| 001. |
कामना से, क्रोध से, भय से, स्नेह से या किसी भी अन्य तरह से प्रभु से रिश्ता जोड़ लेना चाहिए, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 002. |
श्रीग्रंथ के एक-एक श्लोक का चिंतन और मनन संत करते हैं । |
| 003. |
अभिमान और मान (स्वयं का स्वयं की नजरों में ऊँचा होना मान कहलाता है) दोनों ही प्रभु को पसंद नहीं । गोपियों को मान हुआ और श्रीजी भगवती राधा माता के साथ प्रभु अंतर्ध्यान हो गए । |
| 004. |
जीवन में अगर भगवती लक्ष्मी माता का अखंड वास चाहते हैं तो प्रभु श्री नारायणजी को जीवन में लाना ही पड़ेगा । भगवती लक्ष्मी माता स्वतः चिरकाल तक श्री गरुड़जी पर बैठकर प्रभु श्री नारायणजी के साथ ही आती हैं । |
| 005. |
पहले भगवती लक्ष्मी माता की बात नहीं, प्रभु श्री नारायणजी की बात जीवन में करनी चाहिए । माया की जगह माधव को भजना चाहिए । |
| 006. |
जहाँ भगवती लक्ष्मी माता हैं वहाँ प्रभु श्री नारायणजी हो यह जरूरी नहीं पर जहाँ प्रभु श्री नारायणजी होते हैं वहाँ भगवती लक्ष्मी माता होगी-ही-होगी, यह परम सिद्धांत है । |
| 007. |
जहाँ प्रभु श्री नारायणजी के बिना भगवती लक्ष्मी माता आती हैं तो वहाँ उस जीव की धन और वैभव के कारण शांति छिन जाती है क्योंकि प्रभु श्री नारायणजी शांति के स्वरूप हैं । |
| 008. |
एक मैले बच्चे को पहले माँ साफ करती है फिर पिता की गोद में लाकर बैठा देती है । इसलिए पहले माता की कृपा प्राप्त करनी चाहिए और माता हमें शुद्ध करेगी तो परमपिता प्रभु की गोद में हम बैठ पाएंगे । |
| 009. |
रोगी का उपचार, बालक की शिक्षा, पशु की सुरक्षा, स्त्री की रक्षा, वृक्ष के लिए जतन करना - समाज के हर जीव का कर्तव्य होता है, यह भारतीय परंपरा सदा से रही है । |
| 010. |
श्रीसीताराम और श्रीराधाकृष्ण तत्व एक ही हैं, नाम दो दिखने पर भी तत्व एक ही है । |
| 011. |
प्रभु श्री महादेवजी श्रीराम नाम को महामंत्र का रूप देकर जपते हैं । प्रभु श्री गणेशजी ने श्रीराम नाम शिला पर लिखकर परिक्रमा की और प्रथम पूज्य हो गए । श्री वाल्मीकिजी ने उल्टा बोला मरा-मरा और ब्रह्म समान हो गए । उल्टे नाम जपने से भी विशुद्ध हो जाते हैं, इतना सामर्थ्य श्रीराम नाम में है । सूत्र यह है कि श्रीराम को मरा-मरा बोलकर जपे या मरे-मरे अवस्था में यानी दुःख में राम-राम बोलें कल्याण निश्चित है । |
| 012. |
श्रीराम नाम कहकर प्रभु श्री महादेवजी विष पी गए, विष ने अपना स्वभाव छोड़ दिया और हितकारी बन गया और प्रभु श्री महादेवजी के कंठ को विष ने शोभित किया और प्रभु श्री महादेवजी को नया नाम मिल गया “श्रीनीलकंठ” का । |
| 013. |
संतों ने प्रभु नाम की महिमा गाई है और अपना नाम जप का अनुभव बताया है । |
| 014. |
प्रभु श्री रामजी स्वयं पृथ्वी पर नहीं हैं, श्री साकेत धाम में हैं पर उनका नाम तो पृथ्वी धाम पर अपना काम कर ही रहा है । अवतार पूरा करने के बाद प्रभु स्वधाम चले जाते हैं पर उनका नाम उसके बाद भी धरा पर सदैव के लिए रहता है । |
| 015. |
ब्रह्म को पकड़ना है तो ब्रह्म के नाम को पकड़ो । प्रभु नाम की इतनी बड़ी महिमा है । |
| 016. |
कलियुग में श्रीराम नाम का सबसे बड़ा लाभ बताया गया है क्योंकि देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने वरदान स्वरूप मांगा था कि श्रीराम नाम कलियुग में सबसे महान बन जाए । |
| 017. |
चाहे भाव से लिया जाए, चाहे अभाव से लिया जाए, श्रीराम नाम तो कल्याण-ही-कल्याण करेगा । |
| 018. |
जैसे मोबाइल को शांत अवस्था (साइलेंट मोड) पर रखने पर घंटी परेशान नहीं करती वैसे ही कर्म को शांत अवस्था पर रखने पर वह हमें परेशान नहीं करते और प्रभु की भक्ति करने देते हैं । |
| 019. |
जीवन का रस लेना है तो प्रभु नाम जप में और कीर्तन में रुचि रखनी चाहिए । |
| 020. |
हम दूसरे के घर का कचरा अपने घर में नहीं डालने देते पर दूसरे का कचरा यानी व्यर्थ बातें अपने कान में डालने की इजाजत दे देते हैं, यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है । |
| 021. |
संतों ने अपने जीवन के शुरू में प्रभु का नाम लिया है, मध्य जीवन में प्रभु का नाम लिया है तो अंत बेला में प्रभु का नाम उनके जिह्वा पर आकर साकार हो जाता है । प्रभु का नाम लेकर ही वे अपने शरीर का त्याग करते हैं । |
| 022. |
प्रभु श्री रामजी श्रीरामायण हैं और श्रीरामायण प्रभु श्री रामजी हैं । |
| 023. |
जब प्रभु श्री हनुमानजी ने अशोक वाटिका में श्रीराम कथा सुनाई तो भगवती सीता माता का दुःख श्रीराम कथा सुनकर भाग गया । |
| 024. |
जो स्वयं आत्मघात करना चाहती थी वे भगवती सीता माता ने प्रभु श्री रामजी की कथा सुनकर आत्मघात की योजना का त्याग कर दिया । |
| 025. |
प्रभु की कथा जो जीवन के संताप से दुःखी है और मरना चाहता है उसे मरने नहीं देती और जो संताप उसे मारना चाहता है उसे मारने नहीं देती । प्रभु की कथा अपने श्रवण करने वाले को बचाती है । |
| 026. |
हम पंडित हो जाएं, सिद्ध हो जाएं, संत हो जाएं, वृद्ध हो जाएं फिर भी प्रभु का नाम कभी नहीं छोड़ना चाहिए । |
| 027. |
प्रभु का नाम पावन नहीं, अतिपावन है क्योंकि इससे ज्यादा पावन करने वाला कोई भी साधन नहीं है । |
| 028. |
प्रभु के नाम का वर्णन कितना करें, भाष्य कितना करें । संत इसमें असमर्थता का अनुभव करते हैं । इसलिए वे नाम को गाने लगते हैं क्योंकि नाम गाना सरल है, नाम का वर्णन करना, नाम का भाष्य करना बड़ा कठिन है । |
| 029. |
श्रीराम कथा की रचना प्रभु श्री महादेवजी ने करके अपने हृदय में रखी इसलिए नाम पड़ा मानस । मानस का अर्थ है मन में रखना इसलिए नाम मानस पड़ा । फिर उपयुक्त समय पाकर प्रभु श्री महादेवजी ने भगवती पार्वती माता को और फिर श्री काकभुशुण्डिजी को कथा सुनाई और यह क्रम आगे चलता रहा । |
| 030. |
जिस तिथि में यानी श्रीरामनवमी पर ग्रह नक्षत्र अनुकूल हुए और प्रभु पधारे इसी तरह फिर वह योग आया और ग्रह नक्षत्र फिर वैसे ही अनुकूल हुए जैसे प्रभु के जन्म के वक्त हुए थे और गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने श्री रामचरितमानसजी की रचना की । |
| 031. |
श्रीराम कथा के चार घाट संतों ने बताए हैं । कर्म, उपासना, भक्ति और शरणागति का घाट । गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने शरणागति के घाट पर बैठकर श्री रामचरितमानसजी का निरूपण किया । |
| 032. |
श्री रामचरितमानसजी में संदेह का मतलब है श्रीब्रह्म में संदेह करना, ऐसा संत कहते हैं । |
| 033. |
कभी श्रीब्रह्म के बारे में संदेह नहीं होना चाहिए । अगर ऐसा हो तो प्रभु के श्रीकमलचरणों को तुरंत पकड़ लेना चाहिए । अगर संदेह का उदय होने लगे तो भय और लज्जा से प्रभु के श्रीकमलचरणों को पकड़ लेना चाहिए । भय इसलिए कि प्रभु पर संदेह किया तो प्रभु दंड देंगे और लज्जा इसलिए कि प्रभु को पता चलेगा कि मेरे लिए संदेह उत्पन्न हुआ । |
| 034. |
श्री वेदजी, उपनिषद, ऋषि, मुनि जिस नाम का दान करते हैं वह प्रभु का ही नाम है । |
| 035. |
संत कहते हैं कि जब दूसरे संत प्रभु की कथा सुनने का उनसे आग्रह करते हैं तो मानो उन्हें मौका दे दिया महारस लुटाने का । |
| 036. |
कोई और रहस्य पाया जाए, कोई और रहस्य खोजा जाए, इसलिए संत बार-बार श्रीहरि कथा सुनते और सुनाते हैं । |
| 037. |
अगर पूरी पृथ्वी माता कागज बन जाए, सातों श्री समुद्रदेवजी स्याही बन जाए फिर भी प्रभु के बारे में लिखें तो नहीं लिखा जाएगा क्योंकि प्रभु के सद्गुण अनंत हैं, प्रभु का नाम अनंत हैं, प्रभु के रूप अनंत हैं और प्रभु की श्रीलीला भी अनंत है । |
| 038. |
मोहरूपी रावण को प्रभु श्री रामजी मारते हैं और महामोहरूपी महिषासुर को श्रीराम कथा मारती है । सूत्र यह है कि प्रभु श्री रामजी मोह को, तो उनका नाम और उनकी कथा महामोह को मारती है । प्रभु जितना सामर्थ्य अगर किसी में है तो वह उनके नाम में और उनकी कथा में है । |
| 039. |
प्रभु श्री रामजी के आराध्य प्रभु श्री महादेवजी हैं । इसलिए श्रीराम कथा से पहले मानसजी में श्रीशिव कथा आती है । |
| 040. |
संत सोचते हैं कि उनकी वाणी पवित्र हो जाती है अगर कोई उनसे कथा सुनने आ जाता है । |
| 041. |
जब ऋषि कथा सुनाने बैठते हैं और प्रभु श्री महादेवजी कथा सुनने बैठते हैं तो कथा की दक्षिणा के रूप में प्रभु श्री महादेवजी से ऋषिगण सदा भक्ति ही मांगते हैं । |
| 042. |
भक्ति मिलेगी तो सिर्फ प्रभु श्री महादेवजी से ही मिलेगी । प्रभु श्री महादेवजी के भजन के बिना भक्ति मिलना असंभव है । प्रभु श्री महादेवजी के बिना भक्ति का दान कोई नहीं दे सकता । |
| 043. |
प्रभु मुझे प्रिय हों, ऐसा संत मांगते हैं । गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने श्री रामचरितमानसजी के अंत में यही लिखकर मांगा । |
| 044. |
अपनी बुद्धि से तभी लाभ मिलेगा जब हम अपने ज्ञान को सबके साथ बाटेंगे । |
| 045. |
धर्म के कार्य में एक और एक दो नहीं होते बल्कि एक और एक ग्यारह होते हैं । |
| 046. |
लेने में वह आनंद नहीं है जो देने में है । देने से हमारा तेज बढ़ता है, देने से तेज की वृद्धि होती है - यह सूत्र है । |
| 047. |
कलियुगी लोगों को अच्छा दिखने की इच्छा होती है पर अच्छा होने की इच्छा नहीं होती, अच्छा बनने की इच्छा नहीं होती है, यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है । |
| 048. |
भक्ति करने वाले को कभी संसार के लिए रोना नहीं पड़ता । वह रोता है तो प्रभु प्रेम में और प्रभु की प्राप्ति के लिए रोता है । |
| 049. |
लोगों को शक्ति चाहिए पर भक्ति नहीं । सूत्र यह है कि जो भक्त होगा वही आंतरिक रूप से सच्चा शक्तिमान होगा क्योंकि भक्ति में इतनी बड़ी शक्ति जो होती है । |
| 050. |
भक्ति से विमुख होकर हम सुख और शांति चाहते हैं जो भक्ति के बिना मिलना सर्वथा असंभव है । |
| 051. |
समाज को भक्तिवान बनाना संतों का काम होता है । भक्ति के रंग से समाज को रंगने का काम संत करते हैं । |
| 052. |
लोग भक्ति की ओर अग्रसर हो, भक्ति से प्रभु की तरफ अग्रसर हो, यही संत चाहते हैं । |
| 053. |
सच्चे संतों का कोई स्वार्थ नहीं होता । वे निस्वार्थ भाव से प्रभु की भक्ति का प्रचार करते हैं । |
| 054. |
जिस शरीर में स्वार्थ नहीं होता, प्रभु ऐसे शरीर को पसंद करते हैं और उनसे प्रभु अपना कार्य करवाते हैं । |
| 055. |
दुःख का कारण कर्म है । कोई कर्म ऐसा किया होगा जिसके पाप के कारण इस दुःख का हमारे जीवन में निर्माण हुआ । |
| 056. |
प्रभु हमारे पापों का नाश करते हैं और हमारी पाप बुद्धि का भी नाश करते हैं । |
| 057. |
कोई शरीर का संबंधी हमें दुःख देता है, यह निमित्त कारण हुआ । यह दुःख का निमित्त कारण है, मूल कारण नहीं है । मूल कारण है यानी जो वास्तविक कारण है वह यह है कि हमारे पूर्व पाप कर्म ही इस जन्म में किसी को माध्यम बना हमें दुःख पहुँचाते हैं । |
| 058. |
भक्ति लाने के लिए सत्संग जरूरी है क्योंकि वहाँ प्रभु के सद्गुणों का चिंतन, प्रभु का गुणानुवाद होता है । प्रभु के गुणानुवाद को आत्मसात करने से प्रभु प्रेम जागृत होता है और प्रभु से हमारा जुड़ाव होता है । |
| 059. |
प्रभु के लिए गिरे आंसू से ही आंसुओं का आंसू बनना सफल होता है । |
| 060. |
सत्संग हमारा आत्म मंथन करता है । हमें क्या करना चाहिए और हम क्या कर रहे हैं, दोनों का भेद हमारे सामने लेकर आता है । |
| 061. |
हमारे कान हमारी जागृति का कारण बन जाते हैं जब कानों से प्रभु की कथा रूपी प्रेम गंगा हमारे चित्त तक पहुँच जाती है । |
| 062. |
जीवन में मिला सच्चा सत्संग हमारे विचारों में अदभुत परिवर्तन करता है । |
| 063. |
बाहरी परिवर्तन लाभकारी नहीं होता, भीतर का परिवर्तन ही सबसे लाभकारी होता है । |
| 064. |
भीतर परिवर्तन होगा तो बाहर सब कुछ यानी विपरीत चीज भी हमें अच्छी लगने लगेगी क्योंकि दुनिया ही हमें प्रभुमय दिखने लग जाती है । सब प्रभु ही हैं तो फिर किससे वैर करें, किससे लड़ाई करें, किससे नफरत करें, किसकी बुराई करें । फिर वह जीव कभी किसी की बुराई नहीं करेगा । |
| 065. |
निरंतर और नियमित रूप से सच्चा सत्संग जीवन में करते रहना चाहिए । |
| 066. |
सत्संग का अदभुत परिणाम होता है । इसलिए एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी में भी आधी घड़ी का सच्चा सत्संग अदभुत लाभ देकर जाता है । |
| 067. |
खुद ही खुद को प्रमाण पत्र कभी नहीं देना चाहिए । मैं बहुत कुछ जान गया, यह स्वयं का आकलन कभी नहीं करना चाहिए । |
| 068. |
हमें संतों की प्रसन्नता का पात्र बनना चाहिए । संतों को अच्छा लगे, ऐसा कार्य करना चाहिए । यह बहुत बड़ी उपलब्धि होती है । |
| 069. |
जो अपना हृदय का भाव निर्दोष, निष्कपट और निस्वार्थ रखता है वह प्रभु को प्रिय हो जाता है । |
| 070. |
स्वयं को बड़ा और पहुँचा हुआ सिद्ध समझ लिया तो जीवन में भजन की गति मंद पड़ जाएगी । |
| 071. |
किसी ने संत से कहा कि आपकी कृपा के कारण मेरी बीमारी ठीक हो गई और संत ने ऐसा मान लिया कि मेरे कारण यह हुआ तो उनका पतन शुरू हो जाएगा । खुद को पहुँचा हुआ कभी नहीं मानना चाहिए, यह शास्त्रों का सूत्र है । |
| 072. |
चिंता वे करते हैं जो प्रभु का चिंतन नहीं करते । सभी चिंताओं के अंत का उपाय प्रभु का चिंतन करना है । |
| 073. |
प्रभु को आना आता है पर उन्हें भक्त हृदय से वापस जाना आता ही नहीं है । |
| 074. |
कोई ऐसी समस्या नहीं जिसका प्रभु के श्रीकमलचरणों में जाने पर नाश नहीं हो । प्रभु स्मरण से नाश न हो ऐसी कोई समस्या हो ही नहीं सकती । |
| 075. |
कलियुग का सबसे बड़ा गुण कि कलियुग में प्रभु को पाना इतना सरल है, इसको देखकर कोई भी संत या महात्मा कलियुग की बुराई नहीं करते । |
| 076. |
कलियुग में भक्ति को घर-घर में स्थापित करने का देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने संकल्प लिया हुआ है । |
| 077. |
सच्चा संकल्प प्रभु के लिए लेने से हमारे जीवन में सफलता का श्रीगणेश हो जाता है । |
| 078. |
संकल्प प्रभु भजन का हुआ तो हमारे जीवन में प्रभु प्राप्ति सुनिश्चित हो जाती है । |
| 079. |
संकल्प प्रभु के लिए हुआ तो आगे-आगे मदद स्वयं प्रभु करते रहते हैं और हमें मदद मिलती रहती है । |
| 080. |
भजन का संकल्प किया है तो प्रकृति स्वयं हमें स्वास्थ्य देकर हमारी मदद करती है । |
| 081. |
प्रभु के लिए जीवन में कोई भी संकल्प अगर हम लेते हैं तो प्रभु उसमें हमारे मददगार बनकर आते हैं । |
| 082. |
प्रभु प्राप्ति के लिए कोई योग्यता नहीं चाहिए । प्रभु की तरफ बढ़ने पर योग्यता प्रभु स्वयं दे देते हैं । |
| 083. |
भक्ति प्रचार का संकल्प, यह लोकमंगल का संकल्प है जो कि प्रभु को अति प्रिय है । |
| 084. |
मनुष्य स्वार्थ के लिए काम करता है, अगर परमार्थ करता दिखे तो मानना चाहिए कि उस मनुष्य देह से प्रभु ही कार्य करवा रहे हैं । |
| 085. |
कलियुग में ज्ञान, वैराग्य भक्ति जगती तो है पर जागृत अवस्था में ज्यादा समय तक नहीं रह पाती । उदाहरण स्वरूप एक बड़े सेठजी को श्मशान में मुखाग्नि देकर सभी को क्षणभर के लिए वैराग्य आता है कि सेठजी का सब कुछ यहीं रह गया, धन संपत्ति का क्या लाभ हुआ । वैराग्य आया पर क्षणभर के लिए । |
| 086. |
श्री सुग्रीवजी से प्रभु श्री रामजी की मैत्री का पूरा संस्कार प्रभु श्री हनुमानजी ने करवाया । |
| 087. |
श्री सुग्रीवजी की प्रतिज्ञा टूटने पर भी प्रभु उनसे दूर न हो क्योंकि बालि के मारे जाने के बाद वे प्रभु का कार्य भूल गए थे । यह प्रभु श्री हनुमानजी को पता था इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी ने मैत्री का संस्कार करवाया । |
| 088. |
जीव को दंड देने का एकमात्र अधिकार प्रभु को ही है । |
| 089. |
प्रभु श्री हनुमानजी को शास्त्रों में धर्ममूर्ति बताया गया है क्योंकि वे सदा धर्म के पक्ष में रहते हैं और धर्म के पक्ष में रहने वाले को विजयी बनाते हैं । |
| 090. |
प्रभु श्री हनुमानजी सदैव सावधान रहते हैं । उन्होंने देख लिया कि श्री सुग्रीवजी प्रभु का काम भूल गए तो यह उनके लिए बहुत महंगा पड़ सकता है । इसलिए श्री सुग्रीवजी को सचेत करने सबसे पहले प्रभु श्री हनुमानजी आए । |
| 091. |
प्रभु से दूर रहने से हमारे जीवन का सुख स्थाई नहीं रहेगा, यह उपदेश शास्त्रों का है । प्रभु श्री हनुमानजी ने श्री सुग्रीवजी को ऐसा उपदेश श्री रामचरितमानसजी में भी दिया है । सूत्र यह है कि प्रभु को जीवन से दूर किया तो मिला सुख टिकेगा नहीं और चला जाएगा । |
| 092. |
योग्य निर्णय योग्य समय पर लेना होता है तभी सफलता मिलती है । योग्य निर्णय योग्य समय नहीं लिया और विलंब से लिया तो सफलता से हम चूक जाएंगे । |
| 093. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने श्री सुग्रीवजी यानी किष्किन्धा के राजा से सहमति लेकर सभी वानरों को संदेश भिजवाया कि निर्धारित समय इतनी सेना लेकर पहुँच जाए । यह काम प्रभु श्री हनुमानजी ने करवाया और वानरों को प्रभु श्री रामजी के लिए संगठित किया । |
| 094. |
प्रभु श्री हनुमानजी को जिस समय जिस भूमिका की जरूरत होती है उस भूमिका में वे तुरंत आ जाते हैं । |
| 095. |
जो भी प्रभु श्री हनुमानजी के संपर्क में आता है उसका काम सदैव प्रभु श्री हनुमानजी सुधारते हैं । |
| 096. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने मैत्री संस्कार करवाकर श्री सुग्रीवजी की रक्षा की नहीं तो श्री लक्ष्मणजी के कोप से श्री सुग्रीवजी नष्ट हो जाते । |
| 097. |
जब श्री लक्ष्मणजी क्रोध से श्री सुग्रीवजी के राजमहल की तरफ चले तो क्रोध की अवस्था में श्री लक्ष्मणजी के सामने श्री सुग्रीवजी नहीं आए इसलिए पहले भगवती तारा को प्रभु श्री हनुमानजी ने आगे भेजा । प्रभु श्री हनुमानजी को पता था कि श्री लक्ष्मणजी इतने क्रोधी और पराक्रमी हैं और प्रभु से इतनी प्रीति रखते हैं कि प्रभु के लिए किसी का भी नाश कर सकते हैं । |
| 098. |
श्री लक्ष्मणजी की सज्जनता थी कि किसी भी पराई स्त्री के सामने आते ही उनके मस्तक झुक जाता था । यह बात प्रभु श्री हनुमानजी को पता थी इसलिए उन्होंने श्री सुग्रीवजी को कोप से बचाने के लिए भगवती तारा को आगे भेजा । |
| 099. |
कोई भी कठोर चीज जिससे प्रभु और माता को दुःख पहुँचे उसका अनुवाद गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने नहीं किया । श्री वाल्मीकि रामायणजी का प्रसंग जिसमें श्रीराम राज्य के बाद भगवती सीता माता का त्याग का वर्णन है वह गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने अनुवाद नहीं किया । |
| 100. |
सज्जनता की परिसीमा प्रभु श्री रामजी हैं क्योंकि उनके हर व्यवहार में सज्जनता झलकती है । |
| 101. |
भगवती तारा को देखकर श्री लक्ष्मणजी नीचे देखने लग गए और उनका क्रोध कम होता चला गया क्योंकि नीचे देखने से क्रोध ठंडा पड़ जाता है । श्री लक्ष्मणजी के क्रोध के आवेश को प्रभु श्री हनुमानजी ने भगवती तारा को भेजकर ठंडा करा दिया । इस तरह श्री लक्ष्मणजी के क्रोध के वेग को समय बिताकर प्रभु श्री हनुमानजी ने शांत करवाया । |
| 102. |
प्रभु श्री रामजी के दुःख का कारण बनने वाले सभी पर श्री लक्ष्मणजी क्रुद्ध हो जाते थे । वे श्री दशरथजी पर, श्री भरतलालजी पर भी क्रोधित हुए पर श्री सुग्रीवजी को क्रोध से प्रभु श्री हनुमानजी ने बचाया । |
| 103. |
श्री सुग्रीवजी ने श्री लक्ष्मणजी से कहा कि वानरों की सेना को बुलाया है तो श्री लक्ष्मणजी को थोड़ी शांति मिली । असल में बुलावा प्रभु श्री हनुमानजी ने भेजा था जिसके कारण प्रभु श्री रामजी और श्री लक्ष्मणजी को संतोष हुआ कि श्री सुग्रीवजी ने प्रभु का काज को भुलाया नहीं है । |
| 104. |
लंका दक्षिण में थी इसलिए दक्षिण की तरफ जाने वाली टुकड़ी में प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु श्री रामजी ने भेजा । श्री जटायुजी ने बता दिया था कि भगवती सीता माता को लेकर रावण दक्षिण की तरफ गया है । |
| 105. |
दक्षिण दिशा में जाने वाली टुकड़ी के वानर जब प्रभु से मिले और प्रणाम किया तो एक ने भी नहीं पूछा कि भगवती जानकी माता कैसी दिखती हैं, कोई निशानी तो दें । यह सिर्फ प्रभु श्री हनुमानजी ने पूछा । |
| 106. |
भगवती जानकी माता विश्वास करें कि मैं प्रभु का दूत हूँ इसलिए विश्वास निर्माण के लिए निशानी प्रभु श्री हनुमानजी ने मांगी । इसलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने लिखा बुद्धि में सबसे वरिष्ठ यानी सबसे आगे प्रभु श्री हनुमानजी हैं । |
| 107. |
बिना जलपान के सभी वानर व्याकुल हो गए और सबने हिम्मत छोड़ दी, आत्मदाह करने के लिए तैयार हो गए । सबने उत्साह को त्याग दिया पर प्रभु श्री हनुमानजी अति उत्साहित बने रहे । यह फर्क है वानरों में और प्रभु श्री हनुमानजी में । |
| 108. |
प्रभु श्री हनुमानजी इतना चिंतन करके सब कार्य करते हैं । उनके जैसा चिंतन किसी से नहीं होता । |
| 109. |
एक गुफा के समीप जैसे ही प्रभु श्री हनुमानजी ने कुछ पंछी देखे वैसे ही उन्होंने अनुमान लगाया कि जलाशय आसपास ही होगा । उन्होंने भांप लिया कि जलाशय पास में होगा, यह प्रभु श्री हनुमानजी के चिंतन का प्रभाव था । |
| 110. |
भूख, प्यास, थकान और अवसाद में सभी वानर थे पर प्रभु श्री हनुमानजी इतने तरोताजा और उत्साही क्यों बने रहे । क्योंकि उन्होंने प्रभु द्वारा दी गई अंगूठी को अपने मुख में रख लिया था । उन्होंने अपनी उँगली में या जनेऊ में अंगूठी को नहीं रखा क्योंकि मुद्रिका पर श्रीराम नाम अंकित था । श्रीराम नाम को मुख में रखा जाता है । सूत्र यह है कि सारे साधन थक जाएंगे (वानरों की तरह) पर नाम का साधन कभी थकने वाला नहीं है । प्रभु श्री महादेवजी ऐसी श्रीराम नाम की व्याख्या करते हुए भगवती पार्वती माता को कहते हैं । |
| 111. |
साधन अनेक पर सभी साधनों का कलियुग में शिरोमणि साधन है प्रभु का नाम जप । इसलिए प्रभु नाम जप का कभी भी जीवन में त्याग नहीं होना चाहिए । |
| 112. |
अन्य साधन शुरू में अच्छे लगते हैं पर बाद में थकान हो जाती है पर प्रभु नाम जप का साधन कभी थकाने वाला नहीं है । इसलिए उसे शास्त्रों में कलियुग का शिरोमणि साधन कहा गया है । |
| 113. |
सच्चा वैराग्य का अर्थ है कि इहलोक के फल की या पदार्थ की इच्छा नहीं और परलोक के पदार्थ की भी इच्छा नहीं । |
| 114. |
कर्मकांड में जितने नियम हैं उतना उनका पालन करना आज कलियुग में लगभग असंभव है । द्रव्य शुद्धि, काल शुद्धि, शरीर शुद्धि, मंत्र शुद्धि आज के समय ऐसा होना लगभग असंभव है । इसलिए कलियुग के लिए नाम जप को ही सबसे बड़ा आधार माना गया है । |
| 115. |
प्रभु नाम जप का त्याग और भक्ति का त्याग कर कलियुग में कितना भी योग, वेदांत और कर्मकांड करें सब विफल होगा । |
| 116. |
भक्ति में अंतिम चीज प्रभु नाम जप है, उसे कभी नहीं त्यागना चाहिए । |
| 117. |
एक प्रभु का नाम रोज ठीक से लेने का अभ्यास से सभी सिद्धियां हमारे सामने खड़ी हो जाती है । प्रभु श्री हनुमानजी कभी भी मुँह से और अंतःकरण से प्रभु नाम का त्याग नहीं करते । |
| 118. |
प्रभु का नाम सदैव मुँह में लिया जाए यह जरूरी नहीं पर अंतःकरण से सदैव लिया जा सकता है और लिया जाना चाहिए । |
| 119. |
साधना के बल पर प्रभु की अनुभूति जिन्होंने प्राप्त की है वे ही सद्गुरु बनने लायक हैं । |
| 120. |
प्रभु श्री हनुमानजी जलाशय की खोज में पहाड़ पर चढ़कर फिर नीचे आकर वानरों को ऊपर लेकर गए । सूत्र यह है कि सच्चे सद्गुरु शिखर पर जाकर प्रभु अनुभूति करके वापस नीचे आते हैं और फिर अपने शिष्यों को प्रभु अनुभूति करवाने के लिए शिखर पर लेकर जाते हैं । संतों को प्रभु की एक-एक श्रीलीला अनेकों-अनेक संदेश देती है । |
| 121. |
हर भूमिका में प्रभु श्री हनुमानजी श्रेष्ठ हैं । वे एक श्रेष्ठ सद्गुरु, प्रभु श्री रामजी के एक श्रेष्ठ कार्यकर्ता और प्रभु श्री रामजी के एक श्रेष्ठ सेवक हैं । |
| 122. |
प्रभु को प्राप्त करके ही जीवन में तृप्ति आ सकती है । इसके अलावा जीवन में तृप्ति लाने का अन्य कोई उपाय नहीं है । |
| 123. |
प्रभु श्री हनुमानजी सदैव इतने उत्साह में क्यों भरे रहते हैं क्योंकि उनके मुख में सदैव प्रभु का नाम रहता है । |
| 124. |
प्रभु श्री हनुमानजी का एक चित्रण इस तरह से हुआ है कि उनके रोम-रोम में श्रीराम लिखा हुआ है । प्रभु श्री हनुमानजी के मुख में श्रीराम, रोम-रोम में श्रीराम, यही उनकी भक्ति का राज है । |
| 125. |
प्रभु की खोज आँखें खोलकर नहीं यानी संसार को देखकर नहीं होती । आँखें बंद करके अंतरात्मा में प्रभु को खोजा जाता है । |
| 126. |
जिसने बाहर देखना बंद कर दिया, संसार के दृश्य देखना बंद कर दिया और अंतःकरण में दृष्टा यानी प्रभु को देखना शुरू कर दिया वही प्रभु को पा जाता है । |
| 127. |
हमारा मन बाहर देखेगा तो उसे भीतर देखने का समय भी नहीं मिलेगा और सुविधा भी नहीं मिलेगी । |
| 128. |
आँखें बंद करने का मतलब मन की आँखें बंद करना, सिर्फ दिखने वाली आँखें बंद कर ली, यह मतलब नहीं है । दिखने वाली आँखें तो खुली रखनी ही पड़ेगी नहीं तो ठोकर लग जाएगी मगर मन की आँखों से संसार को देखना बंद करना होगा । |
| 129. |
जिन आँखों से प्रभु को देखा जा सकता उन आँखों को देखने की शक्ति जो प्रदान करते हैं वे प्रभु ही हैं । |
| 130. |
हमें अंतर्मुखी होना चाहिए पर हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी इंद्रियां हमें बाहर संसार में खींचकर ले जाती हैं । |
| 131. |
विज्ञान ने टेलीस्कोप और माइक्रोस्कोप बनाए हैं पर इनमें लाखों और करोड़ों गुना विकास भी हो जाए तो भी प्रभु को अंतरात्मा में यह नहीं देख पाएंगे । दृश्य को विज्ञान देख सकता है पर दृष्टा को कैसे देखा जाएगा ? सिद्धांत यह है कि दृष्टा यानी प्रभु सिर्फ भक्ति से ही दिखते हैं । |
| 132. |
हमारा हेतु प्रभु की सेवा करना होना चाहिए, सफल हो या असफल हो पर गौरव तो मिलेगा, यह पक्का है । श्री जटायुजी प्रभु सेवा में सफल नहीं हुए और भगवती सीता माता की रक्षा नहीं कर पाए पर फिर भी प्रभु ने उन्हें पितातुल्य सम्मान दिया और अपने लोक भेज दिया । |
| 133. |
प्रभु हमें दिखें इसके लिए भक्ति के संस्कार और भक्ति की योग्यता हमारे भीतर होनी चाहिए । |
| 134. |
निराशा के बीच आशा देने वाले प्रभु श्री हनुमानजी ही हैं । जब सौ योजन का समुद्र देखकर सब निराश हो गए तो प्रभु श्री हनुमानजी ने एक श्रीराम नाम का जयघोष करके समुद्र को लांघने का बीड़ा उठा लिया । |
| 135. |
किसी भी दल का नेतृत्व करने के लिए युवा होना चाहिए, इसलिए प्रभु ने श्री अंगदजी को दक्षिण जाने वाले दल का नेतृत्व सौंपा । राय देने के लिए वृद्ध होना चाहिए जिसे संसार का अनुभव हो इसलिए श्री जाम्बवंतजी को चुना गया । कार्यकर्ता के रूप में अति उत्साहित रहने वाला होना चाहिए इसके लिए प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु श्री रामजी ने चुना । इस तरह सबसे श्रेष्ठ चुनाव प्रभु ने किया । |
| 136. |
प्रभु का कार्य कोई नहीं कर सकता, सौ योजन का समुद्र कोई नहीं लांघ सकता था इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी की आँखों में आंसू आ गए । सूत्र यह है कि प्रभु कार्य नहीं हो रहा है इसका दुःख होना चाहिए । अब तक प्रभु श्री हनुमानजी को अपने बल की विस्मृति थी, इसके बाद श्री जाम्बवंतजी ने उनको उनका बल याद दिलाया तो प्रभु श्री हनुमानजी ने श्रीराम नाम का जयघोष करके एक बार में सागर को लांघने का बीड़ा उठा लिया । |
| 137. |
प्रभु श्री रामजी के तेज, बल और ज्ञान को याद दिलाकर प्रभु श्री हनुमानजी का तेज, बल और ज्ञान को श्री जाम्बवंतजी ने जागृत कर दिया । |
| 138. |
प्रभु श्री हनुमानजी को जागृत करने के लिए उन्हें उनके पराक्रम की पुरानी बातें बताते हैं । सूत्र यह है कि आज भी प्रभु श्री हनुमानजी की स्तुति में उनको उनके पुराने पराक्रम याद दिलाए जाते हैं । |
| 139. |
वानरों को भरोसा श्री सुग्रीवजी का नहीं था, उसको केवल प्रभु श्री हनुमानजी का ही एकमात्र भरोसा था । सूत्र यह है कि जीवन में एक विश्वास सिर्फ प्रभु श्री हनुमानजी का ही रखना चाहिए । |
| 140. |
संसार में जो कोई नहीं कर पाया वह प्रभु श्री हनुमानजी करते हैं क्योंकि संसार में श्रेष्ठतम पराक्रम प्रभु श्री हनुमानजी का है, ऐसा प्रभु श्री रामजी का मत है । |
| 141. |
प्रभु श्री हनुमानजी अपने बल का स्मरण होते ही कहते हैं कि मैं प्रभु का दास हूँ और प्रभु के लिए एक सागर नहीं सौ सागर भी पी जाऊँगा, पहाड़ों को चूर कर दूँगा और एक रावण नहीं हजार रावणों को पराभूत कर दूँगा । सूत्र यह है कि प्रभु श्री हनुमानजी को बल का स्मरण होते ही उनका अतुलित बल जागृत हो जाता है । |
| 142. |
प्रभु श्री हनुमानजी का अभियान सदैव अपने प्रिय प्रभु के लिए होता है । हम अपने स्वार्थ के लिए अभियान करते हैं पर प्रभु श्री हनुमानजी का अभियान प्रभु श्री रामजी के लिए होता है । यह श्रीहनुमत तत्व की महानता है । |
| 143. |
जिसने प्रभु का कार्य किया वही चिरकाल में शांति को प्राप्त करेगा । |
| 144. |
शरीर जिसका भी हो, जितना भी अच्छा हो पर विकार लगेंगे और लगे हुए हैं और वह शरीर नष्ट भी होगा । जिसने "मैं शरीर हूँ", इस भाव का त्याग कर दिया वही शांति को प्राप्त करेगा । |
| 145. |
अप्रिय बातें जैसे मृत्यु जन्म से चिपकी हुई है, समय रहते सुननी चाहिए तभी जीवन में लाभ मिलेगा । |
| 146. |
जो धन हमारे पास है वह किसी का (प्रभु का) दिया हुआ है । |
| 147. |
बुद्धिमानी इसी में है कि शरीर का सदुपयोग प्रभु प्राप्ति के लिए करना चाहिए । संसार हेतु प्रभु को भुलाकर शरीर का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए । |
| 148. |
शरीर का बढ़िया उपयोग किया तो दोबारा शरीर की जरूरत कभी नहीं पड़ेगी, संत श्री ज्ञानेश्वरजी ऐसा श्री ज्ञानेश्वरीजी में कहते हैं । |
| 149. |
शरीर का भक्ति करके सदुपयोग करने वाले को प्रभु तत्व प्राप्त होता है । |
| 150. |
स्थाई शांति प्रभु को प्राप्त करने पर ही जीवन में आएगी । |
| 151. |
हमारी शांति नकारात्मक है यानी हमने दुःख के अभाव को ही शांति मान लिया । जैसे एक कंधे से बोझा दूसरे कंधे पर हस्तांतरित कर देते हैं तो पहले कंधे को आराम मिलता है । वैसे ही हमने दुःख के अभाव को सुख मान लिया । दुःख का अभाव सुख नहीं है । वेदांत तो सुख की नहीं, परम शांति की बात करता है जो प्रभु प्राप्ति से ही संभव होती है । |
| 152. |
परम शांति प्राप्त करनी है तो कोई भी प्रभु कार्य से जुड़ना ही पड़ेगा । |
| 153. |
प्रभु श्री हनुमानजी के समान परम वैराग्य संपन्न कोई भी नहीं है । |
| 154. |
प्रभु श्री हनुमानजी भगवत् अर्पित हैं यानी उनका जीवन प्रभु को पूर्णतया अर्पित है । |
| 155. |
साधन मार्ग पर चलने पर गृह कार्य रूपी पर्वत सामने आते हैं यानी घरेलू अड़चन आते हैं, घर के जंजाल आते हैं । संसार का काम पूरा करके साधन करेंगे, यह कभी होने वाला नहीं है जैसे सागर की लहरें थमने पर स्नान करेंगे, यह सोचने पर कभी स्नान नहीं कर पाएंगे । |
| 156. |
जिंदगी जब तक रहेगी काम से फुर्सत नहीं होगी, फिर भी हमें उसी जिंदगी में समय निकालना चाहिए प्रभु के लिए । |
| 157. |
मनुष्य का जन्म साधन के लिए नहीं बल्कि तीव्र साधन करने के लिए मिला है, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 158. |
स्वर्ण का पर्वत आया तो प्रभु श्री हनुमानजी ने क्या किया, वही हमें करना चाहिए । पर्वत को स्पर्श करके प्रभु कार्य के लिए आगे चल दिए । |
| 159. |
श्री बालकांड में एक जगह प्रभु श्री रामजी की वंदना एक चौपाई में की गई है और प्रभु नाम की वंदना बहुत सारी चौपाई में की गई है । सूत्र यह है कि प्रभु ने रामायणजी में काफी भक्तों को तारा पर प्रभु के नाम ने करोड़ों-करोड़ों को तारा है, तार रहा है और तारता रहेगा । |
| 160. |
प्रभु का नाम अग्नि की तरह है, जानकर या अनजान में लिया जाए तो पाप तो जलेंगे ही जैसे अग्नि को जानकर या अनजाने में स्पर्श किया जाए तो वह जलाएगी ही । |
| 161. |
सौ के ऊपर की संख्या मंत्र को और नाम जप को पक्का कर देती है । इसलिए एक सौ आठ बार की माला का विधान है । |
| 162. |
भोजन से पहले प्रभु का भजन जरूर होना चाहिए । |
| 163. |
संतों को सभी अपने लगते हैं, कोई भी पराया नहीं लगता । |
| 164. |
पुनः पुनः प्रभु श्री रामजी का जयघोष करते-करते प्रभु श्री हनुमानजी ने लंका के लिए उड़ान भरी । सूत्र यह है कि प्रभु का नाम लेकर ही कोई भी कार्य करना चाहिए । |
| 165. |
प्रभु श्री हनुमानजी हमारे सामने वह आदर्श प्रस्तुत करते हैं जिससे कोई भी, किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है । सूत्र यह है कि प्रभु का नाम लेकर जीवन में लक्ष्य की तरफ बढ़ना चाहिए । |
| 166. |
संपूर्ण भारत में भक्त श्री हनुमानजी के रूप में और दक्षिण भारत में परब्रह्म के रूप में प्रभु श्री हनुमानजी की आराधना होती है । |
| 167. |
भक्ति कैसे की जाए, भक्ति के सर्वोच्च आदर्श के रूप में प्रभु श्री हनुमानजी हैं । |
| 168. |
जिन शब्दों का प्रयोग प्रभु श्री कृष्णजी ने गोपियों के लिए किया उन्हीं शब्दों का प्रयोग प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी के लिए किया और प्रभु ने कहा कि हजारों अवतार लेकर भी मैं प्रभु श्री हनुमानजी के ऋण से उऋण नहीं हो सकता । |
| 169. |
भक्ति में दास रस के आदर्श प्रभु श्री हनुमानजी हैं और भक्ति में प्रेम रस का आदर्श गोपियां हैं । |
| 170. |
संत श्री नामदेवजी कहते हैं भक्ति का मार्ग प्रभु श्री हनुमानजी ही हमें दिखाएं । सूत्र यह है कि भक्तों को भक्ति कैसी करनी चाहिए यह प्रभु श्री हनुमानजी से सीखना चाहिए । |
| 171. |
जिसको जीवन में कोई महान लक्ष्य पाना है उसे प्रभु श्री हनुमानजी का चरित्र जरूर पढ़ना चाहिए तभी उसकी विजय संभव होगी । |
| 172. |
परम वैराग्य के स्वरूप प्रभु श्री हनुमानजी हैं । |
| 173. |
संत विनोद में कहते हैं कि जब कोई साधक संन्यास लेना चाहता है तो माया उसके परिवार के लोगों की बुद्धि में प्रवेश करके बाधा उत्पन्न करती है । इसलिए सभी संत को संन्यास लेने में कठिनाई होती है क्योंकि उनके माता, पिता, भाई, बहन, पत्नी, पुत्र सब विपरीत तर्क देते हैं और संन्यास नहीं लेने देते । इसलिए संत अंत में बिना बताए घर-बार छोड़कर चले जाते हैं और संन्यास ले लेते हैं । |
| 174. |
संत कर्तव्य बुद्धि यानी संसार और परिवार के प्रति कर्तव्य बुद्धि का त्याग करके प्रभु मार्ग पर चल पड़ते हैं । |
| 175. |
संत के जीवन में कोई घटना निर्णायक स्थिति को उनके जीवन में लाती है जब वे प्रभु प्राप्ति के प्यास के कारण प्रभु मार्ग पर चल पड़ते हैं । |
| 176. |
जब जीवन में बाधाएं आती है तो उन पर प्रहार करना पड़ता है जैसे प्रभु श्री हनुमानजी ने पहाड़ों के ऊपर किया और उन्हें वापस नीचे दबा दिया । |
| 177. |
तीन श्रेणी के साधक होते हैं - मंद साधक, मध्य साधक और तीव्र साधक । हमें तीव्र साधक बनना चाहिए जैसे प्रभु श्री हनुमानजी और गोपियां थी । |
| 178. |
तीव्र साधक की विशेष निशानी होती है कि वह प्रमादी यानी प्रमाद करने वाला नहीं हो सकता । |
| 179. |
तीव्र साधक को जीवन में प्रभु को पाने की तीव्र व्याकुलता होती है । |
| 180. |
तीव्र साधक के लक्षण होते हैं कि उसकी एक ही लगन, मन में एक ही अखंड विचार प्रभु प्राप्ति का होता है । |
| 181. |
जैसे बाण सीधा लक्ष्य की ओर चलता है वैसे ही तीव्र साधक प्रभु के कार्य को लक्ष्य बनाकर चलते हैं । गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने यही लिखा कि जैसे रामबाण चलता है वैसे ही प्रभु श्री हनुमानजी लंका की तरफ चले । |
| 182. |
श्रीमद् भागवतजी महापुराण में तीव्र भक्ति की बात है, केवल भक्ति की बात कहीं भी नहीं कही गई है । |
| 183. |
जो छोटे-छोटे कामों में फंस गया वह बड़ा काम या बड़ा लक्ष्य कभी प्राप्त नहीं कर सकता । इसलिए सूत्र यह है कि संसार के छोटे कामों की उपेक्षा करनी चाहिए । |
| 184. |
प्रभु को साथ लेने से सब अनुकूलता साथ हो जाती है । हमारे सभी सांसारिक कार्य अनुकूल हो जाते है जब हम प्रभु का कार्य करने का बीड़ा उठाते हैं । |
| 185. |
मेरी बात और परिवार की बात में परिवार की बात सुननी चाहिए । परिवार की बात और गांव की बात में गांव की बात सुननी चाहिए । गांव की बात और राष्ट्र की बात में राष्ट्र की बात सुननी चाहिए । राष्ट्र की बात और प्रभु की बात में प्रभु की बात सुननी चाहिए । |
| 186. |
सूत्र यह है कि व्यापक के लिए छोटों का त्याग करना चाहिए । प्रभु के लिए परिवार, गांव, राष्ट्र की उपेक्षा की तो एकदम ठीक, ऐसा सभी संतों ने किया है । |
| 187. |
संत अपने परिवार, पत्नी, पुत्र की उपेक्षा करके ही प्रभु साक्षात्कार तक पहुँचे हैं । |
| 188. |
प्रभु के लिए महान कार्य में चलने पर विश्राम नहीं करना । प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु कार्य में चलने पर विश्राम नहीं किया और मैनाक पर्वत के अनुरोध को मना कर दिया, उनका सम्मान किया पर विश्राम नहीं किया । |
| 189. |
सौ योजन के समुद्र में विश्राम की कोई व्यवस्था नहीं थी, स्वयं मैनाक पर्वत ने आकर विश्राम का स्थान दिया, प्रेम से प्रार्थना की । प्रभु श्री हनुमानजी के धर्मपिता श्री पवनदेवजी द्वारा उपकार किया उनका मित्र था । इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी ने बल प्रहार से दबाया नहीं और अदभुत बुद्धि का परिचय दिया, रुके नहीं और अभिमान भी नहीं किया । बस प्रणाम किया, अपमान भी नहीं किया । इसलिए प्रणाम करने के लिए स्पर्श किया और कहा कि रामकाज किए बिना मेरे को कहाँ विश्राम है । |
| 190. |
साधन करते-करते माया द्वारा बाधाएं आती हैं । उपहार के रूप में आती है, सिद्धियों के रूप में आती है, कही हुई बात सत्य होने लगती है, भविष्य की बातें पता चलने लगती है । साधक को लगता है कि अब मैं बड़ा बन गया । क्या करना चाहिए ? उन सिद्धियों को स्वीकार नहीं करना चाहिए और मैंने स्वीकार नहीं किया उसका अहंकार भी नहीं करना चाहिए । दोनों करने पर साधक का साधन मार्ग से पतन हो जाता है । |
| 191. |
सिद्धियां जल्दी नष्ट हो जाती है इसलिए उनको स्वीकार नहीं करना चाहिए । प्रभु श्री हनुमानजी ने मैनाक पर्वत, जो सिद्धियों का पर्वत था, उस पर विश्राम स्वीकार नहीं किया । |
| 192. |
सिद्धियां मिलती है फिर चली जाती है । चली जाने के बाद लोग सिद्धियों का ढ़ोंग करना आरंभ कर देते हैं जो और भी गलत होता है । |
| 193. |
श्री रामकृष्णजी परमहंस को इतनी सिद्धियां मिल गई पर वे भगवती काली माता के सामने रोते कि इन्हें हटाओ, मुझे नहीं चाहिए, मैं क्या करूँगा किसी का भविष्य जानकर । माता ने कृपा करके सिद्धियों को उनके मार्ग से हटा दिया । |
| 194. |
जिसने सिद्धियों का उपयोग किया वह गिरेगा, जिसने सिद्धियों का उपयोग नहीं किया पर अहंकार किया कि मैंने सिद्धियों का उपयोग नहीं किया वह भी गिरेगा । |
| 195. |
किसी संत को जगत व्यवहार में दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए, उन्हें केवल प्रभु की भक्ति और प्रभु प्रेम का प्रचार करना चाहिए । संसार जैसा चल रहा है वैसे चलने देना चाहिए । |
| 196. |
मैनाक पर्वत सिद्धियों का पर्वत था इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी ने उसे स्वीकार नहीं किया, आदर दिया और बिना रूके प्रभु कार्य के लिए आगे चल दिए । |
| 197. |
संत श्री नामदेव जी ने चिरंजीव पद लिखा है । जिसे चिरंजीवी अवस्था प्राप्त करनी है उसे क्या-क्या प्रलोभन से बचना चाहिए, इसका उल्लेख उन्होंने किया है । |
| 198. |
साधक को प्राप्त होने वाली सुविधा, साधक को प्राप्त होने वाली सिद्धियों से हमेशा उसे बचना चाहिए । |
| 199. |
जैसे कोई संत ने कहा कि ऊँचे आसन पर बैठ जाओ तो इनकार करने से संत का अपमान होगा, बैठ गए तो मर्यादा का उल्लंघन होगा । तो क्या करना चाहिए ? उस समय ऊँचे आसन का स्पर्श करके नीचे बैठ जाना चाहिए । |
| 200. |
सुंदर वाक्य के रूप में यानी बड़ाई के रूप में, सुविधा के रूप में, सिद्धियों के रूप में जीवन में चुनौतियां आती है पर उसे न स्वीकार किया, न धिक्कारा, न अहंकार किया, ऐसा करने का मार्ग हमें प्रभु श्री हनुमानजी ने दिखाया है । |
| 201. |
प्रभु प्राप्ति के लिए हमें जीवन में बहुत कम समय मिला है । इसलिए जीवन में ज्यादा विश्राम का समय हमारे पास बिलकुल भी नहीं है । प्रभु श्री हनुमानजी ने इसलिए जीवन में विश्राम नहीं किया और प्रभु का काज किया और प्रभु की सेवा की । |
| 202. |
प्रभु श्री हनुमानजी पुरुषार्थ के देव हैं । |
| 203. |
रोज अपने स्वयं को उत्साहित करते रहना चाहिए । मैं ऐसा कर सकता हूँ, ऐसा करूँगा, ऐसा करते रहूँगा, ऐसा अपने आपको कहते रहना चाहिए । यह श्री योग वशिष्ठजी का सिद्धांत है । |
| 204. |
प्रभु श्री हनुमानजी को जागरण की जरूरत होती है । इसलिए श्री जाम्बवंतजी ने उन्हें जागृत किया । |
| 205. |
हमें भी प्रभु श्री हनुमानजी की स्तुति में उन्हें जागृत करना चाहिए । उनके भजन में, स्तुति में, प्रार्थना में, चालीसा में सबमें जागरण प्रधानता से किया गया है । प्रभु श्री हनुमानजी का जागरण इस प्रकार होता है कि उनको कहना होता है कि कौन-सा काम जग में है जो आप नहीं कर सकते हैं और उन्हें उनके पूर्व में किए हुए कार्यों को याद दिलाना पड़ता है । |
| 206. |
बल और बुद्धि की परीक्षा लेने देवताओं ने सुरसा माता को भेजा । बल देखा कि सौ योजन का मुँह बढ़ाया तो प्रभु श्री हनुमानजी ने अपना आकर दुगुना किया । बुद्धि देखी कि प्रभु श्री हनुमानजी अति लघु रूप होकर मुँह में प्रवेश करके बाहर निकल गए । |
| 207. |
शास्त्रों में अदभुत रस का प्रयोग किया गया है । करोड़ों पुत्र इसका मतलब करोड़ नहीं बल्कि बहुत सारे पुत्र हैं । जैसे हम कहते हैं कि हजार बार बोला यह काम कर दो, हम बोलते तो दो-तीन बार हैं पर कहा जाता है हजार बार कहा, यह अदभुत रस होता है । |
| 208. |
सूत्र यह है कि अदभुत रस नहीं होगा तो कौन कथा सुनेगा ? इसलिए अदभुत रस के साथ श्रृंगार रस, वीर रस और सभी आठ प्रकार के रसों का कथा में समावेश किया गया है । |
| 209. |
प्रभु श्री हनुमानजी की बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए सुरसा माता ने अपना मुँह इतना बड़ा खोला । प्रभु श्री हनुमानजी ने अपना आकर दुगुना करके और फिर छोटे होकर मुँह में प्रवेश करके अपनी बुद्धि की परीक्षा दी । |
| 210. |
प्रभु श्री हनुमानजी अपना रूप दुगुना करते गए कि सुरसा माता को इतना बड़ा मुँह खोलना पड़ा । फिर उसको बंद करने में समय लगेगा इसलिए तुरंत लघु रूप लेकर प्रभु श्री हनुमानजी अंदर गए और वापस बाहर निकल आए । |
| 211. |
स्तुति सभी देवों को भाती है । इसलिए देवताओं की स्तुति करनी चाहिए । |
| 212. |
प्रभु श्री हनुमानजी की स्तुति रस की परीक्षा लेने सुरसा माता आई थी । प्रभु श्री हनुमानजी ने क्या किया ? बड़ा रूप किया और लघु रूप किया । बताया कि यह बड़ा रूप पराक्रम वाला प्रभु के बल के कारण है और यह लघु रूप यानी यह मेरा छोटा-सा खुद का रूप है । तो मेरा कोई पराक्रम नहीं है, पराक्रम प्रभु श्री रामजी का है और स्तुति परीक्षा में प्रभु श्री हनुमानजी उत्तीर्ण हो गए । |
| 213. |
स्तुति हमारे अहंकार को बढ़ाती है । इसलिए हमें अपनी स्तुति से बचना चाहिए । |
| 214. |
स्तुति की पराकाष्ठा तब हुई जब सौ योजन का मुँह खोल यह संकेत दिया कि सौ प्रतिशत स्तुति हो गई । फिर सौ प्रतिशत स्तुति होने पर प्रभु श्री हनुमानजी ने इतना छोटा लघु रूप बना लिया । पहले पुरुषार्थ बढ़ाया, फिर स्तुति हुई तो अपना अति लघु रूप दिखा शून्य हो गए । |
| 215. |
सूत्र यह है कि पुरुषार्थ की बेला में अपने पराक्रम को दुगुना करते जाना चाहिए और अपनी स्तुति की बेला में लघु रूप ले लेना चाहिए । |
| 216. |
श्री ज्ञानेश्वरीजी अदभुत श्रीग्रंथ है जिसके अंत में संत श्री ज्ञानेश्वरजी ने क्या लिखा ? मैंने कुछ भी नहीं किया, यह प्रभु कृपा के कारण हुआ, जो मेरे मुँह से निकाला वह प्रभु कृपा के कारण निकला, यह शून्यता जीवन का सबसे बड़ा अलंकार है । |
| 217. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने पुरुषार्थ की पराकाष्ठा और फिर शून्यता की पराकाष्ठा करके दिखाया । |
| 218. |
निंदा को पचाना कठिन है पर स्तुति को पचाना उससे भी कठिन होता है । स्तुति बड़ों-बड़ों को गिरा देती है, यह सूत्र है । |
| 219. |
स्तुति प्रभु श्री हनुमानजी को हिला भी नहीं पाई, पतन नहीं करवा पाई, गिरा भी नहीं पाई और प्रभु श्री हनुमानजी जीत गए, उत्तीर्ण हो गए । |
| 220. |
छत्रपति श्री शिवाजी ने इतनी लड़ाई लड़ी, सदैव अपने से दुगुनी सेना से, फिर भी जीते क्योंकि कोई भी युद्धनीति को उन्होंने दोबारा काम में नहीं लिया । इसलिए दुश्मन उनको भांप नहीं पाए कि अब वे आगे क्या करेंगे ? यह उनकी माता द्वारा उन्हें बचपन से ही श्री महाभारतजी को पढ़ाने का फल था । |
| 221. |
विजयी व्यक्तित्व के शिरोमणि प्रभु श्री हनुमानजी हैं । |
| 222. |
छाया को पकड़कर भी गिराया नहीं जा सकता इसलिए संदेह, बदनामी हमें गिरा देती है । |
| 223. |
उत्तम पुरुष इतने पारदर्शी होते हैं कि अपने विषय में संदेह, बदनामी उठने ही नहीं देते । कोई ऐसा काम नहीं करते जिससे संदेह और बदनामी हो । |
| 224. |
प्रभु श्री हनुमानजी में चिंतन शक्ति अदभुत है, ऐसा प्रभु श्री रामजी कहते हैं । |
| 225. |
सफलता उसे मिलेगी जो हृदय में प्रभु श्री रामजी को धारण करके कार्य करेगा, ऐसा लंकनी ने प्रभु श्री हनुमानजी से कहा । |
| 226. |
रावण की लंका भोग नगरी थी, वहाँ स्थान-स्थान पर फिसलने के आयाम थे । इससे कौन बच निकलेगा ? शब्द, स्पर्श, रूप, रंग से भरी लंका में वही सफल होगा जो क्षणभर के लिए भी प्रभु का विस्मरण नहीं करेगा, वही बच पाएगा । |
| 227. |
सूत्र यह है कि विषयों की वाटिका संसार में विचरण करने में वही सफल होता है जो संसार में रहकर भी प्रभु का क्षणभर के लिए भी विस्मरण नहीं करता । |
| 228. |
जो मैंने गलत काम किया नहीं उसका फल मुझे भोगना नहीं पड़ेगा और जो मैंने अच्छा काम किया उसका फल कोई मेरे से छीन नहीं सकता, यह सूत्र है । |
| 229. |
संसार के विषयों से बचने के लिए प्रभु का स्मरण अत्यंत आवश्यक है । |
| 230. |
किसी ने भी नहीं देखा पर पराशक्ति प्रभु सब कुछ देख रहे हैं, यह भय है तो हम नियंत्रण में रहेंगे । |
| 231. |
पाप से निर्भय कभी नहीं होना चाहिए । नर्क का डर, प्रभु का डर सदैव रखना चाहिए । प्रभु का भय जीवन में उद्धार करने वाला भय होता है, यह सूत्र है । |
| 232. |
हमें पाप का डर लगना चाहिए । पाप का डर कभी समाप्त नहीं होना चाहिए । अगर ऐसा होता है तो यह जीवन का सबसे बड़ा नुकसान होता है । डर के कारण ही हम पाप से दूर रहते हैं, यह सूत्र है । |
| 233. |
जीवन में नैतिकता रखनी है तो आस्तिकता रखनी होगी यानी प्रभु में आस्था और प्रभु का भय जीवन में होना आवश्यक है । |
| 234. |
भोग की नगरी लंका में कोई भी स्वयं को संभाल नहीं पाया, सफल नहीं हो पाया । केवल श्री विभीषणजी ही ऐसा कर पाए क्योंकि वे प्रभु को हरदम याद रखते थे । |
| 235. |
नियंत्रण और निर्भयता दोनों प्रभु देते हैं । गलत नहीं करने का नियंत्रण और सही करने पर निर्भयता । |
| 236. |
कोई भी साथ हो या नहीं हो, अंतर्यामी प्रभु सदैव हमारे साथ ही रहते हैं । |
| 237. |
संकट में पड़ने पर नास्तिक भी प्रभु को याद करते हैं फिर भी प्रभु कहते हैं कि मैं उसके काम आऊँगा । |
| 238. |
श्री गजेंद्रजी ने पहले प्रभु को कभी याद नहीं किया, पहली बार किया और प्रभु ने तत्काल आकर उनका उद्धार किया । |
| 239. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि तुम (जीव) मुझे प्रेम करो या नहीं करो मगर मैं सदैव तुमसे प्रेम करता हूँ । यह प्रभु की अतुलनीय करुणा और कृपा है । |
| 240. |
स्वामी श्री विवेकानंदजी विदेश में धर्म यात्रा पर गए । रुपए, कपड़े, धर्म सभा का पता सब छूट गया यानी चोरी हो गया । तीन घरों को उन्होंने खटखटाया सबने उन्हें धिक्कार कर निकाल दिया । उन्होंने भगवती काली माता को याद किया । अपने पास न कपड़े थे, न रुपए, न धर्म सभा का पता था जहाँ उन्हें जाना था । तभी एक महिला आई और उन्होंने कहा कि आपको प्रवचन के लिए धर्म परिषद जाना है और मैं लेने आई हूँ । किसने यह किया ? उनकी एक प्रार्थना ने किया, जगतजननी माता ने स्वयं किया । स्वामी श्री विवेकानंदजी का यह अनुभव उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखकर रखा है । |
| 241. |
शास्त्रों और संतों ने निशाचर का अर्थ यह किया है कि जो राक्षस हैं वे ही मात्र निशाचर नहीं हैं बल्कि जो निशा यानी रात में चरता है यानी खाता, पीता और मौज करता है वह भी कलियुग में निशाचर है । |
| 242. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने लंका में रावण के महल में भगवती सीता माता की खोज में अगणित स्त्रियों को गलत अवस्था में देखा पर प्रभु कृपा साथ लेकर गए थे इसलिए कोई विकृति नहीं आयी और कोई गलत असर नहीं हुआ । |
| 243. |
सूत्र यह है कि बुराइयों को देखकर भी पतन तभी संभव नहीं होता जब प्रभु हमारे साथ होते हैं । |
| 244. |
श्री वाल्मीकि रामायणजी में सत्तर श्लोकों में प्रभु श्री हनुमानजी ने रावण के महल के ऊपर बैठकर चिंतन किया जब रावण के महल में भगवती सीता माता नहीं मिली । मुझे आगे क्या करना है इसका चिंतन प्रभु श्री हनुमानजी ने किया । |
| 245. |
सूत्र यह है कि प्रभु श्री हनुमानजी कैसे चिंतन करना चाहिए, यह हमें सिखाते हैं । यह सीखना जीवन में बहुत जरूरी होता है । |
| 246. |
सारे विकल्प का प्रभु श्री हनुमानजी ने चिंतन स्वरूप में विचार किया और बार-बार चिंतन करते रहे, करते रहे और उसके बाद प्रभु श्री हनुमानजी ने आगे क्या करना है इसका निर्णय लिया । |
| 247. |
प्रभु को कितना कष्ट और दुःख होगा अगर मैं (हनुमान) जाकर कहूँगा कि मैं माता को खोज नहीं पाया । प्रभु को कष्ट और दुःख न हो इस विचार से प्रभु श्री हनुमानजी लंका में भगवती सीता माता की खोज करते रहे । |
| 248. |
अपने कार्य का चिंतन एकांत में बैठकर जरूर करना चाहिए । |
| 249. |
मनुष्य के विकास का सच्चा मूल और लक्ष्य प्रभु की प्राप्ति है और ऐसा होने तक कभी थकना नहीं चाहिए । कुछ भी हो जाए लक्ष्य तक जा पहुँचने से पहले थकान महसूस नहीं होनी चाहिए । |
| 250. |
कर्म, कर्म और पूर्ण कर्म करना, यही सफलता का एकमात्र मार्ग है । कर्मयोग का यह अदभुत सिद्धांत है । |
| 251. |
प्रभु श्री रामजी का बार-बार स्मरण करने से प्रभु श्री हनुमानजी अपने आपको अति उत्साहित महसूस करते हैं । |
| 252. |
सूत्र यह है कि प्रभु के स्मरण में अदभुत शक्ति होती है । |
| 253. |
प्रतिज्ञा में अहंकार होता है इसलिए प्रतिज्ञा नहीं करनी चाहिए अपितु प्रभु के लिए संकल्प लेना चाहिए । प्रभु के लिए संकल्प लेने से अहंकार नहीं होता और उस संकल्प को पूर्ण करने के लिए प्रभु का बल और अनुग्रह मिलता है । |
| 254. |
भारतवर्ष की महिमा देखे कि यहाँ युद्ध में भी श्रीहरि नाम लिया जाता था । छत्रपति श्री शिवाजी हर युद्ध से पहले “हर हर महादेव” का जयघोष बार-बार करवाते थे । |
| 255. |
प्रभु का नाम तीन काम करता है । पहला, किसी ने श्राप दिया तो श्राप मुक्त कर देता है । दूसरा, मन को निर्मल करता है और तीसरा, प्रभु नाम हमें भाव समाधि तक पहुँचा देता है । |
| 256. |
सत्संग सदैव प्रभु दर्शन के प्यास को बढ़ाती है । |
| 257. |
पहले संसार चाहिए, प्रभु बाद में चाहिए - यह सत्संग से पहले की अवस्था होती है । पर सत्संग के बाद की अवस्था होती है कि प्रभु पहले चाहिए, संसार बाद में चाहिए या फिर संसार चाहिए ही नहीं । |
| 258. |
प्रभु न तो दूर हैं और न ही पाने में दुर्लभ हैं । |
| 259. |
मृत्यु से पहले प्रभु की खोज यानी आत्म-साक्षात्कार करना ही है, यह मानव जीवन का उद्देश्य होना चाहिए । |
| 260. |
सत्संग से मृत्यु का डर ही समाप्त हो जाता है । |
| 261. |
जो पाप करने से डरते हैं उन्हें मृत्यु से डरना नहीं होता । जैसे चोरी करने वाले को कानून से डरना पड़ता है पर चोरी नहीं करने वाला कानून के डर से बचा रहता है । |
| 262. |
पाप से डरना शुरू कर दें तो मृत्यु हमें भयभीत नहीं करेगी क्योंकि मृत्यु के समय मृत्यु नहीं अपितु हमारे किए हुए पाप हमें मृत्यु की बेला पर डराते हैं । |
| 263. |
समय का अपमान तब होता है जब हम कहते हैं कि भजन के लिए समय नहीं है क्योंकि हमें समय भजन के लिए ही दिया गया है । |
| 264. |
हजारों जिम्मेदारी के बीच भी हम भोजन और निद्रा के लिए समय निकाल लेते हैं पर भजन के लिए समय नहीं निकालते, यह हमारा कितना बड़ा दुर्भाग्य है । |
| 265. |
समय अभाव में भजन नहीं होता, यह सत्य नहीं है । रुचि अभाव में भजन नहीं होता, यह सत्य है । |
| 266. |
जो बीच-बीच में दिनभर खाते-पीते रहते हैं उनको आलस्य के कारण भजन में रुचि नहीं होती । |
| 267. |
जिन्होंने यानी प्रभु ने आपको घर, संपत्ति, परिवार दिया है उन प्रभु को उसे समर्पित करके उनके भजन में लग जाना चाहिए । |
| 268. |
प्रभु की सभी कथाएं हमें कुछ कहना चाहती है, कुछ संदेश देना चाहती है । उनके तात्पर्य को हमें समझना चाहिए । |
| 269. |
दुनिया में रहना ठीक है पर दुनिया का भरोसा करना ठीक नहीं है । जीवन में भरोसा सिर्फ प्रभु का ही होना चाहिए, यह सूत्र है । |
| 270. |
जीवन में हमारे आधार सिर्फ प्रभु होने चाहिए । जीवन में हमारे मालिक केवल प्रभु होने चाहिए । |
| 271. |
दुनिया के नाराज होने पर हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि दुनिया हमारा आधार नहीं है । हमारे आधार प्रभु हैं और प्रभु के नाराज होने पर हमें डरना चाहिए । सूत्र यह है कि प्रभु हमसे जीवन में कभी नहीं रूठे । |
| 272. |
श्री अंगदजी कहते हैं कि मेरे पैर में कोई विशेषता नहीं थी जब उन्होंने अपना पैर लंका में रौप दिया और सभी राक्षस मिलकर भी उसे हिलाने में नाकाम हुए । श्री अंगदजी कहते हैं कि विशेषता उन प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों में थी जिनका मैंने प्रण करते वक्त आश्रय लिया कि मेरा पैर किसी ने हिला दिया तो वानर सेना बिना युद्ध के लौट जाएगी । |
| 273. |
जो सिर्फ अपने लिए सोचे उसकी बुद्धि संकीर्ण होती है क्योंकि सोचना सबकी भलाई के लिए चाहिए । |
| 274. |
धर्म को न मानने से हमारी हानि निश्चित होगी । |
| 275. |
प्रभु नहीं तो कल्याण नहीं, यह शास्त्रों का और संतों का एकमत सूत्र है । |
| 276. |
प्रभु ही हमें परमार्थ के और अध्यात्म के शिखर पर ले जाते हैं । |
| 277. |
सत्कर्म कितना भी बड़ा किया जाए अगर प्रभु को बीच में नहीं रखा गया तो वह व्यर्थ जाएगा । उदाहरण स्वरूप श्री दक्षजी ने यज्ञ में प्रभु को बीच में नहीं रखा तो उस यज्ञ का विध्वंस हुआ और वह व्यर्थ गया । |
| 278. |
कन्या के जन्म का भी बड़ा उत्सव होना चाहिए । शास्त्रों में कन्या के जन्म के उत्सव को बड़ा स्थान दिया गया है । श्री हिमालयजी ने भगवती पार्वती माता के जन्म का बहुत बड़ा उत्सव मनाया था । |
| 279. |
प्रभु के लिए श्रद्धा हो तो जीवन में राह दिखाने संत स्वतः ही आ जाते हैं । |
| 280. |
भक्ति के हर प्रसंग में भक्ति का प्रतिपादन करने के लिए देवर्षि प्रभु श्री नारदजी बहुत उपयोगी बनकर आते हैं । |
| 281. |
देव, दनुज, नर, ऋषि, और मुनि कोई भी विधि के लेख को नहीं मिटा सकते । सिर्फ प्रभु ही विधि के लेख को मिटा भी सकते हैं और बदल भी सकते हैं । |
| 282. |
अत्यंत जागृत व्यक्ति को भी “काम” मूर्छित कर देता है । श्री विनय पत्रिका में इंद्रजीत को गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने “काम” की संज्ञा दी है जिसने श्री लक्ष्मणजी जैसे जागृत को भी मूर्छित कर दिया । फिर प्रभु श्री हनुमानजी जैसा देव चाहिए जो संजीवनी लाकर मूर्छा दूर करे । |
| 283. |
मनुष्य बनाकर प्रभु श्री ब्रह्माजी सबसे ज्यादा संतुष्ट हुए । सूत्र यह है कि मनुष्य शरीर से प्रभु को पाना सबसे सरल है इसलिए प्रभु श्री ब्रह्माजी परम संतुष्ट हो गए । |
| 284. |
ब्रह्म ज्ञान के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ता क्योंकि हमारे हृदय में ही श्रीब्रह्म हैं । |
| 285. |
सत्संग करते-करते संसार से असंग होना सीखना चाहिए । |
| 286. |
किसी भी छोटी-सी बात पर बिना विचारे प्रभु श्री हनुमानजी कोई कदम नहीं उठाते । कोई भी कार्य करने से पहले वे पूर्ण चिंतन करते हैं । |
| 287. |
जब हम चिंतन में डूबते हैं तो प्रकृति रहस्य खोलने लगती है, भीतर से प्रकाश जागृत होता है, भीतर से प्रभु ही राह दिखाना आरंभ कर देते हैं, यह सूत्र है । |
| 288. |
जब श्री गजेंद्रजी फंसे तब उनके परिवार, पत्नी सब उनके साथ थे इसलिए प्रभु का चिंतन नहीं हुआ । जब सब साथ छोड़ गए और कोई नहीं था तो भीतर से उनकी जागृति हुई क्योंकि एकांत मिला और परिवार का मोह दूर हुआ और प्रभु को पुकारने की प्रेरणा हुई । |
| 289. |
एकांत जैसा कोई विद्यालय नहीं और मौन जैसा कोई पाठ नहीं । |
| 290. |
श्री वाल्मीकि रामायणजी आदि काव्य है यानी सबसे पहले प्रभु श्री रामजी की कथा के रूप में लिखा गया इसलिए आदि काव्य है । फिर कई ऋषियों और संतों ने श्री वाल्मीकि रामायणजी को आधार बनाकर अलग-अलग रामायणजी लिखी । |
| 291. |
लंका की अशोक वाटिका में प्रभु श्री हनुमानजी एक पेड़ के ऊपर ऐसे छुप कर बैठे कि वे तो सब कुछ अशोक वाटिका में देख सकते थे पर उन्हें कोई नहीं देख सकता था । सूत्र यह है कि प्रभु भी हमारे भीतर ऐसे ही बैठते हैं कि प्रभु तो सब कुछ देख सकते हैं पर हम प्रभु को नहीं देख सकते । |
| 292. |
प्रभु श्री रामजी के भगवती जानकीजी के बारे में बताए एक-एक बात को जोड़कर प्रभु श्री हनुमानजी देखते हैं और उनका विश्वास लंका के अशोक वाटिका में दृढ़ होता जाता है कि यही भगवती जानकी माता हैं । |
| 293. |
भगवती जानकी माता के दर्शन करते-करते प्रभु श्री हनुमानजी की आँखों से आंसू बहने लगे क्योंकि यह माता का उनका पहला दर्शन था । वैसे प्रभु श्री हनुमानजी कभी रोते नहीं हैं । यह शोक के आंसू नहीं, भक्ति के आंसू थे । सूत्र यह है कि प्रभु विग्रह के दर्शन करते समय हमारे भी नेत्रों में आंसू आने चाहिए । |
| 294. |
पूरी रात प्रभु श्री हनुमानजी ने भाव विभोर होकर भगवती जानकी माता के दर्शन किए । इतनी तीव्र भक्ति उनके भीतर थी । |
| 295. |
लंका में इतनी विपत्ति के बीच एक धन भगवती जानकी माता के पास था - वह प्रभु नामरूपी धन था । |
| 296. |
प्रभु मार्ग पर चलते हुए सभी दुःखों को शांति के साथ झेलना, यह कलियुग में तप की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है । |
| 297. |
पहले समीक्षा गाड़ियां कितनी, फैक्टरी कितनी इससे नहीं की जाती थी, अध्यात्म में जागृति कितनी है इससे समीक्षा की जाती थी । |
| 298. |
उच्चकुलीन मर्यादा रखने वाले पुरुष अथवा महिला पति-पत्नी को छोड़कर आँख से आँख मिलाकर बात नहीं करते थे, यह भारतवर्ष का गौरव था । |
| 299. |
जितनी कलियुग में मर्यादा कम होगी उतना अपराध बढ़ता जाएगा, यह सिद्धांत है । |
| 300. |
शिथिल यानी कमजोर और प्रबल यानी दृढ़ पतिव्रता की भावना एक कन्या में उसको पिता के घर में दिए संस्कारों के कारण जागृत होती है । |
| 301. |
प्रभु श्री हनुमानजी अत्यंत बलवान होकर भी आवेश में कोई काम नहीं करते । उदाहरण स्वरूप जब अशोक वाटिका में रावण ने भगवती जानकी माता के सामने तलवार निकाली तो प्रभु श्री हनुमानजी चुप रहे । प्रभु श्री हनुमानजी में शौर्य के साथ धैर्य भी है । |
| 302. |
शास्त्र में सूत्र बताया गया है कि शौर्य होना चाहिए पर सही अवसर पर रुकने का धैर्य भी होना चाहिए । |
| 303. |
मानवीय जीवन के सभी सद्गुणों का सर्वोच्च विकास प्रभु श्री हनुमानजी में हुआ, ऐसा प्रभु श्री रामजी का मत है । |
| 304. |
जिनको महान कार्य करना है उन्हें प्रभु श्री हनुमानजी के श्रीचरित्र का अध्ययन करना अति आवश्यक है । |
| 305. |
कोई अविवेकी होता तो रावण ने जब माता को बुरा भला कहा तो वह बीच में कूद पड़ता । प्रभु श्री हनुमानजी में विवेक कूट-कूट कर भरा हुआ है । अविवेकी होने की मिशाल श्री सुग्रीवजी ने दी और आवेश में आकर युद्ध से पहले रावण को देखकर उससे भिड़ गए । प्रभु श्री रामजी के लिए समस्या हो गई बाण मारे तो सुग्रीवजी को लग सकता था । सुग्रीवजी राजा थे और अगर रावण द्वारा पकड़े जाते तो बैठे बैठाए युद्ध हार जाते । यह अविवेक की मिशाल थी । गुस्सा का मौका जीवन में होता है, जो आता है और चला जाता है, उसमें विवेक रखना बहुत जरूरी है । |
| 306. |
रावण द्वारा भगवती सीता माता को बुरा भला कहते समय प्रभु श्री हनुमानजी कूद जाते तो वहीं युद्ध हो जाता और रावण मारा जाता । अत्यंत उत्तेजना के समय स्वयं को रोक कर धैर्य रखना बहुत जरूरी है, यह सूत्र है । |
| 307. |
छत्रपति शिवाजी को ललकारने के लिए उनके दुश्मन ने उनकी कुलदेवी का मंदिर तोड़ा । पर छत्रपति शिवाजी उस समय चुप रहे फिर योजना बनाकर दुश्मन को समाप्त किया । |
| 308. |
सूत्र यह है कि भावना के आवेश में महान कार्य नहीं होते । आवेश को रोकना जरूरी है तभी महान कार्य हो सकते हैं । |
| 309. |
सही कार्य करने के लिए सही समय की प्रतीक्षा करने जितना धैर्य हमारे भीतर होना चाहिए । |
| 310. |
सारे प्रतिकूल लोगों में एक अनुकूल मिल जाता है । उदाहरण स्वरूप लंका की अशोक वाटिका में राक्षसी के बीच भगवती जानती माता को त्रिजटाजी मिली । ऐसे ही सारे अनुकूल में एक प्रतिकूल भी मिल जाता है । |
| 311. |
त्रिजटाजी ने सपने में वानर को देखा, उन्हें युद्ध करते हुए देखा और लंका जलाते हुए देखा । ऐसा वृत्तांत त्रिजटाजी ने भगवती सीता माता को सुनाया और पेड़ पर बैठे प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु का संदेश मिल गया कि लंका जला दो । प्रभु संकेत स्वयं भेजते हैं, यह सूत्र है । |
| 312. |
प्रभु सेवा के आदर्श प्रभु श्री हनुमानजी हैं । वे प्रभु के सर्वोत्तम सेवक हैं । |
| 313. |
जब हम उलझन में होते हैं तो प्रभु हमारे लिए अपनी आज्ञा और सुझाव किसी के मुँह से कहलवाकर उपाय सुझा देते हैं । |
| 314. |
सूत्र यह है और शास्त्र कहते हैं कि प्रभु अनंत मुँह से बोलते हैं । |
| 315. |
किसके मुँह से प्रभु क्या कहते हैं उसे समझने की प्रज्ञा हमारे भीतर होनी चाहिए । |
| 316. |
हमें प्रभु कार्य करने की बुद्धि भी प्रभु ही देते हैं । |
| 317. |
शास्त्र में आत्मदाह करना सबसे बड़ा पाप माना गया है । मनुष्य को कभी अपने प्राणों का त्याग स्वतः नहीं करना चाहिए । |
| 318. |
त्रिजटाजी के जाते ही प्रभु श्री हनुमानजी एकांत पाकर सीधे माता से मिलने नीचे पहुँचते तो माता विश्वास नहीं करती । इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी ने उस माहौल का आकलन किया जिसको श्री वाल्मीकिजी ने चौवालीस श्लोकों में वर्णन किया है कि किस तरह से उन्हें उस माहौल में क्या करना चाहिए । |
| 319. |
प्रभु श्री हनुमानजी के सामने पहला विकल्प था कि बिना माता से मिले लौटकर प्रभु को भगवती जानकी माता के बारे में बता सकते थे । दूसरा विकल्प था कि लौटकर जाऊँ और प्रभु आक्रमण करें इसमें समय लगने वाला है इसलिए माता से मिलकर उन्हें तसल्ली देकर जाऊँ जिससे कि वे आत्मदाह करने की नहीं सोंचे । तीसरा विकल्प था कि लंका का निरीक्षण करना जो युद्ध की योजना बनाने में काम आएगी । चौथा विकल्प था कि रावण और उसकी प्रजा में लंका जलाकर भय उत्पन्न करना । |
| 320. |
प्रत्यक्ष मिलने से पहले वातावरण तैयार करना चाहिए, यह सोचकर प्रभु श्री हनुमानजी ने पेड़ पर बैठे-बैठे भगवती जानकी माता को श्रीराम कथा सुनाना प्रारंभ किया । |
| 321. |
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी मानते थे कि वैसे उन पर प्रभु का ध्यान जाए ऐसे सद्गुण उनमें नहीं हैं । इसलिए वे भगवती जानकी माता से प्रार्थना करते थे कि जब प्रभु अनुकूल हों तो उनका जिक्र प्रभु के सामने कर दें । जैसे एक बेटा अपनी माँ को पिताजी से बात मनवाने के लिए कहता है और सीधे पिताजी को अपनी बात नहीं कहता है वैसे ही गोस्वामीजी ने माता का चुनाव किया प्रभु तक अपनी बात पहुँचाने के लिए । |
| 322. |
प्रभु श्री हनुमानजी मनोविज्ञान यानी मन के विज्ञान के श्रेष्ठ ज्ञाता हैं । इसलिए श्रीराम कथा की शुरुआत उन्होंने की जिसे सुनकर माता स्वयं लालायित हो गई उनसे मिलने के लिए । |
| 323. |
श्रीराम कथा कहने के लिए है प्रभु श्री हनुमानजी ने सोचा कि कौन-सी भाषा का प्रयोग करें, इतना गहरा चिंतन उन्होंने किया । फिर उन्होंने अवध यानी श्री अयोध्याजी की भाषा का चुनाव किया । जैसे विदेश के हवाई अड्डे पर कोई हमारी भाषा में बोले तो तुरंत हमें अच्छा लगेगा और हम उससे बात करने लगेंगे, वैसा ही प्रभाव माता पर हुआ । |
| 324. |
भगवती जानकी माता पर प्रभाव डालने के लिए प्रभु श्री हनुमानजी ने श्रीराम कथा का आरंभ किया । सूत्र यह है कि जगतजननी माता पर भी प्रभाव प्रभु की कथा का ही होता है । |
| 325. |
श्रीराम कथा के पहले वक्ता प्रभु श्री हनुमानजी बने और श्रीराम कथा की पहली श्रोता भगवती जानकी माता बनी । |
| 326. |
हर महापुरुष एकांत में बैठकर प्रभु का चिंतन करते हैं । सूत्र यह है कि एकांत में प्रभु का चिंतन नहीं किया तो महान कार्य पूरा नहीं कर पाएंगे । |
| 327. |
अपनी मधुर वाणी को और भी अधिक मधुर बनाकर प्रभु श्री हनुमानजी ने श्रीराम कथा कहना शुरू किया । सूत्र यह है कि मीठी चीज सबको पसंद आती है, ऐसे ही मीठी भाषा सबको पसंद आती है । |
| 328. |
शब्दों का ऐसा प्रभाव हुआ कि श्रीराम कथा सुनकर भगवती जानकी माता का तन लंका में और मन प्रभु के पास पहुँच गया । प्रभु श्री हनुमानजी श्रेष्ठ वक्ता हैं । वक्ता वह श्रेष्ठ होता है जो मन को कथा के द्वारा प्रभु तक पहुँचा देता है, यह सूत्र है । |
| 329. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने श्रीराम कथा का वर्णन श्री दशरथजी से शुरू किया और भगवती जानकी माता के वन में रहने तक किया, उसके बाद प्रभु से वियोग का वर्णन उन्होंने नहीं किया और रुक गए । उत्तम वक्ता कथा की प्यास को बचाकर रखता है कि श्रोता प्यासा रहे और श्रोता आगे भी कथा सुनना चाहे । जहाँ तक की कथा भगवती जानकी माता को पता थी वहाँ तक की कथा प्रभु श्री हनुमानजी ने कही । फिर प्रभु श्री हनुमानजी ने आगे की बात सुनाना प्रारंभ किया, रुक कर सुनाया, जिससे माता की कथा सुनने की प्यास बढ़ती गई । |
| 330. |
प्रभु श्री हनुमानजी वानर के रूप में ही माता से लंका की अशोक वाटिका में मिले और साधु रूप में नहीं मिले क्योंकि रावण भी साधु रूप लेकर गया था इसलिए माता उस रूप से भ्रमित हो चुकी थी । वानर रूप में क्यों मिले ? क्योंकि त्रिजटाजी ने संकेत दिया था कि वानर रूप में प्रभु का दूत आएगा । |
| 331. |
श्रीराम कथा कहते-कहते प्रभु श्री हनुमानजी ने कहा कि एक वानर श्रीराम दूत बनकर माता को खोजते-खोजते लंका पहुँच गया है । फिर यह कहकर उन्होंने श्रीराम दूत कहकर अपना परिचय दिया और माता के सामने आ गए । |
| 332. |
प्रभु श्री हनुमानजी इतने विनय से भगवती जानकी माता से मिले तो माता समझ गईं कि यह लंका का निवासी नहीं हो सकता क्योंकि लंका में इतना विनय था ही नहीं । |
| 333. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने पहला वाक्य क्या कहा ? मैं प्रभु श्री रामजी का दूत हूँ । प्रभु श्री रामजी मेरे पिता और भगवती जानकी माता मेरी माता हैं । भगवती जानकी माता समझ गईं कि माँ कहने वाला लंका का हो नहीं सकता । |
| 334. |
स्वामी श्री विवेकानंदजी ने अमेरिका में धर्मसभा में ऐसे कहा - बहनों और भाइयों और पूरा सभागार चार मिनट तक ताली बजाता रहा क्योंकि भाई और बहन कहने वाला सिर्फ एक भारतीय ही हो सकता है । यह सिद्धांत भारतवर्ष का है । |
| 335. |
श्री वाल्मीकि रामायणजी में भगवती जानकी माता ने प्रभु श्री हनुमानजी पर विश्वास करने से पहले प्रभु श्री रामजी के श्रीअंग के लक्षण पूछे और प्रभु श्री हनुमानजी ने एक-एक प्रभु के श्रीअंगों का वर्णन इतनी बारीकी से किया कि माता चकित हो गईं । सूत्र यह है कि प्रभु का इतना चिंतन किया जाना चाहिए कि प्रभु के एक-एक श्रीअंगों का हमें ज्ञान हो । |
| 336. |
मन-से-मन मिलना भारतीय परंपरा रही है । भक्त और भगवान का रिश्ता मन-से-मन मिलने वाला ही होता है । |
| 337. |
जीवन के हर ऐश्वर्य की सार्थकता इसमें है कि वह प्रभु के काम आए । अपने बल, बुद्धि, शरीर और वित्त की सार्थकता तब होती है जब वह प्रभु के काम आए । |
| 338. |
जीव अपना कल्याण करना जितना जानता है उससे बहुत ज्यादा प्रभु उसका कल्याण करना जानते हैं और करते हैं । |
| 339. |
भक्ति करते रहें, योग्य समय प्रभु जरूर कल्याण करने आएंगे । |
| 340. |
प्रभु श्री हनुमानजी असाधारण हैं, उनके जैसा कोई भी नहीं है - ऐसा प्रभु श्री रामजी का मत है । |
| 341. |
भगवती जानकी माता ने जब निशानी के तौर पर चूड़ामणि दी तो प्रभु श्री हनुमानजी ने एक ऐसा प्रसंग सुनाने की माता से प्रार्थना की जो सिर्फ प्रभु और माता को पता हो । तब माता ने चित्रकूट में श्रीइंद्र पुत्र जयंतजी का प्रसंग बताया । इतना विवेक प्रभु श्री हनुमानजी में था कि प्रभु विश्वास करें इसलिए ऐसा प्रसंग उन्हें पता होना चाहिए जिसका ज्ञान केवल माता और प्रभु को था । |
| 342. |
जब भगवती माता प्रभु के श्रीकमलचरणों में हमें रख देती है तो प्रभु भी अस्वीकार नहीं कर पाते । उदाहरण स्वरूप जब प्रभु श्री रामजी क्रुद्ध हुए तो देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने जयंतजी को भगवती जानकी माता की शरण में जाने को कहा । प्रभु के पास जाते तो बचते नहीं, माता की शरण में गए तो बच गए । सूत्र यह है कि भगवती माता प्रभु के भी कोप से हमें बचा लेतीं हैं । |
| 343. |
रावण की सभा में प्रभु श्री हनुमानजी ने सबके सामने रावण का भंडाफोड़ किया कि भगवती जानकी माता को प्रभु की अनुपस्थिति में हरण करके रावण लाया है । ऐसा तब कहा जब लंका में यह भ्रम था कि प्रभु से युद्ध करके लाया है । रावण चोरी से लाया, यह प्रभु श्री हनुमानजी ने सबको बताया । कुछ समय में पूरे लंका में यह वार्ता फैल गई कि रावण चोरी से भगवती जानकी माता का हरण करके लाया है । |
| 344. |
रावण को अपना पराक्रम दिखाकर प्रभु श्री हनुमानजी बोले कि मैं सबसे दुबला वानर हूँ । प्रभु श्री हनुमानजी कहते हैं कि मैं तो वेगवान हूँ पर मेरे प्रभु श्री रामजी की वानर सेना में इतने वेगवान और बलवान वानर हैं जिसकी रावण कल्पना भी नहीं कर सकता । रावण डर गया कि प्रभु श्री हनुमानजी से बलवान और वेगवान वानर भी हैं । प्रभु श्री हनुमानजी ने जानबूझकर डराने के लिए यह बात कही । इतने बुद्धिमान प्रभु श्री हनुमानजी हैं । |
| 345. |
जब प्रभु श्री हनुमानजी की पूंछ में अग्नि लगाने से पहले नगर घुमाया गया तो उन्होंने पूरे लंका का निरीक्षण कर लिया । इतने बुद्धिमान प्रभु श्री हनुमानजी हैं कि लंका के पूरे नक्शे को अपने मस्तिष्क में बैठा लिया । |
| 346. |
पूरी लंका जल गई पर प्रभु श्री हनुमानजी की पूंछ का एक बाल भी नहीं जला । क्यों ? क्योंकि भगवती जानकी माता को जब पता चला कि प्रभु श्री हनुमानजी को पकड़कर पूंछ में अग्नि लगा दी तो भगवती जानकी माता श्री अग्निदेवजी से प्रार्थना करने लगीं कि प्रभु श्री हनुमानजी के लिए वे शीतल हो जाए । अपने पतिव्रत धर्म के तेज का आधार देकर, प्रभु के सत्य के तेज का आधार देकर प्रार्थना की । सूत्र यह है कि भगवती माता की दुआ और आशीर्वाद सदैव लेना चाहिए । माता की प्रार्थना का बल प्रभु श्री हनुमानजी के पीछे खड़ा हो गया । |
| 347. |
भगवती जानकी माता की कुशलता जानने के लिए और अपनी कुशलता बताने के लिए लंका जलाने के बाद दोबारा प्रभु श्री हनुमानजी अशोक वाटिका में भगवती जानकी माता से मिलने आए । |
| 348. |
लंका विध्वंस करके आधा युद्ध तो प्रभु श्री हनुमानजी ने ही जीत लिया था । |
| 349. |
बल का प्रयोग जन सेवा के लिए और बल का प्रयोग जन अत्याचार के लिए, दोनों के लिए हो सकता है । सज्जन और धर्मयुक्त पुरुष बल का प्रयोग सदैव जन सेवा के लिए ही करते हैं । |
| 350. |
एक सज्जन को जब विद्या प्राप्त होती है तो वह उस विद्या को लोक उपकार का हेतु बनाता है । |
| 351. |
प्रभु श्री हनुमानजी पहले ऐसे थे जो लंका पहुँचे । इससे पहले रावण लूटपाट करके लंका आ जाता था और सौ योजन का सागर होने के कारण कोई वहाँ तक पहुँच ही नहीं पाता था । |
| 352. |
प्रभु श्री हनुमानजी की छोटी-सी बात में भी कुछ हेतु छिपा होता है । |
| 353. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने लंका दहन करके रावण के अहंकार को तोड़ दिया कि लंका कोई पहुँच ही नहीं सकता । |
| 354. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने इतने सारे राक्षसों और योद्धाओं को खत्म किया कि रावण के मन में भयंकर भय उत्पन्न हो गया । |
| 355. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने लंका जलाकर हर नागरिक को व्याकुल कर दिया और उन्हें बता दिया कि आने वाला समय उनके लिए बर्बादी का है । |
| 356. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने सबको बताया कि करोड़ों की संख्या में वानर आने वाले हैं । एक प्रभु श्री हनुमानजी के पराक्रम से सब घबरा गए तो इतने सारे वानर आएंगे तो उस कल्पना से ही वे सब हताश हो गए कि हम अपनी रक्षा कैसे कर पाएंगे । |
| 357. |
प्रभु श्री हनुमानजी के कारण लंका में सबके मध्य चर्चा चली कि रावण ने भगवती जानकी माता का प्रभु की अनुपस्थिति में हरण करके बहुत बड़ी भूल की है । यह रावण का व्यक्तिगत मामला नहीं है, यह सार्वजनिक मामला है । सबको लगने लगा कि यह मामला सार्वजनिक है और पूरी राक्षस जाति को महंगा पड़ने वाला है । |
| 358. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने अपने आपको सबसे दुबला वानर बताकर सबको डरा दिया कि अगर यह सबसे कमजोर वानर है और इन्होंने इतना बवाल मचा दिया तो करोड़ों की संख्या में जब बलवान वानर आएंगे तो क्या होगा । सारी लंका इस बात से डर गई । |
| 359. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने लंका के मंत्रिमंडल के मंत्रियों में फूट डाल दी । फूट वाले मंत्री श्री विभीषणजी के साथ होकर बाद में प्रभु के शरणागत हो गए । |
| 360. |
प्रभु श्री हनुमानजी के लंका दहन के बाद यह पहला प्रसंग था जब रावण को बहुत जोरदार धक्का लगा । |
| 361. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने अपने बल से सबको इतना व्याकुल कर दिया कि उनके नाम से सब डरने लग गए । |
| 362. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने आने वाले युद्ध के लिए लंका की सेना का पूरा उत्साह ही खत्म कर दिया, उनका पूरा मनोबल ही तोड़ दिया । |
| 363. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने रावण के रथ, हाथी, घोड़े, शस्त्र गृह को जलाया और युद्ध में काम आने वाली सभी चीजों का विध्वंस कर दिया । |
| 364. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने भगवती सीता माता को पूरी तरह आश्वस्त कर दिया कि अब जल्दी ही उनके दुःख का निवारण होने वाला है । माता को आशा की किरण दिखा दी । सामने आशा दिखती है तो कष्ट में भी प्राण धारण करने की प्रेरणा जगती है । |
| 365. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने भगवती जानकी माता को वानरों के बल से अवगत कराया जब माता ने संदेह किया कि वानर राक्षसों के आगे क्या कर सकेंगे ? |
| 366. |
जब प्रभु श्री हनुमानजी ने लंका के लिए उड़ान भरी तो वहाँ बैठे सभी वानर प्रभु श्री रामजी का बल प्रभु श्री हनुमानजी के साथ हो जाए इसके लिए जप, तप, उपासना और उपवास करने लगे । सूत्र यह है कि किया हुआ धार्मिक अनुष्ठान जीवन में बहुत काम आता है । |
| 367. |
शास्त्र कहते हैं कि धार्मिक अनुष्ठान हमारा भाग्योदय करता है । |
| 368. |
दो व्यक्ति लड़ते हैं तो उनके भाग्य में भी युद्ध होता है । प्रभु कृपा से जिसका भाग्य बलवान होता है वही जीतता है । |
| 369. |
श्री अर्जुनजी को तेरह वर्ष तक वनवास में प्रभु श्री शिवजी की उपासना करने को प्रभु श्री वेदव्यासजी ने कहा । चौदहवें वर्ष यही उपासना महाभारत की युद्ध में जीत का कारण बनी । |
| 370. |
जो रोगी होता है उसे प्रभु श्री महादेवजी रोगमुक्त करते हैं । प्रभु श्री महादेवजी से जो आयु चाहता है उसे वे आयु देते हैं । प्रभु श्री महादेवजी से जो धन चाहता है उसे वे धन देते हैं । प्रभु श्री महादेवजी से जो विद्या चाहता है उसे वे विद्या देते हैं । प्रभु श्री महादेवजी से जो शस्त्र चाहता है उसे वे शस्त्र देते हैं जैसे श्री अर्जुनजी को दिए । |
| 371. |
प्रभु श्री रामजी का जयकारा लगाते हुए प्रभु श्री हनुमानजी लंका से लौटकर आए और उन्होंने अपने जयकारे से ही बता दिया कि वे प्रभु का कार्य कर आए हैं । |
| 372. |
उत्तम पुरुष सफलता में भी हमेशा झुके हुए मिलेंगे । सूत्र यह है कि सफलता में भी जिनको झुकने की आदत होती है वे ही उत्तम होते हैं । |
| 373. |
प्रभु को किया एक प्रणाम जीवन में हमारा कल्याण कर देता है । प्रभु को किया प्रणाम हमें जीवन में ऊपर उठाता है, यह सूत्र है । |
| 374. |
युवकों के पास नेतृत्व होना चाहिए और परामर्श देने के लिए वृद्ध होने चाहिए । इन दोनों का मिश्रण होना सबसे श्रेष्ठ होता है । |
| 375. |
दो पात्र ऐसे जिनके पास कोई पद नहीं पर उनके बिना पत्ता भी नहीं हिलता । श्री महाभारतजी में प्रभु श्री कृष्णजी और श्री रामायणजी में प्रभु श्री हनुमानजी । |
| 376. |
दास भक्ति के आदर्श प्रभु श्री हनुमानजी हैं । |
| 377. |
जब वानर मधुबन में जाकर उछलने लगे और फल खाने लगे तो सेवकों ने जाकर सुग्रीवजी को बताया । सुग्रीवजी ने पूछा कि प्रभु श्री हनुमानजी क्या कर रहे हैं ? सेवकों ने कहा कि प्रभु श्री हनुमानजी मौन बैठे हैं और उनकी स्वीकृति से ही ऐसा हो रहा है । तो सुग्रीवजी तुरंत समझ गए कि प्रभु श्री हनुमानजी की उपस्थिति में अगर ऐसा हो रहा है और प्रभु श्री हनुमानजी ने वानरों को रोका नहीं तो इसका मतलब प्रभु का काज हो गया और इसका आनंद मनाया जा रहा है । प्रभु श्री हनुमानजी पर इतना विश्वास सुग्रीवजी को था कि प्रभु श्री हनुमानजी के होते कोई वानर उत्पात नहीं कर सकता । |
| 378. |
प्रभु के सामने जाकर खुद प्रभु श्री हनुमानजी ने स्वयं अपने कार्य का वर्णन नहीं किया । अपने पराक्रम का खुद वर्णन नहीं किया । श्री जाम्बवंतजी ने वह वर्णन किया । |
| 379. |
प्रभु के सामने आकर माता ने क्या संदेश दिया है उसे बोलने से पहले प्रभु श्री हनुमानजी ने दक्षिण दिशा में देखकर भगवती जानकी माता को प्रणाम किया । |
| 380. |
पहला शब्द प्रभु श्री हनुमानजी कहते हैं कि मैं भगवती सीता माता को अपनी दृष्टि से देखकर आया हूँ । प्रभु सबसे पहले माता की सब कुशलता ही जानना चाहते थे । प्रभु श्री हनुमानजी को पता था कि सबसे पहले प्रभु क्या सुनने के इच्छुक होंगे और उन्होंने वही कहा । |
| 381. |
जब भगवती सीता माता की वार्ता लेकर प्रभु श्री हनुमानजी आए तो श्री लक्ष्मणजी के हाथ वार्ता सुनते ही श्री हनुमानजी के लिए जुड़ गए क्योंकि माता की वार्ता दस महीने में पहली बार लाने वाले प्रभु श्री हनुमानजी थे । |
| 382. |
प्रभु श्री हनुमानजी से प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि तुमने इतने उपकार पूरे रघुकुल पर कर दिए कि मैं जन्मों तक तुम्हारा ऋण नहीं उतार सकता । |
| 383. |
प्रभु श्री हनुमानजी से प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि ऋण उतारने की बात तो दूर मैं तो नजर उठाकर तुम्हें देख भी नहीं सकता । |
| 384. |
किसी के उपकार का बखान किस श्रेष्ठ तरीके से किया जा सकता है, यह प्रभु श्री रामजी से सीखने वाली बात है । |
| 385. |
स्तुति की पराकाष्ठा प्रभु श्री रामजी ने तब कर दी जब उन्होंने प्रभु श्री हनुमानजी से उऋण नहीं होने वाली बात बोली । |
| 386. |
ध्यान देने योग्य बात यह है कि स्तुति करने वाला कौन है ? स्वयं प्रभु श्री रामजी ने अपने श्रीमुख से प्रभु श्री हनुमानजी की परम स्तुति की है । |
| 387. |
हमारे ऊपर निर्भर रहने वाले हमारी स्तुति करते हैं तो वह बेकार है पर यहाँ स्तुति कौन कर रहा है ? जिनके ऊपर पूरा ब्रह्मांड निर्भर है, वे प्रभु श्री रामजी स्तुति कर रहे हैं । |
| 388. |
स्तुति करने वाला सर्वोच्च होता है तो स्तुति का महत्व सबसे अधिक होता है, यह सिद्धांत है । |
| 389. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने अपनी स्तुति सुनकर क्या किया ? उनकी प्रतिक्रिया क्या थी ? वे प्रभु प्रेम में व्याकुल होकर प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों में गिर गए और कहा "बचाइए-बचाइए" । क्यों बोले - बचाइए-बचाइए ? कौन-सा संकट था ? प्रभु श्री हनुमानजी परम भक्त हैं । उन्हें पता है कि यह मेरी अंतिम परीक्षा है अहंकार की जिससे मैं स्वयं नहीं बच सकता, इसलिए वे प्रभु के श्रीकमलचरणों को पकड़कर बैठ गए और प्रभु के उठाने पर भी उठे ही नहीं । |
| 390. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने सुरसा माता के सौ योजन के मुँह के सामने बचाइए-बचाइए नहीं कहा और अपने पराक्रम से उत्तीर्ण हो गए । |
| 391. |
सिंहिका ने प्रभु श्री हनुमानजी की परछाई पकड़कर गिराना चाहा तो भी बचाइए-बचाइए नहीं कहा और उसे मार गिराया । |
| 392. |
प्रभु श्री हनुमानजी सभी परीक्षा में उत्तीर्ण होते गए पर अंतिम परीक्षा अहंकार की थी, इसमें प्रभु कृपा बिना उत्तीर्ण होना संभव ही नहीं है । |
| 393. |
अहंकार सभी विकारों का सेनापति है, प्रभु ऐसा श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहते हैं । |
| 394. |
श्री ज्ञानेश्वरीजी में संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि जीव का सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है । वे कहते हैं कि काम, क्रोध, मद, लोभ सब छोटे शत्रु हैं । |
| 395. |
अहंकार बलवानों को, विद्वानों को, धनवानों को ही पकड़ता है । |
| 396. |
पापी, लोभी, क्रोधी के उद्धार की कथा श्रीग्रंथों में मिलेगी पर अहंकारी के उद्धार की एक भी कथा किसी भी श्रीग्रंथ में नहीं मिलेगी । |
| 397. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु कृपा से अहंकार को जीते बिना जीव की गति नहीं है । |
| 398. |
अहंकार का स्थान सारे विकारों के मस्तक पर होता है । |
| 399. |
साधक की अंतिम परीक्षा अहंकार की ही होती है । |
| 400. |
प्रभु श्री हनुमानजी अहंकार की परीक्षा के समय प्रभु श्री रामजी से "बचाइए-बचाइए" कहते हैं मानो यह कहना चाहते हैं कि बाकी सभी परीक्षा से मैं उत्तीर्ण हो गया पर अहंकार के परीक्षा से उत्तीर्ण होने का एक ही उपाय है कि प्रभु के श्रीकमलचरणों को पकड़े रखना । इसके अलावा कोई भी अन्य उपाय नहीं है । यह रास्ता प्रभु श्री हनुमानजी हम सबको दिखा रहे हैं । |
| 401. |
प्रभु श्री हनुमानजी जब प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों में गिर गए तो प्रभु श्री रामजी ने अपना श्रीहस्त प्रभु श्री हनुमानजी के मस्तक पर रखा । प्रभु श्री हनुमानजी का शीश प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुका था और प्रभु का श्रीहस्त उनके मस्तक पर था । प्रभु ने इस तरह उन्हें उनकी अंतिम परीक्षा में उत्तीर्ण किया । |
| 402. |
प्रभु श्री हनुमानजी की यह परीक्षा और उसका अदभुत परिणाम देकर प्रभु श्री महादेवजी कथा कहना भूल गए । भक्ति रस की स्मृति में प्रभु श्री महादेवजी डूब गए । |
| 403. |
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु श्री महादेवजी पुनः अति सुंदर कथा कहने लगे । जब शब्द डूब जाते हैं, विसर्जित हो जाते हैं तो कथा अति सुंदर हो जाती है । |
| 404. |
कथा सुनने का विषय नहीं है बल्कि कथा अनुभव लेने का विषय है । |
| 405. |
कोमल अंतःकरण वाले प्रभु कथा की अनुभूति में डूब जाते हैं । |
| 406. |
शब्दों से सुनी जाने वाली प्रभु कथा सुंदर होती है । अनुभूति से सुनी जाने वाली और अनुभव किए जाने वाली कथा अति सुंदर होती है । |
| 407. |
लंका का सही निरीक्षण प्रभु श्री हनुमानजी ने किया था इसलिए उसकी पूर्ण रूपरेखा प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी के सामने रखी । |
| 408. |
लंका सुरक्षित है, लंका पर कभी आक्रमण नहीं हो सकता, प्रभु श्री हनुमानजी ने रावण की इस सोच को ध्वस्त कर दिया । |
| 409. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने लंकावासियों की नजरों में रावण को अपराधी बना दिया । |
| 410. |
प्रभु श्री हनुमानजी की लंका की यात्रा रावण के विनाश के लिए निर्णायक बन गई । |
| 411. |
जीवन मूल्य को निभाना ही धर्म कहलाता है । |
| 412. |
किसी के पाप में कभी सहभागी नहीं बनना चाहिए, चाहे वह राजा ही क्यों न हो । श्री विभीषणजी ने रावण को छोड़ा, श्री भीष्म पितामह धृतराष्ट्र को नहीं छोड़ पाए । |
| 413. |
राजा को और बड़े लोगों को अपने आसपास के प्रशंसकों से दूर रहना चाहिए । ऐसा श्री विभीषणजी ने रावण को कहा । |
| 414. |
मनुष्य अवतार में जब प्रभु ने रावण का वध किया तो देवतागण स्तुति करने आए कि आप परब्रह्म हैं । प्रभु कहते हैं कि मैं तो दशरथ पुत्र राम, एक मनुष्य हूँ । प्रशंसा का कैसे जवाब देना चाहिए, मनुष्य अवतार में प्रभु यह दिखाते हैं । |
| 415. |
उत्तम पुरुष को अकेले कभी निर्णय नहीं लेना चाहिए । अकेले लिया गया निर्णय लगभग गलत होता है । ज्यादा लोगों को लेकर लिया निर्णय भी गलत हो जाता है । इसलिए शास्त्रों का सूत्र है कि कम-से-कम तीन और ज्यादा-से-ज्यादा पांच विशेषज्ञ लोगों को साथ लेकर निर्णय करना चाहिए । जब श्री विभीषणजी शरण में आए तो प्रभु श्री रामजी चार-पांच लोगों को लेकर श्री विभीषणजी के बारे में निर्णय करते हैं । |
| 416. |
प्रभु श्री हनुमानजी ही एकमात्र थे जो निर्णय से पहले श्री विभीषणजी के पक्ष में थे जब श्री विभीषणजी प्रभु की शरण में आए । निर्णय से पहले ही प्रभु श्री हनुमानजी ने श्री विभीषणजी का पक्ष ले लिया तो प्रभु श्री रामजी के लिए निर्णय बड़ा आसान हो गया । |
| 417. |
प्रभु को परामर्श देने का सामर्थ्य देवगुरु श्री बृहस्पतिजी में भी नहीं है पर प्रभु ने पूछकर सबसे राय मांगी और अपना बड़प्पन दिखाया । तब प्रभु श्री रामजी ने श्री हनुमानजी से पूछा कि आपकी क्या राय है तो श्री हनुमानजी ने प्रभु से कहा कि आपको तुरंत श्री विभीषणजी को शरण में ले लेना चाहिए । |
| 418. |
बालि का नाश करके किष्किंधा पर प्रभु ने अधिकार नहीं जमाया और न ही लंका में रावण को जीतकर लंका पर अधिकार जताया । यह प्रभु श्री रामजी का आदर्श है । |
| 419. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने इतनी बारीकी से श्री विभीषणजी को जांच लिया था और उनका पक्ष प्रभु श्री रामजी के सामने रखा, जो अंत में सही निकला और प्रभु की शरणागति उन्हें मिली । |
| 420. |
श्री विभीषणजी के प्रसंग में निर्णय लेना प्रभु श्री रामजी का काम था पर सभी तथ्य प्रभु श्री हनुमानजी ने उपलब्ध कराए । |
| 421. |
जब सागर पार उतरने के लिए प्रभु श्री रामजी से श्री विभीषणजी ने कहा कि प्रार्थना करनी चाहिए और श्री लक्ष्मणजी ने कहा कि रोष करना चाहिए तो प्रभु ने दोनों को राजी किया । पहले विनय किए और फिर क्रोध किया । |
| 422. |
प्रभु श्री महादेवजी की स्थापना श्रीरामेश्वरम के रूप में प्रभु श्री रामजी का सबसे प्रिय कार्य था । |
| 423. |
श्री रामेश्वरमजी में दो-दो शिवलिंग स्थापित होने थे । एक प्रभु श्री रामजी के श्रीहाथों से और एक भक्त श्री हनुमानजी के श्रीहाथों से । इसलिए प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री महादेवजी को संकेत कर दिया कि आप समाधि में चले जाएं । मुहूर्त पर प्रभु के श्रीहाथों से स्थापना हुई और फिर प्रभु श्री हनुमानजी द्वारा लाए लिंग की स्थापना बाद में हुई । प्रभु ने कहा कि जो मेरे द्वारा स्थापित लिंग की पूजा बिना श्री हनुमानजी के द्वारा लाए लिंग की पूजा के करेगा उसे उसका फल प्राप्त नहीं होगा । सूत्र यह है कि प्रभु अपने से भी ज्यादा अपने भक्तों को मान प्रदान करते हैं । |
| 424. |
पूरे वनवास काल में हृदय से हृदय का सेतु बनाते प्रभु श्री रामजी लंका की तरफ चले । प्रभु ने फिर लौकिक दृष्टि से लंका चढ़ाई के वक्त पत्थर का सेतु बनाया । |
| 425. |
प्रभु का संगठन कौशल इतना था कि अयोध्या से सेना मंगवाए बिना रावण से युद्ध करने के लिए उन्होंने वानरों की सेना तैयार कर ली । |
| 426. |
जब मेघनाद ने मूर्छा शक्ति चलाई और प्रभु, श्री लक्ष्मणजी, सभी वानर मूर्छा में आ गए । श्री जाम्बवंतजी सबसे पहले मूर्छा से जगे और सबसे पहले श्री विभीषणजी से पूछा कि श्री हनुमानजी तो ठीक है ना । प्रभु के बारे में नहीं पूछा कि प्रभु ठीक है ना । श्री विभीषणजी ने प्रश्न किया कि सिर्फ श्री हनुमानजी की कुशलता क्यों पूछ रहे हैं ? श्री जाम्बवंतजी बोले कि एक सिद्धांत जानता हूँ कि अगर श्री हनुमानजी उपलब्ध होंगे तो सबको ठीक कर लेंगे और अगर श्री हनुमानजी उपलब्ध नहीं होंगे तो कोई भी ठीक नहीं कर पाएगा । |
| 427. |
सूत्र यह है कि प्रभु श्री हनुमानजी सृष्टि के और प्रभु श्री रामजी के महाप्राण हैं । |
| 428. |
सूत्र यह है कि प्रभु श्री हनुमानजी को अपना महाप्राण बना लें तो न प्रभु श्री रामजी दूर हैं और न ही श्रीसाकेत दूर है । |
| 429. |
जीव को प्रभु के मंगल श्रीकमलचरणों तक पहुँचाने वाले प्रभु श्री हनुमानजी ही हैं । |
| 430. |
वैराग्य प्राप्ति के लिए प्रभु श्री हनुमानजी की उपासना सबसे जरूरी है । |
| 431. |
जहाँ कहीं, जिस समय, जिस सेवा की प्रभु श्री रामजी को आवश्यकता होती है प्रभु श्री हनुमानजी उस सेवा के लिए सदैव प्रस्तुत रहते हैं । |
| 432. |
भारतीय परंपरा में प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाता क्योंकि उसमें चेतन यानी प्रभु का तत्व होता है । इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी संजीवनी लाने के बाद पर्वत को वापस पहुँचा कर आए । |
| 433. |
जहाँ-जहाँ पुरुषार्थ की बात आती है सबका ध्यान प्रभु श्री हनुमानजी की ओर ही जाता है । संजीवनी कौन लाएगा, यह बात उठते ही सबने और प्रभु श्री रामजी ने भी प्रभु श्री हनुमानजी की तरफ देखा । |
| 434. |
भारतीय दर्शन शास्त्र यह है कि संसार के कण-कण में प्रभु को देखना चाहिए, यही भक्ति का भी सिद्धांत है । |
| 435. |
जहाँ भी प्रणाम करें वही भगवान उपलब्ध होते हैं । जल, भूमि, पर्वत, आकाश सब तरफ प्रभु विद्यमान है । |
| 436. |
पूजा करते वक्त संपूर्ण विश्व को अपने श्री ठाकुरजी में देखें और पूजा के बाद संपूर्ण विश्व में अपने श्री ठाकुरजी को देखें । |
| 437. |
विश्व में जो भी है सब प्रभु के रूप हैं, यह मूल भारतीय विचार है । |
| 438. |
सनातन धर्म को मानने वाला किसी भी धर्म का विरोध नहीं करता । यह सनातन धर्म का गौरव है । |
| 439. |
जो भी है परमात्मा तत्व ही है, परमात्मा तत्व के अलावा ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं है । |
| 440. |
न पुष्पों का उपयोग, न औषधि का उपयोग, न अन्न का उपयोग जरूरत से ज्यादा न हो । फिजूलखर्ची भारतीय परंपरा में नहीं है । उदाहरण स्वरूप भगवती तुलसी माता के बीस पत्ते तोड़े और दो पत्ते प्रभु को अर्पित किए, बाकी फेंक दिए तो यह पाप माना गया है । दूसरा उदाहरण है कि अन्न को जूठन के रूप में छोड़ दिया तो वह पाप माना गया है । |
| 441. |
जब संजीवनी औषधि लेने प्रभु श्री हनुमानजी गए तो सभी औषधियों ने अपने आपको छिपा लिया । जब प्रभु श्री हनुमानजी ने निवेदन किया कि प्रभु के काज के लिए जरूरत है तो यह सुनते ही सभी औषधियां प्रकट हो गई । सूत्र यह है कि प्रभु के काज के लिए सब कुछ उपलब्ध हो जाता है । |
| 442. |
श्री लक्ष्मणजी का एक व्रत था कि प्रभु के साथ और प्रभु की सेवा में सदैव रहना । वनवास श्री लक्ष्मणजी को नहीं मिला था, फिर भी वे मरते हुए पिता और माता को और प्रजा को छोड़कर प्रभु के पीछे चले । उन्होंने कहा कि मैं राज्य को नहीं जानता, माता-पिता को नहीं जानता, मैं तो सिर्फ प्रभु श्री रामजी को जानता हूँ और प्रभु के पीछे छाया की तरह चल दिए । |
| 443. |
जब प्रभु श्री हनुमानजी संजीवनी लेने गए तो पीछे से विलाप करते हुए प्रभु श्री रामजी ने कहा कि अगर संजीवनी नहीं आई और श्रीलक्ष्मण के प्राण नहीं बचे तो कल ही युद्ध का विराम कर देना क्योंकि मैं (प्रभु) सागर में प्रवेश करके जल समाधि ले लूंगा । इससे पता चलता है कि संजीवनी कितनी महत्वपूर्ण थी जिसको प्रभु श्री हनुमानजी लेकर आए । |
| 444. |
श्री भीष्म पितामह के ज्ञान को अमर करने के लिए और उनको यश देने के लिए प्रभु श्री कृष्णजी ने उनसे श्री युधिष्ठिरजी को ज्ञान दिलवाया । प्रभु अपने भक्त को सदैव यश दिलाते हैं, यह सूत्र है । |
| 445. |
विज्ञान की जहाँ तक पहुँच नहीं है और जहाँ तक कभी पहुँच नहीं सकता, हमारे ऋषिगण वहाँ तक पहुँच चुके हैं । वह ज्ञान बीच में लुप्त हो गया था पर हमारे ऋषियों ने उसे खोजकर वापस उसका प्रतिपादन शास्त्रों में किया है । |
| 446. |
अपने जीवन में जब आपत्ति में घिर जाएं, शोकमग्न हो जाएं, लगने लगे कि मेरा कोई नहीं है तो प्रभु श्री हनुमानजी को याद करना चाहिए । प्रभु श्री रामजी ने श्रीलक्ष्मण के मूर्छा के प्रकरण में यही किया । |
| 447. |
शुद्ध गंध बहुत सकारात्मक ऊर्जा देती है । इसलिए घर में हवन होने चाहिए, पूजा में प्रभु के सामने शुद्ध घी का दीपक जलना चाहिए, भगवती तुलसी माता घर में होनी चाहिए । इन सबकी शुद्ध गंध हमारे लिए अति उपयोगी होता है । |
| 448. |
प्रभु श्री रामजी के हृदय में प्रभु श्री हनुमानजी का वास है और प्रभु श्री हनुमानजी के हृदय में प्रभु श्री रामजी का वास है । |
| 449. |
प्रभु और रावण का युद्ध सत्तासी दिनों तक चला । श्री महाभारतजी का युद्ध अठारह दिनों तक ही चला था । इससे पता चलता है कि प्रभु का मानव अवतार में युद्ध कितना लंबा और विशाल था । |
| 450. |
रावण भौतिकता के रथ पर बैठकर आया था । प्रभु धर्मरथ में बैठे थे । इसलिए सनातन सूत्र का पालन हुआ कि जहाँ धर्म है वहाँ जय होती है । |
| 451. |
प्रभु जब पापियों का नाश करवाना चाहते हैं तो उन्हें अधर्म के मार्ग में इतना ऊपर भेजते हैं जिससे कि उनका विध्वंस हो जाता है । |
| 452. |
सज्जनता, शक्ति और सावधानता तीनों होनी चाहिए तभी हमारी जीत होती है । सज्जन होने पर, शक्ति का संचार करने पर और सावधानता रखने पर ही विजय होती है । |
| 453. |
प्रभु श्री रामजी ने जिस धर्मरथ का वर्णन श्री विभीषणजी के सामने किया उसे बच्चों को जरूर पढ़ना चाहिए । |
| 454. |
जीवन में प्रभु के बताए धर्मरथ के नियमों का जिन-जिन ने जीवन में पालन किया है वे कभी हार नहीं सकते । |
| 455. |
जिन-जिन नियमों का मनुष्य अवतार लेकर प्रभु ने जीवनभर पालन किया उसे धर्मरथ की व्याख्या के रूप में प्रभु ने बताया है । |
| 456. |
प्रभु ने देवराज श्री इंद्रदेवजी के रथ जिसको कि उन्होंने सत्तर दिनों बाद भेजा उसे स्वीकार कर अपने पुरुषार्थ का अहंकार नहीं किया । प्रभु ने श्री इंद्रदेवजी का रथ लौटाया नहीं और रथ लौटाकर उनका अपमान नहीं किया । |
| 457. |
रोग का निवारण, संकट के नाश के लिए श्री आदित्य हृदय स्तोत्र जो कि प्रभु श्री सूर्यनारायणजी का स्त्रोत रूपी स्तुति है वह बहुत ही उपयोगी है । |
| 458. |
प्रभु युद्ध जीत गए और माता को बुलावा भेजा है, इस शुभ वार्ता को भगवती जानकी माता को देने और श्री भरतलालजी को शुभ वार्ता देने कि प्रभु श्री अयोध्याजी लौटकर आ रहे हैं, इन दोनों को देने सबसे पहले प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु श्री रामजी ने भेजा । सूत्र यह है कि शुभ समाचार सदैव प्रभु श्री हनुमानजी ही लाते हैं । |
| 459. |
जगतजननी भगवती जानकी माता के पास जब प्रभु श्री हनुमानजी युद्ध जीतने की वार्ता लेकर पहुँचे तो माता ने प्रभु श्री हनुमानजी के गुण-ही-गुण गिनाए कि सहनशीलता, विनय, शौर्य, शील, विवेक सभी सद्गुण माता ने गिनाए । प्रभु श्री हनुमानजी का जवाब देखें कि उन्होंने कहा कि यह प्रभु और आपकी यानी माता की कृपा है कि यह गुण मेरे में विद्यमान हैं । |
| 460. |
राक्षसियों ने भगवती जानकी माता को अशोक वाटिका में कष्ट दिया पर माता ने करुणा से उन्हें माफ कर दिया । प्रभु श्री हनुमानजी उन्हें युद्ध जीतने के बाद सजा देना चाहते थे । माता ने कहा कि इतने छोटे अपराध का विचार जीवन में कभी नहीं करना चाहिए । छोटे अपराधों के लिए करुणा भाव होना चाहिए, माफी का भाव होना चाहिए । प्रभु श्री हनुमानजी ने ऐसा क्यों कहा कि सजा होनी चाहिए ? प्रभु श्री हनुमानजी स्वयं इतने करुणावान हैं पर उन्होंने इसलिए कहा कि माता का यह करुणा का सद्गुण जगत के लिए जागृत करने के लिए, उसे जगत के लिए प्रकट करने के लिए । |
| 461. |
लोक कल्याण के लिए श्री योग वशिष्ठजी प्रकट हों इसलिए प्रभु श्री रामजी ने अज्ञानी की भूमिका निभाकर ऋषि श्री वशिष्ठजी के सामने प्रश्न पूछे । |
| 462. |
संतों का भूषण उनका चरित्र ही होता है । |
| 463. |
कोई अपराध भी करता हो तो संत उसके साथ क्रूर व्यवहार नहीं करते । उनका अंतःकरण उदार होता है और वे उसे क्षमा कर देते हैं और प्रभु से उसके मंगल के लिए प्रार्थना भी करते हैं । |
| 464. |
श्री विभीषणजी रावण के भाई होने पर भी उसका अंतिम संस्कार करने को तैयार नहीं हुए क्योंकि रावण पापी था । पर प्रभु ने कहा कि किसी भाई को अपने भाई के लिए ऐसा नहीं सोचना चाहिए । सारे वैर मृत्यु के साथ समाप्त हो जाने चाहिए । प्रभु ने श्री विभीषणजी से कहा कि तुम रावण का अंतिम संस्कार करने में संकोच कर रहे हो तो रावण को मेरा भाई मानकर अंतिम संस्कार करो । रावण को प्रभु ने अपने भाई का दर्जा दिया । यह प्रभु की कितनी बड़ी महानता है । |
| 465. |
श्री रामायणजी जीवन मूल्यों का श्रीग्रंथ है और भारतवर्ष का प्राणभूत आधार है । |
| 466. |
प्रभु का मन सोने की लंका में नहीं लगा क्योंकि उन्हें अपनी मातृभूमि श्री अयोध्याजी से इतना प्रेम था । प्रभु कहते हैं कि स्वर्ण की लंका में उनके कांटा चुभ रहे हैं क्योंकि श्री अयोध्याजी की रज की उन्हें याद आ रही है । सूत्र यह है कि अपनी मातृभूमि से हमें भी इतना ही प्रेम होना चाहिए । |
| 467. |
भगवती जानकी माता ने कहा कि धन्यवाद उन माता को है जिन्होंने तुम्हें (हनुमानजी) को जन्म दिया । भगवती अंजनी माता के दर्शन के लिए लंका से लौटते वक्त भगवती जानकी माता रुकती हैं । |
| 468. |
चौदह वर्षों तक श्री भरतलालजी राजलक्ष्मी के साथ रहे । उनका अंतःकरण राज करने का है क्या, यह जांचने के लिए प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी को भेजा । प्रभु को पता था कि वाणी से श्री भरतलालजी कभी नहीं कहेंगे कि मैं राजा बना रहना चाहता हूँ । पर अंतःकरण से क्या श्री भरतलालजी प्रभु को राज्य देना चाहते हैं । यह जांचने हेतु प्रभु श्री हनुमानजी को भेजा गया । प्रभु श्री हनुमानजी नेत्र, हाथ, हलचल, मुख आकृति एवं दृष्टि सबके हाव-भाव देखकर भीतर का भाव जानने वाले हैं और इस कला में अति कुशल हैं तो वे ही पता लगा सकते थे । क्योंकि वाणी से अगर कोई झूठ बोलता है तो उसके शरीर की भाषा बता देती है कि वह झूठ बोल रहा है । इतनी सूक्ष्म विद्या की जानकारी प्रभु श्री हनुमानजी को है । |
| 469. |
प्रभु भक्त के हृदय के भीतर की भावना के विरुद्ध कभी भी कुछ भी नहीं करते । |
| 470. |
श्री भरतलालजी की श्रीराम भक्ति देखकर प्रभु श्री हनुमानजी बेहद प्रभावित हुए । सूत्र यह है कि जीव के भीतर श्रीराम भक्ति और श्रीराम प्रेम देखकर प्रभु श्री हनुमानजी बहुत प्रभावित होते हैं । |
| 471. |
प्रभु श्री हनुमानजी से जब श्री रामजी ने पूछा कि तुम्हें क्या दूं तो प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु से मांगा कि पहला, आपके श्रीकमलचरणों की भक्ति क्षणभर के लिए भी कम नहीं हो । दूसरा, निरंतर पृथ्वी पर रहकर प्रभु कथा सुनता रहूँ । तीसरा, मन में भक्ति का भाव कभी खंडित नहीं हो । चौथा, निरंतर प्रभु का सेवक और भक्त बनकर रहूँ । |
| 472. |
इस पूरे संसार में एक श्री हनुमानजी ही ऐसे हैं जिन्हें देने जैसा मेरे (प्रभु श्री रामजी के) पास कुछ भी नहीं है, इतने उपकार श्री हनुमानजी के हैं । प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि मैं सबको सब कुछ दे सकता हूँ पर एक श्री हनुमानजी को कुछ भी नहीं दे सकता, श्री हनुमानजी इतने महान हैं । |
| 473. |
मैं, प्रभु ही नहीं, मेरा श्री अयोध्याजी का पूरा परिवार भी श्री हनुमानजी का सदैव ऋणी रहेगा, ऐसा प्रभु श्री रामजी कहते हैं । |
| 474. |
प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी को आलिंगन में भर लिया और भक्त और भगवान एक हो गए । |
| 475. |
प्रभु कथा में निमंत्रण दें या नहीं दें एक श्रोता बिना निमंत्रण के भी स्वतः ही पहुँच जाते हैं और वे हैं प्रभु श्री हनुमानजी । |
| 476. |
प्रभु श्री हनुमानजी बड़े व्याकुल हृदय से श्रीराम कथा का सदैव श्रवण करते रहते हैं । |
| 477. |
प्रभु श्री हनुमानजी सबसे बड़े सद्गुरु हैं क्योंकि वे प्रभु से मिला देते हैं । सद्गुरु का काम ही प्रभु से मिलना होता है । |
| 478. |
सारे तंत्र, मंत्र, यंत्र प्रभु श्री हनुमानजी के सामने विफल हो जाते हैं । यह बात प्रभु श्री कृष्णजी ने श्री अर्जुनजी को कहा जब प्रभु श्री हनुमानजी के जाते ही श्री अर्जुनजी का रथ जलने लग गया । |
| 479. |
श्री इंद्रदेवजी और प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के अंश पुत्रों में युद्ध त्रेता में और द्वापर में हुआ । त्रेता में सूर्यपुत्र श्री सुग्रीवजी थे और इंद्रपुत्र बालि थे पर विजय सूर्यपुत्र श्री सुग्रीवजी की हुई । द्वापर में इंद्रपुत्र श्री अर्जुनजी थे और सूर्यपुत्र कर्ण थे पर विजय इंद्रपुत्र श्री अर्जुनजी की हुई । सूत्र यह है कि इंद्रपुत्र हो या सूर्यपुत्र हो विजय उसे ही प्राप्त होती है जिसके पक्ष में प्रभु श्री हनुमानजी होते हैं । |
| 480. |
सूत्र यह है कि विजय, गौरव, सम्मान उसके पक्ष में ही जाएगा जिसके पक्ष में प्रभु श्री हनुमानजी होंगे । |
| 481. |
प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि प्रभु श्री हनुमानजी के इतने ऋण हैं कि एक ऋण चुकाने के बदले मैं प्राण दे सकता हूँ पर ऐसा करने से बाकी ऋण बिना चुके बच जाएंगे । इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी का ऋण चुकाना संभव ही नहीं है, ऐसा प्रभु श्री रामजी कहते हैं । |
| 482. |
जीवन में विजय के लिए प्रभु श्री हनुमानजी की कृपा अति आवश्यक क्योंकि प्रभु श्री हनुमानजी विजय के देव हैं । |
| 483. |
प्रभु श्री रामजी के स्वतंत्र मंदिर नहीं होते क्योंकि वहाँ भगवती सीता माता और प्रभु श्री हनुमानजी होंगे पर मेरे प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु के स्वतंत्र मंदिर हैं । इतनी महिमा भक्ति की है कि वह भगवान से भी आगे भक्त को रखती है । |
| 484. |
प्रभु भक्तों के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देते हैं कि उनके सब आश्रय खत्म हो जाते हैं और एकमात्र आश्रय और विश्वास प्रभु का ही बचता है । |
| 485. |
मन के प्रवाह को प्रभु में लगाना चाहिए तभी हमारा उद्धार संभव है । |
| 486. |
प्रभु की तरफ मन लगता है तो समता आती है, संसार की तरफ मन लगता है तो व्यक्ति, वस्तु के लिए ममता आती है । समता हमें मुक्ति देती है और ममता हमें बांधती है । |
| 487. |
जो भी कर्म करें, प्रभु को समर्पित करते हुए करें । हमारा शरीर, अंतःकरण, सांसारिक सामग्री सब कुछ प्रभु का ही दिया हुआ है । प्रभु के बल से प्रभु की सामग्री से जो भी कर्म करें भगवत् अर्पित करके करें तभी वह हमें कर्मबंधन से मुक्त रखेगी । |
| 488. |
जीवन में सदैव प्रभु की कृपा का हमें आदर करना चाहिए । |
| 489. |
प्रभु के भरोसे में रहने से हम जीवन की बाजी सदैव जीतते जाएंगे । |
| 490. |
प्रभु के अधीन होने पर माया की अधीनता से हम मुक्त हो जाते हैं । |
| 491. |
जीवन में जब हम भजन करने लायक होते हैं तब दुर्भाग्य से हम संसार के प्रपंच में पड़े हुए होते हैं और संसार का प्रपंच ही हमें सुहाता है । |
| 492. |
अपने प्रभु पर हमें दृढ़ विश्वास होना चाहिए । |
| 493. |
जीव पर प्रभु इतनी दया करते हैं जिसकी कोई सीमा ही नहीं है । |
| 494. |
प्रभु को दयासागर कहते हैं । सागरदेवजी की तो सीमा है पर प्रभु की दया की कोई सीमा नहीं है । |
| 495. |
हम कल्पना भी नहीं कर सकते प्रभु उतनी दया जीव पर सदैव करते रहते हैं । |
| 496. |
संसार के समस्त माताओं की ममता को जोड़ा जाए तो प्रभु की ममता के सागर के सामने एक बूंद जितनी भी नहीं होगी । प्रभु की इतनी वात्सल्यता और ममता जीवों के लिए होती है । |
| 497. |
विपत्ति और प्रतिकूलता में तो प्रभु को पुकार कर प्रभु की तरफ ही चलना चाहिए । |
| 498. |
प्रभु आनंदसिंधु यानी आनंद के समुद्र हैं । उनसे ही आनंद का जल लेकर भक्त और संत उसे जीवों पर बरसाते हैं जैसे मेघ सागर से जल लेकर उसकी वर्षा करता है । |
| 499. |
भगवत् कृपा से ही साधन और भजन संभव होता है । |
| 500. |
सच्चे संत अपने संपर्क में आने वाले लोगों को माया से हटाकर प्रभु की भक्ति में लगाते हैं । |
| 501. |
प्रभु सब पर बराबर कृपा करते हैं पर जिनमें प्रभु के लिए श्रद्धा और विश्वास है उन्हें ही उस कृपा का लाभ मिलता है । |
| 502. |
अपने मन को प्रभु की श्रीलीला स्मरण में लगाना चाहिए । |
| 503. |
हम कामी, क्रोधी कैसे भी हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है । हम किसके हैं (प्रभु के हैं), यह सबसे महत्वपूर्ण है । |
| 504. |
जीवन के तापों को सहते हुए प्रभु की भक्ति करनी चाहिए । |
| 505. |
प्रभु से निवेदन करें कि हमें अपना सेवादार रखें और अपने श्रीकमलचरणों की सेवा सदैव प्रदान करें । |
| 506. |
मान, प्रतिष्ठा और कीर्ति को शास्त्रों ने मीठा जहर माना है । |
| 507. |
हमें पूर्ण रूप से प्रभु के भरोसे ही हो जाना चाहिए । |
| 508. |
भक्त कहता है कि मेरे में गुण तो है ही नहीं पर प्रभु इतने दयालु और कृपालु है कि मेरे अवगुण को देखकर रीझ जाते हैं । |
| 509. |
प्रभु केवल हमारी अनन्यता और प्रियता देखते हैं । |
| 510. |
जैसे ओस को चाटने से प्यास नहीं बुझती वैसे ही संसार के भोगों को भोगने से कभी तृप्ति नहीं मिलती । |
| 511. |
जितना भी जीव का भला हो सकता है वह भक्ति करने पर ही हो सकता है, यह सिद्धांत है । |
| 512. |
प्रभु की माया भक्तों को कभी बाधा नहीं पहुँचाती । |
| 513. |
प्रभु जीव से सिर्फ प्रीति ही चाहते हैं । |
| 514. |
प्रभु को सिर्फ भक्त से अपनापन चाहिए और कुछ भी नहीं चाहिए । |
| 515. |
एक प्रभु की शरणागति पुष्ट होनी चाहिए फिर सब कुछ प्रभु संभाल लेते हैं । |
| 516. |
प्रभु कृपा और दया करने में कभी भी कंजूसी नहीं करते । |
| 517. |
सत्संग सीधे भगवत् प्राप्ति की लगन जागृत करता है । अगर ऐसा नहीं है तो या तो हम ध्यानपूर्वक सत्संग सुन नहीं रहे और या वह सत्संग है ही नहीं क्योंकि वहाँ श्रीहरि चर्चा न होकर अन्य चर्चा होती है । |
| 518. |
परमार्थ के मार्ग में प्रभु के अलावा कोई सहयोग करने वाला नहीं है । |
| 519. |
जब हम परम धर्म की तरफ चलते हैं तो लोक धर्म का त्याग करना ही पड़ता है । |
| 520. |
प्रभु के लिए अपने अस्तित्व का त्याग हो जाए तो प्रभु तत्काल मिल जाते हैं । |
| 521. |
शास्त्रों में परम योग अनन्य भक्ति को ही कहा गया है । |
| 522. |
सिर्फ भजनानंदी के काबू में ही उसका मन रहता है । मन को काबू में रखने का अन्य कोई उपाय नहीं है । |
| 523. |
प्रभु के अलावा भजन मार्ग पर कोई भी हमारा सहयोग करने वाला नहीं है । |
| 524. |
संसार के लिए अप्रकाशित जीवन और भक्ति में प्रकाशित जीवन जीना ही श्रेष्ठ होता है । |
| 525. |
अगर सत्संग हमारे जीवन में स्थाई स्थान बना ले तो यह बहुत बड़ी प्रभु की कृपा होती है । |
| 526. |
अपनी सबसे प्रिय चीज को अपने प्रभु पर न्यौछावर करना चाहिए । |
| 527. |
संसार की असारता सत्संग से ही हमें समझ में आती है । |
| 528. |
अपनी प्रिय वस्तु प्रभु को निवेदन करने पर प्रभु भी अपनी प्रिय भक्ति का दान उस भक्त को कर देते हैं । |
| 529. |
प्रभु आधा अधूरा हमें स्वीकार नहीं करते । कोई भी ममता की डोर संसार से बंधी रहने पर प्रभु हमें स्वीकार नहीं करते । |
| 530. |
प्रभु दया के, वात्सल्य के और कृपा के सागर हैं । |
| 531. |
जिसने भी प्रभु को रिझाया है दीनता से ही रिझाया है । दैन्यता के कारण ही भगवत् साक्षात्कार संभव होता है । |
| 532. |
प्रभु का नाम महाबलशाली होता है । |
| 533. |
नित्य सत्संग सुनने से जीवन में बहुत जल्दी परिवर्तन आ जाता है । |
| 534. |
शास्त्रों से युक्त कथा का ही श्रवण करना चाहिए । कथा में विषयांतर न हो, इसकी सावधानी रखनी चाहिए । |
| 535. |
एक क्षण के सत्संग में भी इतनी क्षमता है कि वह महान पाप का भी नाश करने का सामर्थ्य रखता है । |
| 536. |
माया भक्ति से ही परास्त होती है, अन्य कोई उपाय नहीं है । |
| 537. |
जगत में भोग हमें प्रिय नहीं लगे तभी मानना चाहिए कि प्रभु कृपा हम पर हो गई । |
| 538. |
प्रभु के नाम से बड़ी कमाई कुछ भी नहीं हो सकती । |
| 539. |
भक्त को एकमात्र प्रभु से ही प्रियता होती है । |
| 540. |
संसार के धन को मृत्यु के बाद कोई लादकर नहीं ले जा सकता । मृत्यु के बाद कोई भी संसार में बनाया व्यवहार या संबंध साथ नहीं जाता । खूब खा-पीकर शरीर तगड़ा कर लें उसकी मृत्यु के बाद अंत राख में ही होनी है । जो साथ जाएगा वह परमधन भक्ति ही है । |
| 541. |
वैराग्य में ही सच्चा परमानंद छिपा हुआ है । |
| 542. |
भगवत् मार्ग में चलने वाले को अपना शरीर स्वस्थ रखना अति आवश्यक है तभी वे अपना साधन कर पाएंगे । |
| 543. |
प्रभु का नाम जप कलियुग में अमृततुल्य साधन है । |
| 544. |
शरण में जाने पर प्रभु हमें हमारे कर्मबंधन से मुक्त कर देते हैं । |
| 545. |
तीव्रतम प्रारब्ध भी प्रभु की एक कृपा दृष्टि से बदल जाता है । |
| 546. |
प्रभु कृपा करने के लिए आतुर हो जाते हैं जब कोई दीन हृदय उनको दिखता है क्योंकि प्रभु का एक नाम ही दीनदयाल है । |
| 547. |
प्रभु के धाम में जाने के बाद फिर संसार में जन्म-मरण का चक्र खत्म हो जाता है । |
| 548. |
प्रभु की शरणागति लेने पर प्रभु कितना दुलार करते हैं उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । |
| 549. |
संसार से वैराग्य और प्रभु से अनुराग, यह भक्ति से ही संभव होता है । |
| 550. |
बचपन और युवा अवस्था में भजन के संस्कार नहीं डालेंगे तो बुढ़ापे में भजन नहीं कर पाएंगे । |
| 551. |
भक्त किसी की निंदा करने जैसा कोई पाप कभी नहीं करता । |
| 552. |
आलस्य और प्रमाद भजन में हमारी अरुचि का निर्माण कर देता है । |
| 553. |
माया से तरने का एक ही उपाय है और वह है प्रभु की शरणागति ग्रहण करना । |
| 554. |
प्रभु के शरणागत होते ही करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं । |
| 555. |
प्रभु का लिया एक भी नाम कभी व्यर्थ नहीं जाता और उसका कभी नाश नहीं होता । |
| 556. |
अपना भार प्रभु को समर्पित कर दें तो जीवन में चिंतारहित हो जाएंगे । |
| 557. |
प्रभु की शरणागति लेने पर ही जीवन में पूर्णता आती है । |
| 558. |
प्रभु की शरणागति के बाद जीवन में परमानंद-ही-परमानंद है । |
| 559. |
हर पल और हर कदम पर प्रभु की कृपा का अनुभव हमें करना चाहिए । |
| 560. |
भक्ति में कभी नकारात्मक सोच होती ही नहीं है । |
| 561. |
अपने आपको जो दीन मानता है प्रभु उसकी परीक्षा नहीं लेते क्योंकि दीनता से बड़ी कोई परीक्षा नहीं है । |
| 562. |
प्रभु को रोजाना साष्टांग दंडवत प्रणाम करने वाला लौटकर धरती पर कभी जन्म नहीं लेता । उसे प्रभु के धाम की प्राप्ति होती है । |
| 563. |
जब भी अपने को संकट में पाएं, प्रभु को ही सर्वप्रथम पुकारें । |
| 564. |
प्रभु प्राप्ति के लिए व्याकुलता को ही भक्ति कहते हैं । |
| 565. |
संत श्री रामकृष्णजी परमहंस, भगवती मीराबाई, संत श्री तुकारामजी - इन तीनों संतों ने केवल प्रभु प्राप्ति की परम व्याकुलता से ही भगवत् साक्षात्कार किया । |
| 566. |
प्रभु के लिए व्याकुलता प्रभु को साकार होने पर बाध्य कर देती है । |
| 567. |
जो व्याकुलता से प्रभु की भक्ति करता है प्रभु उसके पक्षपाती हो जाते हैं यानी उसका पक्ष ले लेते हैं और उसके पक्ष में खड़े हो जाते हैं । |
| 568. |
प्रभु पर निर्भर होकर ही हमें अपनी जीवनशैली को चलाना चाहिए । |
| 569. |
प्रभु की कृपा के अभाव में जब हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है तो हमारे द्वारा लिए हुए सब निर्णय गलत हो जाते हैं । |
| 570. |
जीव को अपना जीवन इतना भक्तिमय बनाना चाहिए कि उसके कुल के पितरों का स्वतः ही उद्धार हो जाए । |
| 571. |
एक भी भक्त कुल में जन्म लेता है तो वह अपने पूरे कुल का उद्धार कर देता है । |
| 572. |
कुछ भी असंभव को संभव करने वाले देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी हैं । |
| 573. |
प्रभु श्री महादेवजी वरदान देने से पहले किसी की योग्यता भी नहीं देखते । वे इतने परम दयालु और कृपालु हैं पर बाकी सभी देव योग्यता देखकर ही वरदान देते हैं । |
| 574. |
शास्त्रों के अनेक सिद्धांत प्रभु की आराधना करने से हमारी बुद्धि में प्रकाशित हो जाते हैं । |
| 575. |
प्रभु की कथा सदैव ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से संपन्न होनी चाहिए । |
| 576. |
प्रभु के मार्ग पर चले बिना कोई भी शांति को प्राप्त नहीं कर सकता । |
| 577. |
हमें संसार में अभय केवल प्रभु ही कर सकते हैं । |
| 578. |
संसार से संबंध दुर्गति कराने वाला है और जन्म-मृत्यु के चक्कर में फंसाने वाला है । |
| 579. |
संसार में सब मायाकृत है, सत्य तो केवल प्रभु ही हैं । |
| 580. |
सत्संग हमें अध्यात्म का बोध करवा कर ही रहता है । |
| 581. |
सत्संग मनमानी नहीं बल्कि शास्त्र युक्त होना चाहिए । |
| 582. |
सत्संग ही हमारा मन परिवर्तन करने में सक्षम होता है । |
| 583. |
अनंत जन्मों के वासना युक्त मन को सत्संग पलटकर प्रभु के मार्ग में लगा देता है । |
| 584. |
प्रभु की महिमा किसी के हृदय में जागृत हुई है तो वह कथा श्रवण या सत्संग से ही हुई है । |
| 585. |
अपने नाम में प्रभु ने अपनी समस्त शक्तियों को स्थापित करके रखा है । |
| 586. |
संसार की माया हमें प्रतिपल नाश की तरफ ले जा रही है और सत्संग प्रतिपल हमें कल्याण की तरफ ले जा रहा है । हमें दोनों में से एक को चुनना है । यह चुनाव कितना आसान है फिर भी हम जीवन में सही चुनाव नहीं कर पाते । |
| 587. |
प्रभु को अगर चंदन की उपमा देते हैं तो सत्संग वायु है उस चंदन की सुगंध को जगत में फैलाने के लिए । |
| 588. |
सत्संग हमें प्रभु की शुद्ध शरणागति तत्काल प्रदान कर देता है । |
| 589. |
प्रभु अपने स्वयं को भक्त के ऋणी मानते हैं, यह भक्ति का कितना बड़ा सामर्थ्य है । |
| 590. |
संसारी लोगों को भोग भोगने को मिलने पर वे प्रभु को भूल जाते हैं पर भक्त के लिए प्रभु ही उनके सब कुछ होते हैं । |
| 591. |
प्रभु से बढ़कर ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं है इसलिए भक्त को त्रिभुवन की राजलक्ष्मी भी नहीं लुभा सकती । |
| 592. |
शास्त्र हमें भगवत् मार्ग में चलने की ही आज्ञा देते हैं । |
| 593. |
प्रभु ही हैं जो जीव का अति दुलार करते हैं । |
| 594. |
सच्चा सत्संग जीवन में मिलता रहे तो करुणानिधान प्रभु भी एक-न-एक दिन मिल ही जाएंगे । |
| 595. |
जिसे समाज भजन और साधन का अधिकार नहीं देता उसे भी प्रभु भक्ति करने का अधिकार देते हैं । यह प्रभु की अपार कृपालुता है । |
| 596. |
प्रभु से क्या मांगना चाहिए यह विवेक भक्ति प्रदान करती है । भक्ति हमें प्रभु की अहेतु की कृपा दिलाती है । |
| 597. |
जो भवसागर में तैरने गया वह डूब गया और जिसने भवसागर में डूबने पर भी प्रभु की शरणागति ले ली वह तर गया । |
| 598. |
हमारी दृष्टि प्रभु पर पड़े पर उससे भी उत्तम बात तो यह होगी जब प्रभु की दृष्टि हम पर पड़ जाए । |
| 599. |
प्रभु के अलावा प्रभु से हमारी कोई भी मांग नहीं होनी चाहिए । |
| 600. |
भक्त का स्वाभिमान रखने वाले केवल प्रभु ही होते हैं । |
| 601. |
ज्ञान निष्फल हो सकता है, कर्म निष्फल हो सकता है पर भक्ति कभी भी और किसी भी सूरत में निष्फल नहीं होती । |
| 602. |
संसार के अपमान की कृपा से बहुत सारे भक्तों को भगवान मिल गए क्योंकि उन्हें वैराग्य हो गया और वे भक्ति मार्ग पर चल पड़े । |
| 603. |
प्रभु एक बार हमें स्वीकार करके फिर कभी नहीं त्यागते, यह प्रभु का स्वभाव है । |
| 604. |
सत्संग में रुचि हो गई तो पक्का माने कि भगवत् प्राप्ति का मार्ग प्रभु ने हमारे लिए खोल दिया है । |
| 605. |
जगत को रिझाना छोड़ दें और जगत के मालिक प्रभु को रिझाएं । |
| 606. |
प्रभु केवल भक्ति से ही रीझते हैं । |
| 607. |
जीवन में भगवत् संबंध होना हमारे हृदय में भक्ति जाग्रत करती है । |
| 608. |
प्रभु सिर्फ हमारे अन्तरात्मा के भाव को स्वीकार करते हैं । |
| 609. |
हृदय से प्रभु के लिए प्रेम भाव होना चाहिए जो केवल भक्ति से ही संभव है । |
| 610. |
प्रभु अपने भक्त से मिलने के लिए विकल हो जाते हैं, भक्ति का इतना बड़ा सामर्थ्य है । |
| 611. |
प्रभु ऐसी कृपा अपने भक्त पर करते हैं कि भक्त प्रभु के सानिध्य के बिना रह ही नहीं पाता । |
| 612. |
भक्त का विशुद्ध भक्ति भाव प्रभु को अधीन कर लेता है । |
| 613. |
प्रभु केवल हमारे हृदय में प्रभु मिलन की व्याकुलता देखते हैं । |
| 614. |
जिसने अपना मन प्रभु में लगाया वही प्रभु की माया से बच पाया है । |
| 615. |
माया से छूटने का एक ही उपाय है - प्रभु की शरणागति । |
| 616. |
भगवती माता सद्बुद्धि प्रदान करके हमारा संरक्षण करती है । सद्बुद्धि से जीवन में चलना, यह भगवती माता की कृपा पर ही निर्भर करता है । |
| 617. |
पांच प्रकार से और पांच रूपों में भगवती माता कृपा करती हैं । स्वस्थ हो, यह भगवती दुर्गा माता की कृपा होती है । बुद्धि स्थिर हो, यह भगवती सरस्वती माता की कृपा होती है । घर में संपत्ति हो, यह भगवती लक्ष्मी माता की कृपा होती है । लाचारी का समय जीवन में नहीं आए, यह भगवती गायत्री माता की कृपा होती है । जीवन में आनंद की अनुभूति हो, यह श्रीजी भगवती राधा माता की कृपा होती है । |
| 618. |
पश्चाताप एक ऐसा तीर्थ है जो हमारे पाप करने की प्रवृत्ति को ही बदल देता है । बाकी तीर्थ पाप क्षय करते हैं पर पाप करने की प्रवृत्ति को नहीं बदलते । |
| 619. |
जिसको सच्चा पश्चाताप हो जाता है उसका जीवन ही बदल जाता है । |
| 620. |
प्रभु हमारे पक्ष में होंगे तो जीवन में हार किसी भी हालत में नहीं हो सकती । |
| 621. |
प्रभु की शरणागति पुष्ट होने पर जीवन में खूब भजन में मन लगता है । |
| 622. |
मानस सेवा और पूजा “भाव सेवा” कहलाती है जो प्रभु सहर्ष स्वीकार करते हैं क्योंकि प्रभु को केवल भाव ही प्रिय है । |
| 623. |
भक्ति में केवल भाव का ही साम्राज्य होता है । |
| 624. |
मानसी सेवा का फल इसलिए बहुत बड़ा है क्योंकि यह मन से होती है । मानसी सेवा में मन को सेवा में लगाना ही पड़ता है नहीं तो हम देखते हैं कि प्रत्यक्ष सेवा में मन कहीं और भाग जाता है । मन प्रभु में लगे यह सबसे जरूरी है जो मानसी सेवा में होता है । इसलिए मानसी सेवा की बहुत बड़ी महिमा है । |
| 625. |
प्रभु मानसी सेवा को बहुत जल्दी स्वीकार करते हैं । |
| 626. |
जहाँ भी बाजार में कोई अच्छा फल या वस्तु देखी, मन में भाव कर लिया कि यह मेरे प्रभु के ही लायक है और मन से ही प्रभु को अर्पण कर दिया । इस तरह मानसी सेवा चलते-फिरते कहीं भी हो सकती है । फल या वस्तु खरीदा नहीं, पैसा लगा नहीं और मानसी सेवा हो गई । |
| 627. |
शरणागति ऐसी है जैसा कि किसी धनवान ने किसी गरीब अनाथ बच्चे को अपना उत्तराधिकारी बना दिया । ऐसे ही प्रभु की शरण होते ही हम प्रभु के निज जन बन जाते हैं । बिना कमाए हम प्रभु के प्रेम के अधिकारी हो जाते हैं । |
| 628. |
शरणागति होते ही प्रभु हमें पाप रहित कर देते हैं । |
| 629. |
हमारा जीवन सदैव प्रभु शरण में ही होना चाहिए । |
| 630. |
प्रभु की शरण होने पर हमारी सब चिंताएं खत्म हो जाती है । |
| 631. |
शरण होने पर प्रभु हमें हर विपत्ति से निकाल लेते हैं । |
| 632. |
प्रभु की शरण होने पर प्रभु की माया उस जीव पर अपना प्रभाव डालना बंद कर देती है । |
| 633. |
वही जीव चतुर और भाग्यशाली है जो प्रभु की शरण में हो जाता है क्योंकि मुफ्त में उसका कल्याण हो जाता है । |
| 634. |
शरणागति होने पर फिर हमें अपने कल्याण के लिए कुछ भी अलग से करने की आवश्यकता नहीं होती । |
| 635. |
प्रभु की करुणा, कृपा और दया शरणागत होते ही हमें तुरंत मिलती है । |
| 636. |
शरणागति पूर्ण रूप से हमें भगवत् प्राप्ति करवा देती है । |
| 637. |
शरणागति होते ही परमानंद के लिए हमें कोई अलग से परिश्रम नहीं करना पड़ता । |
| 638. |
शास्त्रों में बताया गया है कि शरणागति सर्वोपरि साधन है क्योंकि हमारी चिंता प्रभु करें इससे बड़ी क्या उपलब्धि हो सकती है ? |
| 639. |
प्रभु को मन अर्पण करना ही शरणागति का मर्म है । |
| 640. |
शरणागति का प्रभाव जीवन में बहुत प्रबल होता है । |
| 641. |
शरणागति होने पर प्रभु हमें प्यारे और मीठे लगने लगते हैं । |
| 642. |
शरणागत भक्त को पक्का विश्वास होता है कि सुख और दुःख प्रभु की स्वीकृति से ही उसके पास आते हैं । इसलिए वह अनुकूलता और प्रतिकूलता दोनों में सम रहता है । |
| 643. |
शरणागत मानता है कि प्रभु की स्वीकृति से ही दुःख आया है और प्रभु मंगलभवन हैं इसलिए इस दुःख में भी मेरा मंगल ही छिपा हुआ है । |
| 644. |
अपने जीवन में प्रभु की इच्छा और स्वेच्छा भक्त चलने देता है । यह शरणागति का मर्म है कि प्रभु की इच्छा में हम राजी रहना सीख जाते हैं । |
| 645. |
शरणागति में तन, मन और प्राण प्रभु को अर्पण कर दिए तो आज ही करोड़ों जन्मों की बिगड़ी बन जाएगी । |
| 646. |
प्रभु की शरणागति बड़े ही आनंद का विषय होती है । |
| 647. |
मन और चाह प्रभु को समर्पित कर दें तभी शरणागति पूर्ण मानी जाएगी । फिर शांति और परमानंद ही जीवन में होगा । |
| 648. |
जिसने अपना सर्वस्व प्रभु को समर्पित कर दिया, प्रभु का एक अवतार उस जीव के हृदय में हो जाता है । यह कितने मौज की बात है । |
| 649. |
सभी प्रभु के शरणागत हो सकते हैं, किसी के लिए भी प्रभु की शरणागति का द्वार कभी बंद नहीं होता । |
| 650. |
पवित्र और निर्मल होने के लिए सबसे श्रेष्ठ उपाय प्रभु की शरणागति ही है । |
| 651. |
हम जैसे भी हैं प्रभु के ही हैं, यह शरणागति का मूल मंत्र है । |
| 652. |
अपना घर प्रभु को समर्पित कर दें तो वह मंदिर बन जाएगा और फिर सेवक बनकर प्रभु के उस घर रूपी मंदिर में प्रभु की सेवा में रहें । |
| 653. |
जितने भी कर्म हों वह सब प्रभु के लिए हों और प्रभु को समर्पित हों । |
| 654. |
जीवन में हमारा लक्ष्य सदैव प्रभु की सेवा और प्रभु को सुख देना ही होना चाहिए । |
| 655. |
प्रभु को भोग लगाकर हम प्रसाद पाएं । जो प्रभु को अर्पित नहीं होता वह कभी नहीं पाएं । |
| 656. |
मेरे पास जो कुछ भी है वह प्रभु का ही है, मेरा नहीं है क्योंकि मैं तो प्रभु के शरणागत हूँ । |
| 657. |
भगवत् प्राप्ति की इच्छा मात्र करने से हृदय निर्मल होना आरंभ हो जाता है । |
| 658. |
भक्ति हमें मृत्यु बेला पर भी उत्साह प्रदान करती है क्योंकि वह हमें तब तक मृत्यु से अभय कर चुकी होती है । |
| 659. |
माया के भक्त तो बहुत होते हैं पर मायापति प्रभु का भक्त कोई बिरला ही होता है । |
| 660. |
प्रभु की कृपा पर जीवन में अटल विश्वास होना चाहिए । |
| 661. |
हमारे द्वारा किए हुए कर्म का फल हमेशा हमारा पीछा करता है । |
| 662. |
किसी के अंतःकरण में वेदना जागृत नहीं करनी चाहिए कि वह व्याकुल होकर हमें कहे कि तुमने मेरे साथ अन्याय किया है । ऐसा होना हमारा तत्काल अकल्याण कर देता है । |
| 663. |
भावयुक्त होकर ही प्रभु की सेवा करनी चाहिए । |
| 664. |
प्रभु को अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करना चाहिए । |
| 665. |
सबसे पहला साधन का सूत्र यह है कि जगत के समस्त जड़ चेतन यानी सबमें प्रभु को ही देखना । |
| 666. |
जो प्रभु से प्रीत करता है प्रभु कई गुना ज्यादा प्रीत उससे करते हैं । |
| 667. |
केवल और केवल प्रभु का ही भरोसा और प्रभु का ही आश्रय जीवन में होना चाहिए । |
| 668. |
अहेतु की भक्ति को ही श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु ने परम धर्म बताया है । |
| 669. |
हर कर्म प्रभु को समर्पित करके ही करना चाहिए । |
| 670. |
जो भी खाना पीना है उसे प्रभु को अर्पित करके ही ग्रहण करना चाहिए । |
| 671. |
जीवन में और दिनभर के समस्त चेष्टाएं प्रभु को अर्पित करके ही करनी चाहिए । |
| 672. |
अगर यह चिंता है कि मेरा क्या होगा तो प्रभु की शरणागति हुई ही नहीं है । |
| 673. |
निरंतर प्रभु का स्मरण और प्रभु का नाम हृदय में चलना चाहिए । |
| 674. |
शरणागति का पहला लक्षण यह है कि निद्रा से उठे तो पहले स्मरण स्वतः ही प्रभु का होना चाहिए । |
| 675. |
जीवनभर प्रभु का नाम लिया है तो मृत्यु बेला पर नाम अपने आप कंठ में आ जाएगा और हमारा परम मंगल कर देगा । |
| 676. |
अन्य आश्रय जीवन में होना ही नहीं चाहिए । |
| 677. |
प्रभु के हर विधान में आनंदित रहना चाहिए । |
| 678. |
प्रभु के किसी भी विधान में विरोध भाव मन में नहीं आने देना चाहिए । |
| 679. |
किसी भी तरह की प्रभु से कोई चाह या कोई कार्य पूरा करने की शर्त नहीं होनी चाहिए । |
| 680. |
शरणागत होने पर निश्चित हो जाएं कि अब प्रभु ने औपचारिक रूप से हमारी पूरी जिम्मेदारी ले ली है । |
| 681. |
हमारे पास अपना कहने वाले केवल प्रभु ही होने चाहिए । |
| 682. |
जीवनभर जो नाम जप करता है उसकी अंतिम स्थिति में यानी अंतिम समय में उसके कल्याण के लिए उससे नाम जप प्रभु स्वयं करवाते हैं । |
| 683. |
जो अंत समय प्रभु का नाम लेकर शरीर त्यागता है उसे निश्चित भगवत् प्राप्ति होती है । |
| 684. |
हर अनुकूलता और प्रतिकूलता में प्रभु का विधान देखने की कला भक्त को आती है । |
| 685. |
सारी सांसारिक कामनाएं त्यागकर प्रभु की शरणागति स्वीकार करनी चाहिए । |
| 686. |
जो सर्वत्र प्रभु को देखता है उसके भय का क्षय हो जाता है क्योंकि सब तरफ और सभी में उसको उसके रक्षक प्रभु ही दिखते हैं । |
| 687. |
सब कुछ भगवान ही बने हुए हैं । जो सृजन, पालन और संहार का खेल हो रहा है वह भगवान ही कर रहे हैं । |
| 688. |
मन को प्रभु में लगाएं तो संसार मन को चोट नहीं दे पाएगा । |
| 689. |
शरणागत के कष्ट को प्रभु अपने ऊपर ले लेते हैं, यह प्रभु का स्वभाव है । |
| 690. |
जो निरंतर प्रभु का चिंतन करता है उसे प्रभु अपना दिव्य अनुभव प्रदान करते हैं । |
| 691. |
स्वर्ग के देवतागण कहते हैं कि जीव को भारतवर्ष में जन्म उसके कितने ही जन्मों के पुण्य के कारण मिलता है । मनुष्य जन्म वह भी भारतवर्ष में, यह बड़ा दुर्लभ संयोग होता है । |
| 692. |
हम संसार से थककर, हारकर प्रभु की शरण में आते हैं । भाग्यवान वह जीव है जो जीवन में सर्वप्रथम ही प्रभु की शरण में आकर भक्ति में रम जाता है । |
| 693. |
भारतवर्ष की भूमि दिव्यता से भरी हुई देवभूमि है । |
| 694. |
भारतवर्ष भूमि नहीं है, श्री गंगाजी और श्री यमुनाजी नदी नहीं है, यह सब देव रूप और देव स्वरूप हैं । |
| 695. |
देवी विभूति से सदैव सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए तभी वे अपनी अदभुत कृपा हम पर करती हैं । |
| 696. |
श्रीदेवी भागवतजी में भगवती तुलसी माता का एक अर्थ बताया गया है कि जिनकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती । |
| 697. |
भगवती तुलसी माता श्रीनारायण प्रिया हैं । |
| 698. |
मृत्यु बेला में दो सबसे महत्वपूर्ण संपदा है - श्रीगंगा जल और श्रीतुलसी दल । |
| 699. |
रोज की जाने वाली भक्ति ही जीवन में काम आती है । |
| 700. |
श्री वेदजी सबसे बड़े प्रमाण स्वरूप हैं । |
| 701. |
प्रभु की प्रसादी माला और प्रसाद का कभी भी जीवन में अपमान नहीं करना चाहिए । |
| 702. |
गौ-माता बिना हमारी गति नहीं है क्योंकि सभी देवताओं का वास उनके श्रीअंगों में है । |
| 703. |
हमारे हृदय में प्रभु के लिए पूर्ण विश्वास होना चाहिए । |
| 704. |
प्रभु हम पर प्रसन्न हो जाएं तभी हमारे साधन की सफलता है । |
| 705. |
मनुष्य जन्म में बड़ा मांगलिक अवसर भगवत् प्राप्ति करने के लिए ही हमें मिला है । |
| 706. |
प्रभु के नाम जप में महाशक्ति है जो हमारे भीतर जागृत होती है । कोई भी कार्य शक्ति माता के बिना संभव नहीं है । |
| 707. |
हर मंत्र में भी उन मंत्र की शक्ति वास करती है । |
| 708. |
पशु बलि का अर्थ शास्त्र करते हैं कि जो हमारी इंद्रियों में और जननेंद्रिय में पशुता है उसकी बलि की बात कही गई है । कहीं भी सनातन धर्म के शास्त्र में पशुओं की बलि भगवती माता को देने की बात नहीं कही गई है । यह पशु भी भगवती माता की ही संतानें हैं तो भगवती माता कैसे अपने लिए अपनी संतान की बलि मांगेगी । |
| 709. |
अपनी भोग प्रवृत्ति और गलत वासनाओं की बलि भगवती माता को देनी चाहिए । सच्ची बलि तब होगी जब हमारी भोग प्रवृत्ति और गलत वासनाओं का जीवन में हम त्याग करेंगे । |
| 710. |
प्रभु को अपने अंदर खोजने से ही प्रभु मिलेंगे, बाहर नहीं मिलेंगे । इसलिए अंतर्मुखी होना बहुत जरूरी है । |
| 711. |
जिसका उद्देश्य प्रभु हैं उसे प्रभु कृपा से प्रभु की माया भी रास्ता दे देती है । |
| 712. |
अगर प्रभु के अतिरिक्त हमारी कोई अन्य इच्छा होगी तो प्रभु वह दे देंगे पर खुद को नहीं देंगे । |
| 713. |
जैसे एक सांसारिक माता जलता अंगारा अपने बच्चे के हाथ में नहीं देती वैसे ही प्रभु हमें संसार नहीं देते । पर हमारा दुर्भाग्य है कि हम प्रभु से प्रभु को नहीं मांगकर संसार ही मांगते हैं । |
| 714. |
भक्त केवल प्रभु से यही चाहता है कि एक बार प्रभु उसे “अपना” कहकर संबोधित कर दें । |
| 715. |
केवल प्रभु से ही अपनापन होना चाहिए । जीव संसार से अपनापन रखने के कारण ही कष्ट पा रहा है । |
| 716. |
भक्त भगवान का धन होता है । जैसे संसार का धन संसारी को प्रिय होता है वैसे ही भक्तरूपी धन प्रभु को अत्यंत प्रिय होता है । |
| 717. |
हम जैसे भी हैं बिना छल और कपट के प्रभु के सामने प्रस्तुत हो जाना चाहिए । |
| 718. |
प्रभु बिना बोले ही हमारी सब बातें जानते हैं, बिना बोले ही हमारी सब बातें सुनते हैं । |
| 719. |
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने सुंदरकांडजी का नाम सुंदरकांड इसलिए रखा क्योंकि इसमें प्रभु श्री हनुमानजी ने भक्तिस्वरूपा भगवती जानकी माता की प्राप्ति की है । भक्ति को प्राप्त करने से सुंदर गोस्वामीजी की दृष्टि में कुछ भी नहीं है । |
| 720. |
अंतिम समय प्रभु का नाम उच्चारण हो जाए तो इस जन्म के और पूर्व जन्मों के सब पाप क्षय हो जाते हैं और निश्चित भगवत् प्राप्ति होती है । |
| 721. |
देह के संबंधियों के प्रेम में तो सब रोते हैं पर आत्मा के संबंधी प्रभु के प्रेम में कोई बिरला ही रोता है । |
| 722. |
सब तरफ से अपनापन हटाकर प्रभु के श्रीकमलचरणों में वह अपनापन हो जाना चाहिए । |
| 723. |
जीवन प्रभु के श्रीकमलचरणों में समर्पित कर दें नहीं तो कितनी दुर्गति कितने जन्मों से हमारी होती आई है, यह हम सोच भी नहीं पाते । |
| 724. |
भक्त को किसी भी व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ का चिंतन नहीं होता यानी प्रभु से हटकर कोई चिंतन नहीं होता । |
| 725. |
देह में, भोग में, धन में, रिश्तों में आसक्त होना बहुत गौण है । प्रभु में आसक्त होना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है । |
| 726. |
प्रभु की प्राप्ति का प्रभु ने सभी को समान अधिकार दिया है । |
| 727. |
प्रभु के प्रेम की प्राप्ति हमारे जीवन का लक्ष्य बन जाना चाहिए । |
| 728. |
भगवत् साक्षात्कार केवल प्रभु के श्रीहाथों में है, यह किसी साधन के द्वारा संभव नहीं है । प्रभु कृपा करेंगे तभी यह संभव होगा । साधन से प्रभु रीझते हैं और कृपा करते हैं । |
| 729. |
चंचल मन को अचंचल यानी स्थिर करना केवल भक्ति से ही संभव है । |
| 730. |
सत्संग का ऐसा प्रभाव है कि वह हमें जीवन में बहुत ऊँचाइयों पर ले जाता है । |
| 731. |
प्रभु की शरणागति होने पर बड़ा रूप लेकर आया प्रारब्ध भी बहुत छोटे रूप में भोगना पड़ता है । जैसे एक बच्चा पड़ोसी के यहाँ बदमाशी करके आया, पड़ोसी मारने दौड़ा पर उस बच्चे की माता तुरंत आ गई पड़ोसी से बचाने के लिए । उसकी माता ने स्वयं लंबा हाथ बनाकर थप्पड़ मारा पर मारा धीरे से । दिखाया कि जोर से मार रही है जिससे पड़ोसी नहीं मारे पर खुद का बेटा था इसलिए मारा धीमे से । ऐसे ही प्रभु अपने भक्तों के प्रारब्ध को बहुत धीरे से और कम कर करके काट देते हैं । |
| 732. |
प्रभु स्वयं कष्ट सह सकते हैं पर जो उनसे प्रेम करता है वह कष्ट सहे, यह प्रभु को स्वीकार नहीं है । प्रभु श्री रामजी श्रीचित्रकूट नंगे पैर आए, कांटों भरी राह में चलकर आए पर जब वनदेवी उपस्थित हुई प्रभु की सेवा के लिए तो प्रभु ने कहा कि मुझे कोई सेवा नहीं चाहिए । प्रभु ने आगे कहा कि अगर सेवा करनी ही है तो जिस मार्ग से मैं आया हूँ उसके कांटे हटा दो क्योंकि कुछ समय बाद भरतलाल इसी मार्ग पर चलकर मुझसे मिलने आएगा । |
| 733. |
भक्त को अपने कृपा छत्र के नीचे प्रभु सदैव रखते हैं । |
| 734. |
प्रभु श्री हनुमानजी का यश सुनकर प्रभु श्री रामजी सबसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं । |
| 735. |
प्रभु के लिए सदैव धन्यवाद के भाव मन में रहना चाहिए तो सुख-दुःख हमें बिना प्रभावित किए छूकर निकल जाएंगे । |
| 736. |
कलियुग में जीव का कल्याण केवल प्रभु नाम जप से ही हो सकता है । सभी शास्त्रों और संतों की यह अंतिम बात है । |
| 737. |
शांत मन ही शक्तिशाली मन होता है । |
| 738. |
अपने दोषों को स्वीकार करने का पुरस्कार शांति के रूप में हमें प्रभु से मिलता है । |
| 739. |
प्रभु के लिए दास का भाव हमारे हृदय में सदैव होना चाहिए । |
| 740. |
प्रभु को रिझाने वाले सद्गुणों का विस्तार हमारे भीतर भक्ति कर देती है । |
| 741. |
हमारे जीवन का उद्देश्य और रुचि प्रभु ही होने चाहिए । |
| 742. |
अगर हमारा लक्ष्य भगवत् प्राप्ति है तो हमारी रुचि भी वैसी ही होनी चाहिए । रुचि संसार के भोगों के लिए होगी और लक्ष्य भगवत् प्राप्ति होगी तो यह कैसे संभव होगा । |
| 743. |
संसार मृत्यु लोक है पर प्रभु का सब कुछ अमृत तुल्य है जैसे कथामृत, नामामृत, रूपामृत और लीलामृत । |
| 744. |
हमारी व्याकुलता प्रभु मिलन की नहीं होती है बल्कि भोगों की, धन की, मान पाने की, जीने की व्याकुलता होती है । व्याकुलता केवल प्रभु मिलन की ही होनी चाहिए तभी हमारा जीवन कृतार्थ होगा । |
| 745. |
जैसे एक लोभी को संसार के व्यापार में वर्ष दर वर्ष घाटा होने पर बेचैनी होती है वैसी बेचैनी वर्ष दर वर्ष प्रभु साक्षात्कार नहीं होने पर हमें भी होनी चाहिए । |
| 746. |
प्रभु केवल हमारी व्याकुलता की चाहत से मिलते हैं । |
| 747. |
जितनी हमारे में धन की चाह है, क्या प्रभु प्राप्ति की उतनी चाह है ? क्या हम अपने परिवार से जितना प्रेम करते हैं उतना प्रेम प्रभु से करते हैं ? सच्चे मन से उत्तर तलाश करें तो दोनों का उत्तर “ना” आएगा । |
| 748. |
शरण लेने से पहले प्रभु उस जीव का पूर्व इतिहास या कर्म नहीं देखते । यह प्रभु की विलक्षण करुणा है नहीं तो शरणागति का कोई भी पात्र नहीं बन पाता । |
| 749. |
प्रभु केवल जीव में अपने लिए अपनापन देखते हैं । |
| 750. |
नाम जप की संख्या, तपस्या, संयम और व्रत से प्रभु नहीं मिलते क्योंकि यह साधन प्रभु को बांध नहीं सकते । प्रभु बंधते हैं तो केवल प्रेम से बंधते हैं । |
| 751. |
प्रभु से मिलन की व्याकुलता तीव्र से तीव्रतम हो जाएगी तो प्रभु पल भर में मिल जाएंगे । |
| 752. |
प्रभु प्राप्ति जिसे करनी है उसे संसार शून्यमय दिखाई देना चाहिए यानी संसार का अस्तित्व उसके लिए शून्य हो जाना चाहिए । |
| 753. |
प्रभु साक्षात्कार के लिए प्रभु के मन में हमसे मिलन की चाह सबसे जरूरी है । हमारी भक्तिरूपी साधना प्रभु के मन में मिलन की यही चाह को जागृत करने के लिए होती है । |
| 754. |
कभी भी, कुछ भी प्रभु से जिसे नहीं चाहिए, ऐसी निष्कामता होनी चाहिए । दूसरी बात, केवल प्रभु से सहज प्रेम होना चाहिए । यह दो बातें जीवन में होने पर प्रभु मिलन हो जाता है । |
| 755. |
हमारी चाह प्रभु के अलावा बहुत-सी चीजों की होती है जैसे धन की, पुत्र की, पौत्र की, मान की, प्रतिष्ठा की । यह सब घड़े में छिद्र की तरह हैं जो जल को घड़े में ठहरने नहीं देते । ऐसे ही अन्य चाह होने पर प्रभु की चाह स्थाई रूप से हमारे हृदय में नहीं ठहरती । |
| 756. |
अन्य चाह प्रभु के अलावा जीवन में रहना मानो छलनी में गौ-माता के दूध दुहना । ऐसा होने पर थोड़ा-सा भी दूध सुरक्षित नहीं बचेगा । |
| 757. |
संसार की चाह न होना, यही सच्ची साधना है । |
| 758. |
प्रभु के बारे में निरंतर श्रवण से प्रभु के लिए चाह हमारे मन में पैदा हो जाती है । |
| 759. |
प्रभु प्राप्ति की चाह में कोई समझौता नहीं करना चाहिए । चाह का सच्चा स्वरूप यही है कि अब बस प्रभु मिलन ही हमें चाहिए । |
| 760. |
एक ही देह है - मनुष्य देह जो हमें भगवत् प्राप्ति करा सकती है । |
| 761. |
जितना प्रभु नाम का धन हम कमा लें उतनी जीवन में मौज होगी क्योंकि इहलोक और परलोक दोनों की व्यवस्था ऐसे करके हमने कर ली । |
| 762. |
संसारी को मृत्यु से भय लगता है और भक्त को प्रभु विस्मरण यानी प्रभु को भूलने का भय लगता है । यह कितना बड़ा फर्क है । |
| 763. |
प्रभु के नाम में प्रियता हो जाए तो आगे उसका जो फल प्रकाशित होगा वह प्रभु से मिलन ही होगा । |
| 764. |
हमारा स्वभाव और जीवन ही भजन बन जाना चाहिए । |
| 765. |
प्रभु का स्वभाव, प्रभु का प्रभाव और प्रभु की महिमा एक भक्त के हृदय में गहराई से उतर जाती है । |
| 766. |
प्रभु के बराबर या समकक्ष किसी को नहीं रखना चाहिए । जीवन में सर्वप्रथम स्थान पर केवल और केवल प्रभु ही विराजमान होने चाहिए । |
| 767. |
किसी संसारी भोग के कारण हम प्रभु को क्षणभर के लिए भी भूल गए तो वह संसारी भोग क्षणभर के लिए बड़ा हो गया । भक्त के जीवन में ऐसा कतई नहीं होता कि क्षणभर के लिए भी प्रभु को पहले की जगह दूसरा स्थान मिले या क्षणभर के लिए भी प्रभु का विस्मरण हो जाए । |
| 768. |
हमारा लक्ष्य भगवत् प्राप्ति होना चाहिए और उस लक्ष्य को जीवन में किसी भी पल भूलना नहीं चाहिए । |
| 769. |
हम प्रभु को अपना जीवन अर्पित कर दें क्योंकि यह जीवन मिला ही भगवत् प्राप्ति के लिए है । |
| 770. |
भजन मार्ग पर माया प्रलोभन, भय और सिद्धियां भेजती है पर साधक को इससे विचलित होकर पथभ्रष्ट नहीं होना चाहिए । |
| 771. |
अनन्य प्रेमी और भक्त ही भगवत् साक्षात्कार कर पाते हैं । |
| 772. |
सबके मालिक प्रभु अपने भक्तों के सेवक तक बन जाते हैं । प्रेम और भक्ति के कारण प्रभु अपने भक्त से इतना प्रेम करते हैं । |
| 773. |
अनन्य भाव से प्रभु का नाम लिया जाए तो वह बहुत बड़ा लाभ देता है । |
| 774. |
भक्त दीनता की दृष्टि रखकर प्रभु से बहुत बढ़िया संबंध बनाता है कि मेरे जैसा पतित कहाँ और आप प्रभु जैसा पतितपावन कहाँ । |
| 775. |
संसार के लिए हमारी आँखों को खूब रोना आता है पर प्रभु के लिए नहीं आता, यह कितना बड़ा हमारा दुर्भाग्य है । |
| 776. |
संसार से चित्त हटाकर प्रभु में लग जाना चाहिए, यह सभी साधनों का एकमात्र फल है । |
| 777. |
प्रभु प्राप्ति की अभिलाषा जीवन में जागृत करना सबसे बड़ा पुरुषार्थ है । |
| 778. |
अन्य संसारी कामना रखने वाला भगवत् प्राप्ति की इच्छा नहीं रख पाता, अनन्य भक्ति करने वाला ही ऐसा कर पाता है । |
| 779. |
शास्त्र विरुद्ध और धर्म विरुद्ध आचरण कभी भी जीवन में नहीं करना चाहिए । |
| 780. |
जो हमारी साधना का तप है वह हमारे किसी पापाचरण के कारण बह न जाए, इसका हमें सदैव ध्यान रखना चाहिए । |
| 781. |
परदोष देखने पर वह दोष हमसे भी चिपक जाता है । |
| 782. |
कलियुग में प्रभु नाम जप से बढ़कर कोई धर्म नहीं, कोई तीर्थ नहीं, कोई अनुष्ठान नहीं, कोई यज्ञ नहीं, कोई दान नहीं और कोई तप नहीं । |
| 783. |
साधना वह है जो हमें जगत से हटाकर प्रभु में लगाए । असाधना वह है जो हमें प्रभु से हटाकर जगत में लगाए । |
| 784. |
भक्त का उद्देश्य भगवत् प्राप्ति होता है । संसारी का उद्देश्य संसार के भोग भोगना होता है । |
| 785. |
भक्ति नहीं करेंगे तो हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी । |
| 786. |
प्रभु को अर्पित जीवन ही शांत जीवन होता है जिसमें मन शांत, बुद्धि शांत और इंद्रियां शांत हो जाती है । |
| 787. |
जितना-जितना हम भजन करेंगे हमारे भीतर से विकार और सांसारिक विषय सब निकलकर भागेंगे । |
| 788. |
चाह केवल प्रभु की, भरोसा केवल प्रभु का – ऐसा होना केवल भक्ति से ही संभव होता है । |
| 789. |
मैं केवल भगवान का दास हूँ और भगवान ही मेरे सर्वस्व हैं - यह शुद्ध भाव भक्त को प्रभु से मिलाने वाला भाव है । |
| 790. |
माला हाथ में चल रही है और चित्त संसार में जा रहा है । ऐसे में हम वहीं माने जाएंगे जहाँ पर हमारा चित्त होगा । |
| 791. |
साधना से चित्त को ऐसा बना दिया जाता है कि चित्त में चितचोर प्रभु के अलावा कोई भी नहीं रहे । |
| 792. |
जगत का चिंतन छोड़ना नहीं पड़ता, प्रभु का चिंतन करना होता है तो जगत का चिंतन अपने आप ही छूट जाता है । |
| 793. |
जैसे अंधेरे कमरे में अंधकार हटाने का प्रयास नहीं किया जाता बल्कि दीपक जलाया जाता है तो अंधेरा स्वतः ही हट जाता है । ऐसे ही जगत छोड़ने का प्रयास नहीं करना चाहिए, प्रभु की भक्ति करें तो जगत स्वतः ही छूट जाएगा । |
| 794. |
जो जगत का चिंतन करता है तो सांसारिक भोग उसे परास्त करके ही रहते हैं । उस जीव का जीवन इसी भोग विलास में निकल जाता है और जीवन में कुछ भी हाथ नहीं लगता । |
| 795. |
हम हट करके प्रभु से माया के खिलौने मांगते हैं और उसी में खुश हो जाते हैं । यह तो वैसा ही है जैसे कोई मूर्खता करके खुश होता है । |
| 796. |
प्रभु की कृपा होगी तो प्रभु हमें भक्ति ही देंगे, मायाकृत खिलौने नहीं देंगे । |
| 797. |
प्रभु कभी भी हमें माया में फंसने वाली चीज देना नहीं चाहते पर हम हट करके वही मांगते हैं तो प्रभु को देना पड़ता है । |
| 798. |
जैसे पश्चिम की तरफ मुँह करके दौड़ेंगे तो उत्तर दिशा की तरफ नहीं पहुँच पाएंगे, ऐसे ही हम बातें परमार्थ की करेंगे और चलते संसार में रहेंगे तो कहीं नहीं पहुँच पाएंगे । |
| 799. |
सच्चा प्रेम तो प्रेम के सागर प्रभु ही कर सकते हैं । |
| 800. |
संसार के पास मोह, राग और आसक्ति है और प्रभु के पास सच्चा प्रेम है, चुनाव हमें ही करना है कि हमें क्या चाहिए । |