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BHAKTI VICHAR CHAPTER NO. 43

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. श्री रामायणजी का मुख्य स्वर मर्यादा और नीति का है और श्री भागवतजी महापुराण का मुख्य स्वर मुक्ति और भक्ति का है ।
002. संसार की सबसे बड़ी कला यह है कि जीव अपनी भक्ति से प्रभु के हृदय में स्थान निर्माण करे ।
003. पांडवों की कीर्ति के मूल में प्रभु श्री कृष्णजी थे ।
004. प्रभु के दर्शन से हमारे नेत्र उत्साहित होने चाहिए और प्रभु के बारे में श्रवण से हमारे कान उत्साहित होने चाहिए ।
005. सत्य को सदैव सादे शब्दों में और मीठे शब्दों में ही बोलना चाहिए और उपयुक्त सत्य ही बोलना चाहिए यानी अप्रिय सत्य कभी नहीं बोलना चाहिए ।
006. हमारा व्यवहार प्रभु को प्रिय लगने वाला होना चाहिए ।
007. शास्त्रों के वचन हमें अप्रिय भी लगे फिर भी वह हमारे लिए सर्वदा हितकारी ही होते हैं ।
008. प्रभु का स्वभाव है कि प्रभु अपने भक्तों की बात कभी नहीं टालते ।
009. शास्त्र कहते हैं कि अत्यंत बड़ा पराक्रम करते समय भी हमें दया का त्याग कभी नहीं करना चाहिए ।
010. हम भूतकाल को याद रखकर अपने भविष्यकाल को नष्ट कर लेते हैं । शास्त्रों के अनुसार बुद्धिमान वह है जो सिर्फ भविष्यकाल की तरफ आशावादी होकर देखता है और भूतकाल को भूल जाता है ।
011. प्रभु भी चाहते थे कि श्री अर्जुनजी से उनका प्रेम निरंतर और अखंड रूप से बना रहे । सूत्र यह है कि भक्त प्रभु को चाहते हैं और श्रेष्ठ भक्तों को प्रभु भी चाहते हैं ।
012. श्री अर्जुनजी अच्छे योद्धा थे पर युद्धबुद्धि के लिए वे प्रभु श्री कृष्णजी के श्रीकमलचरणों में गिरे क्योंकि उनका योद्धा होना तभी सार्थक होता जब उन्हें प्रभु श्री कृष्णजी का मार्गदर्शन मिलता ।
013. शास्त्र कहते हैं कि हम जीवन में तभी सफल होते हैं जब अपनी बुद्धि का उपयोग हमें कहाँ करना चाहिए, यह हमें पता होता है और कहाँ नहीं करना चाहिए, यह भी हमें पता होता है ।
014. शास्त्र कहते हैं कि हमें अपने जीवन के निर्णय सोच समझकर लेने चाहिए । किसी समस्या के बारे में या किसी विषय के बारे में चिंतन बहुत जरूरी है ।
015. शास्त्र कहते हैं कि एकांत में बैठकर सोचने का अभ्यास हमें जीवन में करना चाहिए ।
016. शास्त्र उन्हें उत्तम पुरुष मानते हैं जो रोजाना कुछ समय सोने से पहले सोचने में लगाता है और सुबह प्रातःकाल उठकर प्रभु स्मरण के बाद सबसे पहला काम सोचने का करता है ।
017. प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी मानव श्रीलीला में दिखाया कि इतने बड़े कार्य करते हुए भी व्यक्तिगत संबंधों का प्रभु कितना ध्यान रखते हैं ।
018. शास्त्र कहते हैं कि हमें सार्थक, अर्थयुक्त और योग्य शब्दों से बहुत कम बोलने का अभ्यास करना चाहिए ।
019. शास्त्र कहते हैं कि हमें सदा सबके लिए हितकारी बातें ही बोलनी चाहिए ।
020. मयासुर द्वारा बनाए नए भवन में वास्तुपूजन और उपयुक्त मुहूर्त पर देवताओं की स्थापना करके पांडवों ने जब प्रवेश किया तो सभी ने प्रभु श्री कृष्णजी के नाम का उच्चारण करते हुए प्रवेश किया । प्रभु के नाम में दसों दिशाओं से हमारा मंगल करने का सामर्थ्‍य होता है ।
021. भक्ति में हमें रस आना चाहिए क्योंकि सिद्धांत यह है कि जिसमें रस आएगा उस चीज से व्यक्ति को ऊब नहीं होगी अन्यथा थोड़ा-सा अरस उस कार्य में ऊब पैदा कर देगा । इसलिए दीर्घकाल तक भक्ति करनी है तो उसमें रस आना सबसे अनिवार्य है ।
022. माया अलग-अलग रूप लेकर हमें लुभाने के लिए जीवन में आती रहती है ।
023. हमें अपने पूर्वजों की परंपरा के अनुसार व्यवहार करना चाहिए । पूर्वजों की परंपरा को कभी अपने कर्मों से हानि नहीं पहुँचानी चाहिए ।
024. धर्म (नित्य कर्तव्य), अर्थ (कर्तव्य हेतु साधन जुटाना) और काम (कामना पूर्ति) इन तीनों के बीच में हमें संतुलन बैठाकर रखना चाहिए, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
025. उत्तम निर्णय जब प्रकट होना चाहिए तभी उसे प्रकट होने देना चाहिए, उसे पहले प्रकट नहीं करना चाहिए ।
026. अगली पीढ़ी में शिक्षा के साथ-साथ संस्कार का बहुत महत्व है और यह बहुत जरूरी है नहीं तो अगली पीढ़ी का नाश हो जाएगा ।
027. मन के रोग सत्संग बिना दूर नहीं हो सकते इसलिए नित्य सत्संग करते रहना चाहिए ।
028. भक्ति में प्रभु के पूजन से शुरू करके प्रभु के ध्यान तक हमें पहुँचना चाहिए ।
029. हमारे और प्रभु के बीच में ध्यान की प्रक्रिया चलती ही रहनी चाहिए ।
030. ध्यान करते वक्त ध्यान खंडित होता है । खंडित ध्यान को धीरे-धीरे अखंड रूप से करने का प्रयत्न करना चाहिए । संसार के विषय के बीच-बीच में प्रवेश को रोकने का प्रबंध करना चाहिए ।
031. प्रभु की आराधना करनी है तो पहले देवत्व के चिह्न हमारे शरीर में उभरने चाहिए । जैसे प्रभु श्री महादेवजी का ध्यान करना है तो मस्तक पर थोड़ा भस्म लगाकर करना चाहिए और प्रभु श्री विष्णुजी का ध्यान करना है तो मस्तक पर तिलक लगाकर करना चाहिए ।
032. शास्त्रों में इष्टदेव और भक्त के बाहरी मिलन से ज्यादा भीतरी मिलन पर जोर दिया गया है ।
033. हम परमात्मा के अंश हैं इसलिए परमात्मा से हमारा मिलन संभव है ।
034. प्रभु हमारे प्राणों के प्राण है, हमारे अस्तित्व के आधार हैं, यह भावना हमें रखनी चाहिए ।
035. प्रभु सत, चित्त और आनंद के सिंधु हैं ।
036. भक्ति उसे कहते हैं जब प्रभु के लिए परम प्रेम यानी सर्वाधिक प्रेम जागृत हो जाए । देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने परम प्रेम कहा है, साधारण प्रेम नहीं, यह सूत्र समझना चाहिए ।
037. संसार में कहीं भी हमारा प्रेम ऊपरी रूप से जागृत हो तो ठीक पर प्रभु के साथ सर्वाधिक प्रेम हमारे अंतःकरण के भीतर से जागृत होना चाहिए ।
038. प्रभु को अपने अंतःकरण में आसन देकर अपने अंतःकरण में प्रभु का वास हमें सुनिश्चित करना चाहिए ।
039. ध्यान करते समय एकत्व की भावना होनी चाहिए कि मैं और प्रभु एकरूप हैं, इस भावना की प्रगाढ़ता शीघ्रता से हमें प्रभु मिलन तक पहुँचा देती है ।
040. पांडवों ने प्रभु श्री कृष्णजी का निर्णय सर्वोपरि मानकर जीवन में अंतिम रूप से उसे मान्य किया । हमें भी जीवन में ऐसा विश्वास होना चाहिए कि हमारे सभी निर्णय प्रभु को करने देना है ।
041. जीवन में सभी निर्णय अनुकूल हो इसलिए पांडवों ने अपने जीवन के निर्णय लेने के सारे अधिकार प्रभु श्री कृष्णजी को दे दिए थे ।
042. श्री युधिष्ठिरजी ने जब निश्चय किया कि राजसूय यज्ञ करना है तो उन्होंने श्री द्वारिकापुरीजी में प्रभु को समाचार भेजा कि राजसूय यज्ञ करने की इच्छा है पर आपका निर्णय अंतिम है । अगर आप निर्णय सहमति में देते हैं तो राजसूय यज्ञ में सभी सूत्रों को संभालने के लिए आप तुरंत पधारे ।
043. अपनी मानव श्रीलीला में प्रभु श्री कृष्णजी ने स्वयं राजसूय यज्ञ नहीं किया मगर अपने भक्त पांडवों से राजसूय यज्ञ करवाया । सूत्र यह है कि प्रभु अपने भक्त को हमेशा अपने से आगे रखते हैं, प्रभु अपने भक्त को ज्यादा यश दिलाते हैं, यह प्रभु का विधान है ।
044. प्रभु हमारे शत्रु (भीतर के शत्रु और बाहर के शत्रु) की सूची बनाते हैं और उस पर नीति बनाकर उन्हें जीतने का समाधान हमें देते हैं । यह समाधान मात्र और मात्र प्रभु के पास ही होता है ।
045. प्रभु की शैली यह है कि जो भी भक्त का कार्य अपने श्रीहाथों में लेते हैं उसे सर्वश्रेष्ठ रूप से प्रतिपादित करते हैं ।
046. प्रभु जो भी करते हैं वह अतुलनीय होता है । उपदेश सब देते हैं पर प्रभु श्री कृष्णजी ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में जो उपदेश दिया, ऐसा उपदेश कौन दे सकता है ।
047. श्री युधिष्ठिरजी का पूर्ण समर्पण प्रभु श्री कृष्णजी के प्रति था । वे कहते थे कि राजसूय यज्ञ करते हुए हम दिखेंगे पर हम तो प्रभु के श्रीहाथों की कठपुतलियां हैं, जो प्रभु करवाना चाहते हैं, वही हमसे करवाएंगे ।
048. श्री युधिष्ठिरजी की सीधी घोषणा थी कि इस राजसूय यज्ञ के माध्यम से कि हम संसार को दिखाना चाहते हैं कि हम क्या थे, भिक्षा मांगकर, वेष बदलकर दर-दर भटकने वाले और प्रभु की कृपा के करण आज राजसूय यज्ञ करके चक्रवर्ती सम्राट बनने की दिशा में पहुँच गए ।
049. राजसूय यज्ञ के सभी सूत्र प्रभु ने अपने श्रीहाथों में ले लिए और जो करना था वह करवाया और उसमें तन्मयता से लग गए, यह प्रभु का भक्त का भार उठाने की श्रीलीला थी ।
050. जब जरासंध को हराने के लिए बिना सेना के प्रभु ने श्री अर्जुनजी और श्री भीमजी का चुनाव किया तो सबने यही कहा कि हमें प्रभु पर पूरा भरोसा है, हमें कोई चिंता नहीं है । प्रभु की जो योजना है वह अदभुत है, सटीक है, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है । सूत्र यह है कि प्रभु की कोई भी योजना कभी भी विफल नहीं हो सकती, यह विश्वास जीवन में रखना चाहिए ।
051. अगर भक्ति में प्रभु के लिए तीव्र भावना जागृत हो गई है तो उसका सदैव आदर करना चाहिए ।
052. केवल प्रभु ही ऐसे हैं जो अपने द्वारा भक्त पर किए उपकारों के बदले कुछ भी नहीं चाहते ।
053. निष्काम कर्मयोग के सबसे बड़े आदर्श प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी हैं ।
054. प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी नर श्रीलीला में कभी भी विश्राम नहीं किया । प्रभु यह दिखाना चाहते हैं कि जीवन में हरदम कार्यरत रहना चाहिए ।
055. प्रभु अपने लिए कुछ भी नहीं चाहते पर अपने भक्तों का सदैव हित करना चाहते हैं ।
056. प्रभु अपने भक्तों से बहुत बड़ा कर्म बहुत कम प्रयास में सिद्ध करवा देते हैं ।
057. छोटे-से-छोटा कर्म भी अगर प्रभु के लिए किया जाए तो वह उत्तम कर्म बन जाता है ।
058. घर में पूजा करना तो ठीक है पर अपने कर्म को ही प्रभु की पूजा बना लेना सबसे श्रेष्ठ होता है ।
059. जो उपदेश श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु को करना था उसको अपनी मानव श्रीलीला में जीवंत करके प्रभु ने सबको दिखाई और फिर उपदेश किया ।
060. राजसूय यज्ञ में अग्र पूजा का सम्मान किसको देना चाहिए इस बाबत प्रभु ने श्री भीष्म पितामह को बड़े होने के नाते पूछा । एक सच्चे भक्त होने के नाते श्री भीष्म पितामह ने कहा कि सभी की राय यही है कि प्रभु श्री कृष्णजी की ही अग्र पूजा होनी चाहिए ।
061. एक भक्त सदैव प्रभु की ही वंदना सुनना और करना चाहता है ।
062. लोक उपकार करने में प्रभु से आगे और प्रभु से बड़ा कोई भी नहीं है ।
063. प्रभु श्री कृष्णजी के कुशल प्रबंधन के कारण राजसूय यज्ञ खूब सफल हुआ और पांडवों की कीर्ति सर्वत्र फैल गई, जो प्रभु चाहते थे ।
064. जीवन की सभी प्रतिकूल घटनाओं को और बातों को सहजता से जीवन में ग्रहण करना चाहिए ।
065. जीवन की हर बात को गंभीरता से लेना जरूरी है ।
066. संतों और भक्तों की ऐसी मनोवृत्ति होती है कि प्रतिकूलता में भी एकदम खुश रहते हैं ।
067. हमारे जीवन का व्रत हमारे उत्थान के लिए होना चाहिए, पतन के लिए कोई व्रत की आवश्यकता नहीं होती ।
068. पतन एक स्वतः होने वाली क्रिया है, उत्थान के लिए हमें परिश्रम करना पड़ता है ।
069. कोई भी आदर्श को मानने के लिए हमारे भीतर विवेक का जागृत होना बहुत जरूरी है ।
070. गंदगी में पड़े हुए रत्न को भी हम उठा लेते हैं क्योंकि रत्न जहाँ से भी मिले वह ग्रहण योग्य है ।
071. हमें भक्ति का साधन करना है तो संसार की खटपट में नहीं फंसना चाहिए ।
072. अपना स्वधर्म और कर्तव्य का रोज-रोज हमें पालन करना चाहिए ।
073. प्रभु की जो कृपा हमें प्राप्त हुई है उसकी रक्षा हमें करनी चाहिए कि वह कृपा सदैव के लिए बनी रहे ।
074. संकट में हमें सावधान रहना चाहिए और डगमगाना नहीं चाहिए ।
075. मनुष्य का जीवन में नित्य ऊपर उठने का स्वभाव होना चाहिए ।
076. हमें जीवन में प्रमादी और आलसी नहीं बनना चाहिए ।
077. जो अपने स्वभाव को विनम्र रखता है वह प्रभु को अति प्रिय होता है ।
078. श्री महाभारतजी में कहा गया है कि आगे जो होना है वह होकर रहेगा यह का-पुरुषों की बात होती है क्योंकि सच्चा पुरुषार्थ करने वाला प्रारब्ध को भी बदलकर रहता है ।
079. एक तीव्र प्रारब्ध होता है जो बदला नहीं जा सकता पर इसकी मात्रा बहुत कम होती है और एक मंद प्रारब्ध होता है जो हमारे पुरुषार्थ से बदला जा सकता है ।
080. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु श्री कृष्णजी कहते हैं कि बड़ी मात्रा में प्रारब्ध को अपनी इच्छा शक्ति से बदला जा सकता है ।
081. अधिकतर समय हमें पतन के कारण का पता होता है कि हमारे लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा फिर भी बुराई का हम त्याग नहीं करते और अच्छाई को ग्रहण नहीं करते ।
082. अपने विवेक का जीवन में आदर करना प्रारंभ करना चाहिए ।
083. विवेक का सहयोग मन करे तो जीवन में कोई भी समस्या नहीं रहती ।
084. इंद्रियों पर मन हावी होता है, उस मन को विवेक के हाथों सौंप दिया जाए और उस विवेक को प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित कर दिया जाए तो वह श्रेष्ठ होता है ।
085. सूत्र यह है कि इंद्रियां मन के अधीन होनी चाहिए, मन विवेक के अधीन होना चाहिए और विवेक प्रभु के श्रीकमलचरणों में समर्पित होना चाहिए ।
086. जीवन के गंभीर प्रसंग में गंभीरता के साथ विचार करना और निर्णय लेना आवश्यक होता है ।
087. हमें स्वयं को संभालने के लिए और स्थिति को संभालने के लिए प्रभु द्वारा दिया अवसर मिलता है पर हम उसे बार-बार गंवा देते हैं ।
088. जब हम किसी धर्मात्मा पुरुष का अपमान करते हैं तो हम अपने विनाश की लीला स्वयं लिख लेते हैं ।
089. किसी घटना पर हमारा नियंत्रण नहीं होता पर उसकी प्रतिक्रिया पर हमारा नियंत्रण होता है और उससे हमारी मानसिक स्थिति तत्काल पता चल जाती है ।
090. पहला सम्मान हमारी मातृशक्ति के लिए होना चाहिए, यह सदैव से भारतीय परंपरा रही है ।
091. अपने द्वारा की जाने वाली बुराई, अपने आँखों के सामने होने वाली बुराई को अगर हम नहीं रोकते तो हमारा विनाश सुनिश्चित हो जाता है ।
092. हम अपने किसी गलत आचरण के कारण समाज और कानून से बच सकते हैं पर प्रभु की न्याय दृष्टि से हम कभी नहीं बच सकते ।
093. जीवन में अनैतिक निर्णय कभी नहीं लेने चाहिए ।
094. भगवती द्रौपदीजी के चीरहरण के प्रकरण में उनकी एक ही भावना थी कि संसार के सारे लोगों का दुःख दूर करने वाले, केशव, अब मैं तुम्हारी शरण में हूँ, मुझे बचाओ ।
095. शरण में आकर पुकारने वाले को बचाने का प्रभु का व्रत है और प्रभु इस व्रत को कभी भी भंग नहीं करते ।
096. भगवती द्रौपदीजी ने प्रभु से कहा कि मेरी लाज अब आपके हाथ में है और यह कहकर भगवती द्रौपदीजी ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा लिए । संत कहते हैं कि प्रभु वस्त्रावतार लेकर अपने भक्त की लाज रखने के लिए आरूढ़ हो गए ।
097. प्रभु का श्रीमद् भगवद् गीताजी में उपदेश है कि जो मेरी शरण में आता है, मैं उसके समस्त संकट से उसे बाहर निकाल देता हूँ ।
098. शरण में आए हुए की रक्षा प्रभु कैसे करते हैं, यह प्रभु ने एक नहीं अनेक बार प्रत्यक्ष रूप से करके दिखाया है और आगे भी दिखाते रहेंगे ।
099. पापी व्यक्ति को भी अपने समर्थन में अगर धर्मग्रंथ में कुछ मिल जाता है तो उसका सहारा जरूर लेता है, जो कि गलत है ।
100. जीव अविद्या के जंजाल में इतना डूबा रहता है कि उसे आभास ही नहीं रहता कि वह प्रभु का अंश है ।
101. परम सत्ता प्रभु से साक्षात्कार होना मानव जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य होता है ।
102. प्रभु आनंद के सिंधु हैं और हम उस आनंद के सिंधु के एक बिंदु हैं, यह आभास हमें हरदम होना चाहिए ।
103. प्रभु मेरे अस्तित्व के मूल हैं और मैं उनसे अभिन्न हूँ यानी भिन्न नहीं हूँ, यह ज्ञान हमें होना चाहिए ।
104. प्रभु का ध्यान करते वक्त हमारे ध्यान में स्थित प्रभु ही प्रभु होने चाहिए तभी वह ध्यान पूर्ण माना जाता है ।
105. संतों की दिनचर्या होती है कि वे अल्प पूजा, नाम जप और ज्यादा समय प्रभु के ध्यान में लगाते हैं ।
106. ध्यान में साधक भावयुक्त हो जाता है यानी केवल ध्यान में प्रभु रहते हैं, बाकी सब कुछ प्रभु में विलीन हो जाता है ।
107. शास्त्र कहते हैं कि अपनी वाणी का नियंत्रण करना बहुत जरूरी है । वाणी से किसी का अपमान कभी नहीं करना चाहिए ।
108. प्रभु की जब अनुकंपा होती है तो भूमि का तेज हमारे साथ हो जाता है और वायु का बल हमारे साथ हो जाता है ।
109. पांडव जब वनवास में गए तो श्री विदुरजी का अंतिम उपदेश उनको यह था कि वन में भी सत्संग जरूर करते रहना, सत्संग के बिना मत रहना ।
110. काल जिनका विनाश करना चाहता है पहले उनकी बुद्धि भ्रष्ट कर देता है और फिर उन्हें नष्ट कर देता है ।
111. श्री संजयजी ने धृतराष्ट्र से कहा कि कौरवों का पतन उस समय ही सुनिश्चित हो गया जब प्रभु के कृपा पात्र पांडवों का उन्होंने तिरस्कार किया ।
112. हमें जीवन में अपनी कमजोरी को खोजना चाहिए और विवेक से उससे उबरना चाहिए ।
113. पापियों को देखने में, पापियों से बातचीत करने में, पापियों के साथ एक आसन पर बैठने में हमें भी पाप लग जाता है ।
114. पांडवों का धन गया, राज्य गया और शोभा गई, फिर वापस धन मिला, राज्य मिला और शोभा कई गुना बढ़ी हुई मिली, यह सब प्रभु कृपा के कारण उनके जीवन में संभव हुआ ।
115. जो प्रभु के बारे में श्रवण नहीं करता उसका ज्ञान मलिन हो जाता है, मनोबल टूट जाता है और आत्मविश्वास में कमी आ जाती है । इसलिए प्रभु की कथा को संजीवनी बताया गया है ।
116. उत्तम पुरुष को न तो भूतकाल के शोक में डूबना चाहिए, न भविष्य काल के घटना क्रम से भयभीत होना चाहिए, उसे वर्तमान में अपना कर्तव्य कर्म करना चाहिए ।
117. शास्त्र कहते हैं कि शरीर व्याधि ग्रस्त तब होता है जब हमारा मनोबल टूट जाता है, इसलिए मनुष्य को अपने मन को शांत रखने की कला सीखनी चाहिए ।
118. शरीर में होने वाले रोगों का निर्माण पहले हमारे मन में होता है, यह सिद्धांत है ।
119. शरीर बूढ़ा हो जाता है पर मन की तृष्णा कभी नष्ट नहीं होती ।
120. मानस दुःख को दूर करने का एकमात्र उपाय सत्संग ही है ।
121. मन को जितना चिंता रहित रखेंगे उतना मन निरोग रहेगा । मन को चिंता रहित रखने का सबसे श्रेष्ठ साधन प्रभु की शरणागति है ।
122. शास्त्र कहते हैं कि धन का मोह छोड़ देने पर जीवन के आधे दुःख स्वतः ही खत्म हो जाते हैं ।
123. धन कमाने में भी मन को परिश्रम होता है, धन संभालने में मन को ज्यादा परिश्रम होता है और धन चला जाता है तो मन को सबसे ज्यादा परिश्रम यानी वेदना होती है ।
124. शास्त्र कहते हैं कि अगर हम प्रभु से नहीं जुड़े हुए हैं तो बुढ़ापा मन को बड़ा दुर्बल बना देता है ।
125. गलत संकल्प जीवन में हमें गलत मार्ग पर ही ले जाते हैं ।
126. आहार संयमित होना चाहिए । यह भावना होनी चाहिए कि गलत आहार से हमारे भीतर विराजे प्रभु को निश्चित कष्ट पहुँचता है ।
127. विचार करके हमें संतों से बिलकुल जीवन उपयोगी बातें ही पूछनी चाहिए ।
128. पूजा, नाम जप और प्रभु के बारे में श्रवण - यह तीनों अपनी-अपनी उचित मात्रा में रोजाना करना जरूरी है ।
129. कर्म के त्याग में भी विवेक रखना चाहिए कि किस-किस गलत कर्म को छोड़ना है और किस सत्कर्म को करते रहना है ।
130. प्रभु के लिए जिस कर्म को भी हम करें उस कर्म से एकरूप हो जाएं और उस कर्म में डूब जाएं ।
131. कथा के अमूल्य उपदेशों को हमें ग्रहण करना चाहिए । उन्हें टालकर कथा सुनने से कथा का लाभ खत्म हो जाता है ।
132. उत्तम आरोग्य, उत्तम धन और बुद्धि की प्रज्ञा प्रभु श्री सूर्य नारायणजी की प्रातःकाल उपासना से मिलती है ।
133. जीवन में हमारा सब कुछ संतुलित होना चाहिए ।
134. प्रतिकूलता और अनुकूलता में निर्विकार रहने के लिए प्रभु की नियमित आराधना जीवन में बहुत जरूरी है ।
135. इष्टदेव हमारे घर के ठाकुरबाड़ी में स्थापित होते हैं, इष्टदेव की नियमित पूजा से हमारे संबंध में गहराई आती है और देव-दर्शन का दुर्लभ अवसर जीवन में एक-न-एक दिन उपस्थित होता है ।
136. प्राप्त वस्तुओं का जो प्रभु के लिए सदुपयोग करता है, प्रभु उसके लिए श्रेष्ठ वस्तुओं की व्यवस्था बनाते चले जाते हैं ।
137. तीर्थ यात्रा प्रभु दर्शन के उद्देश्य से ही होनी चाहिए, सैर-सपाटे के उद्देश्य से नहीं ।
138. अर्थ और काम के मूल में धर्म होना चाहिए ।
139. धर्म की शाखाओं के रूप में बताया गया है कि सदाचारी होना, अपनी परंपरा का पालन करना और कर्तव्य पालन करना यह धर्म के अंतर्गत ही आता है ।
140. बुरे कर्म का परिणाम कभी अच्छा हो नहीं सकता, यह शाश्वत सिद्धांत है । बुरे कर्म का परिणाम सर्वनाश में ही होता है ।
141. अपनी गलती सुधारने का मौका प्रभु जीवन में सबको देते हैं ।
142. विनाश से पहले अधर्मी को भी प्रभु सही परामर्श दिलवा कर मौका देते हैं कि वह सुधर जाए ।
143. गलत चीज में जब हम खुशी ढूंढ़ते हैं तो संत उसे “आसुरी खुशी” बताते हैं ।
144. कौरवों ने धर्म के विपरीत कितना बड़ा षड्यंत्र किया और धर्म का जरा भी विचार नहीं किया जिसके कारण उनका पतन और विनाश हुआ ।
145. संतों के सामने अमर्यादा रखने पर हमारे पुण्य तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।
146. कोई दुराचारी को कोई सज्जन समझाने आते हैं तो उसे यह प्रभु की कृपा ही माननी चाहिए ।
147. भक्त, त्यागी, ज्ञानी, महात्मा, संत और सत्पुरुष जब कोई उपदेश या निर्देश देते हैं तो सावधानी पूर्वक उसे ग्रहण करना हमारा कर्तव्य होता है ।
148. सुख के प्रसंगों में और दुःख के प्रसंगों में कभी भी प्रभु को नहीं भूलना चाहिए ।
149. पांडवों के दुःख के प्रसंग में उनके वनवास के दौरान श्री द्वारिकापुरीजी से चलकर पांडवों से मिलने प्रभु आए ।
150. सभी पांडव विपत्ति काल में प्रभु की प्रतीक्षा कर रहे थे और प्रभु ने उस प्रतीक्षा को साकार किया और उनसे मिलने वन में आए ।
151. वनवास के दौरान मिलने पर प्रभु ने सबसे पहला वाक्य जो कहा वह यह कहा कि धीरज का त्याग मत करना, कौन हमारे साथ है इसका विचार मन में मत लाना क्योंकि मैं (प्रभु) सदैव तुम्हारे साथ हूँ ।
152. प्रभु ने एक सिद्धांत बताया कि मेरे भक्त का साथ देने वाले पर मैं कृपा करता हूँ और मेरे भक्त को दुःख देने वालों का मैं विनाश करता हूँ ।
153. पांडवों के वनवास काल में ही उनका राज्याभिषेक करने की प्रतिज्ञा प्रभु ने की और संयम से तेरह वर्ष बिताने के लिए कहा ।
154. भगवती द्रौपदीजी के चीर-हरण प्रकरण के बाद सबसे पहले जब वे प्रभु श्री कृष्णजी से मिली तो खूब रोई । सूत्र यह है कि रोना है तो प्रभु के सामने रोना चाहिए और भगवती द्रौपदीजी ने ऐसा ही किया ।
155. प्रभु ने अंत में श्री युधिष्ठिरजी को लताड़ा और कहा कि आप जुआ खेलने क्यों गए ? प्रभु ने कहा कि परस्त्री की संगति, जुआ और मदिरापान से सदैव जीव को बचकर ही रहना चाहिए ।
156. प्रभु के लौटते समय भगवती द्रौपदीजी जी ने प्रभु की आंसुओं से पूजा की । यह ऋण के आंसू थे जो चीर-हरण प्रकरण में प्रभु ने लाज बचाई थी उसके लिए ऋण था ।
157. भगवती द्रौपदीजी को पतिव्रता, पंडिता, लावण्या और प्रिया - इतनी उपाधि प्रभु श्री वेदव्यासजी ने श्री महाभारतजी में दी हैं । सूत्र यह है कि उच्च शिक्षा लेने पर हमें जो उपाधि मिलती है उससे भी बड़ी यह जीवन के सद्गुणों की उपाधि होती है ।
158. बीच-बीच में जीवन में अपने तेज को प्रदर्शित करने की आवश्यकता होती है ।
159. कभी मृदु, कभी कठोर, कभी क्षमाशील, कभी सजा देने वाला हमें मौका अनुसार बनना चाहिए ।
160. शास्त्र कहते हैं कि यदि किसी से हमारे प्रति अपराध हुआ और पूर्व में उसने हमारा उपकार किया है तो उसके उपकार को याद रखना चाहिए और उसे क्षमा कर देना चाहिए ।
161. शास्त्र कहते हैं कि किसी को अपमानित करना और सार्वजनिक रूप से उसे बुरा-भला कहना गलत है ।
162. शास्त्र कहते हैं कि दूसरे को गलती पर दंड देने की आवश्यकता है पर दंड के साथ अपमानित करने की आवश्यकता एकदम नहीं है ।
163. शास्त्र कहते हैं कि नरमाई से किसी जीव में हम जितना परिवर्तन कर सकते हैं उसका दसवां हिस्सा भी कटु होकर नहीं कर सकते ।
164. यह सिद्धांत है कि धीरे-धीरे पानी का बहाव पत्थरों को भी तोड़ देता है और पत्थरों को पता भी नहीं चलता कि वे टूट गए हैं । इसी तरह नरमाई से हम धीरे-धीरे किसी का हृदय परिवर्तन कर सकते हैं ।
165. शास्त्रों में क्रोध नहीं करने वाले की बहुत प्रशंसा की गई है ।
166. गलती को जीवन में मानना और गलती को जीवन में न दोहराने का प्रण करने वाला ही जीवन में बड़ा बनता है ।
167. परिस्थिति का निर्माण करना कभी-कभी मनुष्य के हाथ में नहीं होता पर मिली हुई परिस्थिति का सदुपयोग या दुरुपयोग करना उसके हाथ में होता है ।
168. जीव के लिए प्रभु की कृपा और अनुकंपा प्राप्त करना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है ।
169. मंदिर प्रांगण का प्रभाव होता है कि मंदिर में आने पर सारे प्राणियों की वृत्तियां स्वतः ही शांत हो जाती है ।
170. हमें माया द्वारा मिली प्रलोभन की परीक्षा में अध्यात्म के मार्ग में उत्तीर्ण होना पड़ता है ।
171. अध्यात्म के लक्ष्य के त्याग के लिए हमें भी जीवन में प्रलोभन मिलेगा पर उसके कारण प्रभु प्राप्ति का संकल्प जीवन में कभी नहीं छोड़ना चाहिए ।
172. प्रभु की कृपा प्राप्त होते ही उसी समय हम पवित्र और धन्य हो जाते हैं ।
173. आधुनिक भारतवर्ष में भी आत्म-साक्षात्कार युक्त भक्तों का जन्म हुआ है और आगे भी होता रहेगा ।
174. संसार हमें तब तक भयभीत करता रहेगा जब तक हमारा ध्यान प्रभु की तरफ नहीं जाता और हमारा मन प्रभु में नहीं लगता ।
175. हमें प्रभु के साथ एकरूपता की अनुभूति में डूब जाना चाहिए पर अभी हमें एकरूपता का बोध ही नहीं है ।
176. परा-भक्ति में कोई क्रिया की जरूरत नहीं होती । यह अनुभव का विषय है, बताने या उपदेश का विषय नहीं है ।
177. प्रभु सभी जीवों के हृदय में स्थाई रूप से विद्यमान हैं ।
178. मन से संसार की वृत्तियों को हटाकर मन में प्रभु को स्थिर कर देना चाहिए ।
179. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु जीव से कहते हैं कि मैं तुम्हारे भीतर ही बैठा हूँ ।
180. संत श्री तुकारामजी कहते हैं कि “शिव” और जीव एक ही हैं, सिर्फ एक माया का पर्दा बीच में डालकर पूरा माया का खेल हो रहा है ।
181. सबसे सरल शब्दों में भक्ति का अर्थ है प्रभु से प्रेम करना ।
182. जब प्रभु से प्रेम हो जाता है तो हमारी इंद्रियां प्रभु के सानिध्य के लिए बेचैन हो जाती हैं । पर हमारा दुर्भाग्य है कि अभी हमारी इंद्रियां संसार के लिए बेचैन रहती हैं ।
183. अत्यंत श्रेष्ठ चीज मिलाने पर गौण चीज जीवन में गौण हो जाती है, यह सिद्धांत है । इसलिए जब प्रभु मिलते हैं तो संसार गौण हो जाता है ।
184. हमें जीवन में जो कुछ भी प्राप्त होता है वह प्रभु की कृपा और अनुग्रह के बिना प्राप्त नहीं हो सकता ।
185. प्रभु के नाम जप, भजन और पूजन का समय कभी भी गिनना नहीं चाहिए क्योंकि सच्चे प्रेम में गिनती नहीं होती ।
186. प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में जीव से यही एक मांग की है कि अपना मन मुझे दे दो । प्रभु केवल हमारा मन ही चाहते हैं ।
187. हमारा मन रिश्तेदारी में, सगे-संबंधियों में, कर्तव्य कर्म में, मौज-मस्ती में लगा हुआ होता है । प्रभु के लिए हमारा मन बहुत कम मात्रा में उपलब्ध होता है । हमारे मन की इस भारी चालाकी को प्रभु जानते हैं ।
188. सूत्र यह है कि जिसने भी प्रभु को प्राप्त किया है केवल और केवल प्रभु को अपना मन अर्पण करके ही प्राप्त किया है ।
189. प्रभु से प्रेम दिन-रात का अनुसंधान है, यह एक घंटे या दो घंटे की गतिविधि नहीं है ।
190. जब तक तीव्र प्रेम प्रभु से नहीं होता तब तक प्रभु की प्राप्ति संभव नहीं है ।
191. प्रभु अपने श्रीकमलचरणों में गिरे भक्तों को उठाकर आलिंगन में भर लेते हैं, यह प्रभु का कोमल स्वभाव है ।
192. श्री अर्जुनजी की भक्ति देखें कि उन्होंने प्रभु श्री महादेवजी को प्रसन्न करके उनसे अस्त्र नहीं मांगे बल्कि कृपास्त्र मांगे यानी उनकी कृपा और अस्त्र दोनों मांगे ।
193. प्रभु के अत्यंत कोमल श्रीकमलचरणों का स्पर्श हमारे माथे को हो, ऐसी अनुभूति हमारे मन में होनी चाहिए, ऐसी परम इच्छा जीवन में होनी चाहिए ।
194. यह भारतीय संस्कृति है कि मंदिर की सीढ़ियां जिस पर हम पैर रखकर मंदिर में जाते हैं उन्हें भी प्रणाम करना चाहिए क्योंकि वे सीढ़ियां प्रभु तक पहुँचाने का साधन बनी हैं ।
195. जो आध्यात्मिक विद्या जीव को सुखी करने के काम में आती है, वही उत्तम विद्या है ।
196. सच्चा साधक वह है जो काम के आवेग, क्रोध के आवेग और लोभ के आवेग को सह जाता है ।
197. प्रभु जिस जीव को अपना लेते हैं यानी अपना बना लेते हैं उस जीव का स्थान पूरे ब्रह्मांड में बहुत ऊँ‍चा हो जाता है ।
198. श्रीमद् भगवद् गीताजी के गुह्यतम रहस्य को खोलने के लिए प्रभु ने श्री अर्जुनजी का चुनाव किया और उन्हें उपदेश हेतु चुना, यह प्रभु की उन पर कितनी बड़ी अनुकंपा थी ।
199. विश्व पटल पर आध्यात्मिक ज्ञान का अंतिम श्रीग्रंथ श्रीमद् भगवद् गीताजी ही है ।
200. जीवन में आपत्ति आती है, जीवन में पतन भी होता है, जीवन में प्रतिकूलता भी आती है, मगर उसके बाद भी भक्ति के कारण जीवन में उत्थान संभव है ।
201. अपनी संस्कृति और परंपरा को कायम रखना हमारा सबसे प्रथम धर्म होता है ।
202. शास्त्रों को पढ़ने का परिणाम होता है कि हमारे जीवन जीने की दृष्टि ही बदल जाती है ।
203. भारतीय परंपरा और संस्कार इतने बलवान और इतने महान है कि इसकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती ।
204. धर्म का कार्य, भारत माता का कार्य, गौ-माता का कार्य हमें बिना किसी स्वार्थ के करना चाहिए ।
205. भक्ति करने के लिए अपने जीवन को अत्यंत विशुद्ध रखना चाहिए ।
206. नित्य कर्म और नित्य कर्तव्य का निर्वाह करते हुए भी जो अपने जीवन को विशुद्ध रखता है, प्रभु उस पर बहुत प्रसन्न होते हैं ।
207. हमें यह देखना चाहिए कि दिनभर हमारे द्वारा होने वाला हर कर्म सत्कर्म ही हो ।
208. वही जीव दीर्घकालीन सुखी और सुरक्षित रहता है जो जीवन में सत्कर्म करता रहता है ।
209. अगर हम सत्कर्म करके आज को सुधार देते हैं तो हमारी सारी आयु धीरे-धीरे स्वतः ही सुधरती चली जाती है ।
210. हमारे भीतर पहले बुराई छोटी मात्रा में प्रवेश करती है और फिर भीतर प्रवेश करने के बाद बड़ा रूप ले लेती है ।
211. कलिकाल हमारे जीवन में प्रवेश करने से हमारी बुद्धि बदल जाती है यानी कल तक जिस बात में श्रद्धा थी आज उसमें बुराई दिखने लगती है ।
212. कलिकाल के प्रभाव के कारण तमोगुण हमारी बुद्धि पर प्रभाव करता है और सारी उल्टी बातें ही हमें सही जान पड़ती है और समझ में आती है ।
213. कलिकाल अपने प्रभाव से हमारी बुद्धि इतनी बिगाड़ देता है कि समझाने वाला भी हमें समझाकर हार जाता है और हमारे ऊपर कोई असर नहीं होता ।
214. संसार में सब लोग अच्छे हो जाएंगे, यह कभी नहीं होगा । संसार में सब लोग बुरे हो जाएंगे, यह भी कभी नहीं होगा । अच्छाई और बुराई का मिश्रण हमेशा रहने वाला है ।
215. अच्छाई और बुराई रूपी दोनों गुणों का प्रतिशत हर युग में बदलता रहता है । सतयुग में 95 प्रतिशत अच्छाई थी तो 5 प्रतिशत बुराई थी । कलियुग में उल्टा है 95 प्रतिशत बुराई है और 5 प्रतिशत अच्छाई है ।
216. यह शास्त्रों का सिद्धांत है कि बुरे-से-बुरे समय में भी अच्छाई रहेगी और अच्छे-से-अच्छे समय में भी बुराई रहेगी ।
217. प्रभु जिनकी मदद करना चाहते हैं उन्हें विपत्ति में भी संजीवनी के रूप में सकारात्मक किरण दिखा देते हैं ।
218. धर्म कहता है कि आपत्तिग्रस्त जीव पर दया करनी चाहिए और उसे आपत्ति से बचाने का प्रयास करना चाहिए ।
219. अगर हम जीवन में प्रभु कृपा के पात्र बन जाते हैं तो विपत्ति के बाद भी हमारा गौरव जितना था प्रभु उसे पुनः उससे भी अधिक बढ़ा देते हैं ।
220. प्रभु की कृपा होती है तो विपत्ति काल के बाद भी हमारा टूटा हुआ मनोबल पुनः जागृत हो जाता है ।
221. हमारे चित्त की वृत्तियां जो बाहर दौड़ती हैं उन्हें अंतर्मुख करने की जरूरत है ।
222. अभ्यास से और वैराग्य से इस चंचल मन को वश में किया जा सकता है, ऐसा श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं ।
223. भारतीय ऋषियों ने मानवीय जीवन का कितनी गहराई से चिंतन किया है, इस तत्व को जब हम समझते हैं तो हमारे ऋषियों के लिए हमारे मन में बहुत आदर का भाव निर्माण हो जाता है ।
224. पूरी पृथ्वी की भी हम यात्रा कर रहे हैं तो उस यात्रा का फल भी एक तीर्थ यात्रा के फल से बहुत कम है ।
225. उत्तम साधक को देखकर संतों का मन भी प्रफुल्लित होता है ।
226. हमें यह देखना चाहिए कि हमारी कोई भी विद्या हमें अपने संस्कार और संस्कृति के विरुद्ध ले जाने वाली नहीं हो ।
227. तीर्थों का पुण्य इतना होता है कि मात्र तीर्थ में निवास करने से ही पुण्य फल की प्राप्ति होने लगती है ।
228. शास्त्रों में बताए नियमों का तीर्थों में पालन करने से तीर्थ का पूर्ण लाभ हमें मिलता है ।
229. शास्त्र कहते हैं कि अपने कर्तव्य कर्म के अलावा कोई अन्य कार्य में नहीं उलझना चाहिए और बाकी समय प्रभु के लिए आरक्षित रखना चाहिए ।
230. तीर्थ में हमें विशेष ध्यान रखना चाहिए कि कोई पाप नहीं हो क्योंकि तीर्थ में किया पाप बहुत भयंकर रूप ले लेता है ।
231. तीर्थों में जाकर जो अपने व्यवहार को और नियम को उत्तम रखेगा उसे ही पुण्य फल की प्राप्ति होती है ।
232. तीर्थों में मिलने वाले पुण्य को ऋषियों ने बड़े-बड़े यज्ञ और अनुष्ठान से भी मिलने वाले पुण्य से ज्यादा महत्वपूर्ण और बड़ा बताया है ।
233. बहुत संचित पुण्यों के बाद ही हमारे मन में यह भावना निर्माण होती है कि हमें तीर्थ में जाना है ।
234. प्राचीन काल से ही हमारे तीर्थ पुण्य अर्जन के स्थान रहे हैं ।
235. भारतवर्ष के एकत्व का स्वरूप हमारे तीर्थ रहे हैं ।
236. भगवती गंगा माता की इतनी महिमा है कि ऐसा कहा गया है कि समस्त तीर्थ और समस्त देवतागण आकर भगवती गंगा माता में निवास करते हैं ।
237. भगवती गंगा माता के तट पर किया दान, स्नान, शास्त्र श्रवण, अनुष्ठान और यज्ञ बहुत अधिक फलदायी होता है ।
238. भगवती गंगा माता सिर्फ अपने नाम उच्चारण से ही दूर बैठे हमारे पाप का नाश करती है फिर पूरे भाव से दर्शन और स्नान करने से सात पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है ।
239. भगवती गंगा माता को स्मरण करने का इतना प्रभाव है कि कलियुग फिर हमें भयभीत नहीं कर सकता ।
240. शास्त्रों में बताए समस्त नियमों का पालन करते हुए हमें तीर्थ यात्रा करनी चाहिए ।
241. जितना-जितना भी विज्ञान आगे बढ़ रहा है भारतीय शास्त्र उतने ही प्रमाणित होते चले जा रहे हैं क्योंकि जो शास्त्रों में हमारे ऋषियों ने लिखा है आज विज्ञान खोज करके उसे मान रहा है ।
242. तीर्थों में रहने से हमारा चित्त सात्विक होता चला जाता है ।
243. तीर्थों का अपना प्रभाव क्षेत्र होता है, जो उस प्रभाव क्षेत्र के भीतर रहता है तीर्थ की सात्विकता उसमें आती है ।
244. भगवती गंगा माता का बहता जल हमारी आँखों को बहता हुआ जल दिखता है पर ऋषियों ने इसे साक्षात प्रभु करुणा का बहता प्रवाह माना है ।
245. सभी तीर्थों का हमें जीवन में आदर करना चाहिए ।
246. तीर्थों में जहाँ बड़े-बड़े अनुष्ठान हुए हैं, यज्ञ हुए हैं, कीर्तन हुए हैं, महापुरुषों और ऋषियों की तरंग आज भी हमें मिलती है ।
247. धर्म मार्ग में चलने वाले व्यक्ति के शील का कभी भी नाश नहीं होता ।
248. प्रभु कहते हैं कि पांडव किसी भी अवस्था में धर्म त्याग नहीं करते, इसी कारण प्रभु का श्रीहाथ सदैव उनके सिर पर रहता है ।
249. तीर्थों के माहात्म्य की जानकारी हो और फिर उनका श्रद्धा से सेवन करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है ।
250. तीर्थों का अमर्यादित सेवन कभी नहीं करना चाहिए, ऐसा करने वाले को पाप लगता है ।
251. इसका सदैव ध्यान रखना चाहिए कि भगवती गंगा माता में जल बुद्धि नहीं होनी चाहिए, प्रभु की प्रतिमा में पाषाण बुद्धि नहीं होनी चाहिए और भगवती तुलसी माता में वनस्पति बुद्धि नहीं होनी चाहिए ।
252. तीर्थों का प्रभाव अपने ऊपर होने के लिए कुछ पर्याप्त समय तीर्थों में रुकना चाहिए, तभी लाभ मिलता है ।
253. धर्म का तनिक भी उल्लंघन हमसे नहीं हो, इसका सदैव ध्यान रखना चाहिए ।
254. जो जितनी बड़ी ख्याति धर्म मार्ग में चलकर अर्जित करता है उसकी परीक्षा भी उतनी ही कठिन होती है ।
255. शरणागत की रक्षा करना प्रभु ने अपने प्रथम धर्म के रूप में माना है ।
256. धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण धर्म के प्रसंग आ जाएं, परम कसौटी जीवन में आ जाए तो भी अपना जीवन दांव पर लगाकर धर्म का पालन करता है ।
257. जीवन जीते हुए यह भावना होनी चाहिए कि मेरा कुछ भी नहीं है, सब कुछ प्रभु का है और मेरे सिर्फ प्रभु ही हैं ।
258. संसार में हमारे सद्गुणों के कारण हमें सर्वत्र ख्याति मिलती है ।
259. कलियुग में मंदिरों में भीड़ श्रद्धा के लिए कम होती है और कामना पूर्ति एवं अटके काम बनाने के लिए ज्यादा होती है ।
260. भारतवर्ष के हर तीर्थ के साथ अनेक श्रेष्ठ कथाएं जुड़ी हुई है जो उस तीर्थ के महत्व का प्रतिपादन करती हैं ।
261. वनवास के दौरान पांडव रोज नियमित जप, ध्यान का अभ्यास, यज्ञ और संध्या वंदन आदि सब क्रियाएं प्रभु की प्रसन्नता के लिए करते थे । सूत्र यह है कि प्रतिकूलता में भी हमारा साधन नहीं छूटना चाहिए ।
262. परमार्थ में किसी की भी जिज्ञासा को पूर्ण करना जरूरी है, किसी की जिज्ञासा को दबाना सही नहीं है ।
263. भारत के शास्त्रों की विशेषता है कि वे हमारी बुद्धि के विकास का सदैव प्रयास करते हैं ।
264. जितना-जितना हम पहाड़ के शिखर की ओर बढ़ते हैं, मार्ग संकरा होता चला जाता है । सूत्र यह है कि साधन का मार्ग अंतिम अवस्था में बड़ा चुनौती वाला होता है ।
265. रुपए को, पुस्तक को, श्री तुलसी पत्र को, श्री बिल्व पत्र को कभी भी लांघकर नहीं जाना चाहिए, इससे पाप लगता है । सूत्र यह है कि किसी भी पवित्र वस्तु को कभी भी लांघना नहीं चाहिए ।
266. शास्त्रों की आज्ञा पालन में ही हमारा कल्याण निहित होता है ।
267. प्रभु का दास हमेशा प्रभु की कीर्ति सुनकर आनंदित होता रहता है ।
268. प्रभु श्री हनुमानजी उपदेश स्वरूप श्री भीमजी को सूत्र देते हैं कि जीवन में अजेय रहना चाहते हो तो प्रभु की आराधना नियमित करते रहना चाहिए ।
269. प्रभु के कृपा प्रसाद से ही जीव जीवन में सुखी हो सकता है ।
270. प्रभु श्री हनुमानजी केवल महा बलवान ही नहीं हैं, वे ज्ञानियों और बुद्धिमानों में भी अग्रणी हैं ।
271. श्री भीमजी ने प्रभु श्री हनुमानजी से मांगा कि उनका आशीर्वाद और सानिध्य उन्हें जीवनभर मिलता रहे, यही उनकी एकमात्र कामना है ।
272. हम परमात्मा शक्ति को भिन्न-भिन्न नाम देते हैं और उस हिसाब से उनकी पूजा भी करते हैं पर अंततोगत्वा वे मूल में एक ही हैं ।
273. जीव की अपनी सीमा होती है पर प्रभु की कोई सीमा नहीं है । प्रभु को कोई भी सीमा में नहीं बांध सकता ।
274. भारतीय अध्यात्म की विशेषता है कि हमारे भारतीय शास्त्र सभी के अविरोधी शास्त्र हैं, उनका किसी से कोई विरोध नहीं है ।
275. प्रभु को प्रसन्न रखने से हम जीवन में अनुकूलता प्राप्त कर सकते हैं ।
276. सामाजिक नियमों को जानते हुए कभी भी उनका उल्लंघन नहीं करना चाहिए ।
277. हमारी भक्ति और समर्पण के कारण प्रभु हमें सब अनुकूलता से संपन्न कर देते हैं ।
278. भक्ति की विशेषता है कि जितना हम कर पाते हैं उससे अधिक करने की क्षुधा हमारे भीतर जागृत कर देती है और हमें और अधिक भक्ति करने की प्रेरणा भीतर से देती है ।
279. जीवन में सदैव विनय संपन्न रहना चाहिए ।
280. भक्ति करके प्रभु की नजरों में बस जाने से हमारा भाग्योदय अपने आप ही प्रभु कृपा से होता है ।
281. अपने द्वारा किए सत्कर्मों का कभी भी अपने मुँह से सबके सामने बखान नहीं करना चाहिए, उसे दुनिया से छुपाकर रखना चाहिए ।
282. अपनी विद्या का कभी भी दुनिया के सामने प्रदर्शन नहीं करना चाहिए । विद्या प्रयोग की वस्तु है, प्रदर्शन की वस्तु नहीं है ।
283. शास्त्रों में विद्या का प्रदर्शन करना विद्या के अमर्यादा का प्रतीक माना गया है ।
284. हमें जीवन में सत्य पर चलना चाहिए, क्षमाशील होना चाहिए, हमारे में दया भाव होना चाहिए और सद्विचारों और सद्गुणों का समन्वय हमारे भीतर होना चाहिए ।
285. सर्वोच्च ज्ञान वह है जिससे हम ब्रह्म को समझ सकें । शास्त्र कहते हैं कि जिसने ब्रह्म को नहीं जाना और अन्य सब कुछ जान लिया उसने सब कुछ जानकर भी कुछ नहीं जाना ।
286. सत्य हमें प्रिय होना चाहिए और हमेशा सत्य वचन ही हमारे मुँह से निकलना चाहिए ।
287. शस्त्र से अहिंसा, हाथों से अहिंसा और वाणी से अहिंसा मिलाकर ही सच्ची अहिंसा बनती है ।
288. जीव अपनी भक्ति से अपने पूर्वजों को भी मुक्त कर देता है । भक्ति का पुण्य संचित करने का इतना बल होता है कि हमारे पूर्वज भी तत्काल मुक्त हो जाते हैं ।
289. पांडवों के वनवास के दौरान प्रभु बार-बार आकर उनसे मिलते रहे और उनके कुशलक्षेम की व्यवस्था करते रहे । सूत्र यह है कि प्रभु अपने भक्तों को जीवन में अप्रत्यक्ष रूप से रोजाना संभालते हैं ।
290. जीवन में अन्न की शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए और घर में आने वाले धन की शुद्धि का भी विचार करना चाहिए ।
291. ब्रह्मचर्य का पालन करने पर हमारी आयु की वृद्धि होती है ।
292. आलस्य के त्याग को ऋषियों ने एक बड़ा त्याग बताया है । आलस्य के त्याग के बिना जीव आत्म-विकास के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता ।
293. प्रातः कालीन और सायं कालीन संध्या वंदन का व्रत हमारे जीवन में होना चाहिए ।
294. ब्राह्मण देव और अतिथि देव का हमें जीवन में सत्कार करना चाहिए ।
295. इंद्रियों का संयम करने से हमारी आयु बढ़ती है ।
296. मन को संयमित रखकर उसे शांत रखने का प्रयास जीवन में करना चाहिए ।
297. शास्त्र कहते हैं कि मरते दम तक हमें छात्र ही बने रहना चाहिए यानी अध्ययनशील बने रहना चाहिए ।
298. शास्त्र कहते हैं कि जिनको जीवन में उन्नति करनी है उन्हें ब्राह्मणों का आशीर्वाद जीवन में प्राप्त करते रहना चाहिए ।
299. ब्राह्मणों को और गरीबों को भोजन देने पर अन्न देवता तृप्त होते हैं ।
300. जिसने अपना जीवन प्रभु की सेवा में लगाया है उस व्यक्ति को दान देना सबसे उत्तम दान माना गया है ।
301. ऐसी गौशाला जहाँ गौ-माता की सच्ची सेवा होती हो वहाँ जाकर गौ-सेवा में सहभागी होने पर हमें पुण्य की प्राप्ति होती है ।
302. श्री गायत्री मंत्र में इतना बल है कि नित्य सुबह-शाम जप करने वाले साधक के सभी दोष नष्ट हो जाते हैं ।
303. हमारा स्वभाव होना चाहिए कि अच्छी आध्यात्मिक जिज्ञासा हमारे मन में उत्पन्न हो और उसका समाधान हमें धर्म के अंतर्गत शास्त्रों में खोजने से मिल जाए ।
304. सभी के लिए धर्म के नियमों का पालन करना अनिवार्य है क्योंकि भारतीय परंपरा में धर्म को सर्वोपरि स्थान दिया गया है ।
305. धर्म आचरण करने से इतना बल साधक को मिलता है कि कई सिद्धियां उनके सामने जीवन में उपस्थित हो जाती है ।
306. अपना कर्तव्य कर्म करते हुए श्रेष्ठ बात तब होती है जब हम अपने पूरे जीवन को भगवत् साधन में लगा देते हैं ।
307. हमारा संपूर्ण जीवन धर्ममय होना चाहिए क्योंकि धर्म आचरण को सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।
308. जीवन में सत्य बोलने वाले को एक सिद्धि मिल जाती है कि उसकी वाणी सिद्ध हो जाती है कि वह जो कहेगा वह प्रकृति द्वारा पूरा किया जाता है ।
309. अनेक सिद्धियुक्त संत भारतभूमि में हुए हैं जिन्होंने सिर्फ सत्य और अहिंसा के बल पर अनेक सिद्धियां प्राप्त की हैं ।
310. हमारे जीवन में अहंकार की कभी जागृति नहीं होने देनी चाहिए ।
311. धर्म की मर्यादा का पालन करने वाले दंपति के गृहस्थ आश्रम को ही सच्चा गृहस्थ आश्रम माना गया है ।
312. शास्त्र कहते हैं कि किसी भूखे व्यक्ति को ज्यादा समय अपने द्वार पर खड़ा रखने पर उस घर के मालिक को पाप लगता है ।
313. शास्त्रों में कहा गया है कि नारी को पतिव्रता धर्म पालन करने से सिद्धियां स्वतः मिलने लगती है ।
314. मनुष्य द्वारा किए पुण्य और साधन उसके द्वारा किए क्रोध से तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।
315. जीवन में मोह और क्रोध का सर्वदा त्याग करना चाहिए ।
316. सर्वदा अहिंसारूपी धर्म का पालन करना चाहिए ।
317. हमारी इंद्रियों पर हमारा नियंत्रण होना चाहिए और वे धर्म परायण होनी चाहिए ।
318. शास्त्रों में कहा गया है कि घर के श्री ठाकुरजी की सेवा, घर के सदस्यों की सेवा और अपने पति की सेवा के कारण जो नारी पतिव्रत धर्म को निभाती है ऐसी नारी पर प्रभु सदैव प्रसन्न रहते हैं ।
319. धर्म का और शिष्टाचार का गृहस्थ आश्रम में हमें पालन करना चाहिए ।
320. जीवन को स्वच्छ रखने के तीन सूत्र शास्त्रों में दिए गए हैं । शास्त्र कहते हैं कि शौचाचार, शिष्टाचार और सदाचार रखने से जीवन मलिन नहीं होता ।
321. घर की ठाकुरबाड़ी को स्वच्छ रखना एक भक्त का परम कर्तव्य होता है । यह भारतीय परंपरा रही है कि घर का मंदिर स्वच्छ नहीं तो हमारी भक्ति में कमी मानी जाती है । मंदिर के बर्तन, मंदिर में जो वस्त्र प्रभु धारण करते हैं, सब कुछ एकदम स्वच्छ होना चाहिए ।
322. उत्तम बात और सिद्धांत जहाँ से भी मिले उसे ग्रहण करने की जीवन में सदैव तैयारी रखनी चाहिए ।
323. भारतीय अध्यात्म सिखाता है कि किसी की बुरा करना तो दूर की बात, किसी के लिए बुरा सोचना भी नहीं चाहिए ।
324. भारतीय परंपरा रही है कि हमारे आचार-विचार को सदैव ऊँ‍चा रखना चाहिए और वे धर्मयुक्त होने चाहिए ।
325. अपने कर्तव्य कर्म को दृढ़ता से करना धर्म के अंतर्गत माना गया है ।
326. बुरी भावना से और किसी का अकल्याण करने के लिए कहे गए सत्य को शास्त्रों में सत्य नहीं माना गया है । वह सत्य होते हुए भी सत्य नहीं है क्योंकि सच्चा सत्य वही है जिससे सभी का हित हो, सभी का कल्याण हो ।
327. जीवन में कल्याण चाहते हैं तो किसी भी अवस्था में अपनी इंद्रियों का संयम रखना चाहिए और उन्हें शांत रखना चाहिए ।
328. दूसरों से ईर्ष्या करने से और क्रोध करने से हमारा धर्म नष्ट होता है ।
329. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में सदैव अप्रमादी रहना चाहिए ।
330. शास्त्र कहते हैं कि कभी भी जीवन असावधान नहीं रहना चाहिए ।
331. संसार में आत्मज्ञान से बड़ा कोई भी ज्ञान नहीं है ।
332. संसार में सत्य आचरण से बड़ा कोई भी व्रत नहीं है ।
333. जीवन में स्थाई रूप से आध्यात्मिक उन्नति करनी है तो अपने आचार-विचार को सुधारना पड़ेगा ।
334. हमारे भीतर धर्म का ज्ञान होना, प्रभु कृपा का ही सूचक है । प्रभु कृपा के बिना धर्म का ज्ञान हमें आकर्षित ही नहीं करेगा ।
335. धर्म परायण होना, पति की सेवा, सास-ससुर की सेवा, घर में स्वच्छता रखना, यह कर्म नारी के लिए कामधेनु समान है जिससे उसे सब कुछ प्राप्त हो जाता है ।
336. अपना कर्तव्य कर्म करते हुए प्रभु की भक्ति करना सबसे श्रेष्ठ है ।
337. अपने समय का सदुपयोग धर्म आचरण में ही करना चाहिए ।
338. हमें नीति युक्त और संस्कार युक्त जीवन जीना चाहिए ।
339. जो धर्म संगत हो वही कार्य जीवन में करना चाहिए ।
340. मन की बिखरी हुई वृत्तियों का समायोजन एक प्रभु में हो जाए तो यह सबसे श्रेष्ठ बात होती है ।
341. भक्ति करने से हमारे मन और प्राण स्वतः ही स्थिर हो जाते हैं ।
342. भक्ति से चित्त को स्थिर किए बिना परमात्मा तत्व में चित्त का लय होना संभव नहीं है ।
343. हमारे प्राचीन ऋषियों ने परमात्मा तत्व को खोजकर और खुद अनुभव करके उस अध्यात्मिक दर्शन को हमारे लिए उपलब्ध कराया है ।
344. शास्त्र कहते हैं कि हमारा मन जड़ संसार की तरफ आकर्षित होता है, उसे चेतन स्वरूप प्रभु में लय कर देना केवल भक्ति ही सिखाती है ।
345. शास्त्र कहते हैं कि जीवन से अहंकार और आलस्य का सदैव त्याग कर देना चाहिए ।
346. जो बातें प्रभु को अच्छी नहीं लगेगी, वह मेरे जीवन में कभी नहीं हो, इसका हमें सदैव ध्यान रखना चाहिए ।
347. प्रभु की सेवा में सबसे पहले प्रातःकाल हमें उपस्थित होना चाहिए ।
348. जीवन में सम्मान याचना से नहीं मिलता, उसे अर्जित करना पड़ता है, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
349. जीवन में पूर्ण सुख उसे ही मिलता है जो जीवन में आलस्य का सर्वथा त्याग कर देता है ।
350. प्रभु में पूर्ण समर्पण बुद्धि से प्रभु की सेवा नित्य करनी चाहिए ।
351. मीठी मुस्कान के साथ रोज प्रभु को सुबह जगाना चाहिए और प्रभु से मिलना चाहिए ।
352. घर में प्रभु की सेवा कभी भी दास-दासियों पर नहीं छोड़नी चाहिए ।
353. मन में यह भाव जागृत करना चाहिए कि मैं प्रभु से अनन्य प्रेम करता हूँ ।
354. प्रभु को अपनी सेवा से खुश और संतुष्ट रखना हमारा पहला कर्तव्य होता है ।
355. प्रभु से प्रेम करना और प्रभु के बताए आध्यात्मिक सूत्र और ज्ञान को जीवन में उतारना चाहिए ।
356. जीवन में प्रभु से प्रेम नहीं हुआ तो प्रभु प्राप्ति जीवन में बड़ी दुर्लभ हो जाएगी ।
357. किसी से ईर्ष्या और बैर रखने से तीखापन मन में रहेगा जो हमारे आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए एक गलत बात है ।
358. किसी से ईर्ष्या करने में उसका नुकसान नहीं होता, हमारा पहले नुकसान हो जाता है, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
359. अगर हम आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हैं तो सबसे प्रेम करना हमें सीखना पड़ेगा ।
360. जीव की दुर्बुद्धि उसके जीवन को ही खराब कर देती है ।
361. सभी जीवों से मात्र इस भावना से प्रेम करना चाहिए कि मैं उस जीव से ही प्रेम नहीं कर रहा बल्कि उसके भीतर बैठे मेरे प्रभु से प्रेम कर रहा हूँ ।
362. प्रभु को पता होता है हमारे हृदय में क्या भाव छिपा हुआ है और हमारी जरूरत क्या है और वे उस अनुसार हमें देते हैं ।
363. अपने गलत कर्म के लिए हमें अकेले में आत्मग्लानि होती है क्योंकि हमारी अंतरात्मा हमें सत्य का दर्शन कराती है ।
364. हमारे पाप हमें जीवन में डराते हैं और हमें आत्मग्लानि से भर देते हैं ।
365. हमें शास्त्रों की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर उसको जीवन में सदैव ग्रहण करना चाहिए ।
366. शास्त्रों में कहा गया है कि प्रभु का मंगलमय नाम हमें जीवन में सदैव लेना चाहिए ।
367. शास्त्रों में कहा गया है कि श्रीग्रंथों का स्वाध्याय करके प्रभु की श्रीलीलाओं का दर्शन हमें करना चाहिए ।
368. जीवन में सुसंगति हो या नहीं हो पर कुसंगति का तुरंत जीवन से त्याग करना चाहिए ।
369. जीवन में प्रभु के कार्य को सदैव सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और उसे तन-मन-धन से करना चाहिए ।
370. यह सूत्र है कि दूसरे के अमंगल के लिए लिया हुआ कोई भी व्रत हमारे खुद के पतन का कारण बनता है ।
371. कुसंगति के कारण हमारी अच्छाई कब बुराई में परिवर्तित हो जाती है इसका हमें पता भी नहीं चलता ।
372. धर्म का और भक्ति का अंग है कि हमारे द्वारा किसी को कोई कष्ट नहीं पहुँचे ।
373. शास्त्र हमें सिखाता है कि हमें मानवता को कभी नहीं भूलना चाहिए ।
374. शास्त्र कहता है कि सबसे पहले एक मनुष्य से अपेक्षा है कि वह पूर्ण मनुष्य बने और मनुष्य की तरह अपने आचार रखे और व्यवहार करे ।
375. शास्त्र कहते हैं कि पूर्ण मनुष्य वही है जो जिस दृष्टि से खुद को देखता है उसी दृष्टि से दूसरे को भी देखता है ।
376. अगर हम खुद अपना अपमान कराना नहीं चाहते तो हमें किसी का अपमान करने का कोई अधिकार नहीं है ।
377. श्री प्रह्लादजी का भक्ति सूत्र है कि सबको समभाव से और दया से हमें देखना चाहिए ।
378. अगर हम भक्ति मार्ग पर चलते रहेंगे तो हमारे हाथों से जो भी कर्म होगा वह धर्म के अलावा कुछ नहीं हो सकता ।
379. सब पर समदृष्टि रखने वाले को ही महात्मा कहा जाता है ।
380. जो अच्छी और सच्ची बात मानने को तैयार नहीं, उसका भला संसार में कोई भी नहीं कर सकता ।
381. शास्त्र हमें जीवन जीने के लिए हमारे कल्याण का मार्ग बताते हैं ।
382. शास्त्रों में दान की व्याख्या की गई है कि स्वयं कष्ट को सहकर भी दान देना श्रेष्ठतम दान माना गया है ।
383. हमारे शास्त्र हमें जीवन में प्रगाढ़ शांति धारण करने हेतु प्रेरणा देते हैं ।
384. चित्त को शांत रखने के लिए जो कला हमें अध्यात्म सिखाता है उससे प्रतिकूल और अनुकूल परिस्थिति में भी चित्त को शांत रखा जा सकता है ।
385. स्वर्ग के सुख का वर्णन सुनकर भी हमारा मन वहाँ नहीं फंसना चाहिए और वह प्रभु के धाम जाने के लिए तत्पर रहना चाहिए । यही अध्यात्म की कसौटी है ।
386. पुण्य कर्म और सत्कर्म केवल पृथ्वी पर ही हम कर सकते हैं । यह दोनों स्वर्ग में भी नहीं हो सकते । पुण्य कर्म और पाप कर्म को भोगने के लिए हमें स्वर्ग या नर्क मिलता है ।
387. शास्त्रों का मत है कि दुःख के पश्चात सुख जीवन में आता ही है ।
388. हमें अपने चित्त को शांत रखने की कला में प्रवीण होना चाहिए ।
389. पांडवों ने अपने जीवन में सदैव प्रभु श्री कृष्णजी पर अटूट भरोसा रखा था ।
390. भगवती द्रौपदीजी को यह पता था कि कौरवों की सभा में आपत्ति में जब वे फंस गई तो प्रभु श्री कृष्णजी ने ही उन्हें बचाया था । इसलिए वे अपने जीवन में उसके बाद एकमात्र प्रभु श्री कृष्णजी की शरण में हो गई क्योंकि निरंतर रक्षा करने वाले प्रभु ही होते हैं ।
391. प्रभु ही हमारे जीवन में एकमात्र सहारा के रूप में होने चाहिए ।
392. प्रभु ने भगवती द्रौपदीजी के अक्षय पात्र से एक पत्ता आरोगा और प्रभु के तृप्त होते ही पूरे ब्रह्मांड के सभी प्राणी तृप्त हो गए ।
393. प्रभु को तृप्त करने के लिए प्रेम भाव से अर्पित एक पत्ता भी काफी होता है ।
394. हमारे विश्वास के बल पर प्रभु कहीं भी हमारे लिए अपने आपको प्रकट कर देते हैं । प्रभु हर जगह हैं और प्रभु की सत्ता सर्वदा और सर्वत्र है ।
395. ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ प्रभु विराजमान नहीं हो और ऐसा कोई समय नहीं जब प्रभु हमारे साथ नहीं हो ।
396. जीवन में यह विश्वास महत्वपूर्ण है कि केवल और केवल प्रभु ही मुझे किसी आपत्ति से बाहर निकालेंगे क्योंकि केवल प्रभु ही ऐसा करने में सक्षम हैं ।
397. अगर यह विश्वास जीवन में है कि प्रभु ही हमारी रक्षा करेंगे तो फिर दुनिया आश्चर्य से देखती रह जाती है और भक्त की रक्षा प्रभु करते हैं ।
398. प्रभु सिर्फ हमारे भक्ति भाव को देखते हैं । हम क्या अर्पण कर रहे हैं यह प्रभु के लिए गौण है ।
399. जिसने जीवन में प्रभु के लिए प्रेम भाव को खो दिया उसने जीवन में सब कुछ खो दिया । इसलिए जीवन में कभी भी प्रभु के लिए प्रेम भाव को नष्ट नहीं होने देना चाहिए ।
400. हम धन से, ज्ञान से प्रभु को नहीं रिझा सकते । प्रभु को केवल प्रेम भाव प्रिय है, पदार्थ प्रिय नहीं है ।
401. प्रभु की मात्र कृपा जब काम करती है तो प्रतिकूल परिस्थिति में भी अनुकूलता एकाएक ला देती है ।
402. प्रभु से हम जैसा संबंध जोड़ते हैं, उसी प्रकार का संबंध प्रभु तत्काल हमसे जोड़ लेते हैं ।
403. प्रभु तृप्त होते हैं तो पूरा ब्रह्मांड तृप्त हो जाता है । सूत्र यह है कि प्रभु की तृप्ति में जगत की तृप्ति स्वतः ही छिपी हुई होती है ।
404. भक्तों की पुकार पर प्रभु क्षणभर में भक्तों के संकट को हर लेते हैं ।
405. प्रभु की इच्छा से सहमत होने वाला ही सच्चा भक्त कहलाता है ।
406. प्रभु की इच्छा में अपनी इच्छा का लय कर देना चाहिए ।
407. अपने भक्त का अहित कभी भी विपरीत परिस्थिति में भी प्रभु नहीं होने देते ।
408. हम प्रभु से प्रेम करें, यह ठीक है पर प्रभु को भी लगे कि मैं इस भक्त से प्रेम करूं तो इससे बड़ी कोई उपलब्धि उस भक्त के लिए नहीं होती है ।
409. भक्त का विनाश या पतन हो, ऐसा प्रभु कभी होने नहीं देते ।
410. अपने तपोबल, शील, तेज, पतिव्रता धर्म के कारण विश्व पटल पर सबसे महान नारी भगवती सीता माता हैं, ऐसा शास्त्र मत है और ऋषि श्री मार्कंडेयजी ने भगवती द्रौपदीजी को यह बात बताई ।
411. जैसे बादल को हटाए बिना प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के दर्शन नहीं होते वैसे ही मन से संसार को हटाए बिना प्रभु तत्व के दर्शन नहीं होते ।
412. चित्त वृत्ति को संसार में जाने से रोक देने पर ही हम अध्यात्म के मार्ग में आगे बढ़ सकते हैं ।
413. अध्यात्म की दृष्टि से संसार को देखना सीख जाएं तो हमारा मन संसार की किसी भी चीज में फंसेगा नहीं और शांत रहेगा ।
414. एक प्रभु के चिंतन का अभ्यास मन को करा देने से हमारा परम मंगल सुनिश्चित हो जाता है ।
415. प्रभु के चिंतन से आत्मरस में मन डूब जाता है ।
416. श्रद्धा के साथ हमारी भक्ति चली तो निश्चित रूप से वह हमें प्रभु तक पहुँचा देती है ।
417. मन की जितनी तीव्रता प्रभु को पाने के लिए होती है, प्रभु हमारे उतने ही समीप होते हैं ।
418. प्रभु को पाने के लिए अत्यधिक वेग और व्याकुलता जैसे भगवती मीराबाई में या संत श्री रामकृष्ण परमहंसजी में थी, ऐसा पुरुषार्थ बिरले भक्तों में ही होता है ।
419. जो प्रभु की इच्छा को जीवन में प्रधानता देता है, उसकी इच्छा पूर्ति प्रभु जरूर करते हैं ।
420. मेरा कल्याण मेरे से भी ज्यादा मेरे प्रभु जानते हैं, यह भरोसा सदैव जीवन में होना चाहिए ।
421. अपने जीवन का सर्वेसर्वा प्रभु को बना लेना चाहिए ।
422. जीवन के हर निर्णय प्रभु को लेने देना श्रेष्ठतम भक्ति है ।
423. प्रभु पर अटूट विश्वास हमारी हार को जीत में बदल देता है और हमारे पतन को भी उत्थान में बदल देता है ।
424. जीवन में खाली समय निकालकर प्रभु की आराधना करनी चाहिए ।
425. जीवन में हमें मन से प्रभु के समीप ही रहना चाहिए ।
426. अपने मन में प्रभु के अलावा अन्य विचार आने नहीं देना चाहिए ।
427. कन्याओं को भगवती पार्वती माता की आराधना सुखमय दांपत्य के लिए करना चाहिए, ऐसा प्रभु श्री शुकदेवजी ने श्रीमद् भागवतजी महापुराण में कहा है ।
428. वाणी और शब्दों की मिठास से हम सभी को प्रभावित कर सकते हैं ।
429. जीवन-मृत्यु के चक्र के साथ हमारा शरीर बदलता रहता है पर प्राण द्वारा किए कर्म का कर्मफल प्राण के साथ ही चलता है ।
430. जीवन में इष्टबल और धर्मबल की कमाई करनी चाहिए ।
431. भक्ति के कारण हमारी वाणी और भाषा में मिठास आ जाती है और हमारे में विनय और शील आ जाता है ।
432. जो सिद्धांत भारतीय ऋषियों ने बताया वह विश्व पटल पर अन्यत्र कहीं भी कल्पना में भी संभव नहीं है ।
433. सूत्र है कि प्रभु जिससे जो करवाना चाहते हैं उससे वैसा करवा लेते हैं ।
434. प्रभु के संरक्षण में पांडवों ने महाभारत का युद्ध किया और प्रभु के कारण ही वे उसमें जीत पाए ।
435. व्यक्तिगत हित से भी बहुत बड़ा और सर्वोपरि समाज का हित और देश का हित होता है ।
436. जीवन में निर्णय सबसे महत्वपूर्ण होते हैं । पांडवों ने अपने जीवन के सभी निर्णय लेने के अधिकार प्रभु श्री कृष्णजी को सौंप दिए थे ।
437. हमारे जीवन में हमारा अविवेक ही हमारा पराभव करता है, यह श्री महाभारतजी का एक बहुत बड़ा सूत्र है ।
438. प्रभु ने अपने भक्त पांडवों के लिए युद्ध में शस्त्र नहीं उठाने का नियम तोड़ा और दिखाया कि प्रभु अपने भक्तों का हित करने के लिए अपना नियम भी तोड़ सकते हैं ।
439. श्री रामायणजी और श्री महाभारतजी के जीवन जीने के सूत्र हमें अपने जीवन में उतारने चाहिए तब हमारी कभी भी पराजय नहीं होगी ।
440. किसी भी देव, यक्ष, गंधर्व और संत वाणी की कभी भी जीवन में अवहेलना नहीं करनी चाहिए ।
441. हम जहाँ भी जाएं वहाँ के स्थान देवता और भूमि को पूज्य मानना चाहिए ।
442. अध्यात्म के श्रीग्रंथों का जो अधिक-से-अधिक श्रवण करता जाता है वह जीव ज्ञानी बनता जाता है । अध्यात्म के ज्ञान को सबसे बड़ा धन बताया गया है इसलिए जिसके पास अध्यात्म का ज्ञान है वही सबसे धनी है ।
443. शास्त्र कहते हैं कि परिश्रम करने वाला ही जीवन में महान बनता है ।
444. जीवन में सच्चा साथी प्रभु के अलावा कोई नहीं है, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
445. जो अपना जीवन प्रभु प्राप्ति में लगा देता है, वही सच्चा बुद्धिमान है ।
446. जो प्रभु की भक्ति नहीं करता शास्त्रों में उसका जीवन निरर्थक बताया गया है ।
447. मनुष्य के मन का जो वेग है उसे वायु से भी अधिक वेगवान बताया गया है ।
448. जीवन में किए सत्कर्म ही हमारे सच्चे मित्र होते हैं और वे ही अंत में हमारे साथ जाते हैं ।
449. शास्त्र कहते हैं कि असावधानी के कारण मनुष्य अपना सबसे बड़ा नुकसान कर बैठता है ।
450. भक्ति करने वाले जीव की पूरे संसार में कीर्ति हो जाती है ।
451. कथा अमृत के माध्यम से प्रभु प्रेम के दान को सर्वोच्च दान बताया गया है ।
452. किसी भी परिस्थिति में अभय दान देने वाले केवल प्रभु ही हैं ।
453. आरोग्य जीवन को जीवन का सबसे बड़ा लाभ बताया गया है ।
454. शास्त्रों में कहा गया है कि उत्तम सुख संतुष्टि में है यानी जिसने जीवन में संतोष धारण कर लिया वही सबसे सुखी है ।
455. जीवन में सदैव प्रभु के साथ हम रहें, यह बोध हमारे हृदय में उठते ही हमारा कल्याण सुनिश्चित हो जाता है ।
456. सत्य का नियम जीवन में पालन करने वाले के लिए मृत्यु के बाद स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं ।
457. आध्यात्मिक सिद्धांत, सामाजिक सिद्धांत, नैतिक सिद्धांत और राजनीतिक सिद्धांत से भरपूर अदभुत श्रीग्रंथ श्री महाभारतजी है ।
458. हम संसार के पदार्थ के लिए तरसते हैं और लालायित रहते हैं क्योंकि हम जीवन में संतोषी नहीं हैं । संतोष जीवन में आने के बाद सुख खोजने जाना नहीं पड़ेगा बल्कि सुख हमें खोजते हुए स्वयं हमारी गोद में आ जाएगा ।
459. शरीर की आवश्यकता बहुत थोड़ी होती है पर हमारे मन की आवश्यकता बहुत बड़ी होती है जिसके कारण मनुष्य जीवनभर व्याकुल रहता है ।
460. शास्त्र कहते हैं कि लाचारी से जीवन जीने के लिए मनुष्य का जन्म नहीं मिला है । जीवन उत्तम होना चाहिए, यह श्री महाभारतजी का सूत्र है । नकारात्मक शैली के जीवन का विचार भारतीय वेद-वेदांत ने कभी भी नहीं किया है ।
461. हमें जीवन में देखना चाहिए कि हमने शांति से बैठकर कभी प्रभु के ध्यान के लिए समय निकाला है क्या ?
462. हम जीवन की व्यर्थ की भाग-दौड़ में सदा भागते रहते हैं और प्रभु के लिए जीवन में समय निकालना, जो सबसे श्रेष्ठ बात है, वह नहीं कर पाते ।
463. प्रभु के लिए शांति से समय वही निकाल पाता है जिसने जीवन में संतोष धारण कर लिया है ।
464. जो संतोषी बन गया उसको दुःखी करने का कारण कोई भी नहीं बन सकता ।
465. ऊँचे सिद्धांतों का जीवन जीने वाले और सादे संतोषी महापुरुष आज भी भारत भूमि में उपलब्ध हैं ।
466. शास्त्र कहते हैं कि एक चक्रवर्ती राजा को भी वह सुख प्राप्त नहीं जो एक संतोषी को प्राप्त होता है ।
467. कामनाएं हमें लाचार बनाती हैं । कामनाओं का विसर्जन हो तो लाचारी तुरंत खत्म हो जाती है ।
468. हमारा चित्त कभी भी धन से तृप्त नहीं हो सकता, यह सिद्धांत है ।
469. शास्त्र कहते हैं कि संतोषी जीव के हाथ से दिया तुलसी पत्र भी बड़े-से-बड़े भूखे को तृप्त करने में सक्षम होता है ।
470. प्रभु के साथ जीव का मिलन करवा दे, वह अध्यात्म का धन सबसे बड़ा धन माना गया है ।
471. हमारे जीवन में स्वर्ण धन, भूमि धन, गोधन और नाना प्रकार के धन होते हैं मगर सच्चा सुख तभी मिलता है जब संतोष धन जीवन में आता है ।
472. अहंकार वह आदत है जिसका त्याग करने से मनुष्य सभी लोगों को प्रभावित करता है और सभी लोगों का प्रिय भी बन जाता है ।
473. किसी का भी हृदय एक अहंकारी से प्रेम करने को तैयार नहीं होता, यह सिद्धांत है ।
474. प्रभु को जीव में अहंकार एकदम प्रिय नहीं है । इसलिए कोई भी अहंकारी जीव कभी भी प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकता, यह सिद्धांत है ।
475. शास्त्र कहते हैं कि क्रोध को छोड़ने से जीवन में बहुत जल्दी सुख आ जाता है ।
476. जिसने जीवन में क्रोध छोड़ दिया उसको जीवन में पछताने की बारी कभी नहीं आती ।
477. क्रोध सामने वाले के हृदय में हमारे लिए अलगाव निर्माण कर देता है ।
478. शास्त्र कहते हैं कि क्रोध नहीं करने वाला जीव ही सुखी और शांत रहता है ।
479. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु ने कहा है कि काम और क्रोध को रोकने का जिसने अभ्यास कर लिया वह जीव सबसे सुखी होता है ।
480. जो हमारे शास्त्रों में सिद्धांत बताए गए हैं वे आदिकाल से प्रचलित हैं और हमारे ऋषियों के अनुभव का मिश्रण उनमें है, इसलिए उनकी गरिमा बहुत अधिक है ।
481. शास्त्रों के बताए मार्ग पर जो जीव चलता है उसे जीवन में कभी भी पछताना नहीं पड़ता और कभी उसका पतन नहीं होता ।
482. शास्त्र कहते हैं कि गौ-माता से निर्माण हुई जो सामग्री होती है वह सबसे सात्विक और सर्वोत्तम होती है जैसे दूध, घी इत्यादि ।
483. गौ-माता इतनी श्रेष्ठ हैं कि उनके गोबर और गोमूत्र से देव विग्रह की शुद्धि करने का विधान है ।
484. समस्त देव प्रतिमा के मानव स्पर्श आदि दोष दूर करने के लिए गोबर और गोमूत्र रूपी पंचद्रव्य का उपयोग होता है ।
485. कलियुग में सबसे बड़ा तप माना गया है कि सारे कष्टों को सहकर भी अपना कर्तव्य कर्म पूरा करते हुए प्रभु के लिए समय निकालना ।
486. आध्यात्मिक ज्ञान को ही शास्त्रों में सच्चा ज्ञान माना गया है ।
487. शास्त्रों में अहंकार को जीव का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है ।
488. लोभ एक ऐसा रोग है जो कभी भी ठीक नहीं होता, ऐसा शास्त्र मत है । जिसके पास जो है उससे भी अधिक पाने का लोभ उसके भीतर होता है ।
489. सबका हित करने वाला, सबका कल्याण करने वाला और ऐसा लक्ष्य और व्रत जीवन में रखने वाला सच्चा साधु होता है ।
490. अपने मन की मलिनता यानी गंदगी को साफ करना, शास्त्रों में सबसे उत्तम स्नान माना गया है ।
491. हमारा दृष्टिकोण होना चाहिए कि हर जीव के भीतर स्थित हमारे प्रभु को मैं कैसे अनुकूलता प्रदान कर सकूं । शास्त्रों में ऐसा करने वाले को श्रेष्ठ भक्त माना गया है ।
492. आध्यात्मिक ज्ञान के कारण किस समय क्या करना उचित है, यह बात झट से हमारे ध्यान में आ जाती है ।
493. शास्त्र कहते हैं कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि परमार्थ और अध्यात्म को हम जीवन के अंत के लिए छोड़ देते हैं ।
494. हमारे ऋषि जहाँ हजारों वर्ष पहले पहुँच चुके हैं वहाँ विज्ञान आज धीरे-धीरे पहुँचने का प्रयास कर रहा है ।
495. आज का आधुनिक विज्ञान जितनी प्रगति करेगा भारतीय आध्यात्मिक शास्त्र उतने ही प्रामाणिक होते चले जाएंगे और उन्हें संसार में प्रतिष्ठा मिलती जाएगी ।
496. शास्त्र कहते हैं कि कोई भी युद्ध, बल और शौर्य से भी ज्यादा धर्मबल से जीता जाता है ।
497. शास्त्र कहते हैं कि हमारे जीवन में विश्व की अदृश्य शक्तियां सदैव हमारी परीक्षा लेती है और उसमें उत्तीर्ण होने वाले को जीवन में आगे बढ़ाती जाती है ।
498. प्रभु जब प्रसन्न होकर वर मांगने को कहें तो शास्त्र कहते हैं कि यही प्रभु से मांगना चाहिए कि आपको मेरे हित में जो उचित लगे वह कर दें ।
499. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु से खुद वर नहीं मांगना चाहिए, देने वाले प्रभु पर इसकी जिम्मेदारी छोड़ देनी चाहिए तो प्रभु उत्तम-से-उत्तम चीज हमें देते हैं, जो अक्षुण्ण रहती है और कभी नष्ट नहीं होती ।
500. शास्त्र कहते हैं कि सभी जीवन के कर्म प्रभु की भक्ति के बिना अधूरे हैं ।
501. शास्त्रों में सबसे उत्तम ध्यान प्रभु के श्रीकमलचरणों के ध्यान को बताया गया है ।
502. संसार के सभी पदार्थों को जानकर भी क्या फायदा ? यदि जानने वाले प्रभु को हमने जीवन में जाना नहीं, तो हमारा मानव जीवन ही व्यर्थ है । इसलिए मन को प्रभु में लीन करना मानव जन्म की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है ।
503. हम तृप्ति का अनुभव संसार के पदार्थ से करना चाहते हैं जबकि सच्ची तृप्ति हमारे भीतर स्थित प्रभु से संयोग होने पर ही हमें मिल सकती है । प्रभु के साक्षात्कार के बाद जीवन में कुछ भी अर्जित करना शेष नहीं बचता ।
504. प्रमु की प्राप्ति के बाद भी भक्त कर्म तो करता है पर वह कर्म फिर उसे कभी कर्मबंधन में बांधता नहीं ।
505. शास्त्र कहते हैं कि पुनः-पुनः सत्संग करते रहना चाहिए और सत्संग के उपदेश को सुनना चाहिए, इससे मन की मलिनता निरंतर हटती रहती है ।
506. संसार का वातावरण ही ऐसा है कि हमारे मन में मैल जम जाता है, इसलिए बार-बार कथा, उपदेश और सत्संग सुनते रहना चाहिए ।
507. सत्संग इसलिए भी बार-बार सुनना चाहिए क्योंकि कोई भी सिद्धांत हमें एक बार कहने से हमसे चिपकता नहीं, बार-बार सुनने से ही हम उस सिद्धांत को पकड़ पाते हैं ।
508. शास्त्र कहते हैं कि बिना पूछे किसी को परमार्थ का परामर्श या सलाह नहीं देना चाहिए ।
509. शास्त्र कहते हैं कि कभी भी जीवन में झूठ नहीं बोलना चाहिए, झूठ बोलने वाला व्यक्ति सबके मन में अविश्वास का निर्माण करता है । शास्त्र आगे कहते हैं कि झूठ बोलने वाले व्यक्ति के सच पर भी कोई विश्वास नहीं करता ।
510. शास्त्र कहते हैं कि किसी दूसरे का धन को देखने का कभी मौका लगे तो अंधे की तरह जाना चाहिए और अंधे की तरह ही बिना देखे वापस आ जाना चाहिए ।
511. किसी से भी अमर्यादा का व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
512. शास्त्र कहते हैं कि किसी से भी अप्रिय वार्ता कभी नहीं करनी चाहिए । अप्रिय बात जीवन में कभी भी किसी से नहीं कहनी चाहिए ।
513. किसी से भी अपनी प्रशंसा सुनकर अपने भीतर अहंकार का भाव नहीं आने देना चाहिए ।
514. किसी की भी गोपनीय बात को सदा गोपनीय रखनी चाहिए, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
515. किसी भी कार्य को करते समय प्रभु का आह्वान करने पर हमारी रक्षा का दायित्व प्रभु का हो जाता है ।
516. प्रभु की कृपा होती है तो चुनौतीपूर्ण कार्य भी बहुत आसानी से सफल हो जाते हैं ।
517. प्रभु की कृपा हमें मिलती है तभी हमारा जीवन सूझबूझ के साथ बीतता है ।
518. प्रभु कृपा से ही हमें जीवन जीने का सच्चा विवेक मिलता है ।
519. शास्त्र कहते हैं कि बुरे समय में हमें सहना सीखना चाहिए । कोई प्रमाद हमसे नहीं हो जिससे वह बुरा समय और भी बढ़ता जाए ।
520. साधक को जीवन जीने की सावधानी सबसे पहले रखनी चाहिए कि कोई गलत और अनुचित कार्य उससे जीवन में नहीं हो ।
521. यह प्रभु श्री कृष्णजी की श्री अर्जुनजी पर असीम कृपा थी जिसके कारण छोटे होते हुए भी वे कर्ण से हर जगह जीते ।
522. छोटी-सी सेना लेकर पांडव हमेशा कौरव से जीते और अधिक संपत्ति और अधिक सेना लेकर भी कौरव हमेशा हारते रहे । ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि प्रभु की कृपा सदैव पांडवों के साथ थी ।
523. जीवन में सत्य की तपस्या में बहुत बड़ा बल होता है ।
524. शास्त्र कहते हैं कि सारी समस्याओं के समाधान का मूल हमारे मन में ही छिपा हुआ होता है ।
525. संसार को हम जानने का प्रयास करते हैं पर संसार को बनाने वाले को जानने का प्रयास नहीं करते । संसार को बनाने वाले को जानने का प्रयास करने का नाम ही अध्यात्म है ।
526. पूजा, पाठ, जप यह सब हमें प्रभु की तरफ ले जाने वाले मार्ग हैं ।
527. प्रभु की बनाई सृष्टि हमें कभी नहीं बांधती । हमारे जीवन की बनाई हमारी अपनी सृष्टि ही हमें बांधती है ।
528. प्रभु तत्व और हमारे बीच में जैसे बादल आ गए, ऐसा मानना चाहिए । जितना-जितना हम जड़ संसार का चिंतन करेंगे यह बादल घने होते जाएंगे और जितना-जितना हम प्रभु का चिंतन करेंगे यह बादल छंटते जाएंगे ।
529. साधक वह होता है जो संसार के दृश्य को तो देखता है पर अपने मन को उस दृश्य से जोड़ता नहीं ।
530. साधक वह होता है जो संसार के दृश्य को तो देखता है पर अपने मन में राग, द्वेष और ईर्ष्या का निर्माण नहीं होने देता ।
531. जब महाभारत युद्ध से पहले श्री अर्जुनजी और दुर्योधन प्रभु से सहायता मांगने के लिए पहुँचे तो श्री अर्जुनजी प्रभु के श्रीकमलचरणों की तरफ हाथ जोड़कर खड़े हुए । प्रभु ने उन्हें पहले मांगने का मौका दिया और उन्होंने प्रभु को चुना । प्रभु ने उनसे कहा कि सेना ले लो तो उन्होंने कहा कि मुझे एक लाख बार भी निर्णय करने का मौका मिलेगा तो मैं आपको ही लूँगा ।
532. श्री अर्जुनजी अपने जीवन में सदैव यही चाहते थे कि प्रभु उनके पक्ष में रहें, उनको अपनी शस्त्र विद्या और सेना से कहीं ज्यादा प्रभु का भरोसा था ।
533. जीवन के सूत्र के रूप में अपनाना चाहिए कि प्रभु को सर्वदा अपने साथ रखें क्योंकि प्रभु ही हमारा सर्वाधिक उपकार कर सकते हैं ।
534. युद्ध में अपने घोड़े की लगाम प्रभु के श्रीहाथों में श्री अर्जुनजी ने सौंप दी । इसका सीधा अर्थ यह था कि उन्होंने अपने इंद्रियों के घोड़े की लगाम प्रभु को सौंप दी ।
535. श्री अर्जुनजी अपने जीवन की डोर प्रभु के श्रीहाथों में सौंपकर निश्चिंत और निर्भय हो गए ।
536. एक तरफ सारे संसार की भौतिक सत्ता हो और संपत्ति हो और दूसरी तरफ प्रभु हो तो हम किसका चुनाव करें ? हमारा मन अधिक बार दुर्योधन बन जाता है और हम भौतिक सत्ता और संपत्ति को चुन लेते हैं यानी संसार को चुन लेते हैं । हमें अपने मन को श्री अर्जुनजी बनाना चाहिए जिससे कि हम चुनाव प्रभु का कर सकें ।
537. भगवती मीराबाई को राणा ने जब कहा कि रानी की सुविधा और श्रीगोविंद में से एक को चुन लो और उन्होंने बिना विलंब किए प्रभु को तुरंत चुन लिया । हमारा मन भी भगवती मीराबाई की तरह प्रबल होना चाहिए तभी हमारा चुनाव केवल प्रभु का होगा ।
538. श्री अर्जुनजी की कितनी बड़ी परीक्षा प्रभु ने ली कि एक तरफ अपनी पूरी सशस्त्र नारायणी सेना और दूसरे तरफ खुद को रख दिया । फिर अपने पलड़े का वजन कम करने के लिए प्रभु ने युद्ध में शामिल नहीं होने की, शस्त्र नहीं उठाने की, प्रहार नहीं करने का व्रत भी ले लिया । इतने के बाद भी श्री अर्जुनजी ने प्रभु का ही चुनाव किया ।
539. कौरवों की राज्यसभा में श्री भीष्म पितामह ने कहा कि जिनके साथ प्रभु श्री कृष्णजी हो उनको त्रिलोकी में सभी मिलकर भी आ जाए तो भी जीत नहीं सकते क्योंकि वे प्रभु के संरक्षण में हैं ।
540. श्री महाभारतजी में हमें प्रभु की कृपा पांडवों पर सर्वत्र दिखती है । यह प्रभु की कृपा हमारे जीवन के उत्थान के लिए भी सबसे बड़ा माध्यम बन सकती है ।
541. किसी से भी किए हमारे गलत व्यवहार के कारण प्रभु को कष्ट न पहुँचे, यह पांडवों का जीवन जीने का मूल सूत्र था ।
542. अपने सद्गुणों के कारण ही मनुष्य की संसार में पहचान होती है ।
543. अपने पूर्वजों द्वारा किए अच्छे कार्य को कभी बंद नहीं करना चाहिए, उसे करते रहना चाहिए ।
544. हमारा जीवन सुखमय हो और हमारे द्वारा लोगों का जीवन भी सुखमय बनाया जा सके, ऐसा प्रयास जीवन में करना चाहिए ।
545. अपनी सज्जनता, कुलीनता और धर्म को कभी नष्ट नहीं होने देना चाहिए ।
546. युद्ध करने से युद्ध न करना सर्वदा कल्याणकारी होता है । इसलिए युद्ध की जगह शांति से कार्य लेना चाहिए, संतोष से कार्य लेना चाहिए । यह महाभारतजी का पहला सूत्र है । दूसरे सूत्र के रूप में श्री महाभारतजी अपने अधिकार के लिए युद्ध का समर्थन भी करती है ।
547. शास्त्र कहते हैं कि अपने अधिकार को कभी भी तिलांजलि नहीं देनी चाहिए । अपने अधिकार के लिए संघर्ष करना चाहिए ।
548. कभी-कभी अध्यात्म के सूत्र गलत समय और गलत तरीके से हमारे मन में ला दिए जाते हैं जो कि भ्रम पैदा करते हैं, इससे सर्वदा बचना चाहिए ।
549. धन का, संपत्ति का लोभ कभी समाप्त नहीं होता, इसलिए आध्यात्मिक लोग इकट्ठा करने वाले को नहीं बल्कि छोड़ने वाले को बड़ा मानते हैं ।
550. आध्यात्मिक जीवन जीने वाले बड़े उच्चकोटि का जीवन जीते हैं और किसी चीज के कारण अपना पतन नहीं होने देते ।
551. कभी जीवन में अपयश मिले, ऐसा काम कभी नहीं करना चाहिए ।
552. पांडव और खासकर पांडवों में श्री अर्जुनजी युद्ध से पहले इतने अवसाद में थे कि वे कैसे भी संभले ही नहीं । प्रभु के प्रभाव के कारण श्रीमद् भगवद् गीताजी के उपदेश के बाद ही वे संभल पाए ।
553. कभी-कभी अधर्म ही धर्म का रूप लेकर आता है और अधर्म ही धर्म है इस तरह हमें प्रभावित करके जाता है ।
554. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के उपदेशों का जीवन में पालन करना चाहिए तभी हमारा विवेक जागृत रहता है ।
555. प्रभु अपने भक्तों के सबसे बड़े शुभचिंतक और हितैषी होते हैं और उनकी आध्यात्मिक उन्नति सदैव देखना चाहते हैं ।
556. जो उपदेश देता है उसे पहले अपने आचरण में वह उपदेश लाना होता है, तभी उसका उपदेश दूसरों पर काम करता है ।
557. पांडवों के धर्मवृक्ष के मूल में प्रभु श्री कृष्णजी थे क्योंकि धर्म के मूल में सदैव प्रभु स्वयं होते हैं ।
558. प्रभु की भक्ति जब जीवन में सर्वत्र बढ़ती रहती है तो हमारे जीवन के मूल प्रभु आ जाते हैं ।
559. प्रभु जिसके जीवन रथ की बागडोर संभाल लेते हैं उसका पराभव करने का सामर्थ्‍य पूरे भूमंडल में किसी का नहीं होता ।
560. प्रभु के श्रीहाथों में जब हमारे जीवन की बागडोर आ जाती है तो हमारा कोई भी, कभी भी, कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता ।
561. प्रभु के लिए हमारे मन में भरपूर प्रेम होना चाहिए ।
562. अध्यात्म की बात सुनने में सबको आनंद आता है पर उसे जीवन में कुछ बिरले ही उतार पाते हैं ।
563. उत्तम परमार्थ करने वाला कोई बिरला ही होता है ।
564. अपने मन को अर्थ और काम की वासना से भरना नहीं चाहिए ।
565. समाज में परमार्थ करने वाले लोगों का सदैव आदर होता आया है ।
566. शास्त्र जिस बात को गलत मानता है वह जीवन में कदापि नहीं करनी चाहिए ।
567. अध्यात्म की नीति के साथ चलने वाला सदैव जीत में रहता है ।
568. हमारे भीतर अच्छाई के प्रति श्रद्धा भाव होना चाहिए ।
569. हमारा रुझान अच्छाई की तरफ ही होना चाहिए ।
570. बुराई के प्रति हमारे मन में अरुचि का भाव होना चाहिए ।
571. भक्तों के आचरण हमारे स्मृति में रखने योग्य होते हैं ।
572. सदाचार को जानते हुए उसे जीवन में उतारना चाहिए ।
573. दुराचार को जानते हुए उसे जीवन में कभी भी हावी नहीं होने देना चाहिए ।
574. प्रभु पर परम विश्वास रखना सबसे बड़ा धर्म माना गया है ।
575. अध्यात्म के मार्ग में उन्नति के बाधक तत्वों को जीवन से दूर रखना चाहिए ।
576. गलत कार्य के लिए हमारे मन में लज्जा का भाव होना चाहिए ।
577. रोज-रोज अपनी आध्यात्मिक उन्नति का विचार जीवन में करते चलना चाहिए ।
578. अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रचार संसार की वाहवाही लेने के लिए कभी नहीं करना चाहिए ।
579. शास्त्र कहते हैं कि किसी के अधिकार का कभी हनन नहीं करना चाहिए ।
580. काम, क्रोध, मद, लोभ आदि शत्रु हमारी आध्यात्मिक उन्नति का अवरोध न कर पाएं, इसके लिए सदैव जीवन में सावधान रहना चाहिए ।
581. संकट आने पर प्रभु को याद करना चाहिए और संकट से भयभीत नहीं होना चाहिए ।
582. प्रभु को याद करने से प्रभु की कृपा संकट को टाल देती है ।
583. प्रभु के मार्ग पर चले बिना परमानंद मिलना असंभव है ।
584. प्रभु की भक्ति करने पर ही परमानंद मिल सकता है ।
585. संसार दिखना बंद होगा तो ही प्रभु की अनुभूति संभव होगी ।
586. अजगर, शेर और हाथी को वश में करना आसान है पर अपने मन को वश में करना बेहद कठिन है । यह भक्ति बिना संभव ही नहीं है ।
587. पूरा संसार का चक्र हमारे मन के अंदर ही घूम रहा है ।
588. जो प्राप्त नहीं हुआ उसके लिए कभी लोभ नहीं करना चाहिए ।
589. अपने जीवन का आध्यात्मिक लक्ष्य सर्वप्रथम निर्धारित करना चाहिए ।
590. हमें प्रभु के श्रीकमलचरणों में पहुँचना है, यह लक्ष्य भक्त को अपने जीवन में निर्धारित करके रखना चाहिए ।
591. रोज अपने आध्यात्मिक लक्ष्य की तरफ एक कदम बढ़ाना चाहिए ।
592. अपने आध्यात्मिक साधन को रोजाना थोड़ा-थोड़ा करने से वह कभी भी खंडित नहीं होता ।
593. जीवन में आदत बना लेनी चाहिए कि मैं अपने समय को कभी व्यर्थ नहीं करूँगा ।
594. शास्त्र कहते हैं कि गंवाया हुआ समय कभी भी वापस नहीं आता ।
595. हमारा समय हमारी सबसे बड़ी संपत्ति होती है ।
596. खोया हुआ धन वापस मिल सकता है पर खोया हुआ समय कभी भी वापस नहीं मिलता ।
597. अपनी इंद्रियों को संयम में रखने का दृढ़ संकल्प मन में होना चाहिए ।
598. जीवन में सम्मान और अपमान में कभी भी उलझना नहीं चाहिए ।
599. जीवन में प्रतिकूलता से विचलित नहीं होने वाला ही सफल होता है ।
600. अपनी बुद्धि को जीवन के आध्यात्मिक विकास में लगाना चाहिए ।
601. भक्ति करने वाले का निरंतर आध्यात्मिक विकास होता चला जाता है ।
602. अपनी ऊर्जा को अध्यात्म में ही लगाना चाहिए ।
603. जीवन में अपने आध्यात्मिक ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए ।
604. बुद्धिवान, ज्ञानवान और प्रज्ञावान जीवों से ही अपना संबंध रखना चाहिए ।
605. आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के बाद हमारा जीवन ही बदल जाता है ।
606. आध्यात्मिक विषय के जानकार संतों से मार्गदर्शन लेना चाहिए ।
607. शास्त्रों में आरोग्य रहने को सबसे पहला सुख माना गया है ।
608. शास्त्र कहते हैं कि तरोताजा रहने के लिए गहरी निद्रा की जरूरत होती है जो जल्दी सोने और जल्दी उठने से ही मिलती है ।
609. आलस्य का जीवन से सर्वदा त्याग करना चाहिए ।
610. शास्त्रों में आलस्य को जीवन का महाशत्रु बताया गया है ।
611. शास्त्र कहते हैं कि वाणी का संयम सभी के लिए परम अनिवार्य है ।
612. शास्त्र कहते हैं कि कटा हुआ पेड़ फिर से हरा हो जाता है, कटा हुआ घाव फिर से भर जाता है पर वाणी से किया घाव कभी भी नहीं भरता ।
613. ज्ञानी का सबसे बड़ा शत्रु उसके ज्ञान का अहंकार होता है ।
614. जिसने जीवन में आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया है उससे जीवन में गलती होने की संभावना बहुत कम हो जाती है ।
615. शास्त्र कहते हैं कि जो व्यवहार हमें अपने लिए अच्छा नहीं लगता वह हमें दूसरों से कभी भी नहीं करना चाहिए ।
616. हमेशा संतों से अध्यात्म के श्रेष्‍ठ प्रश्न ही पूछने चाहिए ।
617. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में प्रमाद करना एकदम गलत है ।
618. क्रोध, लोभ, प्रमाद और आलस्य के कारण हम जीवन में असावधान अवस्था में आ जाते हैं ।
619. शास्त्र कहते हैं कि आवश्यक नहीं होने पर भी हम जिन पदार्थों को याद करते हैं उसकी जरूरत हमें महसूस होने लगती है ।
620. शास्त्र कहते हैं कि पहले गलत कामना को उठने ही नहीं देना चाहिए जिससे गलत संकल्प का निर्माण ही नहीं हो ।
621. बढ़िया-से-बढ़िया, सुंदर-से-सुंदर और बड़े-से-बड़े सांसारिक भोग के पदार्थ जीवन में आएं तो भी हमारा विचार यही होना चाहिए कि मुझे नहीं चाहिए क्योंकि मेरी प्रभु की भक्ति ही सबसे श्रेष्ठ है ।
622. संसार के भोगों के विचार को रोक लिया तो जीवन में कामना का निर्माण नहीं होगा ।
623. जीवन में भोग इच्छा नहीं होने के कारण कामना निर्माण नहीं होगी और हम बहुत सारे विकारों से बच जाएंगे ।
624. भक्तों के मन में यह सिद्धांत जागृत हो जाता है कि उन्हें सांसारिक भोगों का खेल नहीं खेलना और वे संसार को यह खेल खेलने देते हैं ।
625. असावधानता और प्रमाद के कारण ही जीवन में क्लेश आता है ।
626. संसार के विषयों का चिंतन ही हमारे विकारों की जागृति का मुख्य कारण होता है ।
627. संसार के विषय का चिंतन करेंगे तो एक-न-एक दिन उसमें जरूर फंसेंगे क्योंकि चिंतन हुआ तो फंसना निश्चित है ।
628. हमारे चिंतन की धारा को प्रभु की तरफ मोड़ देना चाहिए यानी जीवन में चिंतन प्रभु का ही होना चाहिए ।
629. शास्त्र उसे बालक ही मानते हैं जो वृद्ध होकर भी अध्यात्म के बारे में कुछ नहीं जानता और कुछ नहीं समझता ।
630. श्रेष्ठ भक्तों को मृत्यु का डर नहीं होता क्योंकि वे मृत्यु को एक उत्सव के रूप में मानते हैं कि अब मृत्यु के बाद वे प्रभु के पास जा रहे हैं ।
631. मृत्यु की बेला पर भक्त का मन प्रभु के अलावा कहीं भी नहीं अटकता ।
632. जिसे अध्यात्म में उन्नति चाहिए उसे संसार के विषयों से पूरा वैराग्य लेने की जरूरत है ।
633. अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाला एकांत प्रिय हो जाता है ।
634. अध्यात्म में कहा गया है कि संसार में सच्ची संपत्ति अर्जन करनी हो तो वह आध्यात्मिक ज्ञान की संपत्ति ही है ।
635. ब्रह्मज्ञान और आत्मज्ञान की संपत्ति को संसार की सबसे बड़ी संपत्ति माना गया है ।
636. ब्रह्मज्ञान और आत्मज्ञान की संपत्ति इतनी दुर्लभ है कि प्रभु कहते हैं कि यह करोड़ों में किसी एक बिरले को ही मिलती है ।
637. पापाचरण जारी रखने से हमारी जीवन की गति ही बिगड़ जाती है ।
638. जैसे पेड़ में आग लगने से घोसले में रहने वाली पक्षी उसे छोड़ जाते हैं वैसे ही पापाचरण करने से हमारे अच्छे आचरण हमें छोड़ जाते हैं ।
639. काम, क्रोध, मोह, लोभ, ईर्ष्या, राग, द्वेष और अहंकार इत्यादि से अपने जीवन को हमें मुक्त रखना चाहिए । यह भक्ति से ही संभव है ।
640. सारे आध्यात्मिक ज्ञान को जानकर हमें क्या करना चाहिए ? हमें प्रभु की प्राप्ति का जीवन में प्रयास करना चाहिए ।
641. अहंकार आध्यात्मिक मार्ग का इतना बड़ा शत्रु है कि वह हमारे प्रभु मिलन को टाल देता है ।
642. किसी भी साधन के साथ अगर प्रभु की भक्ति नहीं की तो वह किया हुआ साधन पूरी तरह से प्रभावी नहीं होता ।
643. किसी भी वैदिक पूजा के बाद प्रभु से क्षमायाचना की प्रार्थना करना बहुत जरूरी है क्योंकि हमसे न्यूनता, अधिकता और भावहीनता के कारण अकुशल पूजा होती है, इसलिए हमें प्रभु से क्षमायाचना करनी चाहिए ।
644. जीवन में गलती की शुद्धि के लिए उस गलती को प्रभु को अर्पण करना, प्रभु से क्षमायाचना की प्रार्थना करना और उस गलती को जीवन में नहीं दोहराने का संकल्प प्रभु के सामने लेना ही उस गलती के मार्जन का एकमात्र तरीका है ।
645. प्रभु को जानने हेतु ही श्री वेदजी का विस्तार प्रभु श्री ब्रह्माजी ने किया और श्री वेदजी का विभाजन प्रभु श्री वेदव्यासजी ने किया ।
646. श्री वेदजी की महिमा कम नहीं है और प्रभु की भक्ति करने वाले के लिए तो वे कल्पवृक्ष बन जाते हैं ।
647. हम कर्मकांड से धन तो पा सकते हैं पर परमधन (प्रभु) को केवल भक्ति से ही पा सकते हैं । इससे पता चलता है कि भक्ति कितनी दुर्लभ है ।
648. भक्ति करने से अध्यात्म के सभी संशय को दूर करने की क्षमता हमारे भीतर आ जाती है ।
649. प्रभु का ध्यान करने से हमारा मन शांत होता है, इसलिए प्रभु का ध्यान करना सबसे श्रेष्ठ होता है ।
650. अपने मन और बुद्धि को प्रभु में विलीन कर देना भक्ति की सच्ची उपलब्धि है ।
651. आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के बाद एकांत में उसका चिंतन जरूर किया जाना चाहिए, यह अनिवार्य रूप से होना चाहिए तभी उस ज्ञान की गहराई में हम उतर पाएंगें ।
652. भक्ति करने वाले जीव की संसार से व्यवहार की भूमिका ही बदल जाती है क्योंकि उसे हर तरफ प्रभु के दर्शन होने लगते हैं ।
653. भक्त का व्यवहार किसी से भी गलत नहीं होता क्योंकि वह प्रभु का दर्शन हर तरफ करने लगता है ।
654. भक्त जहाँ नहाता है वहाँ भगवती गंगा माता अदृश्य रूप से उपस्थित हो जाती है, जहाँ चलता है वह स्थान तीर्थ बन जाता है, जो बोलता है वह श्रीहरि कथा बन जाती है ।
655. श्री अर्जुनजी को प्रभु श्री कृष्णजी से ज्यादा प्रिय कोई नहीं था, उनकी प्रियता सबसे ज्यादा प्रभु के साथ ही थी ।
656. कौरवों का विनाश युद्ध से पहले ही सुनिश्चित था क्योंकि प्रभु पांडवों के साथ थे और सिद्धांत यह है कि जिस तरफ प्रभु होते हैं विजयश्री उस पक्ष की ही होती है ।
657. श्री अर्जुनजी को प्रभु का पूर्ण आश्रय था क्योंकि उनके जीवन रथ की बागडोर प्रभु के श्रीहाथों में थी ।
658. प्रभु श्री कृष्णजी ने पांडवों का पूरा दायित्व अपने श्रीहाथों में ले रखा था इसलिए पांडव युद्ध के परिणाम को लेकर अपनी जीत के लिए निश्चिंत थे ।
659. शास्त्र कहते हैं कि हमें बहकाकर और भड़काकर हमसे गलत काम करवाने वाले लोगों से हमें सदैव सतर्क और सावधान रहना चाहिए ।
660. श्री भीष्म पितामह ने राज्यसभा में कहा कि पांडवों के साथ प्रभु श्री कृष्णजी हैं और कौरवों के साथ भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कर्ण और सारी नारायणी सेना है । इसके साथ ही अगर ब्रह्मांड की सारी शक्ति भी कौरवों के पक्ष में आ जाए तो भी उनकी हार निश्चित है क्योंकि प्रभु श्री कृष्णजी जिस तरफ होते हैं दूसरे पक्ष की हार पहले से ही सुनिश्चित होती है ।
661. शास्त्रों में कहा गया है कि बिना आध्यात्मिक तथ्य को जाने सिर्फ तर्क करना दुर्बुद्धि का सूचक है ।
662. शास्त्र कहते हैं कि परिवार में कभी भी न्यायपूर्ण समझौते की नौबत आए तो जरूर कर लेना चाहिए ।
663. परिवार में संघर्ष होने से हमारी शक्ति का बहुत बड़ी मात्रा में हनन होता है ।
664. दुर्बुद्धि के कारण सज्जनता और समझदारी हमारा साथ छोड़ देती है ।
665. सभ्यता का आरंभ वहाँ से होता है जब हम एक दूसरे के अधिकार को मान्यता देते हैं ।
666. शास्त्र कहते हैं कि उत्तेजना देकर हमें भड़काने वाले लोग हमारा सबसे बड़ा नुकसान करते हैं ।
667. जिसके जीवन रथ की बागडोर प्रभु श्री कृष्णजी संभालते हैं उसे ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति पराभूत नहीं कर सकती ।
668. शास्त्र कहते हैं कि काल जिसका नाश करना चाहता है उसकी बुद्धि फेर देता है जिससे उसको बुरी चीज अच्छी लगती है और अच्छी चीज बुरी प्रतीत होती है ।
669. श्री भीष्म पितामह ने कौरवों की राज्यसभा में कहा कि कौन ऐसा ब्रह्मांड में है जो श्री अर्जुनजी से लड़ सकता है । जिनके सिर पर प्रभु श्री कृष्णजी का श्रीहाथ है और जो प्रभु द्वारा संरक्षित है उसका पराभव असंभव है ।
670. प्रभु का सच्चा भक्त प्रभु के सामर्थ्य और बल को जानता है ।
671. शास्त्र कहते हैं कि परिवार में कलह पूरे परिवार का नाश कर देती है ।
672. शास्त्र कहते हैं कि परिवार के लोग जब तक आपस में नहीं लड़ते तो वे परिवार के रूप में उन्नति करते हैं पर जब लड़ते हैं तो एक दूसरे को गिराने में जुट जाते हैं ।
673. परिवार के झगड़ों में विजय किसी की भी हो पर नुकसान दोनों पक्ष का निश्चित होता है ।
674. श्री रामायणजी और श्री महाभारतजी से जीवन उपयोगी सूत्र को सीख लेना सबसे जरूरी है ।
675. शास्त्र कहते हैं कि परिवार में विरोध होने के बाद भी बातचीत का मार्ग जरूर खुला रखना चाहिए, बातचीत कभी बंद नहीं करनी चाहिए नहीं तो विनाश होना तय है ।
676. शास्त्र कहते हैं कि परिवार के कलह में अपना मुद्दा छोड़ने की जरूरत नहीं है पर साथ में बातचीत भी छोड़ने की जरूरत नहीं है ।
677. शास्त्र कहते हैं कि परिवार के किसी भी निर्णय को अपनी इच्छा से नहीं लेना चाहिए । सबसे सलाह और पूछना चाहिए । इससे सामने वाले का मान बढ़ता है और सबमें प्रेम भी बढ़ता है ।
678. आज कलियुग में व्यक्ति का मूल्यांकन उसके सद्गुणों से नहीं बल्कि पैसे से होता है जो कि बहुत गलत है ।
679. पहले के लोग संयुक्त परिवार से, समाज से जुड़े हुए होते थे इसलिए वे अमर्यादा का व्यवहार कदापि नहीं करते थे । यह कितनी अदभुत भारतीय परंपरा थी ।
680. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु सदैव सबके बीच शांति बनी रहे, इसके पक्षधर रहे हैं ।
681. यदि पांडवों के जीवन में प्रभु नहीं होते तो वे निश्चित ही सभी-के-सभी अवसाद में चले जाते और युद्ध का पुरुषार्थ कभी नहीं करते ।
682. हमारे जीवन का हर पुरुषार्थ प्रभु के बल पर ही टिका हुआ होता है ।
683. पूरे ब्रह्मांड की सबसे कुशल नेतृत्व की क्षमता और कौशल प्रभु में ही है ।
684. भक्त के अपमान को प्रभु कभी नहीं भूलते और भक्त का अपमान करने वाले को दंडित करते हैं ।
685. धर्म और न्याय की स्थापना के लिए प्रभु की प्रतिज्ञा शास्त्रों में सर्वत्र मिलती है ।
686. जीवन में प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी की मधुर श्रीलीलाओं का दर्शन शास्त्रों को पढ़कर जरूर करना चाहिए ।
687. प्रभु का ब्रह्म वाक्य है कि चाहे पृथ्वी के सो टुकड़े हो जाएं, चाहे सभी ग्रह-नक्षत्र टूटकर पृथ्वी पर गिर जाएं फिर भी मैं पृथ्वी पर न्याय की स्थापना और अधर्म का नाश जरूर करूँगा ।
688. शास्त्रों द्वारा बताया सबसे श्रेष्ठ धार्मिक आचार यह है कि किसी के प्रति अन्याय मत करो, खुद भी अन्याय मत सहो और अन्याय से लड़ो ।
689. प्रभु ने धर्म स्थापना के लिए पांडवों को चुना । प्रभु ने पांडवों को अपने कार्य का हेतु बनाया और उनके साथ रहे और उन्हें अपने साथ रखा ।
690. पांडवों का सबसे बड़ा सौभाग्य था कि उनके जीवन का पूरा समर्पण प्रभु के लिए था ।
691. भक्त का पूर्ण समर्पण होने पर ही प्रभु उन्हें स्वीकार करते हैं ।
692. जब कोई प्रभु को पूर्ण समर्पित हो जाता है तो प्रभु का भी मन हो जाता है और प्रभु के अंदर उससे प्रेम करने की इच्छा जागृत हो जाती है । यह प्रभु की कितनी बड़ी और विलक्षण करुणा और उदारता है ।
693. भारतीय होने पर हमें अपार गर्व होना चाहिए क्योंकि शास्त्र बताते हैं कि हमारा अतीत कितना गौरवशाली था ।
694. प्रभु को तनिक भी असुविधा हो, यह भक्त कभी सह नहीं सकता ।
695. प्रभु को बुलाने के लिए किसी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं । प्रभु हमारे भाव को जानते हैं और भाव को ग्रहण करने से कभी चूकते नहीं ।
696. शास्त्र कहते हैं कि आगे वाली पीढ़ी से हमें क्या सुनना पड़ सकता है इसकी सावधानी रखकर आज हमें वैसा गलत आचरण नहीं करना चाहिए ।
697. प्रभु हमारे द्वारा अर्पण भोग के लिए भूखे नहीं है । इसलिए हमारे अंदर प्रेम भाव होगा तभी प्रभु उसे स्वीकार करेंगे ।
698. प्रभु ने कौरवों की राज्यसभा में कहा कि मैं पांडवों से उनकी भक्ति के कारण जुड़ा हुआ हूँ और उनकी और मेरी आत्मा एक ही है । अपने भक्त के लिए इतनी बड़ी बात प्रभु ने कही ।
699. प्रभु अपने भक्तों को प्रेम धन लुटाने से कभी नहीं चूकते ।
700. प्रभु के दर्शन करते हुए हमारा मन कभी नहीं भरता । यह सभी भक्तों और संतों का अनुभव रहा है क्योंकि प्रभु का दर्शन ही अमृततुल्य है ।
701. भाषण के सभी गुण देखने हैं तो विश्व पटल पर एक ही भाषण है जो प्रभु ने कौरवों की राज्यसभा में दिया । प्रभु श्रेष्‍ठतम वक्ता हैं और उनका भाषण विश्व का सर्वोत्तम भाषण है ।
702. पांडवों के कर्ताधर्ता और नियंत्रणकर्ता प्रभु ही थे ।
703. प्रभु ने कौरवों की राज्यसभा में डंके की चोट पर कहा कि मेरे द्वारा रक्षित अर्जुन को आज तक कोई युद्ध में हरा पाया है क्या ? जो आज तक नहीं हुआ वह आगे भी होने की संभावना नहीं है, ऐसा प्रभु ने कहा ।
704. यह सिद्धांत है कि प्रभु द्वारा रक्षित को त्रिलोकी में कोई भी हानि नहीं पहुँचा सकता ।
705. प्रभु ने कौरवों की राज्यसभा में कहा कि परिवार में प्रेम का दृश्य होना चाहिए । परिवार में प्रेम रहे, इसे संभव करने के लिए प्रभु बहुत जोर देते हैं ।
706. प्रभु अपने भक्तों के पक्ष में बोलते हुए कौरवों की राज्यसभा में कहते हैं कि मेरे द्वारा रक्षित पांडवों की एक भी गलती पूरी सभा में कोई भी मुझे बताकर दिखा दे । प्रभु को अपने भक्तों पर इतना विश्वास होता है ।
707. सूत्र के रूप में प्रभु कहते हैं कि जीवन में प्रमाद नहीं करने वाले को और मेरी भक्ति करने वाले को मेरा रक्षण मिलता है ।
708. प्रभु की चिंता प्रभु से ज्यादा प्रभु के भक्त को होती है ।
709. प्रभु की कोई-न-कोई सेवा एक भक्त को जरूर अपने हाथों में रखनी चाहिए ।
710. प्रभु का व्रत है कि कोई गलत काम उनके भक्तों द्वारा नहीं होने देंगे और कोई गलत कार्य अपने भक्तों के खिलाफ भी नहीं होने देंगे ।
711. प्रभु के विराट स्वरूप के दर्शन में धर्मात्माओं को देव दर्शन होते हैं और दुष्टों को भय के दर्शन होते हैं ।
712. सूत्र यह है कि प्रभु को दुष्टों पर आक्रोश करने की कोई आवश्यकता नहीं होती । प्रभु का हास्य ही इतना सक्षम है कि वह दुष्टों में भयंकर भय व्याप्त कर देता है ।
713. संसार में जो सबसे श्रेष्ठ पाने योग्य उपलब्धि है वह प्रभु का आत्म-साक्षात्कार है ।
714. संत कहते हैं कि माला हमारे हाथ में होती है और मुँह से हम जप भी करते हैं पर हमारा मन हमारे मुँह और हाथ को उलझाकर भ्रमण करने कहीं ओर चला जाता है ।
715. काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या, राग, द्वेष को सेना बताया गया है जिसका सेनापति अहंकार है ।
716. कर्मकांड का फल सांसारिक भोग, सांसारिक वैभव और सांसारिक पुण्य के रूप में मिलता है और भक्ति का फल प्रभु प्राप्ति के रूप में मिलता है ।
717. एक संसारी व्यक्ति जीवनभर भोग, वैभव और पुण्य के लिए साधन करता है और अंतिम बेला में चाहता है कि प्रभु मिल जाएं तो यह कैसे संभव है ?
718. शास्त्र कहते हैं कि अहंकार छोटे-मोटे लोगों से भी ज्यादा बड़े लोगों को पकड़ता है और उन्हें गिराता है ।
719. शास्त्र तो यहाँ तक कहते हैं कि कभी-कभी "मुझे अहंकार नहीं है" - यही अहंकार हमारा पतन करा देता है ।
720. प्रभु किसी का नाश नहीं चाहते बल्कि उस व्यक्ति की बुराई का नाश चाहते हैं । सूत्र यह है कि हम अपने भीतर की बुराई का नाश कर देते हैं तो हमारा नाश होने से बच जाता है ।
721. अगर श्रीमद् भगवद् गीताजी को समझना है तो प्रभु श्री कृष्णजी की श्रीलीलाओं को समझना सबसे जरूरी है ।
722. जो-जो प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहा है उसे पहले अपने आचरण में स्वयं करके दिखाया है ।
723. शास्त्र कहते हैं कि हमारा जीवन समाज और राष्ट्र के काम आने वाला जीवन होना चाहिए ।
724. शास्त्र कहते हैं कि हमारे जीवन में विकास का कोई भी एक ऐसा क्षेत्र होना चाहिए जहाँ जीवनभर और जीवन के उपरांत हमारा नाम प्रकाशमय होता रहे ।
725. शास्त्र कहते हैं कि अपना नाम भक्ति करके भक्तों के सूची में नहीं लिखवाया तो फिर यह जन्म किस काम का ।
726. शास्त्र कहते हैं कि अपनी आने वाली पीढ़ी में उत्तम कीर्ति कमाने के लिए उत्साह भरना चाहिए ।
727. शास्त्र कहते हैं कि संगति करनी है तो उत्साही व्यक्ति की संगति करनी चाहिए ।
728. प्रभु कहते हैं कि यह सोच गलत है कि पता नहीं क्या होगा, होगा कि नहीं होगा । सोच यह होनी चाहिए कि मैं जो करूँगा वही होगा और मैं करके रहूँगा ।
729. हमें क्या करना है इसका हमें पता होना चाहिए और उसके लिए हमें साधन जुटाने की तैयारी खुद करनी चाहिए ।
730. प्रभु कहते हैं कि जो हमने सोचा वह होकर रहेगा, ऐसी सोच वाले को ही सफलता मिलती है क्योंकि प्रकृति को प्रभु उसकी मदद करने भेज देते हैं ।
731. प्रभु कहते हैं कि मुझे जीवन में विजय प्राप्त करनी है इस निश्चय से और इस तरह के कृत्य करने के लिए हमें जीवन में प्रस्तुत होना चाहिए ।
732. शास्त्र हमें सूत्र के रूप में बताते हैं कि जब हम विजय के लिए सोचेंगे तो हमारे भीतर की शक्तियां विजय लक्ष्य के लिए जागृत हो जाती है ।
733. शास्त्र हमें सूत्र बताते हैं कि अगर हम हार के लिए सोचेंगे तो हमारे भीतर की शक्तियां हार के लक्ष्य के लिए जागृत हो जाएगी ।
734. जीव के पास प्रभु की प्रचंड शक्ति है । उस प्रचंड शक्ति को सकारात्मक लक्ष्य की पूर्ति में लगाना चाहिए ।
735. अपने कमजोर विचारों के कारण हम अपनी बहुत सारी क्षमताओं का उपयोग नहीं करते और वे बेकार चली जाती हैं ।
736. जब हमारी लंबी बात को प्रभु ध्यान से सुनते हैं तो इसका मतलब ही यह है कि वह प्रभु को प्रिय और अनुकूल लगने वाली बात होती है अन्यथा व्यर्थ की बात प्रभु कभी नहीं सुनते ।
737. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में धर्म धारण करने से बड़ा कोई पुरुषार्थ नहीं है ।
738. गुरु द्रोणाचार्य कौरवों की सभा में कहते हैं कि जब प्रभु श्री कृष्णजी पांडवों के साथ हैं तो विश्व के सभी बलवान एक जगह समूह बनाकर भी इकट्ठे हो जाएं तो भी वे सभी टिक नहीं सकते ।
739. श्री महाभारतजी को पढ़ने से पता चलता है कि प्रभु ने महाभारत युद्ध टालने के लिए क्या कुछ नहीं किया, सब कुछ किया जो किया जा सकता था ।
740. शास्त्र कहते हैं कि किसी के उपकार करने पर उसके प्रति कृतज्ञता का भाव जीवन में होना चाहिए ।
741. शास्त्र कहते हैं कि श्रेष्ठ पुरुष वे होते हैं जो अपने से ज्ञानी की बात सुनते हैं और अपने हितैषी की बात मानते हैं ।
742. जो जीवन में कुमार्ग पर चलने का हठ करता है उसका नाश निश्चित होता है ।
743. प्रभु की कृपा से भक्तों का राग और द्वेष रहित बहुत कोमल हृदय होता है ।
744. मानव जीवन की सभी जटिलता हमें श्री महाभारतजी में देखने को मिलती है ।
745. सूत्र यह है कि मनुष्य जीवन को सीधा-साधा रखना चाहिए ।
746. श्री महाभारतजी विवेक जागृत करने वाला श्रीग्रंथ है ।
747. प्रभु सदैव अपने भक्तों का हित सोचते हैं और हित करते हैं ।
748. शास्त्र कहते हैं कि हमारे इस जन्म में किए गलत कर्म हमको इसी जन्म में पकड़ते हैं और दंडित करते हैं ।
749. शास्त्र कहते हैं कि धर्म के विरुद्ध किसी की भी आज्ञा मानने का प्रावधान शास्त्रों में नहीं है ।
750. जो शास्त्र मत है जीवन में वही करना चाहिए ।
751. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में किसी भी संग्राम में उतरने से पहले यह जरूर जाँच लेना चाहिए कि सत्य हमारे पक्ष में है या नहीं ।
752. सूत्र यह है कि सत्य के पक्ष में होने वाला ही अंत में विजयी होता है ।
753. हमारा अधिकार केवल कर्म करने तक होता है क्योंकि कर्मफल प्रभु के श्रीहाथों में होता है ।
754. शास्त्र कहते हैं कि हमारा भविष्य हम ही अच्छा कर सकते हैं और हम ही उसे बिगाड़ सकते हैं ।
755. आज के अच्छे सत्कर्म हमारे भविष्य को सुखी बनाते हैं और आज के पापकर्म हमारे भविष्य को बिगाड़ देते हैं ।
756. श्रीमद् भगवद् गीताजी का सूत्र है कि हम ही अपने भविष्य के निर्माता है और हम ही अपने भविष्य के विनाशकर्ता भी हैं ।
757. सूत्र यह है कि प्रभु के लिए आदर और सम्मान किसी भी सूरत में डिगना नहीं चाहिए ।
758. प्रभु श्री कृष्णजी को प्रत्यक्ष रूप से पांडवों ने अपना सर्वेसर्वा बना दिया था, यही उनकी जीत का एकमात्र कारण था ।
759. शास्त्र कहते हैं कि एकमात्र प्रभु ही है जो सर्वत्र और सदैव विराजमान रहते हैं ।
760. हम प्रभु की और शास्त्रों की बात नहीं मानते हैं तो भी प्रभु इतने दयालु है कि फिर भी हम पर अनुग्रह और कृपा करते रहते हैं ।
761. हमारा मन प्रभु में लीन हो जाए, यह जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है ।
762. परमात्मा तत्व को खोजने में जब भी हमारा मन लगेगा तो मन बहुत सावधान हो जाएगा क्योंकि परमात्मा तत्व बहुत-बहुत बहुमूल्य है ।
763. हमारा सत्य स्वरूप यह है कि हम परमात्मा के अंश हैं और असत्य स्वरूप यह है कि हम सांसारिक अहम में फंसे हुए हैं ।
764. प्रभु हमारे भीतर हैं, अभी माया के पर्दे से ढके हुए हैं, माया का पर्दा प्रभु कृपा से हटेगा तो प्रभु के दर्शन हो जाएंगे और प्रभु से एकरूपता भी हो जाएगी ।
765. प्रभु से एकरूपता होने पर हर जगह और हर जीव में हमें प्रभु तत्व के दर्शन होने लगेंगे ।
766. जैसे पानी की एक बूंद सागर में डूबती है तो सागरमय हो जाती है वैसे ही हम प्रभु तत्व में डूबते हैं तो हमारा पूरा जीवन प्रभुमय हो जाता है ।
767. शास्त्र कहते हैं कि हमारे विवेक के नेत्र सदैव जागृत रहने चाहिए ।
768. शास्त्र का आग्रह है कि हमारा देश हमें सबसे प्रिय लगे और देशप्रेम हमारे मन में भरा हुआ हो ।
769. शास्त्र कहते हैं कि जो काम हमें करना है उस कार्य के हिसाब से उनके देवता का स्मरण करना अनिवार्य होता है ।
770. प्रभु एक ही हैं पर प्रभु की शक्तियां अनंत है । जिस समय जिस शक्ति की जरूरत होती है, प्रभु के उस रूप का आह्वान और आराधना हमें करनी चाहिए ।
771. प्रभु से हमें कहना चाहिए कि जीवन के हर युद्ध में हमारा संरक्षण करें, हमें विजयी बनाएं और हमारे पीछे सदैव अपना हस्तकमल रखें ।
772. जीवन में अनुकूलता निर्माण करने के लिए प्रभु की आराधना अत्यंत आवश्यक है ।
773. प्रभु की भक्ति और आराधना हमारा कल्याण करती-ही-करती है ।
774. जीवन में कभी भी और किसी भी परिस्थिति में प्रभु की भक्ति और आराधना छोड़नी नहीं चाहिए ।
775. हमारे शास्त्रों में भव्यता का श्रेष्ठतम अलंकार प्रभु के लिए ही मिलता है ।
776. संत कहते हैं कि प्रभु और उनके भक्त श्री अर्जुनजी के बीच में विश्व का श्रेष्ठतम संवाद श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में हुआ ।
777. प्रभु जिस भी भूमिका में जहाँ होते हैं उसे श्रेष्ठतम रूप से निर्वाह करते हैं ।
778. आज भी ऐसे संत समाज में हैं जो समाज और देश के कल्याण हेतु पूरा जीवन कार्य करते हैं ।
779. हमारे विकारों के कारण प्रभु हमारे जीवन से चले नहीं जाएं, हम प्रभु को खो नहीं दें, इसके लिए हमें सदैव सचेत और सावधान रहना चाहिए ।
780. शास्त्र कहते हैं कि विवेक से किया काम सही होता है और भावुकता से किया काम बिगड़ता है ।
781. शास्त्र कहते हैं कि अगर आत्मविश्वास खत्म हो गया तो सब कुछ खत्म हो जाता है ।
782. शास्त्र कहते हैं कि धनबल, विद्याबल, तपबल - इन सबसे बड़ा मनोबल होता है ।
783. शास्त्रों का सूत्र है कि मन के हारे हार है और मन के जीते जीत ।
784. शास्त्र कहते हैं कि अपने मन को हमेशा सकारात्मक विचारों से ही भरना चाहिए ।
785. श्रेष्ठ उपासना वह होती है जहाँ हमारे मन को रोज प्रभु के लिए दिव्य भावों से भर दिया जाता है ।
786. प्रभु की कृपा के प्रति कृतज्ञ होना मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा अलंकार होता है ।
787. कठिन परिस्थिति में प्रभु के श्रीकमलचरणों की शरण लेनी चाहिए और प्रभु से कहना चाहिए कि जिसमें हमारा निश्चित कल्याण है, वह प्रभु हमसे करवाएं ।
788. प्रभु की शरणागति लेने वाला जीवन का मोड़ हमारे जीवन में भी आना चाहिए ।
789. शास्त्र कहते हैं कि जिज्ञासु बने बिना आत्मज्ञान का उपदेश और अध्यात्म का उपदेश किसी को नहीं देना चाहिए ।
790. हमारे शास्त्रों की और श्रीग्रंथों की मर्यादा को मान्य करते हुए उन्हें अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान देना चाहिए ।
791. प्रभु के समक्ष जाते हैं तो हमारी भूमिका यह होनी चाहिए कि मैं कुछ भी नहीं जानता ।
792. हमारे शास्त्रों में हमें आत्मज्ञान का भव्य उपदेश मिलता है ।
793. शरणागत हुए जीव को प्रभु सदैव कल्याण का मार्ग दिखाते हैं ।
794. जीव जब विषाद में डूबकर प्रभु के सामने रोता है तो प्रभु मुस्कुराकर उसे उस विषाद से उबारते हैं ।
795. जीव की दुर्दशा यह है कि वह संसार में बाहर भी संघर्ष करके रोता है और भीतर भी आत्म संघर्ष करके रोता है । उसे उबारने का काम प्रभु ही करते हैं ।
796. हजारों वर्ष पूर्व कही गई श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में प्रभु की वाणी आज भी प्रासंगिक है और आने वाले पचास हजार वर्षों बाद भी प्रासंगिक रहेगी ।
797. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु का सनातन संदेश है इसलिए श्रीमद् भगवद् गीताजी शिरोमणि श्रीग्रंथ है जो सर्वोपरि है और श्रेष्ठतम है ।
798. श्रीमद् भगवद् गीताजी नित्य प्रसन्नता का शास्त्र है क्योंकि प्रसन्नता मनुष्य का स्थाई गुण है पर यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम जीवन में प्रसन्न नहीं रहते ।
799. महाभारत का पूरा संग्राम प्रभु की रणनीति पर टिका हुआ था । पांडवों के लिए पूरे युद्ध का दायित्व प्रभु ने उठा रखा था ।
800. संतों को श्रीमद् भगवद् गीताजी के तीन शब्द अत्यंत प्रिय हैं - जीवनभर मुस्कुराते रहो ।