| 001. |
जब हम सबमें भगवत् भाव करते हैं तो किसी के प्रति परायापन का भाव हमारे भीतर नहीं रहता । |
| 002. |
पहले बड़ों को जीवन में अच्छाई करने की पहल करनी पड़ती है तब उनको देखकर छोटे अच्छा करने का जीवन में संकल्प करते हैं । |
| 003. |
बड़ों को अपना आचरण छोटों के लिए आदर्श बनाने के लिए सावधानी भी अधिक रखनी पड़ती है । |
| 004. |
हम जीवन में जितना नियम का पालन करते जाएंगे उतना ही जीवन में पूज्य बनते जाएंगे और संसार से सम्मान पाते जाएंगे । |
| 005. |
हमारी भाषा की बोलने की शैली हमारे अंतरंग का परिचय कराती है । |
| 006. |
प्रभु की भाषा की शैली पूरे महाभारतजी में कितनी उदार और कितनी संयमित थी, उसे हमें देखकर सीखना चाहिए । |
| 007. |
मैं और मेरा और तू और तेरा - सभी संसार के कलह का यह आधारभूत कारण होता है । |
| 008. |
हम अपनी अनुकूल बातों को जल्दी सुनना चाहते हैं और अपने प्रतिकूल बातों को सुनना सदैव टालना चाहते हैं । |
| 009. |
सेना की भौतिक गिनती देखकर धृतराष्ट्र और दुर्योधन खुश थे कि उनकी सेना पांडव सेना से बहुत बड़ी है । पर भक्त की दृष्टि से श्री भीष्म पितामह और श्री विदुरजी का मत था कि भौतिक गणना से ऊपर उठकर प्रभु की कृपा, जो पांडवों के पक्ष में थी, उस कारण पांडवों की जीत पक्की है । |
| 010. |
प्रभु पांडवों के पक्ष में उनकी सत्यता के कारण ही थे । |
| 011. |
पुरानी गुरु परंपरा में जो पात्र है वही शिक्षा का अधिकारी होता था । |
| 012. |
प्रभु के सानिध्य का बचपन में प्रभाव देखें कि श्री अभिमन्युजी इतने बड़े महारथी बने । चक्रव्यूह में उनका कौशल देखकर दुर्योधन भी दंग रह गया श्री भीष्म पितामह भी चकित रह गए जब उन्होंने देखा कि छह-छह महारथियों के साथ एक साथ उन्होंने युद्ध किया । |
| 013. |
अपने पास के लोगों को क्रोध से नहीं बल्कि प्रेम से जीतना चाहिए । |
| 014. |
प्रेम से पाई विजय ही असली विजय होती है । |
| 015. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे नियम की मुझे चिंता नहीं क्योंकि मैं भक्तों के लिए अपने नियम को तोड़ने को सदैव तैयार रहता हूँ । |
| 016. |
बहुत कम लोग संसार में ऐसे होते हैं जो प्रशंसा और स्तुति का नशा अपने ऊपर नहीं चढ़ने देते । |
| 017. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि धन्य है श्री अर्जुनजी जिनके रथ के सारथी के रूप में योगेश्वर प्रभु विराजे हैं । संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि संसार में ऐसा रथ कभी किसी ने आज तक प्राप्त नहीं किया । |
| 018. |
श्री अर्जुनजी के रथ की ध्वजा पर प्रभु श्री हनुमानजी आकर विराज गए । संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि जहाँ प्रभु होंगे उनके प्रिय भक्त श्री हनुमानजी उस जगह पर जरूर होंगे । |
| 019. |
आरंभ से ही श्री अर्जुनजी अपने रथ की ध्वजा पर प्रभु श्री हनुमानजी का चित्र लगाते थे क्योंकि प्रभु श्री हनुमानजी विजय के देवता हैं । |
| 020. |
नियम तभी निभाए जाते हैं जब नियम के साथ एक सजा जुड़ती है, नहीं तो नियम टूटने लगते हैं । जीवन में हमारे नियम टूटने लगेंगे तो हमारा सत्यानाश पक्का है । |
| 021. |
छोटे-छोटे नियम प्रभु के लिए बनाकर जीवन जीने वाला अन्ततोगत्वा परम कल्याण को प्राप्त होता है । |
| 022. |
प्रभु के लिए छोटे-छोटे नियम बनाने से हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है, हमारा विकास होता है और हमारे उत्थान के लिए वे नियम सहायक बन जाते हैं । |
| 023. |
मनुष्य का दोषयुक्त और चंचल मन नियम तोड़ने के लिए लालायित रहता है और उसे तोड़ने के समर्थन में तर्क भी प्रस्तुत करता रहता है । |
| 024. |
अति-आत्मविश्वास और अहंकार में एक बारीक रेखा मात्र ही होती है । कब अति-आत्मविश्वास अहंकार का रूप ले ले यह पता नहीं, इसलिए बड़ी सावधानी रखनी चाहिए । |
| 025. |
कभी-न-कभी जीवन में हर जीव को प्रभु की याद आती ही है और प्रभु की सहायता की जरूरत पड़ती ही है । |
| 026. |
पहले प्रभु की कृपा, फिर कुछ साधन का बल होगा, तभी वह साधन सफल होगा । |
| 027. |
बल सबमें होता है पर प्रभु कृपा का बल सबके ऊपर है । प्रभु कृपा के बल के कारण ही हमारा बल है । |
| 028. |
प्रभु श्री हनुमानजी की आराधना का फल होता है कि आयु बढ़ती है, यश बढ़ता है और जीवन के अवरोध ध्वस्त होते हैं । |
| 029. |
प्रभु की जिस पर कृपा हो गई उन श्री अर्जुनजी को हराने की क्षमता रखने वाला जगत में कौन है ? संत श्री ज्ञानेश्वरजी ऐसा कहते हैं । |
| 030. |
श्री अर्जुनजी के प्रभु सारथी बने, यूं ही नहीं बने । उसका कारण यह है कि युद्ध में सहायता में अपनी पूरी नारायणी सेना एक तरफ रखने के बाद और शस्त्र नहीं उठाने की प्रतिज्ञा से खुद को एक तरफ रखने के बाद प्रभु ने श्री अर्जुनजी की परीक्षा ली । परीक्षा में श्री अर्जुनजी उत्तीर्ण हुए और उन्होंने सिर्फ प्रभु उसको चाहा । प्रभु ने कहा कि विचार कर लो पर श्री अर्जुनजी ने कहा कि मुझे केवल आप (प्रभु) ही चाहिए । |
| 031. |
शस्त्र संपन्न नारायणी सेना का त्याग श्री अर्जुनजी ने प्रभु के लिए किया । कौन दे सकता है ऐसी परीक्षा ? ऐसी परीक्षा के बाद प्रभु निश्चित ही मिलते हैं । |
| 032. |
श्री अर्जुनजी युद्ध में भी प्रभु के सानिध्य में ही रहना चाहते थे । इसलिए उन्होंने नारायणी सेना को छोड़कर प्रभु को ही चुना । |
| 033. |
श्री अर्जुनजी ने अपने रथ के घोड़े की लगाम प्रभु के श्रीहाथों में सौंप दी । जीवन में जो भी अपने जीवन रथ की बागडोर प्रभु के श्रीहाथों में सौंप देता है वह विकट-से-विकट परिस्थिति में भी विजयी होता है । |
| 034. |
संपूर्ण समर्पण के बिना अनंत कोटि ब्रह्मांड के नायक प्रभु हमारे रथ की बागडोर नहीं संभालते । प्रभु ने श्री अर्जुनजी के रथ की बागडोर संभाली, यह श्री अर्जुनजी के भाग्य का गौरव है । |
| 035. |
जब श्री अर्जुनजी मोहग्रस्त होने वाले थे तो प्रभु ने उन्हें रोका क्यों नहीं ? क्योंकि प्रभु को पता था कि हर परिस्थिति में मैं मेरे भक्त को उबार लूंगा । सिर्फ भक्तों को इतना करना है कि प्रभु की कृपा की चाह रखनी है, फिर प्रभु कृपा उसके लिए कार्य करने लगती है । |
| 036. |
मोह जीव को कैसे घेरता है यह श्री अर्जुनजी के प्रसंग में देखने को मिलता है । शत्रु पक्ष में खड़े श्री भीष्म पितामह को देखते ही उनको दादा-पोते का रिश्ता याद आ गया, श्री भीष्म पितामह द्वारा किए उपकार के प्रसंग याद आ गए और श्री अर्जुनजी मोहग्रस्त हो गए । |
| 037. |
वीर वृत्ति लेकर श्री अर्जुनजी युद्ध क्षेत्र में आए थे और मोह के कारण करुणा वृत्ति उत्पन्न कर बैठे । |
| 038. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि श्री अर्जुनजी की करुणा युद्ध भूमि में जागृत होते ही उनकी वीरता ने उनका साथ छोड़ दिया । |
| 039. |
संसार में सबसे प्रेम का व्यवहार करना चाहिए पर अति प्रेम किसी के साथ नहीं करना चाहिए । अति प्रेम सिर्फ प्रभु के लिए ही सुरक्षित और आरक्षित रखना चाहिए । |
| 040. |
जहाँ संसार से हमारा प्रेम है वहाँ संसार की याद हमें आएगी और वह दुःख का निर्माण भी करेगी । इसलिए सच्चा प्रेम केवल प्रभु से ही होना चाहिए । |
| 041. |
संसार और संसारी से प्रेम करना चाहिए पर इसकी एक सीमा होनी चाहिए, कभी भी अति प्रेम नहीं होना चाहिए । सर्वाधिक और अति प्रेम के पात्र तो केवल प्रभु ही हैं । |
| 042. |
संसार के किसी भी रिश्ते में अति प्रेम के कारण भावना में बहने पर हमारा विवेक छूट जाता है । |
| 043. |
जब उत्तम लोग हमारे पुरुषार्थ को देखकर राजी होते हों, तभी हमारे पुरुषार्थ की सार्थकता होती है । |
| 044. |
जीव को जीवन में मानसिक सुख यानी मन के सुख की बहुत आवश्यकता होती है । |
| 045. |
जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य और लाभ प्रभु की प्राप्ति में ही है । |
| 046. |
प्रभु ही हमारे आधार होने चाहिए, हमारी भावनाओं के केंद्र होने चाहिए । जितना प्रेम प्रभु से हमें करना चाहिए उतना प्रेम संसार में किसी से नहीं होना चाहिए । |
| 047. |
भक्त सभी चीजों को प्रभु से ही जोड़कर देखता है । |
| 048. |
श्री अर्जुनजी के जीवन की धन्यता है कि उन्होंने अपनी घोड़े की लगाम के साथ-साथ अपनी जीवन की डोर भी प्रभु के श्रीहाथों में सौंप रखी थी । |
| 049. |
प्रभु ही हमारे सनातन परमपिता हैं । |
| 050. |
प्रभु कभी-कभी पिता की तरह कठोर होते हैं पर ज्यादातर समय माता की तरह कोमल ही रहते हैं । |
| 051. |
भक्ति में अगर पूर्णता प्राप्त करनी है तो प्रभु श्री महादेवजी की कृपा अनिवार्य है । |
| 052. |
शास्त्रों का ज्ञान, अध्यात्म का ज्ञान, किसी भी क्षेत्र का ज्ञान, कला, संगीत तो केवल भगवती सरस्वती माता की कृपा से ही पूर्णता को प्राप्त होती है । |
| 053. |
शरीर को कष्ट दिए बिना तप नहीं हो सकता । इंद्रियां, देह और प्राण कष्ट पाएंगे तो ही तप होता है क्योंकि कष्टों की प्रवृत्ति पर विजय ही सच्चा तप है । |
| 054. |
प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए, जिस दिन भक्ति नहीं कर पाए, उस दिन आत्मग्लानि और पछतावा होना अनिवार्य होता है । |
| 055. |
भक्ति, ज्ञान, कर्म और योग को समेटकर चलने वाला ही सही साधन कर पाता है । |
| 056. |
जीवन में कल्याण चाहें तो प्रभु श्री महादेवजी को पितृ बुद्धि से और भगवती पार्वती माता को मातृ बुद्धि से देखना चाहिए । |
| 057. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में, श्रीमद् भागवतजी महापुराण में और श्री रामचरितमानसजी में जो जीवन जीने का मार्ग बताया गया है वही पूर्ण मार्ग है, बाकी सभी संसार के मार्ग अपूर्ण ही हैं । |
| 058. |
निर्गुण उपासना से भी सगुण उपासना हमारा ज्यादा कल्याण करती है, ऐसा संत श्री ज्ञानेश्वरजी का मत है । |
| 059. |
जब श्री अर्जुनजी ने प्रभु श्री महादेवजी की कृपा और अनुग्रह अर्जित की तो सभी देवतागण उनका अभिनंदन करने के लिए और अपनी शक्तियां उन्हें प्रदान करने के लिए उपस्थित हो गए । |
| 060. |
यह सिद्धांत है कि जिसके ऊपर देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी का अनुग्रह होता है सभी देवतागण स्वतः उस पर अनुग्रह करने के लिए दौड़ पड़ते हैं । |
| 061. |
भक्ति करने में भक्त सफल होता है तो सबसे ज्यादा आनंदित प्रभु होते हैं । |
| 062. |
थोड़ा कष्ट देकर प्रभु अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं और देखते हैं कि कष्ट को देखकर भक्त मुझे छोड़ता है कि नहीं । |
| 063. |
श्री सुदामाजी की निष्काम भक्ति को सकाम बनाने के लिए प्रभु ने कष्टों का पहाड़ भेजा पर श्री सुदामाजी के मन में प्रभु के लिए कोई नकारात्मक विचार नहीं आया । |
| 064. |
श्री सुदामाजी में प्रभु सकाम भक्ति नहीं जगा पाए और निष्काम भक्त जीत गया, ऐसा संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं । |
| 065. |
भक्त को प्रभु विजयी बनाते हैं और इसमें प्रभु को परमानंद मिलता है कि मेरा भक्त मुझसे जीत गया । |
| 066. |
अंत में अपराजित प्रभु भक्त से भक्ति की प्रतिस्पर्धा में पराजित हो जाते हैं । |
| 067. |
हम प्रकृति को केवल प्रकृति के नियम मानने के कारण ही जीत सकते हैं । |
| 068. |
पूर्ण समर्पण ही प्रभु के हृदय को जीतने का मार्ग होता है । |
| 069. |
हमारे ऊपर देवतागण, ऋषिगण, पिता, पितर और समाज का ऋण होता है, जीवन में सत्कर्म करके इसको उतारने का प्रयास करना चाहिए । |
| 070. |
प्रभु के सानिध्य में रहने पर प्रभु का भक्त कभी भी पराजित नहीं हो सकता, संत श्री ज्ञानेश्वरजी उपमा देकर इसे समझाते हैं । वे कहते हैं कि क्या अंधकार श्री सूर्यनारायणजी को जीत सकता है, क्या कालकूट जहर को कोई जहर मार सकता है ? ऐसे ही प्रभु के भक्त को कोई भी पराजित नहीं कर सकता । |
| 071. |
बिना सामने वाले की योग्यता को जांचें वरदान देने वाले एक ही देव हैं और वे देवाधिदेव प्रभु श्री महादेवजी हैं । |
| 072. |
पापी को मारने के लिए धर्म का विचार न करना ही धर्म है । |
| 073. |
जीवन में पाप करने वाले और धर्म का आचरण नहीं करने वाले को विपत्ति में धर्म का सहारा लेने का कोई अधिकार नहीं होता । |
| 074. |
वृद्धों की सेवा करने से हमें विवेक मिलता है क्योंकि उन्होंने समय को देखा है और समय ने उन्हें अनुभव देकर सिखाया है । |
| 075. |
जब श्री अर्जुनजी ने प्रभु के भाव को देखा कि मेरी बात प्रभु को ठीक नहीं लग रही, प्रभु उसे स्वीकार नहीं कर रहे तब श्री अर्जुनजी ने शिष्य की भूमिका में आकर प्रभु को मार्गदर्शक की भूमिका में आने हेतु निवेदन किया । |
| 076. |
हमें श्री अर्जुनजी की भूमिका में आना चाहिए कि प्रभु मैं व्याकुल हूँ, मेरी बुद्धि कम है, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा, आपके बिना मेरा संसार में कौन है, प्रभु मेरा मार्गदर्शन करें । प्रभु को अपना गुरु, पिता, बंधु और इष्ट मानना चाहिए । |
| 077. |
एक बात श्री अर्जुनजी को समझ में आ गई थी कि मेरी विपत्ति और भ्रांति का समाधान मात्र और मात्र प्रभु ही कर सकते हैं । |
| 078. |
प्रभु की शरणागति स्वीकार करने की इच्छा हो जाए तो यही हमारी भ्रांति को खत्म करने का सबसे उपयुक्त साधन है । |
| 079. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में श्री अर्जुनजी मोहग्रस्त होने के साथ-साथ जिज्ञासु बने और प्रभु की शरणागति ली तो प्रभु ने आत्मज्ञान की झड़ी लगा दी और परम ज्ञान का उपदेश दिया । |
| 080. |
बिना जिज्ञासु बने और शिष्य की भूमिका में आए बिना कोई भी ज्ञान का अधिकारी नहीं बनता, यह सिद्धांत है । |
| 081. |
हमें जिज्ञासु की भूमिका में आना पड़ता है तभी संत हमें ज्ञान उपदेश देते हैं । |
| 082. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी का जो शरणागति का श्लोक है वह जीवनभर के लिए चिंता मुक्त कर देने वाला अदभुत श्लोक है । |
| 083. |
संतों का अनुभव है कि श्रीमद् भगवद् गीताजी की शरण में जाना बहुत महत्वपूर्ण और सटीक होता है । संत अपने अनुभव से कहते हैं कि जब भी वे कोई उलझन में होते हैं और समाधान नहीं सूझता तो सोते समय श्रीमद् भगवद् गीताजी का आश्रय लेकर सोते हैं और सुबह उठने से पहले निद्रा में ही प्रभु समाधान भेज चुके होते हैं । |
| 084. |
श्री अर्जुनजी का मोहरूपी अवसाद श्रीमद् भगवद् गीताजी के प्रभु के ज्ञान से उतर गया । |
| 085. |
प्रभु ने अदभुत कृपा करते हुए श्री अर्जुनजी के मोहरूपी अवसाद को अपने परम ज्ञान की वर्षा से शांत कर दिया । |
| 086. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी के शुरू के अध्याय का ज्ञान संक्षिप्त है पर आगे चलते-चलते प्रभु ने ज्ञान का इतना विस्तार किया कि यह महाज्ञान का सागर हो गया । |
| 087. |
हम स्वयं को भीतर से कभी नहीं पहचानते । हमें अपने आत्मस्वरूप से भीतरी पहचान करनी चाहिए । |
| 088. |
उत्तम भक्त वह होता है जो संसार की किसी भी घटना से अस्थिर या विचलित नहीं होता । |
| 089. |
भक्तों का ध्यान एकमात्र अविनाशी प्रभु की तरफ होता है । वे विनाशी तत्व यानी संसार की तरफ ध्यान नहीं रखते । |
| 090. |
जैसे सोने की विभिन्न आकृतियां बनती और बिगड़ती है और फिर गलाकर नष्ट कर दी जाती है, वैसे ही संसार की आकृतियां बनती और बिगड़ती रहती हैं । |
| 091. |
संसार में अलग-अलग शरीर नष्ट भी होते हैं और नए भी बनते हैं । इसलिए हमारा ध्यान शरीर की तरफ नहीं बल्कि शरीर के भीतर स्थित चेतन तत्व प्रभु की तरफ होना चाहिए । |
| 092. |
सुख और दुःख हमेशा नाशवान होते हैं । सुख भी सनातन नहीं होता और दुःख भी सनातन नहीं होता क्योंकि यह चक्र की तरह चलते ही रहते हैं । |
| 093. |
सुख-दुःख, प्रतिकूलता-अनुकूलता में समभाव रखना चाहिए । न दुःख और प्रतिकूलता को अपने ऊपर हावी होने देना चाहिए और न ही सुख और अनुकूलता से हर्षित होना चाहिए । |
| 094. |
जब तक संसार से विरक्ति नहीं ले लेते, लाख प्रयास करने पर भी प्रभु की प्राप्ति नहीं हो सकती । |
| 095. |
संसार से हम जितने जुड़ेंगे उतने ही प्रभु से दूर हो जाएंगे । संसार को जितना छोड़ेंगे उतना ही प्रभु के समीप अपने आपको पाएंगे । |
| 096. |
जैसे हम बच्चों के नकली खेल में लिप्त नहीं होते क्योंकि हमें पता है कि खेल नकली है वैसे ही भक्त संसार के खेल देखकर उसमें लिप्त नहीं होते । |
| 097. |
भक्त प्रभु का ही चिंतन करते हैं और प्रभु, जो निरंजन हैं, उनका ही ध्यान करते हैं । |
| 098. |
शरीर के नाश को कोई नहीं रोक सकता । जहाँ-जहाँ शरीर है नाश होना उसकी गति है । जीवात्मा का नाश कोई नहीं कर सकता क्योंकि वह मृत्यु से अतीत है । इसलिए शरीर के नाश से प्रभावित नहीं होना चाहिए, यह प्रभु का श्रीमद् भगवद् गीताजी में उपदेश है । |
| 099. |
उत्तम भक्त देह से अतीत होकर सिर्फ देह के साक्षी बन जाते हैं । |
| 100. |
जीवात्मा का स्वरूप है कि उसे पानी भिगो नहीं सकता, वायु उड़ा नहीं सकती और अग्नि जला नहीं सकती । |
| 101. |
संत देह भाव से ऊपर उठकर चेतन तत्व (प्रभु) को अनुभव करने के लिए आत्मज्ञान के शिखर तक पहुँच जाते हैं । |
| 102. |
संत द्रष्टा बनकर संसार को देखते हैं और शरीर के संबंध को त्यागकर परमात्मा से संबंध जोड़ लेते हैं । |
| 103. |
जिसने जीवन में अपने स्वधर्म यानी कर्तव्य के दायित्व को ठीक से उठा लिया, उसी का जीवन सफल होता है । |
| 104. |
प्रभु आज्ञा मानकर अपने कर्तव्य कर्म को करते रहना चाहिए, स्वधर्म पालन करने पर प्रभु बहुत जोर देते हैं । |
| 105. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि कीर्ति नष्ट हो सकती है पर अपकीर्ति कभी नष्ट नहीं होती । |
| 106. |
मनुष्य वह है जो अपना जीवन इस तरह से जीता है कि उसके जाने के बाद उसकी कीर्ति संसार में बनी रहती है । |
| 107. |
स्वास्थ्य के लिए अच्छा खाना बहुत अच्छी बात है पर केवल स्वाद के लिए हमें खाने से बचना चाहिए । |
| 108. |
जीवन में अगर अपने कर्तव्य पथ पर हम जीत गए तो हमें यश की प्राप्ति होती है । |
| 109. |
उत्तम पुरुष वह होते हैं जो अपने कर्तव्य पथ पर डटे रहते हैं । कर्तव्य मार्ग पर चलते हुए सम्मान मिला तो ठीक, अपमान हुआ तो ठीक, लाभ हुआ तो ठीक, नुकसान हुआ तो ठीक, जीत गए तो ठीक, हार गए तो ठीक । |
| 110. |
श्री अर्जुनजी के मोह निवृत्ति के लिए प्रभु उनके ऊपर श्रीमद् भगवद् गीताजी रूपी ज्ञान की अमृत वर्षा करते हैं । |
| 111. |
प्रभु आग्रही हैं कि सभी को अपना स्वधर्म का पालन करना चाहिए । |
| 112. |
अपने कर्तव्य मार्ग पर डटे रहना ही धर्म है, यह प्रभु का उपदेश है । प्रभु कहते हैं कि स्वधर्म पालन करने पर फूलों का हार भी मिलेगा, पत्थरों की माला भी मिलेगी, जय-जयकार भी होगी, पराजय भी होगी, लोग सम्मान भी करेंगे और लोग अपमान भी करेंगे । |
| 113. |
कर्मफल हमें बांधते हैं इसलिए कर्मों को प्रभु को अर्पित करना बहुत जरूरी है, नहीं तो कर्म जीव को फंसा देते हैं । |
| 114. |
सद्बुद्धि रखने वाले जीव की जीवन में सदैव विजय होती है । |
| 115. |
जो बुद्धि प्रभु की तरफ बहती जाती है, वही सद्बुद्धि कहलाती है । भगवत् प्राप्ति जिस बुद्धि का हेतु हो, वही सद्बुद्धि कहलाती है । जो बुद्धि प्रभु में रमकर शुद्ध हो जाती है, वही सद्बुद्धि कहलाती है । |
| 116. |
जिस बुद्धि ने प्रभु को स्वीकार कर लिया, जिस बुद्धि में प्रभु लिप्त हैं, वही सद्बुद्धि कहलाती है । |
| 117. |
केवल साधन करना ही धर्म नहीं है क्योंकि साधन करते हुए हमारी दृष्टि प्रभु तक होनी चाहिए तभी वह साधन धर्म बनता है । |
| 118. |
प्रभु कहते हैं कि चाहे कर्म धरती पर हो, चाहे स्वर्ग पर हो, चाहे श्री बैकुंठजी में हो, जब तक कर्म करते हुए सकाम इच्छा या कामना बची हुई है वह कर्म हमें धक्का देकर कर्मफल भोगने हेतु नीचे गिरा देगा । |
| 119. |
कर्म से फल की आशा रखना कर्म में दुर्गंध लाना है । यहाँ फल की इच्छा रखने को दुर्गंध कहा गया है । |
| 120. |
फल की इच्छा त्यागकर जो कर्म केवल प्रभु के लिए किया जाता है और प्रभु को समर्पित किया जाता है उससे सुगंध आती है । वह कर्म हमें कभी बांधता नहीं है । |
| 121. |
सकामता के कारण प्रभु प्रेम रूपी अमृत कुंड से हम वंचित रह जाते हैं । निष्कामता रखने से हमें प्रभु मिल सकते थे पर हम थोड़ा-सा सकामता का फल लेकर ही जीवन में संतुष्ट हो जाते हैं । |
| 122. |
कोई भी कर्म प्रभु को अर्पित करके और प्रभु की प्रसन्नता के लिए करना ही श्रेष्ठ कर्म होता है । |
| 123. |
कोई आशा नहीं रखकर किया गया कर्म और सिर्फ प्रभु की प्रसन्नता के लिए किया गया कर्म सतोगुणी कर्म होता है । |
| 124. |
जैसे ही हमारे मन में “मैं और मेरा” का भाव आता है हम दूसरों को पराया मानने लगते हैं । |
| 125. |
मेरा कोई नहीं और मैं भी कुछ नहीं, संत यहाँ तक पहुँच जाते हैं । |
| 126. |
उत्तम पुरुष के लक्षण होते हैं कि वह अपनी बुद्धि को व्यापक प्रभु से जोड़कर रखता है । |
| 127. |
प्रभु हमारे कितने समीप हैं इसका हमें जीवन में भान तक नहीं होता । |
| 128. |
बिना कारण के चिंता करके हम अपने जीवन का नाश करते हैं, नहीं आने वाली आपत्ति को भी सोच कर बिना कारण चिंता से ले आते हैं । |
| 129. |
उत्तम साधक केवल शास्त्रों को पढ़ते ही नहीं हैं बल्कि उनके रहस्य को ग्रहण करते हैं उन्हें जीवन में उतारते हैं । |
| 130. |
प्रभु प्राप्ति के अलावा बाकी जो भी फल की हम इच्छा करते हैं वह सब नाशवान होता है जैसे आरोग्य, धन इन सबका नाश होता है । |
| 131. |
हमें अपने कर्म के बारे में सदैव सचेत और सावधान रहना चाहिए । |
| 132. |
हमें भक्ति रूपी श्रेष्ठ पुरुषार्थ करने के लिए ही मानव जीवन मिला है । |
| 133. |
धन्य है वह व्यक्ति जो मानव जन्म लेकर प्रभु की प्राप्ति के लिए कर्म करता है । |
| 134. |
भारतवर्ष की भूमि विश्व की श्रेष्ठ कर्मभूमि है । मानव जन्म भारतवर्ष में मिला तो हमें प्रभु प्राप्ति के लिए और अपने उद्धार के लिए यह श्रेष्ठ मौका मिला है । ऐसा संतों का सर्वसम्मति का मत है । |
| 135. |
किए हुए कर्म का फल कैसे भी, कभी भी और कहीं भी मिल सकता है, ऐसा प्रभु कहते हैं । किए हुए कर्म का फल मिलकर ही रहता है । |
| 136. |
प्रभु कहते हैं कि कर्मों का फल मिलना यह प्रभु का विधान है और निश्चित है पर कब, कहाँ मिलेगा इसका निर्णय जीव के हाथ में नहीं है । |
| 137. |
प्रभु सत्कर्म करने के बड़े आग्रही हैं । |
| 138. |
मनुष्य के पास कर्म नहीं करने का विकल्प ही नहीं है क्योंकि कर्म तो उससे होगा ही । उत्तम कर्म करने की स्वतंत्रता जरूर प्रभु ने दी है । |
| 139. |
प्रभु कहते हैं कि कर्म करो और फल की इच्छा मत करो । कर्म को पूरा प्रभु को अर्पण कर दो कि आपके लिए किया और आपको समर्पित कर दिया । जब हम कर्म को प्रभु को अर्पण करते हैं तो प्रभु के श्रीकमलचरणों में पहुँचकर कर्म भी धन्य हो जाते हैं । |
| 140. |
सूत्र यह है कि जो करना है प्रभु के लिए करना है और जो कर्मफल के रूप में प्रभु से मिला है उसे स्वीकार करना है । |
| 141. |
अगर हम अपने कर्म को प्रभु को समर्पित करते हैं तो सुख और दुःख की स्थिति हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती । |
| 142. |
योग का शिकार यह है कि मन और बुद्धि से हम प्रभु के बन जाएं । |
| 143. |
कर्म प्रभु को अर्पित करने से कर्मफल का जंजाल हमारे ऊपर कोई असर नहीं करता । |
| 144. |
जीव लगातार सत्कर्म करे, इसके लिए प्रभु बहुत आग्रही हैं । |
| 145. |
हमने स्वयं को ही दुःखी कर रखा है, हम अपने मन से ही दुःख का निर्माण स्वतः करते हैं । अगर हम सोचते हैं कि लोग हमारे दुःख का कारण हैं तो यह सोच एकदम गलत है । |
| 146. |
हमारे विवेक का निर्णय अलग होता है और हमारी बुद्धि का निर्णय अलग होता है, यही दुःख का कारण है । |
| 147. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि कर्म, ग्रह, मित्र, परिवार, व्यापार, समय और काल कोई भी हमारे दुःख का कारण नहीं हो सकता । हम खुद ही हमारे दुःख के एकमात्र कारण होते हैं । |
| 148. |
हम खुद ही अपने स्वयं को सुखी रखने में एकमात्र समर्थ हैं । जब हमारी बुद्धि हमारे विवेक का अनुसरण करती है उसी समय हम सुखी हो जाते हैं । |
| 149. |
हमारी बुद्धि प्रभुनिष्ठ बुद्धि होनी चाहिए और मन बुद्धि का अनुसरण करे तो शांति-ही-शांति है और आनंद-ही-आनंद है । |
| 150. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि जो श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु अपने श्रीमुख से कहते हैं वे सब हमारे लिए ही कह रहे हैं, श्री अर्जुनजी तो निमित्त मात्र हैं । |
| 151. |
हमारा मन बुद्धि के अधीन हो और बुद्धि प्रभु के अधीन हो, यह श्रेष्ठतम स्थिति होती है । |
| 152. |
प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में स्थिरप्रज्ञ के जो लक्षण गिनाए हैं वह साधक के लिए प्रेरणा लेने हेतु गिनाए हैं कि उनसे प्रेरणा लेकर साधक भी उस अवस्था तक पहुँचे । |
| 153. |
जैसे हम जल में कंकड़ फेंक रहे हैं तो जल स्थिर नहीं रहेगा, किसी ने हमें बताया कि कंकड़ फेंकना आप बंद करो तो जल स्थिर हो जाएगा वैसे ही इच्छा करना बंद करने से हमारी बुद्धि स्थिर हो जाएगी । |
| 154. |
अखंड शांति में रहना भक्त का स्वभाव बन जाता है । |
| 155. |
प्रभु कहते हैं कि कामनाओं का ऐसा त्याग करो कि फिर उनका मुँह भी मत देखो यानी कामनाओं की एक भी तरंग हमारे भीतर नहीं उठे । |
| 156. |
हमारे पास मन को बाहर जाने से रोकने का एकमात्र साधन है कि मन को प्रभु में लगाया जाए । |
| 157. |
इच्छाओं के कारण मन बाहर जाता है और वह हमारी बुद्धि को अस्थिर कर देता है । |
| 158. |
उत्तम पुरुष वह है जो प्रतिकूल अवस्था में भी दुःखों के आघात को शांति के साथ सह लेता है । |
| 159. |
स्थिरप्रज्ञ के लक्षण बताते हुए प्रभु कहते हैं कि वह न लाभ में उछलता है, न हार में निराश होता है, ऐसी स्थिरता उसके भीतर होती है । |
| 160. |
बुद्धि ने जो निश्चय किया, अच्छा जानते हुए भी मन और इंद्रियां उसका विरोध करती है और उसकी बात नहीं मानती । यह हम सबकी दयनीय स्थिति होती है । |
| 161. |
हमें जीवन में यह संकल्प करना चाहिए कि बुरी चीजों को हमें देखना नहीं है, सुनना नहीं है और करना नहीं है । |
| 162. |
हमारा मन इंद्रियों के पीछे भागता है और इंद्रियां उसे खींचकर अस्थिर कर देती है । इंद्रियों को स्थिर करते ही मन और बुद्धि स्थिर हो जाती है । |
| 163. |
जब हम इंद्रियों के अधीन होते हैं तो हम साधारण मनुष्य होते हैं । पर जब इंद्रियां हमारे अधीन हो जाती है तो हम श्रेष्ठ बन जाते हैं । |
| 164. |
प्रभु उदाहरण देकर समझाते हैं कि जैसे कछुआ संकट का आभास होते ही अपने शरीर और चारों पैरों को भीतर अपने कवच में खींच लेता है वैसे ही बाहरी विषयों का संकट आते ही व्यक्ति को अपनी इंद्रियों को खींच लेना चाहिए । |
| 165. |
मन और बुद्धि को स्थिर करने का मानस शास्त्र प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में सबके लिए खोलकर रख दिया । |
| 166. |
जो संसार के विषयों का प्रामाणिकता से त्याग कर दे वही जीव श्रेष्ठ होता है । |
| 167. |
नियमपूर्वक नियम का पालन करना जीवन में आरंभ कर देना चाहिए, यह शुरुआत जल्द-से-जल्द करनी चाहिए । |
| 168. |
हमने एकादशी का व्रत तो ठीक किया पर दूसरे दिन द्वादशी को क्या खाना है उसका चिंतन कर लिया तो हम पूर्ण विजेता नहीं हुए । हमने बाहर का त्याग एक दिन के लिए किया पर भीतर के मन से हम हार गए । |
| 169. |
इंद्रियों के स्तर पर संयम करने से ज्यादा लाभकारी होता है मन के स्तर पर संयम का अभ्यास करना । |
| 170. |
संयम का अभ्यास करते समय अगर हम हार जाते हैं तो ग्लानि और दुःख नहीं होना चाहिए क्योंकि प्रयास करने वाला ही फिसलेगा । ग्लानि तब होनी चाहिए जब हमने संयम के लिए प्रयास ही नहीं किया । |
| 171. |
इंद्रियों का नियंत्रण फिर भी आसान है पर मन का नियंत्रण करना बहुत कठिन है । |
| 172. |
मन रस चाहता है और संसार में रमण करना चाहता है । मन को उसका प्रिय विषय चाहिए । इसलिए जो साधक मन पर नियंत्रण कर लेता है वही सच्चा विजेता होता है । |
| 173. |
प्रभु बहुत बड़ा सूत्र देते हैं कि बिना भक्ति के मन को किसी भी हालत में स्थिर नहीं किया जा सकता । |
| 174. |
किसी से लड़ना आसान है पर मन से लड़ना बेहद कठिन है । किसी को जीतना आसान है पर मन को जीतना बेहद कठिन है । |
| 175. |
जब भक्ति से भीतर के परमानंद का रस मिलेगा तो संसार का रस उपस्थित होने पर भी हमें आकर्षित नहीं करेगा । मन संयम में रहेगा और संयम स्वतः ही हमारा स्वभाव बन जाएगा । |
| 176. |
हम संसारी विषयों को तब त्याग सकते हैं जब संसारी विषयों से भी बहुत बढ़िया, बहुत सुंदर, बहुत मधुर और बहुत आकर्षित विषय का मन को पता चल जाए । यह तभी होता है जब मन प्रभु में लगना शुरू हो जाए । |
| 177. |
अंतरंग में प्रभु की अनुभूति भक्ति के जाग्रत होने पर ही संभव होती है । |
| 178. |
इंद्रियों को और बुद्धि को नियंत्रित करने के लिए अंतरात्मा में प्रभु की भक्ति करना एक अनिवार्य शर्त है । |
| 179. |
वासनाओं की पूर्ण समाप्ति भक्ति बिना संभव ही नहीं है । |
| 180. |
प्रभु का श्रीमद् भगवद् गीताजी में स्पष्ट मत है कि कोई भी योग का अभ्यास अगर भक्ति रहित किया गया तो वह कभी सफल नहीं हो सकता । |
| 181. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु सभी साधन बताकर अंत में कहते हैं कि जीवन में भक्ति नहीं करेंगे तो कुछ भी सफल होने वाला नहीं है । प्रभु कहते हैं कि अंतिम बात जो बनेगी वह भक्ति से ही बनेगी । |
| 182. |
अंतिम सिद्धांत श्रीमद् भगवद् गीताजी का, श्रीमद् भागवतजी महापुराण का और श्री रामचरितमानसजी का यही है कि सिर्फ भक्ति से ही उद्धार संभव है । |
| 183. |
बाहर से भी बहुत बड़ा सुख हमारे भीतर छिपा है पर उसकी झांकी भक्ति से ही संभव है । |
| 184. |
हमारा मन संसार के विषयों को भोगे नहीं इसलिए मन को विषयों में फंसने से बचाना हो तो भक्ति ही उसका एकमात्र उपाय है । |
| 185. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी का स्पष्ट मत है कि सिर्फ भक्ति, सिर्फ भक्ति और सिर्फ भक्ति से ही कल्याण संभव है । |
| 186. |
जिसका मन प्रभु में लगा है और प्रभु से मन हटा नहीं उसका मन कभी भी संसार में बाहर जाने के लिए तड़पता नहीं है । |
| 187. |
मूल विषय यह है कि हमारा मन कहाँ है ? हमारा मन कहाँ फंसा है ? मन को संसार में कभी नहीं फंसने देना चाहिए । |
| 188. |
मन को सदैव भक्ति का विकल्प देना चाहिए तभी मन शांत होगा । |
| 189. |
मन के पतन का क्रम प्रभु बताते हैं कि पहले मन विषय का अनुभव करता है, फिर उस विषय की स्मृति मन में बैठती है, फिर उसकी अभिलाषा मन में जगती है, फिर उस विषय को पाने के लिए लगातार प्रयास होता रहता है । |
| 190. |
मनुष्य संसार के विषयों में इतना फंसता चला जाता है कि उसको प्रभु का विस्मरण हो जाता है । |
| 191. |
जब मन और बुद्धि प्रभु का चिंतन करेगी तो ही वह स्थिर होगी । |
| 192. |
संसार के रस में हम फंसेंगे नहीं तो ही हम भक्ति में रम पाएंगे । |
| 193. |
भक्त की स्मृति में सदैव प्रभु रहते हैं इसलिए संसार के विषय उसकी स्मृति में नहीं रह सकते । |
| 194. |
प्रभु की स्मृति के कारण भक्त पर संसार के विषयों का प्रभाव नहीं पड़ता इसलिए भक्त सदैव प्रसन्न रहता है । |
| 195. |
प्रभु सूत्र देते हैं कि एक बार भक्ति की उससे काम नहीं बनेगा, निरंतर भक्ति करनी पड़ेगी, निरंतर संसार के विषयों से दूर रहना पड़ेगा । |
| 196. |
जो भक्ति पथ से हट जाता है और अपनी इंद्रियों का द्वार खुला छोड़ देता है उस पर संसार के विषयों का प्रभाव पड़ता-ही-पड़ता है । |
| 197. |
एक भक्त को छोड़कर संसार के विषयों का वेग अपने जंजाल में फंसाए बिना किसी को भी नहीं छोड़ता । |
| 198. |
संसार के विषयों की हमें जरा भी आवश्यकता नहीं है पर मन उस विषयों को देखता है तो उसमें फंस जाता है और आवश्यकता निर्माण कर देता है । |
| 199. |
संसार के विषयों को देखना ही बहुत बड़ी मूर्खता है क्योंकि विषयों को उत्सुकता से हम देखेंगे तो उसमें फंसे बिना रहना नामुमकिन है । |
| 200. |
सर्वश्रेष्ठ तीर्थ की व्याख्या करते हुए संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि निरंतर अपने भीतर के तीर्थ की यात्रा करना ही सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है । |
| 201. |
भक्ति करने पर हमारी इंद्रियां कभी भी दुस्साहस या दुर्व्यवहार करने की स्थिति में नहीं रहती हैं । |
| 202. |
संसारी जिन-जिन बातों के लिए लालायित रहते हैं उत्तम साधक वह होता है जो उन बातों को चाहता भी नहीं है । |
| 203. |
उत्तम साधक वह होता है जो अपनी जरूरतों को बहुत कम रखता है । |
| 204. |
जिनको प्रभु की भक्ति में रस आ गया उन्हें फिर संसार में कहीं भी रस नहीं आएगा । |
| 205. |
जितना संसार के झंझटों में हम कम फंसेंगे उतना ही प्रभु की भक्ति कर पाएंगे । |
| 206. |
चित्त की वृत्तियां जितनी ज्यादा चंचल होगी उतना ही जीवन में उपद्रव ज्यादा होगा । |
| 207. |
प्रभु की भक्ति के कारण भक्त की मानसिक स्थिति इतनी ऊँची हो जाती है कि उसे इंद्रासन भी तुच्छ लगता है । |
| 208. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि प्रभु की भक्ति में इतना सुख होता है कि अमृत भी सामने आ जाए तो वह भी उसे तुच्छ लगेगा क्योंकि परमानंद के अमृत में जो रमा हुआ है उसको स्वर्ग का अमृत भी आकर्षित नहीं कर सकता । |
| 209. |
बुद्धि स्थिर तब होती है जब वह प्रभु में लग जाती है । |
| 210. |
मन की कामनाओं को प्रभु के श्रीकमलचरणों में विलीन कर देना चाहिए । |
| 211. |
संत आनंदित होने का सूत्र देते हैं कि सबके काम आ जाओ और किसी से कुछ मत चाहो तो ही हम जीवन में आनंदित हो सकते हैं । |
| 212. |
सबमें भगवद् भाव करने पर हम इतने व्यापक हो जाते हैं कि हमें कोई भी पराया नहीं लगता । |
| 213. |
शरीर रहते अगर हम प्रभु से जुड़ जाते हैं तो शरीर छूटने के बाद हम प्रभु के पास ही जाएंगे, प्रभु के अलावा कहीं भी नहीं जा सकते । |
| 214. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश प्रभु ने समस्त ब्रह्मांड के कल्याणार्थ श्री अर्जुनजी को निमित्त बनाकर दिया । |
| 215. |
प्रभु श्री वेदव्यासजी का हमारे ऊपर परम अनुग्रह है कि उन्होंने प्रभु और श्री अर्जुनजी के पैंतालीस मिनट के संवाद को अठारह खंडों में विषयानुसार विभाजित किया । |
| 216. |
हमारे श्रीग्रंथों के रहस्यों को प्रभु श्री गणेशजी और भगवती सरस्वती माता की कृपा के बिना कोई नहीं खोल सकता, कोई नहीं जान सकता । |
| 217. |
हमारा कल्याण हमारी साधना के कारण नहीं बल्कि प्रभु की अनुकंपा के कारण ही होता है । |
| 218. |
संत कहते हैं कि जीवन की व्यथा के निवारण के लिए सिर्फ प्रभु का गुणानुवाद ही सुनना चाहिए । |
| 219. |
भक्त को प्रभु अपने पास बुला ही लेते हैं, उन्हें अपने से दूर नहीं रख पाते । |
| 220. |
संतों का देहाभास और देहाभिमान मिट जाता है और उनके जीवन में जीव और “शिव” का मिलन हो जाता है । |
| 221. |
जब मानवता अंधकार की तरफ चली जाती है तो भारतीय संस्कृति की तरफ विश्व की नजर होती है क्योंकि अंधकार में भारतीय संस्कृति भास्कर की तरह प्रकाश देती है । |
| 222. |
प्रभु की कथा सुनने से हमारा अभाव मिटता है, प्रभु का प्रभाव हमारे जीवन में आता है और हमारा स्वभाव ही बदल जाता है । |
| 223. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी के ज्ञान उपदेश से पहले प्रभु से श्री अर्जुनजी कहते हैं कि कितने सहस्त्र जन्मों के पुण्य के फलस्वरूप प्रभु उनके समक्ष समाधान हेतु उपलब्ध हुए हैं । |
| 224. |
हमें ऐसा साधन जीवन में करना चाहिए जिससे हमारा परमार्थिक कल्याण हो सके । |
| 225. |
हमारा देहाभिमान नष्ट हो जाने पर ही भक्ति से प्रभु की अनुभूति हमें जीवन में हो सकती है । |
| 226. |
बिना भक्ति का साधन किए हुए हम प्रभु को जीवन में कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते । |
| 227. |
प्रभु के लिए कर्म करना और कर्म प्रभु को समर्पित करना सबसे श्रेष्ठ होता है । कर्म से स्वार्थ गया और कर्म प्रभु की प्रसन्नता के लिए हुआ और प्रभु को समर्पित हुआ तो ऐसा कर्म करने वाला कर्मयोगी होता है । |
| 228. |
शास्त्रों में कहा गया है कि जीवन में अपने स्वधर्म का पालन करना, नैतिक धर्म का पालन करना, पारिवारिक धर्म का पालन करना और परंपरा धर्म का पालन करना चाहिए । प्रभु श्री रामजी ने सभी धर्मों का अपने मानव अवतार में पालन किया । |
| 229. |
अनैतिकता से कमाए धन को अगर हम धर्म कार्य में लगाते हैं तो वह हमें कोई लाभ नहीं देगा क्योंकि नैतिकता को ताक पर रखकर हमने ऐसा किया इसलिए वह फल नहीं देगा । |
| 230. |
कर्म का जीवन में कभी भी त्याग नहीं करने के प्रभु बहुत ही आग्रही रहे हैं । जैसे नदी पार करना है तो नौका का हम त्याग नहीं कर सकते वैसे ही कर्म का त्याग नहीं होना चाहिए । |
| 231. |
प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के उदय होने से पहले उठना और प्रभु का पूजन करना, ऐसा धर्म शास्त्र में बताया गया है । हमारे ऋषियों ने ऐसा किया इसलिए उनमें आध्यात्मिक ऊर्जा और योग्यता दिनभर बनी रहती थी । |
| 232. |
कुछ समय के लिए नियमित सुबह उठकर प्रभु की आराधना करके हम देखेंगे तो पता चलेगा कि कितनी अनुकूलता दिनभर के लिए वह हमें प्रदान करती है । |
| 233. |
धर्म संगत कर्म करने से ही वह कर्म हमें सद्गति दिलवाता है । |
| 234. |
मनुष्य योनि में ही भक्ति करके आत्मानंद की प्राप्ति संभव है । |
| 235. |
प्रभु का ध्यान करने से मन स्थिर होता है, शुद्ध होता है और विकार रहित होता है । |
| 236. |
प्रभु का उपदेश है कि जो शास्त्रों में स्वधर्म रूपी कर्म बताए गए हैं उसे उत्साहपूर्वक जीवन में पूर्ण करना चाहिए । |
| 237. |
जैसे कमल का फूल रात-दिन जल में रहता है पर जल से अलिप्त रहता है वैसे ही प्रभु कहते हैं कि कर्म करते-करते कर्म से अलिप्त होना ही श्रेष्ठ है । |
| 238. |
कर्म किया और प्रभु को अर्पण कर दिया और कर्म से अपना संबंध तोड़ दिया तो वह सतोगुणी कर्म होता है और श्रेष्ठ होता है । |
| 239. |
जिस कर्म से हमारा स्वार्थ चिपका हुआ नहीं है और हम उस कर्म के फलस्वरूप कुछ नहीं चाहते और वह प्रभु को अर्पण कर दिया तो वह कर्म हमें लेशमात्र भी बंधन नहीं देगा । |
| 240. |
श्रेष्ठ कर्म वह होता है जो प्रभु के लिए किया जाए, बिना फल की इच्छा के किया जाए और प्रभु को अर्पण किया जाए । |
| 241. |
हमारे ऊपर देश, परंपरा, समाज और प्रकृति के उपकार होते हैं । |
| 242. |
भक्ति हमें परमानंद भी देती है और तृप्ति भी देती है । |
| 243. |
भारतीय दृष्टि यह है कि पहले मैं भगवान का हूँ, फिर अपने देश का हूँ और फिर अपने समाज का हूँ । |
| 244. |
हमें प्रभु की सेवा तन, मन और धन तीनों से करनी चाहिए । |
| 245. |
कर्म से फल के रूप में कुछ भी नहीं चाहिए, यह बुद्धि हमें देवतुल्य बना देती है । |
| 246. |
जो समाज को देना सीख जाता है और यह सोचता है कि प्रभु ने मुझे निमित्त बनाया और मुझसे समाज की सेवा करवाई है, वह देवतुल्य बन जाता है । |
| 247. |
व्यक्ति जब सात्विक हो जाता है तो उसके भीतर निवास करने वाले पाप विचार करते हैं कि अब वह उनके रहने लायक स्थान नहीं बचा इसलिए पाप उस जीव को छोड़कर चले जाते हैं । |
| 248. |
शुद्ध व्यवहार और शुद्ध कमाई करके जो प्रभु, देवतागण, गुरु और ब्राह्मणों पर खर्च करता है, उसको उसका बहुत अच्छा फल मिलता है । |
| 249. |
अशुद्ध व्यवहार और अशुद्ध कमाई कभी भी हमारा भला नहीं कर सकती । |
| 250. |
यज्ञ का फल भावना के फलस्वरूप ही मिलता है । इसलिए पूरी भावना करके और थोड़ा-सा भी द्रव्य लगाकर किया गया यज्ञ श्रेष्ठ होता है । |
| 251. |
भारतवर्ष का सृष्टि चक्र इतना सुंदर है कि सुबह उठकर भूमि माता को प्रणाम करने का विधान है, घर की रसोई बनाकर पहली रोटी गौ-माता के लिए निकालने का विधान है । |
| 252. |
राजा श्री जनकजी का अदभुत उदाहरण है कि उन्होंने कोई भी कर्म का त्याग नहीं किया पर कोई कर्म में फंसे भी नहीं । बिना किसी कर्म का त्याग किए और कर्मफल में फंसे बिना वे मोक्ष तक पहुँच गए । |
| 253. |
अपने को किसी भी क्षेत्र में बड़ा मानने से अहंकार आता है और हमारा तुरंत पतन होता है । |
| 254. |
जो जीवन में अपने को बड़ा मानता है प्रभु उससे अपनी दूरी बना लेते हैं और जो जीवन में अपने को छोटा मानता है प्रभु उसके समीप पहुँच जाते हैं । |
| 255. |
अपना स्वधर्म करते हुए प्रभु की भक्ति और कर्मफल की अभिलाषा का त्याग, यही उत्तम धर्म है । |
| 256. |
मनुष्य अच्छाई का अनुसरण करने का तो प्रयास मात्र करता है पर बुराई को तुरंत पकड़ लेता है, यह उसका दुर्भाग्य होता है । |
| 257. |
जो परमार्थ भी पूर्ण करता है और परमार्थ के साथ संसार भी पूर्ण करता है, वही सच्चा साधक है । |
| 258. |
हम किसी की अच्छी बात का अनुसरण कम करते हैं और गलत बात का तुरंत अनुसरण करने लग जाते हैं । |
| 259. |
मनुष्य को कभी भी सामाजिक परंपरा तोड़नी नहीं चाहिए बल्कि उस परंपरा के अनुसार ही जीवन जीना चाहिए । |
| 260. |
हमारी क्रिया शक्ति का उपयोग अंत में प्रभु प्राप्ति के लिए ही होना चाहिए । |
| 261. |
प्रभु कहते हैं कि प्रभु साक्षात्कार के बाद भक्त जिस जल से आचमन करता है वह श्री गंगाजल बन जाता है, जहाँ बैठकर वंदना करता है वह श्री काशीजी बन जाता है और जो बोलता है वह श्री वेदजी बन जाता है । |
| 262. |
प्रभु का आदेश पालन करते हुए सभी महापुरुषों ने अपने कर्तव्य का त्याग कभी भी नहीं किया । जनसाधारण अपना कर्तव्य कर्म पूरा करें, उनको दिशा निर्देश देने के लिए उन्होंने ऐसा किया । |
| 263. |
शास्त्र कहते हैं कि जो सिर्फ प्रभु का गुणगान करते हैं वे जीव भवसागर से निश्चित तौर से तर जाते हैं । |
| 264. |
जिसको प्रभु में पूर्ण श्रद्धा है और पूर्ण भक्ति है वे जीव निश्चित भवसागर से तर जाते हैं । |
| 265. |
हमारी श्रद्धा ऐसी होनी चाहिए कि हमें प्रभु के दर्शन सर्वत्र होवें । |
| 266. |
अपने कर्म को प्रभु को अर्पण कर देना चाहिए और पूरी तरह से यह मानना चाहिए कि यह कर्म मैंने प्रभु के लिए ही किया है । |
| 267. |
प्रभु कहते हैं कि जीवन में सभी कार्य करें पर भूमिका सेवक की रखें कि मैं प्रभु की आज्ञा से, प्रभु के सेवक के रूप में, प्रभु का काम कर रहा हूँ । |
| 268. |
जिस चीज में हमारी आलोचना होने का भय हो ऐसा काम जीवन में कभी नहीं करना चाहिए । यह प्रभु का आदेश है कि जिस काम को करने से गौरव मिले वही काम जीवन में करना चाहिए । |
| 269. |
आत्म-कल्याण का शुद्ध मार्ग है कि अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना, उन्हें संसार के विषयों से दूर रखना और उन्हें विषयों में आसक्त नहीं होने देना । |
| 270. |
इंद्रियों का नियंत्रण करके उन पर विजय प्राप्त कर लेना ही सबसे बड़ी विजय होती है । |
| 271. |
संसार के विषयों का भोग तो दूर की बात, संसार के विषयों के चिंतन की आदत भी लग गई तो उस जीव की उन्नति उसी समय रूक जाती है । |
| 272. |
प्रभु कहते हैं कि हमारा विकास हमारे स्वधर्म करने से ही होगा, इसीलिए अपने स्वधर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए । |
| 273. |
अपने कुल की परंपरा के हिसाब से ही जीवनयापन करना चाहिए, ऐसा प्रभु उपदेश करते हैं । |
| 274. |
हमारी पांचों इंद्रियों में से एक भी इंद्रियां अगर प्रबल हो जाती है तो वह साधक का पतन करवा कर ही छोड़ती है । |
| 275. |
एक हिरन इतने वेग से दौड़ता है पर फिर भी पकड़ा जाता है क्योंकि उसकी कमजोरी संगीत होती है, संगीत सुनने के लिए वह रुकता है और पकड़ा जाता है । श्रवण इंद्रिय उसका पतन करा देती है । |
| 276. |
एक हाथी इतना बलवान होता है फिर भी हथिनी को स्पर्श करने की इच्छा के कारण फंस जाता है और स्पर्श इंद्रिय के कारण वह गुलाम बन जाता है । |
| 277. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि काम, क्रोध, मद, लोभ और ईर्ष्या से बचने का एक ही उपाय है कि जीवन में प्रभु की भक्ति कर ली जाए । |
| 278. |
संत उपमा देकर कहते हैं कि काम, क्रोध, मद, लोभ और ईर्ष्या बिना आवाज देकर हमें बुलाते हैं और बिना रस्सी के हमें बांधकर खींचते हैं । |
| 279. |
प्रभु कहते हैं कि जो विकार हैं वे हमारे स्वरूप नहीं हैं, हम उनसे अतीत हैं पर हम उसमें फंसे हुए हैं । भक्ति ही उनसे निकलने का एकमात्र उपाय है, ऐसा प्रभु बताते हैं । |
| 280. |
हमें विवेक होना चाहिए कि हम क्या देखें, क्या सुनें, क्या खाएं, क्या सूंघे । अगर हम ऐसा विवेक नहीं रखेंगे तो हमारा पतन निश्चित है, ऐसा प्रभु उपदेश देते हैं । |
| 281. |
शास्त्रों में इंद्रियों का संयम करना बड़ा ही जरूरी माना गया है । |
| 282. |
जब हम गलत दृश्य देखते हैं, गलत बातें सुनते हैं और गलत चीज खाते हैं तो मन की चंचलता बढ़ती है । |
| 283. |
बाहर से इंद्रियों का नियमन करना चाहिए और भीतर से प्रभु का चिंतन करना चाहिए । मन और बुद्धि को स्थिर रखने का यही श्रेष्ठ मार्ग है । |
| 284. |
प्रभु में श्रद्धा निर्माण हो गई तो जीवन में प्रभु का चिंतन शुरू हो जाएगा । |
| 285. |
जैसे श्री अर्जुनजी प्रभु का सानिध्य चाहते थे वैसे ही प्रभु भी श्री अर्जुनजी जैसे सखा का सानिध्य चाहते थे । |
| 286. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी विवेक जागृत करने वाला श्रीग्रंथ है । |
| 287. |
श्री महाभारतजी विजय का शास्त्र है जो हमें सही समय, सही निर्णय लेने का विवेक देता है । |
| 288. |
भक्ति में प्रभु के लिए प्रेम भावना रखने का ही सर्वोत्तम महत्व होता है । |
| 289. |
श्री अर्जुनजी से प्रभु इतना प्रेम करते थे कि श्रीमद् भगवद् गीताजी के उपदेश में वे अपने श्रीमुख से निरंतर बोलते हुए थकते नहीं थे और एक के बाद एक रहस्य अपने भक्त के लिए खोलते जाते थे । |
| 290. |
जो तपस्वी और ऋषियों को भी प्रभु उपलब्ध नहीं होते, श्री अर्जुनजी को वे प्रभु सहजता से उनके शरणागति भाव के कारण उपलब्ध हो गए थे । |
| 291. |
एक बार श्री अर्जुनजी के पूछने पर प्रभु ने बोलना आरंभ किया तो फिर प्रभु निरंतर बोलते गए और बिना श्री अर्जुनजी के पूछे ही उतावले मन से सब कुछ बताने के लिए सिद्ध हो गए । |
| 292. |
भक्त का प्रेम प्रभु देखते हैं तो उसका हित करने के लिए प्रभु उतावले हो जाते हैं । |
| 293. |
भारतवर्ष के कोई भी ऋषि और संत ने कभी नहीं कहा कि वे नया सिद्धांत बता रहे हैं । सिद्धांत तो सनातन होता है और पहले से शास्त्रों में उपलब्ध होता है । |
| 294. |
भक्तों से प्रेम करने के लिए, साधु और सज्जनों का संरक्षण करने के लिए और महा दुष्टों का नाश करने के लिए प्रभु अवतार लेते हैं । |
| 295. |
मनुष्य अपनी गलती की तरफ ध्यान ही नहीं देता और उसे सुधारने के लिए शिथिल हो जाता है, यह मनुष्य का स्वभाव होता है । |
| 296. |
आत्मानंद कहीं भी बाहर से नहीं आता, वह भक्ति के कारण हमारे भीतर से ही प्रकट होता है । |
| 297. |
अपनी कामनाओं की पूर्ति में लगा संसारी व्यक्ति शास्त्रों की बात सुनने की इच्छा ही नहीं रखता, यह उसका कितना बड़ा दुर्भाग्य होता है । |
| 298. |
संसार की वासना और कामनाओं में लिप्त जीव अविवेकी आचरण करता है और इस कारण थोड़ा-सा भी वैराग्य उसमें टिक ही नहीं पाता । |
| 299. |
संसार के विषय सुख को त्यागे बिना और भक्ति किए बिना प्रभु नहीं मिलते । |
| 300. |
बिना वैराग्य के और बिना संसार की आसक्ति को छोड़े जो प्रभु को पाना चाहता है, प्रभु स्पष्ट कहते हैं कि वे महामूर्ख होते हैं क्योंकि प्रभु ऐसे लोगों को कतई नहीं मिलते । |
| 301. |
प्रभु ने श्री अर्जुनजी को ज्ञान उपदेश के लिए क्यों चुना ? क्योंकि श्री अर्जुनजी प्रभु के सच्चे भक्त थे और सच्चे प्रेमी थे । |
| 302. |
जब भी प्रभु प्रेम में कोई कामना उत्पन्न हो जाती है तो वह प्रेम दूषित हो जाता है, प्रदूषित हो जाता है । |
| 303. |
भक्तों के प्रभु प्रेम में कोई कामना नहीं होती, सिर्फ सच्चा प्रेम होता है । |
| 304. |
प्रभु कहते हैं कि जिस अर्जुन ने मेरे प्रति इतना विश्वास किया, इतना समर्पण किया, उसको मैं अपना गुह्यतम रहस्य नहीं बताऊँ, तो फिर किसे बताऊँगा । |
| 305. |
प्रभु श्रीमद् भगवद् गीताजी के उपदेश में श्री अर्जुनजी से कहते हैं कि कोई तर्क, कोई चालाकी से प्रभु को प्राप्त नहीं किया जा सकता । एकमात्र भक्ति के साधन से ही प्रभु को प्राप्त किया जा सकता है । |
| 306. |
संसार की फिसलन से, विरोध से, खतरे से जीव आखिर थक जाता है और फिर वह प्रभु के श्रीकमलचरणों की छाया चाहता है । |
| 307. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी का मत है कि जीव के चित्त को शांति प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही मिल सकती है । |
| 308. |
जीव को पता होना चाहिए कि संसार में उसका अपना कोई भी नहीं है, संसार में सिर्फ प्रभु ही उसके एकमात्र अपने हैं । |
| 309. |
संसार में कोई भी अनाथ नहीं क्योंकि सभी के नाथ प्रभु हैं । |
| 310. |
हम संसार में अशाश्वत चीजों का आश्रय लेते हैं जबकि हमें शाश्वत प्रभु का आश्रय लेना चाहिए । |
| 311. |
जिसने शाश्वत प्रभु से संबंध जोड़ लिया फिर उसको कोई भी ताप व्याकुल नहीं कर सकता । |
| 312. |
किसी भी जन्म में थोड़ी-सी भी भक्ति की और उसके कारण सद्वासना हमारे भीतर पनपती है तो अगले जन्म में बचपन से ही वह प्रभु की भक्ति हमें प्राप्त करवा देती है । |
| 313. |
प्रभु स्वतंत्र हैं और जीव परतंत्र है । जीव को बाध्य होकर जन्म लेना पड़ता है, कर्म करना होता है और इस तरह जन्म और कर्म के बंधन में वह बंध जाता है । |
| 314. |
सभी ग्रह और नक्षत्र प्रभु के अधीन होते हैं और प्रभु के नियम के अनुसार चलते हैं । |
| 315. |
प्रभु स्वतंत्र हैं और संसार में निरीक्षण हेतु अपनी इच्छा से आते हैं । अपनी स्वेच्छा से जब प्रभु आते हैं तो अपने स्वामी के स्वागत के लिए सभी गृह, नक्षत्र और मुहूर्त अनुकूल हो जाते हैं । |
| 316. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि प्रभु मनुष्य अवतार लेकर आते हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि लोगों को लगे कि मैं उनके जैसा ही हूँ और वे उनसे प्रेम करने लगे । |
| 317. |
प्रभु कहते हैं कि दुष्टों के नाश से भी कहीं ज्यादा भक्तों को भक्ति का रस चखाने के लिए वे अवतार लेते हैं । परमहंसों को भक्ति का रसास्वादन कराने के लिए और उन्हें भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ाने के लिए प्रभु अवतार लेते हैं । |
| 318. |
प्रभु संसार के पतन की पराकाष्ठा होने पर आते हैं और संसार में उत्थान की पराकाष्ठा को स्थापित करके वापस अपने स्वधाम पधारते हैं । |
| 319. |
प्रभु के संसार में पधारने पर स्थितियां बदलने लगती है । जो त्राहि-त्राहि करने वाली असंभव स्थिति होती है और लोगों को लगता है कि स्थिति बदल नहीं सकती वह स्थिति घोर निराशा के बाद बदलने लगती है और परम अनुकूल हो जाती है । |
| 320. |
प्रभु के अवतार के पहले संसार में पतन की निम्न स्थिति होती है वह स्थिति प्रभु के अवतार के बाद श्रेष्ठतम ऊँचाई पर पहुँच जाती है । |
| 321. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि अपने जीवन में प्रभु को लाने से ऐसा होता है कि हमारा पतनोन्मुख जीवन उत्थान को प्राप्त हो जाता है । |
| 322. |
प्रभु कहते हैं कि कर्मयोग, कर्मकांड, ज्ञानयोग में वह शक्ति नहीं कि वह मेरे को प्रकट कर दे । प्रभु आगे कहते हैं कि सिर्फ और सिर्फ भक्ति के कारण ही मैं प्रकट होता हूँ, भक्ति में ही यह सामर्थ्य है । |
| 323. |
भक्ति के कारण ही हम प्रभु का अनुभव कर सकते हैं । |
| 324. |
भक्ति के कारण ही प्रभु भक्तों का लाड़ करने और भक्तों से लाड़ करवाने के लिए अवतार लेते हैं । |
| 325. |
प्रभु अपने भक्तों से बहुत प्रेम करते हैं और उनकी सभी सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करते हैं । |
| 326. |
प्रभु कहते हैं कि केवल भक्ति नेत्र से ही उन्हें देखा जा सकता है, सिर्फ भक्ति नेत्र से ही उन्हें पहचाना जा सकता है । |
| 327. |
जब तक हमारा अंतरंग काम, क्रोध, राग, द्वेष से भरा हुआ है तब तक हमारे भक्ति नेत्र खुलते ही नहीं हैं । |
| 328. |
कामना शून्य होने पर ही भक्ति नेत्र खुलते हैं । प्रभु को पाने के अतिरिक्त कोई कामना मन में नहीं रहने पर ही प्रभु प्रकट होते हैं । |
| 329. |
भगवती मीराबाई ने अपने कष्टों को भूलकर प्रभु को याद रखा इसलिए ही वे इतनी बड़ी भक्त बन पाई । |
| 330. |
प्रभु कहते हैं कि मेरी भक्ति भी करते हो और फिर अपनी चिंता भी करते हो, तो यह दोनों बातें विरोधाभासी हैं । |
| 331. |
प्रभु कहते हैं कि भक्त को अपनी चिंता करना कभी भी शोभा नहीं देता क्योंकि उसकी चिंता का भार प्रभु उठाते हैं । |
| 332. |
प्रभु के भक्तों की तीर्थ भी प्रतीक्षा करते हैं कि प्रभु के भक्त आकर मुझमें डुबकी लगाएंगे तो वे उन्हें पवित्र कर देंगे । |
| 333. |
प्रभु कहते हैं कि भक्त के भीतर मैं जाकर बैठ जाता हूँ । बाहर से वह भक्त होता है पर भीतर से मेरा ही स्वरूप होता है । |
| 334. |
प्रभु कहते हैं कि प्रभु से प्रेम और अपनापन करने के लिए कोई भी भाव चुनें । स्वामी का भाव, मित्र का भाव, पुत्र का भाव, पिता का भाव, प्रिया का भाव, सबको इसके लिए छूट है । इन प्रमुख भावों के अलावा और भी बहुत सारे भाव हो सकते हैं । किसी भी भाव से हम प्रभु से जुड़ जाते हैं तो प्रभु हमें अपना लेते हैं । |
| 335. |
प्रभु कहते हैं कि जो जिस भाव से मेरा भजन करता है, मैं भी उसके उस भाव को पुष्ट करता हूँ । |
| 336. |
संसार के रिश्ते असफल हो सकते हैं पर प्रभु से बनाया रिश्ता कभी भी असफल नहीं होता । |
| 337. |
हमें कामना शून्य होना चाहिए, विकार रहित होना चाहिए और चिंता मुक्त होना चाहिए और सिर्फ प्रभु से ही अपना रिश्ता कायम रखना चाहिए । |
| 338. |
अगर भक्ति में हमारा भाव पक्का है तो कोई भी हमारी भक्ति को सफल होने से नहीं रोक सकता । |
| 339. |
भक्ति का फल सिर्फ प्रभु में की गई श्रद्धा पर ही निर्धारित करता है । यह सिद्धांत है कि जितनी श्रद्धा होगी, उतना फल मिलेगा । |
| 340. |
कर्म करते वक्त हमारा ध्यान प्रभु की तरफ होना चाहिए । जो अपने कर्म प्रभु को समर्पित कर देता है वह सब प्रकार के कर्म करते हुए भी कर्मफल में बंधता नहीं है । |
| 341. |
प्रभु ने जीव को चिंतन करने की और कर्म करने की पूरी स्वतंत्रता दे रखी है । |
| 342. |
भारतीय ऋषियों के लिए वैज्ञानिक रहस्य कभी भी रहस्य नहीं थे क्योंकि उन्हें सभी कुछ का ज्ञान था । |
| 343. |
विश्व में जहाँ आध्यात्मिक अंधकार होता है भारतवर्ष में वहाँ प्रकाश जगमगाता है । |
| 344. |
हमारे ऋषियों और संतों के तप से देश को बहुत बड़ी सहायता मिलती है, आत्मबल मिलता है । |
| 345. |
जितना हम संसार में रमेंगे उतना ही संसार हमसे अपेक्षा रखेगा । |
| 346. |
जितना हम संयम में रहेंगे उतना ही हमें संयम में रहने का अभ्यास हो जाएगा । |
| 347. |
हमें सत्कर्म दूसरों की भलाई के लिए करना चाहिए और प्रतिउत्तर के रूप में स्वयं के लिए कुछ भी नहीं चाहना चाहिए । संत इसी सिद्धांत से चलते हैं । |
| 348. |
जिस समय जो मिल जाए उसके लिए सदैव प्रभु को धन्यवाद देने की आदत डालनी चाहिए । |
| 349. |
एक सिद्धांत है कि हमारे रोने की आदत के कारण प्रकृति हमें रुलाती है और जब अगर हम प्रसन्न रहने की आदत डालते हैं तो प्रकृति हमें प्रसन्न रखती है । |
| 350. |
हम प्रसन्न क्यों नहीं रह पाते ? क्योंकि आत्मस्वरूप प्रभु की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता । हमारा ध्यान संसार की तरफ रहता है जो कि हमारे दुःख का मुख्य कारण है । |
| 351. |
जब हम प्रभु का अंश सभी में देखेंगे तो हम किसी से भी द्वेष नहीं करेंगे, किसी की बुराई नहीं करेंगे । |
| 352. |
हमारी भूमिका यह होनी चाहिए कि हमसे कर्म प्रभु करवा रहे हैं और हम कर्म प्रभु के लिए कर रहे हैं । |
| 353. |
संतों को और भक्तों को अपनी देह की चिंता नहीं होती, इसलिए उनकी देह की चिंता प्रकृति करती है क्योंकि वे केवल भगवत् चिंतन में मग्न रहते हैं । |
| 354. |
जो स्वयं अपनी चिंता करता है प्रभु उसकी चिंता नहीं करते । पर जो स्वयं की चिंता नहीं करता है और प्रभु का चिंतन करता है प्रभु उसकी हर चीज की चिंता करते हैं और अनुकूल व्यवस्था करते हैं । |
| 355. |
प्रभु का स्पष्ट मत है कि ज्ञान यज्ञ जैसा कोई भी यज्ञ नहीं है । |
| 356. |
इंद्रियों ने विषयों का त्याग किया उससे भी ऊँचा स्तर तब होता है जब इंद्रियां विषयों को भूल ही गई । |
| 357. |
सामने रूप है पर देखने की इच्छा ही नहीं है, सामने रस है पर स्वाद लेने की इच्छा ही नहीं है, यह श्रेष्ठतम स्थिति होती है, ऐसा प्रभु कहते हैं । |
| 358. |
अपना शरीर, अपना मन और अपना सर्वस्व प्रभु को समर्पित करके पूर्ण विनम्रता के साथ, अहंकार रहित भाव से प्रभु की सेवा करनी चाहिए । |
| 359. |
प्रभु सेवा के हर कार्य के लिए हर समय हमें उपलब्ध रहना चाहिए । यह सेवा का सबसे ऊँचा स्वरूप है जिसको प्रभु श्री हनुमानजी ने करके दिखाया । |
| 360. |
प्रभु की सेवा करने से प्रभु से हमारा रिश्ता तय हो जाता है कि प्रभु मेरे स्वामी हैं और मैं प्रभु का सेवक हूँ । |
| 361. |
जो भी जन्मों-जन्मों से पापों का संचय हुआ है वे सभी प्रभु नाम जप से नष्ट हो जाते हैं । |
| 362. |
जो भी अज्ञान का संचय जीवन में हो रहा है वह प्रभु भक्ति से ज्ञान में बदल जाता है । |
| 363. |
पाप की नदी कितनी भी बड़ी हो प्रभु कृपा की नौका से हम उसे सहजता से पार कर सकते हैं । |
| 364. |
जैसे कितनी भी बड़ी लकड़ी हवन कुंड में स्वाहा हो जाती है यानी भस्म हो जाती है वैसे ही बड़े-से-बड़े पातक भी प्रभु कृपा से जलकर भस्म हो जाते हैं । |
| 365. |
भक्ति करने से साधक बड़े वेग के साथ आध्यात्मिक जीवन की उच्चतम अवस्था तक पहुँच जाता है । |
| 366. |
जैसे अमृत को दूध की उपमा नहीं दे सकते वैसे ही प्रभु को देने हेतु कोई उपमा नहीं है । |
| 367. |
नित्य भक्ति करते हुए प्रभु से कुछ भी नहीं मांगना चाहिए । क्योंकि मांगने पर मांगने वाला पदार्थ मिलेगा पर प्रभु नहीं मिलेंगे और नहीं मांगने पर पदार्थ तो मिलेगा ही साथ ही प्रभु भी मिल जाएंगे । |
| 368. |
प्रभु मुझे भवसागर से तार देंगे, ऐसी प्रगाढ़ श्रद्धा प्रभु में होनी चाहिए । |
| 369. |
प्रभु मेरे उद्धार हेतु खड़े हैं, ऐसा परम विश्वास प्रभु में होना चाहिए । |
| 370. |
ध्यान प्रभु से भटकेगा तभी हमारी इंद्रियों की तरफ ध्यान जाएगा और विषयों का चिंतन होगा । इसलिए ध्यान प्रभु में लगाकर ही रखना चाहिए तो इंद्रियों की चंचलता अपने आप ही खत्म हो जाएगी । |
| 371. |
जिन्हें प्रभु प्राप्ति में संदेह होता है कि प्रभु मिलेंगे या नहीं मिलेंगे, उन्हें प्रभु नहीं मिलते हैं । पर जब हमारी श्रद्धा पूर्ण होती है और हम संदेह रहित होते है तो प्रभु अवश्य मिल जाते हैं । |
| 372. |
धन्य हैं वे जिनके मन में भक्ति के कारण प्रभु प्राप्ति में कोई संदेह नहीं होता, कोई संशय नहीं होता । |
| 373. |
केवल भक्ति के बल पर ही प्रभु प्राप्ति संभव है । |
| 374. |
प्रभु के लिए असीम श्रद्धा होने पर प्रभु को भक्त के पास आना ही पड़ता है । |
| 375. |
जिनमें प्रभु के लिए श्रद्धा नहीं है उनका किया साधन प्राणहीन साधन होता है । |
| 376. |
प्रभु में श्रद्धा रखने से हमारा इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर जाता है । |
| 377. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी रूपी महाग्रंथ परम श्रद्धा भाव से श्रवण करने मात्र से बैठे-बैठे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है । |
| 378. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी के श्रवण के लिए हमें श्री अर्जुनजी की भूमिका में आना पड़ेगा । श्री अर्जुनजी कहते हैं कि मैं अज्ञानी हूँ, कुछ समझता नहीं, समझने हेतु प्रभु की शरणागति ली है । प्रभु से यही बात हमें भी कहनी चाहिए । |
| 379. |
मनचाही वस्तु प्रदान करने वाले एक ही देव हैं और वे हैं देवाधिदेव प्रभु श्री महादेवजी । |
| 380. |
प्रभु श्री महादेवजी की कृपा हो जाए तो जहर क्षणभर में अमृत बन जाता है । प्रभु श्री महादेवजी प्रसन्न हो जाएं तो हमारे लिए सुखों का सागर क्षणभर में खड़ा कर देते हैं । |
| 381. |
प्रभु श्री महादेवजी की महिमा इतनी विराट है कि जब श्री भीष्म पितामह से श्री युधिष्ठिरजी ने उनके बारे में पूछा तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि उनमें विवेक और क्षमता नहीं कि वे प्रभु श्री महादेवजी के बारे में कुछ भी कह सकें । उन्होंने आगे कहा कि श्रीशिव महिमा का कदाचित वर्णन सिर्फ, सिर्फ और सिर्फ प्रभु श्री कृष्णजी ही कर सकते हैं । |
| 382. |
प्रभु कहते हैं कि जो कुछ जीवन में प्राप्त हुआ या प्राप्त नहीं हुआ उससे जीव को कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए । |
| 383. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में बहुत से विषयों की बहुत ही उत्कृष्ट व्याख्या मिलेगी जो और कहीं भी नहीं मिल सकती । |
| 384. |
संन्यास का संकल्प जीवन का अंतिम संकल्प होता है क्योंकि संन्यास के बाद किसी चीज के लिए संकल्प लिया ही नहीं जा सकता । |
| 385. |
संसार के विषयों का त्याग करना ही मुक्ति है, ऐसा प्रभु कहते हैं । |
| 386. |
प्रभु कहते हैं कि जो बाहर दिखता है वह संसार नहीं है, जो जीव के भीतर चलता है वही संसार है । हमें बाहर का संसार चोट नहीं पहुँचाता, हमें हमारे भीतर का संसार ही चोट मारता है । |
| 387. |
कोई भी कर्म करने के लिए इच्छा जीव की होती है पर शक्ति प्रभु की होती है, यह सूत्र है । |
| 388. |
किसी भी कर्म में कर्तापन का भाव नहीं लाना चाहिए क्योंकि कर्म करने की शक्ति प्रभु ने ही दी है । |
| 389. |
जब हम प्रभु की दी हुई शक्ति का अनुकूल उपयोग करते हैं तो प्रभु बहुत खुश होते हैं । |
| 390. |
वर्षा से फसल उगती है पर जिसने जो खेत में बोया है वही उगेगा । इसी तरह प्रभु की शक्ति से हम जो भी कर्म करते हैं उसी का फल हमें भोगने को मिलता है । |
| 391. |
एक भक्त संसार के भोगों को देखता ही नहीं क्योंकि उसे देखने की इच्छा भी भक्त को नहीं होती । |
| 392. |
संसार के किसी भी विषय का सुख स्थाई नहीं है, वह क्षणिक है यानी कुछ क्षणों के लिए है फिर वह विषय दुःख का कारण बनता है । |
| 393. |
क्षणभर के सुख के लिए हम संसार की लंबी दुःख की मार झेलते हैं । |
| 394. |
भक्त संसार के विषयों के बीच में रहते हुए भी उनमें रमता नहीं है । |
| 395. |
प्रभु कहते हैं कि वास्तव में इस जगत में वे ही सुखी हैं जिन्होंने विवेक से अपने विकारों को अपने भीतर ही जीत लिया है । |
| 396. |
उत्तम भक्त के भीतर विकारों का आवेग नहीं रहता, उनका आवेग रुक जाता है । |
| 397. |
भक्त अपनी सभी इंद्रियों का परम संयम करके ऐसी अवस्था में पहुँचता है जहाँ वह शांति के साथ जीवन में रह पाता है । |
| 398. |
जैसे सागर के मंथन से देवतागणों ने अमृत निकाला वैसे ही पूरे श्री वेदजी का मंथन करने पर प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश किया जिसमें अमृत-ही-अमृत छलकता है । |
| 399. |
कहीं भी, कभी भी प्रभु कर्म के त्याग के पक्ष में नहीं हैं । |
| 400. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश मात्र श्री अर्जुनजी को लक्ष्य बनाकर प्रभु ने नहीं किया बल्कि प्रभु ने उन्हें निमित्त बनाकर जनकल्याणार्थ सबके लिए किया है । |
| 401. |
प्रभु तक पहुँचने के लिए भक्ति की एक-एक सीढ़ी चढ़कर हमें जाना पड़ता है । |
| 402. |
इंद्रियों को हम अगर भोग भोगने देंगे और उन्हें सहलाते रहेंगे तो वे हमें पतन के मार्ग पर ले जाएंगी । |
| 403. |
शास्त्रों और संतों की हर बात को उनके संदर्भ में ही ग्रहण करनी चाहिए तभी हमारा मंगल होगा । |
| 404. |
भक्तों को संसार के विषयों में लिप्त होने की इच्छा भी नहीं होती । |
| 405. |
हमें समय-समय पर अपनी आध्यात्मिक उन्नति का विश्लेषण करना चाहिए कि बीते वर्षों में संसार के जिन विषयों में हमारी रुचि थी वह खत्म हुई या नहीं । |
| 406. |
ज्ञान और वैराग्य को जीवन में लाने का साधन भक्ति ही है । |
| 407. |
प्रमाणिकता से अगर हमने भक्ति का साधन किया तो जीवन में, व्यवहार में, सोच में सकारात्मक परिवर्तन अनिवार्य रूप से होगा । |
| 408. |
हम परमार्थ के पथ पर चलेंगे तो हमें जीवन में बहुत कुछ मिलेगा । वहीं संसार का संग किया तो संसार के अलावा कुछ भी नहीं मिलेगा । |
| 409. |
हमारे पतन और हमारे उत्थान के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार होते हैं यानी हमारे उत्थान का कारण भी हम हैं और हमारे पतन का कारण भी हम ही हैं । |
| 410. |
हमारे पतन का मुख्य कारण होता है कि हम संसार के भोगों में, आलस्य में, अहंकार में और अज्ञान में लिप्त हो जाते हैं । |
| 411. |
कुछ भी नहीं करना, यह भारतीय संस्कृति को कभी भी स्वीकार नहीं है । सभी शास्त्र और संत आलस्य के भरपूर विरोधी हैं । |
| 412. |
आलस्य के कारण हम अध्यात्म के अद्वितीय खजाने से वंचित रह जाते हैं । |
| 413. |
हमारे पतन का दोष दूसरों पर डालने से पतन से हमारा बचाव नहीं हो सकता । |
| 414. |
अगर हमने अपना आध्यात्मिक विकास नहीं किया तो मानव जीवन का बहुमूल्य समय हमने खो दिया । |
| 415. |
जो कुछ हमें अपने उद्धार हेतु करना है वह हमें स्वयं ही करना पड़ता है, किसी अन्य के करने से हमारा उद्धार नहीं होगा । |
| 416. |
हम स्वयं ही हमारे उद्धार और पतन के जिम्मेदार होते हैं । किसी अन्य के करने से हमारा उद्धार भी नहीं हो सकता, न ही हमारा पतन होगा । |
| 417. |
संत कहते हैं कि कोई हमारे धन की हानि कर सकता है, कोई हमारी पदोन्नति को रोक सकता है पर कोई हमें अशांत करने का सामर्थ्य नहीं रखता । हम स्वयं ही अशांत होते हैं । |
| 418. |
संसार के संकल्प-विकल्प में डूबना पतन का सबसे बड़ा कारण होता है । उसे त्यागकर हमें अपने मन को प्रभु में लगाना चाहिए । |
| 419. |
हमारे मित्र भी हम स्वयं ही हैं और हमारे शत्रु भी हम स्वयं ही हैं, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 420. |
प्रभु कहते हैं कि मैं तुमसे दूर नहीं हूँ, मैं बहुत समीप हूँ । सबसे ज्यादा समीप हमारे कोई हैं तो वे प्रभु ही हैं । |
| 421. |
अंतःकरण में संसार में सबके लिए समता का भाव धारण करना चाहिए क्योंकि वास्तव में पूरा संसार ही परमात्मा का स्वरूप है । |
| 422. |
सबके लिए हमारे मन में समता का भाव आते ही प्रभु कहते हैं कि वह जीव योगी नहीं, महायोगी बन जाता है । |
| 423. |
समता रखने वाला जीव प्रभु को सबके भीतर देखता है, ऐसे समता वाले व्यक्ति के कारण ही धर्म जीवंत रहता है । |
| 424. |
अपने भक्तों को देखकर प्रभु के श्रीनेत्र कभी भी तृप्त नहीं होते, यह अदभुत रहस्य संत श्री ज्ञानेश्वरजी ने प्रकट किया है । |
| 425. |
प्रभु देखते हैं तो अपने भक्तों को, बोलते हैं तो अपने भक्तों से, हठ पूरा करते हैं तो अपने भक्तों का, लाड़ लड़ाते हैं तो अपने भक्तों का यानी प्रभु का पूरा संसार ही भक्तमय होता है । |
| 426. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि भक्त अपनी भक्ति के कारण प्रभु को अपना दीवाना बना लेता है क्योंकि प्रभु कहते हैं कि मुझे मेरे से भी ज्यादा मेरे भक्त प्रिय होते हैं । |
| 427. |
अपने इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए भक्तियोग की परम आवश्यकता होती है । |
| 428. |
जो बुद्धि संसार की ओर दौड़ रही है उसे प्रभु की ओर मोड़ना, यह केवल भक्तियोग से ही संभव है । |
| 429. |
प्रभु का स्मरण ठीक हो रहा है या नहीं, इसकी कसौटी है कि मन कोमल होता जा रहा है क्या और अहंकार गल रहा है क्या ? |
| 430. |
भगवती गंगा माता में जल बुद्धि रखना अपराध है, भगवती तुलसी माता में वनस्पति बुद्धि रखना अपराध है और प्रभु के विग्रह में मूर्ति बुद्धि करना अपराध है । |
| 431. |
प्रभु का स्मरण भी हम कर रहे हैं और संसार के विषय भी हमें याद आ रहे हैं, यह दोनों बातें बड़ी विरोधाभासी हैं । |
| 432. |
मन को प्रभु के ध्यान में मोड़ना और प्रभु में एकाग्र करना सबसे जरूरी है । |
| 433. |
भक्ति के मार्ग में सिद्धियां आती है पर सिद्धियों में फंस जाने से हमारा आगे का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है । |
| 434. |
जो भी हमारे शास्त्र हैं वे लोक उद्धार के लिए ही हैं । |
| 435. |
प्रभु का हर कार्य भक्तों का कार्य बन जाता है । |
| 436. |
एक भक्त अपने स्वयं को धन्य करता है, अपने परिवार को धन्य करता है, अपने पितरों को धन्य करता है और अपने समाज को धन्य करता है । इतना बड़ा सामर्थ्य भक्ति में होता है । |
| 437. |
जिसका जीवन अनुशासित है, वैराग्य युक्त है और साधनशील है वे देर सवेर प्रभु तक जरूर पहुँचते हैं । |
| 438. |
जिसका खाना और निद्रा नियमित नहीं है, वे अपने स्वास्थ्य को संतुलित नहीं रख पाने के कारण भक्ति मार्ग पर सफल नहीं हो पाते हैं । |
| 439. |
जीवन को संतुलन में रखना योग का मुकुट माना गया है । |
| 440. |
अपने जीवन में उपयोग हेतु पदार्थ का चुनाव करने पर हमें वे ही पदार्थ चुनने चाहिए जो हमारे भक्तियोग में अनुकूल हों । |
| 441. |
जब ध्यान करने से हमारा मन प्रभु से जुड़ जाता है तो हमें इतना आंतरिक सुख और शांति मिलती है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । |
| 442. |
भक्ति अत्यंत सरल साधन है पर हमें कठिन इसलिए लगता है क्योंकि हमारी इंद्रियों पर हमारा नियंत्रण नहीं है । |
| 443. |
हमारी इंद्रियां वश में नहीं होने के कारण हम जानते हुए भी जानबूझकर गलतियां करते हैं । |
| 444. |
जब इंद्रियां हमारे अनुसार चलती है तो हम साधन मार्ग में कभी भी पतित नहीं होते । |
| 445. |
प्रभु का सानिध्य मिलने के बाद दुःख का पहाड़ भी अगर हमारे ऊपर टूट जाए तो भी हम पर वह असर नहीं करता । |
| 446. |
इंद्रियों का संयम करना किसी भी साधन मार्ग का पहला और अंतिम सूत्र होता है । |
| 447. |
उत्तम साधक को अनुशासन में रहना चाहिए । साधक अनुशासन में रहेगा तभी वह तरेगा नहीं तो वह डूब जाएगा । |
| 448. |
साधक को एकांत बहुत अच्छा लगना चाहिए । |
| 449. |
साधन में कभी भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए । साधन लंबे समय तक धैर्य के साथ चले तो ही वह अनुकूल फल देता है । |
| 450. |
अपने मन में कामनाओं और विषयों का संसार लेकर चलने वाला कभी साधन नहीं कर पाता । |
| 451. |
भक्ति करने वाले को आनंद तरंग की निरंतर अनुभूति होती है । उसे आनंद कभी छोड़कर नहीं जाता । जो आनंद किसी के पास आता नहीं उस आनंद से भक्त लबालब भरा रहता है । |
| 452. |
भक्त संसार को प्रभु की वाटिका मानता है । इसलिए कोई भी उसके लिए पराया नहीं होता क्योंकि सबमें वह भगवत् भाव रखता है । |
| 453. |
श्री अर्जुनजी का प्रश्न है कि क्या वायु को बांध सकते हैं ? क्या बंदर को समाधि में बैठा सकते हैं ? इसी तरह क्या चंचल मन को एकाग्र करना संभव है ? प्रभु कहते हैं कि यह भक्ति से संभव है क्योंकि भक्ति से चंचल मन को वश में किया जा सकता है, उसे जीता जा सकता है । |
| 454. |
प्रभु कहते हैं कि संसार में ऐसा कुछ भी नहीं जो अभ्यास और वैराग्य से प्राप्त नहीं किया जा सकता । |
| 455. |
प्रभु कहते हैं कि मन के स्वभाव को समझो । मन को मीठा पदार्थ चाहिए जिसमें रस मिले, तब वह चिपक जाता है । प्रभु आगे कहते हैं कि सबसे ज्यादा रस भक्ति में ही है । |
| 456. |
आत्म शुद्धि के बाद आत्म-शक्ति की जागृति होती है जिसके बाद ही परमार्थ सिद्ध होता है । |
| 457. |
सारे संसार के लिए अनुपलब्ध ज्ञान को प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में समेट कर जनकल्याणार्थ परोस दिया । |
| 458. |
प्रभु कहते हैं कि भक्ति करने वाले का अकल्याण कभी भी, किसी भी सूरत में नहीं हो सकता । |
| 459. |
प्रभु कहते हैं कि अगर प्रमाणिकता से भक्ति का साधन शुरू किया जाए तो अंतःकरण में प्रभु का परम विश्वास जग जाता है । |
| 460. |
जैसे गौ-माता के थन से दूध की धारा फूट पड़ती है वैसे ही भक्त के भीतर अध्यात्म ज्ञान की धारा फूट पड़ती है । |
| 461. |
हमारे श्रीग्रंथों की मौलिक बातों को एक भक्त हृदय ही समझ सकता है । |
| 462. |
प्रभु कहते हैं कि जो मेरी भक्ति करता है उसकी सेवा हेतु देवतागण भी तत्पर रहते हैं । |
| 463. |
ज्ञानयोग, ध्यानयोग और कर्मयोग के मूल में सिर्फ भक्ति ही होनी चाहिए । भक्ति से ही सभी साधनों की पूर्णता है, भक्ति बिना कोई भी साधन पूर्ण नहीं है । |
| 464. |
सभी योग अभ्यास में शिरोमणि तत्व भक्ति ही है । |
| 465. |
प्रभु कहते हैं कि जो अपने किसी भी योग साधन में भक्ति को जोड़ देता है वह मुझे इतना प्रिय हो जाता है कि वह मेरी आत्मा बन जाता है । |
| 466. |
भक्ति का उपदेश प्रभु द्वारा इसलिए किया गया है कि प्रभु कहते हैं कि बिना भक्ति के उन्हें कोई भी जान नहीं सकता । |
| 467. |
हमारा मन प्रभु का स्पष्ट अनुभव करे, यह सिर्फ भक्ति से ही संभव है । |
| 468. |
प्रभु कहते हैं कि भक्ति के बिना कोई भी अन्य मार्ग सिर्फ भूमिका का मार्ग है, अंतिम मार्ग तो भक्ति का ही है । |
| 469. |
भक्ति की परिपक्वता के बिना हम प्रभु को जान ही नहीं सकते । |
| 470. |
तर्क कभी भी प्रभु तक नहीं पहुँचते, वे प्रभु तक पहुँचने से पहले ही बीच से लौट आते हैं । |
| 471. |
भक्ति के निरूपण से ही हमारा अज्ञान समाप्त हो सकता है । |
| 472. |
प्रभु कहते हैं कि परमार्थ की तरफ कुछ बिरले ही मुड़ते हैं, उनमें से भी कुछ ही सफल हो पाते हैं । |
| 473. |
परमार्थ की तरफ मुड़कर भक्ति करने की इच्छा हो जाए, ऐसा भाग्य कुछ लोगों का ही होता है । |
| 474. |
हमारे पास पुण्यों की पूंजी होगी तो ही हमारी इच्छा होगी कि हम प्रभु की भक्ति करें । |
| 475. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारे पूर्व संचित पापों से हमें पापात्मक प्रेरणा होती है और हमारे पूर्व संचित पुण्यों से हमें पुण्यात्मक प्रेरणा होती है । |
| 476. |
बहुत सारे लोग आस्थावान और श्रद्धावान होकर परमात्मा की तरफ मुड़ते हैं पर कोई बिरला ही प्रभु प्राप्ति का जीवन में सच्चा प्रयास करता है और उसमें सफल होता है । |
| 477. |
प्रभु की शक्ति के बिना ब्रह्मांड में कोई कार्य करना किसी के लिए भी संभव नहीं है । |
| 478. |
जैसे हम सपने में नदी देखते हैं और खुद को डूबता हुआ देखते हैं पर जागते ही हमको पता चल जाता है कि यह मिथ्या है, वैसे ही प्रभु की माया के कारण हमें जो संसार दिखता है वह मिथ्या होता है । |
| 479. |
जैसे पानी में काई जमने से पानी नहीं दिखता वैसे ही प्रभु सर्वत्र हैं मगर हमें माया के आवरण के कारण नहीं दिखते । |
| 480. |
इस परिवर्तनशील संसार को सत्य मान लेने के कारण जीव का ध्यान प्रभु की तरफ जाता ही नहीं है क्योंकि वह अपने जीवन में संसार में उलझकर उससे ही अपना संबंध जोड़कर रखता है । |
| 481. |
हम प्रभु के अंश है फिर भी संसार के शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श में फंस जाते हैं और प्रभु को भूल जाते हैं । इसी को माया नाम दिया गया है, जो बड़ी बलशाली है । |
| 482. |
प्रभु कहते हैं कि प्रभु की माया इतनी बलशाली है कि वह भक्ति नहीं करने वाले जीव को प्रभु से दूर कर देती है । |
| 483. |
पूरे वेदांत शास्त्र का सिद्धांत यह है कि एक सच्चिदानंद प्रभु के अलावा पूरे ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं है । पूरा ब्रह्मांड प्रभु का स्वरूप है । पूरे ब्रह्मांड का अस्तित्व ही प्रभु से है । |
| 484. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी का सिद्धांत यह है कि समस्त ब्रह्मांड श्रीवासुदेव स्वरूप है यानी श्रीवासुदेव स्वरूप के अलावा कुछ भी नहीं है । |
| 485. |
कलियुग के प्रभाव से सद्गुण जैसे सत्य, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, शौच, यम-नियम बहुत मात्रा में नष्ट हो गए हैं । |
| 486. |
जैसे वर्षा बरसने से नदी का जलस्तर बढ़ जाता है वैसे ही जीव में तमोगुण और रजोगुण की वर्षा यानी वृद्धि होने से मायारूपी नदी में बाढ़ आ जाती है । |
| 487. |
मायारूपी नदी में बड़े-बड़े मगरमच्छ जैसे काम, क्रोध, मद, लोभ आदि विकार होते हैं । |
| 488. |
माया के नाच में नाचते-नाचते जीव का जीवन नष्ट और भ्रष्ट हो जाता है । |
| 489. |
माया का प्रभाव है कि ज्ञानी को अज्ञानी, तेजस्वी को लाचार और धर्मशील को निराश बना देती है । |
| 490. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि हम अपनी बुद्धि के बल पर प्रभु को जान लें, ऐसा आज तक किसी के साथ नहीं हो पाया है । |
| 491. |
शास्त्रों में प्रतिपादित मार्ग पर चलने से जीव प्रभु के सानिध्य को पा सकता है, नहीं तो वह माया के कारण बीच मझधार में ही उलझकर रह जाएगा । |
| 492. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी का मुख्य विषय प्रभु की भक्ति ही है क्योंकि भक्ति के अलावा किसी भी मार्ग से प्रभु नहीं मिलते और मोक्ष भी नहीं मिलता । |
| 493. |
जितना-जितना हम साधन पथ पर आगे बढ़ते हैं माया का वेग उतना प्रबल और दृढ़ होता चला जाता है । |
| 494. |
प्रभु कहते हैं कि माया से पार पाना बहुत आसान है पर अपने साधन के बल पर माया से पार नहीं पाया जा सकता । प्रभु की भक्ति ही सिर्फ इसका एकमात्र उपाय है । |
| 495. |
माया को सिर्फ भक्त ही पार कर सकता है । संत श्री ज्ञानेश्वरजी तो यहाँ तक कहते हैं कि भक्ति करने वाले के लिए मायारूपी नदी अंतर्ध्यान हो जाती है यानी लुप्त हो जाती है । |
| 496. |
न होते हुए भी जिसने हमारे सामने भ्रम खड़ा कर दिया, उस विलक्षण प्रभु की शक्ति का नाम माया है । |
| 497. |
भक्ति के अंतर्गत प्रभु की शरणागति ग्रहण करे बिना हम माया से कभी छूट नहीं सकते । |
| 498. |
एक साधन प्रभु की भक्ति है जो हमें सभी विपत्ति से बाहर निकलने का एकमात्र सामर्थ्य रखती है । |
| 499. |
माया के भ्रम को भक्ति नष्ट कर देती है । भक्ति के अलावा माया का भ्रम कैसे भी नष्ट होने वाला नहीं है । |
| 500. |
भक्ति का प्रभाव विलक्षण और अदभुत होता है । यही एक उपाय है विकार और माया से जीतने का, ऐसा प्रभु का स्पष्ट मत है । |
| 501. |
केवल अहंकार के कारण कभी-कभी ऊँचे स्तर तक पहुँचे साधक भी प्रभु के आत्मबोध से दूर हो जाते हैं । |
| 502. |
जीव जब संकट में फंसता है, हताश हो जाता है और उसे सर्वत्र अंधेरा दिखता है तब उसे प्रभु ही याद आते हैं । |
| 503. |
जब कोई बचाने वाला नहीं होता, तब अंत में जीव को प्रभु की ही याद आती है । |
| 504. |
संसार में डूबने वाले का कोई साथी नहीं होता, सिर्फ प्रभु ही उसके एकमात्र साथी होते हैं । |
| 505. |
सब कुछ खत्म हो जाने के बाद, सब कुछ हारने के बाद हमारे मन में अंतिम प्रश्न जरूर आता है कि अब मेरा कौन ? तब हमें प्रभु की याद आती है । |
| 506. |
मृत्यु शय्या पर हमारे मन में भी यह प्रश्न आता है कि अब मेरा कौन ? क्योंकि जिनको अब तक अपना माना उनमें से कोई भी हमारे साथ जाने वाला नहीं है । |
| 507. |
बुद्धिमान वही है जो अंतिम समय से पहले यह विचार कर लेता है कि अब मेरा कौन ? ऐसा विचार करके वह प्रभु की तरफ मुड़ जाता है । |
| 508. |
श्री गजेंद्रजी को विपत्ति में जब सबने छोड़ दिया और उन्हें एकांत मिला तब उन्हें प्रभु की याद आई और उन्होंने प्रभु को पुकारा । |
| 509. |
बच्चों को बचपन में प्रभु की मनोहर कथा सुनाई जाए तो विपत्ति के समय प्रभु की याद जागृत हो जाती है । |
| 510. |
पिछले जन्म में भी अगर हमने सत्संग किया है तो प्रभु हमारे कल्याण के लिए उसे सही समय पर जागृत कर देते हैं । |
| 511. |
जितनी एक भक्त को प्रभु कृपा की भूख होती है, सामान्य सांसारिक जीव को वह भूख नहीं होती । |
| 512. |
हमें जीवन में केवल एक भरोसा प्रभु का होना चाहिए । यहाँ “एक” शब्द बहुत महत्वपूर्ण है । |
| 513. |
प्रभु कहते हैं कि मैं कभी नहीं सोचता कि इस जीव ने मुझे पहले याद नहीं किया, सिर्फ संकट में याद किया है, तो मैं जाऊँ या न जाऊँ । प्रभु कहते हैं कि मैं ऐसा कभी नहीं सोचता । प्रभु आगे कहते हैं कि बस जीव की शरणागति होते ही मैं तुरंत उसकी रक्षा के लिए दौड़ पड़ता हूँ । |
| 514. |
बुढ़ापे में भी अगर अंतिम अवस्था में प्रभु की शरणागति ली गई तो प्रभु उसकी रक्षा के लिए तत्पर हो जाते हैं । यह प्रबल और अदभुत शरणागति का सिद्धांत है । |
| 515. |
जैसे भोला बच्चा ठोकर खाकर ही माता-पिता को याद करता है वैसे ही अगर हम प्रभु को याद करते हैं तो प्रभु तुरंत हमारी रक्षा के लिए दौड़ते हैं । |
| 516. |
भक्त प्रभु का सानिध्य पाने के बाद भी भक्ति नहीं छोड़ते क्योंकि भक्ति के बिना अब उनसे रहा ही नहीं जाता । |
| 517. |
प्रभु कहते हैं कि मैं अपने भक्तों से प्रबल प्रेम करता हूँ । |
| 518. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा भक्त कभी पतित नहीं हो सकता, कभी उसका पतन नहीं हो सकता । |
| 519. |
योग के कितने भी प्रकार हो सकते हैं पर प्रभु कहते हैं कि इन सबमें मुझे भक्तियोग ही सबसे प्रिय है । |
| 520. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त को मैं यह पात्रता देता हूँ कि वह सीधे मेरे तक आ सकता है । |
| 521. |
प्रभु कहते हैं कि जिसने अपना मन मेरे चिंतन में लगा दिया, शरीर रहते हुए भी वह मेरा है और शरीर छूटने पर भी वह मेरे अलावा कहाँ जा सकता है ? वह फिर मेरे पास ही आता है । |
| 522. |
मूढ़, भोगी और लोभी जीव कभी भक्ति नहीं कर सकते क्योंकि उनके मन में भक्ति करने की भावना भी कभी नहीं उपजती । |
| 523. |
प्रभु कहते हैं कि वही मेरा भजन कर सकते हैं जिनका पाप मेरी कृपा से नष्ट हो गए हैं क्योंकि हमारे पाप भक्ति की तरफ हमें मुड़ने ही नहीं देते । |
| 524. |
प्रभु कहते हैं कि एक भक्त ज्ञान के सभी रहस्यों को जान लेता है । इस तरह वह भक्त पूर्ण ज्ञानी और पूर्ण योगी अपने आप बन जाता है । |
| 525. |
जैसे एक नवजात बच्चे की सब व्यवस्था उसकी माँ करती है वैसे ही प्रभु एक भक्त की सब व्यवस्था स्वयं करते हैं । |
| 526. |
एक नवजात बच्चे को अपनी माँ को आवेदन नहीं देना पड़ता कि मुझे भूख लगी है, माँ को स्वयं अनुभूति हो जाती है । ऐसे ही एक भक्त को प्रभु को कभी आवेदन नहीं करना पड़ता, प्रभु स्वयं उसके योगक्षेम को वहन करते हैं । |
| 527. |
पूरे ब्रह्मांड के सभी जीवों में विकृति आती है, केवल प्रभु ही हैं जो इससे परे हैं । |
| 528. |
जो सर्वव्यापक प्रभु हैं, उनका एक स्थान हमारे हृदय में भी है । |
| 529. |
जीवन में प्रभु प्राप्ति का संकल्प ही हमारा सबसे बड़ा भाग्योदय करता है । |
| 530. |
एक जीव भक्ति के कारण ही अपने भीतर छिपे “शिव” को पहचान पाता है और फिर जीव और "शिव" का मिलन हो जाता है । |
| 531. |
प्रभु कहते हैं कि भक्ति करने वाले को अंत में मेरी प्राप्ति होती ही है और वह अनायास ही मेरे तक पहुँच जाता है । |
| 532. |
अंतकाल में हमें उसी का स्मरण होता है जिसको जीवनभर हमने याद किया है । सूत्र यह है कि प्रभु को जीवनभर याद करने का अभ्यास करना चाहिए, प्रयास करना चाहिए तो अंत में प्रभु का स्मरण हो जाएगा । |
| 533. |
प्रभु कहते हैं कि मेरी भक्ति करके मुझे याद करने का प्रयास सर्वदा करते रहना चाहिए । |
| 534. |
श्री अर्जुनजी से प्रभु बड़ी मार्मिक और हृदयस्पर्शी बात कहते हैं । प्रभु कहते हैं कि मैं शपथ लेकर कहता हूँ कि केवल मुझे अपना मन दो यानी मन से मुझसे प्रेम करो और बुद्धि से मेरा विचार करो । प्रभु कहते हैं कि मुझे इन दो के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए । प्रभु कहते हैं कि बस इतना ही मेरे लिए कर दो । |
| 535. |
हमारा चित्त केवल और केवल प्रभु का हो जाए, यह जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है । |
| 536. |
हम पहले स्वयं को संसार में किसी का मानते हैं पर भक्ति के कारण एक भक्त अपने आपको केवल प्रभु का ही मानता है । |
| 537. |
भाग्य वाले जीव के हृदय में यह भाव होता है कि मेरे सिर्फ प्रभु हैं और मेरा संसार में कोई भी अपना नहीं है । |
| 538. |
जीवन के अंत में यही उत्तर हमें चाहिए कि मैं सिर्फ प्रभु का हूँ और सिर्फ प्रभु ही मेरे हैं । |
| 539. |
जो भक्ति करके कामना रहित हो जाता है, अपनी इंद्रियों का दमन कर लेता है और प्रभु का चिंतन करता है वह अपने जीवनकाल में ही प्रभु के पास पहुँचने की तैयारी कर लेता है । |
| 540. |
संत कहते हैं कि प्रभु का हर नाम ओंकार तुल्य है यानी सभी प्रभु के नाम ओंकार में लीन हो जाते हैं । |
| 541. |
अंत समय जीव को प्रभु का ही स्मरण होना चाहिए तभी वह प्रभु के धाम जाता है । |
| 542. |
प्रभु कहते हैं कि ज्ञानयोग, कर्मयोग और ध्यानयोग को छोड़कर जो भक्तियोग का सहारा लेता है, चाहे वह मेरी पूजा करता है, चाहे भजन करता है, चाहे जप-कीर्तन करता है, चाहे अर्चना करता है, वह जीव मुझे प्राप्त होता है । |
| 543. |
अंतकाल में प्रभु का स्मरण हो जाए तो जीव की मुक्ति निश्चित है । |
| 544. |
साधन उसका नाम है जब नियमपूर्वक हम संसार के विषय त्यागने का संकल्प लेते हैं और प्रेम भाव रखकर प्रभु प्राप्ति के लिए हम अग्रसर होते हैं । |
| 545. |
संसार के विषयों को तिलांजलि देना ही किसी भी साधन की नींव होती है । |
| 546. |
प्रभु सेवा हेतु जो संसार के विषयों का त्याग करते हैं, प्रभु कहते हैं कि जितना त्याग उसने किया वह चाहे उसे याद रहे या न रहे, मैं (प्रभु) सदैव उसे याद रखता हूँ । |
| 547. |
अपनी इंद्रियों का निरोध करना और प्रभु का चिंतन करना, ऐसा प्रभु से दृढ़ संबंध बनाने हेतु भक्त करते हैं । |
| 548. |
प्रभु कहते हैं कि प्रभु का भक्त शरीर से कर्म भी कर रहा है और कर्म प्रभु को अर्पित करके मन से सदैव प्रभु के साथ एकरूपता के साथ रहता है । |
| 549. |
प्रभु कहते हैं कि जो मेरी भक्ति करता है उससे मैं अंत समय मेरे स्मरण की अपेक्षा नहीं रखता, मैं खुद उसका स्मरण बन जाता हूँ । |
| 550. |
जो भक्त नित्य पूजा, जप, अर्चना और भक्ति मेरे लिए निस्वार्थ भाव से करता है, प्रभु कहते हैं कि उस भक्त के सभी कर्मों को मैं याद रखता हूँ । |
| 551. |
प्रभु कहते हैं कि जो भक्त मेरी भक्ति करता है उसका ऋण चुकाने हेतु मैं उसका उद्धार कर देता हूँ । |
| 552. |
प्रभु कहते हैं कि मेरी भक्ति करने वाले के हृदय में अंत समय मैं खुद उपस्थित हो जाता हूँ और उसको अपना स्मरण करवाता हूँ और फिर उसे अपने धाम ले जाता हूँ । |
| 553. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त को किसी भी प्रकार की चिंता करने की कोई आवश्यकता कभी भी नहीं होती । |
| 554. |
प्रभु अभिभूत होकर कहते हैं कि मेरे भक्त को कभी भी फिर शरीर धारण करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह सदैव मेरे में लीन रहता है । |
| 555. |
भक्ति करने वाले जीव की गति को प्रभु पहले ही सुनिश्चित और सुरक्षित करके रखते हैं । |
| 556. |
श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि एक मेरे को छोड़कर सब कुछ नश्वर है, नाशवान है, यहाँ तक कि ब्रह्मलोक, स्वर्गलोक और ब्रह्मांड सब कुछ नाशवान है । |
| 557. |
उस तत्व का नाम परमात्मा है जो न बनता है, न बिगड़ता है, न उत्पत्ति है, न लय है, वह निरंतर एकरूप में स्थित है । |
| 558. |
प्रभु कहते हैं कि सभी क्रिया की शक्ति मैं हूँ, मेरे बिना कुछ भी नहीं होता पर फिर भी मैं कुछ भी नहीं करता । |
| 559. |
जीव के पापों और पुण्यों का फल उसे प्रभु ही देते हैं । |
| 560. |
प्रभु कहते हैं कि जो मेरी भक्ति कर लेता है वह जीवन में कभी भी अज्ञानी नहीं रह सकता । |
| 561. |
जिसने जीवन में प्रभु का भजन, पूजन और भक्ति की है वह कभी भी अधोगति को प्राप्त नहीं हो सकता । |
| 562. |
सगुण साकार प्रभु की निष्काम सेवा और भक्ति करके हम प्रभु को प्राप्त कर सकते हैं । |
| 563. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी का पूरा ज्ञान प्रभु द्वारा श्री अर्जुनजी को देने के बाद करुणामय प्रभु कहते हैं कि अर्जुन, अब तुम अपना मन मेरे में लगाओ । |
| 564. |
प्रभु कहते हैं कि जिसने मेरी भक्ति की, भजन किया और सेवा की उसे सौ अवश्मेघ यज्ञ करने से भी बड़ी स्थिति प्राप्त होती है । |
| 565. |
प्रभु के प्रिय हो जाने पर देवतागण भी उस भक्त की स्वतः सहायता करते हैं । |
| 566. |
भारतवर्ष में जन्म लेकर जिसने श्रीमद् भगवद् गीताजी का श्रवण और अध्ययन नहीं किया उसने अपने जीवन का बहुत बड़ा अवसर खो दिया । |
| 567. |
सब कुछ पढ़ने के लिए उपलब्ध होने पर भी श्रीग्रंथों के अलावा कुछ पढ़ने की इच्छा ही नहीं हो, ऐसी शुभ बेला हमारे जीवन में आनी चाहिए । |
| 568. |
भक्त को हर तरफ सिर्फ प्रभु ही दिखते हैं और कुछ नहीं दिखता । |
| 569. |
प्रभु की तरफ जाने का सबसे सरल, सुलभ और सक्षम मार्ग सिर्फ भक्ति का मार्ग है । |
| 570. |
जो प्रभु की रोंगटे खड़े करने वाली श्रद्धा से, अवरुद्ध कंठ से, अश्रुपात भरे नेत्रों से भक्ति करता है वह बहुत जल्दी प्रभु के समीप पहुँच जाता है । |
| 571. |
संपत्ति के बल पर, कुल के बल पर, सौंदर्य के बल पर, शुद्ध आचरण के बल पर प्रभु प्राप्ति संभव नहीं है । प्रभु प्राप्ति सिर्फ निष्काम भक्ति से ही संभव है और यह अंतिम सत्य है । |
| 572. |
प्रभु को प्रिय भक्ति के लिए “भक्ति केवलम” कहा गया है यानी केवल भक्ति ही प्रभु को सबसे प्रिय है । |
| 573. |
प्रभु से निश्छल और निस्वार्थ प्रेम करते हुए एक भक्त प्रभु से कोई अपेक्षा नहीं रखता । भक्त का प्रभु प्रेम में सौ प्रतिशत समर्पण का भाव होता है । |
| 574. |
प्रभु की मूरत भक्त को अनुभूति नहीं दे, ऐसा हो ही नहीं सकता । भक्तों को प्रभु की मूरत से प्रभु की अनुभूति होती ही है, यह सिद्धांत है । |
| 575. |
प्रभु प्रेम का जो प्रदर्शन नहीं करता, वही सच्चा भक्त होता है । |
| 576. |
प्रभु की शरणागति स्वीकार करना भक्ति में भी श्रेष्ठतम मार्ग है । |
| 577. |
हमने जो पाप किए हैं उसकी चिंता न करते हुए, एकांत में बैठकर प्रभु के सामने उसे स्वीकार कर लिया और उसे जीवन में नहीं दोहराने का संकल्प कर लिया और भक्ति करने लगे तो प्रभु हमें तत्काल पापमुक्त कर देते हैं । |
| 578. |
प्रभु को पाने का सबसे श्रेष्ठ और सरल मार्ग भक्ति ही है । |
| 579. |
भक्त सदैव प्रभु के सुरक्षा कवच के भीतर ही रहता है । |
| 580. |
हमारी भक्ति पूर्ण हो, इसलिए भक्त प्रभु की शरणागति ले लेते हैं जिससे भक्ति करने के लिए प्रभु का बल भी हमें मिल जाता है । |
| 581. |
अत्यधिक विनय, अत्यधिक विनम्रता संतों का स्वभाव बन जाता है । |
| 582. |
भक्तों में आत्मविश्वास इतना प्रबल हो जाता है क्योंकि उन्हें प्रभु कृपा का जीवन में परम विश्वास होता है । |
| 583. |
जब हम प्रभु की कथा पूरी तन्मयता से और भाव से सुनते हैं तो श्रीहरि कथा अपना अत्यधिक प्रभाव तत्काल दिखाना शुरू कर देती है । |
| 584. |
भगवत् स्मरण में ही सर्व आनंद छुपा हुआ है, अन्यत्र कहीं भी नहीं है । |
| 585. |
भगवत् प्राप्ति के बाद लेशमात्र दुःख भी हमें स्पर्श करने की स्थिति में नहीं रह जाता । |
| 586. |
प्रभु की कथा सुनना ज्ञान अमृत का भोजन करने जैसा है । |
| 587. |
जीवन में प्रभु कथा का सच्चा प्रकाश प्रभु कृपा होने पर ही होता है । |
| 588. |
श्रेष्ठ लेखक और वक्ता जो प्रभु का गुणानुवाद लिखते हैं और करते हैं वे इस भूमिका में रहते हैं कि वे तो कठपुतली हैं । जैसा प्रभु नचाते हैं वैसा वे नाचते हैं क्योंकि उनकी रस्सी प्रभु के श्रीहाथों में जो होती है । |
| 589. |
प्रभु सबसे पहले हमारे भीतर अपने लिए अनन्यता का भाव ही देखते हैं इसलिए जीवनभर हमें प्रभु के लिए अनन्य ही रहना चाहिए । |
| 590. |
अपनी सभी वृत्तियों का समर्पण प्रभु के श्रीकमलचरणों में हो जाना चाहिए । |
| 591. |
सब कुछ सच्चिदानंद प्रभु का ही रूप है । सारा संसार एक सच्चिदानंद प्रभु से ही भरा हुआ है । एक सच्चिदानंद प्रभु के अलावा कोई भी अन्य ब्रह्मांड में नहीं है । |
| 592. |
एक प्रभु को छोड़कर हमारा सनातन संबंध किसी के साथ नहीं है । सारी विद्याओं के सारे रहस्य में जानने योग्य यही बात है, यही ज्ञान है । केवल इस ज्ञान को नहीं जानने के कारण ही जीव अशांत रहता है, भटकता है और जन्म-मरण के चक्र में फंसता है । |
| 593. |
जैसे कस्तूरी मृग को पता नहीं होता कि कस्तूरी उसके भीतर ही छुपी हुई है वैसे ही एक व्यक्ति सुख के लिए देश-विदेश दौड़ता है पर उस व्यक्ति को यह पता नहीं होता कि सुख उसके भीतर ही छिपा हुआ है । |
| 594. |
शांति के लिए देश-विदेश कहीं भी दौड़ लगा लें, अंत में प्रभु का नाम ही लेना पड़ेगा और हमारे श्रीग्रंथ जैसे श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवद् गीताजी और श्रीरामचरितमानस का ही श्रवण करना पड़ेगा । |
| 595. |
जो सुख एकांतवासी को है वह सुख चक्रवर्ती राजा को भी नहीं । सूत्र यह है कि जिसने एकांत में अंतर्मुख होना सीख लिया उसे संसार का सबसे बड़ा परमानंद तत्काल उपलब्ध हो जाता है । |
| 596. |
आनंदरूपी अमृत यानी प्रभु को छोड़कर संसाररूपी जल की तरफ हम भागते हैं, यह हमारा कितना बड़ा दुर्भाग्य होता है । |
| 597. |
जैसे पारस को छोड़कर हम एक चमकता कांच ले लेते हैं उसकी चमक के कारण, वैसे ही हम प्रभु को छोड़कर संसार की चमकती चीज ले लेते हैं । |
| 598. |
सारा संसार प्रभु का ही बनाया हुआ है । प्रभु कहते हैं कि हर तरफ हर चीज में मैं (प्रभु) ही हूँ । |
| 599. |
संतों का एकमत सिद्धांत है कि सगुण साकार प्रभु की भक्ति ही सर्वोच्च है । श्रीमद् भगवद् गीताजी के भी निष्कर्ष में यही बात आती है । |
| 600. |
जिनका सभी पर नियंत्रण है और जिन पर किसी का नियंत्रण नहीं है, वे ही परमात्मा हैं । |
| 601. |
सारे ब्रह्मांड में एक प्रभु ही हैं । प्रभु सबमें है और सब कुछ प्रभु में समाहित है । |
| 602. |
जैसे दूध से दही का निर्माण होता है वैसे ही प्रभु से सारे संसार का निर्माण होता है । |
| 603. |
जैसे बीज से वृक्ष प्रकट होता है वैसे ही प्रभु से संसार प्रकट होता है । |
| 604. |
जैसे बुलबुला पानी से निर्माण होता है पर बुलबुले को पकड़ने से पानी नहीं मिलेगा वैसे ही संसार को पकड़ने से प्रभु नहीं मिलेंगे । |
| 605. |
संसार की सेवा करने से प्रभु नहीं मिलेंगे क्योंकि प्रभु संसार में समाए हुए तो हैं पर प्रभु संसार से भिन्न हैं । इसलिए संसार को पकड़ने से प्रभु हाथ में नहीं आएंगे । |
| 606. |
प्रभु मात्र निःस्वार्थ और निष्काम भक्ति से ही प्राप्त होते हैं । |
| 607. |
उत्तम साधक का ध्यान संसार की ओर नहीं होकर केवल प्रभु की तरफ होता है । |
| 608. |
भगवान मानकर संसार की सेवा करने वालों का भी पतन हो सकता है पर भगवान मानकर भगवान की सेवा करने वाले का कभी पतन नहीं होता । |
| 609. |
जो प्रभु में परम विश्वास रखता है उसे प्रभु सत्य लगते हैं और जो संसार में विश्वास रखता है उसे संसार सत्य लगता है । |
| 610. |
मन जड़ संसार का चिंतन करेगा तो वह जड़ हो जाएगा और मन चेतन प्रभु का चिंतन करेगा तो वह चेतन हो जाएगा । यह श्री वेदांतजी का सिद्धांत है । |
| 611. |
कोई भी कर्म प्रभु की शक्ति से ही संपन्न होता है पर उसके कर्ता हम स्वयं होते हैं । |
| 612. |
जैसे बिंब को पकड़ने से प्रतिबिंब स्वतः ही पकड़ में आ जाता है, ऐसे ही प्रभु की सेवा से संसार की सेवा स्वतः ही हो जाती है । |
| 613. |
संतों का मत है कि बिंब यानी प्रभु को पकड़े और प्रतिबिंब यानी संसार में नहीं उलझें । |
| 614. |
प्रभु को सिर्फ मानने से प्रभु की प्राप्ति नहीं होती, प्रगाढ़ श्रद्धा से प्रभु की भक्ति करने से ही प्रभु की प्राप्ति होती है । |
| 615. |
प्रगाढ़ श्रद्धा हमारे जीवन में प्रभु के लिए, प्रभु के विभिन्न अवतारों के लिए, प्रभु की विभिन्न श्रीलीलाओं के लिए होनी चाहिए । |
| 616. |
प्रभु के लिए मन में कोई भी संशय नहीं होना चाहिए, तभी हमारा जीवन धन्य होता है । |
| 617. |
प्रभु से हम जो रिश्ता बनाते हैं, उसे अज्ञान से सकाम भाव रखने के कारण हम दूषित कर देते हैं । |
| 618. |
एक सच्चिदानंद परमात्मा सभी रूपों में विराजमान है, यह सबसे सरल सिद्धांत है जो अधिकतर लोग समझ नहीं पाते । |
| 619. |
अज्ञान हमें अंधविश्वासी बना देता है और अज्ञान प्रभु के ज्ञान को ढक देता है । |
| 620. |
प्रभु कभी भूतकाल के विषय नहीं हो सकते, वे वर्तमानकाल में भी हैं और आगे भी सदा रहेंगे । ब्रह्मांड है तब तक भी प्रभु हैं और ब्रह्मांड के बाद भी प्रभु ही रहेंगे । |
| 621. |
प्रभु का कोई भी स्वरूप मिथ्या नहीं हो सकता, यह शास्त्र मत है । एक ही परमात्मा अनेक रूप धारण करते हैं, यह बात कभी भी हमारी बुद्धि से ओझल नहीं होनी चाहिए । |
| 622. |
संत कहते हैं कि जहाँ भी जाओ प्रभु के रूप को देखो, जो भी पढ़ो प्रभु की श्रीलीला पढ़ो । |
| 623. |
भक्त तल्लीन होकर प्रभु की भक्ति करते हैं और प्रभु का भजन करते हैं । |
| 624. |
भारतीय अध्यात्म सिखाता है कि प्रभु एक हैं, उनके रूप अनेक हैं । |
| 625. |
हमारे अज्ञान के कारण हमारी भक्ति लघु हो जाती है और हमारी श्रद्धा लुप्त हो जाती है । |
| 626. |
हमारा सनातन धर्म ज्ञान आधारित धर्म है । |
| 627. |
जिसके जीवन में अज्ञान है उसका जीवन ही बेकार है क्योंकि इस अज्ञान के कारण वह जीवन में प्रभु को नहीं पहचान पाता । |
| 628. |
मानव जीवनरूपी रत्न को हमें प्रभु की भक्ति के बिना नष्ट नहीं करना चाहिए । |
| 629. |
अज्ञान के कारण लोग भ्रष्ट हो जाते हैं, आसुरी प्रवृत्ति उनके भीतर पनप जाती है और व्यसन और भोग में वे अपना समय बर्बाद करने लगते हैं । |
| 630. |
शास्त्र कहते हैं कि संसार तो करना चाहिए पर संसार में स्वाद नहीं लेना चाहिए । संसार करते हुए हमारा ध्यान भक्ति की तरफ होना चाहिए और हमारे मन के केंद्र में प्रभु स्थित होने चाहिए । |
| 631. |
हम पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं पर प्रभु से पहचान नहीं बना पाते, यह हमारा कितना बड़ा दुर्भाग्य होता है । |
| 632. |
एक भक्त हृदय के द्वारा ही गहराई से प्रभु का चिंतन हो सकता है । |
| 633. |
प्रभु को जानने के बाद कोई भी रहस्य फिर रहस्य नहीं रह जाता यानी न कोई भौतिक रहस्य बचता है और न ही कोई आध्यात्मिक रहस्य बचता है । |
| 634. |
आसुरी प्रवृत्ति के लोग जीवन में उल्टी दिशा में ही कार्य करते हैं । इस विपरीत कर्म करने के कारण उनकी प्रभु में आस्था नहीं होती । |
| 635. |
प्रभु कहते हैं कि मैंने भक्तों के मन में क्षेत्र-संन्यास ले रखा है यानी मैं भक्तों के मन को छोड़कर कहीं बाहर नहीं जाता । |
| 636. |
श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि कोई पापी का शिरोमणि भी हो पर वह भी जीवन में भक्ति कर लेता है तो उसके पाप जीवन में बचते नहीं और वह जीवन में पूर्णता का अनुभव करता है । |
| 637. |
विश्व विजेता चक्रवर्ती राजा भी जब मृत्यु को प्राप्त होता है तो खाली हाथ ही संसार से प्रस्थान करता है । |
| 638. |
श्रेष्ठ भक्तों द्वारा लिखा हुआ भजन, किया हुआ कीर्तन और कहे हुए उपदेश में आनंद-ही-आनंद छलकता है । |
| 639. |
सारे भक्त परमानंद के सिंधु में डूबे हुए मिलेंगे यानी आनंद से लबालब भरे हुए मिलेंगे । यह प्रभु की भक्ति के कारण ही संभव होता है । |
| 640. |
भक्तों का व्यवहार स्वतः ही धर्मशास्त्र के अनुरूप होता है । |
| 641. |
प्रभु श्री रामजी के श्रीचरण पादुका लेकर जब श्री भरतलालजी आए और उन्होंने ऋषि वशिष्ठजी को पूछा कि धर्मशास्त्र के अनुसार मार्गदर्शन करें तो ऋषि वशिष्ठजी ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया । उन्होंने कहा कि सब शास्त्र देखकर कार्य करते हैं पर तुम जो कार्य करोगे वही सदैव के लिए शास्त्र में अंकित हो जाएगा । इससे पता चलता है कि भक्ति की कितनी बड़ी महिमा होती है । |
| 642. |
प्रभु की अनुभूति के कारण भक्त शांति का अलंकार धारण कर लेता है । भक्त की आँखों से शांति झलकती है, वाणी सुनने से शांति मिलती है और हाथों के स्पर्श से शांति की अनुभूति होती है । सूत्र यह है कि भक्त के पास केवल बैठने मात्र से ही हमें शांति मिलती है । |
| 643. |
भक्त के द्वारा निरंतर प्रभु का ही चिंतन होता है । भक्त लोगों के बीच में बैठता भी है तो उसके चिंतन के केंद्रबिंदु प्रभु ही होते हैं । |
| 644. |
प्रभु व्यापक हैं इसलिए प्रभु के सभी स्वरूपों को हमें मानना चाहिए । एक स्वरूप में अनन्यता होनी चाहिए पर मान्यता सभी स्वरूपों की होनी चाहिए । |
| 645. |
पूजा करते वक्त सारे संसार को अपने प्रभु में देखना चाहिए और पूजा करके उठने पर पूरे संसार में अपने प्रभु को देखना चाहिए । |
| 646. |
भक्त के भीतर से आनंद इसलिए प्रकट हो जाता है क्योंकि वे आनंदसिंधु प्रभु के साथ एकरूप हो जाते हैं । |
| 647. |
प्रभु की व्यापक अनुभूति एक भक्त को होती है यानी उन्हें हर तरफ प्रभु का आभास होता है । |
| 648. |
प्रभु के लिए अपनी भावना को जीवन में कभी भी खंडित नहीं होने देना चाहिए । |
| 649. |
प्रभु का प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान होना चाहिए यानी पल-पल बढ़ते रहना चाहिए । |
| 650. |
प्रभु का साधन जीवन में कभी भी घटना नहीं चाहिए । हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जीवन में प्रभु का साधन हरदम बढ़ता जाए । |
| 651. |
प्रभु के लिए आसक्ति निरंतर जीवन में बढ़ जाए तो यह मानना चाहिए कि हमारा जीवन धन्य हो रहा है । |
| 652. |
आधुनिक ध्यान की पद्धति में पता नहीं हमें इधर-उधर कितनी जगह ध्यान केंद्रित करना सिखाया जाता है । शास्त्रों में कहा गया है कि ध्यान सिर्फ प्रभु पर ही केंद्रित करना चाहिए तभी हमें शांति मिलेगी, हम तनाव मुक्त होंगे और हमें स्वस्थ रहने का आधार मिलेगा । |
| 653. |
प्रभु का ध्यान करने पर आरोग्यता निरंतर रहने हेतु खुद चलकर हमारे पास आती है । |
| 654. |
शास्त्र कहते हैं कि संत के रूप में ख्याति होना एक बात है पर सच्चा संतत्व होना दूसरी बात है जो सबसे अहम बात है । |
| 655. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त निरंतर भक्ति में तल्लीन हो जाते हैं और अंतरंग में मेरे साथ एकरूप हो जाते हैं और बाहरी अवस्था में मेरी सेवा करते हैं । |
| 656. |
भक्तों को सर्वाधिक प्रिय दो ही चीज होती है । पहला, प्रभु की कथा और दूसरा, प्रभु का नाम जप । |
| 657. |
प्रभु का वियोग उन्हें ही पता चलता है जिन्हें कभी प्रभु से संयोग होने का परम भाग्य मिला हो । |
| 658. |
अपने भक्तों में भी प्रभु को अहंकार एकदम प्रिय नहीं है । भक्तों में अहंकार देखते ही प्रभु उस अहंकार को तोड़ने के लिए अपनी अतिशय कृपा करते हैं । |
| 659. |
प्रभु का नाम लेने के दो प्रकार शास्त्रों में बताए गए हैं । एक जप और दूसरा संकीर्तन । |
| 660. |
मानस जप करना सबसे श्रेष्ठ माना गया है । शास्त्रों में कहा गया है कि साधक को वचन से जप करते हुए मानस जप की तरफ बढ़ना चाहिए । |
| 661. |
शास्त्रों के अनुसार संकीर्तन में उच्च स्वर में प्रभु नाम का उच्चारण करना श्रेष्ठ माना गया है । |
| 662. |
हमारे मन के आधार प्रभु ही होने चाहिए । |
| 663. |
नाम जप एकांत में होना चाहिए और संकीर्तन सामूहिक रूप से होना चाहिए । |
| 664. |
भक्तों के हृदय में प्रभु प्रेम की अभिव्यक्ति हो जाती है । |
| 665. |
भक्ति करने से किए हुए पापों के लिए मन में प्रायश्चित होता है और हमारे पाप जलने लग जाते हैं । |
| 666. |
हमारे शास्त्रों का एक-एक शब्द सही है, पूरी तरह से सब यथार्थ है, कुछ भी काल्पनिक या असत्य नहीं है । |
| 667. |
जैसे रोग को देखकर उसके निवारण हेतु दवाई बताई जाती है वैसे ही शास्त्रों में पापों के निवारण के लिए प्रभु के समक्ष प्रायश्चित बताया गया है । |
| 668. |
प्रभु के नाम जप में जीव के संचित पापों को दहन करने की अदभुत शक्ति है । |
| 669. |
जीव में पाप करने की उतनी शक्ति नहीं है जितनी शक्ति प्रभु के नाम में संचित पापों को दहन करने की है । |
| 670. |
प्रभु का नाम जप और प्रभु नाम का संकीर्तन कलियुग में जीव के संचित पापों को ध्वस्त करने की अदभुत क्षमता रखता है । |
| 671. |
जो प्रभु का नाम उच्चारण करके मृत्यु बेला पर प्रभु को पुकारता है उसे यमदूतों से मुक्त करने का काम प्रभु के पार्षद करते हैं । |
| 672. |
दसों दिशाओं से हमारे किए गए पापों की सूची श्री चित्रगुप्तजी तैयार करते हैं और चौदह गवाहों की साखी होती है जिनमें वायुदेव, जलदेव और अग्निदेव प्रमुख होते हैं । |
| 673. |
प्रभु का नाम कैसे भी लिया जाए, वह पर्याप्त है । भगवत् बुद्धि से लिया जाए तो वह श्रेष्ठतम होता है । |
| 674. |
अंतिम चरण में भी प्रभु के नाम उच्चारण का परिणाम श्री अजामिलजी के चरित्र में देखने को मिलता है । नाम उच्चारण का प्रभाव था कि वे यमपाश से बच गए । |
| 675. |
श्री वाल्मीकिजी के मुँह से श्रीराम नाम नहीं निकला, मरा निकल गया क्योंकि पापों को पता है कि हमारे भीतर बैठे प्रभु का नाम जपने से हमें निकलकर भागना होगा । इसलिए हमारे पाप हमारा गला अवरुद्ध करके प्रभु का नाम निकलने ही नहीं देते । |
| 676. |
बिना प्रभु के नाम के महत्व को जानकर भी अगर हम उल्टा नाम भी जपते हैं तो वह भी अदभुत फल देता है जैसे श्री वाल्मीकिजी को दिया । |
| 677. |
प्रभु श्री यमराजजी अपने यमदूतों से कहते हैं कि प्रभु के नाम जपने वाले के पास जाने की कभी हिम्मत नहीं करना क्योंकि प्रभु अपने नाम लेने वाले के सिरहाने अंत समय खड़े रहते हैं । |
| 678. |
आलस्य में, आलाप में, परिहास में भी लिया प्रभु का नाम कभी व्यर्थ नहीं जाता । |
| 679. |
प्रभु श्री यमराजजी ने अपने यमदूतों से कहा कि ऐसे लोगों को पकड़कर नर्क में जरूर लाना जो एक बार भी दिन में प्रभु को साष्टांग दंडवत प्रणाम नहीं करते हैं, जो रोजाना एकांत में बैठकर प्रभु का नाम जप नहीं करते हैं और जो रोजाना एकांत में बैठकर प्रभु के श्रीकमलचरणों का ध्यान नहीं करते हैं । |
| 680. |
तीनों साधन ज्ञानयोग, कर्मयोग और ध्यानयोग से कलियुग में प्रभु को प्राप्त करना बेहद कठिन है । यह तीनों मार्ग गलत नहीं हैं पर कलियुग का युग धर्म है कि भक्ति के बिना प्रभु प्राप्ति संभव ही नहीं है । |
| 681. |
कोई भी, कैसे भी, कभी भी, किसी भी भावना से प्रभु का नाम लेता है तो वह हमें विपरीत फल कभी नहीं देगा । प्रभु का नाम जप हमारा भला-ही-भला करेगा । |
| 682. |
प्रभु नाम लेने की सरलता के कारण हमने नाम जप का मूल्यांकन ही जीवन में कम कर दिया है । |
| 683. |
संसार के सारे साधन जैसे ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग से जो फल प्राप्त होता है वह सिर्फ प्रभु नाम जप से ही प्राप्त हो जाता है । |
| 684. |
प्रभु का नाम छोटा-सा है और जीव के पापों का भयंकर अंबार है । संत श्री ज्ञानेश्वरजी उपमा देते हैं कि जैसे एक छोटी-सी चिंगारी पूरे जंगल के जंगल को जलाकर भस्म कर देती है वैसे ही लिया हुआ एक छोटा-सा नाम संचित पापों के पूरे जंगल को ही भस्म कर देता है । |
| 685. |
प्रभु के नाम में पाप दहन करने की अदभुत शक्ति होती है । |
| 686. |
प्रभु के ऐश्वर्य को जाने बिना लिया हुआ नाम भी कल्याण ही करता है । प्रभु के नाम के महत्व को जाने बिना भी लिया हुआ नाम कल्याण-ही-कल्याण करता है क्योंकि नाम की शक्ति ही ऐसी है । |
| 687. |
प्रभु नाम की शक्ति का हमें पता नहीं होने पर भी वह शक्ति अपना काम करती है । |
| 688. |
जलाना अंगार का स्वभाव होता है, किसी भी कारण से अंगार को छू लें तो वह हमें जलाएगा ही । वैसे ही प्रभु के नाम का स्वभाव है पापों को जलाना, कैसे भी प्रभु का नाम लिया जाए वह पाप को जलाकर ही रहेगा । |
| 689. |
कलियुग में जीव का निश्चित उद्धार केवल प्रभु के नाम स्मरण से ही संभव है क्योंकि प्रभु ने अपने नाम में अपनी पूरी शक्ति रख दी है । |
| 690. |
साधक को जीवन में कभी भी परनिंदा नहीं करनी चाहिए । |
| 691. |
प्रभु के विभिन्न स्वरूपों में कभी भेद बुद्धि या भेद दृष्टि नहीं रखनी चाहिए । |
| 692. |
श्री वेदजी, हमारे सभी शास्त्रों और श्रीग्रंथों में कभी भी अश्रद्धा नहीं होनी चाहिए । उनके लिए सदैव पूज्य बुद्धि ही होनी चाहिए क्योंकि वे ही अंतिम प्रमाण होते हैं । |
| 693. |
प्रभु नाम जप के भरोसे पाप करने वाले को नाम का अपराध लगता है । |
| 694. |
प्रभु नाम की महिमा को जीवन में कभी भी कम नहीं आंकना चाहिए । शास्त्रों में नाम की अति प्रशंसा की गई है, कुछ लोग उपेक्षा की दृष्टि से इसको देखते हैं जो कि नाम अपराध होता है । |
| 695. |
कर्मकांड की और यज्ञ की अशुद्धि के लिए भी नाम जप का ही सहारा लिया जाता है । कोई भी धार्मिक अनुष्ठान की अशुद्धि का निवारण हेतु नाम जप का ही प्रावधान है । |
| 696. |
शास्त्रों का सूत्र है कि तीव्र और अखंड नाम जप ही कल्याण करता है । |
| 697. |
नाम जप की तीव्रता हमारे पाप नाश के लिए अत्यंत जरूरी है । |
| 698. |
प्रभु मिलन की तीव्रता होने पर और हमारी मनोवृत्ति प्रभु मिलन के लिए होने पर प्रभु दूर नहीं बल्कि बहुत समीप हैं । |
| 699. |
नाम जप कलियुग का प्रधान साधन है । फिर अन्य साधन के रूप में हम पूजा भी करें, कथा भी सुनें या अन्य कोई साधन भी करें मगर नाम जप जीवन में प्रधानता से होनी चाहिए । |
| 700. |
कलियुग में नाम जप की प्रधानता रखनी चाहिए और सभी साधनों के साथ आगे बढ़ते जाना चाहिए, यही हमारे शास्त्रों का अंतिम सिद्धांत है । |
| 701. |
प्रभु नाम के जयघोष से भक्त धरती पर ऐसा गौरव निर्माण कर देते हैं कि स्वयं प्रभु और प्रभु का धाम चलकर धरती पर आ जाते हैं । |
| 702. |
देवर्षि प्रभु श्री नारदजी से प्रभु कहते हैं कि मैं कभी-कभी ही श्रीबैकुंठ में रहता हूँ पर निश्चित रूप से मेरे मिलने का एक पक्का स्थान है और वह है मेरे भक्तों का हृदय । |
| 703. |
प्रभु का नित्य निवास केवल भक्तों के हृदय में ही होता है । |
| 704. |
प्रभु कहते हैं कि भक्तों के हृदय में निवास करके जब वे मेरे नाम का संकीर्तन करते हैं तो मैं उसका श्रवण करता हूँ और उसका आनंद लेता हूँ । |
| 705. |
जब संकीर्तन करते हुए भक्त नृत्य करने लग जाते हैं तो प्रभु की श्रीआँखों से श्रीआंसू बहने लगते हैं और प्रभु अपने भक्तों का भीगे नैनों से दर्शन करते हैं । |
| 706. |
कलियुग में गति हेतु “श्रीहरि नाम केवलम्” कहा गया है यानी केवल प्रभु के नाम से ही गति है । |
| 707. |
सारे साधन अपने स्थान पर योग्य हैं पर सभी साधन को नाम की अपेक्षा होती है पर नाम को किसी भी साधन की अपेक्षा नहीं होती । |
| 708. |
प्रभु ने अपने नाम जप का सरल और सुगम साधन कलियुग में जीव के उद्धार हेतु दिया है । |
| 709. |
प्रभु कितने करुणामय हैं कि अपने एक नाम की जगह सहस्त्रनाम हमें दे दिए । |
| 710. |
नाम का जप या उच्चारण कब करना चाहिए इसके लिए प्रभु ने कोई समय की शर्त नहीं रखी, कोई अन्य शर्त नहीं लगाई । |
| 711. |
प्रभु घोषणा करके कहते हैं कि मैं केवल भक्ति से ही वशीभूत होता हूँ । |
| 712. |
प्रभु से सदैव यह मांगना चाहिए कि हमारा अनुराग प्रभु से हो जाए । |
| 713. |
केवल नाम जप ही नहीं करना चाहिए, नाम से प्रेम करना चाहिए, नाम से अनुराग होना चाहिए । |
| 714. |
बिना बुलाए प्रभु को अपने पास आने हेतु बाध्य करने का सर्वोत्तम साधन है प्रभु का नाम जप । |
| 715. |
जीवन में अपने को भाग्यवान उस दिन मानना चाहिए जिस दिन प्रभु के नाम में श्रद्धा जागृत हो जाए । |
| 716. |
भक्तों को प्रभु के बारे में बोलना ही अत्यंत प्रिय लगता है । |
| 717. |
भक्तों की जिह्वा प्रभु के नाम जप में, प्रभु की कथा के वर्णन में ही लगी रहती है । |
| 718. |
प्रभु के नाम, रूप, श्रीलीला का गान करने से प्रभु उस हृदय में आकर विराजमान हो जाते हैं । |
| 719. |
हम वहाँ होते हैं जहाँ हमारा मन होता है । इसलिए अपने मन को प्रभु तक पहुँचाने का अभ्यास करना चाहिए । |
| 720. |
मन की चंचलता को रोक पाने का एक ही उपाय है कि मन को प्रभु में लगाया जाए । |
| 721. |
वाणी का अनुगमन मन करता है । इसलिए यह सिद्धांत है कि पहले वाणी से प्रभु का नाम जप करें तो मन अपने आप प्रभु में लग जाएगा । |
| 722. |
भक्तों की विशेषता होती है कि प्रभु का नाम उनकी जिह्वा पर निरंतर नृत्य करता रहता है । |
| 723. |
हजारों जन्मों के पुण्य एकत्रित होते हैं तो ही जिह्वा पर प्रभु का नाम आता है । |
| 724. |
प्रभु का नाम इतना सुलभ है कि कोई भी ले सकता है और इतना दुर्लभ है कि इसका महत्व जानते हुए भी पाप के कारण हमसे लिया नहीं जाता । |
| 725. |
प्रभु का नाम हमारे मुँह से निकला तो मानना चाहिए कि सहस्त्र जन्मों के पुण्य का फल मिल गया । |
| 726. |
ध्यानयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग के संपूर्ण फल को और समस्त सिद्धियों को प्रभु का नाम जप हमें प्रदान करवा देता है । |
| 727. |
निर्गुणवादी और सगुणवादी सभी संतों और संप्रदायों का एकमत है कि प्रभु का नाम ही अंत में हमारा कल्याण करता है । दोनों संप्रदायों में प्रभु नाम का उच्चारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है । |
| 728. |
जैसे दीपक घर में बाहर-भीतर रोशनी देता है वैसे ही प्रभु नाम की मणि बाहर-भीतर दोनों तरफ उजाला देती है । |
| 729. |
प्रभु का नाम संसार के प्रपंच जैसे व्यापार, परिवार, संपत्ति, वैभव हेतु भी और प्रभु का नाम मुक्ति, मोक्ष, परमार्थ, निष्काम भक्ति हेतु भी एकमात्र साधन है । |
| 730. |
प्रभु कृपा का सर्वोत्तम लक्षण संपत्ति और वैभव प्राप्त होना नहीं है बल्कि प्रभु कृपा का सर्वोत्तम लक्षण है प्रभु की भक्ति प्राप्त होना और प्रभु के नाम में रुचि होना । |
| 731. |
प्रभु नाम को छोड़कर हमारी जिह्वा और मन कहीं जाने को तैयार ही नहीं होना चाहिए । |
| 732. |
प्रभु का नाम कलियुग का अंतिम साधन है । इसमें भी अंतिम तत्व नाम लेने का भाव है । हम किस भाव से नाम ले रहे हैं, यह सबसे महत्वपूर्ण है । |
| 733. |
तृप्त व्यक्ति जैसे शांति को प्राप्त होता है वैसे ही प्रभु प्राप्ति के बाद जीव सर्वोच्च शांति को प्राप्त होता है । |
| 734. |
संतों की विशेषता होती है कि प्रभु नाम के साथ संकीर्तन करते हुए प्रभु के ध्यान में रम जाते हैं । |
| 735. |
संसार के श्रेष्ठ संत चाहे वह किसी संप्रदाय या साधन मार्ग के हो उनका अंतिम मत और अंतिम लक्ष्य प्रभु की भक्ति ही होती है । |
| 736. |
हमारे हृदय के राज्य सिंहासन पर सदैव के लिए प्रभु का राज्याभिषेक कर देना चाहिए । |
| 737. |
हमारे हृदय में प्रभु को स्थान देना चाहिए और अन्य किसी विषय, वासना और दुनियादारी के लिए स्थान ही नहीं छोड़ना चाहिए । |
| 738. |
भक्तों को संसार के व्यक्ति नहीं दिखते, उन व्यक्ति के भीतर सदैव प्रभु का ही उन्हें दर्शन होता रहता है इसलिए वे छोटे-बड़े सभी जीवों को प्रणाम करते हैं । |
| 739. |
निर्जीव वस्तु में भी कण-कण में भक्त को परमात्मा का ही अनुसंधान होता है और वे उन्हें प्रणाम करते हैं । इतनी बड़ी अवस्था में भक्त पहुँच जाते हैं । |
| 740. |
भक्ति की पराकाष्ठा तब होती है जब भक्त का स्वभाव बन जाता है कि जो भी सामने आ जाए उसमें प्रभु का दर्शन करके उसके सामने झुक जाना । |
| 741. |
जीवन में सदैव छोटे और विनम्र बने रहना चाहिए, कभी भी बड़े बनने की भूल नहीं करनी चाहिए तभी हम प्रभु को प्रिय होंगे । |
| 742. |
यह हमें देखना है कि दुनिया में बड़े बनकर अहंकार युक्त जीवन जीकर हम प्रभु से दूर होना चाहते हैं या छोटे बनकर प्रभु के समीप रहना चाहते हैं । |
| 743. |
प्रभु के पास रहना चाहते हैं तो छोटा बनना सीखना पड़ेगा । यह भक्ति का परम सूत्र है । श्री उद्धवजी को प्रभु उपदेश में कहते हैं कि छोटे बन जाओ, छोटे बनने का अभ्यास करो, सबकी वंदना करो, सबको प्रणाम करो । प्रणाम से विनम्रता और कोमलता जीवन में आती है और इससे प्रभु मिल जाते हैं । |
| 744. |
विनम्रता ही भक्तों का धन होता है । |
| 745. |
जीवन में अकड़कर चलने वाला और दया भाव नहीं रखने वाला कभी भक्त नहीं हो सकता । |
| 746. |
भक्तों के मुँह से निरंतर प्रभु की जय-जयकार ही निकलती रहती है । |
| 747. |
हमारे व्यवहार द्वारा किसी को कष्ट न हो, यह भक्ति का लक्षण होता है । |
| 748. |
भक्ति की पहली सीढ़ी यह है कि सबको प्रणाम करना सीखना चाहिए । व्यक्ति और पदार्थ को नहीं देखना चाहिए बल्कि उनके भीतर प्रभु को देखना चाहिए और प्रणाम करना चाहिए । |
| 749. |
मनुष्य का स्वभाव है कि झुकने में उसे कष्ट होता है । इसलिए प्रभु सबको प्रणाम करने की बात हमें कहते हैं जिससे हमारा अंतःकरण कोमल होता है । |
| 750. |
जीवन में अहंकार की गंदगी हमारे भीतर रहेगी तो वह हमें प्रभु के पास नहीं जाने देगी । |
| 751. |
भगवत् विग्रह के सामने साष्टांग दंडवत प्रणाम करने का प्रावधान है, सिर्फ प्रणाम का प्रावधान नहीं है । |
| 752. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में श्री अर्जुनजी के नहीं पूछने पर भी प्रभु बिना पूछे उन्हें आगे बताते जाते हैं । यह श्री अर्जुनजी की प्रेमाभक्ति के कारण हुआ कि प्रभु की इच्छा होती है कि मैं अपने भक्त को सब कुछ बता दूं । |
| 753. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी उपमा देकर कहते हैं कि श्री अर्जुनजी चकोर पक्षी की तरह बैठे हैं और श्री चंद्रदेवजी की तरह श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में प्रभु अमृत बरसा रहे हैं । |
| 754. |
प्रभु की श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में अमृत वर्षा से पूरा ब्रह्मांड भक्ति के ज्ञान से तृप्त हो गया, ऐसा संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं । |
| 755. |
प्रभु की श्रीलीलाओं का ज्ञानयज्ञ हमारे जीवन में निरंतर चलते रहना चाहिए । |
| 756. |
अगर हमारी अगली पीढ़ी को धर्मयुक्त रखना है तो प्रभु के श्रीचरित्र का ज्ञानयज्ञ निरंतर परिवार में होते रहना चाहिए । |
| 757. |
प्रभु को मैं बुद्धि से जानना चाहता हूँ, यह ज्ञान का मार्ग है । प्रभु को मैं श्रद्धा से मानना चाहता हूँ, यह भक्ति का मार्ग है । |
| 758. |
प्रभु के भिन्न स्वरूप हो सकते हैं, भिन्न नाम हो सकते हैं, भिन्न दर्शन हो सकते हैं पर प्रभु एक ही हैं, यह सभी शास्त्रों का सिद्धांत है । |
| 759. |
प्रभु का अनुभव करना ही भक्ति का परम लक्ष्य होता है । |
| 760. |
श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवद् गीताजी और श्री रामचरितमानसजी भक्तों को जीवन में निरंतर पढ़ते रहना चाहिए, इससे उनकी भक्ति पुष्ट होती है । |
| 761. |
सभी जीवों में प्रभु के दर्शन करके किसी का जीवन में बुरा नहीं करने का विचार अध्यात्म की सच्ची ऊँचाई है । |
| 762. |
भक्त की दृष्टि संसार को देखते समय यह होती है कि सभी में मेरे प्रभु ही हैं क्योंकि सभी मेरे प्रभु ही बने हुए हैं । |
| 763. |
जो समस्त प्राणियों में अपने प्रभु को देखता है और प्रभु में समस्त प्राणियों को देखता है वह अध्यात्म की अंतिम ऊँचाई तक पहुँच जाता है । |
| 764. |
प्रभु मायापति हैं और माया से अतीत हैं यानी माया प्रभु के अधीन है । |
| 765. |
अत्यंत श्रेष्ठ भक्त नित्य अपने चित्त में प्रभु को समाए रखते हैं । |
| 766. |
भक्ति का उदय होने पर सर्वत्र प्रभु की प्रतीति होती है यानी सारे संसार में एक प्रभु ही दिखते हैं । |
| 767. |
एक सच्चिदानंद प्रभु ने एक से अनेक होने का संकल्प किया और पूरे जगत का निर्माण हो गया । |
| 768. |
जो भी संसार में घट रहा है वह प्रभु की आज्ञा से और प्रभु की अनुमति से होता है क्योंकि सारे संसार के एकमात्र शासक प्रभु ही हैं । |
| 769. |
सभी ग्रह और नक्षत्र अपनी मर्यादा में रहते हैं यानी अपनी गति में रहते हैं और चलते हैं । यह प्रभु की आज्ञा से ही संभव होता है । |
| 770. |
जीव को अपने उद्धार के लिए अंतिम उपाय करना चाहिए यानी प्रभु की शरणागति जीवन में लेनी चाहिए । |
| 771. |
जो अपनी आध्यात्मिक उन्नति करना चाहता है उसको अंतिम आलंबन के रूप में जीवन में प्रभु की शरणागति लेनी चाहिए । |
| 772. |
प्रभु कहते हैं कि सभी देवताओं को प्रभु अपनी शक्ति देकर उनसे कार्य करवाते हैं । |
| 773. |
एक कण भी ब्रह्मांड में ऐसा नहीं है जहाँ पर प्रभु का निवास नहीं हो । |
| 774. |
जिस स्तंभ में श्री प्रह्लादजी को प्रभु के दर्शन हुए उसी स्तंभ में हिरण्यकशिपु को प्रभु नहीं दिखे । यह सिर्फ श्री प्रह्लादजी के भक्ति और प्रभु प्रेम के कारण हुआ कि उनको हर जगह प्रभु के दर्शन हुए । |
| 775. |
पूरे ब्रह्मांड में भीतर और बाहर कण-कण में प्रभु ही हैं । |
| 776. |
प्रभु को हम जीवनभर दूर करने के कारण संसार में कष्ट पाते हैं । हमने प्रभु को भुला दिया इसलिए ही जीवन में कष्ट पाते हैं । |
| 777. |
भक्ति में तीव्रता लाने से प्रभु तक पहुँचने में जो समय लगता है वह आधा हो जाता है । |
| 778. |
सत्कर्म करने से हम स्वर्ग जाते हैं, हमारी दुर्गति नहीं होती पर उससे प्रभु प्राप्ति भी नहीं होती । |
| 779. |
स्वर्ग में हम तब तक ही रह सकते हैं जब तक हमारे खाते में पुण्य जमा है । पुण्य समाप्त होता है तो वहाँ से धक्का लगता है और मृत्युलोक में वापस आना पड़ता है । |
| 780. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी पूछते हैं कि बहुत पुण्य कमाया, फिर स्वर्ग गए, फिर वहाँ से पुण्य समाप्त होने पर जोर से धक्का लगा, फिर वापस शून्य पर आकर खड़े हो गए । हमें क्या मिला ? संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि इसलिए जीवन में भक्ति करके प्रभु की प्राप्ति ही करनी चाहिए । |
| 781. |
जिन्होंने प्रभु की भक्ति नहीं करी और केवल संसार किया उन्होंने जीवन में धान को छोड़कर भूसा इकट्ठा किया । संत कहते हैं कि भूसा चार पैर वाले खाते हैं, अगर दो पैर वाले मनुष्य भी भूसा खाना चाहते हैं तो यह बहुत दुःख की बात है । |
| 782. |
जो लोग अन्य योनियों में जाते हैं उन्होंने अपने मानव शरीर का और मानव जीवन का सही उपयोग नहीं किया । |
| 783. |
जीव की अंतिम गति प्रभु से मिलन है । प्रभु से मिले बिना जीव शांत नहीं हो सकता । बहुत भाग्यवान वे लोग होते हैं जो यह रहस्य समझ लेते हैं और प्रभु की आराधना में और प्रभु की भक्ति में लग जाते हैं । |
| 784. |
बहुत कम लोग होते हैं जो संसार के प्रलोभन में नहीं फंसते और सिर्फ और सिर्फ प्रभु की भक्ति करते हैं । |
| 785. |
प्रभु कहते हैं वे भाग्यवान भक्त होते हैं जिनमें प्रभु की सेवा करने की परम इच्छा होती है । |
| 786. |
अंतरात्मा में प्रभु पर परम विश्वास करके अपना पूरा जीवन प्रभु को समर्पित कर देना चाहिए, ऐसा शास्त्र हमें उपदेश देते हैं । |
| 787. |
प्रभु से दूर होकर कुछ भी करना भक्त को कभी भी नहीं सुहाता । |
| 788. |
प्रभु के बिना जीवन का एक क्षण भी हमें व्यर्थ नहीं करना चाहिए । |
| 789. |
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जीवन में काम को प्रधानता देते हैं और प्रभु को याद करने का उनका उपक्रम सबसे अंत में होता है, जो कि गलत है । |
| 790. |
जो सच्चा भक्त होता है उसके जीवन में प्राथमिकता केवल प्रभु ही होते हैं । प्रभु की सेवा, प्रभु की पूजा, प्रभु की भक्ति और प्रभु के अनुसंधान में ही वह पूरा दिन व्यतीत करता है । |
| 791. |
शास्त्र कहते हैं कि जैसे गर्भस्थ बालक माँ के अधीन होता है, माँ जो भी खिलाती-पिलाती है वह खाता-पीता है, उसकी प्राथमिकता उसकी माँ होती है । वैसे ही भक्त प्रभु के अधीन होते हैं और उनकी प्राथमिकता प्रभु ही होते हैं । |
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जो भक्त प्रभु के अलावा किसी को नहीं मानता है, ऐसे अनन्य भक्त की चिंता प्रभु करते हैं । |
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प्रभु के अनन्य भक्त अपना पूरा जीवन प्रभु को समर्पित कर चुके होते हैं । |
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अनन्य भक्त प्रभु के पीछे लग जाते हैं, प्रभु की सेवा में लग जाते हैं, प्रभु की भक्ति में लग जाते हैं और उनका सब हित प्रभु को ही करना पड़ता है । |
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अनन्य भक्त कभी प्रभु से यह नहीं कहते कि मेरे लिए यह कर दें, वे अपना भार भी प्रभु पर नहीं डालते, मगर प्रभु खुद उनके लिए स्वतः बिना बोले सब कुछ करते हैं । |
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अनन्य भक्त का समर्पण इतना होता है कि प्रभु अपने भक्त की सेवा के लिए बाध्य हो जाते हैं क्योंकि भक्ति का ऋण प्रभु अपने ऊपर मानते हैं । |
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अनन्य भक्ति की पराकाष्ठा यह होती है कि जीवन में केवल प्रभु और प्रभु के अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहिए । |
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एक छोटे नवजात पक्षी का बच्चा जिसके पंख नहीं आए और आँखें नहीं खुली, वह अपनी माँ के आश्रित रहता है क्योंकि न वह उड़ सकता है और न ही देख सकता है । जैसे नवजात पक्षी का बच्चा अपनी माँ के अनन्य रहता है, ऐसे ही भक्त अपनी आँखें (ज्ञान) और पंख (पुरुषार्थ) को बंद करके केवल प्रभु के भरोसे रहता है । |
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जैसे गौ-माता का ध्यान अपने बछड़े की तरफ ही होता है, वैसे ही प्रभु का ध्यान सिर्फ अपने भक्त पर ही होता है । |
| 800. |
प्रभु अपने भक्त के पीछे-पीछे अपने श्रीधाम को छोड़कर चले आते हैं । |