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BHAKTI VICHAR CHAPTER NO. 42

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. श्रीउमाशंकर, श्रीलक्ष्मीनारायण, श्रीराधेकृष्ण, श्रीसीताराम दो तत्व नहीं बल्कि एक ही तत्व हैं ।
002. श्रीराधेकृष्ण एक तत्व होने के कारण प्रभु श्री कृष्णजी श्रीराधे-श्रीराधे जपते हैं और श्रीजी भगवती राधा माता श्रीश्याम-श्रीश्याम जपती हैं ।
003. श्री राधेकृष्णजी जब श्रीलीला करते हैं तो दो रूप स्वीकार करते हैं पर वे एक ही हैं ।
004. एक भक्त अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी भक्ति के ऊँचे स्तर पर नहीं पहुँच सकता, प्रभु कृपा मिलने पर ही वह वहाँ पहुँच सकता है ।
005. प्रभु कृपा करते हुए भक्त से मिलने हेतु नीचे आते हैं और भक्त प्रभु की भक्ति करके ऊपर उठता है तभी भक्त और भगवान का मिलन होता है ।
006. भक्ति हमें प्रभु की कृपा दिलाने का सामर्थ्य रखती है और प्रभु कृपा करके भक्त की भक्ति से रीझकर उससे मिलने के लिए आ जाते हैं ।
007. शुद्धता जीवन में कहीं से लानी नहीं पड़ती, हमारे भीतर अशुद्ध भाव और अशुद्ध तत्व का विसर्जन करते ही शुद्ध तत्व अपने आप भीतर ही उभर जाते हैं ।
008. जैसे स्वर्ण को भट्टी में डालने से अशुद्धि जल जाती है और शुद्ध स्वर्ण निकल आता है वैसे ही भक्ति करने से हमारा शुद्ध तत्व निखरकर सामने आ जाता है ।
009. प्रभु के बारे में वाणी से बताया नहीं जा सकता, आँखों से देखा नहीं जा सकता, सिर्फ भक्ति के कारण ही प्रभु की अनुभूति संभव होती है ।
010. जैसे मिट्टी का हाथी, मिट्टी का घोड़ा, मिट्टी का मोर एक बच्चा बनाता है और खेलकर फिर से उसको मिट्टी में लय कर देता है, वैसे ही प्रभु संसार की उत्पत्ति करते हैं और उसके बाद अपने आप में संसार का लय कर देते हैं ।
011. जब कोई आश्रय नहीं बचता, सब आश्रय नष्ट हो जाते हैं तो प्रभु हमारे योगक्षेम की जिम्मेदारी ले लेते हैं ।
012. आनंद भी जिस आनंद का बखान भी नहीं कर सकता, ऐसा परमानंद प्रभु के सानिध्य में जाने से मिलता है ।
013. सुख स्वरूप जीवात्मा संसार में फंसकर दुःख भोगता रहता है ।
014. जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी न दिन करते हैं, न रात करते हैं बस हमें प्रतीति होती है कि वे ऐसा कर रहे हैं, वैसे ही प्रभु कुछ नहीं करते, हमें बस प्रतीति होती है ।
015. सारा जगत ही माया का भ्रम है और हमारी कल्पना का विस्तार है ।
016. उत्तम और सिद्ध भक्त के लिए संसार का हर तत्व एकमात्र परमात्मा स्वरूप ही होता है ।
017. प्रभु कहते हैं कि जिसकी मेरे से पहचान हो गई, जिसने मेरे को जानने का प्रयास किया, जिसने अपने को मेरे से एकरूप करने का प्रयास किया, वही मेरे तक आकर पहुँच पाता है ।
018. शास्त्रों के आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त होकर प्रभु को जानने के पश्चात ही भक्ति का दर्शन और भक्ति में प्रवेश संभव है ।
019. सागर की लहरों का मूल आश्रय सागर होता है वैसे ही संसार के सभी जीवों के मूल आश्रय प्रभु ही होते हैं ।
020. संत कहते हैं कि प्रभु ने क्षीरसागर का मंथन करवा कर अमृत प्रकट किया और शास्त्रों के सागर का मंथन करके श्रीमद् भगवद् गीताजी रूपी अमृत प्रकट किया है ।
021. श्रीमद् भगवद् गीताजी बोलने या सुनने वाला शास्त्र ही नहीं है बल्कि यह संसार के मायाजाल से हमें बाहर निकालने वाला दिव्य शास्त्र है ।
022. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु ने अपने प्रिय सखा श्री अर्जुनजी को सबसे गोपनीय रहस्य की बातें भी बता दी हैं ।
023. प्रभु कहते हैं कि ज्ञान से मुझे जान नहीं सकते पर भक्ति से मुझे प्राप्त किया जा सकता है ।
024. एक नवजात बच्चे की विशेषता होती है कि वह कुछ नहीं जानता, ऐसे ही हमें प्रभु के समक्ष ऐसा बच्चा बनकर ही जाना चाहिए तब हमें प्रभु की कृपा प्रसादी मिलती है ।
025. भक्त के लिए भक्ति की पराकाष्ठा तब होती है जब ऐसी स्थिति आ जाए कि जो वह बोले वह श्रीहरि कथा हो जाए, जो जल वह हाथ में ले वह श्रीगंगाजल हो जाए ।
026. प्रभु की भक्ति जीवन को आनंदमय बनाने हेतु करनी चाहिए ।
027. प्रभु की भक्ति हर स्थिति में आनंद प्राप्त करवाने वाला एकमात्र साधन है ।
028. बिना श्रीवेद पढ़े भी ऐसे भक्त हुए हैं जिनके मुँह से जो भी निकला वह श्रीवेद तुल्य बन गया, श्रीवेद के सिद्धांत उसमें प्रतिपादित हो गए ।
029. संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीताजी का ज्ञान श्री अर्जुनजी के साथ प्रभु श्री हनुमानजी ने भी श्रीध्वजा पर बैठकर श्रवण किया ।
030. शास्त्रों से सुना हुआ ज्ञान जीवन में सही समय में जरूर काम आता है ।
031. शास्त्रों का ज्ञान कभी व्यर्थ नहीं जा सकता है, वह हमारा कल्याण करके ही रहता है ।
032. संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि भगवती सरस्वती माता के आशीर्वाद से ही श्रीमद् भगवद् गीताजी का श्रीज्ञानेश्वरी रूपी भाष्य प्रकट हो पाया ।
033. किसी भी शास्त्र का भाष्य जब हम पढ़ते हैं तो बहुत सारे कठिन विषय या हमारे संशय दूर हो जाते हैं ।
034. ब्रह्मांड में सब कुछ प्रभु का विलास मात्र है क्योंकि सर्वत्र प्रभु ही प्रभु हैं ।
035. जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के उदय होने से अंधकार मिटता है वैसे ही आत्मज्ञान का सूर्योदय होने पर अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है ।
036. हमने अपने स्वयं को जान लिया और पहचान लिया, यही सबसे बड़ी आध्यात्मिक उपलब्धि है ।
037. हमने संसार को तो खूब देखा है पर अपने भीतर जाकर स्वयं को कभी नहीं देखा ।
038. मौत शरीर की होती है, आत्मा की नहीं होती, यह तथ्य शास्त्र पढ़ने से समझ में आ जाता है ।
039. प्रभु प्राप्ति के लिए अपने शरीर को एक साधन के रूप में उपयोग करना चाहिए ।
040. हमारे ऋषि और संत प्रकृति के बहुत करीब रहते थे । वे श्रेष्ठ श्रीग्रंथ प्रकृति की गोद में बैठकर ही लिखते थे ।
041. एकांत में बैठकर हम अपने मन के द्वारा प्रभु से बातें कर सकते हैं ।
042. प्रभु ऐश्वर्य प्रधान भी हैं और माधुर्य प्रधान भी हैं ।
043. जिनका चित्त प्रभु में लग जाता है वे ही जीवन का सच्चा आनंद ले पाते हैं ।
044. आत्मज्ञान का उदय होते ही हमें पूरा संसार एक परिवार की तरह लगता है क्योंकि हर तरफ हमें प्रभु के ही दर्शन होते हैं ।
045. भक्त भगवान का बन जाता है इसलिए उसके जीवन में भाषा, धर्म, जाति और संप्रदाय का भेद समाप्त हो जाता है ।
046. प्रभु साक्षात्कार होने के बाद हमारा जीवन ही बदल जाता है और जीवन में सतोगुण की बहुत ज्यादा वृद्धि हो जाती है ।
047. हमें ऐसा लगता है कि श्रीमद् भगवद् गीताजी में श्री अर्जुनजी से प्रभु बोल रहे हैं पर प्रभु असल में उन्हें निमित्त बनाकर भक्तों के लिए बोल रहे हैं ।
048. कितने जन्मों के पुण्यों के फलस्वरूप हमें श्रीमद् भगवद् गीताजी के श्रवण की इच्छा होती है ।
049. संत कहते हैं कि बिना पुण्य के उदय हुए हम भगवती गंगा माता के तट पर आ ही नहीं सकते ।
050. छोटे-छोटे पुण्य जीवन में अर्जित करते चलना चाहिए । यह छोटे-छोटे पुण्य जीवन में बहुत काम आते हैं ।
051. हमें रोज रात्रि में सोते वक्त अगले दिन के लिए क्या सत्कर्म करना है उसकी तैयारी करनी चाहिए ।
052. जीवन में सत्कर्म करते रहेंगे तो हमारा भाग्योदय होता चला जाएगा ।
053. जैसे हम धन लक्ष्मी आने पर गौरव मानते हैं वैसे ही श्रीग्रंथ के रूप में ज्ञान लक्ष्मी आने पर भी हमें गौरव मनाना चाहिए ।
054. हमारे श्रीग्रंथों को पढ़ने के बाद कुछ भी जानने या पढ़ने जैसा जीवन में नहीं बचता है ।
055. प्रभु सर्वव्यापक हैं और प्रभु के अलावा संसार में कुछ भी नहीं है, यह सिद्धांत सभी श्रीग्रंथों में मान्य है ।
056. प्रभु हमें अनेक रूपों में दिखते हैं पर वे सब उनके प्रतिबिंब होते हैं । मगर असल में मूल बिंब के रूप में प्रभु एक ही हैं ।
057. हमारे भीतर जागृत होने वाले सद्गुण हमारी सच्ची संपत्ति होती है । मगर हमारा दुर्भाग्य है कि हम वित्तीय संपत्ति को ही सच्ची संपत्ति मानते हैं ।
058. भक्ति हमें अभय करती है यानी निर्भयता हमारे जीवन में ले आती है । एक भी संसार की वस्तु से भय हमें नहीं व्याप्तता ।
059. प्रभु के संपर्क में आने के बाद भय नाम की वस्तु हमारे जीवन में नहीं रहती ।
060. हमारे शास्त्र बड़े आग्रही हैं कि किसी भी स्थिति में बुद्धि की सात्विकता कभी नहीं छूटनी चाहिए । बड़े-बड़े संतों ने प्रभु से यही मांग की है कि हमारी बुद्धि धर्म के प्रति सदा निष्ठावान रहे ।
061. मन में दृढ़ निश्चय करके भक्ति का साधन करने पर उसका विकास बहुत जल्दी होता है ।
062. प्रभु की भक्ति हेतु जीवन में प्रयास करना चाहिए । हमारे जीवन में भक्ति हो, ऐसे लक्ष्य का जीवन में निर्धारण करना चाहिए ।
063. अनेक लक्ष्य जीवन में लेकर चलेंगे तो जहाँ के तहाँ रह जाएंगे और कुछ भी नहीं कर पाएंगे । इसलिए प्रभु प्राप्ति का एक लक्ष्य लेकर जीवन में चलना चाहिए तो मंजिल हमें तत्काल मिल जाएगी ।
064. किसी भी साधन से हमें क्या मिला, इसका हमेशा विश्लेषण करना चाहिए ।
065. जो-जो प्रक्रिया हमारे भीतर सतोगुण को बढ़ाती है, वही धर्म कहलाती है । यह धर्म की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है ।
066. पहले भगवत् कृपा की इच्छा जीवन में होनी चाहिए, फिर उसके लिए पात्रता जागृत करनी चाहिए, तब प्रभु की कृपा जीवन में मिलती है ।
067. हमें यह रोज जांचना चाहिए कि पिछले वर्ष हम क्या थे और आज हम क्या हैं ? हमारे साधन के विकास को जानने के लिए यह बहुत जरूरी है ।
068. जीवन को सदैव सतोगुण से ही सजाना चाहिए, यही जीवन का सच्चा अलंकार होता है ।
069. शास्त्र कहते हैं कि किसी के जीवन में उदासी के बादल हटने के लिए हम कुछ कर सकते हैं तो जरूर करना चाहिए ।
070. शास्त्र यहाँ तक कहते हैं कि कहीं दुर्घटना की बात सुनी और तुरंत प्रभु के मंदिर में जाकर प्रामाणिकता से बैठकर प्रभु के श्रीकमलचरणों में उनके लिए प्रार्थना की तो उनका भला तो होगा ही परंतु हमारा तुरंत भला पहले ही हमारी सद्भावना के कारण हो जाएगा ।
071. लोगों का कल्याण करने के लिए अपना समय, धन और सामर्थ्‍य का उपयोग नहीं किया तो हमारा जीवन विफल है ।
072. जीवन के आकलन के दो महत्वपूर्ण बिंदु हमारे शास्त्र बताते हैं । पहला, प्रभु से कितना प्रेम किया और दूसरा, लोगों के भीतर प्रभु को मानकर उनकी कितनी सेवा की ।
073. अशुद्ध धन के लिए प्रभु कहते हैं कि अशुद्ध धन से हम भोजन नहीं करते बल्कि पाप खाते हैं ।
074. अपने इंद्रियों को अंतर्मुख करके उनका संयम करना सबसे जरूरी है ।
075. इंद्रियों से व्यवहार तो जरूर हो पर इंद्रियों की चंचलता नहीं रहे, यह सबसे जरूरी है ।
076. शास्त्र कहते हैं कि हर काम हमें यज्ञ की भावना से करना चाहिए जिससे हमारा भला हो और जगत का भी मंगल हो ।
077. हमारे हर कर्म सर्वहितकारी होने चाहिए ।
078. रात को एक विचार जरूर करना चाहिए कि आज मैंने जीवन में कौन-सा ऐसा सत्कर्म किया जिससे मैंने अपने लिए कुछ नहीं चाहा यानी निष्काम भाव से वह कर्म किया ।
079. हमारे शास्त्रों ने हमें कर्म करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी है ।
080. साधन करते समय शास्त्र आज्ञा को कभी भी खंडित नहीं होने देना चाहिए ।
081. हर जीव के भीतर प्रभु को देखकर प्रणाम करना, यह एकोपचार पूजा कहलाता है ।
082. किसी भी यज्ञशाला को देखकर प्रणाम करना चाहिए, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
083. निरंतर श्रीग्रंथ का स्वाध्याय करना चाहिए । श्रीग्रंथ के कुछ अंश रोजाना पढ़ने चाहिए ।
084. पूरे संसार के विचारक श्रीमद् भगवद् गीताजी को समझने के लिए आज भी लालायित रहते हैं ।
085. श्रीमद् भगवद् गीताजी का पाठ प्रभु के सामने बैठकर प्रभु को ही सुनाना चाहिए ।
086. एक श्रीग्रंथ का जीवन में आश्रय लेकर उसकी विभिन्न टीकाएँ पढ़नी चाहिए और उसके भाव में प्रवेश करना चाहिए ।
087. हमारे में संस्कृत में स्तोत्र और मंत्र पढ़ने की पात्रता नहीं है इसलिए लोक भाषा में भजन के रूप में भी वह भाव प्रकट किया गया है । इसलिए भजन को बड़ा श्रेष्ठ माना गया है ।
088. एक श्रीग्रंथ, एक मंत्र का नियमित पाठ करने से वह सिद्ध हो जाता है ।
089. घर में आध्यात्मिक शास्त्र पढ़ने का वातावरण होना चाहिए, श्रीग्रंथ होने चाहिए, इससे खुद को भी असीम शांति मिलती है ।
090. आध्यात्मिक पुस्तक सिर्फ पास रखने से ही अदभुत ऊर्जा, अदभुत शक्ति और अदभुत भक्ति का संचार हमारे भीतर होता है ।
091. भारतवर्ष की मिट्टी, वायुमंडल और जल सब अलौकिक है, श्रेष्ठ है । यहाँ कण-कण में देवतागण निवास करते हैं । प्रभु की भी प्रिय भूमि भारतवर्ष है जहाँ प्रभु ने अनेक अवतार लिए हैं ।
092. हमने भारतीय दृष्टिकोण से भारतवर्ष को देखना ही छोड़ दिया, यह हमारी कितनी बड़ी भूल है ।
093. जितना जीवन में तप बढ़ेगा उतना हमारे अंतःकरण में आनंद बढ़ता जाएगा ।
094. सिद्धांत यह है कि जिन्होंने अपने शरीर को तप से कसा है वे ही अखंड आनंद की प्राप्ति जीवन में कर पाते हैं ।
095. श्री भरतलालजी ने बड़ा श्रेष्ठ तप किया इसलिए उनका अति विशिष्ट चरित्र निखर कर सबके सामने आया । उनके तप का परिणाम हुआ कि प्रभु श्री रामजी उनके वश में हो गए और उनको जितना गौरव मिला उतना गौरव किसी को नहीं मिला । संसार के साधु और महात्मा प्रभु श्री रामजी का नाम जपते हैं और प्रभु श्री रामजी निरंतर श्री भरतलालजी का नाम जपते हैं ।
096. जैसे तपने से स्वर्ण की अशुद्धि नष्ट हो जाती है वैसे ही तप से हमारे भीतर की मलिनता नष्ट हो जाती है और हमारी प्रज्ञा खिल जाती है ।
097. केवल आहार का तप करके देखें, कितना परिवर्तन जीवन में होगा । आहार के तप का अर्थ है कि जो चीज हमें सबसे ज्यादा पसंद है उसे स्वाद लेने के लिए नहीं खाना ।
098. तप हमारे आहार-विहार और मन की धारणा का ही परिवर्तन कर देता है । तप करने वाले का मन सदैव महकता है और चेहरा सदैव प्रफुल्लित रहता है ।
099. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में सरलता होनी चाहिए । वाणी में वही हो जो मन में हो और आचरण में वही हो जो मन में हो ।
100. सभी में हमारे प्रभु हैं इसलिए सभी के साथ सहजता का और सरलता का व्यवहार जीवन में करना चाहिए ।
101. हमारे शास्त्र आग्रही रहे हैं कि शरीर से, वाणी से और मन से हिंसा का त्याग होना चाहिए ।
102. अपने मन से सबका हित करने की तीव्र इच्छा हमारे भीतर होनी चाहिए । ऐसा होने पर हम प्रभु के प्रिय हो जाते हैं ।
103. सबके कल्याण को अपने हृदय में धारण करके उस हेतु क्रिया करने वाला प्रभु को प्रिय होता है ।
104. शास्त्र कहते हैं कि असत्य तो बोलना ही नहीं चाहिए पर सत्य को भी मधुरता से बोलना चाहिए ।
105. सत्य का आचरण जीवन में करने के लिए पूरे जीवन के क्रम को ही ठीक रखना पड़ता है ।
106. प्रभु कहते हैं कि सत्य को कठोर नहीं, विनम्रता से और दूसरों के सहने लायक सत्य बोलना चाहिए ।
107. स्वयं के स्वार्थ के लिए कभी भी सत्य को छुपाना नहीं चाहिए ।
108. सत्य सदैव मधुर और कल्याणकारी होना चाहिए ।
109. शास्त्र बड़े आग्रही हैं कि हमें अक्रोधी होना चाहिए यानी क्रोध का निमित्त सामने उपस्थित हो गया फिर भी क्रोध नहीं आया तो ही हम अक्रोधी हैं ।
110. शास्त्र कहते हैं कि विकार का कारण हमारे सामने उपस्थित है फिर भी विकार हम को प्रभावित नहीं करें तो हमने उस विकार को जीत लिया, ऐसा मानना चाहिए ।
111. शास्त्र कहते हैं कि दूसरे के कष्ट को देखकर हम पिघल जाएं और उसके निवारण हेतु प्रयास करें, इतनी दया हमारे भीतर होनी चाहिए ।
112. हमारा सारे संसार के साथ ही सुखद व्यवहार होना चाहिए ।
113. जब भी ऐसा लगे कि कुछ गलत हम करने जा रहे हैं तो लज्जा का भाव हमारे भीतर तुरंत निर्माण हो जाना चाहिए तो वही लज्जा हमें गलत करने से रोक देगी ।
114. प्रभु कहते हैं कि हमें दूसरों की गलती को क्षमा भी करना चाहिए और उसके बाद हमने क्षमा किया यह याद भी नहीं रखना चाहिए । क्षमा किया यह भार भी हमारे मन पर नहीं होना चाहिए ।
115. हमारी कोई भी इंद्रिय हमारे विवेक के निर्णय के विरुद्ध कोई काम नहीं करनी चाहिए ।
116. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में किसी से भी द्वेष नहीं रखना चाहिए ।
117. जिस प्रकार सद्गुणों के विकास हेतु हमें चिंतन करना चाहिए वैसे ही दुर्गुणों के त्याग हेतु भी चिंतन जरूरी है ।
118. शास्त्रों में कुछ ग्रहण करने के नियम बताए गए हैं और कुछ को त्यागने के नियम बताए गए हैं । दोनों नियमों का पालन करना चाहिए ।
119. धर्म का थोड़ा-सा पालन करना और बड़े झूठे तरीके से उसको बड़े रूप में दिखाना, इसको शास्त्रों में दंभ कहा गया है ।
120. जीवन में दुर्गुण होना एक ऐसी जंजीर है जिसमें फंसकर हमारा जीवन ही नष्ट हो जाता है ।
121. झूठ बोलना कभी हमारा स्वभाव नहीं बनना चाहिए । झूठ बोलने की हमारे मन में कभी कल्पना भी नहीं होनी चाहिए ।
122. जीवन में हरदम सन्मार्ग में ही चलना चाहिए, गलत मार्ग पर कभी नहीं चलना चाहिए ।
123. हम अपनी कामनाओं का जंजाल इतना फैला लेते हैं कि हमारा मन उसी में फंस जाता है और कभी भी शांत नहीं बैठता ।
124. सुख के लिए, मौज मस्ती के लिए, पैसा कमाने में ही हम जीवन व्यतीत कर देते हैं । उल्टे-पुल्टे काम करके पैसा कमाते हैं, पैसे में मोह बढ़ता है और अंत में हमारी दुर्गति होती है ।
125. शास्त्रों में नर्क के तीन द्वार बताए गए हैं – काम, क्रोध और लोभ । इन तीनों में से एक कारण भी अगर जीवन में होता है तो जीव का नर्क जाना पक्का है ।
126. संत उपमा देकर कहते हैं कि दस वर्ष में जितना चाहे गलत काम कर लो, मौज मस्ती कर लो, अनैतिक कमाई कर लो, आधुनिक बनकर देख लो पर शांति के लिए अंत में प्रभु के पास ही आना पड़ेगा, अन्य कोई विकल्प नहीं है ।
127. संत कहते हैं कि शांति के लिए भगवती गंगा माता के घाट पर आना ही पड़ेगा, प्रभु श्री रामजी का नाम लेना ही पड़ेगा और प्रभु की कथा सुननी ही पड़ेगी । जीवन में कुछ भी करके देख लें, अंत में यही करना पड़ेगा तभी शांति मिलेगी ।
128. बचपन से या जवानी से प्रभु की भक्ति करने की और सत्संग करने की इच्छा हो गई तो प्रभु की असीम कृपा हम पर हो गई है, यह पक्का मानना चाहिए ।
129. श्रद्धा रखकर जिसने भी हमारे श्रीग्रंथ को पढ़ना शुरू कर दिया, चाहे बुद्धि में नहीं उतरे, चाहे उच्चारण नहीं हो फिर भी प्रभु एक-न-एक दिन उस पर कृपा जरूर करते हैं ।
130. हम सत्संग करने लग गए, हमारा मन सत्संग में लगने लग गया तो हमारे जीवन की दिशा ही बदल जाती है ।
131. सत्संग से हम धीरे-धीरे अपने आत्मतत्व को पहचानने लगते हैं । शांति का मूल हमारे भीतर है, उसका अनुभव हम करने लगते हैं ।
132. शास्त्र के मार्ग पर चलने का प्रयास करने वाले हर व्यक्ति को प्रभु की कृपा जरूर मिलती ही है ।
133. शास्त्रों में बताया मार्ग ही शाश्वत मार्ग है । जो इसकी अवहेलना करता है वह अपनी दुर्गति करवाता है ।
134. शास्त्रों के आदेश को छोड़कर जो मनमाना व्यवहार करता है उसका इहलोक और परलोक दोनों बिगड़ जाता है ।
135. हमारे शास्त्र सर्वोपरि हैं इसलिए हमें उनकी शरण में ही रहना चाहिए ।
136. जिस चीज को छोड़ने के शास्त्र आग्रही हैं उसे जीवन में तुरंत छोड़ देना चाहिए ।
137. श्री वेदजी के बताए मार्ग, श्रीग्रंथों के बताए मार्ग और संतों के बताए मार्ग - यही जीवन जीने का श्रेष्ठ मार्ग होते हैं ।
138. शास्त्रों के सामने सदैव विनम्र भाव रखना चाहिए और हमारी शास्त्र निष्ठा एकदम पक्की होनी चाहिए ।
139. भारतीय अध्यात्म जितना व्यापक कुछ भी संसार में नहीं है ।
140. अध्यात्म की अंतिम उपलब्धि ज्ञान नहीं है, ध्यान नहीं है बल्कि भक्ति ही है ।
141. प्रभु की असीम करुणा का शब्दों में वर्णन करने में जब संत असमर्थ हो जाते हैं तो वे अश्रुपात करते हुए मौन हो जाते हैं ।
142. भौतिक शास्त्र जैसे आयुर्वेद का स्वस्थ रहने में लाभ लेना चाहिए पर स्वास्थ्य के लिए प्रभु कृपा का ही एकमात्र अवलंबन होना चाहिए क्योंकि भौतिक शास्त्र की एक सीमा है पर प्रभु की कृपा की कोई सीमा नहीं है ।
143. हमें अपना निहित कर्म करना चाहिए और फिर प्रभु कृपा की चाह होनी चाहिए तभी हमारा वह उपक्रम सफल होता है ।
144. जीवन में सभी के साथ अपना व्यवहार ठीक रखने पर और फिर भक्ति का साधन करने पर भक्ति का फल कई गुना बढ़कर मिलता है ।
145. हमें शास्त्रों के निष्कर्ष तक पहुँचना चाहिए । यह प्रभु कृपा से संभव होता है और इसमें ही हमारा कल्याण छिपा होता है ।
146. अच्छी बात का अनुसरण करने में कभी शर्माना नहीं चाहिए । शास्त्रों में वर्णित अच्छी बातों का अनुसरण तत्काल प्रभाव से जीवन में करना चाहिए ।
147. जीवन के अंतिम समय जिस भाव की प्रधानता रहेगी वैसा ही हमें अगला जन्म मिलेगा ।
148. संगति का बड़ा असर होता है । संत उदाहरण देकर समझाते हैं कि जो जल गन्ने के खेत में गया वह मीठा हो जाता है, जो जल नमक में मिल गया वह खारा हो जाता है और जो जल जहर में मिला दिया जाए तो वह जहर बन जाता है ।
149. साधक की सही पहचान तब होती है जब वह प्रभु के बारे में बोलने लगता है । उसका प्रभु के लिए भाव बताता है कि उसका साधन कहाँ तक पहुँचा है ।
150. पूर्व जन्मों के पुण्यों का अनुमान हमारे इस जन्म की भक्ति के साधन को देखकर होता है ।
151. रोज कोई-न-कोई सत्कर्म जरूर करना चाहिए । एक भी दिन बिना सत्कर्म किए हुए व्यतीत नहीं होना चाहिए, नहीं तो वह दिन ही बेकार हो जाता है ।
152. सत्कर्म हमारे इस जन्म को भी सफल करता है और अगले जन्म के लिए हमारा भाग्योदय करता है ।
153. कर्मयोग में प्रभु की भक्ति जुड़ जाती है तो वह सत्कर्म योग बन जाती है ।
154. गौ-माता की आयु, जाति या बीमारी कभी नहीं देखनी चाहिए । हमारे सामने गौ-माता है बस यही उन पर असीम श्रद्धा रखने का एकमात्र कारण होना चाहिए ।
155. संत कहते हैं कि सत्कर्म करने का नित्य अभ्यास गौ-माता की सेवा से शुरू करना चाहिए । हर दिन गौ-माता के लिए कुछ धन निकालना चाहिए और एक डिब्बे में रखकर उसे फिर महीने भर बाद गौशाला भेजना चाहिए ।
156. शास्त्र कहते हैं कि आयु से बड़ा होने वाला महान नहीं होता, जिसका आचरण बड़ा है वही महान होता है ।
157. आज का समय ऐसा आ गया कि परमार्थ क्या है, भक्ति क्या है, प्रभु सेवा क्या है, प्रभु निष्ठा क्या है, यह सिर्फ शास्त्रों में ही अंकित रह गया है ।
158. शास्त्रों के अर्थ बताने वाले तो आज बहुत मिलेंगे पर शास्त्रों को अपने जीवन के आचरण में उतारने वाला कोई बिरला ही मिलेगा ।
159. शास्त्रयुक्त आचरण जो जीवन में करता है वह सचमुच में कोई भी हो, वह बहुत महान होता है ।
160. वैदिक सिद्धांतों का जीवन में पूर्ण आचरण करना चाहिए । प्रभु श्री रामजी ने अपने अवतार काल में पूरे वैदिक सिद्धांतों का आचरण किया इसलिए उनका चरित्र परम अनुकरणीय है ।
161. प्रभु की प्रसन्नता के लिए किया गया साधन का परिणाम बड़ा मीठा होता है और बड़ा व्यापक होता है ।
162. जिनके भीतर प्रभु के लिए निष्ठा रहती है वह संसार सागर से जरूर तर जाते हैं ।
163. जीवन में शास्त्रनिष्ठ व्यक्ति को अपना आदर्श मानकर उनका अनुसरण करना बहुत उपयोगी होता है ।
164. अहंकार जीव का पतन कराता है, उस जीव को अपने अधीन करके रखता है और उस जीव को अनुशासन में नहीं रहने देता ।
165. शास्त्र भी पढ़ने चाहिए और शास्त्रोक्त आचरण करने वाले महापुरुष के जीवन को अपने लिए आदर्श मानना चाहिए ।
166. अपने ज्ञान के कारण कभी भी जीवन में बड़े-बूढ़ों को नीचा दिखाने की हिमाकत नहीं करनी चाहिए ।
167. प्रभु की भक्ति प्राप्त करने में ही अपने जीवन को लगाना चाहिए ।
168. हमारी श्रेष्ठ भारतीय परंपराओं को लोगों तक पहुँचाना चाहिए और लोगों में उनके प्रति सम्मान जागृत करना चाहिए ।
169. प्रभु को निमित्त बनाकर एकादशी का उपवास शरीर शुद्धिकरण हेतु किया जाता है तो वह श्रेष्ठ होता है ।
170. हमें जीवन में भक्तों की संगति सदैव करनी चाहिए, इससे जीवन सात्विक बना रहता है ।
171. सात्विक संगति में रहेंगे तो हमारा जीवन भी सात्विक बन जाएगा ।
172. श्री वेदजी का सिद्धांत है कि जैसा आहार होगा वैसा ही हमारे मन का विचार बनेगा ।
173. सात्विक आहार से आयु बढ़ती है, हमारे विचारों में शुद्धता आती है जो भक्ति हेतु बहुत सहायक होती है ।
174. देशी गौ-माता के दूध से बने सभी पदार्थ सात्विकता प्रधान होते हैं ।
175. भारतवर्ष में विवाह एक संस्कार है पर हमने उस सात्विक संस्कार को प्रतिस्पर्धा के कारण दूषित कर दिया है ।
176. शास्त्र कहते हैं कि जो सात्विक आहार नहीं पाता वह अपने भीतर सोए हुए रोगों के सर्पों को जगा देता है ।
177. कुपथ्य करने से हमारे रोग जग जाते हैं और हमारे ऊपर आक्रमण करने की तैयारी करते हैं, हमें पीड़ा देते हैं और हम त्राहि-त्राहि कर उठते हैं ।
178. संत श्री ज्ञानेश्वरजी तामस अन्न को अन्न कहने हेतु तैयार ही नहीं हैं क्योंकि वह सर्वनाश का अन्न होता है ।
179. शास्त्र कहते हैं कि तामस अन्न जैसे ही हमारे मुँह का स्पर्श करता है वह अन्न नहीं पाप बनकर हमारे भीतर तब्दील हो जाता है जिसका परिणाम दुःख और रोग होता है ।
180. भारतीय अध्यात्म में कितनी ऊँचाई है यह एक उदाहरण से समझे । घर की जिन गौ-माता का दूध हम पीते हैं उन्हें चारा खिलाना हमारा कर्तव्य होता है क्योंकि वे हमें सीधा लाभ देती हैं । पर जिन गौ-माता का दूध हम नहीं पीते, जिनसे हमारा कोई स्वार्थ नहीं उन्हें चारा देने को सत्कर्म कहा गया है ।
181. बिना अपने किसी भी निजी स्वार्थ के सत्कर्म करने चाहिए । फिर यह भाव रखना चाहिए कि यह सत्कर्म मैंने प्रभु के लिए किया है, इसके फल के रूप में मुझे कुछ भी नहीं चाहिए ।
182. कोई भी सत्कर्म प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए नहीं करना चाहिए नहीं तो वह सत्कर्म ही नहीं रहता ।
183. सत्कर्म से कोई भी लाभ या प्रसिद्धि की चाह नहीं रखनी चाहिए, नहीं तो वह सत्कर्म की जगह साधारण कर्म बन जाता है ।
184. प्रभु की सेवा के तीन प्रकार शास्त्रों में बताए गए हैं जिनको सात्विक तप भी कहा गया है । शरीर से प्रभु की सेवा, धन से प्रभु की सेवा और मन से प्रभु की सेवा ।
185. श्रेष्ठ भक्तों पर कृपा करने के लिए प्रभु चलकर उन पर कृपा करने के लिए आते हैं, भक्तों को कहीं जाना नहीं पड़ता ।
186. हमारे ऋषि और संत प्रभु के जिस रूप का जब ध्यान या पूजन करते हैं उस समय के लिए उस रूप में पूर्ण अनन्य हो जाते हैं, यह भक्ति का अलंकार होता है ।
187. वाणी से किसी को बुरा नहीं बोलना और पूरी सावधानी रखना, इसको शास्त्रों में वाणी का तप बताया गया है ।
188. भूल-चूक से भी मेरी वाणी किसी के हृदय को दुःख नहीं दे, यह ध्यान सदैव रखना चाहिए । वाणी की कठोरता को शास्त्रों ने एकदम मान्य नहीं किया है ।
189. शास्त्र आग्रही हैं कि हमारी वाणी ऐसी होनी चाहिए जो शीतल हो, सत्य हो, सबके लिए प्रिय हो और सबके कल्याणार्थ हो ।
190. जैसे अमृत पीना सभी चाहते हैं वैसे ही मीठी वाणी सुनना सभी पसंद करते हैं, ऐसा शास्त्र मत है ।
191. प्रभु एक बड़ी सरल बात कहते हैं कि दिनभर में थोड़ा-सा समय निकालकर अपनी जिह्वा से प्रभु का नाम लेकर उसे पवित्र कर लेना चाहिए ।
192. नाम जप में प्रभु कोई एक विशेष नाम के आग्रही नहीं हैं । प्रभु कहते हैं कि जो भी नाम प्रिय लगे वह नाम सुलभता से लेना, इसको प्रभु ने तप बताया है ।
193. प्रभु के असंख्य नाम हैं और हर एक नाम में प्रभु ने अपनी पूरी शक्ति भरी हुई है, इसलिए नाम जप बड़ा सरल और सामर्थ्यवान साधन है ।
194. संत कहते हैं कि जिह्वा को बुढ़ापे में लकवा मार जाए इससे पहले प्रभु के नाम का खूब उच्चारण कर लो । यही सबसे बड़ा तप है, सबसे बड़ा यज्ञ है, सबसे बड़ा सत्कर्म है ।
195. प्रभु का नाम जप हमारे जीवन को बदल देने का पूर्ण सामर्थ्य रखता है ।
196. अंतःकरण में हमारे सांसारिक संकल्प-विकल्प खत्म हो जाएं, सिर्फ प्रभु प्रेम ही बचे । यह केवल भक्ति से ही संभव है ।
197. जो हार जाता है, थक जाता है, अंधकार में होता है, अवसाद में होता है, उसके लिए प्रभु ने प्रसन्नता का विधान रचने के लिए श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश दिया है ।
198. संसार को देखने की हमारी जो दृष्टि होती है, वह सकारात्मक होनी चाहिए । किसी भी वस्तु या परिस्थिति में दोष दृष्टि कभी भी नहीं रखनी चाहिए ।
199. जीवन में कभी भी उल्टे मार्ग पर नहीं चलना चाहिए या उल्टी दिशा में नहीं देखना चाहिए ।
200. प्रभु की प्रसन्नता के लिए सत्कर्म करना हमारा स्वभाव बन जाए तो वह श्रेष्ठ सत्कर्म होता है ।
201. उपवास भी जब तक शास्त्रीय पद्धति से नहीं होता है तब तक वह पूर्ण आध्यात्मिक लाभ नहीं देता ।
202. शास्त्रों में मानव शरीर को प्रभु का मंदिर माना गया है । इसलिए शरीर से आलस्य और उन्माद नहीं होने देना चाहिए नहीं तो प्रभु को वेदना पहुँचती है ।
203. शास्त्रों में दान के चार मापदंड बताए गए हैं । उत्तम देश में, उत्तम कार्य हेतु, उत्तम मुहूर्त देखकर और उत्तम पात्र को दान दिया गया तो वह सर्वोत्तम दान कहलाता है ।
204. यश और कीर्ति के कारण दिए हुए दान का लाभ बहुत कम होता है ।
205. जिस दान का किसी को पता भी नहीं चले, वह सबसे ज्यादा लाभ देता है ।
206. दान को कीर्ति प्राप्त करने के लिए कभी भुनाना नहीं चाहिए ।
207. सात्विक साधन वह होता है जो प्रभु प्राप्ति के लिए ही किया जाता है ।
208. सभी साधन की पूर्णता के लिए प्रभु नाम जप अनिवार्य है । इससे प्रभु नाम जप के महत्व का हमें पता चलता है ।
209. हमारी चर्या ऐसी होनी चाहिए कि हमारे मुँह में प्रभु का नाम होना चाहिए और हमारे हाथ में प्रभु की सेवा होनी चाहिए ।
210. प्रभु का नाम उच्चारण करके जो भी कर्म किया जाता है वह लाभ-ही-लाभ देता है ।
211. कोई भी कर्म करते हुए उसमें प्रभु नाम के उच्चारण को जोड़ दिया जाए तो उस कर्म का दोष तत्काल नष्ट हो जाता है और वह कर्म बड़ा लाभकारी बन जाता है ।
212. प्रभु में असीम श्रद्धा होना मनुष्य का सबसे बड़ा सद्गुण है और यह सद्गुण मनुष्य को जीवन की ऊँचाई तक ले जाता है ।
213. शास्त्र कहते हैं कि आधुनिकता के चलते हमारी बुद्धि आज भौतिक बुद्धि रह गई है, आध्यात्मिक बुद्धि नहीं रही है ।
214. प्रभु के लिए हमारे भीतर परिपूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए ।
215. बिना श्रद्धा से किया प्रभु के लिए कोई भी कर्म मात्र श्रम ही रह जाता है ।
216. प्रभु का सामर्थ्य है कि हमारे अमंगल को मूल से ही वे नष्ट कर देते हैं ।
217. श्रीमद् भगवद् गीताजी के अंतिम अध्याय को रत्नों का कलश बताया गया है जो मंदिर के ऊपर शिखर पर स्थापित होता है और सबसे ऊँ‍चा होता है ।
218. एक अध्याय में पूर्ण श्रीमद् भगवद् गीताजी का सार आ गया तो वह अठारहवाँ अध्याय है ।
219. श्रीमद् भगवद् गीताजी इसलिए इतनी महान हैं कि उनके जो लेखक हैं वे प्रभु श्री गणेशजी हैं, वक्ता प्रभु श्री कृष्णजी हैं और संपादक प्रभु श्री वेदव्यासजी हैं ।
220. श्रीमद् भगवद् गीताजी प्रभु श्री कृष्णजी के श्रीमुख से निकली और प्रभु श्री गणेशजी द्वारा उसको लिपिबद्ध किया गया । इससे बड़ी दिव्यता और क्या हो सकती है ?
221. श्रीमद् भगवद् गीताजी के सभी विचारों का समावेश और सभी अध्यायों का निष्कर्ष अठारहवें अध्याय में मिलेगा ।
222. संत कहते हैं कि जो भक्त श्रीमद् भगवद् गीताजी का नित्य पाठ करते हैं वे श्रीगीता मंदिर की जैसे परिक्रमा ही लगाते हैं ।
223. संत कहते हैं कि जो श्रीमद् भगवद् गीताजी का पाठ नहीं कर पाते पर प्रवचन सुनते हैं वे श्रोता श्रीगीता मंदिर में दर्शन करने का फल प्राप्त करते हैं ।
224. श्रीमद् भगवद् गीताजी के सिद्धांतों को सुनकर जीवन में उन्हें उतारना चाहिए ।
225. श्रीमद् भगवद् गीताजी के एक-एक श्लोक का चिंतन करना चाहिए, विचार करना चाहिए, उसकी व्याख्या पढ़नी चाहिए और उसकी संगति अपने जीवन में बैठानी चाहिए ।
226. प्रभु से हमारे श्रीग्रंथों को श्रवण करने के प्रसाद के रूप में मोक्ष से कम कुछ भी नहीं मिलता । संत कहते हैं कि प्रभु के पास देने हेतु इससे कम कुछ भी नहीं है ।
227. जो प्रबलता से साधन नहीं कर पा रहा है, फिर भी प्रभु इतने दयालु और कृपालु हैं कि प्रभु उसको भी मोक्ष फल ही देंगे और देते हैं । प्रभु के संपर्क में आने वाले को सिर्फ मोक्ष प्रसादी ही मिलती है ।
228. संत कहते हैं कि प्रभु पर सिर्फ विश्वास करके देखें, फिर चमत्कार देखें कि जीवन की परिस्थितियां कैसे बदलती हैं ।
229. शास्त्र कहते हैं कि किसी को प्रभु की तरफ जाने से रोकना सबसे बड़ा अपराध होता है ।
230. जब हम प्रभु के सामने कोई शास्त्र का पाठ करते हैं तो प्रभु व्याकरण की परीक्षा नहीं लेते, अशुद्धि की परीक्षा नहीं लेते सिर्फ भाव की परीक्षा लेते हैं ।
231. श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवद् गीताजी और श्री रामचरितमानसजी मात्र और मात्र भक्ति से श्रवण करने पर ही अपने स्वरूप और रहस्य को प्रकट करते हैं ।
232. संत यहाँ तक कहते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीताजी के श्लोक का उच्चारण अगर संस्कृत में नहीं आता तो श्लोक पर उँगली रखकर श्रीकृष्ण-श्रीकृष्ण रटते जाएं तो उस श्लोक का पूरा फल हमें मिल जाता है ।
233. श्री अर्जुनजी को निमित्त बनाकर प्रभु हम सबको कहते हैं कि मैं शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं अपने भक्तों से बहुत प्रेम करता हूँ ।
234. प्रभु तो हमसे प्रेम करते ही हैं पर हम प्रतिउत्तर में क्या प्रभु से प्रेम करते हैं या नहीं ? प्रभु हमारे प्रेम को देखते भी जरूर हैं और परखते भी हैं ।
235. पूरी श्रीमद् भगवद् गीताजी का एक अर्थ संत करते हैं कि प्रभु का स्मरण जीवन में निरंतर करते रहो ।
236. पूरे श्रीमद् भगवद् गीताजी में एक विषय जो प्रभु समझाना चाहते हैं वह यह है कि प्रभुतत्व का अपने भीतर दर्शन करना हमें सीखना चाहिए ।
237. पूरी श्रीमद् भगवद् गीताजी सुनने के बाद भी श्री अर्जुनजी का प्रभु वाणी सुनने से मन नहीं भरा, जैसे श्री गोपीजन का प्रभु को निहारने से कभी मन नहीं भरता । यही सच्चा प्रेम होता है क्योंकि जिसमें मन भर जाए वह सच्चा प्रेम नहीं होता ।
238. प्रभु कहते हैं कि कर्म नहीं करना कर्म संन्यास नहीं है बल्कि कर्म करना और फिर उससे फल की आशा नहीं रखना, यह कर्म संन्यास है ।
239. रोज-रोज स्नान करने से शरीर स्वच्छ रहता है वैसे ही रोज-रोज शास्त्र अध्ययन करने से मन स्वच्छ रहता है ।
240. रोजाना सुबह-शाम की पूजा का विधान क्यों है ? क्योंकि कितनी भी कोशिश करने पर भी कुछ-न-कुछ अदृश्य पाप होंगे ही । दिनभर के अदृश्य पापों को शाम की पूजा से शुद्ध किया जाता है और रातभर के अदृश्य पापों को सुबह की पूजा से शुद्ध किया जाता है । यह कितना सुंदर विधान सनातन धर्म का है ।
241. देखने पर सत्कर्म का फल हमें तुरंत नहीं दिखता पर यथासमय प्रत्येक सत्कर्म का फल हमें जरूर मिलता है ।
242. प्रभु की भक्ति प्रतिकूल घटनाओं के क्रम को ही रोक देती है ।
243. जैसे ही हम प्रभु का नाम जपने लगते हैं तो हमारे बड़े-बड़े पापों के पहाड़ जलने लगते हैं ।
244. कलियुग में हमारे संचित पापों के इतने पर्वत हैं जो प्रभु के नाम जप से ही जल सकते हैं ।
245. कोई भी सत्कर्म कभी बेकार नहीं जा सकता, चाहे उसका प्रत्यक्ष फल हमें उस समय नहीं दिखे पर उसका जमाखर्च प्रभु के यहाँ जरूर होता है । यह प्रभु का कितना सुंदर विधान है ।
246. प्रभु कहते हैं कि जैसे शरीर को रात्रि में विश्राम चाहिए वैसे ही हमारे मन को भी विश्राम चाहिए । मन जीवनभर पूरे तनाव में ही रहता है इसलिए उसको भक्ति करके ही विश्राम देना चाहिए ।
247. प्रभु को जीवन में समय देंगे तो हमारा अंतःकरण शांत होकर ही रहेगा और जीवन से तनाव के बादल हट जाएंगे ।
248. अध्यात्म के बारे में हमारे जो भी संशय हैं उसका निवारण प्रभु ने पहले ही श्रीमद् भगवद् गीताजी में कर दिया है ।
249. प्रभु द्वारा श्रीमद् भगवद् गीताजी में जो कहा गया है उसे सर्वमान्य करना चाहिए, उसमें तर्क बुद्धि एकदम नहीं लगानी चाहिए ।
250. शास्त्र कहते हैं कि हर हालत में दो कर्मों का त्याग जीवन में कभी नहीं करना चाहिए । पहला, प्रभु का नाम जप और दूसरा, प्रभु की तन-मन-धन से सेवा ।
251. प्रभु के मार्ग पर चलने वाले को कभी भी अपने कदम रोकने नहीं चाहिए ।
252. जितनी जल्दी हम प्रभु के मार्ग पर चलेंगे उतनी जल्दी हम प्रभु के पास पहुँच जाएंगे ।
253. प्रभु कहते हैं कि जितना हो सके सत्कर्म करना चाहिए, उसकी फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए और उसे प्रभु को अर्पित करना चाहिए ।
254. सत्कर्म करने से और उसे प्रभु को अर्पित करने से उसका फल हमें जरूर मिलता है, वह दूषित नहीं होता और उचित समय पर उसे प्रभु सही रूप में और सही ढंग से हमें देते हैं ।
255. कोई भी सत्कर्म तब पूरा होता है जब उसके साथ भक्ति को जोड़ दिया जाए ।
256. एक मजदूर से किसी ने प्रश्न किया कि तुम पत्थर तोड़ रहे हो तो उसने कितना मार्मिक भक्तियुक्त जवाब दिया । उसने कहा कि यहाँ पास में प्रभु का मंदिर बन रहा है, प्रभु की असीम कृपा मुझ पर है और मैं प्रभु की सेवा में पत्थर तोड़ रहा हूँ ।
257. सात्विक कर्म में कर्म करते वक्त हमें उस कर्म से अलिप्त रहना चाहिए । हम कर्म प्रभु की सेवा हेतु कर रहे हैं, यह भाव हमारे भीतर होना चाहिए ।
258. हमारे जीवन का हर पल भक्तिमय हो और हमारे जीवन का हर पल प्रभु की सेवा के लिए हो तो यह जीवन का गौरव होता है ।
259. हमें कर्म ऐसा करना चाहिए और जीवन ऐसा जीना चाहिए जिससे हमारा रजोगुण और तमोगुण कम होकर सतोगुण की जीवन में वृद्धि हो ।
260. तमोगुण के कारण आलस्य और रजोगुण के कारण चंचलता नष्ट हो जाएगी तो सतोगुण जग जाएगा और हम प्रभु के योग्य बन जाएंगे ।
261. सतोगुणी व्यक्ति को सुख-दुःख, मान-अपमान से उतना धक्का नहीं लगता जितना रजोगुणी और तमोगुणी व्यक्ति को लगता है ।
262. सतोगुण के कारण हमारे जीवन में सात्विकता आती है जिससे जीवन में सहनशीलता बढ़ जाती है ।
263. सतोगुण जीवन में जितना बढ़ता जाएगा उतना जीवन में दुःखों के आभास से हमें मुक्ति मिलती जाएगी ।
264. सतोगुण के कारण सात्विकता जीवन में होना, मनुष्य जीवन की बहुत बड़ी सिद्धि है ।
265. प्रभु की सेवा के हर काम को बड़े प्रेम से और खुशी मन से करना चाहिए ।
266. भारत माता की सेवा का गौरव और ललक हमारे भीतर सदैव होनी चाहिए ।
267. जनकल्याण को कुरीति के लिए फटकारने हेतु कभी-कभी संत कठोर शब्द का प्रयोग करते हैं ।
268. सत्कर्म करने की शक्ति और स्वभाव हम सबको प्रभु से प्राप्त हुआ है पर हम उसको उपयोग नहीं करते, यह हमारा दुर्भाग्य होता है ।
269. प्रसाद रूप में प्रभु से मिली सत्कर्म करने की शक्ति का हम मानव जीवन में अपमान करते हैं ।
270. मानव जीवन प्रभु का दिया हुआ श्रेष्ठतम प्रसाद है और सबसे मूल्यवान है ।
271. हमारे द्वारा किया प्रभु की सेवा का कर्म करके उसका कर्मफल प्रभु के श्रीकमलचरणों में हमें अर्पित कर देना चाहिए ।
272. कर्मफल का संग नहीं करने से यानी कर्मफल प्रभु को अर्पित होते ही कर्म का कोई बोझ हमारे ऊपर नहीं रहता ।
273. मंदिर में हम प्रभु को कुछ चढ़ाते हैं तो हमें बदले में प्रसाद मिलता है वैसे ही हम प्रभु को अपना कर्म चढ़ाते हैं तो प्रभु की कृपा का प्रसाद हमें मिलता है ।
274. अपने सभी कर्मों को शास्त्रों के अनुसार करते हुए उन्हें पुष्प रूप में प्रभु के श्रीकमलचरणों में चढ़ा देना चाहिए ।
275. जैसे एक सांसारिक पिता अपनी कन्या के लिए सब कुछ करता है और बदले में उससे कुछ भी नहीं चाहता वैसे ही परमपिता प्रभु हमारे लिए सब कुछ करते हैं और बदले में हमसे कुछ भी नहीं चाहते । सांसारिक पिता का फिर भी एक छोटा-सा स्वार्थ हो सकता है कि बेटी-दामाद उसकी बुढ़ापे में सेवा करे पर परमपिता प्रभु का किसी भी जीव से कोई भी स्वार्थ नहीं होता ।
276. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में एक-एक कर्म बढ़िया-से-बढ़िया तरीके से करना चाहिए और फिर उसको प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पण कर देना चाहिए । इस भाव से प्रभु को अर्पण करना चाहिए कि यह कर्म मैंने आपके लिए ही किया है ।
277. महात्माओं के जीवन के पूरे कर्म ऐसे होते हैं जिसका फल वे नहीं चाहते और कर्म प्रभु को अर्पित करने के साथ वे कर्मफल के बंधन से छूट जाते हैं ।
278. जो प्रभु को हर जगह और हर रूप में देखते हैं वह किसी से अपनी तुलना या स्पर्धा नहीं करते और दूसरों के सुख में और समृद्धि में खुश होते हैं, शास्त्र उन्हें सच्चे संत कहते हैं ।
279. संत बिना स्वार्थ के संसार में सबसे प्रेम करते हैं ।
280. अज्ञान के कारण जीवात्मा ने शरीर से इतना पक्का रिश्ता बना लिया और प्रभु से अपने सनातन रिश्ते को भूल गया है ।
281. संतजन संसार के सभी दृश्य को दृष्टा भाव से देखते हैं, ऐसा करना सबसे श्रेष्ठ होता है ।
282. जीवन में अगर हम कर्म करके कर्मफल की इच्छा नहीं करेंगे तो हमारा पतन कभी नहीं होगा ।
283. संसार के कल्याण के लिए शास्त्र कभी-कभी कठोर निर्णय भी हमें देते हैं ।
284. जो धर्म में आस्था नहीं रखता, उसे धर्म की दुहाई देकर अपनी रक्षा की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, ऐसा प्रभु ने कर्ण को फटकार लगाते हुए युद्धभूमि में कहा ।
285. हमें जीवन में सबके साथ सज्जनता का व्यवहार ही करना चाहिए ।
286. निस्वार्थ भाव से सबके काम आ जाना, यह जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि होती है ।
287. जीवनभर कर्मशील रहना सच्चे कर्मयोगी के लक्षण होते हैं ।
288. प्रभु किसी का भी अकल्याण नहीं चाहते, कौरवों का भी कल्याण प्रभु ने करने का प्रयास किया और महाभारत युद्ध बचाने के प्रभु ने बहुत सारे उपाय किए जो कौरवों ने नहीं माने ।
289. सर्वत्र एक प्रभु के दर्शन, सर्वत्र एक प्रभु के अलावा कुछ भी नहीं देखना, यह श्रेष्ठतम ज्ञान होता है ।
290. ब्रह्मांड में जो कुछ भी हमें दिख रहा है वह सब कुछ प्रभु का विलास मात्र है, सब कुछ एक प्रभु का ही तत्व है ।
291. सच्चा कर्मयोग तब होता है कि जब सभी कर्म प्रभु को अर्पित किए जाएं, अपना कोई स्वार्थ नहीं रखा जाए और कर्मफल की इच्छा नहीं की जाए ।
292. जैसे हम मिट्टी के बने खिलौने को देखकर मिट्टी को नहीं भूलते क्योंकि मूल पदार्थ मिट्टी है वैसे ही संसार को देखकर हमें प्रभु को नहीं भूलना चाहिए क्योंकि संसार के मूल तत्व प्रभु ही हैं ।
293. जीवन में प्रभु के एक रूप के आग्रही होना चाहिए पर प्रभु के सभी रूप हमें प्रिय होने चाहिए ।
294. एक भक्त प्रभु को हर तत्व में, हर रूप में, हर जगह देखता है और प्रभु की अनुभूति करता है ।
295. तामस ज्ञान वह होता है जो शरीर के सुख को सबसे बड़ा मानता है । तमोगुण में बुद्धि डूबने के बाद ऐसा ज्ञान हमारे भीतर जागृत होता है ।
296. तमोगुण में डूबने पर हमारे विचार उल्टे होते चले जाते हैं ।
297. तमोगुणी जीव अहंकार से अंधा हो जाता है ।
298. आध्यात्मिक शास्त्र में क्या बात कही गई है, यह तभी हमारे गले उतरती है या समझ में आती है जब सतोगुण हमारे भीतर जागृत होता है ।
299. शास्त्र कहते हैं कि भक्ति के बिना जीवन में एक भी दिन व्यर्थ नहीं जाना चाहिए यानी जीवन को भक्ति करके ही सार्थक करना चाहिए ।
300. जैसे संसारी जीव को गर्मी में चंदन का लेप अच्छा लगता है, सुंदर स्त्री को आँखों में काजल अच्छा लगता है वैसे ही जो जीव भक्ति करता है वह प्रभु को बहुत अच्छा लगता है ।
301. शास्त्रों की आज्ञा मानकर अपना स्वधर्म हमको करना ही चाहिए ।
302. प्रभु की कृपा को अपने जीवन का आधार बना लेना चाहिए ।
303. हम कोई भी कर्म करें उसका हेतु यह होना चाहिए कि प्रभु उस कर्म से प्रसन्न हों । प्रभु की खुशी हेतु, प्रभु की प्रसन्नता हेतु कर्म करना हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए ।
304. अपना स्वधर्म का कर्म करने से पहले सबसे सुंदर कार्य यह होता है कि नित्य कर्म के रूप में प्रभु की पूजा की जाए ।
305. शास्त्रों में किसी सार्वजनिक मंदिर में जाकर प्रभु की सेवा करने का भी बड़ा लाभ बताया गया है ।
306. हम पूजा हेतु जो भी साधन करते हैं उसमें भी अपनी बुद्धि लगाते हैं कि कौन-सा साधन करने से हमें ज्यादा लाभ होगा ? कौन-से साधन में कम परिश्रम है और ज्यादा फल है, ऐसा करना गलत है ।
307. तमोगुणी व्यक्ति के मन में संवेदना नहीं होती और विवेक जागृत नहीं होता जो सतोगुणी व्यक्ति में होता है ।
308. हमारे द्वारा किए जाने वाला हर कर्म समाज में सुगंधी फैलाए, ऐसा कर्म होना चाहिए ।
309. हमारे द्वारा किए जाने वाला कोई भी कर्म लोगों में अशांति का कारण नहीं बने, यह सदैव ध्यान रखना चाहिए ।
310. जैसे चंदन में सुगंधी होती है और वह प्रभु के श्रीमस्तक पर श्रीललाट पर लगता है और शोभायमान होता है वैसे ही हमें ऐसे कर्म करने चाहिए जो प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित होकर शोभायमान हो ।
311. जैसे आकाश मंडल में आने वाले बादल बरसते हैं और सबको तृप्ति देते हैं वैसे ही हमारा कर्म ऐसा होना चाहिए जो समाज को तृप्त करे ।
312. प्रभु के श्रीकमलचरणों में अपने कर्म को अर्पित करने से प्रभु को बड़ी प्रसन्नता होती है ।
313. शुद्ध सात्विक कर्मकांड के लिए शरीर की, काल की, स्थान की, मंत्र की और द्रव्य की शुद्धि परम आवश्यक है ।
314. सतोगुणी व्यक्ति सदैव प्रभु की प्रसन्नता हेतु ही कर्म करता है ।
315. हमारा साधन ऐसा होना चाहिए कि प्रभु का कार्य करते हुए हमें आलस्य, नींद, भूख कुछ भी नहीं सतावे, इस प्रयास को तप कहते हैं ।
316. प्रभु का काम करने वाले का जीवन उमंग से भरा हुआ रहता है, उसकी बुद्धि तेज होती है, आरोग्यता बनी रहती है और उसका विवेक जागृत रहता है । यह सब प्रभु की कृपा के फलस्वरूप होता है ।
317. सात्विक कर्म करने से इंद्रियों पर हमारा संयम रहता है और जीवन में हमारी प्रसन्नता बढ़ती है ।
318. जीवन में प्रसन्नता और आनंद बढ़ना प्रभु की कृपा होने का स्पष्ट लक्षण होता है ।
319. सतोगुणी व्यक्ति कर्म करने में तो भारी उत्साह रखता है पर कर्म की शाबाशी लेने के समय एकदम पीछे हट जाता है ।
320. सतोगुणी व्यक्ति जीवन के एक रहस्य को जानता है कि हर हार या असफलता के बाद दोबारा प्रयास करना अनिवार्य है ।
321. शास्त्र कहते हैं कि सभी सत्कर्म प्रसन्नचित्त होकर और प्रभु की सेवा में कर रहे हैं, ऐसा भाव रखकर करना चाहिए ।
322. पूरी एकाग्रता से सत्कर्म करेंगे और फल की चिंता नहीं करेंगे तो शुभ फल स्वतः ही जीवन में उपस्थित होकर रहेगा ।
323. श्रीग्रंथों से प्रेम करना हम सीख जाएंगे तो उनका ज्ञान स्वतः ही हमारे भीतर जागृत हो जाएगा ।
324. हमें जीवन में सतोगुण को ही सदैव आदर्श के रूप में देखना चाहिए ।
325. जीवन में ज्यादा-से-ज्यादा सतोगुण का वर्णन पढ़ना चाहिए, समझना चाहिए और उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए ।
326. प्रभु का हर काम और प्रभु की हर सेवा में अपना शत प्रतिशत से भी ज्यादा अर्पण करना चाहिए ।
327. प्रभु के कार्य में और आध्यात्मिक उन्नति के लिए शत प्रतिशत तल्लीनता बहुत अनिवार्य है ।
328. सच्ची प्रसन्नता जीवन में सात्विकता होने से ही होती है और वह हमारे भीतर की प्रसन्नता होती है ।
329. हमारा पूरा जीवन गलत दिशा में बह जाता है और हमें पता भी नहीं चलता कि जीवन कैसे व्यर्थ चला गया ।
330. प्रभु सबको जीवन में भक्ति का अवसर प्रदान करते हैं, ऐसा कोई भी नहीं जिसको प्रभु अवसर प्रदान नहीं करते पर उस अवसर को पकड़ना हमें नहीं आता, उतनी तैयारी हमारी नहीं होती ।
331. शास्त्रों में मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य को बताया है । शास्त्र कहते हैं कि आलस्य का त्याग करके मनुष्य सब कुछ पा सकता है और आलस्य के कारण सब कुछ गंवा सकता है ।
332. जीवन के सात्विक कर्मों को कभी भी विलंबित नहीं करना चाहिए ।
333. आलस्य वह दीमक है जो हमारी जीवनी शक्ति का ही नाश कर देता है ।
334. मनुष्य जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पदार्थ मनुष्य का विवेक होता है ।
335. विवेक के बल पर बहुत बड़ा काम एक जीव जीवन में कर सकता है और विवेक के दोष के कारण वह जीव कुछ भी नहीं कर पाता, ऐसा भी देखने में आता है ।
336. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में सब कुछ खो दें तो भी दुःख नहीं होना चाहिए पर विवेक कभी नहीं खोना चाहिए । विवेक से अगर हम लाचार हो गए तो जो कुछ भी बचा हुआ है वह भी नहीं टिकेगा ।
337. हमारी बुद्धि स्वस्थ भी होनी चाहिए और सावधान भी होनी चाहिए ।
338. शास्त्रों में सर्वोत्तम बुद्धि सात्विक बुद्धि को ही माना गया है ।
339. प्रभु कहते हैं कि जो बुद्धि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए इसकी पहचान बता दे, वही सात्विक बुद्धि होती है ।
340. सात्विक बुद्धि इतनी प्रबल होती है कि सात्विक बुद्धि हमें मोक्ष द्वार तक पहुँचा देती है ।
341. शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य अगर अपनी गलत आदतों से और मन के विकारों से छूट जाए तो वह इतना करने से ही आंशिक मोक्ष फल प्राप्त कर लेता है ।
342. विवेक हमें यह बताता है कि क्या करने से हम संसार के झंझट में फंस जाएंगे और क्या करने से हम संसार के झंझट से मुक्त हो जाएंगे ।
343. बहुत सारे लोग संसार में बिना कारण ही बहुत सारी सांसारिक झंझटों को अपने ऊपर लेकर रखते हैं ।
344. जैसे प्यास बुझाने हेतु जल की आवश्यकता होती है, निरोग रहने के लिए औषधि की आवश्यकता होती है वैसे ही पापों से मुक्त रहने के लिए जीवन में सही निर्णय लेने की आवश्यकता होती है ।
345. संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि अच्छे सत्कर्म जीवन में करते चले जाएंगे तो धीरे-धीरे हम मोक्ष द्वार तक अपने आप पहुँच जाएंगे ।
346. पहले क्रिया का निर्णय लेना चाहिए फिर क्रिया कैसे करना चाहिए उसका आकलन करना चाहिए और फिर क्रिया करनी चाहिए, यह विवेक से संभव होता है ।
347. कभी-कभी हम साधन मार्ग पर चलते हुए भी घातक कर्म कर लेते हैं जो कि बिलकुल गलत होता है ।
348. जैसे हम गर्म कपड़े गर्मी में नहीं पहनते बल्कि सर्दी में पहनते हैं वैसे ही हमारी बुद्धि ऐसी होनी चाहिए कि सत्कर्म जवानी में करें, बुढ़ापे के लिए नहीं छोड़ना चाहिए ।
349. वैदिक सिद्धांत यह है कि सफल होने के लिए ही मनुष्य जीवन हमें मिला है, दुर्बलता से जीने के लिए मनुष्य जीवन नहीं मिला है ।
350. यह सिद्धांत है कि प्रभु केवल उनके ही होते हैं जिनको प्रभु से प्रभु के अलावा और कुछ भी नहीं चाहिए होता ।
351. मोक्ष चाहने वाला जीव सकाम कर्म करने से डरता है, वह निष्काम कर्म ही करता है जिससे वह मोक्ष प्राप्त कर सके ।
352. सच्चा संन्यास सकाम कर्म को त्यागना ही है, खाली वस्त्र बदलने का नाम संन्यास नहीं है ।
353. संत श्री ज्ञानेश्वरजी उपमा देकर बताते हैं कि जैसे हम गुफा के अंदर झांकते नहीं कि कोई जानवर आ जाएगा, सांप के बिल में हाथ डालते नहीं, जहर पीकर उसका परीक्षण करते नहीं क्योंकि यह सब आत्मघाती होते हैं । वैसे ही प्रभु प्राप्ति मार्ग के ऊपर सकामता से चलना आत्मघाती है और वर्जित है ।
354. जैसे अंधे आदमी को दिन और रात समान दिखाई देता है वैसे ही तामस बुद्धि वाले को कर्म और अकर्म दोनों समान दिखाई देते हैं ।
355. तामस बुद्धि वाले को अधर्म में ही धर्म दिखता है ।
356. तामस बुद्धि वाला सही बात को भी उलटी दिशा से ही पकड़ता है ।
357. जैसे चोर को दिन नहीं सुहाता, रात्रि अच्छी लगती है वैसे ही तामस व्यक्ति को उल्टा कार्य करना ही अच्छा लगता है, उसकी बुद्धि उसे सुलटी चीज को भी उल्टा ही दिखाती है ।
358. शास्त्र कहते हैं कि अपनी माला, अपना आसन और अपने व्यवहार की वस्तु को किसी दूसरे के साथ साझा नहीं करना चाहिए ।
359. भारतीय धर्मशास्त्र के सभी सिद्धांतों को वैज्ञानिक रूप से सटीक पाया गया है ।
360. जितना सुंदर मनुष्य जीवन का चिंतन और आचार-विचार का चिंतन भारतीय ऋषियों का रहा है उतना सुंदर विश्व में कहीं भी देखने को भी नहीं मिलेगा । भारतवर्ष का आचार-विचार सर्वोच्च है और विश्व को एक-न-एक दिन इसे मानना ही पड़ेगा ।
361. हमारे सोचने की दिशा उल्टी हो और नीति हमें प्रिय नहीं लगे तो हमें मानना चाहिए कि जीवन में प्रभु कृपा से अभी हम वंचित हैं ।
362. सात्विक बुद्धि सही दिशा में हमें ले जाने का सामर्थ्‍य देती है ।
363. सात्विक बुद्धि नहीं होने के कारण हम जीवन में सही निर्णय को नहीं ले पाते ।
364. बहुत से लोगों में सात्विक बुद्धि का अभाव होता है, धैर्य का अभाव होता है जिस कारण उनकी जीवन में दिशा और दशा दोनों गलत हो जाती है ।
365. धैर्य धारण करने के लिए अपनी इंद्रियों को अति नियंत्रण में रखने की आवश्यकता होती है ।
366. प्रभु कहते हैं कि धैर्यवान सदैव विजयश्री को प्राप्त होता है ।
367. प्रभु श्री रामजी ने अपनी श्रीलीला में धैर्य की अपार मिसाल देकर संसार को दिखाई है ।
368. शास्त्र कहते हैं कि आत्म विजयी होने के लिए अपने प्राणों और इंद्रियों पर जय करना पड़ता है ।
369. सात्विक बुद्धि के निर्णय का अनुगमन हमारे प्राण और इंद्रियां अगर करती है तभी जीव की जीवन में जय होती है ।
370. शास्त्र कहते हैं कि सात्विक बुद्धि के साथ भी धैर्य की बड़ी आवश्यकता है । सात्विक बुद्धि ने निर्णय कर लिया पर उसे क्रियान्वित करने के लिए धैर्य से काम लेना चाहिए ।
371. शास्त्र कहते हैं कि हमें प्रभु के न्याय पर अटूट विश्वास होना चाहिए ।
372. छत्रपति श्री शिवाजी महाराज में देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी के लिए इतनी निष्ठा थी कि वे खुद के लिए नहीं बल्कि प्रभु के लिए राज्य स्थापित करते थे । वे प्रभु के लिए युद्ध करते थे, प्रभु के लिए विजयश्री को प्राप्त करते थे, प्रभु के लिए राज्य करते थे, इतनी अटूट प्रभु निष्ठा थी ।
373. प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही परमानंद स्थित है ।
374. दुःख का नाश एक वर्ष के लिए नहीं, एक जन्म के लिए नहीं बल्कि सदा-सदा के लिए होना सिर्फ प्रभु कृपा से ही संभव है ।
375. शास्त्रों के अनुसार सात्विक सुख उसे कहते हैं जो आरंभ में तो कष्ट देता है, पालन करने में कठिन होता है पर अंत में सदा-सदा के लिए हमें सुखी कर देता है ।
376. आत्म नियंत्रण में रहना शुरू में कठिन लगता है पर बाद में वह इतना सुख प्रदान करता है जिसकी कोई सीमा ही नहीं होती ।
377. जो कठिन लगने वाले नियमों का जीवन में पालन कर लेता है वह अंत में इतना सुख पाता है जिसकी अन्य जीव सपने में भी कल्पना नहीं कर सकते ।
378. बहुत व्यक्तियों को अपने जीवन में अच्छाई लाने की आकांक्षा होती है पर बहुत कम लोग ही इसमें सफल हो पाते हैं ।
379. शास्त्र उदाहरण देकर समझाते हैं कि सुबह चार बजे उठने का नियम शुरू में जहर जैसा लगता है पर अंत में वह अमृत होता है क्योंकि हम दिनभर में अधिक काम कर सकते हैं, अधिक स्वस्थ रहते हैं और अधिक प्रसन्न रहते हैं ।
380. प्रभु कृपा से जिसको सात्विक आदत जीवन में लग गई उसका जीवन ही सुखमय हो जाता है ।
381. शुरू में तो कठिन लगेगा लेकिन अगर हमने अपने शरीर को, मन को, इंद्रियों को और वृत्तियों को साध लिया तो वे हमें साधन की बहुत ऊँचाइयों तक ले जाती है ।
382. जीवन में गलत आदतों को नहीं छोड़ने पर हमारा कल्याण कभी भी नहीं हो सकता ।
383. अविषय में हमारी अरुचि हो जानी चाहिए यानी हमारी विषय की वस्तु नहीं हो तो वह हमें रुचिकर नहीं लगे ।
384. आत्म-नियंत्रण में रहने वाला और आत्म-चिंतन करने वाला प्रभु को प्रिय होता है ।
385. हमें संसार की जगह प्रभु ही सबसे अच्छे लगने चाहिए, ऐसा भक्ति से संभव होता है ।
386. विषयों को इंद्रियों का सहयोग मिलने पर आरंभ में तो सुख बहुत अच्छा लगता है पर बाद में वह हमारा पतन करवा देता है ।
387. संसार के विषयों का सुख हमारी आदतें बिगाड़ देता है और हमें आत्मानंद से दूर ले जाता है ।
388. संसार का सुख हमसे धर्म की सीमाओं का उल्लंघन करवा देता है और अंत में हमें उसका विपरीत परिणाम झेलना पड़ता है ।
389. हमें चिंताशील नहीं होना, चिंतनशील होना चाहिए और प्रभु के बारे में निरंतर चिंतन करते रहना चाहिए ।
390. अपने बुरे गुणों का ह्रास करना और अच्छे गुणों का विकास करना, यह भारतीय अध्यात्म हमें सिखाता है ।
391. हमारे ऋषियों ने मनुष्य के मन के हर अंग का और शरीर के हर अंग का विचार किया और फिर प्रभु कृपा से जीवन जीने का श्रेष्ठ मार्ग हमें दिखाया है ।
392. हमारे ऋषियों ने समाज के विभिन्न लोगों को देखकर वर्ग बनाए और काम का विभाजन किया जो कि सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था पूर्वकाल में होती थी ।
393. हमारी बुद्धि ज्यादा-से-ज्यादा प्रभु के चिंतन में लगनी चाहिए ।
394. प्रभु की प्राप्ति हेतु जीवन में निरंतर सावधान रहना चाहिए और साधन भी करना चाहिए और प्रयास भी करना चाहिए ।
395. प्रभु प्राप्ति के लिए जीवन में निरंतर जागरूकता रखना, इसे शास्त्रों ने तप बताया है ।
396. हमारे भीतर माफ करने की वृत्ति यानी क्षमाशीलता और सहन करने की वृत्ति यानी सहनशीलता होनी चाहिए ।
397. हमें जीवन में शांत रहने की आदत डालनी चाहिए और सरलता और सादगी से जीवन जीना चाहिए ।
398. ज्ञान की आराधना जरूरी है और इसमें सबसे बड़ा ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान होता है, जिसकी आराधना करना परम आवश्यक होता है ।
399. हमारे शास्त्रों के श्रेष्ठ टीकाकार कभी नहीं कहते कि यह बात हमने लिखी है, वे कहते हैं कि जो शास्त्रों में दर्ज है वही हमने बताया है ।
400. अध्यात्म हमें सिखाता है कि क्या-क्या जीवन में सहना चाहिए और क्या-क्या जीवन में कभी नहीं सहना चाहिए, इसका विवेक हमें अध्यात्म देता है ।
401. स्वामी श्री विवेकानंदजी व्यक्तिगत आलोचना को सहनशीलता से सह लेते पर भारत माता, भारतीय वेदजी, भारतीय ऋषियों पर कोई गलत बोलता तो वे उबल पड़ते । हमारी वृत्ति एकदम उल्टी होती है क्योंकि हम खुद के बारे में गलत सुनने पर उबल पड़ते हैं पर भारतीय संस्कृति पर कोई गलत बोले तो हमारे रोंगटे खड़े नहीं होते । यह फर्क है साधारण मनुष्य में और महापुरुषों में ।
402. भारत विश्व का आध्यात्मिक रूप से विश्वगुरु रहा है और सदैव रहने वाला है ।
403. भारतीय संस्कृति पर कभी हमला हो तो वह हमें कभी भी सहन नहीं करना चाहिए ।
404. जीवन में दक्षता यानी सावधानता होनी चाहिए, तभी हमारी विजय होती है ।
405. ज्ञान, कर्म और मोक्ष के ऊपर भक्ति का स्थान है । भक्ति इन सबका मुकुट स्वरूप है ।
406. मुक्ति से भी बहुत ऊँ‍चा स्थान भक्ति का है । मुक्त पुरुष, जिन्हें मोक्ष मिल गया, ऐसे संत भी भक्ति में रमते हैं और भक्ति में ही अपना जीवन बिताते हैं ।
407. जिस भक्ति का सहारा लेकर साधक प्रभु साक्षात्कार तक पहुँचते हैं वे उस भक्ति को फिर कैसे छोड़ सकते हैं क्योंकि वे भक्ति के महत्व को जीवन में देख चुके होते हैं ।
408. शास्त्र कहते हैं कि जो गौ-माता के प्रति समर्पित नहीं है और गौ-माता की सेवा नहीं करता, वह मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है ।
409. अपने स्वधर्म यानी निहित कर्म को करने वाले को शास्त्रों ने श्रेष्ठ माना है ।
410. अपनी योग्यता के अनुसार कर्म का चयन करने पर और उस कर्म को श्रेष्ठता से करने पर शास्त्रों ने बहुत जोर दिया है ।
411. अपने स्वधर्म को प्रभु की आज्ञा के रूप में स्वीकार करना चाहिए । जैसे आज्ञा पालन करने वाला सेवक स्वामी को प्रिय होता है वैसे ही प्रभु की आज्ञा मानने वाला और अपना स्वधर्म करने वाला प्रभु को प्रिय होता है ।
412. उत्तम भक्त वह होता है जो प्रभु के मनोरथ को जानकर और शास्त्रों की आज्ञा को मानकर उस अनुरूप अपने जीवन को ढ़ाल लेता है ।
413. अपने स्वधर्म और सत्कर्म के पुष्प प्रभु के श्रीकमलचरणों में हमें चढ़ाने चाहिए ।
414. साधारण पुष्प चढ़ाने से प्रभु को साधारण खुशी होती है पर सत्कर्म के पुष्प प्रभु को चढ़ाने पर प्रभु अति प्रसन्न होते हैं और प्रभु को अपार प्रसन्नता होती है ।
415. वैराग्य नहीं होने के कारण जीव संसार के दुःख में, लाचारी में और संसार के झंझटों में फंसा हुआ रहता है ।
416. जीवन के एक-एक सात्विक कर्म को कर्मफूल बनाकर प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पण कर देना चाहिए ।
417. जो हमारे प्रारब्ध में नहीं होता वह भी जब प्रभु की कृपा होती है तो स्वतः ही प्राप्त हो जाता है ।
418. जीवन में वैराग्य होने पर आध्यात्मिक उन्नति बहुत जोर की होती है ।
419. संत कहते हैं कि जीवन में शास्त्रोक्त सत्कर्म करने पर और उसके कर्मफल को प्रभु को अर्पण करने पर प्रभु की प्रसन्नता हमें मिल जाती है ।
420. अपने सभी सत्कर्म को प्रभु की पूजा मानकर करना चाहिए ।
421. थोड़े समय के लिए वैराग्य होना एक बात है पर जब प्रभु की कृपा होती है तो वैराग्य सिद्ध हो जाता है यानी वह वैराग्य कभी नष्ट नहीं होता ।
422. हमारा मन प्रभु के लिए साधन करने से कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए ।
423. भक्ति करने वाले साधक को प्रभु के अलावा संसार की किसी भी चीज में रस नहीं आता ।
424. संसार की आसक्ति गई तो संसार में रहकर भी संसार से मुक्त रहा जा सकता है ।
425. संसार से हम चिपकते हैं, संसार हमसे नहीं चिपकता । इसलिए संसार के मायाजाल से हमें ही निकलना पड़ेगा ।
426. जड़ (संसार) चेतन (जीव) को नहीं पकड़ सकता क्योंकि जड़ चेतन को पकड़ ही नहीं सकता । चेतन को चेतन ही पकड़ता है यानी जीव (चेतन) प्रभु (चेतन) की तरफ ही आकर्षित होता है ।
427. जैसे नारियल के गोले का जल सूखने पर वह घट अलग हो जाता है वैसे ही संसार करते हुए हमारे भीतर के संसार के सुख की भ्रांति खत्म हो जाए तो हम संसार से छूट जाते हैं ।
428. अपना स्वधर्म नित्य करना चाहिए, यह प्रभु का स्पष्ट मत है ।
429. शास्त्र कहते हैं कि हमारा उद्धार हमारे द्वारा किए सत्कर्म से ही होता है ।
430. प्रभु हमसे हमारा स्वधर्म करवाना चाहते हैं तभी प्रभु को प्रसन्नता होती है ।
431. हमारी आध्यात्मिक उन्नति भी धर्म पालन करने से ही ज्यादा होती है इसलिए धर्म का त्याग जीवन में कभी भी नहीं होना चाहिए ।
432. संसार से जाने से पूर्व हमने अपने सत्कर्म से प्रभु को कितना प्रसन्न किया, यह हमें देखना चाहिए ।
433. प्रभु ने जब हमें कोई कर्म दिया है तो उस कर्म को पूरा करने की योग्यता भी प्रभु ने ही दी है ।
434. भक्ति में स्थिरता का भाव हमें प्रभु तक पहुँचा देता है ।
435. भारतवर्ष में आध्यात्मिक उन्नति के कारण जीव को सदा से ही शांति का भाव प्रिय रहा है ।
436. जिन बच्चों में संस्कार के कारण अपने बड़ों की बात सुनने और मानने की आदत होती है वे सबसे सुखी रहते हैं ।
437. शास्त्रों में वर्णित प्रभु के श्रीवचनों को जीवन में स्वीकार करना और मानना चाहिए ।
438. स्वधर्म को शास्त्रों ने कामधेनु बताया है इसलिए निष्ठा से अपना स्वधर्म करना चाहिए ।
439. भक्ति करने से प्रभु की प्रसादी के रूप में ज्ञान और वैराग्य हमें मिलता है ।
440. शास्त्रों के अनुसार जीवन जीना सर्वोत्तम होता है, शास्त्र विहीन जीवन जीना हमें अशांति ही देता है ।
441. जीवन में प्रभु भक्ति को मुख्य रखते हुए संसार में विकल्पहीन होकर जीवन जीना श्रेष्ठ होता है । जितने ज्यादा संसार में विकल्प होंगे उतना हमारा भटकाव होगा और हमारा मन अशांत होगा ।
442. प्रभु की कृपा जब जीवन में होती है तभी सद्गुरुदेव हमें मिलते हैं ।
443. जिस अखंड आनंद की कामना हर मनुष्य करता है वह प्रभु कृपा से हमारे भीतर ही विद्यमान है यानी स्थित है और भक्ति करने से जागृत होता है ।
444. इंद्रियां मात्र माध्यम हैं जिससे हमारा मन अपनी इच्छा से काम करवाता है । इसलिए चंचल मन को नथना सबसे जरूरी है ।
445. साधन करते हुए जब समय बीतता है और हम साधन को समय देते हैं तभी वह साधन हमें फल देता है ।
446. जितना-जितना जीवन में सद्विचार हमारे भीतर प्रवेश करेंगे उतना-उतना हमारे जीवन के विकार कम होते जाएंगे ।
447. जिसे जीवन में कुछ भी नहीं चाहिए, केवल प्रभु ही चाहिए उसके लिए प्रभु की निष्काम भक्ति सबसे बड़ा माध्यम और साधन है ।
448. जीव की जब विशुद्ध बुद्धि होती है तो सिर्फ और सिर्फ उस विशुद्ध बुद्धि से ही प्रभु प्राप्ति का संकल्प जीवन में जागृत होता है ।
449. हमारी बुद्धि सिर्फ प्रभु के पीछे चलनी चाहिए, अन्य सभी कुछ का बुद्धि को त्याग कर देना चाहिए, यह भक्ति से ही संभव होता है ।
450. जिस प्रकार गाड़ी चलाने वाला सदैव सावधान रहता है वैसे ही साधक, जो प्रभु मार्ग पर चलता है, वह पूरी सावधानी से चलता है ।
451. सारे साधन करते हुए हमें प्रभु को याद करते रहना चाहिए क्योंकि साधन तत्काल तभी सफल होते हैं जब प्रभु की कृपा हमें मिलती है ।
452. भक्ति करने वाला साधक एकांत प्रिय और एकांत पसंद करने वाला जीव होता है ।
453. प्रभु हमारे भीतर हैं इसलिए प्रभु को भोग लगाकर और प्रभु को अर्पण करने का भोजन के समय नियम हो गया तो कभी भी रोग हमारे पास फटकेगा नहीं । ऐसा इसलिए होगा क्योंकि वह भोजन नहीं रहेगा बल्कि प्रभु को भोग लगने के बाद प्रसादी बन जाएगा ।
454. जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी अंधेरे को चीरते हुए चलते हैं वैसे ही साधक संसार के झंझटों को चीरते हुए प्रभु मार्ग पर चलता है ।
455. सच्चा साधक एक-एक विकारों से युद्ध करके उस पर विजय प्राप्त करके उनको अपने जीवन से खत्म करते हुए चलता है ।
456. भक्ति जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचती है तो प्रभु में विलीन हो जाने का मौका हमारे समक्ष उपस्थित कर देती है ।
457. भक्ति करने वाले साधक का स्वागत करते हुए प्रभु हृदय से उसका आलिंगन करते हैं ।
458. भक्ति करने पर प्रभु और भक्त के बीच में कोई दूरी नहीं रहती, कोई अंतर नहीं बचता ।
459. प्रभु से साक्षात्कार होने के बाद भी भक्त की भक्ति जारी रहती है ।
460. संसार के संगम से विजयी करवाने वाला साधन केवल भक्ति ही है ।
461. अन्य साधनों में पूर्णता नहीं है, केवल भक्ति में ही पूर्णता है इसलिए भक्ति से ही प्रभु मिलते हैं ।
462. प्रभु ने सभी श्रीग्रंथों में भक्ति का ही उपदेश प्रभु प्राप्ति के लिए दिया है ।
463. जीवन में प्रभु प्राप्ति का परम निश्चय मात्र और मात्र भक्ति से ही जागृत होता है ।
464. हमें कोई भी सत्कर्म करना चाहिए तो उसे प्रभु के लिए ही करना चाहिए तब वह सत्कर्म प्रभु प्राप्ति का साधन बन जाता है ।
465. ज्ञान हमें प्रभु के बारे में बताता है पर प्रभु की प्राप्ति सिर्फ और सिर्फ भक्ति से ही संभव होती है ।
466. जैसे सद्गुरु के अनेक शिष्य होते हैं पर उत्तराधिकारी एक ही होता है वैसे ही साधन अनेक हैं पर सबसे श्रेष्ठ भक्ति ही है ।
467. प्रभु की प्राप्ति के लिए केवल भक्ति के साधन की ही आवश्यकता होती है ।
468. जो मन, कर्म, शरीर और वाणी से प्रभु में लग गया यानी प्रभु का आश्रय जीवन में ले लिया तो प्रभु उसके संरक्षण हेतु तैयार रहते हैं ।
469. प्रभु के पास आने के बाद जीव सदैव के लिए सुरक्षित हो जाता है ।
470. प्रभु सरल मार्ग बताते हैं कि अपना कर्म करते चलो और साथ-साथ मेरा स्मरण करते चलो ।
471. प्रभु का स्मरण करने से आने वाली सभी आपत्ति को प्रभु टाल देते हैं ।
472. प्रभु जीव से आह्वान करते हैं कि एक मेरी शरणागति ले लो ।
473. शरणागति के चार आयाम होते हैं । पहला, शरीर से प्रभु की सेवा । दूसरा, वाणी से प्रभु का नाम-कीर्तन और भजन । तीसरा, चित्त से प्रभु का चिंतन और ध्यान । चौथा, सदा सर्वदा यह भाव कि मैं केवल प्रभु का ही हूँ ।
474. भक्त की कीर्ति जगत में फैलती है तो प्रभु सबसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं ।
475. जिसने श्रीमद् भगवद् गीताजी का चिंतन और पठन किया उसे वह रत्न प्राप्त होता है जिसकी खोज वह जन्मों-जन्मों से कर रहा था ।
476. प्रभु अपना विचार बताकर फिर हमें स्वतंत्र कर देते हैं कि अपनी इच्छा से जो करना है वह करो ।
477. संपूर्ण शास्त्रों का सार श्रीमद् भगवद् गीताजी है और पूरी श्रीमद् भगवद् गीताजी का सार अठारहवाँ अध्याय का शरणागति वाला श्लोक है जो अंत में प्रभु ने श्री अर्जुनजी को बताया है ।
478. जीव विषय के बिना नहीं रह सकता, वह कुछ-न-कुछ देखेगा, सुनेगा इसलिए प्रभु कहते हैं कि सब कुछ का विषय मुझे बना लो ।
479. दृष्टि से हमें प्रभु का दर्शन करना चाहिए, जिह्वा से प्रभु का नाम उच्चारण करना चाहिए, हाथों से प्रभु की सेवा करनी चाहिए, कानों से प्रभु की कथा सुननी चाहिए यानी सभी व्यवहार प्रभु से ही होना चाहिए ।
480. अंतरंग में चिंतन करना चाहिए कि मेरे एकमात्र अवलंबन प्रभु ही हैं ।
481. प्रभु कहते हैं कि मेरी कृपा मेरे सच्चे भक्तों को जीवन में सदैव मिलती रहती है ।
482. प्रभु कहते हैं कि सर्वप्रथम अपने प्रिय भक्तों को दर्शन देने और फिर पापियों का विनाश करने के लिए मैं अवतार लेता हूँ ।
483. एक भक्त दूसरे भक्त से मिलने के लिए सदैव लालायित रहता है जिससे प्रभु की चर्चा और गुणानुवाद हो सके ।
484. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु अंतिम अध्याय में न ज्ञान की बात करते हैं, न कर्मयोग की बात करते हैं । प्रभु गुह्यतम ज्ञान बताते हैं जो शरणागति का है ।
485. प्रभु कहते हैं कि किसी भी पदार्थ, कामना या आसक्ति को प्रभु से जोड़ दें तब वह हमारा मंगल करने वाला बन जाता है ।
486. प्रभु कहते हैं कि सर्वत्र मेरा दर्शन करो, सभी के अंदर मैं हूँ और मेरे को सभी के अंदर देखते हुए प्रणाम करो और सभी के साथ विनम्रता का व्यवहार करो । प्रभु कहते हैं कि ऐसा करना मेरे भक्त का स्वभाव हो जाना चाहिए ।
487. किसी भी विषय को देखकर हमें प्रभु का स्मरण हो जाना चाहिए जैसे श्रीगोपीजन को वायु का स्पर्श पाकर भी लगता था कि यह वायु मेरे प्रभु को छूकर आ रही है ।
488. भक्त जिधर भी देखता है उसको प्रभु के ही दर्शन होते हैं और प्रभु की निरंतर याद बनी रहती है ।
489. भक्त जीते जी प्रभु से मिला हुआ होता है तो मृत्यु के बाद प्रभु को छोड़कर और कहां जाएगा ? उसका अंतिम गंतव्य प्रभु का धाम होता है ।
490. श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि मैं अपनी शपथ नहीं, अपने से भी प्रिय अपने भक्त की शपथ लेकर कहता हूँ कि मेरे भक्त से प्रिय मुझे कोई भी नहीं है ।
491. भक्त की प्रतिज्ञा बचाने के लिए प्रभु अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ने में कतई संकोच नहीं करते ।
492. प्रभु अपने भक्त के इतने अधीन होते हैं कि प्रभु अपना प्रभुत्व भी भुला देते हैं ।
493. भक्त और भगवान का अदभुत रिश्ता होता है । प्रभु भक्त के लिए समर्पित होते हैं और भक्त प्रभु के लिए समर्पित होता है ।
494. श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि बाकी सब कुछ भूल जाओ केवल मेरे से प्रेम करो, यही श्रीमद् भगवद् गीताजी का गुह्यतम रहस्य है ।
495. प्रभु कहते हैं कि सब धर्म के झंझटों को छोड़ो, ज्ञान के, कर्म के चक्कर में मत फंसो, सीधे मेरे पास आना है तो मेरी शरण में आ जाओ । सब कुछ का जीवन से विसर्जन कर दो, बस मेरी शरणागति को पकड़कर रखो ।
496. प्रभु कहते हैं कि अनन्य रूप से मेरी शरणागति स्वीकार कर लो ।
497. भक्त का अंत में प्रभु से मिलना एक अनिवार्य सत्य है, जो होकर ही रहता है ।
498. संत पूछते हैं कि प्रभु के अतिरिक्त कौन-सा आश्रय जीव को संभाल सकता है । प्रभु की शरणागति के अलावा कोई नहीं जो जीव का मंगल कर सकता है ।
499. प्रभु से एकाकार होने पर जीव परिपूर्ण हो जाता है ।
500. श्रीमद् भगवद् गीताजी के अंत में प्रभु आश्वासन के श्रीनेत्रों से श्री अर्जुनजी को और श्री अर्जुनजी भक्ति जल से भीगे नेत्रों से प्रभु को निहारते हैं, ऐसा संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं ।
501. जब श्रीमद् भगवद् गीताजी के पूरे उपदेश के बाद प्रभु ने श्री अर्जुनजी का आलिंगन किया तो समय की गति रुक गई, ऐसा संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं ।
502. भक्ति के रसास्वादन के लिए भक्त और भगवान दोनों ही लालायित रहते हैं ।
503. श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि जितना सुना वह सब भूल जाओ, आगे कुछ सुनने की इच्छा भी त्याग दो, सिर्फ मेरी शरणागति लेकर रहो । प्रभु आगे कहते हैं कि बिना किसी डर के मेरे शरण में आ जाओ और मेरे बनके रहो ।
504. दो जगह प्रभु शरणागति की बात कहते हैं - श्रीमद् भगवद् गीताजी के अंत में श्री अर्जुनजी से और श्रीमद् भागवतजी महापुराण के अंत में श्री उद्धवजी से संवाद में भी प्रभु यही बात कहते हैं ।
505. प्रभु भक्त का मार्गदर्शन करते हुए कहते हैं कि मेरा नाम जप करो, कीर्तन-भजन करो और मेरी श्रीलीलाओं में मन से विहार करो ।
506. प्रभु की श्रीमद् भगवद् गीताजी में शरणागति का उपदेश एक ब्रह्मवाक्य है, ऐसा संत मानते हैं ।
507. श्री वेदजी और श्रुतियों की सब तक पहुँच नहीं है इसलिए श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में प्रभु ने एक नया अवतार इन शास्त्रों को दे दिया जिससे कि यह सबकी पहुँच में आ जाए ।
508. संतों से जब कोई पूछता है कि कौन-से श्रीग्रंथ से मेरे संशय मिट जाएंगे तो संत कहते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीताजी पढ़ो, सभी संशय प्रभु कृपा से मिट जाएंगे ।
509. संत श्री ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि जैसे गौ-माता अपने बछड़े के लिए दूध देती है वैसे ही प्रभु अपने भक्त के लिए श्रीमद् भगवद् गीताजी में सूत्र देते हैं ।
510. संतों ने श्रीमद् भगवद् गीताजी का अध्ययन करना और इसका उपदेश दूसरे लोगों के कल्याणार्थ देना एक बहुत बड़ा तप बताया है ।
511. प्रभु अपने श्रीहाथों को उठाकर घोषणा करते हैं श्रीमद् भगवद् गीताजी का श्रवण या पठन करने वाला भक्त अंत में मुझसे ही आकर मिलता है ।
512. प्रभु को प्रसन्न करने के लिए और प्रभु के प्रिय होने का प्रयास अगर करना है तो श्रीमद् भगवद् गीताजी पढ़ने का व्रत जीवन में लेना चाहिए ।
513. संत कहते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीताजी जो पढ़ेगा उसका कल्याण, जो सुनेगा उसका कल्याण और जो पढ़ाएगा उसका कल्याण सुनिश्चित है ।
514. श्रीमद् भगवद् गीताजी का पाठ करने वाला, प्रवचन करने वाला, प्रवचन सुनने वाला - तीनों को एक ही फल मिलता है और वह है मोक्ष क्योंकि इससे छोटा कोई दूसरा प्रसाद प्रभु के पास है ही नहीं ।
515. संत कहते हैं कि प्रभु से प्रेम करने का सबसे बढ़िया उपाय श्रीमद् भगवद् गीताजी का पठन, श्रवण और दूसरों को श्रीमद् भगवद् गीताजी का श्रवण करवाना है ।
516. पूरे श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश सुनने के बाद श्री अर्जुनजी ने प्रभु से कहा कि आपने मुझे बचा लिया, नहीं तो मेरा जीवन नष्ट हो जाता । आपने मुझे कृतकृत्य कर दिया । मैं अपने साढ़े तीन हाथ के शरीर में फंसा था, आपने मुझे निकाल लिया । अब मैं समझ गया कि मैं शरीर नहीं हूँ, चेतन हूँ । अब मैं समझ गया कि चेतन स्वरूप आपसे ही मेरा एकमात्र संबंध है ।
517. प्रभु की श्रीमद् भगवद् गीताजी रूपी अदभुत वाणी का अदभुत प्रभाव श्री अर्जुनजी पर हुआ ।
518. श्री संजयजी से धृतराष्ट्र ने पूछा कि कौन जीतेगा ? श्री संजयजी ने भव्य उत्तर दिया कि यह कोई पूछने की बात नहीं है क्योंकि जिस तरफ योगेश्वर प्रभु श्री कृष्णजी होंगे उसी की विजय होना एक अनिवार्य सत्य है । यह सिद्धांत है कि जहाँ प्रभु खड़े रहते हैं उस पक्ष में विजयश्री, अष्ट लक्ष्मी और जीवन के सौंदर्य का आना अनिवार्य होता है ।
519. संत श्री ज्ञानेश्वरजी ने प्रभु से प्रसाद मांगा कि जीव में प्रभु के भजन करने की इच्छा का निर्माण हो, जीव की प्रभु भक्ति सुदृढ़ हो और जीव की प्रभु भक्ति अखंड रहे ।
520. जिन लोगों ने श्रीमद् भगवद् गीताजी को अपना मार्गदर्शक बनाया है उनके जीवन का इहलोक और परलोक प्रभु की कृपा से पहले ही सुधर गया और उनकी सद्गति पहले ही सुनिश्चित हो गई ।
521. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की शरणागति लेकर हमें जीवन में अभय होकर जीवन को जीना चाहिए ।
522. शास्त्र चित्त की शुद्धि को बहुत महत्व देते हैं । चित्त शुद्ध होने पर सात्विक भाव हमारे भीतर आता है और हम अंदर-बाहर से पवित्र हो जाते हैं ।
523. शास्त्र कहते हैं कि संसार में ज्ञानी तो बहुत हैं पर आध्यात्मिक दृष्टि से ज्ञानी होना सबसे जरूरी बात है ।
524. शास्त्र कहते हैं कि स्वयं की इंद्रियों पर संयम होने पर हम भक्ति मार्ग में बहुत जल्दी सफल हो सकते हैं ।
525. शास्त्र जीवन में सत्कर्म करने के लिए और परोपकार करने के लिए आग्रही हैं ।
526. शास्त्र कहते हैं कि मन, वाणी और आचरण में सरलता होनी चाहिए क्योंकि ऐसे स्वभाव वाला व्यक्ति प्रभु को बहुत प्रिय होता है ।
527. प्रभु को अहिंसा पालन करने वाला और सत्य बोलने वाला जीव अति प्रिय होता है ।
528. शास्त्र कहते हैं कि हमें अक्रोधी होना चाहिए यानी क्रोध रहित होना चाहिए ।
529. शास्त्र आदेश करते हैं कि हमें शांत रहने वाला बनना चाहिए, दयाशील होना चाहिए और कोमल हृदय वाला बनना चाहिए ।
530. शास्त्र आज्ञा करते हैं कि गलती होने पर हमें लज्जा का अनुभव होना चाहिए ।
531. हमारे व्यवहार में चंचलता नहीं होनी चाहिए ।
532. जीव में क्षमा होनी चाहिए क्योंकि क्षमाशीलता बहुत बड़ा सद्गुण है ।
533. जीव को सबसे प्रेम करने वाला बनना चाहिए ।
534. जीव को छोटा बनकर जीवन में रहना चाहिए । इससे प्रभु की कृपा बहुत जल्दी मिलती है ।
535. साधक को एकांत सेवी होना चाहिए ।
536. शास्त्र कहते हैं कि हमें अमानी होना चाहिए यानी मान रहित होना चाहिए और दिखावा नहीं करने वाला बनना चाहिए ।
537. शास्त्र आदेश देते हैं कि दंभ (आडंबर, पाखंड वाला), दर्प (घमंड, अपना बड़प्पन मानने वाला) और अभिमान (स्वयं को श्रेष्ठ मानने वाला अहंकारी) प्रभु को कदापि प्रिय नहीं होता ।
538. अज्ञान में रहने वाला, झूठ बोलने वाला और अहंकारयुक्त जीव कभी भी अपना मानव जीवन सफल नहीं कर पाता ।
539. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु द्वारा बताए दैवी गुण हमें अपने भीतर विकसित करने चाहिए ।
540. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु द्वारा बताए आसुरी गुण का हमें त्याग करना चाहिए । जितनी जल्दी हम उनका त्याग करेंगे उतना हमारा मंगल जल्दी होगा ।
541. संपूर्ण भारतीय संस्कृति के दर्शन कराने वाले दो श्रीग्रंथ हैं - श्री रामायणजी और श्री महाभारतजी ।
542. चारों पुरुषार्थों का प्रतिपादन करने वाले दो श्रीग्रंथ हैं - श्री रामायणजी और श्री महाभारतजी ।
543. श्री रामायणजी में प्रभु श्री रामजी की श्रीचरित्र रूपी कथा है । श्री महाभारतजी में प्रभु श्री कृष्णजी की मूलतः कथा है । श्रीमद् भागवतजी महापुराण मूलतः श्रीहरि कथा है और वहाँ पर सभी श्रीहरि अवतार वर्णित हैं जिसमें श्रीकृष्ण अवतार की प्रधानता है ।
544. श्री महाभारतजी प्रभु श्री कृष्णजी की मूल कथा है । प्रभु श्री कृष्णजी को संपूर्ण रूप से जानना है तो श्री महाभारतजी का अवलोकन अवश्य करना पड़ेगा ।
545. श्री महाभारतजी से युक्ति सीखनी चाहिए जो जीवन में हमें विजय दिलाती है ।
546. संत कहते हैं कि नीति श्री रामायणजी से सीखनी चाहिए, युक्ति श्री महाभारतजी से सीखनी चाहिए और भक्ति और मुक्ति कैसे हो यह श्रीमद् भागवतजी महापुराण से सीखना चाहिए ।
547. ज्ञान, कर्म, योग और भक्ति में भक्ति सबसे महत्वपूर्ण है । श्री महाभारतजी की मुख्य शिक्षा भक्ति रखते हुए कर्मयोगी बनना है ।
548. गृहस्थ आश्रम को सर्वोत्तम आश्रम माना गया है । इस गृहस्थ आश्रम में रहते हुए युक्ति से मुक्ति करा देने वाला श्रीग्रंथ श्री महाभारतजी है ।
549. प्रभु श्री कृष्णजी के बारे में बताने वाला सर्वोत्तम श्रीग्रंथ श्री महाभारतजी है । इसलिए इसे संत श्री कृष्णवेद कहते हैं जिसे पंचम वेदजी भी माना गया है ।
550. समस्त श्रीवेदों का एकत्रित रूप श्री महाभारतजी में देखने को मिलता है ।
551. जीवन में पुरुषार्थ लाना है तो श्री महाभारतजी का श्रवण और चिंतन सर्वदा करना जरूरी है ।
552. श्री महाभारतजी में जीवन के हर पहलू का ज्ञान मिलेगा । अच्छे-से-अच्छे चरित्र मिलेंगे और बुरे-से-बुरे चरित्र भी मिलेंगे ।
553. श्री महाभारतजी का सिद्धांत है कि अच्छे-से-अच्छे व्यक्ति में भी कुछ बुराई जरूर होती है और बुरे-से-बुरे व्यक्ति में भी कुछ अच्छाई अवश्य होगी ।
554. जीवन में किसी भी व्यक्ति की तुलना करने वाला एक चरित्र श्री महाभारतजी में अवश्य मिलेगा ।
555. सभी मनुष्य प्रवृत्ति का जीवंत दर्शन श्री महाभारतजी में हमें मिलता है ।
556. मानव जीवन में आने वाले हर प्रसंग की झलक हमें श्री महाभारतजी में मिलती है और उस प्रसंग में प्रभु श्री कृष्णजी का क्या निर्णय रहा, यह हमें जरूर समझना चाहिए और उसे अपने जीवन में उतारना चाहिए ।
557. श्री महाभारतजी का श्रवण करने वाले को सही समय में सही बुद्धि से सही निर्णय लेने की क्षमता मिल जाती है ।
558. संतों ने श्री महाभारतजी को विवेक के वृक्षों का महावन बताया है यानी जो श्री महाभारतजी का चिंतन करेगा वह विवेक से भर जाएगा, उससे कोई गलती नहीं होगी ।
559. भक्ति शास्त्र, समाज शास्त्र, राजनीतिक शास्त्र और दर्शन शास्त्र का जनक श्रीग्रंथ श्री महाभारतजी को माना गया है ।
560. हमें प्रभु श्री वेदव्यासजी का ऋणी रहना चाहिए कि उन्होंने सर्वोच्च रचना श्री महाभारतजी की करके हमें उपलब्ध कराई है ।
561. प्रभु श्री वेदव्यासजी जगतगुरु हैं, व्यासगुरु हैं और उनकी लिखी हुई रचना कल्पतरु के समान है यानी हमारे सभी मनोरथ को पूर्ण करने में सक्षम है ।
562. श्री महाभारतजी का चिंतन और श्रवण और नियमित पठन हमारे भीतर शील, पुरुषार्थ, कर्तव्य और निष्ठा भर देती है ।
563. संत कहते हैं कि कौरव-पांडव की कथा तो महाभारत में एक माध्यम है हम तक गहन उपदेशों को पहुँचाने के लिए ।
564. श्री महाभारतजी को संतजन एक जीवंत ज्ञानकोष के रूप में देखते हैं जिसमें कि असंख्य विषयों का और व्यक्तियों के चरित्रों का उन्हें पता चलता है ।
565. भक्ति मार्ग में श्रवण को बहुत अधिक महत्व दिया गया है क्योंकि जो सुनने वाला होता है वह एक साथ बहुत सारे श्रीग्रंथों का सार श्रवण करके जान लेता है ।
566. पूर्व काल में भी हमारे ऋषियों और मुनियों को श्रीग्रंथों के श्रवण का बहुत आकर्षण रहता था ।
567. प्रभु की कृपा से ही अनुकूलता की वर्षा हमारे जीवन में होती है ।
568. जिसको धर्म का पालन नहीं करना होता वह कैसा भी व्यवहार कर सकता है पर धर्म पालन करने वाला सदैव जीवन में धर्म की मर्यादा वाला व्यवहार ही करता है ।
569. शास्त्रों में धर्म के नियम पालन करने की सबके लिए अनिवार्यता बताई गई है ।
570. जिस साधक में प्रभु की भक्ति दृढ़ होती है उसके भीतर ज्ञान के सभी सिद्धांत स्वतः ही आकर स्थापित हो जाते हैं ।
571. शास्त्र कहते हैं कि जिसने जीवन में क्रोध को जीत लिया उसने मानो सौ यज्ञों के फल से अधिक लाभ कमा लिया ।
572. जिसने जीवन में निंदा सहने का प्रण ले लिया वह जीवन में बहुत ऊँ‍चा उठता चला जाता है ।
573. जिसने आलोचना सहने की अपनी क्षमता बढ़ा ली वह जीव सदा जीत में ही रहता है ।
574. शांति से प्रतिकूलता सहने वाले के पुण्य कभी नष्ट नहीं होते ।
575. संत कहते हैं कि सारे संसार से परिचय करने का प्रयास छोड़ देना चाहिए और आत्मतत्व यानी प्रभु से परिचय का प्रयास करना चाहिए ।
576. यह भारतवर्ष का गौरव रहा है कि प्रभु साक्षात्कार से युक्त भक्त से कभी भी भारत भूमि विहीन नहीं हुई है यानी प्रभु साक्षात्कार से युक्त भक्त का कभी भी भारतवर्ष में अभाव नहीं हुआ है ।
577. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु हर जीव के कर्म को संभाल कर रखते हैं और निश्चित समय उसका फल देते हैं ।
578. हमारे कर्मों का फल हमेशा प्रभु की आज्ञा से हमारे जीवन में फलीभूत होता है ।
579. राजा श्री ययाति अपना अनुभव बताते हैं कि पांचों इंद्रियों से जितना उपभोग करते हैं उतना मन अशांत होता चला जाता है । राजा श्री ययाति कहते हैं कि सुख का मार्ग भोग भोगना नहीं, भोगों से संयम करना है । यही बात जीवन के सूत्र के रूप में शास्त्र भी हमें बताते हैं ।
580. भोग में लिप्त रहने से भोग भोगने की इच्छा का कभी विनाश नहीं होता अपितु भोग भोगने की इच्छा बढ़ती ही चली जाती है ।
581. शास्त्र कहते हैं कि संसार में जितने भी पदार्थ हैं वह एक व्यक्ति के मन को भी तृप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है । ऐसा इसलिए क्योंकि मन कभी तृप्त नहीं होता ।
582. हमारे शरीर की तृप्ति हो सकती है क्योंकि शरीर की जरूरत बहुत कम होती है पर मन की तृप्ति कभी संभव नहीं क्योंकि मन की वासनाएं बहुत ज्यादा होती है ।
583. मन को कितना भी प्राप्त होने पर मन की एक विशेषता है कि यह कभी भी भरता नहीं यानी तृप्त नहीं होता ।
584. संतोष धन के सामने संसार के सब धन धुली समान हैं, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
585. हमारा मन किसी भी वस्तु से तृप्त नहीं होता, केवल संतोष जीवन में होने पर ही मन की तृप्ति संभव है ।
586. सुखी होने के दो सूत्र शास्त्र हमें देते हैं कि तन से संयम का अभ्यास करना चाहिए और मन में संतोष धारण करना चाहिए ।
587. अपने पुण्यों का अपने मुँह से बखान करने पर पुण्यों का शीघ्र नाश हो जाता है, यह जीव के लिए एक बहुत बड़ा सूत्र है ।
588. हमारे तीर्थ में जो श्रीदेव विग्रह होते हैं उनका दर्शन पाप नाशक और पुण्य दायक होता है । इसलिए जीवन में उनके दर्शन जरूर करना चाहिए ।
589. हमारे जीवन में आचार तभी टिकते हैं जब हमारे विचार परिपक्व होते हैं ।
590. प्रभु श्री रामजी जब ऋषियों को दर्शन देने के लिए अपने वनवास काल में जाते तो मर्यादा का पालन करते हुए अपने धनुष की प्रत्यंचा उतार देते थे, यह विनय और सात्विकता का परिचय देने वाला प्रभु का व्यवहार होता था ।
591. शास्त्र कहते हैं कि संसार का हर प्राणी दो भाषा समझता है । एक, प्रेम की भाषा और दूसरी, संगीत की भाषा ।
592. संसार में ऐसा कोई नहीं जिसमें सद्गुण नहीं और ऐसा कोई नहीं जिसमें दोष नहीं हों । हमें यह देखना चाहिए कि हमारे में सद्गुणों की बहुलता हो और दुर्गुण कम-से-कम हों ।
593. भूमि, वनस्पति और नदी को देखने का अदभुत दृष्टिकोण भारतीय संस्कृति में है । भूमि को भारत माता बोला गया है, वनस्पति को तुलसी माता बोला गया है और नदी को गंगा माता बोला गया है ।
594. प्रभु को भोग लगाने के लिए घर में बने पदार्थ का कोई मूल्य नहीं होता क्योंकि भाव के कारण उसके मूल्य की गिनती संभव नहीं है ।
595. शास्त्र कहते हैं कि झूठ बोलने वाला बालक कभी पैदा नहीं होता । वह अपने घरवालों और दोस्तों के गलत आचरण को देखकर और उन्हें झूठ बोलते देखकर ही झूठ बोलना सीखता है ।
596. हमें अपने बच्चों के सद्गुणों से प्रेम होना चाहिए और उसके विकास करने में हमें अपना योगदान देना चाहिए ।
597. स्कूल की परीक्षा में उत्तीर्ण होना, जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण होना नहीं है । जीवन की परीक्षा बड़ी महत्वपूर्ण होती है, स्कूल की परीक्षा उसके सामने बड़ी गौण है ।
598. शास्त्र कहते हैं कि हमें अपने भीतर अहंकार और दूसरों से किसी भी चीज के लिए अपेक्षा का भाव नहीं रखना चाहिए ।
599. संपूर्ण मानव जीवन का एक सटीक चित्रण श्री महाभारतजी में मिलता है ।
600. रात-दिन जल में रहकर भी कमल सूखा का सूखा रहता है यानी जल उसे भिगो नहीं पाता । ऐसे ही संसार की मलिनता में रहते हुए भी हमें अपने सद्विचार को प्रभावित नहीं होने देना चाहिए ।
601. श्री रामायणजी और श्री महाभारतजी को संत भारतीय परंपरा के प्राण मानते हैं ।
602. शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह दूसरे की छोटी-सी-छोटी भूल को बड़ी करके देखता है और स्वयं की बड़ी-से-बड़ी भूल को एकदम नकार देता है ।
603. संसार के भोगों से कभी शांति प्राप्त नहीं हो सकती, शांति जब भी प्राप्त होगी संयम से ही होगी ।
604. जब समय आए तो आनंदपूर्वक और स्वेच्छा से वानप्रस्थ के जीवन को स्वीकारना सर्वश्रेष्ठ होता है ।
605. जीवन में कभी किसी चीज के लिए आग्रही नहीं बनना चाहिए कि यह चीज मुझे अभी चाहिए और जरूर चाहिए ।
606. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में लाचारी का भाव होने से वह हमारे आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को समाप्त कर देता है । इसलिए लाचारी का विचार जीवन में कभी नहीं आने देना चाहिए ।
607. प्रभु के सामने सदैव दीन बनके ही जाना चाहिए ।
608. संसार के विषयों के सामने हमारा मन कठोर होना चाहिए और प्रभु के सामने मन पिघलना चाहिए पर हमारा उल्टा ही होता है जो कि एकदम गलत है ।
609. किसी से भी कपट नहीं करना चाहिए क्योंकि हमारे द्वारा किया हुआ कपट प्रभु को बहुत दुःख देता है ।
610. अपनी जिह्वा को खाने-पीने और वाणी बोलने में संयम सिखाना चाहिए, नहीं तो हमारा पतन हो जाता है ।
611. शास्त्रों ने धन को जरूरी बताया है पर धन का उपयोग भोगों में नहीं बल्कि परोपकार में करना चाहिए ।
612. जो क्रोध में चिल्लाता है उसके पुण्य जलते हैं और जो क्रोध सह लेता है उसके पाप जलते हैं, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
613. शास्त्र कहते हैं कि क्रोध करने वाले पर क्रोध नहीं करना चाहिए, धोखा देने वाले को धोखा नहीं देना चाहिए । ऐसा करने पर हमारे पुण्य का कदापि नाश नहीं होता ।
614. संसार में अच्छे आचरण करने वाले का आचरण देखकर हमें भी सीखना चाहिए । महापुरुषों का व्यवहार ही हमारे लिए शिक्षा योग्य और ग्रहण योग्य होता है ।
615. ऐसी वाणी अपने मुँह से नहीं निकालनी चाहिए जिससे दूसरों को दुःख हो क्योंकि शब्दों के घाव से जीवन में कोई भी औषधि हमें ठीक नहीं कर सकती ।
616. दूसरों की तरफ देखते हुए हमारे में दया और मैत्री का भाव होना चाहिए ।
617. धन के दान से भी श्रेष्ठ श्रमदान, विद्यादान और समय के दान को बताया गया है ।
618. प्रभु ने मुझे जो दिया है वह मेरे लिए है, यह भाव नहीं होना चाहिए । भाव यह होना चाहिए प्रभु ने जो मुझे दिया है वह सबके लिए है ।
619. शास्त्र कहते हैं कि कठोर वाणी का प्रयोग किसी से नहीं करना चाहिए, अपनी वाणी से सबको आदर देना चाहिए ।
620. अपने द्वारा किए सत्कर्म और पुण्य का बखान अपनी वाणी से कभी भी नहीं करना चाहिए, इससे पुण्य तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।
621. शास्त्र कहते हैं कि मन को शांत रखने के लिए मन का नियंत्रण करना बहुत जरूरी है ।
622. शास्त्र इंद्रियों के नियंत्रण पर भी बहुत जोर देते हैं क्योंकि इंद्रियां हमसे पातक कार्य करवा देती हैं ।
623. शास्त्र कहते हैं कि गलत कर्म करने पर हमें आत्मग्लानि होनी चाहिए ।
624. जीव में सरलता प्रभु को अत्यंत प्रिय है । जीव में चतुराई प्रभु को प्रिय नहीं है ।
625. संसार के समस्त प्राणियों के लिए प्रभु के पास अनुकंपा और दया का भाव ही है ।
626. शास्त्र कहते हैं कि संतों का सम्मान होना चाहिए, ऐसा करने से हमारे पुण्य की वृद्धि होती है ।
627. जीवन में उग्रता होने पर वह हमारे भाग्य का नाश करती है । जीवन में सौम्यता हमारा भाग्योदय करती है ।
628. जिनका विनम्रता ही स्वभाव बन जाता है और बड़ों के सामने झुकना ही स्वभाव बन जाता है, वे प्रभु को बहुत प्रिय होते हैं ।
629. प्रभु की आज्ञा माने बिना जीव की संसार में कहीं भी गति नहीं है ।
630. हमें शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित कर्म को श्रद्धापूर्वक जीवन में करना चाहिए ।
631. हम कर्म करते वक्त शांति चाहते हैं मगर हमें अशांति मिलती है क्योंकि हम लौकिक और व्यावहारिक कर्मों की भरमार में फंसे हुए रहते हैं ।
632. शास्त्र कहते हैं कि भोग को भोगने से भोग इच्छा का नाश नहीं होता अपितु भोग शक्ति का ही नाश हो जाता है ।
633. संसार के भोग कभी भी हमें तृप्ति रूपी फल नहीं दे सकते ।
634. गलत मार्ग से आया धन हमारे जीवन में अशांति और पतन लेकर आता है ।
635. घर में आया हुआ धन धर्म के मार्ग से ही आना चाहिए ।
636. अपना कार्य स्वयं करने का अभ्यास हमें डालना चाहिए पर हम परावलंबी हो चले हैं ।
637. शास्त्र बड़े आग्रही हैं कि पाप की एक भी बात हमारे जीवन में नहीं रहनी चाहिए ।
638. जब हम जीवन में बुराई को रोक देते हैं तो हमारे भीतर की अच्छाई प्रबल हो जाती है ।
639. हमारे व्यवहार से किसी को जरा-सा भी कष्ट नहीं हो, इसका हमें सदैव ध्यान रखना चाहिए ।
640. परमार्थ के लिए पोषक गुणों का विकास हमें अपने भीतर करते रहना चाहिए ।
641. शास्त्र कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति या पदार्थ में हमें आसक्ति नहीं रखनी चाहिए तभी हम परमार्थ के मार्ग पर सफल हो पाएंगे ।
642. हमारा जीवन ईश्वर शरण जीवन होना चाहिए ।
643. साधक को सिद्धि और प्रसिद्धि से बचना चाहिए तभी वह भक्ति के मार्ग पर सफल हो पाएगा ।
644. शास्त्र कहते हैं कि दूसरों की उन्नति देखकर हमें ईर्ष्या नहीं होनी चाहिए, नहीं तो हमारा पतन हो जाता है । इसलिए दूसरों की उन्नति देखकर हमारे भीतर हर्ष का भाव होना चाहिए ।
645. अपनी जिह्वा को मीठा बोलने का अभ्यास करना चाहिए क्योंकि यह एक श्रेष्ठ गुण है ।
646. जीव का जीव के साथ कभी सनातन संबंध नहीं होता क्योंकि हर जन्म में यह संबंध बदलता रहता है ।
647. प्रभु की भक्ति करना जीवन का सबसे बड़ा लाभ है । इसलिए पूर्व में बड़े-से-बड़े राजा भी उत्तर अवस्था में राजकाज को छोड़कर भक्ति का तप करने के लिए वन में चले जाते थे ।
648. भारतीय संस्कृति में भक्ति को सबसे श्रेष्ठ स्थान दिया गया है ।
649. शास्त्र कहते हैं कि जन्म से कोई बुरा नहीं होता, कुसंगति के माध्यम से बुराई हमारे भीतर आती है ।
650. पाप करने वाला, पाप करवाने वाला, पाप का अनुमोदन करने वाला - सभी उस पाप के अंश को भोगते हैं ।
651. शास्त्रों का आग्रह है कि शरीर को स्वस्थ रखने के साथ-साथ मन को भी स्वस्थ रखना चाहिए ।
652. हमारे मन में सदैव उदार और पवित्र संकल्प ही जागृत होने चाहिए ।
653. शास्त्र कहते हैं कि एकाग्रता मन की एक आदत और एक अभ्यास बन जाना चाहिए ।
654. एकाग्र मन से किया कार्य थोड़े समय में अत्यधिक फल देता है । इसलिए एकाग्रता से भक्ति करनी चाहिए ।
655. शास्त्र कहते हैं कि हम एकाग्रता की शक्ति से परिचित नहीं हैं इसलिए उसका जितना अच्छा उपयोग किया जा सकता है, उतना हम नहीं करते ।
656. कितनी मर्यादा और शिष्टाचार प्राचीन भारत में रही है यानी हमारे अतीत में रही है, इसकी आज हम कल्पना भी नहीं कर सकते ।
657. शास्त्र कहते हैं कि सत्य को भी बड़े सुंदर तरीके से बोला जाना चाहिए ।
658. सारे संसार को हम मीठी वाणी बोलकर मित्र बना सकते हैं ।
659. श्री भीष्म पितामह को भीष्म नाम (भीषण प्रतिज्ञा करने के कारण) देवताओं ने अभिनंदन करते हुए दिया । श्री भीष्म पितामह ने भीष्म प्रतिज्ञा का पूरे जीवन पर्यंत इतनी कड़ाई से पालन किया कि आगे देश में भीष्म प्रतिज्ञा के नाम से एक मुहावरा प्रचलित हो गया ।
660. प्राचीन भारत सुरक्षा और स्वाभिमान से निपुण हुआ करता था । यह भारतवर्ष का गौरव रहा है ।
661. जो अपने माता-पिता की सेवा करता है उनको माता-पिता का दिया हुआ आशीर्वाद प्रभु कृपा से युक्त होता है । माता-पिता के दिए आशीर्वाद में प्रभु का बल होता है ।
662. भक्ति के अलावा अन्य सभी साधनों के फल शाश्वत नहीं होते, क्षणभंगुर होते हैं ।
663. हमें देखना चाहिए कि सच्चिदानंद स्वरूप प्रभु को प्राप्त करने की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं या पीछे होते जा रहे हैं ।
664. शास्त्रों का सिद्धांत है कि जो कर्म हम करते चले जाते हैं उसी समय उसके फल का निर्माण हम करते चले जाते हैं ।
665. कर्म करने का श्रेष्ठ मार्ग यह है कि कर्म करते हुए कर्मफल की इच्छा का त्याग कर देना चाहिए और कर्म को प्रभु को अर्पण कर देना चाहिए तो कर्मफल हमें कभी बांधते नहीं ।
666. जो कर्म प्रभु को अर्पित हो जाते हैं वह कर्म हमारे चित्त को शुद्ध करते हैं ।
667. कर्म करते समय भाव यह होना चाहिए कि इस कर्म का कर्ता मैं नहीं, कर्म प्रभु की शक्ति से हो रहा है और मैं कर्म के फल की कामना नहीं करता ।
668. कर्मफल तय करने का अधिकार जीव के पास नहीं है, यह प्रभु के श्रीहाथों में है ।
669. कर्म का कितना, कब, कहाँ और किस रूप में फल मिलेगा, यह प्रभु के श्रीहाथों में है, जीव के हाथों में नहीं ।
670. कर्मफल का कभी आग्रही नहीं होना चाहिए । कर्मफल प्रभु के अधीन होता है इसलिए अपने कर्मफल को प्रभु को अर्पित कर देना चाहिए ।
671. ऐसा कर्म जो फल की आशा नहीं रखता है वह मुक्ति का मार्ग होता है, वह कर्मफल हमें बांधने वाला या फंसाने वाला नहीं होता ।
672. कर्म प्रभु की इच्छा के लिए करना और कर्मफल को प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित कर देना, यह दो सिद्धांत जीवन में उतारने चाहिए ।
673. ग्रहों का अपना प्रभाव होता है पर जिन्होंने ग्रहों के मालिक प्रभु के श्रीकमलचरणों को पकड़ लिया उन पर ग्रह प्रभाव नहीं डालते ।
674. संतों की वाणी को असत्य का कभी स्पर्श तक नहीं होता ।
675. पुण्य आत्माओं के लिए जो प्रभु श्री धर्मराजजी हैं, वे ही पापियों के लिए प्रभु श्री यमराजजी हैं ।
676. तपस्या का सीधा अर्थ यह है कि अपने चित्त को प्रभु में लीन करने हेतु साधना । चित्त को प्रभु में एकाग्र करना ही तपस्या है ।
677. श्री चित्रगुप्तजी के पास जो लेखा-जोखा होता है वह दसों दिशाओं से और चौदह साक्षी के समक्ष का होता है और कोई भी हमारा कर्म वहाँ बच नहीं सकता ।
678. जीवन में प्रायश्चित कर्म अवश्य कर लेने चाहिए क्योंकि कोई ऐसा जीव जन्मा नहीं जिससे कभी प्रमाद नहीं हुआ हो ।
679. अहंकार के वशीभूत होकर जीव अपने जीवन के अच्छे अवसर को खो देता है ।
680. युवाओं के लिए कम-से-कम बारह घंटे काम करना अनिवार्य माना गया है और यह व्यवस्था ही उसे महानता प्राप्त कराती है ।
681. पुत्रों और पौत्रों द्वारा किए सत्कर्म पितर लोक में पितरों की कीर्ति और मान को बढ़ाते हैं ।
682. यज्ञों से देवतागण तृप्त होते हैं और श्राद्ध से पितरगण तृप्त होते हैं ।
683. सभी जीव पर दया भाव रखकर प्रभु सबको दया भाव से तृप्त करते हैं ।
684. कुछ चीजें असंभव होती है पर प्रभु कृपा से वह हमारे लिए संभव हो जाती है ।
685. श्री योगवासिष्ठजी का सिद्धांत है कि ऐसा कुछ भी नहीं जो प्रभु कृपा से हम जीवन में प्राप्त नहीं कर सकते ।
686. अपात्र और नास्तिक को कभी भी भक्ति का उपदेश नहीं करना चाहिए और ज्यादा समय उसके साथ भी नहीं बिताना चाहिए ।
687. मनुष्य की अंतिम गति धर्म से ही है और मनुष्य जीवन में विजय भी धर्म पर ही टिकी है ।
688. हमें परिवार में राय देनी चाहिए मगर यह आग्रह नहीं रखना चाहिए कि कोई उसे माने । फिर जरूरत के समय दोबारा राय देनी चाहिए ।
689. पुत्र प्रेम के कारण अपने पुत्र के गलत आचरण को शुरू से नियंत्रण नहीं करना, यह एक बहुत बड़ा अपराध होता है जो धृतराष्ट्र ने किया ।
690. धर्म स्थापना के कार्य के लिए प्रभु श्री कृष्णजी ने जिन पांडवों का चयन किया वे अदभुत होने ही थे क्योंकि प्रभु ने उनका चुनाव किया था ।
691. प्रभु जिस जीव से अदभुत कार्य करवाना चाहते हैं उन्हें अपनी अदभुत शक्ति का अंश पहले ही दे देते हैं ।
692. प्रभु ने देवताओं से आकाशवाणी करवाई और कंस को सचेत किया और अष्टम गर्भ से मृत्यु की बात उसे बता दी । पर प्रभु का अष्टम गर्भ से जन्म कंस रोक नहीं पाया । जब प्रभु की श्रीलीला होती है तो प्रभु को कोई नहीं रोक सकता ।
693. संसार के सभी जीव संसार के दुःख से मुक्ति के आकांक्षी होते हैं जो प्रभु अनुग्रह से ही संभव होता है ।
694. कर्म हमें पतन की ओर भी ले जा सकता है । इसलिए कर्म प्रभु के लिए, प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित करके और जो फल मिले उसे प्रभु प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिए ।
695. शास्त्र कहते हैं कि हम प्रभु को वाणी से तो अर्पण करते हैं पर अपने कर्म को मन से अर्पण नहीं कर पाते ।
696. हमें अपने शरीर, वाणी और मन से किए सभी कर्मों के स्वरूप को प्रभु को अर्पण करना चाहिए ।
697. शरीर से हमें प्रभु के लिए कर्म करने चाहिए जैसे हाथों से पूजा, पैरों से प्रभु की परिक्रमा, आँखों से प्रभु के दर्शन ।
698. हमें वाणी से प्रभु हेतु कर्म करना चाहिए जैसे वाणी से प्रभु का नाम जप, भजन-कीर्तन इत्यादि ।
699. अपनी पात्रता के अनुसार हमें अपने लिए साधन मार्ग का चुनाव करना चाहिए ।
700. प्रभु प्रेम का स्वरूप ऐसा होता है कि साधक अपने दुःख-सुख को केवल प्रभु के साथ ही बांटता है ।
701. भक्ति के दान से बड़ा कोई दान नहीं क्योंकि भक्ति के दान से जीव का जीवन में उद्धार हो जाता है ।
702. जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाए वैसे ही प्रभु के लिए जीवन में समय भी बढ़ाते चलना चाहिए ।
703. बुजुर्गों के पास ज्ञान के साथ अनुभव होता है जो अनमोल होता है जो उन्हें युवा पीढ़ी को धरोहर के रूप में देना चाहिए ।
704. हमारा जीवन किसी से भी पक्षपात रहित और पूर्ण स्वच्छ होना चाहिए ।
705. प्रभु की कृपा होती है तो जीव निरंतर यश और कीर्ति को प्राप्त करता है ।
706. पांडवों के जीवन में प्रभु की कृपा पग-पग पर उन्हें मिली, यह उनके जीवन की सबसे बड़ी जीत थी ।
707. बच्चों का शरीर शुद्ध होना चाहिए, भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी सहने की आदत उनमें होनी चाहिए ।
708. माता-पिता को अपने बच्चों की गलती पर आँखों पर पट्टी नहीं बांधनी चाहिए ।
709. बच्चों को अच्छे संस्कार जीवन में देना माता-पिता का प्रथम कर्तव्य होना चाहिए ।
710. अच्छे संस्कार ग्रहण करने के लिए विवेक की आँखें खोलकर देखना और कान खोलकर सुनना ही पर्याप्त होता है ।
711. भक्ति का साधन जिसने किया है ज्ञान के सूत्र स्वतः ही उनकी बुद्धि में आकर रम जाते हैं ।
712. बचपन में बच्चों को दिए हुए संस्कार जवानी में उनके लिए मार्गदर्शन का काम करते हैं ।
713. कुछ लोगों में गलत संस्कार के कारण गलतियां इतनी स्वाभाविक हो जाती हैं कि उनके ध्यान में ही नहीं आता कि वे कुछ गलत कर रहे हैं या गलत बोल रहे हैं ।
714. जैसी बातों का हम श्रवण करते हैं वैसा ही भाव हमारे भीतर बनता चला जाता है ।
715. पांडवों का स्वभाव बन गया था कि जो कुछ भी करेंगे बड़ों से पूछकर या उन्हें बताकर ही करेंगे ।
716. शास्त्र कहते हैं कि संसार में सभी दुर्जन नहीं होते और सभी सज्जन भी नहीं होते ।
717. श्री महाभारतजी विवेक जागृति वाला श्रीग्रंथ है कि किस परिस्थिति में क्या-क्या विवेक रखकर हमें कर्म करना चाहिए ।
718. शास्त्र कहते हैं कि सक्षम गुरु मिट्टी को सोना बना देता है और अकुशल गुरु सोना को मिट्टी भी कर देता है ।
719. अपनी भारतीय परंपरा के प्रति हमारी पूर्ण निष्ठा होनी चाहिए ।
720. धर्म का नियंत्रण सबके ऊपर होता है क्योंकि धर्म से ऊपर कोई नहीं है ।
721. अपने पवित्र आचार-विचार के कारण संतों को और ब्राह्मणों को पूज्यता का अधिकार शास्त्रों ने दिया है ।
722. हमारे उपयोग में आने वाली वस्तु के उपयोग से पहले उसका एक हिस्सा दान करना श्रेष्ठतम दान माना गया है । हमारे काम नहीं आने वाली निरर्थक वस्तु का दान गलत है ।
723. साधु की परीक्षा मृत्यु बेला पर, क्षत्रिय की परीक्षा युद्ध भूमि में और स्त्री की परीक्षा गरीबी में होती है, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
724. उदार लोगों की भाषा भी बहुत उदार होती है ।
725. श्री अर्जुनजी अपने व्यवहार से जीवन में सबको जीतते गए और प्रभु श्री कृष्णजी को भी सम्मोहन कर दिया और प्रभु ने भी मित्रता हेतु उन्हें चुना ।
726. शास्त्र कहते हैं कि बहुत बड़े पाप-पुण्य का फल तीन दिन में मिलता है, उससे थोड़ा कम पाप-पुण्य का फल तीन पक्ष में मिलता है, उससे कम पाप-पुण्य का फल तीन ऋतु में मिलता है और उससे कम पाप-पुण्य का फल 3 वर्ष में मिलता है ।
727. भगवती सरस्वती माता की कृपा से ही कोई उत्तम वक्ता या लेखक बन सकता है ।
728. जीवन में सब कुछ भी मिल जाए फिर भी प्रभु प्रेम जीवन में नहीं आया तो वह मानव जीवन बेकार है ।
729. जो समाज अपने इतिहास और संस्कृति का विस्मरण कर देता है, वह उन्नति नहीं कर पाता ।
730. श्री महाभारतजी में पांडवों के चरित्र में प्रभु श्री कृष्णजी की अदभुत कृपा की अदभुत धारा देखने को मिलती है । प्रभु के बनने से कैसा संरक्षण प्रभु से मिलता है, यह विश्वास जीवन में हो जाता है ।
731. जो प्रभु से जुड़े रहते हैं उनका मन कभी भी दुःखी नहीं रहता ।
732. सद्बुद्धि हमेशा सत्संग से ही मिलती है, अन्य कोई उपाय नहीं है ।
733. सभी संतों और भक्तों की प्रज्ञा सत्संग से ही जगी है ।
734. भारतीय ऋषियों ने सर्वदा प्रभु को ही सर्वोपरि माना और यही हमारी संस्कृति रही है ।
735. संतों ने माना कि उनके विकारों को नष्ट करने के लिए नारायण (प्रभु) नाम की औषधि ही लेनी चाहिए और नारायण (प्रभु) नाम के श्रीवैद्य के पास ही जाना चाहिए ।
736. प्रभु हमें अपने श्रीकमलचरणों में स्थान देने के लिए लालायित हों, ऐसा व्यवहार हमारा जीवन में होना चाहिए ।
737. प्राचीन भारतवर्ष में आध्यात्मिक धारा ही राष्ट्रीय धारा हुआ करती थी ।
738. हर जड़-चेतन में प्रभु रूप को देखने की आदत बना लेनी चाहिए ।
739. पूजा करते वक्त हम संसार को भूल जाएं और संपूर्ण संसार को प्रभु में देखें, पूजा करके बाहर निकलते ही हमें संपूर्ण संसार में प्रभु के दर्शन होने लगे ।
740. जहाँ-जहाँ हमारी दृष्टि जाए वहाँ-वहाँ हमें प्रभु के दर्शन हों तो ही हमारी भक्ति विकसित हो रही है, यह हमें मानना चाहिए । सूत्र यह है कि सर्वत्र प्रभु की अनुभूति उत्तम भक्तों को होती है ।
741. अगर हमें संसार के हर कण-कण में प्रभु दिखने लग जाए तो हमारा व्यवहार सर्वत्र विनम्रता का ही होगा क्योंकि प्रभु के साथ हम गलत व्यवहार कर ही नहीं सकते ।
742. उत्तम भक्त की कसौटी होती है कि उसका व्यवहार सर्वत्र विनम्रता का ही होता है ।
743. सबमें मेरे श्री ठाकुरजी का वास है, इस भावना के साथ एक भक्त पूरे संसार को देखता है ।
744. एक भक्त संसार को भगवत् रूप में ही देखता है ।
745. उत्तम साधक के लिए बाहर के नियंत्रण की जरूरत नहीं होती, उनके भीतर का आत्म-नियंत्रण ही पर्याप्त होता है ।
746. उत्तम भक्तों को पूजा की अलग से जरूरत नहीं होती क्योंकि उसका हर कर्म ही भगवत् पूजा बन जाता है ।
747. रोज के अभ्यास के कारण अंधेरे में भी भोजन करते वक्त हमारा हाथ मुँह में ही जाता है । इससे सूत्र समझना चाहिए कि रोज के भक्ति के अभ्यास से हम प्रभु की प्राप्ति कर सकते हैं ।
748. भक्तजन श्रीग्रंथों के अध्ययन और अपने साधन करने के लिए जीवन में समय निकालते हैं । उपलब्ध समय में से समय बचाकर, आराम की मानसिकता को त्यागकर, वे अपना साधन करते हैं ।
749. प्रभु से जिनका प्रेम हो गया उन्होंने संसार छोड़ा नहीं बल्कि संसार उनसे चिपका नहीं क्योंकि उनके लक्ष्य प्रभु हो गए । प्रभु प्राप्ति के लक्ष्य के लिए उनका समर्पण हो गया तो बाकी संसार उनको दिखता ही नहीं ।
750. उत्तम मन की एक आदत है कि एक समय एक ही काम करता है और पूरी तरह से उसमें एकाग्र होता है । यह आदत भक्ति में बड़ी लाभदायक सिद्ध होती है ।
751. एक ताले की चाबी कितनी छोटी होती है मगर उससे इतना बड़ा कमरा खुल जाता है वैसे ही शास्त्र के सिद्धांत बहुत मर्म वाले, गुह्यतम होते हैं पर उनसे बहुत बड़ा सूत्र हमें जीवन में मिल जाता है ।
752. प्रभु के लिए भक्ति हो तो उस भक्त को जीवन में बहुत बड़ा फल और लाभ मिलता है ।
753. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की भक्ति अपने गुरु से भी ज्यादा ज्ञान हमें दिला देती है क्योंकि वह ज्ञान गुरु नहीं बल्कि प्रभु देते हैं ।
754. भक्ति परम सामर्थ्यशाली होती है क्योंकि भक्ति से प्रभु भक्त के वश में हो जाते हैं ।
755. प्रभु में श्रद्धा होने पर वह श्रद्धा चेतन प्रभु को हमारे सामने साकार कर देती है ।
756. प्रभु की दृढ़ भक्ति कर ली जाए तो सर्वदा जीवन में कल्याण-ही-कल्याण होगा ।
757. पांडवों के धर्म के वृक्ष की मूल में प्रभु श्री कृष्णजी थे ।
758. शास्त्रों में गृहस्‍थ साधकों के लिए देवतागण की सेवा का सबसे उत्तम मार्ग यज्ञ को बताया गया है ।
759. कर्मकांड, ज्ञान-यज्ञ और भक्ति में भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है ।
760. शास्त्रों में सारे सिद्धांत भरे हैं पर हमारे लिए कौन-सा उपयोगी है, यह तय करना आवश्यक होता है । जैसे हम दवाई की दुकान में जाते हैं तो सभी दवाइयां नहीं खरीदते, जो हमारे लिए डॉक्टर ने बताई है, वही खरीदते हैं क्योंकि सही दवा का चयन करने से स्वास्थ्य लाभ संभव होता है ।
761. जीवन में कामना है तो उस कामना पूर्ति के लिए हमारे शास्त्रों में सकाम विधान बताए गए हैं । अगर जीवन में कोई कामना नहीं है तो ईश्वर प्राप्ति के लिए हमारे शास्त्रों में निष्काम विधान बताए गए हैं ।
762. गुरु मंत्र ग्रहण करके जप नहीं किया तो उसकी बीज शक्ति लुप्त हो जाती है ।
763. शास्त्रों में वर्णित है कि सुआ-सूतक में भी मानसिक नाम जप करना चाहिए ।
764. शास्त्र कहते हैं कि नियमित रूप से हमें अपने नित्य कर्म करने चाहिए तभी जीवन में सफलता मिलती है ।
765. हमारे द्वारा किया सत्कर्म और दुष्कर्म हमें फल दिए बिना नहीं रहते, यह शाश्वत सिद्धांत है ।
766. श्री अर्जुनजी जब भगवती द्रौपदीजी के स्वयंवर में उठे तो उनका पूरा ध्यान प्रभु श्री कृष्णजी के श्रीकमलचरणों में लगा हुआ था कि प्रभु मैं आपकी शरण में हूँ, तभी वे सफल हो पाए ।
767. किसी भी चुनौती के समय हमारी भावना यह होनी चाहिए कि हम प्रभु की शरण में हैं, इस भावना के आते ही प्रभु तुरंत हम पर कृपा बरसा देते हैं ।
768. जीव को श्रद्धापूर्वक सदैव प्रभु का स्मरण करते रहना चाहिए क्योंकि प्रभु कहते हैं कि स्मरण करना जीव का काम है ।
769. जब प्रभु की शरण में हो जाएंगे तो सारे संकट दूर होंगे, यह वचन भगवती कुंतीजी ने हमेशा पांडवों को बार-बार कहा था ।
770. बिना चमत्कार देखे जो प्रभु में विश्वास निर्माण कर दे, उस शक्ति का नाम भक्ति है ।
771. शास्त्र कहते हैं कि जिसमें बुद्धि होती है उसे अधिक उपदेश की जरूरत नहीं होती और जिसमें बुद्धि नहीं होती उसे अधिक उपदेश से भी कोई लाभ नहीं होता ।
772. वृद्ध अवस्था में पहली बार अपने प्राणप्रिय और परमप्रिय प्रभु श्री कृष्णजी के दर्शन जब भगवती कुंतीजी को हुए तो उनके मुँह से शब्द निकल गए - इतनी प्रतीक्षा के बाद आए हो मेरे केशव ।
773. भगवती कुंतीजी को एक आसरा और भरोसा था कि संसार के सभी सज्जनों को संभालने वाले प्रभु कभी हमें भी संभालेंगे ।
774. भगवती कुंतीजी हमेशा पांडवों को कहती थी कि थोड़ी प्रतीक्षा करो, संभालने वाले प्रभु जल्दी ही आएंगे ।
775. श्रीनारायण हमेशा नर को गले से लगाने के लिए आग्रही और इच्छुक होते हैं ।
776. प्रभु श्री कृष्णजी से मिलने के बाद एक मुलाकात में पांडवों को यह विश्वास निर्माण हो गया कि अब हम निश्चिंत हो गए, सभी चिंताओं का अंत हो गया क्योंकि चिंता हरने वाले जीवन में आ गए ।
777. शास्त्र कहते हैं कि हमको पहले अपनी इंद्रियों को भगवत् पूजन में, फिर जप में और फिर ध्यान में लगाना चाहिए ।
778. इंद्रियों को पूजन, जप और कथा श्रवण में हम घंटों तक लगा सकते हैं और इसमें परिश्रम भी कम होता है । पर वही मन को अगर दस मिनट प्रभु के ध्यान में लगाएं तो वह भारी परिश्रम वाला हमें लगता है क्योंकि मन की चंचलता को रोकना बड़ा कठिन होता है ।
779. जैसे धनी का रुपया गिनने में मन एकाग्र होता है, विषयी पुरुष का विषय भोग में मन एकाग्र होता है, इसी प्रकार भक्त का प्रभु में मन एकाग्र हो जाता है ।
780. प्रभु हमें प्रिय और मीठे लगते ही हमारा मन सहयोग करने लगता है और मन प्रभु में एकाग्र हो जाता है क्योंकि सिद्धांत यह है कि प्रिय चीज में ही मन एकाग्र होता है ।
781. प्रभु का ध्यान लगाने के दो सूत्र संत बताते हैं । पहला सूत्र, प्रभु हमें मीठे लगें और दूसरा सूत्र, हमारा मन निर्मल हो तभी हमारा ध्यान प्रभु में लगेगा ।
782. प्रभु कहते हैं कि पहले प्रभु का ध्यान करने के समय मन भटकेगा मगर हमें उत्तेजित नहीं होना है और मन अन्यत्र चला जाए तो उसे वहाँ से खींचकर फिर प्रभु में लगा देना है । धीरे-धीरे इससे मन भटकना बंद हो जाएगा ।
783. प्रभु का ध्यान नहीं किया तो कितने भी जन्म जीव के बीत जाएं उसका आत्म-कल्याण नहीं होगा ।
784. जीवन में अविश्वास से भय का निर्माण होता है । इसलिए जीवन में प्रभु का पूर्ण विश्वास करना चाहिए तो भय का कोई स्थान ही नहीं रहेगा ।
785. जिन्होंने शास्त्रों के परामर्श को माना उन्होंने जीवन में सुख प्राप्त किया और जिन्होंने शास्त्रों के परामर्श को नहीं माना वे दुःख की खाई में गिर गए ।
786. शास्त्रों की बात मानना सर्वदा हितकारी ही होती है ।
787. पांडवों ने अपने जीवन के सभी निर्णय लेने का अधिकार सर्वदा के लिए प्रभु श्रीकृष्णजी के श्रीकमलचरणों में सुरक्षित करके रख दिए ।
788. प्रभु के जीवन में आने के बाद पांडव निर्बल नहीं रहे, अब वे सबल हो गए क्योंकि वे प्रभु के संरक्षण में आ गए ।
789. कितना संभाला प्रभु श्री कृष्णजी ने पांडवों को इसका अदभुत दृष्टांत श्री महाभारतजी में देखने को मिलता है और प्रभु की कृपा का फल भी हमें देखने को मिलता है ।
790. प्रभु से संपर्क होने पर प्रभु ने जो उपकार करना पांडवों का आरंभ किया वह अदभुत था ।
791. जो अनाथ, दीन, गरीब और हीन होते हैं, उनके पुकारने पर प्रभु तुरंत उन पर कृपा करते हैं ।
792. जब प्रभु इंद्रप्रस्थ से श्री द्वारिकापुरीजी जाने लगे तो भगवती कुंतीजी ने कहा कि मत जाओ, फिर भी अगर जाना हो तो जल्दी वापस आना और श्री द्वारिकापुरीजी में रहकर भी हमेशा पांडवों को याद करते रहना और अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखना ।
793. हमें भी प्रभु से रिश्ता बनाना चाहिए, प्रभु से रिश्तेदारी हमें जीवन में निश्चिंत कर देती है ।
794. प्रभु की कृपा के सहारे मनुष्य जीवन में बहुत उन्नति कर सकता है, ऐसा देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने श्री युधिष्ठिरजी को उपदेश में कहा ।
795. पांडवों के जीवन में प्रभु श्री कृष्णजी थे इसलिए वे निरंतर उन्नति करते गए ।
796. मृत्यु की भी मृत्यु हो जाए, ऐसा मृत्युंजय हमें प्रभु की भक्ति बना देती है ।
797. प्रभु इतने दयालु है कि प्रभु भी अपने भक्त के साथ रिश्ता जोड़ना चाहते हैं ।
798. भक्त भगवान से रिश्ता बनाने के लिए लालायित होता है पर श्रेष्ठतम भक्ति में भगवान भी भक्त के साथ रिश्ता बनाने के लिए आतुर रहते हैं ।
799. प्रभु श्री रामजी ने और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी पूरी मानव श्रीलीला में अपने स्वार्थ के लिए कभी भी, कुछ भी नहीं किया ।
800. बिना किसी कर्मफल को ध्यान में रखकर धर्म का आचरण किया जाता है तो उसका मूल्य बहुत अधिक होता है, इसे ही विशुद्ध कर्म कहते हैं ।