| 001. |
राग और द्वेष को केवल भक्ति ही समाप्त कर सकती है । |
| 002. |
भक्ति जीव को इस प्रकार बना देती है कि संसार का कोई भी दुःख उसे दुःखी नहीं कर सकता । |
| 003. |
भगवती भक्ति माता की कृपा को सभी संतों ने अनुभव किया है जिसके कारण उन्हें भक्ति मिली है । |
| 004. |
काल का डर हमें होना चाहिए जिस कारण हमें बिना विलंब भजन प्रारंभ कर देना चाहिए । |
| 005. |
अगर थोड़े समय के लिए भी हमारा मन भक्ति में लगता है और भक्ति में रम जाता है तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होती है । |
| 006. |
भक्ति के लिए मन के स्तर पर अभ्यास करने की आवश्यकता होती है । |
| 007. |
भक्ति हमारे व्यवहार को भी ठीक करने का काम करती है । |
| 008. |
भक्ति के कारण हमारा मन अच्छा और व्यवस्थित हो जाता है जिस कारण हमारा मन परमात्मा में लगता है । |
| 009. |
भक्ति हमारी बुद्धि और व्यवहार को व्यवस्थित करती है । |
| 010. |
हमें भक्ति रूपी साधना नियमित रूप से करनी चाहिए । |
| 011. |
पूरी सृष्टि में हमें परमात्मा तत्व के दर्शन होने चाहिए । |
| 012. |
हमारे पूर्व संकल्पों द्वारा ही हमारा अभी का संसार निर्मित होता है । |
| 013. |
भक्ति के अभ्यास में एकाग्रता और तीव्रता होनी चाहिए । |
| 014. |
हमें मन से संकल्प सिद्ध होना चाहिए कि हम भक्ति में सफल होंगे । |
| 015. |
भक्तों को अपने संकल्प मात्र से वह सब कुछ मिल जाता है जिसके लिए अन्यों को प्रयास करना पड़ता है । |
| 016. |
भक्ति हमारे भीतर सात्विक संकल्प को ही जागृत होने देती है । |
| 017. |
गलत वासनाएं हमें इस जन्म में भी पतित करती है और गलत वासनाओं के कारण हमारा अगला जन्म भी पतित होता है । |
| 018. |
हमें रोजाना कुछ घंटों का समय देकर मन को प्रभु में एकाग्र करना चाहिए । एकांत में बैठकर मन को प्रभु में एकाग्र करना सबसे उत्तम होता है । |
| 019. |
भाप, तरंग, बुलबुला और फेन सभी पानी के ही स्वरूप हैं । इसी तरह संसार में सब कुछ एक परमात्मा का ही स्वरूप हैं । |
| 020. |
शास्त्र कहते हैं कि पहले तन को हलचल रहित करना चाहिए फिर मन को हलचल रहित करना चाहिए तभी हम आध्यात्मिक पथ पर सफल हो पाएंगे । |
| 021. |
देह भाव से ऊपर उठे बिना मन का द्वार नहीं खुलता । |
| 022. |
नाम जप के बिना कलियुग में आध्यात्मिक शक्ति का संचय नहीं हो सकता । |
| 023. |
प्रभु के नाम जप से अपने को सुरक्षित रखना चाहिए । |
| 024. |
यह विडंबना है कि हमारा पेट तो भर जाता है पर हमारा मन कभी नहीं भरता । |
| 025. |
एक साधारण व्यक्ति और एक श्रेष्ठ व्यक्ति के बीच फर्क यह होता है कि भक्ति के कारण वे मन से बलवान होते हैं । |
| 026. |
हम अपनी सभी इंद्रियों का आहार जितना कम करेंगे उतनी हमें आध्यात्मिक सफलता मिलेगी । |
| 027. |
प्रभु नाम जप करते हुए प्रभु में ध्यान केंद्रित करना चाहिए । |
| 028. |
सच्चे मौन का जीवन में पालन होना सबसे श्रेष्ठ होता है । |
| 029. |
जिस तरह नदी में तरंगें होती है उसी तरह हमारे मन में हलचल होती रहती है । |
| 030. |
मन में जितनी कम हलचल होगी उतना ही श्रेष्ठ है । यह दीर्घकाल तक नाम जप से संभव होता है । |
| 031. |
श्रीग्रंथों में जो कथाएं वर्णित है वे उनकी शोभा हैं और इतनी महत्वपूर्ण हैं जिससे हमें सिद्धांतों का पता चलता है । |
| 032. |
संसार जब तक हमें अच्छा लगेगा तब तक हमें प्रभु से प्रीति नहीं होगी । |
| 033. |
कलियुग में नाम जप के लिए प्रयत्न करना चाहिए, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 034. |
मन को दीर्घकाल के लिए एकाग्र करना हो तो इसके लिए प्रभु नाम जप सबसे सहायक है । |
| 035. |
निरंतर नाम जप से हमारी वृत्तियां शुद्ध होती चली जाती है । |
| 036. |
भक्ति से शरीर और मन की स्थिति परम स्थिर होती चली जाती है । |
| 037. |
चित्त की समता आध्यात्मिक ज्ञान के बिना नहीं आती । |
| 038. |
परम सत्य प्रभु को जानना ही मानव जीवन का हमारा उद्देश्य होना चाहिए । |
| 039. |
हमारी बुद्धि का परिष्कार हमें करना चाहिए जिससे वह प्रभु तत्व को जानने योग्य बन जाए । हमारी बुद्धि को ग्राही बनाना चाहिए जिससे हम आध्यात्मिक उन्नति कर सकें । |
| 040. |
हमारे शास्त्रों में प्रश्न और उत्तर की श्रृंखला होती है जो हमें जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर दे देती है । |
| 041. |
प्रभु के एक-एक रोमावली में कोटि-कोटि ब्रह्मांड समाए हुए हैं । |
| 042. |
सबसे बड़ा ज्ञान परब्रह्म का ज्ञान ही है । |
| 043. |
जैसे आकाश सर्वत्र है वैसे ही परमात्मा भी सर्वत्र हैं । |
| 044. |
परमात्मा सर्वत्र हैं और कुछ भक्तों को अनुभूति देते हैं पर साधारण जीव को नहीं देते । |
| 045. |
प्रभु हर जगह विराज रहे हैं, सर्वत्र हैं और हर जगह मौजूद हैं । |
| 046. |
प्रभु को कहीं से आना-जाना नहीं पड़ता क्योंकि वह हर जगह विद्यमान हैं । |
| 047. |
एक ही स्थान पर होते हुए भी प्रभु हर स्थान पर मौजूद हैं । |
| 048. |
प्रभु परम स्थिर हैं और चेतन और ज्ञान से परिपूर्ण हैं । |
| 049. |
अनंत कोटि ब्रह्मांडों को अपने में लय करके रखने वाले केवल प्रभु ही हैं । |
| 050. |
सारा संसार एक प्रवाह के रूप में प्रभु की शक्ति से ही चलता है । |
| 051. |
पापाचरण जीवन में करना एकदम अच्छा नहीं है, इस तथ्य का हमें सदैव ध्यान रखना चाहिए । |
| 052. |
पापाचरण वाला जीवन बिताने से अच्छा प्राण त्यागने होते हैं । |
| 053. |
उत्तम भक्त का अस्तित्व ब्रह्म तुल्य हो जाता है क्योंकि वह ब्रह्म ज्ञानी हो जाता है । |
| 054. |
ब्रह्म ज्ञान से बड़ा कोई ज्ञान विश्व में नहीं है । |
| 055. |
अपने मन को समझना और अपने मन की शक्ति को समझना सबसे जरूरी है । |
| 056. |
चित्त का संसार से निरोध करके ही हम संसार से मुक्त हो सकते हैं । |
| 057. |
हमारा शरीर संसार में फंसा हुआ नहीं है, हमारा मन ही संसार में फंसा हुआ है । |
| 058. |
अपने मन से सात्विक संकल्प करने चाहिए और प्रबलता से उसे निभाना चाहिए । |
| 059. |
पशुवत जीवन जिया और फिर मृत्यु प्राप्त हो गई तो वह मानव जीवन पूरा बेकार चला गया । |
| 060. |
हमारे सात्विक संकल्पों में प्रबलता होनी चाहिए तभी वे हमें निश्चित फल प्रदान करते हैं । |
| 061. |
हमारे भीतर के संसार का निर्माण हमारा मन करता है । |
| 062. |
हमें अपने मन की शक्ति को पहचानना चाहिए । मन प्रभु से जुड़ जाए तो वह सब कुछ कर सकता है । |
| 063. |
शरीर की सीमा होती है पर मन की कोई सीमा नहीं है । |
| 064. |
जब शरीर मन के आड़े नहीं आए तो मन हमें किसी भी सीमा तक ले जा सकता है । |
| 065. |
किसी भी शास्त्रीय सिद्धांतों पर तनिक भी संदेह नहीं करना चाहिए । |
| 066. |
सामान्य जीव का मन भी अगर प्रभु से जुड़ जाए तो उसमें विराट सामर्थ्य निर्माण हो जाता है । |
| 067. |
मन इतना प्रबल है कि हम जो बनना चाहते हैं उसमें अगर हमारा सहयोग करे तो हम वैसा बन पाते हैं । |
| 068. |
मैं प्रभु का सेवक बनूँगा, यह धारणा गलत है । मैं प्रभु का नित्य सेवक हूँ, यह धारणा सही है । |
| 069. |
किसी भी स्थिति को प्रभु से जोड़ने पर प्रभु हमें उस स्थिति के अंजाम तक पहुँचा कर रहते हैं । |
| 070. |
व्यक्ति स्वयं की शक्ति पर विश्वास करता है पर प्रभु की शक्ति पर विश्वास करने से चूक जाता है । |
| 071. |
भक्ति मार्ग यह है कि हमने अपने हर लक्ष्य के लिए प्रभु को आगे कर दिया । |
| 072. |
प्रभु का आलंबन लेकर मन से सात्विक संकल्प करना श्रेष्ठ होता है । |
| 073. |
श्री योग वशिष्ठजी हमारे मन को प्रबल करना और हमारे संकल्पों को दृढ़ करना सिखाता है । |
| 074. |
शरीर की विस्मृति हो जाए और प्रभु की स्मृति जग जाए तो यह भक्ति कहलाती है । |
| 075. |
जितने प्रबल हमारे सात्विक संकल्प होंगे उतनी एकाग्रता से हम उसे पूरा कर पाएंगे । |
| 076. |
हमारे हर सात्विक संकल्पों को प्रभु पूरा करते हैं । |
| 077. |
हमें भक्तों के बीच रहने की आदत डालनी चाहिए और प्रभु के विषय में बोलना आरंभ कर देना चाहिए । |
| 078. |
हमारे चित्त की शक्ति बड़ी प्रबल होती है, हमें बस उसे पहचानने की जरूरत है । |
| 079. |
हमारा मन हमें ऊँचाई तक भी पहुँचा सकता है और नीचे स्तर तक भी ले जा सकता है । |
| 080. |
हम असल में तब हारते हैं जब मन से हार मान लेते हैं । |
| 081. |
श्रीग्रंथों में वर्णित कथा में से हमें तथ्य ग्रहण करने होते हैं । |
| 082. |
मन के गलत संकल्पों के कारण हमारी संसार से आसक्ति नहीं छूटती । |
| 083. |
रोज भगवती गंगा माता को अपने घर बैठे नहाने से पहले याद करें, मन की प्रबलता से याद करने पर श्रीगंगा स्नान का फल हमें हमेशा घर बैठे मिलता रहेगा । |
| 084. |
प्रभु की भक्ति लौकिक वस्तु भी सुलभता से प्राप्त करवा देती है और अलौकिक वस्तु यानी परमपद भी प्राप्त करवा देती है । |
| 085. |
जो सर्वाधिक परमानंद हमें देता है वह प्रभु की भक्ति ही है । |
| 086. |
मन चंचल होने से वह हमारा बहुत बड़ा नुकसान करता है । |
| 087. |
मन के विभिन्न संकल्पों के कारण हमारे भीतर सांसारिक विषयों की लहरें और तरंगें उठती रहती है । |
| 088. |
हमारा मन बिना कारण के उठक−पटक करता रहता है और हमें संसार में फंसा देता है । |
| 089. |
विवेक जागृत करके मन की चंचलता के वेग को हमें कम करना चाहिए । |
| 090. |
हमारे मन को जन्मों-जन्मों से विषय भोगों की आदत लगी हुई है जो छूटती नहीं । |
| 091. |
संसार नाशवान है इसलिए संसार में इतना डूबना नहीं चाहिए । डूबना ही है तो प्रभु की भक्ति में डूबना चाहिए । |
| 092. |
जो व्यक्ति सत्संग से जागृत है वही जीवन में खुश है । |
| 093. |
हमारी स्थिति ऐसी है कि न ही हमसे संसार के विषयों की भूख छूटती हैं और न ही हमें आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है । दोनों तरफ हमारा नुकसान-ही-नुकसान है । |
| 094. |
जैसे-जैसे हमारे अंदर विवेक जागृत होगा वैसे-वैसे हमारे जीवन में संतोष बढ़ता चला जाएगा । |
| 095. |
भक्ति हमें जीवन में निर्भय और निश्चिंत कर देती है । |
| 096. |
जो यह मान लेता है कि मैं शरीर नहीं हूँ, वह जीवन मुक्त हो चुका है । |
| 097. |
सांसारिक संकल्पों का प्रहार हमारे मन के ऊपर नहीं होने देना चाहिए । |
| 098. |
हम भय की कल्पना से ज्यादा परेशान रहते हैं, असल भय से कम परेशान होते हैं । |
| 099. |
हमें अपने मन को सांसारिक संकल्पों की दलदल से निकालना चाहिए । हम अभी तक इसी दलदल में बुरी तरह से फंसे हुए हैं । |
| 100. |
संत अपने मन को समझाते हैं कि “अरे मन, तुम कितने कल्पों से सिर्फ सांसारिक संकल्पों में ही उलझे रहे हो, इस बार भक्ति करके प्रभु प्राप्ति का संकल्प करो” । |
| 101. |
जैसे जाल बनाने वाली मकड़ी अपने मुँह से जाल बनाती है इसी तरह हमारा मन कल्पनाओं का जाल बनाता है और फिर हम उसमें ही फंस जाते हैं । |
| 102. |
जो संसार के मायाजाल में नहीं फंसता वह जीव मुक्त हो जाता है और चेतन स्वरूप हो जाता है । |
| 103. |
हम कर्तव्य का नाम लेकर संसार में फंसते हैं और फिर फंसते ही चले जाते हैं । |
| 104. |
संसार के मायाजाल से बचना है तो प्रभु की भक्ति करना अनिवार्य साधन है । |
| 105. |
हमें अपनी बुद्धि जागृत करके विवेक से काम लेना चाहिए और संसार के मायाजाल में नहीं उलझना चाहिए । |
| 106. |
संसार अज्ञानी को मोहित करने वाला है पर ज्ञानी संसार के इंद्रजाल से बच जाते हैं । |
| 107. |
जो संसार असत्य है, अस्थाई है उसको विवेकपूर्वक हमें ग्रहण नहीं करना चाहिए । ऐसा करने वाला मोक्ष के लिए प्रस्तुत हो जाता है । |
| 108. |
जैसे हम एक जादूगर की जादूगरी देखकर मोहित हो जाते हैं वैसे ही संसार का मायाजाल भी एक जादू ही है, जो हमें मोहित कर देता है । |
| 109. |
अज्ञानी के अंतःकरण में चिंता जल्दी-जल्दी बढ़ती चली जाती है । |
| 110. |
संसार की अनुभूति हमें वैसी ही होती है जैसा हमारा मन सोचता है । |
| 111. |
जो हमारे मन ने संसार में किया, वह कर्म है । जिस मन ने संसार छोड़ दिया और प्रभु की तरफ मुड़ गया, वह सबसे शिरोमणि कर्म है । |
| 112. |
संसार हमारे मन और हमारी कामनाओं का ही सारा खेल है । |
| 113. |
संसार के मायारूपी इंद्रजाल से निकलना सिर्फ भक्ति के कारण ही संभव होता है । |
| 114. |
मन में उठने वाली अशुभ वासनाओं को शुभ वासना के जरिए दबा देना चाहिए । |
| 115. |
अध्यात्म ही हमारे मन के रोग का इलाज करता है । |
| 116. |
सबसे बड़े भवरोग का कारण हमारा मन ही है । |
| 117. |
सबसे बड़ा हमारा शत्रु मन ही है और सबसे बड़ा मित्र भी मन ही है । मित्ररूपी मन से शत्रुरूपी मन पर हम विजय पा सकते हैं । |
| 118. |
मन को हमने किस मात्रा में जीत लिया है यह हमें तब पता चलता है जब जिस वस्तु में हमारा मन सबसे ज्यादा आसक्त था उस वस्तु का त्याग हम कर पाते हैं । |
| 119. |
जो जितना संसार के बाहर के दृश्यों में रमेगा उतना ही उसका मन चंचल होता जाएगा । |
| 120. |
हमें मन को संसार में बाहर जाने से रोकने का प्रयास करना चाहिए और ऐसा प्रयास करने पर एक-न-एक दिन हम सफल हो जाते हैं । |
| 121. |
जितना हमारा चित्त संसार के दृश्यों से भर जाएगा उतना उन दृश्यों के कारण मन चंचल और अशांत होगा । |
| 122. |
दिनभर संसार और दुनियादारी करेंगे और पन्द्रह मिनट प्रभु में मन लगाने का प्रयास करेंगे तो कभी सफल नहीं होंगे । |
| 123. |
भक्ति करने पर हमारे में इतनी शक्ति आ जाती है कि संसार की इच्छित वस्तु का हम त्याग कर सकते हैं । |
| 124. |
संसार की वस्तु को त्यागने के बाद प्रथम में ही शांति मिलती है । पहले धीरे-धीरे शांति आएगी फिर शांति की मात्रा बहुत बढ़ जाएगी । |
| 125. |
मन की अशुभ वासना को दबाने के लिए शुभ वासना का प्रयोग मन पर करना पड़ता है । |
| 126. |
मन को वश में करने के लिए पराक्रम करना पड़ता है । यह पराक्रम प्रभु से जुड़ने का होता है । |
| 127. |
हम जब स्वयं ही संसार के सुख का त्याग कर देते हैं तो हमारी असली विजय होती है । |
| 128. |
हमें अपने मन से विजय का प्रयास करना चाहिए कि हमें सांसारिक परिप्रेक्ष्य में विजय मिल सके । |
| 129. |
हम कोई व्रत लेते हैं तो वह यह देखने का प्रयास होता है कि मन पर विजय कितनी है और किस अवस्था तक है । |
| 130. |
मन पर विजय प्राप्त करने का प्रयोग जीवन में करते रहना चाहिए । |
| 131. |
ज्यादा बोलने वाले को मौन व्रत लेकर वाणी को रोकने का अभ्यास करना चाहिए । |
| 132. |
मन से त्याग के बाद मन को अशांत नहीं होने देना चाहिए । अशांति से उसे शांति की तरफ ले जाने की यात्रा करनी चाहिए । |
| 133. |
श्री योग वशिष्ठजी मनोविजय का शास्त्र है यानी मन पर विजय का शास्त्र है । |
| 134. |
मन पर विजय प्राप्त होते ही हमारे जीवन से दुःख भाग जाते हैं । |
| 135. |
मन तत्काल कहाँ से कहाँ भाग जाता है इसलिए उसे भक्ति से नियंत्रण करने की परम आवश्यकता है । |
| 136. |
मन इतना प्रबल है कि हमसे मानसिक पाप तक करवा देता है । इसलिए हमें मन के मानसी अपराध से बचना चाहिए जिससे मानसिक वेदना हमें नहीं मिले । |
| 137. |
यह सिद्धांत है कि शरीर द्वारा किए दोष का दंड शरीर को मिलता है और मन से किए दोष का दंड मन को मिलता है । |
| 138. |
यह पूरा जगत जीव के मन का विलास मात्र है । |
| 139. |
मन जितना जड़ संसार का चिंतन करेगा उतना जड़ बनता जाएगा और मन जितना चेतन प्रभु का चिंतन करेगा उतना चेतन बनता जाएगा । |
| 140. |
जितनी अज्ञान द्वारा निर्मित कामनाएं कम होगी उतना हमारा चित्त शांत होता चला जाएगा । |
| 141. |
हमारा चित्त जितना संसार में जाना बंद कर देगा उतना ही शांत होता चला जाएगा । |
| 142. |
मन जितना-जितना परब्रह्म का चिंतन करेगा उतना-उतना परमानंद की अनुभूति के पास पहुँच जाएगा । |
| 143. |
मन को कांच की तरह इतना पारदर्शी बना देना चाहिए कि वह चेतन तत्व प्रभु के चिंतन करने के लिए प्रस्तुत हो जाए । |
| 144. |
शास्त्रों में भक्ति योग नहीं “तीव्र भक्ति योग” कहा गया है और इसे सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है । |
| 145. |
मन को एक विषय में केंद्रित करना चाहिए और वह विषय होना चाहिए प्रभु का चिंतन । |
| 146. |
हमारे जीवन का मुख्य मुद्दा यह है कि मन एकाग्र नहीं होता । व्यक्ति के पास क्षमता है मन को लम्बे समय के लिए एकाग्र करने की पर पांच-दस मिनट से ज्यादा हम उसे एकाग्र नहीं कर पाते, ऐसी हमारी हालत है । |
| 147. |
चित एकाग्र नहीं होने का एक कारण यह है कि हमारे अंदर भोग बुद्धि व्याप्त है । |
| 148. |
शास्त्र कहते हैं कि हम परमार्थ में उन्नति नहीं कर सकते, ऐसा सोचना गलत है । किसी ने भी परमार्थ में उन्नति की है तो हम भी जरूर कर सकते हैं, हमें बस आरंभ करने की देर है । |
| 149. |
अपने मन से ही अपने मन पर विजय पाने के लिए अभ्यास का आरंभ करना चाहिए । |
| 150. |
भक्त को कभी दुःख देखने पर धक्का नहीं लगता क्योंकि उसका संयम बहुत बढ़ चुका होता है । प्रभु श्री रामजी का संयम देखें कि राज्याभिषेक की तैयारी के मध्य वनगमन का आदेश मिलने पर इतने शांत भाव से उसे स्वीकार किया । |
| 151. |
प्रभु श्री रामजी ने जो परम पुरुषार्थ किया वह उनकी महानता का परम प्रतीक है । |
| 152. |
हमें ही अपने मन का उद्धार करना होता है, कोई दूसरा आकर नहीं करेगा । कोई सहयोग दे सकता है पर अंतिम उद्धार हमें ही करना पड़ता है । |
| 153. |
प्रभु कृपा बरसाते हैं तभी हमारी साधना पूर्ण होती है । साधक को बस प्रयासरत होना चाहिए और प्रभु की कृपा का इंतजार करना चाहिए । |
| 154. |
मन के निवारण के बाद संसार में कुछ भी निवारण योग्य नहीं बचता । |
| 155. |
श्री योग वशिष्ठजी का संपूर्ण ज्ञान आज के संदर्भ में बड़ा लाभकारी ज्ञान है । |
| 156. |
सबसे पहले हमें संसार के पदार्थ को भोगने की वासना छोड़नी पड़ेगी । |
| 157. |
संसार के पदार्थ सामने आए और उसका हमने त्याग किया, उपयोग नहीं किया और सबसे जरूरी कि उसे अपने मन में भी चिपकने नहीं दिया, तभी हम पूर्ण लाभान्वित होंगे । |
| 158. |
हमारी दृष्टि ऐसी होनी चाहिए कि हमारा चित्त शांत रहे और कोई भी प्रतिकूल चीज हमें प्रभावित नहीं करे । |
| 159. |
शास्त्र कहते हैं कि सारी कामनाओं को लांघकर स्थिर हो जाना चाहिए और परम शांति को पाना चाहिए । |
| 160. |
श्री योग वशिष्ठजी मनोविजय यानी मन की विजय का शास्त्र है । |
| 161. |
परमार्थ का लाभ जीवन में लेना है तो हमें माया के खिलौनों को नजरअंदाज करना पड़ेगा । |
| 162. |
हमें संसार के लिए आग्रही नहीं होना चाहिए, जो मिल जाए उसमें संतोष करना चाहिए । हमारी आस्था प्रभु में होनी चाहिए और हमारा ध्यान प्रभु में लगना चाहिए । |
| 163. |
संसार से आग्रह खत्म होते ही मन में संसार की खटपट खत्म हो जाती है । |
| 164. |
अनाग्रही व्यक्ति ही सच्ची शांति को प्राप्त करता है । |
| 165. |
अपनी सांसारिक इच्छा को प्रबलता से रोकना चाहिए । इच्छा को पूर्ण करेंगे तो दुःख ही पाएंगे । |
| 166. |
भक्ति मार्ग में हमारी इच्छा का कोई महत्व नहीं होता, प्रभु की इच्छा ही सर्वोपरि होती है । |
| 167. |
अपनी सांसारिक इच्छा का मार्जन करने से हमें शांति मिलेगी और जीवन भी बढ़िया व्यतीत होगा । |
| 168. |
अपने मन को पहचानना चाहिए, यह अति दुर्लभ कार्य है । |
| 169. |
मन चेतनमय है इसलिए उसे चेतन प्रभु की तरफ ले जाना चाहिए । |
| 170. |
जैसी हमारी दृष्टि होगी वैसी सृष्टि हमें प्रतीत होगी, यह सिद्धांत है । |
| 171. |
जहाँ हमारी दृष्टि को हम रोक लेंगे वहीं से हमारे लिए संसार लुप्त हो जाएगा । |
| 172. |
हमें अपने आत्मबल का विकास करना चाहिए, यह प्रभु की भक्ति से संभव होता है । |
| 173. |
प्रभु के सामर्थ्य के आगे विज्ञान का सामर्थ्य बहुत ही तुच्छ रहा है और सदा रहेगा । |
| 174. |
संसार सागर में उठने वाली लहरों के बीच में हमें जीवन में शांत रहना सीखना चाहिए । |
| 175. |
हर तरफ और हर समय हमें प्रभु का चिंतन करते रहना चाहिए । इससे प्रभु से जल्दी एकाकार हो सकेंगे । |
| 176. |
पूरे संसार में एवं हमारे स्वयं के भीतर भी एकमात्र परमात्मा तत्व ही है । |
| 177. |
भक्ति मार्ग में एक शिला में प्रभु का भाव करने से वह सब कुछ हमें प्रदान कर देती है । भक्ति मार्ग में सिर्फ भाव का ही साम्राज्य है । |
| 178. |
हमारी भावनाओं को कभी भी नकारात्मक और संकीर्ण नहीं बनने देना चाहिए । |
| 179. |
भक्ति के कारण हमारे मन में जितनी ऊँची भावनाएं जागृत होती जाएगी उतना ही मन प्रबल और समर्थ होता चला जाएगा । |
| 180. |
मनुष्य संसार में इतना बुरी तरह से फंस चुका है कि अपने प्रभु तत्व को ही भुला बैठा है । |
| 181. |
मन में असत् वासनाएं नहीं आएं और सत् वासना ही आएं, ऐसा प्रयास जीवन में करना चाहिए । |
| 182. |
हमारे प्रारब्ध को हम भक्ति करके अनुकूल कर सकते हैं । |
| 183. |
माया और प्रारब्ध उसके लिए शांत हो जाते हैं जो प्रभु का नित्य चिंतन करते हैं । |
| 184. |
जगत के सभी दृश्य असत्य हैं, संसार में असत्य दृश्यों की लंबी-लंबी कतार हैं । |
| 185. |
हमें संसार के दृश्यों के प्रपंच में कभी भी नहीं फंसना चाहिए । |
| 186. |
अज्ञान से हमें ज्ञान के मार्ग में जाना चाहिए । |
| 187. |
अज्ञानी व्यक्ति परिवार को और संसार के दृश्यों को सत्य मानता है और उसमें ही रमता है । |
| 188. |
ज्ञानी महा जागृत अवस्था में होता है और अज्ञान उसको छू भी नहीं सकता । |
| 189. |
हमें शरीर में आसक्त नहीं होकर शरीर के भीतर चेतन तत्व प्रभु में आसक्त होना चाहिए । |
| 190. |
सबसे दुखद बात यह है कि अज्ञानी को अपने अज्ञान का भान भी नहीं होता । |
| 191. |
भक्ति करके हमें कल्याण पथ के ऊपर अग्रसर होना चाहिए । |
| 192. |
जब हमें सच्चे ज्ञान का बोध होता है तो संसार की इच्छाएं मिट जाती है और सत्संग हमें अच्छा लगने लगता है । |
| 193. |
ज्ञान की खोज में हमारे ऋषियों ने और संतों ने बड़ा परिश्रम किया है । |
| 194. |
शास्त्रों का पठन करना चाहिए और संतवाणी सुननी चाहिए और इन दोनों से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए । ऐसा करने से हमारे परमार्थ मार्ग में बहुत अधिक प्रकाश पड़ता है । |
| 195. |
हमें देखना चाहिए कि हमारी इंद्रियों में रमने की इच्छा कम हुई है क्या और जीवन में नियम पालन की इच्छा जागृत हुई है क्या ? |
| 196. |
हमारी कामनाएं कम होनी चाहिए और अंत में शिथिल पड़ जानी चाहिए । |
| 197. |
हमें सात्विक चीज अच्छी लगनी चाहिए और सात्विकता में हमारा मन स्थित होना चाहिए । |
| 198. |
ज्ञान आने के बाद जिन पदार्थों के लिए हम आग्रही थे और उनमें आसक्ति थी उन पदार्थों की हमें याद भी नहीं आती । एक परमात्मा के अलावा किसी से आसक्ति नहीं रहती । |
| 199. |
जगत मिथ्या है और एकमात्र प्रभु ही सत्य हैं, यह सब शास्त्रों का मूल सिद्धांत है । शास्त्र कहते हैं कि पूजा करते समय हमें प्रभु में पूरे संसार को देखना चाहिए और पूजा से निकलने के बाद पूरे संसार में प्रभु को देखना चाहिए । |
| 200. |
प्रभु हमारे भीतर विराजमान हैं । प्रभु की प्रथम उपस्थिति हमारे भीतर ही है । |
| 201. |
इस अधिकार के महात्मा भारतवर्ष में हुए हैं जिनसे किसी ने पूछा कि क्या परब्रह्म को आप जानते हैं तो उन्होंने कहा कि जानता क्या, मैं रोज परब्रह्म से बातचीत करता हूँ । ऐसे ही एक महात्मा श्री रामकृष्ण परमहंसजी थे । |
| 202. |
अपने मन को प्रभु में लगाकर प्रभु को अपने भीतर उतार लेना, यह भारतवर्ष का अध्यात्म ज्ञान रहा है । |
| 203. |
जीते जी जो प्रभु से मिल गया वह शरीर छोड़ने के बाद जरा सोचें कि वह कहाँ जाएगा । वह प्रभु के धाम के अलावा कहीं भी नहीं जा सकता । |
| 204. |
संसार के सभी पदार्थ नाशवान हैं और उन्हें उसी भांति देखना चाहिए । |
| 205. |
स्वप्न में जैसे हम पदार्थ का दर्शन करते हैं वैसे ही असल में भी पदार्थ का दर्शन करना हमें स्वप्न की तरह ही दिखना चाहिए । |
| 206. |
एक कल्पना हमारी खत्म होती है और दूसरी आरंभ हो जाती है, यह मनुष्य की स्थिति सदैव से ही रही है । |
| 207. |
हमें संसार को साक्षी भाव से देखना चाहिए यानी दृष्टा बनकर देखना चाहिए । |
| 208. |
श्रीग्रंथ से सूत्र प्राप्त होना एक बात है और उस सूत्र को जीवन में उतारना दूसरी बात है । |
| 209. |
प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहा है कि मैं तुम्हारे भीतर हूँ पर हम उन्हें श्री बैकुंठजी, श्री कैलाशजी, श्री गोलोकजी, श्री साकेतजी में रहता हुआ मानते हैं । यही हम गलती कर बैठते हैं । |
| 210. |
संसार इतना विलक्षण है और इतनी तालमेल से चल रहा है, यह प्रभु की शक्ति का एक अदभुत नमूना है । |
| 211. |
जीव के अंदर देह, इंद्रिय और हृदय आदि को चलाने वाला प्राण है और प्राण को संयमित करने वाले प्रभु ही हैं । |
| 212. |
हम जो भी खाते हैं उसको पचाने वाली शक्ति प्रभु ही हमें देते हैं । |
| 213. |
हमारे चित्त की परिकल्पनाओं का परित्याग करके मात्र साक्षी बनकर हमें देखना चाहिए और अपनी भीतर की खटपट बंद करनी चाहिए । |
| 214. |
प्रभु को कहीं बाहर से बुलाना नहीं पड़ता । प्रभु हमारे भीतर ही हैं और जब भी दर्शन देंगे हमें भीतर से ही दर्शन देंगे । |
| 215. |
जो शांत होना सीख लेता है उसका चित्त शुद्ध हो जाता है और स्वच्छ हो जाता है और प्रभु की अनुभूति जीवन में होने लगती है । |
| 216. |
इतनी सुंदर प्रकृति का कोई चित्रकार तो होगा जिन्होंने इसमें इतने सुंदर रंग भरे होंगे और वे प्रभु ही हैं । |
| 217. |
सारे संसार को एक स्वप्न की भांति हमें देखना चाहिए और उसमें फंसना नहीं चाहिए । |
| 218. |
संसार के कार्य में हम इतने उलझ जाते हैं कि प्रभु के लिए हम समय ही नहीं निकाल पाते, जो कि एकदम गलत है । |
| 219. |
तर्क बुद्धि से प्रभु को कभी भी नहीं पाया जा सकता । प्रभु को केवल भक्ति भाव से ही पाया जा सकता है । |
| 220. |
संसार के सारे दृश्य बादल जैसे हैं, अभी बादल यहाँ थे, अभी चले गए । स्थाई केवल आकाश है, ऐसे ही स्थाई केवल प्रभु ही हैं । |
| 221. |
उनका चित्त शांत हो जाता है जिन्होंने जीवन में प्रभु की भक्ति का संकल्प ले लिया है । |
| 222. |
जहाँ भी हमारी दृष्टि जाए वहाँ हमें परमात्मा तत्व का दर्शन होना चाहिए । ऐसा होने पर चित्त कभी भी अशांत नहीं होगा और हमेशा शांत रहेगा । |
| 223. |
जैसे एक शिला में एक आकृति समाहित होती है, ऐसे ही पूरे जगत में प्रभु समाहित हैं । |
| 224. |
सांसारिक कामनाओं के कारण हमारा चित्त स्थिर नहीं हो पाता । |
| 225. |
हमारा मन बहुत चंचल है इसलिए उसे एकाग्र करने का प्रयास कभी-कभी सफल होता है कभी-कभी सफल नहीं हो पाता । |
| 226. |
“राम और काम” और “वासुदेव और विषय” के बीच में “राम” और “वासुदेव” को ही चुनना चाहिए । |
| 227. |
हमारा शरीर बूढ़ा हो जाता है जिस कारण वासनाओं की पूर्ति नहीं कर सकता पर तृष्णा मन में नवीन बनी रहती है । |
| 228. |
मनुष्य को बाहर के विषय कष्ट ज्यादा नहीं देते, ज्यादा कष्ट उसे भीतर के विषय देते हैं । |
| 229. |
प्रभु की भक्ति से जो प्राप्त होता है वह अन्यत्र कहीं भी प्राप्त होने वाला नहीं है । |
| 230. |
संत व्यंग्य में कहते हैं कि हम भी जप करते हैं पर हम प्रभु के नाम की जगह पैसे गिनने का, घर-कारोबार के हिसाब का जप करते हैं । |
| 231. |
ज्यादा प्रमाद करना हमारी आध्यात्मिक उन्नति में बाधा देता है । |
| 232. |
ऋषियों की तपस्या के कारण उनकी तपोभूमि ऐसी हो जाती थी कि जहाँ के हिंसक जीव भी अहिंसा पर चलने लगते थे । |
| 233. |
अपने पुण्य का नाश किसी भी गलत क्रिया से नहीं करना चाहिए । |
| 234. |
पुण्य कमा कर स्वर्ग जाने से भी कहीं ज्यादा भक्ति करके प्रभु को प्राप्त करना श्रेष्ठ होता है । |
| 235. |
हमारा शरीर बाहर से मिला हुआ एक आवरण है जिसके सहयोग से हम प्रभु की प्राप्ति कर सकते हैं । |
| 236. |
शरीर के भीतर का तत्व जीवात्मा है पर हम शरीर को ही जीवात्मा मान बैठे हैं । |
| 237. |
गलत कर्म करने से हमारे पुण्यों का नाश होता है । |
| 238. |
हमें अपने भीतर की आंतरिक शक्ति जागृत करनी चाहिए, इसे ही आत्म-बल कहते हैं । |
| 239. |
हमारे मन में संकल्प-विकल्प की अलग-अलग तरंगें उठती रहती है जो केवल भक्ति से ही शांत हो सकती है । |
| 240. |
संकल्प-विकल्प के बीच रहकर भी हमारी बुद्धि भक्ति के कारण सही निर्णय लेती है । |
| 241. |
जीवन से संकल्पों-विकल्पों को शांत करना है तो भक्ति ही उसका एकमात्र उपाय है । |
| 242. |
परमात्मा तत्व हमारे भीतर ही विराजमान है, हमें उसे बस पहचानने की जरूरत है । |
| 243. |
प्रभु की कृपा श्रवण का महत्व देखें कि निद्रा में भी किया श्रवण बेकार नहीं जाता, वह भी हमारा कल्याण ही करता है । पहले बच्चों को दादा-दादी सोते समय प्रभु की कथा सुनाते थे जो उन्हें निद्रा अवस्था में भी याद रहती थी । |
| 244. |
हमें अपने मन को हमेशा जागृत रखना चाहिए । |
| 245. |
प्राप्त किए हुए ज्ञान से भी ज्यादा अपने मन द्वारा सोचकर जो बातें समझ में आती है वह ज्यादा श्रेष्ठ होती है । |
| 246. |
मन के तीव्र संकल्प से कोई ऐसा कार्य नहीं जो किया नहीं जा सकता । |
| 247. |
महात्माओं का मन सभी सांसारिक संकल्पों से रहित हो जाता है और इस कारण बहुत निर्मल हो जाता है । |
| 248. |
मन को आनंद में रमण कराना है तो उसे विकार और कामनाओं से रहित करना होगा । |
| 249. |
जीवन में साहस के साथ सद्विचार करना आरंभ करना चाहिए । |
| 250. |
हम जो देखते हैं वह व्यावहारिक सत्य है पर अंतिम सत्य आध्यात्मिक सत्य ही होता है । |
| 251. |
हमें अंतर्मुख होकर प्रखर रूप से आध्यात्मिक विचार करना आरंभ करना चाहिए । |
| 252. |
हमें ऐसा विचार करना चाहिए कि परमात्मा तत्व जो अनंत हैं, अपार हैं, सर्वशक्तिमान हैं, वे मेरे भीतर भी हैं और बाहर भी वही तत्व हैं । |
| 253. |
आसक्ति के कारण हमने भोगों के लिए हमारी आवश्यकता बढ़ा रखी है जिसकी कोई जरूरत नहीं है । |
| 254. |
हमारा मन सावधान रहने पर बहुत अच्छी प्रकार से काम करता है । |
| 255. |
मन को थोड़े से भोगों से संतुष्ट होना सिखाना चाहिए, तभी वह परमार्थ में हमारा सहयोग देगा । |
| 256. |
जीवन में प्रातःकाल बिना चूके हमें प्रभु का ध्यान करना चाहिए । |
| 257. |
संसार में किसी को जीतने से पहले अपने मन को जीतना सबसे अनिवार्य है । |
| 258. |
हमारे शास्त्रों का सर्वमान्य सिद्धांत है कि परब्रह्म एक ही हैं और अनेक रूप में विराजमान हैं । |
| 259. |
परमार्थ अच्छा होने पर हमारा संसार भी अच्छा होगा । |
| 260. |
अपने मन को सदैव सावधान रखना सीखना चाहिए । |
| 261. |
जिसका जीवन भक्तिमय होता है वह परमार्थ में सबसे दक्ष और उत्कृष्ट होता है । |
| 262. |
मन की एकाग्रता के लिए वैराग्य की परम आवश्यकता होती है । |
| 263. |
मन केवल प्रभु में एकाग्र होना चाहिए तभी वह संसार के हर विषय से निर्लिप्त रहेगा । |
| 264. |
जब हम प्रभु को अपना मालिक बना देते हैं और अपने मन को प्रभु का सेवक बना देते हैं तो मन अच्छी तरह से प्रभु की सेवा में लग जाता है । |
| 265. |
जो प्रभु में लग जाता है उस मन को शास्त्रों ने सचमुच अनमोल रत्न बताया है । |
| 266. |
मन को प्रभु में लगाना उतना कठिन नहीं है जितना अज्ञान के कारण हमें लगता है । |
| 267. |
अपने मन से प्रभु का नाम जप जीवन में लगातार करते रहना चाहिए । |
| 268. |
मन की आलोचना करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मन को अगर हमने भक्ति से साध लिया तो वह हमारा सबसे बड़ा शुभकर्ता बन जाता है । |
| 269. |
मन के कारण ही हम भक्ति में सफल हो पाते हैं । |
| 270. |
मुख्य बात यह है कि मन हमारे नियंत्रण में होना चाहिए न कि हम मन के नियंत्रण में हो । |
| 271. |
हमारा मन एक अनमोल रत्न है जो संसार के सभी दिव्य रत्नों से भी कहीं ज्यादा अनमोल है । |
| 272. |
हमारे समस्त शास्त्रों में विवेक जागृत करने का बड़ा आग्रह किया गया है । |
| 273. |
विवेक और वैराग्य जागृत करना, यह हमारे शास्त्रों के दो प्रिय विषय होते हैं । |
| 274. |
हमें जीवन को भक्तिमय बनाने का प्रयत्न करना चाहिए । |
| 275. |
मनुष्य प्रभु प्राप्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता इसलिए संसार सागर में डूबता है । प्रयत्न किए बिना प्रभु कभी भी किसी को नहीं मिल सकते । |
| 276. |
जीवन के जितने आरंभ में हम श्रीग्रंथ पढ़ लेते हैं उतनी हमारी बुद्धि में विवेक, वैराग्य और विचार की क्षमता बढ़ जाती है । |
| 277. |
संसार के विषय हमारे ऊपर बाहर और भीतर दोनों तरफ से प्रहार करते हैं । |
| 278. |
हमारा मन संसार से हारता है, डरता है पर भक्ति करने पर वह दृढ़ हो जाता है कि मुझे संसार से हारना नहीं है, डरना नहीं है और न ही संसार का भोग करना है । |
| 279. |
भक्ति से हमारा जीवन भविष्य के भय से रहित हो जाता है । |
| 280. |
हमारे अहंकार के कारण हम जीवन में जीती हुई बाजी भी हार जाते हैं क्योंकि अहंकार हमारा पतन करवा देता है । |
| 281. |
इच्छा, वासना, कामना और तृष्णा इन सबके कारण हमारी आयु ही पूरी हो जाती है । |
| 282. |
आत्मज्ञान के बिना जीवन में धैर्य नहीं आता । |
| 283. |
आध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न व्यक्ति संसार के लिए सबसे उपयुक्त होता है । |
| 284. |
जिसने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया वह अपने संसार के व्यवहार में भी श्रेष्ठतम रूप से सक्षम रहेगा । |
| 285. |
संसार रूपी पर्वत पर चढ़ना आरंभ करना है तो आध्यात्मिक ज्ञान शीघ्रता से ग्रहण करना चाहिए । |
| 286. |
एकनिष्ठ साधक ही आगे चलकर संत बनते हैं । |
| 287. |
आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त व्यक्ति बेहद सावधान रहता है इसलिए जीवन में पराजित नहीं होता । |
| 288. |
आध्यात्मिक ज्ञान व्यक्ति को बेहद एकाग्र कर देता है । |
| 289. |
अपने मन को जीतकर उसको अनुशासन में लाने वाला व्यक्ति सबसे श्रेष्ठ होता है । |
| 290. |
जीवन में जिसे महान कार्य करना है उसे अपने मन को जीतना सबसे जरूरी है । |
| 291. |
हम रोज जो गंध, स्पर्श, दृष्टि से अनुभव करते हैं उनका अनुभव करवाने वाले प्रभु का हमें जीवन में अनुभव करना चाहिए । |
| 292. |
संसार के सभी विषयों को जानने पर भी उससे परमार्थ में कोई लाभ मिलाने वाला नहीं है । |
| 293. |
जो आँखों से दिखते नहीं पर आँखों को देखने की जो शक्ति देते हैं, वे प्रभु हैं । जिनको सुना नहीं जा सकता पर जो सुनने की शक्ति देते हैं, वे प्रभु हैं । |
| 294. |
हमारे मन को चिंतन करने की शक्ति भी प्रभु ही देते हैं । |
| 295. |
हमें अपना आध्यात्मिक साधन अपनी योग्यता के हिसाब से चुनना चाहिए । |
| 296. |
अपनी योग्यता से ऊपर का आध्यात्मिक साधन हमें नहीं चुनना चाहिए पर वहाँ तक पहुँचने का धीरे-धीरे जीवन में हमें प्रयास जरूर करना चाहिए । |
| 297. |
अपनी भक्ति को अत्यंत प्रबल करना चाहिए तभी वह भक्ति हमें परब्रह्म तत्व की प्राप्ति करवाती है । |
| 298. |
पूर्ण श्रद्धा से प्रभु पर विश्वास करना चाहिए क्योंकि वे ही अंतिम सत्य हैं । |
| 299. |
हमें अपने श्रीग्रंथों पर पूर्ण श्रद्धा रखनी चाहिए और परम विश्वास रखना चाहिए । |
| 300. |
हमारे श्रीग्रंथ हमें सत्य के सिद्धांत बताते हैं इसलिए वे महान उपकारी होते हैं । |
| 301. |
बुद्धिमान व्यक्ति शास्त्रों के तथ्यों को अपने जीवन में उतारता है । |
| 302. |
अज्ञान का अंधकार कितना भी पुराना हो पर ज्ञान का प्रकाश आते ही वह लुप्त हो जाता है । |
| 303. |
अज्ञान की चिकित्सा अगर समय पर आरंभ कर देते हैं तो जीवन में ज्ञान का उदय जरूर होता है । |
| 304. |
जो बीत गया उसे तुरंत भूलते जाना चाहिए और जो सामने आ गया उस कर्म को एकाग्र होकर दक्षता के साथ पूरा करना चाहिए । |
| 305. |
वर्तमान में रहकर कार्य संपादित करना चाहिए । भूतकाल को भूलना चाहिए और भविष्य काल की चिंता नहीं करनी चाहिए । |
| 306. |
शास्त्र कहते हैं कि जो सृष्टि का बखान उनमें है उसके अलावा अनंत-अनंत सृष्टियां प्रभु द्वारा रचित हैं और सबका संचालन प्रभु द्वारा होता है । |
| 307. |
अपने ज्ञान को अपने साधन में लगाना चाहिए । साधन को आगे बढ़ाने के लिए यह सही स्थिति होती है । |
| 308. |
हमारी क्षमता नहीं होने के कारण हम कोई सत्कर्म नहीं कर सके तो मन से उसे करना चाहिए । मानसिक रूप से सत्कर्म करने में कोई पैसा नहीं लगता और पूरा लाभ मिलता है । |
| 309. |
सभी कर्म निष्काम भाव से करने चाहिए । कोई लौकिक आशा नहीं रखनी चाहिए तभी वह कर्म परिपूर्ण रूप से सिद्ध हो जाएगा । |
| 310. |
हमारा मन ही विभिन्न कामनाओं का निर्माण और वासनाओं का निर्माण हमारे भीतर करता रहता है । |
| 311. |
अपने सभी संकल्पों को समेट लेना चाहिए तो हमें अखंड सुख और शांति मिल पाएगी । |
| 312. |
मन में संसार के दृश्यों को जाने से रोकना चाहिए जिससे गलत संकल्प नहीं बन पाए । |
| 313. |
जीवन व्यवहार के लिए जो कर्तव्य कर्म करने हैं वह हमें करने चाहिए, उसके अलावा पूरा ध्यान परमार्थ में देना चाहिए । |
| 314. |
जीवन मुक्त अवस्था सिर्फ हमारी कामना और वासनाओं के कारण ही हमसे दूर है । |
| 315. |
विवेक और वैराग्य से भी संसार की माया से पार पाना संभव नहीं है । यह केवल प्रभु कृपा से ही संभव है । |
| 316. |
संसार के सभी दृश्यों का दर्शन दृष्टा बनकर ही करना चाहिए । |
| 317. |
जगत के साक्षी प्रभु हैं इसलिए हमें प्रभु से कुछ भी छुपाना नहीं चाहिए । |
| 318. |
हमारी बुद्धि को ऐसी जागृत करनी चाहिए कि वह सभी सद्विचार का प्रकाशन हमारे भीतर करे । |
| 319. |
अपनी श्वासों के माध्यम से प्रभु की आराधना करनी चाहिए कि मैं प्रभु का अंश हूँ और प्रभु के शरणागत हूँ । ऐसा चिंतन श्वास के आते-जाते हमें करना चाहिए । |
| 320. |
प्रभु की आराधना अपने भीतर ही की जाती है पर संसारी लोग प्रभु को बाहर खोजते हैं । प्रभु सर्वप्रथम हमारे भीतर ही स्थित हैं । |
| 321. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें वासना युक्त और कामना युक्त जीवन से मुँह मोड़ना चाहिए । |
| 322. |
अगर हम प्रभु की भक्ति नहीं करते हैं तो सांसारिक दुःख हमारे भीतर शोक का निर्माण कर देते हैं । |
| 323. |
अपने विवेक से कामनाओं और वासनाओं का दमन करना चाहिए । |
| 324. |
भोगों के विष को उतारने के लिए मन को भक्ति में एकाग्र करना सबसे जरूरी है । |
| 325. |
धन्य वह आत्मा है जो अपने भीतर प्रभु में स्थिर हो जाती है और इस तरह माया के चंगुल से बच जाती है । |
| 326. |
हमें सांसारिक कर्म बिना फंसे हुए, बिना आसक्ति के करना चाहिए । |
| 327. |
जीवनमुक्त व्यक्ति वही है जिसको न तो पूर्व की चिंता होती है और न भविष्य की चिंता होती है । वह वर्तमान में संसार में हंसते-हंसते जीता है । |
| 328. |
जीवन मुक्ति की तरफ जाने वाली बुद्धि का उदय करना साधक का पहला काम होता है । |
| 329. |
हमारी बुद्धि चिंता रहित हो जाए तो वह चिंतामणि बन जाती है । |
| 330. |
भूतकाल की चिंता नहीं रखनी चाहिए और भविष्य की भी चिंता नहीं रखनी चाहिए, ऐसा शास्त्र हमें आदेश करते हैं । |
| 331. |
कर्तव्य कर्म को सही रूप में पूरा करने वाला ज्ञान हमारे शास्त्रों में मिलता है । |
| 332. |
संतों से सत्संग सुनकर हमारी जीवन की चर्या ही बदल जाती है । |
| 333. |
सद्गुण को लाने की पहले इच्छा होगी फिर योग्यता आएगी तो जीवन में सद्गुण उतर आएंगे । |
| 334. |
प्रभु के स्वरूप का ध्यान करने से आनंद और सुख की वृत्ति हमारे भीतर जागृत हो जाती है । |
| 335. |
जीवन मुक्त व्यक्ति दृश्य और दर्शन को त्याग कर सिर्फ साक्षी बनकर सबको देखता है । |
| 336. |
हम मंदिर में प्रभु के विग्रह के पास बैठकर अन्य चिंतन करते हैं तो हम प्रभु के समीप नहीं हैं, दूर हैं । |
| 337. |
भक्त को सिर्फ प्रभु की भक्ति में मग्न रहने में ही आनंद आता है । |
| 338. |
अपने मन को जीतना जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ है, ऐसा करने वाला सर्वोत्तम परमार्थ भी कर पाता है । |
| 339. |
पूर्व में राजाओं को तो कभी-कभी युद्ध करना पड़ता था पर जीव को लगातार और सर्वदा अपने मन से युद्ध करना पड़ता है । |
| 340. |
अपने मन को अपनी इच्छा अनुसार मोड़ने के लिए युद्ध नहीं करेंगे तो मन सात्विक नहीं रहेगा और हमारा जीवन पतित हो जाएगा । जो मन हमारी इच्छा अनुसार कर्म करता है वही सात्विक मन होता है । |
| 341. |
शास्त्र कहते हैं कि अपनी वासनाओं और कामनाओं के अनुसार कर्म नहीं करना चाहिए बल्कि कर्म अपने विवेक के अनुसार ही करना चाहिए । |
| 342. |
हमारा अपना संसार में कुछ भी नहीं है, सब कुछ प्रभु का ही दिया हुआ है । |
| 343. |
सुखी प्राणी के अंतःकरण में भक्ति का बल होता है । |
| 344. |
सत्संग के द्वारा संत चाहते हैं कि आध्यात्मिक दृष्टि से कोई भी अज्ञानी न रहे । |
| 345. |
उत्तम पुरुष को चाहिए कि भविष्य की चिंता न करे, भूतकाल का शोक न करे, सिर्फ वर्तमान में सावधानी पूर्वक कार्य करता चले । |
| 346. |
प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी श्रीलीला में सदैव हंसते-हंसते ही सब कार्य किया है । |
| 347. |
मन वर्तमान में रहेगा तो कभी नहीं फंसेगा पर हम अपने मन को भविष्यकाल या भूतकाल में रखते हैं और चिंता और शोक में फंस जाते हैं । |
| 348. |
हम लोग प्रभु के नाम का जप तो करते हैं तो मात्र जिह्वा से करते हैं और मन को उसमें शामिल नहीं करते । मन संसार का चक्कर खाता रहता है, यह प्रभु के नाम जप की उत्तम विधि नहीं है । |
| 349. |
आध्यात्मिक दृष्टि से जो सत्कर्म हमने कर लिए उसे भूल जाना चाहिए, याद रखने से अहंकार का उदय होता है । |
| 350. |
वर्तमान में रहने वाला व्यक्ति मन को संतुलन में रख पाता है और सावधानी से अपना कार्य निष्पादित करता है । |
| 351. |
शास्त्र कहते हैं कि संसार की वस्तु हमें उपलब्ध होने पर भी हमारी चाह उसके लिए नहीं रहे तो यह बहुत बड़ी जीवन की उपलब्धि है । |
| 352. |
शास्त्र हमें जीवन में सबके साथ मृदुता का व्यवहार सिखाते हैं । |
| 353. |
हम अपने आग्रहों के कारण ही दुःख पाते हैं, अनाग्रही जीवन श्रेष्ठतम जीवन होता है । |
| 354. |
अपनी बुद्धि को संस्कारों से परिष्कार करना चाहिए तो हमारा अंतःकरण चमक जाएगा । |
| 355. |
अहंकार और वासना का त्याग करके फिर जब हम उन्हें देखेंगे तो उनसे घृणा आएगी । कभी उनको अपनाने की लेश मात्र भी इच्छा नहीं होगी । |
| 356. |
शास्त्रों ने एकांत को बड़ा महत्व दिया है । हम सब सांसारिक व्यवधानों के बिना रह पाएं, ऐसा आग्रह शास्त्र हमसे करते हैं । |
| 357. |
जीवन मुक्ति की अवस्था होती है कि हमें सांसारिक नाटक प्रभावित नहीं कर पाता । |
| 358. |
संत कहते हैं कि संसार से मात्र नाटक करना सीखना चाहिए और असल में अपना मन प्रभु को दे देना चाहिए । |
| 359. |
संसार के मंच में सबको प्रभु ने कोई-न-कोई पारमार्थिक कर्तव्य देकर भेजा है । हमें उसे समझना चाहिए और पूरा करना चाहिए । |
| 360. |
प्रभु कभी हमसे पूछेंगे कि तुम मेरे क्या हो ? हमें तैयार रहना चाहिए कि हम दास भाव, सखा भाव, कांत भाव, वात्सल्य भाव या कोई अन्य भाव प्रभु को उस समय निवेदन कर सकें । |
| 361. |
संत कहते हैं कि संसार के साथ नाटक ठीक से करना चाहिए और सभी लोगों के साथ संबंध में प्रगाढ़ता दिखनी चाहिए जिससे नाटक ठीक हो पर भीतर मन में प्रभु के लिए सच्ची प्रगाढ़ता होनी चाहिए । |
| 362. |
संत कहते हैं कि संसार से नाटक करते समय गुस्सा भी दिखाएं पर अंतरात्मा में कोई गुस्सा का वेग नहीं आने दे । |
| 363. |
संसार ठीक से करने से हम भीतर से कभी दुःखी नहीं होंगे । |
| 364. |
पूरा विश्व मेरा कुटुंब है, यह उपदेश भारतवर्ष का पूरे विश्व को है । |
| 365. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें किसी भी चीज का शोक नहीं करना चाहिए । कोई दिवंगत हो जाता है तो हम शोक करते हैं पर असंख्य योनियों में असंख्य जीवों से हमारा वियोग हुआ है इसलिए मन से कभी शोक नहीं करना चाहिए । |
| 366. |
श्री योग वशिष्ठजी हमें विचार करने की प्रक्रिया को सिखाने वाला श्रीग्रंथ है कि हमें सदैव विचारशील रहना चाहिए । |
| 367. |
धर्म की आज्ञा होने के कारण अपना कर्तव्य मानकर माता-पिता की सेवा हमें जरूर करनी चाहिए । |
| 368. |
कर्तव्य कर्म संपादित करने से हमें पुण्य की प्राप्ति होती है, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 369. |
वासना और चिंता बढ़ते रहने से अशांति भी बढ़ती जाती है, वासना और चिंता को त्यागने से ही अशांति का क्षय होता है । |
| 370. |
संसार की कामना और वासना नहीं रहने से अशांति की आग हमें भीतर जलाएगी ही नहीं । |
| 371. |
जिस चित्त में निष्कामता स्थाई हो गई उसके मन में सुख और शांति भी स्थाई हो जाती है । |
| 372. |
कामना के विसर्जन में जो सुख प्राप्त होता है वह धन से, अन्य साधन से कभी भी नहीं हो सकता । यह योग वशिष्ठजी का स्पष्ट सिद्धांत है । |
| 373. |
शास्त्र कहते हैं कि शोक और मोह से ऊपर उठकर जीवन जीने से असली विजय प्राप्त होती है । |
| 374. |
हम आशा नाम की रस्सी से बंधे हुए हैं । इस आशा नाम की रस्सी से हमें छूटना चाहिए, तभी शांति मिलेगी । |
| 375. |
प्रभु कृपा से ही जीवन में विवेक जागृत होता है । |
| 376. |
अगर हमें संसार के व्यवहार में रस आ रहा है तो इसका मतलब है कि हमारा अंतःकरण अभी परिपक्व नहीं हुआ है । |
| 377. |
संसार चक्र में फंसने के कारण ही मनुष्य का चित्त अशांति और दुःख का अनुभव करता है । |
| 378. |
सिर्फ एक जगह ही ऐसी है जहाँ अशांति और दुःख नहीं है और वह हैं प्रभु के श्रीकमलचरण । |
| 379. |
हमें बड़ी चतुराई से अपने मन को प्रभु में लगाना चाहिए तभी मन को सच्चा विश्राम मिलेगा । |
| 380. |
शास्त्र कहते हैं कि दिन के समय को तीन भागों में बांटना चाहिए । दो भाग यानी छह घंटे संसार के लौकिक कर्म करने चाहिए जिसे कर्तव्य कर्म कहते हैं । एक भाग यानी तीन घंटे प्रभु की भक्ति और सेवा में लगाना चाहिए । एक भाग यानी तीन घंटे शास्त्रों के स्वाध्याय और सत्संग को देना चाहिए । |
| 381. |
शास्त्र कहते हैं कि उत्तम जीवन उसका है जिसके घर में आने वाली संपत्ति शुद्ध होती है । |
| 382. |
शास्त्र कहते हैं कि अशुद्ध संपत्ति सब परिवार के सदस्यों में अशुद्धि के संस्कार लाकर ही रहती है । |
| 383. |
जब गृहिणी रसोई बनाती है और शुद्ध भगवत् विचार उसके हृदय में होता है तो रसोई का जो भोजन बनता है उसमें सात्विक तत्व आ जाते हैं और वह खाने वाले को परम लाभ देती है । |
| 384. |
शास्त्रों का अध्ययन जीवन में करते हुए चलना चाहिए । |
| 385. |
पूरे विश्व में एक चेतन के रूप में प्रभु ही हैं, प्रभु के अलावा कुछ भी नहीं है । |
| 386. |
संसार में माया हमें दृश्य का दर्शन कराती है मगर असल में न दृश्य है और न ही उसका दर्शन है । हम चेतन स्वरूप प्रभु का ध्यान करते हैं तो माया के दृश्य और दर्शन हमें प्रभावित नहीं करते । |
| 387. |
एक चेतन स्वरूप हैं प्रभु के रूप में जिन्होंने सबका निर्माण किया है । |
| 388. |
हम माया का दृश्य देखते हैं पर जो आध्यात्मिक रूप से जागृत होते हैं उन्हें कोई दृश्य नहीं दिखता । |
| 389. |
चित्त को स्थिर करने के लिए भक्ति की परम आवश्यकता होती है । |
| 390. |
भक्ति में प्रभु का ध्यान करने से हमारी सारी वासनाएं और कामनाएं शांत हो जाती है और हमारे संकल्प-विकल्प भी शांत हो जाते हैं । |
| 391. |
भक्ति करके शांति का प्रयास जीव को स्वयं ही करना पड़ता है । |
| 392. |
सत्कर्म करने के लिए कोई मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती है । |
| 393. |
मंत्र का निरंतर जप करने से उस मंत्र की सिद्धि हमें हो जाती है । |
| 394. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के जिस स्वरूप की हम पूजा करते हैं वह स्वरूप हमारे सामने प्रकाशित हो जाता है । |
| 395. |
प्रभु के सभी श्रीचिह्न के साथ प्रभु का अपने हृदय में ध्यान करना चाहिए । |
| 396. |
पहले हाथ से पूजा करनी चाहिए फिर मानस पूजा भी करनी चाहिए । |
| 397. |
परिवार को सुधारने से पहले स्वयं को सुधारना सबसे आवश्यक है । |
| 398. |
भक्ति में इतनी शक्ति होती है कि भक्तराज श्री प्रह्लादजी ने दैत्य बालकों को भी भक्ति में लगाकर यह दिखा दिया कि भक्ति कोई भी कर सकता है । |
| 399. |
भक्तराज श्री प्रह्लादजी राजा बनने के बाद एक भी दिन भक्ति मार्ग से विचलित नहीं हुए और नित्य भक्ति करते रहे । |
| 400. |
भक्तराज श्री ध्रुवजी प्रभु के ध्यान में इतने मग्न थे कि प्रभु को अपना शंख उनके कपोल पर लगाकर उनको समाधि से जागृत करना पड़ा । |
| 401. |
जब भी भक्त प्रभु के दर्शन करता है तो गदगद कंठ से प्रभु की स्तुति करता है । |
| 402. |
जीवन में श्रीहरि नाम जप की प्रबलता होनी चाहिए तो प्रभु को उस जीव पर अनुग्रह करना ही पड़ता है । |
| 403. |
कभी कर्तव्य कर्म से विमुख नहीं होना चाहिए पर परम कर्तव्य कर्म के रूप में प्रभु की भक्ति ही करनी चाहिए । |
| 404. |
राग और द्वेष हमारे मन में बढ़ते हैं तो वे हमारे मन पर प्रतिकूल असर डालते हैं । |
| 405. |
जिसके अंदर राग और द्वेष नहीं होते उसका मन अति निर्मल होता है और वे साक्षी भाव से प्रभु का अपने अंतःकरण में अनुभव कर पाते हैं । |
| 406. |
जैसे एक दीपक एक सभागृह में साक्षी रूप से जलता है । वह सुबह श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश सुनता है, दोपहर में कोई राजनीतिक भाषण सुनता है, शाम को कोई नृत्य का कार्यक्रम देखता है पर सभी साक्षी भाव से । सबको देखा पर बिना लिप्त हुए । ऐसे ही हमें भी बिना लिप्त हुए संसार करना चाहिए । |
| 407. |
जैसे धान को अगर भूनकर बोया जाए तो वह उगेगा नहीं । वैसे ही हमें अपनी कामनाएं और वासनाओं को प्रभु की भक्ति करके भून देना चाहिए । |
| 408. |
जीवनमुक्त व्यक्ति द्वारा किए कर्म का फल उनसे चिपकता नहीं क्योंकि वे उसे प्रभु को अर्पित कर देते हैं । |
| 409. |
सभी श्रीग्रंथों का जीवन में आदर करना चाहिए । |
| 410. |
जितना भी हो जीवन में प्रयास करके हमें भक्ति मार्ग पर ही चलना चाहिए । |
| 411. |
सभी श्रीग्रंथ प्रभु की महिमा का ही बखान करते हैं और प्रभु की भक्ति का ही प्रतिपादन करते हैं । |
| 412. |
जीवन में प्रभु के नाम का जप लगातार करना चाहिए, इससे बहुत जल्दी हमारा मन निर्मल होता है । |
| 413. |
हम साधन करते हैं तो साधन पथ पर बाधाएं आती है पर उन बाधाओं से निवृत्त होकर हमें साधन करते रहना चाहिए । |
| 414. |
भक्तराज श्री प्रह्लादजी ने प्रभु से वरदान मांगा कि मुझे जीवन में कभी मांगने की इच्छा ही नहीं हो । यह कितनी बड़ी और कितनी उत्तमोत्तम मांग है । |
| 415. |
बच्चों का मूल स्वभाव होता है कि बचपन में जो देखते हैं वैसा संस्कार बनता है । इसलिए बच्चों को बचपन से ही प्रभु की भक्ति में लगाना चाहिए । |
| 416. |
संसार की माया से बचने के लिए आत्म चिंतन की आवश्यकता होती है । |
| 417. |
संसार की माया से निकले बिना संसार के दुःख से निकलना संभव नहीं है । |
| 418. |
जो भी हम संसार में दृश्य देख रहे हैं वह माया ही हमें दिखा रही है । |
| 419. |
सभी श्रीग्रंथ में जो सिद्धांत होते हैं वह शाश्वत सत्य होते हैं और श्रीग्रंथ सिर्फ उनका प्रतिपादन करते हैं । |
| 420. |
संसार चक्र से बचना है तो भक्ति करके प्रभु के श्रीकमलचरणों तक पहुँचना ही पड़ेगा । |
| 421. |
कितना भी हम भोग लें, भोगों को भोगकर हम खत्म नहीं कर सकते । सबसे बड़ी जीत तब होती है जब भक्ति के कारण भोग भोगने की इच्छा ही खत्म हो जाती है । |
| 422. |
संसार के भोग कभी खत्म होने वाले नहीं हैं । भोगों में दृष्टि रखने वाला ही खत्म हो जाएगा । |
| 423. |
हमें माया से मायापति प्रभु तक की यात्रा करनी चाहिए । |
| 424. |
प्रभु की शरणागति सभी शास्त्रों का परम सिद्धांत है । |
| 425. |
हमारा जीवन समाप्त हो जाता है पर भोग भोगने की इच्छा कभी संसार में समाप्त नहीं होती । |
| 426. |
सभी शास्त्र प्रभु से एकाकार होने की बात कहते हैं । |
| 427. |
यह आत्म चिंतन करना चाहिए कि मैं प्रभु से किस रूप में अपने रिश्ते को परिपक्व करना चाहता हूँ । |
| 428. |
प्रभु की शरणागति लेने पर प्रभु अपना परम ज्ञान हमें दे देते हैं और वह परम ज्ञान मोक्षरूपी कल्याण तक हमें पहुँचा देता है । |
| 429. |
हमारा मन ही सारी हैरानी और हताशा का निर्माण हमारे भीतर करता है । |
| 430. |
मन ही सारा उठा-पटक भीतर करता रहता है और सभी वासनाओं को प्रबल करके रखता है । |
| 431. |
हमारा मन नेत्रों के माध्यम से रूप को देखना चाहता है, नाक के माध्यम से गंध ग्रहण करना चाहता है, स्पर्श के माध्यम का सुख चाहता है, कान के माध्यम से सुनना चाहता है और फिर मन हमें अपना गुलाम बना लेता है । |
| 432. |
कभी तो हमें अपने मन से कहना चाहिए कि मैं अपनी पांचों इंद्रियों को प्रभु में लगाना चाहता हूँ । |
| 433. |
एकांत का सेवन अत्यंत जरूरी है । शास्त्रों का अध्ययन करके उनका एकांत में मनन करना चाहिए । |
| 434. |
साधक का मार्गदर्शन करने वाले केवल प्रभु ही होते हैं जो किसी सद्गुरु को जीवन में भेजते हैं । |
| 435. |
जिसने एकांत में रहना सीख लिया उसने परम शांति का अनुभव का मार्ग अपने लिए खोल लिया । |
| 436. |
अत्यंत श्रेष्ठ विचार एकांत में ही हमारे भीतर आते हैं । |
| 437. |
सच्चे साधक को कभी भी संसार का सम्मान स्वीकार नहीं करना चाहिए । |
| 438. |
सारा संसार मेरा परिवार है, यह भावना करने वाली एकमात्र भारतीय संस्कृति है । |
| 439. |
प्रभु कृपा से ही जीव की प्रज्ञा जागृत होती है । |
| 440. |
सभी श्रीग्रंथों में प्रभु की भक्ति का ही प्रतिपादन मिलेगा । |
| 441. |
वानप्रस्थ आश्रम यानी पचास की उम्र के बाद जीवन में हमारी बुद्धि में सकामता नहीं रहनी चाहिए । इस अवस्था के बाद सकामता को शास्त्रों में कलंक माना गया है । |
| 442. |
हमारी प्रज्ञा का जागरण एकांत सेवन से ही होता है । |
| 443. |
हमारे सामने आने वाले दृश्यों से हम अलग हैं, यह भान हमें होना चाहिए तभी हमें परम शांति अंतःकरण में मिलेगी । |
| 444. |
हम जो संसार का बोझ अपने ऊपर उठाए हुए हैं उसको त्याग देना चाहिए, इसी को योग कहा गया है । |
| 445. |
सांसारिक विचारों से बोझ रहित होने पर फिर शांति हमारे भीतर से निकलेगी । |
| 446. |
अपने मन को संतुलन में साधने की कला हमें सीखनी चाहिए । |
| 447. |
संसार में रहते हुए भी जितना एकांत का हम अनुभव करेंगे, उतना ही हमारा मन स्थिर होता चला जाएगा । |
| 448. |
बाजार में और मार्ग में हमें बहुत सारे लोग दिखते हैं पर हम उन्हें याद नहीं रखते क्योंकि हमारा उनसे कोई संबंध नहीं होता । इसी तरह मन में आने वाले विचारों से हमें संबंध नहीं रखना चाहिए । |
| 449. |
जो मन की उपेक्षा करना सीख जाएगा उसका मन शीतलता का अनुभव उसे देगा । |
| 450. |
जीवन में अच्छा बनना है तो हमें अपनी आदत अच्छी बनानी होगी और अच्छे विचार सुनने होंगे । |
| 451. |
जीवन में अपनी बुरी आदतों को सुधारना सबसे कठिन कार्य है । |
| 452. |
किसी भी उम्र में हमें आदत सुधारने का मौका मिले तो उसे तत्काल करना चाहिए । |
| 453. |
अत्यंत संवेदनशील लोगों में अति भावुकता होती है जो उन्हें भक्ति मार्ग में बहुत सहयोग देती है । |
| 454. |
हमारे संत और भक्त चलते-फिरते अध्यात्म के विद्यालय के समान हैं । |
| 455. |
हम कर्म करें पर ऐसा करें कि करते समय मन में अशांति नहीं आए । |
| 456. |
एक होता है विचार, एक होता है सही विचार । एक होता है प्रयास, एक होता है सही प्रयास । हमें सही विचार और सही प्रयास की तरफ बढ़ना चाहिए । |
| 457. |
एक व्यक्ति प्रयत्नशील तो होता है पर सही दिशा में प्रयत्न नहीं करता है तो जीवन में उसे सफलता नहीं मिलती । |
| 458. |
प्रयत्न करने के लिए प्रयत्न का शास्त्रों में जो तरीका बताया गया है उसका हमें पालन करना चाहिए । |
| 459. |
सही तरह से विचार किए बिना योग्य निर्णय जीवन में कभी प्राप्त नहीं होते । |
| 460. |
मृत्यु के बाद हमारा क्या हश्र होगा, इसका कभी तो हमें विचार करना चाहिए । |
| 461. |
हमारे श्रीग्रंथ हमें अध्यात्म के विचार भी देते हैं और प्रभु के लिए प्रेम भाव भी देते हैं । हमारे अंदर अध्यात्म के विचार और प्रभु के लिए प्रबल प्रेम भाव का सही संतुलन होना चाहिए । |
| 462. |
आत्म चिंतन करते हुए हमें अपने मन से प्रश्न पूछना चाहिए कि मैं कौन हूँ और मेरा परम कर्तव्य क्या है ? |
| 463. |
हमारे मन की जो सांसारिक वासनाएं और कामनाएं हैं उन्हें छोड़ने की आवश्यकता है यानी उन्हें त्यागने की आवश्यकता है । |
| 464. |
हमें प्रेरणा देने वाली हमारी ज्ञान इंद्रियां होती है और उसका संचालन हमारे मन के पास होता है । |
| 465. |
हमें आध्यात्मिक साधना करते समय भोगों का चिंतन और संसार का चिंतन नहीं करना चाहिए । |
| 466. |
अगर हमसे कोई आध्यात्मिक गलती हो जाए तो उसका दंड हमें अपने मन को देना चाहिए । |
| 467. |
सांसारिक विकारों के कारण हमारी बुद्धि कभी प्रभावित नहीं होनी चाहिए, यह केवल भक्ति से ही संभव है । |
| 468. |
साधकों को अपने बीच में भगवत् चर्चा करते रहना चाहिए, इससे साधकों का आध्यात्मिक विकास होता है । |
| 469. |
बाहर का कोई व्यक्ति उपदेश करे, इससे अच्छा है हमारा मन ही हमें उपदेश करे जिससे वह शांत हो जाए । |
| 470. |
हमने अपने मन को अगर नहीं जीता तो संसार में कुछ भी जीत लिया वह व्यर्थ ही है । |
| 471. |
हमारा मन हमारा सही मार्गदर्शन करे, ऐसा सामर्थ्य मन को केवल भक्ति ही देती है । |
| 472. |
कैसे भी हमारा जीवनमुक्त जीवन होना चाहिए, इसका आग्रह हमारे श्रीग्रंथ और संत करते हैं । |
| 473. |
श्री ध्रुवजी को प्रभु ने भगवत् दर्शन दिए और उन्हें ध्रुवलोक दिया और श्री ध्रुवजी ने दिखाया कि छह महीने की प्रबल साधना से क्या कुछ नहीं हो सकता । |
| 474. |
हमारे मन में इतने सारे विकार जन्म लेते हैं और मन में कहाँ-कहाँ बैठे रहते हैं, इसका हमें पता भी नहीं चलता । |
| 475. |
हमारे अंतःकरण को वासना और विकारों से मुक्ति पाने के लिए भक्ति की परम आवश्यकता है । |
| 476. |
चित्त को अन्यत्र जाने से कैसे रोका जाए ? उसे रोकने का एक ही उपाय है प्रभु की भक्ति । |
| 477. |
जब मन शुद्ध होता है तो हमारे प्राण भी शुद्ध होते हैं । |
| 478. |
हमारा मन शुद्ध और शांत रहे, इसका प्रयास हमें जीवन में करना चाहिए । |
| 479. |
कुछ समय संसार से खाली रहने का भी अभ्यास जीवन में करना चाहिए । उस समय को सिर्फ प्रभु को देना चाहिए । |
| 480. |
कुछ समय प्रभु को देने में कोई कठिनाई नहीं लगती पर जब हम ऐसा करते हैं तो भयंकर कठिनाई होती है क्योंकि यह सबसे कठिन है कि मन संसार से हटाकर प्रभु को अर्पित किया जाए । |
| 481. |
जो जीव संसार में बुरी तरह से फंसा हुआ है उस जीव को भक्ति करना बहुत कठिन लगता है । |
| 482. |
भक्ति करने से ही शांति का प्रवाह हमारे भीतर से फूटेगा । |
| 483. |
प्रभु श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहते हैं कि कुछ भी चिंता मत करो और मेरी शरण में आ जाओ । |
| 484. |
संसार की उठा-पटक में कुछ नहीं करने की इच्छा करने पर हमें परम शांति का अनुभव होने लगता है । |
| 485. |
आने वाली श्वास और जाने वाली श्वास को नाम जप के दौरान एकाग्र करने से चित्त शांत हो जाता है । |
| 486. |
हमारे ऋषियों ने बहुत सारे अध्यात्मिक अभ्यास हमें जीवन में करने के लिए बताए हैं । |
| 487. |
हमारे श्रीग्रंथ हमारे पूरे जीवन को परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं । |
| 488. |
किसी भी चीज का अभ्यास दृढ़ संकल्प के बिना नहीं हो सकता । |
| 489. |
कर्मकांड और क्रियाकांड से भी ऊपर भक्ति का स्थान है । |
| 490. |
एकांत में बैठकर प्रभु के श्रीकमलचरणों के ध्यान का अभ्यास करना चाहिए । |
| 491. |
हमें किसी को उपदेश नहीं करना चाहिए, सर्वप्रथम अपने मन को ही उपदेश करना चाहिए । |
| 492. |
हमारा मूल आधार हमारा मन प्रभु को समर्पित होना है । |
| 493. |
मन को साधने वाला, मन को साधना में लगाने वाला साधन केवल भक्ति ही है । |
| 494. |
हम मन को भक्ति के लिए समझाने की शुरुआत करते हैं तो प्रभु जरूर उसमें सहायक बन जाते हैं । |
| 495. |
हमें सिर्फ मन के आवेग में नहीं बहना चाहिए । |
| 496. |
हमारा मन संसार में इतना डूबा हुआ है कि हमें भक्तिरूपी जल से उसकी सफाई करनी पड़ती है । |
| 497. |
जब मन का सही उपयोग किया जाता है तो हम पाते है कि हमारा मन बड़ा बलवान और क्षमतावान है । |
| 498. |
साधना करने वाला व्यक्ति रोज अपने मन के एक-एक विकार का त्याग करते हुए जीवन में चलता है । |
| 499. |
भक्ति के मार्ग में मिलने वाली सिद्धियों का परमार्थ के साथ कोई संबंध नहीं होता । इसलिए भक्त सिद्धियों को स्वीकार नहीं करते । |
| 500. |
हमारे श्रीग्रंथ हमारे अज्ञान और संदेह को दूर करते हैं और हमें निस्संदेह बनाकर छोड़ते हैं । |
| 501. |
भक्ति करके सिद्धियां चाहने वालों को सिद्धियां तो मिल जाती हैं पर प्रभु नहीं मिलते । |
| 502. |
जीवन मुक्ति के मार्ग पर जो जीव चलता है उसे उसकी कल्पना से बाहर का फायदा मिलता है । |
| 503. |
संसार में रहकर एकांत में प्रभु का ध्यान किए बिना हमारी सांसारिक वासनाएं नष्ट नहीं होती । |
| 504. |
शास्त्र कहते हैं कि दृश्य दिखाने वाले को देखो, सब कुछ जानने वाले को जानो । अर्थ यह है कि प्रभु को ही देखना चाहिए और प्रभु को ही जानना चाहिए । |
| 505. |
भक्ति से जब हम प्रभु का चिंतन करेंगे तो हमारा मन वासनाओं का निरोध करना सीख जाएगा । |
| 506. |
हमारा संघर्ष स्वयं का स्वयं के साथ ही सबसे ज्यादा होता है । दूसरे के साथ संघर्ष करने पर हम अपना पूरा जोर लगा देते हैं पर अपने साथ संघर्ष करने पर हम ढीले पड़ जाते हैं । |
| 507. |
आहार-विहार का नियंत्रण करना भक्ति में बड़ा लाभदायक होता है । |
| 508. |
आध्यात्मिक शास्त्र का कोई-न-कोई श्रीग्रंथ हमें रोजाना जरूर पढ़ते रहना चाहिए । |
| 509. |
मानव कल्याण हेतु प्रभु श्री रामजी ने और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपने अवतार काल में दिखाया कि समस्याएं उनके जीवन में भी खूब रही हैं पर उन्होंने अपने मनोबल से उसे जीता । |
| 510. |
संत कहते हैं कि श्री रामचरितमानसजी के श्री अयोध्या कांड पढ़ने पर प्रभु का वन गमन देखने पर चित्त अशांत हो जाता है फिर श्री भरतलालजी का चरित्र सुनते हैं तो चित्त को तुरंत शांति मिल जाती है । श्री भरतलालजी जैसे संत का इतना बड़ा प्रभाव होता है । |
| 511. |
श्री हनुमान चालीसाजी ध्यान मग्न होकर पढ़ने से तुरंत चित्त को शांति मिलती है, ऐसा संतों का अनुभव रहा है । |
| 512. |
शांति से बैठकर प्राणायाम करने से चित्त शांत होता है । प्राण और मन का संबंध है इसलिए प्राण को स्थिर किया तो मन भी स्थिर हो जाता है । |
| 513. |
हमारे शास्त्रों में हर विधान और सिद्धांत हमारे मंगल के लिए ही निहित किया गया है । |
| 514. |
जिसको वासनाएं सबसे प्रिय हों उसे कुछ समय के लिए उसे छोड़ने का अभ्यास करना चाहिए । जैसे एकादशी में, अमावस्या में, नवरात्रि में, श्रावण मास में, चातुर्मास में अपनी वासनाओं को शांत करने का नियम लेना चाहिए । सिद्धांत यह है कि अगर कुछ समय के लिए भी हम वासनाएं छोड़ सकते हैं तो फिर हमेशा के लिए भी छोड़ सकते हैं । |
| 515. |
सत्संग करने से उतने समय के लिए हम नकारात्मक विचार से बचे रहते हैं । |
| 516. |
हमें जीवन में आत्म विचार और आत्म मंथन करना चाहिए । विचार के छोटे-छोटे कण में जीवन की महानता छिपी हुई होती है । |
| 517. |
जिस संसार में हम निवास करते हैं उस संसार के दुःख हमें स्पर्श भी करते हैं, उनसे बचने का एक ही उपाय है - प्रभु की भक्ति । |
| 518. |
दीर्घायु होकर सांसारिक जीवन जीने से अच्छा अल्पायु वाला भक्तियुक्त जीवन होता है । |
| 519. |
आत्मज्ञान का श्रवण करने मात्र से कुछ नहीं होता, उसे साधने के लिए समय देकर साधना भी करनी पड़ती है । |
| 520. |
जैसे आकाश में रंग उछाले तो वह किसी भी रंग से निर्लेप रहता है वैसे ही हमारे मन को भी संसार के रंगों से निर्लेप रहना सीखना पड़ेगा । |
| 521. |
प्रलय में सब कुछ प्रभु में समा जाता है और फिर नई सृष्टि के समय सब कुछ प्रभु से उत्पन्न होता है । इससे यह पता चलता है कि जड़ और चेतन सबमें प्रभु का ही वास है । |
| 522. |
प्रभु की हर जीव के ऊपर सदैव असीम कृपा और दया होती है । |
| 523. |
धर्म का पालन करना सभी मानव के लिए अनिवार्य कर्तव्य होता है । |
| 524. |
प्रभु की कृपा के कारण ही हमारा जीवन व्यवस्थित चलता है । |
| 525. |
प्रभु की सृष्टि का इतना विस्तार है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । |
| 526. |
शरीर की मृत्यु होती है, आत्मा सदैव के लिए अमर है क्योंकि वह प्रभु का अंश है । |
| 527. |
हमारे पूर्व जन्मों के कर्म और वासना के कारण हमारे इस जन्म का प्रारब्ध बनता है । |
| 528. |
हमें कर्म और वासना के बंधन से छूटना है तो प्रभु की भक्ति करना अनिवार्य है । |
| 529. |
मन को रुग्ण नहीं होने देना है और संसार के विकारों से बचाना है तो प्रभु की भक्ति करना अनिवार्य है । |
| 530. |
मन को जलाने वाली दो ज्वालाएं हैं । एक चिंतारूपी ज्वाला है और एक आशारूपी ज्वाला है । |
| 531. |
सजीव रहने पर हमें चिंता जलाती है और निर्जीव होने पर चिता जलाती है । |
| 532. |
हमें किसी को देखकर आसक्ति भी नहीं होनी चाहिए, जिसे राग कहते हैं । हमें किसी को देखकर घृणा भी नहीं होनी चाहिए, जिसे द्वेष कहते हैं । |
| 533. |
जीवन में लोभ का होना चिंता का एक बहुत बड़ा कारण होता है । |
| 534. |
चिंता के जो कारण है उसमें राग, द्वेष, लोभ और क्रोध मुख्य हैं जो हमारी आयु का ह्रास करते हैं । |
| 535. |
क्रोध जीव का बड़ा बलवान शत्रु होता है । क्रोध से हम खुद का ही भयंकर बिगाड़ कर लेते हैं । |
| 536. |
काम का अति वेग शरीर और मन को मथ-मथ कर शक्तिहीन कर देता है । |
| 537. |
परम पावन प्रभु से ही हमें प्रेम करना चाहिए और प्रभु का ही भजन करना चाहिए, इससे भक्ति बढ़ती है । |
| 538. |
प्रभु का चिंतन करने से हमारी आयु भी बढ़ती है और हमारा बुरा प्रारब्ध भी मंद पड़ता है । |
| 539. |
भूतकाल का शोक, भविष्य की चिंता नहीं करके जीव को वर्तमान में जीवन जीना चाहिए । |
| 540. |
संतोषी रहने की जीवन में आदत लगानी चाहिए, इसका बहुत बड़ा लाभ शास्त्रों में बताया गया है । |
| 541. |
हमें संसार करते हुए किसी की निंदा और किसी की प्रशंसा में अपने जीवन को नहीं फंसाना चाहिए । |
| 542. |
मन में संसार के आवेग को नहीं आने देना चाहिए और मन को सर्वदा एक स्थिति में संतुलित रखना चाहिए । |
| 543. |
हर काम को शांति के साथ करना चाहिए । अशांति जीवन में नहीं रहनी चाहिए । |
| 544. |
संसार में किसी से ज्यादा लगाव या वैर नहीं रखना चाहिए । |
| 545. |
किसी के आनंद के प्रसंग में मन से आनंदित होकर सहभागी होना और दुःख के प्रसंग में दुःख के बोध के साथ शामिल होना चाहिए । |
| 546. |
आपत्ति काल में प्रभु पर विश्वास पर्वत की तरह अडिग होना चाहिए । |
| 547. |
जीवन को भक्ति का आधार देने पर जीवन आनंदमय हो जाता है । |
| 548. |
जीवन में सबमें भगवत् भाव रखकर सबसे प्रेम करना हमारे दीर्घायु होने की एक परम औषधि है । |
| 549. |
यह संसार हमारे मन के चारों ओर घूमता रहता है और हमारे मन को जकड़ लेता है । |
| 550. |
अपने भीतर स्थित प्रभु आत्मदेव के रूप में पूजित होने चाहिए । |
| 551. |
प्रभु से मांगने जैसा भक्ति के अलावा हमारे जीवन में कुछ भी नहीं होना चाहिए । |
| 552. |
हमें जीवन में कोई पाप नहीं करना चाहिए और अपने जीवन को पापमुक्त रखना चाहिए । |
| 553. |
जीवन में इस अज्ञान को त्याग देना चाहिए कि मैं प्रभु से भिन्न हूँ क्योंकि हमारे भीतर प्रभु तत्व है, यही हमारा मूल स्वरूप है । |
| 554. |
भोजन करते समय यह अभिव्यक्ति होनी चाहिए कि प्रभु से प्राप्त, प्रभु को भोग लगाकर, उसका अंश मैं प्रसाद के रूप में पा रहा हूँ । |
| 555. |
प्रभु की कृपा होने पर परमार्थ में जितनी सरलता से भक्ति प्राप्त हो जाती है उतनी सरलता से कुछ भी अन्य प्राप्त नहीं होता । |
| 556. |
हमारे चित्त का संसार में लय नहीं होने देना चाहिए । |
| 557. |
संसार का कार्य भी होता रहे और चित्त शांत रहे, ऐसी उपलब्धि केवल भक्ति से ही संभव है । |
| 558. |
संसार का दुःख कभी खत्म होने वाला नहीं है । उस दुःख से अपने आपको निकालने का एक ही उपाय है – प्रभु की भक्ति । |
| 559. |
अपने चित्त पर विजय प्राप्त करना ही सच्चा कर्मयोग है । |
| 560. |
गृहस्थ के कर्तव्यों को निभाते हुए परमार्थ का कार्य हमें करना चाहिए । |
| 561. |
कभी भी कुछ ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे हमारे द्वारा जीवन में धर्म की हानि हो । |
| 562. |
श्री योग वशिष्ठजी कर्म और पुरुषार्थ का आग्रही श्रीग्रंथ है । सोलह वर्ष की आयु में इसे सुनने के बाद जो पुरुषार्थ प्रभु श्री रामजी ने अपने जीवन काल में किया वह सबके लिए सदैव के लिए प्रेरणास्त्रोत बनकर रह गया । |
| 563. |
युवावस्था का उत्तर काल चालीस वर्ष की अवस्था से आरंभ होता है और अध्यात्म की तरफ ध्यान देने का यह अंतिम मौका होता है । इसके बाद शरीर धीरे-धीरे क्षीण होता चला जाता है । |
| 564. |
आध्यात्मिक शास्त्रों में रस लेना हमें सीखना चाहिए तभी आध्यात्मिक ज्ञान हमारे भीतर जागृत होगा । |
| 565. |
संसार का खेल कितने दिन खेलेंगे, एक समय जीवन में ऐसा आना चाहिए जो हमें अध्यात्म की तरफ मोड़ दे । |
| 566. |
अधिक-से-अधिक प्रभु का ध्यान हमें संसार से निष्काम होने के लिए करना चाहिए । |
| 567. |
जो जीवन में नित्य प्रभु का ध्यान करते हैं वे जीवन में तनावमुक्त रहते हैं । |
| 568. |
हमें अपने विकारों और वासनाओं पर विजय प्राप्त करने के लिए भक्ति की परम आवश्यकता होती है । |
| 569. |
सिद्धांत के तौर में मानना चाहिए कि जितना समय हम अध्यात्म को देंगे उतना ही हमारे लिए श्रेष्ठ है । |
| 570. |
शरीर के रोग को व्याधि कहते हैं और मन के रोग को आधि कहते हैं । इन दोनों से भक्ति के कारण जागृत मनोबल से ही बचा जा सकता है । |
| 571. |
जो विकार हमारे भीतर बैठे हुए हैं वे हमारे प्राणों की शक्ति पर प्रभाव करते हैं और व्याधि के रूप में शरीर रोग के रूप में हमें दिखाई देते हैं । |
| 572. |
आरोग्य शास्त्र का सिद्धांत है कि जितना तनावमुक्त हम रहेंगे उतना ही आधि और व्याधि से बचे रहेंगे । |
| 573. |
हमें अपने मन के संतुलन को बिगड़ने नहीं देना चाहिए, ऐसा करने का भक्ति श्रेष्ठ उपाय है । |
| 574. |
हमें जीवन में रोज मंत्र जाप, नाम जप और श्रीदेव पूजा करनी चाहिए । श्री योग वशिष्ठजी का सिद्धांत है कि इनका त्याग जीवन में कभी नहीं करना चाहिए । |
| 575. |
अपने मन पर नियंत्रण करना शास्त्रों में सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है । |
| 576. |
शुद्ध पुण्य का अर्थ है कि जिस पुण्य से हम कोई अपेक्षा नहीं रखते और निष्काम भाव से करते हैं । |
| 577. |
शास्त्रों में गृहस्थ आश्रम में कर्मकांड करने के लिए आदेश दिया हुआ है । |
| 578. |
निष्काम भाव से पूजन किया यानी प्रभु की प्रसन्नता के लिए प्रभु की पूजा की तो वह सर्वश्रेष्ठ पूजा होती है । |
| 579. |
अग्नि में तपा सोना जैसे शुद्ध हो जाता है वैसे ही हमें शुद्ध मन और शुद्ध धन से प्रभु की पूजा करनी चाहिए । |
| 580. |
संसार बहुत कर लिया, जब मन ऐसा कहे तो वह हमारे जीवन की श्रेष्ठ घड़ी होती है क्योंकि तब अध्यात्म की तरफ हम मुड़ सकते हैं । |
| 581. |
अपने कर्तव्य कर्म को छोड़ना अध्यात्म कभी नहीं सिखाता । |
| 582. |
अध्यात्म का अच्छा साधन करने पर जीवन में सच्ची प्रगति होती है । |
| 583. |
वैराग्य भी भक्तिमय नहीं होगा तो वह कल्याण नहीं करेगा । |
| 584. |
अध्यात्म को समझकर वैराग्य लेना उत्तम वैराग्य होता है । |
| 585. |
वैराग्य ले लिया और भक्ति का उदय जीवन में नहीं हुआ तो वह वैराग्य अपूर्ण है । |
| 586. |
जीवन में वास्तव में जब तक हम त्याग योग्य चीजों को नहीं छोड़ेंगे हमें शांति नहीं मिल सकती । |
| 587. |
श्री वेदजी का सिद्धांत है कि “मेरा” के साथ “मैं” का भी त्याग होना चाहिए यानी अहंकार का त्याग ही मुख्य त्याग है । |
| 588. |
भक्ति कभी यह नहीं सिखाती कि कर्तव्य से हम मुँह मोड़ लें । |
| 589. |
सच्चा आत्मज्ञान प्राप्त करने के बाद किसी भी तरह का शोक या मोह हमारे चित्त में नहीं रहता । |
| 590. |
मन पर विजय हुई कि वह जीव जीवनमुक्त हो गया । |
| 591. |
जीवनमुक्ति के बाद गृहस्थ में कर्तव्य कर्म पूरा करना कोई बाधा नहीं है क्योंकि फिर वह जीव कर्म में फंसता नहीं है । वह यह सोचता है कि मैं कर्म करने वाला नहीं हूँ, कर्म प्रभु करवा रहे हैं, मैं तो बस निमित्त मात्र हूँ - यह भावना आ जाती है । |
| 592. |
भक्ति का कर्तव्य कर्म के साथ कोई विरोध नहीं है । |
| 593. |
सारा-का-सारा संसार एक परमात्मा का ही रूप है । अविद्या और अज्ञान के कारण हम इसे समझ नहीं पाते । |
| 594. |
सच्चा साधक वह है जो आत्मज्ञान के लिए साधन करता है और उसके लिए संसार का सुख छोड़ देता है । |
| 595. |
विषयों की तरफ आकर्षित करने वाली क्रिया, भक्तों को कभी आकर्षित नहीं करती । |
| 596. |
संतोष धारण करते हुए जीवन में अध्यात्म ज्ञान की जिज्ञासा होनी चाहिए । |
| 597. |
श्रीग्रंथों का अध्ययन और सत्संग से हमें अपने आत्मज्ञान को पुष्ट करना चाहिए । |
| 598. |
संसार की चिंता के कारण जीव अत्यंत चिंता करने का स्वभाव बना लेता है । |
| 599. |
आत्मज्ञान की प्राप्ति में एकांत और मौन बड़ा उपयोगी साधन है । |
| 600. |
भक्ति करने से हमारी संसार की वासनाएं ढ़ीली पड़ने लगती है । |
| 601. |
हमारे भीतर प्रभु के लिए जिज्ञासा जन्में बिना हमारा कल्याण नहीं है । फिर वह जिज्ञासा शास्त्र अध्ययन, सत्संग और चिंतन से निरंतर शांत होती जाती है । |
| 602. |
हमें समझना चाहिए कि हम चेतन स्वरूप हैं क्योंकि एक चैतन्य प्रभु के अलावा पूरे ब्रह्मांड में किसी का भी कोई अस्तित्व ही नहीं है । |
| 603. |
जो आत्मज्ञानी हो जाता है वह अध्यात्म की सर्वोच्च अवस्था तक भी पहुँच जाता है । |
| 604. |
हमारी आत्मा परमात्मा स्वरूप है इसलिए परमात्मा के साथ एकरूप होने के लिए उपयुक्त है पर परमात्मा में लीन होने लायक अवस्था भक्ति करके हमें लानी पड़ती है । |
| 605. |
जीव को अलग-अलग प्रकार की, अलग-अलग चीजों की, अलग-अलग भोगों की इच्छा होती रहती है इसलिए हमें हमारी इंद्रियों का लाड़ नहीं करना चाहिए । |
| 606. |
हमारा पुण्यकर्म और पापकर्म हमारे अगले जन्म के प्रारब्ध को निर्धारित करते हैं । |
| 607. |
धैर्य नाम के अंकुश से ही भोगरूपी हाथी को परमार्थ की सीढ़ी चढ़ते हुए हमें वश में रखना चाहिए । |
| 608. |
बाहर का कर्तव्य त्याग किए बिना हमें भीतर से परमार्थ की तरफ मुड़ जाना चाहिए । |
| 609. |
जीवन में आत्मज्ञान का सूर्योदय होने के बाद अज्ञान के मेघ छंट जाते हैं । |
| 610. |
साधारण व्यक्ति के जीवन को परम धन्य कर दे ऐसा उपदेश प्रभु श्री रामजी ने अपने अज्ञान की मानव लीला करके जनकल्याण हेतु ऋषि श्री वशिष्ठजी से प्रकट कराया । श्री योग वशिष्ठजी का विश्राम होने पर सब तरफ से प्रभु श्री रामजी के लिए लगातार जय-जयकार होने लगी और जयघोष होने लगा । |
| 611. |
हम चेतनमय प्रभु के अंश हैं इसलिए हमारे साथ जीवन में सदैव अच्छा ही होगा, यह विश्वास जीवन में निरंतर रखना चाहिए । यह अंतिम टिप्पणी ऋषि श्री वशिष्ठजी ने अपने ज्ञान उपदेश के बाद श्री योग वशिष्ठजी में की । |
| 612. |
श्री योग वशिष्ठजी के उपदेश के बाद और प्रभु श्री रामजी के आशीर्वाद से संसार धन्य हो गया, संसार अध्यात्म ज्ञान से परिपूर्ण हो गया । |
| 613. |
प्रभु श्री रामजी ने श्री योग वशिष्ठजी के अंत में प्रतिपादन किया कि संसार में आत्मज्ञान से बढ़कर कुछ भी नहीं है । |
| 614. |
श्री योग वशिष्ठजी के विश्राम पर प्रभु श्री रामजी की जय-जयकार करते हुए सिद्ध पुरुष पुष्पों की वृष्टि करते हुए अपने-अपने गंतव्य को चले गए । |
| 615. |
बाहर और भीतर से सारा संसार और उसमें उठने वाली वृत्तियां हमारे आनंद को प्रभावित नहीं करे, मन को अशांत नहीं करे, यह युक्ति योग कहलाती है । |
| 616. |
प्रभु के लिए और प्रभु के प्रिय भक्तों के लिए कभी भी उपेक्षा की बुद्धि नहीं रखनी चाहिए । |
| 617. |
प्रभु श्री रामजी का बाहरी और भीतरी वर्णन जैसा श्री वाल्मीकि रामायणजी में हुआ है वैसा अन्य कहीं नहीं मिलेगा । आदर्श पुरुषोत्तम प्रभु श्री रामजी का संपूर्ण वर्णन यही पर मिलेगा । |
| 618. |
वासना रहित जीवन हो जाना सामान्यतः संभव नहीं है क्योंकि वासना के लिए ही हम कर्म करते हैं और वासना ही हमसे कर्म करवाती है । पर वासना के रूप में शुभ वासना रहे, अशुभ वासना का नाश हो, यही सही मार्ग है । |
| 619. |
हमारे मन में उठने वाली अशुभ वासना पर हम विजय प्राप्त कर लें तो यह सच्चा पुरुषार्थ है । |
| 620. |
व्यक्तित्व के निखार के लिए किस तरह का ज्ञान, किस तरह का आदर्श जीवन में होना चाहिए जिससे विपत्ति काल में अशांति नहीं हो, इसको प्रतिपादन करने वाला श्रीग्रंथ श्री योग वशिष्ठजी है । |
| 621. |
हमारे अध्यात्म के श्रीग्रंथ हमारी भोग इच्छा को अनिच्छा में बदल देते हैं । |
| 622. |
सर्वोच्च धन्य करने वाला श्रीग्रंथ श्रीमद् भगवद् गीताजी है । |
| 623. |
सारे संसार में भारतीय संस्कृति सर्वोच्च और सर्वोत्तम है क्योंकि भारतीय ऋषियों ने जो मानव जीवन की संकल्पना की है वह अद्वितीय है । |
| 624. |
मानव जीवन का सबसे गहरा और व्यापक विचार भारतीय धर्म में किया गया है जो कि अदभुत है इसलिए भारतीय संस्कृति अतुलनीय है और सर्वोत्तम है । |
| 625. |
भारतीय ऋषियों ने धर्म, अर्थ काम और मोक्ष के रूप में चार सबसे व्यापक लक्ष्य जीवन के तय किए । |
| 626. |
प्राचीन भारतवर्ष सदैव से वैभवशाली और गौरवशाली रहा है । |
| 627. |
भारतीय संस्कृति में अर्थ और काम के लिए प्रयास करना चाहिए पर धर्म का पहला चिंतन होना चाहिए । धर्म के नियम से अर्थ कमाओ, धर्म के नियम से कामनाओं की पूर्ति करो, ऐसी उत्कृष्ट विचारधारा है । |
| 628. |
शरीर का अंतिम सत्य मिट्टी में मिलने का ही है । कैसे भी मिले, मिलना मिट्टी में ही है । |
| 629. |
मनुष्य जीवन में जीवन रहते दुःख से मुक्ति को भी एक प्रकार का मोक्ष कहा गया है । मोक्ष को एक पुरुषार्थ माना गया है । |
| 630. |
हमारे ऋषियों ने धर्म, अर्थ काम और मोक्ष के रूप में हमें लक्ष्य ही नहीं दिए बल्कि उसे पाने का संपूर्ण विधान भी बताया है । |
| 631. |
हमारे ऋषियों ने जीवन के समय का विभाजन भी बड़ा सुंदर किया है और चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के रूप में बनाए हैं । |
| 632. |
भारतीय ऋषियों ने हमें जो दिया है उसके लिए सदैव उनके लिए हमारे मन में नमन का भाव होना चाहिए । |
| 633. |
उच्च और नीच का विचार भारतीय संस्कृति में और भारतीय ऋषियों ने कभी भी नहीं किया । |
| 634. |
आध्यात्मिक उन्नति के लिए भक्ति, ज्ञान, योग और कर्म - यह चार साधन बताए हैं । सबको पूरी स्वतंत्रता दी है कि किसी को भी चुने और सबका मिश्रित रूप भी चुनने का विकल्प दिया है । |
| 635. |
सोलह स्तंभों पर खड़ी है प्राचीन भारतीय संस्कृति । चार स्तंभ हैं – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । चार स्तंभ हैं – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास । चार स्तंभ हैं – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । चार स्तंभ हैं – भक्ति, ज्ञान, योग और कर्म । |
| 636. |
श्री महाभारतजी एक लाख श्लोकों का विजय का श्रीग्रंथ है । इसका छोटा प्रारूप श्रीमद् भगवद् गीताजी है जिसमें श्री महाभारतजी के सभी सिद्धांतों का प्रतिबिंब छोटे से रूप में आ गया है । इसलिए श्रीमद् भगवद् गीताजी विश्व का महानतम श्रीग्रंथ है । |
| 637. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी श्री महाभारतजी का सार है और श्री महाभारतजी श्रीमद् भगवद् गीताजी का विस्तार है । |
| 638. |
संसार के हर जीव को कल्याण का मार्ग बताने के लिए प्रभु ने अल्प समय में दिव्य और संपूर्ण उपदेश दिया । अत्यंत अल्प समय यानी चालीस मिनट में प्रभु ने श्री अर्जुनजी को पूरी बात कही । प्रभु श्री वेदव्यासजी ने इस चालीस मिनट के विवरण को लिपिबद्ध करके हमारे लिए अठारह अध्याय में श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में उपलब्ध कराया । |
| 639. |
भारतीय संस्कृति में श्रीमद् भगवद् गीताजी को अंबा यानी माता कहा गया है । |
| 640. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी के इतने अल्प शब्दों में इतना सारा ज्ञान प्रभु का एक चमत्कार ही तो है, ऐसा सभी टीकाकार मानते हैं । |
| 641. |
सबसे ज्यादा संख्या में किसी श्रीग्रंथ पर भाष्य लिखा गया है तो वह श्रीमद् भगवद् गीताजी है । |
| 642. |
जीवन के आरंभ से प्रभु प्राप्ति तक का मार्ग बताने वाला श्रीग्रंथ श्रीमद् भगवद् गीताजी है । |
| 643. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी की तुलना करने वाला दूसरा कोई श्रीग्रंथ नहीं है इसलिए संत इसे अद्वितीय कहते हैं । |
| 644. |
प्रभु श्री कृष्णजी ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में भक्ति, ज्ञान, कर्म और योग का पूरा समन्वय किया है । |
| 645. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु ने ज्ञान को भी भक्ति रस से घोलकर इतना मधुर बना दिया कि जैसे एक छोटे बच्चे को कोई दवाई मीठी चीज में मिलाकर दे दी जाए तो वह ले लेता है । |
| 646. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी के सबसे रसीले भाव का निरूपण संत श्री ज्ञानेश्वरजी ने किया है । |
| 647. |
अध्यात्म में जिनकी रुचि नहीं है वे भी साहित्य के सौंदर्य के कारण श्रीमद् भगवद् गीताजी की तरफ आकर्षित हो जाते हैं । |
| 648. |
भारतवर्ष का मूल प्राण ही धर्म पर टिका हुआ है । |
| 649. |
संतों का कार्य है कि संसार और हमारे श्रीग्रंथ और शास्त्रों के बीच सेतु का कार्य करना । जैसे नदी के दो किनारों को जोड़ने वाला सेतु होता है वैसे ही संत सेतु बनकर संसार और शास्त्रों को जोड़ देते हैं । |
| 650. |
संत भ्रमण करके प्रभु की भक्ति का प्रचार करते हैं । |
| 651. |
भारतवर्ष के संतों ने अपनी बुद्धि का उपयोग संसार की कमाई के लिए नहीं किया बल्कि तप और आध्यात्मिक विद्या अर्जन करने के लिए किया । |
| 652. |
भारतवर्ष में सबसे बड़ा सम्मान धर्मयुक्त संन्यासी को दिया जाता है और उनका बहुत महत्व और सम्मान होता है । |
| 653. |
मनुष्य निर्णय पहले ले लेता है फिर अपने निर्णय को सही ठहराने के लिए तर्क का निर्माण करता रहता है जो कि गलत है । |
| 654. |
अपने योगक्षेम की पूर्ति के लिए पक्का-से-पक्का विश्वास प्रभु पर होना चाहिए । |
| 655. |
असंभव लगने वाली बातें भी प्रभु कृपा से सदैव संभव हो जाती है । |
| 656. |
प्रभु में प्रगाढ़ विश्वास हो तो सभी दुर्गम कार्य संपन्न हो जाते हैं । |
| 657. |
शास्त्रों से हमारी बुद्धि का परिष्कार हो जाता है । |
| 658. |
संत कितनी आपदा सहकर भी शांत रहते हैं और शांत रहना उनका स्वभाव बन जाता है । |
| 659. |
प्रभु श्री रामजी के श्रीचरित्र में मर्यादा के अदभुत दर्शन हमें होते हैं । |
| 660. |
ओ३म् (ॐ) को प्रभु का सर्वमान्य आधार नाम माना गया है । श्री वेदजी और सभी श्री पुराणों में यह प्रभु का आदि नाम है । |
| 661. |
प्रभु और माता के सभी नाम एक समान मंगलकारी और कल्याणकारी होते हैं । |
| 662. |
ओ३म् (ॐ) एक अक्षर ब्रह्म है । |
| 663. |
वैदिक परंपरा में ओ३म् (ॐ) का उच्चारण सर्वप्रथम होना चाहिए । हर वेद मंत्र के आरंभ में ओ३म् (ॐ) का उच्चारण यानी हर मंत्र ओ३म् (ॐ) के उच्चारण से ही शुरू होता है । |
| 664. |
कोई भी यज्ञ या महान कार्य के इत्यादि के आरंभ में भी ओ३म् (ॐ) का उच्चारण करना चाहिए । |
| 665. |
कोई भी करने वाला कर्म अगर प्रभु के लिए किया जाता है तो वह योग बन जाता है । |
| 666. |
श्री ज्ञानेश्वरीजी की ओवियां दृष्टांतों से भरी हुई श्रेष्ठतम भाष्य रूपी रत्न हैं । |
| 667. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी ने श्री ज्ञानेश्वरीजी के मंगलाचरण में सबसे पहले आत्मरूप प्रभु को प्रणाम किया है । |
| 668. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी के चिंतन करने से हमें आत्म रत्न मिलता है । |
| 669. |
प्रभु से निस्वार्थ प्रेम करने वाले जीव का अध्यात्म स्तर ही अलग होता है । |
| 670. |
जीवन में सच्चाई यह है कि जीव सर्वाधिक प्रेम अपने स्वयं से करता है । जब स्वयं से ज्यादा प्रेम प्रभु से किया जाता है तो ही हमारा कल्याण होता है । |
| 671. |
हमने सारे संसार को जानने का प्रयास किया पर प्रभु को जानने का प्रयास नहीं किया । यही हमारा दुर्भाग्य होता है । |
| 672. |
किसी भी साधना से कष्ट या दुविधा नहीं मिटती । वह तभी मिटती हैं जब हम साधना करके अपने भीतर की यात्रा करते हैं और प्रभु तक पहुँचते हैं । |
| 673. |
साधना के बहुत ऊँचे स्तर पर कुछ नहीं करना होता है, कहीं भी नहीं जाना पड़ता है । जो आत्मानंद प्रभु हमारे भीतर हैं वहाँ तक ही पहुँचना होता है । |
| 674. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी ने आत्मरूप में स्थित प्रभु की वंदना की है । मैं हूँ, मेरा अस्तित्व है, यह सभी मानते हैं, नास्तिक भी ऐसा मानते हैं । इसलिए संत श्री ज्ञानेश्वरजी ने आत्मानंद प्रभु की ही वंदना की है । |
| 675. |
स्वयं को जान लिया कि मैं प्रभु का अंश हूँ, प्रभु मेरे भीतर स्थित हैं तो वह घड़ी मुक्ति की घड़ी होती है । |
| 676. |
किसी भी श्रीग्रंथ का श्रवण करने वाला उत्तम अधिकारी, मध्यम अधिकारी और मंद अधिकारी हो सकता है । उत्तम अधिकारी के लिए हर श्रीग्रंथ में कुछ श्लोक में सार छुपाया गया होता है जिससे वे उस श्रीग्रंथ के कुछ श्लोक से ही पूरी बात को समझ जाते हैं । बाद बाकी सभी श्लोक उस सार के विस्तार के लिए मध्यम अधिकारी और मंद अधिकारी के लिए होते हैं । |
| 677. |
श्री ज्ञानेश्वरीजी की पहली ओवी में ही उत्तम अधिकारी के लिए पूरा सार छिपा हुआ है । |
| 678. |
ब्रह्मांड में सर्वाधिक महत्व हमारे भीतर स्थित आत्म स्वरूप प्रभु का ही है । |
| 679. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी के सभी भाष्यों में श्री ज्ञानेश्वरीजी का अपना एक अलग ही स्थान है । |
| 680. |
प्रभु का स्वरूप कैसा है ? प्रभु का स्वभाव कैसा है ? प्रभु का प्रभाव कैसा है ? यह जानने के लिए ही हमारे सभी श्रीग्रंथ हमें प्रभु के विषय में बताते हैं । |
| 681. |
किसी भी कार्य को करने से पहले सबसे पहले यह जांचना चाहिए कि क्या यह कार्य शास्त्र प्रतिपादित है । |
| 682. |
जिनकी मन से कल्पना नहीं की जा सकती पर जो मन को कल्पना करने की शक्ति देते हैं, जिनको बुद्धि से जाना नहीं जा सकता पर जो बुद्धि को चलाने की शक्ति देते हैं, वे प्रभु हैं । |
| 683. |
आत्मानंद प्रभु हमारे भीतर हैं इसलिए हम भक्ति करके उनका अनुभव कर सकते हैं । |
| 684. |
जब हमारी तर्क बुद्धि विसर्जित हो जाती है तब हम शास्त्रों को समझने के पात्र हो जाते हैं । |
| 685. |
बुद्धि को प्रकाश देने का काम प्रभु श्री गणेशजी करते हैं इसलिए सभी शास्त्रों में उनकी प्रथम वंदना की जाती है । |
| 686. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी का संपूर्ण भाष्य के अलावा भी बहुत सारे विषयों का प्रतिपादन श्री ज्ञानेश्वरीजी में किया गया है । इसलिए श्री ज्ञानेश्वरीजी को श्रीमद् भगवद् गीताजी का भाष्य मानते हुए भी एक स्वतंत्र श्रीग्रंथ माना जाता है । |
| 687. |
वैदिक साहित्य सबसे निर्दोष है क्योंकि मनुष्य की बुद्धि से जो निर्माण होता है उसमें दोष हो सकता है पर प्रभु द्वारा प्रतिपादित श्री वेदजी में कोई दोष नहीं है । |
| 688. |
हमारे सनातन धर्म का पूरा नाम - आर्य सनातन वैदिक हिंदू धर्म है । इसका कोई संस्थापक नहीं है और कोई शुरुआत की तिथि नहीं है क्योंकि इसकी शुरुआत प्रभु से हुई है । |
| 689. |
प्रभु कृपा से प्रभु के जो सिद्धांत हमारे ऋषियों के हृदय में आए वही ज्ञान सनातन धर्म के शास्त्रों में मिलता है । |
| 690. |
प्रभु का अनुभव सिर्फ प्रभु कृपा से ही किया जा सकता है, खुद के पुरुषार्थ से नहीं किया जा सकता । |
| 691. |
हमारे ऋषियों के हृदय में जनकल्याण के अलावा कोई अन्य अभिलाषा नहीं थी । |
| 692. |
हमारे शास्त्रों में ऋषियों ने कभी भी अपने स्वार्थ और अभिलाषा पूर्ण करने के लिए सत्य को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत नहीं किया है । |
| 693. |
मनुष्य द्वारा लिखे हुए साहित्य में दोष होना स्वाभाविक है पर ऋषियों द्वारा प्रभु को अनुभव करके लिखे गए शास्त्रों में कोई दोष नहीं हो सकता । |
| 694. |
हमारे शास्त्र सबसे बड़े प्रमाण हैं क्योंकि उनमें सत्य के सिद्धांत का ही प्रतिपादन हुआ है । |
| 695. |
मानव रचित साहित्य हमें बहका सकते हैं पर हमारे शास्त्र जो हैं वे इतने निर्दोष हैं कि वे बहके हुए जीव को सही मार्ग पर ले आते हैं । |
| 696. |
हमारे शास्त्रों में कोई अगर दोष देखने लग जाए तो उसे अपनी बुद्धि का परिमार्जन करना चाहिए । |
| 697. |
हम शास्त्रों की कुछ बातें समझ नहीं पाए तो यह हमारी बुद्धि का ही दोष होता है । शास्त्रों में कोई दोष या कमी नहीं होती, वे सदैव से पूर्ण थे, पूर्ण हैं और पूर्ण रहेंगे । |
| 698. |
हमारे शास्त्रों में धर्म की मर्यादा को एकदम सही रूप में प्रस्तुत किया गया है । |
| 699. |
अलग-अलग प्रसंगों में हमें प्रभु और माता की भुजाओं के दर्शन होते हैं, कहीं वे द्विभुज, कहीं चतुर्भुज, कहीं बहुभुज के रूप में मिलेंगे । |
| 700. |
प्रभु के एक हाथ में कमल के पुष्प हैं । कमल विवेक का प्रतीक है । जैसे गंदे पानी में रहने के बाद भी कमल गंदे पानी को स्पर्श नहीं करता वैसे ही प्रभु चाहते हैं कि संसार की गंदगी में रहकर भी कमलस्वरूप हमें गंदगी का स्पर्श नहीं हो तभी हम प्रभु को पा सकते हैं । |
| 701. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी का श्रेष्ठतम उपदेश है कि हर परिस्थिति में, हर समय मुस्कुराते रहो और खुश रहो । प्रभु श्री कृष्णजी ने ऐसा करके दिखाया जब उनके ऊपर महाभारत युद्ध की अंतिम और पूर्ण जिम्मेदारी थी और श्री अर्जुनजी शंखनाद के बाद मोहग्रस्त हो गए और धनुष रख दिया । प्रभु के स्थान पर कोई भी होता तो चिंतायुक्त हो जाता पर प्रभु मंद-मंद मुस्कुराते रहे । |
| 702. |
प्रभु के भीतर आनंद रस लबालब भरा हुआ है इसलिए प्रभु के श्रीहोठों पर हर परिस्थिति में मुस्कान ही होती है । |
| 703. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी प्रसन्नता का महाशास्त्र है । श्रीमद् भगवद् गीताजी को सच्चे रूप से पढ़ने वाला सदैव प्रसन्न रहता है । |
| 704. |
परमानंद की प्राप्ति के लिए सदैव हमारे श्रीग्रंथों का श्रवण करना चाहिए । |
| 705. |
जीवन व्यवहार सिखाने में भी भक्ति का कोई विकल्प नहीं है । |
| 706. |
शास्त्रों में भोग का मतलब धर्मनिष्ठ भोग को बताया गया है । |
| 707. |
कर्मकांड से भोगों की प्राप्ति होती है और भक्ति से परमानंद की प्राप्ति होती है । |
| 708. |
कर्मकांड की सभी अर्चनाएं सकाम होती है । अपनी-अपनी कामना की पूर्ति के लिए कर्मकांड से आश्रय लिया जाता है । |
| 709. |
सनातन धर्म में कामना रखता गलत नहीं है, कामना पूर्ति के लिए प्रयास करना गलत नहीं है । गलत सिर्फ धर्म विरुद्ध कामना रखना होता है । |
| 710. |
कामनाओं को छोड़कर परमात्मा की प्राप्ति की इच्छा होने पर जीवन में पूर्णता आएगी । |
| 711. |
कामना पूर्ण हो गई, अब कामनाओं को छोड़कर कामनाओं की पूर्ति करवाने वाले प्रभु की कामना करना ही श्रेष्ठतम कामना है । |
| 712. |
हमें भगवती सरस्वती माता की कृपा से बोलने की शक्ति ऐसी मिलती है कि हमारा बोलना संसार में छा जाता है । |
| 713. |
श्रीमद् देवी भागवतजी में एक ही शक्ति को पांच रूपों में देखा गया है । पराक्रम शक्ति के लिए भगवती दुर्गा माता, वैभव शक्ति के लिए भगवती लक्ष्मी माता, वाक् शक्ति के लिए भगवती सरस्वती माता, तेज शक्ति के लिए भगवती गायत्री माता और आनंद शक्ति के लिए श्रीजी भगवती राधा माता । जिस समय जिस शक्ति की आवश्यकता है उस शक्ति का आह्वान शास्त्रों में बताया गया है । |
| 714. |
प्रभु श्री कृष्णजी जगतगुरु हैं । वे सही समय पर अपने भक्तों को सही बात बता देते हैं । |
| 715. |
एक पेड़ को हरा-भरा रखने के लिए उसकी हर डाली या पत्ते को भिगोना जरूरी नहीं है । मात्र जड़ की सिंचाई से पेड़ हरा-भरा हो जाता है वैसे ही प्रभु की आराधना से सबकी तृप्ति हो जाती है, सबकी आराधना हो जाती है । |
| 716. |
जैसे समुद्र स्नान से सभी नदियों के स्नान का फल मिलता है वैसे ही प्रभु के पूजन से सभी का पूजन हो जाता है । |
| 717. |
जिसने अमृत रस का सेवन कर लिया उसके लिए कौन-सा रस बचता है । वैसे ही जिसने प्रभु की सेवा कर ली उसके लिए कौन-सी सेवा बचती है - कोई भी नहीं । |
| 718. |
हमारी बुद्धि को विकसित करके कम परिश्रम में ज्यादा फल दिलाने की कृपा भगवती सरस्वती माता करती हैं । |
| 719. |
संतों द्वारा बताया जीवन का श्रवण धर्म यह है कि पहले बालपन में श्रीराम कथा सुननी चाहिए क्योंकि मर्यादा और मानव रिश्तों के दृष्टिकोण से श्रीराम कथा सर्वोच्च है । इसलिए श्रीराम कथा बच्चों को पढ़ाने से उनका परम कल्याण निश्चित होता है । फिर युवावस्था में जीवन में संघर्ष के समय श्री महाभारतजी की कथा सुननी चाहिए जिससे कि संघर्ष में हम कैसे विजय प्राप्त कर सकते हैं इसकी यह श्रेष्ठतम कथा है, यह विजयश्री का श्रीग्रंथ है । फिर उत्तर अवस्था में श्रीमद् भागवतजी महापुराण की कथा सुननी चाहिए जिससे कि जीव की मृत्यु ही सुधर जाती है । |
| 720. |
भगवती सरस्वती माता विवेक देने की कृपा करती हैं । जिसमें विवेक नहीं वह विजयी नहीं हो सकता । संसार के संघर्ष में विवेक की परम आवश्यकता होती है । |
| 721. |
श्री महाभारतजी का सिद्धांत है कि सही समय पर सही निर्णय लिया गया तो ही उससे यश मिलता है । |
| 722. |
श्री महाभारतजी केवल कौरव और पांडवों की कथा नहीं है, यह हमारे जीवन में विवेक जागृत कराने वाली कथा है । |
| 723. |
संसार में हर तरह के लोग होते हैं, सभी पात्र श्री महाभारतजी में मिलेंगे । संसार की सबसे पेचीदा समस्या श्री महाभारतजी में मिलेंगी । इन सब उलझन में प्रभु की कृपा, प्रभु की शरणागति कैसे काम करती है, यह श्री महाभारतजी दर्शन कराती है । |
| 724. |
क्या सही है, क्या गलत है, यह प्रभु द्वारा श्री महाभारतजी में बताया गया है । |
| 725. |
आज के प्रबंधन शास्त्र जहाँ से शुरू होते है और जहाँ खत्म होते हैं वे सब इन श्री महाभारतजी रूपी महाग्रंथ के चरणों से निकली हैं । |
| 726. |
प्रभु द्वारा दिखाए मार्ग से जीव का विवेक जागृत होता है । |
| 727. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि पहले व्यवहार के लिए श्री महाभारतजी का श्रवण करना चाहिए फिर अध्यात्म के लिए श्रीमद् भगवद् गीताजी का श्रवण करना चाहिए । |
| 728. |
कोई भी ऐसा भारतीय सिद्धांत नहीं है जो श्री महाभारतजी में नहीं मिलेगा । |
| 729. |
जीवन की उत्तर अवस्था में श्रीमद् भागवतजी महापुराण का श्रवण करना चाहिए जिससे कि मृत्यु का डर ही समाप्त हो जाता है । जितने उत्साह के साथ हमने संसार किया, उतने ही उत्साह के साथ प्रभु मिलन की बेला पर भय त्यागकर शरीर छोड़कर प्रभु तक जाना है, यह अवस्था श्रीमद् भागवतजी महापुराण का श्रवण करने से आती है । |
| 730. |
सिर्फ अपने लिए कमाना और अपने परिवार के लिए कमाना, यह भारतीय सिद्धांत नहीं रहा है । अपने और अपने परिवार की पूर्ति के बाद समाज के लिए काम करना, यह भारतीय सिद्धांत रहा है । |
| 731. |
अब मैं केवल प्रभु का ही हूँ और केवल प्रभु ही मेरे हैं - यह श्रीमद् भागवतजी महापुराण का सिद्धांत है । |
| 732. |
पहले श्रीराम कथा, फिर श्री महाभारतजी की कथा, फिर श्रीमद् भागवतजी महापुराण की कथा, यह जीवन का क्रम होना चाहिए । |
| 733. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि चतुरता भी श्री महाभारतजी के श्रवण करने से और अधिक चतुर हो जाती है । |
| 734. |
संसार में एक भी रस ऐसा नहीं है जिसको प्रभु श्री वेदव्यासजी ने श्री महाभारतजी में परोसा न हो । आज का जो भी साहित्य है वह प्रभु श्री वेदव्यासजी के इस अलौकिक जूठन से ही रचा हुआ है । |
| 735. |
श्री महाभारतजी को पढ़ने से घर में महाभारत होता है, यह सोच एकदम गलत है । श्री महाभारतजी विजयश्री का श्रीग्रंथ है यानी जिस घर में श्री महाभारतजी विराजमान है उस घरवालों की प्रभु कृपा से सदैव विजय होती है । |
| 736. |
जिन वृत्तियों के विकास के कारण हमारा जीवन पतनोन्मुख होता है उन वृत्तियों को खोलकर रखा गया है श्री महाभारतजी रूपी श्रीग्रंथ में । |
| 737. |
प्रभु और प्रकृति जीव को सुधरने का अवसर जरूर देती है पर हमारे विवेक से ही हम उस अवसर को पकड़ पाते हैं । |
| 738. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी का मत है कि जीवन मूल्यों के लिए श्री महाभारतजी अद्वितीय और अति उत्तम है । कोई भी श्रीग्रंथ इसकी तुलना लायक नहीं है और उपमा लायक नहीं है । |
| 739. |
श्री महाभारतजी को मथने के बाद जो मक्खन निकलता है वह श्रीमद् भगवद् गीताजी है । |
| 740. |
श्री महाभारतजी अगर सुगंधित फूल है तो उसकी दिव्य सुगंधी श्रीमद् भगवद् गीताजी है, ऐसा संत श्री ज्ञानेश्वरजी मानते हैं । |
| 741. |
संत हमारे श्रीग्रंथों का हमें अनुभव करने का आग्रह करते हैं, केवल श्रवण करने के लिए नहीं कहते । |
| 742. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी सही मायने में अनुभव करने वाला श्रीग्रंथ है । |
| 743. |
सारी साधना चित्त का मल यानी वासना और चित्त की कठोरता यानी अहंकार को मिटाने के लिए होती है । |
| 744. |
प्रभु हमारे स्वभाव को कोमल बनाने पर बहुत जोर देते हैं । |
| 745. |
प्रभु की कथा के भाव में हमें बहना सीखना चाहिए । |
| 746. |
हमें जीवन में प्रभु कृपा पाने का अभिलाषी होना चाहिए और इसका अधिकारी बनना चाहिए । |
| 747. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी की दीनता देखें कि वे श्री ज्ञानेश्वरीजी का भाष्य लिखने से पहले कहते हैं कि मैं तो अपराध कर रहा हूँ क्योंकि प्रभु की वाणी के इस महाग्रंथ का विस्तार करने जा रहा हूँ । |
| 748. |
जैसे एक चिड़िया अपनी चोंच में श्री सागरदेवजी का जल भरकर कितनी बार भी ले जाए पर वह श्री सागरदेवजी को सुखा नहीं सकती वैसे ही हम हमारे श्रीग्रंथ को कितनी बार भी श्रवण कर लें उनके ज्ञान का पार नहीं पा सकते । |
| 749. |
संतों को श्रीमद् भगवद् गीताजी का रोज नया स्वरूप लगता है, रोज नित्य नए अनुभव होते हैं । इसलिए संतों का एकमत है कि श्रीमद् भगवद् गीताजी नित्य नवीन और सदैव तरुण हैं । |
| 750. |
जीवन में अहंकार का त्याग करने से ही हमारा सच्चा कल्याण होगा । शास्त्र कहते हैं कि अहंकार जीव को राक्षस बना देता है । अहंकार ने किसी का भी आज तक भला नहीं किया है । |
| 751. |
श्री वेदजी प्रभु के श्वास स्वरूप हैं । श्रीमद् भगवद् गीताजी प्रभु द्वारा उच्चारण किया हुआ है और श्रीवेदों का साररूपी श्रीग्रंथ है और उनसे भी अधिक महत्व रखता है । |
| 752. |
एक व्यक्ति अपने विनय के कारण ही जीवन में महान कार्य कर पाता है । |
| 753. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी श्री ज्ञानेश्वरीजी का भाष्य लिखने से पहले कहते हैं कि अगर मैं कुछ अधिक गलत चीज ज्यादा बोल जाऊँ तो प्रभु कृपा करके उसे कम कर दें और अगर कोई सही चीज पर कम बोलूँ तो प्रभु विवेक देकर उसे बढ़ा दें । ऐसी अदभुत दीनता संत श्री ज्ञानेश्वरजी दिखाते हैं । |
| 754. |
केवल शिकायत करके कुछ नहीं होगा । उसे सुधारने के लिए हम क्या कर सकते हैं, यह सोचना चाहिए और करना चाहिए । |
| 755. |
भारतवर्ष के सभी श्रीग्रंथ अदभुत गहराई वाले श्रीग्रंथ होते हैं । |
| 756. |
जब अंधकार से घिर जाएं और कोई प्रकाश नहीं दिखे तो प्रभु को याद करना चाहिए । प्रभु कृपा से हम संकट से बाहर निकल जाएंगे । संकट से बाहर निकलने का यह पक्का उपाय है । |
| 757. |
जिसका जितना भाग्य जगता है उसे जीवन में प्रभु उतने ही प्यारे लगने लग जाते हैं । |
| 758. |
शास्त्रों में भक्तों को भी प्रभु का स्वरूप माना गया है । इसलिए शास्त्रों में भक्त अवतार की बात कही गई है । |
| 759. |
भक्त भगवान के होते हैं और भगवान भी अपने भक्तों के होते हैं । |
| 760. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी की विनम्रता का भाव देखें कि वे श्री ज्ञानेश्वरीजी का भाष्य लिखने से पहले भगवती सरस्वती माता से कहते हैं कि मेरे बोलने में कम या ज्यादा हो जाए तो माता आप संभाल लीजिएगा । |
| 761. |
हमें प्रभु के बारे में लिखते या बोलते समय यह नहीं सोचना चाहिए कि हम प्रभु को जान गए हैं, ऐसा सोचना अहंकार के भाव को जागृत करता है । |
| 762. |
हमें प्रभु के बारे में अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए लिखना या बोलना चाहिए, यह विनम्रता का भाव है । |
| 763. |
प्रभु अनंत, अपार और अदभुत हैं । हम अपनी बुद्धि से कभी भी प्रभु को समझ नहीं सके हैं और न कभी समझ पाएंगे । प्रभु की कृपा से ही हम प्रभु को कुछ-कुछ जान पाते हैं । |
| 764. |
असत्य भी जब बार-बार कहा जाता है तो वह सत्य-सा प्रतीत होता है, सत्य का भ्रम पैदा कर देता है । इसलिए हमें जीवन में असत्य से सदैव सावधान रहना चाहिए । |
| 765. |
आज के जीवन में होने वाली हर समस्या हमें श्री महाभारतजी में मिलेगी और उसका समाधान भी वहाँ मिलेगा । |
| 766. |
श्री महाभारतजी के सभी पात्र आज भी दुनिया में मौजूद हैं और हमें दुनिया में सभी तरफ देखने को मिलते हैं । |
| 767. |
पांडवों का बचपन से ही जीवन सात्विक जीवन रहा था । वे आश्रम में जन्में, खुद कार्य किया, ऋषियों से शिक्षा ली, हवन-यज्ञ किया, प्रभु की कथा सुनी, सत्संग किया, भजन किया, प्रभु का पूजन किया इसलिए जन्म से ही उनमें सबसे सात्विक संस्कार थे । |
| 768. |
कौरव राजमहल में पले, लाड़-प्यार में पले, नौकर-चाकर रहे, गलत शिक्षा उन्हें मिली, कोई सत्कर्म नहीं किया, सिर्फ धमा चौकड़ी की, शान-शौकत किया, अहंकार से भरा उनका जीवन रहा, इसलिए उनकी अंत में दुर्गति हुई । |
| 769. |
स्वभाव कैसे बनते हैं और बने हुए स्वभाव बाद में कैसे हमारे जीवन में विकार पैदा करते हैं, यह हमें श्री महाभारतजी से सीखने को मिलता है । |
| 770. |
शुरू में अगर जीवन की सही योजना बना ली जाए तो वह जीवन को बहुत अच्छे से व्यतीत करने का हेतु बन जाता है । |
| 771. |
धृतराष्ट्र बुद्धिमान था और देवर्षि प्रभु श्री नारदजी, प्रभु श्री वेदव्यासजी, श्री भीष्म पितामह, श्री विदुरजी के साथ ज्ञान चर्चा खूब करता था पर ज्ञान अपने भीतर नहीं उतार पाया, संस्कार अपने भीतर नहीं पहुँचा पाया । आज भी ऐसे पात्र हमें समाज में देखने को मिलते हैं । |
| 772. |
पांडव अपने जीवन के नेतृत्व की बागडोर प्रभु श्री कृष्णजी को सौंपकर निश्चिंत हो गए थे, इसी ने पांडवों की जीत को तय किया था । |
| 773. |
प्रभु सदैव सत्य के नेतृत्व को स्वीकारते हैं और उनकी जीत जीवन में सुनिश्चित करते हैं । |
| 774. |
कर्ण श्री अर्जुनजी से बड़ा होने पर और पराक्रमी होने पर भी श्री महाभारतजी की कथा में आठ बार हारा और श्री अर्जुनजी एक बार भी नहीं हारे क्योंकि प्रभु कृपा के कारण श्री अर्जुनजी का कभी भी पराभव नहीं हुआ । |
| 775. |
जीवन में कभी हम यह गलती नहीं करें इसलिए श्री महाभारतजी का श्रवण करना चाहिए क्योंकि यह हमें आईना दिखाती है कि उसके भयंकर परिणाम हमें जीवन में भुगतने पड़ेंगे । |
| 776. |
जहाँ प्रेम सहित बच्चों को स्वतंत्रता मिलती है और संस्कार मिलते हैं वे घर कभी नहीं टूटते । |
| 777. |
उत्तम पुरुष कभी भी दूषित विचारों को अपने जीवन में नहीं आने देता, वह अपने जीवन में दिमाग की खिड़की को दूषित विचारों के लिए बंद रखता है । |
| 778. |
पांडवों को धृतराष्ट्र ने बंजर भूमि दी पर प्रभु कृपा से पांडवों ने उसे भी चमका दिया । प्रभु की कृपा जीवन में कैसे काम करती है, यह यहाँ देखने को मिलता है । |
| 779. |
पांडवों की उन्नति को देखकर कौरव जल गए । यह आज भी होता है कि दूसरों की उन्नति देखकर हम उन्हें अपना दुश्मन तक बना लेते हैं । |
| 780. |
धृतराष्ट्र सच्चा अंधा तब बना जब उसकी विवेक की आँखें फूट गईं । इससे शिक्षा मिलती है कि जीवन में विवेक को सदैव जागृत रखना चाहिए । |
| 781. |
बड़ों की आज्ञा पालन करने की मर्यादा हमें शास्त्र सिखाते हैं । श्री महाभारतजी में धर्मराज श्री युधिष्ठिरजी ने कभी भी बड़ों की आज्ञा नहीं तोड़ी । |
| 782. |
कभी-कभी परिवार के लोगों को संगठित रखने के लिए कठोर निर्णय लेने की जरूरत होती है, नहीं तो परिवार का अहित हो जाता है । |
| 783. |
श्री महाभारतजी का सिद्धांत है कि कभी भी जीवन में पूरी तरह कठोर नहीं होना चाहिए और कभी भी पूरी तरह से नरम नहीं होना चाहिए । जब जिसकी जरूरत हो वैसा करना चाहिए । |
| 784. |
कुछ लोग सिर्फ मनोरंजन के लिए ही प्रश्न पूछते हैं । प्रश्न के उत्तर को जीवन में उतारने का उनका कोई इरादा नहीं होता । श्री महाभारतजी में धृतराष्ट्र ऐसा पात्र है जो सदैव धर्म के ऐसे प्रश्न पूछता था और धर्मचर्चा करता था पर कुछ भी जीवन में उतार नहीं पाया । |
| 785. |
गलती सबसे होती है पर समय रहते गलती को नहीं सुधारना, यह सबसे बड़ी गलती होती है । |
| 786. |
शास्त्रों में दो तरह की बातें सदैव आती है । एक ग्रहण करने वाली बात और एक त्याग देने वाली बात । |
| 787. |
धर्मशील, हितैषी, सभ्य और सत्य बोलने वाले का जीवन में कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए । चाहे हम सारे धन को खो दें पर ऐसे व्यक्ति का संग का त्याग कभी नहीं करना चाहिए । श्री महाभारतजी में धृतराष्ट्र ने पुत्र मोह के कारण श्री विदुरजी को खोया तो इसका दुष्परिणाम उसे झेलना पड़ा । |
| 788. |
श्री महाभारतजी व्यक्तियों की नहीं, प्रवृत्तियों की कथा है । यह प्रवृत्ति सनातन है क्योंकि आज भी ऐसी प्रवृत्ति के लोग देखने को मिलते हैं । |
| 789. |
जैसे रावण ने श्री विभीषणजी को निकालकर अपना पतन सुनिश्चित कर दिया वैसे ही श्री महाभारतजी में धृतराष्ट्र ने श्री विदुरजी को निकालकर अपना पतन सुनिश्चित किया । धर्मशील लोगों का जीवन में कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए । |
| 790. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारे जीवन में सुमति की सुगंधित हवा कम आती है और कुमति की दुर्गंध वाली हवा ज्यादा आती है । |
| 791. |
प्रभु ने महाभारत के युद्ध को बचाने के लिए शांति हेतु कितना प्रयास किया यह श्री महाभारतजी के श्रवण से पता चलता है । अंत में प्रभु आधे राज्य के बदले केवल पांच गांव तक आ गए थे । |
| 792. |
प्रभु ने कौरवों को समझाया, प्रभु श्री वेदव्यासजी ने समझाया, देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने समझाया, श्री विदुरजी ने समझाया, अन्य ऋषियों ने भी समझाया पर धृतराष्ट्र बहाना बनाता रहा कि मैं तो करना चाहता हूँ पर बेटे नहीं करने देते । आज के संदर्भ में भी ऐसा हमें देखने को मिलता है कि पिता लाचार होता है क्योंकि पुत्र उसकी बात नहीं मानते । |
| 793. |
जो होना है वह होकर रहेगा, यह सही है पर प्रभु कृपा के कारण अपने पुरुषार्थ के बल पर हम होनी को बदल सकते हैं । |
| 794. |
श्री महाभारतजी हमें सिखाती है कि ऐसे लोग होते हैं जो कहते हैं कि हम हटेंगे नहीं, चाहे हम मिट जाएंगे, ऐसी नीति हमेशा दुखदाई होती है । |
| 795. |
कैसे समझदारी को अपने भीतर जागृत करके समस्या का निवारण करना, यह श्री महाभारतजी हमें सिखाती है । |
| 796. |
धर्म वृक्ष के मूल में प्रभु स्वयं होते हैं । पांडवों के धर्म वृक्ष के मूल में प्रभु थे । |
| 797. |
जो बहुत ज्यादा जड़ होता है वह कभी जीवन में जीतता नहीं, जो लचीला होगा वही जीतेगा । |
| 798. |
जिन बातों को हमें देखने की आवश्यकता नहीं होती, जो हमें देखना नहीं चाहिए, उसी को हम देखते रहते हैं । |
| 799. |
जिनको जीवन में सद्विचारों से निष्ठा नहीं है वे जीवन में कुछ अच्छा नहीं कर सकते । |
| 800. |
हमें श्री महाभारतजी सिखाती है कि अपना पराया का भेद नहीं करना चाहिए । अपनों के लिए मोहित नहीं होना चाहिए और जो पराए हैं उनके साथ अन्याय नहीं करना चाहिए । |