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BHAKTI VICHAR CHAPTER NO. 44

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. मानव श्रीलीला में प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने दिखाया कि उनका जीवन असुविधाओं से और संघर्ष से भरा हुआ था फिर भी वे जीवन में सदा प्रसन्न रहे और मुस्कुराते रहे ।
002. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु का यही उपदेश है कि प्रभु की शरणागति लेकर चिंता प्रभु पर छोड़ दें और जीवन में प्रसन्न रहें ।
003. अपने जीवन में प्रभु श्री कृष्णजी के आचरण को देखकर उनका प्रतिपादित प्रसन्नता तत्व जीवन में लाना चाहिए ।
004. श्रीमद् भगवद् गीताजी प्रसन्नता का विज्ञान है ।
005. श्री वेदजी के सभी ज्ञान को निचोड़कर और उसका निष्कर्ष निकालकर प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में रख दिया ।
006. संसार का स्वरूप है कि आने वाला जाता है और गया हुआ वापस नया जन्म लेकर आता है । शास्त्र कहते हैं कि इसलिए मृत्यु पर शोक और दुःख क्यों ?
007. कोई भी राग और द्वेष की अनुभूति मन से चिपकने नहीं देने पर प्रसन्नता फिर कभी हमारा दामन नहीं छोड़ती ।
008. व्यावहारिक जीवन जीने की कला सिखाने वाला श्रीग्रंथ श्रीमद् भगवद् गीताजी है ।
009. संसार में एक कर्मयोगी भक्त का जीवन कैसे प्रसन्नता से जिया जाए, यह श्रीमद् भगवद् गीताजी का मूल विषय है ।
010. सभी उपनिषदों और श्रीवेदों का दूध दुहकर प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में हमें प्रदान किया है ।
011. जीवन के संघर्ष में श्रीमद् भगवद् गीताजी रूपी महाग्रंथ सबसे उपयोगी है ।
012. हमारे जीवन के संग्राम में प्रभु का श्रीमद् भगवद् गीताजी में दिया उपदेश सबसे ज्यादा काम आता है ।
013. श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में इतना भव्य और दिव्य उपदेश प्रभु ने दिया इसलिए प्रभु श्री कृष्णजी से बड़ा जगद्‌गुरु जगत में कोई भी और कभी भी नहीं हुआ ।
014. जिसने केवल प्रभु की भक्ति और प्रभु से प्रेम करना सीख लिया उसे कुछ नहीं करना पड़ता, संकल्प भी नहीं करना पड़ता क्योंकि प्रभु उसके लिए सब कुछ पहले से ही करते रहते हैं ।
015. संसार की व्यर्थ बातों से हमें दूर रहना चाहिए और अपने मन और मस्तिष्क को प्रभु के लिए खाली रखना चाहिए ।
016. भूतकाल को भूलकर और भविष्य की चिंता किए बिना वर्तमान काल में तरोताजा होकर जीवन जीने का विज्ञान श्रीमद् भगवद् गीताजी है ।
017. हमारा दुर्भाग्य है कि हम भूतकाल के अच्छे-बुरे विचारों में उलझे हुए रहते हैं और भविष्य के सुख-दुःख की आशा और निराशा में उलझे हुए रहते हैं, इसलिए हम प्रभु का चिंतन नहीं कर पाते ।
018. शास्त्रों का सूत्र है कि हमारे गलत कर्म ही हमें मारते हैं और हमारे सत्कर्म ही हमें तारते हैं ।
019. हमारे भीतर के चेतन तत्व का न तो मरण होता है और न ही जन्म होता है । उसका भिन्न-भिन्न रूपों में नए जन्म लेकर रूपांतरण होता रहता है ।
020. जैसे बचपन से आज तक हमने कितने वस्त्र धारण किए और त्याग दिए यह हमें याद नहीं वैसे ही आदिकाल से अब तक हमने कितने शरीर धारण किए और त्याग दिए इसका हमें भान नहीं होता ।
021. आत्मा की अमरता और शरीर की मृत्यु की अनिवार्यता, यह दोनों सिद्धांत के तौर पर हमारे शास्त्रों में वर्णित हैं ।
022. शास्त्र कहते हैं कि संयोग का सौंदर्य वियोग में है । अगर वियोग नहीं हो तो संयोग का महत्व ही क्या है ?
023. शास्त्र कहते हैं कि चेतन तत्व कभी शरीर को जलाने से नहीं जलता, शरीर को काटने से नहीं कटता ।
024. भारतीय शास्त्रों की मर्यादा है कि सबसे बड़े सूत्र यानी सिद्धांत को सबसे पहले और सबसे कम शब्दों में शुरू में ही बता देते हैं ।
025. भारतीय शास्त्रों के सिद्धांत को जो समझ नहीं पाता उसके लिए फिर शास्त्रों में विस्तार है और जो विस्तार को भी समझ नहीं पाता उसके लिए आगे और अधिक विस्तार है ।
026. श्रीमद् भगवद् गीताजी का प्रमुख सिद्धांत है कि आत्मज्ञान प्राप्त करने का निश्चय जीवन में सर्वप्रथम करना चाहिए ।
027. शास्त्रों का सिद्धांत है कि सांसारिक कामनाओं के लिए जीवन में संकल्प नहीं लेना चाहिए ।
028. शास्त्र कहते हैं कि निष्काम भक्ति करने वाला ही आत्मज्ञान का अधिकारी होता है ।
029. प्रभु की प्राप्ति करनी है तो सकामता का जीवन में त्याग करना पड़ेगा क्योंकि मन में सकामता रहेगी तो प्रभु कभी नहीं मिल सकते ।
030. सकामता को जीवन में पार करके यानी उसका त्याग करके ही आत्मतत्व तक जाने का मार्ग हमें मिलता है ।
031. जीव का अधिकार और योग्यता कर्म करने तक ही है । कर्म का फल कब, कहाँ, कितना और कैसे मिलेगा, यह प्रभु के ऊपर है ।
032. यह शास्त्रों का सिद्धांत है कि कर्म किया तो उसका फल मिलने वाला ही है । सत्कर्म का शुभ फल मिलेगा और गलत कर्म का पाप फल मिलेगा ।
033. कर्म का फल कब मिलेगा, कहाँ मिलेगा और कितना मिलेगा, यह फैसला प्रभु के श्रीहाथों में है क्योंकि हमारा पूरा जन्मों-जन्मों का संचित लेखा-जोखा प्रभु के पास ही होता है ।
034. शास्त्र कहते हैं कि गुप्त कर्म का भी फल जरूर मिलता है । हमने कोई गुप्त दान दिया तो उसका फल भी गुप्त रूप से हमें जरूर मिलकर रहेगा ।
035. अध्यात्म में कहा गया है कि अपने शुभ कर्म का दुनिया के सामने बखान करने से बचना चाहिए नहीं तो शुभ फल की बहुत बड़ी हानि हो जाती है ।
036. प्रभु का व्रत है कि अच्छे कर्म करने वालों की दुर्गति वे कभी नहीं होने देते ।
037. प्रभु का व्रत है कि जो हमने नहीं किया उसका फल हमें कभी भी भोगने को नहीं मिलेगा ।
038. प्रभु सूत्र देते हैं कि उत्तम तरीके से जीवन में सत्कर्म करते रहना चाहिए और फल की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए ।
039. कर्म करने का आग्रह श्रीमद् भगवद् गीताजी में है । प्रभु कहते हैं कि स्वधर्म के कर्म और स्व-कर्तव्य के कर्म हमें जरूर करने ही चाहिए ।
040. कर्मफल की कामना करने वाली बुद्धि हमें चंचल और अस्थिर बनाती है । इसलिए कर्मफल की कामना कभी नहीं करनी चाहिए ।
041. सभी कामनाओं से रहित होकर परम संतुष्ट होना, इसे शास्त्रों ने बहुत बड़ा सद्गुण माना है ।
042. शास्त्र कहते हैं कि जितनी कामनाएं ज्यादा होगी उतनी बुद्धि अस्थिर होगी और जितनी कामनाएं कम होगी उतनी बुद्धि स्थिर होगी ।
043. हम शुरू में दो कामना लेकर चलते हैं, वे पूरी होती है तो चार को जन्म देती है और उनके पूरे होने पर सोलह नई कामनाओं का जन्म हो जाता है ।
044. शास्त्र कहते हैं कि जिसको अपनी बुद्धि प्रभु में स्थिर करनी है उसके लिए श्रेष्ठ है कि वह जीवन में कामनाओं का त्याग करे ।
045. शास्त्र कहते हैं कि चाह रहित मन बहुत जल्दी प्रभु में रमता है ।
046. शास्त्र कहते हैं कि चाह रहित होने पर उस जीव की शांति को भंग करने का बल प्रकृति में भी नहीं है ।
047. जीवन से कामनाओं का विसर्जन करके अपने मन और बुद्धि को प्रभु में लगाना सबसे श्रेष्ठ होता है ।
048. कामना रहित पुरुष में न आसक्ति होती है, न भय होता है, न क्रोध होता है और न ही क्लेश होता है ।
049. कितना भी विश्व के इतिहास का चिंतन कर लें, प्रभु श्री रामजी से बढ़कर कोई भी मानव मर्यादा का आदर्श पूरे विश्व पटल पर कहीं भी नहीं है ।
050. सांसारिक विषयों को देखकर हम अपनी इंद्रियों को खुली छूट दे देते हैं, जिसको शास्त्रों में एकदम गलत बताया गया है ।
051. इंद्रियों द्वारा उनका व्यवहार हो और मनुष्य उस व्यवहार को याद नहीं रखें, यह सबसे श्रेष्ठ होता है ।
052. जब हम इंद्रियों के व्यवहार को याद रखते हैं तो हमारे मन का उस व्यवहार में फंसना तय होता है ।
053. जैसे एक चम्मच से हमने चीनी ली या कड़वी दवाई ली तो वह दोनों चीजों में फंसता नहीं, जैसे चश्मा देखने का काम करता है पर क्या देखा उसमें फंसता नहीं वैसे ही हमारे मन को संसार के व्यवहार में फंसने नहीं देना चाहिए ।
054. मन संसार के विषयों में फंसेगा तो वस्तु मिलने पर मोह होगा और वस्तु नहीं मिलने पर क्रोध आएगा ।
055. इंद्रियों से संसार में फंसने वाला व्यक्ति विषाद को प्राप्त होता है और इंद्रियों को प्रभु में लगाने वाला व्यक्ति प्रभु की कृपारूपी प्रसाद को प्राप्त करता है ।
056. श्रीमद् भगवद् गीताजी विषाद से प्रभु कृपा के प्रसाद की तरफ ले जाने वाला श्रीग्रंथ है ।
057. हम प्रभु की आराधना के लिए बैठते हैं पर हमारे मन को हमारी इंद्रियां कामनाओं की पूर्ति के लिए संसार में खींच ले जाती है ।
058. बुद्धि को स्थिर करने की कला, इंद्रियों को वश में रखने की कला केवल भक्ति ही सिखाती है ।
059. सागर में जैसे वायु के कारण नौका डोलती है वैसे ही संसार के विषयों के कारण हमारे मन की नौका डोलती रहती है ।
060. गलत चीज देखने का, सुनने का, स्पर्श करने का हमें त्याग करना चाहिए तभी हमारा मन स्थिर होगा । सिद्धांत यह है कि गलत चीज देखने पर मन फंसेगा और गलत चीज नहीं देखेंगे तो मन बच जाएगा ।
061. “मैं और मेरा” जितना रहेगा उतना हम संसार में फंसेंगे । मैं प्रभु का और मेरा सब कुछ प्रभु का - यह सिद्धांत जीवन में रखने पर हम कभी नहीं फंसेंगे ।
062. प्रभु के सानिध्य में मिलने वाली शांति और आनंद के सामने संसार के सभी पदार्थ बहुत तुच्छ हैं ।
063. हम प्रभु के अंश हैं, परमात्मा तत्व हैं - यह भान हमें होते ही हम असीम प्रभु के साथ जुड़ जाते हैं ।
064. कामना रहित होकर स्वधर्म का पालन करने वाला सच्चा कर्मयोगी कहलाता है ।
065. प्रभु अपने भक्तों का पूर्ण कल्याण चाहते हैं ।
066. छोटे उपदेश से छोटा समाधान होता है । प्रभु अपने भक्त श्री अर्जुनजी का पूरा समाधान करना चाहते थे । इसलिए प्रभु ने युद्ध भूमि में पैंतालीस मिनटों में पूरी श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश दिया ।
067. संत कहते हैं कि जीवन का परम कल्याण श्रीमद् भगवद् गीताजी से ही हो सकता है चाहे हम जीवन की किसी भी अवस्था में क्यों न हों ।
068. संत हमें कल्याण के दो सूत्र देते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीताजी का ज्ञान और प्रभु का नाम जप करने से पूर्ण कल्याण होगा ।
069. प्रभु ने श्री अर्जुनजी के विषाद की चिकित्सा करने के लिए एक वाक्य में ज्ञान नहीं दिया कि यह तुम्हारा कर्तव्य है और यह तुम्हें करना चाहिए । प्रभु ने लंबी चिकित्सा की और श्रीमद् भगवद् गीताजी के रूप में श्री अर्जुनजी के विषाद रोग को जड़ से नष्ट कर दिया ।
070. सदियों-सदियों के पश्चात भी जन्म लेने वाले जिज्ञासु के हर प्रश्न का जवाब श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु ने पहले ही दे दिया है ।
071. कितने संत और भक्त हुए हैं जिनका पूरा समाधान श्रीमद् भगवद् गीताजी ने कर दिया और वे श्रीमद् भगवद् गीताजी के श्रीग्रंथ को सिर पर लेकर नाचते थे कि उनका समाधान उन्हें मिल गया ।
072. शास्त्र कहते हैं कि मन से किया जाने वाला चिंतन सदैव प्रभु का ही होना चाहिए ।
073. श्रेष्ठ साधक वह होता है जो अपने मन से प्रभु के पास पहुँच जाता है ।
074. हमें अपने को वहीं मानना चाहिए जहाँ हमारा मन पहुँचता है । इसलिए मन को प्रभु के पास पहुँचाना सबसे श्रेष्‍ठ होता है ।
075. हमारा मन संसार में भटकता है तो हमारी दुर्गति कराता है और वह मन प्रभु तक पहुँच जाता है तो हमें परमानंद की प्राप्ति कराता है और हमारा कल्याण करता है ।
076. श्रेष्ठ अवस्था तब होती है जब हम अपने मन को संसार में दूषित नहीं होने देते और उसे प्रभु में लगा देते हैं ।
077. उत्तम कर्म तब होता है जब उस कर्म का हेतु प्रभु की प्रसन्नता बन जाए ।
078. जीवन में भक्तों के चरित्र को हमें अपना आदर्श बना लेना चाहिए ।
079. प्रभु की प्रसन्नता के लिए किया कर्म हमें प्रभु तक पहुँचाने में सक्षम होता है ।
080. प्रभु ने जब भी श्रीराम रूप में और श्रीकृष्ण रूप में अवतार लिया तो सदैव अपनी श्रीलीला में कर्म करते हुए ही दिखते हैं । प्रभु ने कर्म त्याग कभी भी नहीं किया । ऐसा प्रभु ने लोगों को कर्म की प्रेरणा देने हेतु किया ।
081. प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी श्रीलीला में कर्मयोग का सर्वोच्च आदर्श स्थापित किया है ।
082. प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने ऐसा मानव जीवन का आदर्श स्थापित किया कि उनसे प्रेरणा लेकर उनकी बातों को देखने और सुनने वालों का कल्याण हो सके ।
083. स्वधर्म के प्रति अगाध विश्वास और निश्चय होने पर वह स्वधर्म कामधेनु बनकर हमें जीवन में फल देता है ।
084. शास्त्र कहते हैं कि पाप करना बुरा है, यह पता होते हुए भी पाप हो जाता है । पुण्य करना अच्छा है, फिर भी पता होते हुए भी हो नहीं पाता ।
085. बुराई को जानते हुए भी हम उसका त्याग नहीं कर पाते, यह कितनी बड़ी विडंबना है ।
086. जब तक विकारों का वेग शांत नहीं किया जाता वे हमारी दुर्गति करते हैं । केवल बुद्धि को जागृत करके ही विकारों का वेग शांत किया जा सकता है ।
087. काम और क्रोध रूपी विकार को शांत करना बहुत जरूरी है क्योंकि वे हमारे प्राण, वाणी और इंद्रियों को चपेट में लेकर उन्हें अशांत कर देते हैं ।
088. हमारी बुद्धि और हमारा मन अगर प्रभु के सानिध्य में चला जाता है तो हमारी इंद्रियां कुछ गलत नहीं कर पाती हैं ।
089. आज हम शास्त्रों के और संतों के दिए हुए उपदेश को भुला देते हैं, यह हमारा कितना बड़ा दुर्भाग्य होता है ।
090. जिस समय धर्म की हानि होती है और संसार की व्यवस्था बिगड़ती है, प्रभु का आगमन बार-बार हर युग में होता है ।
091. संत कहते हैं कि प्रभु संसार की बिगड़ी व्यवस्था को अपने श्रीधाम में बैठे हुए एक संकल्प मात्र से सुधार सकते हैं पर प्रभु को अपने प्रेमी भक्तों से प्रेम करने के लिए स्वयं आना पड़ता है ।
092. जहाँ भक्तों का प्रगाढ़ प्रेम प्रभु को मिलता है वहाँ प्रभु को स्वयं आना पड़ता है । श्री रामावतार में भगवती कौशल्या माता और भगवती शबरीजी को तृप्त करने प्रभु आते हैं और श्री कृष्णावतार में गोपियों से प्रेम का आदान-प्रदान करने के लिए प्रभु आते हैं ।
093. पापियों की कोई क्षमता नहीं कि वे प्रभु को बुला पाएं । यह भक्त का अधिकार होता है कि वे प्रभु को बुला लेते हैं ।
094. प्रभु को केवल महापुरुष मानना एक बहुत ही तुच्छ उपमा है और बहुत बड़ा अपराध है क्योंकि प्रभु साक्षात प्रभु हैं, वे जगत के नियंता और मालिक हैं ।
095. निर्गुण प्रभु और सगुण प्रभु में कोई अंतर या फर्क नहीं है । अंतर बस इतना है कि जैसा बर्फ और पानी में होता है । बर्फ को गर्म किया तो वह पानी बन जाता है और पानी को ठंडा किया तो वह बर्फ बन जाती है, दोनों तत्व एक ही हैं ।
096. जैसे एक सेठजी अपने सभी कार्य के लिए अपने मुनीम को भेजते हैं पर जब सासूजी बुलाती है तो कोई एवजी के रूप में नहीं जा सकता और सेठजी को खुद जाना पड़ता है । इसी तरह प्रभु को जब भक्त बुलाते हैं तो प्रभु को स्वयं आना पड़ता है ।
097. प्रभु की जब कृपा होती है तो सभी ग्रह और जन्मपत्री अनुकूल हो जाती है । प्रभु की कृपा के आगे किसी की ताकत नहीं कुछ भी विपरीत कर पाए । प्रभु की कृपा सभी प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल देती है ।
098. जो भक्त भक्ति करके प्रभु को जान लेते हैं उन्हें प्रभु अपने पास ही रखते हैं, उन्हें जन्म-मरण के चक्कर से छुड़ा देते हैं और अपने श्रीकमलचरणों में स्थान देते हैं । फिर प्रभु उन्हें अपना पार्षद बनाकर कोई विशेष कार्य के लिए ही दोबारा पृथ्वी पर भेजते हैं ।
099. संत कहते हैं कि सभी प्रभु की प्राप्ति इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि प्रभु की महान सत्ता को संसार में उलझे अभागे लोग समझ नहीं पाते, जिससे कि वे प्रभु प्राप्ति करके प्रभु के पास पहुँच पाएं ।
100. प्रभु का प्रेम के साथ चिंतन करने से प्रभु के लिए तन्मयता आती है, अन्य कोई उपाय नहीं है ।
101. प्रभु एक रहस्य बताते हुए कितनी बड़ी बात श्री अर्जुनजी से कहते हैं कि मैं भी अपने भक्तों की भक्ति करता हूँ ।
102. भक्ति के मुख्य भाव में सेवक भाव (प्रभु श्री हनुमानजी जैसा), अंश भाव (श्री सनतकुमारजी जैसा), सखा भाव (श्री अर्जुनजी जैसा), वात्सल्य भाव (भगवती यशोदा माता जैसा), जनक भाव (श्री रामकृष्ण परमहंसजी जैसा) और माधुर्य भाव (भगवती मीराबाई जैसा) होता है । इनमें से किसी भी एक भाव का आश्रय लेकर हम प्रभु तक पहुँच सकते हैं ।
103. शास्त्र कहते हैं कि कर्म हमें बांधने वाला नहीं बल्कि हमें मुक्त करने वाला होना चाहिए ।
104. भोगों में लिप्त न होकर, इंद्रियों को संयमित रखकर, विकारों से बचकर कर्मयोगी बनना सबसे श्रेष्ठ है ।
105. प्रभु एक बड़ी मार्मिक बात श्री अर्जुनजी से कहते हैं कि इस भ्रम में कभी नहीं रहना चाहिए कि कोई दूसरा हमारा उद्धार करेगा, हमें अपना उद्धार स्वयं ही करना पड़ता है ।
106. भक्ति की पहली आवश्यकता एकांत है । सूत्र यह है कि संसार का कोई भी महान कार्य एकांत बिना नहीं हुआ है ।
107. एकांत के बिना बुद्धि का सही जागरण नहीं होता ।
108. एकांत का सही अर्थ यह है कि मन संसार से अलिप्त हो जाए । फिर हम संसार में भी रहें, भीड़ के बीच में भी रहें तो वह श्रेष्ठ एकांत माना जाता है ।
109. प्रभु के ध्यान में सबसे बड़ी आवश्यकता एकाग्रता की है ।
110. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि शांति के साथ, रोज-रोज और दीर्घकाल तक प्रभु का ध्यान करना चाहिए ।
111. संतुलित जीवन जीने वाला जीव प्रभु को बहुत प्रिय होता है ।
112. श्रीमद् भगवद् गीताजी जीवन में संतुलन लाने वाला श्रीग्रंथ है ।
113. शरीर स्वस्थ रहता है, आहार और निद्रा संयमित रहती है तो प्रभु में ध्यान लगाने की संभावना बहुत बढ़ जाती है ।
114. उत्तम ध्यान प्रभु के सगुण साकार रूप का होना चाहिए, फिर वह प्रभु के विग्रह का, प्रभु की श्रीलीलाओं का हो सकता है ।
115. ध्यान का मार्ग जल्दीबाजी का मार्ग नहीं है । धीरे-धीरे ही ध्यान करने से ध्यान की विधि में प्रबलता आती है ।
116. प्रभु कहते हैं कि मन को धीरे-धीरे प्रभु में लगाकर और प्रभु की भक्ति करके मन को वश में किया जा सकता है ।
117. श्री अर्जुनजी ने प्रभु की शरणागति ग्रहण करके अपने रथ की ही नहीं बल्कि अपने जीवनरथ की बागडोर भी प्रभु के श्रीहाथों में सौंप दी थी ।
118. श्री अर्जुनजी के सारे असमंजस का पूरा निदान प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी का उपदेश देकर कर दिया ।
119. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि कर्तव्य से पलायन करने पर यश की बहुत बड़ी हानि होती है ।
120. निष्काम कर्म जीवन में होने लगे तो वह मानव जीवन का उच्चतम स्तर होता है ।
121. शास्त्र कहते हैं कि जीवन के संघर्ष में शांति हेतु और योग्य निर्णय की क्षमता हेतु मन को स्थिरता की कला सिखानी बहुत जरूरी है ।
122. जब हम प्रभु के ध्यान में उतरते हैं तो मन, जो पहले चंचल प्रतीत होता है, उसकी चंचलता धीरे-धीरे कम हो जाती है और वह शांत और स्थिर होता चला जाता है ।
123. संत कहते हैं कि सकाम कर्मकांड की बात तो समझ में आती है पर सकाम भक्ति एक अवस्था के बाद नहीं होनी चाहिए क्योंकि सच्ची भक्ति निष्काम होती है ।
124. दीपक वहीं जलाना चाहिए जहाँ वायु का झोंका नहीं हो, ऐसे ही भक्ति ऐसी करनी चाहिए जहाँ कामनाओं का झोंका नहीं हो ।
125. हम इंद्रियों के सुख को जानते हैं पर भक्ति के परमानंद को नहीं जानते, जो इन सुखों से बहुत-बहुत बड़ा है और जिसकी उपमा कैसे भी नहीं दे सकते क्योंकि वह अनुभूति का विषय है ।
126. इंद्रियों का सुख भोगने के बाद फीका पड़ जाता है पर भक्ति से मिलने वाला परम परमानंद कभी एक क्षण और एक पल के लिए भी फीका नहीं पड़ता ।
127. संत कहते हैं कि कलियुग के साधारण साधक केवल साधारण सुख तक ही पहुँचते हैं पर कुछ बिरले भक्त ही भक्ति के परमानंद की अनुभूति कर पाते हैं ।
128. शास्त्रों में सुख-दुःख की परिभाषाएं बताई गई है कि जो मन के अनुकूल हो गया तो वह सुख कहलाता है और जो मन के प्रतिकूल हो गया तो वह दुःख कहलाता है ।
129. शास्त्र कहते हैं कि भक्ति के बिना मनुष्य का मन संसार में हमेशा व्याकुल और दुःखी बना रहेगा ।
130. योग की व्याख्या करते हुए प्रभु कहते हैं कि जितना भी दुःख संसार में रहे उसका हमारे चित्त को स्पर्श नहीं होना ही योग है ।
131. शास्त्र कहते हैं कि दुःख संसार में सदैव रहा है और सदैव रहने वाला है पर वह दुःख हमें स्पर्श नहीं करें, ऐसी व्यवस्था भक्ति करके हमें करनी चाहिए ।
132. संसार की राह से हम दुःख हटा नहीं सकते पर हम भक्ति का कवच पहन लेंगे तो दुःख हमें प्रभावित नहीं करेगा ।
133. शास्त्र कहते हैं कि आज हम संसार की भीड़ में दौड़ रहे हैं क्योंकि आगे वाले से और आगे जाने का हमारा बेतुका प्रयास रहता है ।
134. एक प्रभु को छोड़कर अन्य कोई विचार हमारे अंतरंग में घर नहीं करें, यह केवल भक्ति से ही संभव है ।
135. प्रभु सूत्र देते हैं कि धीरे-धीरे मन को संसार के विचारों से निकालकर उस मन को प्रभु में लगा देना ही श्रेष्ठ होता है ।
136. हम मन को प्रभु में एकाग्र करने बैठते हैं तो मन संसार की तरफ भाग जाता है । संत सूत्र देते हैं कि मन से झगड़ा नहीं करें, मन को शांति से वापस प्रभु की तरफ खींचा जाए । ऐसा प्रयास करने से हम एक-न-एक दिन जरूर सफल हो जाते हैं ।
137. जो निरंतर भक्ति का अभ्यास करता है उसके रजोगुण और तमोगुण शांत होने लगते हैं और उसकी मन की चंचलता मिट जाती है और उसके विकार नष्ट हो जाते हैं ।
138. भक्ति करने वाले साधक को ऐसा परमानंद मिलता है जो अन्यत्र कहीं भी मिलना संभव ही नहीं है ।
139. भक्ति करने वाले जीव को मन में प्रभु का आनंदमय स्पर्श प्राप्त होता है ।
140. श्रीमद् भगवद् गीताजी सिर्फ भक्ति की बात नहीं करती । एक विशेष शब्द का प्रयोग किया गया है "तीव्र भक्ति" । यह भक्ति के लिए नया शब्द, नया विशेषण है ।
141. हमारा मन प्रभु के अतिरिक्त बहुत सारी बातों में रस लेता है जो कि गलत है । भक्ति तब सार्थक होती है जब हमें प्रभु के अलावा कोई दूसरी चीज अच्छी ही नहीं लगे, किसी दूसरी चीज का आकर्षण ही नहीं हो ।
142. श्री अर्जुनजी का प्रश्न है कि भक्ति अगर उत्तर अवस्था में की गई और उसके बाद मृत्यु हो गई तो क्या वह व्यर्थ चली जाती है । प्रभु का कितना सुंदर उत्तर है कि किसी भी तरह से भक्ति का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता क्योंकि भक्त का फिर पुनर्जन्म होता है और उसको आगे के साधन में प्रगति करने के लिए पथ मिलता है । पूर्व जन्म का उसका किया हुआ भक्ति का साधन अगले जन्म में उसे अनुकूलता प्रदान करता है और आगे के साधन मार्ग में वह निरंतर बढ़कर प्रभु की प्राप्ति कर लेता है ।
143. बालपन से भक्तियुक्त संस्कार पड़ने पर उस जीव का यौवन संतमय बन जाता है और श्रीहरि की भक्ति करना उसके जीवन का परम लक्ष्य बन जाता है ।
144. दुनिया में कमाए धन को संसार बड़ा मानता है पर सच्चा धन और सनातन धन प्रभु की भक्ति करके कमाया जाता है ।
145. प्रभु कहते हैं कि भक्ति का धन कभी नष्ट नहीं होता, उसे अगले जन्म में उस जीव को मैं (प्रभु) प्रदान करता हूँ ।
146. हम प्रभु के नाम की एक भी माला फेरते हैं तो उसका भी पुरुषार्थ कभी व्यर्थ नहीं जाता ।
147. प्रभु कहते हैं कि जीवन में अगर हमने सत्कर्म किया तो हमारा सदैव मंगल ही होगा । इसलिए जीवन में सदैव सत्कर्म करना चाहिए ।
148. इस जन्म में सत्कर्म करते-करते हम अगले जन्म में उत्थान के लिए सिद्ध हो जाते हैं ।
149. जीवन की शुद्धि की प्रक्रिया भक्ति से होती है और जीव परम शुद्ध होकर और अपने पाप काटकर प्रभु के स्वीकार योग्य बन जाता है ।
150. प्रभु का मत है कि सभी साधनों में सबसे ऊँ‍चा साधन प्रभु को हर समय याद रखना है ।
151. प्रभु अंतिम बात कहते हैं और सबसे बड़ा सूत्र देते हैं कि भक्ति के बिना कुछ भी जीवन में करके प्रभु को पाना असंभव है ।
152. प्रभु को निरंतर जीवन में याद रखना, यह प्रभु को सबसे ज्यादा खुश करने वाली प्रक्रिया है ।
153. श्रद्धायुक्त अंतःकरण से प्रभु की भक्ति करना, इसको प्रभु सबसे बड़ा योग बताते हैं ।
154. प्रभु अंतिम बात कहते हैं कि भक्ति करने वाले से बड़ा प्रभु के लिए कोई भी नहीं है ।
155. जो परम आसक्त होकर प्रभु की भक्ति करता है, उसे प्रभु के दर्शन होते हैं, ऐसा प्रभु कहते हैं ।
156. प्रभु कहते हैं कि असंख्य में से कुछ लोग भक्ति करने की सोचते हैं, असंख्य सोचने वालों में कुछ इसके लिए प्रयास करते हैं और असंख्य प्रयास करने वालों में कुछ ही मेरे तक तीव्र भक्ति करके पहुँचते हैं ।
157. हम जीवन के विकार जैसे काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या, राग, द्वेष और अहंकार को लेकर प्रभु के समीप कभी नहीं जा सकते ।
158. भक्ति के कारण प्रभु जिन्हें अपनाते हैं उन्हें बड़े प्रेम के साथ अपनाते हैं ।
159. प्रभु अपनी माया की प्रबलता बताते हैं कि माया को लांघना बड़ा कठिन है पर जो प्रभु की शरण आ जाते हैं वे ही माया को लांघ पाते हैं ।
160. श्री अर्जुनजी पूछते हैं कि माया को लांघने में कितनी आयु लगती है । इसके जवाब में प्रभु कहते हैं कि जो मेरी शरण में भक्ति करके आता है वह तत्काल ही माया को लांघ जाता है ।
161. शास्त्रों में चार प्रकार के भक्त बताए गए हैं । पहला, जो संकट में फंसने पर भक्ति करता है । दूसरा, जो अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए भक्ति करता है । तीसरा, जो प्रभु को जानने हेतु जिज्ञासा के लिए भक्ति करता है । चौथा, जो प्रभु का ज्ञान प्राप्त करने के बाद प्रभु से प्रेम करने के लिए भक्ति करता है ।
162. प्रभु का ज्ञान होने के बाद जो प्रभु से प्रेम करने के लिए भक्ति करता है प्रभु कहते हैं कि मैं मोरपंख की तरह उसे अपने शीश पर धारण करता हूँ । यह कितना अदभुत और श्रेष्ठ सम्मान प्रभु अपने प्रेमी भक्त को देते हैं ।
163. प्रभु किसी भी प्रकार की भक्ति का निषेध नहीं करते मगर अपने प्रेमी भक्त से सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं ।
164. प्रभु कहते हैं कि जो भी प्रभु का प्रिय रूप हमारे लिए हो, जिसमें हमारी आस्था हो, उस रूप की ही हमें पूजा करनी चाहिए ।
165. शास्त्र तो यहाँ तक कहते हैं कि प्रभु श्री कृष्णजी के भी अलग-अलग स्वरूप जैसे बाल गोपाल, बांसुरी वाले, राधा-कृष्ण वाले स्वरूप में से जो प्रिय हो उसकी वंदना करनी चाहिए ।
166. प्रभु के किसी भी रूप को लेकर झगड़ा करने की जरूरत नहीं क्योंकि प्रभु का मत है कि प्रभु श्री महादेवजी, प्रभु श्री रामजी, प्रभु श्री कृष्णजी, प्रभु श्री गणेशजी, प्रभु श्री हनुमानजी, भगवती दुर्गा माता के किसी भी रूप की करी हुई भक्ति एक ही होती है ।
167. प्रभु कहते हैं कि जो जिस रूप में मेरी आराधना करता है मैं उसी रूप में पहुँचकर उस पर अनुग्रह करता हूँ ।
168. प्रभु कहते हैं कि मेरी किसी भी रूप में आराधना करने वाले को मैं इच्छित फल देता हूँ और उसकी मनोकामना पूरी करता हूँ ।
169. प्रभु कहते हैं कि जो लोग मेरी मानव लीला को देखकर मुझे महापुरुष मानकर बैठे हैं उनकी बुद्धि ठीक नहीं, उनकी बुद्धि स्थिर नहीं है ।
170. अंतकाल में भी प्रभु का स्मरण करने वाले को प्रभु भवसागर से तार देते हैं ।
171. यह प्रभु का बताया हुआ निश्चित सिद्धांत है कि अंतकाल में हमारी जैसी वासना होगी उस हिसाब से हमें अगला जन्म मिलेगा ।
172. निरंतर जीवन में प्रभु का स्मरण करते रहने से अंतकाल में प्रभु की याद आने की संभावना बहुत बढ़ जाती है ।
173. अंतकाल में अगर हमारे मानस पटल पर दुनिया का कचरा भरा रहेगा तो हमारी मृत्यु बेकार चली जाएगी और अगला जन्म निम्नकोटि का मिलेगा ।
174. श्रेष्ठ मृत्यु की व्याख्या करते हुए संत कहते हैं कि अंत समय प्रभु का स्मरण हो जाए और प्रभु नाम का उच्चारण हो जाए तो हम प्रभु तत्व में लीन हो जाते हैं ।
175. शास्त्र कहते हैं कि अंत समय अगर बीमारी भी लग जाए तो बिस्तर पर लेटे-लेटे अनन्य होकर प्रभु का स्मरण करने से हमें सबसे श्रेष्ठ गति मिलती है ।
176. सूत्र यह है कि अंत समय मन का भाव अनन्य होकर प्रभुमय होना चाहिए ।
177. प्रभु अपने भक्तों के लिए कितनी बड़ी बात कहते हैं कि मेरे भक्त को श्रीबैकुंठ जाने की क्या जरूरत है । वे मुझे यानी बैकुंठनाथ को अपनी भक्ति और कीर्तन के माध्यम से बुलाकर जहाँ होते हैं वहीं श्रीबैकुंठ बना देते हैं ।
178. परमात्मा प्राप्ति के लिए सिर्फ भक्ति की आवश्यकता है, भक्ति में केवल हमें भाव प्रभु को अर्पण करना होता है । भाव से द्रौपदीजी ने एक पत्ता अर्पण किया, गजेंद्रजी ने एक फूल अर्पण किया, शबरीजी ने जूठे बेर अर्पण किए और प्रभु तृप्त हो गए ।
179. भगवती शबरीजी के प्रथम बेर खाते ही प्रभु ने उनका उद्धार कर दिया, बाकी बेर प्रभु ने सिर्फ प्रेम भाव के कारण खाए ।
180. प्रेम की खाद से और भक्ति के बीज से भगवती शबरीजी ने अपने बेर प्रभु को अर्पण किए थे इसलिए वे विश्व विख्यात बेर बन गए और प्रभु कभी भी भगवती जानकी माता के सामने भी उनकी बड़ाई करने से नहीं चूकते ।
181. एक भक्ति को छोड़कर अन्य किसी भी माध्यम या साधन से प्रभु प्रेम बंधन में आने को तैयार नहीं हैं ।
182. भक्ति करने वाले की जाति, रंग, स्त्री, पुरुष, बड़ा, छोटा, कोढ़ी, सुंदर कुछ भी प्रभु नहीं देखते और उसे सहर्ष अपना लेते हैं ।
183. भयंकर-से-भयंकर पापी भी पापाचरण छोड़कर प्रायश्चित करके भक्ति करता है और मुझे भजता है तो मैं उसके उद्धार के लिए दौड़ता हूँ, ऐसा प्रभु कहते हैं ।
184. पतन की गर्त में गिरे हुए के लिए कितनी अदभुत बात प्रभु कहते हैं । प्रभु कहते हैं कि पापियों का शिरोमणि भी क्यों न हो, अगर वह मेरी शरण में आ जाता है तो मैं उसका विनाश नहीं होने देता और उसका उद्धार करके ही रहता हूँ ।
185. प्रभु कहते हैं कि कोई पापी भी पाप छोड़कर मेरी भक्ति करने लगता है तो मैं उसको संतों का शिरोमणि बना देता हूँ ।
186. प्रभु कहते हैं कि जीव प्रभु का अंश है । उसमें मलिनता बाहर की होती है, भीतर आत्मतत्व में मलिनता प्रवेश नहीं कर सकती । इसलिए भक्ति के पश्चाताप भरे जल से पाप को धोकर साफ होने पर प्रभु उस जीव को सहर्ष अपना लेते हैं ।
187. प्रभु हमसे हमारा मन मांगते हैं और प्रभु हमसे चाहते हैं कि हम अपने मन से प्रभु से प्रेम करें ।
188. मन प्रभु को अर्पण हो जाए और मन से प्रभु से प्रेम किया जाए तो सिर्फ इन दो चीजों की ही प्रभु को एक जीव से अपेक्षा होती है ।
189. प्रभु आश्वासन देते हैं कि भक्ति से युक्त होने पर वह जीव मेरे पास ही आकर पहुँचता है ।
190. भक्ति करके जब जीव प्रभु की तरफ बढ़ता है तो उस जीव की बांह पकड़कर उसको गले लगाने का कार्य प्रभु तुरंत करते हैं ।
191. हमने सांसारिक रिश्तों से अपना नाता जोड़ लिया । हमें आध्यात्मिक रिश्ते को मान्य करते हुए प्रभु से नाता जोड़ना चाहिए ।
192. अध्यात्म शास्त्र की बातें प्रायः हमें कंठस्थ होती है पर उसके सूत्र का अभ्यास, चिंतन और अनुभूति कुछ बिरले ही अपने जीवन में कर पाते हैं ।
193. संसार में माया की बहुत सारी खिड़कियां और दरवाजे हैं । हमें अपनी इंद्रियों से उनमें झांकना बंद करना पड़ेगा तभी हम प्रभु की अनुभूति कर पाएंगे ।
194. बड़े-बड़े देवतागण और ऋषि-मुनि भी प्रभु को नहीं जान पाते । प्रभु कहते हैं कि मैं जिसको चाहता हूँ उसके सामने ही स्वयं को प्रकट करता हूँ और वे ही मेरे को जान पाते हैं ।
195. अहंकार से युक्त जीव न तो प्रभु को जान सकता है और न ही प्रभु को पा सकता है ।
196. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु रहस्य-पर-रहस्य खोलते हैं और रुकते नहीं और अपने प्रेमी भक्त श्री अर्जुनजी के कल्याण हेतु अधिक-से-अधिक सूत्र बताते जाते हैं ।
197. प्रभु कहते हैं कि जिनका मन मेरे साथ जुड़ जाता है उनके परमानंद की कोई सीमा नहीं रहती, वे ही जीवन में सच्चे परमानंद की अनुभूति करते हैं ।
198. सारे सांसारिक सुख का अंत वियोग में होता है पर परमार्थ का अंत परमानंद में ही होता है ।
199. हमें प्रभु की श्रीलीलाओं का चिंतन एकांत में करना चाहिए और प्रभु की श्रीलीलाओं की चर्चा भक्तों के साथ करनी चाहिए । इससे बहुत आनंद की अनुभूति हमें होती है ।
200. प्रभु की तरफ बढ़ने वाले को प्रभुमय बुद्धि प्रभु स्वयं प्रदान करते हैं ।
201. प्रभु अपने भक्तों के अज्ञान को समाप्त करके ज्ञान का दीपक उनके भीतर जला देते हैं ।
202. भक्ति करने वाले की सारी जिम्मेदारी लेने के लिए प्रभु सदैव तैयार रहते हैं ।
203. संसार में प्रभु के दर्शन कहाँ करें, यह प्रश्न श्री अर्जुनजी ने पूछा । उत्तर में प्रभु ने अपनी असंख्य विभूतियों में कुछ को बताया जिसका चिंतन भक्ति करने वाले साधक के लिए उपयोगी और लाभदायक है ।
204. भगवती गंगा माता प्रभु की विभूति हैं । इसलिए भगवती गंगा माता के दर्शन करने से और उनमें श्रद्धा रखने से प्रभु में श्रद्धा और प्रभु के दर्शन का फल मिलता है ।
205. सामान्य तेज और प्रकाश को देखने की क्षमता भी हमारे में नहीं फिर प्रभु के दिव्य स्वरूप को देखने की हम कल्पना भी कैसे कर सकते हैं । इसलिए ही प्रभु ने श्री अर्जुनजी को अपना विराट रूप दिखाने के लिए दिव्य दृष्टि दी ।
206. प्रभु का दिव्य स्वरूप हर प्रकार से दिव्य है । प्रभु की दिव्य पोशाक, दिव्य सुगंधी, दिव्य मुखारविंद यानी दिव्यता सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है ।
207. दिव्य दृष्टि से भी प्रभु का दिव्य रूप देखने पर डर से कांपते हुए और पसीने से नहाए हुए श्री अर्जुनजी ने प्रभु की कृपा की भीख मांगी और अपने नेत्र बंद कर लिए ।
208. प्रभु कहते हैं कि काल सभी पापियों को उनके पापों के कारण पहले ही समाप्त कर देता है ।
209. श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि मैंने कौरवों की सेना का नाश कर दिया है । अब तुम उठकर पराक्रम दिखाओ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि मेरे भक्त का नाम दुनिया में हो और दुनिया यह देखे कि मेरे भक्त ने ऐसा पराक्रम किया है ।
210. प्रभु का विधान है कि प्रभु अपने भक्त को सदैव यश दिलाना चाहते हैं । सभी कार्य प्रभु स्वयं करते हैं और अपने भक्त को यश का निमित्त बना देते हैं ।
211. अगर हम भक्त हैं और प्रभु का कोई बड़ा कार्य हमारे हाथों हो रहा है तो हमें अहंकार नहीं करना चाहिए और यह मानना चाहिए कि कार्य प्रभु ने स्वयं किया है, हमें मात्र निमित्त बनाया है यश दिलाने के लिए ।
212. हमें अपने द्वारा किए गए गलत कर्म के लिए पश्चाताप करके पूरे मन से और अंतःकरण की गहराई से प्रभु से क्षमा मांगनी चाहिए ।
213. हमें प्रभु को बारंबार साष्टांग दंडवत प्रणाम करना चाहिए और कहना चाहिए कि हम पर कृपा करें, हमें क्षमा करें जैसे एक पिता अपने नासमझ पुत्र को करता है ।
214. भक्ति के कारण ही श्री अर्जुनजी को प्रभु के विश्वरूप देखने का भाग्य मिला जो बड़े-बड़े देवतागण और ऋषि-मुनि को भी तपस्या के बाद भी नहीं मिलता ।
215. हमें प्रभु से कहना चाहिए कि हमें न सांसारिक भोग चाहिए, न ही हमें मोक्ष चाहिए । हमें आपके श्रीकमलचरणों में आपसे प्रेम करने के लिए स्थान चाहिए ।
216. प्रभु कहते हैं कि प्रभु का प्रेम उसे ही प्राप्त होता है जो अनन्य भक्ति से परिपूर्ण हो जाता है ।
217. परमार्थ के मार्ग पर चलकर हासिल करने वाली सबसे ऊँ‍‍ची और सबसे मूल्यवान चीज भक्ति है ।
218. सगुण आराधना के पक्ष में संत कहते हैं कि मनुष्य देहधारी है इसलिए देहधारी प्रभु का आलंबन लेना, आधार लेना उसके लिए अनुकूल और आसान पड़ता है ।
219. प्रभु ने भी सगुण उपासना का मार्ग सबसे सरल और सुलभ बताया है ।
220. संत कहते हैं कि प्रभु का आलंबन लेकर ही हमें अपना साधन करना चाहिए नहीं तो हम अनेक विकार जैसे आलस्य, निद्रा आदि में फंस जाएंगे । प्रभु का आलंबन लेने से हमारी रक्षा हेतु प्रभु सदैव तैयार रहते हैं ।
221. प्रभु की भक्ति करने पर अन्य हर क्षेत्र में प्रभु का आश्रय हमें मिलने लगता है ।
222. जो जीवन में प्रभु को आधार नहीं बनाते और केवल अपनी बुद्धि से चलते हैं उनकी अंत में दुर्गति ही होती है ।
223. प्रभु कहते हैं कि जीव मुझे पुकारे इस बात की ही देर है क्योंकि मैं तैयार खड़ा रहता हूँ उसकी रक्षा करने और उसको संभालने के लिए ।
224. प्रभु कहते हैं कि मेरे में मन लगाना सीखो और मेरे को अपना सबसे प्रिय मानो फिर सब कुछ मैं करने को तैयार हूँ ।
225. शास्त्र कहते हैं कि जगत के सभी से हमारी मैत्री होनी चाहिए, किसी से द्वेष या शत्रुता नहीं होनी चाहिए । सभी लोगों को हमें मैत्री भाव से ही देखना चाहिए ।
226. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के मन में सबके लिए करुणा, दया और कृपा का भाव सदैव रहता है ।
227. शास्त्र कहते हैं कि अपने जीवन के आचार-विचार को जितना शुद्ध रखा जाए उतनी हम भक्ति में प्रगति कर पाएंगे ।
228. जब हम प्रभु की भक्ति करते हैं तो अनुकूलता में हमें हर्ष नहीं होता और प्रतिकूलता में हमें दुःख नहीं होता ।
229. भक्त कभी भी संसार के किसी व्यक्ति की निंदा या स्तुति में नहीं फंसता ।
230. प्रभु कहते हैं कि जो श्रीमद् भगवद् गीताजी में मेरे उपदेश को सुनते हैं और वैसा आचरण करने का जीवन में अथक प्रयास करते हैं वे जीव मुझे अति प्रिय होते हैं ।
231. जितने-जितने सद्गुणों को हम जीवन में अपनाते रहेंगे उतने-उतने हम प्रभु को अधिक प्रिय होते चले जाएंगे ।
232. प्रभु कहते हैं कि जो अत्यंत श्रद्धा के साथ जीवन में केवल मुझे ही अपना सब कुछ मानते हैं, वे मेरे अत्यंत प्रिय होते हैं ।
233. प्रभु ने हमें शरीररूपी एक चलता-फिरता धन दिया है जिससे भक्ति का साधन करके हम प्रभु की प्राप्ति कर सकते हैं ।
234. श्रीमद् भगवद् गीताजी में भक्तों के लक्षण, कर्मयोगी के लक्षण और स्थितप्रज्ञ के लक्षण की सूची हमें देखनी चाहिए और उस अनुरूप अपने आपको ढ़ालना चाहिए ।
235. श्री योग वशिष्ठजी का सिद्धांत है कि जिस रूप में हम अपने को देखना चाहते हैं उस अनुरूप हमें अपने आपको सद्गुणों से अलंकृत करना होता है ।
236. जानकारी होने को, ज्ञान होने को शास्त्रों में इतना महत्व नहीं दिया गया है जितना विवेक होने को महत्व दिया गया है ।
237. शास्त्र कहते हैं कि सच्ची अहिंसा उसे कहते हैं जब खुद दुःख सह लिया जाए और किसी को भी अपनी वाणी या व्यवहार से दुःख नहीं दिया जाए ।
238. शास्त्र कहते हैं कि जो जीवन में सहना सीख लेता है वह तत्काल प्रभु को प्रिय हो जाता है और प्रभु की कृपा का पात्र बन जाता है ।
239. प्रभु कहते हैं कि जो संसार में सहता नहीं और हर चीज में विरोध करता है माया उस जीव को मेरे से इतना दूर कर देती है जिससे उसकी विरोध वाणी मेरे कानों में नहीं पड़े ।
240. जो प्रभु की सेवा तन-मन-धन से करते हैं, मोक्ष उनकी सेवा में स्वयं आकर उपस्थित हो जाता है ।
241. प्रभु की भक्ति करने वाला सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से भी अतीत हो जाता है यानी वह तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है ।
242. संसार का स्वरूप हमें एक जैसा दिखने पर भी प्रतिक्षण वह बदलता रहता है ।
243. संसार जीव को बांधता है । संसार मिथ्या होते हुए भी जीव को आसक्त करके बांधता है ।
244. संसार के पीछे जितने हम पड़े रहेंगे उतना ही दुःख मोल लेते रहेंगे और रोते रहेंगे, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
245. शास्त्र कहते हैं कि संसार दुखालय है । संसार में जितना आसक्त होंगे, संसार से जितना चिपकेंगे, जितना संसार को पकड़ेंगे उतने ही फंसते जाएंगे ।
246. शास्त्र उपमा देकर समझाते हैं कि संसार में धन और यौवन वैसे उड़ जाता है जैसे छिद्र में से कपूर उड़ जाता है ।
247. संत कहते हैं कि पूरा जीवन धन कमाया और अंत में उस धन का उपयोग करने की हमारी शक्ति का ही ह्रास हो जाता है ।
248. संसार से असंग होकर, अनासक्त रहकर ही हम परमार्थ पथ पर आगे बढ़कर प्रभु तक पहुँच सकते हैं ।
249. हमें यह मानना चाहिए कि हर जीवात्मा में मेरे प्रभु का ही अंश विराजमान है ।
250. जैसे वायु के साथ गंध जाती है वैसे ही मृत्यु के बाद हमारी आत्मा के साथ हमारे कर्म जाते हैं ।
251. जो प्रभु की महिमा जान लेता है उसका सारा अज्ञान मिट जाता है ।
252. प्रभु कहते हैं कि प्रभु की भक्ति के अलावा कुछ भी कल्याणकारी और करने योग्य संसार में नहीं है ।
253. शास्त्रों की अवहेलना करना बहुत गलत है क्योंकि उनमें मूलतः प्रभु की ही वाणी और प्रभु का ही उपदेश होता है ।
254. उत्तम तीर्थ में, उत्तम काल में, उत्तम पात्र को दिया हुआ दान ही सात्विक दान कहलाता है ।
255. अश्रद्धा के साथ किया गया कोई भी धार्मिक अनुष्ठान हमारे लिए इहलोक और परलोक दोनों जगह उपयोगी नहीं होता ।
256. अपने द्वारा किए गए सभी कर्मों के फलों का त्याग ही सच्चा त्याग होता है ।
257. भक्ति जीवनभर करते रहना चाहिए, जीवन को पवित्र बनाकर रखने के लिए यह सबसे जरूरी है ।
258. संसार के विषयों का हमारी इंद्रियों से संयोग पहले तो अच्छा लगता है मगर उसका परिणाम बड़ा दुखदायी होता है ।
259. शास्त्र सात्विक सुख की परिभाषा बताते हैं कि वह पहले तो कष्ट देते हुए प्रतीत होते हैं पर उनका परिणाम अंत में बहुत ही सुखद होता है ।
260. सूत्र के रूप में प्रभु बताते हैं कि अपने हर कर्म को पवित्र रखना और उनको प्रेम के साथ प्रभु को अर्पण करना, इससे प्रभु सबसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं ।
261. हम पूजा में प्रभु को साधारण फूल चढ़ाते हैं तो प्रभु खुश होते हैं पर प्रभु को अपने कर्मों के फूल चढ़ाएंगे तो प्रभु अतिशय प्रसन्न होंगे ।
262. भक्ति हमसे प्रभु का ध्यान करवाती है, प्रभु का चिंतन करवाती है और हमें प्रभु के प्रेम में डूबना सिखा देती है ।
263. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के बारे में वार्ता को छोड़कर, संसार की व्यर्थ वार्ता को हमें नजरअंदाज करना चाहिए ।
264. संत कहते हैं कि भक्ति करने वाला काम, क्रोध, ममता, लोभ, ईर्ष्या, राग, द्वेष, अहंकार को प्रभु कृपा से पार करके और ब्रह्मानंद के शिखर पर पहुँचकर मौज-ही-मौज और आनंद-ही-आनंद जीवन में प्राप्त करता है ।
265. जो भक्ति करके प्रभु का सानिध्य पा लेता है, वही जीवनमुक्त कहलाता है ।
266. भक्त जहाँ भी बैठता है वह स्थान तीर्थ बन जाता है, जहाँ भी नहाता है वहाँ भगवती गंगा माता प्रकट हो जाती है, जो बोलता है वह श्रीहरि कथा बन जाती है और उससे होने वाली हर क्रिया प्रभु की पूजा बन जाती है ।
267. भक्त ही जीवन की सर्वोच्च धन्यता की स्थिति को प्राप्त करता है ।
268. हमें अपने हृदय में बैठे प्रभु की शरण में जाना चाहिए जो पूरे संसार के मालिक हैं और पूरे संसार का संचालन करते हैं ।
269. श्रीमद् भगवद् गीताजी के अंत में प्रभु सबसे बड़ा रहस्य बताते हैं और कहते हैं कि मैं शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं अपने भक्त से बहुत प्रेम करता हूँ और प्रतिज्ञा करता हूँ कि उसके योगक्षेम का सदैव वहन करूँगा ।
270. प्रभु भावुक होकर श्री अर्जुनजी से कहते हैं कि मेरे लिए कुछ मत करो, केवल अपना मन मुझमें लगाओ और मेरे से प्रेम करो ।
271. प्रभु कहते हैं कि जो मेरी भक्ति और मेरे से प्रेम करते हैं उनको पग-पग पर मैं संभालता हूँ, उन्हें कुछ नहीं करना पड़ता क्योंकि उनका सब भार उठाकर मैं सदैव उनके साथ चलता हूँ ।
272. जीवन की परिपूर्णता उसी में है जो जीवन हमने प्रभु को अर्पण कर दिया जैसे श्रीगोपीजन ने किया था और भगवती मीराबाई ने कलियुग में किया था ।
273. प्रभु सूत्र देकर कहते हैं कि धर्म का पालन जीवन में सदैव करना पर भरोसा धर्म का नहीं रखना, भरोसा केवल प्रभु का ही रखना चाहिए क्योंकि धर्म का फल भी देने वाले प्रभु ही हैं ।
274. पापों के दलदल में फंसे हुए जीव के लिए प्रभु का आश्वासन है कि समस्त पापों के दलदल से प्रभु उन्हें बाहर निकालेंगे अगर वे प्रभु की शरण में चले जाते हैं ।
275. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु के उपदेश की एक-एक बात निरंतर जीवन में पालन करते रहना सबसे बड़ा जीवन का धर्म है ।
276. धृतराष्ट्र ने श्री संजयजी से पूछा कि युद्ध में विजय किसकी होगी ? श्री संजयजी ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि जिस पक्ष में योगेश्वर प्रभु श्री कृष्णजी हैं उसी पक्ष में विजय, सुख, संपत्ति, राज्य और शांति होगी ।
277. जो जीवन में अपना पुरुषार्थ करते हुए प्रभु की कृपा का पूर्ण भरोसा रखते हैं, जीवन के हर क्षेत्र में उनकी ही विजय होती है ।
278. प्रभु की वाणी और शास्त्रों की आज्ञा मानना हमारे जीवन का परम कर्तव्य और लक्ष्य होना चाहिए ।
279. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु सदैव अपने भक्त के पीछे चलते हैं कि कहीं कोई मेरे भक्त का अहित न कर दे ।
280. शास्त्र कहते हैं कि उत्तम पुरुषों को सभी के भीतर प्रभु को देखकर प्रणाम करने का अभ्यास और आदत होती है ।
281. सत्य और धर्म के पक्ष में रहने वाला हर प्राणी सदैव धर्मात्मा पुरुष को ही विजय का आशीर्वाद देता है ।
282. अगर हम तेजस्वी जीवन के आकांक्षी हैं तो निरंतर सादगी का अभ्यास जीवन में करना चाहिए ।
283. प्रभु को साष्टांग दंडवत प्रणाम करने से हम प्रभु की कृपा और आशीर्वाद के अधिकारी हो जाते हैं ।
284. एक संसारी को प्रणाम करने से भी उसके मन में हमारे लिए अनुकूल परिवर्तन आरंभ हो जाता है तो फिर जरा सोचें कि प्रभु को प्रणाम करने का फल कितना बड़ा होता है ।
285. प्रभु को रोजाना प्रणाम करने से हमारी आयु, विद्या, कीर्ति और बल बढ़ता है, यह शाश्वत सिद्धांत है ।
286. प्रभु को दिन में बार-बार प्रणाम करना हमारी दैनिक दिनचर्या का एक अभिन्न अंग हमें बना लेना चाहिए ।
287. प्रभु को दिन में बार-बार याद करके प्रणाम करना, यह कितना सादा नियम है और इसमें कोई समय नहीं लगता और इसका फल अदभुत होता है ।
288. परिवार वालों के साथ रोजाना आधा घंटा का सत्संग करने से घर का वातावरण सुखमय बन जाता है ।
289. हमारे भीतर सात्विकता देखकर प्रभु को बहुत अच्छा लगता है ।
290. यह सिद्धांत है कि अच्छाई सबको देखने में प्रिय लगती है ।
291. मनुष्य का हृदय प्रभु ने ऐसा बनाया है कि वह अच्छाई देखकर मन से उसका अभिनंदन करता ही है ।
292. पांडवों का धर्म पक्ष था और कौरवों का अन्याय पक्ष था, इसलिए अंत में विजय पांडवों की ही हुई ।
293. प्रभु की कृपा होने के कारण पांडवों को सबका आशीर्वाद मिला और कौरव सबका रोष लेकर युद्ध में गए और इसलिए युद्ध हार गए ।
294. श्री महाभारतजी पढ़ने से और युद्ध का अवलोकन करने से पता चलता है कि कितनी अदभुत युद्ध नीति का प्रचलन पांच हजार वर्ष पहले था जिससे पूर्ण नीति से युद्ध हो सके ।
295. श्री महाभारतजी की युद्ध नीति बताती है कि हर युद्ध के बाद अगला दिन विश्राम का दिन होता था । इस विश्राम के दिन में मारे गए योद्धा की अंतिम क्रिया होती थी, बीमारी और घायलों का इलाज होता था, युद्ध में घायल जानवरों का इलाज होता था, युद्ध प्रांगण की सफाई होती थी । यह कितनी अदभुत युद्ध नीति प्रभु द्वारा बनाई गई थी ।
296. श्री भीष्म पितामह ने दुर्योधन से कहा कि सारे देवतागण और असुर भी मिलकर एक साथ आ जाएं तो भी प्रभु श्री कृष्णजी द्वारा रक्षित किसी को हारने का सोचना भी उनके लिए संभव नहीं है, हराना तो बिलकुल ही असंभव है ।
297. शास्त्र कहते हैं कि अहंकार के कारण अपने सामने दिखने वाली सत्य बात को भी हम नहीं मानते ।
298. श्री भीष्म पितामह प्रभु के बहुत बड़े भक्त थे । इसलिए अपने जीवन के अंतिम दिन प्रभु की ऐसी कृपा उन पर हुई कि उन्होंने इतना भयंकर पराक्रम युद्ध भूमि में दिखाया कि पांडवों को और उनकी सेना को लगा कि जैसे प्रलय ही आ गया । प्रभु विपक्ष में भी अपने भक्त पर कितना श्रेष्ठ अनुग्रह करते हैं और अपने भक्त को विपक्ष में भी कीर्ति दिलाते हैं ।
299. जैसे ही श्री भीष्म पितामह ने देखा कि प्रभु श्री कृष्णजी रथ का पहिया उँगली पर चक्र की तरह उठाकर उनकी तरफ दौड़े, उन्होंने अपना धनुष-बाण रख दिया, निशस्त्र हो गए । उनके हाथ जुड़ गए और प्रभु से कहा कि स्वागत है मेरे महाप्रभु, आपने मेरा प्रण बचाने के लिए अपना प्रण तोड़ दिया ।
300. श्री भीष्म पितामह ने प्रभु श्री कृष्णजी को कहा कि एक विपक्ष के भक्त पर इस अदभुत प्रभु कृपा को संसार कभी भी नहीं भूलेगा । श्री भीष्म पितामह की ओर सब लोग देख रहे थे पर श्री भीष्म पितामह किसी की तरफ नहीं देख रहे थे, वे सिर्फ और सिर्फ अपने प्रभु को ही निहार रहे थे ।
301. किसी भी दृष्टि से देखें महाभारत के दोनों पक्षों के बीच में सबसे बड़े महानायक प्रभु श्री कृष्णजी ही थे, यह सभी ने देखा और अनुभव किया ।
302. कब अपने भक्त के प्रण को बचाने के लिए अपना प्रण भूलना है, यह प्रभु बराबर याद रखते हैं ।
303. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु का सबसे बड़ा व्रत यह है कि वे अपने भक्त के व्रत को टूटने नहीं देते और उसे निभाते हैं ।
304. एक तरफ प्रभु की प्रतिज्ञा थी कि मैं शस्त्र नहीं उठाऊँगा, दूसरी तरफ भक्त श्री भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा थी कि मैं प्रभु से शस्त्र उठवाकर रहूँगा । दोनों प्रतिज्ञा आधी-आधी पूरी होना संभव नहीं थी । एक को टूटना तय था । जिनकी प्रतिज्ञा टूटती उनका मान घटना था और जिनकी प्रतिज्ञा रहती उनकी प्रतिष्ठा बढ़नी थी । प्रभु ने तब भी अपने भक्त की प्रतिज्ञा रखकर अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी ।
305. शास्त्रों ने प्रभु को सदैव अपने सेवक की रुचि रखने वाला बताया है ।
306. सिर्फ और सिर्फ प्रभु ही हैं जो अपने प्रण को तोड़कर अपने भक्त को सदैव जिता देते हैं ।
307. भक्त को महानता प्रदान करने में प्रभु को सबसे ज्यादा आनंद आता है ।
308. समाज के प्रामाणिक लोगों को पता होता है कि धर्म किसके पक्ष में है और उन्हें पता होता है कि प्रभु भी उसके पक्ष में ही हैं, इसलिए उस पक्ष की ही विजय होगी ।
309. शास्त्र कहते हैं कि किसी को बंधन में डालकर नहीं अपनाना चाहिए, उसे प्रेम से ही अपनाना चाहिए ।
310. एक प्रभु को छोड़कर पूरे ब्रह्मांड में सब कुछ नाशवान है ।
311. हम परिवर्तनशील हैं पर हमारे भीतर का परमात्मा तत्व सनातन बना रहता है ।
312. आत्म-साक्षात्कार युक्त जीव अपने अहम को भूल जाते हैं और वे अपनी वाणी से यही कहते हैं कि रामजी ने ऐसा नहीं किया, रामजी ऐसा करवाना चाहते हैं ।
313. महापुरुषों का जीवन एक अलग ही स्तर का जीवन होता है ।
314. जो अत्यंत श्रेष्ठ भगवत् भक्त होते हैं वे अध्यात्म के परम ज्ञानी बन जाते हैं ।
315. सबका मानव शरीर तो एक-न-एक दिन जाना है और जाता रहेगा पर इस मानव शरीर से जो भक्ति करके प्राप्त किया जा सकता है वह सबसे विशेष होता है ।
316. जो अपने जीवन में भक्ति करता है वह प्रभु को सबसे अधिक प्रिय हो जाता है ।
317. प्रभु सूत्र देते हुए कहते हैं कि जो मेरे से अधिक प्रेम करता है, मैं उस जीव से उससे भी अधिक प्रेम करने लगता हूँ ।
318. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि सामान्य रूप से प्रभु सभी जीवों से प्रेम करते हैं पर जो प्रभु से प्रेम करते हैं, प्रभु उनसे बहुत अधिक प्रेम करते हैं ।
319. अपने जीवन की पूरी बाजी लगाकर भक्त प्रभु के प्रेम का पात्र बनने का अधिकार प्राप्त करता है ।
320. शास्त्र कहते हैं कि जीव कहीं भी स्थानांतरण कर ले, उसके कर्म उसका पीछा करते हैं और ठीक समय पर उसके पास फल देने के लिए पहुँच जाते हैं ।
321. प्रभु श्री कृष्णजी धर्म स्थापना हेतु पधारे थे और पांडवों को इस धर्म युद्ध के लिए चुनकर उनको विजयी बनाया ।
322. महाभारत के धर्म युद्ध के समय धर्म की जितनी अदभुत व्याख्या प्रभु श्री कृष्णजी ने की है, ऐसा कहीं भी सुनने को नहीं मिलेगा ।
323. प्रभु के महान भक्त श्री भीष्म पितामह प्रभु के तेज से अपने अंतिम क्षण भी चमक रहे थे ।
324. प्रभु अपने भक्त को कितना सम्मान दिलाते हैं, यह श्री भीष्म पितामह के पूरे प्रसंग को देखने से पता चलता है ।
325. श्री भीष्म पितामह प्रभु के इतने बड़े भक्त थे कि शरीर पर बाण लगने के बाद भी और बाणों की शय्या पर लेटकर भी वेदना को भूलकर वे अखंड प्रभु के दिव्य नाम का जप करने लगे ।
326. पूरा विश्व इस दृश्य को कभी नहीं भूलेगा कि प्राण छोड़ने तक श्री भीष्म पितामह अपनी भक्ति करते हुए प्रभु का निरंतर जप करते रहे और प्रभु जप ग्रहण करने हेतु साक्षात उनके सामने खड़े हो गए ।
327. श्री भीष्म पितामह द्वारा प्रभु के नाम जप में देखते-ही-देखते श्री विष्णु सहस्त्रनाम की नामावली तैयार हो गई ।
328. श्री भीष्म पितामह ने अपने पूरे जीवन में प्रभु को सर्वोच्च मानकर प्रभु की बहुत बड़ी और दिव्य भक्ति की ।
329. शास्त्रों में संसार को कालिख की कोठरी बताया गया है जिससे बचते-बचते भी हम अपने जीवनकाल में बहुत सारी कालिख अपने दामन में लगा बैठते हैं ।
330. पांडवों ने माना कि श्री भीष्म पितामह जैसे महान व्यक्तित्व को और इच्छा मृत्यु के धनी को युद्ध से विमुख करना प्रभु श्री कृष्णजी की कृपा के बिना कतई संभव नहीं था । उन्होंने इसका पूरा श्रेय प्रभु श्री कृष्णजी को दिया ।
331. शास्त्र हमें सूत्र देते हैं कि हमें भी अपनी जीत का श्रेय खुद नहीं लेना चाहिए और उसे प्रभु को ही देना चाहिए ।
332. प्रभु की कृपा जिनके जीवन में साथ होती है उनके जीवन में सदैव विजय होती-ही-होती है ।
333. हमारा अहंकार हमारे विवेक को जागृत नहीं होने देता ।
334. शास्त्र कहते हैं कि किसी भक्त का अपराध उस भक्त द्वारा माफ करने पर ही प्रभु उसे माफ करते हैं ।
335. शास्त्र कहते हैं कि हमें जीवनकाल में किसी से ईर्ष्या या विरोध नहीं रखना चाहिए ।
336. श्री महाभारतजी का शास्त्र हमें सिखाता है कि हमारी भूल कहाँ-कहाँ होती है और उस भूल को हम कितने समय बाद पश्चाताप की खाई में गिरने के बाद याद करते हैं ।
337. शास्त्र कहते हैं कि हमें जीवन में की हुई भूल के लिए एक-न-एक दिन पछताना ही पड़ता है ।
338. शास्त्र कहते हैं कि हमें इतिहास केवल घटनाओं को जानने हेतु नहीं पढ़ना चाहिए । इतिहास को पढ़कर हमारा विवेक जगे यानी विवेक बोध हेतु पढ़ना चाहिए ।
339. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की कृपा और प्रभु का सानिध्य मिलने पर वह जीवन में किसी को भी महान बना देता है ।
340. प्रभु अपनी सबसे दिव्य और दुर्लभ भक्ति अपने भक्त पर अति कृपा करते हुए उसके जीवन में उपलब्ध करवाते हैं ।
341. सभी तंत्र, मंत्र और यंत्र में मूल शक्ति प्रभु की ही होती है । इसलिए प्रभु द्वारा रक्षित भक्त पर कोई भी तंत्र, मंत्र या यंत्र की शक्ति काम नहीं करती ।
342. शास्त्र कहते हैं कि गर्भवती स्त्री को श्रीहरि कथा, भजन और नाम जप में तल्लीन रहना चाहिए, इससे गर्भस्थ शिशु पर बहुत अनुकूल प्रभाव पड़ता है ।
343. प्रभु की कृपा का फल होता है कि बलवान भी निर्बल के सामने घुटने टेक देता है ।
344. जीवन में कभी भी प्रतिकूलता के समय प्रभु पर से विश्वास डिगना नहीं चाहिए ।
345. जयद्रथ को मारने के लिए प्रभु ने अपने सारथी को बुलाया और कहा कि अदृश्य रूप से मेरे रथ को युद्ध में साथ रखना । सारथी ने पूछा कि आपकी प्रतिज्ञा है कि आप शस्त्र नहीं उठाएंगे तो प्रभु ने कहा कि मेरे भक्त के लिए मैं अपनी एक नहीं, सौ प्रतिज्ञा को भी तोड़ सकता हूँ । प्रभु आगे कहते हैं कि मैं अपने भक्त का रक्षण हर परिस्थिति में करके ही रहूँगा ।
346. प्रभु ने श्री महाभारतजी में अपने सारथी को एक अमर श्लोक कह दिया कि मेरा भक्त मेरा अर्धांग है यानी मेरा आधा अंग है, मेरे और मेरे भक्त के शरीर अलग-अलग हैं पर हमारी आत्मा एक ही है ।
347. जब जयद्रथ को मारने के लिए प्रभु अपने सारथी से विचार-विमर्श कर रहे थे तो श्री अर्जुनजी मौज भरी नींद सो रहे थे । प्रभु ने उन्हें जगाया और डांटकर पूछा कि तुम इतने बड़े संकट में मौज में सो रहे हो । श्री अर्जुनजी ने बड़ा मार्मिक जवाब दिया कि मेरी चिंता वहन करने वाले आप जग रहे हैं तो मैं क्यों नहीं चिंतामुक्त होकर सो जाऊँ ।
348. जब जयद्रथ को मारने के लिए प्रभु योजना बना रहे थे और श्री अर्जुनजी सो रहे थे और उन्होंने जवाब दिया कि वे प्रभु पर निर्भर हैं इसलिए चिंतामुक्त होकर सो रहे हैं तो प्रभु ने जवाब सुनकर श्री अर्जुनजी को चादर ओढ़ाकर कहा कि सो जाओ, पार्थ । सूत्र यह है कि प्रतिकूल अवस्था में भक्त सोते हैं और प्रभु अपने भक्त का मंगल करने के लिए जगते हैं ।
349. भक्त की हर चिंता मिटाने वाले सदैव प्रभु ही होते हैं ।
350. प्रभु द्वारा रक्षित श्री अर्जुनजी का पराभव पूरे महाभारत युद्ध में कोई भी नहीं कर पाया ।
351. जिनकी रक्षा प्रभु करते हैं उन्हें जग में कोई भी हरा नहीं पाता, यह अटल सिद्धांत है ।
352. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु केवल अपने भक्तों को संकट से ही नहीं बचाते बल्कि संकटों के समूह से बचाते हैं ।
353. प्रभु अपने भक्त को कैसे बचाते हैं यह श्री महाभारतजी का अवलोकन करने से पता चलता है । पांडवों को प्रभु ने कैसे-कैसे, कितने-कितने संकटों से कितनी-कितनी बार बचाया, यह हमें जरूर अनुभव करना चाहिए ।
354. अपने पांडवों को विजयी बनाने के लिए प्रभु के पास कौरव सेना के सभी विरोधी योद्धा के लिए विशेष-विशेष योजना थी ।
355. शास्त्र कहते हैं कि जीवन को प्रभु प्राप्ति के लिए उद्देश्य युक्त बनाकर रखना चाहिए । उद्देश्यहीन जीवन यानी लक्ष्यविहीन जीवन बेकार होता है ।
356. शास्त्र कहते हैं कि काम ज्यादा करने से कभी जीवन नष्ट नहीं होता बल्कि काम नहीं करने से जीवन नष्ट होता है ।
357. शास्त्र कहते हैं कि देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण और समाज ऋण - इन चारों को चुकाने का कार्य अपने जीवन में हमें करना चाहिए ।
358. हमें प्रभु से कहना चाहिए कि हम अपना जीवन प्रभु की सेवा के लिए ही जी रहे हैं । यह जीवन जीने का श्रेष्ठतम तरीका होता है ।
359. अपने भक्तों को सुरक्षित रखने के लिए प्रभु आगे-से-आगे कितनी सुंदर तैयारी रखते हैं, यह श्री महाभारतजी में पांडवों के प्रसंग में हमें देखने को मिलता है ।
360. प्रभु के अस्त्र को नमन और प्रणाम करने के अलावा कोई प्रतिकार कभी भी, किसी का भी आज तक नहीं चला है ।
361. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु एक पापी को भी उसके जीवन में सुधरने का अवसर भेजते हैं पर उसकी दुर्बुद्धि, अकड़ और कुसंगति उसे सुधरने नहीं देती ।
362. शास्त्र कहते हैं कि अपने मुँह से अपनी बड़ाई करने से हम अपने चरित्र के सौंदर्य को खो देते हैं ।
363. शास्त्र कहते हैं कि अपनी तुलना दूसरे से करने वाला व्यक्ति जीवन में कभी भी सुखी और शांत नहीं हो सकता । वास्तव में जीवन सुखमय जीना है तो किसी से भी अपनी तुलना करने या करवाने से बचना चाहिए ।
364. शास्त्र कहते हैं कि हमारा मान भंग होते ही हमारी आत्मशक्ति भी भंग हो जाती है ।
365. हमारे जीवन में आए आवेश को भी प्रभु की कृपा ही संभालती है ।
366. शास्त्र कहते हैं कि अपने से बड़ों का जीवन में कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए ।
367. शास्त्रों में दूसरों की बुराई अपने मुँह से करने वाले को और अपनी बड़ाई अपने मुँह से करने वाले को गलत बताया गया है ।
368. प्रभु ने अपने भक्त श्री अर्जुनजी को श्री भीष्म पितामह और कर्ण से युद्ध में कितनी बार बचाया, यह श्री महाभारतजी का अवलोकन करने पर पता चलता है ।
369. श्री महाभारतजी का सूत्र है कि धर्म से जिसका संबंध नहीं, उसे धर्म की दुहाई देने का कोई अधिकार नहीं होता । जो जीवनभर धर्म का पालन नहीं करता वह धर्म का नाम लेकर बचने का अधिकार सदा के लिए गंवा बैठता है ।
370. सूत्र यह है कि धर्म उनकी ही रक्षा करता है जिन्होंने जीवन में धर्म का पालन किया हो ।
371. शास्त्र कहते हैं कि अधर्मी का कभी भी धर्म रक्षा नहीं करता ।
372. शास्त्र कहते हैं कि मित्रों का चयन करते समय हमें बहुत सोचना-विचारना चाहिए क्योंकि कुसंगति मनुष्य को गिरा देती है ।
373. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में हमारे निर्णय योग्य होने चाहिए तभी हमारा जीवन सफल होता है ।
374. शास्त्र कहते हैं कि समय निकल जाने के बाद योग्य निर्णय भी असफल हो जाते हैं ।
375. शास्त्र कहते हैं कि हमारे कर्म कभी भी हमें फल दिए बिना नहीं छोड़ते, यह प्रभु का बनाया हुआ विधान है ।
376. महाभारतजी के युद्ध के बाद प्रभु ने श्री अर्जुनजी को रथ से आदेश देकर नीचे उतारा, फिर प्रभु रथ से उतरे और प्रभु श्री हनुमानजी ध्वजा से प्रभु को प्रणाम करके अंतर्ध्यान हो गए । उसी समय रथ जलने लग गया । तब प्रभु ने बताया कि इस रथ पर इतनी मंत्र शक्ति, तंत्र शक्ति, जप शक्ति, अनुष्ठान शक्ति और श्राप शक्ति का कौरवों द्वारा आह्वान करवाया गया है कि अगर प्रभु नहीं होते और प्रभु श्री हनुमानजी नहीं होते तो श्री अर्जुनजी शुरू में ही रथ समेत कभी ही जल के नष्ट हो चुके होते ।
377. प्रभु की कृपा जीवन में कैसे काम करती है और कैसे काम संवारती है, यह अनुभव करना है तो श्री महाभारतजी में पांडवों के प्रसंग को पढ़ना चाहिए ।
378. पांडवों को प्रभु श्री कृष्णजी की कृपा ने कहाँ-कहाँ, कैसे-कैसे और किस-किस अवस्था में बचाया, यह महाभारतजी को देखने पर प्रभु की कृपा का हमें जीवन में विश्वास होता है ।
379. जब प्रभु की कृपा का विश्वास होता है तो इच्छा भी होती है कि हम भी अपने जीवन में प्रभु कृपा अर्जित करने के लिए भक्ति करके प्रयत्न करें ।
380. पांडव धर्मपथ पर थे पर सिर्फ धर्मपथ पर रहते और प्रभु कृपा अपने जीवन में अर्जित नहीं करते तो निश्चित उनका अकल्याण एक नहीं अनेक स्थान पर होता । पर प्रभु कृपा ने उनके अकल्याण का “अ” हटा दिया और पांडवों का सर्वत्र और सर्वदा कल्याण-ही-कल्याण हुआ ।
381. मनुष्य योनि को छोड़कर अन्य किसी भी योनि में आत्म-साक्षात्कार और आत्म-चिंतन की सुविधा नहीं है ।
382. प्रभु ही ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं, ब्रह्मांड का संचालन करते हैं और ब्रह्मांड का लय अपने आप में कर लेते हैं ।
383. मनुष्य जीवन की सार्थकता ही आत्म-साक्षात्कार और आत्म-चिंतन कर पाने में है ।
384. संसार को जानने वाले तो सभी होते हैं पर आत्मतत्व को जानने वाला कोई बिरला ही होता है ।
385. अन्य जो चीज हम मानव जीवन में करते हैं जैसे खाना, सोना, मैथुन यह सभी अन्य योनियों में संभव है पर आत्मबोध किसी भी अन्य योनि में नहीं हो सकता ।
386. पूरी सृष्टि के कर्ताधर्ता प्रभु ही हैं और हमारे भीतर उन्हीं प्रभु का एक अंश विराजमान है ।
387. मानव जीवन में प्रभु से आत्म-साक्षात्कार हमारे पुरुषार्थ की चरम सीमा है । इससे आगे कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं बचता ।
388. प्रभु जिनकी रक्षा करते हैं उन पर एक भी तंत्र, मंत्र और यंत्र का प्रभाव नहीं होता ।
389. कितनी भी प्रतिकूलता जीवन में हो पर प्रभु का सानिध्य मिलने के बाद वे सब प्रभावहीन हो जाती हैं ।
390. जीवन में प्रभु का सानिध्य अर्जित करना सबसे बड़ा पुरुषार्थ है और यह जीवन का सबसे अनिवार्य कार्य भी है ।
391. हम जीवन में निश्चिंत तभी हो सकते हैं जब हमारे सिर पर प्रभु की कृपा का हाथ हो और हमारे हृदय में प्रभु का वास हो ।
392. हमारे जीवन रथ को सुपथ पर चलाने का सामर्थ्य प्रभु की कृपा के कारण ही संभव होता है ।
393. जब हम अपने जीवन रथ की बागडोर प्रभु को सौंप देते हैं तभी हमारा जीवन ऊँचाइयों पर पहुँचता है ।
394. प्रभु की वाणी और शास्त्रों की वाणी को जीवन में सदैव मान्य करना चाहिए, यही जीवन की सफलता का रहस्य है ।
395. प्रभु को हमारा भविष्य पता होता है, इसलिए प्रभु की कृपा हमारे भविष्य को सुरक्षित करने का एकमात्र उपाय है ।
396. प्रभु की कृपा सदैव अपने भक्तों को बड़ी-बड़ी विपदा से बचाती रहती है ।
397. शास्त्र कहते हैं कि संसार के वैभव को अपने कब्जे में करने के चक्कर में मनुष्य अपने जीवन को ही नष्ट कर देता है ।
398. प्रभु के चिंतन में जीवन व्यतीत करना सबसे श्रेष्ठ जीवन माना गया है ।
399. प्रभु की भक्ति करने वाले को संसार के बेकार के प्रपंच में नहीं पड़ना चाहिए ।
400. विद्वान का बेटा विद्वान हो यह जरूरी नहीं है, भगवती सरस्वती माता की कृपा जिस पर होती है वही विद्वान होता है ।
401. शास्त्र कहते हैं कि काल के द्वारा हमारे दुष्कर्म और पाप के लिए नर्क भोगने का विधान है पर कभी-कभी काल धरती पर भी हमारे लिए नर्क का निर्माण कर देता है ।
402. प्रभु के भक्तों से विरोध करने के कारण युद्ध का इतना बुरा परिणाम कौरवों के लिए हुआ जबकि पांडवों के लिए सब कुछ अनुकूल हो गया । प्रभु कृपा के कारण ही पांडवों के लिए ऐसा संभव हुआ ।
403. शास्त्र कहते हैं कि किसी सत्कर्म को करने वाले की निंदा या उस पर प्रतिकूल टिप्पणी कभी भी नहीं करनी चाहिए नहीं तो उसका पाप हमें लगता है ।
404. जीवनभर प्रारब्ध के कारण जिसके साथ अन्याय होता है, प्रभु की कृपा होने के बाद वह अन्याय होना बंद हो जाता है ।
405. प्रभु के विधान के आगे कोई भी मंत्र, औषधि, होम, हवन एक पापी जीव को बचा नहीं सकती ।
406. शास्त्र कहते हैं कि अपने कुल के देव और देवी माता की पूजा किए बिना कोई भी मंगल कार्य कभी भी शुरू नहीं करना चाहिए ।
407. प्रभु ने अत्यंत प्रेम से स्वयं अपने श्रीहाथों से श्री युधिष्ठिरजी का राज्याभिषेक किया और उन्हें मुकुट धारण करवाया । यह प्रभु का कितना अदभुत प्रेम अपने भक्त पांडवों के लिए था ।
408. पूरे विश्व ने देखा कि पांडव सिर्फ प्रभु श्री कृष्णजी की कृपा के कारण और उस कृपा के परिणाम से चक्रवर्ती राजा बन गए ।
409. शास्त्र कहते हैं कि श्री युधिष्ठिरजी का राज्याभिषेक करके प्रभु ने जैसे धर्म का ही राज्याभिषेक कर दिया ।
410. प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी अदभुत श्रीलीला में अपने भक्त पांडवों का राज्याभिषेक करवाया, खुद अपना कभी भी नहीं करवाया, न श्री मथुराजी में और न ही श्री द्वारकाजी में ।
411. धर्मात्मा पुरुष कभी भी अपने सद्गुणों को नहीं देखते और सबसे यही आशीर्वाद मांगते हैं कि जो सद्गुण मेरे में नहीं हैं, उसका जीवन में विकास हो, ऐसा आशीर्वाद दें ।
412. भक्त सदैव प्रभु से विनती करता है कि उसकी गलती या उसके प्रमाद को प्रभु सदैव उसे बताते रहें ।
413. प्रभु श्री कृष्णजी को एक बार श्री युधिष्ठिरजी ने ध्यान करते हुए देखा तो उन्होंने पूछा कि भक्त आपका ध्यान करते हैं पर आप किसका ध्यान कर रहे हैं । प्रभु ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि मैं भी अपने भक्तों का ध्यान करता हूँ ।
414. शास्त्र कहते हैं कि एक-एक गुण भी हमें महान बनाते हैं पर प्रभु की भक्ति के कारण तो सद्गुणों के सागर का महासंगम हमारे अंदर हो जाता है ।
415. शास्त्र कहते हैं कि सत्कर्म करने के लिए कभी भी, किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए ।
416. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की सेवा करते वक्त किसी की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए । अगर किसी व्यक्ति ने प्रभु सेवा का कोई काम नहीं किया तो खुद अपने हाथ से वह कार्य कर लेना चाहिए ।
417. शास्त्र कहते हैं कि देवालय में जाना हो तो पैदल जाना चाहिए । अगर किसी वाहन से भी जाएं तो उस देवालय के कुछ दूर पहले उसे रोक देना चाहिए और वहाँ से पैदल ही देवालय प्रभु के दर्शन के लिए जाना चाहिए ।
418. किसी महापुरुष या संत से मिलने के समय भी पैदल जाना चाहिए । प्रभु ने श्री भीष्म पितामह की बाणों की शय्या आने से पहले ही अपना रथ रोक दिया और पैदल चलकर प्रभु अपने भक्त, जो कि एक महात्मा भी थे, उनसे मिलने गए ।
419. किसी भी बड़े महात्मा या संत के परलोक गमन के समय उनके पास रहना और कीर्तन करना, इसको शास्त्रों ने बहुत बड़ा पुण्य माना है ।
420. शास्त्र कहते हैं कि सकामता जीवन में मनुष्य को लाचार बनाती है, मनुष्य को झुकाती है । इसलिए निष्काम भक्त को प्रभु सबसे शिरोमणि भक्त मानते हैं ।
421. प्रभु जब भक्त से मिलते हैं तो आलिंगन से अपने भक्त का अभिनंदन करते हैं ।
422. जीवनभर श्री भीष्म पितामह ने प्रभु का चिंतन किया था इसलिए प्रभु उनके अंतिम समय स्वयं उपस्थित होकर उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ करने आए ।
423. प्रभु ने अपनी मौजूदगी में पांडवों को श्री भीष्म पितामह से उपदेश दिलवाया । श्री भीष्म पितामह ने कहा कि मेरा प्रभु के सामने बोलना प्रभु श्री सूर्यनारायणजी को दीपक दिखाने जैसा है । प्रभु के सामने एक भक्त कितनी मर्यादा में बोलता है, यह यहाँ देखने को मिलता है ।
424. शास्त्र कहते हैं कि संसार की व्यर्थ बातों को बोलकर हमें अपनी शक्ति क्षीण नहीं करनी चाहिए क्योंकि आयुर्वेद शास्त्र का सिद्धांत है कि सबसे ज्यादा शक्ति बोलने से ही क्षीण होती है ।
425. कितना बड़ा सूत्र श्री भीष्म पितामह ने अपने अंतिम समय दिया जब उन्होंने कहा कि प्रभु की कृपा और नाम जप ही उनकी शक्ति का उनके जीवन में एकमात्र आधार रहा है ।
426. प्रभु के सन्मुख होते ही श्री भीष्म पितामह की थकान चली गई, वेदना और पीड़ा खत्म हो गई, सभी ज्ञान उनकी बुद्धि में उपस्थित हो गए, शरीर के हर अंग में चमक आ गई और उपदेश देने हेतु वे सिद्ध हो गए । भगवत् कृपा के कारण ऐसा सब कुछ संभव हुआ ।
427. श्री भीष्म पितामह ने कहा कि मानव जीवन में सबसे बड़ा और अत्यंत जरूरी आधार प्रभु की कृपा का आधार होता है ।
428. शास्त्र कहते हैं कि हमें जीवन में लेश मात्र भी प्रभु की कृपा अर्जन करने का मौका कभी भी नहीं चूकना चाहिए ।
429. शास्त्र कहते हैं कि सभी को बुद्धि प्रभु देते हैं । उस बुद्धि को सही समय जागृत करने के लिए प्रभु की कृपा ही काम करती है, नहीं तो जरूरत के समय बुद्धि का लोप हो जाता है ।
430. जहाँ संसार की बाकी सभी औषधि निष्फल हो जाती है वहाँ संसार की परम औषधि भगवत् स्मरण काम करती है ।
431. प्रभु कृपा पाने हेतु जीवन में सदैव लालायित और प्रयासरत रहना चाहिए ।
432. शास्त्र कहते हैं कि व्यावहारिक ज्ञान, सांसारिक ज्ञान, भौतिक ज्ञान और सबसे बड़ा आध्यात्मिक ज्ञान प्रभु की कृपा से ही हमें मिलता है ।
433. शास्त्र कहते हैं कि सभी आध्यात्मिक प्रश्नों के निवारण हेतु बुद्धि भगवत् कृपा से ही हमें मिलती है ।
434. प्रभु ज्ञान का उपदेश पांडवों को स्वयं हस्तिनापुर में ही दे सकते थे पर प्रभु ने इसके लिए श्री भीष्म पितामह को चुना और उनसे उपदेश करवाया । प्रभु संसार को यह दिखाना चाहते थे कि उनके भक्त के मुख से कितना सुंदर उपदेश प्रभु कृपा से होता है और भक्त को इसकी कीर्ति मिलती है ।
435. शास्त्र कहते हैं कि हमें संतों के सामने आध्यात्मिक प्रश्न पूछने के लिए विनम्र और जिज्ञासु बनना चाहिए ।
436. भक्त आध्यात्मिक ज्ञान प्रभु कृपा से प्राप्त करता है और फिर उस ज्ञान को दूसरों से बांटकर जगत कल्याण के लिए उसका दान भी करता है ।
437. प्रभु के श्रेष्ठ भक्तों में प्रभु की भक्ति और जीवन की सात्विकता बेजोड़ होती है ।
438. आध्यात्मिक ज्ञान देने से पहले श्री भीष्म पितामह पांडवों से बोले कि प्रभु श्री कृष्णजी की कृपा से अब वे ज्ञान देने के लिए सक्षम बन गए हैं और पांडवों के अज्ञान को मिटाने के लिए प्रभु ने ही उन्हें निमित्त बनाया है ।
439. श्री भीष्म पितामह ने कहा कि उन्हें अपने ज्ञान का लेश मात्र भी अहंकार नहीं है क्योंकि उनका ज्ञान और उनके प्रवचन की क्षमता उन्हें प्रभु कृपा से ही मिली है और उनके द्वारा ज्ञान दे पाना प्रभु कृपा के कारण ही संभव है ।
440. शास्त्र कहते हैं कि अध्यात्म के मार्ग पर हमें सदैव जिज्ञासु बने रहना चाहिए ।
441. संतजन सदैव प्रवचन के लिए मुँह खोलने से पहले प्रभु को प्रणाम करते हैं, प्रभु को याद करते हैं और फिर प्रवचन का आरंभ करते हैं ।
442. कभी भी भक्ति के पुरुषार्थ को प्रारब्ध पर नहीं छोड़ना चाहिए, उसके लिए प्रयासरत होना चाहिए ।
443. प्रभु के विचार में विचारशील जीवन जीना अध्यात्म की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है ।
444. शास्त्र कहते हैं कि भक्ति करके जितेंद्रिय बनना चाहिए यानी अपने मन पर नियंत्रण और अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण होना चाहिए ।
445. भक्ति के कारण हमारा मन प्रभु कार्य के लिए सदैव उत्साही बन जाता है ।
446. प्रभु जैसा दातार पूरे ब्रह्मांड में खोजने से भी कहीं नहीं मिलेगा ।
447. संसार में के दलदल में गिरे हुए संसारी जीव को उसी में मौज मिलती है और अच्छा लगता है ।
448. संत कठोर उपमा देकर बताते हैं कि जैसे नाले में बैठे सुअर को अपनी दुर्दशा का बोध नहीं होता । वैसे ही भक्ति एवं परमार्थ से दूर और संसार में पूरी तरह से लिप्त एक संसारी को उसके अनमोल मानव जीवन की दुर्दशा का बोध नहीं होता ।
449. प्रभु का मानस चिंतन करने से यानी मन से प्रभु का चिंतन करने से हमें बहुत बड़ा लाभ जीवन में मिलता है ।
450. हमें चिंतन करके हमारे चिंतन को प्रभु तक ही पहुँचाना चाहिए ।
451. प्रभु के लिए हमारे हृदय में परम प्रेम जागृत होते ही प्रभु हमारे भीतर से प्रकट हो जाते हैं और हमें दर्शन देते हैं ।
452. शास्त्र कहते हैं कि हमारे प्राचीन ऋषियों की प्रज्ञा को प्रखर और जागृत प्रभु की कृपा ने ही किया है ।
453. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी को प्रभु श्री कृष्णजी ने ब्रह्मांड का सबसे प्रिय और सबसे पूज्य बताया है ।
454. मानव जीवन में प्राप्त होने वाला हर दुःख प्रभु ने अपनी श्रीलीला में भोगकर दिखाया और उसके बीच भी कैसे प्रसन्न रहा जाता है, यह भी दिखाया ।
455. परिवार में, संगठन में, समाज में, संसार में समस्याएं युगों-युगों से रही है और आगे भी रहेगी । प्रभु ने खुद इसके निवारण हेतु प्रभु की भक्ति और प्रभु की शरणागति का मार्ग बताया है ।
456. संत सूत्र देते हैं कि अनुकूलता हो तो उसे प्रभु की दया माननी चाहिए, प्रतिकूलता हो तो उसे भी प्रभु की कृपा ही माननी चाहिए ।
457. शास्त्र कहते हैं कि अगर कोई कड़वी बात हमसे कहता है तो उसकी कड़वाहट को अपने मन में नहीं उतरने देना चाहिए ।
458. शास्त्र कहते हैं कि अपने समीप के लोगों को हरदम जोड़कर रखना चाहिए । इससे घर, परिवार, समाज में महान कार्य करने में हमें उनका सहयोग मिलता है ।
459. शास्त्र कहते हैं कि जहाँ परिवार, समाज और संगठन में फूट होती है वहाँ कार्य बिगड़ता-ही-बिगड़ता है ।
460. शास्त्र कहते हैं कि किसी भी प्रकार से परिवार में आपसी फूट का निर्माण नहीं होने देना चाहिए । सदैव प्रयास रहना चाहिए कि परिवार संगठित रहे तो ही वह श्रेष्ठ परिवार माना जाता है ।
461. श्रीराम राज्य की मिसाल देते हुए श्री भीष्म पितामह कहते हैं कि प्रभु श्री रामजी ने अपने श्रीराम राज्य में बिना किसी को दुःखी किए अधिक-से-अधिक राजकोष की वृद्धि की और धन की एकदम भी फिजूलखर्ची नहीं होने दी यानी अनावश्यक खर्च एकदम भी नहीं था ।
462. अगर अखंड रूप से शांति से रहना है तो अपनी कमियों का चिंतन करना हमारे लिए अति अनिवार्य होता है ।
463. शास्त्र कहते हैं कि अपने विरुद्ध आलोचना के स्वर उठते हैं तो उस अनुरूप हमें अपने में परिवर्तन करना चाहिए और आलोचना के स्वर उठाने वाले को कभी हानि नहीं पहुँचानी चाहिए ।
464. शास्त्र कहते हैं कि हम स्वतंत्र नहीं होते और हमारी आलोचना का अधिकार सबके पास सुरक्षित होता है ।
465. शास्त्र कहते हैं कि एक गुरु को अपने शिष्य को सामाजिक रूप से डांटना या फटकारना नहीं चाहिए बल्कि अकेले में उसकी गलती उसको बतानी चाहिए ।
466. शास्त्र कहते हैं कि जिन पर आपत्ति आई है और जो अनाथ और असहाय हैं उनके आंसुओं को तत्परता से पोंछना चाहिए ।
467. एक साधक को अपनी व्यक्तिगत सुविधा और शौक को तिलांजलि देनी चाहिए और उसे अपनी प्रवृत्ति को भक्ति में लगाना चाहिए ।
468. शास्त्रों के स्वाध्याय से अपने विवेक को बढ़ाने में कभी भी हमें संतोष नहीं करना चाहिए ।
469. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में कभी भी आलसी नहीं बनना चाहिए । अपने कार्य को समय पर पूरा करना और निरंतर कार्यशील रहने का अभ्यास होना चाहिए ।
470. जो बातें हमारे जीवन में पीछे घट गईं उनकी चर्चा करके अपना समय हमें व्यर्थ नहीं करना चाहिए ।
471. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में भयभीत होने पर भी अपना भय किसी को नहीं दिखाना चाहिए ।
472. शास्त्र कहते हैं कि किसी पर विश्वास दिखाते हुए भी उस पर कभी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए यानी सावधानता का त्याग जीवन में कभी नहीं करना चाहिए ।
473. शास्त्र कहते हैं कि भक्ति करने वाला जीव क्षमाशील, सहनशील, धैर्यवान, सत्यवादी, अहिंसा से युक्त, संतोषी, प्रिय वाणी बोलने वाला और शांत व्यवहार करने वाला बन जाता है ।
474. शास्त्र कहते हैं कि अवांछित आचरण हमारी किसी भी इंद्रियों से हमें नहीं होने देना चाहिए ।
475. यह सूत्र है कि संसार में किसी वस्तु के लिए हमारे मन में आसक्ति बढ़ेगी तो उतना दुःख बढ़ता जाएगा और जितनी आसक्ति घटेगी उतनी शांति मिलती जाएगी ।
476. शास्त्र कहते हैं कि ऐसा कोई सुख नहीं जिसके बाद दुःख नहीं आता हो और ऐसा कोई दुःख नहीं जिसके बाद सुख नहीं आए ।
477. प्रभु का श्रीमद् भगवद् गीताजी में उपदेश है कि संसार से अनासक्ति हमारे जीवन के उद्धार का एकमात्र मार्ग है ।
478. संसार के कोई भी रिश्ते, पदार्थ हमारे मन से कभी चिपके नहीं, इसका हमें सदैव भान होना चाहिए और हमें इसका ध्यान रखना चाहिए ।
479. शास्त्र कहते हैं कि “मैं और मेरा”- इस आसक्ति से हमें बाहर निकलना चाहिए ।
480. सच्चा सुख और सच्चा संतोष कामनाओं का त्याग करने पर मिलता है । जितना सुख कामना त्याग में है उतना सुख कामना पूर्ति में नहीं है ।
481. शास्त्र हमें सूत्र देते हैं कि कामना जीवन में आई तो दुःख साथ में आता है और कामना गई तो दुःख भी चला जाता है ।
482. शास्त्र कहते हैं कि हम जीवन में अगर कामनाओं को तिलांजलि दे देते हैं तो तत्काल हमें सुख और शांति की प्राप्ति हो जाती है ।
483. कामना रहित जीव जितनी चैन की नींद सो सकता है उतना कामना लिया हुआ व्यक्ति कभी नहीं सो सकता ।
484. हर जीव का अंतिम लक्ष्य यह होता है कि उसके चित्त को विश्राम मिले ।
485. शास्त्र हमें सूत्र देते हैं कि जिन कामनाओं की पूर्ति होती हमें नहीं दिखती उनको जीवन से तुरंत त्याग देना चाहिए, इससे चित्त को तत्काल विश्राम मिल जाएगा ।
486. प्रभु से यही मांगना चाहिए कि हे प्रभु, मेरी कामनाओं को ही खत्म कर दें यानी मेरे भीतर कामनाएं पनपे उस प्रक्रिया को ही बंद कर दें ।
487. शास्त्र पूछते हैं कि कितने धन से मन तृप्त होगा, कितना खाने से पेट भरेगा, कितना देखने से मन भरेगा और कितना पढ़ने से हमें तृप्ति मिलेगी । शास्त्र ही इसका उत्तर देते हैं कि जितना भी धन कमाएं हमसे आगे कोई-न-कोई रहेगा, कितना भी खाएं हमें स्वाद से तृप्ति नहीं मिलेगी, कितना भी देखे हमारा मन नहीं भरेगा और कितना भी पढ़े फिर भी पढ़ने की चीज बाकी रहेगी । इसलिए कामना का त्याग सर्वोपरि है ।
488. हमारा शरीर बूढ़ा होता जाता है, क्षीण होता जाता है पर हमारी तृष्णा सदैव जवान रहती है और बढ़ती ही जाती है ।
489. शास्त्र हमें बहुत बड़ा सूत्र देते हैं कि जीवन की सभी कामनाओं की डोर प्रभु के श्रीकमलचरणों में बांधकर उसे जीवन से त्याग देना चाहिए । फिर एक ही कामना रखनी चाहिए कि प्रभु की निष्काम भक्ति हम कर सकें । यही सुखमय जीवन का एकमात्र सूत्र है ।
490. पूर्व की अपूर्ण कामनाएं जिनकी पूर्ति हेतु हमने अपने जीवन में खूब प्रयास किया उसे प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पण करके त्याग देना चाहिए ।
491. एक सच्चा भक्त प्रभु से यही विनती करता है कि भविष्य में कामना की प्रक्रिया उसके जीवन में हमेशा के लिए बंद हो जाए ।
492. सच्चा सुख तभी मिल सकता है जब हमारी कामनाओं का त्याग तत्काल हम अपने जीवन में कर देते हैं ।
493. भगवत् विषय की कामना को शास्त्रों ने कामना नहीं माना है । शास्त्रों का आग्रह रहा है कि भगवत् विषय की अधिक-से-अधिक, अधिक-से-अधिक कामना जीवन में रखनी चाहिए ।
494. भगवत् विषय की वैसी कामना रखनी चाहिए जैसे प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी के सामने रखी कि युग-युगांतर तक आपकी कथामृत का पृथ्वी लोक में रहकर अमृत पान करता रहूँ ।
495. शास्त्र कहते हैं कि सांसारिक लोभ एकदम नहीं रखना चाहिए पर प्रभु के नाम जप का, भजन का, प्रभु विग्रह के दर्शन का अधिक-से-अधिक लोभ रखना चाहिए ।
496. संसार का कोई भी पदार्थ हमें निरंतर सुख देने में सक्षम नहीं पर प्रभु का सानिध्य हमें अखंड आनंद और परमानंद देने में पूर्णतः सक्षम है ।
497. अध्यात्म उस प्रक्रिया का नाम है जिसमें सिर्फ प्रभु को ही जाना जाता है ।
498. जीवन में भक्ति के कारण सतोगुण की वृद्धि होने से हमें चित्त की शांति मिलती है, आत्म तृप्ति मिलती है, हमारी प्रज्ञा का विकास होता है और आनंद की परम अनुभूति हमें होती है ।
499. अध्यात्म मार्ग पर चलने से पहले शास्त्रों ने अपना सांसारिक कर्तव्य पूरा करने को धर्म माना है, धर्म का हिस्सा माना है और उसको पूरा करने की आज्ञा दी है ।
500. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में हमें दूसरे के साथ ऐसा व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए जो हमें स्वयं के लिए पसंद नहीं हो ।
501. जितना हम किसी को पीड़ा देने का प्रयास करेंगे उतने पाप के भागी बनेंगे । जितना किसी को पीड़ा से निकलने में सहयोग देंगे उतना पुण्य के भागी बनेंगे ।
502. शास्त्र हमें सूत्र के रूप में बताते हैं कि अहंकार किसी भी चीज का जीवन में होगा तो वह हमें निश्चित ही गिराएगा ।
503. एकादशी के दिन अगर हम प्रभु की भक्ति में रोजाना से ज्यादा समय नहीं लगाते हैं यानी ज्यादा माला, ज्यादा भजन नहीं होता है तो एकादशी का सच्चा लाभ नहीं मिलता है ।
504. जीवन में किसी का भी बुरा नहीं करने का संकल्प हमारे मन में होना चाहिए ।
505. सभी के साथ हमारे व्यवहार में समता की भावना होनी चाहिए ।
506. शास्त्र कहते हैं कि हमें अपना व्यापार या नौकरी यानी कर्तव्य कर्म बड़ी ईमानदारी के साथ करना चाहिए ।
507. भक्त के सामने सभी अनुकूल और प्रतिकूल घटना घटती रहती है पर भक्ति के कारण उनके अंतःकरण में एकदम भी असंतुलन नहीं होता ।
508. शास्त्र कहते हैं कि हमें अपने क्रोध को रोकना चाहिए । हमें जीवन में सहना सीखना चाहिए और माफ करना भी सीखना चाहिए ।
509. जीवन में किसी भी चीज का संकल्प न करने से मन में उठी कामनाएं स्वतः ही नष्ट हो जाती है ।
510. प्रभु को छोड़कर संसार के किसी भी पदार्थ को हम अगर अच्छा मानेंगे तो हमारा मन उसमें फंसे बिना नहीं रहेगा । इसलिए शास्त्र कहते हैं कि संसार के किसी भी पदार्थ को अपने मन को अच्छा नहीं लगने देना चाहिए ।
511. शास्त्र कहते हैं कि हम कामनाओं को जीवन में आने से नहीं रोक सकते । मगर उस कामना को पूर्ण करने हेतु संकल्प करने के लिए अपने मन को रोक सकते हैं ।
512. भक्त मानता है कि सारे ब्रह्मांड में मेरे प्रभु से अच्छा कुछ भी नहीं है, ऐसा संकल्प होने पर मन कहीं भी संसार में फंसता नहीं और वह शांत रहता है ।
513. सावधान व्यक्ति को जीवन में कभी भी भयभीत नहीं होना पड़ता ।
514. अपनी श्वासों को और अपने प्राणों को शांत करने का सबसे अच्छा उपाय है कि मन को प्रभु के ध्यान में लगाया जाए ।
515. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में रोगों के निवारण के लिए यानी आरोग्य रहने के लिए अपना आहार और निद्रा नियंत्रित रखनी चाहिए ।
516. शास्त्र कहते हैं कि जो साधक होता है उसको हितकारी आहार और नियंत्रित मात्रा में आहार लेना चाहिए ।
517. जिसको अपने विवेक को जागृत रखना है उसे नित्य श्रीग्रंथों का स्वाध्याय या श्रवण करते रहना चाहिए ।
518. हमारे मस्तक की क्षमता प्रभु ने ऐसी बनाई है कि हम जितना उसका उपयोग करते हैं उतनी उसकी क्षमता बढ़ती है और उपयोग नहीं करने से उसकी क्षमता घटती है ।
519. शास्त्र कहते हैं कि संतोष की वृत्ति को जीवन में धारण करना चाहिए और मोह की वृत्ति का जीवन में त्याग होना चाहिए ।
520. प्राकृतिक नियम के कारण यह संसार हमसे एक-न-एक दिन छूटने वाला है पर जो मन से संसार को पहले ही छोड़ देता है, वही सच्चा बुद्धिमान होता है ।
521. मौत किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करती और किसी को भी समय नहीं देती । इसलिए भक्ति के लिए जीवन में जितनी जल्दी हो सके हमें समय निकालकर सिद्ध हो जाना चाहिए ।
522. अपने जीवन को उत्तम बनाना है तो कभी भी सत्य का त्याग जीवन में नहीं करना चाहिए ।
523. कामनाओं में और आसक्ति में फंसने से बड़ा कोई दुःख नहीं है ।
524. शास्त्र कहते हैं कि अध्यात्म का ज्ञानरूपी धन ही हमारा कल्याण करने में एकमात्र सक्षम होता है ।
525. हमारा सर्वोच्च कल्याण प्रभु के साथ आत्म-साक्षात्कार के द्वारा ही संभव होता है ।
526. हम प्रभु को बाहर इधर-उधर खोजते हैं पर प्रभु कहते हैं कि मैं तुम्हारे भीतर स्थित हूँ और तुमसे भिन्न नहीं हूँ ।
527. जब भक्त का प्रभु से आत्म-साक्षात्कार होता है तो भक्त को उसके अस्तित्व का भान ही नहीं रहता क्योंकि उसका अस्तित्व ही प्रभुमय हो जाता है ।
528. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में संयम रखने से हम अपने दुःखों से पार पा सकते हैं ।
529. शास्त्र कहते हैं कि वाणी का ऐसा संयम होना चाहिए कि असत्य कभी भी हमारी वाणी से नहीं निकले ।
530. शास्त्र कहते हैं कि बोला जाने वाला सत्य कटु नहीं होना चाहिए यानी वह किसी के हृदय को वेदना देने वाला नहीं होना चाहिए ।
531. शास्त्र कहते हैं कि अगर हम अपना आत्म-कल्याण चाहते हैं तो कठोर वाणी हमें कदापि नहीं बोलनी चाहिए ।
532. शास्त्र कहते हैं कि किसी के हृदय को आघात करने से हमारे आत्म-कल्याण के मार्ग में हानि हो जाती है ।
533. हम किसी की बात से सहमत नहीं हो तो असहमति जताने के लिए भी कठोर वाणी का उपयोग कदापि नहीं करना चाहिए । असहमति मीठे शब्दों में ही होनी चाहिए ।
534. प्रभु निश्चित रूप से उस पर प्रसन्न होते हैं जो कठोर वाणी से किसी कठोर बात का भी उत्तर नहीं देता ।
535. किसी से बदला लेने की भावना का त्याग करने वाले पर प्रभु निश्चित कृपा करते हैं ।
536. जो जीवन में निरंतर क्षमा करता जाता है उसके पुण्यों की वृद्धि होती जाती है ।
537. अपने मन को नियंत्रण में रखना सबसे बड़ा ज्ञान और विज्ञान है ।
538. जो परमार्थ के मार्ग पर चलने के आकांक्षी हैं उन्हें अपमान सहना सीखना चाहिए ।
539. शास्त्र कहते हैं कि बिना कारण अपमान सहने वाले को अपमान करने वाले का पुण्य अमृतरूप में मिल जाता है ।
540. किसी शांतिप्रिय व्यक्ति पर अगर हम क्रोध करते हैं तो वह किया हुआ क्रोध हमें ही हानि पहुँचाता है ।
541. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में जितना क्रोध अधिक उतना हमारे पुण्यों का नाश अधिक होता है ।
542. शास्त्र कहते हैं कि क्रोध से की गई बड़ी रूप में पूजा, अनुष्ठान या यज्ञ का फल बहुत गौण होता है । शांति से की गई छोटी रूप में पूजा, अनुष्ठान और यज्ञ का फल बहुत अधिक होता है ।
543. जीवन में धैर्य से काम लेने वाला, एकांत सेवन करने वाला, शास्त्रों का स्वाध्याय करने वाला, अपने मन पर संयम रखने वाला और क्रोध नहीं करने वाला आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए सिद्ध हो जाता है ।
544. शास्त्र कहते हैं कि अहंकारी जीव किसी को प्रिय नहीं होता । जो अहंकार का त्याग कर देता है यानी अहंकार का विसर्जन कर देता है वह सर्वाधिक लोकप्रिय हो जाता है ।
545. शास्त्र कहते हैं कि सदैव जीवन में मुस्कुराते रहना एक बहुत बड़ा जीवनधन है ।
546. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के श्रीकमलचरणों के सेवन और पूजन में ही जीवन में रस लेना चाहिए, अन्यत्र संसार में कहीं भी रस नहीं लेना चाहिए ।
547. शास्त्र कहते हैं कि श्रेष्ठ पुरुषों की कीर्ति छाया रूप में सदैव उनके साथ स्वतः ही चलती है ।
548. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी अपने समय में से आधा क्षण भी प्रभु की भक्ति किए बिना व्यर्थ नहीं गंवाते । श्री भक्तिसूत्र में वे सूत्र देते हैं कि एक क्षण भी प्रभु के बिना व्यर्थ किया गया हमारे लिए बहुत बड़ी हानि का कारण बनता है ।
549. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी सतत प्रभु का ध्यान करते रहते हैं और अखंड नाम जप करते रहते हैं, इससे उनको कभी भी तृप्ति का अनुभव नहीं होता ।
550. देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने ऋषि श्री वाल्मीकिजी को श्री रामायणजी लिखने की प्रेरणा दी, प्रभु श्री वेदव्यासजी को श्रीमद् भागवतजी महापुराण लिखने की प्रेरणा दी, श्री ध्रुवजी को प्रभु प्राप्ति के लिए महामंत्र दिया, श्री प्रह्लादजी को उनकी माता के गर्भ में ही सत्संग देकर भक्त बना दिया । सार यह है कि वे हर तरफ, हर जगह और हर तरह से प्रभु के काज में सदैव लगे रहते हैं ।
551. हमारा आज का प्रारब्ध पूर्व जन्मों में हमारे ही द्वारा निर्माण किया गया पुरुषार्थ या अपुरुषार्थ के कारण ही होता है ।
552. हमारे खाते में जमा पुराने और गलत प्रारब्ध को काटना है तो इसका एकमात्र उपाय इस जीवन में हमें भक्ति का पुरुषार्थ करना ही है ।
553. सिर्फ भक्ति का पुरुषार्थ करना काफी नहीं है । सही दिशा में और सही ढंग से तीव्र भक्ति का पुरुषार्थ करना अनिवार्य है ।
554. किसी भी देवता या देवी माता की अनुकूलता हमारे द्वारा किए भक्ति के पुरुषार्थ पर ही निर्भर करती है ।
555. शास्त्र कहते हैं कि जो सावधान रहकर पुरुषार्थवादी बनकर सत्कर्म करता है उसका निश्चित कल्याण होकर ही रहता है ।
556. शास्त्र कहते हैं कि घर की श्री ठाकुरबाड़ी को प्रभु के उत्सव के दिन खूब सजाया जाना चाहिए ।
557. जिस घर में कलह या झगड़ा होता रहता है, भगवती लक्ष्मी माता वहाँ से दूर रहतीं हैं ।
558. जो जीव प्रभु की नित्य आराधना करता है, जिसको प्रभु के श्रीकमलचरण बहुत प्रिय लगते हैं, जो प्रभु के श्रीकमलचरणों का नित्य ध्यान करता है, भगवती लक्ष्मी माता उस जीव पर इस समर्पण के कारण बहुत कृपा करतीं हैं ।
559. भगवती लक्ष्मी माता वहाँ अवश्य निवास करतीं हैं जहाँ भगवती तुलसी माता की नित्य सेवा होती है, गौ-माता की सेवा होती है, माता-पिता और गुरुजनों की सेवा होती है, पितरों का श्राद्ध होता है, आने वाले गरीब को रोटी मिलती है और अत्यंत श्रद्धा से भगवत् भजन होता है ।
560. भगवती गंगा माता की महिमा बताते हुए शास्त्र कहते हैं कि जितने समय हमारे पितरों की अस्थि भगवती गंगा माता में रहती है उतने समय तक पितर किसी भी लोक में हों, वे सदा तृप्त रहते हैं ।
561. जैसे श्री गरुड़जी को देखकर सभी सर्प बलहीन हो जाते हैं वैसे ही भगवती गंगा माता के परम पवित्र श्रीगंगाजल को देखकर हमारे भीतर के सभी पाप बलहीन होकर भाग जाते हैं ।
562. संसार के किसी भी तीर्थ में स्नान करें पर भगवती गंगा माता में स्नान अतुल्य फल देने वाला है क्योंकि यह परम पवित्र श्रीगंगाजल प्रभु के श्रीकमलचरणों से निकला है ।
563. जिसने मानव जन्म लेकर भगवती गंगा माता के परम पवित्र श्रीगंगाजल में स्नान नहीं किया, श्रीगंगाजल का पान नहीं किया, भगवती गंगा माता के दर्शन नहीं किए, उसे लंगड़ा, अंधा होने से भी ज्यादा पंगु शास्त्रों में माना गया है ।
564. शास्त्र कहते हैं कि गौ-माता की नित्य सेवा करने वाला अति दिव्य गति को प्राप्त करता है क्योंकि गौ-माता के प्रत्येक अंग में देवी-देवताओं का निवास है ।
565. शास्त्र कहते हैं कि जो गौ-माता की सेवा नहीं करते, उन्हें धर्म धिक्कारता है ।
566. प्रभु के उत्सव के दिनों में अल्पाहार या उपवास और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए ।
567. अपने घर की नित्य पूजा सवेरे जल्दी ही हो जानी चाहिए । शास्त्र कहते हैं कि जितनी देर से पूजा होती है उतना पुण्य का क्षय होता चला जाता है ।
568. शास्त्र कहते हैं कि ब्रह्मांड के संचालक प्रभु के नाम का कीर्तन, जप, पाठ, आराधना, अनुष्ठान, सहस्त्रनाम का पाठ भगवत् प्राप्ति का श्रेष्ठ उपाय है । ऐसा करने वाला जन्म-मरण के बंधन से सदैव के लिए मुक्त हो जाता है ।
569. शास्त्र कहते हैं कि अंतिम अवस्था में जीव को प्रभु से उनकी शरणागति के अंतर्गत प्रभु के श्रीकमलचरणों की नित्य सेवा में प्रभु द्वारा स्वीकार करने का निवेदन हमें प्रभु से करना चाहिए ।
570. एक भक्त हृदय प्रभु से प्रभु के श्रीकमलचरणों में स्थान चाहता है और प्रभु की नित्य सेवा में सदैव के लिए नियुक्त होने की अभिलाषा रखता है ।
571. जब श्री भीष्म पितामह से श्री युधिष्ठिरजी ने प्रभु श्री महादेवजी की महिमा पूछी तो श्री भीष्म पितामह शांत हो गए । उन्होंने कहा कि श्रीशिव महिमा का बखान करने के लिए वे सर्वदा से असमर्थ हैं, मात्र प्रभु श्री कृष्णजी ही ऐसा करने में एकमात्र सक्षम हैं । फिर दादा श्री भीष्मजी और पोते श्री युधिष्ठिरजी श्रोता बन गए और प्रभु श्री कृष्णजी ने प्रभु श्री महादेवजी की अपार और असीम महिमा का निरूपण शुरू किया ।
572. एक भक्त प्रभु की महिमा का वर्णन सुनकर भी आनंदित होता है और प्रभु की महिमा का वर्णन करके भी आनंदित होता है ।
573. हम अपने जीवन में जो कुछ भी प्राप्त करते हैं वह प्रभु की कृपा के कारण ही प्राप्त कर पाते हैं ।
574. हमें नित्य प्रभु के श्रीकमलचरणों का ध्यान करना चाहिए ।
575. हमारे लिए प्रभु से बढ़कर हमारे जीवन में कुछ भी नहीं होना चाहिए ।
576. सारे ब्रह्मांड का निर्माण, संचालन और लय प्रभु के श्रीहाथों में होता है ।
577. प्रभु के भजन और आराधना से जीव अपने जीवन में सभी प्रकार की संपत्ति को प्राप्त कर लेता है ।
578. प्रभु श्री महादेवजी भक्तों की अपेक्षा से भी अधिक उनकी मनोकामना की पूर्ति करते हैं क्योंकि वे करुणानिधान हैं यानी करुणा के महासागर हैं ।
579. देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी की आराधना हमें वैभव, विद्या और आरोग्य देती है ।
580. संपत्ति और सद्बुद्धि दोनों प्रभु की कृपा के कारण ही जीवन में आती है ।
581. अट्ठावन दिन बाणों की शय्या पर श्री भीष्म पितामह लेटे थे और उनसे नित्य मिलने के लिए प्रभु श्री कृष्णजी, देवर्षि प्रभु श्री नारदजी, प्रभु श्री वेदव्यासजी और ऋषि-मुनि-संत सब आते थे । इतना बड़ा सम्मान किसी को अंतिम समय में नहीं मिला । यह सिर्फ उनकी भक्ति के कारण था कि प्रभु स्वयं चलकर उनको अपना सानिध्य देने आते थे ।
582. अपने अंतिम समय अंतिम वार्ता हेतु श्री भीष्म पितामह ने प्रभु श्री कृष्णजी से अंतिम संवाद का निवेदन किया । जितने भी उपस्थित सज्जन थे सब पीछे हट गए और श्री भीष्म पितामह टकटकी लगाए प्रभु को देखते रहे, देखते रहे । अपनी मति को प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित करके श्री भीष्म पितामह ने प्रभु का नाम लेते-लेते और अपने नेत्रों से प्रभु के साक्षात दर्शन करते-करते इस महान भक्त ने इस धरती से प्रस्थान किया ।
583. शास्त्र कहते हैं कि अपने पूर्वजों और पितरों के प्रति निरंतर जीवन में आदर भाव कायम रखना चाहिए ।
584. जो श्रीमद् भगवद् गीताजी का ज्ञान अपने जीवन में उतारता है वह साक्षात प्रभु को प्राप्त होता है ।
585. श्रीमद् भगवद् गीताजी के उपदेश की तुलना किसी भी उपदेश से नहीं हो सकती क्योंकि इसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता ।
586. शास्त्र हमें सूत्र देते हैं कि किसी भी शुभ कार्य से पहले प्रभु से कृपा की याचना करनी चाहिए ।
587. शास्त्र कहते हैं कि जो संपदा जिस देवता के अधीन है उनकी कृपा जीवन में अर्जित करने से वह संपदा हमें प्राप्त हो जाती है ।
588. यह सिद्धांत है कि उत्तम पदार्थ हमारी पात्रता होने पर ही हमें उपलब्ध होते हैं ।
589. प्रभु की कृपा के बिना जीवन के किसी भी क्षेत्र में हमें अनुकूलता प्राप्त नहीं हो सकती ।
590. जीवन में अप्राप्त की प्राप्ति प्रभु की कृपा से ही होती है ।
591. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु का अंश होने के कारण आनंद जीव का स्वयं सिद्ध स्वरूप है पर जीव को इसकी विस्मृति हो गई है ।
592. शास्त्र कहते हैं कि परमात्मा तत्व को हम बाहर खोजते हैं मगर वह हमारे हृदय में ही स्थित है और हमसे एकदम दूर नहीं है ।
593. शास्त्रों ने प्रभु को परिपूर्ण परमानंद का सागर बताया है ।
594. भक्ति के कारण सद्गुणों और दैवीय संपत्ति से युक्त जीव ही प्रभु के आत्म-साक्षात्कार हेतु प्रस्तुत होता है ।
595. जो प्रभु की निष्काम भक्ति करता है वह प्रभु को सबसे प्रिय होता है ।
596. शास्त्र कहते हैं कि जिसका अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण होता है वह भक्ति में बहुत जल्दी सफल हो जाता है ।
597. जब हमारा संसार से मोहभंग होता है तो हम भक्ति पथ पर बहुत जल्दी अग्रसर हो पाते हैं ।
598. प्रभु की प्राप्ति वही कर पाता है जिसको जीवन में प्रभु से आत्म-साक्षात्कार हेतु तीव्र इच्छा होती है ।
599. जो संसार के सुखों का त्याग करके आत्मज्ञान के लिए सिद्ध हो जाता है, उसका जीवन ही शास्त्रों के द्वारा सबसे सफल जीवन माना गया है ।
600. शास्त्र कहते हैं कि जीवन रहते ही प्रभु से आत्म-साक्षात्कार करके जीवन से मुक्त हो जाना चाहिए, यही मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है ।
601. शास्त्र कहते हैं कि यज्ञ, अनुष्ठान और पूजा में निर्दोष और सात्विक विधान में ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए ।
602. भक्तों ने अपने जीवन में प्रभु कृपा की इतनी अदभुत महिमा देखी होती है कि उनका परम विश्वास प्रभु पर हो जाता है ।
603. पूर्व के राजाओं की मान्यता होती थी कि पूरा राज्य प्रभु का है और राज्य की पूरी संपत्ति प्रभु की है । वे मात्र प्रभु के सेवक के रूप में राज्य संभालते थे ।
604. अपना सब कुछ प्रभु का मानकर और अपने को प्रभु के अधीन मानकर कार्य करना, यह जीवन जीने का सबसे श्रेष्ठ तरीका होता है ।
605. भक्त सदैव यह मानता है कि उसके पास जो कुछ भी है वह प्रभु का ही है और प्रभु की सेवा हेतु ही है ।
606. भक्त के उद्धार के लिए प्रभु कभी भी भक्त में अहंकार नहीं रहने देते एवं अहंकार का निर्माण होते ही उसे तोड़ देते हैं ।
607. शास्त्र कहते हैं कि किसी गरीब के पेट की अग्नि बुझाना बहुत बड़ा धर्म माना गया है ।
608. प्रभु के लिए लिया किसी व्रत के पालन में परिवार के सभी सदस्यों को योगदान देना, उनका कर्तव्य होना चाहिए ।
609. जिसके पास खूब धन है उसने थोड़ा धन दान के लिए निकाल दिया तो इसे शास्त्रों ने ठीक बताया है । पर जो अभावग्रस्त है उसने भी अपने पास से दान के लिए धन निकाला उसकी शास्त्रों में स्तुति की गई है ।
610. शुद्ध तरीके से अर्जित किए धन के शुद्ध दान का प्रभाव बहुत बड़ा होता है ।
611. प्रभु हमारे पास बहुत से लोगों को निमित्त बनाकर उपदेश भेजते रहते हैं ।
612. जिस यज्ञ में किसी भी प्रकार की हिंसा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं हुई, शास्त्रों में उसे ही सर्वश्रेष्ठ यज्ञ माना गया है ।
613. जीवन के संघर्ष में हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए, यह श्री महाभारतजी हमें सिखाती है ।
614. जब प्रभु की कृपा होती है तो हमारे पापों के लिए प्रायश्चित करने के लिए हमारे भीतर से प्रभु ही हमें प्रेरणा देते हैं ।
615. शास्त्र कहते हैं कि जो प्रभु आज्ञा में रहते हैं उनका सदैव मंगल-ही-मंगल होता रहता है ।
616. शास्त्र कहते हैं कि इंद्रियों का जितना संयम होगा उतना ही हमारा जीवन सुखमय बनेगा ।
617. जीवन में किए सत्संग का प्रभाव हमें जरूरत के समय देखने को मिलता है ।
618. सत्संग हमारे हृदय को परिवर्तन करने का एकमात्र साधन माना गया है ।
619. अध्यात्म या परमार्थ में किया हमारा कोई भी साधन प्रभु की कृपा से ही सफल होता है ।
620. शास्त्र कहते हैं कि किसी के दोष को पुनः-पुनः बोलना या दोहराना उचित नहीं है, दोष को भूलना ही सबसे उचित नीति है ।
621. जीवन में हुए पुराने अपमान को याद करके भी हम वर्तमान में जलते रहते हैं । इसलिए शास्त्र कहते हैं कि जब तक हम इस वृत्ति का त्याग नहीं करते हमें शांति नहीं मिल सकती ।
622. हमारे भीतर के दोष हमें प्रभु की नजरों में नीचे गिरा देते हैं । इसलिए जीवन में अपने दोषों का सर्वथा त्याग करना चाहिए ।
623. जीवन की हर गलती प्रभु के सामने सच्चे पश्चाताप के आंसू से घुल जाती है ।
624. प्रभु की कृपा होती है तो हमारी बुद्धि सदैव धर्म में लगी रहती है और धर्म आचरण के लिए निष्ठावान रहती है ।
625. प्रभु अपने भक्तों पर कितना अनुग्रह करते हैं, यह श्री महाभारतजी में पांडवों का दृष्टांत देखने से हमें पता चलता है ।
626. शास्त्र कहते हैं कि जो भक्ति करके प्रभु को जानने का प्रयास नहीं करते, वे अध्यात्म के रहस्यों को भी अपनी बुद्धि से नहीं जान पाते ।
627. हमें जीवन में सभी चीज प्रभु की कृपा के बाद सुलभ हो जाती है ।
628. जब जीव प्रभु से दूर हो जाता है तो उसकी सभी शक्तियां, बुद्धि, सात्विकता का नाश स्वतः हो जाता है ।
629. भक्तों का एकमात्र बल प्रभु ही होते हैं ।
630. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की भक्ति का जीवन में कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए ।
631. शास्त्र कहते हैं कि व्यक्ति नहीं गिरता, उसके कर्म ही उसे गिराते हैं ।
632. शास्त्र कहते हैं कि जिनके पुण्य बहुत होते हैं और पाप थोड़े होते हैं उन्हें पहले नर्क ले जाकर फिर स्वर्ग लाया जाता है । जिनके पाप बहुत होते हैं और पुण्य थोड़े होते हैं उन्हें पहले स्वर्ग दिखाकर फिर नर्क ले जाया जाता है ।
633. शास्त्र कहते हैं कि हमारे भाई, बंधु, माता, पिता, पुत्र, पुत्री, पति, पत्नी सब अनित्य हैं और हर जन्म में बदलते रहते हैं, केवल प्रभु ही सनातन और नित्य हैं । इसलिए शास्त्र कहते हैं कि अनित्य के लिए नित्य की कभी भी उपेक्षा जीवन में नहीं करनी चाहिए ।
634. श्री महाभारतजी के पठन से और श्रवण से हमारा विवेक जागृत होता है और हमारा व्यवहार ठीक बना रहता है ।
635. जीवन के मांगल्य के लिए यह पंचम वेद यानी श्री महाभारतजी है । यह प्रभु के निकट पहुँचाने वाला परम श्रीग्रंथ भी है ।
636. भारतीय संस्कृति विश्व में सर्वश्रेष्ठ है, इसमें कोई दो मत नहीं । यह प्रमाणित करता है श्री महाभारतजी का श्रीग्रंथ ।
637. भारतीय संस्कृति इसलिए अदभुत है क्योंकि मानव जीवन का अत्यंत गहराई से विचार यानी सर्वाधिक व्यापक विचार भारतीय संस्कृति में ही हुआ है ।
638. मानव जीवन के विचार में जिस गहराई और जिस व्यापकता तक हमारे ऋषि-मुनि पहुँच गए वहाँ तक अन्य कोई भी आज तक नहीं पहुँच पाया है ।
639. मानव जीवन प्राप्त करके हमें क्या-क्या अर्जित करना चाहिए इसका उत्तम विचार भारतीय ऋषियों ने किया है ।
640. भारतीय ऋषियों की मान्यता थी कि राष्ट्र संपन्न होना चाहिए, समृद्ध होना चाहिए और सर्वसमर्थ होना चाहिए ।
641. पूरा विश्व आध्यात्मिक ज्ञान के लिए और धर्म के लिए सदैव भारतवर्ष की तरफ देखता रहा है ।
642. भारतवर्ष की संस्कृति का कभी पतन नहीं हुआ, कभी वह नष्ट नहीं हुई, यह हमारी संस्कृति की अदभुत ताकत है ।
643. भारतीय संस्कृति जीव को उसके उत्थान के लिए स्वतंत्रता देने में सदैव अनुपम रही है । जीव को ज्ञान, कर्म, भक्ति और योग चार मार्ग दिए हैं और उसको स्वतंत्रता दी है कि वह अपने हित अनुसार किसी भी मार्ग का चयन कर ले ।
644. भारतीय संस्कृति का मंदिर सोलह स्तंभों पर खड़ा है । चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) । चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) । चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) । चार साधन (ज्ञान, कर्म, भक्ति और योग) । इतना व्यापक मानव जीवन का विचार मात्र भारतवर्ष में ही हुआ है ।
645. प्राचीन भारतवर्ष के तीर्थ, जाति, पहनावा, रीति-रिवाज, वन, पहाड़, नदी, भूगोल का पूरा विस्तार श्री महाभारतजी में हमें देखने को मिलता है । इसलिए श्री महाभारतजी को जाने बिना पुरातन भारतवर्ष को जाना नहीं जा सकता, भारतीय संस्कृति को जाना नहीं जा सकता ।
646. श्री महाभारतजी की फल स्तुति में कहा गया है कि महाभारतजी जिस घर में रखी जाएगी, पढ़ी जाएगी वहाँ का जीव जहाँ भी जाएगा विजय को प्राप्त करेगा क्योंकि यह विजय का श्रीग्रंथ है यानी विजय प्राप्त कराने वाला श्रीग्रंथ है ।
647. प्रभु के प्रेम में भक्तों का किया रुदन उन्हें प्रभु के समीप ले जाता है ।
648. शास्त्रों का सिद्धांत है कि शरणागति प्रभु के हृदय को पिघला देती है, मगर शरणागति वैसी होनी चाहिए जैसे एक नवजात बच्चे की अपने माँ के लिए होती है ।
649. शास्त्रों में बताया पहला नियम यह है कि जब तक कोई जिज्ञासु बनकर नहीं पूछे, उन्हें किसी शास्त्र का उपदेश नहीं देना चाहिए ।
650. संसार में जब-जब जो भी शोकग्रस्त और मोहग्रस्त होता है उन्हें श्रीमद् भगवद् गीताजी धर्म का मार्ग दिखाती है ।
651. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु के मार्गदर्शन के बाद हम धर्मयुक्त निर्णय लेने के लिए जीवन में सिद्ध हो जाते हैं और उसके लिए सक्षम बन जाते हैं ।
652. ब्रह्मांड में सभी चीजों का संचालन प्रभु के श्रीहाथों में होता है, यह श्रीमद् भगवद् गीताजी का अंतिम सिद्धांत है । इसी मुख्य सिद्धांत का विस्तार श्रीमद् भगवद् गीताजी में हुआ है ।
653. हमारे शास्त्रों में सार शुरू में बता दिया जाता है बाद में उसका विस्तार किया जाता है ।
654. अपने स्वधर्म का पालन करने का बहुत बड़ा लाभ शास्त्रों में बताया गया है ।
655. शास्त्र कहते हैं कि सत्कर्मों से अपना नाम अमर किया जा सकता है, शरीर तो किसी का अमर होने वाला नहीं है ।
656. हमारे शास्त्र हमारी बुद्धि का परिष्कार करते हैं, हमारी बुद्धि ईश्वरनिष्ठ हो जाए इसके लिए प्रयत्न करते हैं ।
657. शास्त्र कहते हैं कि भक्ति मार्ग में अगर हम मन में कोई कामना रखते हैं तो कामना की पूर्ति हो जाएगी मगर प्रभु हमसे दूर ही रहेंगे ।
658. कामना रहित व्यक्ति, जो निष्काम भक्ति करता है वह प्रभु को सर्वाधिक प्रिय होता है ।
659. अपने कर्मफलों को प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित कर देना शास्त्रों ने श्रेष्ठ माना है ।
660. शास्त्रों का मूल सिद्धांत यह है कि हमारे किए हुए हर कर्म का हमें फल मिलेगा मगर कैसे मिलेगा, क्या मिलेगा और कब मिलेगा इसके चयन का अधिकार केवल प्रभु के पास है ।
661. हमारे शास्त्र हमें दो सिद्धांत बताते हैं । पहला, जो हमने किया है उसका फल हमें मिलकर ही रहेगा । दूसरा, जो हमने नहीं किया उसका फल हमें कभी भोगना नहीं पड़ेगा ।
662. शास्त्र कहते हैं कि यदि कोई प्रतिकूल भोग हम वर्तमान में भोग रहे हैं तो उसका निहित कर्म निश्चित ही पूर्व में हमने किया होगा ।
663. कर्म दक्षता के साथ करना या नहीं करना, यह हमारे अधीन होता है । उस कर्म का फल क्या मिलेगा, कैसे मिलेगा, किस रूप में मिलेगा और किस जन्म में मिलेगा, यह प्रभु के अधीन होता है ।
664. कामनाएं हमारे हृदय से लुप्त हो जाएं तो हमारे अंतःकरण में एक बहुत संतुलन की स्थिति बन जाती है ।
665. शास्त्र कहते हैं कि हमारा मन सबके लिए दया भाव से भरा हुआ होना चाहिए । जिसने अच्छा किया उसके प्रति भी और जिसने बुरा किया उसके प्रति भी दया यानी प्राणिमात्र के प्रति दया का भाव होना चाहिए ।
666. हमारा मन संसार में रहकर भी विकारों की तरफ नहीं जाना चाहिए, यह केवल भक्ति से ही संभव होता है ।
667. अखंड प्रसन्नता हमारा स्वभाव बन जाना चाहिए । अभी की स्थिति यह है कि हम कभी-कभी प्रसन्न रहते हैं पर अखंड रूप से प्रसन्न नहीं रहते ।
668. जीवन में सबके साथ हमारा अहंकार रहित व्यवहार होना चाहिए ।
669. श्रीमद् भगवद् गीताजी में कर्मयोग के बारे में कहा गया है कि कर्म यज्ञ से प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं । अपना कर्तव्य कर्म ठीक से करने से जीव शुद्ध हो जाता है और प्रभु को प्रिय हो जाता है ।
670. आज के युग में आध्यात्मिक ज्ञान का भाषण करने में तो सभी कुशल हैं पर उसे आचरण में उतारने में कोई बिरला ही सफल होता है ।
671. भंवरे का नाश गंध के विषय से होता है, हिरण शब्द के विषय से पकड़ा जाता है, हाथी स्पर्श के विषय से पकड़ा जाता है और पतिंगा का नाश लौ के विषय के कारण हो जाता है । दृष्टांत देकर शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य को इसलिए सांसारिक विषयों से बचना चाहिए ।
672. अगर हम सच्चे मन से प्रभु से प्रेम करते हैं तो यह हमारे अनंत जन्मों के पुण्यों का परम फल मानना चाहिए ।
673. संत कहते हैं कि अपने प्रेमी भक्तों से मिलने, पापियों को दंड देने और संसार की व्यवस्था करने यानी धर्म स्थापना करने हेतु प्रभु का अवतार होता है ।
674. प्रभु अपनी विभूतियों को भी संसार में धर्म की व्यवस्था के लिए भेजते रहते हैं पर कभी-कभी खुद भी पधारकर संसार को कृतार्थ करते हैं ।
675. वैदिक सिद्धांत किसी भी युग में बदलते नहीं, केवल उनकी प्रस्तुति का तरीका युग अनुसार संतों द्वारा बदल दिया जाता है ।
676. संसार की किसी भी वस्तु में आसक्ति नहीं रखने वाला, किसी प्राणी से मोह या बैर नहीं रखने वाला, यम नियमों का पालन करने वाला और विशुद्ध जीवन जीने वाला प्रभु को सर्वाधिक प्रिय होता है ।
677. जो प्रभु की भक्ति तन-मन से करते हैं प्रभु भी कहते हैं कि मैं भी उन भक्तों की भक्ति करता हूँ ।
678. प्रभु अपने भक्तों को स्वतंत्रता देते हैं कि वह किसी भी भाव से प्रभु की भक्ति करें, किसी भी युक्ति से प्रभु की भक्ति करें, जैसे दास भक्ति (प्रभु श्री हनुमानजी), सखा भक्ति (श्री अर्जुनजी), वात्सल्य भक्ति (भगवती यशोदा माता- श्री नन्द बाबा), लालन भक्ति (श्री रामकृष्ण परमहंसजी), शांत भक्ति (श्री सनकादिक ऋषिगण), माधुर्य भक्ति (श्री गोपीजन, भगवती मीरा बाई) ।
679. भक्त भगवान की भक्ति करते हैं, इसको शास्त्रों में भगवत् भक्ति कहा गया है । भगवान भक्त की भक्ति करते हैं, इसको शास्त्रों में भक्त भक्ति कहा गया है ।
680. देवतागणों की आराधना उन्हें प्रभु से भिन्न मानकर करना, एक भयंकर भूल है । सभी देवतागणों की आराधना उन्हें प्रभु का अंश मानते हुए करना सबसे श्रेष्ठ तरीका है ।
681. देवतागण केवल माध्यम बनते हैं पर सभी को न्यायोचित फल देने वाले एकमात्र प्रभु ही होते हैं । सिद्धांत के रूप में समझना चाहिए कि एक ही प्रभु अनेक देवतागणों को माध्यम बनाकर जीव को कर्मफल देते हैं ।
682. भक्ति करने में जितनी श्रद्धा होगी और जितनी प्रबल भावना होगी, उतनी ही जल्दी हम भक्ति में सफल होंगे ।
683. हम कर्म का फल चाहते हैं इसलिए हमारा मन कर्मफलों में लिप्त होता है और कर्मफल हमसे चिपक जाते हैं । भक्त बिना कर्मफल की कामना के प्रभु की प्रसन्नता के लिए कर्म करता है, इसलिए कर्मफल उससे चिपकते नहीं ।
684. जिस समय प्रभु की कृपा से जो-जो प्राप्त हो जाए, एक सच्चा भक्त उसी में संतोष कर लेता है ।
685. प्रभु के नाम से पापों का नाश होता है । नाम जप में पाप नाश और दोष नाश की असीम शक्ति है ।
686. प्रभु का नाम जप हमारे पाप नाश करेंगे, इसमें कोई संशय नहीं होना चाहिए क्योंकि वे पाप नाश करके ही रहते हैं ।
687. अपने भक्ति के साधन पर संशय होना, साधन के प्रभाव को कम कर देता है ।
688. प्रभु से हमारे व्यवहार में एकदम संशय नहीं होना चाहिए । हमें संशय होता है कि पता नहीं प्रभु मेरी बात सुनेंगे कि नहीं, पता नहीं प्रभु मेरी बात मानेंगे कि नहीं, पता नहीं प्रभु मेरी बात स्वीकार करेंगे कि नहीं । ऐसा संशय कभी नहीं होना चाहिए ।
689. कलियुग का प्रभाव है कि प्रभु के लिए हमारे मन में संशय जागृत कर दिया और हमारी श्रद्धा को कमजोर कर दिया ।
690. कोई भी हमारा हुनर या कला जो प्रभु को साथ लेकर चलती है और प्रभु के लिए काम करती है, वही हमारा कल्याण करती है ।
691. भक्त को यह अड़िग विश्वास होता है कि प्रभु ही उसके जीवन में जो करना होगा वह करेंगे । उसका जीवन प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित है और प्रभु जो देंगे उसे वह स्वीकार होगा ।
692. उपमन्यु की कथा हमें बताती है कि अनन्यता केवल प्रभु से होनी चाहिए । उपमन्यु को दूध की चाह थी और उसकी अनन्यता के कारण प्रभु श्री महादेवजी ने उनके लिए दूध के सागर का निर्माण कर दिया ।
693. वेष बदलने को या घर त्यागने को संन्यास नहीं माना गया है । सच्चा संन्यास है “मैं” और “मेरा” का जीवन से त्याग हो जाए । ऐसा त्याग करने वाला जीव जिस अवस्था में हो, जहाँ भी हो, जिस युग में हो, वह सच्चा संन्यासी है ।
694. भक्ति से हमारा मन इतना स्थिर हो जाता है और उसमें प्रभु के अलावा कोई संकल्प ही नहीं उठता है ।
695. पहले इच्छा या कामना होती है, फिर संकल्प बनता है । इसलिए संकल्प को खत्म करने से कामनाएं स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं ।
696. किसी वस्तु को केवल देखने से, उस वस्तु की प्राप्ति का संकल्प मन में करने से हमारा परमार्थ बिगड़ जाता है ।
697. संसार की किसी वस्तु को अच्छा माना तो यह इच्छा अनिवार्य रूप से जन्म लेगी कि यह हमें चाहिए । ऐसा होते ही संकल्प जागृत हो जाएगा ।
698. शास्त्र कहते हैं कि हमें ऐसा मानना चाहिए कि हमारे मन को ग्रहण करने योग्य सिर्फ प्रभु हैं । संसार हमारे मन को ग्रहण करने योग्य है, ऐसी बुद्धि को ही नष्ट कर देना चाहिए । ऐसी बुद्धि तभी नष्ट होगी जब भक्ति के कारण प्रभु प्रेम हमारे हृदय में जागृत होगा ।
699. शास्त्र कहते हैं कि संसार की वस्तु का उपयोग करना एक बात है । संसार की वस्तु में आसक्त हो जाना दूसरी बात है, जो कि एकदम गलत है ।
700. हमारे मन को पूरा निश्चय हो जाना चाहिए कि मन की सारी कामनाओं का प्रभु के श्रीकमलचरणों में विलय हो जाए । एक प्रभु ही हमें आकर्षित करें, संसार न हमें अच्छा लगे और न ही हमें आकर्षित करे ।
701. प्रभु के श्रेष्ठ भक्त प्रभु के अलावा किसी सांसारिक विषय में कभी भी नहीं रमते ।
702. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु कोमलता की परिसीमा हैं और संसार कठोरता की परिसीमा है । अब यह हमें चुनना है कि हमें क्या चाहिए और मूर्ख जीव संसार को ही चुन लेता है ।
703. जो भक्ति करके प्रभु में रम जाता है, उसे संसार की तुच्छ चीज कभी भी आकर्षित नहीं करती ।
704. भक्ति की कसौटी यह है कि संसार के विषय सामने आने पर वे हमें तुच्छ लगने लगते हैं ।
705. संसार का सुख क्षणिक है । शास्त्र कहते हैं कि जैसे बिजली चमकने पर एक क्षण के लिए प्रकाश होता है वैसा ही सांसारिक सुख हैं ।
706. हमारी दृष्टि प्रभुमय हो जाए तो हमें पूरी सृष्टि प्रभुमय दिखने लगती है ।
707. प्राचीन भारतवर्ष को जोड़ने के लिए हमारे ऋषियों की व्यवस्था थी कि श्री काशीजी का श्रीगंगाजल श्री रामेश्वरमजी में चढ़ाना और श्री सेतुबंध की रेत लाकर श्री काशीजी में भगवती गंगा माता में अर्पण करना । यह कितनी अदभुत व्यवस्था थी ।
708. जैसे एक सेठजी अपनी संपत्ति कमरा बंद करके एकांत में गिनते हैं, वैसे ही हमें हृदय के एकांत में इंद्रियों के दरवाजे बंद करके हमारे श्रीग्रंथों का चिंतन करना चाहिए ।
709. जो इंद्रियों के भोगों को छोड़ चुके हैं या छोड़ने का दृढ़ निश्चय कर लिया है, आध्यात्मिक ज्ञान उनके लिए ही उपलब्ध होता है ।
710. कहीं भी शास्त्रों में अध्यात्म के लिए घर संसार के त्याग की बात नहीं मिलेगी । शास्त्र कहते हैं कि सिर्फ भक्ति का साधन करना आरंभ करें तो अपने आप संसार में रहते हुए संसार की आसक्ति छूट जाएगी ।
711. शास्त्र कहते हैं कि आनंद बाहर से लाना नहीं पड़ता, बाहर खोजना नहीं पड़ता क्योंकि वह हमारे भीतर प्रभु ने सदैव विद्यमान करके रखा है ।
712. आनंद हमारे बहुत समीप है पर उसे पाने की कला हमें भक्ति के रूप में सीखनी पड़ती है ।
713. शास्त्र कहते हैं कि हमारा उद्धार हमारे प्रयास से ही होगा, कोई दूसरा हमारा उद्धार नहीं कर सकता ।
714. अगर हम संसार की आसक्ति को छोड़ देते हैं तो आनंद दौड़ा-दौड़ा हमारे पीछे-पीछे स्वतः ही चला आएगा ।
715. शास्त्र कहते हैं कि संसार ने हमें नहीं पकड़ा बल्कि हमने ही संसार को पकड़ रखा है । हमारे छोड़ते ही संसार के बंधन से हम तत्काल मुक्त हो जाते हैं ।
716. जिसने संसार की कामना का जीवन से त्याग कर दिया उसके लिए प्रभु दूर नहीं हैं । प्रभु स्वयं उसके जीवन में आते हैं, उसे फिर प्रभु को खोजने कहीं जाना नहीं पड़ता ।
717. प्रभु का अपने भक्तों से इतना लगाव होता है कि वे एक क्षणभर के लिए भी उन्हें अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देते ।
718. प्रभु के श्रीअंगों का ध्यान ही हमारे ध्यान का मुख्य आधार और ध्यान की अनिवार्यता होनी चाहिए ।
719. शास्त्रों में भक्ति के त्याग की बात कहीं भी, कभी भी सुनने को भी नहीं मिलेगी ।
720. मन कितना भी चंचल होने पर उस मन को भक्ति द्वारा निश्चित रूप से स्थिर किया जा सकता है, ऐसा प्रभु कहते हैं ।
721. सच्चे भक्त सभी सद्गुणों की मूर्ति होने पर भी अपने आपको बड़ा नहीं मानते अपितु सबसे छोटा ही मानते हैं ।
722. सारा ब्रह्मांड ही प्रभु का निवास स्थान है, इसलिए भक्त सभी को प्रणाम करते रहते हैं ।
723. भक्तों का सबसे बड़ा सद्गुण उनकी विनम्रता होती है ।
724. भक्त सभी देवी-देवताओं में भी अपने प्रभु के स्वरूप को ही देखते हैं ।
725. शास्त्र कहते हैं कि भगवत् प्राप्ति की अपेक्षा स्वर्ग मिलना बहुत तुच्छ उपलब्धि है । स्वर्ग जाने के लिए किए गए कर्म को शास्त्रों में पाप श्रेणी में रखा गया है । जो पुण्य हम स्वर्ग जाने के लिए करते हैं उनको शास्त्रों में पुण्यात्मक पाप कहा गया है ।
726. शास्त्र बताते हैं कि शुद्ध पुण्य यानी निष्काम पुण्य से ही भगवत् प्राप्ति संभव है । यह सूत्र है कि पुण्य निष्काम होगा तभी वह हमें भगवत् प्राप्ति कराएगा ।
727. संसार की सभी विद्याएं पढ़ ली और प्रभु की भक्ति और प्रभु से प्रेम नहीं किया तो उन सभी विधाओं को शास्त्रों में भूसा की संज्ञा दी गई है, जिसको ग्रहण करने से कोई आध्यात्मिक लाभ हमें नहीं मिला ।
728. एक सच्चे भक्त को किसी सांसारिक जरूरत की पूर्ति के लिए संकल्प या अनुष्ठान नहीं करने पड़ते क्योंकि प्रभु स्वतः ही उसकी पूर्ति पहले ही कर देते हैं । जैसे एक नवजात बच्चे की सभी जरूरत की पूर्ति उसकी माँ स्वतः ही कर देती है ।
729. अनन्य भक्त की व्याख्या करते हुए शास्त्र कहते हैं कि जो अनन्य भक्त होता है वह प्रभु का ही ध्यान करता है, प्रभु की ही पूजा करता है, प्रभु का ही नाम जप करता है, प्रभु के लिए ही तीर्थों में यात्रा करता है, प्रभु के ही श्रीग्रंथों का स्वाध्याय करता है, प्रभु के लिए एकांत में अश्रुपात करता है और रात-दिन उसका चिंतन प्रभु का ही होता है ।
730. बिना पंख निकले हुए, बिना आँखें निकली हुई एक नन्हा पक्षी का बच्चा जैसे कोई चिंता नहीं करता क्योंकि उसकी पूरी चिंता उसकी माँ करती है, उससे भी कहीं ज्यादा प्रभु अपने अनन्य भक्तों की चिंता करते हैं ।
731. अनन्य भक्त को हृदय में सिर्फ प्रभु का आभास होता रहता है और वह प्रभु के कार्य में ही अपना जीवन व्यतीत करता है ।
732. शास्त्र कहते हैं कि आँखें ज्ञान का प्रतीक होती है और पंख पुरुषार्थ के प्रतीक होते हैं । जैसे नन्हे पक्षी का बच्चा अपनी माँ के अनन्य हो जाता है वैसे ही जो अनन्य भक्त अपने ज्ञान और पुरुषार्थ को एक किनारे रखकर प्रभु की शरणागति ले लेता है तो उसकी सभी जरूरतों की पूर्ति प्रभु करते हैं ।
733. अपने शरणागत भक्त की हर जरूरत को प्रभु जरूरत से पहले ही अंजाम देकर पूर्ण कर देते हैं ।
734. ज्ञान और वैराग्य भी एक धन है पर अपने बल पर हमारा ज्ञान और वैराग्य भी टिक नहीं सकता । उसके संरक्षण के लिए प्रभु की शरणागति परम आवश्यक है ।
735. हम अपनी ज्ञान, प्रतिष्ठा, संपत्ति, बड़प्पन, पुरुषार्थ को भूलते नहीं और यही प्रभु मिलन में सबसे बड़ी बाधा बनकर आड़े आ जाती है ।
736. प्रभु के सामने सदैव दीन बनकर यानी छोटा बनकर ही रहना चाहिए क्योंकि प्रभु छोटे को ही अपनाते हैं और बड़ों को अपने से दूर रखते हैं ।
737. ज्ञान, प्रतिष्ठा, संपत्ति, बड़प्पन और पुरुषार्थ का अलंकार प्रभु की कृपा से ही हमें मिलता है पर वही प्रभु के मिलन में बाधा बनता है इसलिए उन्हें दूर करके प्रभु तक जाना अनिवार्य होता है । इन अलंकारों को दूर रखने का सामर्थ्य भी प्रभु से ही हमें मांगना चाहिए ।
738. प्रभु देवताओं को निमित्त बनाकर हमारे कर्मों का फल हमें भेजते हैं पर सब कुछ भेजने वाले सदैव प्रभु ही होते हैं ।
739. सारे धार्मिक कर्म प्रभु को निमित्त बनाकर ही जीवन में करने चाहिए ।
740. प्रभु मिलन के मार्ग में जो अपने अहंकार को गला देता है, उसको प्रभु के श्रीकमलचरणों का अधिकार मिल जाता है ।
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