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BHAKTI VICHAR CHAPTER NO. 47

प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा - चन्द्रशेखर कर्वा
हमारा उद्देश्य - प्रभु की भक्ति का प्रचार
No. BHAKTI VICHAR
001. गरीबी में भी अपने पिता के सत्य वचन का पालन करने के कारण नाभागजी पर प्रभु श्री महादेवजी इतने प्रसन्न हुए कि उनकी कृपा प्रसादी से नाभागजी की अगली पीढ़ी में राजा श्री अम्बरीषजी हुए जो चक्रवर्ती सम्राट हुए और प्रभु के परम भक्त हुए ।
002. राजा श्री अम्बरीषजी नित्य प्रभु की सेवा खुद अपने हाथों से करते, प्रभु के मंदिर को खुद राजा होते हुए भी बुहारी लगाते । राजा श्री अम्बरीषजी की खुद की सेवा में हजारों नौकर-चाकर थे पर प्रभु की सेवा वे स्वयं अपने हाथ से करते, किसी से नहीं करवाते थे ।
003. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की सेवा अपने शरीर से ही होनी चाहिए, मंदिर बुहारना, प्रभु के लिए जल लाना, प्रभु के पूजा की परिचर्या तैयार करना, यह सब अपने हाथों से होना चाहिए । प्रभु की सेवा में अपना तन, मन और धन तीनों लगाना चाहिए ।
004. अपने शरीर की हर इंद्रियों को प्रभु के एक-एक काम में लगाना चाहिए । आँखों को प्रभु के दर्शन में, हाथों को प्रभु की पूजा में, कानों को प्रभु की कथा श्रवण में और पैरों को प्रभु की परिक्रमा करने में लगाना चाहिए ।
005. राजा श्री अम्बरीषजी प्रभु के इतने श्रेष्ठ भक्त हुए कि प्रभु श्री रामजी ने उनके वंश को चुनकर अवतार लिया और प्रभु श्री विष्णुजी ने अपना दिव्य चक्रराज श्री सुदर्शन चक्र को नित्य श्री अम्बरीषजी की रक्षा में लगाए रखा ।
006. एकादशी व्रत को सभी शास्त्रों में यानी श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीदेवी भागवतजी, श्रीशिव महापुराणजी में सर्वसम्मत रूप से सबसे बड़ा व्रत माना गया है । इसलिए हर वैष्णव को एकादशी व्रत जरूर करना चाहिए ।
007. अगर हमारा भक्ति भाव प्रबल होता है तो हम अपनी क्षमता से ज्यादा प्रभु के लिए त्याग करते हैं ।
008. प्रभु के लिए कड़ाई से नियम पालन करने वालों का ही नाम शास्त्रों में आता है ।
009. जब ऋषि श्री दुर्वासाजी ने कृत्या राक्षसी का निर्माण किया तो श्री अम्बरीषजी एक पग भी पीछे नहीं हटे क्योंकि उन्हें परम विश्वास था कि प्रभु चाहेंगे तो मेरी रक्षा किसी भी शक्ति से हो जाएगी और प्रभु के होते हुए कोई शक्ति मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी । प्रभु पर परम विश्वास के कारण उन्होंने न प्रतिकार किया, न पलायन किया बस आँखें बंद करके प्रभु का ध्यान करने लगे ।
010. जिस दिन हमसे कोई गलती हो उस दिन यह जांच जरूर करनी चाहिए कि क्या घर के श्री ठाकुरबाड़ी के प्रभु हमें देखकर खुश हैं जितना कि रोज रहते हैं ।
011. सारा संसार प्रभु के श्रीहाथों में है पर प्रभु अपने आप को स्वतंत्र नहीं मानते, अपने प्रिय भक्तों के अधीन मानते हैं ।
012. प्रभु ने श्री दुर्वासा ऋषि से वह अमर वाक्य कहा कि आप मेरा अपमान करते तो मैं माफ कर देता पर आपने मेरे भक्त का अपमान किया जो मैं कभी माफ नहीं करता क्योंकि मेरी भक्ति सरल नहीं है, बड़ी दुर्लभ है ।
013. प्रभु बड़े गर्व से श्री दुर्वासा ऋषि से कहते हैं कि आज तक मेरे किसी भी सच्चे भक्त ने अपनी भक्ति को कभी भी संसार के भोग मांगकर नहीं भुनाया ।
014. प्रभु कहते हैं कि मैं अपने भक्तों से आग्रह पर आग्रह करता हूँ कि कुछ तो मेरे से मांग लो पर मेरे भक्त मेरे चरणों की सेवा को छोड़कर, मेरे नाम कीर्तन को छोड़कर, मेरे प्रेम को छोड़कर और मेरी सेवा के अधिकार को छोड़कर मेरे से कभी कुछ नहीं मांगते ।
015. श्री दुर्वासा ऋषि से प्रभु वह अमर वाक्य कहते हैं कि मेरे अंतःकरण को खोलकर आप देखेंगे तो उसमें मेरे भक्त के ही दर्शन होंगे, ठीक वैसे ही जैसे मेरे भक्त के अंतःकरण में मेरे दर्शन होते हैं ।
016. प्रभु कहते हैं कि श्री अम्बरीषजी जैसी प्रभु भक्ति, प्रभु सेवा और प्रभु निष्ठा के कारण एक पूरा वंश ही पवित्र हो जाता है ।
017. भक्ति के कारण सद्गुणों का विकास हमें सभी भक्तों के चरित्र में देखने को मिलता है ।
018. भक्ति करते हुए हमें देखना चाहिए कि हमारी अच्छाइयां जीवन में बढ़ रही हैं कि नहीं और हमारी बुराइयां जीवन में कम हो रही हैं कि नहीं ।
019. संत कहते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु ने अच्छाइयों की सूची दी है । यह सूची यह देखने के लिए दी है कि हमारी भक्ति के कारण हम कितनी अच्छाइयां अपने जीवन में ला पाते हैं और इस तरह हमारी भक्ति कितनी सफल होती है ।
020. संत कहते हैं कि जैसे हम साल में एक बार अपने कारोबार का लेखा-जोखा बनाते हैं वैसे ही हमें हर जन्मदिन पर अपने चरित्र का लेखा-जोखा बनाना चाहिए । बीते वर्ष में हमारी अच्छाइयों और बुराइयों का हिसाब हमें रखना चाहिए कि पिछले वर्ष में कितनी अच्छाइयां बढ़ी और कितनी बुराइयां कम हुईं ।
021. श्रीग्रंथ हमारे जीवन परिवर्तन के लिए हमें मार्ग दिखाने के लिए होते हैं ।
022. भगवत् साधन करने वाले को चाहिए कि वह सदा संसार के आकर्षण से सावधान रहे ।
023. संत कहते हैं कि संसार के आकर्षण के बीच यह मानव जीवन हमें संसार भोगने के लिए नहीं बल्कि प्रभु प्राप्ति के साधन के लिए मिला है ।
024. आज भी बड़े श्रेष्ठ महात्मा हिमालय क्षेत्र में रहते हैं जिनका नाम तक किसी को नहीं पता, न उनका रूप किसी ने देखा है ।
025. प्रभु की चर्चा होते ही हाथ जोड़ने की मुद्रा आ जाए, जिससे प्रभु को मानसिक प्रणाम किया जा सके, यह सभी श्रेष्ठ भक्तों के जीवन में देखने को मिलता है ।
026. शास्त्र कहते हैं कि जीवन का सबसे पहला और सबसे आवश्यक संस्कार हमारी वाणी का संस्कार होना चाहिए यानी हमारी वाणी मीठी बोले ।
027. शास्त्र कहते हैं कि वाणी के गलत प्रयोग से परिवार, संस्था और संगठन टूट जाते हैं ।
028. हमारे मन का अच्छा और बुरा परिणाम हमारे शरीर पर होता है । इसलिए मन को प्रभु में लगाकर रखना चाहिए तो हमारा शरीर भी ओजस्वी रहता है ।
029. शास्त्र कहते हैं कि मन से प्रभु का चिंतन करने से हमारे शरीर में आभा आती है और वह निर्विकार रहता है ।
030. शास्त्र कहते हैं कि पुण्य इकट्ठा करने में कभी भी संतोष नहीं करना चाहिए । जीवन में जितना हो सके भक्ति का साधन, नाम जप और दान करते चलना चाहिए ।
031. शास्त्र कहते हैं कि बच्चों में अच्छे संस्कारों को पुष्ट करने के लिए उन्हें जीवन में हमारे महापुरुषों की प्रेरणादायक कथा सुनानी चाहिए ।
032. हर काल, हर देश में अनुकरण करने योग्य आदर्श जीवन हमें श्रीराम कथा में प्रभु श्री रामजी के श्रीचरित्र के चिंतन से मिलता है ।
033. संत मानते हैं कि दुष्टों के विनाश के लिए नहीं बल्कि मर्यादा की लोक शिक्षा के लिए प्रभु श्री रामजी का अवतार हुआ ।
034. एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ व्यवहार कैसा हो यह एक सार्वजनिक विषय है, जिसे संसार के हर व्यक्ति को जानने की जरूरत है । इसको सिखाने के लिए प्रभु श्री रामजी आए जिन्होंने अपनी श्रीलीला में माता, पिता, पत्नी, भाई, सखा, शत्रु सबके साथ अद्वितीय संबंध निभाकर दिखाया । प्रभु श्री रामजी हमें सिखाकर गए कि भाई-भाई, पुत्र-पिता, पुत्र-माता, पति-पत्नी, भगवान-भक्त, भगवान-पतित, भगवान-शरणागत, मित्र, शत्रु और प्रजा से कैसा रिश्ता रखना चाहिए ।
035. शास्त्र कहते हैं कि लोभ की कोई सीमा नहीं होती, वह अनेक बार जीव से पाप कर्म करवा ही लेता है ।
036. आज के आधुनिक साहित्य में भी हमें श्री रामायणजी और श्री महाभारतजी के ही सूत्र देखने को मिलते हैं ।
037. प्रभु श्री रामजी ने अपने मानव श्रीचरित्र में दिखाया कि काम, क्रोध, मद और लोभ का छींटा तक उनके श्रीचरित्र में नहीं है । उनका जीवन परम आदर्श युक्त जीवन है जिसमें निर्मलता, विमलता, शालीनता और धर्म भरा हुआ है ।
038. संत कहते हैं कि श्री वाल्मीकि रामायणजी पढ़े बिना श्रीराम कथा में पूरा प्रवेश हम नहीं कर पाते । श्रीराम कथा की गहराई में उतरने के लिए श्री वाल्मीकि रामायणजी का अवलोकन अत्यंत आवश्यक है ।
039. हमारे जीवन में कभी भूल न हो, अगर हो तो उस भूल से हमारे जीवन को संभालने के लिए हमें जीवन में प्रभु कृपा की नितांत आवश्यकता होती है ।
040. संत कहते हैं कि जो श्रीराम चरित्र का एक अंश भी अपने जीवन में उतारने में सफल हो जाता है, वह महात्मा तुल्य हो जाता है ।
041. शास्त्रों का कितना बड़ा आश्वासन है कि पापी का उद्धार हो सकता है क्योंकि पाप को भक्ति से धोया जा सकता है ।
042. साधन करने वाले को अपने धार्मिक साधन का आधार होता है पर पतितों और पापियों को केवल प्रभु की कृपा और दया का ही आधार होता है ।
043. प्रभु श्री परशुरामजी के प्रकरण में प्रभु श्री रामजी ने शूरवीर होने के बाद भी विनम्रता का कितना बड़ा उदाहरण प्रस्तुत किया, यह विनम्रता की एक अदभुत मिसाल है ।
044. प्रभु श्री रामजी ने कितनी सहजता के साथ महल, राज्य और संपत्ति सब छोड़कर वनगमन स्वीकार किया । इतिहास में त्याग का यह एक बेमिसाल और स्वर्णिम उदाहरण है ।
045. प्रभु के परम प्रिय होने के कारण और प्रभु की भक्ति करने के कारण श्री भरतलालजी को संतों की मंडली में जो गौरव मिला वह अन्य किसी को नहीं मिला ।
046. जीवन में व्रतों का पालन कितना उच्चकोटि का होना चाहिए इसका आदर्श श्रीराम परिवार है । भगवती जानकी माता, श्री भरतलालजी और श्री लक्ष्मणजी ने प्रभु श्री रामजी के लिए नियम और व्रत लेकर स्वर्णिम आदर्श प्रस्तुत किया ।
047. चाहे श्री समुद्रदेवजी का सारा जल सूख जाए, चाहे श्री हिमालयजी पिघल जाए तो भी प्रभु श्री रामजी ने दिखाया कि सत्पुरुष कभी भी अपना धर्म नहीं छोड़ते ।
048. प्रभु श्री रामजी की अतुलनीय विशेषता यह है कि न उन्होंने धर्म छोड़ा और न उन्होंने प्रेम छोड़ा । जब श्री भरतलालजी श्री चित्रकूटजी गए तो प्रभु ने अपने धर्म का पालन किया, वापस नहीं लौटे मगर श्री भरतलालजी का प्रेम से भरपूर समाधान भी किया ।
049. श्री भरतलालजी ने अपना प्रभु प्रेम का दर्शन कराते हुए वह करके दिखाया जो दुनिया ने कभी नहीं देखा था । दुनिया ने आज तक किसी की भी पादुका को राज्य करते कभी नहीं देखा था ।
050. श्री शत्रुघ्नलालजी को प्रभु ने अपनी शपथ देकर कहा कि चौदह वर्षों तक कोई भी भगवती कैकेयी माता का अनादर नहीं करे इसकी जिम्मेदारी उनको सौंपी । प्रभु की महानता देखें कि इतना निश्छल, इतना पवित्र अंतःकरण जिसमें कोई द्वेष भगवती कैकेयी माता के लिए कहीं भी नहीं था यानी हृदय के किसी कोने में नहीं था ।
051. श्री रामचरितमानस में इतनी गहराई में संतजन उतर जाते हैं कि वे दर्शन करते हैं कि प्रभु के जन्मोत्सव में मैं था, उत्सव में भाग ले रहा था, विवाह उत्सव में मैंने यह कार्य किया, वन गमन के समय में राजमहल में नौकर के रूप में था और खूब रोया, श्री भरतजी जब प्रभु को मनाने गए तो मैं उनके साथ श्री चित्रकूटजी गया, जब श्रीराम राज्य की स्थापना हुई तो मैं एक सुखी प्रजा के रूप में वहाँ था ।
052. एक-एक मानवीय सद्गुणों की पराकाष्ठा तक का निर्वाह प्रभु श्री रामजी के श्रीचरित्र में देखने को मिलता है ।
053. सारी विपत्ति और आपदाओं को झेलकर अपने स्वधर्म का पालन और कर्तव्य का पालन करना सबसे बड़ा तप है - यह प्रभु श्री रामजी ने करके दिखाया ।
054. संत मानते हैं कि प्रभु श्री हनुमानजी ने लंका-दहन करके राक्षसों में भय पैदा कर दिया, उनकी सेना का मनोबल तोड़ दिया और लंका का आधा युद्ध लंका-दहन से ही प्रभु श्री हनुमानजी ने जीत लिया ।
055. प्रभु ने उऋण नहीं होने की बात कहकर प्रभु श्री हनुमानजी के आगे प्रेम भाव की पराकाष्ठा कर दी, फिर भी अहंकार नहीं आए इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी त्राहि-त्राहि कहकर प्रभु के श्रीकमलचरणों में लोट गए । प्रभु श्री हनुमानजी का मत था कि बल की परीक्षा राक्षसों ने ली पर अहंकार की परीक्षा प्रभु स्वयं ले रहे हैं । इसमें उत्तीर्ण होने का एक ही उपाय है - प्रभु की कृपा और दया ।
056. शास्त्रों का सूत्र यह है कि प्रभु की कृपा के बिना जीवन से अहंकार गल नहीं सकता और जीव अहंकार रहित हो नहीं सकता ।
057. पत्थर जड़ होते हुए भी प्रभु का नाम लिखने पर कैसे तैरते हैं, यह दिखाना श्री सेतुबंध का एक हेतु था ।
058. श्री भरतलालजी इतने दृढ़ प्रतिज्ञ थे जब उन्होंने कहा कि एक दिन का भी चौदह वर्षों बाद प्रभु के आने में विलंब हुआ तो वे अग्नि प्रवेश कर लेंगे । इस कारण प्रभु को पुष्पक विमान लेकर लंका विजय के बाद तुरंत श्री अयोध्याजी आना पड़ा ।
059. लंका विजय के बाद श्री विभीषणजी के आग्रह पर भी प्रभु ने स्वर्ण की लंका को त्यागा, उसका अतिक्रमण नहीं किया, यह दिखाने के लिए कि प्रभु को अपनी जन्मभूमि ही सबसे प्रिय और स्वर्णतुल्य लगती है ।
060. श्रीराम परिवार और श्रीशिव परिवार के श्रीचरित्र का गान ब्रह्मांड में सर्वदा होता रहेगा क्योंकि यह दोनों अदभुत और प्रेरणादायक परिवार हैं ।
061. प्रभु श्री रामजी ने अपनी मानव श्रीलीला में दिखाया कि अपने धर्म पालन के लिए वे जितने सावधान रहते थे उतने ही दूसरा भी धर्म का पालन करे, इसके लिए भी सदा आग्रही रहते थे ।
062. संत कहते हैं कि भक्ति से प्रभु की उपासना करने वाला स्वयं उपासक स्वरूप हो जाता है ।
063. भक्ति की भावना हमारे मानव जीवन को सदा के लिए हरा-भरा रखती है ।
064. प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी का जो मानव श्रीचरित्र है वह पूर्ण भावना प्रधान श्रीचरित्र है ।
065. धर्म विरुद्ध आचरण करने वाला कभी भी प्रभु की कृपा नहीं पाता है, यह सिद्धांत है ।
066. प्रभु श्री रामजी एवं प्रभु श्री कृष्णाजी का ध्यान हमेशा अपने स्वधर्म और कर्तव्य की तरफ ही रहा ।
067. पूर्ण मानवीय मर्यादा में रहकर प्रभु श्री रामजी ने अपने अवतार का पूरा कार्य संपादित किया ।
068. प्रभु श्री रामजी ने ऐसा कोई कार्य नहीं किया जो मानव के लिए आज अनुकरणीय नहीं हो ।
069. प्रभु श्री रामजी के श्रीकमलचरणों का हृदय में ध्यान करते हुए श्रीमद् भागवतजी महापुराण में प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि उन श्रीचरणों की रज का भी ध्यान करने मात्र से ही हम धर्म मार्ग पर आगे बढ़ जाते हैं ।
070. प्रभु श्री रामजी द्वारा जो-जो किया गया वह सबके लिए प्रेरणादायक है ।
071. संत कहते हैं कि प्रभु श्री रामजी का अनुसरण करने से श्रीनारायण तत्व का विकास हमारे अंदर हो जाता है ।
072. संसार को सिखाने का सबसे उत्तम ढंग खुद करके दिखाना होता है और प्रभु श्री रामजी ने ऐसा ही करके दिखाया ।
073. संत कहते हैं कि धर्म को जानने के लिए पोथियां पढ़ने की जरूरत नहीं है । श्रीराम कथा के माध्यम से प्रभु श्री रामजी का चिंतन जीवन में कर लें तो जीवन ही धर्ममय हो जाएगा ।
074. शास्त्र कहते हैं कि ब्रह्मांड के सर्वश्रेष्ठ राजा, जो आज तक हुए हैं और जो आगे होंगे, वे राजा श्री रामजी ही हैं ।
075. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि जितने सुख राजा श्री ययाति ने भोगे उतने किसी ने भी नहीं भोगे होंगे पर उनका अंतिम निष्कर्ष यह था कि सुख भोग में तृप्ति नहीं है, तृप्ति संयम रखने में ही है ।
076. यह सूत्र है कि जीवन में तृप्ति का साधन भोग नहीं अपितु संतोष है ।
077. शास्त्र कहते हैं कि सुख का जो रास्ता है वह शरीर के संयम और मन के संतोष से ही निकलता है ।
078. शास्त्रों के मार्गदर्शन में और शास्त्रों के प्रवाह से जो नहीं सीख पाता, उसका जीवन ही निरर्थक हो जाता है ।
079. शास्त्र एक सूत्र देते हैं कि अपनी कीर्ति का बखान अपने मुख से करने से अपने स्वयं के पुण्य नष्ट होते हैं ।
080. श्री महाभारतजी के महासागर में पांडव कहीं भी, कभी भी डूब सकते थे पर सिर्फ प्रभु श्री कृष्णजी की शरणागति लेने के कारण वे बिना परिश्रम तर गए ।
081. राजा श्री परीक्षितजी चार दिनों से अन्न-जल लिए बिना प्रभु की कथा सुन रहे थे । जब प्रभु श्री कृष्णजी की कथा विस्तार से सुनाने का समय आया तो प्रभु श्री शुकदेवजी ने उन्हें अन्न-जल ग्रहण करने का आग्रह किया तो राजा श्री परीक्षितजी ने उन्हें कथामृत पिलाने का ही आग्रह किया ।
082. प्रभु श्री शुकदेवजी जैसे वक्ता और कथा के प्यासे राजा श्री परीक्षितजी जैसे श्रोता को पाकर सभी ऋषिगण और संतजनों ने साधु-साधु और धन्य-धन्य कहकर भरपूर आशीर्वाद दिया ।
083. राजा श्री दशरथजी और श्री वासुदेवजी दोनों सत्यनिष्ठ, सत्यवादी और सत्य के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहने वाले थे । उनके सत्य और उनकी प्रेम निष्ठा के कारण ही प्रभु ने श्रीराम बनकर और श्रीकृष्ण बनकर उनके घर अवतार लिया ।
084. श्री वासुदेवजी के प्रसंग से सूत्र निकलता है कि जिन्होंने प्रभु को अपने माथे पर धारण करके चलना आरंभ कर लिया उनके लिए संसार की हर बेड़ियां और हर द्वार अपने आप खुल जाते हैं ।
085. शास्त्र कहते हैं कि संताप में या चिढ़कर भी कभी भी अशुभ वचन नहीं बोलने चाहिए, हरदम मंगल वचन ही बोलने चाहिए ।
086. रोज प्रभु का नाम बोलने से और लिखने से इतना अदभुत प्रभाव पड़ता है कि वह नाम जीवन में फलदायक होने लगता है ।
087. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में वही सुख पाएगा और सबके हृदय को जीत पाएगा जिसने अपनी वाणी पर नियंत्रण करना सीख लिया ।
088. हमारे शास्त्रों की महानता देखें कि कन्या के लिए हरदम सबके हृदय में कोमल भाव रखने का आग्रह शास्त्रों में किया गया है ।
089. शास्त्र कहते हैं कि जिस घर में स्त्री अपमानित होती है, वहाँ से भगवती लक्ष्मी माता चली जाती हैं ।
090. शक्ति और शक्तिमान के स्वरूप में हमारे सनातन धर्म में युगल उपासना का विधान है - श्रीगौरीशंकर, श्रीलक्ष्मीनारायण, श्रीराधाकृष्ण, श्रीसीताराम की उपासना का विधान है ।
091. गलत लोगों का संग करने के कारण अच्छा कृत्य करने का संकल्प हमारे हृदय में ज्यादा समय टिक नहीं पाता ।
092. शास्त्र कहते हैं कि असुर तत्व को जीवन में रहने की जगह एकदम नहीं देनी चाहिए ।
093. एक सात्विक व्यक्ति के यहाँ जब खुशी का प्रसंग आता है तो खुशी मनाने का विकल्प सत्संग को चुनता है यानी उस दिन प्रभु का खूब गुणानुवाद करता है ।
094. कंस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में उत्थान चाहते हैं तो गलत मित्रों, गलत संगति से हमेशा सावधान रहना चाहिए, नहीं तो हमारा सर्वनाश निश्चित है ।
095. प्रभु का बनाया हुआ विधान है कि हमसे गलती होने पर हमारे अंदर एक चेतन तत्व हमें कोसता है, हमें संभालता है और हमें अच्छाई की तरफ धकेलता है पर हमारा दुर्भाग्य यह होता है कि हम उसकी आवाज सुनना ही बंद कर देते हैं ।
096. शास्त्र कहते हैं कि अपने स्वभाव से सबका दिल जीतना दुनिया का सबसे बड़ा शौर्य है ।
097. शास्त्र कहते हैं कि जीवन को बदलने का और अच्छा बनने का एक मौका प्रभु सबको अवश्य देते हैं ।
098. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु से जुड़े हुए हर भक्त के सामने जाते ही हमारे हाथ जुड़ जाने चाहिए और उनकी भक्ति को हमें प्रणाम करना चाहिए ।
099. जीवन में परम सुखी होने के लिए बहुत सारी संपत्ति की जरूरत नहीं है, केवल प्रभु की भक्ति की ही जरूरत है ।
100. पहले के समय भारतवर्ष में गौ-माता एक परिवार के वरिष्ठ सदस्य के रूप में परिवार में रहतीं थीं । यह भारतवर्ष के सनातन धर्म का कितना बड़ा गौरव का विषय है ।
101. हर जीव में प्रभु के चेतन तत्व को देखने की कला हमें आ जाए तो प्रभु को यह देखकर बहुत प्रसन्नता होती है ।
102. स्वयं का श्रृंगार खुद के लिए या दुनिया के लिए किया तो वह भोग माना जाता है । प्रभु के उत्सव के लिए, प्रभु के लिए खुद का श्रृंगार किया कि प्रभु मुझे देखकर प्रसन्न होंगे तो यह भक्ति के अंतर्गत आ जाता है ।
103. श्री गोपीजन प्रभु को देखते ही यह भाव अपने हृदय में ले आती थी कि यह केवल भगवती यशोदा माता के लाला नहीं, हमारे भी लाला हैं । यह अदभुत अपनापन का प्रेम भाव प्रभु के लिए हमारे जीवन में भी होना चाहिए ।
104. मन में संसार का विकल्प आते ही हमारा प्रभु के लिए भाव खंडित हो जाता है ।
105. जैसे पूरे विश्व में गणित और विज्ञान के सिद्धांत एक ही मिलेंगे, वैसे ही पूरे विश्व में प्रभु तत्व का एक ही सिद्धांत हर धर्म में मिलेगा ।
106. प्रेम भाव रखने वाले हृदय में प्रभु जरूर पधारते हैं ।
107. भगवती गंगा माता और श्री हिमालयजी में प्रभु तत्व का वास है इसलिए उन्हें मात्र देखने से ही हमारे जीवन में आनंद निर्माण हो जाता है ।
108. भगवत-साक्षात्कार प्राप्त होते ही पूरा जीवन ही उत्सव बन जाता है ।
109. संसार के भोगों के सुख से ऊपर उठकर हमें जीवन में प्रभु सानिध्य के आनंद का अनुभव करना सीखना चाहिए ।
110. श्री गोपीजन की आपस की बातचीत के सब विषय शून्य हो जाते, बस प्रभु के रूप में चिंतन का एक ही विषय बचता था ।
111. जीवन में प्रभु का आह्वान करने से और प्रभु की तन-मन-धन से सेवा करने से सारी खुशियां दौड़कर हमारे पास चली आती हैं ।
112. हमारे श्रीग्रंथों पर जितनी टीकाएँ लिखी गई हैं उन सबको नमस्कार करना चाहिए क्योंकि संतों ने अपना पूरा जीवन लगाकर एक-एक प्रसंग पर टीकाएँ लिखी है ।
113. पूतना का जहर देने का कृत्य निंदा की पराकाष्ठा है और बालरूप में प्रभु कोमलता की पराकाष्ठा हैं । दोनों पराकाष्ठा का मेल हमें श्रीमद् भागवतजी महापुराण के पूतना मोक्ष के प्रसंग में देखने को मिलता है ।
114. पूतना के प्राणों का जब प्रभु ने आकर्षण करना शुरू किया तो पूतना ने कहा - छोड़ो-छोड़ो । प्रभु मानो मुस्कुराते हुए बोले कि मैं तुम्हें जीवन-मरण के चक्कर से छुड़ाकर ही छोडूंगा ।
115. गौ-माता का सौभाग्य देखें कि जब-जब कंस के भेजे राक्षसों को प्रभु ने मारा, गोपियां गौ-माता की पूंछ का झाड़ा लगातीं, गोबर का लेप करतीं और गोमूत्र से प्रभु को स्नान करातीं ।
116. जीवन में कभी भी भक्ति को छोड़ना नहीं चाहिए । हम जब भक्ति छोड़ देते हैं तो प्रभु की तरफ हमारा मन लगने की संभावना ही खत्म हो जाती है ।
117. प्रभु के लिए उत्तम श्रद्धा सिर्फ कुछ समय में निर्माण नहीं होती, उसके लिए हमें नियमित भक्ति और तीव्र भक्ति करनी पड़ती है ।
118. सभी नकारात्मक शक्तियां और नकारात्मक तत्व प्रभु के नाम से भयंकर रूप से डरते हैं । इसलिए प्रभु का नाम जीवन में लेते रहना चाहिए ।
119. शास्त्र तो यहाँ तक कहते हैं कि हमारी त्वचा में, अस्थियों में भी जो दोष चले जाते हैं वे भी प्रभु नाम जप से समाप्त हो जाते हैं ।
120. प्रभु के मंदिर में दर्शनार्थियों के स्पर्श दोष और दृष्टि दोष की निवृत्ति के लिए गोबर-गोमूत्र से प्रभु के विग्रह के स्नान का प्रावधान है । गौ-माता इस कारण इतनी पूजनीय हैं कि उनके गोबर-गोमूत्र से प्रभु के विग्रह को स्पर्श दोष और दृष्टि दोष से पवित्र करने का शास्त्रों में वर्णित विधान है ।
121. एक भक्त सुख और दुःख दोनों परिस्थितियों में प्रभु का सानिध्य बराबर बनाए रखता है ।
122. श्री गोकुलजी प्रभु को प्रिय क्यों है ? क्योंकि गोकुलवासियों ने प्रभु के लिए त्याग किया । जो जीव प्रभु के लिए त्याग करता है वह प्रभु के लिए श्रीगोकुल-तुल्य बन जाता है ।
123. प्रभु से अपनापन जीवन में कभी भी नहीं खोना चाहिए ।
124. हम एकमात्र प्रभु के ही हैं, यह भावना जीवन में दृढ़ करके रखनी चाहिए ।
125. भक्ति के अलावा जो भी कमाई हम करते हैं वह हमारी मृत्यु पर संसार में ही रह जाने वाली है ।
126. भक्ति का मुख्य बिंदु प्रभु के लिए श्रद्धा और प्रेम जागृत करना है ।
127. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के नाम जप से हमारी पाप राशि जलकर भस्म हो जाती हैं ।
128. पूतना को भी प्रभु ने परम गति दी, इस पर प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि सर्वसामर्थ्यवान होते हुए भी प्रभु में किसी को दुर्गति देने का सामर्थ्य है ही नहीं ।
129. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु को सर्वदा याद करना ही हमारी परम गति का मुख्य हेतु होता है ।
130. मृत्यु एक दिन सबको घेरती ही है पर मृत्यु के बाद जीवात्मा की गति क्या होती है, यह मुख्य बात होती है ।
131. प्रभु के सानिध्य में आने के बाद किसी भी पापी का पाप टिक ही नहीं सकता ।
132. प्रभु से किया हमारा हर व्यवहार हमारा कल्याण और मंगल ही सुनिश्चित करता है ।
133. भगवती मीराबाई ने अपनी आलोचना का कभी जवाब नहीं दिया क्योंकि आलोचना का जवाब देने पर उन्हें आलोचक का मन में चिंतन करना पड़ता । भगवती मीराबाई चाहतीं थीं कि चिंतन केवल प्रभु का ही जीवन में हो ।
134. संसार के चिंतन से ऊपर उठकर अपने मन को केवल प्रभु के चिंतन में ही लगाना चाहिए ।
135. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु का जीवनभर चिंतन करने वाला अंत में प्रभु में ही लीन हो जाता है ।
136. हमारे जीवन के आश्रय और हमारे जीवन के विषय दोनों प्रभु बन जाने चाहिए ।
137. शास्त्र हमें सूत्र देते हैं कि संसार हमारा है ही नहीं, हमारे अपने मात्र और मात्र प्रभु ही हैं ।
138. भक्ति से प्रभु ही हमारे जीवन के केंद्र बन जाते हैं । फिर जो कुछ भी जीवन में होता है वह प्रभु के लिए ही होता है ।
139. भक्ति हमारे हृदय के केंद्रबिंदु में संसार को हटाकर प्रभु को ले आती है, ऐसा होते ही वह जीव संत बन जाता है ।
140. प्रभु के लिए जीवन में सदैव उत्साह रखना चाहिए तो हमारा पूरा जीवन ही एक उत्सव बन जाता है ।
141. सूत्र यह है कि हमारी बुद्धि जब प्रभु से दूर होती है तो ही हमारे जीवन में संकट आता है ।
142. जीवन में अगर हम जीवनरस को ऊँ‍चा स्थान देते हैं और प्रभु को नीचे रखते हैं तो हमारे जीवनरस की मटकी ही फूट जाती है ।
143. जीवन में प्रभु सदैव प्रथम स्थान पर रहने चाहिए । पहले प्रभु फिर संसार, यह ठीक है । पहले संसार फिर प्रभु, यह गलत है ।
144. हमारा पूरा जीवन “मेरा-मेरा” करते हुए चला जाता है । मेरे बच्चे, मेरा घर, मेरी गाड़ी, मेरे रुपए, मेरी बचत पर हम भूल जाते हैं कि हमारी सांसे बंद होने के बाद यह सब किसी दूसरे के हो जाएंगे, हमारे नहीं रहेंगे ।
145. शास्त्र कहते हैं कि इस मानव देह का मूल्यांकन तब तक ही है जब तक चेतन स्वरूप प्रभु हमारे भीतर बैठे हैं ।
146. शास्त्र कहते हैं कि हम संसार का चिंतन करते हैं पर इस संसार को चलाने वाले प्रभु का चिंतन नहीं करते, जो हमें करना चाहिए ।
147. शुरुआत में श्रद्धा नहीं रखकर भी अगर हम भक्ति का साधन करेंगे तो भी प्रभु हमारे हृदय में उतरकर स्वयं हमारा हृदय परिवर्तन करके उसे श्रद्धायुक्त कर देंगे ।
148. हमें अध्यात्म मार्ग के लिए कभी भी हल्का और हीन भाव जीवन में नहीं आने देना चाहिए ।
149. आज हम साधारण शांति भी अपने घर-परिवार में नहीं रख पाते, इसका सबसे मुख्य कारण यह है कि प्रभु से हमारा जुड़ाव कम हो गया है क्योंकि शांति के दाता प्रभु ही हैं ।
150. भक्तों के लिए प्रभु अपनी माया का पर्दा हटाकर थोड़ा-थोड़ा उन्हें अपने अस्तित्व की झलक दिखाते रहते हैं ।
151. प्रभु अखंड आनंद की अनंत सत्ता हैं, परमानंद के महासागर हैं ।
152. प्रभु ही हमारे जीवन को कुशल और मंगल रखने में और हमारा परम कल्याण करने में एकमात्र समर्थ हैं ।
153. जो निरंतर प्रभु की भक्ति करता है, उसके जीवन में प्रभु की कृपा का प्रभाव निर्माण हो जाता है ।
154. हमें भक्ति करने पर प्रभु का सानिध्य मिल जाता है और इससे जीवन में पूर्णता आ जाती है ।
155. प्रभु का नाम जप बड़ा सुलभ साधन है क्योंकि नाम जप से प्रभु को हम भाव रूप से तुरंत अपने पास पाते हैं ।
156. प्रभु श्री कृष्णजी की श्रीलीला को समझने के लिए अति शुद्ध बुद्धि होने की आवश्यकता है, बुद्धि शुद्ध नहीं तो प्रभु श्री कृष्णजी की श्रीलीला में प्रवेश निषेध है यानी प्रतिबंधित है ।
157. प्रभु श्री कृष्णजी की श्रीलीलाओं से प्राप्त होने वाला रस के जैसा ब्रह्मांड में कोई रस नहीं है ।
158. अपने भीतर के आनंद को जागृत करने के लिए सतंजन प्रभु श्री कृष्णजी की श्रीलीलाओं को सर्वोपरि मानते हैं ।
159. जीवन से संकट टालने के लिए भक्ति के अंतर्गत प्रभु का नाम जप सर्वोपरि साधन है ।
160. अपने भाग्य का उदय जीवन में देखना हो तो अपने जीवन में भक्ति भाव से प्रभु का प्रवेश ही उसका एकमात्र उपाय है ।
161. प्रभु श्री कृष्णजी की बाल लीला में उनकी जूठन को पाने के लिए देवतागण और ऋषिगण आदि पक्षी का रूप लेकर आते थे और प्रभु की जूठन के कण-कण को बड़े चाव से पाते थे ।
162. गौ-माता और बछड़े प्रभु से इतना प्रेम करते थे कि जब उनके पीछे प्रभु बाल लीला में खेल-खेल में दौड़ते थे तो आगे पथ में कांटा देखकर गौ-माता और बछड़े रुक जाते थे क्योंकि कहीं पीछे आने वाले प्रभु को कांटा न चुभ जाए ।
163. श्री गोकुलजी में सभी का एकमात्र प्रभु की तरफ ध्यान देना ही जैसे उनका पक्का स्वभाव बन गया था ।
164. प्रभु माखन चोरी के जरिए गोपियों का चित्त चुराते थे ।
165. श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु की एक ही मांग है कि मुझे अपना मन दे दो । पर जीव के लिए प्रभु को मन देना अत्यंत कठिन है क्योंकि जीव प्रभु के अलावा सबको अपना मन दे देता है ।
166. हम आरती में गाते हैं कि "तन-मन-धन सब कुछ है तेरा" पर एक क्षण मात्र के लिए भी ऐसा नहीं कर पाते ।
167. संतजन प्रभु से कहते हैं और विनती करते हैं कि प्रभु लीला करके स्वयं ही हमारे मन की चोरी कर लें क्योंकि हम उसे देने में हमेशा विफल रहते हैं ।
168. प्रभु कैसा मन और धन लेते हैं ? इसके बारे में संत कहते हैं कि प्रभु विकारों से भरा मन नहीं लेते और गलत तरीके से कमाया अशुद्ध धन नहीं लेते ।
169. प्रभु माखन चोरी श्रीलीला से बताते हैं कि माखन का गुण है सफेदी, निर्मलता और कोमलता । जिसके हृदय में निर्मलता और कोमलता है, ऐसे हृदय को प्रभु चुरा लेते हैं ।
170. संत कहते हैं कि हमें अपने शरीर को स्वस्थ रखना चाहिए, मन को विकार रहित रखना चाहिए और धन को शुद्ध रखना चाहिए तभी प्रभु की दृष्टि उन पर पड़ती है ।
171. प्रभु ने जब मिट्टी खाने के बहाने अपना मुखमंडल भगवती यशोदा माता को दिखाया तो प्रभु यह संदेश देना चाहते थे कि ब्रह्मांड में प्रभु से बाहर कुछ भी नहीं है, सब कुछ प्रभु के अंदर ही समाहित है ।
172. संत कहते हैं कि प्रभु का स्वभाव है कि प्रभु हमेशा अपने भक्त को ही जिताते हैं ।
173. श्री भरतलालजी ने प्रभु को वापस श्री अयोध्याजी लाने के लिए श्री चित्रकूटजी में खूब दलील रखी मगर अंत में भक्त थे इसलिए कह दिया कि जैसा आपको अच्छा लगे, जो आपको अनुकूल लगे, जैसी आपकी इच्छा हो, जिसमें आपको सुख मिले वैसा ही करें । सूत्र यह है कि एक सच्चा भक्त हमेशा अपना नहीं बल्कि प्रभु का ही सुख चाहता है ।
174. संत कहते हैं कि श्री भरतलालजी की तरह हमें भी अपने जीवन की समस्या के सभी विकल्प प्रभु के सामने रख देने चाहिए, अपनी इच्छा बता देनी चाहिए और फिर धीरे से मन की गहराई से कह देना चाहिए कि अब जैसी आपकी इच्छा हो वैसा मेरे लिए करें । इसे ही संतों ने प्रभु के सामने अपनी बात रखने का श्रेष्ठतम तरीका माना है ।
175. पूरी श्री रामायणजी में कहीं भी प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता के श्रीमुख से वनवास के लिए किसी को दोष देने की बात कहीं नहीं मिलेगी, वे सिर्फ इसे कालचक्र का प्रभाव मानते थे । संत कहते हैं कि हमें भी किसी को अपनी विपरीत परिस्थिति के लिए दोष नहीं देना चाहिए ।
176. हमारे घर में भी अगर प्रभु की श्री लड्डू गोपालजी के रूप में सेवा है तो यह भावना रखनी चाहिए कि इनके श्रीमुख में कोटि-कोटि ब्रह्मांड समाए हुए हैं जैसा कि इन्होंने भगवती यशोदा माता को दर्शन कराया था ।
177. हम पूजा प्रभु की प्रतिमा की करते हैं पर पूजा प्रतिमा को नहीं बल्कि साक्षात प्रभु को प्राप्त होती है ।
178. प्रभु इतने विशाल और विराट हैं कि हम उनके स्वरूप की पूजा कैसे भी नहीं कर सकते, इसलिए प्रभु छोटे से विग्रह में उपलब्ध होते हैं और हमें कहते हैं कि अपनी पूजा करने की इच्छा पूरी कर लो ।
179. अगर हमारे मन में प्रभु के लिए प्रबल प्रेम की भावना आ जाए तो जितना सुख प्रभु ने भगवती यशोदा माता को दिया या भगवती मीराबाई को दिया उतना ही सुख हमारे घर के विग्रह में विराजे प्रभु हमें भी दे सकते हैं ।
180. प्रभु के विग्रह के माध्यम से हम प्रभु के सामने रो सकते हैं, हंस सकते हैं, प्रभु को खिला-पिला सकते हैं, प्रभु के साथ गुस्सा और प्रेम कर सकते हैं और प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं ।
181. प्रभु से हमें यह मांगना चाहिए कि हमारी भगवत् बुद्धि बनी रहे जो एक क्षण के लिए भी प्रभु को नहीं छोड़े ।
182. उत्तम वैष्णव सबमें श्रीब्रह्म की भावना रखते हैं जिससे कि एक क्षण के लिए भी वे प्रभु को नहीं भूलें ।
183. अपनी सेवा और पूजा से हमें अपने घर के मंदिर को ही सबसे बड़ा तीर्थ बना लेना चाहिए ।
184. एक नास्तिक हमारी प्रबल भगवत् भावना को ध्वस्त करने में सक्षम होता है इसलिए उससे दूरी रखनी चाहिए ।
185. भगवती कर्मा बाई और भक्त श्री धन्नाजी जाट ने कोई वेदांत नहीं पढ़ा । पर प्रेम भाव के कारण प्रभु ने भगवती कर्मा बाई का खिचड़ा खाया और श्री धन्नाजी जाट की रोटी खायी ।
186. हमारे देश का सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक काव्य प्रेम भाव के कारण भक्तों द्वारा ही रचित है ।
187. हमारा चित्त जब तक अशुद्ध है तब तक वह प्रभु के ध्यान में लगने के लिए उपयुक्त नहीं है ।
188. चित्त हमारा शुद्ध तब होता है जब उसे प्रभु के कीर्तन-भजन-नाम जप में लगाया जाता है ।
189. प्रभु को श्रोता बनाकर भक्त प्रभु के लिए गान करते हैं, उनकी भावना होती है कि प्रभु सुन रहे हैं ।
190. संत कहते हैं कि अगर सही भावना रखकर चला जाए तो अध्यात्म का मार्ग बड़ा ही सरल है ।
191. भक्त श्री सूरदासजी का पद सुनने प्रभु स्वयं आते थे, श्री सूरदासजी को कहीं जाना नहीं पड़ता था ।
192. प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में श्री अर्जुनजी के माध्यम से सबको निर्देश दिया है और यह नहीं कहा कि मुझमें मन लगाओ, प्रभु ने कहा है मुझमें “ही” मन लगाओ । यहाँ “ही” शब्द सबसे महत्वपूर्ण है ।
193. प्रभु मानते हैं कि भक्त मेरा ही है, मात्र मेरा ही है । वैसे ही प्रभु चाहते हैं कि भक्त भी यह माने कि सिर्फ प्रभु ही मेरे हैं ।
194. प्रभु जिनसे प्रेम करते हैं और वह जीव जिसमें आसक्त होता है तो प्रभु उसकी आसक्ति का घड़ा ही फोड़ देते हैं । इससे उसकी आसक्ति खत्म हो जाती है और वह शुद्ध रूप से प्रभु से ही प्रेम करने लगता है ।
195. शास्त्र कहते हैं कि परमानंद केवल प्रभु के ही पास है और जो प्रभु के पास आते हैं उन्हें ही मिलता है ।
196. शास्त्र कहते हैं कि बड़े-से-बड़े धनवान के पास भी परमानंद नहीं है पर प्रभु से प्रेम करने वाले भक्त के पास वह सदैव मिलता है ।
197. शास्त्र कहते हैं कि हम दुनियादारी, धन-संपत्ति का अर्जन, यश-कीर्ति का अर्जन सब कुछ आनंद की चाहत में करते हैं, आनंद हमारा परम लक्ष्य होता है । पर इन सब चीजों से हमें आनंद नहीं मिलता क्योंकि हम गलत दिशा में प्रयास करते हैं । आनंद केवल और केवल प्रभु के पास आने पर ही मिलता है ।
198. प्रभु के सानिध्य में हमें तृप्ति मिलती है और फिर एक मीठी अतृप्ति भी जग जाती है प्रभु का और अधिक सानिध्य पाने के लिए ।
199. प्रभु जब परमानंद लुटाते हैं तो भक्त आनंद में झूमते हैं और आनंद विभोर हो जाते हैं ।
200. हमें आध्यात्मिक ज्ञान को अपने जीवन में उतारना चाहिए, उसे केवल प्रवचन का विषय नहीं बनाना चाहिए ।
201. अहंकार रहित जीव को ही प्रभु मिलते हैं । अहंकार की कोई भी संपत्ति लेकर हम कभी भी प्रभु के पास नहीं जा सकते ।
202. अपने अहंकार को गलाने का रोज प्रयास करना चाहिए क्योंकि अहंकार ही हमारे समस्त दुःखों को निर्माण करता है ।
203. जो जीवन में अहंकार को छोड़कर जितना छोटा बनेगा, उतनी जल्दी वह प्रभु के समक्ष पहुँच जाएगा ।
204. प्रभु ने अपनी मानव श्रीलीला में दिखाया कि श्री रामावतार में और श्री कृष्णावतार में प्रभु की मधुर वाणी का जादू सभी पर चलता था ।
205. संसार का कोई भी लौकिक बंधन प्रभु को नहीं बांध सकता । प्रभु केवल और केवल भक्ति के कारण प्रेम बंधन में ही बंधते हैं ।
206. अगर भगवती यशोदा माता जैसा निश्छल प्रेम होता है तो प्रेम के कारण प्रभु हमारे प्रेम बंधन में बंध जाते हैं ।
207. जब भगवती यशोदा माता ने प्रभु को ऊखल से बांधना चाहा तो दो अंगुल रस्सी छोटी पड़ गई । संत सूत्र देते हैं एक अंगुल हमारे साधन की होती है और दूसरी अंगुल प्रभु की कृपा की होती है तभी प्रभु बंधते हैं । सूत्र यह है कि कोई कितना भी साधन कर ले पर जब तक प्रभु की कृपा नहीं होगी तब तक प्रभु प्रेम बंधन में नहीं बंधेंगे और हमारा साधन भी सफल नहीं होगा ।
208. अपने साधन को पराकाष्ठा तक ले जाना हमारा कर्तव्य होना चाहिए । साधन के प्रति निष्ठा होनी चाहिए पर साधन से प्रभु प्राप्त हो जाएंगे यह अहंकार कभी नहीं होना चाहिए । प्रभु केवल और केवल अपनी कृपा से ही प्राप्त होते हैं ।
209. हमारे भीतर यह भाव होना चाहिए कि जो साधन हम कर सकते हैं - हमने कर लिया, साधन में जितनी शक्ति और परिश्रम हम लगा सकते हैं - हमने लगा दिया । अब असहाय बनकर प्रभु की कृपा की प्रतीक्षा जीवन में करनी चाहिए ।
210. प्रभु से प्रसाद रूप में मुक्ति अपने आप मिल जाती है इसलिए भक्त कभी भी प्रभु से मुक्ति नहीं मांगते, वे केवल भक्ति ही मांगते हैं ।
211. प्रभु कभी किसी साधन से, ज्ञान से, धन से नहीं बंधते हैं, प्रभु केवल और केवल प्रेम के बंधन को ही स्वीकार करते हैं ।
212. गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने अपनी भक्ति की शक्ति से प्रभु को रूप बदलने के लिए बाध्य कर दिया और जगत को दिखाया कि जो रघुनाथ हैं, वही यदुनाथ हैं और जो यदुनाथ हैं, वही रघुनाथ हैं ।
213. भक्ति शास्त्र कहता है कि अगर हम अपनी भक्ति में पूर्ण भाव ले आए तो जैसा हम चाहते हैं प्रभु वैसा करने लग जाते हैं ।
214. हमारी वाणी प्रभु का गुणानुवाद करने में लगे, हमारे नेत्र प्रभु के दर्शन करने में लगें, हमारे कान प्रभु के बारे में श्रवण करने में लगें, तब हमारे हृदय में प्रभु का निवास अपने आप ही हमें अनुभव होने लगता है ।
215. पूरे ब्रह्मांड में प्रभु ही जीवों में परमानंद का वितरण करने में एकमात्र सक्षम और समर्थ हैं ।
216. रोज-रोज भक्ति करके प्रभु को पुकारेंगे और प्रभु के द्वार पर दस्तक देंगे तो एक दिन वह पुकार जरूर सुनी जाएगी और प्रभु का द्वार हमारे लिए खुल जाएगा ।
217. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि प्रभु का एक अखंड नियम है कि पुकारने वाले की पुकार सुनते हैं, मांगने वाले को देते हैं और रक्षा के लिए बुलाने वाले की रक्षा करते हैं ।
218. प्रभु जितने हमें दूर से अच्छे लगते हैं भक्ति से प्रभु के समीप आने पर प्रभु उससे भी अनंत गुना ज्यादा अच्छे लगने लग जाते हैं ।
219. हम अपनी भक्तिरूपी कर्म के दो फूल प्रभु को अर्पण करते हैं तो प्रभु हमें अपनी कृपा का फल दे देते हैं, जिसका फल अनंत होता है ।
220. घर में हम अपने लिए अनुकूल स्थान तो रखते हैं पर सच्चा वैष्णव वह होता है जो प्रभु के लिए अनुकूल स्थान रखने को जीवन में प्राथमिकता देता है ।
221. सच्ची भक्ति जब जागृत होती है तो प्रभु के लिए मन इतना व्याकुल रहता है कि प्रभु के सानिध्य के बिना एक चुटकी बजाने जितना समय भी एक युग के बराबर लगता है ।
222. प्रभु श्री कृष्णजी की सभी श्रीलीलाएं नाना प्रकार के रस से रसमय होती हैं ।
223. पुण्य करते-करते भी पाप हमारे जीवन में आ जाता है क्योंकि पाप हमें आकर्षित करता है । पाप का रास्ता बड़ा आकर्षक और सरल होता है । इससे बचने का एक ही उपाय है - प्रभु की भक्ति ।
224. किसी भी अवस्था में प्रभु को भूलना हमारे शास्त्रों को कदापि मान्य नहीं है ।
225. श्रीराम लीला, श्रीकृष्ण लीला युग-युगान्तर से चली आ रही है और चलती रहेगी क्योंकि भक्त हृदय को इससे अदभुत आनंद मिलता है ।
226. वनभोज में जितने भी गोप थे वे गोलाकार बनाकर पंक्ति में बैठते और मध्य में प्रभु को रखते । इससे सूत्र निकलता है कि हमें भी जीवन के विषयों का गोलाकार बनाकर प्रभु का स्थान उसके बीच में आरक्षित रखना चाहिए ।
227. जीवन के केंद्र में प्रभु को रखेंगे तो संसार के विषय अपनी मर्यादा में रहेंगे और हमें मोहित नहीं करेंगे क्योंकि प्रभु का आकर्षण सबके ऊपर भारी पड़ेगा ।
228. अगर प्रभु के लिए कोई सात्विक संकल्प हमारे मन में होता है और वह संकल्प अगर हम तीव्र रखते हैं और निरंतर बनाए रखते हैं तो प्रभु उसे जरूर साकार करते हैं ।
229. हमें अपने घर के श्री ठाकुरजी से उमड़-उमड़ कर प्रेम करना चाहिए, जितना प्रेम हम अपने बच्चों से करते हैं उससे भी कोटि-कोटि गुना ज्यादा करना चाहिए ।
230. जितना प्रयास हम संसार की लौकिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए करते हैं उतना प्रयास और संकल्प हम प्रभु के लिए जीवन में कर लें तो प्रभु हमारे जीवन में प्रकट हो जाएंगे ।
231. एक संत के मुँह से अगर हम प्रभु की कथा सुनते हैं तो वह कथा हमें सच्चे रूप में कृतार्थ करती है क्योंकि संत के हृदय से वह कथा आती है और हमारे हृदय में उतर जाती है ।
232. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु अजीत हैं यानी प्रभु से कोई जीत नहीं सकता पर साथ में यह भी कहते हैं कि भक्त अपने प्रेम के कारण प्रभु को जीत लेते हैं ।
233. प्रभु श्री ब्रह्माजी कहते हैं कि जो भक्ति भाव के बिना आध्यात्मिक शास्त्र पढ़ते हैं वे मानो भूसा कूट रहे हैं जिससे कुछ मिलने वाला नहीं है । इससे सूत्र निकलता है कि आध्यात्मिक शास्त्र का श्रवण भी भक्ति युक्त होना चाहिए ।
234. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु एक माता की तरह हैं, जो बच्चे के अपराध को माफ करके भी आनंद का अनुभव करते हैं । माफ करने में भी प्रभु आनंद लेते हैं इसलिए भक्त के अपराध प्रभु तुरंत क्षमा करते हैं ।
235. सर्वोत्तम भक्त की दृष्टि ऐसी होती है कि उनके जीवन में जो कुछ भी घटता है उसमें वे प्रभु की कृपा का ही सर्वत्र दर्शन करते हैं ।
236. प्रभु का उत्तम भक्त बनते ही मुक्ति पर हमारा स्वतः ही अधिकार हो जाता है, मुक्ति हमें अलग से मांगनी नहीं पड़ती ।
237. उत्तम भक्त वह होता है जो प्रभु से कभी भी शिकायत नहीं करता । वह प्रभु की अनुकंपा को हर अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति में सदैव महसूस करता है ।
238. भक्त प्रभु को अनुकंपा के सागर के रूप में देखता है और अपने हृदय में प्रभु के लिए कृतज्ञता का भाव रखता है जिस कारण प्रभु उसे जीवन में अपने आप ही संभालते रहते हैं ।
239. भक्त को कभी भी प्रभु अपने से छोटा नहीं मानते, अपने बराबर का दर्जा प्रभु उन्हें देते हैं । यह भक्ति की कितनी बड़ी उपलब्धि है और प्रभु की दृष्टि में भक्त का कितना बड़ा महत्व है ।
240. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु का दास बनने की बात तो बहुत बड़ी है, अगर प्रभु के दास का भी दासत्व करने का जीवन में मौका मिल जाए तो भी हम तर जाते हैं ।
241. प्रभु अपने भक्तों से बड़ा किसी को नहीं मानते और न ही कभी मान सकते हैं ।
242. जो अपनी इन्द्रियों से प्रभु के दिव्य रस का पान कर रहा है, वही जीव धन्य होता है ।
243. प्रभु को अपने जीवन का सबसे अनमोल हिस्सा बनाना चाहिए यानी प्रभु से अनमोल हमारे जीवन में कोई भी नहीं हो ।
244. प्रभु के रूप में हमारी आँखें आसक्त रहनी चाहिए, प्रभु की कथा में हमारे कान आसक्त रहने चाहिए और प्रभु के नाम जप में हमारी जिह्वा आसक्त रहनी चाहिए । ऐसी आसक्ति जीवन में हो तो हमारा निश्चित कल्याण हो जाता है ।
245. भक्ति करते-करते भक्त प्रभु को इतना प्रिय हो जाता है कि प्रभु उससे उऋण नहीं होने की बात कहते हैं और उसे अपने से बड़ा मानने लगते हैं ।
246. भक्ति के साथ जीवन में कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए । भक्ति में समझौता आ जाए तो फिर वह भक्ति नहीं रहती ।
247. अपने पूरे घर को ही प्रभु का मंदिर मानना चाहिए इससे घर में सदा आनंदमय वातावरण बना रहता है ।
248. जीवन में किसी भी परिस्थिति में रहें पर प्रभु का बनकर रहना चाहिए तभी हमारा मंगल और कल्याण होगा ।
249. एक संत जब पत्र लिखते थे तो अंत में लिखते थे “आपका” । एक दिन उनको चिंतन हुआ कि मैं किसी का नहीं, सिर्फ प्रभु का हूँ तो उस दिन से उन्होंने लिखना शुरू कर दिया “प्रभु का” ।
250. शास्त्र कहते हैं कि हम अपने घर में रहकर भी बहुत अच्छा परमार्थ और अध्यात्म का साधन कर सकते हैं ।
251. शास्त्र कहते हैं कि शरीर से भी ज्यादा हमें अपने मन को आश्रम और तीर्थ में ले जाने की आवश्यकता है । हम आश्रम या तीर्थ में रहें और हमारा मन वहाँ नहीं रहकर घर में रहे तो यह गलत है ।
252. केवल प्रभु के पास ही अमृत दृष्टि है क्योंकि प्रभु अमृत स्वरूप हैं ।
253. प्रभु जिसकी तरफ देख लेंगे या जिसको याद भी कर लेंगे उसका उसी समय मंगल और कल्याण हो जाता है ।
254. प्रभु सौंदर्य की पराकाष्ठा हैं क्योंकि सौंदर्य उनसे आगे है ही नहीं ।
255. कालिया मर्दन में कालिया के एक सौ एक फन थे, जो फन उठता प्रभु उसके ऊपर अपना श्रीचरण रखकर उसको दबाते और उसका मर्दन करते । इससे सूत्र निकलता है कि जब भी अधर्म की गर्दन उठती है उसे दबाने के लिए प्रभु के श्रीकमलचरण सदैव तैयार रहते हैं ।
256. कालिया नाग को श्री गरुड़जी का डर था तो प्रभु ने उससे कहा कि मेरे चरण चिह्न तुम्हारे मस्तक पर अंकित हैं जो तुम्हें सबसे अभय करेंगे । सूत्र यह है कि प्रभु का कृपा चिह्न हमारी देह पर अंकित हो जाए तो हम सब तरफ से अभय हो जाते हैं ।
257. शास्त्र कहते हैं कि अपने घर के देवालय यानी श्रीठाकुरबाड़ी को परम पवित्र अवस्था में रखना चाहिए ।
258. अपनी हर कामना को प्रभु से जोड़कर रखना चाहिए । कुछ अच्छा खाने की इच्छा है तो मन होना चाहिए कि प्रभु के लिए बनाऊँ और भोग लगाकर प्रसाद रूप में पाऊँ । अपने शरीर को स्वस्थ रखना है तो यह इच्छा होनी चाहिए कि प्रभु के लिए मैं साधन कर सकूँ इसलिए शरीर को अच्छा रखना है ।
259. प्रभु अनंत शक्तियों के केंद्र हैं और अनंत शक्तियां हाथ जोड़कर प्रभु की सेवा में सदैव उपस्थित खड़ी रहती हैं ।
260. श्री कृष्णावतार में प्रभु ने दावाग्नि का पान किया और सबको बचाया । शास्त्र कहते हैं कि हमारे अंतरंग में जठराग्नि, कामाग्नि, ज्ञानाग्नि हमें परेशान किए रहती है - इन सबका पान करके केवल प्रभु ही इन्हें शांत कर सकते हैं । ऐसा होने पर ही जीव अपनी अंतरात्मा में परम शांति का अनुभव कर पाता है ।
261. अपनी इंद्रियों की हर वृत्ति को कोई भी साधक नहीं संभाल सकता । अंत में उसे प्रभु से ही प्रार्थना करनी पड़ती है क्योंकि प्रभु की कृपा से ही वह संभलती है ।
262. कलियुग का युग धर्म है कि पापों की चमक अधिक होती है और परमार्थ और अध्यात्म की चमक कम होती है ।
263. जीव की विडंबना यह है कि वह अपने भीतर चेतन स्वरूप प्रभु के रूप को नहीं देखकर अपने देह रूप को ही जीवनभर देखता है ।
264. जीवन का सर्वोच्च लाभ तब होता है जब जीव प्रभु की परम सुंदर श्रीलीलाओं का दर्शन अपने मन में करने लगता है ।
265. हमारे नेत्र जीवनभर अनेकों-अनेक दृश्य देखते रहते हैं पर एक दिन जीवन में ऐसा आना चाहिए कि हमारे नेत्रों की अभिलाषा हो अब प्रभु के दर्शन के अलावा हमें कुछ भी नहीं देखना ।
266. प्रभु के सभी स्वरूप आदरणीय हैं, पूजनीय हैं पर भक्त किसी एक प्रभु के स्वरूप में आसक्त हो जाता है और उसी स्वरूप में प्रभु को रिझाता है ।
267. भाग्यवान वे लोग होते हैं जो प्रभु को सदैव याद करते हैं पर कितने भाग्यवान वे लोग होंगे जिनको प्रभु याद करते हैं ।
268. संत कहते हैं कि बांसुरी की तपस्या कितनी होगी जो प्रभु के श्रीहोठों से सदैव चिपकी रहती है ।
269. हाथों से होने वाली प्रभु की पूजा से भी हृदय से होने वाली प्रभु की मानस पूजा को सर्वश्रेष्ठ माना गया है ।
270. हम प्रभु को रिझाने में लोक लज्जा के कारण संकोच रखते हैं पर उत्तम भक्त सभी संकोच त्यागकर प्रभु को रिझाते हैं ।
271. भक्त अपने मन के भाव में संकोच त्यागकर प्रभु की श्रीलीला में पहुँच जाते हैं कि वानर रूप में प्रभु श्री रामजी की सेना में हूँ या मैं प्रभु श्री कृष्णजी के सामने मोर बनकर उनकी बांसुरी की धुन पर नाच रहा हूँ ।
272. प्रभु की श्रीलीला का वर्णन और श्रीलीला के श्रवण का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसमें रमने पर प्रभु के लिए बहुत जल्दी तन्मयता हमारे चित्त में आ जाती है ।
273. संतों का एक तरीका होता है कि वे पूजा सबकी करते हैं पर मांगते अपने इष्ट की आसक्ति हैं । श्रीगोपीजन भगवती जगदंबा माता का पूजा करतीं थीं और प्रभु श्री कृष्ण जी का प्रेम चाहतीं थीं । श्री विनय पत्रिका में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने बहुत से देवी-देवताओं की पूजा और वंदना की है और मांगा है कि मेरे इष्ट श्री सीतारामजी का अनुग्रह मुझे दिला दें ।
274. श्री चीर हरण प्रसंग का सूत्र यह है कि प्रभु का निवास सर्वत्र है इसलिए हमारा हर व्यवहार हर जगह मर्यादापूर्ण होना चाहिए ।
275. भारतवर्ष का दृष्टिकोण देखें कि हमारी संस्कृति में किताब को भगवती सरस्वती माता का रूप माना गया है, रुपए को भगवती लक्ष्मी माता का रूप माना गया है और तिजोरी को श्री कुबेरजी का स्थान माना गया है ।
276. शास्त्र कहते हैं कि हमारे और प्रभु के बीच माया का पर्दा है । जीव प्रभु को पर्दे के पार नहीं देख सकता पर प्रभु पर्दा होने के बावजूद हमें स्पष्ट देख सकते हैं और देखते हैं ।
277. प्रभु चाहते हैं कि भक्त मेरे से एकरूप हो जाए पर भक्त चाहते हैं कि वे अलग रहकर प्रभु की भक्ति रस का जीवनभर आनंद लेते रहें ।
278. जीवन में ऐसा कोई विकार हो जो प्रयत्न के बाद भी हमसे नहीं छूट रहा तो उसकी निवृत्ति के लिए प्रभु की कृपा मांगनी चाहिए फिर वह विकार खत्म होते देर नहीं लगेगी ।
279. अपने मन और बुद्धि को तीव्रता से प्रभु की भक्ति में लगाना चाहिए ।
280. वृक्षों का सारा जीवन दूसरों को सुख देने के लिए होता है । श्रेष्ठ मानव जीवन की प्रभु व्याख्या करते हैं कि जीव को भी अपनी वाणी, अपने विचार, अपने भाव, अपने कर्म, अपने ज्ञान से दूसरों का उपकार करना चाहिए ।
281. शास्त्रों ने स्त्री को इतना गौरव दिया है कि उनके भीतर पाए जाने वाले प्रेम, तल्लीनता, समर्पण, स्नेह, कोमलता को भक्ति के लिए बड़ा उपयुक्त माना गया है । इसलिए श्रेष्ठ संत पुरुष शरीर में रहते हुए भी गोपी भाव से प्रभु की आराधना करते हैं ।
282. शास्त्र कहते हैं कि स्वयं पुण्य करना चाहिए, अपने परिवार वालों से पुण्य करवाना चाहिए और किसी को पुण्य करते हुए देखें तो उसका अभिनंदन करना चाहिए ।
283. प्रभु के अनुकूल होते ही देवतागण और प्रकृति भी हमारे अनुकूल हो जाते हैं ।
284. भक्ति मार्ग में यह मान्यता है कि हर तत्व में प्रभु का अंश है । इसलिए हर तत्व में प्रभु के दर्शन करने का विधान शास्त्रों में बनाया हुआ है ।
285. एक संत ने आधुनिक व्याख्या करते हुए कहा कि जितने भी प्रभु प्राप्ति के साधन हैं वह रेल के डिब्बे के समान हैं जिसको चलाने वाला इंजन भक्ति है । सूत्र यह है कि भक्ति के बिना कोई भी साधन कभी भी सफल नहीं होता ।
286. शास्त्र कहते हैं कि जो कर्म हमने किया उसका फल कभी टलने वाला नहीं है और जो कर्म हमने नहीं किया उसका फल कभी मिलने वाला नहीं है ।
287. जिनका उपकार हम अपनी आँखों से रोज देखते हैं उनकी आराधना निश्चित करनी चाहिए क्योंकि वे प्रत्यक्ष देव होते हैं जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी, श्री चंद्रदेवजी, भगवती गंगा माता, भगवती यमुना माता, भगवती तुलसी माता, श्री गिरिराजजी और गौ-माता ।
288. प्रभु का प्रसाद पाने के लिए सभी एक जैसे अधिकारी होते हैं इसलिए किसी को भी, कभी भी प्रभु के प्रसाद से वंचित नहीं करना चाहिए ।
289. प्रभु श्री कृष्णजी सर्वोत्तम वक्ता हैं । उनके जैसा वक्ता न कभी हुआ, न आगे होगा । वे बहुत मीठा बोलते हैं और जब जरूरत पड़ती है तो तीखे उपदेश भी देते हैं ।
290. प्रभु का उपदेश है कि अपने कर्म और कर्तव्य को पूजा की तरह करो । पूजा भाव से अपने कर्म और कर्तव्य को निभाना चाहिए ।
291. प्रभु का कभी यह आग्रह नहीं होता कि मैं जैसा कहता हूँ वैसा ही करो । अंतिम निर्णय प्रभु हमेशा जीव पर छोड़ते हैं और जीव को कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करते हैं ।
292. जीव के पास जो भी शक्ति है वह उसे प्रभु से मिली हुई है पर उस शक्ति का उपयोग अपनी इच्छा से करने के लिए प्रभु ने उसे पूर्ण रूप से स्वतंत्र छोड़ा है ।
293. जो जीव प्रभु की दी हुई शक्ति को अच्छे कर्म यानी सत्कर्म में लगाता है तो प्रभु उससे खुश होते हैं और उसकी शक्ति को बढ़ाते हैं । इसलिए प्रभु की दी हुई शक्ति का गलत कार्य में दुरुपयोग कभी नहीं करना चाहिए ।
294. जीव को कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रभु ने दी हुई है इसलिए ही उसे अपने किए कर्म का फल पाप और पुण्य के रूप में भोगना पड़ता है ।
295. सिद्धांत यह है कि हर कार्य प्रभु की शक्ति से होता है पर उसमें इच्छा जीव की होती है ।
296. प्रभु की मूर्ति धातु की है यह लौकिक दृष्टि होती है पर उस मूर्ति में साक्षात मेरे प्रभु हैं यह अलौकिक दृष्टि रखने पर वह हमें अपार लाभ देती है ।
297. शास्त्रों पर विश्वास रखने से हमें अलौकिक दृष्टि प्राप्त होती है जिससे हम भगवती तुलसी माता को माता स्वरूप में देखते हैं जिसको एक विज्ञान का छात्र वनस्पति के रूप में देखता है ।
298. जैसे एक कागज के टुकड़े का मूल्य दस पैसा है मगर उस पर किसी देश के सरकार का संकल्प छपने पर उसका मूल्य एक हजार रुपए हो जाता है वैसे ही एक गोलाकार पत्थर पर श्री शालिग्रामजी या श्री नर्पदेश्वरजी का संकल्प आ जाए तो वह देवतुल्य बन जाता है ।
299. श्री गिरिराज लीला में प्रभु ने दिखाया कि अगर हम किसी पर्वत के लिए भी देव भाव अपने मन में ले आते हैं तो प्रभु पर्वत का रूप लेकर भी अर्पण हुए भोग को ग्रहण करने की श्रीलीला दिखाते हैं ।
300. शास्त्र कहते हैं कि वही जीव सुखी होता है जो मानव जीवन की मर्यादा को समझता है और उसके भीतर ही रहता है ।
301. प्रभु का संकल्प है और अखंड व्रत है कि जो प्रभु की शरण में आ जाता है उसका पूर्ण संरक्षण प्रभु करते हैं ।
302. जिनको प्रभु अपनाते हैं फिर जगत में उनका कोई भी, कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता ।
303. जिसने शास्त्रों का तो खूब श्रवण और पठन किया पर जीवन में प्रभु के लिए प्रेमाभक्ति जागृत करके प्रभु को अपनाया नहीं उसका सब परिश्रम व्यर्थ चला गया ।
304. संत कहते हैं कि जब प्रभु के श्रीविग्रह का हम दर्शन करते हैं तो प्रभु के श्रीहोठों के हास्य का दर्शन और स्मरण करना चाहिए, ऐसा करते ही हमें जीवन में आनंद का अनुभव होता है ।
305. शास्त्रों में कहे गए प्रभु के हर शब्द और वचन पर हमें पूर्ण विश्वास करना चाहिए ।
306. जीव की सभी तरफ से रक्षा केवल और केवल प्रभु ही करते हैं ।
307. भक्ति में भाव का ही साम्राज्य होता है । भक्त यह भावना करता है कि प्रभु शयन करते हैं तो प्रभु सो जाते हैं ।
308. श्री गिरिराज लीला में प्रभु ने सात दिनों तक श्री गिरिराजजी को उठाए रखा । प्रभु ने संदेश दिया कि अगर हम प्रभु पर विश्वास करते हैं तो हफ्ते के सातों दिन प्रभु रक्षा करेंगे और रक्षा करने के लिए उपलब्ध रहेंगे ।
309. अपना कर्म जीवन में करना चाहिए मगर कर्म करते हुए ध्यान प्रभु का रखना चाहिए क्योंकि कर्म को आधार देने वाले प्रभु ही होते हैं ।
310. सात दिवस तक प्रलयकालीन वर्षा होने के बावजूद प्रभु ने पूरे बृजमंडल में एक भी लता, एक भी पत्ते को टूटने नहीं दिया, किसी के घर और किसी भी वृक्ष को उजड़ने नहीं दिया यानी कोई क्षति नहीं पहुँचने दी ।
311. सात्विक जीवन जीने वाला और प्रभु पर पूर्ण विश्वास रखने वाले का प्रभु जरूर उद्धार करते हैं ।
312. अनुकूलता में प्रभु कृपा देखने के तो हम आदी होते हैं पर प्रतिकूलता में प्रभु की कृपा देखना भक्ति का लक्षण है जो एक भक्त ही करता है ।
313. अनुकूलता और सुख हमारे लिए प्रभु को दुर्लभ कर देते हैं जबकि विपत्ति और प्रतिकूलता हमें प्रभु के समीप ले आते हैं ।
314. जीवन में जब विपत्ति आती है तो हम संसार से पीठ फेर लेते हैं और प्रभु की तरफ मुड़ जाते हैं ।
315. प्रभु जिसे बड़े वेग से अपने पास बुलाना चाहते हैं उसे जीवन में विपत्ति देते हैं, फिर अपना सानिध्य देते हैं और फिर उसे अपनी प्राप्ति करवाकर परमानंद दे देते हैं ।
316. लाभ-ही-लाभ और सम्मान-ही-सम्मान में हमारा अहंकार बढ़ता है जिससे प्रभु से दूरी भी बढ़ती है जबकि प्रतिकूलता में तीव्रता से हम प्रभु के समीप पहुँचते हैं ।
317. सामान्य लोगों को प्रभु विपत्ति नहीं देते क्योंकि वे प्रभु का सानिध्य नहीं पाना चाहते । पर जिन्हें प्रभु अपने समीप लाना चाहते हैं उन्हें विपत्ति देकर अपनी तरफ मोड़ लेते हैं ।
318. संपत्ति, सत्ता और पूज्यता हमारे अहंकार की वृद्धि करता है और इस तरह हमें प्रभु से दूर कर देता है और अंत में हमारा पतन करवाता है ।
319. जो चीज हमने जीवन में प्रभु को अर्पित कर दी उस पर अगर हम बाद में अपना अधिकार जमाते हैं तो वह कर्म पाप की श्रेणी में आता है ।
320. शास्त्र कहते हैं कि अपने हृदय के सिंहासन पर प्रभु का ही अभिषेक करना चाहिए ।
321. शास्त्र कहते हैं कि कर्म का मार्ग सामान्य लोगों के लिए होता है । भक्त के लिए प्रभु की कृपा का मार्ग होता है क्योंकि उनके जीवन में भक्ति के कारण प्रभु की कृपा का उदय हो चुका होता है ।
322. जिसने अपने जीवन में प्रभु को अपना प्राण मान लिया, उसने सभी शास्त्रों का मर्म जीवन में जान लिया ।
323. हमारे शरणागति के भाव को जब प्रभु देख लेते हैं और प्रभु को लगता है कि यह जीव केवल मेरे पर ही पूर्णतया निर्भर है तो प्रभु के हृदय में करुणा जग जाती है और प्रभु हमारे जीवन के सर्वेसर्वा बन जाते हैं ।
324. जो भक्त प्रभु पर पूर्णतया निर्भर हो जाता है, ऐसे परम प्रिय भक्त की प्रभु सदैव चिंता करते हैं और सबसे ज्यादा चिंता करते हैं ।
325. ब्रह्म तत्व को जानने वाला और ब्रह्म बुद्धि लेकर चलने वाला ही श्रीरास में प्रवेश कर सकता है ।
326. प्रभु का सौंदर्य अपार है और अद्वितीय है और प्रभु नित्य किशोर अवस्था में सदा रहते हैं ।
327. प्रभु श्री रामजी का धर्म आचरण श्रेष्ठतम है । उन्होंने पूरे श्री रामावतार में कहीं भी और कभी भी मर्यादा नहीं तोड़ी ।
328. प्रभु श्री कृष्णजी का श्रेष्ठतम वैराग्य है । वे अपनी बांसुरी श्री वृंदावनजी में छोड़ गए और फिर कभी अपनी प्रिय बांसुरी को नहीं बजाया और ऋषि के श्राप वश अपने सामने अपने पूरे वंश को समाप्त होते देखकर भी एक आंसू प्रभु के श्रीआँखों से नहीं टपके ।
329. शास्त्र कहते हैं कि जीवात्मा कितना भी चाहे कि मैं प्रभु से मिल लूं पर जब तक प्रभु नहीं चाहेंगे तब तक प्रभु मिलन नहीं होगा ।
330. भक्ति के कारण हमारे मन के विकार जब खत्म होते हैं तभी हम प्रभु से मिलने के लिए प्रस्तुत हो सकते हैं और हमारे में वह योग्यता आती है कि प्रभु साक्षात्कार हम कर सकें ।
331. जीव का भक्ति रूपी पुरुषार्थ और प्रभु का कृपा रूपी अनुग्रह होने पर ही प्रभु मिलन संभव होता है ।
332. श्री गोपीजन को श्रीरास के लिए प्रभु के बुलावे पर इतनी व्याकुलता निर्माण हो गई थी जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते ।
333. संसार में किसी भी भक्त या संत ने आज तक प्रभु को प्राप्त किया है तो एक चीज जरूर उन सबके जीवन में होगी और वह है प्रभु प्राप्ति के लिए व्याकुलता ।
334. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु कितनी जल्दी मिलते हैं इसका मापदंड यह है कि जितनी व्याकुलता हमारे जीवन में प्रभु मिलन की होगी उतनी जल्दी प्रभु मिलन होता है ।
335. अगर प्रभु हमारे जीवन के लक्ष्य हैं और प्रभु की प्राप्ति हमें इस मानव जीवन में करनी है तो तीव्र भक्ति ही इसका एकमात्र उपाय है ।
336. शास्त्र और संत दृष्टि से सच्चा भाग्यवान जीव वही है जो प्रभु की प्रेमाभक्ति करता है और प्रभु प्राप्ति का एकमात्र लक्ष्य अपने जीवन में रखता है ।
337. शास्त्र कहते हैं कि हाथ वही भाग्यवान हैं जो प्रभु की सेवा करें, नेत्र वही भाग्यवान हैं जो प्रभु के दर्शन करें, मस्तक वही भाग्यवान है जो प्रभु के आगे झुके, जिह्वा वही भाग्यवान है जो प्रभु का नाम उच्चारण करे और कान वही भाग्यवान हैं जो प्रभु की कथा श्रवण करें ।
338. जिनकी बुद्धि संसार में रमण करती है उन्हें शास्त्रों में भाग्यवान नहीं माना गया है । शास्त्रों में उन्हें ही सच्चा भाग्यवान माना गया है जिनकी बुद्धि प्रभु में लग जाती है ।
339. शास्त्र कहते हैं कि संसार में कमाए धन की धज्जियां हमारी मृत्यु पर उड़ जाती हैं क्योंकि हमारे साथ कुछ भी नहीं जाता । भक्ति ही एकमात्र ऐसा परम धन है जिसका हनन कभी नहीं होता और वह मृत्यु बाद भी हमारे साथ रहती है ।
340. श्रीरास एक साधारण लीला नहीं है । यह परमहंस महात्माओं और संतों की, जो श्रीगोपी रूप में थे, उनकी परम पुरुष परमात्मा के साथ दिव्य श्रीलीला है ।
341. हम जब भक्तों के चरित्र का चिंतन करते हैं तो ऐसा करने से हमें भक्ति करने की प्रेरणा मिलती है ।
342. जब हम भक्ति करने लगते हैं तो हमारे हर सात्विक संकल्प को प्रभु अपनी कृपा से पूर्ण करते हैं ।
343. संसारी पुरुष विषय रस में डूबते हैं जबकि भक्त भक्ति रस में डूबते हैं, यह कितना बड़ा फर्क है ।
344. भक्त प्रभु के पार्षद होते हैं जो प्रभु के धाम में रहते हैं । उन्हें प्रभु किसी देव कार्य हेतु निमित्त बनाकर संसार में भेजते हैं ।
345. जो भक्ति करके जीवन में प्रभु प्राप्ति के लिए दौड़ते हैं, उन्हें ही शास्त्रों में सबसे बड़ा भाग्यवान माना गया है । संसार की दौड़ में दौड़ने वाले को भाग्यवान नहीं माना गया है ।
346. कलियुग में संसार के लोग वित्त, सत्ता, प्रसिद्धि, कामना पूर्ति और इंद्रियों की तृप्ति के लिए दौड़ते हैं यानी सांसारिक विषयों के पीछे दौड़ते हैं और उनकी यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होती और उन्हें कभी विश्राम और शांति नहीं मिलती । शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की तरफ दौड़ने पर ही हमें आनंद, विश्राम और शांति मिलती है ।
347. प्रभु के श्रीकमलचरणों में अपने चित्त को लगा देना चाहिए तभी चित्त को पूर्ण विश्राम मिलेगा ।
348. शास्त्र हमें अपने उपदेशों से आत्म प्रगति के मार्ग पर ले जाते हैं ।
349. भक्ति से प्रभु प्रेम को जागृत करना मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है ।
350. संत कहते हैं कभी भी साधनों के चक्कर में इतना नहीं पड़ना चाहिए कि हम साध्य यानी प्रभु को ही भूल जाएं ।
351. शास्त्र उन्हें ही भाग्यवान और बुद्धिमान मानता है जो अपने जीवन को प्रभु की भक्ति में लगाते हैं ।
352. संसार नित्य नहीं है इसलिए संसार में मन नहीं लगना चाहिए । प्रभु नित्य हैं, सनातन हैं इसलिए नित्य प्रेम प्रभु से ही करना चाहिए और प्रभु की भक्ति में ही अपना मन लगाना चाहिए ।
353. जीवन में सभी क्रियाओं का लक्ष्य प्रभु प्राप्ति होना चाहिए ।
354. भगवती मीराबाई इतनी बड़ी राज संपत्ति को त्यागकर भक्ति में लग गई जितनी संपत्ति हम जीवनभर भाग्यवान होने पर भी नहीं कमा सकते । इससे पता चलता है कि भक्ति वह परम धन है जिसके सामने संसारी धन का महत्व कांच के बराबर है ।
355. प्रभु से वैसे तो कभी कुछ नहीं मांगना चाहिए पर एक प्रार्थना भरी मांग जरूर करनी चाहिए कि हम जैसे भी हैं, अच्छे या बुरे पर प्रभु हमारा त्याग कभी नहीं करें ।
356. आध्यात्मिक साधन तब तक ही जरूरी है जब तक साध्य प्रभु के लिए हमारे चित्त में पूर्ण भक्ति और अनुराग निर्माण नहीं हो जाता ।
357. प्रभु का एक नियम है कि प्रभु कभी भी, किसी भी जीव का अहंकार नहीं सहते । जब हमारे जीवन में अहंकार का उदय होता है तो हमारा प्रभु से वियोग हो जाता है ।
358. शास्त्र कहते हैं कि शक्ति (माता) और शक्तिमान (प्रभु) एक ही हैं । श्रीलीला विलास के लिए वे एक से दो होते हैं और श्री उमा-शंकर, श्री राधा-कृष्ण, श्री सीता-राम के रूप में अपनी श्रीलीलाएं करते हैं ।
359. संत हमें सूत्र देते हैं कि जब भी जीवन में अहंकार की घड़ी आए तो इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा माननी चाहिए और प्रभु श्री हनुमानजी की तरह प्रभु के श्रीकमलचरणों को पकड़ लेना चाहिए ।
360. शास्त्र कहते हैं कि हमारे चिंतन का विषय और वाणी का विषय सदैव प्रभु होने चाहिए ।
361. श्री बैकुंठजी में प्रभु अजन्मा हैं, वहाँ प्रभु का कोई जन्मोत्सव नहीं होता मगर श्रीबृज में प्रभु का सुंदर जन्मोत्सव होता है । श्री बैकुंठजी में प्रभु का नामकरण नहीं होता पर श्रीबृज में भक्तों ने प्रभु के सैकड़ों नाम दिए हैं । इसलिए संतजन श्री बैकुंठजी से भी श्रीबृज को श्रेष्ठ मानते हैं ।
362. प्रेम से प्रभु जिसे अपनाते हैं उसके कोटि-कोटि अपराध भी प्रभु तत्काल क्षमा कर देते हैं ।
363. प्रभु का स्वभाव है कि भक्तों को विपत्ति से बचाना, उन्हें सावधान करके रखना, उनकी रक्षा करना और संकट के बीच से उन्हें निकालना ।
364. प्रभु की कथा हमारे कानों से हमारे हृदय में जाकर प्रभु के स्मरण और प्रेम को हमारे भीतर जागृत कर देती है ।
365. संतों ने माना है कि संसार का सबसे बड़ा दान प्रभु की भक्ति और प्रेम का दान है ।
366. प्रभु इतने कोमल हैं कि हमारे कठोर हृदय में प्रभु कभी निवास नहीं कर सकते । जब हमारे हृदय में भक्ति के कारण अत्यंत सुकोमल भावनाएं जागृत होती हैं तब वह प्रभु के निवास के लिए उपयुक्त बनती है ।
367. संत मानते हैं कि प्रभु के श्रीकमलचरण असाधारण हैं । वे हमारी सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं । जो प्रभु के श्रीकमलचरणों में अपना शीश नवाता है, उनकी पूजा करता है और उनका प्रबल आधार जीवन में लेता है उस जीव को सभी संकटों से निवृत्ति मिल जाती है ।
368. प्रभु के श्रीकरकमल सर्वाधिक मंगल करने वाले, सर्वाधिक शांति प्रदान करने वाले हैं ।
369. सांसारिक सुख नष्ट होने वाला हैं परंतु प्रभु के सानिध्य का अलौकिक परमानंद नाशवान नहीं है ।
370. जब हम भक्ति से प्रभु का अलौकिक परमानंद प्राप्त करते हैं तो सांसारिक सुख की मिठास, आकर्षण और चाहत एकदम खत्म हो जाती है ।
371. श्रीगोपी भाव में आकर संतजन और भक्तजन प्रभु के विरह में रोते हैं । उनका रुदन इतना श्रेष्ठ और इतना असाधारण होता है कि उसकी गहराई और भावना को संसारी जीव समझ ही नहीं सकते ।
372. श्री गोपीगीत में प्रभु के लिए श्री गोपीजन द्वारा प्रकट किए इतने उच्च स्तर के विरह को हम समझ सकें, ऐसी हमारी अवस्था और क्षमता नहीं है । यह अवस्था और क्षमता प्रभु की भक्ति करने से ही प्राप्त होती है ।
373. प्रभु को बाहर खोजेंगे तो प्रभु नहीं मिलेंगे । एकांत में बैठकर भक्ति से अपने भीतर की अंतर्यात्रा करने पर ही प्रभु मिलते हैं ।
374. किसी को कोई सांसारिक धन मिल जाए और वह उसका थोड़ा उपयोग कर ले फिर वह धन लुप्त हो जाए तो बड़े वेग से उस जीव के मन में उस धन का विचार चलता रहेगा । संत कहते हैं इसी प्रकार प्रभु अपना सानिध्य देने के बाद वियोग देते हैं जिससे प्रभु का विचार और अनुसंधान प्रबलता से हमारे हृदय में चलता रहे ।
375. भक्तों को प्रभु अपने सानिध्य के बाद वियोग देते हैं जिससे उनका प्रभु का अनुसंधान निरंतर चलता है जो उनका अदभुत रूप से कल्याण और मंगल करता है ।
376. प्रभु के विरह में तीव्रता से प्रभु की निरंतर याद आती रहे तो वह हमारा परम कल्याण सुनिश्चित करता है ।
377. श्रीबृज मंडल में आज भी यह मान्यता है कि श्रीरास इतिहास की घटना नहीं है बल्कि श्रीरास प्रभु की सनातन श्रीलीला है और आज भी अधिकारी पात्रों को श्रीरास के दर्शन होते हैं ।
378. श्रीरास के श्रवण और चिंतन से प्रभु के लिए दिव्य प्रेम की जागृति हमारे हृदय में होती है ।
379. जो प्रभु की भक्ति करता है उसका जीवन शांति, आनंद और उल्लास से भर जाता है ।
380. प्रभु की किसी भी श्रीलीला में दोष दर्शन करना एक बड़ा जघन्य अपराध और पाप है, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
381. हमें अपने जीवन में प्रभु की सेवा के कार्यों को ठीक से याद रखना चाहिए और उसका सुचारु रूप से निष्पादन करना चाहिए ।
382. अगर भक्ति करते वक्त प्रभु से कोई चाहत नहीं होगी यानी निष्काम भक्ति होगी तो हमारी भक्ति हमें अदभुत आत्मबल देगी ।
383. जिस भी दिन जीवन में कोई बढ़िया वस्तु यानी अति उत्तम वस्तु हमें दिख जाए उसे भाव से तत्काल प्रभु को अर्पित करना चाहिए ।
384. प्रभु का गुणानुवाद करके संतजन प्रभु का अपने शब्दों से सुंदर चित्रण करते हैं जो हमारी आँखों के सामने प्रभुमय दृश्य उत्पन्न कर देता है ।
385. दिन और रात प्रभु की श्रीलीला का स्मरण जीवन में होने से एक दिन ऐसी स्थिति आती है कि हम प्रभु की श्रीलीला विहार में प्रवेश पा जाते हैं ।
386. प्रभु की श्रीलीलाओं का चिंतन करने से हमारा चित्त निर्मल हो जाता है और संसार के विषय का आकर्षण छूट जाता है ।
387. जो प्रभु की भक्ति के मार्ग पर चलता है कलियुग उनके जीवन में विघ्न, व्याधि, आलस्य, विषय भोग की इच्छा जगाता है पर भक्ति इन सबको निष्फल कर देती है ।
388. भक्ति के कारण जब हमारी सांसारिक वासनाएं नष्ट होगी तो ही हमें सच्ची शांति और आनंद की प्राप्ति होगी ।
389. भक्तजन पहले प्रभु की श्रीलीलाओं का गुणगान जीवन में करते हैं और फिर एक दिन उनके जीवन में ऐसा आता है कि मन की गहराई में वे उस श्रीलीला के दर्शन करने लगते हैं ।
390. जब प्रभु के अनुग्रह के हम पात्र हो जाते हैं तो संसार का आकर्षण खत्म हो जाता है । जब तक संसार का आकर्षण हमारे भीतर है तब तक मानना चाहिए कि प्रभु अनुग्रह के पात्र हम नहीं हुए हैं ।
391. जगत की जगह केवल श्रीजगदीश ही हमें अपने लगने लग जाएं, यह भक्ति का सबसे बड़ा मंत्र है ।
392. प्रभु मेरे हैं और मैं केवल प्रभु का हूँ, यह भावना जीवन में निर्माण होती है तो हम भक्ति पथ पर सफल हो जाते हैं ।
393. शास्त्र पहली बात हमें कहते हैं कि संसार में आसक्त होकर नहीं रहना चाहिए । शास्त्र दूसरी और सबसे ऊँ‍‍ची बात हमें कहते हैं कि प्रभु में आसक्त हुए बिना नहीं रहना चाहिए ।
394. भक्तों को प्रभु का नाम लेने का, प्रभु की श्रीलीलाओं को गुनगुनाने का एक व्यसन लग जाता है । यह भक्ति की बड़ी ऊँ‍‍ची अवस्था होती है ।
395. प्रभु के कथा श्रवण की जब हमारे मन को व्यसन लग जाए तो एक दिन प्रभु की श्रीलीला के दर्शन की योग्यता भी हमारे जीवन में आ जाती है ।
396. प्रभु की भक्ति के कारण ही हमारा जीवन परम पवित्र होता है और आध्यात्मिक रूप से हमारा सच्चा भाग्योदय होता है ।
397. हम बुढ़ापे तक संसार ही करते रहते हैं । संसार करना गलत नहीं है पर आयु बढ़ने पर संसार छूटना चाहिए और हमें परमार्थ पथ पर आगे बढ़ना चाहिए ।
398. संत हमसे पूछते हैं कि हम पूरे जीवन संसार की चर्चा और संसार की वार्ता करते हैं तो प्रभु प्राप्ति के लिए साधन कब करेंगे ?
399. प्रभु के लिए हमारे मन में प्रश्न उठे और हमारे मन में ही उसका उत्तर मिलने लग जाए तो हमारी भक्ति परिपक्व हुई है, ऐसा हमें मानना चाहिए ।
400. प्रभु का कोई अपना या पराया नहीं होता मगर प्रभु का कृपा पात्र वही होता है जो जीवन में प्रभु की भक्ति करता है, प्रभु का चिंतन करता है और प्रभु को नमन करता है ।
401. अपने जीवन रथ पर चलते हुए अगर हम पूरे जीवन प्रभु का चिंतन करेंगे तो जीवन के सायंकाल होने से पहले प्रभु के समक्ष पहुँच जाएंगे ।
402. शास्त्र कहते हैं कि बाहर से कोई भी क्रिया करें मगर चित्त को प्रभु में लगाकर रखें, यह सबसे जरूरी है । श्री गोपीजन घर-गृहस्थी का सब काम करतीं थीं पर अपना मन प्रभु में लगाकर रखती और चिंतन प्रभु का ही करतीं थीं ।
403. श्रीमद् भगवद् गीताजी के टीकाकार कितनी सुंदर बात कहते हैं कि संसार का कर्म हाथ से करो मगर चिंतन मन से प्रभु का करो । वे कहते हैं कि संसार छोड़ो मत, कर्म छोड़ो मत पर चिंतन सिर्फ प्रभु का करो तो हमारा निश्चित कल्याण हो जाएगा ।
404. मन से प्रभु का निरंतर चिंतन हो तो हमें परमार्थ के लिए अलग से समय निकालने की जरूरत नहीं पड़ेगी और अपना सांसारिक कर्म छोड़ने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी ।
405. शास्त्र कहते हैं कि मन चेतन तत्व है इसलिए उसे चेतन यानी प्रभु की सेवा में लगाना चाहिए, उसे जड़ यानी संसार में नहीं लगाना चाहिए ।
406. हम अपने मन को प्रभु को अर्पण नहीं करके उसे संसार में लगा देते हैं, इस कारण हम परमार्थ में असफल हो जाते हैं ।
407. मन को प्रभु में लगाकर और प्रभु का चिंतन करते हुए संसार का कोई भी काम हम कर सकते हैं । ऐसा करने से हमारा कल्याण सुनिश्चित हो जाता है ।
408. भक्ति में प्रभु के निरंतर चिंतन को ही सर्वश्रेष्ठ साधन माना गया है ।
409. जीवन में संसार के सारे तापों से हमें छाया केवल प्रभु ही देते हैं ।
410. जीवन में प्रभु के लिए अपने प्रेम भाव को कभी भी, किसी भी चीज से खंडित नहीं होने देना चाहिए ।
411. जीवन में भगवत् भाव का जागरण हो जाए, यह सबसे महत्वपूर्ण बात है ।
412. प्रभु की कृपा के बिना परमार्थ पथ पर कुछ भी सुलभ नहीं है ।
413. ऐसे मनुष्य से, पुस्तकों से और विचारों से बचना चाहिए जो प्रभु के लिए हमारे भाव को खंडित करे क्योंकि इससे बड़ा नुकसान और कुछ नहीं हो सकता ।
414. शास्त्र कहते हैं कि धन नष्ट होने से और समय नष्ट होने से थोड़ा नुकसान होता है पर प्रभु के लिए भाव नष्ट हो गया तो यह जीवन का सबसे बड़ा नुकसान होता है ।
415. जीव प्रभु के साथ कौन-सा संबंध रखना चाहता है इसकी पूरी स्वतंत्रता प्रभु ने जीव को दी हुई है । प्रभु की विशेषता है कि जीव जिस भाव से चाहता है प्रभु उस भाव को ग्रहण करके उसके अनुरूप व्यवहार करते हैं ।
416. हमें प्रभु की प्रसन्नता की चिंता होनी चाहिए इसलिए हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए जो प्रभु को प्रसन्नता प्रदान करे । प्रभु को हमारे व्यवहार से कष्ट हो, ऐसा व्यवहार जीवन में कभी नहीं करना चाहिए ।
417. शास्त्र कहते हैं कि संसार से आशा नहीं रखकर हमें आशा सिर्फ प्रभु से ही रखनी चाहिए ।
418. प्रभु की श्रीलीला का चिंतन और प्रभु के मंगलमय नाम का जप, यह भक्तों के जीवन के दो बहुत बड़े आधार होते हैं ।
419. एक बार कुब्जा ने प्रभु का सुंदर श्रृंगार किया तो प्रभु ने उसकी कूबड़ ठीक करके उसे सुंदर रूप प्रदान कर दिया । इस प्रसंग से सूत्र निकलता है कि प्रभु को सजाने वाले के जीवन को ही प्रभु सजा देते हैं ।
420. संसारी जीव प्रभु की आराधना धन और वैभव के लिए करते हैं पर सतंजन प्रभु की आराधना भक्ति और वैराग्य के लिए करते हैं ।
421. प्रभु के लिए समय का, हुनर का और वित्त का व्यय जीवन में सबसे बड़ा फल देता है क्योंकि प्रभु उसे कई गुना करके वापस लौटाते हैं ।
422. परमार्थ के उत्तम संकल्पों को प्रभु ही पूर्ण करते हैं ।
423. एकमात्र प्रभु ही हमारे कर्मफल को माफ करके हमें मुक्ति दे सकते हैं ।
424. प्रभु से आर्शीवाद की संपत्ति रोजाना लेनी चाहिए । इससे हमारा जीवन मंगलमय और सफल होता चला जाता है ।
425. प्रभु को साष्टांग दंडवत प्रणाम करना, इसे शास्त्रों में प्रणाम यज्ञ की उपमा दी गई है ।
426. जितना प्रभु को जीवन में प्रणाम करेंगे उतना जीवन में ऊँ‍चा उठते चले जाएंगे ।
427. जीवन में जब प्रभु की कृपा रहती है तो ही जीवन आनंदमय रहता है ।
428. जीवन की किसी भी अवस्था में प्रभु को कदापि भूलना नहीं चाहिए ।
429. हमें जीवन में प्रभु को केवल घर के मंदिर में ही नहीं रखना चाहिए अपितु अपने हृदय के मंदिर में भी रखना चाहिए ।
430. जीवन की हर अनुकूल या प्रतिकूल अवस्था में अपने हृदय के हर कोने में प्रभु का ही वास रखना चाहिए ।
431. प्रभु के लिए अपने हृदय में सबसे प्रबल प्रेम और भावना रखनी चाहिए ।
432. भक्ति के सिद्धांत, सूत्र, उपदेश जहाँ से भी अच्छे लगे, निःसंकोच होकर लेने चाहिए ।
433. प्रभु के लिए हमारे हृदय में प्रगाढ़ प्रेम का निर्माण भक्ति करती है ।
434. भक्ति से हमारा चित्त शुद्ध होकर प्रभु में तल्लीन होने के लिए तैयार हो जाता है ।
435. श्रीगोपीजन का चित्त प्रभु में इतना लगा हुआ था कि अन्य का चिंतन करने का अवसर ही उनके चित्त को नहीं था ।
436. हमारे श्रीग्रंथ प्रभु के लिए प्रेम जागृत करने के लिए हैं, उनमें जो कथाएं हैं उनका एकमात्र उद्देश्य यही है ।
437. भक्त जब भक्ति की परिपक्व अवस्था में पहुँच जाता है तो यह अनुभव करता है कि जगत मिथ्या है, प्रभु ही एकमात्र सत्य हैं और प्रभु से ही हमारा सनातन संबंध है ।
438. प्रभु की कृपा जब होती है तो ऐसे शास्त्र, ऐसे संत, ऐसी कथाएं हमारे सामने जीवन में आती है जिससे प्रभु के लिए अनुराग जग जाता है ।
439. दास भाव से प्रभु की नि:स्वार्थ भक्ति करना एक श्रेष्ठ श्रेणी की भक्ति है ।
440. कभी-कभी प्रभु के लिए प्रेम भाव आए इससे भी महत्वपूर्ण है कि प्रभु के लिए सदैव हमारे हृदय में प्रेम उमड़ना चाहिए ।
441. जीवन का एक लक्ष्य होना चाहिए कि कभी भी प्रभु के लिए हमारी प्रेम भावना पर जीवन में किसी भी सांसारिक विषय से विपरीत प्रभाव नहीं पड़े ।
442. शास्त्र कहते हैं कि अगर कोई भक्त हमें दिख जाए, जो प्रभु के लिए श्रेष्ठ भावना अपने हृदय में रखता हो, तो उसे तुरंत प्रणाम करना चाहिए ।
443. भक्ति से हमें प्रभु के सानिध्य की अनुभूति सर्वत्र और सर्वदा होती है क्योंकि प्रभु हमारे हृदय में सदा विराजमान रहते हैं ।
444. संत कहते हैं कि जो प्रभु की भक्ति करता है उसका प्रभु से दृष्टि वियोग हो सकता है मगर नित्य वियोग कभी नहीं होता ।
445. भक्त अपने हृदय के भीतर विराजे प्रभु से अपनी भावनाओं के कारण रोज प्रेम का आदान-प्रदान करता रहता है ।
446. जब हम प्रभु को अपने भीतर अनुभव करने लगते हैं तो हमारा हृदय ही सबसे बड़ा तीर्थ बन जाता है ।
447. प्रभु के लिए प्रेम भावना का हमारे हृदय में जागरण होते ही परमानंद सदैव के लिए हमारा दामन थाम लेता है ।
448. श्रीगोपीजन में प्रभु प्रेम की इतनी प्रबल भावना थी कि प्रभु ने उनके भीतर ज्ञान का दीपक जगा दिया और बिना वेद-वेदांत पढ़े हुए जो वे बोलतीं गईं, वह वेदतुल्य हो गया ।
449. हम संसार में रहते हुए भी संसार के प्रपंच में नहीं फंसे तो ही हम भक्ति में सफल हो पाएंगे ।
450. जब प्रभु की सच्ची कृपा होती है तो हम प्रभु को बाहर नहीं अपितु अपने भीतर अंतरात्मा में खोजते हैं ।
451. हमारे चित्त की वृत्ति और विचार सब प्रभु की तरफ ही बहने चाहिए ।
452. सच्चे भक्त प्रभु से मोक्ष और मुक्ति नहीं मांगते, वे स्वर्ग और श्रीबैकुंठ लोक भी नहीं मांगते । वे सिर्फ जन्म-जन्मांतर तक प्रभु की भक्ति की कृपा मांगते हैं ।
453. शास्त्र कहते हैं कि हमसे यह अपेक्षा होती है कि भक्ति भाव जागृत होने के बाद हम प्रभु को बाहर नहीं बल्कि अपने भीतर खोजें ।
454. भक्त को प्रभु की निरंतर अनुभूति होती रहती है यानी भक्त के जीवन से प्रभु कभी जाते नहीं हैं ।
455. संतों ने अपनी देह को ही तीर्थ स्वरूप बना लिया और ऐसी अवस्था आ गई कि प्रभु का निवास उनके भीतर ही पुष्ट हो गया ।
456. शास्त्रों ने प्रभु को कल्पवृक्ष जैसा बताया है । जो जिस योग्यता से प्रभु से मांगता है उसे वैसा ही मिलता है । साधारण जीव प्रभु से साधारण चीज मांगते हैं और श्रेष्ठ भक्त प्रभु से भक्ति मांगते हैं ।
457. प्रभु से क्या मांगना चाहिए इसका विवेक होना बहुत जरूरी है, यह विवेक हमें भक्ति देती है ।
458. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु को अपने सुख का साधन बनाना एक तुच्छ उपलब्धि है जबकि खुद प्रभु के सुख का साधन बनना सबसे श्रेष्ठ उपलब्धि है ।
459. शास्त्र कहते हैं कि जब समय विपरीत हो तब अपनी बुद्धि नहीं चलाकर प्रभु की शरणागति लेनी चाहिए । तब प्रभु हमें हर विपदा से बचा लेते हैं ।
460. प्रभु का स्वभाव है कि प्रभु अपने सभी भक्तों को सदैव यश प्रदान करते हैं ।
461. अपना नित्य कर्म और निहित कर्म करके प्रभु को समर्पित करना चाहिए ।
462. प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी मानव श्रीलीला में दिखाया कि सारी बातें शक्ति से ही नहीं बल्कि युक्ति से भी करनी चाहिए ।
463. जिसको संसार में कोई नहीं स्वीकारता, उसे भी प्रभु सहर्ष स्वीकारते हैं ।
464. प्रभु की कृपा के कारण ही हमें संसार में ऐश्वर्य और कीर्ति मिलती है ।
465. पूरे ब्रह्मांड का सारा-का-सारा भार प्रभु पर ही है ।
466. जीवन में प्रभु से कोई भी शिकायत नहीं होनी चाहिए, यह एक सच्चे भक्त का लक्षण होता है ।
467. जिसने अपने जीवन में प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य रखा है, वह जीव प्रभु को सबसे ज्यादा प्रिय होता है ।
468. युद्ध भूमि में इतने तनाव के दौरान भी प्रभु श्री कृष्णजी ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए श्री अर्जुनजी को श्रीमद् भगवद् गीताजी का अपूर्व ज्ञान और उपदेश दिया ।
469. प्रभु का सच्चा भक्त कभी भी जीवन में चिंता नहीं करता और कभी भी संसार से याचना नहीं करता क्योंकि वह प्रभु पर पूर्ण रूप से आश्रित होता है ।
470. प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहा है कि मेरे पर आश्रित रहो और चिंता मत करो । पर जीव को आज के युग में चिंता करने की आदत हो गई है क्योंकि उसका प्रभु पर विश्वास पूर्ण नहीं है ।
471. संत कहते हैं कि रोज पूजा के बाद एक संकल्प करना चाहिए कि आज प्रभु की कृपा से मैं दिनभर प्रसन्न रहूँगा ।
472. प्रभु की सदैव शरणागति लेकर चिंता रहित होकर जीवन में सदा मुस्कुराते रहना चाहिए, यह श्रीमद् भगवद् गीताजी का सार है ।
473. प्रभु ने प्रसन्न रहने का रसायन सबको दिया है पर हम उसका उपयोग ही नहीं करते ।
474. प्रभु प्रसन्नता की मूर्ति हैं और सदा अपने से संपर्क में आने वाले को प्रसन्नता का वितरण करते हैं ।
475. प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी अपने मानव अवतार में प्रेम बांटने के कारण सदा लोकप्रिय रहे ।
476. जीवन में प्रसन्न रहना है तो किसी के प्रति द्वेष, वैर या ईर्ष्या की भावना कदापि नहीं रखनी चाहिए ।
477. दूसरे के प्रति द्वेष, वैर या ईर्ष्या की भावना रखने वाला व्यक्ति प्रभु को कभी भी प्रिय नहीं होता, यह सिद्धांत है ।
478. जब वातावरण प्रतिकूल हो तो मौन रहना सबसे श्रेष्ठतम मार्ग होता है, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
479. प्रभु को संगीत सेवा बहुत प्रिय है । इसलिए भजन और कीर्तन का भक्ति में बहुत बड़ा महत्व है ।
480. प्रभु को अर्पित करने के लिए अपनी क्षमता अनुसार सबसे उत्तम वस्तु लानी चाहिए, ऐसा करना श्रेष्ठ उपकर्म होता है जो परम लाभकारी और फलदायी होता है ।
481. जीव का कल्याण केवल परमार्थ के कारण ही संभव होता है, यह शाश्वत सिद्धांत है ।
482. हमारे धर्म शास्त्रों को संतजन आनंद का विज्ञान कहते हैं । हमारे धर्म शास्त्रों के हिसाब से चलने से जीवन भी आनंदमय हो जाता है और मरण भी आनंदमय बन जाता है ।
483. महाराज श्री युधिष्ठिरजी ने राजसूय यज्ञ यह दिखाने के लिए किया कि जिस पर प्रभु की कृपा होती है उसका कितना उत्थान होता है, यह पूरी दुनिया देखे ।
484. प्रभु से प्रेम करने वाले पांडव और प्रभु का विरोध करने वाले कौरव के भाग्य में कितना बड़ा अंतर हो गया, यह श्री महाभारतजी के अवलोकन से साफ पता चलता है ।
485. प्रभु के श्रीकमलचरणों की तरफ ही एक सच्चे भक्त का सदैव ध्यान होता है ।
486. संपत्ति घर में आना एक बात है पर वह संपत्ति हमें सुख दे, यह केवल प्रभु की कृपा पर ही निर्भर करता है ।
487. शास्त्र कहते हैं कि सबसे ज्यादा सुख तो संतोष की वृत्ति रखने पर ही हमें मिलता है ।
488. हमारा जीवन शास्त्र नियंत्रित होना चाहिए यानी शास्त्रों के नियम के अनुसार होना चाहिए ।
489. किसी भी विपरीत परिस्थिति में हमारी बुद्धि प्रभावित नहीं हो, यह केवल प्रभु की भक्ति पर ही निर्भर करता है ।
490. जो जीव अपने जीवन में शास्त्रों के नियम की अवहेलना करता है, वह प्रभु की कृपा से वंचित रह जाता है ।
491. शास्त्र कहते हैं कि स्वधर्म का जो भी कार्य हमें मिला है उसे ईमानदारी से करना चाहिए, इससे प्रभु प्रसन्न होते हैं ।
492. जो परोपकारी है उसके हृदय में प्रभु का निवास पक्का है, ऐसा मानना चाहिए ।
493. अहंकारी व्यक्ति का पतन होना सुनिश्चित है क्योंकि अहंकार हमें गिराता-ही-गिराता है ।
494. जो जीवन में धर्म का पालन करता है, वह जीव प्रभु को बेहद प्रिय होता है ।
495. जीवन में अगर कोई भूल हो जाए तो उसे तुरंत स्वीकार करके प्रभु से क्षमा की याचना करनी चाहिए ।
496. जीव अपने पुरुषार्थ से प्रभु तक कभी नहीं पहुँच सकता, यह प्रभु की कृपा होती है और मात्र उस कृपा के कारण ही जीव का प्रभु से मिलन होता है ।
497. श्री सुदामाजी कभी जीवन में किसी सेठ के सामने याचक नहीं बने, उन्होंने जीवन में प्रभु को ही एकमात्र सेठों का सेठ माना ।
498. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि श्री सुदामाजी की कथा एक शांति-कथा है कि इतनी गरीबी में रहकर भी प्रभु की शरणागति के कारण उनका चित्त इतना शांत रहता था ।
499. श्री सुदामाजी ने बिना किसी स्वार्थ के प्रभु से निष्काम प्रेम किया था ।
500. संत कहते हैं कि प्रभु अंतर्यामी हैं और मनुष्य तो क्या, एक चींटी के मन की बात भी बिना बताए जानते हैं ।
501. दुःख में एक भक्त को प्रभु का सानिध्य बराबर मिलता रहता है, इससे दुःख उन्हें प्रभावित नहीं करता ।
502. संपत्ति चली जाने से संसार के सभी रिश्ते मुँह मोड़ लेते हैं, मात्र और मात्र प्रभु ही हैं जो हमारा साथ निभाते हैं ।
503. श्री सुदामाजी के प्रसंग में प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि भगवती सुशीलाजी का भेजा एक मुट्ठी चिउड़े का महत्व संसार में किसी ने नहीं समझा, केवल प्रभु ने ही समझा ।
504. शास्त्र कहते हैं कि पुण्य से पाप नहीं कटते । पुण्य का फल अलग मिलता है और पाप का फल अलग भोगना पड़ता है ।
505. पाप करते समय हरदम डरना चाहिए कि उसका फल हमें कभी-न-कभी जरूर भोगना ही पड़ेगा ।
506. शास्त्र कहते हैं कि सुख के बाद आया दुःख हमें बहुत कष्ट देता है जबकि दुःख के बाद आया सुख हमें बहुत खुशी देता है ।
507. शास्त्र कहते हैं कि मंदिर का धन, धर्म संस्थान का धन और दान के धन का अपहरण जो करता है उसको पीढ़ियों तक नर्क भोगना पड़ता है ।
508. हमें सिर्फ घर की सफाई पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, अपना मन को विकारों से साफ रखना चाहिए और धन को अनैतिकता से साफ रखना चाहिए ।
509. अनैतिक कमाई वाला धन नहीं होना चाहिए नहीं तो जो अन्न उस धन से आता है वह हमें अनुकूल फल नहीं देगा ।
510. जो धन प्रभु की सेवा में लगता है वह शुद्ध होना चाहिए, ऐसा शास्त्रों का परम आग्रह है ।
511. अधर्म का धन जितना भी इकट्ठा कर लें वह हमें तात्कालिक सुख दे सकता है पर परमार्थ में कदापि लाभ नहीं देगा । परमार्थ में लाभ केवल धर्म से कमाया हुआ धन ही देगा ।
512. शास्त्रों की कथा हमें प्रेरणा लेने के लिए और शिक्षा ग्रहण करने के लिए सुननी चाहिए ।
513. प्रभु प्राप्ति से पहले हमें एक-एक कर्म को धोना पड़ता है यानी कर्मफल से मुक्त होना पड़ता है । इसलिए कर्म करते समय सदैव सावधान रहना और कर्म प्रभु को अर्पित करते हुए चलना चाहिए ।
514. प्रभु श्री रामजी ने जो भी उपदेश दिया उसे अपने आचरण में उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत भी किया ।
515. प्रभु श्री कृष्णजी ने कितने ही राजाओं के सिंहासन को पलटा पर अपने लिए एक भी आरक्षित नहीं किया, कितनों का राज्याभिषेक किया पर खुद का नहीं करवाया ।
516. प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी जैसा श्रेष्ठ कर्मयोगी इतिहास के पन्नों में कहीं भी नहीं मिलेंगे क्योंकि प्रभु ने बिना स्वार्थ, बिना किसी से आशा के अपने सत्कर्म जनहित के लिए किए ।
517. मनुष्य को उपदेश जितना नहीं सिखाता उतना प्रत्यक्ष आचरण सिखाता है इसलिए प्रभु श्री रामजी की मानव श्रीलीला परम अनुकरणीय है ।
518. प्रभु श्री रामजी ने और प्रभु श्री कृष्णजी ने अपनी मानव श्रीलीला में कितने कर्तव्यों का बोझ उठाया, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते ।
519. शास्त्र कहते हैं कि संसार का सबसे सच्चा और सबसे बड़ा धन तो प्रभु की शरणागति है ।
520. श्री उद्धवजी की भक्ति के कारण उनका भाग्य देखें कि उन्होंने प्रभु श्री कृष्णजी का खाया हुआ जूठन जीवनभर पाया, प्रभु के पहने हुए प्रसादी वस्त्र जीवनभर धारण किए ।
521. श्रीगोपीजन का पूरा समय ही प्रभु के चिंतन में बीतता था । वे काम संसार का करतीं थीं पर चिंतन प्रभु का ही होता था ।
522. प्रभु की माया अनंत है, उसका पार कोई नहीं पा सकता । प्रभु की कृपा होती है तभी जीव माया के बंधन से छूटता है ।
523. भक्ति के साधन के लिए एकांत अत्यंत आवश्यक है ।
524. संत उपमा देकर समझाते हैं कि जैसे श्रीशिवलिंग पर मधु, फूल, दूध, दही, श्रीगंगाजल, पंचामृत, भांग सब चढ़ता है मगर सब जल से बह जाता है और श्रीशिवलिंग पर कोई प्रभाव नहीं होता वैसे ही संसार के साधनों का जीवनयापन के लिए उपयोग करते हुए किसी भी चीज का लेप हमारे ऊपर नहीं होना चाहिए ।
525. संत कहते हैं कि जब श्री सुदामाजी श्री द्वारकापुरीजी पहुँचे और प्रभु के राजमहल के सामने खड़े होकर द्वारपाल से प्रभु के लिए संदेश भिजवाया तो उनकी जो प्रतीक्षा थी वह प्रभु की परीक्षा की घड़ी बन गई । फिर प्रभु ने वह करके दिखाया जिसकी जगत में कहीं मिसाल नहीं मिलेगी ।
526. संत कहते हैं कि श्री सुदामाजी की कथा जीवात्मा और परमात्मा के मिलन की कथा तो है ही, साथ ही यह प्रबल प्रेम की कथा है कि कितना निःस्वार्थ प्रेम जीवात्मा और परमात्मा के बीच में होता है ।
527. प्रभु ने श्री सुदामाजी का क्या कहकर अपने राजमहल में स्वागत किया, इससे प्रभु के प्रेम भाव का पता चलता है । प्रभु ने कहा कि कृष्ण की कुटिया में आपका स्वागत है, मेरी कुटिया और द्वारकापुरी आज पवित्र हो जाएगी और धन्य हो जाएगी ।
528. जो भक्ति, त्याग, वैराग्य और संतोष का आदर्श श्री सुदामाजी ने स्थापित किया था उस कारण श्री सुदामाजी को इतना मान देते हुए प्रभु उनके चरणों में बैठ गए ।
529. श्री सुदामाजी के चरणों को प्रभु ने जल से नहीं धोया बल्कि अपने अश्रुओं की बूंदों की धार से प्रक्षालन किया ।
530. संत कहते हैं कि श्री सुदामाजी की चिउड़े की पोटली की एक-एक गांठ खोलते हुए प्रभु ने मानो श्री सुदामाजी के भाग्य की एक-एक विपरीत रेखाओं की गांठ खोल दी ।
531. भक्त के आगे प्रभु अपने ऐश्वर्य और माया को भी गौण मानते हैं ।
532. प्रभु श्री कृष्णजी ने श्री सुदामाजी की गरीबी के कलंक को धोने के लिए उन्हें तीनों लोकों की संपत्ति देना भी कम माना ।
533. भगवती रुक्मिणी माता ने मन में सोचा कि इतना राजभोग प्रभु के लिए रोज तैयार होता है पर जो तृप्ति प्रभु को श्री सुदामाजी के चिउड़े से मिली, ऐसी तृप्ति कभी नहीं देखी गई ।
534. एक भक्त की सेवा प्रभु कैसे करते हैं, यह देखें । रात को सोते वक्त जगत नियंता प्रभु अपने श्रीहाथों से श्री सुदामाजी के चरण दबाने लगे और जगत जननी भगवती रुक्मिणी माता उन्हें पंखा करने लगी ।
535. संत कहते हैं कि जितना कोई भक्त भी प्रभु की सेवा में उपस्थित नहीं होता उससे कहीं ज्यादा प्रतिक्षण प्रभु स्वयं श्री सुदामाजी की सेवा में श्री द्वारकापुरीजी में उपस्थित रहे ।
536. प्रभु ने अंतिम परीक्षा श्री सुदामाजी की ली और जाते वक्त श्री द्वारकापुरीजी से उन्हें कुछ भी नहीं दिया । पर श्री सुदामाजी भी एक मंझे हुए भक्त थे, उन्होंने इस अंतिम परीक्षा में भी प्रभु के लिए अपना भाव खंडित नहीं होने दिया और पूरी तरह से उत्तीर्ण हुए ।
537. जब प्रभु ने श्री द्वारकापुरीजी से विदा करते वक्त श्री सुदामाजी को देखा तो श्री सुदामाजी की आँखों में प्रभु को अपना ही दर्शन हुआ क्योंकि श्री सुदामाजी ने अपने नेत्रों में और हृदय में प्रभु को बसाकर रख लिया था ।
538. श्री सुदामाजी ने प्रभु से विदा लेते वक्त आखिरी और अंतिम बात कही जो कि बड़ी मार्मिक और बहुत उच्चकोटि की बात है । उन्होंने कहा कि अभी तो मैंने अपने नेत्रों और हृदय में आपको बसा लिया है पर अंत समय आने पर शायद मैं भूल जाऊँ तो आप मेरे नेत्रों और हृदय से निकलकर मुझे अंतिम बेला पर दर्शन देकर कृतार्थ कर दें ।
539. जीव ने अपनी अंतिम अवस्था कभी नहीं देखी है कि वह बीमारी में या बदहाली में किस अवस्था में रहेगा । इसलिए भक्ति करके प्रभु को ही यह जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए कि अपना स्मरण प्रभु ही कृपा करके हमें अंतिम समय करवा दें ।
540. संत कहते हैं कि श्री सुदामाजी और साधारण जीव में अंतर यही है कि कुछ नहीं देने के बाद भी लौटते समय श्री सुदामाजी प्रभु की मधुर याद और प्रेम लेकर लौटे जबकि हम खिन्न होकर और प्रभु का को दोष देते हुए लौटते ।
541. हम जीवनभर भूल करते रहते हैं और उसका पछतावा भी नहीं होता, यह कितनी बड़ी विडंबना होती है ।
542. हमारे द्वारा प्रभु की होने वाली पूजा औपचारिकता की भी होती है और भावना की भी होती है । भावना वाली पूजा ही प्रभु तक पहुँचती है ।
543. श्री द्वारकापुरीजी जाते वक्त प्रभु प्रेम से मिलेंगे क्या, ऐसा सोचना और प्रभु पर शंका करना भी श्री सुदामाजी ने पाप माना । भक्ति जीव को इतना संवेदनशील बना देती है ।
544. एक सच्चा भक्त एक छोटे से गलत कृत्य को भी पाप मानेगा क्योंकि उसकी संवेदना भक्ति के कारण इतनी जागृत हो जाती है ।
545. श्री सुदामाजी का अंतिम निष्कर्ष यह था कि प्रभु के श्रीकमलचरणों की भक्ति सब कुछ प्रदान करने वाली होती है ।
546. हमें देखना चाहिए कि हम घर के श्रीठाकुरबाड़ी में जब प्रभु के सामने बैठते हैं तो प्रेम के, भाव के और आनंद के आंसू हमारे आते हैं या नहीं ।
547. जीवन में अनुकूलता नहीं होने पर उसमें भी प्रभु की कृपा और प्रेम देखना, यह भक्ति का शिखर होता है ।
548. संसार के किसी भी भक्त ने अनुकूलता और प्रतिकूलता में प्रभु से कभी भी शिकायत तक नहीं की, इसी दृष्टिकोण का नाम भक्ति है ।
549. एक भक्त हर परिस्थिति में प्रभु की अनुकंपा का दर्शन करने वाला बन जाता है ।
550. बड़ी-से-बड़ी आपत्ति, बड़ी-से-बड़ी प्रतिकूलता आने पर भी उसे प्रारब्ध मानने वाला और प्रभु को उसके लिए दोष नहीं देने वाला ही सच्चा भक्त होता है ।
551. प्रभु की कृपा को एक भक्त कृपा मेघ के रूप में देखता है जो भक्त के जीवन में हमेशा कृपा वृष्टि करते रहते हैं ।
552. हर परिस्थिति में हमारा हृदय प्रभु के लिए प्रेम भाव से भरा हुआ होना चाहिए ।
553. हमारी वाणी पर प्रभु का नाम आते ही हमारा हृदय प्रभु के लिए प्रेम से गदगद हो जाना चाहिए ।
554. प्रतिकूलता की घड़ी में भी हर चीज में प्रभु की कृपा का अनुभव करने वाला और प्रभु के लिए हरदम सकारात्मक विचार रखने वाला ही सच्चा भक्त होता है ।
555. हर दिन और हर घटना में हमें प्रभु कृपा के दर्शन होना चाहिए, यह भक्ति की निशानी होती है ।
556. भक्त को अपने जीवन में प्रभु की कृपा का निश्चित रूप से पता होता है, उन्हें अपने जीवन में प्रभु की कृपा को कभी तलाशना नहीं पड़ता ।
557. प्रभु कृपा जब जीवन में उदय होती है तो अवहेलना करने वाला संसार भी हमारी जय-जयकार करने लगता है ।
558. दुःख की बेला में भी एक भक्त पूर्ण निश्चिंत रहता है क्योंकि उसे पूर्ण विश्वास होता है कि प्रभु एक पल में प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सकते हैं ।
559. श्री सुदामापुरी के रूप में अपार वैभव आने के बाद भी श्री सुदामाजी की प्रभु सेवा में, प्रभु भजन में और प्रभु भक्ति में कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ । यही एक सच्चे और असाधारण भक्त की निशानी होती है ।
560. प्रभु श्री शुकदेवजी कहते हैं कि श्री सुदामाजी की निष्काम भक्ति की परीक्षा थी और प्रभु सकामता नहीं जगा पाए और हार गए । भक्त की जीत पर सबसे ज्यादा प्रसन्नता प्रभु को ही हुई ।
561. संत कहते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीताजी में सकाम भक्ति की घोषणा तो है पर उसकी प्रतिष्ठा नहीं है, प्रतिष्ठा तो निष्काम भक्ति की ही है ।
562. निष्काम भक्त के लिए प्रभु कहते हैं कि उसे संभालने की जिम्मेदारी मेरी है, एक माँ की तरह मुझे पता है उसकी क्या जरूरत है और मैं उसकी पूर्ति का दायित्व लेता हूँ ।
563. सकाम भक्त को प्रभु उसकी इच्छा की चीज दे देते हैं पर निष्काम भक्त को प्रभु अपना बना लेते हैं ।
564. सच्चा भक्त वही है जिसका प्रभु प्रेम हर अवस्था में, हर जीवन की परीक्षा के बाद निरंतर बढ़ता ही जाता है ।
565. संत कहते हैं कि श्री सुदामाजी प्रभु से कुछ मांगते भी नहीं और कुछ चाहते भी नहीं । संत आगे कहते हैं कि ऐसे भक्तों के प्रभु खुद भक्त बन जाते हैं ।
566. जैसे प्रभु श्री सूर्यनारायणजी के लिए कमल अनेक होते हैं पर कमल के लिए एक ही प्रभु श्री सूर्यनारायणजी होते हैं वैसे ही प्रभु को प्रेम करने वाले बहुत सारे भक्त होते हैं पर भक्तों को प्रेम करने वाले सिर्फ एक ही प्रभु होते हैं ।
567. संसार में संयोग के बाद वियोग का दुःख होता है, सिर्फ प्रभु से संयोग के बाद आनंद-ही-आनंद होता है ।
568. प्रभु के दर्शन की लालसा भक्तों में प्रबल होती है और इसी अभिलाषा के लिए वे अपना जीवन धारण करके रखते हैं ।
569. उत्तम भक्तों और संतों ने प्रभु से बस एक ही विनती की है कि अंतिम समय उनके हृदय में प्रभु प्रेम लबालब भरा रहे ।
570. श्री गोपीजन से उऋण होने के लिए प्रभु ने उन्हें स्वर्ण का निवास, मोक्ष, श्री बैकुंठजी का निवास, श्री इंद्रदेवजी की सत्ता - सब कुछ देना चाहा पर गोपियों ने प्रभु के श्रीकमलचरणों के प्रेम को छोड़कर अन्यत्र कुछ भी नहीं मांगा ।
571. श्री गोपीजन ने प्रभु से मांगा कि हमारा चिंतन सदैव आपका होता रहे, हमारी वृत्तियां सदैव आप में लगी रहे, हमारी वाणी पर सदैव आपका नाम हो और हमारे शरीर से सदैव आपकी सेवा होती रहे । यह कितनी ऊँ‍‍ची और श्रेष्ठ मांग प्रभु से है ।
572. भक्ति को छोड़कर किसी भी साधन में वह क्षमता नहीं कि वह जीव को शांति और परमानंद प्रदान कर सके ।
573. सच्ची भक्ति का जब हृदय में जागरण होता है तो हमारी सांसारिक वासनाएं और कामनाएं खत्म हो जाती हैं ।
574. हमारे हृदय में प्रभु के लिए भक्ति, प्रेम और श्रद्धा भाव होने को शास्त्रों में बहुत बड़ा महत्व दिया गया है ।
575. शास्त्र कहते हैं कि हमारे परिवार में भी रोजाना परिवार वालों के साथ सत्संग चलते रहना चाहिए ।
576. शास्त्र कहते हैं कि माया के कारण ही जीवात्मा, जो आनंद स्वरूप है, वह अपने आनंद को खो देता है और उस आनंद का अनुभव नहीं कर पाता ।
577. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की माया का प्रभु की कृपा के बिना कोई पार नहीं पा सका है ।
578. शास्त्र कहते हैं कि किसी भी देवतागण की, किसी भी साधन से की हुई पूजा और स्तुति अंत में प्रभु को ही प्राप्त होती है ।
579. प्रभु ने ही ब्रह्मांड का निर्माण किया और फिर उसमें प्रवेश करके कण-कण में समाहित हो गए ।
580. ब्रह्मांड की सभी शक्तियों के केंद्रबिंदु प्रभु ही हैं, सारी शक्तियों की जागृति प्रभु से ही होती है ।
581. प्रभु की भक्ति का हमारे जीवन में सदैव अनुकूल परिणाम ही होता है ।
582. प्रभु की कृपा से ही जीव अहंकार से बच सकता है नहीं तो एक महान पुरुष भी अहंकार से ग्रस्त हो सकता है ।
583. संसार में हर समस्या के समाधान की चाबी प्रभु के पास ही होती है ।
584. भक्त प्रभु से कुछ नहीं चाहते, मात्र प्रभु का निरंतर प्रेम चाहते हैं ।
585. जीवन में हमेशा प्रभु को अपने पक्ष में रखना चाहिए नहीं तो विपत्ति कभी भी हमें घेर सकती है ।
586. शास्त्र कहते हैं कि हमारे जीवन का मुख्य हेतु प्रभु के सानिध्य को पाना होना है । निमित्त किसी भी साधन को बनाएं मगर हेतु एक ही होना चाहिए कि हमें प्रभु का सानिध्य मिल सके ।
587. सर्वोत्तम विद्या आध्यात्मिक विद्या ही है क्योंकि यही विद्या है जो हमें संसार सागर से तारने वाली एकमात्र विद्या है ।
588. मनुष्य के जीवन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए कि वह इसी जीवन में प्रभु की प्राप्ति कर लेवें ।
589. शास्त्र कहते हैं कि जिसने सांसारिक विद्या तो ग्रहण कर ली और निपुण भी हो गया पर आध्यात्मिक विद्या को ग्रहण नहीं किया उसने अपने मानव जीवन को सफल नहीं किया ।
590. आत्मज्ञानी संत और भक्त अपने आत्मज्ञान को सबके लिए उपलब्ध करवाते हैं जिससे कि जीव मात्र का कल्याण हो सके ।
591. भक्ति के बदले प्रभु अपने स्वयं का दान भक्तों को कर देते हैं । भक्ति में इतना सामर्थ्य और प्रेमबल होता है ।
592. श्रीमद् भगवद् गीताजी का जो सार है वह भक्ति के अंतर्गत प्रभु की शरणागति है ।
593. मनुष्य जीवन में हर क्षेत्र में भय जुड़ा हुआ है, हर संयोग के साथ वियोग जुड़ा हुआ है, हर भोग के साथ रोग जुड़ा हुआ है । परम विश्राम तो केवल प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही है ।
594. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में वही निर्भय रह सकता है जिसने भक्ति करके प्रभु की कृपा को पा लिया है ।
595. हमारी कोई भी इंद्रियां संसार से कभी भी तृप्त नहीं हो सकती । इंद्रियों को तृप्त करने का उपाय यही है कि उन्हें भगवत् सेवा में लगाया जाए ।
596. भक्ति के अलावा अन्य मार्ग से जो जीव प्रभु तक पहुँचने की कोशिश करता है, वह रास्ता भटकता भी है और गिरता भी है । भक्ति ही एकमात्र वह राजमार्ग है जो सीधे हमें प्रभु के श्रीकमलचरणों तक ले जाती है ।
597. जो भी हम कर रहे हैं उसे प्रभु को अर्पण कर दें, यहीं से भक्ति मार्ग की शुरुआत हो जाती है ।
598. प्रभु प्रेम जागृत करने का सबसे सरल उपाय है कि प्रभु के बारे में श्रवण करना । जब हमें प्रभु की करुणा, दया और कृपा के दृष्टांत पता चलते हैं तो हमारे मन में अत्यंत वेग के साथ प्रभु का प्रेम जागृत हो जाता है ।
599. प्रभु का प्रभाव जानते ही प्रभु के लिए आदर और प्रेम हमारे हृदय में निर्माण हो जाता है ।
600. प्रभु प्रभाव में अत्यंत महान और विलक्षण हैं पर स्वभाव से अत्यंत कोमल हैं ।
601. जीव को सर्वाधिक प्रेम और श्रेष्ठ प्रेम प्रभु से ही करना चाहिए ।
602. प्रभु का गुणानुवाद सुनने से हमारे अंतःकरण में प्रभु के लिए प्रेम जग जाता है ।
603. प्रभु का नाम लेते समय और प्रभु के नाम का संकीर्तन करते समय हमारे हृदय में प्रभु के लिए प्रेम और अनुराग का भाव आना चाहिए ।
604. जब हम प्रभु की भक्ति करते हैं तो हमारी अंतर्दृष्टि स्वच्छ हो जाती है और प्रभु की झांकी हमें अंतरात्मा में दिखने लगती है ।
605. प्रभु की भक्ति से संसार से विरक्ति और प्रभु प्रेम का उदय हमारे हृदय में होने लगता है ।
606. जीवन में जब प्रभु से प्रेम करना प्रारंभ हो जाए, प्रभु का चिंतन करना प्रारंभ हो जाए तब ही जीवन की धन्यता माननी चाहिए ।
607. भक्ति करने पर प्रभु प्रेम के कारण जो संसार के लिए वैराग्य का निर्माण होता है, वह वैराग्य स्थाई होता है ।
608. हमारी भक्ति सिद्ध होने पर आत्मज्ञान का दीपक प्रभु स्वयं हमारे हृदय में जला देते हैं ।
609. भक्ति मार्ग पर चलने वाला भक्त कभी भी अशांत नहीं होता क्योंकि प्रभु से जुड़ने के बाद उसके पास स्थाई शांति, सच्ची शांति और परम शांति होती है ।
610. सच्चे भक्त का लक्षण होता है कि उसके भीतर जाति, वर्ण, ज्ञान, आश्रम, पात्रता, धन, रूप और संन्यास किसी का भी अहंकार नहीं होता ।
611. शास्त्र कहते हैं कि सृष्टि का निर्माण और विलय, यह प्रभु की एक लीला विलास मात्र है ।
612. संसार और सृष्टि हमें सत्य लगे, जो शक्ति हमें ऐसा भान कराती है, उस शक्ति का नाम माया है ।
613. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की प्राप्ति के लिए अंत में भक्ति मार्ग के अलावा कोई आलंबन नहीं है । इसलिए जितनी जल्दी साधक इस मार्ग पर आ जाए उतना ही श्रेष्ठ है ।
614. प्रभु का चिंतन करने से हमारा चित्त संसार की खटपट से मुक्त हो जाता है ।
615. हमारे घर में ऐसा वातावरण होना चाहिए कि प्रभु की चर्चा और प्रभु का गुणानुवाद नित्य घर के सदस्यों के बीच होना चाहिए । ऐसा होने पर घर के सदस्यों के पाप मूल से नष्ट होने लगते हैं ।
616. प्रभु के विषय में श्रवण करने से और बोलने से, प्रभु से एकरूपता का भान हमें होता है जिससे हमें परम संतुष्टि मिलती है और हमें परमानंद भी मिलता है ।
617. सच्चा भक्त स्वयं भी प्रभु का स्मरण करता है और दूसरों से भी प्रभु का स्मरण करवाने का प्रयास करता है ।
618. भक्ति करने पर, भक्ति के कारण ही परा-भक्ति के बीज हमारे जीवन में अंकुरित होते हैं ।
619. भक्ति के कारण ही हमारे अंदर विराजे प्रभु हमारी अंतरात्मा को परमानंद से लबालब भर देते हैं ।
620. अंतरात्मा में प्रभु से जीव के मिलन का आनंद सिर्फ भक्ति ही प्रदान करती है ।
621. प्रभु का एक स्थाई निवास हमारे हृदय में है जो केवल भक्ति करने पर ही प्रकाशित होता है ।
622. जैसे एक माता कोई वस्तु का प्रलोभन देकर बच्चों को औषधि देती है वैसे ही श्रीवेद रूपी माता सकाम उपासना का प्रलोभन देकर हमें प्रभु की भक्ति करने की प्रेरणा देती है ।
623. हमें जीवन की एक अवस्था के बाद सकाम से निष्काम भक्ति की तरफ मुड़ जाना चाहिए ।
624. जब हम प्रभु के श्रीकमलचरणों में परम विश्राम पा सकते हैं और परमानंद पा सकते हैं तो प्रभु से हमें तुच्छ सांसारिक भोगों की याचना नहीं करनी चाहिए ।
625. हमारे शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के जिस स्वरूप में हमारा मन लगे, उसी स्वरूप की आराधना करें क्योंकि वही हमारे लिए श्रेष्ठ फलदायी होता है ।
626. चाहे थोड़ा-सा भी हो पर अपनी क्षमता अनुसार प्रभु को उत्तम-से-उत्तम सामग्री का भोग पूरी तन्मयता के साथ अर्पण करना चाहिए ।
627. हमें देखना चाहिए कि हमारे परिवार की पूजा पद्धति और परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थापित होनी चाहिए ।
628. प्रभु को जिससे दुःख हो, ऐसा शास्त्र विरुद्ध आचरण जीवन में कभी भी नहीं करना चाहिए ।
629. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु में आस्था और निष्ठा नहीं रखने वाले को संसार में दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ता है ।
630. देवतागण और ऋषिगण भी कलियुग की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं क्योंकि कलियुग में भगवत् प्राप्ति का मार्ग बड़ा ही सरल है और भक्ति करके हम प्रभु प्राप्ति सुगमता से कर सकते हैं ।
631. कलियुग में भक्ति करके प्रभु की शरणागति लेने पर हमारा परम कल्याण हो जाता है और मातृ, पितृ, गुरु, ऋषि और समाज आदि सभी ऋणों से हम मुक्त हो जाते हैं ।
632. प्रभु हमारे सबसे समीप होने पर भी अगर हम भक्ति नहीं करते तो अंतकाल तक हमें प्रभु का बोध नहीं होता ।
633. प्रभु श्री दत्तात्रेयजी ने चौबीस गुरुओं के बिना सिखाए, मात्र उन्हें देखकर ही उनसे शिक्षा ग्रहण कर ली ।
634. भक्ति करने वाले साधक का जीवन स्वच्छ और पवित्र होना चाहिए । साधक की वाणी, कर्म और विचार सभी पवित्र होने चाहिए ।
635. संतजन आध्यात्मिक ज्ञान ग्रहण करके उस ज्ञान की वर्षा दूसरों के भले के लिए करते हैं ।
636. भक्ति करने वाले उत्तम साधक को जो भी मिल जाए उसमें अपना कार्य चलाने की वृत्ति रखनी चाहिए क्योंकि संतोष सबसे बड़ा धन होता है । अधिक प्राप्त करने के लिए अधिक शक्ति लगानी होती है और प्रभु की भक्ति करने वाला साधक अधिक शक्ति केवल प्रभु की साधना में ही लगाता है ।
637. जैसे श्री सागरदेवजी उत्तम रत्न को अपने तह में छुपाकर रखते हैं वैसे ही उत्तम साधक को अपने साधन के रहस्य रूपी रत्न को संसार से छुपाकर रखना चाहिए ।
638. जैसे भंवरा मात्र फूल से मधु ग्रहण कर लेता है वैसे ही साधक को शास्त्रों का सार-सार ग्रहण करना चाहिए ।
639. शास्त्र कहते हैं कि अपनी जिह्वा को जीतना बड़ा कठिन है । मछली जिह्वा के स्वाद के कारण कांटे में फंस जाती है और फंसकर मर जाती है ।
640. जिसने जिह्वा पर संयम रखना सीख लिया यानी बोलने और खाने में संयम रख लिया उसने आध्यात्मिक मार्ग पर विजय प्राप्त करने के लिए एक बड़ी लंबी छलांग लगा ली, ऐसा शास्त्र कहते हैं ।
641. संसार से आशा और अपेक्षा रखने से जब वह पूरी नहीं होती तो वह हमारे दुःख का निर्माण करती है । इसलिए शास्त्र कहते हैं कि आशा केवल प्रभु से ही रखनी चाहिए ।
642. संसार से जितनी आशा ज्यादा उतना दुःख ज्यादा । इसलिए शास्त्र कहते हैं कि आनंद पाने का रहस्य यह है कि आशा केवल और केवल प्रभु से ही रखनी चाहिए ।
643. हमारे शास्त्रों का सिद्धांत है कि दुःख बाहर से आया हुआ पदार्थ नहीं है बल्कि हम स्वयं ही हमारे दुःख को निर्माण करते हैं ।
644. बाहर के किसी भी सुख पर कभी निर्भर नहीं होना चाहिए । हमारे अंदर आनंद का स्त्रोत है जो हमें निरंतर आनंद देने में सक्षम है ।
645. प्रभु आत्म तत्व हैं जो हमें आनंद रस देने के लिए हमारे हृदय में बैठे हैं पर कोई बिरला ही होता है जो उनके पास आता है । अधिकतर जीव बाहर ही सुख को खोजते हैं यानी इंद्रियों के भोग से सुख के लिए प्रयास करते हैं जो मात्र व्यर्थ का श्रम होता है ।
646. शास्त्र कहते हैं कि जितना संसार से वैराग्य अधिक होगा उतना ही हमारा हृदय में आनंद भी अधिक होगा ।
647. जीवन की किसी भी परिस्थिति के कारण वैराग्य आ जाए, वह अंत में हमारा कल्याण ही करता है ।
648. शास्त्र कहते हैं कि संसार की जिस वस्तु को पकड़ने से हमारी शांति चली जाए, उस वस्तु को तुरंत छोड़ देना चाहिए ।
649. जीवन में सर्वाधिक मूल्यवान है - हृदय की शांति । इसलिए हमारी शांति का नाश करने वाली कोई वस्तु या पद का तुरंत परित्याग करना चाहिए ।
650. शास्त्र कहते हैं कि जो जीव शांति को दांव पर लगाकर संसार करता है वह अपनी बहुत बड़ी हानि कर लेता है ।
651. शास्त्रों का बताया हुआ सिद्धांत है कि जितना संग्रह ज्यादा उतनी शांति कम, जितना संग्रह कम उतनी शांति ज्यादा । इसलिए शास्त्र कहते हैं कि जितना उपयोग के लिए और बुढ़ापे के लिए जरूरी है उतना ही संग्रह करना चाहिए ।
652. अधिकतर लोग आज संसार का इतना बोझ और इतनी चिंता लेकर घूमते हैं, इतने गंभीर रहते हैं कि उन्होंने शांत और खुश रहना जैसे भुला ही दिया है ।
653. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु का चिंतन करना चाहिए और अपनी चिंता का भार प्रभु पर छोड़ देना चाहिए ।
654. शास्त्र कहते हैं कि साधक को एकांत में अपनी साधना करनी चाहिए जो सर्वश्रेष्ठ होती है जिससे साधना में पूर्ण रूप से तल्लीन हुआ जा सके ।
655. साधक को अपनी दिनचर्या में सावधान रहना चाहिए कि उसकी दिनचर्या शांतिप्रिय हो ।
656. शास्त्र कहते है कि निरंतर प्रभु का ध्यान करने से प्रभु की स्मृति और आकृति हमारे हृदय में विराजमान हो जाती है ।
657. भक्ति हमारे जीवन में वैराग्य और विवेक दोनों जाग्रत करती है ।
658. शरीर को इतना कुशल रखना चाहिए कि शरीर प्रभु की साधना में हमारा पूरा सहयोग कर सके ।
659. हमारी इंद्रियां हमें अलग-अलग दिशा में खींचती रहती है । इस खींचतान को बंद करने का एक ही उपाय है कि अपनी इंद्रियों को प्रभु की सेवा में लगाया जाए ।
660. अनेकों-अनेक योनियों के बाद हमें मानव शरीर प्राप्त हुआ है, यह विवेक जागृत होना सबसे जरूरी है जिससे शीघ्र और तीव्र प्रयास प्रभु प्राप्ति का किया जा सके ।
661. अगर हम प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य जीवन में निर्धारित कर लेते हैं और तीव्रता से उस ओर बढ़ते हैं तो प्रभु कृपा से हमारे प्रयास में अनुकूलता आने लगती है ।
662. सारा जीवन सकामता में नहीं जाना चाहिए, धीरे-धीरे उससे निवृत्त होकर हमें निष्काम भक्ति की तरफ बढ़ना चाहिए ।
663. हमें प्रभु की भक्ति केवल प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही करनी चाहिए ।
664. प्रभु की नित्य पूजा से, कथा श्रवण से, संकीर्तन से, नाम जप से, परिवार में प्रभु की चर्चा से, प्रभु के त्यौहार को उत्सव के रूप में मनाने से हमारे भीतर भगवत् संस्कार जागृत होते हैं ।
665. भक्ति करते रहने से एक दिन जीवन में ऐसा आएगा जब हमारी बुद्धि प्रभु में स्थिर हो जाएगी ।
666. घर के मंदिर यानी श्रीठाकुरबाड़ी में परिवार के हर सदस्य को अपनी सेवा देनी चाहिए ।
667. जो हमें सबसे अच्छा लगता है, जो हमें सबसे प्रिय हो उस वस्तु को पहले प्रभु को अर्पण करना चाहिए फिर उपयोग में लेना चाहिए ।
668. परिवार के सदस्यों के बीच सत्संग होना चाहिए, प्रभु की चर्चा होनी चाहिए और प्रभु का गुणानुवाद होना चाहिए ।
669. प्रभु की भक्ति करने वाले जीव को प्रभु की कृपा मिलने लगती है फिर उसका पतन जीवन में कभी नहीं होता ।
670. प्रभु अंतिम उपदेश श्री उद्धवजी को देते हैं कि पूर्ण रूप से मेरे शरणागत हो जाओ और सिर्फ मेरे बनकर रहो ।
671. भक्ति की परिपक्व अवस्था आने पर एक दिन जीवन में ऐसा आता है कि भक्त जो जल हाथ में लेता है वह श्री गंगाजल बन जाता है, जहाँ बैठता है वह स्थान श्री काशीजी बन जाता है, मुँह से जो निकलता है वह श्रीहरि कथा बन जाती है ।
672. जिस विकार को हम छोड़ने का प्रयास करते हैं वह ज्यादा प्रबलता से हमारे भीतर बैठ जाता है । विकारों से मुक्त होने का एक ही उपाय है - प्रभु की भक्ति ।
673. जैसे चश्मा से हम जो देखते हैं चश्मा पर उसका कोई प्रभाव नहीं होता वैसे ही जो दृश्य हमें संसार के दिखें वे हमें प्रभावित नहीं करें । हमें केवल साक्षी बनकर संसार का बाहर और भीतर का खेल देखना चाहिए ।
674. हम शरणागत होकर हमारी जिम्मेदारी प्रभु को नहीं देते पर प्रभु हमारी हर जिम्मेदारी लेने को तैयार खड़े हैं ।
675. हृदय में जो शांत भाव धारण कर लेता है, वह प्रभु को बहुत प्रिय हो जाता है ।
676. अगर निरंतर हमारी बुद्धि प्रभु में लगी रहती है तो वह हमारे भीतर विकारों का दमन कर देती है, यह सिद्धांत है ।
677. शास्त्र कहते हैं कि कामनाओं का जीवन से त्याग करना सबसे बड़ा तप है ।
678. अपना स्वभाव बदलने के लिए खुद से संघर्ष करना पड़ता है इसलिए शास्त्रों में इसे सबसे बड़ा शौर्य माना गया है ।
679. शास्त्रों में प्रभु की भक्ति के लाभ को संसार का सबसे बड़ा लाभ माना गया है ।
680. जिसने अपने भीतर सबसे ज्यादा सद्गुणों का विकास किया, उसे ही सबसे संपन्न माना गया है, ऐसा शास्त्र मत है ।
681. शास्त्र कहते हैं कि जो संतुष्ट नहीं है, तृप्त नहीं है, वह संसार का सबसे बड़ा दरिद्र है ।
682. शास्त्र कहते हैं कि जिसका अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं है, वह सबसे बड़ा लाचार जीव है ।
683. संसार और माया उसे ही जीवन में बाधा देते हैं जो प्रभु का चिंतन और भजन नहीं करते ।
684. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु प्राप्ति के लिए अगर जीवन में कष्ट भी सहना हो तो सहना चाहिए क्योंकि इसका जो लाभ है वह बड़ा विशाल है ।
685. शास्त्र कहते हैं कि हमारे सुख-दुःख का कारण ग्रह, नक्षत्र, धन, पूर्व जन्म के कर्म, प्रतिकूल-अनुकूल समय नहीं है बल्कि हमारे सुख-दुःख का मूल कारण हमारा मन है ।
686. प्रभु की भक्ति से सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि हमारे मन पर हमारा नियंत्रण होने लगता है ।
687. प्रभु की सेवा में हमें अपने जीवन को अर्पण करना चाहिए ।
688. प्रभु की भक्ति से हम अपने मन और बुद्धि को सफलता से नियंत्रित कर सकते हैं ।
689. मनुष्य जीवन में पतन के बाद भी अगर हम भक्ति में लग जाते हैं तो हमारा पुनरुत्थान संभव है ।
690. सच्चे भक्त के मन में धारणा होती है कि मैं जो भी कर रहा हूँ अपने प्रभु के लिए कर रहा हूँ और मेरा जो कुछ भी है वह मेरे प्रभु का ही है ।
691. अपने मन को अधिक-से-अधिक प्रभु के स्मरण में ही लगाना चाहिए ।
692. प्रभु के सभी उत्सवों को त्यौहार के रूप में परिवार वालों के साथ मनाना चाहिए, इससे हमारी भक्ति को बल मिलता है ।
693. भक्ति की परिपक्व अवस्था आने पर हमें प्रभु का स्वरूप हर जगह दिखता है, हर हृदय में हमें अपने प्रभु विराजे हुए दिखते हैं ।
694. अपने जीवन को भक्तिमय बनाना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है ।
695. शास्त्र कहते हैं कि सभी इंद्रियों में नेत्र और वाणी सबसे बलवान इंद्रियां हैं । इसलिए इन दोनों इंद्रियों से कुछ गलत नहीं करना चाहिए और इनको संयम में रखना बहुत जरूरी है ।
696. भक्ति की परिपक्व अवस्था आती है तो हमारे हृदय में प्रभु विराजते हैं, हमारे शीश पर प्रभु का श्रीकमलचरण होता है और हमारी जिह्वा पर प्रभु का नाम होता है ।
697. शास्त्र कहते हैं कि बदलने वाले संसार की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए, कभी नहीं बदलने वाले प्रभु की तरफ ही ध्यान देना चाहिए ।
698. शास्त्र कहते हैं कि भूमि को आज तक किसी ने अपना नहीं बना पाया है । बड़े-से-बड़े चक्रवर्ती राजा भी समाप्त हो गए और उनकी राज्य सीमा भी समाप्त हो गई ।
699. हमारे श्रीग्रंथों में कथा का प्रवाह इसलिए है कि कथा के अलंकार से दृष्टांत को रोचक बनाया जा सके ।
700. प्रभु की कथा प्रवचन की तरह नहीं सुननी चाहिए बल्कि कथा का अपने हृदय में अनुभव करना चाहिए ।
701. हमें अपनी वाणी को प्रभु को अर्पण करना चाहिए और उसे संसार की व्यस्त बातों में नहीं लगाना चाहिए ।
702. हम जो भी प्रभु को अर्पण करते हैं वह अनंत गुना बढ़कर वापस हमारे पास आता है, यह प्रभु का बनाया हुआ सिद्धांत है ।
703. संसार की सभी शक्तियां शक्तिमान प्रभु के ही अधीन होती हैं ।
704. प्रमु तत्व शरीर में आता है तो शरीर चेतनमय हो जाता है, प्रभु तत्व शरीर से निकल जाता है तो शरीर जड़ हो जाता है ।
705. जीवात्मा के पास इच्छा शक्ति होती है पर उसको क्रियान्वित करने के लिए प्रभु की शक्ति की जरूरत पड़ती है । जैसे उंगली हिलाना जीव की इच्छा है पर उंगली हिलाने में जो शक्ति लगती है वह प्रभु की दी हुई होती है ।
706. इस जन्म की एक सुई भी हम अगले जन्म में संग्रह करके अपने साथ नहीं ले जा सकते । साथ जाने वाली एक ही चीज है और वह है - प्रभु की भक्ति की कमाई ।
707. कलियुग में माया की फिसलन इतनी है कि बिना प्रभु की कृपा के नैतिकता जीवन में टिक ही नहीं सकती ।
708. प्रभु उनके साथ आज भी बोलते हैं जो अपने जीवन में प्रभु की बातें सुनते और मानते हैं ।
709. आनंद प्रभु से आता है यानी प्रभु के पास आने से आता है और प्रभु से दूर जाने पर वह खत्म हो जाता है ।
710. प्रभु की सुंदरता हृदय में बसाने के बाद किसी दूसरी चीज को देखने की मन में इच्छा ही नहीं होती ।
711. कलियुग में असुर अस्त्र लेकर नहीं आते हैं । आसुरी तत्व हमारे भीतर जाग्रत करना ही उनका अस्त्र होता है ।
712. संत कहते हैं कि प्रभु की श्रीलीलाओं को भाव से देखना चाहिए, उनमें बुद्धि नहीं लगानी चाहिए ।
713. हमारी इंद्रियों के स्वामी प्रभु हैं इसलिए अपनी इंद्रियों से प्रभु की सेवा करनी चाहिए - यही भक्ति है ।
714. प्रभु की भक्ति करने से ही हमें प्रभु से शांति का दान मिलता है ।
715. संत व्याख्या करते हुए कहते हैं कि जो सबके मन को हर ले उन्हें श्रीहरि कहते हैं और जो श्रीहरि के मन को भी हर ले वे भक्त होते हैं ।
716. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की सबसे बड़ी सेवा शास्त्रों में अंकित प्रभु की आज्ञा का पालन करना है ।
717. संत कहते हैं कि प्रभु से मांगना ही है तो सबसे मूल्यवान और प्रभु की सबसे प्रिय वस्तु भक्ति ही मांगनी चाहिए ।
718. संसार में दुःख की कमी को ही सुख मान लिया जाता है । संसार सुख में ही उलझा रहता है और प्रभु की भक्ति से मिलने वाले आनंद, परमानंद और ब्रह्मानंद की तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता ।
719. हमें अपने भौतिक स्वास्थ्य से भी कहीं ज्यादा अपने आध्यात्मिक स्वास्थ्य की चिंता करनी चाहिए ।
720. भक्ति का जीवन में उदय होने पर ही जीव प्रभु की शरण में जाता है ।
721. हमारी जिह्वा स्वाद और वाणी को नियंत्रित करती है । इसलिए जिसने अपनी जिह्वा पर काबू कर लिया उसने मानो एक बहुत बड़ा आंतरिक युद्ध जीत लिया ।
722. प्रभु को भोग लगाकर भोजन पाने से प्रभु की कृपा उस भोजन में समा जाती है क्योंकि वह प्रसाद का रूप ले लेता है ।
723. संत कहते हैं कि प्रभु के प्रसाद के अलावा कुछ भी ग्रहण नहीं करने का नियम जीवन में लेना चाहिए । जो प्रभु को अर्पण नहीं हुआ वह चीज हम ग्रहण करते हैं तो मानो हम पाप ही ग्रहण कर रहे हैं ।
724. प्रभु पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए, प्रभु की चर्चा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और प्रभु के मनन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ।
725. जो जीव अपना समय संसार की व्यर्थ चीजों में खर्च कर देता है और प्रभु की भक्ति नहीं करता वह अपनी बहुत बड़ी हानि कर लेता है ।
726. कोई भी कार्य को जब तक प्रभु से नहीं जोड़ा जाता तब तक वह हमें पुण्य प्रदान नहीं करता ।
727. प्रभु की सृष्टि में प्रभु के बनाए नियम और कानून की हमें सदैव पालना करनी चाहिए ।
728. प्रभु की कृपा देखें कि हर पेड़ के फल में अगले पेड़ के लिए बीज हमें मिल जाते हैं ।
729. जो योग हमें प्रभु से जोड़े वही सच्चा योग कहलाता है ।
730. प्रभु की शरण में आने पर ही हम माया के प्रभाव से बच सकते हैं ।
731. जो कर्म हम प्रभु के लिए करते हैं और प्रभु को अर्पित करते हैं वह कभी हमारे बंधन का कारण नहीं बनता ।
732. धर्म के सिद्धांतों से विहीन जीव को शास्त्रों में मनुष्य नहीं बल्कि पशु माना गया है ।
733. हमें अपने मन को मक्खी की तरह संसार की गंदगी में नहीं बैठने देना चाहिए । हमें अपने मन को प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही बैठाना चाहिए ।
734. शास्त्र कहते हैं कि एक भक्त को छोड़कर संसार में कोई भी प्राणी नहीं है जो सांसारिक इच्छा से रहित हो सकता है ।
735. भक्त प्रभु की भक्ति करता है बिना किसी सांसारिक इच्छा को रखे क्योंकि उसे पता होता है कि उसकी सभी आवश्यकता की पूर्ति प्रभु अपने आप ही करेंगे ।
736. हम जब प्रभु की भक्ति करने लगते हैं तो हमारी भक्ति की रक्षा भी प्रभु ही करते हैं ।
737. भक्ति ही एकमात्र सनातन योग है क्योंकि प्रभु साक्षात्कार के बाद भी भक्ति सनातन बनी रहती है और निरंतर बढ़ती ही जाती है ।
738. अपने भीतर से कलियुग को खत्म करना है तो अपने भीतर से गलत प्रवृत्तियों को खत्म करना होगा, यही इसका एकमात्र उपाय है ।
739. शास्त्रों के उपदेश का अधिकारी वही जीव है जो उस उपदेश के सार को जीवन में उतारने की इच्छा रखता है ।
740. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु की भक्ति करने वाला किसी भी परिस्थिति में अपने मन के संतुलन को नहीं खोता ।
741. हमारे श्रीग्रंथों के मार्गदर्शन में हमें अपना विवेक जागृत करना चाहिए जिससे जीवन में हर निर्णय में वे हमारे सहायक हो सकें ।
742. शास्त्र कहते हैं कि जो व्यक्ति खुद मान नहीं चाहता पर दूसरों को मान देता है, वह सबमें श्रेष्ठ होता है ।
743. शास्त्र कहते हैं कि दूसरों की गलती को प्रेम से क्षमा करना श्रेष्ठ होता है ।
744. हम शरीर की शुद्धि स्वयं कर सकते हैं पर मन की शुद्धि प्रभु कृपा के बिना संभव नहीं है । प्रभु की कृपा होती है तभी हमारा मन शुद्ध रहता है ।
745. अशुद्ध तरीके से और अनैतिकता से कमाए हुए धन की महिमा शास्त्रों में कहीं भी नहीं है ।
746. वानप्रस्थ अवस्था में आने पर हमें संतुष्ट रहना चाहिए, इच्छा रहित रहना चाहिए, संयम का पालन करना चाहिए और शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए ।
747. शास्त्रों में धर्म आचरण से चलने वाले गृहस्थ को बहुत वंदनीय माना गया है ।
748. अपने मुँह से बखान करने से अपने पुण्य का ह्रास होता है ।
749. शास्त्र कहते हैं कि दूसरों द्वारा किए पुण्य कर्मों का आदर करने में हमें कभी पीछे नहीं रहना चाहिए ।
750. गलत प्रकार से संपत्ति बढ़ाने के प्रयास को शास्त्रों में गलत माना गया है ।
751. शास्त्र कहते हैं कि कामना के त्याग में जो सुख है वह कामना पूर्ति में भी नहीं है ।
752. हमारे शास्त्रों की प्रधान बातों को और जीवन उपयोगी सूत्रों को जीवन में उतारना चाहिए ।
753. शास्त्र कहते हैं कि अपने सहने की क्षमता को हमेशा बढ़ाते चलना चाहिए ।
754. शांति से बैठकर कभी-कभी हमें अपने दोषों और विकारों का चिंतन भी करना चाहिए ।
755. शास्त्र कहते हैं कि ऐसा कोई कर्म कभी नहीं करना चाहिए जिससे हमें बाद में लज्जित होना पड़े ।
756. शास्त्र कहते हैं कि देवतागण जब हमारी प्रभु निष्ठा को देखते हैं तो वे भी हमारा अभिनंदन करते हैं ।
757. विपत्ति काल में प्रभु पर पूर्ण निष्ठा रखने वाले की प्रभु स्वयं पूर्ण रूप से मदद करते हैं ।
758. शास्त्र कहते हैं कि लोभ ही समस्त पापों का मुख्य कारण होता है ।
759. शास्त्र कहते हैं कि जीवन में संयम और संतोष रखना सारे पुण्यों का मूल होता है ।
760. जीवन में संयम और संतोष का अभ्यास करने वाला ही सुख की नींद सो सकता है, ऐसा शास्त्र मत है ।
761. शास्त्र कहते हैं कि हमें यह देखना चाहिए कि हमारे अंदर कितना संयम जागृत हुआ, हमारी वाणी में कितनी मधुरता आयी और हमारा लोभ कितना कम हुआ ।
762. किसी भी जीव का किसी जीव के साथ सनातन संबंध नहीं है । जीव का सनातन संबंध मात्र और मात्र प्रभु के साथ ही है ।
763. हमें जो भी मिला है सब कुछ प्रभु का दिया हुआ है तो फिर हमारा क्या है - हमारे सिर्फ प्रभु हैं, यह एक भक्त का दृष्टिकोण होता है ।
764. हमारे शास्त्रों के श्रवण के बिना मनुष्य के विवेक की जागृति कदापि नहीं होती ।
765. शास्त्र कहते हैं कि जिसकी तृष्णा, इच्छा और कामना ही समाप्त हो गई उसे संसार में कौन दुःखी कर सकता है ?
766. प्रभु की भक्ति से हमारा चित्त शांत हो जाता है, इससे बड़ी जीवन की कोई उपलब्धि नहीं है ।
767. भक्ति से प्रभु का चिंतन करने से प्रभु के सद्गुण हमारे जीवन में धीरे-धीरे उतरने लग जाते हैं ।
768. प्रभु श्री रामजी के रूप के चिंतन के साथ-साथ प्रभु श्री रामजी के सद्गुणों का चिंतन करना कितना श्रेष्ठ होता है । इससे उन सद्गुणों का अपने जीवन में विकास करने की हमें प्रेरणा मिलती है और प्रभु की असीम कृपा भी मिलती है ।
769. प्रभु ने हमें क्या-क्या नहीं दिया, यह सबको हर समय याद रहता है । पर प्रभु ने हमें क्या-क्या दिया है, क्या यह हमें हर समय याद रहता है ?
770. यदि हमारे श्रीग्रंथों को पढ़ने की या श्रवण करने की हमें भीतर से प्रेरणा होती है तो इसे प्रभु की असीम कृपा माननी चाहिए ।
771. प्रभु की शरणागति से मानव जीवन को उसके सर्वोच्च अवस्था तक ले जाया जा सकता है ।
772. शरीर को श्रीमद् भगवद् गीताजी के टीकाकार ने वस्त्र की उपमा दी है । जैसे हम वस्त्र बदलते हैं उसी प्रकार प्रभु का चेतन यह शरीर रूपी वस्त्र बदलता रहता है ।
773. संसार के पास फंसाने वाला, गिराने वाला आकर्षण है । प्रभु के पास परमानंद वाला, मोक्ष वाला आकर्षण है ।
774. संसार में सुख आने से हमारा पतन नहीं होता । शास्त्र कहते हैं कि सुख आने से जब हमारी भक्ति और सत्संग छूट जाता है, तब हमारा पतन होता है ।
775. विपत्ति काल में भी धर्म का आचरण नहीं त्यागने वाले जीव पर प्रभु असीम कृपा करते हैं ।
776. प्रभु में हमारी श्रद्धा को कभी भी शिथिल नहीं होने देना चाहिए ।
777. भोग भोगने से हमारी भोग इच्छा प्रज्वलित होती जाती है, संयम रखने से ही वह ठंडी पड़ती है ।
778. प्रभु में अपने मन को लगा लिया तो यह अमृतत्व का मार्ग है ।
779. प्रभु से जब हम कुछ मांगते हैं तो मांगकर हम प्रभु को सीमित कर देते हैं । पर प्रभु से जब हम कहते हैं कि जो आपको अच्छा लगे वह करें तो हम प्रभु को स्वतंत्र कर देते हैं । स्वतंत्र होते ही प्रभु हमारी कल्पना से भी बहुत ज्यादा हमारा भला करते हैं ।
780. हमने अपने आध्यात्मिक विकास के लिए आज के दिन क्या किया, यह हमें रोज सोचना चाहिए ।
781. चित्त को प्रभु के चिंतन में एकाग्र करने से हमारी इंद्रियों का गलत दिशा में वेग स्वतः ही नियंत्रित हो जाता है ।
782. शास्त्र कहते हैं कि हमें अपने अंतःकरण में एक पक्का विश्वास जागृत करना चाहिए कि प्रभु को छोड़कर मेरा अपना और कोई नहीं है । जीवनभर ऐसा विश्वास रखने वाले का अंत में प्रभु से मिलन हो जाता है ।
783. एक भक्त की धारणा होती है कि उनके जीवन में जो कुछ भी करना है वह उनके प्रभु को ही करना है और वे प्रभु को ही करने देते हैं ।
784. हमारे द्वारा किए हुए अच्छे कर्म हमें जन्म-जन्मांतर के बाद भी अपना फल देते ही हैं । हमारे विकास का मूल कारण हमारे पुरुषार्थ के साथ हमारे पूर्व में किए सत्कर्म ही होते हैं ।
785. अपने पूर्व के कर्मफल को हमें खुशी-खुशी भोगना चाहिए और इस वर्तमान जीवन को हमें सत्कर्म करने में लगाना चाहिए ।
786. जो नित्य प्रभु की भक्ति करता है, पूजन करता है, जप करता है उसका भाग्योदय एक दिन निश्चित होकर ही रहता है ।
787. शास्त्र कहते हैं कि पूर्ण तरह से शुद्ध धन, जो परिश्रम से आता है, वही प्रभु कार्य के लिए सबसे उपयुक्त होता है ।
788. भगवती गंगा माता के दर्शन मात्र से हमारे पापों का नाश होता है । संत तो यहाँ तक कहते हैं कि अपने घर बैठे ही भगवती गंगा माता का अत्यंत भाव के साथ स्मरण कर लिया जाए तो भी हमारे पापों का नाश हो जाता है ।
789. जो जीव प्राणी मात्र पर दया करता है वह प्रभु को अत्यंत प्रिय हो जाता है ।
790. गौ-माता का ध्यान रखना, गौ-माता के लिए धन का दान देना, गौ-माता की सेवा करना अति उत्तम फल देता है ।
791. जिस मनुष्य के पीछे उसके पुण्य खड़े हो जाते हैं उसका सभी जगह अभिनंदन होता है ।
792. जिस घर में प्रभु का नित्य संकीर्तन होता है, अशुभ शक्तियों का प्रवेश वहाँ स्वतः ही पूर्ण रूप से प्रतिबंधित हो जाता है ।
793. शास्त्र विरुद्ध आचरण जीवन में कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे हानि-ही-हानि होती है ।
794. शास्त्र कहते हैं कि देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी इतने कृपालु हैं कि जीवन की हर समृद्धि उनकी कृपा से अर्जित की जा सकती है ।
795. प्रभु की कृपा हमें समृद्धि भी देती है और सद्बुद्धि भी देती है, जिससे समृद्धि की हम रक्षा कर सकें ।
796. शास्त्र कहते हैं कि जो स्त्री अपने पतिव्रत धर्म का पूर्ण रूप से पालन करती है वह अपने दोनों कुल के लिए सौभाग्य बन जाती है और स्वयं का भी कल्याण करती है और अपने दोनों कुल को भी पवित्र करती है ।
797. पांडवों का सबसे बड़ा सौभाग्य यह रहा कि उन्होंने प्रभु के श्रीकमलचरणों का कभी भी जीवन में एक पल के लिए भी परित्याग नहीं किया ।
798. हमारे घर की श्री ठाकुरबाड़ी में प्रभु के विग्रह में प्रभु का विराट और पूर्ण विश्व स्वरूप समाहित है ।
799. जीव का सर्वोच्च धर्म है कि प्रभु की भक्ति करना, प्रभु का नाम जप करना, संकीर्तन करना और प्रभु को रोजाना साष्टांग दंडवत प्रणाम करना ।
800. श्री भीष्म पितामह ने बाणों की शय्या से अंतिम उपदेश श्री युधिष्ठिरजी को दिया कि प्रभु की भक्ति का कभी भी जीवन में त्याग नहीं करना चाहिए और अपनी बुद्धि को कभी भी प्रभु के श्रीकमलचरणों के आश्रय को छोड़ने नहीं देना चाहिए ।