| 001. |
जो भक्ति अखंड होती है उसे ही प्रभु स्वीकार करते हैं । इसलिए भक्ति का उपक्रम जीवन में स्थाई रूप से होना चाहिए । |
| 002. |
भक्ति को श्रद्धा और भावना की खाद से और आंसुओं के जल से सींचा जाए तो वह आनंद और परमानंद की बेल बन जाती है । |
| 003. |
कोई भी सद्गुरु भक्ति का बीज डालने से ज्यादा कार्य नहीं कर सकता । बीज को हमें स्वयं अपने प्रयास से और अपनी श्रद्धा और भावना से सींचना पड़ता है । |
| 004. |
प्रभु के यहाँ ऐसा न्याय है कि पाप की सजा धीरे-धीरे मिलती है पर मिलती बड़ी सटीक है और बड़ी जोरदार है । |
| 005. |
संत कहते हैं कि प्रभु ने अपने पास से सभी चीजें संसार में बांट दी । बस दो ही चीज संसार में नहीं गई - शांति और परमानंद । यह दोनों संसार में नहीं मिलेगी, केवल प्रभु के पास आने पर ही मिलती हैं । |
| 006. |
आध्यात्मिक मार्ग में बाहर की तीर्थ यात्रा से भी बहुत ज्यादा उपयोगी अपने अंतःकरण की अंतर्यात्रा है । |
| 007. |
संत कहते हैं कि प्रभु से कुछ नहीं मांगना चाहिए, प्रभु से प्रभु को ही मांग लेना चाहिए । |
| 008. |
प्रभु से मांगना चाहिए कि हमारी भक्ति और भजन निरंतर जीवन में बढ़ता रहे । |
| 009. |
संत कहते हैं कि प्रकृति की सुंदरता में मत फंसे, फंसना ही है तो इस प्रकृति को बनाने वाले प्रभु की सुंदरता में फंसें । |
| 010. |
कभी भी प्रभु की भक्ति को बुढ़ापे के लिए नहीं छोड़ना चाहिए और जवानी को भोग भोगने में व्यर्थ नहीं करना चाहिए । |
| 011. |
हम संसार में कहीं भी रहें पर हमारा मन प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही लगा रहना चाहिए । |
| 012. |
संसार से विरोध किए बिना अपनी भक्ति को बढ़ाना चाहिए जैसे भक्तों और संतों ने करके दिखाया है । भगवती मीराबाई ने संसार का विरोध सहकर भी अपनी भक्ति को पराकाष्ठा तक पहुँचाया । |
| 013. |
संत कहते हैं कि पहले प्रभु की करुणा जीवन में आएगी फिर करुणानिधान प्रभु जीवन में आएंगे । |
| 014. |
संसार के विषय वासना में मन लगाने से मन कठोर होता है । प्रभु की भक्ति और भजन करने से मन कोमल होता है । |
| 015. |
सबसे बड़ा भाग्यहीन वह है जिसके पास प्रभु के लिए जीवन में समय नहीं है । |
| 016. |
हमें मनुष्य जीवन भोग भोगने के लिए नहीं मिला बल्कि भगवत् प्राप्ति करके इसे अंतिम जन्म बनाने के लिए मिला है । |
| 017. |
सबसे बड़ा योग तब सिद्ध होता है जब भक्ति करके प्रभु को हम अपने जीवन के केंद्रबिंदु में ले आते हैं । |
| 018. |
सनातन धर्म में प्रभु के लिए श्रद्धा का बहुत ऊँचा स्थान है । एक पाषाण में श्रद्धा आ जाए तो वह प्रभु श्री शालिग्रामजी बन जाते हैं, जल में श्रद्धा आ जाए तो वह चरणामृत बन जाता है । |
| 019. |
शास्त्र कहते हैं कि कोई चमड़ी का दास है तो कोई धन का दास है पर जो सच्चे दास होते हैं वे प्रभु के दास होते हैं । |
| 020. |
शास्त्र कहते हैं कि जब हमारे दांत नहीं आए थे तो भी प्रभु ने माता के स्तनों से हमें दूध दिया, यह प्रभु की कितनी विलक्षण कृपा है । |
| 021. |
अकेले ज्ञान और वैराग्य में क्षमता नहीं कि वे प्रभु को प्रकट कर दें पर जब ज्ञान और वैराग्य में भक्ति जुड़ जाती है तो प्रभु प्रकट हो जाते हैं । |
| 022. |
हमारी कोई भी विशेषता या हुनर हमारा अपना नहीं है, प्रभु का दिया हुआ प्रसाद है । इसलिए उस विशेषता या हुनर को सर्वप्रथम प्रभु के कार्य में लगा देना सबसे श्रेष्ठ होता है । |
| 023. |
हमारे जीवन में जो भी विशेषता है उसे प्रभु की कृपा मानेंगे तो हमारा अहंकार खत्म हो जाएगा । |
| 024. |
संसार की प्रतिकूलता का सदुपयोग करना चाहिए क्योंकि इससे प्रभु मिलन का द्वार खुलता है । |
| 025. |
जीवन की हार को यानी प्रतिकूलता को प्रभु की भक्ति करके हम जीत में बदल सकते हैं । |
| 026. |
हमारी शक्ति हमें संसार करने में नहीं बल्कि भक्ति करने में लगानी चाहिए । |
| 027. |
अपने भक्त की कीर्ति और महिमा सुनकर प्रभु को अत्यंत सुख मिलता है । |
| 028. |
अगर हमारी रुचि सत्कर्म में है तो इसे प्रभु की विलक्षण कृपा माननी चाहिए । |
| 029. |
जो प्रभु से कुछ नहीं मांगता, प्रभु उसके पीछे-पीछे उसका कल्याण करने के लिए सदैव चलते हैं । |
| 030. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों में हमारा सदैव के लिए आश्रय हो जाए, यह अधिकार प्रभु से मांगना चाहिए । |
| 031. |
प्रभु जब बहुत प्रसन्न होते हैं तो हमें सत्कर्म करने की प्रेरणा और सत्संग की प्रेरणा देते हैं । |
| 032. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारा हृदय अगर कोमल है तो प्रभु हमें बहुत कोमल प्रतीत होते हैं । हमारा हृदय पाषाण जैसा है तो प्रभु हमें कठोर प्रतीत होंगे । |
| 033. |
भाव से प्रभु की भक्ति करने से हमारा संसार सागर से बेड़ा पार हो जाता है । |
| 034. |
कौरव सौ थे, हमारे भी सौ बुरे विचार जीवन में आते हैं । पांडव पांच थे, हमारे भी जीवन में पांच ही अच्छे विचार आते हैं । उन पांच अच्छे विचारों को पांडवों की तरह प्रभु को समर्पित कर देने से हमें जीवन में विजय मिलती है । |
| 035. |
दुनियादारी में ही पूरा जीवन रम जाना प्रभु के धाम जाने का रास्ता नहीं है । प्रभु की भक्ति करना ही प्रभु के धाम जाने का रास्ता है । |
| 036. |
एक सच्चा भक्त अपनी मृत्यु को भी एक उत्सव मानता है क्योंकि वह प्रभु मिलन की उसकी बेला होती है । |
| 037. |
हर दिशा से प्रभु अपने भक्त का मंगल करते हैं और हर दशा में प्रभु अपने भक्त का मंगल करते हैं । |
| 038. |
प्रभु की भक्ति जो हम करते हैं, प्रभु का नाम जो हम लेते हैं वह कभी भी व्यर्थ नहीं जाता । |
| 039. |
संत कहते हैं कि दुनिया के साधारण सेठ भी अपना नाम नहीं डूबने देते, ऐसे ही यह सेठों के महासेठ प्रभु कभी अपने नाम पर दाग नहीं लगने देते । इसलिए जो प्रभु नाम का आश्रय लेता है वह भवसागर से निश्चित तर जाता है । |
| 040. |
जगत के लिए रोने वाले तो बहुत हैं पर प्रभु के लिए प्रेम में रोने वाला कोई बिरला ही होता है । |
| 041. |
प्रभु का चिंतन ही हमें प्रभु की प्राप्ति तक ले जाने वाला साधन है । |
| 042. |
भगवती मीराबाई की भक्ति को कालकूट जहर भी नहीं मार पाया । भक्ति का सामर्थ्य इतना बड़ा होता है । |
| 043. |
आज भी कण-कण में प्रभु विराजमान हैं पर उन्हें प्रकट करने वाला कोई श्री प्रह्लादजी जैसा भक्त चाहिए । |
| 044. |
संगीत के राग से भी कहीं ज्यादा प्रभु भाव और श्रद्धा से गाया हुआ भजन सबसे ज्यादा पसंद करते हैं । |
| 045. |
प्रभु से जीवन में केवल प्रभु का प्रेम और प्रभु की भक्ति ही मांगनी चाहिए । |
| 046. |
हम खेत में पसीना बहाते हैं तो अनाज प्रकट होता है और हम भक्ति में पसीना बहाते हैं तो अनाज प्रकट करने वाले ही प्रकट हो जाते हैं । |
| 047. |
जीवन में कभी नहीं कहना चाहिए कि मेरे सारे सहारे टूट गए क्योंकि प्रभु अंतिम सहारे होते हैं जो हमें कभी नहीं बिसराते । |
| 048. |
जीवन में हमेशा प्रभु की प्रसादी का सर्वोच्च सम्मान करना चाहिए । |
| 049. |
राजा श्री बलिजी ने अपना आत्म-निवेदन प्रभु से करके एक नया शब्द प्रकट किया जिसे कहते हैं - बलिदान । बलिदान का आध्यात्मिक अर्थ होता है कि अपना तन, मन और धन प्रभु को देना, यही बलिदान का श्रेष्ठतम अर्थ संतों ने किया है । |
| 050. |
अपने जीवन के समय का श्रृंगार प्रभु को करने से यानी समय प्रभु को देने से समय भी अनुकूल होकर हमारा श्रृंगार करता है । |
| 051. |
संत कहते हैं कि जो समय हमने भक्ति, भजन और पूजन में अर्पण किया वह जैसे प्रभु की तिजोरी में जमा हो गया और जो समय हमने दुनियादारी में अर्पण किया वह जैसे संसार के कूड़ेदान में डाल दिया । |
| 052. |
शास्त्र कहते हैं कि प्रभु स्वतंत्र हैं पर प्रभु कहते हैं कि मैं अपने भक्तों के अधीन हूँ और भक्तों से बंधा हुआ हूँ । |
| 053. |
प्रभु के नाम जैसा विपत्ति काल में हमारा कोई भी रक्षक नहीं है । |
| 054. |
संत कहते हैं कि दुनिया की डोर प्रभु के श्रीहाथों में है पर प्रभु की प्रेम डोर भक्तों के हाथ में होती है । |
| 055. |
शास्त्र कहते हैं कि श्रीगंगा, श्रीगीता, श्रीगायत्री, श्री गौ-माता और श्रीगोविंद में कोई भेद नहीं है । |
| 056. |
भक्त भाव देते हैं कि हमारे आंसू प्रभु के श्रीकमलचरणों की धोवन बन जाएं और हमारी आँखों की पलक प्रभु को हवा देने वाले पंखे बन जाएं । |
| 057. |
संत कहते हैं कि संसारी श्री लक्ष्मीजी के आने पर खुश होते हैं पर भक्त श्री लक्ष्मीनारायणजी के आने पर आनंद मनाते हैं । |
| 058. |
असाधारण भक्त वह होता है जिसे प्रभु केवल मंदिर में ही नहीं बल्कि हर जगह प्रभु दिखते हैं । |
| 059. |
सबसे श्रेष्ठ आशीर्वाद जो हम किसी को दे सकते हैं वह यह कि प्रभु की भक्ति उसके जीवन में आए । |
| 060. |
संत कहते हैं कि दुनिया में ऐसा कोई पाप नहीं जिसका प्रभु नाश नहीं कर सकते और ऐसा कोई दुःख नहीं जिसको प्रभु खत्म नहीं कर सकते । |
| 061. |
संत कहते हैं कि दुनिया को दुःख बताने से वह दुःख बरकरार रहता है, केवल प्रभु को ही वह दुःख निवेदन करने से उस दुःख का निवारण होता है । |
| 062. |
श्रीबृज पर कोप करने के लिए श्री इंद्रदेवजी ने प्रलयकारी मेघ भेजे पर प्रभु की शरण लेने पर बृजवासियों की प्रलय पर भी विजय हो गई । |
| 063. |
लौकिक दृष्टि से लगता है कि हम अपने परिवार को पाल रहे हैं पर असल में सबके परिवार को प्रभु ही पालते हैं । |
| 064. |
श्री गिरिराजजी की महिमा प्रभु ने अपनी श्रीलीला में बहुत बढ़ा दी । सूत्र यह है कि जिस पर प्रभु कृपा करते हैं उसकी महिमा बहुत बढ़ जाती है । |
| 065. |
हर युग और हर काल में जीवात्मा को परमात्मा का अपने जीवन में स्वागत और सत्कार करना चाहिए । |
| 066. |
जिस दिन हम प्रभु के श्रीकमलचरण में पूर्ण रूप से आश्रित हो जाते हैं, हम महाभाग कहलाने योग्य बन जाते हैं । |
| 067. |
संसार के दरवाजे पर हमें ठोकर ही मिलती है, पर प्रभु के द्वार पर हमेशा हमारा स्वागत ही होता है । |
| 068. |
किसी को भी प्रभु के मंदिर में प्रभु दर्शन से वंचित करना शास्त्रों में एक अपराध माना गया है क्योंकि प्रभु दर्शन और प्रभु की भक्ति के सभी अधिकारी होते हैं । |
| 069. |
एकमात्र प्रभु ही हैं जिनको चौबीस घंटे हम अपने साथ रख सकते हैं यानी चौबीस घंटे प्रभु का सानिध्य हमें मिल सकता है । |
| 070. |
संत और भक्त प्रभु का प्रेम दान पाने की अरदास भगवती माता से करते हैं । |
| 071. |
प्रभु की चाकरी करना सबसे श्रेष्ठ होता है, ऐसा मेहनताना मिलता है कि जीवन में किसी से कुछ मांगने की कभी आवश्यकता ही नहीं रहती । |
| 072. |
प्रभु की कथा ही कलियुग की व्यथा हरने वाली होती है । |
| 073. |
प्रभु की कथारूपी श्रीगंगा में डूबेंगे तो संसार सागर से तर जाएंगे । |
| 074. |
प्रभु और हमारे बीच माया का पर्दा है । आर्त भाव से हमारी भक्ति युक्त पुकार उस माया के पर्दे को हटा देती है और प्रभु को हमारे अंतःकरण में प्रकट कर देती है । |
| 075. |
जीवन में प्रभु की भक्ति को कभी भी, किसी भी परिस्थिति में छोड़ना नहीं चाहिए । |
| 076. |
अपनी भक्ति से प्रभु प्रेम का संयोग जीवन में सदैव बनाकर रखना चाहिए । |
| 077. |
हम प्रभु को याद करते हैं पर जब भक्ति की पराकाष्ठा होती है तो प्रभु भी हमें याद करने लग जाते हैं । |
| 078. |
शास्त्र कहते हैं कि वह हृदय नहीं पत्थर है जिसने प्रभु के प्रेम के मर्म को अभी तक नहीं जाना । |
| 079. |
श्री उद्धवजी श्रीब्रह्म का ज्ञान देने श्रीगोपीजन के पास गए थे और उनसे प्रभु के प्रेम का दान लेकर लौटे । सूत्र यह है कि श्रीब्रह्मज्ञान भी प्रभु के प्रेम के आगे बौना होता है । |
| 080. |
भक्त को आठों पहर केवल प्रभु से ही काम होता है क्योंकि भक्तों का संसार ही एकमात्र प्रभु होते हैं । |
| 081. |
श्रीगोपीजन प्रभु प्रेम में इतना तन्मय हो गईं थीं कि उनके शरीर के प्रत्येक अंग से प्रभु प्रेम की पुकार ही निकलती थी । |
| 082. |
संत कहते हैं कि हमें भक्ति करके प्रभु के द्वार तक पहुँचना होता है, फिर द्वार के अंदर बुलाने का काम प्रभु का होता है । |
| 083. |
भक्ति का दीपक जलाना हमारा काम है, फिर हमारे भीतर आत्मज्ञान के दीपक को जलाना प्रभु का काम है । |
| 084. |
पूतना को देखते ही प्रभु ने अपने श्रीनेत्र बंद कर लिए । संत सूत्र देते हैं कि तन सुंदर हो पर मन मैला हो तो प्रभु उस जीव को नहीं देखते हैं । |
| 085. |
संत कहते हैं कि प्रभु की शरण में आने वाले के पाप-पुण्य को प्रभु नहीं देखते हैं और उसका उद्धार कर देते हैं । |
| 086. |
प्रभु की असीम करुणा देखें कि श्रीमद् भागवतजी महापुराण में एक पापिनी पूतना को माँ जैसी गति दे दी और श्री रामायणजी में एक गिद्ध श्री जटायुजी को पिता जैसी गति दे दी । |
| 087. |
प्रभु ऋषिकेश हैं यानी हमारी इंद्रियों के स्वामी हैं । इसलिए अपनी इंद्रियों को प्रभु को समर्पित करके अपनी इंद्रियों की रक्षा का दारोमदार प्रभु को सौंप देना चाहिए । |
| 088. |
पूर्ण श्रद्धा से प्रभु की भक्ति करने वाले की परम गति प्रभु पहले ही सुनिश्चित करके रखते हैं । |
| 089. |
संत कहते हैं कि दुनिया से जाने से पहले प्रभु के नाम की जितनी कमाई कर सकते हैं कर लेनी चाहिए क्योंकि यही एकमात्र काम आने वाली कमाई है । |
| 090. |
भक्ति करके रोज प्रभु को अपने हृदय में अनुभव करने से रोज प्रभु के लिए नया भाव हृदय में जागृत होता है । |
| 091. |
भक्ति करके प्रभु के पास आते ही प्रभु हमें चौरासी लाख जन्मों के चक्कर से छुड़ा देते हैं । |
| 092. |
दुनिया में हमसे वित्त (धन) को चाहने वाले बहुत मिलेंगे पर चित्त (मन) को चाहने वाले केवल प्रभु ही हैं । |
| 093. |
माया जिस जीव को प्रभु से दूर करना चाहती है उसके भीतर प्रभु के लिए शंका और दोष का भाव पैदा कर देती है । यह माया की जीत होती है और उस जीव की जोरदार हार होती है । |
| 094. |
प्रभु की श्रीलीलाओं पर पूर्ण विश्वास करना चाहिए और उसके आध्यात्मिक उपदेश और संदेश को समझने का प्रयत्न जीवन में करना चाहिए । |
| 095. |
संत श्री कबीरदासजी आजीविका के लिए कपड़े बेचते थे । उनकी मान्यता थी कि कपड़ा बनाने वाला भी भगवान, बेचने वाला भी भगवान, खरीदने वाला भी भगवान और कपड़ा भी भगवान । एक व्यक्ति ने उनके कपड़े के सोलह टुकड़े कर दिए तो श्री कबीरदासजी खुश हो गए कि पहले मुझे कपड़े में एक भगवान दिखते थे अब सोलह भगवान दिख रहे हैं । |
| 096. |
श्री रामावतार में वनवास श्रीलीला के दौरान एक मोर अपने पंख से प्रभु के मार्ग की बुहारी करता था कि प्रभु को कंकड़ चुभकर कष्ट न हो । संत कहते हैं कि इस सेवा से प्रसन्न होकर प्रभु ने श्री कृष्णावतार में मोर के पंख को ही अपने मुकुट पर धारण कर लिया । |
| 097. |
जो जीव संसार से मेरापन छोड़ देता है वह प्रभु को अतिशय प्रिय हो जाता है । |
| 098. |
दुनिया को समय देकर हमारा समय बर्बाद होता है और प्रभु को समय देकर हमारा समय आबाद होता है । |
| 099. |
प्रभु जब बांसुरी बजाते थे तो सारे वृक्ष झूमने लगते थे कि हमारे वंश की उत्पत्ति, बांसुरी के रूप में, प्रभु के श्री होठों पर लगी है । संत सूत्र देते हैं कि अगर वंश में एक भी प्रभु भक्त हो जाता है तो पूरे वंश के पितर झूमने लगते हैं । |
| 100. |
प्रभु जब बांसुरी बजाते थे तो बंदर और हिरण खड़े होकर घंटों तक आंसू बहाते हुए बांसुरी सुनते थे, उनकी चंचलता बिलकुल खत्म हो जाती थी । संत सूत्र देते हैं कि प्रभु का संग करने से हमारे मन की चंचलता भी बिलकुल खत्म हो जाती है । |
| 101. |
भक्त जब प्रभु श्री कृष्णजी का ध्यान करते हैं तो अपने मन को प्रभु के मोर पंख में फंसा लेते हैं, वहाँ से निकलते हैं तो प्रभु के श्रीनेत्रों में फंसा लेते हैं, वहाँ से निकलते हैं तो प्रभु के श्रीकेश की उलझन में अपने मन को फंसा लेते हैं । |
| 102. |
हमें भी वैभव, धन, सत्ता, कीर्ति, पद-प्रतिष्ठा के मोह को छोड़कर प्रभु से प्रेम करना चाहिए । |
| 103. |
हम प्रभु के विग्रह में भी प्रभु को नहीं देख पाते और श्रीगोपीजन उस अवस्था तक पहुँच गईं थीं कि भंवर गीत में उन्होंने भंवर के रूप में भी प्रभु को देखा । |
| 104. |
हमें भी प्रभु के वे श्रीकरकमल उबारने को तैयार हैं जिन्होंने श्री गजेंद्रजी को उबारा था । |
| 105. |
श्री नानी बाई के भात भरने की जो कथा है वह प्रभु पर श्रेष्ठ विश्वास रखने की पराकाष्ठा की कथा है । |
| 106. |
श्री रुक्मिणी मंगल का संदेश है कि प्रभु अपने शरणागत का त्याग किसी भी सूरत में, कभी भी नहीं करते । |
| 107. |
शास्त्र कहते हैं कि जो प्रभु की रजा में राजी रहना सीख जाता है उसका जीवन हरदम आनंद-ही-आनंद से भरा रहता है । |
| 108. |
जगत में एकमात्र प्रभु ही हैं जो हमें किसी भी भय से अभयदान दे सकते हैं । |
| 109. |
अपने और अपने परिवार वालों के हाथों से घर की श्री ठाकुरबाड़ी के प्रभु के सभी सेवा कार्य होने चाहिए । हमें प्रभु का सेवा कार्य किसी सेवक के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए । |
| 110. |
शास्त्रों में वर्णन है कि श्री सुदामाजी की नाम जप में इतनी निष्ठा थी कि रोज सवा लाख नाम रत्न जप करके वे अपने खाते में जमा करते थे । |
| 111. |
संत कहते हैं कि जिसने मृत्यु से पहले जितने करोड़ नाम प्रभु के ले लिए वह उतना ही बड़ा और सच्चा करोड़पति है । |
| 112. |
मानव शरीर ने मानो हमें मौका दिया है कि जितनी प्रभु नाम की भरपूर कमाई हम कर सकते हैं उतनी हमें कर लेनी चाहिए । |
| 113. |
श्री सुदामाजी धन के धनवान नहीं बल्कि भक्ति के धनवान थे । वे ऐसा धन कमाते थे जिससे प्रभु रीझ जाते थे । |
| 114. |
प्रभु के हृदय में यह भाव था कि परा भक्ति करने वाले श्री सुदामाजी अगर श्री द्वारकापुरी आएंगे तो द्वारकापुरी पवित्र हो जाएगी । भक्त का इतना बड़ा सामर्थ्य प्रभु मानते हैं । |
| 115. |
शास्त्र कहते हैं कि जहाँ हमारे अनेक आश्रय होते हैं वहाँ प्रभु नहीं आते । जहाँ हम सिर्फ प्रभु पर आश्रित होते हैं यानी दुनिया का एक भी आश्रय नहीं होता वहाँ प्रभु सब कुछ करने तत्काल आ जाते हैं । |
| 116. |
संतों को प्रभु और भक्त के दो मिलन सबसे ज्यादा आह्लादित करते हैं । एक तो प्रभु श्री रामजी और श्री भरतजी का मिलन और दूसरा प्रभु श्री कृष्णजी और श्री सुदामाजी का मिलन । |
| 117. |
श्री सुदामाजी का चरित्र ऐसा है कि जहाँ प्रभु के वैभव और श्री सुदामाजी की गरीबी में कोई मेल नहीं था वहाँ भी प्रभु ने भक्ति के कारण अदभुत मिलन करके दिखाया । |
| 118. |
शास्त्र कहते हैं कि संतोषी व्यक्ति का तेज बहुत बढ़ जाता है । |
| 119. |
संत विनोद में कहते हैं कि पहले के समय में जीवन सोना चांदी जैसा उज्जवल होता था और बर्तन मिट्टी के होते थे । अब बर्तन सोने चांदी के होते हैं और जीवन पतित होकर मिट्टी तुल्य हो गया है । |
| 120. |
भक्त जब अपनी भक्ति के भाव के कारण प्रभु के ध्यान में लीन हो जाता है तो वह प्रभु का सबसे प्रिय बन जाता है । |
| 121. |
किसी भी तरह का भयंकर-से-भयंकर दुःख जीवन में आ जाए तो प्रभु के श्रीकमलचरणों का आश्रय लेना ही उसके निवारण का श्रेष्ठ उपाय होता है । |
| 122. |
प्रभु को उनके भक्त प्राण प्रिय होते हैं । ऐसे ही भक्ति का साधन भक्त का प्राण प्रिय साधन होता है । |
| 123. |
संसार में किसी का पोषण धन से होता है, किसी का ज्ञान से होता है, किसी का कीर्ति से होता है, किसी का पद-प्रतिष्ठा से होता है पर प्रभु के भक्त का पोषण सिर्फ भक्ति से ही होता है । |
| 124. |
भक्ति के पीछे-पीछे प्रभु चलते हैं यानी जिसके जीवन में भक्ति होती है उसके जीवन में प्रभु को आना ही पड़ता है । |
| 125. |
हमारे श्रीग्रंथों के श्रवण से, फिर उनमें बताएं सूत्रों को आचरण में उतारने से हमारा जीवन ही बदल जाता है । |
| 126. |
बुढ़ापे में शरीर के नाना रोग हमारे पीछे लग जाते हैं इसलिए जवानी को ही प्रभु की भक्ति में लगाना श्रेष्ठ होता है । |
| 127. |
जिस घर में हमारे श्रीग्रंथों का पाठ प्रभु को सुनाया जाता है वह घर नहीं, तीर्थ बन जाता है । |
| 128. |
तीर्थों में जाना और तीर्थों का सेवन करना अच्छी बात है पर भक्ति करके अपने घर को और फिर अपने मन को ही तीर्थ बना लेना सबसे श्रेष्ठ होता है । |
| 129. |
सागर की लहरों के थमने का इंतजार करने पर स्नान करने की सोचने वाला कभी भी स्नान नहीं कर पाएगा । ऐसे ही हमें संसार की लहरों के बीच से प्रभु की भक्ति करनी पड़ेगी क्योंकि संसार की लहर कभी भी थमने वाली नहीं है । |
| 130. |
हमारे श्रीग्रंथों के श्रवण की तो बात ही क्या, श्रीग्रंथों को घर में विराजमान करके उनका दर्शन करने मात्र से ही हमारे पाप नाश हो जाते हैं । |
| 131. |
हमारे श्रीग्रंथों का दर्शन यह मानकर करना चाहिए कि मैं साक्षात प्रभु का ही दर्शन कर रहा हूँ । |
| 132. |
हमारे श्रीग्रंथ हमारे पापों को नाश करने वाले, हमारे दुर्भाग्य को ठीक करने वाले और माया के फंदे को काटने वाले होते हैं । |
| 133. |
जीवन की अंतिम सफलता, अंतिम धन्यता इसी बात में है कि हमारा मन प्रभु की भक्ति में कितना डूबा है । |
| 134. |
एकमात्र भक्ति में ही सामर्थ्य है कि सर्वव्यापक प्रभु को प्रेम के कारण हमारे सामने, हमारे घर में प्रकट कर देती है । हमें प्रभु को खोजने कहीं जाना नहीं पड़ता । |
| 135. |
भक्ति प्रबल हो जाए तो प्रभु भक्त के भीतर अपने स्वरूप का प्रकाश कर देते हैं । |
| 136. |
प्रभु की जीव से बस एक ही मांग रहती है कि मुझसे प्रेम करो । प्रभु केवल प्रेम के कारण भगवती शबरीजी के जूठे किए हुए बेर पाने के लिए, श्रीगोपीजन के साथ खेलने के लिए और भगवती मीराबाई के भजन सुनने के लिए आते थे । |
| 137. |
शास्त्र कहते हैं कि ऐसा कोई पापी, कामी, संसारी, विषय भोगी आज तक जन्मा नहीं जिसने प्रभु की भक्ति की हो और तर न गया हो । |
| 138. |
संसार कभी हमें पूर्ण नहीं मिलेगा क्योंकि संसार सदा से अपूर्ण ही रहा है । परिपूर्ण केवल प्रभु ही हैं इसलिए पूर्ण रूप से केवल प्रभु ही हमें मिल सकते हैं । |
| 139. |
संत कहते हैं कि संसार के प्रपंच ने और विषयों ने आज तक किसी को सुख नहीं दिया है और न कभी देगा । |
| 140. |
धर्म के मामले में पूर्ण श्रद्धा रखनी चाहिए और तर्क नहीं करना चाहिए क्योंकि तर्क करते-करते एक समय ऐसा आता है कि हमारा तर्क ही कुतर्क में बदल जाता है । |
| 141. |
संसार की रीति है कि जो हमें सुख प्रतीत होता है वह सुख अंत में हमें दुःख ही देता है । परमानंद तो केवल प्रभु के सानिध्य में ही मिलता है । |
| 142. |
शास्त्र कहते हैं कि संसार से वैराग्य का भाव लेकर प्रभु की भक्ति करने वाले को जो आनंद मिलता है, वह आनंद एक चक्रवर्ती राजा को भी नहीं मिलता । |
| 143. |
हमारे अंतःकरण में संसार के किसी व्यक्ति या चीज के लिए नहीं बल्कि प्रभु के श्रीकमलचरणों के लिए प्रेम और लगाव होना चाहिए । |
| 144. |
शास्त्र कहते हैं कि संसार के हर रिश्ते से एक-न-एक दिन वियोग होना ही है । केवल प्रभु के साथ ही हमारा सनातन रिश्ता रहा है और सनातन रिश्ता रहने वाला है । |
| 145. |
संत कहते हैं कि संसार के प्रपंच में हम जितना फंसेंगे उतना ही अशांत होते चले जाएंगे । प्रभु के सानिध्य में जितना रहेंगे उतना ही हमें शांति का अनुभव होगा । |
| 146. |
एकांत में प्रभु के पास बैठना चाहिए और प्रभु को अपनी भक्ति और प्रेम से रिझाना चाहिए । |
| 147. |
हमारे अंतःकरण में अभी यह सोच है कि मैं संसार का हूँ, इसमें परिवर्तन होना चाहिए कि मैं संसार में किसी का नहीं हूँ ,मैं केवल प्रभु का हूँ । |
| 148. |
अपने सब कुछ का स्वामित्व प्रभु को सौंप देना चाहिए और प्रभु के सेवक की भूमिका में हमें आ जाना चाहिए । |
| 149. |
संसार में आसक्त हुए बिना हमें दुनियादारी करनी चाहिए और गृहस्थ करना चाहिए । आसक्ति केवल और केवल प्रभु के लिए होनी चाहिए । |
| 150. |
संसार का रस कुछ दिनों का है पर प्रभु के श्रीकमलचरणों का अमृत शाश्वत है । |
| 151. |
प्रभु के सानिध्य में रहकर प्रभु की भक्ति करके परमानंद प्राप्ति का लक्ष्य जीवन में रखना चाहिए । |
| 152. |
किसी भी गृहस्थ के कर्तव्य, व्यापार के कर्तव्य या दुनियादारी के कर्तव्य को भक्ति में बाधक नहीं बनने देना चाहिए । |
| 153. |
दुनिया का व्यवहार करना अगर हमारा धर्म है तो प्रभु की भक्ति करना हमारा परम धर्म है । |
| 154. |
संसार की आसक्ति को त्यागे बिना प्रभु की भक्ति का पूर्ण साधन कभी भी सफल नहीं हो सकता । |
| 155. |
सबसे सच्चा भक्त वह होता है जिसको संसार की जगह प्रभु सबसे अधिक प्रिय लगने लग जाते हैं । |
| 156. |
प्रभु की सेवा मात्र कर्म के रूप में ही नहीं करनी चाहिए बल्कि उसमें आनंद और रस लेना चाहिए । |
| 157. |
जितना भगवत् सेवा में रस लेना हम सीख जाएंगे उतना ही भगवत् रंग हम पर चढ़ता चला जाएगा । |
| 158. |
प्रभु का नाम ही सदैव से और सदैव के लिए हमारा सच्चा साथी रहने वाला है । |
| 159. |
प्रभु को दिया समय ही सार्थक होता है, संसार को दिया समय अंत में व्यर्थ ही जाता है । |
| 160. |
जितना प्रेम हम प्रभु से करते हैं उससे भी कहीं ज्यादा प्रेम बंधन में प्रभु को बांधने का जीवन में प्रयास करना चाहिए । |
| 161. |
एक दुर्गुण जीवन में आता है तो वह बहुत सारे दुर्गुणों के आने का सिलसिला जीवन में शुरू कर देता है । |
| 162. |
प्रभु की भक्ति करने वाले के जीवन में बुरी शक्तियां कभी कुछ बिगाड़ नहीं सकती । |
| 163. |
प्रभु हमें प्रिय लगें, इसके लिए हमें अपने श्रीग्रंथों का चिंतन करना चाहिए । |
| 164. |
प्रभु की भक्ति करने पर सभी आध्यात्मिक रहस्य अपने आप हमारे सामने खुल जाते हैं । |
| 165. |
जितना प्रेम हम अपने प्राणों से करते हैं उससे भी कोटि-कोटि गुना ज्यादा प्रेम हमें प्रभु से करना चाहिए । |
| 166. |
प्रभु से कुछ प्राप्त करने के लिए भक्ति नहीं करनी चाहिए, प्रभु मुझ पर प्रसन्न हों - यही एकमात्र भक्ति का कारण होना चाहिए । |
| 167. |
भवसागर से पार होने के लिए और मुक्ति के लिए प्रभु की भक्ति ही एकमात्र आधार होती है । |
| 168. |
जिनका मन प्रभु में लग गया वह अब भौतिक धन कमाने के लिए नहीं बल्कि भक्ति का धन कमाने के लिए ही जीवन में श्रम करता है । |
| 169. |
जीवन में एक छोटा-सा नियम बनाना चाहिए कि रोज प्रभु को प्रभु की कथा सुनानी है । |
| 170. |
संत कहते हैं कि हमारे श्रीग्रंथ हमें प्रेम-संन्यास सिखाते हैं यानी प्रभु के प्रेम के कारण संसार के प्रपंच से संन्यास लेना सिखाते हैं । |
| 171. |
प्रभु के लिए हमारे अंतःकरण में प्रेम के कारण भावुकता और व्याकुलता आ जाए तो हमारा कल्याण निश्चित है । |
| 172. |
सारे संसार की संपत्ति प्राप्त करने पर भी हमें वह तृप्ति प्राप्त नहीं हो सकती जो प्रभु की भक्ति करने से मिलती है । |
| 173. |
हम प्रभु की पूजा करते हैं और प्रभु से कामना करते हैं कि हमें संसार के भोग मिले, इस धर्म आचरण को शास्त्रों में गौण धर्म आचरण माना गया है । |
| 174. |
अत्यंत सरलता से और बिना विलंब के भक्ति हमें प्रभु के प्रेम बंधन में बांध देती है । |
| 175. |
भक्ति हमें हमारे इष्ट से मिला देती है जिससे जीवन के सभी अनिष्ट सदैव के लिए खत्म हो जाते हैं । |
| 176. |
इतने सारे शास्त्रों को आखिर में हमें क्या कहना है ? वे हमें सारभूत में प्रभु की भक्ति करने का ही सूत्र देते हैं । |
| 177. |
हमारा अंतिम कल्याण और परम कल्याण केवल भक्ति ही कर सकती है । संसार की कमाई जैसे धन, कीर्ति हमारा कल्याण नहीं कर सकते । |
| 178. |
संसारी प्रभु से संसार मांगते रहते हैं, योगी प्रभु से मोक्ष मांगते रहते हैं । मगर एक सच्चा भक्त, जो सच्चे रूप में निष्काम हो जाता है, वह प्रभु को छोड़कर प्रभु से कुछ नहीं मांगता, यह भक्ति की पराकाष्ठा होती है । |
| 179. |
हमारा चित्त प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकने पर वह प्रभु प्रेम से तृप्त हो जाता है । |
| 180. |
समस्त शास्त्रों का एक ही सार है कि प्रभु की भक्ति जीवन में कभी नहीं छूटे, प्रभु से प्रेम करना जीवन में कभी कम नहीं हो । |
| 181. |
श्रीमद् भगवद् गीताजी के सार रूप में प्रभु कहते हैं कि हमें अपना मन प्रभु में लगाना चाहिए और प्रभु से निश्छल प्रेम करना चाहिए । |
| 182. |
संत तीन वाक्यों में श्रीमद् भगवद् गीताजी का सार कहते हैं । पहला, प्रभु की भक्ति करो । दूसरा, प्रभु से प्रेम करो । तीसरा, प्रभु की शरणागति लेकर रहो । |
| 183. |
भक्ति होने पर प्रभु ही हमारे भीतर अध्यात्म का ज्ञान जगा देते हैं और प्रभु प्रेम के कारण संसार से हमारा वैराग्य हो जाता है । |
| 184. |
प्रभु जब सबसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं तब ही हमें अपनी भक्ति का दान देते हैं । |
| 185. |
भक्ति जीव को उस अवस्था तक पहुँचा देती है जो मानव जीवन का परम लक्ष्य और शिखर होता है । |
| 186. |
कितने ही ब्रह्मांड प्रभु के एक-एक रोमावली में समाए हुए हैं और उन ब्रह्मांडों में प्रभु ने कितने-कितने अवतार लिए हैं, यह लेखा-जोखा किसी के पास नहीं है । इसलिए ही कहा गया है कि श्रीहरि अनंत और श्रीहरि कथा अनंता । |
| 187. |
प्रभु को उन भक्तों के पास आना ही पड़ता है जिन भक्तों को प्रभु को छोड़कर जीवन में प्रभु से कुछ भी नहीं चाहिए । |
| 188. |
प्रभु के दर्शन रस की चाह श्रेष्ठ भक्तों को होती है और उनकी इस चाह की पूर्ति के लिए प्रभु अवतार लेते हैं । |
| 189. |
अपनी वाणी और कंठ को पवित्र करने के लिए हमें प्रभु का गुणानुवाद करना चाहिए । |
| 190. |
जगत का कल्याण सिर्फ उस साहित्य से होता है जिसमें प्रभु का यशगान किया गया है । सर्वोत्तम साहित्य की ऐसी व्याख्या देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने प्रभु श्री वेदव्यासजी के समक्ष की है । |
| 191. |
जिसकी भी जिह्वा पर प्रभु का नाम है, उस जीव को शास्त्रों में परम वंदनीय माना गया है । |
| 192. |
जीवन में सब कुछ प्राप्त कर लिया और भक्ति प्राप्त नहीं की तो पूरा जीवन ही व्यर्थ हो गया । |
| 193. |
केवल प्रभु की कृपा ही हमारे भाग्य की रेखा को बदल सकती है । |
| 194. |
प्रभु का गुणगान करने से और सुनने से हमारा मन क्षणभर में शांत हो जाता है । |
| 195. |
प्रभु कृपा से हमारी भीतर की आँखें खुल जाएं तो सभी श्रीग्रंथ हमारे अंतःकरण में प्रकाश करके हम पर कृपा बरसाते हैं । |
| 196. |
हमारे शास्त्रों के सिद्धांतों पर प्रश्न चिह्न खड़ा करना एक बहुत बड़ा अपराध और पाप माना गया है । |
| 197. |
हमारे शास्त्रों को शब्दार्थ से जानना एक बात है और उसका गूढ़ अर्थ समझना दूसरी और श्रेष्ठ बात है । |
| 198. |
सभी का मन धन, संपत्ति, सत्ता, पद, विषय और अलंकार में फंसता है पर किसी बिरले का ही मन प्रभु में फंसता है । |
| 199. |
प्रभु ही सर्वत्र हैं इसलिए सर्वदा हमारे अंतिम रक्षक होते हैं । |
| 200. |
मानव जीवन हमें प्रभु की प्राप्ति के लिए ही मिला है इसलिए मानव जीवन के सच्चे मूल्य को पहचानना चाहिए । जिसने प्रभु को पाने का बहुमूल्य समय केवल संसार करके व्यर्थ कर दिया उसने अपना बहुत बड़ा नुकसान कर लिया । |
| 201. |
भक्ति करना एक भक्त का परम स्वभाव बन जाता है । |
| 202. |
बिना किसी सांसारिक मनोकामना के भक्ति करना हमें सबसे श्रेष्ठ फल देता है । |
| 203. |
भगवती कुंतीजी प्रभु से कहती हैं कि पांडवों पर आपके कितने उपकार को मैं गिनाऊँ क्योंकि पांडवों को सभी विपत्तियों से बचाने वाले केवल आप ही थे । |
| 204. |
आपत्ति जीवन में आती है पर प्रभु स्मरण अगर साथ में होता है तो प्रभु भी आ जाते हैं और फिर आपत्ति चली जाती है । |
| 205. |
भक्त अपनी भक्ति के माध्यम से प्रभु का ध्यान करते हैं तो प्रभु भी प्रेम के कारण अपने भक्तों का ध्यान करते हैं । |
| 206. |
जीवन की हर वेदना को शांत करने का एकमात्र उपाय है - प्रभु की भक्ति । |
| 207. |
हमें अपनी बुद्धि और मन को प्रभु को अर्पण कर देना चाहिए । |
| 208. |
प्रभु की कृपा ही हमारे जीवन में विजय का एकमात्र कारण होती है । |
| 209. |
भक्त को जिताने के लिए कब अपनी प्रतिज्ञा को भूलना है यह प्रभु को सदैव याद रहता है । प्रभु अपनी प्रतिज्ञा टूटने देते हैं पर भक्त की प्रतिज्ञा की लाज रखते हैं । इसका जीवंत उदाहरण श्री महाभारतजी में श्री भीष्म पितामह के प्रसंग में देखने को मिलता है । |
| 210. |
अपना कल्याण चाहिए तो अपने मन को किसी व्यक्ति, विषय और वस्तु में नहीं फंसने देना चाहिए, अपने मन को केवल प्रभु के ध्यान में फंसने देना चाहिए । |
| 211. |
हम प्रभु की कितनी भक्ति करते हैं और वह भक्ति कितनी आस्था और श्रद्धा से करते हैं, यह सबसे महत्वपूर्ण बात है । |
| 212. |
भक्तों को संकट से बाहर निकालने के लिए प्रभु हमेशा तत्पर रहते हैं । |
| 213. |
पांडवों का विश्व विजयी प्रकाश पूरी दुनिया ने देखा पर संत कहते हैं कि यह प्रभु की कृपा का प्रकाश था । |
| 214. |
प्रभु की कृपा होती है तो विपत्ति काल में भी हमारा उत्थान संभव होता है, जैसा पांडवों का हुआ । |
| 215. |
एक बार भी कृपा करने के बाद प्रभु कभी भी अपना बड़प्पन हमें नहीं जताते । |
| 216. |
भगवती गंगा माता के लिए श्रद्धा केवल इस कारण से होनी चाहिए कि वे प्रभु के श्रीकमलचरणों से निकलीं हैं । |
| 217. |
प्रभु के अलावा मेरा कोई नहीं है और मैं प्रभु के अलावा किसी का नहीं हूँ, यह भाव जीवन में एक-न-एक दिन जरूर आना चाहिए । |
| 218. |
प्रभु अपनी कृपा से अपने भक्तों को जगत में बहुत महान बना देते हैं । |
| 219. |
परमात्मा तत्व की जिज्ञासा और खोज सिर्फ मानव जन्म में ही संभव है । |
| 220. |
प्रभु की भक्ति हमें सदा के लिए संसार में आदरणीय बना देती है । |
| 221. |
भगवत् चिंतन सभी साधनों का सार है । हमें अपना जीवन भगवत् चिंतन में ही बिताना चाहिए । श्री गोपीजन ने प्रेम से भगवत् चिंतन किया, कंस ने डर से भगवत् चिंतन किया और शिशुपाल ने द्वेष से भगवत् चिंतन किया और सभी का उद्धार हो गया । इससे सूत्र निकलता है कि भगवत् चिंतन निरंतर जीवन में करने से हमारा उद्धार पक्का है । |
| 222. |
भक्ति और भक्ति के अंतर्गत सभी साधन जो अंतिम चीज हमसे करवाना चाहते हैं - वह है भगवत् चिंतन । सबका उद्देश्य यह है कि हमारा भगवत् चिंतन हो । जीवन तभी सार्थक है जब भगवत् चिंतन जीवन में निरंतर होता रहे जैसा श्री गोपीजन का होता था । |
| 223. |
कौन कितना समय प्रभु के लिए बचाता है, अपने भक्तिरूपी साधन के लिए बचाता है, यह सबसे जरूरी बात है । अधिकतर लोग तो अपना पूरा समय निद्रा, कर्तव्य कर्म और नित्य कर्म में ही पूरा कर लेते हैं । |
| 224. |
अंतिम बेला जीवन की सबसे संवेदनशील होती है । अंत समय हमारा बिगड़ न जाए इसलिए प्रभु की भक्ति, प्रभु का ध्यान, प्रभु का चिंतन, प्रभु का नाम जप, प्रभु का स्मरण और संकीर्तन का नित्य अभ्यास जीवन में करना चाहिए । |
| 225. |
श्रीमद् भागवतजी महापुराण का श्रीकृष्ण चरित्र और श्री रामायणजी का श्रीराम चरित्र के श्रवण, पठन और चिंतन से बड़ा कोई सत्कर्म नहीं है जो हमें तत्काल प्रभु की कृपा दिलवा देता है । |
| 226. |
घर की श्री ठाकुरबाड़ी में कभी भी अमर्यादा या असावधानी का व्यवहार नहीं करना चाहिए । |
| 227. |
अगर भक्ति करने पर हमारे मन की चंचलता कम हुई है और हो रही है तो हम भक्ति के सही मार्ग पर चल रहे हैं, ऐसा मानना चाहिए । |
| 228. |
प्रलोभन के कारण यानी सकामता के लिए नहीं बल्कि निष्काम बनकर यानी केवल प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही हमें भक्ति का साधन करना चाहिए । |
| 229. |
जीवन में ज्यादा-से-ज्यादा समय हमें प्रभु की प्राप्ति के साधन में ही लगाना चाहिए । |
| 230. |
हमारी बुद्धि प्रभु से जुड़ी रहे, इसमें ही बुद्धि का और जीवन का सच्चा सौंदर्य है । |
| 231. |
प्रभु के श्रीकमलचरणों के ध्यान से हमें प्रगाढ़ शांति का अनुभव होता है । |
| 232. |
भक्ति हमें एक दिन उस अवस्था तक पहुँचा देती है जब प्रभु से रहित कुछ देखने का या सुनने का हमारा मन ही नहीं करता । |
| 233. |
श्रीबृज के दर्शन इस भाव से करना चाहिए कि यहाँ मेरे प्रभु ने अवतार लेकर जन्म लिया, यहाँ प्रभु ने खेला, यहाँ प्रभु ने यह श्रीलीला की, इन श्री गिरिराजजी को प्रभु ने उठाया - इस भाव से हमें दर्शन करना चाहिए । |
| 234. |
मंदिर में प्रभु के दर्शन के बाद प्रभु के वही स्वरूप का दर्शन बाहर आने पर हमारे हृदय में होना चाहिए, तभी हमने सच्चा दर्शन का लाभ लिया, ऐसा मानना चाहिए । |
| 235. |
अपने चित्त को एकाग्र करने के लिए प्रभु के एक-एक श्रीअंगों का ध्यान करना चाहिए । |
| 236. |
भक्त पर प्रभु की कृपा असीम, अनंत और बिना किसी सीमा के होती है । |
| 237. |
दुःख की बेला में प्रभु से संबंध प्रगाढ़ करने का सबसे स्वर्णिम मौका हमें मिलता है । |
| 238. |
जिसका विवेक जागृत हो जाता है उसका संसार से मोह भंग हो जाता है । अविवेकी जीव ही संसार में फंसता है । |
| 239. |
भक्ति में तीव्रता और प्रभु के लिए व्याकुलता का स्थान बहुत बड़ा होता है और बहुत मीठा होता है क्योंकि वह प्रभु को हमारे जीवन में प्रकट कर देता है । |
| 240. |
मंगल मूर्ति प्रभु जब हमारे जीवन के केंद्रबिंदु में आ जाएं, वही जीवन की सबसे मंगल बेला होती है । |
| 241. |
जिस घर में प्रभु के नाम का जप और संकीर्तन होता है विपत्ति भी उस घर को लांघकर आगे बढ़ जाती है । |
| 242. |
प्रभु की सेवा करते-करते जो प्रभु तत्व हमारे भीतर होता है, वह जागृत हो जाता है । |
| 243. |
प्रभु की दृष्टि में हम क्या हैं - इस बात का विचार करना चाहिए । संसार की दृष्टि में हम क्या हैं - इसका विचार नहीं करना चाहिए । |
| 244. |
शांति की खोज में अध्यात्म को मानना आज हमारी मजबूरी बन गई है क्योंकि संसार के विषयों ने थकाकर हमें अशांत कर दिया है । |
| 245. |
भक्ति के जागरण के लिए आज सच्चे सत्संग की परम आवश्यकता है । |
| 246. |
उत्तम साधक बनना है तो सहनशील बनना सीखना होगा । संसार के हर संत की जीवनी देख लें, सभी ने बहुत सहा है । |
| 247. |
संसार के ताप के कारण एक संसारी का अशांत हृदय देखकर प्रभु नहीं आते हैं, भक्ति के कारण एक भक्त का शांत हृदय देखकर ही प्रभु आते हैं । |
| 248. |
अध्यात्म की बातें सुनना आसान है पर अगर हम भक्ति नहीं करते तो उसे जीवन में उतारना कठिन प्रतीत होता है । |
| 249. |
प्रभु की भक्ति प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही करनी चाहिए, किसी स्वार्थ पूर्ति के लिए नहीं करनी चाहिए । |
| 250. |
भक्त के जीने का मुख्य आधार प्रभु होते हैं क्योंकि उसका परम विश्वास प्रभु में ही होता है । |
| 251. |
भक्त को प्रभु की वार्ता सुनना, पढ़ना और कहना सबसे अच्छा लगता है । |
| 252. |
जीवन में प्रभु के अलावा किसी का भी संग नहीं करना चाहिए । प्रभु का संग ही हमारी सद्गति कराने वाला संग होता है । |
| 253. |
हमें प्रभु प्राप्ति के लिए जीवन में चेष्टा करनी चाहिए । मानव देह हमें मिला ही इसलिए है क्योंकि हम प्रभु प्राप्ति के अधिकारी हैं । |
| 254. |
प्रभु से संवाद करना, बोलना हमें आरंभ करना चाहिए । हमें यह विश्वास दृढ़ करके रखना चाहिए कि प्रभु हमारी बातें सुनते हैं । बड़े-बड़े संत प्रभु से खूब बातें करते हैं । |
| 255. |
प्रभु ही हमारे जीवन के जीवनधन बन जाने चाहिए । |
| 256. |
भक्ति में एक स्थिति ऐसी आती है जब मुक्ति भी भक्त के सामने आकर झुक जाती है क्योंकि भक्त उसे स्वीकार नहीं करता । |
| 257. |
तीव्र भक्ति के कारण संसार से वैराग्य और प्रभु की शरणागति से हमारे सारे पाप और विकार नष्ट हो जाते हैं । |
| 258. |
भक्ति करने वाले के लिए अध्यात्म का मार्ग एकदम सरल हो जाता है जो वैसे कठिन प्रतीत होने वाला मार्ग है । |
| 259. |
भक्ति के लिए “कल” शब्द का प्रयोग नहीं होना चाहिए । भक्ति आज और अभी से शुरू होनी चाहिए । |
| 260. |
जो प्राप्त हो जाए उसमें ही संतोष से रहने की वृत्ति बनानी चाहिए । यह भक्ति के लिए बहुत लाभदायक होता है । |
| 261. |
अपने इष्ट का स्वरूप ही हमें सबसे महत्वपूर्ण लगना चाहिए । |
| 262. |
जब हम प्रभु के श्रीविग्रह का दर्शन कर रहे हों तो यह भाव रखना चाहिए कि साक्षात चेतन प्रभु मेरे सामने हैं । |
| 263. |
ध्यान में प्रभु की श्रीलीलाओं का दर्शन करना चाहिए । फिर उन श्रीलीलाओं में अपने आपको देखना आरंभ करना चाहिए कि मैं भी प्रभु की श्रीलीला में शामिल था । |
| 264. |
ध्यान करने में प्रभु के श्रीकमलचरणों की कोमलता का ध्यान करना चाहिए और प्रभु के मुखारविंद के शांत भाव का ध्यान करना चाहिए । |
| 265. |
ध्यान करें कि हमारा मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुका है और वह अब कितना पवित्र हो गया है । |
| 266. |
ध्यान करें कि प्रभु का मेरे हृदय में वास है जिस कारण अब मेरे सभी पापों का नाश हो गया है । |
| 267. |
एकांत में बैठकर अपने मन मंदिर में प्रभु को अपनी आँखों की पलकों पर झूला झुलाना चाहिए । |
| 268. |
ध्यान करें कि प्रभु अपने चक्रराज श्री सुदर्शनजी को लेकर मेरी रक्षा के लिए खड़े हैं । |
| 269. |
निर्गुण प्रभु हम पर अनुकंपा करने के लिए सगुण साकार रूप लेते हैं जिससे हम उनकी सुंदरता और कोमलता का ध्यान कर सकें । |
| 270. |
एक संकल्प लें कि अपना दुःख और कष्ट अब मैं केवल प्रभु से कहूँगा, संसार में किसी से नहीं कहूँगा । |
| 271. |
संतों का अनुभव है कि प्रभु के ध्यान में जाना उनका कार्य है पर ध्यान से लौटना उनके हाथ में नहीं होता है । जब प्रभु छोड़ते हैं तभी वे ध्यान से वापस लौट पाते हैं । |
| 272. |
जब हम ध्यान लगने पर मन से निष्क्रिय हो जाते हैं तो प्रभु हमारे अंतःकरण में सक्रिय हो जाते हैं । |
| 273. |
भक्ति से हमारा हृदय पिघलता है और हमारे नेत्रों से अश्रुधारा बह निकलती है, रोम-रोम रोमांचित हो उठता है और कंठ अवरुद्ध हो जाता है । |
| 274. |
संसार में रहकर भी जो जीव प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य लेकर चलता है वह धन्य होता है क्योंकि गर्भ में की गई प्रभु से प्रतिज्ञा को वह निभाता है । |
| 275. |
यह सिद्धांत है कि हमारा मस्तक प्रभु के आगे जितना झुकता है उतना ही वह संसार में ऊँचा उठता चला जाता है । |
| 276. |
सनातन धर्म का गौरव है और भूषण है कि हमारे यहाँ विभिन्न देव, विभिन्न साधना और योग, विभिन्न पूजा पद्धति का प्रचलन है, ऐसी उदारता और कहीं नहीं मिलेगी । |
| 277. |
प्रभु की तरफ जब हम पहला कदम बढ़ाते हैं तभी प्रभु हमारे जीवन की सभी व्यवस्था करना आरंभ कर देते हैं । |
| 278. |
पांच वर्ष की अवस्था में श्री ध्रुवजी को न वन का पता था, न तप का पता था, न जप का पता था, न ध्यान का पता था, केवल भक्ति का संकल्प दृढ़ था कि मुझे प्रभु प्राप्ति करनी है । इस संकल्प से ही प्रभु रीझ गए । |
| 279. |
भक्ति मार्ग पर चलने पर प्रभु हमारी साधन क्षमता स्वयं बहुत बढ़ा देते हैं जितना कि हम सोच भी नहीं सकते । |
| 280. |
हमें अपने घर के मंदिर में और अपने मन मंदिर में प्रभु के दर्शन की आतुरता सदैव बनी रहनी चाहिए । |
| 281. |
जीवन में प्रभु को प्रसन्न करने का प्रयास सर्वप्रथम करना चाहिए । |
| 282. |
संत संसार को परदेश और प्रभु के धाम को अपना स्थाई निवास मानते हैं । |
| 283. |
समाज कभी भी बिना धर्म के सिद्धांतों के टिक ही नहीं सकता । |
| 284. |
हमारे पुराणों की शैली है कि दर्शनशास्त्र सीधे नहीं सुनाते, उन्हें कथा और दृष्टांत के माध्यम से रोचक बनाकर और सुनाकर अपनी बात हमारे हृदय में बैठाते हैं । |
| 285. |
जो सर्वत्र उपलब्ध नहीं है यानी अन्य योनियों में उपलब्ध नहीं है उस आत्म-कल्याण के साधन को प्राप्त करने के लिए ही हमें मानव जन्म मिला है । |
| 286. |
जो जीव प्रभु की भक्ति में तल्लीन है उसी का अंतःकरण शांत रह सकता है । |
| 287. |
प्रभु में परम श्रद्धा रखना ही हमारे परम उद्धार का कारण बन जाता है । |
| 288. |
हम जो भी कर्म कर रहे हैं, प्रभु के लिए और प्रभु की प्रसन्नता के लिए कर रहे हैं - यह भाव जीवन में सदैव होना चाहिए । |
| 289. |
संसार के तनाव के बीच रहकर हम शांति से परमार्थ का साधन करने में कभी सफल नहीं हो सकते । हमें संसार को भुलाकर ही परमार्थ का साधन करना पड़ेगा । |
| 290. |
शास्त्र कहते हैं कि जिन्होंने हमारे भीतर प्रभु की भक्ति नहीं जगाई वे गुरु, माता-पिता, पति-पत्नी कहलाने योग्य नहीं हैं । |
| 291. |
मृत्यु के समय संसार का कोई व्यक्ति, वस्तु काम आने वाला नहीं है, केवल प्रभु की भक्ति ही काम आने वाली है । |
| 292. |
जीवन में धीरे-धीरे संसार के सब परिचय का त्याग होना चाहिए । फिर केवल एक ही परिचय बचना चाहिए कि मैं प्रभु का दास हूँ । |
| 293. |
प्रभु की करी हुई भक्ति और सेवा ही मृत्यु के बाद हमारे साथ जाती है बाकी कुछ भी साथ नहीं जाता । |
| 294. |
धर्म का प्रवचन करना एक बात है पर धर्म को जीवन में उतारना दूसरी और सबसे बड़ी बात होती है । |
| 295. |
कथनी और करनी में जिसका अंतर समाप्त हो जाता है वह सच्चा महापुरुष कहलाता है । |
| 296. |
अपने जीवन को उस दिन ही महान मानना चाहिए जिस दिन प्रभु का महत्व जीवन में संपूर्ण और स्थाई रूप से समझ में आ जाए । |
| 297. |
जीवन की प्राथमिकता जिस दिन संसार की जगह प्रभु हो जाएं, उस दिन अपने को सच्चा भाग्यवान मानना चाहिए । |
| 298. |
तीव्र भक्ति के कारण प्रभु साक्षात्कार का समय जीवन में एक-न-एक दिन उपस्थित हो जाता है । |
| 299. |
नाम जप करते समय माला का मनका तभी आगे बढ़े जब लिया हुआ प्रभु के नाम में परिपूर्ण भाव समा जाए । |
| 300. |
बच्चों को बचपन में सिखाना चाहिए कि हम माता-पिता केवल पालक हैं, सच्चे मालिक तो प्रभु ही हैं । इसलिए बच्चों को बचपन से ही प्रभु की अंगुली पकड़ा देनी चाहिए । |
| 301. |
संसार का कोई भी कर्म करते हुए प्रभु की विस्मृति कभी भी नहीं होनी चाहिए । |
| 302. |
आत्मज्ञानी का सिद्धांत होता है कि दृष्टा बनकर संसार को देखना और उसमें फंसना नहीं । |
| 303. |
संसार के विषय हमारी इंद्रियों को, इंद्रियां बुद्धि को और बुद्धि हमारे मन को प्रभावित करके चंचल बना देती है । |
| 304. |
प्रभु की कृपा से ही हम संसाररूपी स्वप्न से बाहर निकल सकते हैं । |
| 305. |
संसार के भोगों में हमें तृप्त करने का सामर्थ्य नहीं है, केवल प्रभु की भक्ति में ही यह सामर्थ्य है । |
| 306. |
संत कहते हैं कि श्री गरुड़ पुराणजी में नर्क का वर्णन हमें सुनना चाहिए क्योंकि उसे सुनने से हमारी बुद्धि ठीक रहती है । |
| 307. |
नर्क की यातना के अलावा जीवात्मा को स्वच्छ करने का एकमात्र साधन प्रभु की भक्ति है जो पतित-से-पतित को भी पावन कर देती है । |
| 308. |
पाप शरीर से, वाणी से, मन से और बुद्धि से होता है । उससे निवृत्त होने का श्रेष्ठतम और सर्वोत्तम मार्ग भक्ति है । |
| 309. |
किसी भी कारण से, किसी भी निमित्त से प्रभु का नाम जिह्वा पर आ जाए तो इसे प्रभु की बहुत बड़ी कृपा समझनी चाहिए क्योंकि वह नाम अपना प्रभाव दिखाए बिना नहीं रहता । |
| 310. |
प्रभु के नाम जप की महिमा कलियुग में सर्वोपरि है । |
| 311. |
अंतःकरण की वासना प्रभु के नाम जप से खत्म होती है । यमदूत प्रभु के नाम जापक के पास कभी नहीं आते । कामनाओं और इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी शास्त्रों में नाम जप का ही विधान है । |
| 312. |
रोज कुछ समय घर में प्रभु नाम का संकीर्तन होना चाहिए । कलियुग उस घर में कभी प्रवेश नहीं करता जहाँ नियमित नाम जप और संकीर्तन होता है । |
| 313. |
केवल प्रभु के नाम जप से योग, यज्ञ, मंत्र, तप से प्राप्त होने वाले सभी इच्छित फल हमें प्राप्त हो जाते हैं । |
| 314. |
जहाँ प्रभु का नाम जप होता है वहाँ तंत्र-मंत्र और नकारात्मक शक्तियां अपना प्रभाव नहीं डाल सकती । |
| 315. |
विपत्ति काल में प्रभु की भक्ति को निरंतर बढ़ाना चाहिए क्योंकि विपत्ति काल भक्ति को बढ़ाने के लिए बहुत अनुकूल समय होता है । |
| 316. |
श्रेष्ठ भक्त सदैव प्रभु के दास बनकर प्रभु की भक्ति करना चाहते हैं । |
| 317. |
भक्ति मार्ग में सबसे बड़ा बाधक तत्व भक्ति का अहंकार होता है । |
| 318. |
हम अपने मानव जन्म में संसार, घर, परिवार, पदार्थ, कीर्ति, वैभव में नहीं रमे, केवल प्रभु की भक्ति में रमे, ऐसी कृपा प्रभु से मांगनी चाहिए । |
| 319. |
संसार में हमारी आसक्ति होने के कारण हमें संसार मूल्यवान लगता है जो कि बिलकुल गलत है । |
| 320. |
संसार में जहाँ भी, जिसके पास भी जो शक्ति है वह प्रभु की दी हुई शक्ति ही है । |
| 321. |
भक्ति ही हमारे भीतर सद्गुणों का विकास करती है । |
| 322. |
ऐसा कोई स्थान ब्रह्मांड में नहीं है जहाँ पर प्रभु का अस्तित्व न हो । |
| 323. |
श्री प्रह्लादजी और भगवती मीराबाई ने जहर भी पिया तो प्रभु के चरणामृत की भावना करके पिया और वह अमृत बन गया । प्रभु का विधान है कि अपने भक्तों के लिए सभी प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल देते हैं । |
| 324. |
मात्र प्रभु से ही हमारा सर्वोपरि और सबसे असाधारण रिश्ता होना चाहिए । |
| 325. |
कलियुग में मन से दिगंबर होने की जरूरत है तभी हमारा मन मायाजाल में नहीं उलझकर प्रभु की भक्ति में लगेगा । |
| 326. |
भक्ति करने से प्रभु कब हमारे पूर्व जन्मों के संचित पाप कर्मों की गठरी को अपनी कृपा से भस्म कर देते हैं, यह हमें पता भी नहीं चलता । |
| 327. |
अगर नैतिकता और चरित्र हमारे पास है तो इसे कलियुग में प्रभु की बहुत बड़ी कृपा माननी चाहिए । |
| 328. |
प्रभु की कृपा से वंचित होने पर ही जीवन में हमारा पतन होता है । |
| 329. |
शास्त्र कहते हैं कि हमारी योग्यता नहीं कि हम हजारों जन्मों के पुण्य के बदले भी प्रभु के श्रीकमलचरण तो क्या, श्री चरणरज के दर्शन भी पा सकें । पर ऐसा केवल और केवल भक्ति के कारण ही संभव होता है । |
| 330. |
जितनी नाजों से हमारे माता-पिता ने प्रभु की ममतारूपी कृपा के कारण हमें रखा उससे भी कोटि-कोटि गुना ज्यादा नाजों से, सुख-सुविधा से प्रभु को हमें अपने घर की श्री ठाकुरबाड़ी में विराजमान करना चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए । |
| 331. |
चाहे कोई भाव से, कुभाव से, अभाव से, कामना से, लोभ से, क्रोध से प्रभु का चिंतन करता है तो भी उसका कल्याण ही होता है । |
| 332. |
अपनी सभी प्रिय चीजें सदैव प्रभु को अर्पण करनी चाहिए और फिर ही उनको जीवन में स्वीकार करना चाहिए । |
| 333. |
प्रभु की श्रीलीलाओं में हमें सदैव श्रद्धा भाव से प्रवेश करना चाहिए, तर्क बुद्धि से कदापि नहीं करना चाहिए । |
| 334. |
हर जीवात्मा में प्रभु तत्व को देखना हमें भक्ति सिखाती है । |
| 335. |
प्रभु का नाम लेने का अवसर जीवन में कभी भी चूकें तो उसका मलाल होना चाहिए जैसे लोभी को धन हानि का मलाल होता है । |
| 336. |
प्रभु से सच्चे भक्त मांगते हैं कि उन्हें जग अच्छा नहीं लगे और वे जग को अच्छा नहीं लगें । इससे वे जग के आकर्षण से बच जाते हैं । |
| 337. |
भक्ति के बल पर ही हमारे भीतर सात्विक सद्बुद्धि का जागरण संभव होता है । |
| 338. |
भक्ति करने पर इंद्रियों का संयम सफलता से किया जा सकता है । |
| 339. |
प्रभु में हमारी श्रद्धा, आस्था और निष्ठा सदैव अटूट होनी चाहिए । |
| 340. |
श्रेष्ठ भक्त कभी भी प्रभु से मुक्ति भी नहीं मांगते । वे प्रभु से केवल और केवल प्रतिक्षण वर्धमान होने वाली भक्ति ही मांगते हैं । |
| 341. |
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| 705. |
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| 707. |
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| 708. |
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| 710. |
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| 711. |
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| 714. |
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| 715. |
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| 716. |
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| 717. |
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| 718. |
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| 719. |
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| 721. |
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| 722. |
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| 781. |
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| 782. |
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| 784. |
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| 785. |
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| 789. |
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| 790. |
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| 794. |
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| 795. |
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| 796. |
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| 797. |
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| 798. |
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| 799. |
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| 800. |
|