| 001. |
चित्त को परम शांति प्रदान करने वाला संसार का सर्वोत्तम साधन प्रभु की भक्ति ही है । |
| 002. |
प्रभु के नाम जप का सभी युगों में सभी जीवों को समान अधिकार प्रभु ने दिया है । |
| 003. |
प्रभु के नाम जप में कोई नियम नहीं है । कोई भी, कभी भी, कैसे भी, किसी भी भावना को लेकर प्रभु का नाम जप कर सकता है और उसका उद्धार हो जाएगा । |
| 004. |
संत तो यहाँ तक कहते हैं कि जीवन की कोई भी बेला को कल्याण बेला बनाने के लिए उसे प्रभु के नाम जप के बिना व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए । |
| 005. |
जीवन में कोई भी साधन नहीं सूझे तो जीवन में कभी भी, कहीं भी, कैसे भी सिर्फ प्रभु का नाम जप कर लें । जो कर्मकांड और तपस्या से प्राप्त होता है वह सब कुछ और उससे भी बहुत ज्यादा प्रभु के नाम जप से प्राप्त हो जाएगा । |
| 006. |
हमारा प्रभु के लिए भक्ति का साधन तन और मन दोनों से होना चाहिए । |
| 007. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारा जीवन अखंड रूप से भगवतमय हो जाना चाहिए । |
| 008. |
शास्त्र कहते हैं कि जो नाम जप करते हुए सोता है और उठते ही नाम जप करने लगता है तो एक दिन उसके जीवन में ऐसा आता है कि नींद में भी उसका अखंड नाम जप प्रारंभ हो जाता है । |
| 009. |
श्री भरतलालजी इतने बड़े महात्मा थे कि उन्होंने अपने कर्म, मन और वाणी से प्रभु को सर्वदा समर्पित होकर एक आदर्श प्रस्तुत किया । संत कहते हैं कि हमें भी थोड़ा-सा भरतमय जीवन बनाना चाहिए जिससे हम प्रभु श्री रामजी के प्रिय हो जाएं । |
| 010. |
प्रभु का नाम सर्वदा सब कुछ करने में सर्वसामर्थ्यवान है । |
| 011. |
हमारे हृदय पटल पर जितना हो सके प्रभु का नाम नित्य चलना चाहिए । |
| 012. |
जब-जब भक्ति के भरण-पोषण की आवश्यकता पड़ेगी तब-तब युगों-युगों तक मार्गदर्शन के लिए प्रभु श्री हनुमानजी की तरफ देखा जाएगा । |
| 013. |
प्रभु श्री हनुमानजी का श्रीचरित्र हमें निरंतर देखना चाहिए क्योंकि इससे हमारी भक्ति पुष्ट होती है । |
| 014. |
भक्ति के सर्वोच्च आदर्श के रूप में प्रभु श्री हनुमानजी हैं । देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने श्री भक्ति सूत्र में भक्ति के आचार्य के रूप में श्रीगोपीजन को माना है और संतों ने भक्ति के आचार्य के रूप में श्री भरतलालजी को माना है । |
| 015. |
प्रभु श्री रामजी की मर्यादा का हम आँखें मूंदकर अनुसरण कर सकते हैं । वैसे ही प्रभु श्री हनुमानजी की भक्ति का भी हम आँखें मूंदकर अनुसरण कर सकते हैं । |
| 016. |
प्रभु के लिए प्रेम और प्रभु के लिए नियम दोनों का संतुलन देखना हो तो यह सिर्फ श्री भरत चरित्र में देखने को मिलता है । |
| 017. |
जब-जब हमारी भक्ति में हमें कमी की अनुभूति होने लगे तब-तब हमें श्री हनुमत चरित्र को उठाकर देखना चाहिए तो फिर हमारी भक्ति पुष्ट हो उठेगी । |
| 018. |
हमें अपनी देह से भी, मन से भी और वाणी से भी प्रभु के भक्ति का साधन करना चाहिए । |
| 019. |
श्री भरतलालजी की भक्ति इतनी ऊँची थी कि प्रभु वनवास में हमेशा श्री लक्ष्मणजी को श्री भरत चरित्र सुनाते थे । |
| 020. |
भक्ति की पूर्णता इसमें है कि भक्ति के नियम भी नहीं टूटे और प्रभु का प्रेम भी लबालब हृदय में भरा रहे । |
| 021. |
भक्ति की पूर्णता इसमें है कि न तो भक्ति के नियम जीवन में टूटे और न ही नियम के कारण नीरसता जीवन में आए । |
| 022. |
श्री लक्ष्मणजी के जीवन का एक ही दृष्टिकोण कि माता राम, पिता राम, सखा राम, प्रभु राम, सब कुछ मेरे श्रीराम । |
| 023. |
श्री लक्ष्मणजी के जीवन का मंत्र था कि दशरथजी पिता नहीं, श्रीराम पिता । सुमित्राजी माता नहीं, श्रीराम माता और जहाँ प्रभु श्री रामजी वही उनकी श्रीअयोध्या । |
| 024. |
श्री भरतलालजी ने और श्री लक्ष्मणलालजी ने अपने प्रभु के लिए इस समर्पण के कारण सदैव प्रभु की आज्ञा की पालना की । |
| 025. |
सारे जग के आधार प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री रामजी बड़े गर्व से कहते हैं कि मेरे आधार प्रभु श्री हनुमानजी हैं । |
| 026. |
प्रभु श्री रामजी अपने पिता दशरथजी, माता कौशल्याजी, भाई भरतजी, पत्नी भगवती जानकीजी के बगैर रह सकते हैं पर प्रभु श्री हनुमानजी के बगैर एक पल भी नहीं रह सकते । |
| 027. |
शास्त्रों में काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और अहंकार को भक्ति का शत्रु माना गया है । |
| 028. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु द्वारा जीव में विकारों की सूची दी हुई है और सबसे प्रथम स्थान टीकाकार उसमें अहंकार का मानते हैं । |
| 029. |
हमारे शास्त्रों में कामी, पापी और दुष्ट के तरने के उदाहरण अनेकों हैं पर एक भी अहंकारी के तरने का उदाहरण कहीं भी नहीं मिलेगा । |
| 030. |
अहंकार छोटों को नहीं पकड़ता सिर्फ बड़ों को ही पकड़ता है यानी सूत्र यह है कि जब हमारी भक्ति बढ़ती है तो भक्ति का भी अहंकार हमें जकड़ता है । |
| 031. |
भक्ति में पहले अहंकार नहीं आता । भक्ति का अहंकार तब आता है जब भक्ति बढ़ने लगती है । |
| 032. |
अहंकार भक्ति के बढ़ने के लिए सबसे बाधक तत्व बन जाता है । |
| 033. |
प्रभु श्री रामजी के अंतःकरण की भावना देखें कि जो भगवती कैकेयी माता अयोध्याजी की विपत्ति का कारण बनी उनके लिए प्रभु के मन में भरपूर सम्मान था और कोई भी रोष नहीं था । |
| 034. |
कितनी मनुहार के बाद भी प्रभु श्री रामजी ने वनवास की शपथ नहीं तोड़ी, यह उनके कितने बड़े पुरुषार्थ का दर्शन कराता है । |
| 035. |
प्रभु श्री रामजी की मर्यादा के साथ उनका संयम भी श्रेष्ठतम है और परम अनुकरणीय है । |
| 036. |
मंदिर की नींव में जो पत्थर काम आते हैं उनकी पूजा नहीं होती पर हमारे शास्त्र उनका भी सम्मान करते हैं क्योंकि उनके ऊपर ही मंदिर टिका हुआ होता है । इसलिए मंदिर की पहली सीढ़ी को प्रणाम करने का विधान है । |
| 037. |
श्रीराम कथा का मंदिर श्री भरतलालजी, श्री लक्ष्मणलालजी और श्री शत्रुघ्नलालजी की नींव पर ही खड़ा है । |
| 038. |
प्रभु श्री रामजी सबके आधार हैं पर अपने आधार के रूप में वे प्रभु श्री हनुमानजी को ही स्वीकार करते हैं । |
| 039. |
प्रभु इतने व्यापक हैं कि उनके संकल्प मात्र से क्षणभर में कोटि-कोटि ब्रह्मांड का निर्माण और विलय हो जाता है । |
| 040. |
मानव लीला का सदैव पालन करते हुए, मर्यादा में रहकर प्रभु श्री रामजी का श्रीचरित्र सबके लिए परम अनुकरणीय है । |
| 041. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु का सानिध्य प्रतिक्षण आनंद, आनंद और सिर्फ आनंद प्रदान करने वाला होता है । |
| 042. |
हमारी संस्कृति को हमारे भीतर प्रवेश करने से कभी नहीं रोकना चाहिए । |
| 043. |
हमें भोजन करते समय प्रभु का स्मरण जरूर करना चाहिए कि प्रभु की कृपा के कारण ही हमें आज का भोजन मिला है । |
| 044. |
प्रभु के श्रीचरणों की रज को प्राप्त करने के लिए देवतागण, ऋषिगण और संत सदैव लालायित रहते हैं । |
| 045. |
प्रभु श्री महादेवजी जब काकभुशुण्डिजी के साथ प्रभु श्री रामजी के दर्शन करने अयोध्याजी आए तो उन्होंने अपनी गोदी में श्रीरामलला को बैठाया और उसे सबसे बड़ा धन माना और दक्षिणा के रूप में श्रीरामलला के श्रीचरणों की रज को अपने मस्तक पर धारण किया । |
| 046. |
प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु श्री रामजी का भोग लगा हुआ जूठन ही प्रसाद के रूप में पाने में सबसे अधिक आनंद आता है । |
| 047. |
प्रभु श्री हनुमानजी को प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों की सेवा में बैठने में सबसे ज्यादा आनंद आता है । |
| 048. |
मंदिर में प्रभु के झूला उत्सव का सूत्र बताते हुए संत कहते हैं कि एक दिन अपने मन-मंदिर में प्रभु को झूला झुलाना चाहिए । |
| 049. |
जब-जब प्रतिकूलता जीवन में घेरे तब-तब प्रभु को प्रणाम करना चाहिए और प्रभु की शरण में चले जाना चाहिए । |
| 050. |
हम अपने जीवन में दुःख का चिंतन करते-करते आनंद स्वरूप प्रभु को भूल जाते हैं, यह कितनी बड़ी विडंबना है । |
| 051. |
प्रभु से विनती करनी चाहिए कि भक्ति के कारण हम पूज्य हैं, ऐसा विचार कभी हमारे मन में जन्म नहीं ले । |
| 052. |
जीवन में मन, कर्म और वाणी की पवित्रता बनाकर रखनी चाहिए । |
| 053. |
प्रभु के प्रताप की छत्रछाया में जीवन यापन करने से हमारे जीवन के सभी दोष नष्ट हो जाते हैं । |
| 054. |
शास्त्र कहते हैं कि श्रीश्याम के प्रताप और श्रीराम के प्रताप से अपने जीवन को सदैव हरा-भरा रखना चाहिए । |
| 055. |
संतों को भोजन से तृप्ति होती है पर प्रभु की कथा से कभी तृप्ति नहीं होती । जितनी कथा श्रवण करते हैं उतनी कथा सुनने की इच्छा बढ़ती रहती है । |
| 056. |
संत कहते हैं कि हमें जगत की गोद में नहीं बल्कि श्रीजगन्नाथ की गोद में बैठना चाहिए । |
| 057. |
श्री रामचरितमानसजी की चौपाइयां सिद्ध चौपाइयां ही नहीं बल्कि सिद्ध मंत्र भी हैं । |
| 058. |
शास्त्रों को पढ़ना एक बात है पर शास्त्रों के मर्म को समझना सबसे बड़ी उपलब्धि होती है । |
| 059. |
शास्त्रों का ज्ञान हमेशा हमारे जीवन के संशय को मिटाने में सक्षम होते हैं । |
| 060. |
गलत कृत्य करने में लज्जा आने को शास्त्रों में बहुत बड़ा लज्जा-गुण माना गया है । शास्त्रों का आग्रह है कि हमें लज्जा-गुण से युक्त होना चाहिए । |
| 061. |
जीवन में नित्य प्रभु की सेवा करते हुए अपना ध्यान प्रभु के श्रीकमलचरणों में केंद्रित रखने से ही हम अहंकार से बच सकते हैं । |
| 062. |
प्रभु श्री रामजी ने अपने श्री रामावतार में जो सिखाया वह भारतीय मर्यादा बन गई, जो प्रभु श्री रामजी ने किया वह भारतीय संस्कृति बन गई । |
| 063. |
शास्त्रों का स्वाध्याय करना और आजीवन करना, यह संतों का बताया बहुत बड़ा सद्गुण है जो हमारे भीतर होना चाहिए । |
| 064. |
कर्मकांड निर्धारित मापदंडों से नहीं किया गया तो वह इच्छित फल नहीं देता पर भक्ति कैसे भी की जाए वह हमें लाभ-ही-लाभ देती है । |
| 065. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु सभी यज्ञों का वर्णन करते हैं और सर्वश्रेष्ठ यज्ञ जप-यज्ञ को कहते हैं । जप की इतनी बड़ी महिमा प्रभु ने बताई है । |
| 066. |
प्रयत्नवादी और पुरुषार्थवादी जीवन का शिरोमणि आदर्श प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी मानव श्रीलीला में प्रस्तुत किया । |
| 067. |
भजन में सहयोग देने वाली पत्नी के साथ रहकर बहुत बढ़िया भजन किया जा सकता है और भक्ति की जा सकती है । शास्त्रों में पति-पत्नी को भक्ति मार्ग में एक-दूसरे का बाधक नहीं माना गया है । |
| 068. |
पचास वर्ष की आयु तक निष्काम और इच्छारहित हो जाना चाहिए । फिर जीवन में कोई इच्छा पूर्ति का प्रयास नहीं होना चाहिए, कोई इच्छा नहीं बचनी चाहिए । |
| 069. |
जीवन में एक अवस्था के आने पर जब हमारी सभी इच्छाओं का त्याग होगा तभी हमारे चित्त को परम शांति प्राप्त होगी । |
| 070. |
शास्त्र कहते हैं कि क्रोध करने से हमारे बहुत बड़े तप बल, यज्ञ बल, मंत्र बल और पुण्य बल का नाश होता है । |
| 071. |
शास्त्र कहते हैं कि दूसरों के सांसारिक झंझटों में पड़कर हम अपना आध्यात्मिक लक्ष्य भटक जाते हैं । |
| 072. |
साधक को उसके साधन के लिए जरूरी क्या चीज है, वही करनी चाहिए । बेकार की चीजों में कभी भी नहीं पड़ना चाहिए । |
| 073. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें अपने जीवन में मनोविजय की यात्रा करनी चाहिए । |
| 074. |
एक-एक विकारों का जीवन से त्याग करते हुए हमें जीवन में अध्यात्म की बहुत लंबी यात्रा करनी पड़ती है । |
| 075. |
शास्त्र कहते हैं कि जीवन में अध्यात्म में प्रयत्नवादी होने पर हमारी यश गाथा संसार में फैल जाती है । |
| 076. |
जीवन में पुण्य का अर्जन तो करना चाहिए पर पुण्य कैसे जीवन से बह जाता है उसका उपाय भी पहले खोजना चाहिए और उसे रोकना चाहिए । |
| 077. |
शास्त्रों में शांत चित्त वाले व्यक्ति को बहुत बड़ा महत्व दिया गया है यानी चित्त की शांति को बहुत बड़ा महत्व दिया गया है । |
| 078. |
भक्ति करने पर हमारे मन की शांति को भंग करने का कोई भी उपाय संसार के पास नहीं बचता । |
| 079. |
सच्चा भक्त कभी भी संसार से प्रमाण पत्र नहीं मांगता कि वह एक भक्त है |
| 080. |
जब-जब जीवन में प्रभु की कृपा प्राप्त होती है तो उस बेला को जीवन की सर्वोत्तम बेला माननी चाहिए । |
| 081. |
मंत्र जप में शुद्धि अनिवार्य है, यज्ञ में विधि अनिवार्य है पर प्रभु के नाम जप में कुछ भी अनिवार्य नहीं है । जहाँ चाहें, जब चाहें, जैसे चाहें प्रभु का नाम लिया जा सकता है । |
| 082. |
जब भक्ति जीवन में प्रवेश करती है तो प्रेम के कारण प्रभु के लिए नियम लेने का मन बन जाता है । |
| 083. |
वैसे प्रभु बहुत दुर्लभ हैं पर सहजता से केवल भक्ति से ही प्राप्त होते हैं । |
| 084. |
श्रीराम नाम का रामरत्न संसार का सबसे दुर्लभ रत्न माना गया है । |
| 085. |
हम आध्यात्मिक बनकर भगवत् प्राप्ति के लिए प्रयास करेंगे तो संसार में अरुचि स्वतः ही निर्माण हो जाएगी । |
| 086. |
शास्त्र कहते हैं कि गर्भावस्था में आने के बाद से जीव श्मशान तक की यात्रा में हमेशा दुःखों से बंधा हुआ रहता है । प्रभु की भक्ति करने पर ही प्रभु जीवन में आनंद लेकर आते हैं । |
| 087. |
शास्त्र कहते हैं कि बाल्यावस्था में जीव माता-पिता के पराधीन रहता है, युवावस्था में कर्मों के और भोगों के पराधीन रहता है और वृद्धावस्था में रोगों के पराधीन रहता है । |
| 088. |
बढ़िया लगने वाले संसार के भोगों को भोगते हुए हम अपने जीवन को नष्ट कर देते हैं । |
| 089. |
हमें योग शरीर की निरोगता से ज्यादा मन के नियंत्रण और निरोगता के लिए करना चाहिए । |
| 090. |
संसार जैसा है वैसा ही रहने वाला है, हम उसे बदल नहीं सकते । संसार के उपद्रव हमारे मन को प्रभावित नहीं करें, इसे ही सबसे उत्कृष्ट योग कहते हैं । |
| 091. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की भक्ति के कारण हमारे मन के शांत स्वभाव पर किसी परिस्थिति, समय या जीव का विपरीत प्रभाव नहीं होता । |
| 092. |
संत उपमा देते हैं जैसे कमल का पत्ता दिन-रात कीचड़ के जल में रहता है पर बाहर निकलने पर कीचड़ का कोई परिणाम नहीं होता वैसे ही भक्ति करने वाले पर संसार का कोई परिणाम नहीं होता । |
| 093. |
शास्त्र कहते हैं कि डंडा लेकर दुनिया को सुधारने का प्रयास नहीं करना चाहिए । अपने आपको भीतर से सुधारना ही सच्चा योग कहलाता है । |
| 094. |
शास्त्रों का सिद्धांत है कि बाहर का संसार हमारे लिए ज्यादा दुखदाई नहीं होता, हमारे भीतर का संसार ही हमारे दुःख का कारण होता है । |
| 095. |
शास्त्र कहते हैं कि बाहर का दुःख हमें कम सताता है । हम सबसे ज्यादा व्यथित होते हैं अपने भीतर के दुःख, कामना, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से । |
| 096. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारे भीतर की कामनाओं को अशुभ से हमें शुभ बनाना चाहिए । कामनाएं नष्ट नहीं होती पर उनका अशुभ से शुभ में रूपांतरण हो सकता है । |
| 097. |
हमारा मन बुराइयों को सींचता रहता है । हमें भक्ति करके अपने चित्त को अच्छाई की तरफ मोड़ देना चाहिए । |
| 098. |
यदि पुरुषार्थ हमारे शास्त्रों के अनुसार किया जाए तो वह हमें जीवन में बहुत ऊँचाइयों पर ले जाता है । |
| 099. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें मौज मस्ती के लिए जाने की इच्छा हुई तो हमें मन को कथा में या सत्संग में जाने के लिए मोड़ देना चाहिए । अगर हमारे मन को कहीं घूमने जाने की कामना हुई तो उसे तीर्थ में जाने के लिए मोड़ देना चाहिए । |
| 100. |
शास्त्रों का अंतिम लक्ष्य है कि अशुभ कामनाओं को जीवन से त्यागकर शुभ कामनाओं को जीवन में लाना । |
| 101. |
जीवन में सांसारिक असत् वासना के त्याग का प्रयास करना चाहिए और आध्यात्मिक सत् वासना को पूर्ण करने का प्रयास करना चाहिए । |
| 102. |
हमारे भीतर सांसारिक कामनाओं का प्रवाह हमारे लिए सदैव ही दुःखदायक होता है । |
| 103. |
अपने मन के भीतर शांति का निश्चय करने को शम कहते हैं । चाहे कुछ भी हो जाए मैं अशांत नहीं होऊँगा, ऐसा शांति का संकल्प जीवन में रोजाना करना चाहिए । |
| 104. |
भक्ति करने वाले जीव को हर दिन यह संकल्प करना चाहिए कि आज कुछ भी हो जाए मुझे अशांति स्पर्श नहीं करेगी । |
| 105. |
प्रभु की भक्ति करने से शांति के रूप में इतना बड़ा सुख हमें जीवन में मिलता है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । |
| 106. |
संसार हमें अशांत करता है । संसार की प्रतिकूल बात, स्पर्श, दृश्य, भोग, खान-पान, सभी हमें अशांत करने में अपना योगदान देते हैं । |
| 107. |
हम जहाँ से आए हैं वहाँ जाएंगे तो निरंतर सुखी हो जाएंगे, ऐसा शास्त्र कहते हैं । इसका सूत्र यह है कि परब्रह्म तत्व से हम आए हैं और परब्रह्म तत्व की तरफ हम जाएंगे तो जीवन में निरंतर सुखी हो जाएंगे । |
| 108. |
शास्त्र कहते हैं कि हम अपने मूल परब्रह्म तत्व को पहचान लें तो संसार का नाटक फिर हमें जीवन में प्रभावित नहीं कर पाएगा । |
| 109. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें जो मिला है उसके कारण हमें अपने मन में संतोष कर सुखी होना चाहिए पर हमें जो नहीं मिला है उसकी तरफ हम ध्यान देकर दुःखी होते रहते हैं । |
| 110. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु ने हमें दो नेत्र, एक जिह्वा, दो हाथ, दो पैर दिए हैं । कितने लोग हैं जो इस बात से सुखी हैं और प्रभु को इसके लिए धन्यवाद देते हैं । |
| 111. |
दुःख का मुख्य कारण असंतोष है । शास्त्रों में कहा गया है कि संतोष सुख का परम रसायन और परम औषधि है । |
| 112. |
हमारे शरीर की जरूरतें प्रभु ने इतनी कम रखी हैं पर अपने मन की भूख हम इतनी बढ़ा लेते हैं कि जीवनभर उसके लिए दुःखी होते रहते हैं । |
| 113. |
शास्त्र कहते हैं कि सभी लोग मन की भूख की पूर्ति न होने के कारण दुःखी रहते हैं । |
| 114. |
शास्त्रों का मंत्र है कि अपने से नीचे वालों को देखकर चलेंगे तो सुख पाएंगे और अपने से ऊपर वालों को देखकर चलेंगे तो सदैव दुःखी रहेंगे । |
| 115. |
शास्त्र कहते हैं कि संतुष्ट चित्त शांत होता है इसलिए शांताकारम प्रभु का आनंद स्वरूप प्रतिबिंब उसे साफ दिखता है । |
| 116. |
प्रभु श्री कृष्णजी ने श्री उद्धवजी को सत्संग मुख्य साधन के रूप में बताया और कहा कि सत्संग की श्रीगंगा में रोजाना स्नान करना सबसे श्रेष्ठ होता है । |
| 117. |
शास्त्र कहते हैं कि सारे सांसारिक बंधनों का मुख्य कारण हमारा मन है । मन संसार के बंधन से मुक्त हुआ तो वह मन प्रभु के लिए उपयुक्त होकर प्रस्तुत हो जाता है । |
| 118. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारे मन का हर संकल्प-विकल्प प्रभु के लिए होना चाहिए, ऐसा केवल भक्ति करने पर ही संभव होता है । |
| 119. |
शास्त्रों में मन को पानी जैसा माना गया है और कहा गया है कि जिसमें मिला दें मन वैसा बन जाएगा । मन को हम शत्रु के, मित्र के, व्यापार के, पत्नी के, घर के, गाड़ी के विचार में फंसा दे तो वह उसमें फंस जाएगा और मन को भक्ति से प्रभु में लगा दें तो वह प्रभु में लग जाएगा । |
| 120. |
मन को प्रभु में लगाने से हमारे भीतर सतोगुण की वृद्धि होती चली जाती है और हमारे भीतर जड़त्व खत्म होकर चेतन तत्व की वृद्धि होती चली जाती है । |
| 121. |
अनेक जन्मों से हमारा मन जड़ संसार के साथ जुड़ा हुआ है इसलिए वह जल्दी से चेतन प्रभु के साथ जुड़ने के लिए तैयार नहीं होता । भक्ति करके निरंतर प्रयास करने पर ऐसा संभव हो जाता है । |
| 122. |
जब तक मन जड़ संसार से जुड़ा हुआ है उसे भक्ति के साधन जैसे नाम जप, सत्संग, पूजा-पाठ, भजन, कीर्तन में अधिक रुचि नहीं होती । |
| 123. |
जब हम मन और मुँह से बोलकर प्रभु का नाम जप करते हैं तो मुँह और कान दोनों को काम मिलता है, मुँह उच्चारण करता है और कान सुनता है । |
| 124. |
जब हम प्रभु के किसी नाम का जप करते हैं तो उस नाम के साथ प्रभु के सद्गुण हमारे भीतर उतरना आरंभ कर देते हैं । |
| 125. |
दृढ़ निश्चय से किया गया प्रभु से जुड़ने का कोई भी प्रयास बहुत जल्दी सफल होता है और हमें लाभ देता है । |
| 126. |
भक्ति से धीरे-धीरे संसार की वासनाएं खत्म होने लगती हैं और प्रभु से हमारी दूरी भी कम होने लग जाती है । |
| 127. |
प्रभु का चिंतन करते समय संसार के अन्य चिंतन को अपने मन में जगह नहीं देनी चाहिए । |
| 128. |
भक्ति के कारण जीवन में एक समय ऐसा आता है कि प्रभु हमें संसार से बहुत अच्छे लगने लगते हैं और प्रभु में हमारा मन लगने लग जाता है । |
| 129. |
प्रभु प्राप्ति में बाधक संसार से दूरी बनाना, हमें भक्ति करने पर एक दिन अच्छा लगने लगता है । |
| 130. |
भक्ति करने पर एक अवस्था ऐसी आती है जब संसार के पदार्थों का स्मरण लगभग बंद हो जाता है । |
| 131. |
सत्संग में बैठने से और प्रभु का नाम जप करने से हमारे मन की चंचलता खत्म होती है और मन का वेग नियंत्रित हो जाता है । |
| 132. |
जिनका संसार की कामनाओं में अधिक ध्यान जाता है वे अपने मन पर कभी विजय प्राप्त नहीं कर सकते । |
| 133. |
शास्त्र कहते हैं कि हम अपने मन से रोज हारते हैं । अपने मन को कभी हराना भी हमें जीवन में आरंभ करना चाहिए । |
| 134. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें अपने धर्म ग्रंथों का स्वाध्याय और संतवाणी का श्रवण करना चाहिए और फिर एकांत में उनका चिंतन भी करना चाहिए । |
| 135. |
अपने भीतर सद्गुणों का जागरण करना शास्त्रों में प्रभु की एक प्रकार की पूजा के रूप में माना गया है । |
| 136. |
शास्त्र कहते हैं कि भक्ति जब परिपक्व हो जाती है तो रोजाना प्रभु को अहिंसा का फूल, सत्य का फूल, असंग्रह का फूल, ब्रह्मचर्य का फूल और स्वाध्याय का फूल हम चढ़ाने लगते हैं । |
| 137. |
संसार के सब संकल्प नष्ट हो जाएं, सारे विकार मिट जाएं और हमारा मन चेतन प्रभु में लग जाए, यह जीवन की सबसे श्रेष्ठतम अवस्था होती है जो भक्ति से आती है । |
| 138. |
भक्ति जब परिपक्व होती है तो हमारे भीतर विराजमान चेतन प्रभु का विस्तार हम संसार में देखना प्रारंभ कर देते हैं । |
| 139. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें प्रभु प्राप्ति के साधन के लिए यह मनुष्य शरीर प्राप्त हुआ है, उसे संसार के भोगों में व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए । |
| 140. |
शास्त्र हमें सूत्र देते हैं कि अगर हम अपने मन को स्वस्थ नहीं रखेंगे तो आगे चलकर हमारा शरीर भी स्वस्थ रहने वाला नहीं है । |
| 141. |
जीवन में प्रभु को छोड़कर किसी अन्य से रखी गई आशा या अपेक्षा के कारण ही हमारे मन का स्वास्थ्य बिगड़ता है । |
| 142. |
जीवन में भगवत् भक्ति का आश्रय लेने से मन निर्विकार बन जाता है । |
| 143. |
मेरे जीवन में जो भी अच्छा होगा वह प्रभु कृपा के कारण ही होगा । इस विचार को जीवन में प्रबल रखने से बहुत सारे मनोविकार स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं । |
| 144. |
हम कर्तव्य पालन के लिए कर्म करें और मन कदापि कर्म में लिप्त न हो तो यह कर्म करने की श्रेष्ठ अवस्था होती है । |
| 145. |
शास्त्र कहते हैं कि आत्मज्ञान से बढ़कर संसार का कोई भी ज्ञान नहीं है । |
| 146. |
शास्त्र कहते हैं कि भगवत् भक्ति रूपी परम कर्तव्य से हमें कभी भी विमुख नहीं होना चाहिए । |
| 147. |
शास्त्र कहते हैं कि हम प्रभु श्री रामजी को निमंत्रण देते हैं तो प्रभु श्री हनुमानजी स्वतः ही उनके साथ चले आते हैं, उन्हें अलग से निमंत्रण देने की आवश्यकता नहीं पड़ती । |
| 148. |
सभी अच्छे संस्कार हमारे शास्त्रों के सानिध्य में रहने पर छोटे बालकों में आ जाते हैं । बड़े होने पर वे बालक संस्कारयुक्त बन जाते हैं । |
| 149. |
प्रभु श्री रामजी ने अपने मानव श्रीचरित्र में दिखाया कि उनका पुरुषार्थ, आत्मज्ञान, शास्त्र विद्या, शस्त्र विद्या और धर्म पूरे विश्व पटल पर सबसे ऊँचा था । |
| 150. |
हमें बच्चों को हमेशा अपने देश के बारे में बताना चाहिए और देश के महापुरुषों की प्रेरक कथाएं सुनानी चाहिए । |
| 151. |
सुबह बच्चों को जगाते समय उनसे प्रभु की बातें करते हुए और उन्हें प्रभु की बातें बताते हुए जगाएं । इस नियम से उनके भीतर श्रेष्ठ और अच्छी भावनाएं प्रबल होती हैं । |
| 152. |
मन में उस दिन गौरव मनाना चाहिए जिस दिन हमारे हाथ में माला आ जाए और हमारे मन से प्रभु का नाम जप शुरू हो जाए । |
| 153. |
हम दिनभर देह को खाने का आधार देते हैं पर आत्मा को सत्संग, पूजा, भजन, जप और शास्त्र स्वाध्याय का आधार नहीं देते । |
| 154. |
शास्त्र कहते हैं कि छोटे बालकों को उपदेश करने के बजाय उन्हें प्रभु की, शास्त्रों की और भक्तों की कथाएं सुनानी चाहिए । |
| 155. |
प्रभु को प्रणाम करते हुए हमें सावधान रहकर मर्यादा पूर्वक प्रणाम करना चाहिए यानी प्रभु को प्रणाम कर रहे हैं तो हमारा ध्यान भी प्रभु पर ही केंद्रित होना चाहिए । |
| 156. |
हमें बचपन से ही बच्चों को भक्तों की कथा सुनाकर उनके जीवन में प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य निर्धारित करने में सहयोग देना चाहिए । |
| 157. |
शास्त्र कहते हैं कि कोई भी साधक सही रूप से अगर प्रभु नाम का जप करता है तो प्रभु की शक्तियां उसके भीतर प्रवेश करती ही हैं । |
| 158. |
संत कहते हैं कि जप-यज्ञ यानी प्रभु का नाम जप और नमस्कार-यज्ञ यानी प्रभु को प्रणाम करना हमें नित्य करते रहना चाहिए । |
| 159. |
प्रभु की भक्ति करने से प्रभु बहुत जल्दी तृप्त होते हैं और तृप्त होते ही प्रभु तुरंत हमारे लिए अनुकूलता निर्माण कर देते हैं, यह सिद्धांत है । |
| 160. |
कामनाओं के विसर्जन के लिए भी प्रभु की भक्ति है और कामनाओं की पूर्ति के लिए भी प्रभु की भक्ति है, दोनों के लिए एक ही मार्ग शास्त्रों में बताया गया है । |
| 161. |
हमारे जीवन में प्रभु की कृपा होते ही हमारा जीवन सुखमय बन जाता है । |
| 162. |
संत कहते हैं कि श्री हनुमान चालीसाजी एक सिद्ध मंत्र स्वरूप है । कुछ भी अभीष्ट की प्राप्ति इससे पूर्णतया संभव है । |
| 163. |
भक्ति के कारण प्रभु और माता जब हमारे जीवन में आते हैं तो जीवन के सभी अकाल सदैव के लिए मिट जाते हैं । |
| 164. |
हमारे शास्त्र ज्ञान कथाओं के द्वारा ज्ञान का संस्कार हमें प्रदान करते हैं । |
| 165. |
सदैव बच्चों को श्री रामायणजी, श्री महाभारतजी की कथाएं सुनानी चाहिए, इससे उनके व्यक्तित्व में बहुत निखार आता है । |
| 166. |
बच्चों के विकास के लिए और उन्हें प्रेरणा देने के लिए हमारी पौराणिक कथाएं उन्हें सुनानी चाहिए । पौराणिक कथाएं सुनने से बच्चे का सर्वश्रेष्ठ विकास होता है । |
| 167. |
शास्त्र कहते हैं कि बच्चों के विकास का मूल कार्य बाल्यकाल में ही करना श्रेयस्कर होता है । |
| 168. |
आध्यात्मिक ज्ञान का चिंतन और आध्यात्मिक ज्ञान का दान करने में हमारे ऋषिगण सबसे आगे थे । |
| 169. |
प्रभु ने और प्रभु के नाम ने कितनों का उद्धार किया है इसकी गिनती हम कतई नहीं कर सकते । |
| 170. |
प्रभु की उदारता पर, कृपा पर और दया पर कभी भी प्रश्नवाचक चिह्न नहीं लगाना चाहिए । ऐसा करना बहुत बड़ा पातक होता है । |
| 171. |
पाप त्याग के बाद, सच्चे पश्चाताप के बाद और प्रभु की शरण में आने के बाद बड़ा-से-बड़ा पापी भी तर जाता है । |
| 172. |
पाप त्याग करवा कर और सच्चा प्रायश्चित करा कर प्रभु की भक्ति एक पापी को पापी नहीं रहने देती और उसका उद्धार करा देती है । |
| 173. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु कहते हैं कि शरण में आए हुए को वे पाप शून्य कर देते हैं और शरण में आने पर पापी-से-पापी और दुराचारी के शिरोमणि जीव को भी वे शीघ्र अपना लेते हैं । |
| 174. |
पाप के सारे दोष प्रभु की भक्ति के प्रभाव से तत्काल नष्ट हो जाते हैं । |
| 175. |
संत कहते हैं कि पाप को प्रायश्चित के अश्रुधारा से धोया जा सकता है और भजन के प्रभाव से धोया जा सकता है । |
| 176. |
प्रभु का श्रीमद् भगवद् गीताजी में अमर वचन है कि अंतकाल में जो प्रभु का नाम लेकर शरीर त्यागता है वह जीव बिना संशय प्रभु के पास, प्रभु के धाम पहुँचता है । यह प्रभु का प्रण है और प्रभु की घोषणा है । |
| 177. |
भगवती अहिल्याजी ने अपनी गलती का पश्चाताप किया, भविष्य में वह गलती नहीं करने का प्रबल प्रण किया और प्रभु की तीव्र भक्ति की तो प्रभु श्री रामजी मार्ग बदलकर पतित अहिल्याजी का उद्धार करने के लिए पधारे । |
| 178. |
शास्त्र कहते हैं कि जीव जब कष्ट में होता है तो प्रभु स्मरण में अपने आप तीव्रता आती है । |
| 179. |
अपनी कृपा और दया से पतितों को पावन करने में प्रभु कभी भी पीछे नहीं रहते । |
| 180. |
पतित जीव को करुणानिधान प्रभु पुनः पावन करके अपनाते हैं । यह प्रभु की अदभुत दया और कृपा के फलस्वरूप होता है । |
| 181. |
हमारे ऋषियों की वाणी में कोटि-कोटि जीवों के कल्याण करने का सामर्थ्य प्रभु कृपा से आ जाता था । |
| 182. |
प्रभु न्यायाधीश के साथ परमपिता भी हैं । परमपिता के रूप में वे हमारी गलती को क्षमा भी करते हैं और हमें दंड भी कम करके देते हैं । |
| 183. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु का स्पष्ट मत है कि प्रभु को हर जीव प्रिय है पर जो जीव दीन बन जाता है और प्रभु की शरण में आ जाता है वह प्रभु को परम प्रिय हो जाता है । |
| 184. |
जो जीव पाप करने के बाद प्रभु के सामने पश्चाताप के अश्रु रोता है और दोबारा गलती नहीं करने का संकल्प लेता है, प्रभु तत्काल उसे पाप मुक्त कर देते हैं । |
| 185. |
प्रभु सौंदर्य के शिखर हैं और करुणा और कोमलता की पराकाष्ठा हैं । |
| 186. |
प्रभु की करुणा, दया और कृपा देखकर हमारे मन में प्रभु प्रेम का प्रवाह फूट पड़ता है । |
| 187. |
प्रभु का सगुण साकार स्वरूप भक्तों को अधिक प्रिय, मधुर, सुंदर और आकर्षक लगता है और भक्ति के साधन करने के लिए परिपूर्ण लगता है । |
| 188. |
शास्त्रों में भक्ति की अवस्था मुक्ति से भी बहुत ऊँची मानी गई है । |
| 189. |
मुक्ति के बाद भी मुक्त जीव प्रभु की भक्ति करते रहते हैं । |
| 190. |
प्रभु की अदभुत और अतुलनीय शोभा देखकर एक भक्त धन्य हो जाता है । |
| 191. |
प्रभु श्री रामजी ने श्री रामावतार में अपने छोटे-छोटे व्यवहारों से अदभुत मर्यादा का परिचय दिया है । |
| 192. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारे जीवन में शोक और भय के कारण हमारा प्रभु में अनुराग बढ़ जाता है । |
| 193. |
सकाम उपासना के बारे में शास्त्र कहते हैं कि प्रभु से मांगने में कोई हानि नहीं क्योंकि हम जगत माता और जगत पिता से नहीं मांगेंगे तो फिर किससे मांगेंगे । पर एक अवस्था के बाद हमें सकामता का त्याग करके पूर्ण निष्काम हो जाना चाहिए । |
| 194. |
प्रभु हमेशा देखते हैं कि कोई जीव प्रभु तक पहुँचने के लिए भक्ति का पुरुषार्थ करता है तो प्रभु को बहुत अच्छा लगता है । |
| 195. |
संत कहते हैं कि सौंदर्य शब्द प्रभु और माता के आगे बहुत छोटा और ओछा लगता है क्योंकि प्रभु के सौंदर्य का वर्णन श्री वेदजी भी नहीं कर पाते और नेति-नेति कहकर मौन हो जाते हैं । |
| 196. |
प्रभु का वर्णन करने में हमारे ऋषिगण बड़े सुंदर-सुंदर शब्दों को बड़ी गंभीरता के साथ चुनते हैं कि कोई भी कमजोर शब्द और मर्यादा विहीन शब्द का चयन प्रभु के लिए नहीं होना चाहिए । |
| 197. |
हर चीज प्रभु को निःसंकोच बता देनी चाहिए । भक्ति में दोष तब उत्पन्न होता है जब हमारी प्रभु से छुपाने की प्रवृत्ति जगती है । |
| 198. |
संत कहते हैं कि मानवीय सीमाओं का पालन करते हुए प्रभु श्री रामजी ने अदभुत मर्यादा की श्रीलीला अपने श्री रामावतार में करके दिखाई । |
| 199. |
शास्त्र हमें सूत्र देते हैं कि जड़ लगने वाली वस्तु में भी चेतन प्रभु का वास है । इसलिए उनमें चेतन प्रभु का वास समझकर उन्हें प्रणाम करना चाहिए तो उनका चेतन तत्व हम पर तुरंत कृपा करता है, यह भारतीय सिद्धांत है । इसलिए ही भारतवर्ष में शस्त्र और औजारों की भी पूजा होती है । |
| 200. |
भगवती गंगा माता में जल बुद्धि नहीं करके और भगवती तुलसी माता में वनस्पति बुद्धि नहीं करके उनके चेतन तत्व को प्रणाम करने से भगवती गंगा माता और भगवती तुलसी माता हम पर भरपूर कृपा करतीं हैं । |
| 201. |
किसी भी शुभ काम की शुरुआत प्रभु को मन-ही-मन प्रणाम करके ही करनी चाहिए । |
| 202. |
प्रभु को प्रणाम करके कोई भी काम करने से उसमें तत्काल ही अनुकूलता आ जाती है । |
| 203. |
हमारे भीतर विनम्रता और दीनता होती है तो हमें प्रभु की कृपा मिलती है और हम बड़ा-से-बड़ा काम भी सुगमता से कर पाते हैं । |
| 204. |
श्री वेदजी कहते हैं कि हम कितना भी बोलें, कितना भी बखान करें पर प्रभु की महिमा का लेशमात्र बखान करने में भी सर्वदा असमर्थ ही हैं । |
| 205. |
मर्यादा का पालन किसे कहते हैं यह श्रीराम कथा में प्रभु श्री रामजी की श्रीलीला में पग-पग पर देखने को मिलती है । |
| 206. |
भक्ति करके प्रभु के प्रेम की कमाई करना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है । |
| 207. |
प्रभु प्रेम में एक बूंद आंसू निकल जाए तो वह संसार की लाख उपलब्धि से भी ज्यादा प्रबल होती है । |
| 208. |
प्रभु के लिए प्रेम में आंसू निकलना बड़े ही सौभाग्य की बात होती है । |
| 209. |
कृपा और दया जहाँ दिखती है वहाँ आकर्षण पैदा हो जाता है, इसलिए प्रभु की कृपा और दया को जीवन में हरदम देखना चाहिए । |
| 210. |
हमारे सद्गुण देखकर प्रभु आकृष्ट होते हैं, इसलिए जीवन में सद्गुणों की कमाई करते रहना चाहिए । |
| 211. |
संत कहते हैं कि प्रभु नाम की धरोहर अमूल्य है । इससे ज्यादा मूल्यवान ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं है । |
| 212. |
हमारे शास्त्र कहते हैं कि बीमार हो जाना एक अपराध है क्योंकि हमने प्रकृति का कोई-न-कोई नियम कहीं-न-कहीं तोड़ा है तभी हम बीमार पड़ते हैं । |
| 213. |
जो आज तक की विश्व की सर्वोच्च राज्य व्यवस्था हुई है, जिससे आगे कुछ कल्पना भी हम नहीं कर सकते, वह शिरोमणि राज्य व्यवस्था श्रीराम राज्य की थी । |
| 214. |
शास्त्र कहते हैं कि बचपन से ही बालकों को उनकी गलत आदतें और दिशा बदलने के लिए प्रेरित करना चाहिए । |
| 215. |
शास्त्र कहते हैं कि अगर राष्ट्र को बलवान बनाना है तो हमें आध्यात्मिक ऊर्जा की कमाई की तरफ जाना ही पड़ेगा । |
| 216. |
शास्त्र कहते हैं कि अगर हमें आध्यात्मिक मार्ग में सफल होना है तो हमें इतना सहनशील बनना होगा कि ऋतु परिवर्तन और भूख-प्यास-निद्रा से हम प्रभावित नहीं हों । |
| 217. |
खुद कभी गलती नहीं करें और दूसरों की गलती में सहनशील और क्षमाशील हों, यह प्रभु श्री रामजी की शैली थी । |
| 218. |
अपने पूर्वजों की गुण गाथा सुनकर बच्चों को प्रेरणा मिलती है कि उन्हें सामान्य नहीं रहना है और उन्हें भी जीवन में बड़ा कार्य करना है । |
| 219. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें समाज और राष्ट्रहित के लिए काम करना चाहिए और कभी भी श्रेय या सम्मान लेने के लिए आगे नहीं आना चाहिए । |
| 220. |
भारतीय परंपरा रही है कि समाज के लिए और देश के लिए काम आ जाना पर आज की विडंबना है कि हम अपने लिए ही सब कुछ करते हैं, देश और समाज के लिए नहीं करते । |
| 221. |
मानव जीवन की अंतिम महानता इसमें है कि अपने देश और समाज के काम आ जाएं और कीर्ति एवं नाम नहीं चाहें । |
| 222. |
हमारा जीवन सिद्धांतों पर कैसे टिका रहे यह प्रभु श्री रामजी ने आदर्श प्रस्तुत करते हुए अपनी मानव श्रीलीला में करके दिखाया । उनका अनुसरण करके हम भी ऐसा कर सकते हैं । |
| 223. |
भक्त और प्रभु के बीच में जो प्रेम होता है उसे शास्त्रों में विश्व का सर्वोच्च प्रेम बताया गया है । |
| 224. |
शास्त्रों में बेटी को नैतिक शिक्षा, नारी धर्म की शिक्षा और अन्य घरेलू शिक्षा देने पर बहुत जोर दिया गया है । |
| 225. |
भारतवर्ष की संस्कृति, सभ्यता और संवेदनाओं को अपने भीतर उतारना बहुत जरूरी है । |
| 226. |
हम मित्र की दृष्टि से पूरे विश्व को देखें, यह भारतीय संस्कृति रही है । |
| 227. |
शास्त्रों में कहा गया है कि जो स्त्री नारी धर्म और पतिव्रत धर्म का सही पालन कर लेती है वह अपने ससुराल, पीहर और ननिहाल तीनों का उद्धार कर देती है । |
| 228. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की लेखी और प्रभु का वरदान अपना फल देकर ही रहता है । |
| 229. |
शास्त्र कहते हैं कि जिसके पास शक्ति है उसका हृदय कठोर नहीं बल्कि विनम्र होना चाहिए । |
| 230. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी के सभी व्यवहार और प्रबंधन अपनी मानव श्रीलीला में अदभुत और उच्चकोटि के थे । |
| 231. |
प्रभु और माता जब हमारे जीवन में आते हैं तो हमारा सच्चा सौभाग्य प्रकट होता है । |
| 232. |
जिन्हें भक्ति के कारण प्रभु मिल जाते हैं, ऐसे भक्त के भाग्य की चर्चा पूरे विश्व में होती है क्योंकि इतना भाग्यवान कोई नहीं हो सकता । |
| 233. |
जब तक ब्रह्मांड रहेगा तब तक सर्वत्र विश्व में प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी की मानव श्रीलीला के सद्गुणों और कीर्ति की चर्चा होती रहेगी । |
| 234. |
एक जीव के जीवन में कौन-कौन से सद्गुण निखार लाते हैं इसकी पूरी सूची श्री रामायणजी और श्री महाभारतजी में हमें देखने को मिलती है । |
| 235. |
प्रभु के बारे में कभी अनायास भी, किसी भी प्रतिकूल अवस्था में हमारे मुँह से कोई दोषपूर्ण शब्द नहीं निकले, अगर निकले तो सिर्फ स्तुति ही निकले, ऐसा सदैव ध्यान रखना चाहिए । |
| 236. |
हमारे जीवन से किसी भी प्रतिकूलता को समाप्त करने का सामर्थ्य केवल और केवल प्रभु ही रखते हैं । |
| 237. |
श्री रामायणजी को समझना और श्री महाभारतजी को समझना भारतवर्ष के हृदय को समझने जैसा है । |
| 238. |
धन का सुख के साथ कोई निश्चित संबंध नहीं है । शास्त्र कहते हैं कि धनी व्यक्ति हमेशा सुखी होगा, यह कहना गलत होगा । |
| 239. |
शास्त्र कहते हैं कि जिनके हृदय में प्रेम होता है उनके लिए पराए भी अपने हो जाते हैं और जिनके हृदय में प्रेम नहीं होता उनके अपने भी पराए हो जाते हैं । |
| 240. |
प्रेम का दान देकर प्रभु श्री रामजी ने और प्रभु श्री कृष्णजी अपनी मानव श्रीलीला में जहाँ भी गए, जिस दिशा में भी गए वहाँ मित्र-ही-मित्र बनाए । |
| 241. |
भक्ति हमें जीवन जीने का सूत्र देती है कि सभी प्राणियों में प्रभु का वास देखते हुए किसी से द्वेष नहीं करना और सबसे मैत्री करके रखना चाहिए । |
| 242. |
श्रीराम राज्य में प्रभु श्री रामजी ने अपनी प्रजा को अपने सुशासन से कितना तृप्त करके रखा होगा, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । |
| 243. |
भक्ति करने वाला जीव किसी से ईर्ष्या का भाव नहीं रखता । |
| 244. |
प्रभु श्री रामजी ने अपनी मानव श्रीलीला में दिखाया कि अत्यंत लोकप्रियता के बाद भी उससे प्रभावित हुए बिना प्रभु अपने मन में अति शांत और कार्य के लिए गंभीर रहे । |
| 245. |
संत कहते हैं कि प्रभु श्री रामजी को सच्चे मायने में समझना हो तो उनके सद्गुणों को समझना चाहिए । |
| 246. |
प्रभु श्री रामजी ने कभी किसी को कटु वचन नहीं कहे, उनकी वाणी हरदम मिठास भरी हुई होती थी । |
| 247. |
बिना कारण प्रभु श्री रामजी को किसी ने कड़वा भी बोला तो प्रभु शांत रहे और कभी तल्खी से जवाब नहीं दिया । प्रभु ने सूत्र दिया कि चुप रहना भी बहुत बड़ा पुरुषार्थ है । |
| 248. |
प्रभु श्री रामजी का छोटा-सा कार्य भी कोई करता तो प्रभु संतुष्ट मन से दस बार उसकी प्रशंसा करते, उसकी सराहना करते । |
| 249. |
सभी शास्त्र, ऋषिगण और संतजन एकमत हैं कि प्रभु श्री रामजी का श्रीराम चरित परम अनुकरणीय चरित्र है । |
| 250. |
प्रभु श्री रामजी के प्रति किसी ने कठोर बात कही हो, कोई अपराध किया हो और एक नहीं सौ बार भी किया हो तो भी प्रभु क्षमा कर देते । ऐसा कहना भी गलत है कि प्रभु क्षमा करते थे, प्रभु उस अपराध को एकदम भूल ही जाते । |
| 251. |
शास्त्र कहते हैं कि किसी की भूल को क्षमा करने से भी बड़ी बात है कि उसकी भूल को भूल ही जाना । |
| 252. |
हम जीवन में किसी को मित्र भाव से देखते हैं तो किसी को शत्रु भाव से देखते हैं । प्रभु श्री रामजी के पास सभी को देखने का एक ही भाव था और वह मित्र भाव था । |
| 253. |
हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा का हमारे विकारों के कारण ह्रास हो जाता है, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 254. |
एक बार भी प्रभु श्री रामजी के अंतःकरण में मंथरा और भगवती कैकेयी माता के लिए क्षमा का भाव भी नहीं आया क्योंकि वे उनके दोषों को पूरी तरह से भूल गए थे । यह क्षमाशीलता और मर्यादा की श्रेष्ठतम पराकाष्ठा है । |
| 255. |
प्रभु श्री रामजी अपने श्रीराम राज्य में यह भावना रखते कि सब मेरे अपने हैं । इसलिए किसी के गलत व्यवहार से कभी दुःखी नहीं होते, कभी वापस क्रोध नहीं करते और कभी अपने व्यवहार से किसी को कष्ट नहीं देते । |
| 256. |
शास्त्र कहते हैं कि संसार आग बनकर आता है पर संत पानी बनकर तैयार रहते हैं । |
| 257. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें शरीर वृद्ध होने से पहले ज्ञान वृद्ध हो जाना चाहिए यानी ज्ञान में परिपक्व हो जाना चाहिए । |
| 258. |
संस्कृत देव भाषा है और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बड़ी उपयुक्त भाषा है क्योंकि शब्दों के अलंकार बहुत बड़ी मात्रा में यहाँ उपलब्ध हैं । |
| 259. |
प्रभु की भक्ति का सबसे बड़ा फल यह है कि उसके कारण जीवन में निश्चिंतता आ जाती है । |
| 260. |
शास्त्र कहते हैं कि जीवन में जैसा संग होता है वैसे ही हमारे विचार बनते जाते हैं । इसलिए संतों के साथ सत्संग करना चाहिए और दुस्संगति का तुरंत जीवन से त्याग करना चाहिए । |
| 261. |
संत मानते हैं कि प्रभु श्री रामजी के नाम के जप का सही अर्थ है कि प्रभु श्री रामजी के सद्गुणों का चिंतन करना और उसका अनुसरण करना । |
| 262. |
प्रभु श्री रामजी के सद्गुणों का स्मरण करते हुए और उन्हें अपने जीवन में किंचित उतारते हुए अगर हम प्रभु श्री रामजी का नाम जप करते हैं तो वह एक माला, दस माला के बराबर फल देती है । |
| 263. |
प्रभु श्री रामजी समस्त सद्गुणों की साकार मूर्ति हैं । |
| 264. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी मानव श्रीलीला में दिखाया कि मानवीय आदर्शों का पालन करने के कारण उनके जैसा लोकप्रिय उनसे पहले भी कोई नहीं हुआ और आगे भी कोई नहीं होगा । |
| 265. |
प्रभु श्री रामजी लोकप्रियता की पराकाष्ठा तक पहुँच गए थे । वे इतने लोकप्रिय थे कि जब वे वनवास गए थे तो श्री अयोध्याजी के पूरे प्रांत में एक भी घर में कई-कई दिनों तक चूल्हा नहीं जला था । |
| 266. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी सबके प्रति मानवीय दृष्टिकोण रखते थे और भावुक हृदय से अपने कर्तव्यों का निर्णय लेते थे । |
| 267. |
शास्त्र कहते हैं कि सत्य के बराबर कोई तप नहीं । हम जीवन में जितना झूठ बोलते हैं उसका हिसाब प्रकृति रखती है । झूठ बोलने से हमारे आत्मबल और अध्यात्म बल की हानि होती है । |
| 268. |
आज भी ऐसे संत हैं जिन्होंने अपनी वाणी से अपने जीवन में कभी भी झूठ का उच्चारण नहीं किया । |
| 269. |
प्रभु श्री रामजी का एक अदभुत सद्गुण था कि वे दीन-हीन, दुःखी और पतित के लिए करुणा की भावना रखते थे और उनका भला किए बिना कभी नहीं रुकते थे । |
| 270. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें अपने वंश और कुल परंपरा के प्रति सदैव गौरव की भावना रखनी चाहिए । |
| 271. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी मानवीय श्रीलीला में दिखाया कि वे अपने स्वास्थ्य का बराबर ध्यान रखते थे । प्रभु अपनी मानवीय श्रीलीला में कभी बीमार पड़े हों, ऐसा वर्णन कहीं नहीं मिलेगा । हमारा दुर्भाग्य यह है कि हम कभी-कभी ही स्वस्थ रहते हैं । |
| 272. |
किससे, कैसे, कब, क्या व्यवहार करना चाहिए इसकी अदभुत सूझ-बूझ प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी श्रीलीला में दिखाई । |
| 273. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी सबका मन जानकर, उन्हें भीतर से टटोलकर ही अपनी बात प्रेम से उनके सामने रखते थे । |
| 274. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी सभी विद्याओं का, सभी मानवीय नियमों का पालन करने में एकदम श्रेष्ठ थे । |
| 275. |
संपूर्ण ज्ञान और संपूर्ण सज्जनता में प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी दोनों परिपूर्ण थे । |
| 276. |
शास्त्र कहते हैं कि अत्यंत स्थिर बुद्धि वाले लोग जीवन में बहुत ऊँचाई तक पहुँच जाते हैं । |
| 277. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें जीवन में कभी भी असावधान नहीं रहना चाहिए । इससे हमें हानि हो सकती है । |
| 278. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें दूसरों के दोषों को जानते हुए भी उसे जग जाहिर नहीं करना चाहिए और स्वयं के दोषों को जानकर उसे कम करने का प्रयास करना चाहिए । |
| 279. |
सदगुण आने पर हमें अहंकार नहीं होना चाहिए अपितु उसे प्रभु की कृपा ही माननी चाहिए । कोई हमसे सद्गुणों में आगे है उससे हमें द्वेष नहीं करना चाहिए । |
| 280. |
अपने सद्गुणों के कारण बिना सत्ता के प्रभु श्री कृष्णजी ने सबके मन को जीत लिया था । वे लोगों के सबसे बड़े हृदय सम्राट थे । |
| 281. |
भक्ति मार्ग में चलते हुए हमें अपना आत्म-निरीक्षण करते चलना चाहिए कि हमारे विकार कितने कम हो रहे हैं । |
| 282. |
हमारे अंदर यह आदत होती है कि दूसरों के छोटे-छोटे दोष भी हमको बहुत बड़े दिखते हैं और अपने बड़े दोषों को भी हम छोटा मानकर उनसे किनारा कर लेते हैं । |
| 283. |
रावण को उसका दोष विभीषणजी ने, कुंभकरण ने, मंदोदरीजी ने, मयासुर ने, माल्यवंत ने, मारीच ने बताया और बार-बार उसकी गलती बताई पर वह माना नहीं । आज के युग में भी ऐसे लोग हैं जो बताने पर भी अपनी गलती नहीं मानते । |
| 284. |
प्राचीन भारत का गौरव था कि प्राचीन भारत के राजा स्वतंत्र नहीं थे, उनके ऊपर ऋषिगण थे, नीचे मंत्री और सचिव थे जिनके परामर्श से वे राज्य कार्य करते थे । |
| 285. |
जब महाराज श्री दशरथजी ने अपने मंत्रिमंडल को प्रभु श्री रामजी के राज्याभिषेक के बारे में पूछा तो सबने एक मत से कहा कि रघुवंश के सभी राजा परम प्रतापी हुए हैं । मगर उन सभी राजाओं के समस्त सद्गुणों को मिला दिया जाए तो भी वे प्रभु श्री रामजी के सद्गुणों की तनिक भी बराबरी नहीं कर सकते, प्रभु श्री रामजी सद्गुणों में इतने महान हैं । सभी राज्य प्रतिनिधियों ने भरी राज्यसभा में यह बात एकमत से कही । |
| 286. |
सनातन धर्म के शास्त्रों में प्रावधान है कि प्रभु की प्रतिमा में मंत्रों द्वारा प्रभु का आह्वान किया जाता है । इसे मात्र औपचारिकता नहीं माननी चाहिए, यह परम सत्य होता है । |
| 287. |
किसी को धर्म के विषयों में श्रद्धा नहीं हो तो वह उसकी पालना न करें पर उसकी आलोचना करने की दुर्बुद्धि कभी नहीं लानी चाहिए, ऐसा करना बड़ा पातक होता है । |
| 288. |
प्रभु श्री रामजी इतने लोकप्रिय थे कि जैसे ही श्री दशरथजी ने उनके नाम का राजा के लिए प्रस्ताव रखा तो उनका अभिनंदन करने, बधाई देने और धन्यवाद देने के लिए राज्यसभा में लोगों का तांता लग गया । |
| 289. |
शास्त्र कहते हैं कि धर्म परायण लोगों की बुद्धि को कोई नहीं बिगाड़ सकता । |
| 290. |
गलत विषय हमारे भीतर न जाएं इसलिए अपने कानों और आँखों को गलत चीजों को सुनने और देखने से रोकना चाहिए । |
| 291. |
शास्त्र कहते हैं कि जिस घर की स्त्रियां दुःख से रोती हैं वह घर भाग्यहीन हो जाता है क्योंकि स्त्रियां घर के सौभाग्य का प्रतीक होती हैं । |
| 292. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें बोलने में बड़ा नियंत्रण रखना चाहिए और खासकर संध्या बेला पर, पूजा के समय, बच्चों के सामने कभी भी अशुभ नहीं बोलना चाहिए । |
| 293. |
गलत संगति मनुष्य को कितना गिरा देती है इसकी मिसाल श्री रामायणजी में देखने को मिलती है । एक नौकरानी मंथरा के बहकावे में आकर एक रानी भगवती कैकेयी माता ने कितना गलत कर दिया । |
| 294. |
श्री दशरथजी का प्रभु श्री रामजी से इतना प्रेम था जितना प्रेम किसी ने किसी से नहीं किया और कोई किसी से इससे ज्यादा प्रेम नहीं कर सकता । |
| 295. |
शास्त्र कहते हैं कि सत्य हमारे जीवन की मूल धरोहर होनी चाहिए । |
| 296. |
धर्म संकट में फंसे हुए अपने पिता को प्रभु ने कैसे उबारा इसके लिए इतिहास गवाह है कि सत्य को कलंक नहीं लगे इसलिए प्रभु स्वेच्छा से वनवास में चले गए । |
| 297. |
पति पर वनवास का संकट आया तो साहस देने का अदभुत कार्य भगवती जानकी माता ने किया । संकट में सहभागी और संकट में साहस का स्तंभ बनने की नारियों की अदभुत परंपरा भारतवर्ष में सदा से रही है । |
| 298. |
भगवती सुमित्रा माता ने श्री लक्ष्मणजी को प्रभु श्री रामजी के साथ वनवास जाने की अनुमति देते हुए क्या कहा यह देखें । भगवती सुमित्रा माता ने कहा कि तुरंत जाओ, तुरंत जाओ, तुम्हारी माता सीता हैं, तुम्हारे पिता राम हैं, जहाँ रामजी रहेंगे वहीं तुम्हारी श्रीअयोध्या है । |
| 299. |
प्रभु श्री रामजी के वनवास जाने के बाद उनके वियोग में एक भी गौ-माता, घोड़े, हाथी, पशु-पक्षी ने अन्न तो क्या जल तक ग्रहण नहीं किया । पशु-पक्षी भी इस हद तक दुःखी हो गए । कई-कई दिनों तक श्री अयोध्याजी में चूल्हा नहीं जला और बच्चे-बूढ़े सब भूखे रहे । |
| 300. |
सुख-सुविधा, धन, घर-बार, पत्नी, पुत्र, पुत्री, वृद्ध मां-बाप को त्यागकर अयोध्यावासी सब प्रभु श्री रामजी के पीछे वनवास के लिए भागे, यह कितना अदभुत त्याग था । यह विश्व का बेमिसाल प्रभु प्रेम वाला त्याग था जिसमें प्रभु के लिए प्रेम की पराकाष्ठा देखने को मिलती है । |
| 301. |
धर्म का मार्ग कठिन होता है पर महापुरुषों और संतों के लिए वही एकमात्र मार्ग होता है । |
| 302. |
प्रभु अनाथों के नाथ होते हैं यानी जिसका कोई नहीं होता उसके प्रभु होते हैं । |
| 303. |
प्रभु छोटे-से-छोटे, अधम, दीन और दुर्बल जीव को भी सदैव अपनाते हैं । |
| 304. |
शास्त्र कहते हैं कि जो आर्थिक पक्ष से दुर्बल होते हैं वे सच्चे दुर्बल नहीं हैं । असली दुर्बल वे होते हैं जो संस्कारों के कारण दुर्बल होते हैं । |
| 305. |
जब हम भक्ति करके प्रभु को जीवन में लाते हैं तो नाम जप, पूजा-पाठ, कर्मकांड, सत्संग सबमें हमारी रुचि बन जाती है । |
| 306. |
अगर हमारा मन प्रभु के नाम जप, पूजा-पाठ, कर्मकांड और सत्संग में लगा हुआ है तो यह सच मानना चाहिए कि प्रभु की कृपा हम पर है । |
| 307. |
महाराज श्री दशरथजी ने, श्री भरतलालजी ने और पूरे अयोध्यावासियों ने भगवती कैकेयी माता का त्याग किया पर प्रभु श्री रामजी और भगवती जानकी माता की अदभुत महानता देखें कि प्रभु और माता ने कभी भी अपने हृदय से भगवती कैकेयी माता का त्याग नहीं किया । |
| 308. |
प्रभु के भक्त अपने पारिवारिक संबंध से भी ज्यादा महत्व दूसरे भक्त के साथ उनके संबंध को देते हैं । वे मानते हैं कि उनका संबंध सिर्फ प्रभु के कारण ही होता है यानी जो प्रभु के साथ संबंध रखने वाला हैं वही उनके सच्चे संबंधी होते हैं और जो प्रभु से प्रेम करते हैं उन्हीं से वे सच्चा प्रेम करते हैं । |
| 309. |
प्रभु जहाँ भी जाएंगे अनुकूलता वहीं निर्माण होती रहेगी, यह शाश्वत सिद्धांत है । |
| 310. |
सिद्धांत के रूप में शास्त्र बताते हैं कि जब हमारे किसी पापाचरण के कारण रुष्ट होकर प्रभु हमारे जीवन से चले जाते हैं तो अनुकूलता उनके साथ छाया रूप में चली जाती है और अनुकूलता के जाते ही प्रतिकूलता हमें आकर घेर लेती है । |
| 311. |
जब अयोध्यावासियों ने वनवास गमन के समय प्रभु को रोकने का प्रयत्न किया पर प्रभु नहीं रुके तो वे रथ के एक-एक घोड़े से प्रार्थना करने लगे कि वे श्रीअयोध्या के स्वामी को श्रीअयोध्या से बाहर नहीं ले जाएं । |
| 312. |
संतों और भक्तों के द्वारा धर्म की जो सेवा की जाती है उस कारण धर्म भी उनके संसार से जाने पर रोता है । |
| 313. |
श्री वाल्मीकि रामायणजी में लिखा है कि प्रभु श्री रामजी के वन गमन के समय वृक्ष भी रोने लगे इसलिए कि उनके पैर नहीं है इसलिए वे प्रभु के पीछे नहीं जा सकते । यह उनका कितना बड़ा दुर्भाग्य है, यह सोचकर वे रोने लगे । |
| 314. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी पूरी मानव श्रीलीला में अपनी चिंता कहीं भी नहीं की पर दूसरों की चिंता करना प्रभु ने कभी छोड़ी नहीं । |
| 315. |
प्रभु श्री रामजी ने श्री लक्ष्मणजी को अपना (प्रभु का) साथ छोड़कर अयोध्याजी में रुक जाने की जो आज्ञा दी वो उन्होंने नहीं मानी और साफ मना कर दिया । इस एक आज्ञा को छोड़कर इसके अलावा पूरे जीवनभर श्री लक्ष्मणजी ने प्रभु की प्रत्येक आज्ञा का सदैव पालन किया । |
| 316. |
श्री लक्ष्मणजी के जीवन का एक ही सूत्र था कि जीवन के सभी सुख, अपने सभी कर्तव्य प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित करके रखना पर प्रभु के श्रीकमलचरणों का त्याग कभी नहीं करना । संत कहते हैं कि श्री लक्ष्मणजी के इस सूत्र का सभी भक्त सदैव अनुसरण करने का प्रयत्न करते हैं । |
| 317. |
संत कहते हैं कि प्रभु ने अयोध्यावासियों के प्रेम को प्रणाम किया और निद्रा अवस्था में उनको छोड़कर आगे चल दिए । सूत्र यह है कि प्रभु भी भक्त के प्रेम को और भक्ति को प्रणाम करते हैं । |
| 318. |
प्रभु स्वयं कष्ट को सहने में कभी हिचकिचाते नहीं पर अपने भक्तों को कष्ट में देखकर उस दुःख को कभी सह नहीं पाते, यह प्रभु का स्वभाव है । |
| 319. |
संत कहते हैं कि मानव का जीवन मिला और उसमें प्रभु की भक्ति नहीं की तो उस जीवन को धिक्कार है । धन्य उनका जीवन होता है जिन्होंने प्रभु की भक्ति की । |
| 320. |
शास्त्र कहते हैं कि जीव के लिए भौतिक संपत्ति का कोई ज्यादा महत्व नहीं है क्योंकि गरीब का भी अंत मिट्टी में होता है और अमीर का भी अंत मिट्टी में ही होता है । भौतिक संपत्ति हमारा अंत नहीं सुधार सकती, सिर्फ भक्ति ही हमारा अंत सुधारने में एकमात्र सक्षम है । |
| 321. |
शास्त्र कहते हैं कि भौतिक संपत्ति से, ज्ञान से, परिवार के सुख से कभी भी मानव जीवन की पूर्णता प्राप्त नहीं होती । मानव जीवन की पूर्णता केवल और केवल प्रभु की भक्ति से ही प्राप्त होती है । |
| 322. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी की मानव श्रीलीला में प्रभु की लोकप्रियता और प्रभु के प्रति जनमानस में श्रद्धा की पराकाष्ठा हमें देखने को मिलती है । |
| 323. |
सभी अयोध्यावासी को लगने लगा कि दो पात्र ही सबसे धन्य हैं भगवती जानकी माता और श्री लक्ष्मणजी । दोनों ने प्रभु श्री रामजी के दुःख की बेला में उनका अनुसरण किया और उनके लिए सब कुछ त्याग दिया पर प्रभु का साथ नहीं छोड़ा । |
| 324. |
जब वनवास के दौरान प्रभु श्री रामजी को भगवती गंगा माता का तट दिखाई दिया तो प्रभु के दोनों हाथ जुड़ गए और पास पहुँचकर प्रभु ने दंडवत प्रणाम किया । प्रभु श्री रामजी टकटकी लगाकर भगवती गंगा माता की लहरों का दर्शन करते रहे । |
| 325. |
भगवती गंगा माता का दर्शन तन और मन दोनों को पावन करने वाला है । इसलिए तीर्थ में जाकर अपने नेत्रों और हृदय से भगवती गंगा माता का दर्शन करना चाहिए । |
| 326. |
शास्त्र कहते हैं कि भगवती गंगा माता और भगवती यमुना माता के रूप में हमारे सकल मनोरथ को पूर्ण करने वाली दो अमृतमय देव नदियां भारतवर्ष को धन्य कर रही हैं । |
| 327. |
शास्त्र कहते हैं कि तीर्थों के लिए अपनी भावना को कभी मलिन नहीं होने देना चाहिए । पूरी भक्ति, श्रद्धा और सम्मान के साथ हमें तीर्थों का सेवन करना चाहिए । |
| 328. |
भगवती गंगा माता के श्रीगंगाजल का महत्व और प्रभाव आज भी संत अनुभव करते हैं । पवित्र श्रीगंगाजल में डुबकी लगाते ही वे थकान रहित हो जाते हैं और श्रीगंगाजल का पान करके वे तृप्त हो जाते हैं । |
| 329. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी सभी मानव श्रीलीला लोक कल्याण के लिए और सबको धर्म आचरण के लिए प्रेरित करने के लिए की है । |
| 330. |
सनातन धर्म में हर चीज को चेतन के रूप में देखा गया है । हमारी मातृभूमि भारतवर्ष भी चेतनमय है, इसलिए पूरी श्रद्धा रखते हुए रोजाना अपनी मातृभूमि भारत माता को प्रणाम करना चाहिए । |
| 331. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी मानव श्रीलीला में कभी भी अपने सिद्धांतों का त्याग नहीं किया और किसी के प्रेम की अवहेलना नहीं की । |
| 332. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के सामने याचना करने वाले के सकल मनोरथ सदैव पूर्ण होते हैं । |
| 333. |
भक्त को प्रथम अवसर मिलने पर अपना सब कुछ प्रभु को अर्पण करने की तैयारी रखनी चाहिए । |
| 334. |
पतिव्रता धर्म के पालन के कारण एक पत्नी कितनी ऊँची उठ सकती है इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण भगवती जानकी माता की श्रीलीला में देखने को मिलती है । |
| 335. |
बड़ा-से-बड़ा जीव भी अपना कर्मफल कभी टाल नहीं सकता । कर्मफल को माफ करने का अधिकार केवल और केवल प्रभु के पास है । |
| 336. |
शास्त्र कहते हैं कि अगर कोई दुःख में है तो किसी ने उसे दुःख दिया, ऐसा सोचना गलत है । उसके कर्मफल ही उसके जीवन में दुःखरूप बनकर आते हैं । |
| 337. |
शास्त्र कहते हैं कि आज जो हमारी अवस्था है उसका कारण हम ही हैं । आगे जो हमारी उन्नति या दुर्गति होनी है उसका कारण भी हम ही होते हैं । |
| 338. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारा प्रारब्ध हमारे पूर्व संचित जन्मों के कर्मफल से ही बनता है । |
| 339. |
शास्त्र कहते हैं कि भविष्य का सही निर्माण करना चाहते हैं तो आज से मन, कर्म और वाणी से सत्कर्म में लग जाना चाहिए । सबसे बड़ा सत्कर्म प्रभु की भक्ति करना है । |
| 340. |
प्रभु की भक्ति ही हमारे जीवन में हमारी सच्ची उन्नति करा सकता है । |
| 341. |
भक्ति के कारण भक्तों और संतों के ज्ञान चक्षु यानी ज्ञान नेत्र खुल जाते हैं । |
| 342. |
जीवन में वैराग्य होना जीवन की सच्ची कसौटी है । ऐसा होने पर संसार के किसी भी विषय में जरा-सा भी आकर्षण नहीं रहता, आकर्षण केवल और केवल प्रभु का ही रहता है । |
| 343. |
वैराग्य रहित प्रभु प्राप्ति का साधन नष्ट हो जाता है जैसे फूटे हुए घड़े में पानी भर दिया जाए तो धीरे-धीरे वह खत्म हो जाता है । |
| 344. |
संसार में रहकर भी हम वैराग्य युक्त हो सकते हैं और एकांत में रहकर भी हम विषयों में लिप्त रह सकते हैं । |
| 345. |
भोग और भक्ति दोनों एक साथ कभी नहीं चलती । शास्त्र कहते हैं कि जब संसार के भोग भोगने की वृत्ति समाप्त हो जाती है तो भक्ति जागृत होती है । |
| 346. |
जब भक्ति के कारण अंतःकरण में परब्रह्म के दर्शन के लिए हम सक्षम बन जाते हैं तो संसार का प्रपंच हमें काल्पनिक लगने लगता है और हमारी रुचि उसमें खत्म हो जाती है । |
| 347. |
भक्ति होने पर प्रभु के श्रीकमलचरणों में सच्चा अनुराग जग जाता है । |
| 348. |
प्रभु की भक्ति करने वाले हृदय में संसार के अन्य संकल्पों के लिए कोई जगह ही नहीं बचती । |
| 349. |
सच्चे भक्त को प्रभु से भिन्न संसार में कुछ भी नहीं दिखता और प्रभु के अलावा उसे संसार में कुछ भी नहीं दिखता । |
| 350. |
कितनी बार प्रभु श्री रामजी की मनुहार हुई कि वे श्री अयोध्याजी लौट जाएं पर प्रभु अपने व्रत पर अडिग रहे और चौदह वर्षों तक निरंतर अडिग बने रहे । |
| 351. |
भगवती सीता माता ने राजा श्री जनकजी और महारानी सुनैनाजी से जो नारी धर्म की शिक्षा पाई थी उसे जीवंत करके अपने श्रीचरित्र में दिखाया । |
| 352. |
प्रभु ने जब हाथ जोड़कर और अपनी शपथ देकर श्री सुमंतजी को वापस श्री अयोध्याजी के लिए रवाना किया तो रथ के सभी घोड़ों के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी और सभी घोड़ों को रोता देखकर निषादराज गुह और सभी भील रोने लगे । |
| 353. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी अपनी मानव श्रीलीला में अत्यंत भावुक और संवेदनशील रहे । पर जब-जब भावना और कर्तव्य के बीच संघर्ष हुआ तो भावना का त्याग करके तुरंत कर्तव्य पथ को प्रभु ने चुना । यह अदभुत विशेषता प्रभु के श्रीचरित्र में देखने को मिलती है । |
| 354. |
प्रभु को किसी भी बात के लिए मना करने का साहस न तो श्री वेदजी में है, न ऋषिगणों में है, न आचार्यों में है पर भक्ति की महिमा देखें कि भक्त केवटजी ने प्रभु के श्रीचरण प्रक्षालन किए बिना प्रभु को अपनी नौका में बैठने से प्रथम बार में मना कर दिया । |
| 355. |
श्री वेदजी भी प्रभु के बारे में बखान करते-करते नेति-नेति कहकर रुक जाते हैं और कहते हैं कि हम आपका मर्म इससे आगे न तो जानते हैं और न ही बता सकते हैं । |
| 356. |
संत कहते हैं कि जैसा पवित्र प्रवाह का दर्शन भगवती गंगा माता के किसी भी घाट में जाने से हमें मिलता है वैसा ही श्रीराम चरित्र में कहीं भी बिना रोक-टोक के गोता लगाए अदभुत पवित्र श्रीलीला हमें देखने को मिलती है । |
| 357. |
प्रभु कभी भी अपना सम्मान करवाने के इच्छुक नहीं होते, वे हरदम अपने भक्त को सम्मान देने और दिलवाने के लिए तत्पर रहते हैं । |
| 358. |
जिनके नाम का उच्चारण मात्र जीव को भवसागर के पार उतार देता है वे प्रभु प्रेमवश भगवती गंगा माता को पार करने के लिए श्री केवटजी की मनुहार करने लगे । यह अदभुत प्रेम और भक्ति की मिसाल थी । |
| 359. |
जीवन में भक्तियुक्त संकल्प करते चलना चाहिए तो प्रभु स्वयं उसकी पूर्ति के लिए पूर्ण रूप से मदद करते हैं । |
| 360. |
शास्त्र कहते हैं कि जीव का दुर्भाग्य होता है जो भक्तियुक्त प्रभु प्राप्ति का संकल्प नहीं करके संसार के उल्टे-पुल्टे संकल्प जीवन में करता रहता है । |
| 361. |
शास्त्र कहते हैं कि जो सुख प्रभु के श्रीकमलचरणों के दर्शन में और श्रीकमलचरणों के स्पर्श में है वह सुख पूरे ब्रह्मांड में कहीं भी नहीं मिल सकता । |
| 362. |
भक्ति की प्रबलता दिखाने वाला अदभुत प्रसंग श्री केवटजी का है जहाँ भक्त के अधीन होकर प्रभु अपने भक्त की हर इच्छा को पूरी करते हैं । |
| 363. |
प्रभु अपने भक्त केवटजी के आगे झुक गए और मनुहार करने लगे कि जल्दी से मेरे पग पखार लो और नौका में बैठा लो और देवतागण आकाश से भक्त की जीत पर फूल बरसाने लगे । |
| 364. |
प्रभु भक्त के प्रेम के आगे झुक जाते हैं, ऐसा संत भाव देते हैं और इस पंक्ति को प्रभु ने साकार और सार्थक किया श्री केवटजी के प्रसंग में । |
| 365. |
संत कहते हैं कि श्री केवटजी का भाग्य देखें कि जो प्रभु के श्रीकमलचरणों के परम पावन और पवित्र जल को प्रभु श्री महादेवजी अपनी जटा पर धारण करते हैं उसी श्रीगंगाजल से प्रभु के श्रीकमलचरण पखार रहे हैं । ऐसा भाग्य देवतागणों को भी कभी नहीं मिला, यह देखकर देवतागण स्वर्ग से पुष्पों की वर्षा करने लगे । |
| 366. |
भक्त की भक्ति की विजय हुई और श्री केवटजी ने प्रभु के चरणामृत को अमूल्य और दुर्लभ जानकर उसका पान किया और सभी परिवार वालों को और गांव वालों को पान करवाया । |
| 367. |
प्रभु की कृपा देखें कि प्रभु को श्रीगंगा पार कराना अभी शेष था पर प्रभु का चरणामृत पीते ही श्री केवटजी की इक्कीस पीढ़ियों को प्रभु ने भवसागर से पहले ही पार कर दिया । |
| 368. |
प्रभु के चरणामृत से पवित्र संसार में क्या हो सकता है, कुछ भी नहीं है । इसलिए रोजाना प्रभु के चरणामृत का पान करने का अभ्यास जीवन में करना चाहिए । |
| 369. |
संत कहते हैं कि सामान्य लगने वाला श्री केवटजी बड़ा असामान्य और असाधारण हैं और भक्तों के शिरोमणि हैं और श्रीराम कथा में उनका स्थान बहुत ऊँचा है । |
| 370. |
प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी मानव श्रीलीला में दिखाया कि सज्जनता के वे शिरोमणि और आदर्श हैं । |
| 371. |
किसी भी हुनर को, धन को या समय को जब प्रभु के लिए लगाया जाता है तभी वह सार्थक होता है । |
| 372. |
समय को संसार में लगाने में उसकी सार्थकता नहीं है, समय का सर्वोच्च उपयोग उसे प्रभु में लगाने में है । |
| 373. |
प्रभु की सेवा का मौका मिलने पर श्री केवटजी को सब कुछ मिल गया, यह उनका स्पष्ट मत था । अब उन्हें किसी भी चीज की अभिलाषा नहीं थी । प्रभु सानिध्य प्राप्त होने के बाद उससे ज्यादा जीव और क्या मांग सकता है ? |
| 374. |
जो अपने जीवन में प्रभु को पा लेता है उसके सारे अभाव नष्ट हो जाते हैं । |
| 375. |
शास्त्र कहते हैं कि जिसकी तृष्णा जितनी बड़ी है वह उतना ही दरिद्र है । |
| 376. |
जिसने जीवन में प्रभु की शरण ले ली, भगवत् प्राप्ति की राह पर चल पड़ा, वह संसार का सबसे अमीर है, ऐसा शास्त्र कहते हैं । |
| 377. |
जीवन के सारे दुःख तब समाप्त हो जाते हैं जब प्रभु का सानिध्य हमें मिलता है । |
| 378. |
प्रभु का एक नाम पापों के दलदल को समाप्त करने के लिए अकेला सक्षम है । प्रभु के नाम में पाप दहन की इतनी क्षमता है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । शास्त्र कहते हैं कि प्रभु नाम जापक के कोई भी पाप जीवन में नहीं बचते । |
| 379. |
प्रभु के जीवन में आते ही हमारे सारे विकार, दोष, दुःख, दरिद्रता सब तत्काल मिट जाते हैं । |
| 380. |
श्री भरतलालजी ने श्री प्रयागराजजी से मांगा कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कुछ भी नहीं चाहिए, उन्हें केवल प्रभु के श्रीकमलचरणों में दिन प्रतिदिन बढ़ता प्रेम चाहिए । प्रभु प्रेम के अलावा उनकी कोई चाहत नहीं थी, वे प्रभु के इतने महान भक्त थे । |
| 381. |
जब भक्त को भक्ति रस की प्राप्ति हो जाती है तो वह मोक्ष के सुख को भी ठुकरा देता है । |
| 382. |
श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवद् गीताजी और श्री रामचरितमानसजी का सर्वमान्य सिद्धांत है कि मुक्ति से बहुत-बहुत ऊँचा स्थान भक्ति का है । |
| 383. |
भक्तों के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि सभी पुरुषार्थ गौण हो जाते हैं क्योंकि भक्ति इन चारों पुरुषार्थों के मस्तक पर विराजती है । |
| 384. |
शास्त्र और संत कहते हैं कि प्रभु मुक्ति देने में बहुत उदार हैं पर भक्ति देने में बड़े कंजूस हैं । परम और विशेष अधिकारी जीव को ही प्रभु भक्ति का दान देते हैं । |
| 385. |
सच्चे भक्त अदभुत रूप से निष्काम पाए जाते हैं । |
| 386. |
भक्ति एक सच्चे भक्त का जीवन ही बन जाती है । |
| 387. |
भक्ति में भी हमें भक्ति के अहंकार से बचना चाहिए और सावधान होकर भक्ति करनी चाहिए । |
| 388. |
प्रभु हमें सदैव याद रखें, इसकी व्यवस्था एक भक्त अपनी भक्ति करके कर लेता है । |
| 389. |
जो भक्त प्रभु के सुख का कारण बन जाता है, प्रभु उसे हमेशा याद रखते हैं । |
| 390. |
अपनी भक्ति से प्रभु के आनंद को जागृत करना एक भक्त अपना परम कर्तव्य मानता है । |
| 391. |
हर समय जीव को परम आनंद प्रदान करने की क्षमता मात्र और मात्र प्रभु की भक्ति में ही है । |
| 392. |
प्रभु आनंद देने वाले भक्त को खुद ही बुलाते हैं और उसे अपना सानिध्य प्रदान करते हैं । |
| 393. |
भक्ति के कारण एक समय भक्त के जीवन में ऐसा आता है जब वह प्रभु के सामने साक्षात्कार के लिए प्रस्तुत हो जाता है । |
| 394. |
अगर श्री केवटजी पारिश्रमिक के तौर पर मुद्रिका ग्रहण कर लेते तो तो वे नाविक ही रह जाते । उन्होंने पारिश्रमिक नहीं लिया तो उन्हें प्रभु से प्रभु की दुर्लभ भक्ति का दान मिला । |
| 395. |
सकाम भक्त एक मजदूर की तरह अपना पारिश्रमिक प्रभु से ले लेता है । पर निष्काम भक्त ऐसा होता है जो प्रभु का सानिध्य पा लेता है और अंत में प्रभु का पार्षद बन जाता है । |
| 396. |
सकाम भक्ति प्रारंभिक कक्षा की भक्ति है और निष्काम भक्ति उसका परम शिखर है । |
| 397. |
सकाम भक्ति ही क्यों न हो पर शास्त्र कहते हैं कि भक्ति जरूर करनी चाहिए और प्रभु से मांगना चाहिए कि इतनी शक्ति जल्दी से हमें दे दें जिससे हम जीवनभर के लिए निष्काम बन सकें । |
| 398. |
भारतीय नारियों की यह परंपरा और स्वभाव रहा है कि घर के मंगल के लिए, घर के सदस्यों के उद्धार के लिए और घर की निरंतर प्रगति के लिए वे प्रभु की भक्ति निरंतर करती रहती थी । उनके द्वारा की गई प्रभु की भक्ति उनके परिवार को बल प्रदान करने का काम करती थी । |
| 399. |
श्री रामावतार में जिस वृक्ष के नीचे प्रभु और माता वनवास के दौरान विश्राम करते, स्वर्ग के कल्पवृक्ष उनकी स्तुति करते और उनके भाग्य की प्रशंसा करते । सूत्र यह है कि प्रभु का सानिध्य पाने वाला ब्रह्मांड में सबसे गौरवशाली बन जाता है । |
| 400. |
शास्त्र कहते हैं कि जीवन को एक बोझ की तरह मानना गलत है । जीवन में प्रभु की भक्ति करके भक्ति का रस लेना सबसे उत्तम होता है । |
| 401. |
जगत जननी भगवती सीता माता ने वनवास के दौरान जहाँ एक रात रसोई बनाई वह स्थान सनातन तीर्थ बन गया । ऐसी कितनी ही "श्रीसीता रसोई" के नाम के सनातन तीर्थ भारत भूमि को गौरवांवित कर रही हैं । |
| 402. |
माता-पिता, पत्नी, मातृभूमि या स्वर्ग के लिए भी प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों से दूर नहीं जाने का श्री लक्ष्मणजी का स्पष्ट संकल्प और मत था । |
| 403. |
भारतीय मर्यादा का अदभुत दर्शन प्रभु श्री रामजी की प्रत्येक श्रीलीला में हमें होता है । |
| 404. |
वनवास के दौरान प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों के चिह्न को टालते हुए भगवती जानकी माता चलती क्योंकि उनका मानना था कि जो श्रीचरण रज माथे पर धारण करने योग्य है उन पर अपने चरण कैसे रख सकते हैं । |
| 405. |
वनवास के दौरान श्री लक्ष्मणजी सबसे पीछे चलते और दोनों श्रीकमलचरणों के चिह्नों को यानी प्रभु श्री रामजी और भगवती जानकी माता के श्रीचरणों के चिह्नों को टालते हुए चलते । कितनी अदभुत मर्यादा का दर्शन यहाँ होता है । |
| 406. |
पूरी मर्यादा और विनय के साथ प्रभु वनवास के दौरान ऋषियों और संतों के आश्रम में प्रवेश करते थे । |
| 407. |
संत कहते हैं कि भक्ति का आरंभ प्रभु के बारे में श्रवण करने से ही करना चाहिए । |
| 408. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारे कान प्रभु की कथा सुनने के लिए समुद्र समान हों । जैसे समुद्र में बहुत सारी नदियां मिलती हैं पर समुद्र कभी भरता नहीं वैसे ही हमारे कान प्रभु की कितनी भी कथा, कितनी भी बार सुनने पर कभी तृप्त नहीं होने चाहिए । |
| 409. |
शास्त्रों का स्वाध्याय करके उत्तम सिद्धांत को हमें याद करके और लिखकर रखना चाहिए । |
| 410. |
हमारे शास्त्रों के सूत्र बहुत लोगों को पता तो होते हैं पर उसकी अनुभूति बहुत कम लोग ही अपने जीवन में कर पाते हैं । |
| 411. |
प्रभु का वास सबके हृदय में है पर प्रभु की अनुभूति कुछ बिरले भक्तों को ही होती है । |
| 412. |
दृष्टा के रूप में प्रभु स्वतंत्र रूप से हम सबको देखते हैं । |
| 413. |
जैसे-जैसे भक्ति से हमारी प्रकृति पवित्र होती जाती है वैसे-वैसे हम प्रभु की अनुभूति के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं । |
| 414. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारा शरीर, मन, प्राण और बुद्धि सभी प्रभु की भक्ति से ही शुद्ध होते हैं । |
| 415. |
शास्त्र कहते हैं कि अहंकार रहित होने का भी एक ही उपाय है कि भक्ति करके प्रभु की कृपा जीवन में प्राप्त कर लेना । |
| 416. |
जो प्रभु के बारे में श्रवण पारायण हो जाता है वह एक-न-एक दिन प्रभु को पा ही लेता है । |
| 417. |
प्रभु की कथा सुने बिना प्रभु के स्वभाव, प्रभाव और ऐश्वर्य को कोई जान नहीं सकता । इन्हें जाने बिना जीवन में प्रभु के लिए प्रेम निर्माण नहीं होता । |
| 418. |
जिनके नेत्र प्रभु के दर्शन के प्यासे हों और प्रभु के दर्शन की आसक्ति जिनमें हो, ऐसे जीव प्रभु को बहुत प्रिय होते हैं । |
| 419. |
श्री गोपीजन प्रातः से रात्रि तक प्रभु के रूप माधुर्य के दर्शन करने के लिए आसक्त रहतीं थीं । |
| 420. |
हमारे नेत्रों का प्रभु के दर्शन करने से बढ़िया उपयोग शास्त्रों ने दूसरा कोई भी नहीं माना है । |
| 421. |
उत्तम भक्तों के लिए संसार उपलब्ध रहता है, वे संसार करते भी हैं पर संसार की प्यास उनमें नहीं होती । उनकी प्यास मात्र और मात्र प्रभु मिलन के लिए ही होती है । |
| 422. |
शास्त्रों में भक्ति के अंतर्गत प्रभु के लिए श्रवण आसक्ति और रूपासक्ति को बड़ा ऊँचा स्थान दिया गया है । |
| 423. |
बिना भक्ति के प्यास के प्रभु की भक्ति करने से हमें उत्तम फल नहीं मिलता । सूत्र यह है कि भक्ति में प्रभु के लिए हमारा चित्त प्रेम में पिघलना चाहिए । |
| 424. |
संत कहते हैं कि हमारी तरफ से भक्ति का कंप होगा तो उसके फलस्वरूप प्रभु की तरफ से अनु कंप होगा यानी प्रभु की अनुकंपा हमें मिलेगी । |
| 425. |
संत श्री रामकृष्ण परमहंसजी रोजाना भगवती काली माता के साथ बातें करते थे । हमसे भी माता बातें कर सकती हैं पर हमें संत श्री रामकृष्ण परमहंसजी की तरह अनुकूल भक्त बनना पड़ेगा । |
| 426. |
शास्त्र कहते हैं कि जिनकी जिह्वा प्रभु का यश, कीर्ति और गुणानुवाद करते कभी थकती नहीं है, प्रभु का निश्चित वास उनके हृदय में होता है । |
| 427. |
हमारी वाणी को प्रभु के विषय में बोलने की प्रेरणा हमें देनी चाहिए और ऐसा अभ्यास हमें अपनी वाणी को कराना चाहिए । |
| 428. |
ऐसे संत हुए हैं जिन्होंने प्रभु के विषय में बोले बिना यानी प्रभु का गुणानुवाद किए बिना भिक्षा में मिला अन्न भी कभी ग्रहण नहीं किया । ऐसा व्रत उन्होंने जीवनभर निभाया । |
| 429. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें व्यसन लग जाना चाहिए कि प्रभु के विषय में हमें भक्तों के बीच में बोलना है । इस आसक्ति से हमें बड़ा लाभ मिलता है । |
| 430. |
गृहस्थ जीवन में हर चीज जो घर में आती है, उसे हमें प्रभु को समर्पित करके फिर उसका उपयोग करना चाहिए । |
| 431. |
भक्त मानता है कि उसका घर प्रभु के विराजने के लिए है । फिर वह क्यों रहता है ? वह उस घर में प्रभु के सेवक के रूप में प्रभु की सेवा करने के लिए रहता है । |
| 432. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारे जीवन में भोगों की नहीं, भगवान की प्रधानता होनी चाहिए । |
| 433. |
शास्त्र कहते हैं कि जिसको प्रभु की भक्ति में रस नहीं आता, वह जीव अभागा है । |
| 434. |
भक्त की यह भावना होती है कि हमारे घर में श्री ठाकुरजी नहीं बल्कि श्री ठाकुरजी के घर में हम सेवक के रूप में रहते हैं । |
| 435. |
वैष्णवजन घर में रसोई प्रभु के लिए बनाते हैं । जिस पदार्थ का प्रभु को भोग नहीं लगाया गया उसको वे कभी ग्रहण नहीं करते । |
| 436. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु का पूजन स्वयं अपने हाथों से करना चाहिए । पूजा विस्तार से करें या संक्षिप्त रूप में करें, इसमें दोष नहीं है । सूत्र यह है कि प्रभु की पूजा हमारे हाथों से ही हो । शास्त्रों का आग्रह यही है कि स्वयं हमारे हाथों से नित्य पूजा हो । |
| 437. |
अपनी हर इंद्रियों को प्रभु की सेवा में लगाना, यह भक्ति का सूत्र है । कानों से प्रभु की कथा का श्रवण हो, नेत्रों से प्रभु के दर्शन हों, नासिका से प्रभु को चढ़ाए हुए श्री तुलसीदल की अलौकिक सुगंध ग्रहण हो, पैरों से प्रभु की परिक्रमा हो, हाथों से प्रभु की सेवा हो । |
| 438. |
शास्त्र कहते हैं कि हर रोज किसी-न-किसी समय प्रभु का नाम जप जरूर करना चाहिए । |
| 439. |
राह चलते हुई कहीं भी हमें मंदिर दिखे तो हमारा मस्तक तुरंत मंदिर दिखते ही विनय से झुक जाना चाहिए । |
| 440. |
जिस परिवार में ऐसा होता है कि परिवार के सभी सदस्य मिलकर प्रभु की पूजा करते हैं तो वह पूजा कई गुना ज्यादा फलदायी होती है । |
| 441. |
शास्त्र कहते हैं कि अलोभी हृदय में प्रभु का वास है । जिस हृदय में संसार का कुछ भी पाने की इच्छा या लोभ नहीं है, उस हृदय में प्रभु निवास करते हैं । |
| 442. |
प्रभु की सेवा प्रभु के पराधीन होकर करना सर्वश्रेष्ठ होता है । अपनी सुविधानुसार प्रभु की सेवा की, अपनी इच्छा का भोग प्रभु को लगाया, यह गलत है । |
| 443. |
प्रभु हमारे सबसे निकट हैं पर हमारे सामने प्रकट तब होते हैं जब हम अपने मन, कर्म और वाणी को भक्ति करके शुद्ध करते हैं । |
| 444. |
जो कुछ भी घर में आता है जैसे अलंकार, संपत्ति, खाद्य पदार्थ वह पहले प्रभु को अर्पित होना चाहिए और प्रसाद रूप में हमें उसे ग्रहण करना चाहिए । |
| 445. |
हमारा सारा जीवन प्रभुमय बन जाना चाहिए । जो हमारे पास आता है वह प्रभु से आता है और जो हमारे द्वारा किया जाता है वह प्रभु की प्रसन्नता के लिए किया जाता है, यह भाव जीवन में आना चाहिए । |
| 446. |
काम, क्रोध, मद, लोभ और अहंकार आदि विकारों के कारण मन अस्वस्थ रहता है । भक्ति करके इन विकारों पर विजय पाकर मन को स्वस्थ करना चाहिए । |
| 447. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें सबके लिए हितकारी बनना चाहिए और सबको प्रभु से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए । |
| 448. |
जो जीवन में केवल प्रभु से आशा रखते हैं और संसार से आशा नहीं रखते, वे ही जीवन में सफल होते हैं । |
| 449. |
शास्त्र कहते हैं कि दूसरों के दुःख में दुःखी होना आसान है पर दूसरों के सुख में सुखी होना बड़ा कठिन है । यह केवल भक्ति से ही संभव होता है कि हम दूसरे की संपत्ति, उन्नति और प्रगति को देखकर खुश होते हैं । |
| 450. |
शास्त्र कहते हैं कि जीवन में दूसरों के लिए जलन समाप्त हो जाए तो वह हृदय प्रभु के पधारने के लिए और प्रभु के रहने के लिए सबसे उपयुक्त हृदय बन जाता है । |
| 451. |
जिनका मन केवल प्रभु को पाने के लिए व्याकुल होता है, प्रभु उन पर अनुग्रह करके अपना निवास स्थान उनके हृदय को बना लेते हैं । |
| 452. |
प्रभु के लिए प्रबल प्रेम की भावना जब हमारे हृदय में उत्पन्न होती है तो हमारे विकार धीरे-धीरे अपने आप ही शांत होते चले जाते हैं । |
| 453. |
सच्चा भक्त वह होता है जिसके जीवन के सारे संबंध प्रभु के साथ जुड़ जाते हैं । उसके माता-पिता, गुरु, सखा सब प्रभु बन जाते हैं । |
| 454. |
प्रभु के साथ वात्सल्य भाव (बच्चों वाला), लालन भाव (माता-पिता वाला), माधुर्य भाव (प्रिया वाला), सखा भाव (मित्र वाला), दास भाव (सेवक वाला) और शांत भाव (परमात्मा वाला) हम रख सकते हैं । |
| 455. |
जो प्रभु के लिए अपने हृदय में प्रेम भाव निर्माण कर लेता है, प्रभु उसके हृदय में आकर बस जाते हैं क्योंकि प्रभु को स्वयं उसके सानिध्य में बहुत रस आने लगता है । यह उस भक्त के जीवन की श्रेष्ठतम अवस्था होती है । |
| 456. |
शास्त्र कहते हैं कि जब हमारे अवगुण हमें अवगुण के रूप में नहीं दिखते तो यह हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता है क्योंकि तब अवगुणों के नाश होने की संभावना ही नहीं बचती । |
| 457. |
हम प्रभु को तब प्रिय लगने लगते हैं जब हमारे अवगुण और विकार भक्ति के कारण शांत हो जाते हैं । |
| 458. |
संत कहते हैं कि हम शास्त्रों के उन उपदेशों को ही पकड़ कर बैठते हैं जो हमें अनुकूल लगता है और हमारे लिए अनुकूल पड़ता है । शास्त्रों के सभी उपदेश को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना सबसे श्रेष्ठ होता है । |
| 459. |
जब हम अवगुण को हटाने के लिए और सद्गुण को जीवन में लाने के लिए संकोच नहीं करते यानी प्रयास करते हैं तो हमारे आध्यात्मिक विकास को कोई नहीं रोक सकता । |
| 460. |
शास्त्र कहते हैं कि भक्तों को किसी से द्वेष नहीं करना चाहिए, सबके प्रति करुणा रखनी चाहिए और सबको क्षमा करते हुए चलना चाहिए । |
| 461. |
भक्तिमार्ग में भक्ति की साधना करने से हमारे दोष घटते जाते हैं और हमारे सद्गुण बढ़ते जाते हैं । |
| 462. |
शास्त्र कहते हैं कि गौ-माता इसलिए पूजनीय हैं कि वे स्वयं अपने लिए कुछ भी नहीं करती और हमारे लिए क्या कुछ नहीं करती । |
| 463. |
गौ-माता के पूजनीय होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी मानव श्रीलीला में उनकी सेवा की है । |
| 464. |
जो जीव नैतिकता के मार्ग का जीवन में त्याग नहीं करता, उसका अंतःकरण प्रभु का मंदिर बन जाता है । |
| 465. |
भक्त सदैव मानता है कि उसके जीवन में जो भी अच्छा हुआ वह प्रभु की कृपा के फलस्वरूप है और जो कुछ भी गलत हुआ वह उसके अपराध के फलस्वरूप है । |
| 466. |
सच्चे भक्त को प्रभु की भक्ति करने वाला दूसरा जीव बहुत प्रिय लगता है । |
| 467. |
जिनके अंदर उत्तम धन, परिवार, व्यापार और प्रतिष्ठा का अहंकार जन्म नहीं लेता वे प्रभु को प्रिय हो जाते हैं । |
| 468. |
शास्त्र तो यहाँ तक आज्ञा देते हैं कि श्रेष्ठ धर्माचरण का भी अहंकार कभी जीवन में नहीं करना चाहिए । |
| 469. |
शास्त्र उपमा देकर कहते हैं कि जैसे छाया हमारे साथ रहती है पर उसका भान मिट जाता है ऐसे ही अहंकार का भान हमारे जीवन से मिट जाना चाहिए । |
| 470. |
भक्ति करने वाले के मन में स्वर्ग, नर्क या मोक्ष का विचार जन्म ही नहीं लेता । |
| 471. |
एक सच्चे भक्त के मन, कर्म और वाणी का हर विचार केवल प्रभु के लिए ही होता है । |
| 472. |
प्रभु से सहज प्रेम होना चाहिए, ऐसा केवल भक्ति से ही संभव होता है । |
| 473. |
प्रभु से हमें कुछ मिलने वाला है, इस भावना से प्रभु की भक्ति नहीं करनी चाहिए । भक्ति निर्दोष और निस्वार्थ होनी चाहिए । |
| 474. |
सच्चे भक्त को प्रभु से कुछ नहीं चाहिए होता फिर भी प्रभु से प्रेम किए बिना वह रह नहीं पाता, यही सहज प्रेम की परिभाषा है । |
| 475. |
भक्ति करने के दौरान जीवन में प्रतिकूलता अगर आती है तो भी रंचमात्र हमारी भक्ति में कमी नहीं होनी चाहिए । |
| 476. |
शास्त्र सूत्र देते हुए कहते हैं कि अनुकूलता में भक्ति इतनी श्रेष्ठ नहीं होती जितनी प्रतिकूलता में होती है । |
| 477. |
भक्ति भक्त और भगवान का विलय करा देती है यानी मिलन करा देती है । फिर वे अलग नहीं होते, एक ही हो जाते हैं यानी प्रभु के साथ एकरूपता हो जाती है । |
| 478. |
सच्चा भक्त जो मन से बोल देता है वह शास्त्र के वचन बन जाते हैं, जो क्रिया वह करता है वह साधन की क्रिया बन जाती है । |
| 479. |
शास्त्र कहते हैं कि सच्चा भक्त जो भी खाता है उसे प्रभु प्रत्यक्ष ग्रहण करते हैं । |
| 480. |
जीवन की उन्नति और प्रगति के सभी सूत्र हमारे शास्त्रों में मौजूद हैं । |
| 481. |
हमें अपनी भक्ति से प्रभु को आनंदित करने का प्रयास करना चाहिए । |
| 482. |
जब प्रभु हमारे जीवन में आते हैं तो बिना बताए ही हमारे सारे दुःख खत्म हो जाते हैं । |
| 483. |
प्रभु की सेवा का कोई भी मौका जीवन में मिले तो कभी भी चूकना नहीं चाहिए । |
| 484. |
प्रभु के बारे में हमारा मन चर्चा में लगना चाहिए यानी मन से प्रभु की चर्चा होनी चाहिए । |
| 485. |
शास्त्र कहते हैं कि कभी भी प्रभु के सामने खाली हाथ नहीं जाना चाहिए । हम क्या लेकर जाते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है । सबसे अच्छा तब होता है जब हम अपने सद्गुणों की भेंट प्रभु को अर्पण करते हैं । |
| 486. |
मंदिर में प्रभु की झांकी मिलते ही, मग्न होकर, नेत्रों से आंसू छलका कर, ध्यान लगाकर प्रभु के दर्शन करने चाहिए । |
| 487. |
प्रभु के श्रीविग्रह को दंडवत प्रणाम करके, हाथ जोड़कर प्रेम रस में डूबकर प्रभु का दर्शन करना चाहिए । |
| 488. |
हमारी कुशलता और सौभाग्य हमारे मन मंदिर में प्रभु के दर्शन होते ही अपने आप जग जाते हैं । |
| 489. |
प्रभु का दर्शन हमें सनाथ करने वाला दर्शन होता है । |
| 490. |
निषादराज गुह ने प्रभु से कहा कि वे परिवार और प्रजा समेत प्रभु के सनातन सेवक हैं । प्रभु की सेवा करके उनकी प्रजा और परिवार सदा आनंद से झूमता रहेगा । |
| 491. |
प्रभु सर्वसमर्थ होने पर भी अपने भक्तों की सेवा लेते हैं । यह केवल प्रेम के कारण प्रभु करते हैं । प्रभु अपने भक्त से इतना प्रेम करते हैं जिसकी कोई उपमा नहीं । |
| 492. |
प्रभु को अपने सच्चे भक्तों की सेवा बहुत मीठी लगती है । |
| 493. |
प्रभु को हमारी सेवा की आवश्यकता नहीं पर जो प्रेम भक्तों के नेत्रों से बहता है उससे प्रभु विवश हो जाते हैं और भक्तों की सेवा ग्रहण करते हैं । |
| 494. |
सर्वाधिक महत्व प्रभु के लिए सदा से भक्तों के प्रेम का ही रहा है । |
| 495. |
प्रभु सदा यह देखते हैं कि हमारे हृदय में उनके लिए कितना प्रेम भरा हुआ है । हमारी जो सेवा होती है वह हमारा प्रेम प्रभु तक पहुँचाने का निमित्त होती है, साधन होती है । |
| 496. |
श्री रामचरितमानसजी की प्रसिद्ध चौपाई में कहा गया है कि प्रभु को “केवल” प्रेम प्रिय है । ऐसा नहीं कहा गया कि प्रभु को प्रेम प्रिय है बल्कि कहा गया है कि प्रभु को “केवल” प्रेम प्रिय है । यहाँ “केवल” शब्द बहुत महत्वपूर्ण है । |
| 497. |
प्रेम के साथ कुछ हो इसकी कोई आवश्यकता नहीं । मात्र निर्मल प्रेम ही प्रभु को प्रेम-बंधन में बांधने में एकमात्र सक्षम है । |
| 498. |
श्री सुदामाजी के पास कौन-सा धन था । श्री प्रह्लादजी के पास कौन-सा ज्ञान था । भगवती अहिल्याजी के पास कौन-सा शील था । श्री अजामिलजी के पास कौन-सा चरित्र था । श्री विदुरजी की कौन-सी जाति थी । श्री ध्रुवजी में कौन-सा बल था । पर सबके हृदय में प्रभु के लिए प्रेम था इसलिए सबको प्रभु मिल गए । |
| 499. |
प्रभु रीझते हैं तो केवल प्रेम से रीझते हैं । प्रभु हमारे भीतर मात्र और मात्र प्रेम भाव देखते हैं कि मेरे लिए मेरे भक्त के हृदय में कितना प्रबल प्रेम है । |
| 500. |
त्याग की बात करना आसान है पर प्रत्यक्ष त्याग करना बड़ा कठिन है । भक्त प्रभु की प्राप्ति रूपी परमधर्म के लिए बड़ा-से-बड़ा त्याग जीवन में करते हैं । |
| 501. |
धर्म प्रधान जीवन जीने के लिए एक भक्त बड़ी कड़ाई से धर्म के सभी नियमों का अपने जीवन में पालन करता है । |
| 502. |
हर जीव से प्रभु की अपेक्षा होती है कि वह धर्मयुक्त कर्तव्यों का जीवन में निर्वाह करे । |
| 503. |
जो भी प्रभु का सानिध्य पाता है या प्रभु के संपर्क में आता है वह प्रभु का भक्त बनकर ही रहता है । |
| 504. |
शोक, मोह और भय तब तक ही जीवन में रहते हैं जब तक प्रभु हमारे जीवन में नहीं आते । |
| 505. |
प्रभु को प्रेम की भाषा इतनी प्रिय है कि प्रभु ने केवल मनुष्य को ही नहीं बल्कि पशु-पक्षी तक में प्रेम की भाषा का संचार किया है । इस कारण पशु-पक्षी भी प्रेम की भाषा समझते हैं । |
| 506. |
भक्ति के कारण अंतःकरण से भक्त अति कोमल होता है । |
| 507. |
किसी भी प्रामाणिकता की पराकाष्ठा से देखें तो प्रभु श्री रामजी का श्रीचरित्र परम अनुकरणीय है । |
| 508. |
शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य का शरीर महत्वपूर्ण नहीं होता, मनुष्य के शरीर में जो सद्गुण वास करते हैं वे ही सबसे महत्वपूर्ण होते हैं । |
| 509. |
मानव शरीर का सदुपयोग केवल भक्ति का श्रेष्ठ साधन करके प्रभु की प्राप्ति करने में ही है । |
| 510. |
शास्त्र आग्रह करते हैं कि अधिक-से-अधिक सद्गुणों को हमें जीवन में धारण करते चलना चाहिए । |
| 511. |
शास्त्र कहते हैं कि सद्गुणों के कारण ही हम प्रभु को प्रिय होते हैं और संसार में भी लोकप्रिय होते हैं । |
| 512. |
प्रभु श्री रामजी समस्त सद्गुणों की परम पराकाष्ठा हैं, इसलिए वनवास काल के दौरान भी उनके सद्गुणों का उच्चारण श्री अयोध्याजी में प्रत्येक अयोध्यावासी के मन में सदैव होता था । |
| 513. |
महाराज श्री दशरथजी के जीवन का सर्वोच्च बिंदु उनका श्रीराम प्रेम था । |
| 514. |
अपनी मातृभूमि के लिए प्रभु श्री रामजी के मन में इतनी असीम श्रद्धा थी कि जैसे ही श्री अयोध्याजी का जिक्र आता प्रभु के दोनों हाथ जुड़ जाते । |
| 515. |
भारतीय नारी की असीम और सर्वोच्च मर्यादा श्री रामायणजी में भगवती सीता माता के रूप में देखने को मिलती है । |
| 516. |
शास्त्र कहते हैं कि मानव जीवन में किए हुए समस्त पाप हमारी मरण अवस्था के समय हमारे सामने आकर खड़े हो जाते हैं । |
| 517. |
हमारे कर्मों के फल जीवनभर हमारा पीछा करते रहते हैं । |
| 518. |
महाराज श्री दशरथजी ने अपने जीवन का परम लाभ लिया और तब तक ही जीवित रहे जब तक उन्हें प्रभु का दर्शन सुलभ था । प्रभु के वियोग में उन्होंने अपने प्राणों का तत्काल त्याग कर दिया । |
| 519. |
शास्त्र कहते हैं कि तुच्छ व्यक्ति की संगति एक महान मनुष्य के महान जीवन को भी नष्ट कर सकती है । |
| 520. |
श्री भरतलालजी का स्वभाव बहुत कोमल था पर उनका अनुशासन और नियम इतना दृढ़ था कि प्रभु श्री रामजी भी उनकी बड़ाई अपने श्रीमुख से करते थकते नहीं थे । |
| 521. |
लोभ जीव को कितना अंधा कर देता है यह श्री महाभारतजी के अवलोकन से पता चलता है । |
| 522. |
शास्त्र कहते हैं कि अवगुणों के कारण हमारा पतन किस सीमा तक हो सकता है, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । |
| 523. |
इस आकांक्षा से कि चरित्र दूषित कभी नहीं हो, प्रभु का एक भक्त सदैव भयभीत रहता है क्योंकि वे चरित्र के पुजारी होते हैं । |
| 524. |
शास्त्र कहते हैं कि महानता तो उस व्यक्ति की होती है जिसका विरोध करने वाले भी उसके सद्गुणों की प्रशंसा करे बिना नहीं रह पाते । |
| 525. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारे विरोधी भी जब हमारे सद्गुणों की प्रशंसा करते हैं तो यह जीवन का सबसे बड़ा प्रमाण पत्र होता है । |
| 526. |
एक भक्त अपने व्यवहार से अपने आराध्य प्रभु की प्रसन्नता के लिए सदैव निर्दोष और निर्मल बना रहता है । |
| 527. |
जीवनभर जिन श्रीचरणों की पूजा में जीवन की धन्यता मानी उन प्रभु के श्रीकमलचरणों को अब वन में चलना पड़ेगा, यह सुनते ही इतना व्याकुल हृदय से भयंकर विलाप श्री भरतलालजी ने किया जिसकी कोई मिसाल ही नहीं है । |
| 528. |
श्री भरतलालजी ने श्री अयोध्याजी की अतुलनीय राजलक्ष्मी को अपने मन के एक अंश से भी कभी स्वीकार नहीं किया । |
| 529. |
श्री भरतलालजी के मन में प्रभु श्री रामजी के लिए इतना सम्मान था कि उन्हें पता था कि अगर वे मर्यादा के बाहर जाकर अपनी माता से बर्ताव करेंगे या मंथरा को दंड देंगे तो फिर वे प्रभु श्री रामजी से आँखें नहीं मिला पाएंगे । |
| 530. |
प्रभु के प्रेम को खोने का अदभुत डर श्री भरतलालजी के मन में था, उनका क्रोध कम नहीं था, उनका दुःख कम नहीं था पर वे मर्यादा के अंदर रहे क्योंकि प्रभु का स्वभाव वे जानते थे कि प्रभु कभी भी गलत व्यवहार का समर्थन नहीं करेंगे । |
| 531. |
एक भक्त पर अपने गलत आचरण के कारण प्रभु का प्रेम नहीं खोने का भयंकर दबाव जीवनभर होता है । इसलिए ही वे जीवन में कभी गलत आचरण नहीं करते । |
| 532. |
श्री भरतलालजी ने इतनी ऊँची सिद्धांत की बात गुरुदेव श्री वशिष्ठजी को कही कि अभी मैं कलंकित हूँ मेरी माता के कारण, मगर मैं अपने व्यवहार से प्रभु की नजर में कभी कलंकित नहीं होना चाहूँगा । |
| 533. |
प्रभु के एक महान भक्त श्री भरतलालजी ने अपना स्पष्ट और अपरिवर्तनीय निर्णय पूरी राज्यसभा में सुना दिया कि मैं अपना राज्याभिषेक कभी नहीं कराऊँगा क्योंकि यह राज्य सदा से और सदा के लिए प्रभु श्री रामजी का ही है । |
| 534. |
श्री भरतलालजी ने पहले अपने परिवार में, फिर राज्यसभा में, फिर आमसभा में अपने निर्णय से सबको अवगत कराया और सबको अत्यंत खुशी हुई कि वे प्रभु को मनाने और प्रभु का राज्याभिषेक करने श्री चित्रकूटजी जा रहे हैं । |
| 535. |
जब भी अपने जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ पर बोलने की बारी आई श्री भरतलालजी ने मन-ही-मन प्रभु श्री रामजी को याद किया । |
| 536. |
जो जीव नित्य बोलने से पहले प्रभु को याद करते हैं उनसे बोलने में कोई गलती नहीं होती और उनके निर्णय में भी कोई गलती नहीं होती है । |
| 537. |
प्रभु श्री रामजी का संपूर्ण जीवन निर्दोष यानी पूर्णतया दोष रहित है यानी दोष की एक झलक भी कहीं देखने को नहीं मिलेगी । |
| 538. |
श्री भरतलालजी की एक घोषणा ने कि राज्य हमेशा प्रभु श्री रामजी का ही रहेगा, उनके लिए श्री अयोध्याजी में अपार श्रद्धा और आदर का निर्माण कर दिया और उनको भक्तों की गिनती में परम शिखर पर पहुँचा दिया । |
| 539. |
प्रभु के वियोग के कारण जो ग्लानि, विवशता, दुःख और घुटन श्री अयोध्याजी के जन-जन में थी उसके बीच श्री भरतलालजी के प्रभु से मिलने श्री चित्रकूटजी जाने के प्रस्ताव ने सबको आनंदित कर दिया । |
| 540. |
प्रभु अपने भक्त श्री भरतलालजी का मर्म संसार को बताना चाहते थे । प्रभु को पता था कि जब मेरे वियोग में श्री भरतलालजी का व्यवहार जगत देखेगा तो श्री भरतलालजी प्रभु समर्पण के आदर्श बन जाएंगे । क्या होता है प्रभु प्रेम, क्या होती है प्रभु की भक्ति, क्या होता है प्रभु के लिए समर्पण, यह श्री भरतलालजी के चरित्र से जगत को पता चल जाएगा । संपूर्ण रूप से स्व-समर्पण की अदभुत मिसाल श्री भरतलालजी बन जाएंगे । |
| 541. |
प्रभु श्री हनुमानजी अपनी श्रीराम भक्ति के कारण श्रीराममय हो गए । संत कहते हैं कि श्रीराम और श्रीहनुमान एक ही हैं और श्रीहनुमान और श्रीराम एक ही हैं । |
| 542. |
शोक, मोह और भय के सागर में डूबे हुए जीव का खेवनहार एक भक्त बन जाता है जब वह उस जीव को प्रभु की तरफ मोड़ देता है । |
| 543. |
शास्त्र कहते हैं कि संसार सागर में हमारी नौका की दिशा प्रभु की तरफ जाने वाली होनी चाहिए । |
| 544. |
भारतीय संस्कृति की जो विरासत है वह महान नहीं बल्कि महानतम है । |
| 545. |
भारतीय संस्कृति की उन्नति हमें श्री वाल्मीकि रामायणजी और श्री महाभारत का अवलोकन करने पर पता चलती है । |
| 546. |
श्री भरतलालजी की श्री चित्रकूटजी यात्रा में भगवती कैकेयी माता को ले जाने की कोई इच्छा नहीं थी पर प्रभु पूछेंगे तो वह क्या जवाब देंगे इसलिए वे लेकर गए । इससे प्रभु की मर्यादा का पता चलता है और उनकी मर्यादा के कारण अपने भक्तों पर कितनी अदभुत पकड़ होती है, इसका पता चलता है । |
| 547. |
प्रभु श्री रामजी का वनवास जाकर राजत्याग करना तो बहुत महान है पर प्रभु की महानता देखें कि अपने भक्त श्री भरतलालजी के राजत्याग को अपने से भी महान दर्जा दिला दिया । |
| 548. |
जीवन में हमेशा प्रभु दर्शन की लालसा को बड़ी प्रबल बनाकर रखनी चाहिए । |
| 549. |
एक भक्त संसार की नजरों के सामने और एकांत में अपने नियम का दृढ़ता से पालन करता है । एकांत में भी वह अपने नियम का लोप नहीं होने देता । |
| 550. |
प्रभु का कार्य करने का मौका और सौभाग्य जीवन में उत्पन्न हो, ऐसी प्रभु की कृपा मांगनी चाहिए । |
| 551. |
जीवन का सदुपयोग प्रभु के कार्य में हो क्योंकि इससे श्रेष्ठ और कुछ नहीं हो सकता । |
| 552. |
एक पापी और एक महान पुरुष का अंत चार मुट्ठी राख में ही होता है । जो अपने जीवन का सही मूल्यांकन करता है वह अपनी देह का मृत्यु से पहले प्रभु कार्य में लगाकर उसका सदुपयोग कर लेता है । |
| 553. |
लंबा जीवन पाकर भी हम उसे निरर्थक और बेकार कर लेते हैं अगर हम उसमें प्रभु की भक्ति नहीं करते । |
| 554. |
जो भक्ति करके अपने जीवन को प्रभु को अर्पण कर देता है उसका नाम उसके परिवार में नहीं बल्कि पूरे विश्व में अमर हो जाता है । |
| 555. |
शास्त्र कहते हैं कि संसार के भोगों को भोगने वाला याद नहीं रखा जाता पर जिसने भोगों का भक्ति के लिए त्याग कर दिया उसे संसार याद रखता है । |
| 556. |
शास्त्र कहते हैं कि संसार में संग्रह करने वाला याद नहीं रखा जाता पर जो सात्विक कार्य के लिए दान देने वाला होता है उसे याद रखा जाता है । |
| 557. |
शास्त्र उपमा देकर समझाते हैं कि सैकड़ों कमल रोज खिलते हैं और मुरझाते हैं पर जो कमल प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पण हो जाते हैं उनके भाग्य की प्रशंसा स्वर्ग के कल्पवृक्ष भी करते हैं । |
| 558. |
शास्त्र कहते हैं कि एक व्यक्ति अपने जीवन में किस चीज का चयन करता है उससे ही उसकी मानसिकता का पता चलता है । |
| 559. |
जो प्रभु को अपने आचरण से सुख पहुँचाता है, वही सच्चा भक्त होता है । |
| 560. |
दो भक्त जब मिलते हैं तो प्रभु भक्ति और प्रभु प्रेम की ही बातें करते हैं । |
| 561. |
कभी भी विश्व में समता, प्रेम और एकता का संचार होगा तो वह सिर्फ प्रभु की भक्ति से ही संभव होगा । |
| 562. |
प्रभु श्री हनुमानजी जैसा श्रीराम प्रेमी पूरे ब्रह्मांड में कोई नहीं है, यह सभी शास्त्रों का, ऋषियों का और संतों का अंतिम मत है । |
| 563. |
प्रभु के लिए नियमों और व्रतों का कितना तन्मय होकर पालन किया जा सकता है, इसके सर्वोच्च आदर्श श्री भरतलालजी हैं । |
| 564. |
श्री भरतलालजी ने अपने जीवन में पहली बार किसी से याचना की और तीर्थों के राजा श्री प्रयागराजजी से पहली बार जीवन में भिक्षा मांगी कि प्रभु में उनका निर्मल प्रेम दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहे । यही जीवन की सबसे ऊँची मांग होती है और जीवन को धन्य कर देने वाली मांग होती है । |
| 565. |
भक्त जैसे-जैसे भक्ति के साधन की सीढ़ियां चढ़ता जाता है वैसे-वैसे प्रभु प्रेम की नवीन-नवीन अनुभूतियां उसे जीवन में होने लगती है । |
| 566. |
प्रभु से प्रेम होना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है क्योंकि प्रभु सर्वत्र हैं पर प्रेम के अभाव से हमारे सामने प्रकट नहीं होते । यह शक्ति केवल प्रेम में है जो प्रभु को प्रकट कर देती है । |
| 567. |
जिन्होंने भी श्री भरतलालजी पर संशय किया, श्री भरतलालजी ने अपनी प्रभु भक्ति और प्रेम से उनके मन में असीम श्रद्धा जगा दी । यही श्री भरतलालजी की असली कमाई थी । |
| 568. |
श्री भरतलालजी सदैव राज्य सिंहासन पर प्रभु को मानसिक आसन देते और मानसिक रूप से विराजे प्रभु की पूजा करके उनके दास के रूप में राजकाज संभालते । |
| 569. |
वनवास के दौरान जिस वृक्ष के नीचे प्रभु और माता रात्रि विश्राम करते, श्री भरतलालजी को जब उस वृक्ष के दर्शन होते तो वे पूरी रात श्री सीताराम-सीताराम का जप करते हुए उस वृक्ष की परिक्रमा करते हुए काट देते । |
| 570. |
ऋषि श्री भारद्वाजजी ने कितना बड़ा प्रमाण पत्र श्री भरतलालजी को दिया जब उन्होंने कहा कि प्रभु श्री रामजी और भगवती जानकी माता के दर्शन का फल उन्हें मिल रहा है कि आज उन्हें प्रभु के परम भक्त श्री भरतलालजी के दर्शन हो रहे हैं । |
| 571. |
प्रभु के सच्चे भक्त में शक्ति होती है कि वे तीर्थों को भी पवित्र और पावन कर देते हैं । |
| 572. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रतिकूलता की घड़ी में जो दुःख हमारे जीवन में आता है उसे कोई मंगल विधान मानते हुए उस समय प्रभु पर परम विश्वास रखना चाहिए । |
| 573. |
जो प्रभु की भक्ति और प्रेम में डूब जाता है प्रकृति उसकी सेवा करने के लिए लालायित हो उठती है । |
| 574. |
प्रभु अपने भक्त का किसी के हाथों अपमान कभी नहीं सहते । |
| 575. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारे चित्त को शांति और हृदय को ठंडक तब मिलती है जब हमारा मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुक जाता है । |
| 576. |
शास्त्र कहते हैं कि भक्त को प्रभु अपने श्रीचरणों तक पहुँचने से पहले ही उठाकर अपने गले से लगा लेते हैं । |
| 577. |
प्रभु श्री रामजी ने अपनी मानव श्रीलीला में दिखाया कि वे स्वयं तो अपने नियम का पालन करते ही हैं पर दूसरों का नियम नहीं टूटे, इसका भी वे सदैव ध्यान रखते हैं । |
| 578. |
प्राचीन भारत भूमि मर्यादा पालन और भगवत् प्रेम से ओत-प्रोत होने के कारण परम पूजनीय भूमि थी । |
| 579. |
शास्त्रों में वाणी का संयम होने को बहुत बड़ा महत्व दिया गया है । |
| 580. |
रात्रि के अंतिम पहर यानी चौथे पहर में उठ जाना चाहिए । प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी अपनी मानव श्रीलीला में प्रातः तीन बजे उठ जाते थे । |
| 581. |
सारे सांसारिक संग्रह एक दिन नष्ट होते हैं पर हम जो भक्ति की कमाई करते हैं वह कभी नष्ट नहीं होती । |
| 582. |
संसार में हर उत्थान का अंत पतन में होता है और हर संयोग का अंत वियोग में होता है । |
| 583. |
संसार में किसी भी व्यक्ति के साथ हमारा सनातन संबंध नहीं है, सनातन संबंध केवल और केवल प्रभु के साथ ही है । |
| 584. |
धर्म शाश्वत और सनातन है इसलिए सभी सत्पुरुष धर्म का ही अवलंबन जीवन में लेते हैं । |
| 585. |
जब हम अपने कर्म का फल पाने के लिए प्रभु के सामने प्रस्तुत होते हैं तो हमारी तर्कबुद्धि और युक्तियां प्रभु के सामने समाप्त हो जाती हैं । |
| 586. |
पूरे विश्व ने दो भाइयों (प्रभु श्री रामजी और श्री भरतलालजी) के बीच में एक प्रेम की लड़ाई देखी जो राज्य और संपत्ति पाने के लिए नहीं थी बल्कि दूसरे को राज्य और संपत्ति मिले, इसके लिए थी । |
| 587. |
अंत में प्रभु के श्रीकमलचरणों में लोट कर श्री भरतलालजी के अश्रुओं से प्रभु के श्रीकमलचरणों का अभिषेक हुआ और प्रभु के अश्रुओं से उसी समय श्री भरतलालजी के मस्तक का अभिषेक हुआ । |
| 588. |
एक क्षण के लिए प्रभु के पवित्र श्रीकमलचरणों को श्री चरण पादुका पर श्री भरतलालजी ने धारण करवाया और फिर मस्तक पर उन चरण पादुकाओं को लेकर एक महान भक्त और महात्मा श्री अयोध्याजी की तरफ लौट चले । |
| 589. |
प्रभु श्री रामजी ने अपने धर्म के नियम नहीं तोड़े फिर भी श्री भरतलालजी की भक्ति और प्रेम का खूब सम्मान किया और उनकी जग में जय-जयकार करवा दी । |
| 590. |
शास्त्र कहते हैं कि पूर्व का विचार त्याग कर भविष्य की प्रगति के लिए हमें आगे बढ़ना चाहिए । पूर्व में किसने गलती की, कैसी भी गलती की, कितनी भी गलती की उन सबको हमें भुला देना ही श्रेष्ठ होता है । |
| 591. |
जिसने पुरानी बातों को, पुरानी स्मृतियों को भुला दिया वह उसके बोझ से बच जाता है और सदा के लिए सुखी हो जाता है । |
| 592. |
प्रभु श्री रामजी की मानव श्रीलीला में उनके अंतःकरण की निर्मलता और पवित्रता हमें हर जगह देखने को मिलती है । |
| 593. |
प्रभु श्री रामजी ने अपनी मानव श्रीलीला में किसी के प्रति रोष या बदले की भावना कभी भी नहीं रखी । |
| 594. |
संत कहते हैं कि प्रभु के सामने शब्दों से जो नहीं बोला जा सकता, वह हमारे प्रेम अश्रुओं से बोला जा सकता है । |
| 595. |
शास्त्र कहते हैं कि स्वयं के धर्म पालन के लिए हमें सदैव पर्वत की तरह अडिग रहना चाहिए । |
| 596. |
प्रभु प्रेम के कारण श्री भरतलालजी ऐसे महात्मा बन गए जिनकी जीवनचर्या देखकर शास्त्र लिखे जाते हैं । शास्त्रों में क्या लिखा होगा, यह देखने की ऐसे महात्मा को कोई आवश्यकता नहीं होती । |
| 597. |
श्री भरतलालजी पूरी एकाग्रता के साथ सदैव श्रीपादुका में प्रभु का अस्तित्व देखते, श्रीपादुका को चँवर-पंखा करते, उनकी पूजा करते, हर राज्य का कार्य उन्हें निवेदित करते और उनकी आज्ञा लेकर करते । |
| 598. |
श्री भरतलालजी के जीवन का एक ही सूत्र था कि हर कार्य प्रभु का, प्रभु के लिए और प्रभु को समर्पित करके करना । |
| 599. |
श्री भरतलालजी ने प्रभु के लिए बड़े त्याग किए, स्वेच्छा से कठोर नियम और व्रत लिए । उन्होंने पूरे विश्व को एक अदभुत संदेश दिया कि मैं स्वामी नहीं बल्कि सेवक हूँ, मैं स्वतंत्र नहीं बल्कि परतंत्र हूँ, प्रभु के अधीन हूँ, प्रभु से बंधा हुआ हूँ । |
| 600. |
राजलक्ष्मी के पास रहकर भी प्रभु के लिए इतना कठोर नियम पालन करना बहुत-बहुत कठिन होता है जिसमें राजसुख, राजभोग का त्याग करना सबसे कठिन होता है जो श्री भरतलालजी ने अपने प्रभु प्रेम के कारण अपने जीवन में साकार करके दिखाया । |
| 601. |
भक्त अपने इष्टदेव को अपनी भावना से प्रकट करके उनकी निरंतर सेवा करता है । |
| 602. |
दास भाव के बिना आज तक किसी भी भक्त का उद्धार नहीं हुआ है । प्रभु श्री हनुमानजी, श्री भरतलालजी और श्री लक्ष्मणजी इसके जीवंत उदाहरण हैं जिन्होंने प्रभु श्री रामजी के लिए दास भाव रखा । |
| 603. |
प्रभु के लिए पिता भाव, माता भाव, सखा भाव, पुत्र भाव सभी में प्रभु की सेवा अनिवार्य है । पर सेवक भाव यानी दास भाव अन्य भावों से श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें अपने आपको पूरा प्रभु को समर्पित कर दिया जाता है । |
| 604. |
प्रभु के लिए असीम प्रेम और नियम पालन का सही संतुलन प्रभु श्री हनुमानजी के दास भाव में हमें देखने को मिलेगा । इसलिए ही वे इसके आदर्श बन गए । |
| 605. |
शास्त्रों में पावन का अर्थ बताया गया जो खुद तो पवित्रतम हो और अपने समीप आने वाले को भी पवित्र कर दे । इसलिए प्रभु को पतित पावन कहा गया है । |
| 606. |
प्रभु हमारे जीवन में मंगल की सृष्टि और मंगल की वृष्टि करते हैं । |
| 607. |
प्रभु श्री हनुमानजी की श्रीराम भक्ति ऐसी है कि वे सिर्फ संतों के ही आदर्श नहीं बल्कि भक्ति के साधन मार्ग में जो-जो आगे बढ़ता है, उन सबके आदर्श हैं । |
| 608. |
प्रभु श्री हनुमानजी ने अपनी श्रीलीला में दिखाया कि जिसमें प्रभु श्री रामजी को हर्ष हो वही काम वे करते हैं । हमें भी अपने घर का मालिक और देह का मालिक प्रभु को मानना चाहिए और हमारी बुद्धि, वाणी और हाथ वही काम करे जिससे प्रभु को हर्ष हो । |
| 609. |
हमारे हुनर और कला का जीवन में सर्वप्रथम उपयोग प्रभु के लिए ही होना चाहिए । |
| 610. |
पूरा ब्रह्मांड प्रभु की ही संपत्ति है और प्रभु ही उसके एकमात्र मालिक हैं, यह मूल वैदिक सिद्धांत है । |
| 611. |
भक्ति से नियंत्रित जीवन होने से हमारा सबसे जल्दी और सबसे बड़ा विकास होता है । |
| 612. |
नंदीग्राम के महान तपस्वी संत श्री भरतलालजी अगर नहीं होते तो प्रभु प्रेम के मार्ग में हम कितनी प्रगति कर सकते हैं, इसका मापदंड ही हमारे सामने नहीं होता । |
| 613. |
हर पौराणिक घटना और पौराणिक कथा का कोई निश्चित हेतु होता है । |
| 614. |
श्री वाल्मीकि रामायणजी में इतिहास का सत्य लिखा हुआ है और श्री तुलसीदासजी की रामचरितमानसजी में भक्ति का सत्य लिखा हुआ है । भक्ति का सत्य, इतिहास के सत्य से बड़ा होता है, ऐसा भक्तों का मानना होता है । यही कारण है कि आज श्री रामचरितमानसजी सबसे प्रचलित है । |
| 615. |
प्रभु किसी भी चीज में किसी भी शक्ति का आह्वान करके उसे क्रियान्वित कर सकते हैं । प्रभु श्री रामजी ने एक तिनके में ब्रह्मास्त्र का आह्वान किया और वह तिनका श्री जयंत के पीछे ब्रह्मास्त्र बनकर चल पड़ा । |
| 616. |
शास्त्र कहते हैं कि कीर्तन, सत्संग और मंदिर में जाने से ही हम धार्मिक नहीं होते । हमारे भीतर यानी हमारे व्यवहार में धर्म झलकना चाहिए । |
| 617. |
प्रभु के रोष से पूरे ब्रह्मांड और त्रिलोकी में कोई भी बचाने वाला नहीं है, ऐसा देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने श्री जयंत को कहा जब तिनका रूपी ब्रह्मास्त्र उनके पीछे चल पड़ा । |
| 618. |
जग जननी भगवती सीता माता पूरे विश्व को पुत्र रूप में देखती हैं और माता की भूमिका में रहती हैं । इसलिए प्रभु श्री रामजी के कोप से वे ही एकमात्र किसी जीव को बचा सकती हैं । यह सूत्र देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने श्री जयंत को दिया । |
| 619. |
शरणागत को अभय करने का प्रभु का स्वभाव है और शरणागत के सारे पापों का नाश करने का प्रभु का अमर वचन श्रीमद् भगवद् गीताजी में है । |
| 620. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की शक्ति, सामर्थ्य और महत्व का हमें पूर्ण रूप से भान होना चाहिए और कभी भी जीवन में इतनी बड़ी गलती नहीं करनी चाहिए कि प्रभु रुष्ट हो जाएं । ऐसा अवसर कभी भी जीवन में आने नहीं देना चाहिए । |
| 621. |
शास्त्र कहते हैं कि स्वयं के जीवन को संदेह और संचय से अतीत रखना अति आवश्यक है । |
| 622. |
शास्त्रों में बताया गया है कि भगवती जगदंबा माता सबके कल्याण की चिंता करने वाली और सबके लिए मंगल का विधान करने वाली जगत माता हैं । |
| 623. |
शास्त्र कहते हैं कि संतजन हमें मूक संदेश भी देते हैं और यह हमारी जिम्मेदारी होती है कि हम उसके तह तक पहुँचकर उसके सार को समझें । |
| 624. |
शास्त्र कहते हैं कि सबसे अहम बात यह है कि हम कितने एकाग्र होकर भक्ति की साधना करते हैं । |
| 625. |
हम श्री वास्तु शांति के लिए गृह प्रवेश के समय पूजन करते हैं पर प्रभु श्री रामजी की मर्यादा देखें कि जब श्री चित्रकूटजी की पर्णकुटी से वे रवाना हुए तो गृह त्याग पर भी उन्होंने पूजन किया और श्री वास्तु देवता को धन्यवाद दिया कि वहाँ उनका प्रवास इतना सुखमय रहा । |
| 626. |
शास्त्र कहते हैं कि पतिव्रत धर्म के पालन के कारण एक पतिव्रता स्त्री के आशीर्वाद में बहुत प्रभाव और शक्ति आ जाती है । |
| 627. |
भगवती अनुसूया माता ने पतिव्रत धर्म का उपदेश देते हुए भगवती जानकी माता को कहा कि जो नारी अपने पतिव्रत धर्म को संभालती है, वह नारी बहुत उन्नति को प्राप्त होती है । |
| 628. |
पतिव्रत धर्म पालन करने के कारण भगवती अनुसूया माता का अधिकार देखें कि वे पतिव्रत धर्म का उपदेश साक्षात जगत जननी भगवती सीता माता को करने में सक्षम हो गईं । |
| 629. |
भगवती सीता माता ने भगवती अनुसूया माता को कहा कि बचपन में उनकी माता भगवती सुनैना देवी ने उन्हें पतिव्रत नारियों की प्रेरणादायक कथाएं सुनाई जिससे उनका पतिव्रत धर्म में विश्वास एकदम पक्का हो गया । सूत्र यह है कि बचपन में हमें भी अपनी बेटियों को पतिव्रता भगवती जानकी माता, पतिव्रता सावित्री, पतिव्रता अनुसूया माता की कथाएं बार-बार सुनानी चाहिए । |
| 630. |
प्रभु श्री रामजी का शील, स्वभाव और आदर्श एक प्रसंग में देखने को मिलता है जब धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने पर उन्होंने महाराज श्री जनकजी से कहा कि गुरु आज्ञा तो मैंने पूरी कर दी पर विवाह का निर्णय तो केवल मेरे पिताजी ही ले सकते हैं । फिर महाराज श्री जनकजी ने श्री अयोध्याजी अपने दूत भेजे । |
| 631. |
भगवती सीता माता का विवाह धनुष के अधीन था, धनुष प्रभु द्वारा जय किया गया फिर भी जयमाला पिता की आज्ञा के बिना प्रभु ने डालनी स्वीकार नहीं की । |
| 632. |
शास्त्र कहते हैं कि हमें अपने बच्चों के सामने सद्विचार बोलते रहना चाहिए, यह उनके लिए जीवन में प्रेरणा का सूत्र बन जाते हैं । |
| 633. |
भक्ति परिपक्व होने के बाद भक्त जिस दिशा में देखते हैं प्रभु उसी दिशा से आकर उनका कल्याण करते हैं । |
| 634. |
शास्त्र हमें सूत्र देते हैं कि प्रभु को पाने के लिए भक्ति का कोई भी मार्ग चुन लें, अगर हमारी भक्ति में बल हुआ तो प्रभु उसी मार्ग में हमें खड़े मिलेंगे । |
| 635. |
शास्त्र कहते हैं कि श्रेष्ठ भक्त को कभी भी सत्संग, जप, त्याग और पूजा से तृप्ति नहीं होनी चाहिए । |
| 636. |
सूत्र यह है कि भक्ति के साधन से हमें कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए और लगातार साधन करते रहना चाहिए । |
| 637. |
भक्ति करने वाले बड़े-बड़े साधक भी अपने साधन में कमियां देखते हैं और उन कमियों को सुधारने का प्रयास करते हैं और इसी गुण के कारण वे प्रभु के प्रिय बन जाते हैं । |
| 638. |
जो अपने भक्ति के साधन मार्ग पर दृढ़ होते हैं उनको कृतार्थ करने उनके समक्ष प्रभु को आना ही पड़ता है । |
| 639. |
प्रभु एक ही हैं पर हम अपनी रुचि और इच्छा अनुसार उनके अनेक रूपों में किसी एक रूप में आसक्त हो सकते हैं । |
| 640. |
संतजन प्रभु से वरदान मांगते हैं कि वे केवल प्रभु के हैं और प्रभु उनके हैं, यह एकमात्र अहंकार उनके जीवन में बचे । प्रभु के अलावा अन्य कोई भी रूप, जाति, पराक्रम, बुद्धि, बल या प्रतिष्ठा का अहंकार हमारा पतन करने वाला होता है । मैं केवल प्रभु का हूँ और प्रभु मेरे हैं, यह अहंकार मंगलदायी होता है । सूत्र यह है कि प्रभु की महिमा देखें कि प्रभु हेतु जो अहंकार जीवन में होता है उस अहंकार को भी प्रभु ने अत्यंत मंगलकारी बना दिया । |
| 641. |
जीवन में पतन का आरंभ सबसे पहले हमारे दूषित विचारों से होता है । |
| 642. |
सांसारिक विषयों का चिंतन करते-करते हम उन विषयों में फंसते चले जाते हैं । |
| 643. |
शास्त्र कहते हैं कि हर व्यक्ति का अपने कर्तव्यों का दृढ़ता से पालन करना ही उसके जीवन का सबसे बड़ा तप है । |
| 644. |
प्रभु ने अपनी मानव श्रीलीला में कभी भी अपने धर्म और कर्तव्यों का त्याग नहीं किया । |
| 645. |
प्रभु श्री रामजी ने भगवती सीता माता के पतिव्रत धर्म को नमन किया और कहा कि वे उनके कुल और उनके व्यक्तित्व को शोभायमान करने वाली बन गईं हैं । |
| 646. |
तप करने का पहला अर्थ है कि अपनी इंद्रियों का संयम करना । जो इंद्रियों का संयम अनुकूल और प्रतिकूल स्थिति में कर लेता है, वही जीवन में सफल होता है । |
| 647. |
जीव जितनी भक्ति करता है, उसकी प्रभु को पाने की इच्छा शक्ति उतनी ही प्रबल होती जाती है । |
| 648. |
शास्त्र कहते हैं कि मानव शरीर का सर्वोत्तम लाभ उसने लिया जिसने अपने मानव शरीर को प्रतिदिन प्रभु की भक्ति करके सार्थक कर लिया । |
| 649. |
निराशा जीवन में कभी नहीं आनी चाहिए क्योंकि हम प्रभु के अंश और प्रभु की संतान हैं और प्रभु सर्वसामर्थ्यवान हैं । |
| 650. |
अपनी मातृभूमि का कल्याण कैसे हो, यह देखना और इसके लिए प्रयत्न करना शास्त्रों ने हमारा परम कर्तव्य बताया है । |
| 651. |
निष्पाप लोगों को अपनी कृपा से प्रभु हमेशा सुखी करते हैं, यह प्रभु का स्वभाव है । |
| 652. |
पूर्वजों द्वारा जो अच्छे कर्म किए जाते हैं उसका परिचय अगली पीढ़ी को समाज अपने आप बखान करके देता है, यह सिद्धांत है । |
| 653. |
प्रभु के लिए प्रेम, सेवा और त्याग का जो आदर्श श्री भरतलालजी ने स्थापित किया उसके कारण आरंभ में उनका विरोध करने वाले सभी विरोधी भी श्री भरतलालजी के सामने अंत में नतमस्तक हो गए । |
| 654. |
प्रभु अपने भक्तों के संदर्भ में हमेशा सुनना चाहते हैं । जो भी प्रभु से श्री भरतलालजी के गुणों की प्रशंसा करता प्रभु तल्लीन होकर सुनते, यादों में खो जाते और प्रभु के श्रीनेत्रों से अश्रुधारा बहने लगती । |
| 655. |
प्रभु से सदैव मांगना चाहिए कि प्रभु की ऐसी कृपा हो जिससे हमारी बुद्धि और हमारे परिवार के सदस्यों की बुद्धि हमेशा शुद्ध रहे । |
| 656. |
शास्त्र कहते हैं कि बोलते समय शब्दों का सही चयन करना हमें सीखना चाहिए । आज परिवार टूटने का मुख्य कारण अयोग्य शब्दों का प्रयोग करना होता है । |
| 657. |
शास्त्र कहते हैं कि अपने शब्दकोश से कठोर शब्दों का विनाश पहले ही कर देना चाहिए जिससे कि दूसरों के भाव का विनाश उनके द्वारा नहीं हो सके । |
| 658. |
श्री लक्ष्मणजी का भक्ति भाव देखें कि वे अपने आपको प्रभु के श्रीकमलचरणों की सेवा के अधिकारी नहीं मानते, वे प्रभु के श्रीकमलचरणों की रज की सेवा चाहते हैं । |
| 659. |
मेरे भीतर मेरे आराध्य प्रभु विराजमान हैं, यह भाव एक भक्त हमेशा जागृत करके रखता है । |
| 660. |
शास्त्र कहते हैं कि हम सुख को जितना पकड़ना चाहेंगे वह उतना ही हमसे दूर चला जाएगा, यह संसार की रीति है । |
| 661. |
शास्त्र कहते हैं कि दुःख का निर्माण माया रूपी अविद्या करवाती है । मैं और मेरा, इस बात को जिसने मन से त्याग दिया वह इस अविद्या के प्रभाव से मुक्त हो जाता है । |
| 662. |
श्री लक्ष्मणजी ने प्रभु से पूछा कि भक्त को क्या प्राप्त होता है ? इसके जवाब में प्रभु ने कहा कि भक्ति के कारण भक्त को प्रभु ही प्राप्त हो जाते हैं । |
| 663. |
शास्त्र कहते हैं कि अन्य सभी साधन अपने आप में योग्य होने पर भी भक्ति से उनकी तुलना नहीं हो सकती क्योंकि भक्ति का स्थान बहुत-बहुत ऊँचा है । |
| 664. |
शास्त्र कहते हैं कि संत और भक्त को देखकर हमारे अंतःकरण में श्रद्धा जागृत होनी चाहिए क्योंकि वे प्रभु के मार्ग के पथिक होते हैं । |
| 665. |
भक्ति की कितनी बड़ी उपलब्धि है कि भोग उपलब्ध होने पर भी भक्त के मन में वैराग्य जागृत हो जाता है । |
| 666. |
जब हमारे मन की मांग होती है तभी किसी चीज का हमारे जीवन में मूल्य होता है । अगर मन की मांग खत्म हो गई तो मूल्य भी खत्म हो जाता है । भक्ति हमारे जीवन में संसार की मांग को ही खत्म कर देती है । भक्ति होने पर जीवन में प्रभु प्राप्ति की एक ही मांग बचती है । |
| 667. |
प्रभु के नाम, रूप, गुण, लीला और धाम में रुचि होना प्रभु के लिए अनुराग यानी प्रेम होने के लक्षण होते हैं । |
| 668. |
जब प्रभु के लिए जीवन में नियम पालन करने का मन हो, तो यह मानना चाहिए कि प्रभु का अनुग्रह हमें मिल गया है । |
| 669. |
भक्त के सभी संबंध प्रभु से जुड़ जाते हैं और भक्त सभी कार्य प्रभु के लिए करता है, यह भक्ति की परिपक्व अवस्था होती है । |
| 670. |
बचपन में बच्चों का शरीर चंचल होता है पर मन शांत होता है, इसलिए यह भक्ति के लिए श्रेष्ठ समय होता है । बड़े होने पर शरीर भी धीरे-धीरे शिथिल हो जाता है और मन संसार की वासनाओं के कारण चंचल हो जाता है । |
| 671. |
शास्त्र कहते हैं कि जीवन में जब हम प्रभु की भक्ति नहीं करके केवल वासनाओं और इच्छाओं की पूर्ति के लिए क्रिया करते हैं तो वह हमारा सर्वनाश करवाती है । |
| 672. |
कोई भी वरदान एक पापी को प्रभु के कोप से नहीं बचा सकता । प्रभु ने हिरण्यकशिपु का उद्धार करके यह संदेश सबको दिया कि कितने विलक्षण वरदान भी प्रभु के कोप से हमारी रक्षा नहीं कर सकते । |
| 673. |
सभी भगवत् भक्तों में श्री प्रह्लादजी, जो कि दैत्य कुल में जन्में थे, उनका नाम बड़े आदर से लिया जाता है । |
| 674. |
प्रभु के भक्त को कभी अहंकार नहीं होना चाहिए । उत्तम भक्त कभी भी अहंकारी नहीं हो सकता । |
| 675. |
प्रभु का भक्त किसी से द्रोह की भावना नहीं रखता, ऐसा करने पर वह भक्ति के पायदान से फिसल जाता है । |
| 676. |
भक्तों का एक गुण होता है कि वे अपने आपको छोटा-से-छोटा मानते हैं । |
| 677. |
बालकों में हृदय परिवर्तन बहुत जल्दी होता है क्योंकि वे संवेदनशील होते हैं और उनकी बुद्धि स्वच्छ होती है । इसलिए बालकों को प्रभु की भक्ति में लगाना सबसे श्रेष्ठ होता है । |
| 678. |
परिवार का बंधन आसक्ति और प्रेम के कारण बड़ा गहरा होता है । एक सच्चा भक्त ही इस आसक्ति और प्रेम के बंधन को तोड़कर प्रभु की तरफ मुड़ता है । |
| 679. |
किसी को अपने मन, कर्म और वचन से पीड़ा नहीं देने वाले प्राणी पर प्रभु सर्वदा प्रसन्न रहते हैं । |
| 680. |
हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्य प्रभु को प्रसन्न करना होना चाहिए क्योंकि प्रभु के प्रसन्न होते ही सारे पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) हमारे सामने हाथ जोड़कर उपस्थित हो जाते हैं । |
| 681. |
शास्त्र कहते हैं कि बचपन ही भक्ति और ज्ञान के सदुपदेश को ग्रहण करने का सबसे श्रेष्ठ समय होता है । |
| 682. |
प्रभु से रति होनी चाहिए, केवल प्रभु से ही सच्चा प्रेम किया जाना चाहिए । मेरा संसार में कुछ भी नहीं है, मेरे सब कुछ प्रभु हैं, यह भाव जीवन में होना चाहिए । |
| 683. |
अपने शरीर के प्रत्येक अंग को प्रभु की सेवा में लगाने से भक्ति का बड़ा विकास होता है । |
| 684. |
प्रभु का चिंतन हमें हर्षित करने वाला होता है । इसलिए प्रभु को अंतःकरण में बसाकर प्रभु का चिंतन करने से जीव हर्षित होता है । |
| 685. |
जितनी जीवन में भक्ति बढ़ेगी और चित्त प्रभु में लगेगा उतने ही हमें हमारे संचित पापों का नाश होता चला जाएगा । |
| 686. |
प्रभु की भक्ति करने से संसार में आने का यानी हमारे चौरासी लाख योनियों के आवागमन का चक्र ही टूट जाता है । |
| 687. |
प्रभु से निर्मल और निश्छल प्रेम करने से और प्रभु की भक्ति करने से हमें बहुत जल्दी प्रभु की प्राप्ति हो जाती है । |
| 688. |
भक्ति का मापदंड यह है कि हृदय में हर अवस्था में प्रभु पर प्रगाढ़ विश्वास हो, कभी भी अविश्वास की अवस्था जीवन में नहीं आने देनी चाहिए । |
| 689. |
भक्त में भावना होती है कि प्रभु मेरे हैं और मैं केवल प्रभु का हूँ । मैं प्रभु का बालक हूँ इसलिए प्रभु मेरा अहित और अकल्याण कभी नहीं होने देंगे, ऐसा प्रगाढ़ विश्वास भक्ति के कारण हृदय में हो जाता है । |
| 690. |
श्री प्रह्लादजी आज असुर कुल में सबसे महान क्यों हैं ? क्योंकि उन्होंने अपने जीवन से प्रभु का त्याग करने से साफ इनकार कर दिया । |
| 691. |
शास्त्र कहते हैं कि उत्तम भक्त का ध्यान मात्र और मात्र प्रभु के श्रीकमलचरणों पर ही टिका रहता है । |
| 692. |
श्री प्रह्लादजी के लिए शास्त्रों में लिखा है कि जाति से हल्के, बुद्धि से अपरिपक्व, उम्र में छोटे फिर भी अपनी निष्ठा और प्रभु भक्ति के कारण उन्होंने प्रभु को प्राप्त कर लिया । |
| 693. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु प्रभाव में बहुत-बहुत बड़े हैं और स्वभाव से बहुत-बहुत कोमल हैं । |
| 694. |
श्री प्रह्लादजी कहते हैं कि प्रभु केवल अपने भक्तों के हृदय में अपने लिए कितना प्रेम है, यही एक बात देखते हैं । |
| 695. |
प्रभु के लिए शिक्षा, तप, प्रभाव, जाति, मंत्र, पूजा, आचार सब भक्ति के सामने गौण हो जाते हैं । प्रभु केवल एक जीव की भक्ति और प्रेम से ही रीझते हैं । |
| 696. |
भक्ति को प्रभु इतना श्रेष्ठ महत्व देते हैं कि भक्तियुक्त चांडाल को भी प्रभु अपनाने में कभी झिझकते नहीं । |
| 697. |
शास्त्रों का मत है कि जिनकी जिह्वा में प्रभु का नाम हो, हृदय में निश्चल और निष्काम भाव से प्रभु की भक्ति और प्रेम हो, वही जीव सभी जीवों में सर्वश्रेष्ठ होता है । |
| 698. |
शास्त्र यहाँ तक कहते हैं कि जो प्रभु की भक्ति निश्चल और निर्मल मन से करता है वह संसार में रहकर भी देवतुल्य बन जाता है । |
| 699. |
भक्ति का सिद्धांत है कि जो चीज हमें सबसे प्रिय हो, उसे प्रभु को अर्पण करनी चाहिए । |
| 700. |
शास्त्र कहते हैं कि जो जीव भक्ति करके प्रभु के श्रीकमलचरणों से चिपक जाता है, वह संसार रूपी चक्की में पिसने से बच जाता है । |
| 701. |
श्री प्रह्लादजी से असुर बालकों ने पूछा कि आपको नर्क का डर नहीं लगता तो श्री प्रह्लादजी ने कितना मार्मिक उत्तर दिया कि नर्क में भी मैं प्रभु का नाम संकीर्तन करते हुए जाऊँगा । संकीर्तन के प्रभाव के कारण नर्क को भी मेरे प्रभु मेरे लिए श्रीबैकुंठ बना देंगे । |
| 702. |
कलियुग में प्रभु नाम संकीर्तन का इतना महत्व इसलिए है कि प्रभु कहते हैं कि जहाँ चार लोग मिलकर संकीर्तन करते हैं वहाँ उस संकीर्तन का आनंद लेने मैं (प्रभु) अवश्य आता हूँ । |
| 703. |
प्रभु का नाम तो हम सभी लेते हैं पर क्या हमें उस नाम पर विश्वास है ? सूत्र यह है कि जितना प्रभु के नाम में विश्वास होगा उतना ही हमें उसका फल प्राप्त होगा । |
| 704. |
हम प्रभु को उनके नाम की डोर और भक्ति की डोर से प्रेम बंधन में बांधकर अपने पास बुला सकते हैं । |
| 705. |
प्रभु की भक्ति करने से और भक्ति का प्रचार करने से हम प्रभु के श्रीधाम जाने योग्य बन जाते हैं । |
| 706. |
नर्क का प्रावधान भक्ति करने वाले के लिए बिलकुल ही खत्म हो जाता है । |
| 707. |
शास्त्र कहते हैं कि नित्य प्रभु को साष्टांग दंडवत प्रणाम करना चाहिए, नित्य किसी भी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए, नित्य पूजा और मंदिर दर्शन करने चाहिए और नित्य प्रभु कथा का श्रवण करना चाहिए । |
| 708. |
शास्त्र कहते हैं कि मांगने के लिए व्यापारी बनकर प्रभु का स्मरण करने से बहुत ऊँचा फल तब मिलता है जब प्रेम से हम निःस्वार्थ और निष्काम होकर प्रभु का स्मरण करते हैं । |
| 709. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु से मांगने वाला व्यापारी पाकर खुश होता है और उसका हिसाब लगाता रहता है कि कितना मिला । पर प्रभु का प्रेमी भक्त अपना स्व-अर्पण प्रभु को करके खुश होता है और प्रेम का कोई हिसाब नहीं रखता इसलिए प्रेमी भक्त की स्थिति बहुत-बहुत ऊँची होती
है । |
| 710. |
प्रभु से श्री प्रह्लादजी ने मांगा कि ऐसा मन उन्हें दें जिस मन में कभी मांगने की कोई इच्छा ही कभी निर्माण नहीं हो यानी उनकी सारी कामनाओं का ही विसर्जन हो जाए । |
| 711. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारी चार इच्छाएं पूरी होती है तो चौदह नई इच्छाएं पैदा हो जाती हैं । इसलिए कामनाओं के पीछे भागने वाला जीव अपने जीवन से सुख खो बैठता है । |
| 712. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी में श्री अर्जुनजी से प्रभु कहते हैं कि तुम कामनाओं का ऐसा त्याग करो कि उनकी ओर फिर कभी देखो भी मत । |
| 713. |
शास्त्रों में संसार की कामनाओं और इंद्रियों के सुख को कांच का टुकड़ा माना है और भक्ति के कारण मिले प्रभु सानिध्य को अनमोल हीरा माना है । |
| 714. |
शास्त्र कहते हैं कि जितनी हमारी इच्छाएं ज्यादा उतना हमारा सुख कम होगा, जितनी हमारी इच्छाएं कम होगी उतना जीवन में सुख अधिक होगा । |
| 715. |
श्री प्रह्लादजी भक्तों के शिरोमणि हैं इसलिए प्रभु के सामने अत्यंत निःस्वार्थ और निष्काम बने रहे । |
| 716. |
प्रभु के मनुहार करने पर भी अगर भक्त प्रभु से कुछ नहीं मांगता तो अंत में प्रभु को अपनी निर्मल भक्ति का दान देना ही पड़ता है । |
| 717. |
शास्त्र कहते हैं जैसे दुष्ट अपनी बुराइयों का त्याग नहीं करते वैसे ही भक्त कभी अपनी अच्छाइयों का त्याग जीवन में नहीं करते । |
| 718. |
प्रभु ने श्री प्रह्लादजी से कहा कि हिरण्यकशिपु का उद्धार करने की मुझे जरूरत नहीं क्योंकि तुम्हारे जैसे भक्त ने इक्कीस पीढ़ियों का स्वतः ही उद्धार कर दिया । |
| 719. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारा जीवन किस दिशा में जा रहा है इस पर हमें रोज विचार करना चाहिए । |
| 720. |
शास्त्र कहते हैं कि कुमार्ग में हमारा मन कभी भी नहीं जाना चाहिए । शास्त्र तो यहाँ तक कहते हैं कि मानसिक रूप से भी हमारा मन कुमार्ग में नहीं जाना चाहिए । |
| 721. |
शास्त्र कहते हैं कि संसार के सभी जीवों के प्रति हमारे मन में समदृष्टि का भाव होना चाहिए । |
| 722. |
प्रभु की सेवा तन, मन और धन से होनी चाहिए यानी हमारा तन भी प्रभु सेवा में लगे, मन भी प्रभु सेवा में लगे और धन भी प्रभु सेवा में लगे । |
| 723. |
संसार के बाद हमें कहाँ जाना है इसका विचार हमें जीवन में करना चाहिए । प्रभु के श्रीधाम जाना है, यह विचार जीवन में आने पर हम तत्काल भक्ति में लग जाते हैं । |
| 724. |
भारतीय संस्कृति सभी जीवों के चेतन स्वरूप में प्रभु का दर्शन करती है । |
| 725. |
शास्त्र कहते हैं कि दूसरों का अधर्म का बर्ताव हमारे लिए अधर्म करने का बहाना नहीं होना चाहिए । |
| 726. |
जीवन में वानप्रस्थ आने पर अपने वस्त्र और अन्न को सादगीपूर्ण रखना चाहिए और व्यर्थ की लोक चर्चा में समय बर्बाद नहीं करके अपना पूरा समय प्रभु के लिए साधना में लगाना चाहिए । |
| 727. |
हर शास्त्रीय कर्म का शास्त्रों में विधान बताया गया है, उस विधान से करने पर हमें भरपूर लाभ और पुण्य मिलता है । इसलिए मनमानी तरीके से कभी भी शास्त्रीय कर्म नहीं करना चाहिए । |
| 728. |
हमें शास्त्रों का ज्ञाननिष्ठ होना चाहिए यानी शास्त्रों का श्रेष्ठ अध्ययन करके अपनी बुद्धि का परिष्कार करना चाहिए । |
| 729. |
शास्त्रों में मानव के लिए तीन श्रेष्ठ गुण बताए गए हैं कि स्वाद पर विजय प्राप्त करना, वासनाओं को जीतना और जीवन में संयम का पालन करना । |
| 730. |
शास्त्रों में बताया गया है कि जीवन में आलस्य और चंचलता कम होगी तो वह हमारे सतोगुण को बढ़ाने में सहायक बनेगी । |
| 731. |
शास्त्र कहते हैं कि सत्संग का त्याग जीवन में कभी भी नहीं करना चाहिए । |
| 732. |
शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य जितना संग्रह करता है वह अंततः उसके लिए उतना ही कष्टदायक होता है क्योंकि उसके छिनने का भय उसे सदैव के लिए चिंताक्रांत बनाए रखता है । |
| 733. |
शास्त्रों में प्रभु की जगह, धन-संपत्ति की चिंता और चिंतन में जीवन व्यतीत करने को जीवन के पतन के रूप में देखा गया है । |
| 734. |
शास्त्र उपमा देकर हमें बताते हैं कि मधु के संग्रह के कारण मधुमक्खी को अंत में जलना पड़ता है और मधु दूसरे के हाथ में चला जाता है । न तो मधुमक्खी मधु खाती है, न ही किसी को खाने देती है और संग्रह के कारण अंत में वे नष्ट हो जाती हैं । |
| 735. |
जिस दिन जो मिल जाए उसमें संतोष करके उससे काम चला लेने की प्रवृत्ति रखने वाला जीव हमेशा चिंतामुक्त रहता है । |
| 736. |
श्री गजेंद्र मोक्ष कथा का संदेश यह है कि जीवन के आनंद उत्सव में हमें बहुत सारे लोग मिल जाएंगे मगर विपत्ति के समय प्रभु को छोड़कर साथ देने वाला कोई भी नहीं मिलेगा । |
| 737. |
जीवन के सरोवर में आमोद-प्रमोद के बीच काल नाम का ग्राह हमें पकड़ लेता है, तब हमें बचाने वाले केवल प्रभु ही होते हैं । |
| 738. |
बीमारी में परिवार वाले भी हमारा साथ छोड़ देते हैं, हमें स्वयं को वेदना झेलनी पड़ती है, उस समय संभालने वाला कौन है ? केवल प्रभु । |
| 739. |
हमें जीवन के हर उत्सव में किसी का साथ मिल जाता है पर जब हमारी वृद्ध और असहाय अवस्था आती है तो प्रभु के अलावा किसी का साथ नहीं मिलता । |
| 740. |
अनेक जन्मों का ज्ञान और प्रभु स्मरण हमारे भीतर है पर माया से ढका हुआ है । जब प्रभु की कृपा होती है तब जरूरत पड़ने के समय वह जागृत हो जाता है जैसे श्री गजेंद्रजी को जब एकांत मिला तो पूर्व जन्म का उनका ज्ञान जागृत हो गया कि प्रभु ही एकमात्र मेरे हैं । |
| 741. |
पारमार्थिक संपत्ति या कमाई ही ऐसी होती है जो इस जन्म में ही नहीं बल्कि आने वाले बहुत से जन्मों के बाद भी हमारे काम आती है । |
| 742. |
पारमार्थिक कमाई करने के लिए कभी भी जीवन में विलंब नहीं करना चाहिए । |
| 743. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की कृपा करने की शैली और स्वभाव कभी नहीं बदलता, वह सनातन बना रहता है । |
| 744. |
प्रभु आज भी श्री प्रह्लादजी, श्री ध्रुवजी, श्री गजेंद्रजी की शैली में हम पर कृपा करने को तैयार हैं पर जरूरत है कि हमारे भीतर उन भक्तों की तरह भक्ति की भावना और प्रेम की पुकार आ जाए । |
| 745. |
पतित और पापी जीव के लिए प्रभु की कृपा ही जीवन का एकमात्र आधार और सहारा होती है । |
| 746. |
श्री गजेंद्रजी ने अपनी पुकार में प्रभु से कहा कि शरण आने के बाद अगर आप मेरी रक्षा नहीं करेंगे तो मैं नहीं डूबूँगा अपितु आपका शरणागत-वत्सल का नाम डूब जाएगा । |
| 747. |
विपत्ति के समय किसी की तरफ भी आशा एवं सहारा के लिए नहीं देखना चाहिए, केवल प्रभु का ही आसरा जीवन में रखना चाहिए । |
| 748. |
श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवद् गीताजी और श्री रामायणजी से शरणागति के कुछ श्लोक चुन लेने चाहिए और उन्हें रोजाना पढ़ना चाहिए तो वे हमारा कल्याण-ही-कल्याण सुनिश्चित करते हैं । |
| 749. |
पूरे मन से जो प्रभु की शरणागति लेकर प्रभु को विपत्ति में पुकारता है तो प्रभु उसके उद्धार के लिए दौड़ते हुए स्वयं आते हैं, किसी को भेजते नहीं । |
| 750. |
प्रभु हमारे परम विश्वास की परीक्षा जरूर लेते हैं पर उसमें उत्तीर्ण होने के बाद हमें तत्काल अंगीकार करते हैं । |
| 751. |
श्री गजेंद्रजी के उद्धार के लिए प्रभु अपने अद्वितीय वेगवान वाहन श्री गरुड़जी के वेग को भी कम मानते हुए उन पर भी विश्वास नहीं करते हुए स्वयं नंगे पांव दौड़ते हैं । |
| 752. |
अपने भक्त की चिंता प्रभु को सर्वदा और सबसे पहले होती है । |
| 753. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु ने श्री गजेंद्रजी को संकट से ही मुक्त नहीं किया वरन् चौरासी लाख योनियों से भी मुक्त कर दिया । |
| 754. |
शास्त्र कहते हैं कि किसी विशेष जन के आने पर भी प्रभु की पूजा से कभी उठना नहीं चाहिए, पूजा का विश्राम होने पर ही उठना चाहिए । |
| 755. |
हमें सात्विक जीवन व्यतीत करना चाहिए और प्रभु प्रेम से अपने हृदय को भरकर रखना चाहिए । |
| 756. |
श्री गजेंद्र मोक्ष जी का पाठ इतना विशेष इसलिए है कि प्रभु ने स्वयं कहा है कि इसका पाठ करने वाले को संकट से मैं वैसे तारूंगा जैसे गजेंद्रजी को तारा । श्री गजेंद्रजी को बिना खरोंच आए प्रभु ने सुरक्षित ग्राह से बचा लिया । |
| 757. |
भक्तों को बिना दिव्य नेत्र के ही उनकी अंतरात्मा में, स्वप्न में और समाधि अवस्था में प्रभु के दर्शन होते रहते हैं । |
| 758. |
आध्यात्मिक उत्थान के लिए भारतीय परंपरा, जो सनातन है, और हमारे ऋषिजनों का ज्ञान, जो सर्वोच्च है, उसे ही मानना चाहिए और नए-नए प्रयोग कदापि नहीं करने चाहिए । |
| 759. |
हमें प्रभु के दर्शन की कोई जल्दी नहीं होती इसलिए हमारा साधन प्रबल और तीव्र नहीं होता । |
| 760. |
प्रभु के साक्षात्कार के लिए भक्ति करके और प्रभु की शरणागति लेकर जीवन में अपनी आध्यात्मिक योग्यता बढ़ाते चलना चाहिए । |
| 761. |
हमें जीवन में जो भी मदद मिलती है वह प्रभु ही पहुँचाते हैं, निमित्त किसी को बनाते हैं । |
| 762. |
शास्त्र कहते हैं कि श्री समुद्र मंथन का संदेश यह है कि पर्वत को नीचे धारण करने वाले प्रभु, ऊपर पर्वत को संभालने वाले प्रभु, दोनों हाथों से देवताओं और दैत्यों को शक्ति देकर मंथन करवाने वाले प्रभु । सूत्र यह है कि ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं सब तरफ का कार्य करने वाले एकमात्र प्रभु ही होते हैं । |
| 763. |
शास्त्र कहते हैं कि हम आध्यात्मिक ज्ञान पाकर बड़े हो गए और हमारा वह ज्ञान अगर संसार के काम नहीं आया तो ऐसा ज्ञानवृद्ध होना व्यर्थ है । |
| 764. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु निर्बलों के काम आते हैं, पतितों के आंसू पोंछते हैं और गिरे हुए को उठाते हैं । ऐसा करने वाला प्रभु के अलावा और कोई नहीं है । |
| 765. |
संत कहते हैं कि ब्रह्मांड को देने में सबसे ज्यादा सक्षम और सबसे ज्यादा हित करने वाले देव, देवाधिदेव प्रभु श्री महादेवजी हैं । |
| 766. |
संत कहते हैं कि अमृत पीने वाले देवता मात्र देव कहलाते हैं पर अमृत देकर जहर पीने वाले देवाधिदेव प्रभु श्री महादेवजी कहलाते हैं । |
| 767. |
शास्त्र कहते हैं कि अपने हृदय के लिंग को ऐसा निर्मल बनाएं कि उस लिंग में प्रभु श्री महादेवजी का वास हो । |
| 768. |
शास्त्र कहते हैं कि जीवन में सिद्धांतवादी होना चाहिए और अपने सिद्धांतों से दाएं-बाएं कभी नहीं जाना चाहिए यानी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए । |
| 769. |
श्री समुद्र मंथन में एक समान पुरुषार्थ करने पर भी देवताओं को अमृत मिला और दैत्यों को कुछ नहीं मिला क्योंकि प्रभु देवताओं के साथ थे । इसका सूत्र यह है कि फल सदैव प्रभु ही दिलाते हैं, हमारा पुरुषार्थ नहीं । इसलिए जीवन में प्रभु को अपने पक्ष में रखना चाहिए । |
| 770. |
अपने कर्म का अहंकार कभी नहीं रखना चाहिए क्योंकि पसीना बहाने से ही फल नहीं मिलता । फल प्रभु कृपा से मिलता है इसलिए संत पुरुष कर्मफल को कृपा-फल कहते हैं । |
| 771. |
जीवन के संग्राम में विजयी होने के लिए प्रभु को अपने अनुकूल रखना पड़ता है । |
| 772. |
कोई कितना भी पतित या पापी हो पर प्रभु की भक्ति करने से धीरे-धीरे उसका भाग्योदय होता है । |
| 773. |
शास्त्रों में भाग्योदय की कुंजी प्रभु की आराधना को ही माना गया है । |
| 774. |
हम थोड़ी-थोड़ी प्रभु की सेवा करना प्रारंभ करते हैं तो अधिक सेवा करने का सौभाग्य भी प्रभु हमें प्रदान करते हैं । |
| 775. |
रोज थोड़ी-थोड़ी भक्ति करके पुण्य इकट्ठा करते रहने से एक समय में बहुत बड़ी मात्रा में पुण्यों का संग्रह हो जाता है । |
| 776. |
शास्त्र हमें सचेत करते हैं कि एक बार प्रभु की कृपा हो गई तो हमेशा होती रहेगी, यह नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि हमारी योग्यता गिरेगी तो हम प्रभु की कृपा को खो देंगे । |
| 777. |
बुढ़ापे से पहले जीवन में सत्कर्म कर लेने चाहिए क्योंकि बुढ़ापा आने पर कथा श्रवण के लिए कानों की क्षमता नहीं होती, तीर्थ जाने के लिए पैरों की क्षमता नहीं होती, दान देने के लिए परिवार की नई पीढ़ी के सदस्यों की अनुकूलता नहीं मिलती । |
| 778. |
पुण्य कर्म करते हुए एक पुण्य का कवच हमें निर्माण करना चाहिए जिसके भीतर हम सुरक्षित रह सकें । |
| 779. |
एक भक्त किसी परिवार में जन्म लेता है तो उस कुल के सभी पितर तृप्त हो जाते हैं, पूरा कुल ही पवित्र हो जाता है । |
| 780. |
हम प्रभु को संसार में ढूँढ़ते हैं पर प्रभु हमारे अंतःकरण में ही विराजमान हैं । |
| 781. |
हमारे आध्यात्मिक संकल्प को प्रभु स्वयं सहयोग देकर पूर्ण करते हैं । |
| 782. |
उत्तम भक्त प्रभु की सभी सेवा का कार्य स्वयं ही करना चाहता है । |
| 783. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के आगे न गुरु, न पिता, न माता प्रधान हैं क्योंकि प्रभु सबसे बड़े और सर्वोपरि हैं । |
| 784. |
राजा श्री बलिजी का जगत को संदेश है कि कोई गुरु प्रभु से बड़ा नहीं हो सकता, उन्होंने प्रभु के लिए अपने गुरु वचन को भंग कर दिया क्योंकि उनके गुरु ने प्रभु से विपरीत, धर्म से विपरीत आचरण उन्हें बताया । |
| 785. |
शास्त्र कहते हैं कि जो गुरु प्रभु से हमें मिला दे वही गुरु कहलाने योग्य है । |
| 786. |
शास्त्र कहते हैं कि सत्य और धर्म का पालन जो करता है वह हर स्थिति में निर्भय रहता है । इसके विपरीत जो सत्य और धर्म के विरुद्ध आचरण करता है वह जीवनभर भय की अवस्था में रहता है । |
| 787. |
जब वामन अवतार में प्रभु ने राजा श्री बलिजी को पूछा कि मैं तीसरा पग कहाँ रखूँ तो उनकी बुद्धि को भगवती सरस्वती माता ने प्रेरणा दी और उन्होंने कहा कि मेरे मस्तक पर तीसरा पग धर दें । प्रभु इस भाव को देखकर गदगद हो गए । |
| 788. |
संत विनोद में कहते हैं कि प्रभु का प्रेम करने का तरीका यही है कि जीवन में आपत्ति देना, कष्ट देना और फिर देखना कि वह भक्त कितना प्रभु का चिंतन करता है, कितना प्रभु से जुड़ाव रखता है । जो ऐसा करने में सफल हो जाता है उसका प्रभु परम मंगल, परम कल्याण और पूर्ण उद्धार तत्काल सुनिश्चित कर देते हैं । |
| 789. |
जैसे-जैसे हमारे जीवन में प्रभु का स्मरण और प्रभु की भक्ति बढ़ती जाती है वैसे-वैसे हम प्रभु को परम प्रिय होते चले जाते हैं । |
| 790. |
संत कहते हैं कि प्रभु भी अपने भक्तों की सेवा करने में कभी पीछे नहीं रहते । प्रभु ने पांडवों की, राजा श्री बलिजी की कितनी सेवा करके दिखाई, यह मिसाल जग−जाहिर है । |
| 791. |
कालचक्र के कारण संसार की व्यवस्था बार-बार बिगड़ती है, इसलिए युग-युग में प्रभु व्यवस्था कायम रखने के लिए अंश अवतार या पूर्ण अवतार लेते हैं । |
| 792. |
शास्त्र कहते हैं कि किसी भी बात की एक मर्यादा से बाहर जाकर कभी भी आलोचना नहीं करनी चाहिए । |
| 793. |
संत कहते हैं कि प्रभु के अलग-अलग अवतार में वराह रूप, मत्स्य रूप आदि में आने का एक प्रयोजन यह बताने का है कि निंदनीय माने जाने वाले प्राणियों में भी वे ही विराजमान हैं । |
| 794. |
शास्त्र कहते हैं कि हम प्रभु को एक रूप में बांध नहीं सकते क्योंकि प्रभु अनेकों रूप लेने के लिए स्वतंत्र हैं । हमें जो प्रिय रूप लगता है हम उसकी आराधना कर सकते हैं पर प्रभु के हर रूप को हमें स्वीकार करना चाहिए । |
| 795. |
सनातन धर्म में प्रभु का कोई एक स्थाई रूप नहीं है क्योंकि रुचि अनुसार हम प्रभु के प्रिय रूप की आराधना कर सकें, प्रभु की रुचि अनुसार भक्ति कर सकें, इस तथ्य को पूर्ण करते हुए प्रभु नाना रूप में, नाना श्रीलीलाएं करके हमें ऐसा सौभाग्य देते हैं । |
| 796. |
सनातन धर्म महासागर स्वरूप है । विश्व में कोई ऐसा आध्यात्मिक सिद्धांत नहीं मिलेगा जिसका सनातन धर्म में प्रतिपादन नहीं हुआ । |
| 797. |
सनातन धर्म का अंतिम सत्य एक है कि परमात्मा विभिन्न रूपों में होते हुए भी एक ही हैं । |
| 798. |
जिसको भक्ति के कारण सर्वत्र एक ही प्रभु के दर्शन होते हैं और विभिन्न रूपों में भी एक ही प्रभु के दर्शन होते हैं वही सर्वश्रेष्ठ भक्त कहलाने का अधिकारी होता है । |
| 799. |
हमको अपनी भक्ति इतनी प्रबल रखनी चाहिए कि प्रभु हमें अपने किसी कार्य के लिए चुनें, इसकी तैयारी हमारे मन में सदा होनी चाहिए । |
| 800. |
वैदिक अनुष्ठान में शुद्ध विधि, शुद्ध सामग्री, शुद्ध मंत्र, शुद्ध धन होने पर ही प्रयोजन सफल होता है । इसलिए सकाम कर्मकांड में शुद्धता का विशेष ध्यान रखना अनिवार्य और उपयोगी होता है तभी हमें सफलता मिलती है । |