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BHAKTI VICHAR CHAPTER NO. 38

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. भगवत् विस्मरण वाला जीवन मृत जीवन जैसा ही है ।
002. प्रभु और माता की युगल जोड़ी उपमा रहित है । त्रिभुवन में किसी भी चीज से उनकी उपमा नहीं दी जा सकती ।
003. जैसी भी परिस्थिति हो उस परिस्थिति में भी भजन किया जा सकता है । परिस्थिति बदलने का इंतजार नहीं करना चाहिए, भजन से अपने आप परिस्थिति बदल जाएगी ।
004. भक्ति के प्रभाव से सभी विकार नष्ट होने लग जाते हैं । उस साधक की स्थिति बदलने लग जाती है ।
005. शास्त्रों के अनुसार प्रभु की भक्ति ही एकमात्र सच्चा पुरुषार्थ है ।
006. प्रभु को प्रेमाधीन कहा गया है यानी भक्तों के प्रेम से प्रभु उनके अधीन हो जाते हैं ।
007. शरीर का अंत होने से पहले अनंत प्रभु से मिलन हो जाना चाहिए ।
008. हमें चिंतन में प्रभु के अलावा किसी से भी सच्ची प्रियता नहीं रखनी चाहिए, असल में तो रखनी ही नहीं चाहिए ।
009. अब सभी आश्रय को छोड़ दें और प्रभु के अनन्य हो जाएं तो वह सबसे श्रेष्ठ जीवन हो जाएगा ।
010. चित्त दो ही जगह लगता है - प्रभु की माया में और प्रभु में । अगर हम प्रभु की माया से चित्त को हटा लें तो वह प्रभु में लग जाएगा ।
011. सुखसिंधु प्रभु की तरफ पीठ करके हम संसार की तरफ देखते हैं जो कि एकदम गलत है ।
012. मन, वचन और कर्म से प्रभु जो जुड़ा हुआ है वही इस संसार में श्रेष्ठ है ।
013. भक्त की एक वृत्ति होती है कि जो भी अच्छी चीज है वह उसके प्रिय प्रभु के लिए ही उपलब्ध होनी चाहिए ।
014. हमारा किया भजन हमें कहाँ तक पहुँचाएगा पता नहीं पर उस भजन के प्रभाव से प्रभु की करुणा हमें प्रभु के श्रीकमलचरणों तक पहुँचा देगी ।
015. अगर चिंतन है तो मंदिर से दस किलोमीटर दूर से ही प्रभु स्मरण हो जाएगा पर अगर भाव नहीं है तो मंदिर के गर्भगृह में भी हमें प्रभु का स्मरण नहीं होगा ।
016. प्रभु की हर श्रीलीला नित्य और सत्य है ।
017. प्रभु में सभी सद्गुण उनमें स्वतः ही सभी समय प्रकट रहते हैं, उसके लिए प्रभु को कोई प्रयास नहीं करना पड़ता है ।
018. प्रभु सभी कलाओं के सिंधु यानी सागर है ।
019. संसार की माता में इतनी ममता होती है तो जगतमाता जगजननी में कोटि-कोटि सांसारिक माताओं से भी कहीं ज्यादा ममता होती है । संसार की सभी माताओं की ममता मिलाकर एक बिंदु है जिसकी सिंधु जगजननी भगवती माता की ममता है ।
020. हम प्रभु से प्रेम संबंध स्वीकार करेंगे तो वह संबंध ही हमें प्रभु की कृपा दिलाएगी ।
021. हमें माया का दास नहीं बल्कि मायापति प्रभु का दास बनना चाहिए ।
022. प्रभु को श्रृंगार धारण कराकर सुंदरता में वृद्धि नहीं होती बल्कि श्रृंगार प्रभु को पाकर सुंदर हो उठता है । प्रभु तो वैसे ही अलौकिक और परम सुंदर हैं और उन्हें श्रृंगार क्या सुंदर करेगा ।
023. जब भोग सामग्री सामने हो पर भोगने की इच्छा न हो, रुचि न हो तभी हम परमार्थ पथ पर आगे बढ़ सकते हैं ।
024. योग में जो आनंद होता है वह भोग में कभी नहीं हो सकता । चित्त प्रभु में एकाग्र करना ही सच्चा योग है ।
025. जो मन की कामनाओं की मांग है, जो हमारी भगवत् विमुख चेष्टाएं हैं, उनको कभी पूर्ण नहीं होने देना चाहिए ।
026. इंद्रियां जब गलत मार्ग पर जाएं तो उनका सहयोग कभी भी नहीं करना चाहिए ।
027. अपने लिए तो सभी जी रहे हैं पर जो प्रभु के लिए जीवन जीते हैं वे ही सच्चे भाग्यवान होते हैं ।
028. प्रभु के दर्शन की प्रबल लालसा ही भगवत् दर्शन करवा सकती है ।
029. मन में उठने वाली कामनाओं का जब तक हम समर्थन करते हैं तब तक हम प्रभु से विमुख बने रहते हैं । जब हम मन में उठने वाली कामनाओं का त्याग कर देंगे तो भगवत् सानिध्य का तत्काल अनुभव कर पाएंगे ।
030. प्रभु से वृत्ति और भाव जुड़ने से हमारा मंगल और कल्याण निश्चित है ।
031. भक्ति, संयम और मौन से प्रभु बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं ।
032. संसार के विषय सेवन से भजन का उत्साह खंडित होता है ।
033. भक्ति में भगवान का बल है, भरोसा है और सहारा है इसलिए भक्ति सर्वश्रेष्ठ है ।
034. हम प्रभु की कृपा की अवहेलना करके फिर विषय भोग की तरफ चले जाते हैं । यह हमारा बहुत बड़ा दुर्भाग्य होता है ।
035. माया चक्र में वही फंसता है जो प्रभु के शरणागत नहीं है ।
036. जो वृत्ति प्रभु से विमुख है वह हमें माया के चक्कर में फंसा देगी ।
037. जो प्रभु से विमुख हैं वह माया के बंधन में बंधेगा ही क्योंकि उसे बचाने वाला कोई नहीं है ।
038. हमें प्रभु के नजदीक रहना चाहिए और भोगों से दूर रहना चाहिए पर हम इसका ठीक उल्टा करते हैं ।
039. धर्म के अनुसार मन को चलना चाहिए । ऐसा संयमित मन ही श्रेष्ठ होता है ।
040. भोगों का चिंतन भोगों का संग करने की इच्छा प्रकट कर देती है । इसलिए भोगों के चिंतन को ही रोकना चाहिए ।
041. भोगों से दूर भागने से बचेंगे नहीं तो भोग हमें नष्ट और भ्रष्ट कर देंगे । जैसे सिंह या सर्प आने पर हम भागते हैं वैसे ही भोगों से हमें भागना चाहिए । भोगों को जीवन में हम जीत नहीं सकते जैसे सिंह और सर्प से हम जीत नहीं सकते ।
042. इस जीवन में प्रभु से प्रेम करने का सौभाग्य पाना चाहिए ।
043. जितना प्रभु का नाम जपेंगे उतना ही निर्विकार होंगे ।
044. प्रभु के नाम जप से हम अपनी इंद्रियां और मन को प्रभु में स्थित कर सकते हैं ।
045. भोगों से मंगल होने वाला नहीं है, मंगल तो केवल प्रभु भक्ति से ही संभव है ।
046. मन को सदैव प्रभु में स्थित रखना चाहिए पर हम उसे भोगों में स्थित रखते हैं, यह हमारा दुर्भाग्य है ।
047. प्रभु के भरोसे रहने पर हम निर्विकार हो सकते हैं ।
048. जैसे वर्षा अग्नि को ठंडी कर देती है और राख को भी बहा देती है वैसे ही प्रभु की कृपा हमें निर्विकार कर देती है और हमारे अहंकार को भी बहा देती है ।
049. एक संत कहते थे कि जब जीवन में हार जाते हैं तो प्रभु के गले का हार बन जाते हैं क्योंकि वे हारे के सहारे हैं ।
050. मन और बुद्धि प्रभु में लगा देने से जीवन ही प्रभुमय हो जाएगा ।
051. प्रभु के लिए नियम कभी नहीं तोड़ना चाहिए । प्रभु के लिए नियमावली बनाकर उसे निभाना चाहिए ।
052. भक्ति जीव को प्रभु का प्रेम प्रदान करती है ।
053. बिना इच्छा और संकल्प के जीवन जीना चाहिए तभी प्रभु प्राप्ति में हम सफल होंगे ।
054. विषय सेवन नहीं करने पर जैसे ईंधन न मिलने पर अग्नि शांत हो जाती है वैसे ही हमारा मन शांत होकर प्रभु में लग जाता है ।
055. शरीर एक रथ है जिसे प्रभु की तरफ ले जाना चाहिए ।
056. एक ही लक्ष्य जीवन में भगवत् प्राप्ति का होना चाहिए ।
057. प्रभु में विश्वास ही प्रभु प्राप्ति का हेतु होता है ।
058. प्रभु में आश्रय और विश्वास दृढ़ रखना चाहिए ।
059. प्रभु के श्रीकमलचरणों की शरणागति कभी भी जीवन में नहीं छूटनी चाहिए ।
060. कामनाओं को भोगने से कभी तृप्ति नहीं मिलती, उन्हें छोड़ने से ही शांति मिलती है ।
061. जो प्रभु में चित्त अर्पित कर देता है प्रभु उसे निर्विकार बना देते हैं ।
062. जब हम जीवन में हार रहे होते हैं तो अपना एक बल, जो प्रभु का बल होता है, उसका स्मरण करना चाहिए ।
063. जगत के तिरस्कार किए हुए को प्रभु गले लगाते हैं, यह प्रभु का स्वभाव है ।
064. केवल पूर्ण निष्ठा से ही भगवत् प्राप्ति संभव होती है ।
065. भक्तों का कल्याण करने में प्रभु कभी भी देर नहीं करते ।
066. प्रभु में मन लगता है तो संसार से अरुचि हो जाती है ।
067. अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में प्रभु की ही भक्ति करनी चाहिए ।
068. प्रभु का इतना मृदुल स्वभाव है कि शरणागत के अवगुण को कभी नहीं देखते । अगर देखते तो किसी का भी उद्धार ही नहीं होता । इसलिए अपने शरणागत के दोष प्रभु देखते ही नहीं हैं ।
069. शरणागत का निर्वाह करना तो केवल प्रभु ही जानते हैं ।
070. प्रभु केवल प्रेम से ही रीझते हैं । प्रभु केवल प्रेम ही देखते हैं । कौन है, कहाँ का है, कैसा है, यह नहीं देखते ।
071. अगर हम हृदय से शरणागत हो जाएं तो प्रभु सब कुछ संभाल लेते हैं ।
072. प्रभु वैसे पक्षपात नहीं करते पर जब कोई प्रभु की शरण ले लेता है तो प्रभु उसका पक्ष ले लेते हैं । तब प्रभु अपने शरणागत के लिए पक्षपात करते हैं ।
073. प्रभु को समर्पित किए गए छोटे-से-छोटा कर्म भी महान फल देने वाला बन जाता है । इसलिए हर कर्म प्रभु को समर्पित करना चाहिए ।
074. जिस तरफ प्रभु होते हैं, विजय उसकी ही होती है ।
075. प्रभु में पूर्ण विश्वास के बिना भक्ति स्थिर नहीं होती ।
076. शरणागत भक्त केवल प्रभु की कृपा का ही जीवन में स्वाद लेता है ।
077. किसी में भी बल, तेज, बुद्धि और जितेंद्रियता सभी प्रभु द्वारा ही दी हुई होती है ।
078. सभी जगह से ठुकराए हुए को, तिरस्कृत किए हुए को भी प्रभु ही अपनाते हैं ।
079. कोई प्रभु जैसा क्षमावान, दयालु, कृपालु और उदार पूरी सृष्टि में नहीं है ।
080. शरणागत का प्रभु को छोड़कर और कोई आश्रय नहीं होता है ।
081. जो प्रभु की शरण में आ जाते हैं उनके सागर जितने अपराध भी प्रभु नहीं मानते और क्षमा कर देते हैं ।
082. जिनके हृदय में यह बात दृढ़ हो जाए कि हमारा प्रभु के अलावा कोई भी नहीं है तो यह भाव होना भगवत् प्राप्ति हेतु बहुत बड़ी सिद्धि है ।
083. जिसका कोई सांसारिक सहारा होता है वह संकट आने पर उसके पास जाता है और जिसका कोई आश्रय नहीं होता वह संकट पड़ने पर प्रभु की गोद में चला जाता है ।
084. प्रभु भक्त को पावन ही नहीं करते उसे दूसरों को पावन करने वाला भी बना देते हैं ।
085. हमारे माता, पिता, गुरु और सखा सभी प्रभु ही होने चाहिए ।
086. इस जगत में कोई अपना कहलाने वाला न हो, केवल प्रभु ही हों जो अपने हो तो हम जीवन की बाजी जीत जाएंगे ।
087. हमने प्रभु का आश्रय ले लिया तो आगे सब कार्य प्रभु कर देंगे ।
088. प्रभु प्रेम से बड़ा कोई सुख और आनंद संसार में नहीं है ।
089. प्रभु ही हमें एकमात्र अपने लगने चाहिए ।
090. जो भगवत् विस्मरण कराए उसका नाम माया है और जो भगवत् स्मरण कराए वह भक्ति है ।
091. जिस वस्तु, व्यक्ति या स्थान के संग के कारण भगवत् स्मरण छूट जाए उसका जीवन से तत्काल त्याग कर देना चाहिए ।
092. प्रभु का प्रेम प्रसाद ही हमें प्रसन्नता प्राप्त करवाती है ।
093. हानि होने वाली चीज को प्रभु सौ बार मांगने पर भी नहीं देंगे । इतना ख्याल प्रभु हमारा रखते हैं ।
094. हमारा हित होने पर ही प्रभु हमें कुछ देंगे ।
095. भक्ति करने वाला ही कल्याण को प्राप्त होता है ।
096. भक्त तीनों लोकों को पावन करने वाला बन जाता है ।
097. प्रभु के आश्रित होने पर कोई बाधा हमें परास्त नहीं कर सकती ।
098. जिस पर प्रभु कृपा करते हैं उसे माया परास्त नहीं कर सकती ।
099. प्रभु केवल अपनापन से ही प्राप्त होते हैं ।
100. जीवन में भक्ति को कभी भी बाधित नहीं होने देना चाहिए ।
101. संसार के पक्ष में नहीं बल्कि सदैव प्रभु के पक्ष में ही रहना चाहिए, यह शरणागति का मूल मंत्र है ।
102. श्रीहरि स्मृति समस्त विपत्ति से जीव को मुक्त करा देती है ।
103. प्रभु का यश रोजाना कानों में जाए तो एक दिन वह हमारे हृदय में भगवत् प्रेम का निर्माण जरूर कर देगी ।
104. एक तरफ माया है अपने विकारों के साथ और एक तरफ भक्ति है प्रभु के साथ । हमें किसके पक्ष में जाना है यह हमें तय करना है ।
105. प्रभु की विशुद्ध कृपा सभी भक्तों पर होती है ।
106. भक्त को प्रभु के अधीन हो जाना चाहिए नहीं तो माया पलभर में उसे अपने अधीन कर लेगी ।
107. प्रभु के लिए प्रेम में कोई कामना की मिलावट नहीं होनी चाहिए ।
108. माया में, विषय भोगों में जितना रस लेंगे उतना ही जीवन में दुःख मिलेगा ।
109. करोड़ों मुख से भी प्रभु के उपकारों का हम वर्णन नहीं कर सकते ।
110. मुझे केवल प्रभु चाहिए - यह बहुत हिम्मत वाली स्थिति साधक की होती है ।
111. हमारा एकांत कितना पवित्र है, यह हमें देखना चाहिए । एकांत में ही प्रभु चिंतन होता है ।
112. केवल प्रभु से ही जीवन में विशुद्ध प्रेम करना चाहिए ।
113. हमारी रुचि वह होनी चाहिए जिसमें प्रभु की प्रसन्नता हो ।
114. प्रभु के शरणागत होकर अपनी चिंता भी करना, यह शरणागति पर कलंक है - ऐसा शास्त्र मत है ।
115. शरणागत को अपनी चिंता कभी नहीं होती । वह प्रभु के आश्रय में सदैव निश्चिंत रहता है ।
116. तीर्थों की वायु का स्पर्श भी हमें पवित्र कर देता है ।
117. प्रभु के लिए किया थोड़ा-सा परिश्रम भी हमें जीवन में बहुत बड़ा लाभ देता है ।
118. भक्त हर स्थिति में प्रभु की कृपा का ही दर्शन करता है ।
119. हमें अपनी एक-एक वृत्ति को संसार में जाने से रोककर उसे प्रभु में लगाना चाहिए क्योंकि यही सच्चा योग है ।
120. जीवन में भजन नहीं होना बहुत हानिकारक है क्योंकि ऐसे समय में कलियुग हम पर आक्रमण कर देता है ।
121. बड़े भाग्यशाली वे होते हैं जो प्रभु के भरोसे में जीवन में रहते हैं ।
122. कुसंग का प्रभाव बहुत जोरदार होता है क्योंकि हमारा हर जन्म में कुसंग में फंसने का अभ्यास रहा है ।
123. आज से मैं प्रभु का हूँ, संसार का कोई अधिकार मेरे पर नहीं है, यह बात जीवन में दृढ़ कर लेनी चाहिए ।
124. भगवत् आश्रय जीवन में लेना बड़ा ही मंगलमय होता है ।
125. जीवन में एकमात्र प्रभु का भरोसा होना और प्रभु के आश्रित हो जाना चाहिए ।
126. प्रभु केवल हमारे पूर्ण रूप से समर्पित होने पर ही मिलते हैं ।
127. प्रभु की शरणागति में बहुत दिव्यता है ।
128. जैसे भक्ति से प्रभु वश में होते हैं वैसे अन्य किसी साधन से नहीं होते ।
129. हमारी शरणागति शुद्ध भाव से होनी चाहिए ।
130. जिसके पक्ष में प्रभु हो जाते हैं वह जीव माया पर विजय प्राप्त कर लेता है ।
131. प्रभु के यहाँ सारा खेल ही पूर्ण समर्पण का है ।
132. हमारा प्रभु के सिवाय कोई अपना नहीं होना चाहिए ।
133. धन्य हैं वे जिनके जीवन में एकमात्र स्वामी प्रभु होते हैं ।
134. हमारा चिंतन का विषय कभी भी प्रभु से अलग नहीं होना चाहिए ।
135. प्रभु का कथा श्रवण और नाम जप केवल प्रभु के लिए होना चाहिए, अन्य कोई हेतु नहीं होना चाहिए ।
136. भगवती सीता माता का दोबारा प्रभु से वियोग के कई कारण श्री वाल्मीकि रामायणजी में मिलते हैं । पहला, तोता-मैना की जोड़ी को बालपन में अलग करने के कारण तोता का श्राप । दूसरा, श्री दशरथजी के असमय देह त्यागने के कारण उनकी आयु प्रभु ने भोगी बिना भगवती सीता माता के जिससे श्री दशरथजी की सद्गति हो । तीसरा, श्री विश्वामित्रजी से सब अस्त्र-शस्त्र की विद्याएं प्रभु ने प्राप्त कर ली पर उतनी ही श्रेष्ठ विद्याएं अपने बच्चों को दिलाने के लिए श्री वाल्मीकिजी के पास भेजा । चौथा, श्रीराम राज्य का आदर्श स्थापित करने के लिए कि एक भी अपवाद प्रभु को स्वीकार नहीं चाहे वह धोबी का हो । पांचवा, श्रीराम दल के सभी को बल का अहंकार हो गया था तो प्रभु ने श्री कुशजी और श्री लवजी के हाथों उन्हें परास्त कराकर वह खत्म करवाने के लिए यह श्रीलीला की ।
137. जो प्रभु की शरण में आते हैं उनका उद्धार निश्चित होता है ।
138. संसार का मोह भक्ति मार्ग में बहुत बड़ा बाधक तत्व है ।
139. सभी साधन प्रभु का अपनापन प्राप्त करने के लिए ही होता है ।
140. हमारा अपनापन केवल प्रभु से ही होना चाहिए ।
141. प्रभु का आश्रय जिसने जीवन में नहीं लिया उसे माया ने मानो ठग लिया ।
142. प्रभु का आश्रय और बल ही है जो हमें सब जगह बचाता है ।
143. अगर कोई प्रभु के शरणागत हो जाता है तो उसके कुटुंब का भार प्रभु ले लेते हैं, उसके पितरों के उद्धार का जिम्मा भी प्रभु ले लेते हैं ।
144. प्रभु हमारे हृदय की बात खूब जानते हैं । वे हमारे हृदय की भावना को ही देखते हैं ।
145. प्रभु की आज्ञा में जो रहते हैं उनके जीवन में परम मंगल होता है ।
146. प्रभु का स्वभाव है कि वे सदैव अपने सेवक के अनुकूल रहते हैं ।
147. भक्त वही है जो अपनी इच्छा को प्रभु की इच्छा में मिला देता है ।
148. प्रभु की रुचि में चलना करोड़ों मंगलों का मूल है ।
149. प्रभु श्री कृष्णजी को संत परमानंद के श्री ठाकुरजी बताते हैं ।
150. प्रभु जिस पर कृपा करते हैं उसे अपनी तन्मयता प्रदान करते हैं ।
151. प्रभु की कथा हमारे जीवन की सभी व्यथाओं को मिटा देती है ।
152. संसार को मौके पर कभी साथ नहीं पाएंगे, मौके पर और जरूरत के समय केवल प्रभु ही उपलब्ध मिलेंगे - यह शाश्वत सत्य है ।
153. जीवन में भजन का प्रभाव अदभुत होता है ।
154. प्रभु प्रेम के समुद्र हैं फिर भी भक्तों के प्रेम के भूखे रहते हैं ।
155. प्रभु की कथा इतनी दयालु है कि प्रभु से मिलने का साधन दे देती है ।
156. अनंत माताओं के वात्सल्य को जोड़ा जाए तो भी वह प्रभु के वात्सल्य का एक बिंदु मात्र भी नहीं होगा । प्रभु में इतना वात्सल्य अपने भक्तों के लिए होता है ।
157. प्रभु अपने भक्तों के लिए आगे-से-आगे व्यवस्था करते चलते हैं ।
158. प्रतिकूलता से जीवन में भक्ति की वृद्धि होती है ।
159. जिसके जीवन में प्रभु होते हैं, वही सच्चा भाग्यवान होता है ।
160. अपनी कीमती श्वासों को संसार के भोगों में व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए ।
161. अहंकार युक्त किसी भी साधन से कभी भी प्रभु प्राप्ति संभव नहीं है ।
162. भजन का एक अर्थ संत करते हैं कि संसार को “भज न” यानी संसार को नहीं भजना ।
163. मृत्यु पर तो सब कुछ छूटना तय है । इसलिए प्रभु के नाम को पकड़े जो कभी छूटने वाला नहीं है ।
164. हर स्थिति में जो भजन कर लेता है वही सच्चा भाग्यवान होता है ।
165. भोग भोगने पर शांति नहीं बल्कि अशांति ही मिलती है ।
166. प्रभु का नाम मंगल का भी मंगल करने का सामर्थ्य रखता है ।
167. जैसे पर्वत को वज्र चूर-चूर कर देता है वैसे ही प्रभु का नाम जप हमारे पापों के पर्वत को चूर-चूर कर देता है ।
168. प्रभु का नाम जप जीवन के सभी भय को समाप्त कर देता है ।
169. जो प्रभु का नाम जीवन में लेता रहता है उसे प्रभु का दुलार मिलता रहता है ।
170. प्रभु अपने नाम के जापक का सब भार अपने ऊपर ले लेते हैं ।
171. प्रभु की शरण में आने पर हमें परमानंद-ही-परमानंद का अनुभव होगा ।
172. अगर जीवन में भजन नहीं है तो पशु से भी निम्न जीवन मानव जी रहा है, ऐसा शास्त्र मत है ।
173. बड़े कृपापात्र वे होते हैं जो संसार द्वारा ठुकरा दिए जाते हैं और फिर प्रभु के मार्ग पर चल पड़ते हैं ।
174. प्रभु को हमसे केवल एक अपनापन का भाव ही चाहिए ।
175. एक भरोसा, एक बल, एक आश और एक विश्वास जीवन में प्रभु का ही होना चाहिए ।
176. प्रभु के अलावा कोई आशा और कोई भरोसा हमारा संसार में नहीं होना चाहिए ।
177. जिसको कंचन, कामिनी और कीर्ति ने जीवन में परास्त कर दिया उसकी दीक्षा और शिक्षा व्यर्थ हो जाती है ।
178. प्रभु का एक एकांतिक प्रेमी बनकर जीवन में रहना चाहिए ।
179. ऐसी अनन्यता अगर जीवन में आ गई कि हमारा संसार में कोई नहीं है तो हमारी पूरी जिम्मेदारी प्रभु ले लेते हैं ।
180. प्रभु सिर्फ हमसे दुलार चाहते हैं और फिर हमारा भी दुलार करते हैं ।
181. अखिल लोकों के भय को मिटाने वाले अभयदाता तो केवल प्रभु ही हैं ।
182. प्रभु की बहुत लाड़ भरी उपासना संतों ने हमें करने के लिए कहा है ।
183. हमें रुपयों का, अपनी बुद्धि का, अपने प्रियजनों का भरोसा होता है पर प्रभु का भरोसा हम नहीं कर पाते । हमें भरोसा केवल और केवल प्रभु का ही होना चाहिए ।
184. प्रभु अपने भक्त के हृदय में प्रकट होना सबसे ज्यादा पसंद करते हैं ।
185. संसार के नकली कामों में मानव जीवन का असली काम न छूट जाए । असली काम अपने मन को प्रभु के रंग में रंगने का है ।
186. जिनको जीवन में केवल प्रभु का भरोसा होता है, वे ही परम भाग्यवान होते हैं ।
187. अपनी प्रभु की शरणागति को सदैव पुष्ट करते रहना चाहिए ।
188. जब तक प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय नहीं लेंगे तब तक शांति नहीं मिलेगी ।
189. जीवन की प्रतिकूलता को साधक भगवत् कृपा ही मानते हैं ।
190. अपने ऊपर प्रभु की बहुत बड़ी कृपा का सदा अनुभव करना चाहिए ।
191. प्रभु ही पूर्ण हैं और एक हैं । यह दोनों सिद्धांत प्रभु का पूर्ण होना और एक होना को जो जान लेता है उसके लिए फिर कुछ जानने योग्य नहीं बचता ।
192. जब तक प्रभु से लगाव नहीं होता तब तक जीवन में तनाव रहता है । तनाव जीवन से हटाना है तो प्रभु से लगाव होना अनिवार्य है ।
193. जीवन में तनाव केवल इसलिए होता है क्योंकि हम अपने को असहाय, दुःखी, अनाथ और अकेला महसूस करते हैं । प्रभु से लगाव होते ही यह चारों हमें महसूस होना तत्काल बंद हो जाता है ।
194. जिसके जीवन के लक्ष्य प्रभु और माता हैं उनके ही लक्षण जीवन में श्रेष्ठ होते हैं ।
195. प्रभु के रूप माधुर्य को देखकर कोटि-कोटि श्री कामदेवजी भी मूर्छित हो जाते हैं ।
196. प्रभु का आकर्षण ही सांसारिक भोगों के आकर्षण को मिटा सकता है, अन्य कोई उपाय नहीं है ।
197. प्रभु में प्रबल श्रद्धा होना, निष्काम प्रेमाभक्ति होना, नित्य सत्संग और भजन होना, पापों और दुर्गुणों का भय होना - यह चारों चीजें जीवन में होने पर भगवत् प्राप्ति जीवन में होना निश्चित और तय है ।
198. प्रतिकूलता में एकमात्र आधार प्रभु होते हैं और इसलिए ऐसी परिस्थिति में प्रभु का खूब ध्यान होता है ।
199. प्रभु की श्रीलीलाओं का जीवन में श्रवण करना हमारा सबसे जल्दी उद्धार कर देता है ।
200. संसार के भोगों को विष के जैसा मानकर त्याग देना चाहिए, ऐसा संत कहते हैं ।
201. संसार का विषय चिंतन नहीं होना चाहिए बल्कि भगवत् चिंतन ही जीवन में होना चाहिए ।
202. माया हमें प्रभु के नाम जप में श्रद्धा नहीं होने देती ।
203. प्रवचन करना और प्रवचन सुन लेना आसान है पर प्रवचन का पालन करना सबसे कठिन है ।
204. हमें संसार के विषय का त्यागी और प्रभु का अनुरागी होना चाहिए ।
205. संसार के भोग में हम राजी हो गए तो हम परमार्थ में फिसल जाएंगे ।
206. जीवन में प्रभु का सतत स्मरण होना चाहिए ।
207. कलियुग में सच्चा सत्संग, जिसमें सिर्फ श्रीहरि की चर्चा हो, वह मिलना बहुत दुर्लभ है । जिसे सच्चा सत्संग मिल रहा है उन पर निश्चित प्रभु की असीम कृपा है ।
208. सत्संग केवल प्रभु कृपा के कारण ही हमें मिलता है ।
209. प्रभु को आठों याम नित्य प्रणाम करने मात्र से हमारे सभी पापों का मार्जन हो जाता है ।
210. हमारे जीवन के एक संकल्प प्रभु ही होने चाहिए ।
211. शरणागत के भाव को प्रभु सहर्ष स्वीकार करते हैं ।
212. शास्त्रों के हिसाब से वे ही सबसे भाग्यवान है जो प्रभु से प्रेम करते हैं ।
213. प्रभु की श्रीलीलाओं के चिंतन से, प्रभु कथा सुनने से, प्रभु का स्मरण करने से, प्रभु का नाम जप करने से प्रभु में चित्त लगता है ।
214. केवल भगवत् चर्चा ही जीवन में सुनना चाहिए ।
215. प्रभु सदैव हमारी प्रार्थना सुनते हैं पर हम उत्तर प्राप्त करने के लिए धैर्य नहीं रख पाते ।
216. शरणागत की रक्षा करना प्रभु का व्रत है । शरणागत होने पर कभी हमें प्रभु को कहना नहीं पड़ता कि मेरी रक्षा करें ।
217. शरणागत की पूरी जिम्मेदारी प्रभु अपनी मानते हैं ।
218. प्रभु अपनी कृपा से सदैव हमें विपत्ति से बचाते हैं ।
219. कर्म, कर्मफल और कर्तापन तीनों प्रभु को अर्पण करना पड़ता है तो ही पूर्ण अर्पण माना जाएगा, प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में यही बात श्री अर्जुनजी से कही है ।
220. जीवन में नाशवान चीजों के मिलने पर कोई लाभ नहीं है, सच्चा लाभ परमार्थ में ही है ।
221. प्रभु के रूप, श्रीलीला, नाम और धाम में से कुछ भी छूटा तो माया तुरंत अपना प्रभाव हमारे ऊपर डाल देगी । इसलिए इन चारों में यानी प्रभु के रूप, श्रीलीला, नाम और धाम में हर समय किसी एक को पकड़कर रखना चाहिए ।
222. संसार का विषय रस संसार के बंधन को ही पुष्ट करता है ।
223. जीवन में भोगों का चिंतन नहीं बल्कि भगवत् चिंतन ही होना चाहिए ।
224. प्रभु की भक्ति करने वाले को ही प्रभु मिलते हैं ।
225. सांसारिक कार्य करते हुए भी प्रभु का चिंतन करने वाला श्रेष्ठ होता है ।
226. जिस घर में श्री तुलसीजी महारानी की नित्य पूजा और सेवा होती है उस घर के किसी भी मृतक को लेने यमदूत कभी भी नहीं आ सकते ।
227. संसार के राग और द्वेष से बचने का एक ही उपाय है कि प्रभु से अनुराग होना ।
228. प्रभु के लिए किसी भाग्यवान के ही आंसू आते हैं ।
229. जिन आँखों से प्रभु के लिए नीर बहा करते हैं उन आँखों में प्रभु बसा करते हैं । भक्तराज श्री सूरदासजी ने यह भाव प्रकट किया है ।
230. हम छोटी-से-छोटी चीज में “मेरा” शब्द लगाते हैं जैसे मेरा पेन, मेरा मकान, मेरी गाड़ी पर दुर्भाग्य है कि मुख में यह शब्द नहीं आता कि “मेरे राम” या “मेरे श्याम” । हम प्रभु के लिए “मेरा” शब्द लगाने से चूक जाते हैं ।
231. एक संत कहते थे कि पूजा में एक नियम जोड़े कि रोज प्रभु से क्षमा मांगें । जो पाप हम जानते हैं उनके लिए भी क्षमा और जो पाप हम जन्मों-जन्मों में करके भूल गए हैं उनके लिए भी क्षमा ।
232. मंदिर में प्रभु की परिक्रमा करने से चौरासी लाख योनियों की परिक्रमा से हम बच जाते हैं ।
233. प्रभु को नित्य आठों याम दंडवत प्रणाम करने से जीव का दंड का विधान ही खत्म हो जाता है ।
234. श्री वाल्मीकि रामायणजी में लिखा है कि प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों की एक रज वायु के कारण भगवती अहिल्याजी बनी शिला पर पड़ी और उनका उद्धार हो गया । प्रभु के श्रीकमलचरणों की एक रज का इतना प्रताप है कि हजारों वर्ष से श्राप के कारण दंड पा रही भगवती अहिल्याजी तुरंत मुक्त हो गई ।
235. हम अभागे हैं जब तक प्रभु से हमारा प्रेम नहीं होता । हम भाग्यवान की गिनती में तब आएंगे जब प्रभु से प्रेम हो जाएगा ।
236. प्रभु के श्रीकमलचरणों का प्रेम और भक्ति ही प्रभु से मांगनी चाहिए ।
237. सौभाग्यवान वही है जो प्रभु का भजन जीवन के जंजालों के बीच में भी कर लेता है ।
238. प्रभु के लिए प्रेम में रोने से प्रभु हमारे जन्म-जन्मांतर का रोना यानी आवागमन मिटा देते हैं ।
239. प्रभु से चित्त जुड़ना चाहिए, यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है ।
240. जो अपनी वृत्ति को प्रभु से किसी भी तरह से जोड़ लेते हैं वे एक-न-एक दिन प्रभु को प्राप्त कर लेते हैं ।
241. हमें अपनी साधना का भरोसा नहीं अपितु प्रभु की कृपा का भरोसा होना चाहिए जो हमें प्रभु की प्राप्ति करा देगा ।
242. सारी कामनाएं, सारे भोग और सारे संबंध एक भक्त प्रभु के लिए त्याग देता है ।
243. श्रीगोपीजन कहतीं हैं कि जिन्होंने भी प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय लिया है वे सभी विपदा से मुक्त हो जाते हैं यानी जीवन में अभय हो जाते हैं ।
244. प्रभु की मोहिनी मूर्ति को देखकर आज तक कौन मुग्ध नहीं हुआ है ?
245. जीवन में क्लेश क्यों हैं क्योंकि प्रभु से अनुराग नहीं है ।
246. भगवत् प्रेम किसी भी दुःख को हमारे पर हावी नहीं होने देता ।
247. जीव का सर्वोपरि मंगल विधान है कि जीव का प्रभु के श्रीकमलचरणों में प्रीति हो जाना ।
248. लाभ उसी समय है जब प्रभु का चिंतन हो रहा है और हानि उसी समय है जब प्रभु का विस्मरण हो रहा है ।
249. प्रतिकूलता हमें याद दिलाती है कि जीवन में प्रभु का भजन ही करना चाहिए ।
250. प्रभु कभी भी किसी भी जीव का भरोसा नहीं तोड़ते । यह प्रभु का करुणामय स्वभाव है ।
251. प्रभु सत्य हैं इसलिए प्रभु के लिए संकल्प करने पर प्रभु उसे भी सत्य करते हैं ।
252. माखन गोरा होता है इसी तरह हमारे मन को भी गोरा होना पड़ेगा । तन काला होगा तो चलेगा पर मन गोरा होना पड़ेगा तब ही प्रभु उसे चुराएंगे ।
253. माखन कोमल होता है इसी तरह हमारे मन को भी कोमल होना पड़ेगा तब प्रभु उसे चुराएंगे ।
254. प्रभु को कोई सच्चाई से अपना बनाकर देखें तो कितना परमानंद जीवन में आएगा उसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते ।
255. माता के दरबार में करुणा, कृपा और दया के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिलेगा । इसीलिए सभी संत माता की कृपा सबसे पहले चाहते हैं ।
256. “यदि” कहकर प्रभु के सामर्थ्य पर कभी भी संदेह नहीं करना चाहिए । प्रभु पर सदैव अटल और अटूट विश्वास होना चाहिए ।
257. जीव का स्वभाव है प्रेम करना । अगर प्रभु से प्रेम नहीं है तो परिवार, भोगों, संपत्ति से प्रेम करेगा । प्रेम की दिशा गलत जगह नहीं होनी चाहिए ।
258. अहंकार एकदम नहीं होना चाहिए । क्या चीज का अहंकार ? हमारा रूप, भाग्य और बुद्धि सब कुछ प्रभु की ही दी हुई है ।
259. शुद्ध प्रेम केवल प्रभु से ही मिलता है ।
260. विषयी जीव संसार के विषयों से प्रेम करता है और भक्त प्रभु से प्रेम करता है, यह कितना बड़ा फर्क है ।
261. संसार के विषय का चिंतन करने वाले का जीवन ही बिगड़ जाता है ।
262. प्रभु अपने शरणागत भक्तों के पूर्व के दोषों को देखते ही नहीं हैं ।
263. प्रभु के श्रीकमलचरणों का ध्यान करने से जीवन की आपदा और विपत्ति से मुक्ति मिल जाती है ।
264. संसार सागर में डूबने से बचने का एक ही उपाय है प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय ।
265. मन को और इंद्रियों को प्रभु कृपा के बल से ही प्रभु में लगाया जा सकता है ।
266. जो केवल और केवल प्रभु का आश्रय ले लेते हैं वे ही प्रभु की माया को पार कर पाते हैं ।
267. प्रारब्ध अपने पुरुषार्थ से नहीं बदला जा सकता, केवल प्रभु की शरण में आकर ही बदला जा सकता है ।
268. विषयों का चिंतन छोड़ना बहुत कठिन है इसलिए नित्य सत्संग जरूरी है ।
269. प्रभु भक्ति नहीं करने वाले जीवन को शास्त्र निंदनीय जीवन मानते हैं ।
270. जीवन में प्रभु का दृढ़ भरोसा और आश्रय होना चाहिए ।
271. हमारा चिंतन जहाँ है वहीं हमारी उपस्थिति मानी जाती है । इसलिए संसार का काम करते हुए भी चिंतन प्रभु का ही रखना चाहिए ।
272. प्रभु नित्य हैं और निरंतर हैं ।
273. अपने साधन को छोटा और प्रभु की कृपा को सबसे बड़ा मानना चाहिए क्योंकि हमारा साधन भी प्रभु कृपा से ही संभव होता है ।
274. जिनका प्रभु का चिंतन हो रहा है वे ही सबसे धन्य होते हैं ।
275. प्रभु की दृष्टि हमारे ऊपर जाते ही हमारे जन्मों-जन्मों के पाप भस्म हो जाते हैं ।
276. जो जीवन प्रभु का नहीं बन पाया वह जीवन धिक्कार युक्त है, ऐसा शास्त्र मत है ।
277. अपने प्रेमी भक्तों से ही प्रभु पूर्ण प्रेम करते हैं ।
278. प्रभु की प्राप्ति ही जीवन की सच्ची विजय है ।
279. सच्ची शरणागति की स्थिति उस चिड़िया के नवजात बच्चे की तरह होती है जो सब कुछ के लिए अपनी माता पर आश्रित होता है ।
280. यह साधारण बात नहीं है कि प्रभु की पूर्ण शरणागति का भाव जीवन में आ जाए ।
281. सुख के सिंधु प्रभु को छोड़कर हमारा मन संसार के भोगों की तरफ भागता है, यह हमारा कितना बड़ा दुर्भाग्य है ।
282. अपने मन की पकड़ में आने पर हमारी दुर्गति होती है । हमारा मन हमारे पकड़ में आता है तो हमारी आध्यात्मिक उन्नति होती है ।
283. मानव शरीर पाकर वह दुर्भाग्यशाली जीव होता है जो जीवन में प्रभु से अपना संबंध स्वीकृत नहीं कर पाता ।
284. प्रभु से तनिक भी संबंध नहीं है और माया के दलदल में खुशी से कूद रहे हैं, ऐसे जीव सच्चे दुर्भाग्यशाली होते हैं ।
285. भक्त प्रभु प्रेम के मतवाले होते हैं ।
286. जीवन की सफलता हर समय प्रभु का स्मरण होने में ही है ।
287. बड़प्पन का भाव जीवन में आने पर हमारा पतन निश्चित है ।
288. प्रभु प्राप्ति के साधन में कभी भी दिखावा नहीं होना चाहिए ।
289. हमें अपनी प्रियता के भाव को केवल प्रभु से ही जोड़ना चाहिए ।
290. श्रेष्ठ भक्त अपने प्रभु के लिए निष्ठा और नियम को कभी नहीं तोड़ते ।
291. हमारे सैकड़ों विकार और पाप हवा में उड़ जाएंगे जब हम प्रभु की शरण में हो जाते हैं ।
292. इस संकल्प से कभी विचलित नहीं होना चाहिए कि हम प्रभु की शरण में हैं ।
293. हम भवसागर में हाथ-पैर मारते-मारते डूब जाएंगे । बचने का उपाय यही है कि प्रभु की शरण होकर उनकी श्रीकमलचरणों रूपी जहाज से भवसागर से पार हो जाया जाए ।
294. जैसे बादल में कोई आकृति बनती है और हवा का एक झोंका आते ही वह नष्ट हो जाता है वैसे ही प्रभु कृपा रूपी हवा से हमारे पाप के बादल नष्ट हो जाते हैं ।
295. भक्तों के वचन हमारे भजन मार्ग को पुष्ट करते हैं ।
296. दृढ़ प्रतिज्ञा करें कि मैं केवल प्रभु का ही हूँ और प्रभु की शरण में हूँ । ऐसा करने पर करोड़ों जन्म के पाप प्रभु नष्ट कर देते हैं ।
297. जो भक्ति करनी चाहिए वह हम नहीं करते और जो विपरीत कर्म हमें नहीं करना चाहिए वही हम जीवन में करते हैं, यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है ।
298. नियम और निष्ठा से किया भजन का बहुत बड़ा प्रभाव होता है ।
299. संत कहते हैं कि एक दिन यहाँ संसार से जाना है तो खूब प्रभु नाम जप की कमाई करके जाएं ।
300. उस जीव को पंचम पुरुषार्थ प्रभु प्रेम मिलता है जो चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का त्याग कर देता है । यह बहुत ऊँ‍‍ची अवस्था और बहुत बड़ी बात है ।
301. जीवन में भगवत् प्रेम का होना बड़ी दुर्लभ बात है ।
302. जो प्रभु की आठों याम सेवा में लगा है उससे बड़ा जीवन का कोई भी लाभ नहीं है ।
303. बीच-बीच में असाधन यानी संसार की चर्चा नहीं करनी चाहिए । हर समय साधन यानी प्रभु की सेवा में ही रहना चाहिए ।
304. भक्ति बड़े मौज का मार्ग है । हम प्रभु के हैं और प्रभु हमारे हैं, यह इस मार्ग की मौज है ।
305. जिसके जीवन में प्रभु के अलावा कोई नहीं है वही सबसे बड़ा भाग्यवान है ।
306. प्रभु की भक्ति बड़ी दुर्लभ लाभ देने वाली है ।
307. सिद्धांत से चलने पर ही हम परमार्थ के मार्ग में टिक पाएंगे ।
308. प्रभु के दासत्व से युक्त होना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है ।
309. कभी भी प्रभु अपने भक्त का त्याग नहीं करते ।
310. एक बार प्रभु जिसको स्वीकार कर लेते हैं उसका फिर कभी भी त्याग प्रभु नहीं करते ।
311. सभी साधनों का बल प्रभु की भक्ति से ही आता है ।
312. मन को एकाग्र और निर्मल करना है तो इसके लिए भक्ति अनिवार्य है ।
313. जागृत अवस्था में भी एकांत होना चाहिए । एकांत का तात्पर्य है केवल चित्त में प्रभु का चिंतन, संसार को बिलकुल चित्त से बाहर कर देना चाहिए ।
314. प्रभु के अलावा जो भी चिंतन हमसे होता है उसे शास्त्र और संत व्यर्थ का चिंतन कहते हैं ।
315. व्यर्थ श्रवण, व्यर्थ भ्रमण, व्यर्थ चिंतन और व्यर्थ भाषण से हमें जीवन में बचना चाहिए ।
316. किसी भी सांसारिक जीव से अपनापन नहीं हो, सच्चा अपनापन केवल प्रभु से ही हो । व्यवहार सबसे रखें पर अपनापन केवल प्रभु से ही रखें ।
317. प्रभु का नाम जप हमारे सभी अपराधों को प्रभु से क्षमा करवा देता है ।
318. प्रभु की शरणागति से हमारा साधन पुष्ट होता है क्योंकि प्रभु की कृपा हमें मिल जाती है ।
319. प्रभु रीझते हैं तो केवल अनन्यता से इसलिए भक्ति में अनन्यता होनी चाहिए ।
320. जीवन में लोभ प्रभु के नाम का, प्रभु की सेवा का ही होना चाहिए ।
321. प्रभु के श्रीकमलचरणों में रति होना सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात है ।
322. हमारा जीवन भी भक्तों की तरह भगवत् अर्पण जीवन होना चाहिए ।
323. शरीर, हृदय और जीवन सब कुछ प्रभु को समर्पित होना चाहिए ।
324. हमारी शरणागति उस पक्षी के बच्चे की तरह होनी चाहिए जो अपनी माता पर पूर्ण रूप से आश्रित होता है ।
325. अपनी परवाह हम करते हैं तो हमारी शरणागति पूर्ण नहीं है । यह शरणागति पर कलंक है ।
326. हम परवाह करेंगे तो प्रभु बेपरवाह रहेंगे । हम बेपरवाह हो जाएंगे तो प्रभु हमारी परवाह करेंगे ।
327. सारे कर्म प्रभु को अर्पित होने चाहिए ।
328. पाप के लिए मन में पूर्ण संताप होते ही प्रभु कृपा करते हैं और पाप भस्म हो जाते हैं ।
329. हमें अपनी साधन क्रिया पर भरोसा है पर प्रभु की कृपा पर भरोसा नहीं करते, यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है ।
330. सब कोई संसार में परीक्षा करके कृपा करते हैं पर प्रभु बिना परीक्षा ही अकारण कृपा करते हैं ।
331. शरणागत के कल्याण का बोझ प्रभु पर सदैव होता है और प्रभु इसे सहर्ष स्वीकारते हैं ।
332. जिनको प्रभु का आश्रय होता है उनसे बड़ा भाग्यवान कोई नहीं हो सकता ।
333. हमें प्रभु के श्रीहाथों बिक जाना चाहिए ।
334. साधन और भजन से बहुत बड़ी प्रभु की शरणागति होती है ।
335. कोई रोकर प्रभु का भजन करता है तो प्रभु भी रोकर उसका ध्यान करते हैं ।
336. हमारा मन निरंतर प्रभु में लगा हुआ होना चाहिए ।
337. हमें अपने प्राणों को प्रभु को समर्पित कर देना चाहिए ।
338. हमारा जीवन भगवत् अर्पण जीवन होना चाहिए तभी मानव जीवन की सार्थकता है, ऐसा शास्त्र और संत मत है ।
339. भगवत् चर्चा हमें प्राणों से भी प्रिय लगनी चाहिए ।
340. प्रभु के श्रीकमलचरणों में प्रेम नहीं बना तो सभी साधन विफल हैं ।
341. प्रभु हमारे अंदर अपने लिए केवल अनन्यता का भाव ही देखते हैं ।
342. हमारे इस मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य प्रभु प्राप्ति ही होनी चाहिए ।
343. हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए कि प्रभु का चिंतन और स्मरण कभी नहीं छूटे ।
344. हमारा नित्य अनुराग प्रभु के लिए बढ़ते रहना चाहिए ।
345. प्रभु ही हमारे प्राणधन होने चाहिए ।
346. जिनको प्रभु से अपनापन हो गया वे ही इस पूरे जगत में सच्चे भाग्यवान हैं ।
347. वह जीवन किस काम का जिसमें प्रभु का प्रथम स्थान न हो ।
348. प्रभु जैसा जीव से प्रेम करने वाला ब्रह्मांड में कोई भी नहीं है ।
349. अपनी नीचता और प्रभु की महानता को जब हम जान जाएंगे तो हमें पता चलेगा कि इतने नीच जीवात्मा को इतने महान प्रभु कितना प्रेम करते हैं । इससे प्रभु की करुणा का हमको परिचय मिलेगा ।
350. जो प्रभु का आश्रय लेता है प्रभु उसका पक्ष ले लेते हैं ।
351. एक प्रभु को छोड़कर कोई दूसरा हमारे हृदय और दिमाग में नहीं रहे, सारी साधना इस बात के लिए ही है ।
352. प्रभु कृपा करते हुए कभी भी तृप्त नहीं होते यानी कृपा-पर-कृपा करते ही रहते हैं ।
353. प्रभु की कृपा को देखते हैं तो लगता है कि प्रभु की प्राप्ति संभव है ।
354. जितना प्रभु की कृपा का भरोसा करते जाएंगे उतना प्रभु के समीप पहुँचते जाएंगे ।
355. प्रभु पर पूर्ण विश्वास होना जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है ।
356. प्रभु की शरणागति प्रभु को हमारे तरफ खींचती है और हमें भी प्रभु की तरफ ले जाती है ।
357. प्रभु इतने उदार हैं कि देखते भी नहीं कि शरण में आने वाला जीव कितना पापी और दुराचारी है और उस पतित को अपना लेते हैं ।
358. प्रभु से जब चित्त जुड़ जाता है तो अलौकिक अनुभव होने लगते हैं ।
359. हृदय से प्रभु का पक्का आश्रय हो तो हमसे कोई भी चूक हो जाए फिर भी प्रभु हमें नहीं छोड़ते ।
360. प्रभु की माया बड़ी बलवती है पर प्रभु की कृपा उससे भी कहीं ज्यादा बलवती है ।
361. संत कहते हैं कि प्रभु का गजब का करुणामय स्वभाव है ।
362. प्रभु का आश्रय हो तो प्रभु हमारे सभी कर्मों और बातों को सुधार देते हैं ।
363. जितनी प्रभु चर्चा सुनें उतनी ही प्रभु में आसक्ति हो जाएगी ।
364. प्रभु के विश्वास और भरोसे में कभी भी कमी नहीं आने देनी चाहिए ।
365. हमारी हर सेवा प्रभु को प्रसन्न करने के लिए होनी चाहिए तभी वह सेवा सार्थक होती है ।
366. अपने आचरण से प्रभु और माता को सुख पहुँचाना, यह सबसे श्रेष्ठ सेवा है ।
367. मृत्यु के समय प्रभु का स्मरण कभी नहीं छूटना चाहिए ।
368. अहंकार की छतरी लगाकर रखने पर प्रभु कृपा की वर्षा में हम भीग नहीं पाएंगे ।
369. एकमात्र प्रभु की कृपा का ही जीवन में भरोसा रखना चाहिए ।
370. हमारी हर इंद्रियां तभी पवित्र मानी जाती है जब वे प्रभु से जुड़े ।
371. भजन अविनाशी है जो कभी भी नष्ट नहीं होता । इसलिए किया हुआ भजन हमेशा हमारे साथ रहता है ।
372. दुःख, चिंता और भय से मुक्ति करने की शक्ति केवल भक्ति में ही है ।
373. अन्य कहीं मन नहीं जाए तो ही हमारा जीवन भजन के योग्य बनेगा ।
374. आनंद, दया, करुणा और वात्सल्य का अनमोल खजाना केवल प्रभु के पास ही है ।
375. केवल और केवल प्रभु की कृपा का ही जीवन में भरोसा रखना चाहिए ।
376. जीवन में आश्रय केवल प्रभु का ही होना चाहिए ।
377. नियम और अभ्यास में बड़ा सामर्थ्य होता है क्योंकि वह हमें परमार्थ मार्ग पर आगे ले जाते हैं ।
378. प्रभु को प्रसन्न करके कोई संसार का विषय सुख मांगे तो उससे बड़ा दुर्भाग्य वाला कोई जीव नहीं होगा ।
379. प्रभु की हमारे पर असीम कृपा है, यह सदा अनुभव करना चाहिए ।
380. शरणागत का प्रभु के परमपद पर वैसा अधिकार होता है जैसा एक पुत्र का अपने पिता की संपत्ति पर जन्मजात अधिकार होता है ।
381. हम दूसरों को उपदेश देने में बहुत कुशल होते हैं और स्वयं के मन को उपदेश देने में विफल हो जाते हैं ।
382. प्रभु को नित्य दंडवत प्रणाम करने वाला फिर कभी लौटकर मृत्युलोक नहीं आता और कभी नर्क नहीं जाता ।
383. युगल प्रभु की एकांतिक भक्ति करनी चाहिए ।
384. प्रभु की कृपा का जीवन में परम भरोसा रखना चाहिए ।
385. जो इच्छा प्रभु की प्राप्ति के लिए होती है वह इच्छा होते हुए भी निष्काम है, सकाम नहीं है ।
386. प्रभु के श्रीकमलचरणों की शरण में ही सदैव रहना चाहिए ।
387. प्रभु की माया तब फंसाती है जब हम प्रभु की भक्ति नहीं करते ।
388. कुछ रसिक प्रभु की कथा कान से सुनते नहीं बल्कि देखते हैं । वैसे देखने का कार्य आँखें करती है पर उन रसिकों के कान उन्हें कथा को दिखाने का काम करती है । यह कथा सुनने की एक बहुत ऊँ‍‍ची अवस्था होती है ।
389. प्रभु और माता का स्वभाव है कि एक बार जिसको स्वीकार कर लिया उसे फिर कभी भी छोड़ते नहीं ।
390. सदगुरुदेव हमें प्रभु की तरफ आकर्षित कर देते हैं ।
391. प्रभु अपने भक्त के विशुद्ध प्रेम से ही आकर्षित होते हैं ।
392. प्रभु को जो समर्पित हो जाता है उसको कोई विकार या विपत्ति प्रभावित नहीं कर सकते ।
393. भक्ति का सीधा संबंध प्रभु से ही होता है ।
394. जीवन के विकारों से जीत पाने का एक ही उपाय है - प्रभु की कृपा ।
395. माया से मुक्त होने का एक ही उपाय है - प्रभु की कृपा ।
396. जीवन में पवित्रता के बिना भगवत् विचार जीवन में नहीं आते ।
397. जगत से अपनापन रखने पर प्रभु प्राप्ति नहीं होगी । अपनापन केवल प्रभु से ही होना चाहिए ।
398. भगवत् आश्रय पुष्ट होने से ही भगवत् प्राप्ति होती है ।
399. कैसी भी परिस्थिति में भगवत् आश्रय कभी भी नहीं छूटना चाहिए ।
400. संसार से प्रियता केवल स्वार्थ के कारण ही होती है ।
401. प्रभु और माता कभी भी अपने आश्रितों का भरोसा नहीं तोड़ते ।
402. हमारे बनाए कोटि जन्मों में भी नहीं बनेगी जो प्रभु कृपा से क्षणभर में बन जाएगी ।
403. जीवन में भोगों के चिंतन की वृत्ति बहुत ही खतरनाक है ।
404. भजन मार्ग में त्याग और प्रभु प्रेम को जगत से छिपाना चाहिए ।
405. जो बीज धरती पर ऊपर आ जाते हैं वे अंकुरित नहीं होते । वैसे ही जिस भजन का प्रदर्शन हो जाता है वह सफल नहीं होता । धरती के भीतर छिपा बीज अंकुरित होता है वैसे ही जगत से छिपाया हुआ भजन सफल होता है ।
406. भक्ति के प्राण प्रभु में विश्वास होना है यानी हर परिस्थिति में प्रभु पर पूर्ण विश्वास होना है ।
407. हमें प्रभु को अपना जीवन अर्पित कर देना चाहिए ।
408. प्रभु के श्रीकमलचरणों पर ही हमें आश्रित होना चाहिए ।
409. भजन नहीं करने से संसार के विषय भोगों की आसक्ति नहीं छूटेगी ।
410. प्रभु के मंदिर की ध्वजा के प्रथम दर्शन पर हमें तुरंत प्रणाम करना चाहिए ।
411. भक्त केवल अपने भगवान की प्रसन्नता ही चाहते हैं ।
412. भजन करने का कोई मुहूर्त नहीं देखना चाहिए । जब भी जीवन में भजन का संकल्प हो जाए भजन करना प्रारंभ कर देना चाहिए ।
413. शास्त्रों में जो-जो भी लिखा है वह पूर्णतया सत्य है ।
414. विपत्ति आते ही प्रभु की शरणागति लेकर हम विपत्ति को दूर कर सकते हैं ।
415. प्रभु का भजन करने में लाभ-ही-लाभ है ।
416. वही सच्चा भाग्यवान है जो अपनी बुद्धि को प्रभु को समर्पित कर देता है ।
417. जीवन में परम मंगल और परम शांति चाहते हैं तो प्रभु की भक्ति में लग जाएं ।
418. प्रभु का जहाँ हम सुमिरन करते हैं वहीं प्रभु उपस्थित होते हैं ।
419. शास्त्र कहते हैं कि मानव जीवन हमें संसार के आवागमन से मुक्त होने के लिए ही मिला है ।
420. जीवन में भगवत् मिलन की तैयारी करना ही भक्ति है ।
421. जिनकी रक्षा प्रभु करते हैं उनका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता ।
422. जिनके रक्षक प्रभु होते हैं उनका अशुभ कभी नहीं हो सकता ।
423. यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि इसी जन्म में, इसी शरीर से प्रभु को प्राप्त करेंगे । प्रभु की कृपा का इतना भरोसा होना चाहिए ।
424. भक्ति ऐसी है कि भक्त प्रभु के प्रेम में विभोर हो जाता है और प्रभु भी अपने प्रिय भक्त के प्रेम में विभोर हो जाते हैं ।
425. पहला तो पाप नहीं हो, अगर हो जाए तो सच्चा पश्चाताप और पाप को जीवन में कभी नहीं दोहराने का संकल्प हो तो प्रभु हमें तत्काल पाप मुक्त कर देते हैं ।
426. माया संसार के प्रपंची जीव को भजन करने का समय ही नहीं देती ।
427. प्रभु कभी अपने भक्त का रुदन नहीं देख पाते । रुदन के कारण को ही प्रभु नष्ट कर देते हैं ।
428. संसार के सामने भजन करके छप जाना यानी विख्यात हो जाना गलत है और संसार से छुपाकर भजन करना श्रेष्ठ है । इन दोनों बातों में कितना बड़ा फर्क है ।
429. हमारा सब कुछ प्रभु को समर्पित हो जाना चाहिए ।
430. सबके बाद में प्रभु की याद नहीं आनी चाहिए, सबसे पहले प्रभु की याद आनी चाहिए ।
431. प्रभु को जीवन में सदैव प्रथम स्थान पर ही रखना चाहिए ।
432. प्रभु का निरंतर आश्रय और चिंतन होने पर भगवत् प्राप्ति निश्चित है ।
433. प्रभु से विमुख होकर संसार के प्रपंच में समय काटने वाले जीव का मन से त्याग कर देना चाहिए ।
434. भजन करने से संसार से वैराग्य हो जाता है और प्रभु से स्वतः ही प्रेम होने लग जाता है ।
435. प्रभु जब किसी को स्वीकार करते हैं तो उसे किसी परिस्थिति में छोड़ते नहीं हैं ।
436. प्रभु किसी को भी स्वीकार करते हैं तो उसके दोषों और विकारों को नहीं देखते ।
437. भक्त सर्वदा आपस में प्रभु की ही चर्चा करते रहते हैं ।
438. संसार के विषयमुख जीव भगवत् परायण होना ही नहीं चाहते । यह उनका कितना बड़ा दुर्भाग्य होता है ।
439. प्रभु का नाम जप करना सच्ची संपत्ति है और प्रभु को भूल जाना सच्ची विपत्ति है ।
440. प्रभु की दासता मिलना जीवन की सबसे बड़ी जीव की उपलब्धि होती है ।
441. मृत्यु का तमाचा लगते ही संसार की सब कुछ चीज यहीं छूट जाएगी ।
442. प्रभु को अर्पण करने के बाद ही हमें जीवन में कुछ खाना-पीना चाहिए ।
443. संसार से प्रीति करेंगे तो प्रभु से प्रीति में बाधा पहुँच जाएगी ।
444. प्रभु के श्रीकमलचरणों का दर्शन करने से सभी अशुभों का नाश हो जाता है ।
445. नवधा भक्ति की पूर्णता आत्मनिवेदन भक्ति में ही है यानी जीवन में प्रभु का ही आश्रय होना चाहिए ।
446. अपने ऊपर आश्रित जनों का प्रभु कभी भी अमंगल नहीं होने देते ।
447. भजन में किसी भी प्रकार का विघ्न कतई बर्दाश्त नहीं करना चाहिए ।
448. जीवन में जगत से वैराग्य और प्रभु के श्रीकमलचरणों में अनुराग होना, यह प्रभु की कृपा का ही फल होता है ।
449. हमारे जितने निकट प्रभु हैं उतना कोई अन्य कभी हो ही नहीं सकता ।
450. जब हम प्रभु के शरणागत हो जाते हैं तो ग्रह नक्षत्र हमारा यह कहकर अभिनंदन करते हैं कि यह जीव अब हमारे मालिक प्रभु की शरण में चला गया है ।
451. भक्ति भक्त को तो सुख देती ही है परंतु प्रभु को भी परम सुख देती है ।
452. जिनको भगवत् प्राप्ति करनी है उन्हें निंदा शून्य होना पड़ेगा ।
453. प्रभु और प्रभु की कृपा परीक्षा के विषय नहीं हैं, समीक्षा के विषय हैं । समीक्षा करें कि प्रभु ने कृपा करके मानव जन्म दिया, भारतवर्ष में जन्म दिया, हवा-पानी-रोशनी निःशुल्‍क दी । प्रभु कृपा की समीक्षा करें तो हमें कृपा-ही-कृपा का अनुभव होगा ।
454. संत कहते हैं कि जीव का परिचय यह है कि वह बार-बार नर्क की यात्रा करने वाला जीव है ।
455. एक संत ने कीर्तन की व्याख्या की है कि प्रभु की कीर्ति गाना ही सच्चा कीर्तन है ।
456. नाम में सदैव नामी प्रभु विराजमान रहते हैं ।
457. सत्संग में रुचि हो गई तो सच्ची मानें कि प्रभु की कृपा का द्वार हमारे लिए खुल गया ।
458. जिस तरह वायु हमें दिखाई नहीं देती लेकिन बड़े-बड़े पेड़ को उखाड़ देती है । वैसे ही प्रभु की कृपा हमें दिखाई नहीं देती पर भरोसा होने पर पलक झपकते ही बड़ी-से-बड़ी विपत्ति को उखाड़ फेंकती है ।
459. हर श्वास में प्रभु को याद करें और प्रभु का आभार व्यक्त करें ।
460. भले ही हम प्रभु को न देख पाएं पर प्रभु हर पल हमारे साथ होते हैं ।
461. कर्म और ज्ञान निष्फल जा सकते हैं पर भक्ति कभी भी निष्फल नहीं जाती ।
462. भक्ति सबसे पहले भक्त को निर्भय कर देती है ।
463. जो प्रभु से कुछ मांगते हैं उन्हें कुछ मिलता है और जो प्रभु से कुछ भी नहीं मांगते उन्हें सब कुछ मिल जाता है ।
464. सच्चे संत भी संचय करते हैं पर केवल श्रीहरि नाम का संचय करते हैं, धन का नहीं करते ।
465. पारस मणि भी जीवन में आ जाए तो भी वह चिंता को बढ़ाएगी । चिंता को मिटाने के लिए चिंतामणि ही समर्थ है । संत कहते हैं की सच्ची चिंतामणि तो प्रभु का नाम जप ही है ।
466. अपनी शक्ति संसार को छोड़ने में नहीं लगाएं, अपनी शक्ति भक्ति करके प्रभु को पकड़ने में लगाएं, फिर संसार तो अपने आप ही छूट जाएगा ।
467. प्रभु की प्रार्थना करते हुए कभी आँखों से आंसू आ जाएं तो पक्का समझ लेना चाहिए कि हमारा संदेश प्रभु तक पहुँच गया है ।
468. जब भक्ति में मन लगने लग जाए तो समझना चाहिए कि हमने प्रभु को नहीं बल्कि प्रभु ने हमको चुन लिया है ।
469. भीगने का शौक हो तो प्रभु के श्रीकमलचरणों में आकर बैठें । बादल तो कभी-कभी बरसते हैं पर प्रभु की कृपा तो रोज बरसती है ।
470. प्रभु की प्रेमाभक्ति कभी छोड़नी नहीं चाहिए, चाहे संसार इस कारण हमारी निंदा करें क्योंकि प्रभु की प्रेमाभक्ति में ही परमानंद छिपा हुआ है ।
471. अपने मन की बात होने की अपेक्षा प्रभु के मन की बात होने में ही हमारा सच्चा कल्याण छिपा है ।
472. प्रभु के प्रति सभी भावों में मूल भाव दास भाव का है । इसलिए प्रभु के प्रति दास भाव जरूर रखना चाहिए ।
473. प्रभु के विषय में चिंतन करना, बोलना, लिखना कभी भी टालना नहीं चाहिए क्योंकि यह हमारा कल्याण करने वाला साधन है ।
474. प्रभु का ज्ञान ही श्री योग वशिष्ठजी का मूल विषय है ।
475. मोक्ष का पहला अर्थ है छूटना । किस बात से छूटना तो पहला अर्थ है जीवन के दुःख से छूटना ।
476. प्रभु के लिए रोज के नित्य कर्म करते रहना चाहिए । आलस्य और प्रमाद के कारण उसका त्याग कभी भी नहीं करना चाहिए ।
477. दुःख से छूटने का श्रेष्ठ उपाय प्रभु की भक्ति ही है ।
478. अपने जीवन में आलस्य का समर्थन करने के लिए कुछ व्यक्ति धर्म के कुछ अंश को अपने स्वार्थ हेतु जोड़-तोड़कर प्रस्तुत कर देते हैं । पर सच्चाई यह है कि धर्म कभी भी कर्महीन होने की बात नहीं करता ।
479. एकांत सेवन के बिना उत्तम ज्ञान कभी भी प्राप्त नहीं होता ।
480. संसार में सर्वत्र किसी-न-किसी को कभी-न-कभी परमानंद के लिए भक्ति का अवलंबन लेना ही पड़ता है ।
481. दुःखों पर विजय प्राप्त करना प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी के अवतार की श्रीलीला से सीखें । शास्त्र कहते हैं कि दुःखों पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रभु की शरण में जाएं ।
482. किसी को देखकर तुच्छता का विचार आते ही हमारे भीतर अहंकार जागृत हो जाता है । इसलिए सबमें भगवत् भाव रखना चाहिए और सबमें प्रभु को देखना चाहिए ।
483. ईर्ष्या और अहंकार का प्रभाव बहुत बड़ा होता है । प्रभु की भक्ति ही इससे बचने का एकमात्र उपाय है ।
484. जहाँ-जहाँ ईर्ष्या और अहंकार होगा वहाँ जीवन में दुःख जरूर होगा ।
485. जिसे धरती के भोगों से वैराग्य और स्वर्ग के भी भोगों से वैराग्य हो गया वह सच्चा आत्मज्ञान युक्त भक्त है ।
486. इहलोक और परलोक दोनों में मंगल करना है तो इसके लिए भक्ति अनिवार्य है ।
487. सच्चा योग प्रभु की भक्ति करने को ही कहा गया है ।
488. भीतर और बाहर का संसार छूट जाए तभी सच्चे योग में स्थित होना माना जाएगा ।
489. हमारे मन में संसार चिपक जाता है पर जो योगी होते हैं उनका मन कमल के पुष्प जैसा होता है जो पूरे समय जल में रहता है पर जल का एक कण भी ग्रहण नहीं करता ।
490. जिसने ईर्ष्या, वासना, लोभ, काम, क्रोध, राग, द्वेष, मोह और स्पर्धा का त्याग कर दिया वही सच्चा योगी है ।
491. मनुष्य की आकृति लेकर आए भगवान का स्वरूप ही प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी हैं ।
492. प्रतिकूलता होने में भी कभी-कभी प्रभु का पूर्ण अनुग्रह होता है ।
493. आत्मज्ञानी हो जाएं तो भी अहंकार हमारे भीतर जन्म लेता है, इससे बचने का एक ही उपाय है प्रभु की भक्ति ।
494. संत कहते हैं कि महाराज श्री दशरथजी और भगवती कौशल्या माता के गृहस्थ आश्रम को धन्य करने के लिए प्रभु श्री रामजी ने अवतार लिया ।
495. श्री योग वशिष्ठजी में प्रभु श्री रामजी द्वारा जीवनमुक्त पुरुष की चर्चा की गई है । यही सच्चा आदर्श है, इतना सुंदर, इतना बढ़िया जीवनमुक्त पुरुष की व्याख्या और कहीं भी नहीं मिलेगी ।
496. प्रभु श्री रामजी ने बिना द्वेष से रावण से युद्ध किया और उसे मुक्ति दी, यह कितना महान आदर्श है ।
497. प्रभु श्री रामजी ने राक्षसों से युद्ध करके दिखाया कि उनके पुरुषार्थ में कोई कमी नहीं और अंतःकरण में राक्षसों के लिए कोई द्वेष नहीं, यह अदभुत चरित्र प्रभु श्री रामजी का है ।
498. राग, द्वेष और क्रोध रहित पुरुषार्थ प्रभु श्री रामजी ने करके दिखाया । पुरुषार्थ में कोई कमी नहीं और किसी से भी द्वेष नहीं किया ।
499. प्रभु श्री रामजी ने दिखाया कि वे सकारात्मक ऊर्जा के स्त्रोत बनकर रहे अपने पूरे अवतार काल में ।
500. प्रभु की प्राप्ति का सर्वमान्य साधन भक्ति ही है ।
501. सामान्य मनुष्यों को जीवन की शिक्षा देने के लिए प्रभु श्री रामजी का अवतार हुआ ।
502. प्रभु श्री रामजी ने मानव जीवन में ऐसा आदर्श स्थापित किया जो कि अतुलनीय है । मानव जीवन के सभी सिद्धांतों को प्रभु ने सत्य करके दिखाया ।
503. हमारा वासना रहित यानी कामना रहित जीवन होना चाहिए तो इसे संतों ने मोक्ष तुल्य कहा है । प्रभु श्री रामजी का जीवन इसका जीवंत उदाहरण है ।
504. शुभ वासना यानी अच्छे विचार और अशुभ वासना यानी बुरे विचार के बीच मानव जीवन झूलता रहता है ।
505. हमें अशुभ वासना में डूबना नहीं चाहिए और शुभ वासना को ही पुष्ट करना चाहिए । यही परम पुरुषार्थ है ।
506. प्रभु श्री रामजी के जीवन में एक भी विकार, विकृति आपको नहीं दिखेगी । उनका मन और सिद्धांत इतने स्वस्थ हैं जिसकी तुलना ही नहीं हो सकती । उनके संस्कार और अनुशासन इतने पवित्र हैं जिसका आँखें बंद करके हम अनुसरण कर सकते हैं ।
507. प्रभु श्री रामजी अपने मर्यादा अवतार में रोज अध्ययन करते थे । इससे उन्होंने शास्त्रों के अध्ययन के महत्व को जगत के सामने प्रकट किया ।
508. प्रभु श्री रामजी ने तीर्थ यात्रा की जिससे वे अपने समाज और देश के गुण और दोष को जान सकें और उसका निरीक्षण कर सकें ।
509. प्रभु श्री रामजी परम पुरुषार्थ की सबसे बड़ी मूर्ति हैं ।
510. जितना-जितना मनुष्य ऊँ‍चा उठता जाता है उतना-उतना उसकी वाणी में मौन आवश्यक हो जाता है ।
511. अत्यधिक विवेक और वैराग्य जागृत होने पर हम गंभीर हो जाते हैं ।
512. जीवन में मंगल और पवित्रता हमें प्रभु की भक्ति से ही मिलती है ।
513. संसार की संपत्ति पास रहती है तो मन दुराचार की तरफ खिंचा चला जाता है । यह हमारे अंदर अहंकार उत्पन्न करता है, हमारे अंदर विकार और दोष उत्पन्न करता है । इसलिए संत कहते हैं कि सच्ची संपत्ति प्रभु की भक्ति है ।
514. संसार की जो संपत्ति है उसके साथ प्रभु की भक्ति की एक संपत्ति भी प्राप्त कर लेनी चाहिए जिससे चित्त की शांति हमेशा के लिए बनी रहती है ।
515. हमारे द्वारा कमाई संपत्ति अक्सर हमारे दुःख का कारण बनती है इसलिए मर्यादा से बाहर जाकर संपत्ति नहीं कमानी चाहिए ।
516. शास्त्रों में कहा गया है कि संपत्ति अर्जन करने में कष्ट है, संभालने में कष्ट है और नष्ट होने पर तो परम कष्ट है । इसलिए जीवन में कलियुग की सच्ची संपत्ति प्रभु का नाम जप ही कमाना चाहिए जो कभी नष्ट नहीं होगी ।
517. उसी का जीवन सार्थक है जो अपने जीवन में विचार करता हुआ अपने जीवन के उद्देश्यों को समझता हुआ अपने जीवन को जीता है ।
518. शास्त्रों को तो हमने पढ़ा पर विवेक के साथ उसे मनन नहीं किया तो शास्त्र पढ़ना बेकार चला गया ।
519. अवसाद में हमारी मनोस्थिति खराब हो जाती है इसलिए प्रभु की भक्ति करनी चाहिए जिससे कभी जीवन में अवसाद का मौका ही नहीं आए ।
520. अहंकार के कारण मनुष्य पर संकट आते हैं । यह अहंकार रोग बन जाता है, एक शत्रु बन जाता है और एक शत्रु का कार्य करता है और अंत में हमारा पतन करवाता है ।
521. मन में आग से भी ज्यादा ताप, वज्र से भी ज्यादा कठोरता है, मन सागर को पी जाना चाहता है, मेरु पर्वत उखाड़ना चाहता है । पर मन का निरोध करना, मन पर विजय प्राप्त करना बड़ा कठिन है । यह केवल भक्ति से ही संभव है, ऐसा प्रभु कहते हैं ।
522. अहंकार एक ऐसी चीज है जो हम जानते हैं कि गलत हैं फिर भी चाहकर भी ऐसा विकार है जो नहीं छूटता । यह केवल प्रभु की कृपा से ही छूटता है ।
523. अहंकार के कारण हमें जीवन में बड़ी-से-बड़ी विपत्ति सहन करनी पड़ती है ।
524. मन पागलों की तरह इधर-उधर दौड़-भाग करता रहता है, एक जगह टिकता नहीं है । हमारा मन ही हमारा नाश करना आरंभ कर देता है । इसे नथने का एक उपाय है - भक्ति ।
525. बिना किसी कारण किसी की बात सुनकर खुश हो जाना और ऐसे ही बिना किसी कारण किसी की बात सुनकर दुःखी हो जाना, यह मन का खेल है ।
526. भक्ति का विकास जीवन में करने से मन की चंचलता खत्म हो जाती है ।
527. शरीर जितना बूढ़ा होता जाता है तृष्णा उतनी जवान होती चली जाती है, यह एक सत्य सिद्धांत है ।
528. जीवन में सबसे अधिक दुःख देने वाली कोई राक्षसी है तो वह तृष्णा है, ऐसा प्रभु श्री रामजी श्री योग वशिष्ठजी में कहते हैं ।
529. शरीर क्षीण होता जाता है पर तृष्णा हरी-भरी रहती है, तभी मन उदास होता है और रोता है क्योंकि तृष्णा की पूर्ति नहीं कर पाता ।
530. जीवन में सुख और दुःख का हिसाब लगाने बैठते हैं तो पाते हैं कि थोड़ा-सा सुख प्राप्त करने के लिए हमें बड़ा दुःख भोगना पड़ता है ।
531. संत श्री तुकारामजी उपमा देकर कहते हैं कि दुःख का पहाड़ खोदा तो निकला सुख का चूहा ।
532. जीव सर्वथा स्वाधीन है अपने मन से और मन के कारण दुर्बल और पराधीन बना रहता है ।
533. युवावस्था में ही मन मलिन सबसे ज्यादा होता है जैसे वर्षा ऋतु में नदियां सबसे ज्यादा मलिन होती है ।
534. संसार में सबसे बड़ा बंधन मन का बंधन है जिसने इसको त्याग दिया वह संसार के सभी उपद्रव से छूट गया, ऐसा प्रभु कहते हैं ।
535. अकड़ कर जीव अपने शरीर को जवानी में सुंदर दिखाता है और उसे बुढ़ापे में छुपाता है, यह जीवन का एक सत्य है ।
536. काल इतना प्रबल है कि वह पुराने भवनों को, पुराने लोगों को भी नहीं रहने देता । पुराने सागर, पुराने पहाड़ तक को भी नहीं छोड़ता । काल नृत्य करता हुआ सबका नाश कर देता है । काल द्वारा हमारा नाश हो इससे पहले हमें भक्ति करके प्रभु की प्राप्ति कर लेनी चाहिए ।
537. जोड़-तोड़कर जीवन जीते-जीते जीवन का असली उद्देश्य प्रभु प्राप्ति का हमें भान ही नहीं रह पाता, उसे पूरा करना तो बहुत दूर की बात है ।
538. जहर तो हमें एक जीवन में मारता है पर संसार के विषयों का जहर हमें हर जन्म से मारता आ रहा है ।
539. चित्त की अशांति हमें अवसाद में ले जाती है और आत्मघात करने तक के लिए प्रेरित कर देती है, यह कितना बड़ा दुर्भाग्य होता है ।
540. श्री योग वशिष्ठजी में विकारों का और विचारों के बोझ से निराशावादी जीवन का चित्रण किया गया है और इससे बचने के उपाय बताए गए हैं ।
541. संसार में हमारी भूमिका क्या है ? क्या करने से हमारा जीवन सफल होगा ? इस विवेक का आग्रह श्री योग वशिष्ठजी में हुआ है ।
542. अंधकार जब घना होता है तो सूर्योदय का समय समीप होता है । इसी तरह जब जीवन में अंधकार घना होता है तो प्रभु कृपा बहुत समीप होती है ।
543. जब श्री अर्जुनजी को महाभारत युद्ध से पहले निराशा प्रकट हुई तो प्रभु ने उन्हें उपदेश देकर उनको उबार लिया । प्रभु अपने भक्तों को सदैव उबारते हैं ।
544. प्रभु श्री कृष्णजी श्रीमद् भगवद् गीताजी के वक्ता बने और प्रभु श्री रामजी श्री योग वशिष्ठजी के श्रोता बने । यह प्रभु की वक्ता और श्रोता बनने की श्रीलीला है ।
545. जब प्रभु श्री रामजी श्रोता बनकर श्री योग वशिष्ठजी सुनने के लिए बैठे तो देवतागणों ने और ऋषियों ने साधु-साधु कहकर पुष्पों की वर्षा की । प्रभु ने श्रोता बनकर अमृत पान का अवसर सबको दिया । श्री वेदजी के रस का द्वार प्रभु ने सबके लिए खोल दिया ।
546. भक्ति प्रधान सत्संग में ही हमें शामिल होने के लिए लालायित होना चाहिए ।
547. प्रभु का अभिवादन अनेक विशेषणों से सिद्ध पुरुष हरदम से करते आए हैं ।
548. संसार से सच्चा वैराग्य होना बड़ा कठिन है । भक्ति ही इसका एकमात्र उपाय है ।
549. प्रभु श्री रामजी ने जन कल्याण हेतु गुरु श्री वशिष्ठजी में प्रश्न पूछे । प्रभु तो कल्याण करने वाले हैं । उनका कल्याण कौन कर सकता है ? मगर उन्होंने जन कल्याण के लिए प्रश्न पूछे ।
550. सब ज्ञान प्रभु के भीतर विद्यमान रहते हैं । प्रभु को किसी ज्ञान की आवश्यकता नहीं है पर फिर भी प्रभु ज्ञान के जिज्ञासु बनकर और श्रोता बनकर श्री योग वशिष्ठजी सुनने के लिए बैठे । यह लोक कल्याण के लिए प्रभु ने किया ।
551. प्रभु श्री रामजी की तरह हमारे भीतर विवेकजन्य वैराग्य होना चाहिए । विपत्ति के कारण जन्मा वैराग्य तो साधारण श्रेणी का वैराग्य कहलाता है ।
552. सर्वाधिक महत्व हमारे जीवन में किस चीज का है ? यह विचार हमें करना चाहिए और इसके लिए जिज्ञासु बनना चाहिए । सर्वाधिक महत्व सदैव जीवन में प्रभु का ही होना चाहिए ।
553. मन कितना भी चंचल हो यह अलग बात है पर विचार बुद्धि से ही होता है । तो बुद्धि को विचार में हरदम लगाना चाहिए कि हमारे मानव जीवन का उद्देश्य प्रभु प्राप्ति है ।
554. सबसे बड़ा दीर्घ रोग यह है कि किसी-न-किसी चीज में हमारी वासना अटकी रहती है । क्या हम कभी शांति के लिए इन वासनाओं का त्याग कर सकते हैं । वासना को भंवर रोग कहा गया है । भंवर की तरह यह हमें फंसाए रखता है, अटकाए रखता है । बचने का एक ही उपाय है - प्रभु की भक्ति ।
555. क्या हमने भक्ति करके वासना रहित अंतःकरण का अभी तक कभी अनुभव किया है ?
556. वासना रहित होना भक्ति से संभव है । वासना मधुमक्खी की तरह है जो अच्छी और बुरी दोनों होती है । मधुमक्खी शहद और गंदगी दोनों जगह बैठती है । भक्ति से सद्वासना जागृत हो जाती है ।
557. वासना दलदल के समान है । हम दलदल में जितना स्थिर रहेंगे उतना बचे रहेंगे, जितना हलचल करेंगे उतना फंसते चले जाएंगे । ऐसी स्थिति वासना की है कि वासना में जितना स्थिर रहेंगे उतना बचेंगे, वासना में जितना हलचल करेंगे उतना फंसते जाएंगे ।
558. सिर्फ भक्ति के द्वारा सद्विचारों से वासना से तरा जा सकता है । मात्र सद्विचार से ही हम इससे बच सकते हैं ।
559. भक्ति के कारण सद्विचारों से हमारी बुद्धि जागृत हो जाती है और विवेक का प्रकाश जागृत हो जाता है ।
560. विवेक और बुद्धि में अंतर है कि बुद्धि एक सीमित दायरे में रोशनी डालती है जबकि विवेक का भास्कर जब उदय हो जाता है तो वह प्रकाश दूर-दूर तक फैला देता है, दूर-दूर तक हमें साफ दिखाई देने लगता है । विवेक जागृत करने का उपाय भक्ति है ।
561. भक्ति के कारण विवेक जागृत होने से शास्त्रों के सिद्धांत बिना पढ़े स्वतः ही हमारे सामने जागृत हो जाते हैं । इसलिए संत चाहे किसी भी धर्म या जाति के हों उनकी बात एक ही होगी और एक-दूसरे से मिलती होगी ।
562. जैसे रसगुल्ला को अंग्रेजी में कुछ बोलते हैं पर हिंदी में कुछ बोलते हैं पर दोनों के लिए स्वाद एक ही मीठा होता है । इसी प्रकार भक्ति से विवेक जागृत होने के बाद एक ही रस का रसास्वादन महापुरुष करते हैं इसलिए एक ही सिद्धांत का प्रतिपादन विभिन्न संत करते हैं ।
563. महापुरुषों को ज्ञान तो होता है पर उनमें फिर भी जिज्ञासा रहती है कि इससे अधिक ज्ञान भी जगत में है क्या ?
564. उत्तम ज्ञान कभी भी सस्ता नहीं मिलता, कभी भी सरलता से नहीं मिलता, उसके लिए परिश्रम करना पड़ता है और प्रभु की कृपा की प्रतीक्षा करनी पड़ती है ।
565. अपमान के दुःख, उपेक्षा के दुःख से हमें दुःखी नहीं होना चाहिए और भोग विलास के सुख से हमें सुखी नहीं होना चाहिए ।
566. जैसे श्री हिमालयजी का शिखर है वहाँ वायु आती-जाती है, ऋतु आती-जाती है पर वे स्थिर खड़े रहते हैं वैसे ही हमें सुख-दुःख की अवस्था में स्थिर रहना चाहिए ।
567. हमारे मन के कारण ही संसार में माया के दृश्य हमको दिखते रहते हैं ।
568. सत्य का निर्णय करने के लिए शास्त्र, गुरु और आत्मा तीनों एक ही अनुभव हमें देंगे। सही सिद्धांत तीनों के बोलने पर एक ही होगा ।
569. जीव को बंधन स्वयं के संकल्प से ही होता है । जब अंतःकरण से सब संकल्पों को हम तिलांजलि दे देते हैं तो हमारा बंधन भी छूट जाता है ।
570. जो कुछ शास्त्रों में जानने योग्य है उसे पूरा जानना चाहिए और फिर उसे अपने अंदर स्थिर करना चाहिए ।
571. किसी भी अनुकूलता और प्रतिकूलता के दृश्य का प्रतिबिंब जिसके हृदय पर नहीं होता यानी किसी अनुकूलता-प्रतिकूलता जिसे प्रभावित नहीं करती वही मुक्त आत्मा है ।
572. हम ज्ञान की बात तो करते हैं पर भोगों के ऊपर नहीं उठ पाते । हम ज्ञान की बात करते हैं और अज्ञानी की तरह व्यवहार करते हैं ।
573. वैराग्य को देखकर ही उस व्यक्ति के आत्म ज्ञान का परीक्षण होता है ।
574. आत्मज्ञानी भी ज्ञान प्राप्त करता है और वैराग्य से उसकी रक्षा करता है नहीं तो ज्ञान समाप्त हो जाता है । जैसे फूटे हुए घड़े में पानी टपक-टपककर समाप्त हो जाता है वैसे ही ज्ञानी के साथ भी होता है अगर वह वैराग्य में स्थित नहीं हो ।
575. सच्चे आत्म ज्ञानी को “मैं पूर्ण हूँ” - यह भ्रांति कभी नहीं रहती ।
576. संत जगत से व्यवहार तो करते हैं पर भक्ति को छोड़कर किसी चीज के आग्रही नहीं होते ।
577. जैसे वासना का बर्फ जमने पर जल जम जाता है पर ज्ञान के ताप से वह फिर पानी बनकर पिघल जाता है । वैसे ही आत्म ज्ञानी जीव वासना के बंधन को तोड़कर प्रभु से मिल जाते हैं, प्रभु तत्व से मिल जाते हैं ।
578. आत्म ज्ञानी पुरुष भी भोगों की तरफ आकर्षित होता है पर इंद्रियों के चुंगल में नहीं फंसता, पुनः भोगों को स्वीकार नहीं करता है । शब्द, स्पर्श, रूप, गंध इत्यादि के भोगों को तिलांजलि देकर वह अपना हित करता है ।
579. वासनाओं को ढ़ीला करना और उसकी गांठ को तोड़ देना और वासनाओं को छोड़ देना, यही मोक्ष का मार्ग है ।
580. किसी भी कामना के प्रति रस न लेना, यही ज्ञानी भक्त होने के लक्षण हैं । जिसकी वासना से रुचि समाप्त हो गई वही जीवन मुक्त होता है ।
581. वही ज्ञान सार्थक है जो प्रभु प्राप्ति के लिए उपयुक्त है ।
582. हम संसार से जो कुछ भी प्राप्त करते हैं वह अपने प्रयत्नों से ज्यादा प्रभु की कृपा से प्राप्त करते हैं ।
583. भाग्य में जो है वह होने वाला है, कुछ लोग ऐसा मानते हैं । पर जो पुरुषार्थ करते हैं और प्रयत्न करते हैं और सबसे जरूरी बात कि प्रभु की कृपा पर भरोसा रखते हैं वे अपने भाग्य को भी बदल लेते हैं ।
584. जीवन में उत्थान हमारे पुरुषार्थ से होता है और पतन हमारे प्रमाद से होता है ।
585. भगवत् कृपा भी जीवन में हमारे पुरुषार्थ के द्वारा अर्जित की जाती है । इसके लिए भक्ति के पुरुषार्थ की जरूरत होती है ।
586. अच्छे कर्म के लिए पुरुषार्थ करना भी एक तरह की प्रभु की सेवा ही है ।
587. जिसने बचपन से शास्त्रों को सुना उसके अंदर शास्त्रीय पुरुषार्थ की भावना जागृत हो जाती है और वह जीव धन्य हो जाता है ।
588. जिसने सद्गुणों का विकास किया और सत्कर्म में अपने जीवन को लगाया वही जीव धन्य होता है ।
589. प्रभु हमेशा अपनी श्रीलीला जीव के हित के लिए ही करते हैं ।
590. में बेचारा हूँ, क्या कर सकता हूँ - इस भावना का सर्वदा त्याग करना चाहिए । मैं प्रभु की कृपा से जो चाहूँगा वह करके दिखाऊँगा, यह भाव जागृत करना चाहिए । यह श्री योग वशिष्ठजी का सिद्धांत है ।
591. प्रभु की कृपा जीवन में अर्जित करना सबसे बड़ा पुरुषार्थ है ।
592. हमारे अंदर अत्यंत पवित्र और अत्यंत गंदी वासना का दोनों प्रवाह एक साथ होता है । यह सबके अंदर होता है । बस प्रतिशत बदलता जाता है । शुभ वासना क्षीण होती है अशुभ वासना बड़े रूप में जागृत होती है, यह सामान्य व्यक्ति की बात है । अशुभ वासना क्षीण होती है और शुभ वासना बड़े रूप में जागृत हो जाती है, यह भक्त की निशानी है ।
593. जितनी शुभ वासना का प्रवाह हमारे भीतर बढ़ता चला जाएगा उतना ही हम संत होते चले जाएंगे ।
594. जितनी शुभ वासना बढ़ती जाएगी मन को उतना सुख मिलेगा, जितनी अशुभ वासना बढ़ती जाएगी मन को उतना दुःख मिलेगा ।
595. जिस प्रकार एक राजा बाहर के दुष्टों से शस्त्र से लोहा लेता है वैसे ही हमें अपने मन की दुष्ट वासनाओं से लोहा लेना पड़ता है ।
596. अपने पुरुषार्थ और पराक्रम से शुभ वासनाओं को प्रबल बनाना चाहिए और अशुभ वासनाओं को दबाना चाहिए ।
597. सच्चा पुरुषार्थ यह है कि शुभ वासनाओं को प्रबल बनाना और अशुभ वासनाओं को सफल नहीं होने देना । उदाहरण स्वरूप ठंड के दिन में जल्दी उठना शुभ वासना है और अशुभ वासना है कि ठंड है तो सुबह देर तक सोते रहें । शुभ वासना को जागृत करते हुए हमें जल्दी उठना चाहिए और आलस्य का त्याग करना चाहिए ।
598. क्या अशुभ वासना को बलपूर्वक सर्वदा दबाना चाहिए ? हमेशा नहीं । छोटे बालक को जैसे लाड़ लड़ाते है और डाँटते भी हैं उसी प्रकार अशुभ वासना को कठोरता के साथ और समझाकर दबाना चाहिए, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
599. हमारा चित्त एकाएक वश में नहीं होगा, धीरे-धीरे प्रयत्न करना पड़ेगा तभी वह वश में होगा ।
600. शुभ वासना का पूरे मन से समर्थन, जीवन को उसे उतारने का प्रयास करना चाहिए और अशुभ वासना का कभी समर्थन नहीं करना चाहिए । गलती हो गई तो उसको सही नहीं मानना चाहिए, उसको गलत ही मानना चाहिए ।
601. शुभ वासना को जीवन में जागृत करने के लिए वर्तमान जीवन में प्रयत्न करते रहना चाहिए ।
602. शुभ वासना को इतना बढ़ा लेना चाहिए ताकि अशुभ वासना उसके सामने निष्क्रिय हो जाए । उदाहरण स्वरूप अच्छी पुस्तकों का घर में संग्रह इतना करना चाहिए कि बुरी पुस्तक हाथ में आए ही नहीं ।
603. अशुभ वासना को दबाना आना चाहिए, अशुभ वासना को हम नष्ट नहीं कर सकते । उदाहरण स्वरूप पहाड़ों में घूमने जाने की वासना है तो कहीं भगवती माता रानी के तीर्थ में जाएं, वहाँ पर्वत भी चढ़ना हो जाएगा और भगवती माता रानी के दर्शन भी हो जाएंगे ।
604. अशुभ वासना को शुभ वासना का विकल्प देकर नष्ट करना, उसे दबाना श्रेष्ठतम मार्ग है ।
605. शुभ वासना के प्रवाह को जीवन में निरंतर बढ़ाते रहना चाहिए ।
606. वही जीव जीवन मुक्त होता है जो अपनी शुभ वासनाओं को जीवन में बढ़ाता चला जाता है ।
607. हमें आज भी पुरुषार्थ करना है और कल भी पुरुषार्थ करना है जिससे हमारी शुभ वासना प्रबल हो जाए ।
608. शास्त्र कहते हैं कि शुभ वासना जागृत करने के लिए केवल प्रयत्न नहीं, "पूरा प्रयत्न" करना चाहिए ।
609. प्रारब्ध कैसा भी हो पर आज के प्रयास से प्रारब्ध बदला जा सकता है । यह कहने वाला श्रीग्रंथ श्री योग वशिष्ठजी है । प्रारब्ध पूर्व जन्मों के कर्म-अकर्म का फल माना जाता है पर यह भी माना जाता है कि वर्तमान प्रयास से बदला जा सकता है । पर यह प्रयास शास्त्रीय पुरुषार्थ का होना चाहिए जो कि प्रभु की भक्ति है ।
610. अपने आहार-विहार का नियंत्रण, यह लौकिक प्रयास है जिसके बाद हमारा चित्त स्वस्थ हो जाता है ।
611. दवा को जेब में रखने से फल नहीं मिलता, दवा खाने से फल मिलता है । वैसे ही प्रयत्नपूर्वक पुरुषार्थ करने से ही फल मिलता है ।
612. सांसारिक लोगों को सांसारिक जीवन में सुखी रहने के लिए और दुःख कम करने के लिए भगवत् भक्ति करनी चाहिए । संपूर्ण दुःख के नाश के लिए एक ही चीज परम आवश्यक है - भगवत् भक्ति ।
613. मोक्ष को शास्त्र मानव जीवन की अंतिम उपलब्धि मानते हैं ।
614. तर्क और युक्ति युक्त जीव भक्ति में जल्दी से सफल नहीं हो पाते ।
615. हम लोग इतने पूर्वग्रहों से ग्रस्त हैं, पूर्व जन्म के गलत संस्कारों से ग्रस्त हैं, पूर्व के विकारों से ग्रस्त हैं कि शास्त्रों का हमने गलत आकलन और विश्लेषण कर लिया है ।
616. सच्चिदानंद स्वरूप परमानंद की किरण केवल प्रभु के श्रीकमलचरणों से ही निकलती है ।
617. दुःखों से बाहर आने का उपाय यानी दुःख पूर्ण नष्ट हो जाए फिर कभी जीव दुःख नहीं पाए इस हेतु प्रभु का एक ही निर्णय है कि भक्ति करना अनिवार्य है ।
618. हमें अज्ञानी की भूमिका में जाकर ज्ञान अर्जन करना चाहिए । अज्ञानी बनकर ज्ञान की जिज्ञासा करनी चाहिए । जैसे भूखा होने पर ही हमें भूख की मार का पता चलता है ।
619. हमारे जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला कुछ है तो वह हमारा भक्ति करने का संकल्प ही है ।
620. हमारे जीवन के निर्माता हम स्वयं हैं क्योंकि जीवन में अच्छे संकल्प से अच्छे कर्म बनते हैं और बुरे संकल्प से बुरे कर्म बनते हैं ।
621. जीवन को सुखमय बनाना हो तो सबसे अच्छा संकल्प यानी भक्ति के संकल्प को मन में जन्म देना चाहिए ।
622. हमारा मन वैसे तो वानर जैसा चंचल है । इसलिए वह बंधन, लाचारी और दुःख का कारण बन जाता है ।
623. मन के बंधन से बाहर आने का एकमात्र उपाय प्रभु की भक्ति ही है ।
624. हमारे शास्त्रों का उपदेश सभी को सुखी करने हेतु दिया गया है ।
625. सभी शास्त्रों का ज्ञान देश-विदेश में संतों द्वारा फैलाया जाता है ।
626. दुःख से छुटकारा पाने का सबसे उत्तम साधन प्रभु की भक्ति ही है ।
627. हमें पुण्य भी जीवन में थोड़ा-थोड़ा करके निरंतर कमाते रहना चाहिए । एक साथ पुण्य नहीं कमा सकते । रोज पुण्य कमाना चाहिए । यह पुण्य धन हमारे दुःख क्षय करने का एक बहुत उत्तम साधन है ।
628. रोज प्रभु की सेवा, भगवती तुलसी माता की पूजा, श्री गायत्री माता का जाप और अन्य साधन जीवन में करते रहने चाहिए ।
629. धर्म पर किए गए खर्च से हमेशा धन बढ़ता ही है, कभी धन का क्षय नहीं होता ।
630. हम धर्म कार्य के लिए धन देने लगेंगे तो हमारे पास नया धन आने लगेगा । यह एक खिड़की की तरह काम करता है जिसको हम खोल देते हैं तो पुरानी हवा निकल जाती है और दूसरी तरफ से अधिक शुद्ध हवा भीतर आती है ।
631. देवताओं का पूजन, पितरों का श्राद्ध, सनातन धर्म के सभी पर्व पर पूजा - यह आवश्यक है और निश्चित करना चाहिए ।
632. कर्मकांड के महत्व को भी हमें जानना चाहिए और कर्मकांड की सीमा को भी हमें जानना चाहिए ।
633. कर्म के बिना रहना नहीं चाहिए पर सकाम कर्म में फंसना भी नहीं चाहिए । सकामता से निष्काम कर्म की तरफ बढ़ना चाहिए तो चित्त शुद्ध हो जाएगा जिसका साधन भक्ति है ।
634. श्री वेदजी के मंत्र विशुद्ध पिंड से निकलने पर बहुत प्रभाव करते हैं । अशुद्ध अवस्था में और अशुद्ध पिंड से निकला मंत्र उतना प्रभाव नहीं करता ।
635. हमारे श्रीग्रंथ ही हमारे सच्चे मार्ग प्रदर्शक होते हैं ।
636. सदा के लिए दुःख से निवृत्ति और परमानंद की निरंतर प्राप्ति हेतु भक्ति ही एकमात्र उपाय है । यही भक्ति का उद्देश्य और प्रयोजन है ।
637. जीव के भीतर परमात्मा तत्व है और सारे संसार में वे ही परमात्मा व्याप्त हैं ।
638. जिस प्रकार सागर और सागर की लहरों में अंतर नहीं है वैसे ही हमारे भीतर परमात्मा तत्व और परमात्मा में कोई अंतर नहीं है ।
639. श्रीग्रंथ के अधिकारी वे ही होते हैं जिनको उन श्रीग्रंथ पर पूर्ण विश्वास और आस्था होती है ।
640. श्रीग्रंथ को पढ़ते समय उनका मनन करना अत्यंत आवश्यक है ।
641. शास्त्रों में पढ़ी हुई चीज और शास्त्रों का श्रवण कर प्राप्त किया ज्ञान हमारे भीतर टिक जाए, इसका ध्यान हमें रखना चाहिए ।
642. हम शास्त्रों में बड़ी बातें पढ़ तो लेते हैं पर वह हमारे भीतर असर करे और स्थाई रूप से हमारा मंगल करे, ऐसी चेष्टा हमें करनी चाहिए ।
643. सच्चा सज्जन वह है जो शास्त्रों का मात्र अध्ययन नहीं करता, उसका पालन भी जीवन में करता है ।
644. संतों से शास्त्रों का श्रवण करके उसे जीवन में उतारा जाए तो वह निश्चित हमारा कल्याण करता है ।
645. सच्चा संत वह है जो शास्त्रों के सिद्धांतों का अपने जीवन में अनुसरण करे ।
646. पहले के गुरुकुल में जो बालक थे वह अपने गुरु का पूरा आचरण देखते थे और उसे निरंतर सीखते थे ।
647. राजा श्री परीक्षितजी ने सात दिन तक भूखे-प्यासे रहकर और थकान सहकर भी श्रीमद् भागवतजी महापुराण का श्रवण किया । इतनी निष्ठा हमारे में अगर हो तो हमारा कल्याण भी निश्चित है ।
648. जब शास्त्रों का भाव से श्रवण किया जाता है तो वे हमारे दुःख का निवारण जरूर करते हैं ।
649. भक्ति के बिना जिस जीव का जीवन छूट जाता है तो वह जीव अभागा कहलाता है क्योंकि मानव जीवन का उद्देश्य भक्ति के बिना सफल नहीं होता ।
650. माता-पिता, पत्नी, पुत्र, मित्र और अन्य सभी उपकारी हो सकते हैं पर हमारे परम उपकारी तो केवल प्रभु ही हैं ।
651. ज्ञान को श्री योग वशिष्ठजी में मोक्ष मंदिर कहा गया है क्योंकि सच्चा ज्ञान हमें परमात्मा की तरफ ले जाता है और मोक्ष प्रदान करता है ।
652. जीवन में यह तीन द्वारपाल - शांति, सद्विचार और संतोष हमें जरूर रखना चाहिए ।
653. शांति को हमें धारण करना चाहिए और मन में निश्चय करना चाहिए कि जो भी हो जाए मैं अशांत नहीं बनूँगा । किसी भी स्थिति में अपनी शांति को भंग नहीं होने दूँगा ।
654. संत श्री एकनाथजी अपने चित्त को इतना शांत रखते थे कि वे दूसरों के लिए एक उदाहरण और आदर्श बन गए थे शांति की अवस्था को पाने के लिए ।
655. शांति रखने वाला जीव जितना शांत रहना सीख जाता है उतना ही सुख प्राप्त करता है । अमृत पीने में और धन के आलिंगन करने में भी वह सुख नहीं है जो शांति रखने से मिलता है ।
656. अनुकूलता और प्रतिकूलता जिसे प्रभावित नहीं करे, वही सच्चा संत पुरुष है ।
657. शांति का विकास सबसे पहला सद्गुण हमारे भीतर होना चाहिए ।
658. व्यक्ति को विचार पारायण होना चाहिए यानी हर बात का विचार करके ही किसी अंजाम तक पहुँचना चाहिए ।
659. सात्विक बुद्धि से ही प्रभु को जाना जा सकता है ।
660. कुछ की बुद्धि चतुर होती है पर सात्विक नहीं होती । जिनकी बुद्धि सात्विक होती है वे ही जीवन का परम लाभ ले पाते हैं ।
661. यदि जीव समस्त दुःखों से मुक्त होना चाहता है तो उसे विचार करना होगा कि इसका साधन क्या है ? इसका साधन भक्ति है जो भवसागर से पार करने का भी परम साधन है ।
662. हमें प्रभु की भक्ति करनी है, यही हमारे विचार का स्वरूप होना चाहिए ।
663. सद्विचार के बिना मुक्ति मार्ग पर अग्रसर नहीं हुआ जा सकता ।
664. बुद्धि के भिन्न प्रकार होते हैं पर जो बुद्धि भक्ति करने में हमें लगा देती है वही सद्बुद्धि है ।
665. हमें कभी विचार करना चाहिए कि हमें किसने बनाया है, संसार को किसने बनाया है, इतनी दिव्य रचना किसने की है, हमें प्रेरणा देने वाली शक्ति कौन है - यह सब विचार यदि हम करेंगे तो पाएंगे कि अंत में सब प्रभु ही हैं ।
666. एक संत ने शरीर को घोड़े की उपमा दी है जिसको नथने की जरूरत है और इसकी बागडोर प्रभु के हाथ में सौंपने की जरूरत है ।
667. मैं सुखी होना चाहता हूँ, यह सभी जीवों की मांग होती है और इस मांग को केवल प्रभु ही पूरा कर सकते हैं ।
668. हम जिसे “मैं” और “मेरा” कहते हैं उससे ही हम बंधन में आ जाते हैं ।
669. शांत और संतोष होने का संकल्प और वृत्ति हमें अपने भीतर जागृत करनी चाहिए ।
670. अधिक की आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए, अधिक के पीछे दौड़ने की आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए । संतोष धन को शास्त्रों में सबसे बड़ा धन बताया गया है ।
671. संतोषी जीव सदा सुखी रहता है, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
672. दुःख का मुख्य कारण हमारे भीतर का असंतोष ही होता है ।
673. हमें अधिक नहीं चाहिए, जो पुरुषार्थ से सहज में आ गया सो ठीक है । कर्म के फल में जो आ गया उसमें संतोष करना, यही शास्त्र का बताया हुआ मार्ग है ।
674. प्रभु से प्रेम करना ही भक्ति है ।
675. हमारा मन नहीं टूटे इसलिए संतोष नाम के कवच को धारण करना चाहिए ।
676. जीवन में सत्संग का त्याग कभी नहीं करना चाहिए ।
677. असंतोष के दर्पण में हम कभी भी अपना प्रतिबिंब नहीं देख पाएंगे ।
678. सत्संग का प्रभाव देखें कि सत्संग ने राजा श्री परीक्षितजी की मृत्यु को भी एक उत्सव बना दिया । इतना अदभुत सत्संग का प्रभाव होता है ।
679. प्रचलित सभी विधियों और साधनों का हम अभ्यास नहीं कर सकते, इसलिए हमें केवल भक्ति का ही अभ्यास करना चाहिए ।
680. भक्ति करने वाले जीव के पास ज्ञान, वैराग्य और मुक्ति स्वयं चलकर आ जाते हैं ।
681. जैसे शरद ऋतु में प्रकृति की मलिनता समाप्त हो जाती है वैसे ही साधक के मन की मलिनता भक्ति से समाप्त हो जाती है ।
682. हर व्यक्ति सर्वदा सभी प्रकार के दुःखों से मुक्त रहना चाहता है, यह सामर्थ्य केवल और केवल भक्ति में ही है ।
683. निरंतर सद्गुणों का जीव को जीवन में विकास करना चाहिए ।
684. सद्गुणों को शास्त्रों में गुण-लक्ष्मी का नाम दिया गया है । जैसे अन्न-लक्ष्मी, धन-लक्ष्मी होती है वैसे ही गुणों की भी श्रीलक्ष्मी होती है ।
685. मनुष्य को जब उसके मरने के बाद याद किया जाएगा तो उसके रूप, वजन और लंबाई से नहीं किया जाएगा बल्कि उसके सद्गुणों के कारण ही याद किया जाएगा ।
686. प्रभु श्री रामजी की विशेषता उनके सद्गुणों के कारण ही है । मनुष्य आकृति लेकर जब प्रभु आए तब सद्गुणों का विकास उनमें इतना था जिसकी कोई तुलना ही नहीं की जा सकती ।
687. हम प्रभु श्री रामजी जैसा तो नहीं बन पाएंगे पर उस मार्ग पर कुछ आगे तो बढ़ ही सकते हैं ।
688. सद्गुणों के कारण ही हमारा अंतःकरण शांत होता है ।
689. सद्गुणों के कारण और उसके विकास के कारण जीव जीवनमुक्त हो जाता है ।
690. शास्त्रों का मनन करना चाहिए जिससे हमारे भीतर के दूषित भाव निकल जाएं ।
691. सद्गुणों का विकास धीरे-धीरे हमारे भीतर होते चले जाने चाहिए ।
692. सद्गुणों के कारण जीव स्थिर-चित्त हो जाता है ।
693. हमें जांचना चाहिए कि जो संत होते हैं उनमें क्या विशेषताएं होती हैं और हमारे में क्या कमियां हैं ? इसका चिंतन हमें करना चाहिए और उसका सुधार करना चाहिए ।
694. हमारे श्रीग्रंथ हमारे जीवन को श्री बैकुंठजी के योग्य बनाने के लिए हैं ।
695. हमें शांति के मार्ग में चलकर शांति का विकास अपने भीतर करना चाहिए ।
696. उत्तम ज्ञानी को पहचानना बहुत कठिन होता है । अज्ञानी को पहचानना बहुत आसान होता है ।
697. जो भी सत्कर्म जीवन में हमारे सामने आ जाए उसे पूरा मन से रम कर पूरा करना चाहिए ।
698. भूतकालीन अवस्था और भविष्यकालीन आशा के लिए हम जीवनभर व्यथित रहते हैं । भक्ति करने से यह दोनों अवस्था में हम सम हो जाते हैं ।
699. भक्ति करने वाला हृदय किसी प्रतिकूल परिस्थिति में टूटता नहीं है ।
700. भक्ति करने वाला हृदय सदाचार से निपुण रहता है ।
701. तपस्या के सामने प्रभु के नाम जप को संतों ने सुखासन की उपमा दी है ।
702. शास्त्र हमें कहते हैं कि स्थान और समय के अनुकूल व्यवहार करना चाहिए ।
703. बड़ी सहजता से जितना हो सके जीवन में सत्संग करना चाहिए ।
704. चित्त को ऐसी अवस्था में सत्संग से पहुँचा देना चाहिए कि किसी भी प्रकार से वह विचलित नहीं हो ।
705. शास्त्रों और सत्संग के कारण हम अपनी प्रज्ञा का विकास कर सकते हैं ।
706. जो अपनी प्रज्ञा का विकास कर लेता है उसे दुर्लभ शांति की प्राप्ति होती है जिसका कभी नाश नहीं होता ।
707. भक्ति से हमारे भीतर सद्गुण विकसित हो जाते हैं ।
708. जीवन को गुण संपन्न और ज्ञान संपन्न बनाना चाहिए, यह केवल भक्ति से ही संभव है ।
709. जानने योग्य प्रभु को कैसे जानना चाहिए, इसका एकमात्र साधन भक्ति है ।
710. बाकी सब बातों में आशंका हो सकती है पर भक्ति करने पर प्रभु कृपा मिलती है, इसमें कोई आशंका नहीं है ।
711. “मैं” और “मेरा” का त्याग भक्ति करवा देती है ।
712. माया द्वारा निर्माण किए हुए दृश्य हमें जीवन में फंसा देते हैं ।
713. माया के दृश्य हमें आकर्षित करते हैं और अंत में हमें फंसाते हैं ।
714. माया को वैसे देखना चाहिए जैसे हम सपना देख रहे हैं जो कि सत्य नहीं है ।
715. जीव को मन से जागृत अवस्था में रहना चाहिए कि उसका मन बाहर के दृश्यों में नहीं फंसे ।
716. भक्ति हमें भाव-समाधि तक ले जाती है ।
717. व्यक्ति अपने विचारों से जगत में फंसा हुआ है इसलिए उसे जगत से निकलना आसान है क्योंकि वह मात्र विचारों में फंसा हुआ है ।
718. शास्त्र कहते हैं कि दृश्य और दृष्टा प्रभु एक ही हैं ।
719. मन के संकल्प के कारण हम फंसे हुए हैं । मन में संकल्प नहीं उठने देने पर हम नहीं फंसेंगे ।
720. अगर हम अपने जीवन को अच्छा बनाना चाहते हैं तो कल्पना में भी हमें ऊँ‍‍ची अवस्था में पहुँचना पड़ेगा तभी हम सत्यता में ऊँ‍‍ची अवस्था में पहुँच पाएंगे । यह श्री योग वशिष्ठजी का सिद्धांत है ।
721. आज का अच्छा संकल्प और सात्विक इच्छा कल के हमारे जीवन को सुधारेगा, यह योग वशिष्ठजी का सिद्धांत है ।
722. शास्त्र हमेशा हमें धर्म की पालना की आज्ञा देते हैं ।
723. हमारे प्रारब्ध हमारे पूर्व कर्मों मात्र से बनते हैं । पूर्व जन्मों के संचित कर्मों से हमारे इस जन्म के प्रारब्ध बनते हैं ।
724. पिछले जन्म में विपरीत कर्म किए बिना हमारे इस जन्म में बुरे प्रारब्ध नहीं बन सकते ।
725. शास्त्र युक्त कर्म करने वाले प्रभु को सबसे प्रिय होते हैं ।
726. हमें अपनी दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या शास्त्रों के हिसाब से और उनके नियम के हिसाब से करनी चाहिए ।
727. शास्त्र युक्त जीवन जीने से हमारी आयु बढ़ती है, हमारे विकार खत्म होते हैं और भक्ति में हमारा मन लगता है ।
728. गलत कर्म करके हम कभी भी उससे छूट नहीं सकते । वह गलत कर्म हमारे अगले जन्म में भी पीछा करते हैं ।
729. मनुष्य का शरीर नाशवान है इसलिए इससे अविनाशी प्रभु की प्राप्ति करनी चाहिए ।
730. हम अपने मन में संसार के दृश्य निर्माण होने देते हैं और फिर उस दृश्य में फंस जाते हैं ।
731. संसार में आज तक जिस चीज को कोई नहीं जान पाया है वह है जीव का मन ।
732. अंदर उठने वाले संकल्पों की लहरों को ही मन कहते हैं ।
733. हमारे मन से हमें सार्थक और सात्विक संकल्प ही करने चाहिए ।
734. अगर हम सोचेंगे कि मेरा बुरा संसार में नहीं हो सकता तो कोई जीव भी मेरा बुरा नहीं कर सकता । यह आत्म-शक्ति हमें कभी विचलित नहीं होने देगी । यह आत्म-शक्ति प्रभु पर भरोसा करने से जागृत होती है ।
735. अच्छे संकल्पों के माध्यम से बुरे संकल्पों को दबा देना चाहिए और उन्हें अंत में नष्ट कर देना चाहिए । यही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है ।
736. जैसे उत्तम घुड़सवार घोड़े को सही दिशा में ले जाता है वैसे ही उत्तम संकल्प हमें जीवन में सही दिशा में ले जाते हैं ।
737. गलत संकल्पों के कारण हमारा जीवन व्यथित होता है और पतनोन्मुख होता है ।
738. हमारे मन में प्रभु ने कल्पवृक्ष लगाकर दिया है । जैसी हम मन से इच्छा करेंगे, विचार करेंगे कल्पवृक्ष की तरह मन वही फल हमें देगा । अच्छे विचार करेंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरे विचार करेंगे तो बुरा फल मिलेगा ।
739. जीव का अंतिम लक्ष्य संकल्प रहित मन होना चाहिए ।
740. हमारे विचार उन्नत, ऊँचे और सात्विक होने चाहिए ।
741. मन में सात्विक संकल्प जगते ही जीवन में आनंद आ जाता है ।
742. हम बिंब हैं और परमबिंब प्रभु में विलीन होना, यह हमारा अंतिम लक्ष्य होना चाहिए ।
743. हमारे विकार और दोष हमें भयभीत करते हैं, दुःखी करते हैं पर जब हम प्रभु से जुड़ जाते हैं तो वे निष्क्रिय हो जाते हैं ।
744. सत्संग से ज्ञान और वैराग्य जागृत होता है और हमारे भीतर सात्विक जीवन जीने की योग्यता और पात्रता आ जाती है ।
745. संसार को प्राप्त करने का हमने बहुत प्रयास किया अब इस जीवन में प्रभु को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए ।
746. परब्रह्म प्रभु के अलावा किसी अन्य का कोई अस्तित्व ही नहीं है क्योंकि एक प्रभु के अलावा कुछ अन्य नहीं है ।
747. जैसे सागर की अनेक लहरें हैं पर उसका मूल सागर है वैसे हम सबके मूल प्रभु हैं ।
748. जैसे स्वर्ण से बहुत सारे आभूषण हमने बना लिए पर सबमें स्वर्ण तो एक ही है, ऐसे ही जगत के मूल में प्रभु ही हैं ।
749. हम संसार का अनुभव करते हैं जो कि माया द्वारा रचित है । हमें इससे ऊपर उठकर प्रभु का अनुभव करना चाहिए ।
750. परमात्मा तत्व हम हैं और परमात्मा प्रभु हैं । इसलिए हमारा अंतिम मिलन प्रभु से ही होना है ।
751. संसार के दृश्य दिखने हमें बंद हो जाएं तो सभी संशय मिट जाते हैं और सभी दुःखों से हम छूट जाते हैं ।
752. शास्त्रों का अवलोकन, संतों द्वारा सत्संग सुनना और उसका मनन करने का अभ्यास हमें परमात्मा की अनुभूति प्राप्त करवा देती है ।
753. मैंने कुछ खोया इसका शोक चला जाए, कुछ होगा इसका भय चला जाए, कुछ मिलेगा यह लोभ चला जाए यानी सांसारिक चाह खत्म हो जाए तो हम परमात्मा प्राप्ति के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं ।
754. जैसे हम आकाश में कितना भी रंग उछालें पर आकाश में रंग नहीं लगता वैसे ही हमारे अंतःकरण में सुख और दुःख की अनुभूति नहीं होनी चाहिए ।
755. शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य के नेत्र और मुख उसके दुःख और सुख की अवस्था का बखान कर देते हैं । इसलिए हमें नेत्रों से प्रभु के दर्शन करने चाहिए और मुख से प्रभु का गुणानुवाद करना चाहिए जिससे आनंद की अवस्था सदा जीवन में रहे ।
756. प्रभु श्री रामजी वनवास की आज्ञा के समय और राज्याभिषेक के समय दोनों अवसर पर एक जैसे सम रहे, यह कितनी बड़ी मर्यादा का उदाहरण है ।
757. हम लोग जागते हुए भी मन से सोते हैं और संत लोग सोए हुए भी मन से जागते रहते हैं, यह कितना बड़ा फर्क है ।
758. हमें ईर्ष्या वाली बात पर ईर्ष्या नहीं हो, लोभ वाली बात पर लोभ नहीं हो, गुस्सा वाली बात पर गुस्सा नहीं हो, यह असली योग है ।
759. अपने कर्म करते समय कि “मैं कर रहा हूँ” यह अहंकार जागृत नहीं हो तो हम उस कर्म में फंसेंगे नहीं ।
760. जो लोगों को कष्ट नहीं देता और लोगों से कष्ट मिला ऐसा अनुभव नहीं करता वही सच्चा जीवनमुक्त है ।
761. जिस जीव की भीतर की उथल-पुथल शांत हो गई है, वही सच्चा जीवन मुक्त है ।
762. हमें यह प्रयास करना चाहिए कि मानव शरीर नष्ट होने पर हम प्रभु के धाम पहुँच पाएं ।
763. निद्रा वह अवस्था है जिसमें सोते हुए को बाहर का भान नहीं होता और समाधि वह अवस्था है जिसमें जागते हुए भी बाहर का भान नहीं होता ।
764. भक्ति का पुनः-पुनः प्रयास करने पर और अनुभव करने पर आनंद और परमानंद की ही अनुभूति होती है ।
765. एक बार जिसने भक्ति का परमानंद प्राप्त कर लिया फिर वह कभी भी दुःख को प्राप्त नहीं होता ।
766. श्रीग्रंथ में सिर्फ ज्ञान नहीं है बल्कि कथाएं भी है क्योंकि कथाओं के माध्यम से सिद्धांत याद रह जाए इसलिए कथाओं के प्रवाह को शामिल किया गया है ।
767. प्रभु की भक्ति हमें भूतकाल, वर्तमान और भविष्यकाल सबसे निश्चिंत कर देती है ।
768. भक्ति करने का विचार दीर्घकाल तक और तीव्रता से हमारे जीवन में आना चाहिए ।
769. दीर्घकाल तक और तीव्रता से भक्ति का विचार करेंगे तो भक्ति हमारे हृदय में जागृत हो जाएगी ।
770. विवेक से विचार करने पर पाएंगे कि भक्ति के अलावा कोई भी परम पुरुषार्थ नहीं है ।
771. विपत्ति में पड़कर जब भी हम प्रभु से मार्गदर्शन चाहते हैं प्रभु उस समय भी हमें मार्गदर्शन देते हैं ।
772. प्रभु भक्ति से सबसे जल्दी प्रसन्न होते हैं ।
773. भक्ति के पुरुषार्थ को कभी भी बुढ़ापे के लिए नहीं छोड़ना चाहिए ।
774. काल हमें कभी भी भजन करने का समय नहीं देगा इसलिए जीवन में भजन तत्काल प्रभाव से आरंभ कर देना चाहिए ।
775. भक्ति का द्वार हमारे लिए जीवन में कब खुलता है इसका निर्णय हमारे हाथ में है ।
776. हमारे मन में एक विचार उठा और नष्ट हुआ और दूसरा विचार उससे पहले ही उठ जाता है । इस पर लगाम लगाने के लिए प्रभु की भक्ति सबसे उपयोगी है ।
777. किसी भी दो चीजों के बीच हमें चुनाव करना होता है । ऐसे ही हमें माया और भक्ति के बीच में चुनाव करना होता है पर अक्सर हम गलत चुनाव कर लेते हैं ।
778. काल और समय सब हमारे अनुकूल हो जाता है अगर हम प्रभु की भक्ति करते हैं ।
779. आज का समय हमारा है इसलिए उसमें भक्ति कर लेनी चाहिए, कल का समय हमें भी पता नहीं हमें मिलेगा या नहीं ।
780. कामना और वासना शेष रहने पर पुनर्जन्म है । पुनर्जन्म है तो पुनः दुःख है । इसलिए भक्ति करके कामना और वासना का विलय कर देना चाहिए ।
781. जीवन में कामना जितनी कम होगी उतना जीवात्मा सुखी होगा ।
782. जिस प्रकार का स्वरूप हमें प्राप्त करना होता है उसी प्रकार का चिंतन हमें जीवन में बनाना पड़ता है ।
783. जगत में एकमात्र सच्चिदानंद स्वरूप प्रभु ही हैं ।
784. अपने मन को संसार से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए ।
785. श्रीमद् भगवद् गीताजी एवं श्रीमद् भागवतजी महापुराण का एक सिद्धांत है कि सारा संसार प्रभु का विस्तार मात्र है, प्रभु से भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है, जो भी हैं वे प्रभु ही हैं ।
786. यदि प्रामाणिक तौर से हम आध्यात्मिक चिंतन करेंगे तो हम किसी का भी बुरा नहीं करेंगे या चाहेंगे क्योंकि सबमें और सभी रूप में प्रभु ही हैं ।
787. संसारी जीव के ताप को संत पानी बनकर बुझा देते हैं ।
788. जैसे रात में हम सपने देखते हैं जो कि मिथ्या होते हैं वैसे ही जगत का स्वप्न भी मिथ्या ही है ।
789. हमें अच्छे संकल्प करने चाहिए, अच्छे संकल्प से हमें अच्छी चीज प्राप्त होती है ।
790. संकल्प प्रबल होगा और अच्छा होगा तो वह निश्चित ही फलदायी होगा ।
791. जीवन में सबसे अच्छा और प्रबल संकल्प प्रभु भक्ति का ही होना चाहिए ।
792. एक ने संसार पाने का संकल्प किया और एक ने भक्ति करके मुक्ति पाने का संकल्प किया । अब आप सोचिए किसका संकल्प ज्यादा बढ़िया है ।
793. प्रभु आराधना के समय जो संकल्प हम दृढ़ता से और प्रबलता से करते हैं वह निश्चित ही फलीभूत होता है ।
794. अपनी भक्ति रूपी भावना प्रबल रखनी चाहिए और निरंतर प्रभु की आराधना उस भावना की पूर्ति के लिए करनी चाहिए ।
795. श्री योग वशिष्ठजी का सिद्धांत है कि प्रबलता से की हुई प्रभु से सात्विक कामना प्रभु कृपा से इसी जन्म में पूरी होती है, उसके लिए अगले जन्म की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
796. हमसे पाप कर्म न हों, सिर्फ सत्कर्म जीवन में हों, ऐसी इच्छा हमारे मन में होनी चाहिए ।
797. संसार का सब कुछ परिवर्तनशील है ।
798. हमारा संकल्प दृढ़ होता है तो उसका फल जरूर मिलकर ही रहता है ।
799. हम न तो समय के बंधन में हैं, न काल के बंधन में हैं । यह दोनों बंधन हमारे माने हुए बंधन हैं पर असल में नहीं हैं ।
800. संसार का सपना हमें अज्ञान के अंधेरे को दिखाता है । अगर ज्ञान की ज्योति जल जाए तो हमें सब तरफ मात्र प्रभु ही प्रभु दिखेंगे ।