्राप्त करने के लिए अनन्य भक्ति ही एकमात्र उपाय है ।
572. जो प्रभु का नित्य चिंतन करता है उसका चित्त एक-न-एक दिन प्रभु में तल्लीन हो जाता है ।
573. अपने चित्त को एकाग्रतापूर्वक प्रभु में ही लगा देना चाहिए ।
574. भोगों का संयोग होने पर बड़े-बड़े संयमी का संयम खत्म हो जाता है, प्रभु कृपा के कारण केवल भक्त ही बचा रह पाता है ।
575. संसार के भोगों का त्याग होने पर ही प्रभु से अनुराग होता है ।
576. बड़ी जोर की निष्ठा हमारे हृदय में प्रभु के लिए होनी चाहिए ।
577. विपत्ति में हमें केवल प्रभु ही याद आते हैं क्योंकि उस समय संभालने वाला और कोई नहीं होता ।
578. बिंदु मात्र भी आनंद संसार में नहीं है जो प्रभु की भक्ति में है ।
579. प्रभु पतित हृदय की भी पुकार सुनते हैं जो दुनिया में और कोई नहीं सुनता ।
580. जितना प्रभु नाम जप में पाप नाश की शक्ति है उतना पाप जीव कभी सपने में भी नहीं कर सकता ।
581. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु हमें हमारे मन का दान प्रभु को करने की बात कहते हैं ।
582. प्रभु के सिवाय किसी अन्य का कभी चिंतन ही नहीं करना चाहिए ।
583. भगवत् आश्रय में बहुत बड़ा बल होता है ।
584. साधन अगर उतना प्रबल नहीं है पर प्रभु का आश्रय अगर प्रबल हो तो उस जीव का कल्याण निश्चित है ।
585. प्रभु के मार्ग में आनंद-ही-आनंद है और संसार के मार्ग में दुःख-ही-दुःख है ।
586. संसार के आश्रय का त्याग करने के बाद ही प्रभु का पूर्ण आश्रय हमें प्राप्त होता है ।
587. भगवत् आश्रित की चूक और गलती को प्रभु तत्काल क्षमा कर देते हैं ।
588. माया इतना लुभावना खेल खेलती है कि माया से निवृत्ति प्रभु कृपा बिना संभव ही नहीं है ।
589. जब प्रभु देखते हैं कि यह जीव मेरा अनन्य हो गया तो प्रभु उस पर कृपा किए बिना रह ही नहीं सकते ।
590. प्रभु का एक कृपा कटाक्ष करोड़ों मोक्ष सुख को भी लघु कर देने वाला होता है ।
591. जीवन की बाजी हारा हुआ साधक ही प्रभु का आश्रय बहुत जल्दी ले पाता है ।
592. मन में सदा के लिए निश्चिंत, निर्भय और शोक रहित जीव तब होता है जब वह प्रभु के आश्रय में चला जाता है ।
593. प्रभु का रक्षा कवच हमेशा भक्त के साथ ही रहता है ।
594. प्रभु के पार्षद की दृष्टि प्रभु के भक्त पर सदैव होती है कि कहीं उस भक्त का अमंगल नहीं हो जाए । उदाहरण स्वरूप अजामिलजी के चरित्र में उन्होंने अपने पुत्र का नाम पुकारा पर वह प्रभु का नाम था इसलिए प्रभु के पार्षद की दृष्टि में वे तत्काल आ गए ।
595. प्रभु के नाम को पकड़ लिया तो प्रभु को दौड़कर हमारे हृदय में प्रकाशित होना ही पड़ेगा ।
596. जीवन में प्रभु प्राप्ति की ही केवल अभिलाषा होनी चाहिए ।
597. भाव से शून्य पुकार प्रभु नहीं सुनते और भावयुक्त पुकार सुनकर प्रभु तुरंत दौड़कर आते हैं ।
598. जो आनंद हम भोगों में खोज रहे हैं वह वहाँ है ही नहीं । आनंद तो केवल प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही है ।
599. अन्य योनियों में हम भक्ति करके प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकते । यह केवल और केवल मनुष्य योनि में ही संभव है ।
600. भक्ति नहीं करने पर ऐसे-ऐसे पाप हमसे हो जाते हैं जिसके कारण कल्पों तक हमें नर्क भोगना पड़ता है ।
601. मानव जीवन में प्रमाद स्थिति में कभी नहीं रहना चाहिए तभी भक्ति संभव हो पाएगी ।
602. केवल भक्ति से ही ऐसा संभव हो पाता है कि इस जन्म के बाद हमारा अगला जन्म न हो ।
603. भक्ति करने वाले के साथ प्रभु सदैव रहते हैं ।
604. भक्ति करने वाला माया के भवसागर को सहजता से पार कर लेता है ।
605. संसार में आवागमन के बीज को भक्ति सदैव के लिए नष्ट कर देती है ।
606. जीव जब तक प्रभु का नहीं हो जाता तब तक ही उसे संकट और विघ्न घेरे रहते हैं ।
607. केवल प्रभु ही हमें संसार के हर भय से अभयदान दे सकते हैं ।
608. जीवन में हर समय हमें अपने भजन को संभालकर रखना चाहिए ।
609. मन, वाणी और शरीर से किसी की हिंसा कभी नहीं करनी चाहिए ।
610. सभी धर्मों के सिद्धांतों का सार प्रभु की भक्ति ही है ।
611. प्रभु की भक्ति जीव के संसार में आवागमन चक्र को ही नष्ट कर देती है ।
612. हमारा मोह संसार, परिवार, धन, संपत्ति से हट जाए और मोह केवल प्रभु से हो जाए तो हमारा कल्याण निश्चित हो जाता है ।
613. संसार के विषयों से निर्मोह हो जाएं तभी हम भजन कर पाएंगे ।
614. पूर्व जन्म और इस जन्म के कर्म दोष प्रभु के भजन से नष्ट हो जाते हैं ।
615. कोई भी सांसारिक भोग एक सच्चे भक्त को आकर्षित नहीं कर पाता क्योंकि उनके आकर्षण का एकमात्र केंद्र प्रभु होते हैं ।
616. कर्म किया हुआ कल्पों तक संचित रहता है और उन्हें भोगकर ही काटना पड़ता है । दूसरा उपाय प्रभु की भक्ति करना है जिस कारण प्रभु उन्हें भस्म कर देते हैं ।
617. हमारे संचित पाप कर्म हमें घोर दंड देने के लिए उतावले खड़े रहते हैं ।
618. सांसारिक लोग व्यस्त होने पर सबसे पहले प्रभु को ही भूलते हैं ।
619. भजन में कभी भी प्रमाद नहीं करना चाहिए ।
620. घर और शरीर में कभी भी ममता नहीं रखनी चाहिए ।
621. संसार कभी भी हमारा नहीं हो सकता - यह सिद्धांत है ।
622. प्रभु की दिव्य शक्तियां प्रभु के आश्रित जीव की सदैव रक्षा और व्यवस्था करती रहती है ।
623. कलियुग के विकार हमें कभी स्पर्श नहीं कर पाते अगर हम प्रभु की भक्ति करते हैं ।
624. हम प्रभु की सेवा की जिम्मेदारी ले लें तो प्रभु हमारे पूरे जीवन की जिम्मेदारी ले लेते हैं ।
625. मन और इंद्रियों की जिद को हमें हराना चाहिए, उन्हें पूरी नहीं करनी चाहिए ।
626. इंद्रियों के लाड़, प्यार और दुलार को रोकना पड़ेगा तभी हम आध्यात्मिक उन्नति कर पाएंगे ।
627. भक्ति के अलावा अन्य साधन में इतनी ताकत नहीं कि वह हमें भगवत् प्राप्ति करवा दे ।
628. भक्ति ही प्रभु की अनुभूति तक हमें ले जाती है ।
629. पापों की निवृत्ति और अंतःकरण की शुद्धि केवल भक्ति से ही संभव है ।
630. निर्मल अंतःकरण की पवित्र स्थिति यह है कि केवल एक प्रभु का ही जीवन में स्मरण होता रहे ।
631. संसार के प्रपंचों से लड़ाई, अपने विकारों से लड़ाई केवल प्रभु कृपा से ही हम लड़ सकते हैं और जीत सकते हैं ।
632. चित्त की एक भी वृत्ति प्रभु से विमुख नहीं होनी चाहिए ।
633. धन और संपत्ति का आश्रय रखने पर भगवत् आश्रय पुष्ट नहीं हो पाएगा ।
634. प्रभु की हमारे ऊपर कृपा है पर हम कृपा पात्र नहीं बन पाते इसलिए प्रभु की कृपा को ग्रहण नहीं कर पाते ।
635. प्रभु के सामने सदैव सरल और सहज होकर जाना चाहिए ।
636. प्रभु की शरणागति ग्रहण करना भक्त का पहला कर्तव्य होता है ।
637. सभी सांसारिक प्रपंचों से बचकर प्रभु की भक्ति करनी चाहिए ।
638. जीवन में हमारा अधिक समय भजन में ही व्यतीत होना चाहिए ।
639. भजन में बाधक तत्व से सदैव जीवन में बचकर ही रहना चाहिए ।
640. भक्ति करके प्रभु से केवल भक्ति ही मांगें कि हमारी भक्ति और बढ़ती ही चली जाए ।
641. भक्ति के कारण प्रभु भक्तों का हाथ पकड़ लेते हैं और फिर कभी भी छोड़ते नहीं ।
642. अधिक-से-अधिक हम भक्ति कर पाएं, यही प्रभु से वर मांगना चाहिए ।
643. भक्ति में रोजाना नए उत्साह भरकर रखना चाहिए ।
644. भक्ति में कभी शिथिलता नहीं आने देनी चाहिए ।
645. हम जीवन में भक्ति कर पा रहे हैं, यह हमारे ऊपर प्रभु की सबसे बड़ी कृपा है ।
646. सबसे बड़ा सौभाग्य तब उदित होता है जब हमें केवल भजन करना ही जीवन में सुहाता है ।
647. वही भक्त है जो एक प्रभु के अलावा किसी से सच्चा और विशुद्ध प्रेम नहीं करता ।
648. ब्रह्मांड में सब कुछ प्रभु ही बने हुए हैं ।
649. अपना कीमती समय भजन में लगाना चाहिए न कि सांसारिक प्रपंच में लगाना चाहिए ।
650. अगर भजन करने का समय जीवन में मिल रहा है तो प्रभु की सबसे बड़ी कृपा हमारे ऊपर हो गई, ऐसा मानना चाहिए ।
651. दृढ़तापूर्वक प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय लेने से प्रभु हमारे अनुकूल हो जाते हैं ।
652. जीवन में केवल प्रभु से ही प्रेम बढ़ाना चाहिए ।
653. इसी जीवन में हमें हमारे जीवनधन प्रभु के प्रेम में डूबना चाहिए ।
654. शास्त्र वाक्य को ही जीवन का आधार माने तो कभी जीवन में भ्रष्ट और पतित नहीं होंगे ।
655. हमारी तर्क बुद्धि प्रभु के लिए श्रद्धा में सबसे बड़ी बाधक होती है ।
656. प्रभु में पूर्ण श्रद्धा होना, यह भक्ति का मूल सिद्धांत है ।
657. जैसे ही कोटि-कोटि जन्मों का पुण्य उदित होता है वैसे ही प्रभु में श्रद्धा दृढ़ और पुष्ट होती है ।
658. प्रभु के लिए पूर्ण श्रद्धा होना जीवन का बहुत बड़ा धन है । इस धन को निरंतर जीवन में बढ़ाते रहना चाहिए ।
659. सबसे बड़ा जीवन का लाभ प्रभु की भक्ति ही है, ऐसा श्रीमद् भागवतजी महापुराण में श्री उद्धवजी को प्रभु कहते हैं ।
660. जिसके पास प्रभु नामरूपी खजाना है वह सबसे बड़ा धनवान है, ऐसा शास्त्र मत है ।
661. प्रभु का विधान अटल है । जगत में कोई उसे परिवर्तित कर सकता है तो वे केवल प्रभु ही हैं ।
662. अगर जीवन में भोगों का त्याग नहीं कर सकते तो भक्ति का त्याग क्यों करते हैं ? भक्ति को पकड़कर रखेंगे तो मिथ्या भोगों में लिप्तता खत्म हो जाएगी ।
663. क्रोध करना नर्क जाने का दरवाजा है । जब क्रोध आए तो वहाँ से मौन होकर हट जाना चाहिए ।
664. भगवत् चिंतन नहीं करने से ही जीवन में विषय चिंतन होता है ।
665. जीवन में भगवान के संबंध में ही सुनना, बोलना और चिंतन करना चाहिए ।
666. अपने में दुर्गुण को बढ़ने देना पशुता है, ऐसा शास्त्र मत है ।
667. सभी संकल्प जीवन में प्रभु के लिए उठना चाहिए । यह भक्ति की श्रेष्ठ स्थिति होती है ।
668. बार-बार हमारी बुद्धि यही निर्णय करे कि हमें केवल एक प्रभु ही चाहिए ।
669. यह हमारा परम कर्तव्य है कि इसी जन्म में भक्ति करके प्रभु की प्राप्ति कर ली जाए ।
670. संसार का चिंतन छूटे और प्रभु का चिंतन हो, यह सभी साधनों का मूल है ।
671. प्रभु अपनी दासता देवें और अपनी सेवा में हमें ले लेवें तो यह जीवन का सबसे बड़ा लाभ होता है ।
672. भक्ति में कामना मल रूप माना गया है क्योंकि प्रभु प्रसन्न होते हैं कामना रहित यानी निष्काम भक्ति से ।
673. संत कहते हैं कि जहाँ प्रभु का यशगान होता रहता है वहाँ प्रभु श्री हनुमानजी सदैव के लिए विराजमान हो जाते हैं ।
674. प्रभु को कभी मत कहें कि ऐसा कर दीजिए । श्री रामचरितमानसजी में देवर्षि प्रभु श्री नारदजी के श्रीमुख की चौपाई है कि जिसमें प्रभु आपको मेरा हित दिखे वैसा कर दीजिए ।
675. भोग को देखकर कामना कहती है कि एक बार भोग लें पर जन्मों-जन्मों से अनेक बार कामना भोग भोगती आई है । भोग मिल गया तो भोगने का लोभ बढ़ता है और भोगने को नहीं मिला तो क्रोध भड़क उठता है ।
676. माया दुःख में सुख दिखाकर बड़ों-बड़ों को अपना गुलाम बना लेती है ।
677. प्रभु की भक्ति वह सुरक्षा कवच है जिसे कोई भी बुरी शक्ति कभी भेद नहीं सकती ।
678. प्रभु श्री रामजी (रामनवमी) और प्रभु श्री कृष्णजी (जन्माष्टमी) का जन्मोत्सव वर्ष में एक बार आता है पर प्रभु श्री हनुमानजी का जन्मोत्सव वर्ष में दो बार आता है । यह भक्त की महिमा होती है ।
679. प्रभु श्री हनुमानजी के स्वतंत्र मंदिर हैं पर प्रभु श्री रामजी के मंदिर में प्रभु श्री हनुमानजी अनिवार्य रूप से होते हैं । प्रभु श्री हनुमानजी के स्वतंत्र मंदिर हैं जहाँ प्रभु रामजी का प्रतिमा रूप में होना अनिवार्य नहीं हैं क्योंकि प्रभु श्री रामजी तो प्रभु श्री हनुमानजी के हृदय में सदैव विराजमान रहते है ।
680. प्रभु श्री हनुमानजी की आराधना नहीं की जाए तो बुद्धि स्थिर नहीं होती । बुद्धि देने वाली भगवती सरस्वती माता हैं पर बुद्धि को स्थिर करने वाले प्रभु श्री हनुमानजी हैं ।
681. प्रभु श्री हनुमानजी इतने महान कि उनकी प्रशंसा रूपी स्तुति स्वयं प्रभु श्री रामजी करते हैं ।
682. प्रभु श्री हनुमानजी की आराधना करने वाला वह सभी प्राप्त कर लेता है जो सभी शास्त्रों के श्रवण से प्राप्त होता है ।
683. संत प्रभु की शरणागति एक बार मांगते हैं पर प्रभु श्री हनुमानजी की शरणागति बार-बार मांगते हैं ।
684. भक्ति का सबसे महान तत्व है – श्रीहनुमत तत्व ।
685. प्रभु श्री हनुमानजी की उपासना से संकट दूर होते हैं, आयु बढ़ती है, बुद्धि का विकास होता है और घर में वैभव बढ़ता है ।
686. क्या-क्या करने से जीव नर से श्रीनारायण बन जाते हैं यह प्रभु श्री रामजी ने अपने मर्यादा अवतार में यानी श्रीरामावतार में करके दिखाया ।
687. प्रभु श्री रामजी को जिसने जान लिया उसने धर्म को जान लिया क्योंकि धर्म की साकार मूर्ति प्रभु श्री रामजी हैं ।
688. प्रभु श्री रामजी ने किस प्रसंग में क्या किया यानी जैसा व्यवहार किया वैसा किया जाए तो धर्म का स्वतः ही पालन हो जाता है ।
689. लंका आक्रमण करने के समय न प्रभु ने श्री अयोध्याजी से कोष मंगवाया, न ही सेना मंगवाई - यह पुरुषार्थ की पराकाष्ठा प्रभु श्री रामजी की थी । प्रभु श्री रामजी ने सब कुछ स्वयं यानी अकेले खड़ा किया, सभी चुनौतियों का अकेले सामना किया ।
690. प्रभु श्री रामजी इतने महान कि उनके जैसा कोई नहीं है । प्रभु ने स्वयं सभी परीक्षा नर लीला करते वक्त दी ।
691. श्री हनुमान कथा के श्रोता बनकर सुनने के लिए प्रभु श्री रामजी श्री अयोध्याजी की वाटिका में बैठकर ऋषि श्री अगस्त्यजी से श्री हनुमान कथा सुनते हैं ।
692. सभी राजाओं के आदर्श प्रभु श्री रामजी हैं । जैसे पिता अपने पुत्र को संपत्ति और संस्कार दोनों देते हैं वैसे ही राजा के रूप में प्रभु श्री रामजी ने अपनी प्रजा को स्वयं का उदाहरण दिखाकर संस्कार और सद्बुद्धि दी ।
693. प्रभु श्री रामजी बोलकर कम सिखाते हैं बल्कि आचरण से ही ज्यादा सिखाते हैं ।
694. सुनना है तो प्रभु श्री कृष्णजी की श्रीमद् भगवद् गीताजी रूपी वाणी सुने और देखना है तो प्रभु श्री रामजी का श्री रामायणजी में आचरण देखें । यह देखने और सुनने का सर्वश्रेष्ठ विकल्प है ।
695. जो प्रभु के कार्य के लिए प्रामाणिकता से जीवन में लक्ष्य लेकर चलता है उसकी मदद अदृश्य देवता, ऋषि और संत करते हैं । यह बात आज भी सत्य है ।
696. प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि मेरा श्रीहनुमान अति बलवान और अति गुणवान है । इसलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने लिख दिया "सकल गुणनिधानम" क्योंकि प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि कोई भी ऐसा गुण नहीं जो मेरे श्रीहनुमान में नहीं हो ।
697. जिस दृष्टि से भी देखें प्रभु श्री हनुमानजी का व्यक्तित्व सबसे उत्कृष्ट है ।
698. प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि मेरा श्रीहनुमान अति बलवान और अति सावधान । लोग बलवान होते हैं पर सावधान नहीं होते इसलिए जीवन की बाजी हार जाते हैं पर प्रभु श्री हनुमानजी बलवान के साथ-साथ सावधान भी हैं । इसलिए प्रभु श्री रामजी गदगद कंठ से प्रशंसा करते हैं प्रभु श्री हनुमानजी की सावधानता यानी दक्षता की ।
699. श्री यक्ष प्रश्न के उत्तर में श्री युधिष्ठिरजी कहते हैं कि धर्म का सार ही सावधानता है ।
700. प्रभु श्री हनुमानजी जैसी दक्षता, बल, धैर्य, शास्त्रों का सारा ज्ञान किसी में नहीं । कुछ भी ऐसा शास्त्रों में नहीं, कोई भी ऐसा ज्ञान नहीं जो प्रभु श्री हनुमानजी को पता नहीं हो । प्रभु श्री हनुमानजी सबको लेकर काम करने वाले यानी संगठन कौशल के धनी इसलिए ही सभी वानर उनकी बात मानते हैं । प्रभु श्री हनुमानजी आगे रहकर पराक्रम करने वाले हैं । इसलिए प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि यह सभी सद्गुण मेरे श्रीहनुमान में एकरूप हो गए यानी एकत्रित हो गए ।
701. प्रभु श्री रामजी अपने श्रीमुख से प्रभु श्री हनुमानजी के सद्गुणों को याद करते-करते एक-एक प्रसंग बताते हैं । प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि श्री हनुमानजी आगे रहकर पराक्रम करने वाले हैं । जब सभी वानर हताश थे कि लंका कैसे जाएंगे तो प्रभु श्री हनुमानजी ने सागर लांघा, भगवती सीता माता को आश्वासन दिया, लंका में रावण को चेतावनी दी और लंका को जलाकर वापस आ गए ।
702. जो बल प्रभु श्री हनुमानजी में है वह कोटि काल में भी नहीं, कोटि प्रभु श्री यमराजजी में भी नहीं, कोटि श्री कुबेरजी में भी नहीं, न कोटि श्री इंद्रदेवजी इतने बलवान हैं, प्रभु श्री रामजी ऐसा ऋषि श्री अगस्त्यजी को कहते हैं ।
703. प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि भगवती जानकी माता वापस मिली, श्री लक्ष्मणजी के प्राण बचे और लंका युद्ध जीता गया इसका सारा श्रेय प्रभु श्री हनुमानजी को मिलना चाहिए ।
704. प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि मुझे नए-नए सखा श्री सुग्रीवजी और श्री विभीषणजी के रूप में प्रभु श्री हनुमानजी ने मिलवाया । भक्त से मिलाने का काम प्रभु श्री हनुमानजी करते हैं, ऐसा प्रभु श्री रामजी कहते हैं ।
705. पराक्रम और प्रभाव में प्रभु श्री हनुमानजी सर्वोपरि हैं, ऐसा प्रभु श्री रामजी कहते हैं ।
706. ऋषि श्री अगस्त्यजी को प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि संक्षिप्त में मत कहिए, विस्तार से श्रीहनुमान कथा मुझे सुनाएं, जैसे राजा श्री परीक्षितजी ने प्रभु श्री शुकदेवजी से श्रीकृष्ण कथा विस्तार में सुनना चाहा । सूत्र यह है कि राजा श्री परीक्षितजी अपने प्रभु की कथा विस्तार से सुनना चाहते थे और प्रभु श्री रामजी अपने भक्त की कथा विस्तार से सुनना चाहते हैं ।
707. प्रभु के बाल रूप की कथा बालकांड में, श्री अयोध्याजी की कथा अयोध्याकांड में, अरण्य यानी वन की कथा अरण्यकांड में, किष्किंधा की कथा किष्किंधाकांड में । बाल अवस्था की कथा हुई इसलिए उस कांड का नाम बालकांड हुआ, एक स्थान विशेष यानी किष्किंधा के आस-पास कथा हुई इसलिए उस कांड का नाम किष्किंधाकांड हुआ । पर प्रभु श्री रामजी ने स्वयं श्रीसुंदरकांड नाम रखा क्योंकि प्रभु कहते हैं कि यह चरित्र में मेरे सबसे सुंदर भक्त की कथा है ।
708. श्री सुंदरकांडजी में प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि मेरा कोई वर्णन नहीं होना चाहिए सिर्फ प्रभु श्री हनुमानजी का ही वर्णन होना चाहिए जिससे मुझे सबसे ज्यादा प्रसन्नता होगी ।
709. भक्तों की भक्ति करने वाले प्रभु को अति प्रिय होते हैं । इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी की भक्ति करने वाले प्रभु श्री रामजी को सर्वाधिक प्रिय होते हैं ।
710. श्री लक्ष्मणजी का एक ही लक्ष्य कि जीवन में सब कुछ प्रभु श्री रामजी के लिए करना । प्रभु श्री रामजी को उन्होंने पिता-माता-गुरु-सखा सब कुछ माना । जो प्रभु श्री रामजी को कष्ट दे वह जीव श्री लक्ष्मणजी को कतई बर्दाश्त नहीं । इसलिए उन्होंने भगवती कैकेयीजी और श्री दशरथजी को भी नहीं बख्शा, उनसे बोलते थे तो आक्रोश में बोलते थे । श्री लक्ष्मणजी इतना प्रेम प्रभु श्री रामजी से करते थे ।
711. भक्तों को प्रभु की कथा प्रिय लगती है और प्रभु को भक्तों की कथा प्रिय लगती है ।
712. शास्त्र कहते हैं कि दो भक्ति ऐसी है जो एक साथ चलती है । एक, जो भक्त भगवान की करता है और दूसरा, जो भगवान अपने भक्त की करते हैं ।
713. प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहा है कि – अर्जुन, सुनो मैं भी अपने भक्तों की भक्ति करता हूँ ।
714. सुनने वाले प्रभु श्री रामजी और बोलने वाले श्री अगस्त्य ऋषि दोनों को ही अति आनंद हुआ जब श्री अयोध्याजी में श्रीहनुमान कथा का निरूपण हुआ ।
715. बल, गति और मति (बुद्धि) में प्रभु श्री हनुमानजी अद्वितीय हैं यानी सबसे बलवान, सबसे गतिमान और सबसे मतिमान प्रभु श्री हनुमानजी हैं ।
716. पूर्व में वानर एक जाति थी जिसमें मनुष्य के गुण और बंदर के गुण मिश्रित मिलते थे । यह वानर जाति आज लुप्त हो गई है । यह जंगल में पेड़ों पर नहीं रहते थे बल्कि नगर बसाकर मनुष्य की तरह रहते थे । मनुष्य की तरह उनकी भाषा थी, मनुष्य की तरह वे वस्त्र धारण करते थे । इन्हीं वानरों को साथ लेकर प्रभु श्री रामजी ने लंका का युद्ध किया था ।
717. बालि की पत्नी भगवती तारा उसे समझाती थी कि सुग्रीवजी को बल से मत जीतो, प्रेम से जीतो । इतना सटीक उपदेश भगवती तारा का श्री रामायणजी में मिलेगा जो एक स्त्री का अपने पति को दिया उपदेशों का एक आदर्श है ।
718. ऋषि शरीर से सुंदर दिखने के लिए नहीं बल्कि सद्गुणों से सुंदर दिखने के लिए अपना पुरुषार्थ करते थे ।
719. जीव में अहंकार आने पर प्रभु उस जीव को संसार से ठोकर मरवाते हैं । उसके अहंकार को नष्ट करने के लिए यह प्रभु की कृपा और अनुग्रह उस जीव पर होती है ।
720. ऋषि और संत भी पहले श्राप देकर अनुग्रह करते थे और प्रभु से मिलाते थे । एक पुंजिकास्थली नामक अप्सरा को ऋषि से श्राप मिला और प्रभु श्री हनुमानजी की माता के रूप में उनका जन्म हुआ और वे भी भगवती अंजनी माता कहलाई ।
721. सबके पूज्य और सबके प्रिय, यह दोनों एक साथ होना बड़ा कठिन है क्योंकि जो पूज्य होता है वह प्रिय नहीं होता और जो प्रिय होता है वह पूज्य नहीं होता । पर प्रभु श्री कृष्णजी का मत है कि जगत में एक ही व्यक्तित्व ऐसा है जो सबके पूज्य और प्रिय हैं और वे देवर्षि प्रभु श्री नारदजी हैं ।
722. प्रभु श्री वेदव्यासजी को श्रीमद् भागवतजी महापुराण लिखने की प्रेरणा और ऋषि श्री वाल्मीकिजी को श्री रामायणजी लिखने की प्रेरणा देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने दी । श्री ध्रुवजी और श्री प्रह्लादजी को भक्ति की दीक्षा देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने दी । श्री प्रह्लादजी की माताजी को देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने प्रभु की कथा सुनाई और सत्संग किया और गर्भ में भक्ति के संस्कार श्री प्रह्लादजी में पड़ गए ।
723. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी भक्ति माता के प्रचारक ऋषि हैं ।
724. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी निस्वार्थता की परिसीमा हैं । किसी से भी, कुछ भी स्वार्थ में वे कभी नहीं चाहते और सिर्फ सबको प्रभु के साथ जोड़कर सबका भला करना चाहते हैं ।
725. इंद्रियों को प्रिय लगे वैसा काम संत कभी नहीं करते हैं । उदाहरण स्वरूप निर्जला एकादशी ज्येष्ठ यानी गर्मी के महीने में आती है जो कि संतों को बहुत प्रिय होती है । उस समय वे पूरे गर्मी के दिन जल के बिना प्रभु के लिए रहते हैं ।
726. हम इंद्रियों को प्रिय लगे वह काम करते हैं और संत इंद्रियों को प्रिय नहीं लगे वह काम करते हैं । यह कितना बड़ा फर्क है ?
727. संतों की बात आज्ञा के रूप में माननी चाहिए, उनसे तर्क-वितर्क कभी नहीं करना चाहिए ।
728. जो कष्ट तप के रूप में प्रभु के लिए श्रद्धा के कारण सहा जाता है वह हमारे में निखार ला देता है ।
729. प्रभु की प्रसन्नता के लिए जो भी प्रामाणिकता से तप करता है, कष्ट सहता है उसके मार्गदर्शन के लिए संत स्वयं आते हैं, यह प्रभु का विधान है । सूत्र यह है कि प्रभु के लिए मार्गदर्शन की व्यवस्था भी प्रभु स्वयं संतों के द्वारा करवाते हैं ।
730. जीवन में जब पुण्य पकने की स्थिति आती है उसको ही भाग्योदय कहते हैं ।
731. ऋषिवर के पूछने पर कि कैसा पुत्र चाहिए, भगवती अंजनी माता ने ऋषिवर से मांगा कि मुझे ऐसा पुत्र चाहिए जो पूरा धार्मिक हो और सबसे अहम बात कि प्रभु की भक्ति करे ।
732. ब्रह्मांड में सबसे बलवान वायु है इसलिए बल के लिए वायु देवता की आराधना करने के लिए ऋषिवर ने भगवती अंजनी माता को कहा ।
733. ज्यादा स्वर्ण जहाँ भी होगा वह नुकसान ही करेगा, ऐसा शास्त्र कहते हैं । स्वर्ण की नगरी लंका का नाश हुआ, स्वर्ण नगरी श्री द्वारिकाजी, जो प्रभु की नगरी थी, वह भी संतों के अपराध होने पर श्राप के कारण डूबी ।
734. तिरुमाला पर्वत पर जाकर भगवती अंजनी माता और श्री केसरीजी ने प्रभु श्री वेंकटेशजी को प्रणाम करके अपना तप आरंभ किया । सूत्र यह है कि जहाँ भी जाए वहाँ के स्थान देवता की अनुकूलता प्राप्त करनी चाहिए ।
735. श्री हरिद्वारजी के स्थान देवता भगवती माया देवी हैं । आज कितने लोग हैं जिनको इस तथ्य का पता भी नहीं है कि श्री हरिद्वारजी का पुराना नाम मायापुरी था ।
736. सभी देवता प्रणाम मात्र से ही रीझ जाते हैं । प्रणाम इसलिए एकोपचार पूजा है ।
737. भगवती अंजनी माता ने प्रभु श्री महादेवजी की आराधना की थी पुत्र प्राप्ति के लिए । प्रभु श्री महादेवजी ने ऋषि को भेजा यह कहने के लिए कि मेरा यानी प्रभु श्री महादेवजी का अंश प्रकट होगा । वह बलवान हो इसलिए बल के देवता वायुदेव की आराधना भगवती अंजनी माता करें । सूत्र यह है कि यदि कभी उपासना टकराती है यानी हम एक देवता की उपासना करते हैं एवं कोई ऋषि या संत हमें दूसरी उपासना करने हेतु कहते हैं तो मानना चाहिए कि पहले उपासना करने वाले देवता की कृपा ही हमारा मार्गदर्शन कर रही है जिससे दूसरे देवता की उपासना का मार्ग दिखाया जा रहा है ।
738. पूर्व दोषों का नाश उसके सच्चे प्रायश्चित से होता है । पूर्व दोष कटेंगे तब पुण्य का रंग खिलेगा । जैसे गंदी हुई दीवार को पहले रगड़ना पड़ता है फिर नया रंग चढ़ेगा नहीं तो रंग नहीं चढ़ता । इसी तरह सूत्र यह है कि पूर्व दोषों का सच्चा प्रायश्चित किए बिना नए पुण्य का रंग जीवन में नहीं खिलेगा ।
739. प्रभु के लिए शत्रु और मित्र में कोई भेद नहीं होता क्योंकि दोनों के लिए समता का भाव प्रभु रखते हैं । दोनों का कल्याण ही करते हैं ।
740. कृपा का एक अर्थ संतों ने किया कि “कर” और “पा” यानी प्रभु की भक्ति “कर” और प्रभु की कृपा “पा” ।
741. कामना और माया रूपी दो वस्त्र हैं । कामना से जीव ढका हुआ है और माया रूपी वस्त्र से प्रभु ढके हुए हैं । संत कहते हैं कि प्रभु ने गोपियों के साथ चीर हरण श्रीलीला करके यह दोनों वस्त्र खींच लिए ।
742. प्रभु कामना के बीज को भून देते हैं जिससे कि भक्त के मन में फिर कामना के बीज कभी अंकुरित ही नहीं होते ।
743. भक्त को सभी कामनाओं से मुक्त करके प्रभु उसके जीवन को शुद्ध करना चाहते हैं ।
744. प्रभु श्री हनुमानजी जन्म से ही सभी सिद्धियों से सिद्ध थे ।
745. वज्र का अनादर न हो क्योंकि वह ऋषि श्री दधीचिजी की हड्डियों से बना हुआ था, इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी ने वज्र का प्रहार झेला ।
746. सभी देवताओं को प्रभु श्री रामजी के कार्य में सहयोग देना है इसलिए हर देवता ने अपना एक अंश पृथ्वी पर भेजा । श्री वायुदेव ने प्रभु कार्य हेतु प्रभु श्री महादेवजी के अंश को प्रकट करके कृपा की और प्रभु श्री हनुमानजी का जन्म हुआ ।
747. देवराज श्री इंद्रदेवजी ने प्रभु श्री हनुमानजी का नामकरण किया । थुड़ी (हनु) पर चोट से वह टेढ़ी हो गई इसलिए उनका नाम श्रीहनुमान पड़ा ।
748. देवराज श्री इंद्रदेवजी ने कहा कि मेरा वज्र आज से प्रभु श्री हनुमानजी के आगे भी निष्फल होगा । प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहा है कि मैं शस्त्रों में वज्र हूँ और वज्र भी प्रभु श्री हनुमानजी के आगे निष्फल है । प्रभु श्री सूर्यनारायणजी ने अपने तेज को प्रभु श्री हनुमानजी को अर्पण किया और अपना ज्ञान उनको दिया । प्रभु श्री हनुमानजी इस कारण सबसे बड़े ज्ञानी हुए । श्री वरुणदेवजी ने कहा कि थल में भी और जल में भी प्रभु श्री हनुमानजी अजीत होंगे यानी जल या थल में कोई भी प्रभु श्री हनुमानजी को नहीं जीत पाएगा । प्रभु श्री यमराजजी ने कहा कि मेरा यमदंड यानी जो काल बनकर सबको डराता है वह प्रभु श्री हनुमानजी के आगे निष्फल होगा । श्री कुबेरजी ने कहा कि जो-जो प्रभु श्री हनुमानजी से प्रेम और उनकी भक्ति करेगा मैं उन पर अति कृपा करूँगा ।
749. प्रभु श्री महादेवजी कहते हैं कि मेरे कोई भी अस्त्र का प्रभु श्री हनुमानजी पर कभी कोई असर नहीं पड़ेगा ।
750. देवताओं के सभी अस्त्र प्रभु श्री विश्वकर्माजी के बनाए हुए हैं इसलिए प्रभु श्री विश्वकर्माजी ने वरदान देकर कहा कि मेरे द्वारा किसी भी देवता को दिया कोई अस्त्र प्रभु श्री हनुमानजी पर कभी कोई असर नहीं करेगा ।
751. प्रभु श्री ब्रह्माजी ने कहा कि मेरा ब्रह्मपास भी प्रभु श्री हनुमानजी को नहीं बांध पाएगा । उन्होंने आगे कहा कि कोई मंत्र और तंत्र प्रभु श्री हनुमानजी पर कभी काम नहीं करेंगे ।
752. सारे ब्रह्मांड में प्रभु श्री हनुमानजी को जीतने का बल किसी में नहीं होगा । जिससे भी इनका युद्ध होगा वह पराजित ही होगा, ऐसा वरदान प्रभु ने दिया ।
753. कोई भी रूप बदलने का प्रभु श्री हनुमानजी के पास कौशल होगा और वे कोई भी रूप ले सकेंगे । उनकी गति को रोकने का सामर्थ्‍य किसी में नहीं होगा, ऐसा वरदान प्रभु श्री हनुमानजी को मिला ।
754. वेग और पुरुषार्थ में सबसे बड़े प्रभु श्री हनुमानजी होंगे, ऐसा वरदान उन्हें मिला ।
755. प्रभु श्री हनुमानजी बचपन में अजगर के साथ खेलते और शेर का कान पकड़कर खेलते थे । इतने बलवान और निडर प्रभु श्री हनुमानजी बचपन से ही थे ।
756. धर्म कथा, प्रभु की कथा और प्रभु भक्तों की गाथा भगवती अंजनी माता नित्य बचपन में प्रभु श्री हनुमानजी को सुनाती थी ।
757. मंत्र, तंत्र और श्राप कोई भी प्रभु श्री हनुमानजी पर काम नहीं करते इसलिए ऋषिवर दंड देने में असमर्थ थे । इसलिए प्रभु कार्य तक उन्होंने ऐसी व्यवस्था कर दी कि प्रभु श्री हनुमानजी अपनी शक्ति को भूल जाएं ।
758. जैसे एक पिता का बेटा तेज गाड़ी चलाता है तो पिता गाड़ी की गति को नियंत्रित करने के लिए मिस्त्री से इंजन में कुछ नियंत्रण करवा देता है वैसे ही ऋषियों ने किया कि प्रभु श्री हनुमानजी अपनी शक्ति को भूल जाए और जब प्रभु काज के लिए उसकी जरूरत हो तो वह तुरंत जागृत हो जाए ।
759. प्रभु श्री हनुमानजी को कोई क्रोध से श्राप दे तो वह लागू नहीं होता क्योंकि प्रभु श्री हनुमानजी श्रापमुक्त हैं इसलिए ऋषियों ने पिता की भांति बचपन में उनकी शक्ति को नियंत्रित किया ।
760. प्रभु श्री हनुमानजी का तेज और शक्ति का जागरण स्तोत्र से होता है, ऐसा ऋषियों ने वरदान में कहा । इसलिए आज भी प्रभु श्री हनुमानजी की स्तुति और प्रार्थना में उनको अपने बल का याद दिलाया जाता है, तभी वह बल हमारे लिए हितकारी होता है । स्तोत्र में कहा जाता है कि कौन-सा जग में काज है जो आपसे नहीं किया जाता, आपने तो बड़े-बड़े काज प्रभु के लिए किए है तो प्रभु श्री हनुमानजी तत्काल जागृत हो उठते हैं ।
761. सभी शास्त्रों का ज्ञान यानी जो कुछ भी शास्त्रों में उपलब्ध था वह प्रभु श्री सूर्यनारायणजी ने गुरुरूप से प्रभु श्री हनुमानजी को दिया ।
762. देवतागण भी पात्र को देखकर अनुग्रह करते हैं । जब प्रभु श्री हनुमानजी ज्ञान हेतु प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के पास गए तो प्रभु श्री सूर्यनारायणजी ने अपने ताप को शीतल कर दिया जिससे प्रभु श्री हनुमानजी को अनुकूलता हो ।
763. प्रभु श्री सूर्यनारायणजी इतने वेगवान कि उनसे पढ़ने के लिए प्रभु श्री हनुमानजी को भी अति वेगवान बनना पड़ा । श्री सूर्यनारायणजी निरंतर वेग से चलते थे और प्रभु श्री हनुमानजी ने उतनी ही वेग से पीछे की दिशा में चलते हुए शिक्षा ग्रहण की ।
764. हमारा मुख गुरुदेव की तरफ होना चाहिए इसलिए प्रभु श्री सूर्यनारायणजी जिस दिशा में वेग से चलते थे उसी वेग से उसके विपरीत दिशा में चलकर प्रभु श्री हनुमानजी ने शिक्षा ग्रहण की ।
765. प्रभु श्री हनुमानजी में परम सद्बुद्धि और विभिन्न विद्याओं का सार समाहित है । सभी प्रकार की विद्या के वे ज्ञाता हैं ।
766. प्रभु श्री हनुमानजी बलवान योद्धा मात्र ही नहीं बल्कि उनके जैसा पराक्रमी कोई नहीं । पर सबसे बड़ी बात कि उनके जैसा उत्साहवान कोई नहीं । बहुत से मनुष्य गुणवान और बुद्धिमान होते हैं पर उत्साहवान नहीं होते तो जीवन में कुछ नहीं कर पाते । प्रभु श्री हनुमानजी अति उत्साहवान हैं ।
767. श्री योग वशिष्ठजी अध्यात्म का एक बहुत बड़ा श्रीग्रंथ है ।
768. श्री योग वशिष्ठजी का सिद्धांत है कि एक आलस्य से सब सकारात्मक शक्तियों को जीवन में नष्ट कर दिया जाता है । सूत्र यह है कि जो शक्तियों का उपयोग नहीं करते वह शक्ति नष्ट हो जाती है ।
769. मनुष्य के मस्तिष्क का जितना उपयोग होगा उतना उसका विकास होगा, यह सिद्धांत है ।
770. उत्साह के अभाव में पराक्रम बेकार हो जाता है, उत्साह के अभाव में बुद्धि बेकार हो जाती है । इसलिए जीवन में उत्साह बनाए रखना चाहिए, यह हमारे शास्त्रों का निर्देश है ।
771. जिस मात्रा में सद्गुण प्रभु श्री हनुमानजी के पास है उतने सद्गुण किसी अन्य के पास प्रभु श्री रामजी को नहीं दिखते, यह प्रभु का मत है ।
772. चारों श्री वेदजी, नौ व्याकरण एवं सभी शास्त्रों और विषयों का ज्ञान प्रभु श्री हनुमानजी ने प्राप्त किया । एक विषय सूची ऋषि श्री अगस्त्यजी ने दी है जो ज्ञान प्रभु श्री हनुमानजी के पास है, उसमें से कई विद्याएं तो आज लुप्त भी हो गई है । हम तो कलियुग में आज उस सूची के विषय तक का ज्ञान नहीं रखते । प्रभु श्री हनुमानजी जैसा सभी विषयों और चीजों की जानकारी अन्य कोई भी नहीं रखता । कोई विद्या ऐसी नहीं जो प्रभु श्री हनुमानजी नहीं जानते हों ।
773. सभी कलाओं और सभी विद्याओं में पारंगत प्रभु श्री हनुमानजी हैं ।
774. गुरु दक्षिणा के रूप में प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री सूर्यनारायणजी को सुग्रीवजी की रक्षा का वचन दिया और गुरु सेवा के रूप में सुग्रीवजी का जीवनभर रक्षण प्रभु श्री हनुमानजी ने किया ।
775. पूजा करते समय किसी से बात नहीं करनी चाहिए और आसन से नहीं उठना चाहिए । पूजा पूर्ण होने तक अपनी सभी सांसारिक प्रवृत्ति बंद रखनी चाहिए । पूजा करते वक्त प्रभु के लिए, सिर्फ प्रभु के लिए समय निकालना चाहिए, चाहे वह समय पन्द्रह मिनट का ही क्यों न हो ।
776. छोटे-छोटे नियम का प्रभु के लिए रोजाना पालन होने पर वह बहुत बड़ा लाभ जीवन में देता है ।
777. स्तुति करने वाले पास रहकर बड़े व्यक्ति को भी गिरा देते हैं । इसलिए शास्त्र कहते हैं कि चापलूसी करने वाले से सदैव दूर रहना चाहिए ।
778. जीवन का विकास करना हो तो प्रभु ने मुझे कौन-सा गुण दिया है उसकी जाँच करनी चाहिए और उस अनुरूप जीवन में व्यवहार करना चाहिए ।
779. प्रभु ने सबको कोई-न-कोई सद्गुण दिए हैं, उसको जीवन में जागृत करना हमारा काम होता है ।
780. जिसकी नीव स्वार्थ पर टिकी है वैसी मैत्री टिकने वाली नहीं होती, ऐसा शास्त्र मत है ।
781. श्री सुग्रीवजी ने अपना सब कुछ गंवा दिया था पर प्रभु श्री हनुमानजी को अपने जीवन में नहीं गंवाया इसलिए अंत में विजयी हुए ।
782. एक सिद्धांत है कि जिनके साथ प्रभु श्री हनुमानजी होते हैं उनकी विजय निश्चित होती है । उदाहरण स्वरूप देखें कि त्रेता में प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के अंश सुग्रीवजी के साथ थे और श्री इंद्रदेवजी का अंश बालि मारा गया । द्वापर में प्रभु श्री हनुमानजी श्री इंद्रदेवजी के अंश श्री अर्जुनजी के साथ थे और प्रभु श्री सूर्यनारायणजी का अंश कर्ण मारा गया । विजय उनकी हुई जिनके साथ प्रभु श्री हनुमानजी थे ।
783. प्रभु श्री हनुमानजी विजय के देवता हैं । उनका निरंतर स्मरण करने वाला जीवन में कभी हार नहीं सकता ।
784. प्रभु श्री हनुमानजी कलियुग में भी भक्तों को दर्शन देते रहे हैं और देते रहेंगे । श्री सालासरजी धाम में साधु रूप में प्रभु श्री हनुमानजी प्रकट हुए और वहाँ दर्शन दिए और आज प्रभु श्री हनुमानजी की प्रतिमा उसी रूप में है ।
785. शब्दों के भीतर जाकर सत्य खोजना, यह कला केवल प्रभु श्री हनुमानजी को आती है । प्रभु श्री हनुमानजी को इसलिए श्री सुग्रीवजी ने प्रभु श्री रामजी के पास मालुम करने के लिए भेजा कि वे मित्र हैं या शत्रु । इस कारण ही प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी को वनवास काल पूर्ण होने से पहले श्री भरतलालजी के पास सत्य जांचने के लिए भेजा कि श्री भरतलालजी राज्य चाहते हैं या प्रभु की वापसी चाहते हैं ।
786. प्रभु श्री रामजी को पूर्ण रूप से समझने के लिए श्री वाल्मीकि रामायणजी का अध्ययन बहुत जरूरी है ।
787. प्रभु श्री रामजी श्री वाल्मीकि रामायणजी में श्री लक्ष्मणजी से कहते हैं कि प्रभु श्री हनुमानजी जैसा श्रेष्ठतम वक्ता कोई नहीं, उनकी भाषा इतनी शुद्ध, व्याकरण की कोई गलती नहीं, बोलते समय शारीरिक गतिविधि क्या होनी चाहिए वह प्रभु श्री हनुमानजी जैसा कोई नहीं जानता । एक भी गलत शब्द नहीं बोलते, कौन-सा शब्द कंठ से, कौन-सा नाभि से, कौन-सा हृदय से बोलना चाहिए सब सही बोलते हैं । इतना मधुर कोई नहीं बोल सकता, इतना विस्तार नहीं करते कि लोग ऊब जाए, इतना संक्षिप्त भी नहीं बोलते कि बात समझ में ही नहीं आए । न ज्यादा धीरे बोलते हैं, न ज्यादा तेज बोलते हैं । इतनी सहजता से सही गति में बोलते हैं, सहजता से प्रभावमय वाणी बोलते हैं । ऐसा नहीं लगता कि याद करके बोल रहे हैं, सारे मुद्दे क्रम से बोलते हैं । प्रभु श्री हनुमानजी के वक्ता के रूप में कौशल का ऐसा श्रेष्ठ चित्रण प्रभु श्री रामजी ने किया ।
788. प्रभु यहाँ तक कहते हैं कि कोई शत्रु भी प्रभु श्री हनुमानजी से युद्ध करने आए तो उनका भाषण सुनकर प्रभु श्री हनुमानजी से युद्ध करना भूल जाएगा और उनका भाषण सुनने लग जाएगा ।
789. प्रभु श्री हनुमानजी से पहली मुलाकात में प्रभु श्री रामजी को उनसे अथाह प्रेम और परम आकर्षण हो गया ।
790. हमारा आकलन कौन करता है और हमारे आकलन पर मोहर कौन लगाता है, यह देखना सबसे जरूरी होता है । प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमान जी को प्रमाण पत्र दिया जो स्वयं श्रेष्ठतम ज्ञानी और श्रेष्ठतम वक्ता हैं ।
791. प्रभु श्री रामजी को भी अपनी तरफ पूर्ण रूप से आकर्षित कर लिया, ऐसा व्यक्तित्व प्रभु श्री हनुमानजी का है ।
792. सद्गुणों का इतना विकास जितना प्रभु श्री हनुमानजी के जीवन में हुआ है वैसा किसी के जीवन में कभी नहीं हुआ है ।
793. सद्गुणों की संपत्ति सदैव जीवन में बढ़ाते चलनी चाहिए क्योंकि उनका उपयोग निश्चित समय जरूर होगा । इसलिए दिन प्रतिदिन हमें सद्गुणों का विकास कर अपने जीवन को बेहतर बनाते रहना चाहिए ।
794. प्रभु श्री रामजी से मित्रता के समय श्री सुग्रीवजी से अग्नि स्थापना कर प्रतिज्ञा करवाई क्योंकि प्रभु श्री हनुमानजी को पता था कि प्रभु श्री रामजी तो मैत्री को निभा लेंगे पर श्री सुग्रीवजी भूल सकते हैं । ऐसा ही हुआ जो प्रभु श्री हनुमानजी का अनुमान था और श्री सुग्रीवजी भूल भी गए । प्रभु श्री हनुमानजी ने करार नहीं बल्कि अग्नि के सामने संस्कार कराया था क्योंकि करार तोड़ सकते हैं पर संस्कार तोड़ा नहीं जाता ।
795. पारिवारिक स्थिरता भारत की एक श्रेष्ठ परंपरा सदा से रही है । संस्कारों के कारण संस्कृति का श्रेष्ठ विकास भारत में देखने को मिलता है ।
796. भारत की संस्कृति बच्चों को साथ रखती है और पति-पत्नी को भी साथ जोड़कर रखती है । इसलिए भारत का गृहस्थ आश्रम धन्य होता है ।
797. गलती करे तो भी सुग्रीव अपना है - यह कहना पड़ा प्रभु श्री रामजी को जब श्री लक्ष्मणजी उत्तेजित हुए और किष्किंधा गुस्से से जाने लगे । यह अग्नि संस्कार के कारण करना पड़ा प्रभु श्री रामजी को जो प्रभु श्री हनुमानजी के कारण हुआ नहीं तो श्री लक्ष्मणजी द्वारा श्री सुग्रीवजी मारे जाते ।
798. प्रभु श्री हनुमानजी का नित्य चिंतन करने वाला कभी भी पराभव को प्राप्त नहीं हो सकता यानी जीवन में कभी भी, किसी से हार नहीं सकता ।
799. प्रभु से सत्संग द्वारा निरंतर रिश्ता जोड़कर रखना चाहिए ।
800. जीव के भोलेपन और कोमलता पर प्रभु तत्काल रीझ जाते हैं ।