| 001. |
भक्त का सिर्फ एक ही चिंतन होता है और वह प्रभु का चिंतन होता है । |
| 002. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे अनन्य भक्तों के सभी कार्य मैं (प्रभु) करता हूँ, उनको सभी सुविधा मैं स्वयं उपलब्ध करवाता हूँ । |
| 003. |
भक्तों को दाल-रोटी कमाने की विद्या में रुचि नहीं होती, वे आध्यात्मिक विद्या में रुचि रखते हैं जिससे जीवन में प्रभु को प्राप्त किया जा सके । |
| 004. |
भक्त प्रभु की इतनी सेवा करता है, इतनी सेवा करता है, इतनी सेवा करता है कि प्रभु को अपने अधीन कर लेता है । |
| 005. |
जो प्रभु के अनन्य हो जाते हैं, प्रभु कहते हैं उनका सारा आश्रय मैं (प्रभु) बन जाता हूँ । |
| 006. |
अनन्य भक्त को आध्यात्मिक साधन करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि सभी साधन स्वयं पूर्णता के साथ आकर उनके भीतर प्रभु कृपा से उपस्थित हो जाते हैं । |
| 007. |
प्रभु के लिए लिया एक छोटा-सा नियम पर दृढ़ता से उसका पालन करने पर वह जीवन में बहुत बड़ा फल देता है । |
| 008. |
जो छोटे-छोटे नियम प्रभु के लिए लेता है और उसको पालन करने का लक्ष्य जीवन में निभाता है, ऐसा करने वाला अंत में प्रभु कृपा से अपना कल्याण कर लेता है । |
| 009. |
जो प्रभु के द्वार से बिना मांगे आ जाए उसे अमृत मानकर स्वीकार करना चाहिए, ऐसे अमृत से ही हमारा जीवन अमृतमय होता है । |
| 010. |
प्रभु की कृपा से ही हम प्रभु के लिए अपने साधन को संभाल पाते हैं । |
| 011. |
प्रभु के लिए होने वाले साधन को प्रभु ही संभालेंगे, यह विश्वास रखना भक्ति का एक अंग है । |
| 012. |
प्रभु के भरोसे जीवन में रहने पर सब कुछ प्रभु देते हैं और जो दिया है उसकी रक्षा भी प्रभु करते हैं । |
| 013. |
सभी देवतागण प्रभु के श्रीअंगों में व्याप्त हैं और अंत में प्रभु उन्हें माध्यम बनाकर ही हमें फल देते हैं । |
| 014. |
जीवन में प्रधानता सिर्फ और सिर्फ प्रभु की ही होनी चाहिए । |
| 015. |
प्रभु के बराबर कोई भी सर्वोपरि नहीं हो सकता । |
| 016. |
प्रभु से बड़ा या प्रभु के समकक्ष कोई देवी-देवतागण, ऋषि, सिद्ध पुरुष, गुरु, पितर कोई भी नहीं हो सकता । |
| 017. |
सद्गुरुदेव प्रभु से मिलने के साधन होने चाहिए । |
| 018. |
जिन सद्गुरुदेव में श्रीगोविंद का मार्ग बताने की सामर्थ्य नहीं, श्रीगोविंद से मिलाने की क्षमता नहीं, वे गुरु कहलाने योग्य नहीं हैं । |
| 019. |
देवतागण, सद्गुरुदेव और पितरगण हमारा उद्धार करते हैं पर प्रभु की आज्ञा से और प्रभु की शक्ति से ही करते हैं । |
| 020. |
प्रभु ने सभी देवतागणों के विभाग बांट रखे हैं पर वहाँ प्रभु की सत्ता ही चलती है और सब कुछ प्रभु की आज्ञा से ही होता है । |
| 021. |
प्रभु की कृपा का मूल्यांकन जीवन में कभी भी कम करके नहीं आंकना चाहिए । |
| 022. |
प्रभु की भक्ति बिना हमारी सद्गति कैसे भी संभव नहीं हो सकती । |
| 023. |
जीवन में प्रभु की भक्ति की ही प्रधानता होनी चाहिए । |
| 024. |
प्रभु कहते हैं कि जो मेरी भक्ति करते हैं, मेरी पूजा करते हैं, मेरे लिए जीवन जीते हैं, नेत्रों से मेरे दर्शन की आशा रखते हैं, कानों के प्याले बनाकर मेरी कथा सुनते हैं, जिह्वा से मेरा प्रसाद ग्रहण करते हैं, रात-दिन मेरा अनुसंधान करते हैं, अपने जीवन का केंद्र मुझे बना लेते हैं, उनके ऊपर मैं सर्वदा अतिशय कृपा करता हूँ । |
| 025. |
अभिमान को शास्त्रों में गलत माना गया है मगर यह अभिमान कि मैं प्रभु का नित्य सेवक हूँ, इसको संतों ने मान्य किया है । संतों ने चाहा है कि ऐसा अभिमान हरदम उनके जीवन में टिका रहे, बना रहे । |
| 026. |
अगर हम भक्ति करते हैं तो हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारे कोई भी कृत्य से प्रभु को कभी भी दुःख या क्लेश नहीं पहुँचे । |
| 027. |
प्रभु विनोद में कहते हैं कि मेरे भक्तों में भी लोभ होता है पर वह ज्यादा-से-ज्यादा माला से नाम जप करने का, प्रभु के ज्यादा दर्शन करने का, प्रभु की ज्यादा कथा सुनने का, प्रभु की ज्यादा सेवा करने का और ज्यादा-से-ज्यादा प्रभु से प्रेम करने का लोभ होता है । |
| 028. |
संसार के लोगों को संसारी कामनाएं होती है पर भक्तों को भगवत् विषय की कामना होती है क्योंकि उनके जीवन की हर चेष्टा प्रभु के लिए होती है । |
| 029. |
भक्ति का विश्राम जीवन में कभी नहीं होना चाहिए । भक्ति निरंतर चलती ही रहनी चाहिए । उसका क्रम जीवन में कभी भी खंडित नहीं होने देना चाहिए । |
| 030. |
प्रभु की भक्ति निरंतर होती रहेगी तभी भक्त और भगवान का रिश्ता निरंतर बना रहेगा । |
| 031. |
प्रभु कहते हैं कि भक्त अपनी आत्मा को ही मुझे समर्पित कर देता है, वह अपने आपको ही मुझे अर्पण कर देता है । |
| 032. |
भक्त के मन में यह भाव होता है कि मैं अब प्रभु का हो चुका हूँ, मैं संसार में अब किसी का नहीं हूँ । |
| 033. |
प्रभु कहते हैं कि सभी साधनों का शिरोमणि साधन है कि भक्ति के अंतर्गत मुझसे ज्यादा-से-ज्यादा प्रेम करना । |
| 034. |
प्रभु के लिए जिसने संसार का विसर्जन कर लिया, अपने अहंकार का विसर्जन कर लिया वह प्रभु को प्राप्त कर लेता है । |
| 035. |
संत प्रभु से यह मांगते हैं कि उन्हें छोटा बना कर रखें, कभी बड़ा नहीं बनाएं क्योंकि बड़ों की पहुँच प्रभु तक नहीं होती । प्रभु छोटे को ही अपनाते हैं । |
| 036. |
प्रभु को सर्वाधिक प्रिय है भक्तों के भीतर दीनता देखना, दैन्य भाव रखे बिना भक्ति में सफलता कदापि संभव नहीं है । |
| 037. |
प्रभु कहते हैं कि भक्ति और श्रद्धा से मुझे एक पत्ता भी चढ़ा दिया जाए तो मैं उससे भी पूर्ण रूप से तृप्त हो जाता हूँ । |
| 038. |
प्रभु कहते हैं कि भक्तों के लिए मेरे सब नियम टूट जाते हैं, मैं सभी नियमों को भुला देता हूँ । |
| 039. |
प्रभु अपने भक्तों के लिए कहते हैं कि जो वे मांगते हैं वह उन्हें सदा मिलता है और जब भी वे मेरा द्वार खटखटाते हैं मेरा द्वार उनके लिए सदा खुलता है । |
| 040. |
भगवती शबरीजी का शरीर बूढ़ा हो गया पर उनका प्रभु पर किया भरोसा यौवन रहा । इसलिए प्रभु उनके उस विश्वास को पूरा करने के लिए और अपने भक्त का दर्शन करने के लिए मार्ग बदलकर और अपने नियम तोड़ कर आए । |
| 041. |
प्रभु कहते हैं कि जिनको प्रभु की धुन लग जाती है उन्हें फिर मेरा ध्यान करने की जरूरत नहीं रहती क्योंकि प्रभु सदैव उनके ध्यान में स्वतः ही रहते हैं । |
| 042. |
प्रभु कहते हैं श्री उद्धवजी से कि श्रीगोपीजन प्रेमाभक्ति की उस अवस्था में पहुँच गई थी जहाँ उनका ध्यान कभी भी प्रभु से हटता नहीं था । प्रभु आगे कहते हैं कि योगीजन जन्म-जन्म लगा देते हैं मेरे श्रीकमलचरणों का हृदय में ध्यान करने के लिए जो श्रीगोपीजन से सहज ही होता था । |
| 043. |
श्रीगोपीजन का इतना ध्यान प्रभु के श्रीकमलचरणों में लग चुका था कि वे कोशिश करती थी कि थोड़ा-सा ध्यान हटे तो वे संसार का काम करें । इतनी ऊँची अवस्था श्रीगोपीजन ने प्राप्त कर ली थी । |
| 044. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु का दर्शन पहले हृदय में होता है फिर प्रत्यक्ष रूप से दर्शन होंगे । |
| 045. |
भगवती शबरीजी ने प्रभु को साष्टांग दंडवत प्रणाम ही नहीं किया बल्कि उनके श्रीकमलचरणों में लिपट गई । प्रभु कहते हैं कि भक्तों का प्रभु के श्रीकमलचरणों पर पहला अधिकार होता है । |
| 046. |
श्री लक्ष्मणजी देखते रहे और प्रभु ने अपने नियम तोड़कर भगवती शबरीजी के जूठे बेर खाए और उसकी भक्ति की मिठास के कारण उसका गुण गिनाते हुए कभी थके नहीं । |
| 047. |
संत कहते हैं कि भगवती शबरीजी के जूठे बेर विश्व विजयी बेर बन गए । भगवती शबरीजी के पूरे जीवन की भक्तिरूपी तपस्या इसका रहस्य था । |
| 048. |
भक्ति के कारण भगवती शबरीजी के जो बेर थे वे भक्ति शास्त्र में अमर हो गए । |
| 049. |
प्रभु ने भगवती शबरीजी से कहा कि मैं सिर्फ भक्ति का और प्रेम का एक नाता मानता हूँ । |
| 050. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि मुझे अर्पण करने के लिए सिर्फ भाव चाहिए । भगवती शबरीजी के बेर में वह प्रेम का भाव था तो वह प्रभु को अर्पण हो गया । |
| 051. |
श्री प्रह्लादजी ने अपने असुर बाल मित्रों को समझाते हुए कहा कि प्रभु के लिए बाद बाकी सब बातें गौण हैं, सिर्फ निर्मल प्रेमाभक्ति ही प्रभु के लिए प्रधान है । |
| 052. |
भगवती द्रौपदीजी को अंतिम विश्वास प्रभु का था । उन्होंने सबको आजमा लिया था । उनके इस अंतिम विश्वास का ऋण उतारने के लिए और उनकी लाज बचाने के लिए प्रभु वस्त्र बनकर उनसे लिपट गए । संतों ने इसे प्रभु का अदभुत वस्त्र-अवतार बताया है । |
| 053. |
श्री गजेंद्रजी का एक फूल, जो उन्होंने अंतिम अवस्था में प्रभु को अर्पण किया, वह अमर हो गया क्योंकि उसके पीछे उनकी अनन्यता जग गई । |
| 054. |
भगवती द्रौपदीजी के अक्षयपात्र का एक छोटा-सा पत्ता अमर हो गया और प्रभु ने उससे पूरे ब्रह्मांड को तृप्त कर दिया । यह भगवती द्रौपदीजी की अनन्यता के भाव के कारण हुआ । |
| 055. |
प्रभु कहते हैं कि अनन्यता के कारण उन्होंने श्री सुदामाजी के द्वारा अर्पित चिउड़े को बिना किसी लज्जा के स्वीकार किया । प्रभु कहते हैं कि सुदामाजी ने मुझे चिउड़े दिए नहीं बल्कि मैंने झपट्टा मारकर उसे छीन लिया और शिष्टाचार को भूलकर उसे आरोगा । |
| 056. |
प्रभु ने श्री सुदामाजी के चिउड़े की पोटली की गांठों को जैसे-जैसे खोला श्री सुदामाजी की मस्तक पर लिखी विपत्ति की गांठे अपने आप ही खुल गई । |
| 057. |
श्री सुदामाजी के चिउड़े में उनके जीवनभर के भक्ति भाव का स्वाद था जो प्रभु ने सहर्ष स्वीकार किया । |
| 058. |
हम पदार्थ को देखते हैं पर प्रभु उसके पीछे छिपे भाव को देखते हैं । प्रभु की दृष्टि ऐसी है कि पदार्थ के पीछे जाकर उसके भाव को ग्रहण कर लेते हैं । |
| 059. |
कुछ ग्राम चिउड़े के बाजार मूल्य का आकलन प्रभु ने नहीं किया बल्कि उस चिउड़े के पीछे छिपे प्रेम भाव का आकलन प्रभु ने किया जो कि प्रभु के लिए अमूल्य और अतुलनीय था । |
| 060. |
प्रभु सिर्फ भक्ति और प्रेम के भाव को ही ग्रहण करना जानते हैं । अकेली भक्ति और प्रेम ही प्रभु को भक्त के अधीन कर देती है । प्रभु कहते हैं कि जो ज्ञान से नहीं होता, ध्यान से नहीं होता वह सिर्फ प्रेमाभक्ति से संभव हो जाता है । |
| 061. |
प्रभु कहते हैं कि वे छोटे-बड़े का, जाति का और आश्रम का विचार नहीं करते । जो प्रभु की ज्यादा भक्ति करता है वह प्रभु के लिए सबसे बड़ा होता है । |
| 062. |
“भक्ति से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है” से भी ज्यादा यह कहना सही होगा कि “भक्ति से ही भगवान को प्राप्त किया जा सकता है” । यहाँ “ही” सबसे महत्वपूर्ण शब्द है । |
| 063. |
संत सबको समझाते हैं कि भक्ति बिना जीव की गति नहीं है । |
| 064. |
जीवन में भक्ति भाव को कभी भी और किसी भी सूरत में खंडित नहीं होने देना चाहिए । |
| 065. |
प्रभु कहते हैं कि जीवन में सदैव अपने हृदय में भक्ति भाव जागृत करके रखना चाहिए । |
| 066. |
मानव जन्म लेकर श्रेष्ठतम पुरुषार्थ यह होता है कि जीवन में प्रभु के नाम, रूप, श्रीलीला के लिए सदैव रोमांचित और व्याकुल बने रहें । |
| 067. |
जिसने भक्ति करके अजीत प्रभु का मन जीत लिया उसने मानो सारा संसार ही जीत लिया । |
| 068. |
प्रभु कहते हैं कि मुझे अपने मन के मंदिर में सदैव याद रखो । |
| 069. |
मन के मंदिर में प्रभु की भाव प्रतिष्ठा कर लेना सबसे श्रेष्ठ होता है । |
| 070. |
हमारे मन में क्षणभर के लिए प्रभु आते हैं फिर इतने सारे संसार के विषय और लोग आ जाते हैं कि प्रभु वापस चले जाते हैं । |
| 071. |
सभी श्रीग्रंथों का मूल सिद्धांत है कि प्रभु की भाव प्रतिष्ठा अपने मन में करनी चाहिए । |
| 072. |
अपना हर कर्म प्रभु को अर्पण करना चाहिए और उस कर्म से अपना संबंध तोड़ लेना चाहिए । |
| 073. |
अच्छा हुआ, बुरा हुआ, ज्यादा हुआ, कम हुआ जो भी हुआ सब प्रभु को अर्पण करना चाहिए । |
| 074. |
सिर्फ मंत्र बोलकर अर्पण नहीं बल्कि पूरी भावना से और मन की गहराई से प्रभु को कर्म अर्पण करना चाहिए । |
| 075. |
कर्म अर्पण के पीछे भावना यह होनी चाहिए कि जो भी कर रहा हूँ उसे करवाने वाले प्रभु हैं इसलिए कर्म का लाभ, हानि और श्रेय सब प्रभु का ही है । |
| 076. |
अगर सच्चे मन से कर्म प्रभु को अर्पण हो जाता है तो हम जीवन में सदैव तरोताजा रहेंगे, तनाव रहित रहेंगे और ऊर्जा से भरे हुए रहेंगे । |
| 077. |
कर्म प्रभु को अर्पण हो गया तो भूतकाल का तनाव खत्म हो जाता है और भविष्य की चिंता भी खत्म हो जाती है । |
| 078. |
मंदिर में परिक्रमा का सच्चा अर्थ यह होता है कि जैसे मंदिर में प्रभु केंद्र में होते हैं और हम उनकी परिक्रमा करते हैं वैसे ही हमारे जीवन के केंद्र में हमने प्रभु को बसा लिया है । |
| 079. |
शुद्ध सत्कर्म वह होता है जिसके बारे में आज तक हमने किसी को बताया नहीं है और उसे गुप्त रखा है । |
| 080. |
अगर हम अपने कर्म सच्चे मन से प्रभु को अर्पण करने में सफल हो गए तो जैसे अग्नि में आहुति देने से सब भस्म हो जाता है वैसे ही सभी कर्मफल भस्म हो जाते हैं । फिर उन्हें भोगने के लिए जन्म-मरण का चक्र भी समाप्त हो जाता है । |
| 081. |
सर्वोच्च भाग्य उसका होता है जो जीवन में भगवत् प्राप्ति के लिए प्रयासरत होता है । |
| 082. |
भगवत् प्राप्ति कठिन नहीं है पर उसके लिए भक्ति का साधन करना अनिवार्य है । |
| 083. |
श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि जीव मेरा हो जाए, मुझसे प्रेम कर ले, बस इतना ही मैं चाहता हूँ । |
| 084. |
प्रभु पदार्थ से खुश नहीं होते बल्कि उसके पीछे छिपे प्रेम भाव से खुश होते हैं । |
| 085. |
पदार्थ से प्रभु समझौता कर लेते हैं पर प्रेम से प्रभु कभी भी समझौता नहीं करते । |
| 086. |
प्रभु के बहुत कम शुद्ध प्रेमी भक्त होते हैं इसलिए प्रभु प्रेम चाहते हैं और प्रेम से कभी भी समझौता नहीं करते । |
| 087. |
होने वाले कर्म को, कर्म के फल को और कर्म के कर्ता भाव को प्रभु को अर्पण कर देना चाहिए । यह बात छोटी-सी है पर ऐसा करने से इसका फल बहुत बड़ा होता है । |
| 088. |
जीवन की यात्रा में और साधन करने वाले हर साधक को साधन में कभी-न-कभी हमारे श्रीग्रंथों के मार्गदर्शन की आवश्यकता जरूर पड़ती है । |
| 089. |
हमारे सभी श्रीग्रंथ जीवन उपयोगी सूत्रों से भरे हैं । |
| 090. |
बाकी सभी मार्ग जैसे ज्ञानमार्ग, ध्यानमार्ग, कर्ममार्ग अपूर्ण हैं क्योंकि पूर्णता तक ले जाने वाला केवल भक्तिमार्ग ही है जो एकमात्र पूर्ण है । यह भक्तिमार्ग बड़ा रोचक और आनंदमय भी है । |
| 091. |
प्रभु कहते हैं कि जो अपने आपको मुझे अर्पण कर देता है, मैं परिपूर्ण रूप से उस भक्त के हृदय में निवास करता हूँ । |
| 092. |
जैसे वृक्ष के फल में बीज होता है और बीज में वृक्ष छिपा हुआ होता है वैसे ही प्रभु कहते हैं मेरे भक्त में मैं (प्रभु) होता हूँ और मेरे में मेरे भक्त समाए होते हैं । |
| 093. |
हमारे अनंत जन्मों से बटोरा हुआ पातक हमें प्रभु के सन्मुख होने से रोक देता है । |
| 094. |
श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि कोई दुराचारी-से-दुराचारी हो, पापों का पुतला हो, मलिन-से-मलिन हो, पतित-से-पतित हो, वह भी मेरी भक्ति से पावन हो जाता है । |
| 095. |
संत कहते हैं कि जब श्री गजेंद्रजी डूब रहे थे तो प्रभु उनके पाप-पुण्यों का हिसाब लगाने नहीं बैठे, अगर बैठते तो इतने पाप श्री गजेंद्रजी के थे कि प्रभु आ ही नहीं सकते थे । प्रभु को श्री गजेंद्रजी ने अपनी स्तुति में कहा कि मेरे पाप अपार हैं पर उससे भी ज्यादा प्रभु आपकी करुणा अपार है । |
| 096. |
श्री गजेंद्रजी ने अपनी स्तुति में कहा कि ज्ञानियों को ज्ञान का आधार होता है, सत्कर्मियों को अपने कर्म का आधार होता है, धर्मपालन करने वालों को धर्म का आधार होता है पर मुझ जैसे पापी को एकमात्र प्रभु का आधार है । |
| 097. |
प्रभु कहते हैं कि केवल दुराचारी ही नहीं, दुराचारी का शिरोमणि जिसने पाप के अलावा जीवन में कुछ भी नहीं किया वह भी मेरी शरण में आकर मुझे प्राप्त कर सकता है । यह प्रभु की कितनी बड़ी घोषणा है । |
| 098. |
कोई पापी-से-पापी भी प्रभु को अनन्य भक्ति करके पुकारता है तो प्रभु उसे बचाने आ जाते हैं और प्रभु के आते ही उसके पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं । |
| 099. |
जैसे हम नदी में डूब रहे होते हैं और एक रस्सी हमारे हाथ आ जाती है वैसे ही जब हम भवसागर में डूब रहे होते हैं तो प्रभु की कृपारूपी रस्सी हमारे हाथ में आ जाती है और हम उसे पकड़ कर भवसागर से पार हो जाते हैं । |
| 100. |
अगर हम तीव्रता के साथ प्रभु की भक्ति करने में लग गए तो प्रभु कहते हैं कि अपने पापों की सूची की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, उन पापों को जलाने के लिए मैं (प्रभु) बैठा हूँ । ऐसा कृपा भरा उद्घोष भक्ति करने वालों के लिए प्रभु करते हैं । |
| 101. |
जिस जीव को अपने पापों का भान हो गया, उसका सच्चे मन से पश्चाताप हो गया और प्रभु की शरणागति की इच्छा हो गई तो फिर उस जीव का उद्धार प्रभु तत्काल सुनिश्चित कर देते हैं । |
| 102. |
भक्तिरूपी तीर्थ में नहाने से पाप कटते हैं और सदैव के लिए हमारा मन स्वच्छ हो जाता है । |
| 103. |
पाप काटने के लिए पश्चाताप रूपी नदी में स्नान करना सबसे अहम और जरूरी होता है । संत कहते हैं कि सच्चा पश्चाताप होने से फिर जीवन में नए पाप का निर्माण नहीं होता । |
| 104. |
भक्तों ने खुद के लिए अत्यंत पश्चाताप का दैन्य भाव प्रभु के सामने रखा और प्रभु से प्रखर करुणा की याचना की है । |
| 105. |
भक्ति मार्ग पर चलने से ही पापों का सच्चा पश्चाताप संभव होता है । |
| 106. |
प्रभु का आश्वासन है कि पापी-से-पापी भी अगर पश्चाताप करके और आगे पाप नहीं करते हुए भक्ति में लग जाता है तो उसके संचित पापों का क्षय प्रभु तत्काल कर देते हैं । |
| 107. |
जीवन में आगे का पापाचरण सच्चे पश्चाताप से छूट जाए तो जो पापाचरण जीवन में हुआ उसके लिए प्रभु हमें क्षमा कर देते हैं । |
| 108. |
प्रभु केवल न्यायाधीश ही नहीं हैं जो कि समानता का सबके साथ न्याय करें, वे साथ में हमारे माता-पिता भी हैं, परमपिता भी हैं । इसलिए प्रभु का वात्सल्य न्याय करते हुए भी जग जाता है । |
| 109. |
जब शरणागति लेने पर एक पतित का प्रभु उद्धार करते हैं तो प्रभु को सबसे ज्यादा उसका आनंद होता है । |
| 110. |
जब एक दुराचारी सुधर जाता है तो प्रभु सबसे ज्यादा खुश होते हैं और आनंदित होते हैं । |
| 111. |
भक्ति पथ पर चलकर जो जीव अपने पापों को पश्चाताप की अग्नि में जलाकर आ जाता है तो यह प्रभु के लिए बहुत आनंद का विषय होता है । |
| 112. |
मनुष्य जीवन में संसार का धक्का लगना बहुत जरूरी है, यह प्रभु की अति कृपा होती है क्योंकि इससे जीव प्रभु मार्ग पर आ जाता है । |
| 113. |
अपनी करुणा के कारण प्रभु अपने भक्तों के न्याय के समय समता की जगह ममता रखते हैं । |
| 114. |
एक पापी भी सच्चे पश्चाताप के बाद प्रभु की करुणा को जागृत कर देता है और इस कारण उनकी दुर्गति नहीं होती क्योंकि प्रभु उसे तार देते हैं । |
| 115. |
सामान्य पापी ही नहीं, पापियों का शिरोमणि भी कोई हो और वह पाप छोड़कर सच्चा पश्चाताप करके प्रभु की ओर मुड़ जाता है एवं भक्ति पथ पर आ जाता है यानी भक्ति का आलंबन ले लेता है तो प्रभु उसका तुरंत उद्धार कर देते हैं । |
| 116. |
प्रभु की भक्ति पापी-से-पापी को भी तत्काल तार देती है । |
| 117. |
अगर हमने पूर्व के पापों का सच्चा प्रायश्चित कर लिया और आगे पाप नहीं करने का संकल्प ले लिया एवं भक्ति में लग गए तो यह तीन शर्त पूरी होते ही प्रभु हमें संभाल लेते हैं । |
| 118. |
पतित-से-पतित का उद्धार करने में भी प्रभु को क्षणभर भी नहीं लगता । |
| 119. |
पापी-से-पापी भी सच्चा पश्चाताप करने के बाद सीधा प्रभु की गोद में पहुँच जाता है । शर्त यह है कि पश्चाताप सच्चा होना चाहिए और पाप दोबारा जीवन में नहीं होना चाहिए । |
| 120. |
अत्यंत पापमय जीवन जीने वाले लोगों की भी भक्ति ने जीवन दिशा बदल दी और उनको बहुत ऊँचे स्तर तक पहुँचा दिया । |
| 121. |
भक्ति का सामर्थ्य देखें कि पतित जीवन जीने वाला व्यक्ति भी अगर पश्चाताप के बाद भक्ति करके प्रभु की तरफ मुड़ जाता है तो उसका जीवन उज्जवल-ही-उज्जवल हो जाता है । |
| 122. |
एक हीरे की अंगूठी गंदे नाले में गिर गई तो हम उसे उठाकर, कीचड़ हटाकर, उसे धोकर पहन लेते हैं । वैसे ही प्रभु कहते हैं कि जीवात्मा प्रभु का अंश है और पाप के कीचड़ में गिरने के बाद भक्ति के जल से धोकर वह शुद्ध हो सकता है । |
| 123. |
कितना भी पापी या कलंकित जीवन हो गया फिर भी भक्ति के मार्ग में आकर उस जीवन को स्वच्छ करना संभव है । |
| 124. |
एक बार गलत कर्म हुआ या पाप हुआ उसका जीवनभर भार नहीं लेना चाहिए । उस भार को उतारने का रास्ता है प्रभु से प्रायश्चित करके, भक्ति मार्ग का आलंबन लेकर प्रभु की शरणागति लेना । |
| 125. |
आगे पाप नहीं होगा और पिछला पाप भक्ति से नष्ट हो जाएगा, यह दोनों बातें भक्ति पथ पर चलने वाले के साथ होती है । |
| 126. |
प्रभु की भक्ति एक पतित-से-पतित को भी परम पवित्र कर देती है । |
| 127. |
उत्तम व्यापारी वह होता है जो पूंजी लगाकर मुनाफा कमाता है । वैसे ही मानव जीवन रूपी पूंजी से भक्ति रूपी मुनाफा कमाना चाहिए तभी हम अपने मानव जीवन को सफल कर पाएंगे । |
| 128. |
मनुष्य जीवन का प्रभु को पाने के लिए उपयोग नहीं किया, उसमें भगवत् भजन नहीं किया तो नर्क जाना पक्का है, ऐसा समझना चाहिए । |
| 129. |
शरीर किसी का अमर नहीं है, एक दिन तो मिट्टी होना ही है । शरीर के नाश होने से पहले उससे प्रभु प्राप्ति कर ली जाए तो ही श्रेष्ठ होता है । |
| 130. |
मानव शरीर से बड़ा-से-बड़ा लाभ जरूर लेना चाहिए । यह लाभ प्रभु प्राप्ति का लाभ है । |
| 131. |
अपने जीवन के केंद्र में प्रभु को ले आना चाहिए । |
| 132. |
अपनी वाणी से रोजाना प्रभु के बारे में बोलना चाहिए यानी प्रभु का गुणानुवाद करना चाहिए । |
| 133. |
रोजाना अपनी आँखों से प्रभु के विग्रह को निहारना चाहिए, इसे रूपासक्ति कहते हैं । |
| 134. |
प्रभु की कथा का रसास्वादन जीवन में नित्य करना चाहिए । सैकड़ों बार कथा सुनने पर भी हमें कथा रोज नई लगनी चाहिए और रोज नया भाव जागृत होना चाहिए । |
| 135. |
अपने एक-एक अंग को प्रभु की सेवा में अर्पण करना चाहिए । वाणी से प्रभु का भजन करें, कानों से प्रभु की कथा का श्रवण करें, हाथों से प्रभु की सेवा करें, चरणों से प्रभु की परिक्रमा करें, नेत्रों से प्रभु का दर्शन करें और हृदय से प्रभु की भक्ति करें । |
| 136. |
जीवन में प्रामाणिक और सात्विक संकल्प होगा तो प्रभु निश्चित रूप से उसे पूरा करते हैं । |
| 137. |
प्रभु कहते हैं कि मैं अपने भक्तों को छोड़कर अन्य किसी को नहीं पहचानता क्योंकि मेरे भक्त भी मेरे अलावा किसी चीज का भान नहीं रखते । ऐसा प्रभु ने ऋषि श्री दुर्वासाजी से कहा है । |
| 138. |
संत श्री रामकृष्ण परमहंसजी ने किसी से संसार के प्रपंच की बातें जीवनभर नहीं करी । भागवत् सेवा, भागवत् चिंतन, भागवत् भजन, भागवत् कथा के अलावा उनके पास कोई भी विषय नहीं था । |
| 139. |
जीवन में एक ही रस बचना चाहिए और वह है भक्ति का रस । |
| 140. |
दैत्य कुल में जन्में श्री प्रह्लादजी ने भक्ति रस के कारण प्रभु को पा लिया । |
| 141. |
भक्ति करने वाले के जीवन में सद्गुण आना तय है । |
| 142. |
प्रभु के लिए कुल, जाति, विद्या और वर्ण सब कुछ गौण हो जाता है क्योंकि केवल भक्ति ही प्रभु के लिए सर्वोत्तम स्थान रखता है । |
| 143. |
जब प्रभु जीव को अपना लेते हैं तो वह जीव तत्काल प्रभु का बन जाता है । |
| 144. |
मृत्यु बेला पर जीव के मुँह में प्रभु का नाम होना चाहिए और जीव की दृष्टि प्रभु की तरफ होनी चाहिए तो मोक्ष के दोनों कारण जीवन में उपस्थित हो जाते हैं । |
| 145. |
हृदय से प्रभु का ध्यान और नेत्रों से प्रभु के दर्शन की आदत जीवन में बनानी चाहिए । |
| 146. |
प्रभु श्री महादेवजी ने अपनी जटा में जब भगवती गंगा माता को धारण किया तो उन्होंने बड़ा सुखद अनुभव किया क्योंकि प्रभु के श्रीकमलचरणों से भगवती गंगा माता निकली थी । |
| 147. |
प्रभु की कृपा दृष्टि हमारे पापों के लिए विनाशक होती है । |
| 148. |
प्रभु यह नहीं देखते कि कौन किस निमित्त से मेरे पास आया है । अगर हम किसी भी निमित्त से प्रभु के पास पहुँच जाते हैं तो प्रभु हमारा उद्धार तत्काल कर देते हैं । |
| 149. |
प्रभु हर जीव से कहते हैं कि मुझे जीवन में भूलो मत । |
| 150. |
प्रभु से अपार प्रेम करने जितना भाग्य जीवन में जगाना चाहिए । |
| 151. |
संत विनोद में कहते हैं कि जब जीव प्रभु के समक्ष होता है तो उसका उद्धार नहीं करने का सामर्थ्य प्रभु में नहीं है । प्रभु के समक्ष होते ही जीव का उद्धार हो जाता है । |
| 152. |
प्रभु से प्रेम करने का नाम ही भक्ति है । |
| 153. |
किसी भी निमित्त से प्रभु को याद कर लिया, प्रभु का चिंतन हो गया तो हमारा कल्याण सुनिश्चित हो जाता है । |
| 154. |
प्रभु कहते हैं कि सब व्यवहार मुझसे करें । क्रोध करना है, रूठना है, हंसना है, रोना है सब प्रभु से करना चाहिए । |
| 155. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी तो यहाँ तक कहते हैं कि जीवन में वैर भी करना हो तो प्रभु से वैर करें, ऐसा करने पर भी हमारा उद्धार निश्चित हो जाएगा । |
| 156. |
प्रभु के पास जिस भी भाव से जाया जाए प्रभु हमारा उद्धार ही करेंगे, कल्याण ही करेंगे क्योंकि अकल्याण नाम की वस्तु प्रभु के पास नहीं है । |
| 157. |
प्रभु का सबसे प्रिय कार्य है अपने आश्रित जीव का कल्याण और उद्धार करना । |
| 158. |
प्रभु के सगुण साकार स्वरूप के साथ जितना समय बिताएंगे उतनी भक्ति परिपक्व होगी, यह सिद्धांत है । |
| 159. |
प्रभु के नाम जप के समय भाव आने पर हमारे हृदय में प्रभु का स्वरूप प्रकट हो जाता है । |
| 160. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा स्मरण करो, सबके लिए यह उपदेश है । पर श्रेष्ठ भक्तों के लिए प्रभु इसके आगे का उपदेश देते हैं कि सिर्फ मेरा स्मरण करो और सिर्फ मुझसे प्रेम करो । यहाँ “सिर्फ” शब्द सबसे महत्वपूर्ण है । |
| 161. |
प्रभु का सबके लिए उपदेश है कि मेरा स्मरण करो पर अपने श्रेष्ठ भक्तों के लिए प्रभु आगे का उपदेश देते हैं कि सिर्फ मेरा स्मरण करो और सिर्फ मुझसे प्रेम करो । |
| 162. |
प्रभु के स्मरण मात्र से ही हमारा उद्धार सुनिश्चित हो जाता है । |
| 163. |
हमारे मन का संपर्क संसार की अवांछित चीजों से नहीं होकर केवल प्रभु के साथ होना चाहिए । |
| 164. |
हमारे जीवन में उठने वाली हर वृत्ति के विषय प्रभु हो जाएं तो हमारा परमार्थ सफल हो जाता है । |
| 165. |
हमारे जीवन के आश्रय प्रभु होने चाहिए और हमारे चिंतन के विषय भी प्रभु होने चाहिए । |
| 166. |
हमारा हर संकल्प प्रभु के लिए उठे और प्रभु के बारे में उठे तो ही हमारा जीवन धन्य होता है । |
| 167. |
मन जब चेतन प्रभु का चिंतन करेगा तो वह चेतन बन जाता है और जब मन जड़ संसार का चिंतन करेगा तो वह जड़ बन जाता है । सिद्धांत यह है कि हमारे मन के चिंतन का विषय चेतन होना चाहिए, जड़ नहीं होना चाहिए । |
| 168. |
प्रभु का स्वभाव है कि प्रभु मुक्ति देने में एकदम भी संकोच नहीं करते पर भक्ति देने में बड़े संकोची हैं यानी बड़ी दुर्लभता से देते हैं । |
| 169. |
श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवद् गीताजी और श्री रामचरितमानसजी का सर्वमान्य सिद्धांत है कि सबसे दुर्लभ दान जो प्रभु से मिलता है वह भक्ति का ही दान है । |
| 170. |
सभी श्रीग्रंथों ने भक्ति को मुक्ति से बहुत ऊपर स्थान दिया है । चारों पुरुषार्थ के ऊपर मुकुट रूप में भक्ति का स्थान है । |
| 171. |
प्रभु मुक्ति देकर एक जीव से मुक्त हो जाते हैं, इसलिए बड़ी सुलभता से देते हैं । पर भक्ति देकर प्रभु उस भक्त की प्रेम डोर में बंध जाते हैं, इसलिए बड़ी दुर्लभता से देते हैं । |
| 172. |
पूरे संसार के श्रीग्रंथों को पढ़कर देख लें, प्रभु अगर डरने की श्रीलीला करते हैं तो एकमात्र भगवती यशोदा माता के साथ करते हैं और केवल भक्ति के कारण करते हैं । जिन प्रभु के भय से काल थर−थर कांपता है, जिनके भय से सृष्टि चलती है, वे प्रभु डर की श्रीलीला केवल भक्ति के कारण भगवती यशोदा माता के सामने करते हैं । यह केवल भक्ति का ही सामर्थ्य है । |
| 173. |
भगवती यशोदा माता को केवल यही चिंता रहती थी कि लाला सोया है, लाला उठेगा, लाला को नहलाना है, लाला का श्रृंगार करना है, लाला को खिलाना है, लाला को लाड़ लड़ाना है । इसलिए उनकी प्रभु के लिए भाव समाधि अखंड होती थी क्योंकि उनके चिंतन के विषय ही केवल प्रभु होते थे । |
| 174. |
प्रभु कहते हैं कि मेरी भक्ति कोई भी कर सकता है उसमें जाति, वर्ण, आयु और पात्रता सब अप्रासंगिक हो जाते हैं । |
| 175. |
जिसने जीवन में भक्ति को प्राथमिकता दी है वह भक्ति के बल पर बहुत ऊँचाई पर पहुँच जाता है । |
| 176. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों के ध्यान से हमारे जीवन के मांगल्य की वृद्धि होती है । |
| 177. |
प्रभु जैसा अकारण कृपा करने वाला ब्रह्मांड में कोई भी नहीं है । प्रभु से विरोध करने वाले पर भी प्रभु इतनी कृपा करते हैं जिसकी हम मिसाल भी नहीं दे सकते । |
| 178. |
भक्ति का प्रतिपादन प्रभु ने बड़े विस्तार से किया है, इतने विस्तार से अन्य किसी की चर्चा प्रभु ने कहीं नहीं की है । |
| 179. |
भक्ति का आश्रय लेकर ही हम जीवन में दिव्य गति को प्राप्त कर सकते हैं । |
| 180. |
प्रभु कहते हैं कि भक्ति करने वाला सबसे श्रेष्ठ होता है और भूलोक के देव जैसा होता है । |
| 181. |
भक्ति के कारण एक साधारण जीव भी एक दिन परम पूज्य बन जाता है । |
| 182. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि संपूर्ण जीवन भक्ति का संस्कार रखने वाला निश्चित रूप से भवसागर से तर जाता है । |
| 183. |
हम संसार में उस तरह मौज कर रहे हैं जैसे एक छिद्र वाली नौका में बैठकर कोई मौज करता है । |
| 184. |
भौतिकता के बल पर हम जीवन को आनंदमय बना देंगे, यह सोचना ही मूर्खता है । |
| 185. |
जवानी का मौका चूक गए तो बुढ़ापे में भजन नहीं हो सकेगा । |
| 186. |
बुढ़ापे में भजन तभी हो सकता है जब उसका प्रयास जवानी में किया जाए और जवानी से भजन करना एक आदत बन जाए । |
| 187. |
एक प्रभु की भक्ति को छोड़कर अन्य कोई भी उपाय अखंड शांति और आनंद का आज तक किसी के पास नहीं है । |
| 188. |
हमने अपने शरीर को जीवन में मुख्य हेतु बना रखा है जिसे अंत में दो मुट्ठी मिट्टी में मिलना तय है । |
| 189. |
हमारे शरीर का महत्व शरीर के कारण नहीं बल्कि शरीर के भीतर आत्मतत्व के कारण है । |
| 190. |
जैसे भोजन के लिए थाली साधन है वैसे ही प्रभु प्राप्ति के लिए हमारा शरीर साधन है जिससे हम भक्ति करके प्रभु को प्राप्त कर सकें । |
| 191. |
जैसे जहर को अमृत मानकर पीना मूर्खता है वैसे ही संसार के लिए जीवन जीना और उस जीवन को उच्चकोटि का मानना एक मूर्खता है । |
| 192. |
संसार में कोई भी शाश्वत नहीं है, सबका एक-न-एक दिन नाश होना पहले से ही तय है । |
| 193. |
शास्त्र कहते हैं कि बहुत सारे संसार के भोगों में डूबने वाले लोग, जो अपने को भाग्यवान कहलाते हैं, वे मूर्खता के अलावा कुछ नहीं कर रहे । |
| 194. |
जो संसार में अधिक डूबे हुए रहते हैं उनके बल, प्रज्ञा, बुद्धि और आयु का संसार ह्रास कर देता है । |
| 195. |
हर जन्मदिन पर हमें सावधान होना चाहिए कि हमारी आयु का एक वर्ष कम हो गया, परमार्थ हेतु एक वर्ष कम हो गया, प्रभु प्राप्ति हेतु एक वर्ष कम हो गया । |
| 196. |
हम काल के मुँह में संसार का स्वाद लेने बैठे हैं जैसे एक मेंढक सर्प के मुँह में बैठकर कीटक को निगलने का स्वाद लेता है । |
| 197. |
हर व्यक्ति के जीवन में एक समय ऐसा आने वाला है जब उसकी पत्नी, बेटा-बेटी, पोता-पोती, धन-संपत्ति कोई काम आने वाला नहीं है । |
| 198. |
संत कहते हैं कि भक्ति के लिए कोई भी मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं है । जैसे घर में आग लगी है तो बिना मुहूर्त देखे हम बाहर भागते हैं वैसे ही हमें संसार से निकलकर तत्काल बिना मुहूर्त देखे भक्ति का साधन करना चाहिए । |
| 199. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी चुनौती के रूप में कहते हैं कि अगर प्रभु प्राप्ति के लिए भक्ति से बड़ा कोई मार्ग मिले तो कोई उन्हें भी बता दें । |
| 200. |
सभी साधन को पूर्ण करने के लिए भक्ति अनिवार्य है पर भक्ति को पूर्णता के लिए किसी का आलंबन नहीं चाहिए क्योंकि भक्ति अपने आप में स्वयं सिद्ध साधन है । |
| 201. |
संत कहते हैं कि धन, लोकप्रियता, सत्ता, परिवार, शरीर और ज्ञान कुछ भी काम नहीं आएगा, सिर्फ प्रभु की भक्ति ही काम आएगी । |
| 202. |
प्रभु कहते हैं कि भक्ति के मार्ग पर हमें तुरंत आ जाना चाहिए और तत्काल इस मार्ग पर चलना आरंभ कर देना चाहिए । |
| 203. |
जीवन में भटकना बंद करना चाहिए, भ्रम को दूर करना चाहिए और भक्ति के नियम को जीवन में अपनाते चलना चाहिए । |
| 204. |
प्रभु कहते हैं कि भक्ति करने वाला मेरे तक आकर पहुँचता है, ऐसा वचन प्रभु देते हैं । ऐसा वचन प्रभु और किसी साधन मार्ग के लिए नहीं देते । |
| 205. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि मुझे तुम्हारा कुछ भी नहीं चाहिए, बस मुझे अपना मन दे दो यानी अपने मन में मुझे बसा लो । |
| 206. |
मन में प्रभु को बसाना है तो भक्ति मार्ग का अवलंबन लेना ही पड़ेगा । |
| 207. |
अन्य सभी संसार के विषयों से आसक्ति हटानी है तो भक्ति करके प्रभु के लिए आसक्ति बढ़ानी होगी । |
| 208. |
भक्ति का सबसे बड़ा सूत्र प्रेम है जो सिर्फ प्रभु से ही करना चाहिए । |
| 209. |
संत कहते हैं कि जैसे गर्भवती माता अपने गर्भस्थ बालक से प्रेम करती है उससे भी कोटि गुना ज्यादा प्रेम हमें प्रभु से करना चाहिए । |
| 210. |
जैसे एक माता का व्यवहार अपने बच्चे से ही होता है वैसे ही भक्त का सभी व्यवहार प्रेम के कारण प्रभु से ही होता है । |
| 211. |
प्रभु कहते हैं कि सर्वत्र मुझे देखकर सबको प्रणाम करो क्योंकि मुझे सबमें देखो । |
| 212. |
हमें संसार की वस्तु की कामना के कारण अशांति होती है । कामना को नष्ट करने का तरीका यही है कि मन संकल्प की स्थिति में नहीं रहे जो केवल भक्ति से ही संभव है । |
| 213. |
किसी भी चीज को देखकर मन यह सोचेगा कि “अच्छा है” तो अगली भावना मन में आएगी कि यह मुझे चाहिए और कामना जन्म लेगी । संत कहते हैं कि अच्छेपन का भाव संसार में किसी के लिए भी निर्माण होते ही हम उसमें फंस जाते हैं । |
| 214. |
जो निरंतर अपने मन से प्रभु का विचार करते हैं, प्रभु का अनुसंधान करते हैं, उनको संसार की कोई भी दूसरी चीज सुंदर और आकर्षक लगती ही नहीं है । |
| 215. |
हमें जीवन में सर्वाधिक सुंदर और सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रभु ही लगने चाहिए । |
| 216. |
प्रभु कहते हैं कि प्रभु की भक्ति करने वाले को ही आनंद का सागर प्राप्त होता है । |
| 217. |
संस्कृत भाषा जाने बिना हमारे श्रीग्रंथों को गहराई से समझना लगभग असंभव है । संस्कृत का ज्ञान इसलिए अत्यंत जरूरी है । इतनी महान महिमा संस्कृत भाषा की है । |
| 218. |
सद्गुरुदेव प्रभु का बोध हमें करवाने के लिए ही होते हैं । |
| 219. |
जीव की सारी समस्या का कारण है, जीव के सारे दुःखों का कारण है कि अपने भीतर बैठे प्रभु का हमें बोध नहीं है, प्रभु की भक्ति नहीं है और प्रभु से प्रेम नहीं है । |
| 220. |
शास्त्र एक पारमार्थिक सत्य हमें बताते हैं कि हमें सर्वाधिक और सर्वोत्तम प्रेम प्रभु से ही होना चाहिए । |
| 221. |
सद्गुरुदेव की सच्ची पहचान उनके भीतर स्थित आत्मज्ञान से होती है । |
| 222. |
श्रीग्रंथों में से छुपे रहस्याओं को खोज निकालने को परम विद्या कहा गया है । |
| 223. |
भक्तों के अंदर प्रभु से एकाकार होने के कारण परम ज्ञान का विस्तार हो जाता है । वे प्रभु प्रेरणा से जो भी लिखते हैं, वह लिखा हुआ अमर हो जाता है । |
| 224. |
जैसे सागर को विशालता की उपमा नहीं दे सकते, आकाश को व्यापकता की उपमा नहीं दे सकते और हमें कहना पड़ता है कि उनके जैसा वे भी हैं, ऐसे ही प्रभु को हम कोई भी उपमा नहीं दे सकते । |
| 225. |
प्रेम से हमारे श्रीग्रंथों को पढ़ने वाले का चित्त शांत हो जाता है क्योंकि शांत रस की वृष्टि होती है । |
| 226. |
शास्त्रों का जितना चिंतन किया जाएगा उतना संसार का मैल हमारे भीतर से निकलेगा और संसार की आसक्ति शिथिल होगी जिससे हम शांत होते चले जाएंगे । |
| 227. |
श्री अर्जुनजी का प्रभु से प्रेम इतना प्रबल था कि अपने भक्त को प्रभु रहस्य पर रहस्य बताते चले गए, बिना पूछे बताते चले गए । प्रभु के अलावा इतना भक्तवत्सल कोई नहीं होगा । |
| 228. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि प्रभु को रस आता है अपने भक्त को ज्ञान से सजाकर । जैसे सोने को तपाने से सुनार खुश होता है वैसे ही श्री अर्जुनजी को भक्ति के ज्ञान में तपाने पर प्रभु खुश होते हैं । |
| 229. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी विनोद में कहते हैं कि प्रभु को शायद व्यसन लग गया है सुनाने का । ज्ञान के सिद्धांतों से सजाकर अपने भक्तों को ज्ञान सुनाकर उनका उपकार करने का प्रभु का संकल्प बन जाता है । |
| 230. |
सारा संसार प्रभु का स्वरूप है और प्रभु ही सभी रूपों में सभी तरफ विद्यमान हैं । |
| 231. |
जो ज्ञान की अनुभूति देवताओं और ऋषियों को भी प्राप्त नहीं हुई, श्री अर्जुनजी को भक्ति के कारण प्रभु वे अनुभूति प्रदान कर रहे हैं । इतना दिव्य प्रेम भक्त के लिए प्रभु का होता है । |
| 232. |
सभी के निर्माता प्रभु हैं और प्रभु के अलावा कोई अन्य तत्व ब्रह्मांड में नहीं है । |
| 233. |
प्रभु इतने व्यापक हैं कि एक भी कण संसार में प्रभु के अलावा नहीं है । |
| 234. |
ऐसा कोई स्थान और समय नहीं जब प्रभु नहीं हों, प्रभु सर्वत्र हैं और सर्वदा से हैं । |
| 235. |
ज्ञान संपन्न भक्त सभी जगह कण-कण में प्रभु को देखकर उनसे प्रेम करते हैं । संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ पर भक्त प्रभु को नहीं देखते । |
| 236. |
श्रेष्ठ भक्तों को एकांत पसंद होता है, वे ज्यादा चीज जानना नहीं चाहते, वे चाहते हैं कि ज्यादा लोग उन्हें नहीं जाने । परमात्मा तत्व को प्राप्त हुए भक्तों की यह स्थिति होती है । |
| 237. |
भक्त सबको प्रभु से जोड़ता है, यह उसकी भक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँचने पर संभव होता है । |
| 238. |
जैसे गुलाब अपनी सुगंधी सब तरफ फैलाता है, उसके सामने ज्ञानी, अज्ञानी, अंधा, रूपवान, राजा और रंक कोई भी आए, वह किसी को नहीं छोड़ता । ऐसे ही भक्त सभी को भक्ति का प्रचार-प्रसार करके कृतार्थ करते हैं । |
| 239. |
श्रीगोपीजन जहाँ भी जाती प्रभु के बारे में ही बोलती थी, सिर्फ प्रभु के बारे में बोलना और बोलते हुए कभी थकना नहीं । |
| 240. |
प्रभु के विषय में बोलते हुए आनंद की पराकाष्ठा पर भक्त पहुँच जाते हैं और उनकी वाणी आनंद के कारण रुक जाती है । |
| 241. |
प्रभु की कथा अति सुंदर तब होती है जब श्रोता और वक्ता आनंद भाव में डूब जाते हैं । |
| 242. |
प्रभु की कथा मात्र सुनने का विषय नहीं है, वह तो अनुभव करने का विषय है । |
| 243. |
बड़े-बड़े संत और महात्मा जो प्रभु के बारे में बोलते हैं, वे भाव विभोर होकर बोलते-बोलते भाव समाधि में चले जाते हैं । |
| 244. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे बारे में बोलने का जिसको व्यसन लग जाता है वह फिर जीवनभर आनंद में डूबा रहता है । |
| 245. |
प्रभु की भक्ति हमारे भीतर के आनंद को जागृत कर देती है । |
| 246. |
एक भक्त को प्रभु के प्रेम में आनंद की इतनी अनुभूति होती है कि उस अनुभूति को बयान करना किसी के लिए भी संभव नहीं है । |
| 247. |
श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि मुझसे प्रेम करने वाला मुझे कोई बिरला ही मिलता है । |
| 248. |
अनन्यता से प्रभु से प्रेम करने वाले पर प्रभु मुग्ध हो जाते हैं । |
| 249. |
प्रभु कहते हैं कि मुझे मांगने वाले तो रोज मिलते हैं, कोई मुझसे संपत्ति मांगता है, कोई सत्ता मांगता है, कोई स्वर्ग मांगता है, कोई मोक्ष मांगता है - यह सब तो सामान्य बात है । पर सच्ची बात यह है कि मुझे प्रेमी भक्त, जो मुझसे नि:स्वार्थ प्रेम करें, वह बिरला ही मिलता है । |
| 250. |
प्रभु से कुछ नहीं चाहना और प्रभु से केवल प्रभु की तृप्ति के लिए प्रेम करना - यह जीवन की बहुत ऊँची उपलब्धि होती है । |
| 251. |
प्रभु से कुछ चाहत रखना, इसे संतों ने भक्ति का कलंक बताया है । सच्ची भक्ति में प्रभु से सिर्फ प्रभु को ही चाहना चाहिए । |
| 252. |
प्रभु से प्रेम का कोई कारण नहीं होना चाहिए क्योंकि जिसमें कोई कारण होता है वह सच्चा प्रेम नहीं होता । इसलिए प्रभु से बिना किसी हेतु के प्रेम होना चाहिए । |
| 253. |
श्रीगोपीजन ने आजीवन प्रभु से प्रेम किया । प्रभु ने उनको बड़ा लंबा वियोग दिया फिर भी श्रीगोपीजन प्रभु को भूली नहीं । यह प्रभु की अंतिम प्रेम की परीक्षा थी जिसमें श्रीगोपीजन उत्तीर्ण हुई । |
| 254. |
जब श्री कुरुक्षेत्रजी में इतने लंबे वियोग के बाद श्रीगोपीजन और बृजवासी प्रभु से मिले तो सबने देखा कि उनका प्रभु के लिए प्रेम कितना बढ़ चुका था । |
| 255. |
प्रभु प्रेम वही होता है जो वर्धमान हो, उसका कभी ह्रास नहीं हो यानी उसमें कभी कमी नहीं हो । |
| 256. |
प्रभु कहते हैं कि मैं कृपा की मशाल लेकर मेरे भक्त के आगे चलता हूँ और उसके भक्ति मार्ग पर पथ-प्रदर्शक बनता हूँ । |
| 257. |
प्रभु के भक्त को जीवन में कभी भी अज्ञान का स्पर्श भी नहीं होता । प्रभु के भक्त में ज्ञान सदैव के लिए स्थिर हो जाता है । |
| 258. |
भक्त को सब कुछ प्राप्त करवाने की जिम्मेदारी प्रभु लेते हैं । |
| 259. |
अपने पुरुषार्थ से प्राप्त होने वाला ज्ञान एक सीमा में होता है पर प्रभु भक्ति के कारण प्रभु की कृपा से जब ज्ञान का उदय होता है तो वह ज्ञान असीम हो जाता है, अखंड हो जाता है । |
| 260. |
प्रभु कहते हैं कि सगुण साकार रूप में प्रभु से अत्यंत प्रेम करते हुए अपने सारे तार प्रभु से जोड़ देना चाहिए । |
| 261. |
प्रभु की किरणें सर्वत्र फैली हुई हैं । उस विराट और व्यापक प्रभु की किरणों को पाने के लिए हमें जीवन में भक्ति का आधार चाहिए । |
| 262. |
उत्तम, समझदार और चतुर वह होता है जो सगुण साकार प्रभु के स्वरूप से अपना संबंध जोड़ लेता है । |
| 263. |
प्रभु की पूजा, प्रभु की सेवा, प्रभु का जप, प्रभु का भजन, प्रभु का ध्यान और प्रभु से प्रेम करने पर हमें प्रभु मिल जाते हैं । |
| 264. |
प्रभु से श्री अर्जुनजी कहते हैं कि मुझे यही तो चाहिए था कि मेरी जिम्मेदारी लेने वाला कोई मिल जाए । श्री अर्जुनजी आगे कहते हैं कि प्रभु मेरी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार बैठे हैं इसलिए मैं धन्य हो गया । |
| 265. |
सारे जीवन चिंतन करने पर भी हम प्रभु के विराट और व्यापक स्वरूप का पार नहीं पा सकते । |
| 266. |
प्रभु की छत्रछाया पाकर जीव धन्य हो जाता है । |
| 267. |
प्रभु की सबसे बड़ी कृपा तब होती है जब प्रभु अपने स्वयं को जानने का ज्ञान हमें दे देते हैं । |
| 268. |
भगवत् कृपा से ही भगवत् बुद्धि जागृत होती है । |
| 269. |
जीवन में जो भी हमारे संचित पुण्य हैं उसका श्रेष्ठतम फल यह होता है कि प्रभु का सानिध्य हमें मिल जाए । |
| 270. |
प्रभु अपने श्रीनेत्रों से करुणा, प्रेम और कृपा की वृष्टि करते हैं । |
| 271. |
सारे साधन, अध्ययन और ज्ञान को जीवन में फलीभूत होने के लिए प्रभु की कृपा अत्यंत अनिवार्य है । |
| 272. |
प्रभु कहते हैं कि जैसे शरीर के रोमावली की गिनती कर पाना संभव नहीं है वैसे ही मेरे लिए मेरी विभूतियों को गिन पाना संभव नहीं है । |
| 273. |
श्री अर्जुनजी ने प्रश्न किया कि हम प्रभु को देखना चाहते हैं तो कहाँ-कहाँ देखें । प्रभु ने उत्तर में कहा कि मुझे सभी के भीतर आत्मरूप में देखना चाहिए । |
| 274. |
हमारा आत्म-स्वरूप प्रभु का स्वरूप है और यही हमारी असली पहचान है । इस जन्म में मिला सांसारिक नाम हमारी असली पहचान नहीं है । |
| 275. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा आत्मरूप अपने अंदर और सबके अंदर देखना चाहिए । |
| 276. |
सभी जीव, सभी जाति के जीव, सभी रंग के जीव, सभी रूपों के जीव के भीतर आत्म-तत्व प्रभु एक ही हैं । |
| 277. |
यज्ञों में प्रभु ने अपनी विभूति जप यज्ञ को बताया है । प्रभु सबसे ज्यादा महत्व जप को दे रहे हैं इसलिए प्रभु ने उसे अपनी विभूति के रूप में बताया है । |
| 278. |
जैसे स्वर्ण अलंकार व्यक्ति की शोभा बढ़ाते हैं पर कभी-कभी बहुत सुंदर व्यक्ति अलंकार की शोभा बढ़ा देते हैं । वैसे ही प्रभु अपनी विभूति बताकर विभूतियों की शोभा बढ़ा रहे हैं । |
| 279. |
जिस चीज को प्रभु अपनी विभूति कहते हैं वह उस वर्ग में सर्वश्रेष्ठ है, इसका सीधा अर्थ यह निकलता है । |
| 280. |
एक यज्ञ जो सभी के लिए उपलब्ध हो, सब समय उपलब्ध हो और समय और स्थान का बंधन नहीं हो, ऐसा सिर्फ जप यज्ञ है । इन सिद्धांतों को ध्यान रखते हुए जप को सर्वोत्तम यज्ञ माना गया है । |
| 281. |
अत्यंत प्रभावी प्रभु का नाम रोज अनुशासन से यदि हम जप करते हैं तो उसके जैसा कोई भी साधन कलियुग में नहीं है । |
| 282. |
कोई भी, कभी भी, किसी भी भावना से प्रभु का नाम जप कर सकता है । नाम जप में अपार क्षमता है । |
| 283. |
एकाग्र मन से और अनुशासन से नाम जप करने का लाभ बहुत बड़ा और असाधारण होता है । |
| 284. |
नाम जप किसी भी समय और कहीं भी किया जाए, उसमें कोई दोष कदापि नहीं होता । |
| 285. |
नाम जप करना हम जब भी जीवन में आरंभ कर देते हैं तो वह हमें अपना परिणाम दिखाना प्रारंभ कर देता है । |
| 286. |
लयबद्ध तरीके से नाम जप करने पर हमें मानसिक शांति भी मिलती है और हमारे शारीरिक रोग भी ठीक होते हैं । यह नाम जप का सांसारिक लाभ है । पारमार्थिक लाभ तो अदभुत होता ही है । |
| 287. |
नाम जप करते समय अपना ध्यान प्रभु में केंद्रित कर देना चाहिए तो वह श्रेष्ठ होता है । |
| 288. |
नाम जप जीवन में करते रहेंगे तो हम पाएंगे कि यह साधन इतना प्रबल हो जाता है कि हमारा जीवन ही बदल देता है । |
| 289. |
प्रभु का नाम साक्षात ब्रह्म है । इसलिए नाम जप साधन छोटा-सा है पर सबसे बड़ा महत्व कलियुग में रखता है । |
| 290. |
प्रभु का नाम जप एक सरल साधन होने के कारण हम इसका महत्व जीवन में नहीं समझ पाते । |
| 291. |
प्रभु का नाम जप हमें सीधे प्रभु तक पहुँचाने वाला साधन है । |
| 292. |
संसारी कामना की पूर्ति हमें बड़ी लुभावनी और आकर्षक लगती है पर यह हमारी आयु का बड़ा भाग चौपट करके हमें मझधार में छोड़ देती है । |
| 293. |
कभी भी प्रभु के नाम जप को सरल साधन मानकर इसकी अपेक्षा जीवन में नहीं करनी चाहिए । |
| 294. |
प्रभु का नाम जप हमारे मन को पवित्रता से भर देता है । |
| 295. |
प्रभु का नाम जप हमारी वाणी, हमारे मन और संसार को देखने की हमारी दृष्टि को ही परिवर्तित कर देता है । |
| 296. |
प्रभु का नाम जप हमारी अंतरात्मा तक पहुँचता है और प्रभु का साक्षात्कार हमें करवा देता है । |
| 297. |
सारे नियम से मुक्त एक ऐसा साधन प्रभु का नाम जप है जिसका कोई विकल्प कलियुग में नहीं है । |
| 298. |
प्रभु श्री रामजी धर्म की शिक्षा और मर्यादा की शिक्षा देने हेतु अवतार लेकर पधारे थे । यह दोनों शिक्षा सबके लिए आवश्यक और सर्वदा जरूरी होती है । |
| 299. |
मर्यादा के नहीं होने के कारण कलियुग में संपत्ति तो बढ़ी है पर शांति लुप्त हो गई है । |
| 300. |
विज्ञान ने हमें संसार से नक्षत्र तक उड़ना सिखाया है पर धरती पर हमारे रिश्तों को कैसे निभाना है यह विज्ञान नहीं सिखा पाया है । इसके लिए हमें श्री रामायणजी और श्री महाभारतजी का ही आलंबन लेना होगा । |
| 301. |
आज विज्ञान ने घर, ऑफिस और गाड़ी को ठंडा रखने की व्यवस्था कर दी पर हमारा दिमाग गर्म रहता है उसे ठंडा करने के लिए विज्ञान कुछ नहीं कर पाया और न कर पाएगा । इसके लिए हमें अध्यात्म की तरफ ही मुड़ना पड़ेगा । |
| 302. |
जो भी आध्यात्मिक साहित्य संसार में है वह भारतीय महाशास्त्रों के प्रसाद के अलावा कुछ भी नहीं है । |
| 303. |
प्रभु श्री रामजी के रूप में मर्यादा के सूर्य का उदय होना था इसलिए प्रभु ने सूर्यवंश को चुना । |
| 304. |
भगवती गंगा माता की अपार महिमा बताते हुए प्रभु कहते हैं कि संसार में जितने भी जल प्रवाह हैं उसमें मेरी विभूति भगवती गंगा माता है । |
| 305. |
तीनों लोकों में भगवती गंगा माता जैसा पतित को पावन करने वाला कोई भी नहीं है । |
| 306. |
भगवती गंगा माता की महिमा अपार है । हर सनातनी की यह इच्छा और आकांक्षा होती है कि अंत समय मुँह में श्रीगंगाजल और श्रीतुलसी दल आ जाए और उसकी अस्थियों का विसर्जन भगवती गंगा माता में हो । |
| 307. |
अंत में अस्थियों के विसर्जन के साथ जीव को अंतिम विश्राम भगवती गंगा माता में ही मिलता है । |
| 308. |
भगवती गंगा माता जल नहीं है, शास्त्र कहते हैं कि वे द्रवीभूत ब्रह्म हैं । |
| 309. |
अन्य विधाओं से जीवनयापन हो सकता है पर मोक्ष दिलाने वाली और शांति दिलाने वाली एकमात्र आध्यात्मिक विद्या ही है । |
| 310. |
आध्यात्मिक विद्या मानसिक शांति हेतु सबसे जरूरी है । |
| 311. |
अध्यात्म विद्या अगर हमने जीवन में अर्जित नहीं की तो संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि हमारी अवस्था उस आँखों जैसी जो मोर के पंख में आँखें होती है जिससे दिखाई नहीं देता सिर्फ छवि रूप में होती है । |
| 312. |
जो आध्यात्मिक वैभव भारतवर्ष का रहा है वह कहीं भी विश्व में किसी देश का नहीं रहा है । इसलिए भारतवर्ष को सदैव जगद्गुरु माना गया है । |
| 313. |
सारी विद्याएं जीवन के अंत में समाप्त हो जाती है, एक आध्यात्मिक विद्या ही है जो अंत में भी काम आती है । |
| 314. |
आध्यात्मिक विद्या से जीव जीवन की हर अवस्था में शांत और संतुष्ट रहना सीख जाता है । |
| 315. |
प्रभु की दैवीय शक्ति को हमें दूसरों के उत्थान में लगाना चाहिए न कि दूसरों को परेशान करने में उसका उपयोग करना चाहिए । |
| 316. |
अपने जीवन का उपयोग दूसरों के हित के लिए हमने कितना किया, यह हमें कभी तो आकलन करना चाहिए । |
| 317. |
अगर प्रभु ने हमें दूसरों के लिए कुछ करने का सामर्थ्य दिया है तो उसके साथ-साथ करुणा और दया भी दी है जिससे हम दूसरों का हित कर सकें । |
| 318. |
प्रभु कहते हैं कि उनकी व्यापकता का निरंतर ध्यान और भान रखना चाहिए । |
| 319. |
भक्त और भगवान के बीच आत्मीय संबंध होने के कारण भक्तों का विशेषाधिकार प्रभु पर होता है । |
| 320. |
श्री अर्जुनजी पर प्रभु ने कृपा के इतने मेघ बरसाए और जो किसी को नहीं बताया वह दिल खोलकर श्री अर्जुनजी को श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में प्रभु ने बताया । |
| 321. |
जीव पर अकारण कृपा करने का प्रभु का स्वभाव ही है । |
| 322. |
प्रभु इतने कृपालु हैं कि जो प्रभु से वैर भी करता है उसका भी प्रभु उद्धार करके उसे मोक्ष दे देते हैं । |
| 323. |
प्रभु वे हैं जिनके पास से आज तक कोई भी अतृप्त नहीं लौटा । |
| 324. |
प्रभु के विश्व स्वरूप में श्री अर्जुनजी ने देखा कि प्रभु की एक-एक रोमावली में अनंत कोटि ब्रह्मांड समाए हुए हैं । |
| 325. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी एक उपमा देते हैं कि जैसे हाथी महावत का कहना मानता है वैसे ही प्रभु अपने भक्त का कहना मानते हैं क्योंकि भक्त की भक्ति का जादू प्रभु पर चलता है । |
| 326. |
प्रेम के वशीभूत होकर श्री अर्जुनजी को प्रभु वे सब भी बता देते हैं जो श्री अर्जुनजी पूछते भी नहीं । |
| 327. |
जिस ज्ञान का परम धन ज्ञानियों को उपलब्ध नहीं होता, वह परम धन श्री अर्जुनजी को बिना मांगे प्रभु दे रहे हैं, ऐसा संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं । |
| 328. |
प्रभु जीव के प्रेम को स्वीकार करते हैं उस प्रेम के कारण जीव से ऐसा करुणामय व्यवहार करते हैं जिसकी उपमा भी हम नहीं दे सकते । |
| 329. |
प्रभु के सकल अवतार में एक बात हमें साफ देखने को मिलेगी कि प्रभु हमेशा अपने भक्त के अधीन रहते हैं । |
| 330. |
जहाँ श्री वेदजी की भी पहुँच नहीं उस विश्व रूप का दर्शन भक्ति के कारण श्री अर्जुनजी को सुलभता से हो गया । |
| 331. |
विश्व रूप देखने पर श्री अर्जुनजी चकित हो गए, आँखें खोलकर भी उन्हें वही विराट स्वरूप दिखाई दिया, आँखों को बंद करने पर भी विराट रूप दिखाई दिया । इधर देखा, उधर देखा, ऊपर देखा, नीचे देखा, दसों दिशाओं में वही रूप जिसमें प्रभु के हजारों मुँह, जिह्वा, दाँत हैं उसे देखकर श्री अर्जुनजी डरकर सहम गए । |
| 332. |
श्री अर्जुनजी को प्रभु का विराट स्वरूप देखने के बाद डर भी लग रहा था और आनंद भी आ रहा था । डर के साथ आनंद और आनंद के साथ डर, ऐसा श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं । |
| 333. |
श्री अर्जुनजी को प्रभु द्वारा प्रदान दिव्य दृष्टि के बाद भी वे विश्व रूप को पूरा नहीं देख पा रहे थे, इतना विराट विश्वरूप था । |
| 334. |
प्रभु का विराट स्वरूप देखने के बाद भयभीत और रोमांचित श्री अर्जुनजी त्राहि-त्राहि करने लग गए । |
| 335. |
प्रभु कहते हैं कि विश्व में वही होता है जो प्रभु चाहते हैं, हम तो बस निमित्त मात्र हैं । |
| 336. |
प्रभु ही विश्व के निर्माता, पालनकर्ता और लय करने वाले हैं । |
| 337. |
जैसे एक सांसारिक पिता अपने पुत्र के कितने ही अपराधों को सह लेता है, सजा नहीं देता वैसे ही जगतपिता प्रभु हमारे अनगिनत अपराध को सहन कहते रहते हैं और हमें माफ करते रहते हैं । |
| 338. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में परम ज्ञान और अपना विराट विश्व रूप जो प्रभु ने श्री अर्जुनजी को एक भक्त पर कृपा करते हुए दिखाया वह देवतागण और ऋषि-मुनि भी आज तक नहीं देख पाए । |
| 339. |
श्री वेदजी का पाठ, तपस्या, बहुत दान, यज्ञ करने के बाद भी प्रभु के विश्व रूप का दर्शन कोई नहीं कर सकता और न कर सकेगा । यह सिर्फ, सिर्फ और सिर्फ भक्ति के कारण ही श्री अर्जुनजी देख पाए । सिर्फ भक्ति ही ऐसा सामर्थ्य रखती है, यह प्रभु का स्पष्ट मत है । |
| 340. |
श्री अर्जुनजी की अनन्य भक्ति के कारण ही ऐसा दुर्लभ अवसर उनके जीवन में आया कि प्रभु का विश्व स्वरूप, जो कोई नहीं देख पाया था, उसे उन्हें देखने का सौभाग्य मिला । |
| 341. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी एक अदभुत बात कहते हैं कि प्रभु ने मीठा बोलने की और गुस्सा न करने की भक्त के सामने दीक्षा ले रखी है यानी वे कभी भी भक्त पर गुस्सा नहीं करते और सदैव मीठा ही बोलते हैं । |
| 342. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि प्रभु के विराट स्वरूप में और प्रभु के लघु रूप में कोई भी अंतर नहीं है क्योंकि दोनों तत्व एक ही हैं । |
| 343. |
श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि तुम्हारी भक्ति के कारण, मात्र भक्ति के कारण ही तुम्हें मेरा विराट रूप देखने को मिला है । |
| 344. |
हमें जीवन में कर्म करते वक्त उसके मूल हेतु के रूप में प्रभु को ही देखना चाहिए । |
| 345. |
भक्त का सभी कार्य प्रभु की प्रसन्नता पर ही केंद्रित होता है । |
| 346. |
भक्त के जीवन में एक भी कर्म ऐसा नहीं है जो प्रभु के लिए नहीं होता । |
| 347. |
भक्त के जीवन का हर आधार केवल प्रभु ही होते हैं । |
| 348. |
भक्त के हृदय की धड़कन और उनकी वाणी का उच्चारण का हर क्रम प्रभु के लिए ही होता है । |
| 349. |
भक्त को प्रभु से ज्यादा महत्वपूर्ण ब्रह्मांड में कोई भी और कभी भी नहीं लगता । |
| 350. |
हमारे जीवन में प्राथमिकता के क्रम में प्रभु कहाँ हैं, यह हमें जरूर सोचना चाहिए । प्रभु को पहले स्थान पर ही रखना चाहिए । |
| 351. |
भक्त के जीवन के पहले क्रमांक पर ही नहीं, हर क्रमांक पर प्रभु ही विराजमान रहते हैं । |
| 352. |
भक्त के लिए प्रभु ही एकमात्र और सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हैं । |
| 353. |
उत्तम भक्त के जीवन में एकमात्र संग प्रभु का ही होता है । |
| 354. |
उत्तम भक्त सर्वत्र प्रभु का ही अनुभव करता है । |
| 355. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी का बारहवां अध्याय, जो भक्ति योग है, वह संतों को सर्वाधिक प्रिय है । |
| 356. |
भक्त को अपने प्रभु में केवल करुणा और कृपा के ही दर्शन होते हैं । |
| 357. |
एक भक्त को प्रभु की कृपा दृष्टि के अलावा जीवन में कुछ भी नहीं चाहिए । |
| 358. |
उत्तम भक्त संसार के सभी विषयों का उपयोग प्रभु की सेवा हेतु ही करता है । |
| 359. |
भक्तों की दृष्टि में प्रभु की कृपा के कारण ऐसा प्रभाव आ जाता है कि वे जगत मंगल कर देते हैं । |
| 360. |
भक्ति की पात्रता बनने पर और प्रभु की कृपा ग्रहण करने पर उस कृपा की अनुभूति हमें हर समय होने लगती है । |
| 361. |
प्रभु की भक्ति करने से श्रीग्रंथों का ज्ञान स्वतः ही हमारे भीतर प्रकट हो जाता है । |
| 362. |
प्रभु अपने भक्तों के लिए कामधेनु और कल्पतरु के समान हैं । |
| 363. |
अहंकार सभी दुर्गुणों का सेनापति है । |
| 364. |
जब भी हम प्रभु को पुकारते हैं तो हमें प्रभु की कृपा जरूर मिलती ही है । |
| 365. |
प्रभु अंतर्यामी हैं इसलिए हमारे भीतर की बातें भी प्रभु जानते हैं, यह भान हमें जीवन में सदैव होना चाहिए । |
| 366. |
सद्गुरुदेव की पूजा का सच्चा अर्थ है कि सद्गुरुदेव के भीतर विराजे प्रभु तत्व की पूजा । |
| 367. |
सद्गुरुदेव परंपरा के अंत में आदिगुरु के रूप में प्रभु ही मिलेंगे । |
| 368. |
प्रभु में हमारा भक्ति भाव जितना पुष्ट होगा उतनी ही प्रभु की कृपा हमें जीवन में मिलती रहेगी । |
| 369. |
जीव के कल्याण के लिए प्रभु ने अपने सभी अवतारों में ज्ञान स्वरूप उपदेश दिया है । |
| 370. |
प्रभु की कृपा दृष्टि अकरण ही जीव पर होती है । |
| 371. |
कृपा करने का कारण होने पर भी उस कारण से बहुत ज्यादा कृपा प्रभु सदैव अपने भक्तों पर करते हैं । |
| 372. |
प्रभु की कृपा के कारण ही अध्यात्म ज्ञान हमारे भीतर टिकता है और हमें लाभ देता है । |
| 373. |
सजीव और निर्जीव दोनों तत्वों का पूरे ब्रह्मांड में नियंत्रण करने वाले केवल प्रभु ही हैं । |
| 374. |
वही काव्य श्रेष्ठ होता है जिसमें प्रभु का गुणानुवाद किया गया है । |
| 375. |
भारतवर्ष की श्रेष्ठता है कि भारतवर्ष के हर सिद्धांत के मूल में अध्यात्म है । |
| 376. |
अध्यात्म शास्त्र पढ़ते हुए हमारे भीतर कभी भी कुतर्क का जन्म नहीं होने देना चाहिए । |
| 377. |
संत प्रभु की कृपा मांगते हैं कि उन्हें ऐसी वाणी दें जिससे प्रभु का निरंतर गुणगान हो सके । |
| 378. |
वह वाणी धिक्कार योग्य है जिससे प्रभु का गुणगान नहीं किया जाता । |
| 379. |
भक्ति करने वाले जीव का हर व्यवहार सात्विक हो जाता है । |
| 380. |
भक्ति करे बिना जीव को सपने में भी शांति का अनुभव नहीं हो सकता । |
| 381. |
किसी भी शाखा का ज्ञान जीवन में व्यर्थ नहीं है पर आध्यात्मिक ज्ञान सबसे उपयोगी है । |
| 382. |
मन को शुद्ध और कोमल बनाने हेतु भक्ति ही सर्वोत्तम विकल्प है । |
| 383. |
भाग्यवान लोग अपने जीवन में भक्ति उसी पल से शुरू कर देते हैं जब उन्हें भक्ति के सिद्धांत का पता चलता है । |
| 384. |
प्रभु की भक्ति हमारे मन को भीतर से संस्कार देती है । |
| 385. |
जीव का कल्याण जब कभी भी होना है वह केवल भक्ति से ही होना है । |
| 386. |
जीवन का सच्चा अमृत भक्ति करने पर ही मिलता है । |
| 387. |
प्रभु के एक सगुण साकार स्वरूप को केंद्र बनाकर भक्ति करनी चाहिए । |
| 388. |
अज्ञान हटते ही हमें पूरा संसार ही परमात्मा स्वरूप दिखाई देने लग जाता है । |
| 389. |
जैसे हम भगवती गंगा माता के एक घाट में पूजा करते हैं तो पूरे श्रीगंगाजल की पूजा हो जाती है वैसे ही प्रभु के एक सगुण साकार स्वरूप की पूजा करने से सच्चिदानंद स्वरूप प्रभु की पूजा हो जाती है । |
| 390. |
हमें यह मानना चाहिए कि कोटि- कोटि ब्रह्मांड के नायक मेरे विराट प्रभु मुझ पर अनुकंपा करने के लिए छोटे विग्रह के रूप में मेरी ठाकुरबाड़ी में विराजे हैं । |
| 391. |
प्रबल भक्ति भाव से प्रभु की अर्चना और पूजा करनी चाहिए । |
| 392. |
जो भक्ति के सरल साधन से प्राप्त हो जाता है वह ज्ञानयोग, ध्यानयोग आदि बहुत कठिन साधन से प्राप्त नहीं होता । |
| 393. |
सबसे अधिक लाभ भक्ति से ही मिलने वाला है, अन्य कोई साधन से मिलने वाला नहीं है । |
| 394. |
सगुण साकार प्रभु की भक्ति करना ही सबसे लाभदायक होता है, ऐसा प्रभु का मत है । |
| 395. |
अन्य साधनों का आधार वे साधन होते हैं पर भक्ति करने वालों के आधार स्वयं प्रभु होते हैं । |
| 396. |
भक्ति करने वाले पर कोई आपत्ति आती है तो प्रभु कहते हैं कि मैं दौड़कर आपत्ति निवारण हेतु आता हूँ । |
| 397. |
सच्चा भक्त किसी भी साधन, संप्रदाय या पंथ का विरोध नहीं करता । |
| 398. |
सारे-के-सारे संप्रदाय सही हैं, मान्य हैं, यह कहने वाला एक भक्त हृदय ही हो सकता है । |
| 399. |
हमारे शास्त्रों में जो करने को कहा गया है, उसे ही करना चाहिए और जो नहीं करने को कहा गया है, उसे त्याग देना चाहिए । |
| 400. |
कर्म प्रभु को अर्पण करने से उसका बोझ हमारे ऊपर से हट जाता है । |
| 401. |
मेरे शरीर से जो कुछ भी हो रहा है वह प्रभु मैं आपके लिए कर रहा हूँ, यह भाव हमारे हृदय में होना सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी है । |
| 402. |
शरीर से जो कुछ हुआ, मन से जो कुछ हुआ, वाणी से जो कुछ हुआ, वह प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित कर दिया, उससे मेरा कोई संबंध नहीं है । ऐसी भावना हमारे भीतर होनी चाहिए । |
| 403. |
जो भी मेरे से होना संभव हुआ वह प्रभु कृपा से ही संभव हुआ, यह भाव एक भक्त के हृदय में होता है । |
| 404. |
श्री बैकुंठजी, श्री गोलोकजी, श्री साकेतजी में प्रभु स्थाई निवास करते हैं या नहीं, यह पता नहीं पर भक्तों के हृदय में प्रभु जरूर स्थाई रूप से निवास करते हैं, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 405. |
प्रभु के लिए भक्ति भाव होने पर हमारा शरीर ही प्रभु का घर बन जाता है । |
| 406. |
प्रभु अपने भक्त से इतना प्रेम करते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । |
| 407. |
जीवन की उत्तर अवस्था तक व्यक्ति सकाम रहे तो यह दुर्भाग्यपूर्ण माना गया है । जीवन में एक अवस्था के बाद हर जीव को निष्काम भक्ति ही करनी चाहिए । |
| 408. |
प्रभु प्रेम के बिना हमसे रहा ही नहीं जाए, इसलिए प्रभु से प्रेम किया जाए, यह सच्चा प्रेम है । जिस प्रेम में न कोई कामना, न मोक्ष और न ही भोग की प्रभु से चाहत हो, वही सच्चा प्रेम होता है । |
| 409. |
श्रीगोपीजन कहती हैं कि उन्हें न भोग चाहिए, न स्वर्ग चाहिए, न मोक्ष चाहिए । प्रभु इन चीजों में हस्तक्षेप नहीं करें, अगर प्रभु को देना ही है तो प्रभु अपने श्रीकमलचरणों की प्रेमाभक्ति दें । |
| 410. |
प्रभु का प्रेम हृदय में जागृत करके मन को कोमल बनाया जाता है क्योंकि कोमल मन से ही प्रभु की प्राप्ति संभव है । |
| 411. |
भक्तों की आँखों से प्रेम भाव के कारण निरंतर अश्रुधारा प्रवाह होती रहती है जब वे प्रभु का गुणानुवाद करते हैं और प्रभु की श्रीलीलाओं का स्मरण करते हैं । |
| 412. |
प्रभु हमारी कामनाएं भी पूर्ण करते हैं पर प्रभु यह जरूर देखते हैं कि हम कामना पूर्ति से संबंध रखते हैं या प्रभु से संबंध रखते हैं । |
| 413. |
जिन्होंने एक प्रभु को छोड़कर कुछ भी नहीं चाहा उन्हें ही जीवन में भक्ति प्राप्ति हुई है । |
| 414. |
हमने प्रभु को कामना पूर्ति करने का साधन बना लिया है जो कि एकदम गलत है । |
| 415. |
भक्तों का यह भाव होता है कि उनकी वाणी, शरीर और प्राण सब कुछ उन्होंने प्रभु को बेच दिया है । ऐसे भक्तों का पूरा योगक्षेम का भार प्रभु उठाते हैं । प्रभु कहते हैं कि ऐसे भक्तों को कुछ भी नहीं करना पड़ता क्योंकि उनके लिए सब कुछ मैं करता हूँ । |
| 416. |
प्रभु भक्तों पर किए अपने उपकारों का कभी भी लेखा-जोखा नहीं रखते, वे तो उपकार पर उपकार करते जाते हैं । |
| 417. |
जितना लगाव एक वृद्ध अवस्था में पुत्र होने पर एक माता को होता है उससे भी कोटि-कोटि गुना ज्यादा लगाव प्रभु को अपने प्रिय भक्तों से होता है । |
| 418. |
हम घर आते हैं तो पत्नी पूछती है रुपए लाए क्या, पिता पूछते हैं कि मेरी दवाई लाए क्या, बच्चे पूछते हैं कि मेरे खिलौने लाए क्या ? पर प्रभु कोई चाहत नहीं रखते, बाकी दुनिया स्वार्थ रखती है पर प्रभु केवल हमसे विशुद्ध प्रेम करते हैं । |
| 419. |
भक्ति जीव को शुद्ध करने का परम रसायन है । |
| 420. |
भक्ति ही एकमात्र साधन है जो अपात्र-से-अपात्र साधक को भी पात्र बना देती है । |
| 421. |
भक्ति ही प्रभु प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन है, यह सभी शास्त्रों, ऋषियों और संतों का एकमत है । |
| 422. |
प्रभु कहते हैं कि जो मेरी भक्ति करता है उसे स्वयं की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं होती । जिसने अनंत कोटि ब्रह्मांड के नायक से रिश्ता जोड़ दिया फिर उसे क्या चिंता करनी ? |
| 423. |
प्रभु कहते हैं कि जब जीवात्मा मेरे से संबंध जोड़ लेता है तो उसकी सभी जिम्मेदारी मेरी हो जाती है । |
| 424. |
जब हम सर्वसमर्थ प्रभु से रिश्ता जोड़ लेते हैं तो हमारी चिंता उसी समय खत्म हो जाती है क्योंकि हमारी चिंता प्रभु की चिंता बन जाती है और प्रभु उसका भार स्वयं उठाते हैं । |
| 425. |
जैसे एक पिता को अपने पुत्र की मदद करने में कोई संकोच नहीं होता वैसे ही प्रभु कहते हैं कि मुझे भी मेरे भक्त का हित करने में कोई संकोच नहीं होता । |
| 426. |
एक पिता अपने पुत्र की हर इच्छा पूरी करने की सामर्थ्य शायद नहीं रखता हो पर सर्वसामर्थ्यवान परमपिता हमारी हर इच्छा पूर्ण करने की पूरी सामर्थ्य रखते हैं । |
| 427. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा भक्त भवसागर देखकर भयभीत नहीं हो जाए और भवसागर में डूब नहीं जाए इसलिए मैं अपनी कृपा और दया रूपी नौका उसके लिए सदैव तैयार रखता हूँ । |
| 428. |
जिस जगह प्रभु के जिस स्वरूप की पूजा होती है वहाँ प्रभु का वह स्वरूप जागृत हो जाता है । |
| 429. |
प्रभु की भक्ति हमारे सौभाग्य को जगाती है और हमारी सात्विक मनोकामनाएं पूरी करती है । |
| 430. |
प्रभु के अलग-अलग नाम और रूप सनातन धर्म के भूषण स्वरूप हैं । |
| 431. |
आकाश से बरसा हुआ जल भिन्न-भिन्न नदियों के रूप में सागर से मिल जाता है वैसे ही सनातन धर्म में प्रभु के सभी नाम और स्वरूप हमें एक ही परमपिता तक ले जाते हैं । |
| 432. |
पुरानी पीढ़ी में अपने पुत्र और पुत्री का नाम प्रभु और माता के नाम पर रखा जाता था । यह एक बहुत उत्कृष्ट परंपरा थी जो आज लुप्त हो रही है । |
| 433. |
भक्तों पर कृपा करने के लिए प्रभु ने इतने नाम और इतने रूपों में अपने को प्रकट किया है । |
| 434. |
प्रभु कहते हैं कि एक भी चिंता मेरे भक्त को नहीं करनी पड़ती क्योंकि उसकी हर चिंता का वहन मैं करता हूँ । |
| 435. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में योगक्षेम की बात श्रवण करके हमें प्रभु पर पूर्ण विश्वास हो जाता है और हम अपने वर्तमान और भविष्य के लिए निश्चिंत हो जाते हैं । |
| 436. |
प्रभु कहते हैं कि तुम चिंता मत करो, मेरे पर अपनी चिंता का भार छोड़ दो । |
| 437. |
प्रभु कहते हैं कि मुझे मेरे भक्त से कुछ भी नहीं चाहिए, सिर्फ वह अपना मन और बुद्धि मुझमें लगा दे यानी मन से प्रभु से प्रेम करे और बुद्धि से प्रभु का विचार करे । |
| 438. |
हमारी संतवाणी में जितना प्रभु प्रेम छिपा है उतना प्रभु प्रेम कहीं नहीं मिलेगा । |
| 439. |
हमें अपने मन, प्राण और बुद्धि को प्रभु से जोड़ लेना चाहिए । ऐसा करना सबसे लाभप्रद होता है । |
| 440. |
प्रभु यहाँ तक कहते हैं कि दिन का एक क्षण मुझे दे दो । वह क्षण ऐसा होना चाहिए जिसमें कोई दूसरा ध्यान और दूसरा कोई काम हमें नहीं हो । पर हमारा दुर्भाग्य होता है कि हम प्रभु के लिए वह एक क्षण भी नहीं निकाल पाते । |
| 441. |
शास्त्र कहते हैं कि कुछ क्षण के लिए भी प्रभु से सच्चा प्रेम करके देखें, फिर जीवन में क्या चमत्कार होगा इसकी हम कल्पना भी नहीं कर पाएंगे । |
| 442. |
प्रभु कहते हैं कि एक क्षण भी अगर हम प्रभु से सच्चा प्रेम करने लगते हैं तो प्रभु सबसे पहले उस क्षण को आनंद देने वाला बना देते हैं और फिर चौबीस घंटों के लिए हमारे मन को खींच लेते हैं । |
| 443. |
एक क्रिया जो रोज-रोज निर्धारित समय पर की जाती है तो उस क्रिया की शक्ति बढ़ जाती है, यह बात अध्यात्म के साधन पर भी लागू होती है । इसलिए अपना साधन नियमित रूप से करना चाहिए । |
| 444. |
प्रभु कहते हैं कि भक्ति के लिए रोज-रोज के अभ्यास की जरूरत है, इससे भक्ति करने की पात्रता बढ़ती है और एक दिन वह भक्ति हमें प्रभु तक पहुँचा देती है । |
| 445. |
अपने मन और बुद्धि को प्रभु को अर्पण करने का जीवन में अभ्यास करना चाहिए । |
| 446. |
अभ्यास उसे कहते हैं जो रोज किया जाए । प्रभु के लिए रोज 10-15 मिनट का साधन का नियम लेने से वह नियम ही हमारा उद्धार कर देता है । |
| 447. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी तो यहाँ तक कहते हैं कि एक निमिष यानी पलक झपकने जितना समय अगर प्रभु को हम रोजाना निर्धारित समय पर देना आरंभ कर देते हैं तो उसका जीवन में लाभ और जीवन में परिवर्तन हम स्वयं देख सकते हैं । |
| 448. |
प्रभु को समय देने में पूर्ण अनन्यता होनी चाहिए यानी उस समय विश्व की सबसे महत्वपूर्ण और सबसे दुर्लभ कीमती चीज भी हमारे सामने आ जाए तो हमारा ध्यान प्रभु से नहीं हटे । |
| 449. |
साधन करते समय कोई भी बाधा आते ही हम उस साधन को तत्काल छोड़ देते हैं जो कि एकदम गलत है । |
| 450. |
प्रभु का संकल्प है कि वे अपने भक्तों का कल्याण करके ही छोड़ते हैं । |
| 451. |
प्रभु कहते हैं कि अगर मुझे समय नहीं दे सकते तो ऐसा करना चाहिए कि दिन में हम जो भी चर्या करें उसे प्रभु को अर्पण कर देने का नियम बना लेना चाहिए । |
| 452. |
कर्म प्रभु को अर्पण करने का मूल तरीका यह है कि मैं कर ही नहीं रहा, कर्म तो प्रभु ही करवा रहे हैं, प्रभु के लिए ही वह हो रहा है और वह कर्म प्रभु को अर्पण है । |
| 453. |
उत्तम साधक वह होता है जो अपने पुराने संकल्पों और कर्मों को भुला देता है, प्रभु को अर्पण करने के बाद उसे याद नहीं रखता । |
| 454. |
प्रभु सिद्धांत बताते हैं कि वर्तमान में जीना चाहिए, भूतकाल को भुला देना चाहिए और भविष्यकाल की चिंता नहीं करनी चाहिए । |
| 455. |
अपने द्वारा किए कर्मों से संबंध तोड़ लेना संसारी के लिए कठिन होता है और भक्ति करने वाले साधक के लिए आसान होता है, ऐसा प्रभु कहते हैं । |
| 456. |
प्रभु हमसे कर्म करवा रहे हैं और प्रभु के लिए कर्म हो रहा है, जीवन में यह जागृति सर्वदा रखनी चाहिए । |
| 457. |
जैसे एक पेड़ अपने फूल और फल को पकने के बाद छोड़ देता है, उसे पकड़कर नहीं रखता वैसे ही हमें अपने कर्मों को छोड़ देना चाहिए यानी प्रभु को अर्पण कर देना चाहिए, उन्हें पकड़कर नहीं रखना चाहिए । |
| 458. |
जैसे एक कन्या का पिता अपनी पुत्री को जन्म देकर, संस्कार देकर, पढ़ाता है, उसके लिए वर खोजता है, विवाह समारोह करता है, कन्यादान करता है पर उससे कोई अपेक्षा नहीं रखता । वैसे ही हमें अपने कर्म से कोई अपेक्षा नहीं रखना चाहिए और उसे प्रभु को अर्पित कर देना चाहिए । |
| 459. |
कर्म किया और कर्मफल का त्याग कर दिया तो यह सबसे ऊँची स्थिति होती है । हम कर्म की स्मृतियों को संभाल कर रखते हैं जो सबसे गलत होता है । |
| 460. |
प्रभु कहते हैं कि इस तीन बोझ को हमेशा के लिए त्याग देना चाहिए । भूतकाल का शोक, वर्तमान का मोह और भविष्यकाल का भय । इसका उपाय प्रभु बताते हैं कि भक्ति करने से ही यह तीनों बोझ नष्ट होंगे । |
| 461. |
शास्त्र कहते हैं कि अनन्यता से भक्ति की जाए तो दोबारा पंच भौतिक देह प्राप्त नहीं होती । |
| 462. |
हमारे कर्मफल और वासनाओं के कारण हमें अगली पंच भौतिक देह मिलती है । भक्ति का अभ्यास अनन्यता से करने पर पंच भौतिक देह मिलने का यह मूल कारण ही नष्ट हो जाता है । |
| 463. |
जैसे-जैसे नियम से भक्ति का अभ्यास करेंगे वैसे-वैसे अध्यात्म रूपी कल्याण का ज्ञान अपने आप हमारे भीतर जागृत हो जाएगा । |
| 464. |
भक्ति करने में मन नहीं लगता तब भी भक्ति करनी चाहिए, यही अभ्यास का मतलब होता है । ऐसा करने पर ही भक्ति में मन लगने लगेगा । |
| 465. |
भक्ति ही हमें अंत में जीवन में शांति उपलब्ध करवाएगी । |
| 466. |
नियमित भक्ति करने वाले का पूरा दिन इतना शांतिमय गुजरता है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । |
| 467. |
जिसका मन प्रभु की भक्ति में लग जाता है उसे कर्मफल त्यागना नहीं पड़ता वह स्वयं ही उसके लिए त्याज्य हो जाता है । |
| 468. |
भक्ति से जीवन में अनेक सद्गुणों की जागृति होती है जिससे जीव प्रभु को अति प्रिय हो जाता है । |
| 469. |
सदगुण हमारे जीवनमूल्य होते हैं । भक्ति करने वाले साधक को इन सद्गुणों की वृद्धि उसके अंदर हो रही है या नहीं इसकी जाँच करते रहना चाहिए । |
| 470. |
भक्त किसी से द्वेष नहीं करता क्योंकि प्रभु को हर तरफ वह मौजूद पाता है इसलिए उसे कोई पराया नहीं लगता । |
| 471. |
भक्त जिधर भी देखता है मैत्री के नेत्र से ही चारों तरफ देखता है । |
| 472. |
भक्त में मैं और मेरापन का भाव नहीं रहता क्योंकि सारे संसार को ही वह अपना मानता है । |
| 473. |
भक्ति के कारण भक्त को जीवन में क्रोध स्पर्श भी नहीं करता । |
| 474. |
भक्ति के कारण जीव में इतनी दया और क्षमा भर जाती है कि संत कहते हैं कि भक्तरूपी समुद्र में दया और क्षमा कभी सूखती नहीं । |
| 475. |
भक्ति के कारण भक्त का प्रभु के ऊपर पूर्ण विश्वास हो जाता है और अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है । |
| 476. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा भक्त मुझे सर्वाधिक प्रिय होता है । प्रभु कहते हैं कि भक्त कितना प्रिय होता है इसकी कोई उपमा ही उनके पास नहीं है । |
| 477. |
प्रभु कहते हैं कि भक्त के साथ रमने में उन्हें जो आनंद आता है उसे वे बयां ही नहीं कर सकते । |
| 478. |
सच्चा भक्त प्रभु के अलावा संसार में किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखता । |
| 479. |
भक्त के जीवन में मुक्ति पहले से ही तय होती है । |
| 480. |
प्रभु कहते हैं कि जैसे श्री सूर्यनारायणजी के पास अंधकार पहुँच नहीं सकता वैसे ही मेरे भक्त के भीतर पाप पहुँच ही नहीं सकते । |
| 481. |
जब हम प्रभु के सानिध्य में पहुँच जाते हैं तो दुःख का लेश भी हमें स्पर्श नहीं करता क्योंकि आनंदित रहना भक्ति के कारण हमारा स्वभाव बन जाता है । |
| 482. |
जैसे एक पक्षी व्याध की पकड़ से छूट जाता है तो वह छूटकर आनंद मनाता है वैसे ही भक्त संसाररूपी व्याध से छूटकर प्रभु के पास आकर आनंद मनाता है । |
| 483. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे और मेरे भक्त में कोई भेद नहीं होता क्योंकि मैं ही भक्त के रूप में लीला करता हूँ । |
| 484. |
प्रभु कहते हैं कि कोई अकेला प्रेम नहीं कर सकता इसलिए मैं भी एक से दो रूप बना लेता हूँ, एक मेरा और एक मेरे भक्त का और इस तरह प्रेम का आदान-प्रदान करता हूँ । |
| 485. |
प्रभु कहते हैं कि मैं अपने भक्त से प्रेम पाने की सदैव प्रतीक्षा करता रहता हूँ । |
| 486. |
प्रभु कहते हैं कि दुष्टों का नाश तो मैं बिना धरा पर आए हुए भी कर सकता हूँ पर अपने भक्तों से प्रेम का रसास्वादन करने के लिए मैं अवतार लेता हूँ । |
| 487. |
संसार की कोई भी चीज एक भक्त को सुख नहीं देती क्योंकि उसने परमानंद के शिरोमणि प्रभु को प्राप्त कर लिया है । |
| 488. |
भक्त के जीवन में कोई भेदभाव नहीं बचता । वह मनुष्य से ही नहीं बल्कि वृक्षों से, भूमि से, जल से यानी सबसे प्रेम करता है और जहाँ जाता है वहाँ प्रेम बिखेरता है । |
| 489. |
भक्त को अच्छा-बुरा, अनुकूल-प्रतिकूल, लाभ-हानि का पता भी नहीं चलता जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी रात नहीं जानते । भक्त सब स्थिति में सम रहता है । |
| 490. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा भक्त ब्रह्म ज्ञानी नहीं होता वह तो खुद ज्ञान बन जाता है । ज्ञान हो जाना सबसे बड़ी बात है । |
| 491. |
मैं और मेरा रूपी अज्ञान का नाश केवल भक्ति से ही संभव है, ऐसा प्रभु का मत है । |
| 492. |
प्रभु साक्षात्कार के बाद भी भक्ति करना भक्त का स्वभाव बन जाता है क्योंकि वह भक्ति के बिना रह ही नहीं सकता । |
| 493. |
प्रभु शपथ लेकर कहते हैं कि मेरे भक्तों के अलावा मुझे कुछ भी ब्रह्मांड में प्रिय नहीं है । |
| 494. |
प्रभु कहते हैं कि मैं भक्तों का स्वागत करने के लिए दौड़कर जाता हूँ और अपने मुकुट की जगह उन्हें अपने सिर पर बैठा लेता हूँ जहाँ किसी की भी पहुँच नहीं है । |
| 495. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा भक्त चुप नहीं बैठता, वह भक्ति बांटता है, प्रेम बांटता है और सब जगह सबको प्रभु से जोड़कर भक्ति का दान देता है । उससे बड़ा कोई दानी नहीं होता । |
| 496. |
प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त को मुक्ति की चिंता नहीं होती क्योंकि मुक्ति उसकी मुट्ठी में सदैव रहती है । |
| 497. |
प्रभु कहते हैं कि मैं भी मेरे भक्त का दर्शन करने के लिए उतावला रहता हूँ । मेरे भक्त की स्तुति करने में मुझे रस आता है । कोई मेरे भक्त का गुणगान करता है तो वह मुझे प्रिय लगता है । |
| 498. |
प्रभु अश्रुधारा बहाकर और गदगद होकर कहते हैं कि मेरे हाथ में जो कमल है वह मैं अपने भक्त के ऊपर चढ़ाने हेतु रखता हूँ । |
| 499. |
प्रभु कहते हैं कि मेरा चतुर्भुज रूप इसलिए है कि दो हाथ से मेरे भक्त का आलिंगन करके मुझे तृप्ति नहीं होती, इसलिए चार हाथ आलिंगन के लिए मैं रखता हूँ । |
| 500. |
प्रभु कहते हैं कि भक्तियोग का श्रवण करने वाला, भक्तियोग में श्रद्धा रखने वाला और भक्ति मार्ग पर चलने का प्रयास करने वाला मुझे सबसे ज्यादा प्रिय हो जाता है । |
| 501. |
प्रभु कहते हैं कि जो भक्त मेरा ध्यान करते हैं, मैं भी उनका ध्यान करता हूँ । |
| 502. |
प्रभु कहते हैं कि मैं अपने भक्तों के पीछे दीवाना रहता हूँ क्योंकि मेरे भक्त ही मेरे सर्वस्व होते हैं । |
| 503. |
संत कहते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीताजी भक्त और भगवान के बीच में एक प्रेम और ज्ञान का संवाद है । |
| 504. |
भक्त के कल्याण के लिए श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु सूत्र-ही-सूत्र बोलते जाते हैं और ज्ञान का अमृतरूपी खजाना खोल देते हैं । |
| 505. |
हमारे शास्त्रों में सबके लिए सभी साधन अंकित होते हैं । हमें यह समझना चाहिए कि हमारे लिए क्या लिखा हुआ है और उसे ही हमें ग्रहण करना चाहिए । |
| 506. |
अपने मन को जीवन का सत्य समझाना सबसे जरूरी है और यह सबसे कठिन भी है । |
| 507. |
हमारी कामनाओं को पोषण हमारे मन से मिलता है । |
| 508. |
हमारा मन ही हमारी इंद्रियों को संसार के विषयों की ओर धकेल देता है । |
| 509. |
मन में ही संकल्प-विकल्प और कल्पना की जागृति होती है । |
| 510. |
भक्त की जिह्वा को झूठ नाम का पदार्थ स्पर्श भी नहीं करता । |
| 511. |
भक्ति हमारी इंद्रियों को प्रभु की तरफ मोड़कर उन्हें शांत कर देती है । |
| 512. |
भक्त अपनी बड़ाई दूसरों के सामने नहीं होने देना चाहता, वह सम्मान और स्तुति से दूर रहता है । |
| 513. |
भक्त के हृदय में प्रभु से अपनापन होने के कारण खुद की बड़ाई और खुद के गौरव का विसर्जन हो चुका होता है । |
| 514. |
भक्त हृदय में कीर्ति और पूज्यता की चाहत ही नहीं होती । |
| 515. |
लघुता भक्त की पूंजी होती है । भक्त लघु बनकर ही सदैव रहना चाहता है । |
| 516. |
उत्तम भक्त दुनिया से बचकर प्रभु के साथ ज्यादा-से-ज्यादा समय बिताना चाहता है । |
| 517. |
मन को प्रभु में लगाना है तो मन से संसार से दूर हो जाना ही इसका एकमात्र उपाय है । |
| 518. |
हमारा अपनापन हमारे सामने वाले जीव के भीतर के परमात्मा तत्व यानी प्रभु से ही होना चाहिए । |
| 519. |
भक्तों को एकांत प्रिय होता है, संसारी को संसार की खटपट प्रिय होती है - यह कितना बड़ा फर्क है । |
| 520. |
प्रभु को सच्चे मन से चाहने वाला अपने मन से संसार को बाहर निकाल देता है । |
| 521. |
जो अपने आध्यात्मिक धन को छुपाता है वही उसमें वृद्धि कर पाता है । जो अपने आध्यात्मिक धन को संसार को दिखाता है वह उसे खो देता है । |
| 522. |
हमारी भक्ति केवल प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही होनी चाहिए, उसका और कोई उद्देश्य नहीं होना चाहिए । |
| 523. |
हमें कभी यह सोचना चाहिए कि क्या हमने जीवन में कोई भी ऐसा परोपकार का काम किया है जो हमें तो पता है पर अन्य किसी को पता नहीं हो यानी वह जगत में प्रकाशित नहीं हो । |
| 524. |
जिस परोपकार को हमने दुनिया को दिखा दिया उसका पुण्य बहुत कम हो जाता है । इसलिए परोपकार को दुनिया से छुपाकर ही रखना चाहिए । |
| 525. |
प्राचीन भारतीय परंपरा में दिखावे का बिलकुल महत्व नहीं था, सादगी का बड़ा महत्व था । |
| 526. |
सच्चा भक्त अपने पुण्य को वैसे छुपाता है जैसे एक किसान खेत में बीज डालकर उसे ढक देता है, खुला नहीं रखता । |
| 527. |
जैसे बीज को खेत में खुला छोड़ देने पर चिड़िया उसे चुग लेती है और वह अंकुरित नहीं होता वैसे ही प्रशंसा की चिड़िया हमारे पुण्यों के बीज को चुग लेती है । |
| 528. |
जिसने अपने पुण्यों को ढक दिया फिर प्रभु कृपा की वर्षा उसके ऊपर होती है और एक बड़ा पुण्य का फल उसके लिए निर्माण कर देती है । |
| 529. |
सभी जीवों के प्रति करुणा का आचरण करते हुए अपने आध्यात्मिक साधन को करना सबसे श्रेष्ठ होता है । |
| 530. |
किसी को मानसिक पीड़ा, शारीरिक पीड़ा या कष्ट देना शास्त्रों में हिंसा कहलाता है । |
| 531. |
सच्ची अहिंसा की व्याख्या किसी को मारना नहीं है, यही पर नहीं रुकती । सच्ची अहिंसा में किसी को पीड़ा नहीं देना, किसी को कष्ट नहीं देना शामिल है । इसी अहिंसा की बात श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं । |
| 532. |
भक्त किसी को कष्ट दे नहीं सकता क्योंकि उन्हें दूसरे को कष्ट देने में स्वयं ही कष्ट अनुभव होता है । |
| 533. |
बोलने की अहिंसा सबसे बड़ी होती है । भक्त बड़े प्रेम से बोलता है जैसे वह विनम्रता की मूर्ति हो । |
| 534. |
अपनी वाणी से एक भी कठोर शब्द, जो किसी को क्लेश पहुँचाता हो, वह कभी भी नहीं बोलना चाहिए । |
| 535. |
वाणी की अहिंसा के कारण भक्त की इतनी मधुर वाणी बन जाती है कि वह दूसरे के हृदय को शीतलता प्रदान करती है । |
| 536. |
आज के युग में वाणी का दोष जीवन में सबसे बड़ा क्लेश का कारण बन जाता है । |
| 537. |
वाणी का दोष न हो इसके लिए वाणी को मधुर रखना सबसे आवश्यक है । यह आध्यात्मिक उन्नति के लिए बहुत ही सहयोगी होती है । |
| 538. |
संसार में हमारे अधिकतर मित्र वाणी के कारण ही होते हैं । वैसे ही हमारे अधिकतर शत्रु भी वाणी के कारण ही होते हैं । |
| 539. |
कभी-कभी हमें पता भी नहीं होता और हम ऐसी बातें बोल देते हैं जिसमें किसी का अमंगल छिपा हुआ होता है । |
| 540. |
प्रभु कहते हैं कि कभी तो याद करना चाहिए कि कितने लोगों का हमने कठोर शब्द बोलकर हृदय दुखाया है । |
| 541. |
हमारी वाणी से निकलने वाला हर शब्द सौम्य हो और सत्य हो, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 542. |
शास्त्र कहते हैं कि जितना आवश्यक हो उतना ही बोलना चाहिए, व्यर्थ की बातें कभी नहीं करनी चाहिए । |
| 543. |
शास्त्र में हाथों की अहिंसा के लिए बताया गया है कि एक अभ्यास हमारे हाथों को होना चाहिए कि किसी को भी देखा और हमारे हाथ नमस्कार के लिए जुड़ जाएं । |
| 544. |
शास्त्रों में मन की अहिंसा पर बड़ा जोर दिया गया है क्योंकि वाणी की, हाथों की और आँखों की अहिंसा मन से ही आरंभ होती है । |
| 545. |
हमारा मन प्रेम भरा होना चाहिए, सबके प्रति कोमलता और दया का भाव हमारे मन में होना चाहिए । |
| 546. |
प्रभु कहते हैं कि जिसमें सभी तरह की अहिंसा के लक्षण दिखते हैं वह जीव मुझे अतिशय प्रिय होता है । |
| 547. |
जिस हृदय में प्रभु का वास होता है उसी हृदय में क्षमा का दर्शन हमें होता है । |
| 548. |
आत्मानंद की प्राप्ति हेतु सबसे जरूरी है कि हमारे भीतर क्षमा भाव होना चाहिए । |
| 549. |
श्री रामायणजी जीवन जीने की युक्ति, भक्ति और मुक्ति तीनों हमें देती है । |
| 550. |
उत्तम भक्त जो होता है उसमें इतना साहस होता है कि वह सबको और सभी कुछ को क्षमा कर देता है । |
| 551. |
जो क्षमा नहीं करता और विरोध लेकर जीवन में जीता है वह अंत तक अपने मन में जलता ही रहता है । |
| 552. |
जो क्षमा करने की प्रवृत्ति जान लेता है संसार में उसे कोई भी, कभी भी दुःखी नहीं कर सकता । किसी में उसे दुःखी करने का सामर्थ्य नहीं होता, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 553. |
संत दूसरों का कड़वा व्यवहार भी बड़ी सुगमता से सह लेते हैं, इस कारण उनमें एकदम भी कटुता नहीं आती । |
| 554. |
भक्तों का हाथ अमंगल करने वाले को भी आशीर्वाद देने के लिए ही उठता है । |
| 555. |
संत हरदम कहते हैं कि जिन्होंने हमारा बुरा किया उनका भी मंगल हो, यह कितनी बड़ी जीवन की उपलब्धि होती है । |
| 556. |
सच्चे संत कभी कष्ट पाकर भी किसी को श्राप नहीं देते, ऐसे संतों को प्रभु ने संसार का अलंकार बताया है । |
| 557. |
भक्त के मन में जो होता है वही उनकी वाणी पर आता है । |
| 558. |
प्रभु प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से यानी दोनों तरह से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं । |
| 559. |
श्री रामायणजी में प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता दो ही ऐसे पात्र हैं जिन्होंने पूरी श्री रामायणजी में एक बार भी भगवती कैकेयी माता को बुरा-भला नहीं कहा । प्रभु और माता ने कोई भी मलाल भगवती कैकेयी माता के प्रति अपने मन में नहीं रहने दिया, सब कुछ मन से निकाल दिया । क्षमा का इससे बड़ा दर्शन पूरे शास्त्रों में कहीं भी नहीं मिलेगा । |
| 560. |
प्रभु श्री रामजी ने भगवती कैकेयी माता के प्रति इतनी उदारता का व्यवहार किया जैसे भगवती कैकेयी माता ने कोई अपराध किया ही नहीं हो । |
| 561. |
प्रभु की पूजा और अर्चना करने का फल शाश्वत होता है । |
| 562. |
हमें प्रभु की पूजा और अर्चना करके शाश्वत फल की प्राप्ति का लक्ष्य जीवन में रखना चाहिए । |
| 563. |
संसार का सारा मेला नश्वर है । इसमें नहीं उलझकर शाश्वत फल, जो प्रभु की प्राप्ति है, उसका प्रयत्न हमें जीवन में करना चाहिए । |
| 564. |
जो अखंड आनंद का संकल्प है वह सिर्फ प्रभु भक्ति से ही पूर्ण हो सकता है, अन्य किसी साधन से यह संभव नहीं है । |
| 565. |
प्रभु ही हमारे जीवन में सद्गुरुदेव भेजने की कृपा करते हैं । |
| 566. |
जीव की क्षमता न होने पर भी उसे परमात्मा की प्राप्ति की योग्यता भक्ति प्रदान करती है । |
| 567. |
प्रभु की कृपा होने पर एक अपात्र जीव भी आध्यात्मिक पोषण पाकर प्रभु तत्व के ज्ञान हेतु योग्य बन जाता है । |
| 568. |
हमारे शास्त्र और श्रीग्रंथ तीव्र भक्ति की बात करते हैं क्योंकि भक्ति में तीव्रता ही सब कुछ होती है । |
| 569. |
अन्य किसी साधन की मर्यादा से प्रभु को बंधन में नहीं बांधा जा सकता । प्रभु मात्र भक्ति के प्रेम बंधन में ही बंधते हैं । |
| 570. |
प्रभु कभी किसी शर्त से नहीं मिलते कि इतना कर्मकांड कर लेंगे, इतनी बार तीर्थ कर लेंगे तो प्रभु मिल जाएंगे । प्रभु केवल भक्ति की तीव्रता होने पर ही मिलते हैं । |
| 571. |
प्रभु तक जाना है तो विकाररूपी यानी बिना जरूरत की वस्तु का त्याग करके हमें जाना चाहिए । फालतू का बोझा लेकर प्रभु के पास जाना समझदारी नहीं है । |
| 572. |
संत कहते हैं कि अगर हम प्रभु मार्ग पर वेग से चलते हैं तो प्रभु बहुत निकट हैं । अगर हम प्रभु मार्ग पर धीरे-धीरे चलते हैं तो प्रभु बहुत दूर हैं । |
| 573. |
जिनका भक्ति का साधन बड़ा तीव्र होता है वे प्रभु के बहुत जल्दी समीप पहुँच जाते हैं । |
| 574. |
प्रभु की सामान्य याद आना एक बात है पर प्रभु को तीव्रता से सदैव याद रखना बहुत श्रेष्ठ बात है । |
| 575. |
हमारे हृदय में बहुत अधिक आसक्ति प्रभु के लिए निर्माण होनी चाहिए, इससे भक्ति परिपक्व होती है । |
| 576. |
प्रभु की कृपा की वर्षा हमें जीवन में मिलती है तो हमारी भक्ति फलने-फूलने लगती है । |
| 577. |
जब हम प्रभु की भक्तिरूपी सेवा करते हैं तो ज्ञान और वैराग्य हमारी सेवा में स्वतः ही उपस्थित हो जाते हैं, ऐसा मानना चाहिए । |
| 578. |
जड़ संसार का चिंतन करने से मन जड़ बनता है और चेतन प्रभु का चिंतन करने से मन चेतनमय बनता है । |
| 579. |
जीवन में हमारी वृत्ति निरंतर ऐसी होनी चाहिए कि वह प्रभु सेवा का अवसर सदैव तलाशती रहे । |
| 580. |
एकाग्रता से की हुई मानस पूजा सिर्फ मानस पूजा ही नहीं रह जाती, वह सच्ची बनकर परम सिद्ध हो जाती है । |
| 581. |
मानस पूजा में प्रभु के लिए अपने मन के रत्नों से संतजन आभूषण बनाते हैं । |
| 582. |
मानस पूजा मात्र कल्पना का खेल नहीं है । इसमें भावना प्रगाढ़ होती है तो हमारा मन वैसे पदार्थ को प्रभु को अर्पण करने के लिए निर्माण कर देता है । |
| 583. |
मानस पूजा में भावना की प्रधानता होती है जो भक्ति का भी एक मुख्य स्तंभ है । |
| 584. |
जब हम मानस पूजा करते हैं तो हम देखते-देखते प्रभु के साथ दूसरे विश्व में पहुँच जाते हैं । |
| 585. |
भगवती मीराबाई को जब प्रसाद के रूप में जहर भेजा गया तो उन्होंने प्रसाद के रूप में उसे ग्रहण करना स्वीकार किया । उनके इस भाव से जहरत्व खत्म हो गया और वह प्रभु का प्रसाद बनकर अमृततुल्य हो गया । |
| 586. |
प्रभु के लिए की हुई भक्ति भावना में हमारा मंगल करने का बहुत बड़ा बल होता है । |
| 587. |
मानस पूजा में हम प्रभु के श्रीकमलचरणों की सेवा कर सकते हैं और उसमें बहुत सारी हमारी मन की भावनाओं को जोड़ सकते हैं । |
| 588. |
प्रभु परमपिता हैं यानी जगत के पिता है फिर भी हमारी सेवा की तरफ प्रभु का तत्काल ध्यान जाता है क्योंकि प्रभु प्रेम से आकर्षित होते हैं । |
| 589. |
प्रभु की इतनी सेवा करनी चाहिए कि हमें लगना चाहिए कि प्रभु केवल हमारे ही हैं इसलिए हमारे बिना प्रभु की सेवा करने वाला कोई नहीं है । |
| 590. |
प्रभु हमारे प्रेम के कारण हमें छोड़कर कहीं जाएं नहीं, ऐसी सेवा हमें करनी चाहिए । |
| 591. |
प्रभु सबके हैं, इसे ज्ञान कहते हैं और प्रभु सबके होते हुए भी सिर्फ मेरे हैं, इसे भक्ति कहते हैं । |
| 592. |
प्रभु सबके हैं, यह एक साधारण बात है । प्रभु मेरे हैं, यह एक विशेष बात है और प्रभु सिर्फ मेरे हैं, यह सबसे बड़ी बात है । |
| 593. |
हम प्रभु के हैं, यह भाव हमारे हृदय में होना चाहिए । अभी गड़बड़ यह है कि हम परिवार के हैं, समाज के हैं, सबके हैं और प्रभु के “भी” हैं । हमें केवल प्रभु के “ही” होना चाहिए । |
| 594. |
प्रभु में प्रगाढ़ भक्ति होने से शास्त्रों के रहस्य हमारे सामने खुल जाते हैं, नहीं तो शास्त्र कंठस्थ भी कर लें तो भी उनके भाव से हम अछूते रह जाएंगे । |
| 595. |
प्रभु की निष्काम भक्ति में हमें अर्पण करने हेतु अपने सद्गुणरूपी अलंकार प्रभु को समर्पित करने चाहिए । |
| 596. |
भक्त यहाँ तक मानस पूजा में भाव कर लेते हैं कि वे प्रभु के श्रीकमलचरणों की खड़ाऊँ बन जाएं यानी हमेशा प्रभु के श्रीकमलचरणों से चिपके हुए रहें । |
| 597. |
संत मानस पूजा में भाव करते हैं कि वे प्रभु के बैठने का आसन बन जाएं । प्रभु की सेवा में जो चंदन इत्यादि अर्पण होता है वह सामग्रीरूपी उपचार बन जाएं । |
| 598. |
संत यहाँ तक मानस पूजा में भाव कर लेते हैं कि जो वस्त्र प्रभु धारण करते हैं वे वस्त्र बन जाएं, प्रभु की आरती के दीपक बन जाएं । |
| 599. |
मानस पूजा में यह भाव करना चाहिए कि जो प्रभु को प्रिय पदार्थ है, वह पदार्थ मैं बन जाऊँ । |
| 600. |
भक्त को प्रभु की सेवा-ही-सेवा सूझती है, उसे प्रभु से कुछ मांगने की बात कभी भी नहीं सूझती । |
| 601. |
मेरे प्रभु ही मेरा परिवार है, यह भावना भक्त के हृदय में दृढ़ करके बैठ जाती है । |
| 602. |
हमारे जीवन में प्रभु के पहले कोई भी नहीं होना चाहिए । |
| 603. |
प्रभु की सेवा और भक्ति सबसे पहली, बाकी संसार के कर्तव्य बाद में होने चाहिए । |
| 604. |
भक्त प्रभु की सेवा करने वाले दूसरे भक्त से बहुत प्रेम रखता है । |
| 605. |
कोटि-कोटि साधन करने से भी ज्यादा प्रभाव कलियुग में प्रभु के नाम जप का है । |
| 606. |
प्रभु को स्पर्श किया हुआ स्नान का जल या प्रभु श्री महादेवजी के शिवलिंग के अभिषेक का जल कोटि तीर्थ के जल से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है । |
| 607. |
प्रभु के भोग के रूप में अर्पण हुआ प्रसाद मोक्षरूपी फल हमें देता है । |
| 608. |
प्रभु की भक्ति करने वाले के लिए सारे शास्त्रों के सिद्धांत दूर हट जाते हैं । जो भक्त करता है, वही शास्त्रयुक्त बन जाता है । |
| 609. |
प्रभु की सेवा से ज्ञान, जो हमारे भीतर होता है, वह प्रकट हो जाता है । |
| 610. |
ज्ञान और वैराग्य को एक भक्त के हृदय में ही प्रतिष्ठा मिलती है । |
| 611. |
ज्ञान और वैराग्य भक्त की परिक्रमा करते हैं कि वह भक्त मुझे स्वीकार कर लें । |
| 612. |
जो ज्ञान हमें साधन मार्ग पर बीच में छोड़कर चला जाता है, वह ज्ञान भक्ति के कारण हमें अखंड रूप से प्राप्त हो जाता है । |
| 613. |
जैसे नीम को कितना भी शहद का लेप लगाने पर भी वह खाने में कड़वा ही लगेगा, वैसे ही संसार एक साधक को कड़वा ही लगता है । |
| 614. |
भक्त बहुत संयमी होता है और उसकी इंद्रियां उसकी आज्ञा का पालन करती हैं । |
| 615. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें मन पर भरोसा नहीं करना चाहिए, अपने विवेक पर भरोसा करना चाहिए । |
| 616. |
हमारी इंद्रियां और मन हमारी आज्ञा मानते नहीं पर भक्त की इंद्रियां और मन उसके पूर्ण नियंत्रण में रहते हैं । |
| 617. |
योग शास्त्र का संक्षेप में उपदेश यह है कि इंद्रियों को मन के अधीन होना चाहिए, मन को बुद्धि के अधीन होना चाहिए और बुद्धि को प्रभु के अधीन होना चाहिए । |
| 618. |
भक्त का मन स्वेच्छा से उसकी आज्ञा का पालन करता है । |
| 619. |
भक्त जो सोचता है कि ऐसा विचार मेरे मन में नहीं आए, वह विचार कभी भी उनके मन में नहीं आता । |
| 620. |
भक्त संसार के विषयों को जहरतुल्य मानते हुए उनको तिलांजलि दे देता है । |
| 621. |
भक्ति में इतना बल होता है कि भक्ति के कारण एक भक्त संसार के गलत विषयों और दृश्यों को देखता भी नहीं । |
| 622. |
शास्त्रों में उपमा देकर और कथा के माध्यम से तथ्यों को समझाने का प्रयत्न किया गया है । |
| 623. |
हमारे शास्त्र जीवनभर हमें माता के रूप में संरक्षण देते हैं । |
| 624. |
जिनको संसार के विषयों से वैराग्य प्राप्त हो गया उन्हें ही सच्चा भाग्यवान मानना चाहिए । |
| 625. |
प्रभु की कृपा का उदय जीवन में तब मानना चाहिए जब संसार के विषयों से हमारा वैराग्य हो जाए । |
| 626. |
हमारे शास्त्र विषयानंद यानी संसार के विषयों के आनंद से आत्मानंद यानी प्रभु के सानिध्य का परमानंद तक हमें ले जाते हैं । |
| 627. |
शास्त्र कहते हैं कि संसारी भोगानंद बनता है यानी संसार के भोगों में आनंद लेता है जो कि गलत है । |
| 628. |
वैराग्य बिना परमार्थ पथ पर हम सफल नहीं हो सकते । |
| 629. |
जो संसार का प्रपंच जीवन रहते ही छोड़ देता है, वही सच्चा आत्मज्ञानी होता है । |
| 630. |
संसार में कर्म करते वक्त “मैं” की भावना का पूर्ण विसर्जन हो जाए तो वह कर्म हमारे लिए बंधन नहीं बनता । |
| 631. |
एक भक्त संसार के विषयों के चक्कर में नहीं पड़ता और उससे बचने का उपाय भक्ति करके जीवन में कर लेता है । |
| 632. |
उत्तम भक्त वह होता है जो जीवन के मध्यकाल से ही परमार्थ की तरफ मुड़ जाता है । |
| 633. |
शास्त्र कहते हैं कि परमार्थ के लिए जिस भी दिन जग गए उस दिन ही जीवन का सच्चा प्रभात होता है । |
| 634. |
हम मृतक को श्मशान पहुँचा कर आते हैं और खुद को शाश्वत मानते हैं, यह कितनी बड़ी विडंबना है । |
| 635. |
प्रभु की भक्ति ही सभी दुःखों से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है । |
| 636. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारे शरीर का अंत एक मुट्ठी भर राख में ही होना है । |
| 637. |
राजा, रंक, धनी और गरीब अंत में सबके शरीर की एक ही गति होती है । |
| 638. |
अगर कोई प्रभु का आलंबन ले लेता है, हाथों से प्रभु की सेवा करता है, मुँह से प्रभु का नाम जप करता है तो उसे कलियुग का डर एकदम भी नहीं सताता । |
| 639. |
भक्त परिवार में तो रहता है पर रात-दिन परिवार का चिंतन नहीं करता, उसके चिंतन के विषय प्रभु होते हैं । |
| 640. |
जैसे हर व्यक्ति के पीछे उसकी छाया आती है, व्यक्ति कहीं जाता है तो छाया का विचार नहीं करता कि छाया मेरे साथ आई क्या ? ऐसे ही भक्त संसार में रहते हुए संसार के प्रपंच का विचार नहीं करता । |
| 641. |
संत कहते हैं कि मन में संसार का प्रपंच रखना ठीक नहीं, जैसे नाव के भीतर पानी रखना ठीक नहीं है । नाव के भीतर पानी रहने से नाव डूब जाएगी वैसे ही मन में संसार का प्रपंच रहेगा तो मन उसमें डूब जाएगा । |
| 642. |
हमारे मन को संसार से रिक्त करना बहुत जरूरी है तभी वह प्रभु में लग पाएगा । |
| 643. |
रोज एक घंटे का नियम लेना चाहिए कि मानसिक संन्यास ले लिया जाए । उस एक घंटे में परिवार का, व्यापार का चिंतन नहीं होना चाहिए, केवल प्रभु का ही चिंतन हो । मैं केवल प्रभु का हूँ और प्रभु ही केवल मेरे हैं, यह आभास होना चाहिए । |
| 644. |
दिनभर संसार का नाटक, परिवार का नाटक करें पर मन से केवल प्रभु के बन जाएं तो हम परमार्थ में सफल हो जाते हैं । |
| 645. |
प्रभु से कहना चाहिए कि जो भूमिका आपने मुझे संसार में देकर भेजा है वह संसार के मंच पर नाटक के रूप में मैं कर रहा हूँ मगर मन से मैं सिर्फ आपका ही हूँ, सिर्फ और सिर्फ आपका ही हूँ । |
| 646. |
जितना संसार से अनासक्ति होगी उतनी लाचारी, शोक और दुःख से हम ग्रसित नहीं होंगे । |
| 647. |
सभी भक्तों ने यही किया - संसार पटल पर सुंदर नाटक किया और मन से प्रभु के बन गए । |
| 648. |
भक्ति करने में सभी भक्त बड़े दक्ष होते हैं । |
| 649. |
हमें यह भान होना चाहिए कि प्रभु ही हमारे मूल अस्तित्व हैं, प्रभु ही हमारे परम धन हैं । |
| 650. |
प्रभु हमारे इतने समीप हैं कि प्रभु से ज्यादा समीप कोई भी नहीं है । |
| 651. |
प्रभु तत्व ही हमारा मूल है, इसलिए हम प्रभु तत्व से भिन्न नहीं जा सकते । |
| 652. |
संत मानते हैं कि संसार में जितने भी जीव हैं वह सब प्रभु के चलते फिरते मंदिर हैं । |
| 653. |
प्रभु कहते हैं कि मैं श्रीबैकुंठ, श्रीगोलोक और श्रीसाकेत में मिलूँ या नहीं मिलूँ मगर एक भक्त हृदय के भीतर मेरा दर्शन जरूर होता है । |
| 654. |
एकांत सबसे बड़ा विद्यापीठ है और मौन सबसे बड़ा पाठ है । |
| 655. |
मन के मौन की बात शास्त्रों में कही गई है, मन मौन हो जाए तो हमारे भीतर संकल्प-विकल्प उठने बंद हो जाएंगे । |
| 656. |
शास्त्रों में अज्ञानी उसे माना गया है जो भौतिक विद्या तो खूब अर्जित कर लेता है पर आध्यात्मिक विद्या की तरफ उसका रुझान ही नहीं होता । |
| 657. |
अंततोगत्वा जीव को जिनको जानना है वे मात्र प्रभु ही हैं । |
| 658. |
जो नहीं है ऐसा जानते हुए भी जो संसार हमें दिख रहा है वह मायाकृत है । |
| 659. |
परब्रह्म प्रभु का विचार करते-करते श्री वेदजी भी नेति-नेति कहकर शांत हो जाते हैं क्योंकि विचार का जहाँ प्रवेश नहीं है, जहाँ पहुँच नहीं है वे प्रभु हैं । |
| 660. |
प्रभु की शरणागति - यह भारतीय अध्यात्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सबसे उच्च सिद्धांत है । |
| 661. |
प्रभु एक ही हैं पर एक से अनेक बनकर सभी में उनका वास है । |
| 662. |
जैसे सागर की लहरें अनेक हैं पर उसमें जल एक ही है वैसे ही संसार में प्रभु की लहरें अनेक हैं पर प्रभु एक ही हैं । |
| 663. |
जब चुंबक के संपर्क में लोहा आता है तो लोहे में हलचल निर्माण हो जाती है, वैसे ही प्रकृति जब चेतन तत्व (प्रभु) के संपर्क में आती है तो प्रकृति में हलचल शुरू हो जाती है । |
| 664. |
कथा सबको प्रिय होती है, बड़ों से लेकर बच्चों तक को सबको प्रिय होती है इसलिए हमारे शास्त्रों में कथा के रूप से ज्ञान परोसा गया है । |
| 665. |
मृत्यु के समय हमारा मन प्रभु में ही रमना चाहिए, यही मुक्ति का द्वार है और मुक्ति का साधन भी है । |
| 666. |
शास्त्र कहते हैं कि जीव राजहंस है और आत्मानंद की उड़ान भर सकता है पर वह संसाररूपी कीचड़ में फंस गया है । |
| 667. |
हमारे भीतर दो शक्तियां होती हैं - इच्छा शक्ति और क्रिया शक्ति । इच्छा शक्ति के रहते क्रिया शक्ति समाप्त हो गई तो वह मृत्यु है और क्रिया शक्ति के रहते इच्छा शक्ति समाप्त हो गई तो वह जीवनमुक्ति है । |
| 668. |
जो जीव भक्ति करता है उसकी क्रिया शक्ति के रहते हुए इच्छा शक्ति का नाश हो जाता है जिसे जीवनमुक्ति कहते हैं । |
| 669. |
प्रभु को जानने के बाद जानने वाली सभी बातें समाप्त हो जाती है । |
| 670. |
दिखने वाला जड़ संसार भ्रम है और माया है । चेतन प्रभु तत्व ही सत्य हैं । |
| 671. |
एकमात्र प्रभु ही सत्य हैं, बाद बाकी सब कुछ प्रभु का विस्तार मात्र है । |
| 672. |
प्रभु से निकला चेतन तत्व अक्षुण्ण है और उसका कभी भी नाश नहीं होता । |
| 673. |
सब कुछ प्रभु से ही निकलता है और अंत में प्रभु में ही समा जाता है । |
| 674. |
जैसे चुंबक कुछ नहीं करता पर लोहे में हलचल चुंबक के कारण होती है वैसे ही प्रभु कुछ नहीं करते पर प्रभु के कारण जड़ संसार में हलचल होती है । |
| 675. |
सबसे पहले हमारी वाणी संयमित होनी चाहिए और आहार भी हमारा संयमित होना चाहिए । |
| 676. |
श्री रामायणजी को पंचम श्रीवेद तुल्य माना गया है । चार श्री वेदजी के बाद पंचम श्रीवेद श्री रामायणजी को माना जाता है । |
| 677. |
जो भी भक्ति करता है और जिस भी भाव से करता है उसका कल्याण निश्चित है । |
| 678. |
उत्तम भक्त अपने जीवन को मलिन नहीं होने देते क्योंकि वे प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य लिए हुए होते हैं । |
| 679. |
सच्चा भक्त चेतन प्रभु से अपना संबंध जोड़ लेता है और जड़ संसार से अपना संबंध विच्छेद कर लेता है । |
| 680. |
प्रभु की कथा में सभी रस ऐसे होते हैं जो हमें प्रभु के श्रीकमलचरणों में ले जाते हैं । |
| 681. |
भक्ति से हमारी प्रज्ञा खिलना आरंभ हो जाती है । |
| 682. |
भक्ति आत्मानंद की प्राप्ति के लिए होती है, न कि भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए । |
| 683. |
भक्ति को अनन्यता प्रदान करने के लिए प्रभु की कृपा अनिवार्य है । |
| 684. |
प्रभु कहते हैं कि भक्ति का साधन करने पर मोक्ष हमारे पास नित्य स्थित होता है । संसार के भोगों में लिप्त संसारी अज्ञान के कारण उससे वंचित रह जाते हैं । |
| 685. |
आध्यात्मिक ज्ञान को जानने के बाद साधक को कभी क्लेश स्पर्श नहीं कर सकता । |
| 686. |
प्रभु कहते हैं कि बंधन नाम की वस्तु जीव के पास नहीं थी पर जीव ने प्रभु को भुलाकर संसार के बंधन में अपने को बांध लिया है । |
| 687. |
भ्रांति के कारण जीवात्मा माया में ग्रस्त रहता है । |
| 688. |
भ्रांति से मुक्त होते ही जीवात्मा पूर्ण मुक्त हो जाता है । इसी बंधन को अज्ञान कहा गया है और भ्रांति को माया कहा गया है । |
| 689. |
माया की भ्रांति के आते ही हमें संसार के दृश्य दिखने आरंभ हो जाते हैं । |
| 690. |
जब जीवन में प्रभु आ जाते हैं तो जीवन से भ्रांति की ग्रंथियाँ खुल जाती है । |
| 691. |
संसार का निर्माण भी प्रभु से होता है, संसार के रूप में भी प्रभु ही हैं और संसार का लय भी प्रभु में होता है । |
| 692. |
जैसे सोने का अलंकार बना तो सोना उसमें स्थित है वैसे ही प्रभु से संसार बना और संसार में प्रभु स्थित हैं । |
| 693. |
सतोगुण होने पर हमें ज्ञान और सुख की अनुभूति होती है । |
| 694. |
रजोगुण हमें चंचलता और वासना में फंसा देती है । |
| 695. |
तमोगुण हमें आलस्य और प्रमाद की तरफ ले जाता है । |
| 696. |
जब हम सत्संग करते हैं तो उस समय सतोगुण हमारे में प्रधान रूप से होता है । |
| 697. |
हमारे में सतोगुण का स्तर ऊँचा होने पर हम बहुत जल्दी श्रीग्रंथों को पढ़कर तथ्य को समझ लेते हैं । |
| 698. |
जिसके जीवन में प्रभु प्राप्ति ही लक्ष्य है उसमें सतोगुण की वृद्धि होना स्वाभाविक है । |
| 699. |
हमें जीवन में यह जाँचते रहना चाहिए कि हमारे जीवन में सतोगुण की वृद्धि हो रही है कि नहीं । |
| 700. |
सबके भीतर एक गुण की प्रधानता होती है और दो गुण दबकर निवास करते हैं । |
| 701. |
जितनी जीवन में सात्विकता बढ़ती है उतनी ही हमारी प्रज्ञा भी बढ़ती जाती है । |
| 702. |
सतोगुण बढ़ता है तो संसार के विषयों के लिए अरुचि पैदा हो जाती है और हमारा मन संसार के विषयों में नहीं रमता । |
| 703. |
सतोगुणी और सात्विक जीवन शैली हमारे सुंदर भविष्य का निर्माण करती है । |
| 704. |
जब अंतकाल में हमारी वृत्ति सतोगुणी रहती है तो नया जन्म भी बहुत ही सात्विक मिलता है । |
| 705. |
हमें अपनी आध्यात्मिक साधन की हानि करते हुए ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए जिससे हमारा अगला जन्म ही बिगड़ जाए । |
| 706. |
जीवन में प्रभु का विचार करना श्रेष्ठ है और निराधार संसार की चिंता करना बेकार है । |
| 707. |
संसार की किसी भी बात को अपने मन से चिपकने नहीं देना चाहिए । |
| 708. |
सच्चे भक्त के ऊपर सम्मान और अपमान का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । |
| 709. |
भारतवर्ष की आध्यात्मिक पूंजी पूरे विश्व पटल पर सबसे पावन और महान है । |
| 710. |
भक्ति में इतनी शक्ति होती है कि एक भक्त परमात्मा तत्व के अलावा किसी अन्य तत्वों को संसार में नहीं देखता । एक भक्त संसार में प्रभु तत्व को ही सर्वत्र देखता है । |
| 711. |
प्रभु के विश्व रूप और हमारे श्रीठाकुरबाड़ी में विराजे प्रभु में कोई अंतर नहीं है । |
| 712. |
जीव, जगत और जगदीश के चिंतन में हमें श्रीजगदीश का ही सदैव चिंतन करना चाहिए । |
| 713. |
हमारी मानस पूजा जितनी प्रबल होती है उतनी ही अध्यात्म की ऊँचाई तक वह हमें पहुँचाती है । |
| 714. |
मानस पूजा में कल्पना ऊँचे-से-ऊँची और भावना भी ऊँचे-से-ऊँची करनी चाहिए, उनमें कोई कंजूसी नहीं करनी चाहिए । मन से मानस पूजा में कल्पना और भावना जितनी उत्तम होगी उतनी ही वह फलीभूत होगी । |
| 715. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी हाथ से की हुई पूजा को साधारण वृक्ष बताते हैं और मानस पूजा को कल्पवृक्ष बताते हैं । |
| 716. |
मानस पूजा का सिद्धांत है कि जैसे-जैसे हमारा मन उसमें रमता जाएगा हमारी मानस पूजा सिद्ध होती चली जाएगी । |
| 717. |
प्रभु को सदैव अपने हृदय में ही आसन देना चाहिए । |
| 718. |
भक्ति के आनंद की सुगंधि को इत्र रूप में मानस पूजा में प्रभु को अर्पित करना चाहिए । |
| 719. |
अपने अहंकार को धूप के रूप में जलाकर प्रभु के सामने मानस पूजा में अर्पित करना चाहिए । |
| 720. |
मानस पूजा में संसार के भोग और मोक्ष को प्रभु के ऊपर वारकर फेंक देना चाहिए । भाव यह होना चाहिए कि प्रभु, मुझे न संसार के भोग चाहिए और न ही मुझे मोक्ष चाहिए, मुझे केवल आप ही चाहिए । |
| 721. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में प्रभु की वाणी के श्रवण का आनंद प्रभु कृपा से ही मिलता है । |
| 722. |
प्रभु के भक्त द्वारा कही हुई बात में प्रभु की कृपा ही बोलती है । प्रभु खुद अपने भक्त की वाणी से अपने स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं । |
| 723. |
एक भक्त अपने सारे आध्यात्मिक ज्ञान को प्रभु की श्रीकमलचरणों में रखकर उस आध्यात्मिक ज्ञान से प्रभु की अनुभूति का रसास्वादन करता है । |
| 724. |
भक्त जो भी प्रभु के बारे में बोलते हैं, वह सिद्ध हो जाता है । |
| 725. |
हमें श्रीग्रंथ को ज्ञानी बनकर नहीं बल्कि साधारण व्यक्ति बनकर ही पढ़ना चाहिए । |
| 726. |
आध्यात्मिक ज्ञान को एकांत में पढ़ना चाहिए और जो पढ़ा है उसे दूसरों से बांटना चाहिए । |
| 727. |
बिना मनन किए सौ जन्म भी हम श्रवण कर लेंगे तो वह मनोवांछित लाभ नहीं देगा । |
| 728. |
बिना श्रीग्रंथ के श्रवण किए कोई भी आत्मानंद का अधिकारी नहीं बन सकता । |
| 729. |
जब तक हम अपने आध्यात्मिक ज्ञान का दूसरों को वितरण नहीं करते हैं तब तक उस ज्ञान की पूर्णता नहीं होती है । |
| 730. |
श्रीग्रंथ की इतनी महिमा होती है कि हमारे श्रीग्रंथ का पाठ करने वाले पर यमदूत दृष्टि भी नहीं डालते । |
| 731. |
हमारी वाणी की पवित्रता बढ़ेगी इसलिए हमें प्रभु का गुणगान अपनी वाणी से करना चाहिए । |
| 732. |
भक्तों को प्रभु के बारे में बोलने, लिखने और दूसरों को बतलाने का बीड़ा उठाना चाहिए । |
| 733. |
जो प्रभु के बारे में श्रवण करता है और दूसरों को प्रभु के बारे में बताता है वह प्रभु को बहुत प्रिय होता है । |
| 734. |
प्रभु की कृपा और दया होने पर असंभव भी पूर्णतया संभव हो जाता है । |
| 735. |
प्रभु की अनुकूलता जीवन में होने पर जीवन मोक्षमय बन जाता है यानी मोक्ष आकर हमारे जीवन में स्थित हो जाता है । |
| 736. |
भक्ति के कारण प्रभु ही भक्त की प्रेमवाणी के विषय बन जाते हैं । |
| 737. |
प्रभु का प्रेम केवल और केवल अनुभव का विषय होता है । |
| 738. |
प्रभु का ज्ञान उसी को प्राप्त होता है जिसने अपने मन को भक्ति से शुद्ध कर लिया है । |
| 739. |
बिना वैराग्य के प्रभु का ज्ञान प्राप्त नहीं होता और अगर हो भी गया तो वह टिकता नहीं है । |
| 740. |
श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि मेरे भक्त को ज्ञान और वैराग्य के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ता । अगर वह भक्ति पथ पर चलता रहता है तो यह दोनों स्वयं आकर उसके जीवन में उपस्थित हो जाते हैं । |
| 741. |
भक्ति से विवेक जागृत होता है जिस कारण एक भक्त का मन संसार के विषयों की तरफ नहीं भागता । |
| 742. |
भक्त मानता है कि संसार में सब कुछ मूल्यहीन है, एकमात्र प्रभु ही सबसे मूल्यवान हैं । |
| 743. |
परमात्मा ही सत्य हैं, संसार मिथ्या है । फिर भी हम अपनी कल्पना के कारण संसार का खेल खेलते हुए सुखी होते रहते हैं । |
| 744. |
संसार का हर सुख दुःख के रूप में ही आता है यानी हर सांसारिक सुख के साथ दुःख छिपा हुआ आता है । |
| 745. |
माया हमारे जीवन में तब तक ही रहती है और हमें प्रभावित करती है जब तक हम प्रभु की भक्ति नहीं करते । |
| 746. |
संत कहते हैं कि सांसारिक सुख आया तो मानो दुःख आने ही वाला है क्योंकि वह एक ही सिक्के का दूसरा पहलू है । |
| 747. |
संत कहते हैं कि जिसने सांसारिक सुख लेने का प्रयास किया उसने जीवन में मानो दुःख को स्वतः ही बिना मोल लिए गले लगा लिया । |
| 748. |
संसार में लोग दुःख के अभाव को ही सुख का नाम देते हैं । यह सुख की कितनी नकारात्मक व्याख्या है । |
| 749. |
शास्त्रों में प्रभु के सानिध्य में प्राप्त परमानंद को ही परम सुख माना गया है । |
| 750. |
प्रभु के सानिध्य में दुःख का अभाव-ही-अभाव है और सुख का प्रभाव-ही-प्रभाव है । |
| 751. |
अज्ञान की निद्रा में हमें मायारूपी संसार दिखता है जो हमारी कल्पना से ही निर्माण हुआ है । |
| 752. |
सत्य उस तत्व का नाम है जिसमें कभी परिवर्तन नहीं होता । संसार का कण-कण और हमारे शरीर का कण-कण प्रतिक्षण बदलता रहता है । इसलिए सत्य तो केवल प्रभु ही हैं । |
| 753. |
हमारी दुविधा यह है कि संसार हमें दिखता है इसलिए असत्य नहीं लगता पर संसार प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है इसलिए वह सत्य भी नहीं है । |
| 754. |
जीवन में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश अति आवश्यक है । |
| 755. |
भक्ति के कारण हमारे भीतर जो वासना होती है वह सात्विक और शुभ होती है । |
| 756. |
जैसे बादल चलते-चलते अपना रूप बदल लेते हैं वैसे ही संसार के रिश्ते अपना रूप हमारे सामने बदलते रहते हैं । |
| 757. |
ब्रह्मांड के अंदर ब्रह्मांड समाए हुए हैं । इसका कहाँ आदि है और कहाँ अंत है किसी को पता नहीं । यह प्रभु के विलक्षण ऐश्वर्य का दर्शन है । |
| 758. |
शास्त्र कहते हैं जैसे एक बाँझ के पुत्र की जन्मपत्री हम बनाते हैं जो है ही नहीं वैसे ही संसार को हम देखते हैं जो कल्पना है और सत्य नहीं है । |
| 759. |
जैसे सपने में देखे हुए सांप को मारने के लिए कोई डंडा नहीं चाहिए सिर्फ सपने से जागृति होने से हमारा काम हो जाता है वैसे ही संसार के दृश्य को खत्म करने के लिए मात्र आध्यात्मिक रूप से हमें जगना पड़ता है । |
| 760. |
प्रभु के लिए भक्ति भाव जागृत नहीं हुआ तो सभी साधन चाहे वह तीर्थ, कथा या पूजा हो वे सभी हमें थकान देने वाले साधन बनकर रह जाते हैं । |
| 761. |
बहुत सारे साधन एक साथ करने पर हमारे अंदर साधन के जंजाल निर्माण हो जाते हैं । हम साधन करते-करते थक जाते हैं और कहीं भी नहीं पहुँच पाते । |
| 762. |
अनेक बार अनेक तरह के साधन एक साथ करने में वह दलदल की तरह बन जाता है जिसमें हम फंस जाते हैं । |
| 763. |
एक-दो साधनों को ही जीवन में हम प्रबलता से पकड़ लेंगे तो हमारा फंसना बंद हो जाएगा और वे एक-दो साधन ही हमें तार देंगे । |
| 764. |
हमारे मन में जब तक संसार की प्रतीति है तब तक हमारे जीवन से दुःख हटना संभव ही नहीं है । |
| 765. |
बिना वैराग्य के ज्ञान जीवन में ठहर ही नहीं सकता । |
| 766. |
संत कहते हैं कि बिना वैराग्य के ज्ञान कोई काम का नहीं है जैसे बिना धार की तलवार कोई काम की नहीं होती । |
| 767. |
संसार के विषयों को देखने मात्र में हमारी अरुचि हो जाए तो यह मानना चाहिए कि वैराग्य हमारे भीतर टिक गया है । |
| 768. |
शास्त्रों का गूढ़ रहस्य समझना हो तो जीवन में संतों की वाणी का आश्रय लेना जरूरी है । |
| 769. |
हम संसार के संबंधों में अपना मन फंसाते हैं पर भक्त अपना एक ही संबंध मानता है वह केवल प्रभु के साथ ही मानता है और प्रभु में ही अपना मन फंसाता है । यह कितना बड़ा फर्क है । |
| 770. |
जैसे धनुष से छोड़ा एक बाण निकलता है तो किसी की परवाह नहीं करता और रास्ते में जो आता है उसे भेदता हुआ चलता है, वैसे ही साधक अपने प्रभु प्राप्ति के लक्ष्य के लिए संसार की परवाह किए बिना चलता है । |
| 771. |
हमें यह भी चाहिए, वह भी चाहिए और प्रभु भी चाहिए तो इस तरह प्रभु कभी मिलने वाले नहीं हैं । “सिर्फ प्रभु ही चाहिए” यह भाव जीवन में होगा तभी प्रभु मिलते हैं । इतना महान त्याग जीवन में करना पड़ता है । |
| 772. |
सिद्धांत यह है कि जितनी महान चीज को हम चाहेंगे उतना महान त्याग उसके लिए जीवन में करना ही पड़ेगा । |
| 773. |
जो स्वर्ग, मोक्ष, त्रिभुवन की लक्ष्मी, यहाँ तक कि देवतागण के पद को भी त्यागने का सामर्थ्य रखते हैं वे ही प्रभु को प्राप्त कर सकते हैं । |
| 774. |
जीवन में मोह संसार के किसी भी जीव या वस्तु से नहीं होना चाहिए । |
| 775. |
जीवन में सकामता का त्याग करना चाहिए नहीं तो हम उसमें ही फंस जाएंगे । सकामता का विसर्जन करने पर ही हमारी मुक्ति संभव है । |
| 776. |
सकामता रखने पर एक कामना पूरी हुई तो दूसरी कामना जन्म ले लेती है और यह कामनाओं की उठा-पटक जीवन में चलती ही रहती है । |
| 777. |
संसार के लोग सुख चाहते हैं जो कि सांसारिक होता है । संत भी सुख चाहते हैं जो कि पारमार्थिक होता है, प्रभु प्राप्ति का होता है जो कि शाश्वत सुख कहलाता है । |
| 778. |
प्रभु की भक्ति में बड़ा ही प्रबल मीठा रस होता है जो संसार में अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलेगा । |
| 779. |
संत अंतर्यात्रा करके भक्ति का मीठा रस पाते हैं और अज्ञानी बाहर संसार में निरर्थक ही भागते-दौड़ते रहते हैं । |
| 780. |
प्रभु हमारे भीतर ही वास कर रहे हैं । प्रेम रस का उद्गम स्थान प्रभु के श्रीकमलचरण ही हैं । प्रभु के अलावा यह प्रेम रस देने वाला कोई भी नहीं है । |
| 781. |
प्रभु प्रेम के कारण भक्त आत्मानंद में रमते हैं और अपना लोक और परलोक दोनों को सफल करते हैं । |
| 782. |
जब हम भक्ति करके प्रभु के समीप पहुँच जाते हैं तो अखंड परमानंद-ही-परमानंद हमें जीवन में मिलता रहता है । |
| 783. |
जैसे लहरें समुद्रदेवजी से भिन्न नहीं हैं, वैसे ही जीवात्मा परमात्मा से भिन्न नहीं है । |
| 784. |
जीवात्मा प्रभु से अपने आपको भिन्न मानता है तभी वह इस संसार के झंझट और संकट में फंस जाता है । |
| 785. |
सारी सांसारिक शक्तियों का उद्गम प्रभु से ही होता है । |
| 786. |
जैसे वर्षा तो एक जगह एक जैसे ही होती है पर जो बोया है वही उगता है । वैसे ही हमारी वासना अलग-अलग होने के कारण प्रभु की शक्ति, जो एक ही है, वह हमारे लिए अलग-अलग रूप में काम करती है । |
| 787. |
प्रभु साफ-साफ शब्दों में कहते हैं कि मैं भक्तों के हृदय में निश्चित रूप से वास करता हूँ । |
| 788. |
हम अपने भीतर अंतर्यात्रा करेंगे तो ही प्रभु को पा सकेंगे । |
| 789. |
शास्त्रों के अनुसार हम जीवन में उतने ही सफल हैं जितने भक्ति के संस्कार हमारे भीतर स्थित हैं । |
| 790. |
प्रभु की श्रीलीलाओं का श्रवण करना चाहिए, प्रभु का भजन, सेवा, नाम जप सब कुछ करना चाहिए, ऐसा करने पर ही प्रभु की कृपा हमें जीवन में मिलती है । |
| 791. |
प्रभु सबके आदिगुरु हैं यानी सबके अंतिम गुरु प्रभु ही हैं । |
| 792. |
हमें संसार को महत्व नहीं देना चाहिए और संसार में रस नहीं लेना चाहिए । |
| 793. |
सकाम इच्छा में हमें नहीं फंसना चाहिए, हम जितने निष्काम बनेंगे उतने ही प्रभु को प्रिय होंगे । |
| 794. |
अगर प्रभु तक पहुँचना है तो भक्ति के अलावा कोई भी विकल्प नहीं है । |
| 795. |
प्रभु किसी के बंधन में नहीं हैं पर भक्ति के कारण भक्त के प्रेम बंधन को प्रभु सहर्ष स्वीकार करते हैं । |
| 796. |
आध्यात्मिक ज्ञान में अंतिम जानने योग्य जो है वह प्रभु तत्व ही है । |
| 797. |
संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि जब सुनने वाले प्रभु के प्रिय सखा श्री अर्जुनजी या श्री उद्धवजी होते हैं तो प्रभु को व्यसन लग जाता है अध्यात्म ज्ञान के रहस्य-पर-रहस्य खोलने का । |
| 798. |
प्रभु को अध्यात्म ज्ञान के रहस्य अपने भक्तों के सामने खोलने में बहुत अच्छा लगता है और जब भी मौका मिलता है प्रभु ऐसा करते हैं । |
| 799. |
प्रभु कहते हैं कि आँखें दो होती है पर देखती एक ही चीज है, कान दो होते हैं पर सुनते एक ही बात है, नाक दो होते हैं पर गंध एक ही लेते हैं वैसे ही प्रभु कहते हैं कि मैं और मेरे भक्त एक ही है उसमें कोई भेद नहीं है । |
| 800. |
भक्त जब प्रभु के पास पहुँचता है तो प्रभु उसे प्रगाढ़ आलिंगन देते हैं और अपने हृदय में स्थान देते हैं । |